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शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की मुराद नहीं हुई पूरी, अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला

सुप्रीम कोर्ट में आज (नवंबर 25, 2019) लगातार दूसरे दिन महाराष्ट्र के मामले पर सुनवाई हुई। देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण के खिलाफ शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की संयुक्त याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने फैसला मंगलवार तक के लिए सुरक्षित रख लिया। अभिषेक मनु सिंघवी की ओर से तीन दलों के पास 154 विधायकों का समर्थन होने की एफिडेविट स्वीकार करने से अदालत ने इनकार करते हुए कहा कि फैसला इस पर होना है कि मुख्यमंत्री सदन में बहुमत हासिल कर पाते हैं या नहीं।

महाराष्ट्र में शनिवार (नवंबर 23, 2019) तड़के राष्ट्रपति शासन समाप्त किए जाने के बाद फडणवीस और पवार ने शपथ ली थी। सोमवार को सुनवाई के दौरान तत्काल बहुमत परीक्षण की मॉंग को टालते हुए अदालत ने सरकार बनाने के आमंत्रण और दावे से जुड़े दस्तावेज सौंपने को कहा था।

जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गवर्नर के सचिव की चिट्ठी अदालत को सौंपी, जिसमें विधायकों के हस्ताक्षर थे। तुषार मेहता ने कहा कि अजित पवार द्वारा 22 नवंबर को पत्र दिया गया था। पत्र में कहा गया था कि एनसीपी के सभी 54 विधायकों ने उन्हें नेता चुना है और सरकार बनाने के लिए अधिकृत किया गया है। इस चिट्ठी में 54 विधायकों के हस्ताक्षर थे।

तुषार मेहता ने समर्थन की चिट्ठी कोर्ट में पेश करते हुए कहा कि इसी चिट्ठी के आधार पर राज्यपाल ने शपथ दिलाई। मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि 12 नवंबर के बाद राज्यपाल के पास क्यों नहीं गए याचिककर्ता? उन्होंने कहा कि सभी के मना करने के बाद राज्यपाल ने ये फैसला किया। सॉलिसिटर जनरल ने गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी को अजित पवार के द्वारा लिखा गया समर्थन पत्र पढ़ा, जिसमें अजित पवार ने कहा था कि उनके पास 54 विधायक हैं और वो BJP को समर्थन दे रहे हैं। इसलिए वो चाहते है कि देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ के लिए बुलाया जाए।

तुषार मेहता ने राज्यपाल के उस पत्र को कोर्ट में पढ़कर सुनाया, जिसमें उल्लेख किया गया था कि फडणवीस-पवार सरकार को 170 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। मेहता ने कोर्ट के सामने फडणवीस के उस पत्र को भी पढ़ा, जिसमें कहा गया था कि पहली बार जब उन्हें सरकार बनाने के लिए बुलाया गया था, तो उनके पास संख्याबल नहीं था, लेकिन अब अजित पवार के समर्थन के बाद उनके पास बहुमत है।

महाराष्ट्र सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि गवर्नर पर विपक्षों का हमला पूरी तरह से निराधार है। किसी व्यक्ति को चुनने में राज्यपाल को पूर्ण विवेक होता है। फ्लोर टेस्ट कब आयोजित करना है, यह भी राज्यपाल का विवेक है। इस दौरान जस्टिस खन्ना ने कहा कि पिछले सभी मामलों में 24 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट हुआ है। उनका कहना था कि बहुमत गवर्नर हाउस में नहीं, बल्कि सदन के पटल पर तय किया जाता है।

अजित पवार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए वकील मनिंदर सिंह ने कहा कि उनकी विधायकों की लिस्ट तथ्यात्मक, कानूनी और संवैधानिक रूप से सही है। वो समर्थन देने के लिए अधिकृत थे। उन्होंने कहा कि अजित पवार 22 नवंबर को विधायक दल के नेता थे और उन्होंने विधायक दल के प्रमुख के रूप में 22 नवंबर को बीजेपी को समर्थन दिया और राज्यपाल ने इसी आधार पर विवेक का इस्तेमाल करते हुए फैसला लिया।

वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि 22 की रात को प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें कॉन्ग्रेस-एनसीपी और शिवसेना ने सरकार बनाने की बात कही। सभी ने कहा कि उद्धव सीएम होंगे लेकिन सुबह 5 बजे ही फडणवीस सीएम बन गए। उन्होंने कहा कि ऐसी कौन सी इमरजेंसी थी कि सुबह सवा 5 बजे राष्ट्रपति शासन हटाया गया और शपथ दिलवा दी गई। इमरजेंसी का खुलासा होना चाहिए। इस पर जस्टिस खन्ना का कहना है कि कोर्ट राष्ट्रपति शासन को रद्द करने के सवाल पर सुनवाई नहीं कर रहा है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने फौरन फ्लोर टेस्ट की माँग करते हुए कहा कि दोनों पक्ष फ्लोर टेस्ट को सही कह रहे हैं तो फिर इसमें देरी क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि कुछ छिपाया जा रहा है। अजित पवार की चिट्ठी फर्जी है। वहीं तुषार मेहता ने अजित पवार के विधायक दल के नेता से हटाए जाने पर कहा कि जो नई चिट्ठी सौंपी गई है, उसमें 12 विधायकों के हस्ताक्षर गायब हैं। मुकुल रोहतगी ने एक याचिका पर तीन वकीलों के दलील देने पर भी आपत्ति जताई।

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900 ISIS आतंकियों ने अफ़ग़ानिस्तान में किया सरेंडर, 10 महिलाएँ-बच्चे केरल से: रिपोर्ट

अफ़ग़ानिस्तान के अधिकारियों के सामने 900 ISIS आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण किया। हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी 10 महिलाएँ और बच्चे हैं, जो भारतीय आतंकवादियों के परिवार से हैं। इन 10 महिलाओं और बच्चों में से अधिकांश केरल के हैं।

ख़बर के अनुसार, आतंकवादियों ने पूर्वी प्रांत नांगरहार में आत्मसमर्पण किया है, जहाँ अफ़ग़ान राष्ट्रीय सुरक्षा बल ISIS के ख़िलाफ़ ऑपरेशन कर रहे हैं। आतंकी संगठन के ख़िलाफ़ 12 नवंबर को ऑपरेशन शुरू हुआ। 12 नवंबर को शुरू हुए आतंकी संगठन के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान के आक्रामक हमले के कुछ ही घंटों बाद 93 आतंकवादियों ने, जिनमें कई पाकिस्तानी शामिल थे, उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था।

मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक, केरल के कई आतंकवादी 2016 से अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा पर थे। कुछ ने तो इस आतंकी संगठन में शामिल होने के लिए इस्लाम धर्म क़बूल कर लिया था। इनमें से कई अपने परिवार को भी साथ ले जाते हैं। माना जाता है कि जिन 10 महिलाओं और बच्चों ने आत्मसमर्पण किया है, वे ISIS आतंकवादियों के पारिवारिक सदस्य हैं, जिन्होंने भारत से अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की थी। अधिकारियों ने कथित तौर पर कहा है कि वे उन सभी आतंकवादियों के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है।

यह भी बताया जा रहा है कि 10 महिलाएँ और बच्चे, अधिकतर केरल से आए आतंकवादियों के परिवार हैं, जो काबुल में स्थानांतरित कर दिए गए। अफ़ग़ान ख़ुफ़िया एजेंसी, राष्ट्रीय सुरक्षा निदेशालय की एक विशेष टीम, आत्मसमर्पण करने वाले लोगों का ब्यौरा इकट्ठा कर रही है।

हाल ही में यह बताया गया था कि ISIS या ISIS-K के खुरासान समूह ने पिछले साल भारत में आत्मघाती हमले का प्रयास किया था। अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने यह दावा किया था। राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के कार्यवाहक निदेशक, राष्ट्रीय ख़ुफ़िया विभाग के निदेशक रसेल ट्रैवर्स के अनुसार, ISIS-K दक्षिण एशिया में संचालित होता है। ISIS-K अमेरिका के लिए चिंता का कारण बना हुआ है।

ट्रैवर्स ने आगे कहा कि दो साल पहले ISIS-K ने अमेरिका की धरती पर हमले का प्रयास किया था, लेकिन एफबीआई ने इसे रोक दिया। इसके अलावा, उन्होंने सांसदों से कहा कि किसी भी गणना के अनुसार, 9/11 के समय के लोगों की तुलना में अब अधिक कट्टरपंथी व्यक्ति हैं।

ISIS के मुख्य आतंकवादी अबू बक्र अल-बगदादी के उत्तर पश्चिमी सीरिया में अमेरिकी सेना द्वारा मारे जाने के कुछ दिनों बाद, ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि आतंकवादी संगठन अफ़ग़ानिस्तान में अपना आधार बदल रहा है।

उन्होंने कहा था कि ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान सीमा पर जो हालिया हमले किए गए, वे ISIS ने अफ़ग़ानिस्तान से बाहर होते हुए किए थे। घातक बंदूक की लड़ाई में एक दर्जन से अधिक लोग मारे गए।

ज़रीफ़ ने कहा कि उनकी सरकार ISIS के अपडेट के बारे में भारतीय एजेंसियों के साथ नियमित सम्पर्क में है। अफ़ग़ानिस्तान में बेस शिफ्ट करने वाला आतंकी समूह पाकिस्तान, रूस और चीन जैसे अन्य दक्षिण एशियाई देशों के लिए भी ख़तरा बना हुआ है। उन्होंने कहा, “यह (आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई) एक ऐसा मुद्दा है, जो हम सभी को एकजुट कर सकता है।” ज़रीफ़ ने कहा कि इन सभी देशों को आतंकी समूह से निकलने वाले खतरे से लड़ने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता है।

नशे में धुत हो धार्मिक समारोह में गा रहा था गाना, लोगों ने स्टेज पर चढ़कर की पिटाई: Video वायरल

धार्मिक समारोह में शराब पीकर लोकसंगीत गाना एक गायक को महंगा पड़ गया। सोशल मीडिया में वायरल हुए एक वीडियो में देखा जा सकता है कि धार्मिक समारोह के दौरान वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने नशे में धुत गायक को स्टेज पर चढ़कर चांटा जड़ दिया। उसके बाद भी उस व्यक्ति का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वह दोबारा गायक को मारने के लिए आगे बढ़ा। मामले को वहीं रोकने के लिहाज से दूसरे युवक को स्टेज पर चढ़ दखल देना पड़ा।

सोशल मीडिया पर इस वीडियो को गुजरात के पत्रकार जनक दवे ने शेयर करते हुए पूरे मामले की जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि समारोह में गायक शराब पीकर गाना गा रहा था। इस दौरान उसका न सुर मिल रहा था और न ताल। वहाँ मौजूद लोगों ने उसकी धुनाई कर दी। पत्रकार दवे के अनुसार कार्यक्रम धार्मिक था। लिहाजा लोगों को गायक की यह हरकत और नागवार गुजरी।

बता दें ये वीडियो गुजरात के बोताड का है। जिसमें मात्र 13 सेकेंड में ही गायक की आवाज सुनकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वो अपने होश में नहीं था और जनता को बरगलाने के लिए कुछ भी गा रहा था। ऐसे में उसके सुर लगातर बिगड़ रहे थे, जिससे वहाँ मौजूद जनता निराश तो हो रही थी, लेकिन कुछ बोल नहीं पा रही थी। तभी एक युवक से ये सब बर्दाशत नहीं हुआ और वह स्टेज पर चढ़ गया। पहले उसने गायक को एक चांटा मारा और फिर दूसरा। इसके बाद वहाँ बैठे अन्य लोग भी गायक का विरोध करने लगे। कुछ लोग स्टेज पर भी आए, ताकि गुस्साए युवक से गायक को बचाया जा सके।

गौरतलब है कि गुजरात एक ऐसा प्रदेश है जहाँ शराब खरीदना और शराब बेचना दोनों निषेध है।

दिल्ली प्राइड परेड: ‘कश्मीर माँगे आज़ादी’, ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’ के लगे नारे

दिल्ली में रविवार (24 नवंबर) को समलैंगिकों ने प्राइड परेड का आयोजन किया। इस दौरान कई आपत्तिजनक और देश विरोधी नारे लगे।

इस प्राइड परेड की एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर पत्रकार बोधिसत्व सेन रॉय ने शेयर की। इसमें आप देख सकते हैं कि परेड में शामिल लोगों ने किस तरह भड़काऊ और देशविरोधी नारे लगाए। उन्होंने कश्मीर का मुद्दा उठाते हुए नारे लगाए, इनमें ‘कश्मीर माँगे आज़ादी’, ‘तुम पुलिस बुआओ’, ‘तुम गोलो चालाओ’, ‘लाठी मारो’ जैसे भड़काऊ नारे शामिल हैं।

दिल्ली प्राइड परेड के दौरान ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’ लिखित प्लेकार्ड भी देखे गए।

इसके अलावा कुछ ने राजनीतिक नारे लगाकर प्रधानमंत्री को निशाना बनाया।

समलैंगिकों ने अपनी इस प्राइड परेड के दौरान हाथों में प्रधानमंत्री मोदी पोस्टर लेकर उनका मज़ाक उड़ाया।  

और हाँ, ‘भगवा’ नफ़रत का रंग है।

दरअसल, समलैंगिक (LGBTQ) समुदाय ने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भारत सरकार द्वारा लाए जा रहे बिल में कुछ प्रावधानों का विरोध किया है। इनका आरोप है कि सरकार ने क़ानून के प्रारूप में पहले ट्रांसजेंडर के तौर पर पंजीयन कराने और फिर सर्जरी का सबूत देने की बाध्यता रखी है।

समलैंगिक समुदाय की माँग है कि सरकार इस तरह के किसी प्रावधान को क़ानून में शामिल न करे। समुदाय अपनी पहचान किसी भी जेंडर में कराने को तैयार हैं। पदयात्रा के दौरान जारी एक वक्तव्य में समुदाय ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ख़ुश तो हैं, लेकिन अभी तक उनकी स्वीकार्यता समाज में नहीं बन पाई है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल समलैंगिक संबंधो पर फ़ैसला देते हुए अंग्रेजों के ज़माने के क़ानून को निरस्त करने का आदेश दिया था। इस पुराने क़ानून में समलैंगिक संबंधो के आरोप सही पाए जाने पर दस साल की सज़ा का प्रावधान था।

अयोध्या में राम मंदिर: 75 साल बाद वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों से हटेगा बाबरी मस्जिद का नाम

राम जन्मभूमि मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब सुन्नी वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों से बाबरी मस्जिद का नाम हटाने की कवायद शुरू हो गई है। यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड में 26-फैजाबाद’ नाम से दर्ज वक्फ सम्पत्ति ‘‘बाबरी मस्जिद’ को जल्द ही वक्फ बोर्ड के राजस्व अभिलेख से हटाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि वक्फ बोर्ड की 26 नवंबर की बैठक में इस पर फैसला लिया जाएगा। इसी बैठक में बोर्ड यह भी फैसला करेगा कि मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन ली जाए या नहीं। 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि से अलग मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए पॉंच एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था। इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने की बात बोर्ड पहले ही कह चुका है।

जानकारी के मुताबिक बोर्ड के दस्तावेज में 1 लाख 23 हजार से ज्यादा संपत्तियाँ दर्ज हैं। बता दें कि 75 साल पहले 1944 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद का नाम दर्ज कराया था। ये वक्फ नंबर 26 पर बाबरी मस्जिद अयोध्या जिला फैजाबाद नाम से दर्ज है। जिसे अब हमेशा के लिए हटाया जा सकता है।

मंगलवार (26 नवंबर, 2019) को लखनऊ में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की अहम बैठक होगी। माल एवेन्यू स्थित बोर्ड के कार्यालय में 11 बजे से होने वाली बैठक में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के बाबरी मस्जिद से जुड़े मुकदमे पर गौर किया जाएगा। बोर्ड की बैठक में कुल 8 सदस्य शामिल होंगे। इनमें चेयरमैन जुफर फारुकी के अलावा अदनान फरूखशर, अबरार अहमद, मोहम्मद जुनैद सिद्दीकी, सैय्यद अहमद अली, मोहम्मद जुनीद, इमरान माबूद खां और अब्दुल रज्जाक खां शामिल होंगे।

बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारुकी ने हिन्दुस्तान से कहा कि बैठक में हम लोग इस बात पर फैसला लेंगे कि उच्च्तम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में बोर्ड को क्या करना है? अपनी बैठक में बोर्ड यह फैसला करेगा कि 5 एकड़ जमीन उसे कुबूल है अथवा नहीं। अगर कुबूल है तो उस जमीन पर मस्जिद के अलावा और क्या-क्या निर्माण होगा।

इस मामले में कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दस्तावेज से बाबरी मस्जिद का नाम हटाना एक प्रक्रिया है, जिसे वक्फ बोर्ड को पूरा करना है। इस बीच कुछ मुस्लिम पक्षों के द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात भी सामने आई है। मगर कानून के जानकारों के मुताबिक यदि मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से पुनर्विचार याचिका दाखिल की भी जाती है तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के दस्तावेज से बाबरी मस्जिद का नाम हटाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

पंजाब में 16 साल के किशोर को दलितों ने खँभे से बाँधा, पेट्रोल छिड़क जिंदा जलाया, 3 गिरफ्तार

कॉन्ग्रेस शासित पंजाब के मनसा से एक दिल दहला देने वाली खबर आई है। जानकारी के अनुसार शनिवार (नवंबर 23, 2019) को तीन युवकों ने एक 16 साल के किशोर को खँभे में बाँधकर जिंदा जला दिया। दोनों पक्ष दलित समुदाय के बताए जा रहे हैं। पुलिस ने मृतक बच्चे का शव रविवार (नवंबर 24, 2019) को बरामद कर लिया।

मनसा नगर पुलिस थाने के एसएचओ सुखजीत सिंह ने बताया कि जसप्रीत सिंह (मृतक) को पहले खँंभे से बाँधा गया और फिर पेट्रोल छिड़क कर उसे आग लगा दी गई। उसकी मौक़े पर ही मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इनकी पहचान जश्न सिंह, गुरजीत सिंह और राजू सिंह के रूप में हुई है।

एचएचओ सुखजीत के अनुसार, जसप्रीत के बड़े भाई, कुलविंदर सिंह ने करीब ढाई साल पहले जश्न सिंह की बहन को भगाकर उससे शादी कर ली थी और फिर दोनों शहर से 30 किमी दूर बुधलाढा में बस गए थे। इस घटना के बाद दोनों लोग एक बार भी अपने परिवारजनों से मिलने के लिए वापस नहीं लौटे। अब उनका एक साल का बेटा भी है। कथित तौर पर इस संबंध को लेकर जश्न और उसके परिवारवालों को जसप्रीत चिढ़ाता था। वह कहता था कि कुलविंदर जल्द घर लौटेगा और उनके साथ ही रहेगा। जिससे लड़की के घरवाले बहुत तंग हो गए थे।

दरअसल, जश्न के परिवार वालों के मुताबिक वे इस शादी से खुश नहीं थे और वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी दोबारा इस इलाके में लौटे। लेकिन जसप्रीत के लगातार चिढ़ाने से वो परेशान हो गए और इस घटना को अंजाम दिया।

मृतक के पिता के अनुसार शुक्रवार (नवंबर 22, 2019) की रात जश्न और उसके रिश्ते का भाई गुरजीत, अपने दोस्त राजू के साथ उनके घर आए और जसप्रीत को साथ ले गए। जब बहुत देर बाद भी उनका बेटा घर नहीं लौटा तो उन्होंने पुलिस थाने में मामले की रिपोर्ट लिखवाई। पुलिस ने लड़के की खोजबीन शुरू की और रविवार को उसका शव बरामद किया।

बता दें इस मामले पर पंजाब राज्य के अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष तेजिंदर कौर ने संज्ञान लेने से मना किया है। उन्होंने कहा है कि उनका आयोग दलित बनाम अन्य जाति वाले मामलों पर काम करता है, न कि दलित बनाम दलित। लेकिन इस घटना को बर्बर बताते हुए उन्होंने आरोपितों के लिए कानून के अनुसार सजा दी जाने की माँग की है। इसके अलावा जमीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के अध्यक्ष मुकेश मालौद ने भी कहा है कि वे केवल अपराध और भेदभाव (स्वर्ण बनाम दलित) से जुड़े मामलों में कदम उठाते हैं। लेकिन ये मानते है कि ये एक शर्मनाक घटना है और इसके लिए आरोपितों को अवश्य ही सजा मिलनी चाहिए।

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समुदाय विशेष के किशोरों ने धर्मस्थल में घुस शिवलिंग को किया अपवित्र, 2 को लोगों ने दबोचा

उत्तर प्रदेश के बदायूं में धर्मिक स्थल को अपवित्र करने को लेकर दो समुदायों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया है। बदायूं के फैजगंज बेहटा क्षेत्र में दूसरे समुदाय के तीन किशोर एक धर्मस्थल में घुसकर शिवलिंग को अपवित्र कर रहे थे। वहाँ गंदगी फैला रहे थे। लोगों को जब इसकी जानकारी मिली तो आक्रोश फैल गया।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दो आरोपित को पकड़कर पुलिस को लोगों ने सौंपा दिया। तीसरा भीड़ का फायदा उठाकर भागने में कामयाब रहा। घटना के बाद से इलाके में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है। एफआईआर दर्ज कर
पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है।

रिपोर्टों के मुताबिक कस्बे के श्मशान भूमि वाली सड़क पर ग्राम समाज की जमीन पर काफी पुराना एक धर्मिक स्थल है। आसपास के इलाके से लोग यहाँ पूजा-अर्चना करने आते हैं। रविवार (नवंबर 24, 2019) शाम तकरीबन साढ़े चार बजे कस्बा निवासी आशीष तिवारी, रमाकांत व संतराम मिश्रा खेत की ओर जा रहे थे। इस दौरान उनकी नजर धार्मिक स्थल पर पड़ी तो देखा कि दूसरे समुदाय के तीन किशोर उसे अपवित्र कर रहे हैं।

शोर मचाने पर आसपास के लोग मौके पर पहुँचे और तीनों को दबोच लिया गया। हालाँकि एक आरोपित भीड़ को चकमा देकर फरार हो गया। मामले की जानकारी पर पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँची और आरोपितों को अपने साथ थाने ले गई। पूछताछ के दौरान ही आरोपितों के बचाव में उनके परिजनों के पहुँचने पर लोग भड़क गए।

हालात तनावपूर्ण होते देख बिसौली के सीओ राघवेंद्र सिंह भी फोर्स लेकर घटनास्थल पर आ गए। वार्ड संख्या चार निवासी आशीष तिवारी ने पुलिस को घटना की तहरीर दी। साथ ही स्थानीय लोगों से पूरा मामला गंभीरता से सुनने के बाद सीओ ने पुलिस को घटना का मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया। पुलिस ने तीनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है। सीओ ने बताया कि इलाके में पुलिस तैनात कर दी गई है और पकड़े गए लड़कों को सोमवार (नवंबर 25, 2019) को बाल गृह बरेली भेजा जाएगा। 

आसिफ ने लड़की को प्रेमजाल में फँसाया, कार में रेप करने के बाद जंगल के पास छोड़कर फरार

लड़की को प्यार के जाल में फँसाकर उसकी इज्जत लूटने की एक और घटना सामने आई है। मामला गाजियाबाद के लालकुआँ का है। आरोपित युवक ने लड़की को मिलने के बहाने बुलाया। फिर, कार में उसके साथ बलात्कार किया। बलात्कार के बाद पीड़िता को सुनसान जगह पर छोड़ फरार हो गया। आरोपित की पहचान आसिफ के तौर पर की गई है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 22 वर्षीय पीड़िता नोएडा के एक कॉल सेंटर में काम करती है और गाजियाबाद मसूरी की रहने वाली है। 5 माह पहले वह अपनी दादी के मायके बुलंदशहर के जहाँगीराबाद गई थी। वहाँ उसकी पहचान पड़ोस में रहने वाले आसिफ से हुई। आसिफ शाहबेरी में फर्नीचर का काम करता था। धीरे-धीरे दोनों में बातें होनें लगीं और मामला शारीरिक संबंध तक पहुँच गया।

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लड़की का आरोप है कि आसिफ ने शादी का झाँसा दे उसके साथ संबंध बनाए। जब वह गर्भवती हो गई तो उसने उसका गर्भपात करवा दिया। इसके बाद से ही उसने आसिफ से दूरी बनानी शुरू कर दी।

बीते शनिवार (नवंबर 23, 2019) को आसिफ ने उसे गाजियाबाद के लालकुआँ बातचीत करने के लिए बुलाया। इसी दौरान कार में उसके साथ रेप किया। लड़की ने विरोध किया तो उसे दादरी बाइपास से सटे जंगल के पास छोड़कर फरार हो गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है। दादरी के कोतवाली इंचार्ज दिनेश सिंह ने बताया कि जल्द ही आरोपित गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

बता दें इस मामले के अलावा कल गुड़गाव और मुजफ्फनगर से भी रेप के मामले आए हैं। गुड़गाँव में जहाँ 22 साल के बिंदु नामक युवक ने 12 साल की लड़की का बलात्कार कर उसे मुँह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी। तो वहीं, यूपी के मुजफ्फरनगर जिले में 26 साल के एक युवक ने 24 साल की युवती का अपहरण कर उसके साथ चलती कार में बलात्कार किया। इस दौरान आरोपित सुबोध के साथियों ने पूरी वारदात का वीडियो भी बनाया। अपहरण के कुछ घंटों बाद लड़की को उसके कॉलेज के बाहर छोड़ते हुए आरोपितों ने घटना के बारे में किसी को बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।

महाराष्ट्र पर ‘सुप्रीम’ फैसला आज, एनसीपी का दावा- लौटे आए 54 में से 52 विधायक

महाराष्ट्र में शनिवार (नवंबर 23, 2019) सुबह हुए सियासी उलटफेर के मामले में उच्चतम न्यायालय आज (नवंबर 25, 2019) दूसरे दिन फिर सुनवाई करेगी। बता दें कि महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के मुख्यमंत्री और अजित पवार के उप मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने को लेकर शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने सर्वोच्च अदालत में चुनौती दे रखी है। तीनों दलों की संयुक्त याचिका में राज्यपाल द्वारा 23 नवम्बर को भाजपा सरकार को सरकार बनाने के लिए दिए गए निमंत्रण को रद्द करने का आदेश देने की माँग की गई है। इस याचिका पर रविवार को जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने सुनवाई की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सोमवार (नवंबर 25, 2019) सुबह 10:30 बजे राज्यपाल का आदेश और फडणवीस की तरफ से उन्हें सौंपे गए समर्थन पत्र की कॉपी पेश करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस, उप मुख्यमंत्री अजित पवार, केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को भी नोटिस जारी कर जवाब माँगा था। 

इस बीच, एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक ने दावा किया है कि पार्टी के 54 में से 52 विधायक शरद पवार के साथ एकजुट हैं और अजित पवार अब अकेले पड़ गए हैं। अजित पवार को मनाने की कोशिशें भी जारी है। एनसीपी नेता छगन भुजबल सोमवार की सुबह उनसे मिलने पहुॅंचे। इससे पहले शिवसेना के नेता ने भी उनसे मुलाकात की थी। इस मसले पर आज संसद में भी हंगामा होने के आसार हैं। लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी और लोकसभा में पार्टी के चीफ व्हिप के. सुरेश ने महाराष्ट्र मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है। विनय विश्वम ने राज्यसभा में स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है।

शिवसेना का दावा है कि शिवसेना-एनसीपी- कॉन्ग्रेस गठबंधन के पास 165 विधायकों का समर्थन है और वह आसानी से विधानसभा में बहुमत साबित कर देगा। वहीं भाजपा ने दावा किया है कि फडणवीस के पास 170 विधायकों का समर्थन है। बता दें कि 288 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए 145 विधायकों की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट में रविवार को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति एन वी रमन, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस गठबंधन को कोई अंतरिम राहत नहीं दी और फडणवीस सरकार को 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने का कोई निर्देश जारी नहीं किया। अदालत ने कहा कि सोमवार को दोनों पत्रों को पढ़ने के बाद ही इस मुद्दे पर विचार करेगी।

पीठ ने कहा था, ‘‘राज्यपाल के आदेश के साथ ही देवेन्द्र फडणवीस द्वारा सौंपे गए पत्रों को पढ़ने के बाद ही मुद्दों पर विचार किया जाएगा और याचिकाकर्ताओं द्वारा 24 घंटे के अंदर शक्ति परीक्षण कराने की माँग पर विचार किया जाएगा। हालाँकि, राज्य सरकार की तरफ से कोई पेश नहीं हुआ लेकिन हम तुषार मेहता से आग्रह करते हैं कि कल सुबह साढ़े दस बजे तक उन दोनों पत्रों को पेश करें जब मामले की सुनवाई शुरू होगी ताकि हम उचित आदेश पारित कर सकें।’’

कोर्ट में शिवसेना की तरफ से पेश हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि जिस तरीके से सुबह पाँच बजकर 47 मिनट पर राष्ट्रपति शासन हटाया गया यह ‘‘विचित्र’’ था, क्योंकि कैबिनेट की कोई बैठक नहीं हुई और यह स्पष्ट नहीं था कि किस आधार पर राज्यपाल ने इसकी अनुशंसा की। इसके साथ ही जिस तरीके से सुबह आठ बजे मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को शपथ ग्रहण कराया गया उस पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए और कहा कि यह ‘‘रहस्यों से घिरा’’ है और सार्वजनिक पटल पर दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं कि किस तरह से सरकार का गठन किया गया।

वहीं एनसीपी और कॉन्ग्रेस की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सरकार बनाने के लिए फडणवीस को निमंत्रण देने का राज्यपाल का निर्णय ‘‘धोखेबाजी’’ और ‘‘लोकतंत्र का विनाश’’ करना है। सिंघवी ने कोर्ट से कहा कि जोड़-तोड़ की राजनीति को रोकना जरूरी है, इसलिए जल्द से जल्द फ्लोर टेस्ट हों। सुप्रीम कोर्ट आज फिर इस पर सुनवाई करेगी, जिसके बाद महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है।

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महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस पर बहुमत साबित करने की बड़ी जिम्मेदारी है क्योंकि ये पूरे भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। अब भाजपा ने ज़मीन पर इसकी पूरी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को दी है। कहा जाता है कि राणे के दोस्त सभी पार्टी में हैं। वो बाल ठाकरे की रिमोट कंट्रोल वाली सरकार में मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। भाजपा को उनके अनुभव का फ़ायदा मिल सकता है। नारायण राणे की एक ख़ास बात ये भी है कि वो फ़िलहाल तो भाजपा में हैं लेकिन कभी शिवसेना और कॉन्ग्रेस में भी रह चुके हैं। दोनों दलों में उनका प्रभाव है।

राज्यसभा सांसद नारायण राणे के शिवसेना और कॉन्ग्रेस के कई नेताओं से अभी भी काफ़ी दोस्ताना संबंध हैं। जब उन्होंने 2017 में कॉन्ग्रेस छोड़ी थी, तभी उन्होंने कहा था कि उनके दोस्त सभी पार्टियों में हैं। हाँ, नारायण राणे को दो नेताओं से चिढ़ ज़रूर है। उन्होंने कहा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण उनके दोस्त नहीं हैं। आज जब शिवसेना और कॉन्ग्रेस के यही दोनों नेता बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, नारायण राणे के लिए उन्हें पटखनी देने का ये मौक़ा व्यक्तिगत भी हो चुका है।

यह भी जानने वाली बात है कि जब नारायण राणे को राज्यसभा भेजा गया था, तब शिवसेना ने इसका विरोध किया था। भाजपा ने अपने सहयोगी की आपत्ति को दरकिनार करते हुए राणे को राज्यसभा भेजा। नारायण राणे को शिवसेना का वो विरोध भी याद ही होगा। ताज़ा विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नारायण राणे की ‘महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष’ पार्टी का भाजपा में विलय कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी। जब हाल ही में महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा था, तब राणे ने कहा था कि वो भाजपा की सरकार के लिए सभी ‘साम, दाम, दंड और भेद’ अपनाएँगे।

नारायण राणे ने कहा कि उन्हें बस 40 और विधायकों का जुगाड़ करना है क्यों भाजपा के पास पहले से ही 105 विधायक हैं। युवाकाल से ही शिवसेना के साथ रहे राणे को बाल ठाकरे ने 1999 में मुख्यमंत्री बना कर उनकी वफादारी का इनाम दिया था। वो उद्धव ठाकरे के पुराने आलोचक रहे हैं और उन्हें क्षमतावान नहीं मानते हैं। वो कॉन्ग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण सरकार में राजस्व मंत्री बने और फिर आलाकमान के ख़िलाफ़ बोलने के लिए 2008 में निकाल बाहर किए गए। बाद में कॉन्ग्रेस ने उन्हें फिर अपनाया। 2017 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और तभी से उनका झुकाव भाजपा की तरफ उठा।

राणे पहले ही कह चुके हैं कि शिवसेना और कॉन्ग्रेस के कई विधायक उनके संपर्क में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल को भी देवेंद्र फडणवीस की मदद के लिए बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। अगर सुप्रीम कोर्ट फ़ौरन बहुमत साबित करने का आदेश देता है तो सदन में भाजपा के लिए मुश्किलें आ सकती हैं, ये बात पार्टी को भी पता है।