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‘दलित बच्चों को भेजेंगे विदेश, सारा खर्चा हम उठाएँगे’ : अम्बेडकर विवाद को भुनाने में जुटी AAP, दिल्ली चुनाव से पहले किया ‘अम्बेडकर सम्मान स्कॉलरशिप योजना’ का ऐलान

डॉ भीमराव अम्बेडकर को लेकर चल रहे राजनीतिक बवाल का फायदा उठाने का प्रयास आम आदमी पार्टी (AAP) ने किया है। भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच डॉ अम्बेडकर के सम्मान को लेकर जारी बहस के बीच केजरीवाल ने उनके नाम पर एक योजना चालू करने का ऐलान किया है। यह योजना दलित छात्रों के लिए लाई गई है।

शनिवार (21 दिसम्बर, 2024) को दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने इस योजना की जानकारी दी। केजरीवाल यहाँ ‘डॉक्टर अंबेडकर सम्मान स्कॉलरशिप’ का ऐलान किया, जिसका फायदा दलित बच्चों को दिया जाएगा। केजरीवाल ने कहा है कि यह योजना उन दलित बच्चों को फायदा देगी जो विदेश जाकर पढ़ना चाहते हैं। उन बच्चों को दिल्ली सरकार स्कॉलरशिप देगी।

केजरीवाल ने कहा कि विदेशों में दलित बच्चों की पढ़ाई के साथ ही उनके आने-जाने का भी खर्च भी दिल्ली सरकार उठाएगी। यह योजना उन बच्चों पर भी लागू होगी, जिनके माता-पिता सरकारी सेवा में हैं। हालाँकि, केजरीवाल ने यह नहीं बताया कि यह योजना कब से चालू होगी और इसका फायदा कैसे लिया जा सकेगा।

केजरीवाल ने यह ऐलान ऐसे समय में किया है जब भाजपा डॉ अम्बेडकर के अपमान को लेकर कॉन्ग्रेस पर हमलावर है और इतिहास के पन्नों से लगातार चौंकाने वाली जानकारियाँ सामने रख रही है। वहीं कॉन्ग्रेस गृह मंत्री अमित शाह पर डॉ अम्बेडकर का अपमान करने का आरोप लगा रही है। तमाम हैंडल्स ने उनका एक आधा-अधूरा क्लिप भी वायरल किया है।

केजरीवाल का यह ऐलान दिल्ली में दलित वोटरों में दायरा बढ़ाने और आगामी विधानसभा चुनाव में फायदा लेने के कदम के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकांश शहरी जनसंख्या वाली दिल्ली में लगभग 20% वोटर दलित हैं और वह विधानसभा चुनाव में बड़ा रोल निभाते हैं। AAP को इससे पहले विधानसभा चुनावों में दलितों का अच्छा ख़ासा वोट मिला है।

बीते कुछ समय में राज कुमार आनंद जैसे दलित चेहरों ने AAP छोड़ी है। अब केजरीवाल फिर से यह दिखाना चाहते हैं कि वह दिल्ली में दलितों के हितैषी हैं और उनका वोट बटोरना चाहते हैं। राज कुमार आनंद ने इस्तीफ़ा देने के समय दिल्ली सरकार को दलित विरोधी करार दिया था। यह योजना आगामी चुनावों में कितना असर डालेगी, यह परिणाम देखकर पता चलेगा।

जिस तरह की योजना का ऐलान केजरीवाल ने किया है, केंद्र सरकार ऐसी ही योजनाएँ पहले ही चलाती है। इसके तहत पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों दलित छात्र विदेश पढ़ने जा चुके हैं।

चौकीदार बनकर आए वाजिद अली ने हड़पा पूरा मंदिर, मूर्तियाँ गायब करवाकर पूजा बंद करवाई: 150 साल पुराना श्रीगंगा महारानी मंदिर 50 साल बाद कब्जा मुक्त हुआ, फिर गूँजेगी शंखध्वनि

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में मुस्लिमों के कब्ज़े में मौजूद एक और मकान के मंदिर होने का दावा किया गया है। बताया जा रहा है कि ये मंदिर 150 साल (कहीं-कहीं 250 साल) पुराना है। 50 साल पहले यहाँ एक वाजिद अली नाम का शख्स चौकीदार बनकर आया था और धीरे-धीरे उसने पूरे मंदिर पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने मूर्तियाँ गायब करवाईं और फिर पूजा भी बंद करवा दी। बाद में मंदिर को मकान बनाकर उस पर इस्लामी झंडा लगाया दिया गया। हाल में जब मंदिरों के कब्जाने की खबरों ने तूल पकड़ा तो इस मंदिर का भी पता चला। शिकायत के बाद प्रशासन ने मामले की जाँच की और मकान को खाली करने का नोटिस दीवार पर चस्पा किया। वहीं हिन्दू संगठन के सदस्यों ने सक्रिय होकर मकान पर लगे हरे झंडे को हटा कर भगवा ध्वज लगा दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला बरेली के किला थानाक्षेत्र का है। यहाँ के कटघर इलाके में रहने वाले राकेश सिंह ने दावा किया है कि आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले उनके पूर्वजों ने गंगा महारानी का एक मंदिर बनवाया था। तब इस मंदिर में विधि-विधान से कई देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को स्थापित किया गया था। कुछ ही समय में यह मंदिर आसपास के हिन्दुओं की आस्था का केंद्र बन गया था। यहाँ नियमित पूजा अर्चना होने लगी थी।

राकेश सिंह आगे बताते हैं कि लगभग 50 साल पहले इस मंदिर में बने एक कमरे को सहकारी समिति के लिए किराए पर दे दिया गया था। सहकारी समिति वालों ने वाज़िद अली नाम के एक चौकीदार को यहाँ रखरखाव और देखभाल के लिए नियुक्त किया। आरोप है कि वाज़िद अली ने पहले सहकारी समिति वाले कमरे और बाद में पूरे मंदिर पर ही कब्ज़ा जमा लिया। उसने धीरे-धीरे यहाँ स्थापित मूर्तियों को गायब कर दिया और पूजा अर्चना भी बंद करवा दी।

राकेश सिंह द्वारा इस मुद्दे को उठाते ही हिन्दू संगठन के सदस्य उस मकान पर पहुँच गए। मकान पर अब वाज़िद अली के बेटे रहते हैं। हिन्दू कार्यकर्ताओं ने घर के ऊपर लगे हरे रंग के इस्लामी झड़े को हटा कर वहाँ भगवा ध्वज लहरा दिया। छत पर खड़े हो कर ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए गए। मामला दो समुदायों से जुड़ा होने के नाते पुलिस और प्रशासन फ़ौरन एक्टिव हुआ। मौके पर फ़ोर्स तैनात कर दी गई। गुरुवार को राकेश सिंह व वाज़िद अली के बेटों के बयान दर्ज करवाए गए।

प्रशासन की जाँच में पता चला कि वाज़िद अली या उसके बेटे मकान में अवैध तौर पर काबिज़ थे। वो सहकारी समिति के सदस्य भी नहीं थे। इसी आधार पर प्रशासन ने वाज़िद के परिवार को मकान खाली करने का निर्देश दिया है। मकान के ऊपर नोटिस भी चस्पा कर दी गई है। SDM गोविन्द मौर्य के मुताबिक मुस्लिम पक्ष ने अपनी मर्जी से मकान को खाली कर दिया है। फिलहाल मकान को सील कर कर राकेश सिंह के दावों की जाँच करवाई जा रही है। वहीं राकेश सिंह ने उम्मीद जताई है कि वाज़िद अली दौरा कब्जाए गए उनके मकान में जल्द ही पहले जैसा पूजा-पाठ शुरू होगा।

तमिलनाडु में आतंकी का जनाजा निकला ‘शान’ से… हजारों कट्टरपंथी शामिल, सुरक्षा में DMK सरकार ने 2000 पुलिसकर्मी लगाए: विरोध करने वाले BJP नेता गिरफ्तार, अन्नामलाई भी हिरासत में

देश के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में साल 1998 में सीरियल धमाके हुए थे। ये धमाके कोयंबटूर में हुए, जिसमें 58 लोगों की मौत हुई तो 231 लोग घायल हुए। इन धमाकों के दोषी एस-ए पाशा की मौत कुछ दिन पहले हुई। तमिलनाडु सरकार ने आतंकवादी एस ए पाशा के जनाजे की न सिर्फ अनुमति दी, बल्कि 2000 से ज्यादा पुलिसवालों को भी सुरक्षा में लगाया। इस दौरान हजारों कट्टरपंथियों, नेताओ, अभिनेताओं की भीड़ ने उसे किसी ‘हीरो’ की तरह विदाई दी। एक आतंकी के महिमामंडन का बीजेपी ने विरोध किया, लेकिन आतंकवादियों को जेल में मालिश की सुविधा देने वाली डीएमके सरकार ने इसे नजरअंदाज किया और विरोध प्रदर्शन करने वालों को ही हिरासत में ले लिया।

इस बीच, बीजेपी ने तमिलनाडु सरकार द्वारा आतंकवादी के जनाजे की अनुमति देने का विरोध किया गया। बीजेपी ने इस बात से आपत्ति जताई कि अनगिनत मासूमों की जान लेने वाले आतंकवादी का जनाजा निकाला गया और उसे आतंकी की तरह गुमनाम नहीं, बल्कि किसी हीरो की तरह शानदार विदाई दी गई। लेकिन डीएमके सरकार को ये पसंद नहीं आया। इस बात की तस्दीक ये दो तस्वीरें भी करती हैं।

आतंकवादी को हीरो जैसी विदाई देने के डीएमके सरकार के फैसले के खिलाफ बीजेपी, हिंदू मुन्नानी और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने रैली का आयोजन किया था। इस रैली में सैकड़ों लोग शामिल हुए, जो आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश देना चाहते थे। लेकिन डीएमके सरकार ने इन राष्ट्रवादी आवाजों को दबाने के लिए पुलिस का सहारा लिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

तमिलनाडु बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने ट्वीट कर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने बताया कि डीएमके सरकार की पुलिस ने उन्हें, हिंदू मुन्नानी के प्रदेश अध्यक्ष केदेश्वर सी. सुब्रमण्यम, विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष शिवलिंगम, बीजेपी के अन्य कार्यकर्ताओं और आम जनता को हिरासत में ले लिया। यह गिरफ्तारी उस समय हुई जब वे ‘ब्लैक डे रैली’ में शामिल होकर डीएमके सरकार का विरोध कर रहे थे।

अन्नामलाई ने इसे डीएमके सरकार की वोट बैंक राजनीति का हिस्सा बताया और कहा कि सरकार ने एक तरफ आतंकवादी के जनाजे को समर्थन दिया, जबकि दूसरी तरफ जन सुरक्षा की माँग करने वालों को जेल में ठूँस दिया।

तमिलनाडु में एक तरफ आतंकी को हीरो जैसी विदाई जाती है, तो विरोध प्रदर्शन करने वाले राष्ट्रवादी नेताओं को डीएमके की सरकार जेल में ठूँस देती है। दोनों तस्वीरें सामने हैं। बताइए, देश में आतंकियों का महिमामंडन करने में कितनी आगे निकल गई है इंडी गठबंधन, जहाँ उप मुख्यमंत्री खुद को प्राउड क्रिश्चियन बताता है और सनातन की तुलना डेंगू-मलेरिया से करते हुए सनातन को मिटाने की बात करता है।

7 साल के बच्चे से लेकर 70 साल की खातून तक… 6 बांग्लादेशी घुसपैठियों को त्रिपुरा पुलिस ने दबोचा: पूछताछ में बोले- हम काम की तलाश में आए

पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में पुलिस ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) को 6 बांग्लादेशी घुसपैठियों को गिरफ्तार किया है। इन घुसपैठियों में 2 नाबालिग और इतनी ही महिलाएँ शामिल हैं। ये सभी खोवाई जिले के एक गेस्ट हॉउस में छिपे थे। अब तक हुई पूछताछ में पता चला कि ये सभी घुसपैठिए दिल्ली भी गए थे। ये सभी भारत में घुसपैठ का मकसद काम की तलाश बता रहे हैं। हालाँकि पुलिस इन दावों की गहराई से पड़ताल की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला खोवाई जिले के सुभाष पार्क इलाके का है। गुरुवार को यहाँ के जिला अस्पताल के आसपास कुछ संदिग्ध लोगों की सूचना पर पुलिस सक्रिय हुई थी और तलाशी अभियान चलाया था। इसी दौरान पुलिस ने रॉय गेस्ट हॉउस भी पहुँची। इस गेस्ट हॉउस में पुलिस को 6 लोग संदिग्ध दिखे। इसमें 2 महिलाएँ, 2 पुरुष और 2 नाबालिग बच्चे शामिल थे। संतोषजनक जवाब न मिलने पर पुलिस इन सभी को थाने ले आई।

थाने में इन सभी संदिग्धों से हुए सवाल जवाब में इनकी पहचान 37 साल के मोहम्मद कबीर, 35 वर्षीया तानिया बेगम, 70 वर्षीया आएशा खातून, 23 साल के मुमीन, 5 वर्षीया शाहिदा और 6 वर्ष उम्र के मोहम्मद शाकिब के तौर पर हुई। पहले तो इन सभी ने पुलिस को भारतीय पहचान पत्र दिखा कर गुमराह करने की कोशिश की। जाँच में ये प्रमाण पत्र फर्जी निकले तो इन सभी ने खुद के बांग्लादेश के फेनी जिले से होने का सच कबूल कर लिया।

इन्होने पुलिस को बताया कि पकड़े जाने से पहले वो सब दिल्ली भी हो आए हैं। इन्होने भारत में घुसपैठ की वजह रोजगार की तलाश बताया है। सभी आरोपितों को हिरासत में ले कर पूछताछ और उनके घुसपैठ के असल मकसद को खंगाला जा रहा है। बरामद पहचान पत्रों की जाँच कराई जा रही है। केस दर्ज कर के मामले में जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इन कार्रवाइयों के बाद सभी को वापस उनके मुल्क में भेजने की प्रक्रिया अमल में लाई जाएगी।

बांग्लादेश में फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने 3 मंदिरों को बनाया निशाना, 8 मूर्तियाँ तोड़ीं: विदेश मंत्रालय ने बताया- 2024 में हिन्दुओं पर हुए 2200 हमले

बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा थम नहीं रही है। हिन्दू और उनके मंदिर निशाने पर लिए जा रहे हैं। बीते 4 दिनों के भीतर बांग्लादेश के अलग-अलग इलाकों में 8 मूर्तियाँ तोड़ी गईं। इन हमलों में मात्र एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हो पाई जबकि बाकी हमलावरों का पता तक नहीं लगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश के मैमेनसिंह जिले के हलुआघाट उपजिला में में बुधवार-गुरुवार (19 दिसम्बर, 2024) को दो हिन्दू मंदिर में तीन मूर्तियाँ तोड़ी गईं। यहाँ के बन्दरपुरा में स्थित एक मंदिर में दो मूर्तियाँ तोड़ी गई। मूर्ति तोड़ने वालों का कोई पता नहीं लग पाया है और इस संबंध में पुलिस खाली हाथ है।

वहीं हलुआघाट के ही पोलाशकांडा इलाके में स्थित एक काली मंदिर में भी एक मूर्ति को तोड़ दिया गया। इस मामले में मंदिर समिति ने पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस ने दूसरी घटना में अलाल उद्दीन को पकड़ा है। इससे पहले बांग्लादेश के दिनाजपुर में स्थित झरबारी काली मंदिर पर भी हमला हुआ।

इस मंदिर में स्थापित 5 मूर्तियों को तोड़ दिया गया। इस हमले के आरोप इस्लामी कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के युवकों पर लगाया गया है। इस हमले के बाद क्षतिग्रस्त मूर्तियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हैं। इस मामले में किसी की गिरफ्तारी की सूचना नहीं है।

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से लगातार हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार हिन्दुओं के खिलाफ हमले रोकने में असफल रही है। उसने इस हिंसा पर आँखे बंद कर ली हैं। कई बार तो उसने हिंसा की घटनाओं को सिरे से नकार दिया है।

इसी के चलते 2024 में बांग्लादेश में हिन्दुओं को हजारों हमले झेलने पड़े हैं। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार (20 दिसम्बर, 2024) को राज्यसभा में एक जवाब में बताया है कि 2024 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ 2200 हिंसक घटनाएँ हुई हैं। इन घटनाओं में 2024 में 700% से अधिक की वृद्धि हुई है।

विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2022 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की 47 जबकि 2023 में 300 घटनाएँ हुई थी। पाकिस्तान में 2024 में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा के 112 मामले सामने आए हैं। 2023 में पाकिस्तान में 103 जबकि 2022 में 241 मामले सामने आए थे।

गौरतलब है कि अगस्त, 2024 में बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी थी। इसके बाद बांग्लादेश में हिन्दू निशाने पर हैं। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दू पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया है और कई जगह मंदिरों पर हमला किया है। बांग्लादेश की सरकार ने हिन्दुओ के हक़ में बोलने वाले संत चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया है। इस्लामी कट्टरपंथी बांग्लादेश में इस्कॉन की शाखाओं को निशाना बना रहे हैं।

सऊदी के आतंकी ने जर्मनी के क्रिसमस मार्केट में BMW से लोगों को रौंदा… 2 की मौत, 60+ घायल: डॉक्टर तालेब गिरफ्तार, वीडियोज सामने आईं

जर्मनी के मैगडेबर्ग में एक क्रिसमस मार्केट की चहल-पहल शुक्रवार को अचानक चीख-पुकार में बदल गई। तेज रफ्तार बीएमडब्ल्यू कार ने भीड़ पर चढ़ाई कर दी, जिससे दो लोगों की मौत हो गई और 60 से अधिक लोग घायल हो गए। मरने वालों में एक बच्चा भी शामिल है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमलावर की पहचान सऊदी अरब के 50 वर्षीय डॉक्टर तालेब के रूप में हुई, जिसने किराए की बीएमडब्ल्यू का इस्तेमाल कर इस वारदात को अंजाम दिया। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया। शुरुआती जाँच में पाया गया कि वह करीब 20 साल से जर्मनी में स्थायी निवासी के रूप में रह रहा था। हमलावर के कार में डेटोनेटर भी मिला है, हालाँकि किसी तरह का अन्य विस्फोटक नहीं मिला। जर्मन पुलिस ने हमलावर को पकड़ने का वीडियो भी जारी किया है।

हमलाकर को गिरफ्तार करती जर्मन पुलिस (फोटो साभार: German news agency dpa)

घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कार सीधे भीड़भाड़ वाले बाजार में घुस गई और टाउन हॉल की ओर बढ़ी। चंद सेकंड में बाजार में खून और चीखों का मंजर छा गया। सोशल मीडिया पर घटना की तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिन्हें एलन मस्क ने भी साझा किया।

11 मौतों की अफवाह, 2 की पुष्टि

शुरुआती रिपोर्ट्स में 11 लोगों की मौत की बात कही गई थी, लेकिन अधिकारियों ने बाद में स्पष्ट किया कि मृतकों की संख्या सिर्फ दो है। हालाँकि, घायलों में से 15 की हालत गंभीर बताई जा रही है।

हमले के बाद बाजार में अफरा-तफरी मच गई। सुरक्षा बलों और आपातकालीन सेवाओं ने तुरंत मौके पर पहुँचकर घायलों को अस्पताल पहुँचाया। पुलिस ने घटनास्थल पर तैनाती बढ़ा दी और बाजार को खाली कराया।

2016 की याद दिलाता हमला

यह घटना 2016 में बर्लिन के क्रिसमस मार्केट पर हुए आतंकवादी हमले की भयावह यादें ताजा कर देती है, जब एक ट्रक ने भीड़ पर चढ़ाई कर 12 लोगों की जान ले ली थी। हालाँकि, मैगडेबर्ग की घटना में पुलिस ने इसे सिर्फ एक आतंकी का हमला बताया है और आगे किसी खतरे से इनकार किया है।

जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज़ ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “मेरी संवेदनाएँ पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं। हम मैगडेबर्ग के लोगों के साथ खड़े हैं।”

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने इस घटना की निंदा करते हुए पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति संवेदनाएँ व्यक्त कीं। बयान में कहा गया कि “सउदी हिंसा की हर घटना की निंदा करता है और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता है।”

हिंदू लड़के के प्यार में मुस्लिम लड़की, घर छोड़ आ गई साथ रहने… अब मिल रही धमकी: बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को दिया सुरक्षा और सेफ हाउस देने का आदेश

महाराष्ट्र सरकार के गृह विभाग द्वारा अंतरधार्मिक और अंतरजातीय जोड़ों के लिए ‘सेफ हाउस’ बनाने का आदेश जारी करने के एक दिन बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को हिंदू-मुस्लिम जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें सेफ हाउस मुहैया कराने का आदेश दिया। इस दौरान कोर्ट में खाप पंचायत का भी जिक्र हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस पी.के. चव्हाण की बेंच ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि मुंबई के उपनगरों में जोड़े की पसंद के अनुसार उन्हें एक सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराया जाए। कोर्ट ने कहा, “अब जब आपने सेफ हाउस बनाए हैं, तो उन्हें एक सेफ हाउस दें।”

करीब 23 साल की उम्र का ये जोड़ा साल 2021 में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मिला था और इसके बाद रिश्ते में आ गए। जब हिंदू युवक ने मुस्लिम युवती से शादी की इच्छा जताई, तो दोनों के परिवारों से उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं। इन हालातों के चलते युवती ने अपनी नौकरी छोड़ दी और दोनों ने अपने घर छोड़ दिए। उन्होंने इसी हफ्ते शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया और अपनी सुरक्षा के लिए कोर्ट से मदद माँगी।

कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि शाम तक जोड़े को सुरक्षित स्थान पर ले जाया जाए। इसके साथ ही, पुलिस को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि युवक को अपने कार्यस्थल तक सुरक्षित यात्रा के लिए पर्याप्त सुरक्षा मिले। हालाँकि सेफ हाउस में फिलहाल केवल एक कॉन्स्टेबल की सुरक्षा है, कोर्ट ने स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया कि वे जोड़े की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त इंतजाम करें।

इससे पहले, एक अन्य अंतरधार्मिक जोड़े के मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने राज्य को सुझाव दिया था कि जिलों में राज्य के गेस्ट हाउस के कमरों का उपयोग सेफ हाउस के रूप में किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने तब यह मुद्दा उठाया था कि राज्य ने सेफ हाउस और विशेष सेल्स की जानकारी नहीं दी थी। कोर्ट के निर्देश पर 18 दिसंबर 2024 को एक सर्कुलर जारी किया गया, जिसमें महाराष्ट्र में स्थापित सेफ हाउस और विशेष सेल्स की जानकारी दी गई। हालाँकि, याचिकाकर्ता ने आज आपत्ति जताते हुए कहा कि चंडीगढ़ और दिल्ली में अपनाए गए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के उनके सुझावों पर विचार नहीं किया गया।

इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “चंडीगढ़ और दिल्ली के उदाहरण मत दीजिए… वहाँ खाप पंचायतें हैं। हमारे यहाँ खाप पंचायतें नहीं हैं। यह सब हमारे समाज की परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।” कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी को करेगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई के साथ अधिवक्ता लारा जेसानी और ऋषिका अग्रवाल पेश हुए। राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक पी.पी. शिंदे उपस्थित रहे।

दाल में काला है या पूरी दाल ही काली है: सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की सरकार को लताड़ा, कहा- शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी का पता चला तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई

पश्चिम बंगाल के 25,000 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती से संबंधित ‘घोटाले’ में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 दिसंबर 2024) को कहा कि उम्मीदवारों के चयन में बहुत सारी खामियाँ हैं। बंगाल सरकार और भर्ती करने वाली SSC को लताड़ लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भर्ती में गड़बड़ी का पता राज्य सरकार को चल चुका था तो शिक्षकों की अतिरिक्त पद पर नियुक्ति क्यों की गई।

यह घोटाला सामने आने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द करने का आदेश दिया था। इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। मामले पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस आधार पर भर्ती रद्द कर दी थी, क्योंकि दागी और बेदाग उम्मीदवारों को अलग नहीं किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला एक साल से अधिक समय तक लंबित रहने के बाद सुनवाई शुरू हुई। शीर्ष न्यायालय की खंडपीठ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार से पूछा, “अतिरिक्त पद बनाने का उद्देश्य क्या था? गड़बड़ी का पता लगने के बावजूद आपने दागी उम्मीदवारों को बाहर क्यों नहीं किया? दाल में कुछ काला है या सब कुछ काला है?”

पीठ ने कहा कि दागी उम्मीदवारों को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। जैसे कि अयोग्य या जिनके रैंक में हेरफेर करके उन्हें चयन सूची में लाया गया, जिनके अंकों में हेरफेर करके उन्हें योग्य उम्मीदवारों से आगे कर दिया गया, ओएमआर में हेरफेर (जिनमें से कुछ खाली थे) और जो मेरिट सूची में नहीं थे उन्हें नियुक्त किया गया आदि।

बेंच ने कहा कि भर्ती में ‘घोटाले’ का पता जस्टिस रंजीत कुमार बाग आयोग ने लगाया था और सीबीआई ने इसकी पुष्टि की थी। यहाँ तक ​​कि एसएससी ने भी अनियमितताओं को स्वीकार किया था। 25,000 पदों के लिए 22 लाख उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था, लेकिन साल 2020 में एसएससी ने उन सबकी उत्तर पुस्तिकाएँ नष्ट कर दी थीं। इस आधार पर हाई कोर्ट ने नियुक्तियों को रद्द किया था।

एसएससी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने कहा कि सीबीआई ने दागी उम्मीदवारों की पहचान की है और यह संख्या एसएससी द्वारा पहचाने गए उम्मीदवारों से कमोबेश मेल खाती है। उन्होंने तर्क दिया कि दागी उम्मीदवारों की नियुक्तियों को रद्द किया जा सकता है। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि हजारों शिक्षकों की नियुक्ति रद्द करने से कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ेगा।

इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने खारिज कर दिया और कहा, “हम ऐसी दलीलें स्वीकार नहीं करेंगे।” हालाँकि, पीठ ने यह भी कहा कि वह उन विभागीय उम्मीदवारों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगी जो बेदाग हैं और इस भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से शिक्षक के रूप में नियुक्त होने से पहले लंबे समय तक काम कर चुके हैं। कोर्ट ने कहा, “हम उन्हें पहले के कैडर में वापस जाने की अनुमति देने पर विचार करेंगे।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2025 को करने का आदेश दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने ‘घोटाले’ की पहचान करते हुए न्यायमूर्ति बाग आयोग के माध्यम से जाँच कराई थी। न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने बाद में जज के पद से इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और सांसद बन गए।

दरअसल, साल 2016 में पश्चिम बंगाल के स्कूल सेवा आयोग की शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी के आरोप लगे थे। कहा गया था कि 5 लाख से 15 लाख रुपए तक घूस लेकर नौकरी दी गई। इस मामले में CBI ने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी मॉडल अर्पिता मुखर्जी और SSC के कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। इनके ठिकानों पर ED ने छापेमारी भी की थी।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल को राज्य सरकार और सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,753 शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द कर दी थी। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिका डाली गई। सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को हटाए गए शिक्षकों के खिलाफ CBI जाँच पर रोक लगा दी थी।

संभल में जहाँ प्राचीन कुआँ, वहाँ चारों तरफ दफन है मुस्लिमों की लाश: SDM ने कराया निरीक्षण, कब्रिस्तान के पास ही 68 तीर्थों में से एक गोपंच तीर्थ जर्जर हालत में

संभल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की चार-सदस्यीय टीम ने प्राचीन कार्तिकेय मंदिर और आसपास के क्षेत्रों का गुप्त तरीके से सर्वेक्षण और कार्बन डेटिंग की है। टीम ने शुक्रवार (20 दिसंबर 2024) को 5 तीर्थ स्थलों और 19 प्राचीन कूपों का निरीक्षण किया।

जिलाधिकारी राजेंद्र पेंसिया ने बताया कि मंदिर का सर्वेक्षण और कार्बन डेटिंग सफलतापूर्वक और सुरक्षित तरीके से संपन्न की गई है। सुरक्षा कारणों से इस प्रक्रिया को गुप्त रखा गया, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

जानकारी के अनुसार, कार्तिकेय मंदिर 46 सालों से बंद था। 14 दिसंबर को पुलिस ने उपद्रवियों की तलाश के दौरान दीपा राय इलाके में मंदिर की खोज की थी। यह मंदिर सपा सांसद जिया उर्रहमान बर्क के घर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर को खुलने के बाद 15 दिसंबर को पूजा-अर्चना शुरू की गई और उसी दौरान मंदिर परिसर में प्राचीन खंडित मूर्तियों और कूपों की जानकारी मिली।

संभल में ASI की टीम ने भद्रकाश्रम, स्वर्गदीप, चक्रपाणि तीर्थ और प्राचीन श्मशान मंदिर जैसे स्थानों का निरीक्षण किया। इसके अलावा, 19 प्राचीन कूपों की स्थिति और ऐतिहासिक महत्व का भी गहन अध्ययन किया गया। इन सभी कूपों और तीर्थों का अध्ययन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को समझने के लिए किया गया। बताया जा रहा है कि इस निरीक्षण से इतिहास के नए पहलुओं पर रोशनी डालने की उम्मीद है।

विशेषज्ञ टीम ने सभी प्रक्रियाएँ गुप्त तरीके से संपन्न की और इसकी रिपोर्ट को सुरक्षा कारणों से गुप्त रखा गया है। ASI ने प्रशासन से अनुरोध किया था कि सर्वेक्षण प्रक्रिया को मीडिया कवरेज से दूर रखा जाए, जिससे किसी भी तरह की तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न न हो।

कब्रिस्तान के पीछे मिला प्राचीन कुआँ, पास में गोपंच तीर्थ

इस बीच, संभल में हयातनगर थाने के पीछे कबिस्तान में एक प्राचीन कुआँ भी मिला है। मौके पर एसडीएम वंदना मिश्रा और सीओ अनुज चौधरी पहुँचे और कर्मचारियों को बुलाकर कुएँ का निरीक्षण कराया। बताया जा रहा है कि कब्रिस्तान के पास ही संभल के 68 तीर्थों में से एक गोपंच तीर्थ है, जोकि बेहद जर्जर हालत में है। अब अधिकारी गोपंच तीर्थ के बारे में भी जानकारी जुटा रहे हैं।

संभल में यह सर्वे ऐसे समय हुआ है जब वहाँ मंदिर मिलने का मुद्दा गरमाया हुआ है। हिंसा के बाद प्रशासन ने उपद्रवियों की तलाश में सर्च ऑपरेशन चलाया, जिसके दौरान यह मंदिर मिला और बिजली चोरी का मामला भी सामने आया। संभल क्षेत्र अपने प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह उम्मीद की जा रही है कि ASI की इस गतिविधि से मंदिर और अन्य स्थलों के ऐतिहासिक महत्व को समझने में मदद मिलेगी और इस क्षेत्र के इतिहास के बारे में नई जानकारी मिलेगी।

नेहरू ने लगाया था अंबेडकर पर अंग्रेज के साथ मिल ‘गद्दारी’ करने का आरोप: 1946 का पत्र आया सामने, कॉन्ग्रेस के ढोंग की खुली पोल

पिछले कुछ दिनों से कॉन्ग्रेस अपना प्रेम बाबा साहेब अंबेडकर के प्रति दिखाने की हर संभव कोशिश कर रही है और ऐसा जता रही है कि उनके अतिरिक्त कोई बाबा साहेब को सम्मान नहीं देता…।

वो गृहमंत्री अमित शाह की आधी-अधूरी क्लिप को साझा करके अपना प्रोपगेंडा फैला रहे थे लेकिन इसी बीच जवाहर लाल नेहरू का एक पत्र सामने आया जो बताता है कि कॉन्ग्रेस शुरुआती समय से बाबा साहेब के लिए कैसी विचार रखती थी।

ये पत्र जवाहरलाल नेहरू ने 20 जनवरी 1946 को अमृत कौर के नाम लिखा था। इसे वैसे तो nehruselectedworks.com पर पढ़ा जा सकता है लेकिन आज इसका स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर भी वायरल है।

इस पत्र में जवाहर लाल नेहरू ने बाबा साहेब के बारे में बात करते हुए कहा था “…मुझसे पूछा गया कि आखिर कॉन्ग्रेस क्यों अंबेडकर के पास नहीं जाती और उनसे सुलह कर लेती। मैंने उनसे कहा कि कॉन्ग्रेस ऐसा कुछ नहीं करने वाली। अंबेडकर ने लगातार कॉन्ग्रेस और कॉन्ग्रेस नेताओं का अपमान किया है। जब तक वह माफी नहीं माँगते तब तक कॉन्ग्रेस का उनसे लेना-देना नहीं है। मैंने निश्चित तौर पर ये नहीं कहा कि अनुसूतिच जाति के लोगों को पूना पैक्ट के तहत राजनैतिक लाभ नहीं मिलेंगे। लेकिन मेरा पूरा जोर इस बात पर था कि अंबेडकर ने ब्रिटिश सरकार के साथ गठजोड़ किया था और कॉन्ग्रेस के खिलाफ थे। हम उनसे डील नहीं कर सकते।”

इसी पत्र के अंश को हाईलाइट करके अब सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस से सवाल हो रहे हैं। भाजपा नेता अमित मालवीय ने लिखा, ” ये सोच से भी परे है कि नेहरू ने अमृत कौर को लिखे पत्र में बाबा साहेब को ‘गद्दार’ कहा और उनपर ब्रिटिशों के साथ गठजोड़ करने का आरोप लगाया… संविधान के रचयिता बाबा साहेब और दलित समुदाय की इससे बड़ी बेइज्जती नहीं हो सकती।”

अमिताभ चौधरी लिखते हैं, “1946 में अमृत कौर को लिखे गए पत्र में नेहरू ने अंबेडकर को ‘गद्दार’ कहा था और उनपर ब्रिटिशों के साथ गठजोड़ करने का आरोप लगाया था। आज उन्हीं का खून राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के लोग वीर सावरकर को भी ब्रिटिश एजेंट बोलते हैं।”

इस पत्र के साथ सोशल मीडिया पर लोग ये सवाल भी कर रहे हैं कि कॉन्ग्रेस आज जितना प्यार बाबा साहेब के लिए दिखा रही है, तो उन्हें ये भी बताना चाहिए कि क्या बाबा साहेब ने नेहरू के रवैये से तंग आकर 1951 में कानून मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया था? क्या जब बाबा साहेब देश के पहले कानून मंत्री बने थे उस समय उन्हें रक्षा संबंधी, विदेश संबंधी और वित्त संबंधी हर प्रमुख निर्णय लेने में शामिल करने की बजाय, किनारे नहीं किया गया था? क्या नेहरू ने उनपर ब्रिटिशों के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाकर गद्दार नहीं कहा गया था?