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तेलंगाना थल्ली की साड़ी का रंग किया हरा, सिर से मुकुट भी हटाया : कॉन्ग्रेस बदल रही राज्य की देवी की पहचान या कर रही हिंदू संस्कृति से किनारा?

तेलंगाना राज्य आंदोलन के दौरान संघर्ष की प्रमुख पहचान मानी जाने वाली ‘तेलंगाना थल्ली’ को कॉन्ग्रेस की रेवंत रेड्डी सरकार ने बदल दिया। तेलंगाना थल्ली की सचिवालय में नई मूर्ति लगाई गई जिसमें पहले की तुलना में कई बदलाव थे। पहले की मूर्ति जहाँ तेलंगाना की हिन्दू संस्कृति और त्यौहारों से मेल खाने वाली थी तो वहीं नई मूर्ति में कई निशानियों को बदल दिया गया है। कॉन्ग्रेस के सरकार के इस कदम के चलते काफी लोग नाराज हैं। उन्होंने इसे तेलंगाना की पहचान मिटाने का प्रयास बताया है।

कौन हैं ‘तेलंगाना थल्ली’?

तेलंगाना यानी तेलुगु बोलने वालों का राज्य और थल्ली का मलतब माँ। यानि तेलंगाना थल्ली का मलतब राज्य की माँ हैं। तेलंगाना थल्ली को सबसे पहले 2003 में सामने लाया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट बताती है कि 2003 में सबसे पहले तेलंगाना थल्ली की परिकल्पना की गई थी। तब तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन तेजी पर था।

निर्मल जिले के रहने वाले एक कलाकार ने तेलंगाना थल्ली की कल्पना की थी। तेलंगाना राज्य के लिए लड़ाई के दौरान आंदोलनकारियों ने अपनी पहचान के अलग निशान बनाने चालू कर दिए थे। 2003 में लाई गई तेलंगाना थल्ली की छवि में जिन देवी की कल्पना की गई थी, उन्होंने एक गुलाबी रंग की रेशम की साड़ी पहनी हुई थी।

गुलाबी रंग भी तेलंगाना राज्य आंदोलन के साथ जुड़ा रहा है। थल्ली के एक हाथ में मक्के की एक बाली थी। उनके हाथ में एक बर्तन है, जिसमें फूल रखे हैं। दरअसल, यह फूलों वाला बर्तन तेलंगाना के एक त्यौहार से संबंध रखता है। इसे बथुकम्मा त्यौहार कहते हैं।

यह त्यौहार तेलंगाना में नवरात्रि के साथ ही मनाया जाता है, जिसमें शक्ति और प्रकृति की पूजा की जाती है। इसी त्यौहार के दौरान, फूलों की पूजा भी होती है। तेलंगाना थल्ली के सर पर मुकुट भी दिखाया गया है। उनके कमर से लेकर शरीर के बाकी अंग पर भी कई सोने के जेवर हैं।

कुल मिलाकर, इन तेलंगाना थल्ली को एक हिन्दू देवी के तौर पर दिखाया गया था। तेलंगाना थल्ली को राज्य बनने के बाद एक प्रमुख पहचान के तौर पर जानी जाती थीं।

कॉन्ग्रेस सरकार ने क्या बदला?

जहाँ अब तक तेलंगाना थल्ली धनधान्य और संस्कृति को दर्शाने वाली देवी के तौर पर दिखती थीं वहीं नई लगाई गई मूर्ति में कई पुराने फीचर गायब हैं। नई मूर्ति में साड़ी का रंग बदल कर हरा कर दिया गया है। उनके अधिकांश जेवर भी मूर्ति पर से हटा दिए गए हैं।

उनके बाएँ हाथ की मक्के की बाली को दाएँ हाथ में दे दिया गया है और इसमें दिखने वाला बथुकम्मा का बर्तन भी गायब है। यानि कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा बनाई गई नई डिजाइन में तेलंगाना के बड़े हिन्दू त्यौहार के लिए कोई जगह नहीं है। सबसे हास्यास्पद है कि उनके सर पर दिखने वाला मुकुट भी हटा दिया गया है। नई मूर्ति में चूड़ियों का रंग भी बदल कर हरा कर दिया गया है।

उनका जो एक हाथ खाली है, वह कॉन्ग्रेस के निशान की मुद्रा की तरह दिखता है। इसके अलावा तेलंगाना थल्ली के चेहरे में कुछ बदलाव भी किए गए हैं। इस मूर्ति को सोमवार (9 दिसम्बर , 2024) को तेलंगाना सचिवालय के बाहर लगाया गया है। इस प्रतिमा का अनावरण कॉन्ग्रेस सरकार के मुखिया रेवंत रेड्डी ने किया है।

मूर्ति का अनावरण उस दिन किया गया, जिस दिन कॉन्ग्रेस की मुखिया सोनिया गाँधी का जन्मदिन था। गौर करने वाली बात यह है कि कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी को ही तेलंगाना की माँ बताते आए हैं। इसके पीछे तर्क है कि कॉन्ग्रेस सरकार में ही तेलंगाना राज्य बना था और सोनिया गाँधी ने इसको लेकर काफी प्रयास किए थे।

क्या संस्कृति से किनारा करने की कोशिश?

तेलंगाना की कॉन्ग्रेस सरकार का थल्ली की मूर्ति का डिजाइन बदलना राज्य की भव्य हिन्दू विरासत से किनारा करने के एक प्रयास के तौर पर देखा गया है। इसके पीछे तर्क भी दिए गए हैं। ऐसा दावा करने वालों ने प्रश्न उठाया है कि आखिर साड़ी का रंग का हरा करना क्या सेक्युलरिज्म से सम्बन्धित है।

इसी के साथ ही उनके हाथ से जो हिन्दू त्यौहार से सम्बन्धित बर्तन हटाया गया, वह भी संस्कृति छोड़ने के प्रयास के तौर पर देखा गया है। नई मूर्ति में कोई भी ऐसी सांस्कृतिक पहचान नहीं जोड़ी गई है। देवी के मुकुट को हटाना भी उनके गौरव को कम करने के तौर पर देखा गया है। हिन्दू परंपरा में अधिकांश देवियों के सर पर मुकुट रहता है।

संभवत: कॉन्ग्रेस सरकार शायद इसी हिन्दू पहचान से दूरी बनाना चाहती हो। वहीं उनके हाथ को खाली करके उसे कॉन्ग्रेस के चुनाव चिन्ह पंजे की तरह दिखाने को लेकर भी चिंता जताई गई है। तेलंगाना थल्ली का रूप बदलने को लेकर राजनीतिक लड़ाई भी चालू हो गई है। कॉन्ग्रेस का दावा है कि यह तेलंगाना की एक सामान्य महिला को प्रदर्शित करती हैं। राज्य की विपक्षी पार्टियों ने कॉन्ग्रेस सरकार के इस कदम पर प्रश्न उठाए हैं।

BRS ने कॉन्ग्रेस के इस कदम को तेलंगाना की संस्कृति का अपमान बताया है। BRS नेता के कविता ने कहा, “यह प्रतिमा दशकों से हमारे संघर्ष, बलिदान और पहचान का प्रतीक रही है। इसे केवल सरकारी आदेश के आधार पर नहीं बदला जा सकता। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, जिनकी तेलंगाना आंदोलन में कोई भूमिका नहीं है और जो ऐतिहासिक रूप से एकीकृत आंध्र प्रदेश का समर्थन करते आए हैं, वे मनमाने ढंग से इस मूर्ति को अपनी सोच से नहीं बदल सकते।”

राम मंदिर मामले में अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट का: पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने रिटायर्ड जज नरीमन की ‘संविधान का मजाक’ टिप्पणी को नकारा, बताया देश के नागरिक को आलोचना का अधिकार

अयोध्या फैसले पर सवाल उठाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रोहिंगटन नरीमन को लेकर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बयान दिया है। चंद्रचूड़ ने कहा कि अयोध्या के राममंदिर के फैसले पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं, उनमें से कई लोग 1000 पन्ने के फैसले का एक पन्ना भी नहीं पढ़े होंगे। दरअसल, नरीमन ने फैसले को ‘न्याय का मजाक’ और ‘सेक्युलरिज्म का उल्लंघन’ बताया था।

टाइम्स नेटवर्क के इंडिया इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, मैं फैसले का एक पक्ष था। इसलिए यह मेरे काम का हिस्सा नहीं है कि मैं इस फैसले का बचाव करूँ या आलोचना करूँ।” उन्होंने कहा, “कोई जज किसी फैसले में पार्टी होता है। वह फैसला सार्वजनिक संपत्ति बन जाता है और उस पर दूसरे लोग ही बात करेंगे।”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “जस्टिस नरीमन ने फैसले की आलोचना की है। इसका मतलब है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत अभी जिंदा है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत अंतरात्मा की स्वतंत्रता है। जस्टिस नरीमन जो कर रहे हैं, वह अपनी अंतरात्मा से कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि नागरिकों के पास चर्चा करने, आलोचना करने और टिप्पणी करने का अधिकार है।

इस कॉन्क्लेव में बोलते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “मैं अपने फैसले का बचाव नहीं कर सकता। हमने पाँच जजों के जरिए अपनी बात रखी है और हर तर्क को पेश किया है। ऐसे में हर न्यायाधीश इस फैसले का हिस्सा है। यह निर्णय लेने का काम सामूहिक है और हम अपने हर शब्द पर अडिग हैं। अदालतें वर्तमान मुद्दों पर फैसला लेती है। वो उन मुद्दों पर फैसला लेते हैं, जो देश के सामने हैं।”

जस्टिस नरीमन के आरोपों पर उन्होंने आगे कहा, “यह एक धारणा है और इस तरह की कई धारणाएँ होंगी। नागरिकों के पास चर्चा करने, टिप्पणी करने, आलोचना करने का अधिकार है। लोकतंत्र में यह सब संवाद की प्रक्रिया है। यह जस्टिस नरीमन का नजरिया है और हर कोई इस नजरिये का सम्मान करता है, लेकिन यह नजरिया सत्य के एकाधिकार को नहीं दर्शाता। अंतिम शब्द सुप्रीम कोर्ट होगा।”

क्या कहा था जस्टिस नरीमन ने?

कॉन्ग्रेस सरकार में देश के सॉलिसिटर जनरल रहे और बाद में सुप्रीम कोर्ट में जज बने रोहिंटन नरीमन ने एक लेक्चर के दौरान राम मंदिर पर दिए गए फैसले की आलोचना की थी। उन्होंने इसे ‘न्याय का मजाक’, सेक्युलरिज्म का उल्लंघन करने वाला फैसला करार दिया। उन्होंने हिन्दुओं को कानून के खिलाफ रहने वाला बताया, मस्जिदों के खिलाफ याचिका डालने को दैत्य के सर की तरह बताया।

रोहिंटन नरीमन ने यह टिप्पणी अहमदी फाउंडेशन द्वारा आयोजित जस्टिस AM अहमदी मेमोरियल लेक्चर में की थी। ‘धर्मनिरपेक्षता और भारतीय संविधान’ विषय पर बोलते हुए रोहिंटन नरीमन ने कहा कि यह पूरा मसला 1984 में विश्व हिन्दू परिषद की राम मंदिर बनाने की माँग को ‘तानाशाही’ और ‘अत्याचारी’ माँग से चालू हुआ था।

उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा समेत भाजपा और VHP के नेताओं को बरी किए जाने पर दुख जताया और उस जज को लानतें भेजी, जिसने यह फैसला सुनाया था। उन्होंने कहा कि उस जज को यूपी में एक पद दिया गया, जिसने इन नेताओं को बरी किया था। 

नरीमन का कहना था कि अब 1991 का कानून सख्ती से लागू कर दिया जाए, जिसके तहत कोई भी हिन्दू इतिहास में अपने धार्मिक स्थल के साथ हुई बर्बरता के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है। उन्होंने कहा था कि तभी भारत के लोग सहिष्णु हो पाएँगे। 

शादीशुदा हिंदू महिला के घर में घुसा असलम अंसारी, हत्या करके फरार हुआ: मुरादाबाद पुलिस ने एनकाउंटर के बाद दबोचा, पैर में गोली मारी

मुरादाबाद में गुरुवार (12 दिसंबर 2024) की सुबह कटघर थाना इलाके के बलदेवपुरी में कोहराम मच गया, जब एक 45 वर्षीय महिला भूवी प्रजापति की हत्या की खबर सामने आई। हत्यारे का नाम असलम अंसारी उर्फ असलम खान है, जो बुधवार (11 दिसंबर 2024) की रात उससे मिलने उसके घर में आया था। घटना के समय भूरी का पति एक शादी समारोह में शामिल होने गया था। सुबह भूरी मृत मिली थी, तो असलम खान फरार हो गया था। हालाँकि शाम होते-होते तक पुलिस ने असलम की घेरेबंदी की और मुठभेड़ के बाद असलम खान को गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया।

क्या था पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, असलम और भंवरी उर्फ भूरी प्रजापति में करीब 1 साल से संपर्क था। भूरी के तीन बच्चे भी हैं। बुधवार की रात को भूरी ने अपने पति को शादी-समारोह में भेज दिया और सुबह आने को कहा। भूरी ने अपने तीनों बच्चों को नीचे के कमरे में बंद कर दिया और फर्स्ट फ्लोर पर अपने आशिक असलम अंसारी के साथ चली गई। यहाँ असलम अंसारी ने भूरी की हत्या कर दी और फरार हो गया। बच्चे सुबह के समय दरवाजा पीटते और शोर मचाते रहे। पड़ोसी पहुँचे, तो दरवाजा खुला और फिर भूरी का शव बरामद हुआ।

एनकाउंटर के दौरान पैर में लगी गोली

इस मामले में शुरुआती जाँच में ही महिला की गला दबाकर हत्या की बात सामने आई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस पर मुहर भी लग गई। इस बीच पुलिस ने जाँच शुरू की और असलम की तलाश तेज की। उसे पकड़ने के लिए 2 टीमें बनीं, जहाँ रफातपुरा फ्लाईओवर के पास एनकाउंटर के बाद वो पुलिस की गिरफ्त में आ गया। असलम के पैर में गोली लगी है। उसके पास से बरामद तमंचा व बाइक कब्जे में ले ली।

SP सिटी ने बताया कि मृतका के पति की तहरीर के आधार पर असलम नाम के युवक को नामजद करते हुए FIR दर्ज की गई है। बच्चों ने भी अपने बयान में बताया है कि घर में असलम अंसारी ही आया था। बताया जा रहा है कि भंवरी उर्फ भूरी फलों-सब्जियों की रेहड़ी लगाती थी और असलम के साथ वो बीते 1 साल से संपर्क में थी।

18 साल के डी गुकेश वर्ल्ड चैंपियन: भारतीय की जीत पर बिलबिलाया गोरी चमड़ी वाला क्रेमनिक, उसी के देश वाले चेस-स्टार ने की बोलती बंद

भारत के डी गुकेश महज 18 साल में ही शतरंज की दुनिया के नए बादशाह बन गए हैं। उन्होंने चैंपियन का ताज पहनने के लिए वर्ल्ड चैंपियन चीनी खिलाड़ी डिंग लिरेन को 7.5-6.5 से हराया। आखिरी बाजी एक समय ड्रा के लिए बढ़ रही थी, तभी डिंग लिरेन ने ऐसी गलती कर दी, जो शायद ही कोई बड़ा खिलाड़ी करता। उनकी इस गलती पर तुरंत ही डी गुकेश ने शिकंजा कस लिया और उन्हें हार के लिए मजबूर कर दिया। इसी के साथ डी गुकेश शतरंज की दुनिया के 18वें बादशाह बन गए। वो सबसे कम उम्र के शतरंज चैंपियन हैं और विश्वनाथन आनंद के बाद चैंपियन बनने वाले दूसरे भारतीय खिलाड़ी भी।

बेहद कड़े मुकाबले में मिली जीत

डी गुकेश और डिंग लिरेन के बीच चैंपियन बनने की जंग 17 दिनों से चल रही थी, जो 14वें राउंड पर जाकर थमी। 13 राउंड तक दोनों खिलाड़ी 6.5-6.5 से बराबर थे, जिसमें दोनों ही खिलाड़ियों ने 2-2 राउंड जीते थे, तो बाकी के 9 मुकाबले ड्रॉ रहे थे। लिरेन ने पहली बाजी जीत कर बढ़त बनाई थी, तो गुकेश ने तीसरी बाजी में जीत हासिल की। 11वी बाजी गुकेश ने जीतकर बढ़त बनाई तो 12वीं बाजी में लिरेन ने जीत दर्ज कर बराबरी पाई और फिर 14वीं और आखिरी बाजी में गुकेश ने जीत दर्ज की। आखिरी बाजी 4 घंटे और 58 चालों तक चली, जो क्लासिकल शतरंज की मिसाल कहा जाएगा। हालाँकि आखिर में लिरेन ने घोड़ों को बदलने की जो गलती की, उसके बाद की तीसरी ही चाल में गुकेश ने उन्हें पराजय झेलने को मजबूर कर दिया।

वर्ल्ड चैंपियन रहे व्लादिमीर क्रेमनिक ने उठाई उंगली

दरअसल, शतरंज के मुकाबलों में छोटी-छोटी गलतियाँ अक्सर भारी पड़ जाती हैं। आखिरी बाजी में लिरेन की गलती ने उनसे वर्ल्ड चैंपियन का खिताब छीन लिया। अब इस चाल को व्लादिमीर क्रेमनिक (चैंपियन 2000-2007) ने बचकानी करार दिया है, साथ ही हैरानी जताई है कि इस सबसे छोटी गलती की वजह से लिरेन को हार झेलनी पड़ी। उन्होंने इसे ‘शतरंज का अंत’ तक करार दे दिया।

हालाँकि क्रेमनिक के दावों पर तुरंत ही सवाल भी उठ गए। लोगों ने उनके दूसरे ट्वीट पर कम्यूनिटी नोट भी जोड़ दिए। जिसमें बताया गया कि 1892 का फाइनल मुकाबला भी ऐसी ही एक गलती की वजह से हुआ था, जिसमें सिर्फ 2 मूव में ही मिखाइल चिगोरिन को हार झेलनी पड़ी थी।

बहरहाल, क्रेमनिक के दावों के तुरंत बाद ही 15 साल तक वर्ल्ड चैंपियन रहे गैरी कास्परोव (चैंपियन 1985-2000) सामने आए। उन्होंने डी गुकेश की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि गुकेश ने बेहद कम उम्र में ही सभी खिलाड़ियों को पीछे छोड़ दिया। वो पूरी तरह से तैयार थे। रही बात गलतियों की, तो उन्होंने साल 2014 के मैच की ओर ध्यान दिलाया, जब दुनिया के 2 सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों मैग्नन कार्लसन (चैंपियन-2013-23) और विश्ननाथन विश्ननाथन (चैंपियन-2007-2013) के मैच में 2-2 गलतियाँ हुईं थी।

11 साल की उम्र में देखा सपना, 18 में कर लिया पूरा

डी गुकेश ने महज 11 साल की उम्र में वर्ल्ड चैंपियन बनने का सपना देखा और 7 साल में ही पूरा भी कर लिया। दरअसल, 11 साल की उम्र में उन्होंने सबसे युवा विश्व चैंपियन बनने का सपना देखा था। गुकेश जब सिर्फ 11 साल 6 महीने के थे, तब चेस बेस इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वो बड़े होकर सबसे युवा वर्ल्ड चैंपियन बनना चाहेंगे। उन्होंने इसे सच साबित कर दिया है।

शतरंज विवादों का भी रहा है खेल

बता दें कि FIDE शतरंज चैंपियनशिप का आयोजन कराता है। कभी चैंपियनशिप को लेकर विवाद भी हुए थे। एक समय ऐसा भी था, जब 2 खिलाड़ी खुद को विश्व चैंपियन बताते थे। हालाँकि 2006 से ये विवाद किसी तरह खत्म हुए हैं। ये वही दौर था, जब क्रामनिक खुद को क्लासिक चैंपियन बताते थे। फिडे की लड़ाई के समय वो खुद को क्लासिकल चैंपियन बताते थे, यूनिफिकेशन के बाद उन्हें साल 2007 में विश्वनाथन आंनद ने हराया। एक भारतीय से लगातार हार का बदला अब वो डी-गुकेश पर उंगली उठाकर ले रहे हैं।

‘कठमुल्ला’ शब्द बोलने वाले जज शेखर यादव के खिलाफ INDI गठबंधन का महाभियोग प्रस्ताव: जानिए एक न्यायाधीश को हटाने के लिए संविधान में क्या हैं प्रावधान, पढ़िए डिटेल

समान नागरिक संहिता को लेकर बयान देने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर यादव के खिलाफ INDI गठबंधन महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कहा जा रहा है कि राज्यसभा के 38 सांसदों ने अब तक महाभियोग प्रस्ताव की नोटिस पर साइन कर दिए हैं। बाकी 12 सांसदों के आज शुक्रवार (13 दिसंबर 2024) को हस्ताक्षर करने की बात कही जा रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में ही महाभियोग के लिए संसद में नोटिस दिया जाएगा। श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सांसद आगा सईद रुहुल्लाह मेहदी ने कहा है कि कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसदों ने नोटिस का समर्थन करने की बात कही है। प्रस्ताव का समर्थन करने वालों में TMC सांसद महुआ मोइत्रा भी हैं।

महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपने पोस्ट में लिखा है कि उन्होंने अपनी पार्टी के अन्य सांसदों के साथ जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। विपक्षी सासंदों के हस्ताक्षर के बाद प्रस्ताव को राज्यसभा में पेश किया जाएगा। अगर राज्यसभा में प्रस्ताव पास हो गया तो उसे लोकसभा में पेश किया जाएगा।

क्या है महाभियोग की प्रक्रिया?

दरअसल, भारत में न्यायाधीशों को हटाने के लिए संविधान में प्रावधान किए गए हैं, जो कि काफी जटिल भी है। संविधान के अनुच्छेद 124 में न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं हटाने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है। यह अनुच्छेद भारत के सुप्रीम कोर्ट की स्थापना और उसके कार्यों से संबंधित है। इसमें न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया के बारे में भी बताया गया है।

यही वो अनुच्छेद है जो न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र बनाता है। इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद के किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।इस प्रस्ताव को लाने के लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला एक नोटिस दिया जाना चाहिए। नोटिस स्वीकार भी होना चाहिए।

नोटिस दोनों सदनों में स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यीय एक जाँच समिति गठित की जाती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और चेयरमैन या स्पीकर की सहमति से चुने गए एक न्यायविद शामिल होते हैं। यह समिति न्यायाधीश पर लगे आरोपों की जाँच करती है और संसद को अपनी रिपोर्ट सौंपती है। रिपोर्ट के आधार पर संसद के दोनों सदनों में इस प्रस्ताव पर बहस होती है।

इस दौरान जज को भी संसद में अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। दोनों सदनों में ‘विशेष बहुमत’ से इस प्रस्ताव को पारित होना आवश्यक होता है। विशेष बहुमत का मतलब है कि प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन होना चाहिए। इसके साथ ही प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों की कम-से-कम दो-तिहाई होनी चाहिए।

बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बाद इस प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को उसके पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस तरह जज की सेवा समाप्त हो जाती है। महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए जज पर दुर्व्यवहार, अक्षमता, पद की गरिमा की अवहेलना, पक्षपात, भ्रष्टाचार आदि जैसे गंभीर आरोप होने चाहिए।

क्या है पूरा विवाद?

दरअसल, विश्व हिंदू परिषद (VHP) की लीगल सेल ने 8 दिसंबर 2024 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश शेखर यादव के जस्टिस दिनेश पाठक भी बुलाए गए थे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस यादव ने कहा था, “यह हिंदुस्तान है और यह देश यहाँ रहने वाले बहुसंख्यकों की इच्छा से चलेगा। यही कानून है।”

जस्टिस शेखर यादव ने कहा, “आप यह नहीं कह सकते कि मैं हाईकोर्ट के जज होने के नाते ऐसा कह रहा हूँ। दरअसल, कानून ही बहुमत के हिसाब से काम करता है।” इस दौरान जस्टिस शेखर यादव ने ‘समान नागरिक संहिता एक संवैधानिक अनिवार्यता’ विषय पर बोलते हुए कहा, “देश एक है, संविधान एक है तो क़ानून एक क्यों नहीं है?” उन्होंने ‘कठमुल्लों’ को देश के लिए घातक बताया।

जस्टिस यादव ने कहा, “हमारे हिंदू धर्म में बाल विवाह, सती प्रथा और बालिकाओं की हत्या जैसी कई सामाजिक कुरीतियाँ थीं। राम मोहन राय जैसे सुधारकों ने इन कुरीतियों को खत्म करने के लिए संघर्ष किया। लेकिन जब मुस्लिम समुदाय में हलाला, तीन तलाक और गोद लेने से जुड़े मुद्दों जैसी सामाजिक कुरीतियों की बात आती है, तब उनके पास इनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं थी।”

उन्होंने कहा, “आप उस महिला का अपमान नहीं कर सकते जिसे हमारे शास्त्रों और वेदों में देवी का दर्जा दिया गया है। आप 4 बीवियाँ रखने, हलाला करने या तीन तलाक़ का अधिकार नहीं रख सकते। आप कहते हैं कि हमें ‘तीन तलाक’ कहने का अधिकार है और महिलाओं को भरण-पोषण ना देने का अधिकार है। अगर आप कहते हैं कि हमारा पर्सनल लॉ इसकी इजाजत देता है, तो ये अस्वीकार्य है।

उन्होंने कहा, “एक महिला को भरण-पोषण मिलेगा, दो विवाह की इजाजत नहीं होगी और एक आदमी की सिर्फ़ एक पत्नी होगी, चार पत्नियाँ नहीं… अगर एक बहन को भरण-पोषण मिलता है और दूसरी को नहीं, तो इससे भेदभाव पैदा होता है, जो संविधान के खिलाफ है। UCC कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसकी वकालत VHP, RSS या हिंदू धर्म करता हो। देश का सुप्रीम कोर्ट भी ऐसी ही बात करता है…। यह देश UCC कानून ज़रूर और बहुत जल्द लाएगा।”

IIT की हिंदू लड़की को ACP मोहसिन खान ने फँसाया, किया रेप: 5 साल की बेटी के बावजूद खुद को बताया कुँवारा, FIR दर्ज कर एक्शन में UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के कानपुर में तैनात ACP मोहसिन खान पर IIT कानपुर की एक हिन्दू छात्रा ने शादी का झांसा देकर रेप करने का आरोप लगाया है। छात्रा IIT कानपुर में क्रिमिनोलॉजी पढ़ती है। ACP मोहसिन खान ने उससे पढ़ाई के बहाने नजदीकी बढ़ाई थी। मोहसिन खान का पहले से निकाह हो चुका है। इसके बाद छात्रा को उन्होंने यह झांसा दिया कि उससे निकाह के लिए अपनी पहली बीवी को वह तलाक दे देंगे। पुलिस ने इस मामले में छात्रा की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज कर ली है। ACP को फील्ड पोस्टिंग से हटाया गया है।

क्या है पूरा मामला?

मोहसिन खान 2013 बैच के यूपी पुलिस के PPS अधिकारी हैं। उनकी पोस्टिंग दिसम्बर, 2023 में कानपुर में की गई थी। दिसम्बर, 2023 में ही मोहसिन खान और पश्चिम बंगाल की निवासी हिन्दू IIT छात्रा की मुलाक़ात हुई। यह मुलाक़ात कानपुर साइबर सेल और IIT कानपुर के एक प्रोग्राम को लेकर हुई थी। दोनों में नम्बरों का आदान-प्रदान हुआ। छात्रा IIT कानपुर में क्रिमिनोलॉजी की चौथे सेमेस्टर की शोधार्थी है। इसके बाद जून, 2024 में मोहसिन खान ने छात्रा से सम्पर्क किया।

मोहसिन खान रेप IIT
ACP मोहसिन खान

मोहसिन खान ने बताया कि वह छात्रा के निर्देशन में PhD करना चाहते थे। इसके बाद दोनों की बातचीत चालू हो गई। छात्रा ने मोहसिन खान को PhD में एडमिशन लेने में मदद की। उनको इंटरव्यू के लिए भी बताया। यहाँ तक कि मोहसिन खान की तरफ से प्रोग्राम की फीस भी छात्रा ने ही जमा की। मोहसिन खान के एडमिशन लेने के बाद दोनों नजदीकी और बढ़ गई। मोहसिन खान ने इसके बाद छात्रा को बताया कि उनका अभी निकाह नहीं हुआ है। उन्होंने दावा कि वह छात्रा से बहुत प्यार करते हैं और रिश्ते में आना चाहते हैं।

छात्रा ने उनकी बात मान ली। छात्रा ने बताया है कि वह मोहसिन की बातों में इसलिए भी आ गई क्योंकि वह उस दौरान ब्रेकअप के दौर से गुजर रही थी। दोनों IIT के भीतर हॉस्टल में ही मिलने जुलने लगे। छात्रा ने बताया कि इसी दौरान रेप हुआ। इसके कुछ दिनों बाद छात्रा को पता चला कि मोहसिन खान का पहले ही निकाह हो चुका है। उनकी पत्नी गर्भवती तक हैं। इस बात को लेकर लड़ाई हुई लेकिन मोहसिन खान ने यह कह कर छात्रा को दुबारा मना लिया कि वह अपनी पहली पत्नी को तलाक दे देंगे क्योंकि उनका लम्बे समय से विवाद चल रहा है।

कैसे सामने आई सच्चाई?

हिन्दू छात्रा के आरोपों के अनुसार, मोहसिन की पत्नी 27 नवम्बर, 2024 को उनकी पत्नी ने दूसरे बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद छात्रा ने मामले में और छानबीन चालू कर दी। उसने उनकी पत्नी का इन्स्टाग्राम अकाउंट चेक किया। फिर जाकर वह मोहसिन की पत्नी से मिली तो पता चला कि विवाद जैसी कोई बात नहीं है। मोहसिन खान की पत्नी ने भी छात्रा के प्रति सहानुभूति ना दिखाकर रूखा व्यवहार अपनाया और सलाह दी कि वह अपनी इच्छानुसार उनके साथ रह सकती है। छात्रा ने बताया कि इसके बाद उसे पता चला कि उसके साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है।

पुलिस ने क्या कार्रवाई की?

IIT छात्रा ने सबसे पहले अपने साथ हुए रेप और धोखे की जानकारी IIT के प्रशासन को दी। उन्होंने इस मामले में जाँच करवाई और कानपुर कमिश्नरेट को इस बारे में सूचित किया। कानपुर कमिश्नरेट की जाँच के शुरूआती दौर में इस मामले को आपसी सहमति से निपटने की बात भी मीडिया रिपोर्ट्स में बताई गई है। हालाँकि, छात्रा ने इस पर कड़ा रुख अपना लिया और फिर रेप की FIR दर्ज करवाने का फैसला लिया है। कानपुर पुलिस की एक टीम ने छात्रा से उसका बयान लिया है।

पुलिस ने एक SIT भी इस संबंध में बनाई है। इसमें दो महिला अधिकारी शामिल की गई हैं। एक साइबर विशेषज्ञ को भी लगाया गया है। छात्रा ने गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को इस संबंध में FIR दर्ज करवाई है। प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए मोहसिन खान को कानपुर की पोस्टिंग से हटा लिया है। उन्हें अब लखनऊ में DGP मुख्यालय से अटैच किया गया है। आरोपित मोहसिन खान का पक्ष अभी तक मीडिया में नहीं आया है। छात्रा को लेकर IIT कानपुर उसके साथ है और उसकी सुरक्षा में साबधानी बरत रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने मजहबी स्थलों के खिलाफ याचिका-सर्वे पर लगाई रोक, जानिए किन-किन मामलों पर पड़ेगा फर्क: 10 जगह लड़ रहे हिन्दू हक की लड़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को मजहबी स्थलों के सर्वे की माँग करने वाली याचिकाओं को स्वीकार करने पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मजहबी स्थलों पर पहले से चल रहे मुकदमे को लेकर भी अंतिरम या अंतिम आदेश देने पर रोक लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभी बाकी अदालतें किसी भी मजहबी स्थल के सर्वे आदि का आदेश ना दें।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट, 1991 को लेकर दायर की गई याचिकाओं की सुनवाई को लेकर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में कई हिन्दू एक्टिविस्टों ने इस कानून को चुनौती दी है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि यह कानून उनके न्यायालय जाने के अधिकार को छीनता है। हिन्दू पक्ष ने यह भी कहा है कि इस कानून से मौलिक अधिकार भी प्रभावित होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में मुस्लिम पक्ष भी पहुँचा है। जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने इस मामले में कानून को सही ठहराते हुए याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इस पूरे मामले में केंद्र का रुख जानने के लिए उनसे एक हलफनामा दायर करने को कहा है। कोर्ट ने साथ ही यह रोक के आदेश भी दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की सर्वे पर रोक के आदेश के बाद देश में उन मजहबी स्थल को लेकर मामला लटक जाएगा जहाँ किसी पक्ष ने कोई दावा ठोंका है। वर्तमान में काशी लेकर मथुरा और संभल-बदायूँ समेत कई ऐसे मामले अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं। इनमें से कुछ सर्वे तक के आदेश हो चुके हैं जबकि कुछ में केवल याचिका ही स्वीकार हुई है।

कमाल मौला मजार बनाम भोजशाला

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला विवाद बहुत पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का मत है कि ये माता सरस्वती का मंदिर है जहाँ देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक आज भी लिखे हुए हैं। सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहाँ मौलाना कमालुद्दीन की मजार बना दी थी जिसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आना जाना शुरू हो गया और अब इसे नमाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इस मामले में हिन्दू कोर्ट पहुँचे थे। हिन्दू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च, 2024 में ASI सर्वे का आदेश दिया था।

ASI यहाँ सर्वे कर चुकी है। रिपोर्ट में ASI ने कहा है कि भोजशाला का वर्तमान परिसर यहाँ पहले मौजूद मंदिर के अवशेषों से बनाया गया था। ASI ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में बताया था, “खंभों और की सजावट और उन पर बने भित्तिचित्रों की वास्तुकला से यह कहा जा सकता है कि वह पहले मंदिर का हिस्सा थे। बेसाल्ट के ऊँचे परिसर पर मस्जिद के स्तम्भ बनाते समय इनका दोबारा इस्तेमाल हुआ है। एक स्तम्भ, जिसमे चारों दिशाओं में खाने बने हुए हैं, उसमे देवताओं की नष्ट की हुईं छवियाँ भी हैं।”

अटाला मस्जिद बनाम अटाला देवी

उत्तर प्रदेश के जौनपुर में बनी अटाला मस्जिद को लेकर भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। मई 2024 में इस संबंध में एक वकील अजय प्रताप सिंह ने याचिका दायर की थी। उन्होंने अपने दावे में कई पुस्तकों में उल्लेखित संदर्भों का हवाला दिया है। साथ ही पुरातत्व विभाग के निदेशक की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है।

माना जाता है कि अटाला माता मंदिर का निर्माण कन्नौज के राजा जयचंद्र राठौर ने करवाया था। अजय प्रताप सिंह ने कहा है कि इस मंदिर को तोड़ने का पहला हुक्म फिरोज शाह ने दिया था। बाद में इब्राहिम शाह ने इस पर कब्जा कर मस्जिद बना दिया। वकील अजय प्रताप सिंह की यह याचिका अभी कोर्ट में लंबित है। इस मामले में एक और याचिका डाली गई थी। इस पर कोर्ट ने 16 दिसम्बर, 2024 को फैसला देने की बात कही थी। हालाँकि, अब इसमें समय लग सकता है।

टीले वाली मस्जिद बनाम शेषनाग मंदिर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में टीले वाली मस्जिद के खिलाफ भी हिन्दू कोर्ट पहुँचे हैं। साल 2013 में लखनऊ स्थित भगवान शेषनाग टीलेश्वर महादेव विराजमान, लक्ष्मण टीला शेषनाग तीर्थ भूमि और अन्य ने निचली दीवानी कोर्ट में एक सिविल क्लेम किया था, जिसमें कहा गया था कि मुगल आक्रान्ता औरंगजेब के शासनकाल में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ दिया गया था।

हिंदू याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि संपत्ति के एक हिस्से पर जहाँ मस्जिद है, यह उनका है और इसे उन्हें सौंपा जाना चाहिए। इस मामले में मुस्लिम पक्ष ने हिन्दू पक्ष की याचिका के खिलाफ कोर्ट में अपील भी डाली थी लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। वर्तमान में यह मामला कोर्ट के सामने लंबित है।

अजमेर दरगाह बनाम शिव मंदिर

हिन्दू पक्ष की याचिका में यह भी कहा गया है कि यहाँ भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक भी होता था। हिन्दू पक्ष ने अपनी माँग के समर्थन में 1911 में लिखी एक किताब का जिक्र किया है। साथ ही उन्होंने दरगाह में मौजूद ढांचों को भी पुराने मंदिर का हिस्सा बताया है।

हिन्दू पक्ष ने कहा है कि अजमेर के तहखाने में गर्भगृह है। याचिका विष्णु गुप्ता ने दायर की है। विष्णु गुप्ता ने अब इस जगह की सही स्थिति जानने के लिए एक सर्वे की माँग की है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इसके साथ ही दरगाह के ही निकट अढ़ाई दिन का झोपड़ा मस्जिद को भी मंदिर तोड़ कर बनाया गया है।

संभल जामा मस्जिद बनाम हरि हर मंदिर

संभल के जिला न्यायालय में एक याचिका लगाई गई है। याचिका में कहा गया है कि संभल में स्थित जामा मस्जिद का निर्माण सदियों पुराने श्री हरि हर मंदिर पर किया गया था, जो भगवान कल्कि को समर्पित था और जिसे बाबर ने नष्ट कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यह स्थल हिंदुओं के लिए धार्मिक महत्व रखता है और इसे मुगल काल के दौरान इसे जबरन मस्जिद में बदल दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि वर्तमान में यह संरक्षित स्मारक है। इसको लेकर कोर्ट ने 19 नवम्बर को सर्वे का आदेश दिया था। इसके बाद 24 नवम्बर को भी सर्वे होना था लेकिन इस दिन मुस्लिम भीड़ ने दंगा कर दिया।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील और एडवोकेट विष्णु शंकर जैन के पिता हरि शंकर जैन, नोएडा के पार्थ यादव साथ अन्य याचिकार्ताओं ने लगाई है। याचिका लगाने वालों में और भी लोग शामिल हैं। उन्होंने कोर्ट से कहा है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त होने के नाते, उन्हें पूजा-अर्चना के लिए मंदिर में जाने का अधिकार है।

बदायूँ जामा मस्जिद बनाम नीलकंठ महादेव

यूपी के बदायूँ में स्थित शाही जामा मस्जिद पर हिंदू पक्ष ने दावा किया है। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि बदायूँ की जामा मस्जिद असल में पौराणिक नीलकंठ महादेव मंदिर है। इसको लेकर हिंदू पक्ष ने जिला अदालत में याचिका दायर की है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 दिसम्बर, 2024 को है।

हिंदू पक्ष की तरफ से वादी मुकेश पटेल ने साल 2022 में अदालत में सबूत पेश करते हुए दावा किया था कि यह मस्जिद पहले नीलकंठ महादेव मंदिर थी। उनकी याचिका में जामा मस्जिद के अंदर हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की माँग की गई है। मुस्लिम इस याचिका को खारिज करने की माँग कर रहे हैं।

फतेहपुर की जामा मस्जिद बनाम कामाख्या मंदिर

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में स्थित सलीम चिश्ती की दरगाह के खिलाफ भी हिन्दुओं ने कोर्ट में याचिका दायर की है। हिन्दुओं ने कहा है कि जहाँ आज फतेहपुर में जामा मस्जिद बनी हुई है, वहाँ कभी माँ कामाख्या का मंदिर हुआ करता था। हिन्दू पक्ष यहाँ बनी जामा मस्जिद के भी हिन्दू मंदिर के परिसर में होने की बात कही है।

हिन्दू पक्ष की तरफ से यह याचिका वकील अजय प्रताप सिंह ने दायर की है। उन्होंने ASI के एक अधिकारी की एक पुस्तक का भी जिक्र अपनी याचिका में किया है। उन्होंने कहा है कि इस पुस्तक के अनुसार, यहाँ मस्जिद में हिन्दू और जैन मंदिर के अवशेष से निर्माण किया गया है।

शाही ईदगाह बनाम कृष्ण जन्मस्थान

मथुरा में स्थित शाही ईदगाह वर्तमान में विवादित है और इसको लेकर न्यायालयों में कई याचिकाएँ पड़ी हुई हैं। हिन्दू पक्ष का कहना है कि मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बराबर में बनी शाही ईदगाह वाला ढाँचा जबरन वही बना दिया गया जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस जगह पर कब्जा करके ढाँचा बनाया गया है। यहाँ अभी भी कई ऐसे सबूत हैं जो कि यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था। यह मामला अभी कोर्ट में ही लंबित है।

हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन् 1670 में मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह ढाँचा बनवा दिया था और इसे मस्जिद कहने लगे। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह ढाँचे को हटाने की माँग करते रहे हैं। इस मामले में सर्वे का आदेश निचली अदालत द्वारा दिया गया था लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है।

ज्ञानवापी मस्जिद बनाम काशी विश्वनाथ

वाराणसी में काशी विश्वनाथ के बराबर में स्थित विवादित ज्ञानवापी मस्जिद में हिन्दू पक्ष को शुरूआती सफलता भी मिली है। इस मामले में हिन्दू पक्ष ने ASI सर्वे की माँग की थी। कोर्ट ने यहन ASI को सर्वे का आदेश भी दिया था। ASI की रिपोर्ट में बताया गया है कि ढाँचे के भीतर मंदिर का अस्तित्व प्रमाणित करने वाली कई कृतियों को जानबूझकर छुपाकर रखा गया था। ये सभी कृतियाँ (मूर्तियाँ, शिलाएँ, शिलालेख) उन तहखानों की जाँच में मिले हैं, जिन्हें जानबूझकर दीवालों और मलबों के सहारे बंद कर दिया गया था।

31 जनवरी, 2024 को एक आदेश में कहा गया था कि ज्ञानवापी परिसर के भीतर व्यास जी के तहखाने में हिन्दू पूजा अर्चना कर सकते हैं, उन्हें झरोखा दर्शन की अनुमति भी दी गई थी। यह निर्णय आने के बाद प्रशासन ने रात में ही पूजा और आरती चालू करवा दी थी। मस्जिद कमिटी इसके खिलाफ पहले सुप्रीम कोर्ट भी गई थी जहाँ कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया था।

कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद बनाम हिन्दू-जैन मंदिर

2020 में दिल्ली की एक अदालत में क़ुतुब मीनार के भीतर मंदिर होने की बात कहते हुए वहाँ हिन्दुओं को पूजा का अधिकार दिलाने हेतु याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में दावा किया गया है कि क़ुतुब मीनार के भीतर ही हिन्दू और जैन मंदिर परिसर स्थित है।

याचिका में कहा गया है कि अंदर 27 मंदिर हुआ करते थे, जिनमें मुख्य रूप से जैन तीर्थंकर ऋषभदेव के अलावा भगवान विष्णु प्रमुख रूप से स्थापित हैं। और इन्हीं मंदिरों को तोड़ कर ही मस्जिद का निर्माण किया गया। इस मामले में को निचली अदालत ने खारिज कर दिया था, जिसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई है।

मंदिरों पर कब्जा जमाए मस्जिदों की असलियत नहीं जान पाएँगे हिंदू, पुराने मामलों पर जजमेंट नहीं, सर्वे के लिए याचिका भी नहीं होगी स्वीकार: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने मजहबी स्थलों के सर्वे को लेकर नई याचिकाओं के स्वीकार किए जाने पर रोक लगा दी है। जिन मजहबी स्थलों के खिलाफ ऐसे मामले में चल रहे हैं, उन पर अदालतें कोई फैसला नहीं दे सकेंगी। इसके अलावा किसी भी मजहबी स्थल के सर्वे के आदेश भी नहीं दिए जा सकेंगे। कोर्ट ने यह फैसला प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट कानून पर चल रही सुनवाई के दौरान दिया है।

CJI संजीव खन्ना की बेंच ने गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई की है। इस कानून को हिन्दू पक्ष ने असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला बताया है। इसको लेकर कई याचिकाएँ डाली गई थीं। वहीं इसके समर्थन में जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द जैसे संगठन हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आदेश दिया कि अब देश की अदालतों में कोई भी ऐसी याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, जिसमें किसी मजहबी स्थल की स्थिति को लेकर चुनौती दी गई हो। इन याचिकाओं पर सुनवाई ही नहीं होगी। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट से नीचे की सभी अदालतों पर लागू होगा।

इसके अलावा जिन मामलों में किसी मजहबी स्थल के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं या जिनके सर्वे के आदेश दिए जा चुके हैं, उनको लेकर भी अदालतें कोई अंतरिम या अंतिम फैसला नहीं दे सकेंगी। इसका अर्थ है कि ज्ञानवापी जैसे मामलों पर अस्थायी रोक रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन मामलों में याचिकाएँ स्वीकार हो चुकी हैं, उनमें भी ASI या कोर्ट कमिश्नर जैसे सर्वे के आदेश नहीं जाएँगे। यह रोक तब तक लगी रहेगी जब सुप्रीम कोर्ट प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट की सांवैधानिकता पर फैसला नहीं दे देता। यानि जब तक सुनवाई चलेगी, तब तक किसी मस्जिद, चर्च मंदिर जैसे धर्मस्थान को लेकर दावा नहीं ठोंका जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मामले में केंद्र सरकार से एक हलफनामा दायर करने को कहा है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार को इस मामले में 4 सप्ताह के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में अगली सुनवाई पर स्थिति और भी स्पष्ट करेगा।

गौरतलब है कि वर्तमान में वाराणसी की ज्ञानवापी, धार की भोजशाला, मथुरा की शाही ईदगाह, संभल की जामा मस्जिद, बदायूँ की शम्सी जामा मस्जिद और जौनपुर की अटाला मस्जिद समेत कई ऐसे ही मजहबी स्थलों की स्थित को लकर हिन्दू पक्ष ने कोर्ट में मामले में डाले हैं। इनमें से कुछ में याचिका स्वीकार हुई है जबकि कुछ में सर्वे के आदेश दिए गए हैं।

आतंकी जाँच मामले में मौलवी हिरासत में, हंगामा मचाने आई बुर्काधारियों को फोर्स ने कंट्रोल किया: मीडिया ने कहा- धक्का-मुक्की हुई, पुलिस ने बताया- हालात अब सामान्य

उत्तर प्रदेश के झाँसी में मौलवी को छुड़ाने के लिए मुस्लिम भीड़ द्वारा NIA टीम को घेरने के मामले में पुलिस का बयान सामने आया है। बयान में झाँसी पुलिस ने बताया कि 12 दिसंबर को झाँसी जनपद के थानाक्षेत्र में NIA और ATS एक संदिग्ध व्यक्ति से पूछताछ के लिए गए थे। इसी दौरान कुछ लोग इकट्ठा होकर कार्रवाई का विरोध करने लगे, लेकिन मौके पर अतिरिक्त बल बुलाकर सबको समझा दिया गया और अब संदिग्ध को साइबर सेल थाना लाकर पूछताछ की जा रही है। माहौल बिलकुल शांत है।

बता दें कि इस मामले में मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से पहले बताया गया था कि गुरुवार (12 दिसम्बर, 2024) को NIA की एक टीम तड़के सुबह सुपर कॉलोनी नाम के मुहल्ले में मुफ़्ती खालिद नदवी को पकड़ने गई थी। खालिद नदवी शहर के काजी का भतीजा है। जब टीम ने उसका घर खटखटाया तो उसने दरवाजा नहीं खोला। आधे घंटे तक मशक्कत के बाद उसने दरवाजा खोला। इसके बाद टीम ने उसके घर में इस्लामी साहित्य और उसके लेनदेन के विषय में जानकारी ली। NIA टीम ने उससे जब बहुत से विदेशी नम्बरों पर बातचीत के विषय में पूछा तो उसने ऑनलाइन पढ़ाने की बात बताई।

इसके बाद सुबह NIA जब उसे अपने साथ ले जाने लगी तो बवाल हो गया। खबरों के अनुसार, मौलवी को हिरासत में लिए जाने के बाद मस्जिद से ऐलान हो गया और सैंकड़ों मुस्लिम आसपास इकट्ठा हो गए। इस भीड़ में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। सबने मिलकर मौलवी को छुड़ाने की कोशिश की। इस दौरान धक्का-मुक्की तक की बात सामने आई। हालाँकि अतिरिक्त फोर्स बुलाकर स्थिति को संभाल लिया गया और मौलवी को अपने साथ लेकर वो साइबर सेल थाने आ गए।

बताया जा रहा है कि NIA की टीम मौलवी को विदेशी फंडिंग के एक मामले में पकड़ने पहुँची थी। वह ऑनलाइन इस्लाम की तालीम देता है। उसके छात्रों में विदेशी छात्र भी शामिल हैं। NIA टीम ने झाँसी में ही एक और मौलवी से पूछताछ की है। वहीं खालिद को लेकर खबर है कि साइबर पुलिस थाने में पूछताछ के बाद उसे जाने दिया गया।

नोट: यह रिपोर्ट झाँसी पुलिस का बयान आने के बाद अपडेट की गई है।

गौमांस परोसो या होटल बंद करो: बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे, बोले- हिंदू मान्यताओं को नीचा दिखाने के लिए ये खाना जरूरी

बांग्लादेश के ढाका में इस्लामी कट्टरपंथ अब इस हद तक पहुँच गया है कि ‘मुस्लिम कंज्यूमर राइट्स काउंसिल’ ने माँग की है कि या तो राज्य के हर रेस्टोरेंट में बीफ परोसा जाए वरना सब मिलकर उसका बहिष्कार करे।

अपनी इस माँग को लेकर मुस्लिम कंज्यूमर राइट्स काउंसिल ने बंगशाल एरिया में एक रैली भी की और साथ में तर्क दिया कि जो रेस्टोरेंट बीफ नहीं दे रहे वो इस्लामी विचारधारा के विरुद्ध हैं इसलिए उन्हें बॉयकॉट किया जाना चाहिए।

रैली में शामिल प्रदर्शनकारी इस दौरान बंगशाल इलाके के एक होटल अल रज्जाक में एकत्रित हुए। इस दौरान उन्होंने नारेबाजी की। बार-बार कहा गया -जहाँ बीफ नहीं बिक रहा वो रेस्टोरेंट भारत और हिंदुत्व के एजेंट हैं। ऐसे रेस्टोरेंट्स का बहिष्कार किया जाए।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, परिषद के संयोजक मुहम्मद आरिफ अल खबीर ने बीफ को इस्लामी पहचान बताया और कहा कि गोमांस खाना इसी पहचान का प्रतीक है।

मुहम्मद आरिफ अल ख़बीर ने आगे कुरान की आयतों की बात करते हुए ये भी बताया कि उनके मजहब में गोमांस खाना कोई अनिवार्य नहीं है लेकिन हिंदू मान्यताओं को नीचा दिखाने के लिए और इस्लाम के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए ऐसा करना जरूरी है। ठीक वैसे जैसे इस्लाम में ऊँट का मांस खाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन मुसलमान ऊँट खाते हैं क्यों ये यहूदियों के खानों में निषेध है, इसलिए इस्लाम के प्रति निष्ठा दिखाने के लिए उनका ऊँट खाना जरूरी है।।

आरिफ अल खबीर ने कहा कि सभी रेस्टोरेंटों को अपनें मेन्यू में कम से कम एक बीफ डिश शामिल करके मुस्लिमों के प्रति अपना समर्थन देना चाहिए। अगर वो ऐसा नहीं करते तो ये तो पक्का है कि वो हिंदुत्व के एजेंट हैं और इसीलिए उनका बहिष्कार होना चाहिए।

आरिफ ने अपने बयान में पश्चिमी देशों पर भी गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि यूरोप और अमेरिका में यहूदी और ईसाई मुस्लिमों के लिए हलाल खाना नहीं रखते। मुस्लिमों को अपने खाने के लिए अलग व्यवस्थान करनी पड़ती है। ऐसे ही अगर हिंदुओं को अपने लिए कोई विकल्प रखना है तो वो अपना रेस्टोरेंट खोल लें, मुस्लिमों के अधिकारों का हनन न करें।