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चाइनीज माल जैसी चीनी अर्थव्यवस्था, 27 साल के निचले स्तर पर ग्रोथ रेट

भारत के पड़ोसी देशों की अर्थव्यवस्था ICU से गुजर रही है। पाकिस्तान के बाद अब उसके सदाबहार दोस्त चीन की हालात भी नाजुक दौर में है। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध और वैश्विक स्तर पर माँग की कमी का असर चीन पर पड़ा है। शायद यही वजह है कि चीन की आर्थिक विकास की रफ्तार 27 साल में सबसे सुस्त पड़ गई है। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनबीएस) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार चीन की GDP (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर 2019 की दूसरी तिमाही में 6.2% रही।

6 अरब डॉलर का कर्ज भी डूबने से नहीं बचा पाएगा पाकिस्तान को

वर्तमान वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चीन की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार पिछले तीन दशक में सबसे कम रही है। अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार के कारण भी चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अमेरिका के खिलाफ लड़ने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। पिछले वर्ष से चीन के आर्थिक विकास पर मंदी का दबाव पड़ा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की रफ्तार मंद पड़ने का एक प्रमुख कारण चीन और अमेरिका के बीच जारी व्यापारिक तनाव (ट्रेड वॉर) को माना जा रहा है।

डोनाल्ड ट्रम्प मना रहे हैं खुशियाँ

चीन की अर्थव्यवस्था के आँकड़ों में तीन दशक में सबसे कम वृद्धि दर की रिपोर्ट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प खुशियाँ मना रहे हैं। उन्होंने कहा, “पिछले 27 साल में इस दूसरी तिमाही में चीन में सबसे कम ग्रोथ दर्ज हुई है। यह अमेरिकी टैरिफ का नतीजा है, अब कंपनियां गैर-टैरिफ वाले देशों की ओर जाने को बेताब हैं। चीन से कंपनियां देश छोड़ कर जा रही हैं, यही वजह है कि चीन अब अमेरिका से डील करना चाहता है।”

आँकड़ों के अनुसार, साल 2019 के अप्रैल-जून के दौरान चीन की जीडीपी वृद्धि दर 6.2% रही, जबकि पहली तिमाही में यह 6.4% थी। इससे कम वृद्धि दर 1992 की जनवरी-मार्च तिमाही में दर्ज की गई थी।हालाँकि, जीडीपी के यह आँकड़े पूरे साल के लिए सरकार के छह से 6.5% के लक्ष्य के अनुरूप हैं।

बीजिंग और वाशिंगटन के बीच व्यापारिक विवाद का असर अर्थव्यवस्था की सेहत पर नजर आने लगा है। यही वजह हैं कि बीजिंग के अधिकारी अपने अमेरिकी समकक्ष के साथ व्यापारिक विवाद को सुलझाने की दिशा में लगातार प्रयासरत हैं। नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स ने कहा कि बाहरी अनिश्चितताओं को लेकर अर्थव्यवस्था जटिल दौर से गुजर रही है। ब्यूरो ने यह भी कहा कि अर्थव्यवस्था पर नया दबाव बना हुआ है।

संसद में मंत्रियों को Absent देखकर भड़के PM मोदी, माँगी लिस्ट

संसद में नेताओं की गैरहाजिरी के कारण प्रधानमंत्री मंगलवार (जुलाई 16, 2019) को भड़क गए। उन्होंने संसदीय समिति की बैठक के दौरान अपनी नाराजगी जाहिर की और संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी को संसद में अनुपस्थित रहने वाले मंत्रियों के नामों की लिस्ट रोजाना देने को कहा।

प्रधानमंत्री ने इस दौरान जल संकट के मुद्दे पर बात की। उन्होंने नेताओं को निर्देश दिए कि वे संसदीय क्षेत्र में अधिकारियों के साथ जल संकट पर बैठक करें और स्थानीय लोगों से भी इस बारे में बातचीत करें।

खबर के मुताबिक प्रधानमंत्री ने सांसदों को राजनीति से इतर भी काम करने का सुझाव दिया। उन्होंने सांसदों से कहा कि वे लोग अपने संसदीय क्षेत्र में कुछ हटकर भी काम करें। जिसमें वे स्थानीय प्रशासन की मदद लें और साथ में सामाजिक कार्यों से भी जुड़ें।

प्रधानमंत्री ने सांसदों को गंभीर बीमारियों जैसे टीबी और लैप्रोसी से लड़ने और उन्हें दूर करने के लिए मिशन की तरह काम करने का सुझाव दिया।

सांसदों की अनुपस्थिति पर संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी ने बताया कि जैसा कि पीएम मोदी पहले भी कह चुके हैं कि संसद में उपस्थिति के मामले में कोई अपवाद नहीं होगा। सभी के लिए संसद की चर्चाओं में भाग लेना अनिवार्य है।

बता दें कि 14 जुलाई को पार्टी ने लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों को नोटिस जारी करके आज की बैठक के बारे सूचित कर दिया था ताकि सभी सांसद बैठक में मौजूद रहें। लेकिन सूचना देने के बाद भी सांसदों की कुर्सी खाली रही, जिसके कारण प्रधानमंत्री भड़क उठे। इस बैठक में हिस्सा लेने वालों में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, संसदीय मामलों के मंत्री प्रहलाद जोशी, विदेश मंत्री एस जय शंकर और वी मुरलीधरन का नाम शामिल है।

सब खुदाओं को इनकार, सिर्फ़ अल्लाह से इकरार, बगैर इसे माने मुस्लिम नहीं: सलमा अंसारी को दो टूक जवाब

हाल ही में पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने चाचा नेहरु मदरसे में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए मंदिर और मस्जिद का निर्माण करवाया। जिसके बाद सोमवार (जुलाई 15, 2019) को उस मदरसे के प्रांगढ़ में बने मंदिर में पूजा हुई और मुस्लिम बच्चों ने वहाँ नमाज पढ़ी।

हालाँकि सलमा अंसारी द्वारा उठाए गए इस कदम की हर ओर सराहना हुई लेकिन कुछ इस्लामी धर्मगुरुओं ने इसका खूब विरोध किया है। एक ओर जहाँ अलीगढ़ की पूर्व मेयर ने सलमा के विचार से प्रभावित होकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मंदिर बनाने की माँग की तो वहीं AMU के प्रोफेसर मुफ्ती जाहिद का कहना है कि अगर कोई मुस्लिम है तो उसे सब खुदाओं को इनकार करना पड़ता है और सिर्फ़ अल्लाह से इकरार करना पड़ता है। और बगैर इसे माने कोई मुस्लिम नहीं हो सकता।

मंदिर बनाने के विरोध में सिर्फ़ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने ही नहीं बल्कि सपा के पूर्व विधायक ज़मीरुल्लाह ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि मदरसे में किसी मंदिर की जरूरत नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर कई और जगह भी लोग मदरसों में मंदिर बनाने की माँग कर सकते हैं।

हालाँकि सलमा अंसारी ने इन सभी धर्मगुरुओं की टीका-टिप्पणी को नजरअंदाज करते हुए इस मामले पर बोला, “मैं चाहती हूँ कि हिंदुस्तान के निर्माण में सबकी भागीदारी होनी चाहिए। यहाँ मैं केवल अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंतित हूँ। मॉब लिचिंग जैसे अपराध देश के ऊपर धब्बा हैं। मदरसा चलाते हुए इन चीजों को ध्यान रखने की जरूरत है।”

5 साल से JNU में बतौर गार्ड तैनात रामजल मीणा ने निकाला एंट्रेंस एग्जाम, पढ़ेंगे रशियन

जब राजमल मीणा ने 2014 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में एक गार्ड के रूप में क़दम रखा था, तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वह इसी यूनिवर्सिटी के छात्र होंगे। राजस्थान के करौली से आने वाले मीणा ने रशियन भाषा में बीए ऑनर्स कोर्स में दाखिले की परीक्षा पास की है। मीणा ने कहा, “जेएनयू की सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ लोग सामाजिक भेदभाव में विश्वास नहीं रखते। तैयारी के दौरान शिक्षकों से लेकर छात्रों तक, सभी ने मेरी हौसला अफजाई की और अब वे मुझे बधाई दे रहे हैं।

मीणा ने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे उन्हें रातोरात बहुत बड़ी ख्याति मिल गई हो। मीणा के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई। लेकिन, बाद में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। गाँव से कॉलेज की दूरी 28-30 किलोमीटर थी और उन्हें अपने पिता का हाथ बँटा कर घर-परिवार के लिए रुपए भी कमाने थे।

लेकिन मीणा ने हार नहीं मानी। पिछले वर्ष उन्होंने डिस्टेंस एजुकेशन के द्वारा राजस्थान यूनिवर्सिटी से राजनीतिक विज्ञान, इतिहास और हिंदी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। जेएनयू के कुलपति एम जगदीश ने कहा कि संस्थान ने हमेशा अलग-अलग सामाजिक परिवेश से आने वाले छात्रों का हौसला बढ़ाया है।

मीणा अभी मुनिरका में किराए पर रहते हैं। वो शादीशुदा हैं और उनकी 3 बेटियाँ भी हैं। मीणा मानते हैं कि परिवार की वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने में वह ख़ासे व्यस्त रहे, लेकिन उनके मन में कहीं न कहीं नियमित शिक्षा के लिए किसी कॉलेज में एडमिशन न ले पाने का दुःख ज़रूर था। उन्होंने जब जेएनयू के शैक्षिक वातावरण को देखा, तब उनकी यह इच्छा फिर से जाग उठी। वह अपनी ड्यूटी के दौरान व उसके बाद प्रवेश परीक्षा की तैयारी करते थे।

मीणा अपने फोन में ही रोज़ अखबार पढ़ा करते थे और जेएनयू के छात्र भी पीडीएफ नोट्स देकर उनका सहयोग करते थे। विदेशी भाषा पढ़कर मीणा का विदेश घूमने का सपना है। वह सिविल सर्विसेज की भी तैयारी करना चाहते हैं। लेकिन, रुपयों को लेकर उनकी चिंता बनी हुई है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी घर की वित्तीय ज़रूरतों को लेकर चिंतित रहती है। जेएनयू में नौकरी करते हुए नियमित शिक्षा पाना कठिन है, इसीलिए उन्होंने नाइट शिफ्ट दिए जाने की माँग की है। फिलहाल उन्हें 15,000 रुपए प्रति महीने मिलते हैं।

जेएनयू के मुख्य सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि नियमित शिक्षा के साथ जेएनयू में नाइट शिफ्ट में नौकरी कर पाना संभव नहीं है, लेकिन उन्हें मीणा पर गर्व है और उन्हें हरसंभव सहयोग दिया जाएगा। मीणा ने बताया कि फरवरी 2016 में हुए प्रकरण (जेएनयू नारेबाजी प्रकरण) के कारण कुछ लोगों ने अपने मन में इस संस्थान को लेकर ग़लत छवि बना ली है, लेकिन आज हर क्षेत्र में कई बड़े पदों पर जेएनयू से पढ़े लोग हैं। उन्होंने कहा कि वे भी यहाँ से पढ़ कर कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं।

J&K: श्रीनगर में जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी बसीर अहमद गिरफ्तार, ₹2 लाख का था इनाम

दिल्‍ली पुलिस की स्‍पेशल सेल ने जैश-ए-मोहम्‍मद के आतंकी बसीर अहमद को गिरफ्तार किया है। इस आतंकी पर दिल्‍ली पुलिस ने ₹2 लाख का इनाम रखा था। मुखबिर की सूचना पर स्पेशल सेल ने मंगलवार (जुलाई 16, 2019) को श्रीनगर से बसीर अहमद को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी के बाद पुलिस की टीम द्वारा लगातार उससे पूछताछ की जा रही है।

जानकारी के मुताबिक, आतंकियों को पकड़ने के लिए सुरक्षाबलों ने उत्तरी कश्मीर में दो जगह तलाशी अभियान चलाया। इसी कड़ी में बिछरवारा, कुपवाड़ा और हाजिन बांडीपोर में भी तलाशी ली। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने जैश-ए-मुहम्मद के एक आतंकी बशीर अहमद को श्रीनगर में पकड़ा। 

गौरतलब है कि फरवरी 2007 में दिल्ली पुलिस ने बशीर अहमद, फैयाज अहमद लोन और अब्दुल मजीद बाबा को एक पाकिस्तानी आतंकी शाहिद गफूर संग दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर पकड़ा था। पुलिस ने दावा किया था कि यह सभी सुरक्षाबलों के साथ हुए मुठभेड़ के बाद पकड़े गए हैं। ये लोग दिल्ली में किसी बड़ी साजिश को अंजाम देने वाले थे।

सात अगस्त 2013 में दिल्ली की एक अदालत ने शाहिद गफूर को सजा सुनाई थी और बशीर, फैयाज व अब्दुल मजीद को रिहा कर दिया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने बशीर, फैयाज व अब्दुल मजीद को भी दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। कुछ सालों बाद इस मामले में जमानत मिलने के बाद बशीर हाई कोर्ट में पेश नहीं हो रहा था। कई बार पेशी से नदारद रहने पर कोर्ट ने उसके खिलाफ गैरजमानती वॉरंट जारी किया था। बशीर के दोनों साथियों फैयाज और अब्दुल मजीद को दिल्ली पुलिस पहले ही श्रीनगर से पकड़ चुकी है और पुलिस ने बशीर को भी पकड़ लिया है।

बिहार: पानी के लिए हाहाकार, चमकी बुखार और अब बाढ़, गिरोह को था इसी का इंतजार

जिस राज्य में नेताओं-अधिकारियों-ठेकेदारों का गिरोह विपदा की प्रतीक्षा करता हो, गिद्ध की तरह नजर जमाए बैठा हो कि घर-बार उजड़े, तैरते-उफनाते इंसानों-जानवरों के शव दिखें, ताकि वह राहत और बचाव के नाम पर माल कूट सके, उस राज्य की नियति भला और क्या हो सकती है!

ताज्जुब नहीं कि आम चुनावों के बाद बिहार ने पहली सुर्खियां पानी के लिए तरसते लोगों के कारण बटोरी। फिर आया चमकी बुखार जिसने करीब 200 बच्चों की जान ली। और अब पानी का सैलाब। ऐसा सैलाब जिसे रोक पाना तो मुमकिन नहीं था, लेकिन जिसकी आशंका सबको थी। जिसकी आहट से हर साल लोग सहमे रहते हैं।

सरकारी मशीनरी भी इससे अनजान नहीं। इसलिए, उसने भी आदेश निकाले। लेकिन, बचाव की कोई तैयारी नहीं की गई। क्योंकि, जान-माल का कम नुकसान इन गिद्धों को पेट भरने की खुराक नहीं दे पाता। और जब एक चुनाव से निपटे हों और अगले साल फिर चुनाव में जाना हो तो खजाना भरा होना चाहिए, ​हम-आप तो मरने के लिए ही पैदा हुए हैं।

आदेश पर अमल कौन करे?

आपदा प्रबंधन विभाग ने 3 मई 2019 को बिहार के सभी जिलाधिकारियों एक पत्र भेजा। यह पत्र हर साल अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में जारी होता है और जून के आखिर तक इसमें दिए गए दिशा-निर्देशों को पूरा करना होता है। इनमें कंट्रोल रूम बनाना, नावों का इंतजाम, गोताखोरों की बहाली, राहत केंद्र के लिए जगह, राशन, दवा, मोबाइल टीम, तटबंधों की सुरक्षा सुनिश्चित करना वगैरह जैसे काम शामिल हैं। यदि प्रशासन ने इन निर्देशों को लेकर थोड़ी भी गंभीरता दिखाई होती तो हालात उतने भयावह नहीं होते जितने आज दिख रहे हैं।

लेकिन, 15 साल के ‘जंगलराज’ के बाद से जारी करीब डेढ़ दशक के ‘सुशासन’ में ये निर्देश रूटीन से ज्यादा महत्व नहीं रखते। अब चूॅंकि हर साल बाढ़ से पहले तटबंधों की मजबूती के नाम पर करोड़ों का वारा-न्यारा होता है, सो बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के केन्द्रीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष ने 13 जुलाई तक सभी तटबंध सुरक्षित होने का बुलेटिन जारी किया। जबकि तटबंध टूटने शुरू हो चुके थे। 14 जुलाई को तटबंध टूटने की बात विभाग ने तब मानी जब सोशल मीडिया में कटाव, गॉंवों के टापू बनने और सैकड़ों लोगों के फंसे होने के वीडियो की बाढ़ आ गई।

टीओआई में प्रकाशित इंटरव्यू

बांध से पानी बहे तो कोई क्या करेगा

14 जून को टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित इंटरव्यू में बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने दावा किया है कि सरकार बाढ़ के हालात से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। इतना ही नहीं अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कर सरकार ने 1-7 जून तक बाढ़ सुरक्षा सप्ताह भी मनाया था। जब सारे दावों की पोल खुल गई तो 15 जून को झा ने कहा कि ‘बांध से जब पानी बहेगा तो कोई क्या करेगा’।

24 घंटे तक बहाव के बीच पेड़ पर फँसे रहे

सीतामढ़ी के बाढ़ प्रभावित पंचायत सिंहवाहिनी की मुखिया रितु जायसवाल ने अपने फेसबुक पेज पर 13 जुलाई की शाम 6 बजकर 23 मिनट पर लिखा, “मुझे जिले के नरगा दक्षिणी पंचायत के गांव हरदिया से मदद के लिए फोन आ रहे है। भीषण बहाव में सुबह 8 बजे से 8 लोग पेड़ पर फँसे हैं। ग्रामीण सुबह से अधिकारियों को फोन कर रहे हैं पर कोई सुन नहीं रहा। मैंने अभी पटना आपदा प्रबंधन विभाग को इसकी सूचना दी है। उन्होंने तत्काल एनडीआरएफ की टीम भेजने का भरोसा दिलाया है।”

हरदिया में पेड़ पर फॅंसा ग्रामीण

तो क्या एनडीआरएएफ की टीम पहुॅंची? रितु ने 14 जुलाई की सुबह 9 बजकर 44 मिनट पर किए गए पोस्ट में बताया है, “आपदा को लेकर सीतामढ़ी जिले के एसी कमरे से बैठ कर जारी किए गए हाई अलर्ट के जमीनी हकीकत को जानिए। रात भर हम ग्रामीण अधिकारियों के साथ फोन पर थे। सुबह नतीजा ये निकला की एनडीआरएफ और एसडीआरएफ तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं पहुँच पाई। आखिरकार, ग्रामीणों ने हिम्मत दिखाते हुए बांस जोड़-जोड़ कर लगभग हिम्मत हार चुके 24 घंटे से पेड़ पर फँसे हुए ग्रामीण को आज सुबह 6 बजते-बजते बचा लिया और उसके बाद एनडीआरएफ को सूचित भी किया कि हमने बचा लिया है अब आने की ज़रूरत नहीं है सर। इसके बाद ग्रामीणों पर झूठ बोलने का आरोप लगाया गया और एफआईआर करने की धमकी दी गई। सदर एसडीओ मुकुल गुप्ता ने विकट परिस्थिति में लड़ रहे ग्रामीणों को एफआईआर की धमकी दे पीड़ित व्यक्ति को बाढ़ के इस भयावह हालात में जिला कार्यालय आने को कहा। इसकी सूचना भी मैंने पटना दी। वहॉं से फटकार लगने के बाद वो माने।”

रितु काफी चर्चित मुखिया हैं और अपने पंचायत की सूरत बदलने को लेकर उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं। रितु ने फेसबुक पर बताया है कि बाढ़ 2017 से ज्यादा प्रलयकारी है और उनका पंचायत पूरी तरह तबाह हो चुका है।

नरूआर भी नहीं पहुॅंची एनडीआरएफ की टीम

बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित गॉंवों में झंझारपुर का नरूआर भी है। इस गॉंव में अचानक आए तेज बहाव में कई लोग बह गए जिनका अब तक पता नहीं चल पाया है। यहॉं बचाव के काम में जुटी मानव कल्याण केंद्र संस्था के पंकज झा ने ऑपइंडिया को बताया कि उनकी टीम को गाँव में एक बूढ़ी महिला के घर में फँसे होने की सूचना मिली। महिला का मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ था। सूचना मिलने के बावज़ूद एनडीआरएफ की टीम गाँव नहीं पहुँची। आखिर में स्थानीय लोगों ने खुद जोखिम उठा महिला को अगली सुबह बचाया।

फिर भी नहीं सुधरे

आपदा के 72 घंटे बाद राज्य सरकार ने पीड़ितों के लिए 196 राहत केंद्र और 644 सामुदायिक रसोई खोलने का दावा किया है। पर आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि मधुबनी में तीन ही राहत केंद्र खुले हैं, जबकि वहां के 15 प्रखंड बाढ़ प्रभावित हैं। सीतामढ़ी में भी प्रभावित इलाके का दायरा इतना ही बड़ा है, लेकिन वहॉं 148 राहत केंद्र खोल दिए गए हैं। बाढ़ से राज्य के 12 जिलों के करीब 26 लाख लोग पीड़ित हैं। जो काम 30 जून तक हो जाने चाहिए थे, वे अब हो भी रहे हैं तो इतने छोटे स्तर पर कि इसका कोई मतलब नहीं।

कंधे पर बोरी लादे डीएम

सो, अब कंधे पे बोरी लादे या हाफ पैंट पहनकर पानी में खड़े अधिकारियों की तस्वीर दिखे तो लहोलोहाट मत हो जाइएगा। असल में इनके लिए आप जानवरों जैसे ही हैं। यकीन न हो तो नेपाल से सटे जयनगर के पास बाढ़ के पानी में साथ-साथ तैरते जानवरों और इंसानों के इस वीडियो को देख लें।

वैसे, फिर से यह सारा दोष नेपाल के मत्थे मढ़ा जाएगा। लेकिन, बता दूॅं कि नेपाल किसी बराज से पानी नहीं छोड़ता। नेपाल से राज्य में आने वाली केवल दो नदियों गंडक और कोसी पर बराज है। दोनों की डोर बिहार के जल संसाधन विभाग के हाथों में ही है और पटना से आदेश के बाद ही बराज के फाटक खुलते हैं। इस विभाग के मुखिया वही संजय झा हैं जो बाढ़ आने से पहले दावा कर रहे थे कि सरकार अबकी बार पूरी तरह तैयार है।

‘अपने पालतू कुत्ते को कंट्रोल करें’- TDP सांसद ने पार्टी चीफ चंद्रबाबू नायडू को दी धमकी

तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। बीते दिनों पार्टी से 4 राज्यसभा सदस्यों के जाने के बाद अब एक और सांसद ने पार्टी और लोकसभा सदस्यता छोड़ने की धमकी दी है। विजयवाड़ा से टीडीपी सांसद केसिनेनी श्रीनिवास नानी ने पार्टी छोड़ने की धमकी देते हुए ट्विटर पर लिखा, “चंद्रबाबू यदि आप पार्टी में मेरे जैसे लोगों को नहीं चाहते हैं, तो आप मुझे बता सकते हैं। मैं संसद सदस्य के रूप में और पार्टी की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दूँगा। अगर आप चाहते हैं कि मेरे जैसे लोग बने रहें, तो कृपया अपने पालतू कुत्ते को नियंत्रित करें।”

केसिनेनी के इस ट्वीट में ‘पेट डॉग’ शब्द का इशारा टीडीपी नेता और आंध्र प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बुद्धा वेंकन्ना की तरफ था। जिसके बाद इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वेंकन्ना ने कहा कि वो हमेशा चंद्रबाबू नायडू के वफादार रहेंगे। उन्होंने एक पिछड़ी और कमजोर जाति के व्यक्ति को एमएलसी की सीट दी है, जिसे वो विश्वास का नाम देना चाहते हैं। वेंकन्ना ने कहा कि केसिनेनी ने उनकी वफादारी का जो नाम (पेट डॉग) दिया है, उसे वो स्वीकार करते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वो चंद्रबाबू नायडू और पार्टी के लिए ट्विटर वॉर खत्म कर रहे हैं।

बुद्धा वेंकन्ना, पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के काफी करीबी माने जाते हैं और बीते कई दिनों से टीडीपी के इन दोनों नेताओं की ट्विटर पर जंग जारी है। ये दोनों ही नेता एक दूसरे पर सत्तारूढ़ वाईएसआर कॉन्ग्रेस पार्टी को समर्थन देने की योजना बनाने को लेकर आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में वेंकन्ना ने वाईएसआरसीपी के नेता विजय साई रेड्डी से मुलाकात की थी, जिसके बाद से ये खबरें और तेज हो गई थीं। टीडीपी के चार राज्यसभा सदस्यों के पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने के बाद चंद्रबाबू नायडू के लिए यह एक गंभीर संकेत हो सकता है।

गौरतलब है कि पिछले महीने टीडीपी के चार राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए थे। टीडीपी सांसद वाईएस चौधरी, सीएम रमेश, टीजी वेंकटेश और जी मोहनराव ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू से मुलाकात की थी और टीडीपी से अपने इस्तीफे सौंपे थे। वेंकैया नायडू को संबोधित अपने पत्र में इन सांसदों ने कहा था कि वे नरेंद्र मोदी के शानदार नेतृत्व से प्रेरित और उत्साहित हुए हैं और अपने समूह का विलय बीजेपी में कर रहे हैं।

एक हिंदू लड़की मुस्लिम Live-In पार्टनर के द्वारा मार दी जाती है और तापसी पन्नू को मजाक सूझ रहा है!

चश्मेबद्दूर, पिंक और बेबी जैसी फिल्मों से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने वाली तापसी पन्नू सोशल मीडिया पर अक्सर सक्रियता से किसी भी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए दिखाई पड़ती हैं, लेकिन इस बार एक बर्बर हत्या की घटना पर ट्वीट करना उन्हें महंगा पड़ गया। और ऐसा होता भी क्यों न? तापसी ने हत्या जैसे गंभीर मामले पर ‘व्यंग्य’ कसने का प्रयास किया, वो भी सिर्फ़ ‘कबीर सिंह’ फिल्म के डायरेक्टर के प्रति अपनी कुंठा निकालने के लिए!

तापसी ने 15 जुलाई को एक न्यूज पोर्टल की खबर को रिट्वीट किया। खबर थी- नागपुर में एक बॉयफ्रेंड ने अपनी 19 साल की गर्लफ्रेंड की कर दी हत्या, क्योंकि उसे लड़की के कैरेक्टर पर शक था। तापसी ने इसे शेयर करते हुए लिखा, “क्या पता वो एक-दूसरे से पागलों की तरह प्यार करते हों और ऐसा करना उसके लिए सच्चे प्यार पर मुहर लगाने जैसा था।

तापसी पन्नू के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

तापसी के इस ट्वीट से स्पष्ट था कि यहाँ उन्होंने घटना की ओट में फिल्म कबीर सिंह के डायरेक्टर संदीप वांगा के उस बयान पर तंज कसा है। जिसमें उन्होंने कहा था कि वो प्यार ही क्या जिसमें थप्पड़ मारने की आजादी न हो। जिस पर सोशल मीडिया यूजर्स ने संदीप की बहुत आलोचना की थी, लेकिन उनके सफाई देने पर मामला लगभग शांत हो गया था। अब ऐसे में तापसी द्वारा किसी बर्बर हत्या की घटना पर कसा ‘तंज’ भी यूजर्स को अखर गया और यूजर्स ने तापसी को ट्विटर पर ही आड़े हाथों ले लिया।

एक यूजर ने लिखा- एक हिंदू लड़की को उसके मुस्लिम बॉयफ्रेंड द्वारा बर्बर तरीके से मार दिया जाता है और तुम्हें मजाक सूझ रही है। अगर यह उल्टा होता तो फेविकॉल पी के शांत बैठी रहती। मौत पर व्यंग्य करके इंसान गिरने की सीमा से भी परे होकर गिर जाता है।

तापसी को उनके तंज पर जमकर ट्रोल किया गया। जिसके बाद उन्होंने वैधानिक चेतावनी लिखते हुए दोबारा पोस्ट किया, “जिन लोगों के पास व्यंग्य की समझ नहीं है, वो प्लीज मेरा ट्वीट इग्नोर करिए। शुक्रिया।”

तापसी द्वारा माफ़ी की उम्मीद लगाए बैठे यूजर्स को जब इस तरह का जवाब मिला तो उनके सपोर्टर भी उन पर भड़क उठे और उन्हें जमकर सुनाया। किसी ने उन्हें समझाया कि हत्या जैसी घटना पर व्यंग्य करना सही नहीं है। तो किसी ने कहा, “एक लड़की मार दी गई और तुझको मज़ाक सूझ रहा है, ज्ञान पेल रही है किसी की लाश पर, शर्म तो बेच कर पहले ही खा गई हो… थोड़ी सी इंसानियत भी नहीं है तुममें… तेरे घर पर कोई मरे ना तब ये sarcasm दिखाना लोगो को…”

हत्या की घटना पर दी गई व्यंग्य प्रतिक्रिया पर एक यूजर ने उनके लिए dumb शब्द का प्रयोग किया और पूछा कि हत्या के बाद आखिर कोई कैसे व्यंग्य ट्वीट कर सकता है।

प्रशांत नाम के ट्विटर यूजर ने तो यहाँ तक लिखा, “मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रेमी भी तुम्हें इसी तरह प्रेम करे। बुरा मत मानना, मैं भी व्यंग्य कर रहा हूँ।”

कई यूजर ने तापसी पर इल्जाम लगाया कि वे व्यंग्य के जरिए उस हत्यारे को डिफेंड करने की कोशिश कर रही है, जिसने प्यार के नाम पर 19 साल की लड़की को मार दिया।

चेहरे को कुचला, हाथ को किया क्षत-विक्षत… उभरती मॉडल ख़ुशी परिहार का बॉयफ्रेंड अशरफ़ शेख़ गिरफ़्तार

बाढ़ से बेहाल मिथिलांचल में जान-माल भगवान भरोसे, राहत-बचाव की तो पूछिए मत

बिहार के अधिकतर इलाके भयंकर बाढ़ की चपेट में हैं। कोसी, कमला, बागमती, गंडक, महानंदा समेत राज्य की सभी बड़ी नदियां उफान मार रही हैं। सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, मोतिहारी, अररिया समेत कई जिलों में जगह-जगह तटबंध टूटने के कारण स्थिति बेहद भयावह है। खासकर, ग्रामीण इलाकों की। मधुबनी, सीतामढ़ी और दरभंगा में तो दर्जनों गांव ऐसे हैं जो टापू बन चुके हैं। इन गांवों के चारों तरफ बाढ़ का पानी है और सड़क संपर्क समाप्त हो गया है।

इस तरह के विकट हालात में भी राहत और बचाव का कार्य कुछ व्यक्तियों और सामाजिक संस्थानों के भरोसे ही चल रहा है। हालाँकि आपदा के 72 घंटे बाद राज्य सरकार ने पीड़ितों के लिए 196 राहत केंद्र और 644 सामुदायिक रसोई खोलने का दावा किया है। इनमें 148 केंद्र सीतामढ़ी जिले में खोले गए हैं और मधुबनी में केवल तीन। जबकि, मधुबनी और सीतामढ़ी दोनों जिलों के 15-15 प्रखंड बाढ़ प्रभावित हैं। सरकार की तरफ से बताया गया है कि एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की 26 टुकड़ियां लोगों को बचाने में जुटी है।

लेकिन, प्रभावित इलाकों से आ रही ख़बरें कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं। बचाव के काम में जुटी मानव कल्याण केंद्र संस्था के पंकज झा ने ऑपइंडिया को बताया कि अभी भी पीड़ित सरकारी मदद के इंतजार में हैं।

उन्होंने बताया कि उनकी टीम को झंझारपुर के नरुआर गाँव में एक बूढ़ी महिला के घर में फँसे होने की सूचना मिली। महिला का मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ था। जानकारी होने के बावज़ूद एनडीआरएफ की टीम गाँव नहीं पहुँची। आखिर में स्थानीय लोगों ने खुद जोखिम उठा महिला को बचाया।

पंकज झा और उनके साथी मुख्यतः झंझारपुर इलाक़े में बचाव-कार्य में लगे हुए हैं। यहाँ का नरुआर गाँव बाढ़ से ज्यादा प्रभावित है। इस गाँव के कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

पंकज झा ने बताया कि समय बीतने के साथ-साथ अन्य प्रबुद्ध जन भी राहत कार्य के लिए सामने आए हैं। इनमें कई वरिष्ठ नागरिक भी हैं, जिनके अनुभवों का लाभ बचाव-कार्य में जुटे लोगों को मिल रहा है।

पंकज झा व उनके अन्य साथी
रात में भी नहीं रुकता है बचाव व राहत कार्य
बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत सामग्रियाँ

स्थानीय प्रशासन के सहयोग के बारे में पूछने पर पंकज झा ने बताया कि उनके साथ बचाव-कार्य कर रहे लोग स्थानीय प्रशासन पर ही निर्भर नहीं हैं। हालाँकि, उन्होंने इतना ज़रूर कहा कि मेडिकल कैम्प के डॉक्टरों व एनडीआरएफ टीम का अब पूरा सहयोग मिल रहा है। उन्हें अभी तक स्थानीय प्रशासन की मदद की ज़रूरत नहीं पड़ी है। उन्होंने इस बात पर ख़ुशी जताई कि उनके पास इस बचाव कार्य के लिए मानव संसाधन की कमी नहीं है।

अपने साथियों संग राहत सामग्रियाँ जुटाने व पीड़ितों तक पहुँचाने में लगे पंकज झा

पंकज झा ने कहा कि चूँकि वे लोग आधिकारिक भूमिका में नहीं हैं, स्थानीय प्रशासन द्वारा बाढ़ से पहले क्या तैयारियाँ की गई थीं- इस बारे में उन्हें कोई ख़ास जानकारी नहीं है।

बिहारी पत्रकारों, नीतीश कुमार की काहिली को डिफेंड कर रहे हो? इसी बाढ़ में डूब क्यों नहीं जाते?

बालिका गृह कांड किस स्तर का होगा, और उसमें किस स्तर के लोग अपराधी होंगे इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि मीडिया में इसकी फॉलोअप स्टोरी नहीं मिलती और सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर बिहार सरकार को लताड़ लगानी पड़ती है कि इस पर बात आगे क्यों नहीं बढ़ रही। एक ऐसा भयावह कांड जो भारत के हर जिले के हर ऐसे शेल्टर होम या बालिका गृह की कहानी हो सकती है, वो कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय खबर बनी, लेकिन फिर चर्चा से गायब हो गई। मैं कोई आँकड़े नहीं दूँगा क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं है। बच्चियों को सहारा देने के नाम पर उनका यौन शोषण व्यवस्थित तरीके से करवाने की भयावहता शायद आँकड़ों की मोहताज नहीं।

चमकी बुखार या इन्सेम्फलाइटिस से मरे हुए सौ से ज्यादा बच्चों ने भारतीय मीडिया की ड्रामेबाजी तो देख ली, लेकिन जिनसे सवाल होने थे, जो फॉलोअप किया जाना था वो नहीं किया गया। लगातार एंकर स्वयं ही सर्वज्ञ बन कर बताते रहे कि किसका इलाज होना चाहिए, किसका नहीं, लेकिन नितीश फिर बच गए। सामर्थ्यवान हमेशा ही पीछे हटते रहे और सोशल मीडिया ने अपने स्तर से बहुत कोशिश की। ये मुद्दा भी बहुत भयावह था, लेकिन नितीश को क्लीन चिट मिल गई।

शिक्षकों की सैलरी का मुद्दा तो जब से पैदा हुआ हूँ तब से चल ही रहा है। बिहार के स्कूलों में आख़िर शिक्षक किस मोटिवेशन से पढ़ाएगा अगर आप उसकी सैलरी साल और छः महीने पर देंगे? शिक्षकों के प्रति लालू भी उदासीन था, नीतीश भी कुछ अलग नहीं। अब प्रदेश के हजारों शिक्षक पटना पहुँच कर घेराव करने की बातें कर रहे हैं। शिक्षा का संकट भले ही स्वास्थ्य और बाढ़ से भयावह न हो, लेकिन कम भयावह भी नहीं। पत्रकार लोग बस इसकी रिपोर्टिंग करते हुए खानापूर्ति करके डेट बता देते हैं कि हड़ताल कब होगी। ये कभी मुद्दा बन ही नहीं पाया।

उसके बाद का मुद्दा वो मुद्दा है जो हर साल बिहार को तबाह कर जाता है, लेकिन सरकार ज्यों की त्यों बनी रहती है। विभागों से ‘सारे तटबंध सही हैं’ का लेख हर महीने फाइलों में खिसकता रहता है, लेकिन बारिश होते ही दस जगहों से वह टूटते हैं, और वही फाइल ये सूचना देती है कि टूट गई। आखिर कौन बनाता है यह रिपोर्ट? हर महीने दुरुस्त रहने वाला तटबंध अचानक से टूट कैसे जाता है? फाइलों में तो तटबंध हमेशा दुरुस्त ही रहेंगे, क्योंकि फाइल में पानी नहीं घुसता।

उसके बाद अगर आप इस बाढ़ की रिपोर्टिंग देखिएगा तो पता चलेगा कि लोग छः कॉलम में जलमग्न, जलराशि, मंजर, भयावह स्थिति आदि शब्दों का प्रयोग कर फोटो छाप देते हैं और बताते हैं कि कितना इलाका चपेट में आया हुआ है। इसके आगे की बात गायब हो जाती है। बिहारी पत्रकार, जो कि पत्रकारिता के उद्योग में रैंडमली ढेला तीन बार फेंकने पर एक बार अपने सर पर तो लेगा ही, वो ज्ञान दे रहा है कि इसमें जिम्मेदारी कलेक्टर कि है। ये वही पत्रकार हैं जो अपनी राजनैतिक विचारधारा से विपरीत विचार रखने वाले लोगों से घोड़े की टाँग टूटने पर इस्तीफा माँग लेते हैं।

ये वही पत्रकार समूह है जो गौरी लंकेश की हत्या पर दिल्ली के प्रेस क्लब में जरूर शिरकत करता है लेकिन बिहार के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या पर चुप रहता है। यही कारण है कि नीतीश को ऐसे दिखाया जाता है जैसे उनके बिना बिहार बंद हो जाएगा या फिर वो जो कर रहे हैं वही सर्वोत्तम समाधान है। बिहार में बाढ़ का आना तय है, ये बात सबको पता है लेकिन इसका समाधान कुछ नहीं।

समाधान शायद इसलिए नहीं है क्योंकि बाढ़ सरकारी महकमे के अफसरों और नेताओं के लिए उत्सव है। ये वो समय है जब राहत पैकेज के रूप में भ्रष्टाचार का पैकेज आता है। आखिर लगभग पंद्रह साल से सत्ता में रही पार्टी इस समस्या का कोई हल ढूँढने में विफल क्यों रही है? अगर कोसी द्वारा अपने पुराने बहाव क्षेत्र में वापस आने वाले साल को छोड़ दिया जाए, तो बाकी के हर साल एक ही समस्या कैसे आ जाती है? इस पर हवाई दौरा करने से क्या होता है? या हम यह मान लें कि दुनिया के किसी इलाके में, या भारत के ही किसी भी इलाके में बाढ़ को लेकर कोई सही समाधान नहीं आया है?

पत्रकारों का शायद सबसे बड़ा प्रतिशत बिहारियों का होगा लेकिन सारे अख़बारों पर महज ‘कहाँ क्या हुआ, कितने लोग मरे, कितने बह गए, किस जिले का कितना हिस्सा डूबा और मुख्यमंत्री ने आज क्या बयान दिया’ यही चल रहा है। कौन ज़िम्मेदारी लेगा, तटबंध कैसे टूट गए, हर साल बचाव कार्य का कितना पैसा कहाँ गया, इसका ब्यौरा नहीं दिखता। आख़िर बाढ़ में राहत पैकेज का करोड़ों रूपया हर साल किस हालत में बहा दिया जाता है कि अगले साल फिर वही समस्या हो जाती है?

पता नहीं इन लोगों को नीतीश ने घुट्टी पिला रखी है या ये भूल गए कि बिहार के ही हैं और बाढ़ की भयावहता से दूर भले हैं, अनजान नहीं, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाए और सवाल पूछे जाएँ। लेकिन राजनैतिक उथल-पुथल के दिनों में शायद नितीश के पाला बदलने के अंदेशे में ये समझ नहीं पा रहे हैं कि विरोध करें तो किन शब्दों में करें। कई लोग जो भाजपा के मुखर विरोधी रहे हैं वो भी ‘सॉफ़्ट’ हो गए हैं और बता रहें हैं कि नेताओं को छोड़ कर बाकी सब ज़िम्मेदार हैं। संस्थानों की विचारधारा के हिसाब से चलने की बात और है, लेकिन फेसबुक पर पोस्ट तो लिखे जा सकते हैं?

हर स्तर पर सिर्फ सूचनाएँ देना लेकिन किसी भी तरीके से नेतृत्व को ज़िम्मेदार न ठहराना, बल्कि डिफेंड करने लगना अलग स्तर की धूर्तता है। इतना जोड़-घटाव तो लोग चुनाव के समय भी नहीं करते जितना हमारे बिहारी पत्रकार शायद इस आपदा के वक्त कर रहे हैं जो हर स्तर पर बिहार को शब्दशः और वैसे भी भीतर से ही काटे जा रही है।