बिहारी पत्रकारों, नीतीश कुमार की काहिली को डिफेंड कर रहे हो? इसी बाढ़ में डूब क्यों नहीं जाते?

पत्रकारों का शायद सबसे बड़ा प्रतिशत बिहारियों का होगा लेकिन सारे अख़बारों पर महज ‘कहाँ क्या हुआ, कितने लोग मरे, कितने बह गए, किस जिले का कितना हिस्सा डूबा और मुख्यमंत्री ने आज क्या बयान दिया’ यही चल रहा है। कौन ज़िम्मेदारी लेगा?

बालिका गृह कांड किस स्तर का होगा, और उसमें किस स्तर के लोग अपराधी होंगे इसका अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि मीडिया में इसकी फॉलोअप स्टोरी नहीं मिलती और सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर बिहार सरकार को लताड़ लगानी पड़ती है कि इस पर बात आगे क्यों नहीं बढ़ रही। एक ऐसा भयावह कांड जो भारत के हर जिले के हर ऐसे शेल्टर होम या बालिका गृह की कहानी हो सकती है, वो कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय खबर बनी, लेकिन फिर चर्चा से गायब हो गई। मैं कोई आँकड़े नहीं दूँगा क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं है। बच्चियों को सहारा देने के नाम पर उनका यौन शोषण व्यवस्थित तरीके से करवाने की भयावहता शायद आँकड़ों की मोहताज नहीं।

चमकी बुखार या इन्सेम्फलाइटिस से मरे हुए सौ से ज्यादा बच्चों ने भारतीय मीडिया की ड्रामेबाजी तो देख ली, लेकिन जिनसे सवाल होने थे, जो फॉलोअप किया जाना था वो नहीं किया गया। लगातार एंकर स्वयं ही सर्वज्ञ बन कर बताते रहे कि किसका इलाज होना चाहिए, किसका नहीं, लेकिन नितीश फिर बच गए। सामर्थ्यवान हमेशा ही पीछे हटते रहे और सोशल मीडिया ने अपने स्तर से बहुत कोशिश की। ये मुद्दा भी बहुत भयावह था, लेकिन नितीश को क्लीन चिट मिल गई।

शिक्षकों की सैलरी का मुद्दा तो जब से पैदा हुआ हूँ तब से चल ही रहा है। बिहार के स्कूलों में आख़िर शिक्षक किस मोटिवेशन से पढ़ाएगा अगर आप उसकी सैलरी साल और छः महीने पर देंगे? शिक्षकों के प्रति लालू भी उदासीन था, नीतीश भी कुछ अलग नहीं। अब प्रदेश के हजारों शिक्षक पटना पहुँच कर घेराव करने की बातें कर रहे हैं। शिक्षा का संकट भले ही स्वास्थ्य और बाढ़ से भयावह न हो, लेकिन कम भयावह भी नहीं। पत्रकार लोग बस इसकी रिपोर्टिंग करते हुए खानापूर्ति करके डेट बता देते हैं कि हड़ताल कब होगी। ये कभी मुद्दा बन ही नहीं पाया।

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उसके बाद का मुद्दा वो मुद्दा है जो हर साल बिहार को तबाह कर जाता है, लेकिन सरकार ज्यों की त्यों बनी रहती है। विभागों से ‘सारे तटबंध सही हैं’ का लेख हर महीने फाइलों में खिसकता रहता है, लेकिन बारिश होते ही दस जगहों से वह टूटते हैं, और वही फाइल ये सूचना देती है कि टूट गई। आखिर कौन बनाता है यह रिपोर्ट? हर महीने दुरुस्त रहने वाला तटबंध अचानक से टूट कैसे जाता है? फाइलों में तो तटबंध हमेशा दुरुस्त ही रहेंगे, क्योंकि फाइल में पानी नहीं घुसता।

उसके बाद अगर आप इस बाढ़ की रिपोर्टिंग देखिएगा तो पता चलेगा कि लोग छः कॉलम में जलमग्न, जलराशि, मंजर, भयावह स्थिति आदि शब्दों का प्रयोग कर फोटो छाप देते हैं और बताते हैं कि कितना इलाका चपेट में आया हुआ है। इसके आगे की बात गायब हो जाती है। बिहारी पत्रकार, जो कि पत्रकारिता के उद्योग में रैंडमली ढेला तीन बार फेंकने पर एक बार अपने सर पर तो लेगा ही, वो ज्ञान दे रहा है कि इसमें जिम्मेदारी कलेक्टर कि है। ये वही पत्रकार हैं जो अपनी राजनैतिक विचारधारा से विपरीत विचार रखने वाले लोगों से घोड़े की टाँग टूटने पर इस्तीफा माँग लेते हैं।

ये वही पत्रकार समूह है जो गौरी लंकेश की हत्या पर दिल्ली के प्रेस क्लब में जरूर शिरकत करता है लेकिन बिहार के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या पर चुप रहता है। यही कारण है कि नीतीश को ऐसे दिखाया जाता है जैसे उनके बिना बिहार बंद हो जाएगा या फिर वो जो कर रहे हैं वही सर्वोत्तम समाधान है। बिहार में बाढ़ का आना तय है, ये बात सबको पता है लेकिन इसका समाधान कुछ नहीं।

समाधान शायद इसलिए नहीं है क्योंकि बाढ़ सरकारी महकमे के अफसरों और नेताओं के लिए उत्सव है। ये वो समय है जब राहत पैकेज के रूप में भ्रष्टाचार का पैकेज आता है। आखिर लगभग पंद्रह साल से सत्ता में रही पार्टी इस समस्या का कोई हल ढूँढने में विफल क्यों रही है? अगर कोसी द्वारा अपने पुराने बहाव क्षेत्र में वापस आने वाले साल को छोड़ दिया जाए, तो बाकी के हर साल एक ही समस्या कैसे आ जाती है? इस पर हवाई दौरा करने से क्या होता है? या हम यह मान लें कि दुनिया के किसी इलाके में, या भारत के ही किसी भी इलाके में बाढ़ को लेकर कोई सही समाधान नहीं आया है?

पत्रकारों का शायद सबसे बड़ा प्रतिशत बिहारियों का होगा लेकिन सारे अख़बारों पर महज ‘कहाँ क्या हुआ, कितने लोग मरे, कितने बह गए, किस जिले का कितना हिस्सा डूबा और मुख्यमंत्री ने आज क्या बयान दिया’ यही चल रहा है। कौन ज़िम्मेदारी लेगा, तटबंध कैसे टूट गए, हर साल बचाव कार्य का कितना पैसा कहाँ गया, इसका ब्यौरा नहीं दिखता। आख़िर बाढ़ में राहत पैकेज का करोड़ों रूपया हर साल किस हालत में बहा दिया जाता है कि अगले साल फिर वही समस्या हो जाती है?

पता नहीं इन लोगों को नीतीश ने घुट्टी पिला रखी है या ये भूल गए कि बिहार के ही हैं और बाढ़ की भयावहता से दूर भले हैं, अनजान नहीं, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाए और सवाल पूछे जाएँ। लेकिन राजनैतिक उथल-पुथल के दिनों में शायद नितीश के पाला बदलने के अंदेशे में ये समझ नहीं पा रहे हैं कि विरोध करें तो किन शब्दों में करें। कई लोग जो भाजपा के मुखर विरोधी रहे हैं वो भी ‘सॉफ़्ट’ हो गए हैं और बता रहें हैं कि नेताओं को छोड़ कर बाकी सब ज़िम्मेदार हैं। संस्थानों की विचारधारा के हिसाब से चलने की बात और है, लेकिन फेसबुक पर पोस्ट तो लिखे जा सकते हैं?

हर स्तर पर सिर्फ सूचनाएँ देना लेकिन किसी भी तरीके से नेतृत्व को ज़िम्मेदार न ठहराना, बल्कि डिफेंड करने लगना अलग स्तर की धूर्तता है। इतना जोड़-घटाव तो लोग चुनाव के समय भी नहीं करते जितना हमारे बिहारी पत्रकार शायद इस आपदा के वक्त कर रहे हैं जो हर स्तर पर बिहार को शब्दशः और वैसे भी भीतर से ही काटे जा रही है।

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