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अमरनाथ यात्रा में बाधा बने अलगाववादी, रोकी गई जम्मू से श्रद्धालुओं की आवाजाही

अलगाववादियों द्वारा बुलाए गए बंद के कारण शनिवार (जुलाई 13, 2019) को अमरनाथ यात्रा को एक दिन के लिए रोक दिया गया। तीर्थयात्रियों को जम्मू से कश्मीर घाटी की ओर जाने की अनुमति नहीं दी गई। पुलिस ने बताया कि अलगाववादियों के प्रदर्शनों को देखते हुए कानून-व्‍यवस्‍था और अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के मद्देनजर ऐहतियात के तौर पर यह कदम उठाया गया है। 

अलगाववादियों ने यह बंद वर्ष 1931 में 13 जुलाई को श्रीनगर के डाउन टाउन इलाके में मारे गए करीब 22 लोगों के विरोध में किया है। बता दें कि साल 1913 में इसी दिन डोगरा महाराजा की सेनाओं द्वारा श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर गोलीबारी हुई थी, जिसमें करीब 22 लोग मारे गए थे। अलगाववादी हर साल 13 जुलाई को शहीद दिवस के तौर पर मनाते हैं। जम्मू के लोग इस आयोजन का विरोध करते हैं, क्योंकि यह मामला तत्कालीन महाराजा हरि सिंह के खिलाफ विद्रोह से जुड़ा है। वहीं, राज्य सरकार इस दिन को 1947 में आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सम्मान के तौर पर मनाती है।

अलगाववादियों के बंद को देखते हुए यात्रा मार्ग समेत अन्‍य संवेदनशील स्‍थानों पर सुरक्षा के तगड़े बंदोबस्‍त किए गए हैं। भारतीय सेना लगातार चप्पे-चप्पे पर नजर जमाए हुए है। कई इलाकों में ड्रोन से नजर रखी जा रही है। बंद के कारण सड़कें सुनसान हैं। गौरतलब है कि 1 जुलाई से शुरू हुई अमरनाथ की वार्षिक तीर्थयात्रा में 1.50 लाख से अधिक तीर्थयात्री अब तक बाबा बर्फानी का दर्शन कर चुके हैं। 15 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा के दिन अमरनाथ यात्रा समाप्त होगी।

मुस्लिमों पर अत्याचार: पाकिस्तान सहित 37 देशों ने कहा – सही कर रहा है चीन

चीन पर शिनजियांग में दस लाख मुस्लिमों को हिरासत में लेने और उइगरों को सताए जाने का आरोप है। इसी संदर्भ में 22 देशों के राजदूतों ने चीन की नीतियों की आलोचना करते हुए इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद को एक पत्र लिखा। दरअसल, उइगर एक तुर्की-मुस्लिम जातीय समूह हैं, जो मुख्यतः चीन के प्रशासनिक क्षेत्र शिनजियांग में रहते हैं। इसके अलावा मंगोलिया, रूस, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में भी इनकी थोड़ी-बहुत आबादी है। चीन के शिनजियांग स्वायत्त क्षेत्र में अधिकारियों और स्थानीय उइगर आबादी के बीच संघर्ष का एक लंबा इतिहास रहा है।

मानवाधिकार निगरानी संस्था (ह्यूमन राइट्स वॉच) के अनुसार, 22 पश्चिमी देशों ने एक बयान जारी कर चीन से अनुरोध किया है कि वो पश्चिम शिनजियांग क्षेत्र में उइगर और अन्य मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर मनमाने ढंग से की गई नज़रबंदी समेत अन्य उल्लंघनों को ख़त्म करे। इस पत्र पर ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बेल्ज़ियम, कनाडा, डेनमार्क, एस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, आइसलैंड, आयरलैंड, जापान, लातविया, लिथुआनिया, लग्जमबर्ग, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्वीडन, स्विटजरलैंड और ब्रिटेन हैं। ध्यान देने की बात यह है कि इन देशों में एक भी ऐसा मुस्लिम देश शामिल नहीं है, जिसने चीन के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया-स्वरूप इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हों।

वहीं दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, रूस और 35 अन्य देशों ने पश्चिमी देशों की आलोचना के विपरीत शुक्रवार को शिनजियांग के पश्चिमी क्षेत्र में चीन की नीतियों का समर्थन करते हुए संयुक्त राष्ट्र को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में इन 35 देशों को चीन की शिनजियांग नीति से कोई परहेज़ नहीं है बल्कि इसके उलट वे उइगर मुस्लिमों को “उग्रवाद से दूर करने (deradicalization) और व्यवसायिक शिक्षा देने” वाली चीन की नीतियों के समर्थन में हैं।

इन 35 देशों में शामिल सऊदी अरब और रूस के साथ-साथ कई अफ्रीकी देशों, उत्तर कोरिया, वेनेजुएला, क्यूबा, ​​बेलारूस, म्यांमार, फिलीपींस, सीरिया, पाकिस्तान, ओमान, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन समेत कई इस्लामिक मुल्कों के राजदूतों ने चीन की नीतियों के समर्थन में पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।

शिनजियांग में उइगर मुस्लिम आबादी के ख़िलाफ़ कठोर नीतियों को अपनाने के लिए चीन संयुक्त राष्ट्र की निंदा का सामना कर रहा है। ख़बर यह भी है कि चीन अपने क़ैदखानों में उइगर मुस्लिमों को कथित रूप से उनकी परंपराओं को भूलने, इस्लामी प्रथाओं की निंदा करने और शी जिनपिंग की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफ़ादार बनने को मजबूर करता है। हालाँकि चीन इस तरह के मानवाधिकार उल्लंघनों से इनकार करता है और इन्हें चरमपंथ से लड़ने और रोज़गार योग्य कौशल सिखाने के उद्देश्य वाले प्रशिक्षण स्कूल बताता है।

पाकिस्तान, ईरान और सऊदी अरब जैसे कई इस्लामिक देश ऐसे देश हैं जिन्होंने मुस्लिमों पर हो रहे इन कथित अत्याचारों पर चुप्पी साध रखी है। इसकी वजह शायद चीन का इन देशों में भारी निवेश है। चीनी निवेश इन देशों को आर्थिक संकट से उबारने में बहुत महत्वपूर्ण है। इसी के चलते ये इस्लामिक देश चीन की नीतियों का विरोध करने की बजाए उसके समर्थन में खड़े नज़र आते हैं।

बिजनौर: प्यार-धर्म परिवर्तन-बलात्कार के बाद फराज ने आखिर में हड़प लिए ₹5 लाख

दिल्ली की रहने वाली एक महिला ने बिजनौर जिले के शख्स पर आरोप लगाया है कि उसने महिला को पहले प्रेमजाल में फँसाया और फिर फर्जी निकाह के लिए धर्म परिवर्तन करवा दिया। इस सबके बाद महिला से 5 लाख रुपए हड़पे और असलियत सामने आने पर बलात्कार कर के छोड़ दिया। पुलिस ने इस मामले में दो नामजद और तीन अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज किया है।

मीडिया खबर के मुताबिक दिल्ली के गोविंदपुरी में रहने वाली एक महिला का 3 साल पहले बिजनौर के नगीना में आना-जाना था। इसी बीच उसकी मुलाकात फराज नाम के युवक से हुई। फराज ने महिला से खुद की पहचान एक प्रॉपर्टी डीलर के रूप में करवाई और फिर अपना मोबाइल नंबर उसे देकर उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया। इसके बाद फराज उसे फोन करता और दोनों के बीच घंटों तक बातें होती थी।

प्रकाशित खबर का फोटो

एक दिन फराज ने उसे फोन करके नगीना बुलवाया और प्यार का झाँसा देकर उससे निकाह करने की बात कही। महिला उसके इस जाल में फँसती गई और निकाह के लिए हाँ कर दिया। फराज ने अक्टूबर, 2016 में मौलवी को बुलवाकर अपने तीन दोस्तों के सामने पहले उसका धर्म परिवर्तन करवाया फिर मौलाना से फर्जी निकाह पढ़वा दिया। इसके बाद उसने महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए और 5 लाख रुपए भी लिए। कुछ दिन तक सब ठीक चलता रहा, लेकिन कुछ दिन बाद वह महिला से दूरियाँ बनाने लगा।

महिला को इस दौरान कहीं से पता चला कि फराज ने जो उससे निकाह किया है वो फर्जी है और वह इस तरह लड़कियों को फँसाकर उन से पहले भी रूपए हड़प चुका है। जिसके बाद वह जुलाई 07, 2019 को नगीना में स्थित फराज के घर पहुँची, जहाँ फराज ने फिर से महिला का बलात्कार किया। इसके बाद फराज ने महिला को दिल्ली चलने के नाम पर को बस अड्डे भेज दिया, लेकिन खुद वहाँ नहीं गया। फराज ने महिला को धमकी भी दी कि यदि उसने इस मामले की शिकायत पुलिस से की तो वह उसकी अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर देगा।

हिंदुस्तान की खबर के अनुसार थाना प्रभारी राजेश तिवारी ने बताया कि पीड़ित महिला की शिकायत पर फराज और फर्जी निकाह पढ़ने वाले मौलाना समेत तीन अन्य के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी करने धर्म परिवर्तन कराने सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर के कार्रवाई शुरू कर दी है।

‘छोटे शहरों और गाँवों में खौफ का माहौल’: मॉब लिंचिंग पर सलमान खुर्शीद का विवादित बयान

देश में पिछले कुछ वक्त में मॉब लिंचिंग के कई मामले सामने आ चुके हैं, इसके बाद से ही इस मामले पर राजनीति जारी है। इसे लेकर भाजपा और कॉन्ग्रेस कई बार आमने-सामने हो चुकी हैं। अब इस मामले पर कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने विवादित बयान दिया है। खुर्शीद के इस बयान पर एक बार फिर से ये मामला गरमा सकता है और सियासत तेज हो सकती है। 

दरअसल, मॉब लिंचिग पर बयान देते हुए सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिल्ली से बाहर रह रहे लोग डर के साए में जी रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि दिल्ली के उन इलाकों में डर का कोई माहौल नहीं है, जहाँ हम रहते हैं या काम करते हैं, लेकिन हाँ छोटे शहरों और गाँवों में इसका डर जरूर है। इस डर को दूर करने की जिम्मेदारी हर भारतीय की है।”

कॉन्ग्रेस नेता की यह टिप्‍पणी यूपी के उन्‍नाव में मदरसा छात्र और स्थानीय युवकों के बीच हुई झड़प के बाद आई है। इस मामले में कहा गया कि बजरंग दल के सदस्‍यों ने मदरसा के कुछ छात्रों की सिर्फ इसलिए पिटाई कर दी, क्‍योंकि उन्‍होंने ‘जय श्री राम’ के नारे नहीं लगाए। शहर के काजी निसार अहमद मिस्बाही ने आरोप लगाया कि मदरसा के छात्र क्रिकेट खेल रहे थे, तभी बजरंग दल से जुड़े कुछ छात्र वहाँ पहुँचे और जबरन जय श्री राम बुलवाने की कोशिश की। जब उन छात्रों ने मना किया तो उनकी पिटाई कर दी। निसार अहमद ने इस मारपीट को मॉब लिंचिंग से जोड़ने की कोशिश भी की। हालाँकि पुलिस द्वारा इस मामले की जाँच के बाद स्पष्ट हुआ कि मजहबी नारे लगवाने के लिए मजबूर करने वाली बात एकदम मनगढ़ंत और झूठी थी

कानून-व्यवस्था के महानिरीक्षक प्रवीण कुमार ने उन्नाव में क्रिकेट खेलने को लेकर दो पक्षों में हुई मारपीट की घटना को लेकर बताया कि इस मामले की जाँच में पता चला है कि मदरसे के बच्चों से धार्मिक नारे नहीं लगवाए गए थे। यह विवाद दो पक्षों के बीच क्रिकेट मैच के दौरान झगड़े के कारण शुरू हुआ था। प्रवीण कुमार का कहना है कि ऐसे झूठे आरोप लगाकर मेरठ और आगरा में भी शांति भंग करने का प्रयास किया गया, लेकिन जिला और पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी के चलते यह नाकाम हो गया। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी भी देश के कई राज्यों में मॉब लिंचिंग को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए भुनाने की कोशिश हो चुकी है, जबकि मॉब लिंचिंग के ज्यादातर मामले गलत ही साबित हुए हैं।

मदरसे में पढ़ने गई थी 8 साल की बच्ची, मौलवी ने किया बलात्कार: कोर्ट ने सुनाई 23 साल की सजा

उत्तर प्रदेश के नोएडा में पिछले साल 8 वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म मामले में एक स्थानीय अदालत ने मौलवी को दोषी करार देते हुए 23 साल की सजा सुनाई है। साथ ही मौलवी पर ₹2.10 लाख का जुर्माना भी लगाया है।

सबा करीम नाम का यह मौलवी बिहार के किशनगंज इलाके का रहने वाला है। साल 2018 में नोएडा सेक्टर-49 में स्थित पुलिस थाने में पीड़िता के परिजनों ने मौलवी के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी। जिसके आधार पर पूरे मामले की सुनवाई हुई।

नवभारत टाइम्स में प्रकाशित खबर की फोटो

खबरों के मुताबिक बच्ची पिछले साल की 13 जनवरी को सेक्टर-49 कोतवाली के बरौला स्थित मदरसे में पढ़ने गई थी। जहाँ मौलवी ने उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना मालूम चलने पर बच्ची के परिजनों ने मामले में कानून का सहारा लिया और उनकी शिकायत के आधार पर दोषी मौलवी को गिरफ्तार किया गया।

जब कोर्ट में मामले की सुनवाई हुई तो बच्ची ने तुरंत मौलवी को पहचान लिया और पूरी घटना के बारे में बताया। बच्ची के मेडिकल टेस्ट में भी बलात्कार की पुष्टि हो चुकी है।

न्यायाधीश ने गवाहों और सबूत के आधार पर सबा करीम को बलात्कार के लिए 10 साल और POCSO एक्ट के तहत 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही उसे 2 लाख रुपए जुर्माना देने का आदेश भी दिया गया। इसके अलावा छेड़खानी के आरोप में भी मौलवी को 3 साल की सजा भी मुकर्रर की गई है। छेड़खानी के लिए उस पर 1000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। बता दें कि दोषी पर ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और जेल में बिताए उसके वक्त को सजा में शामिल किया जाएगा।

जनता के लिए अलग और MLA के लिए अलग कानून! क्या सरकार भेजेगी अपने विधायक को जेल?

भीड़ और उसके द्वारा की जाने वाली हिंसा की बातें तो हो रहीं हैं, मगर पूरे तौर पर नहीं हो रहीं। भीड़ ने असंवैधानिक कृत्य किए हों, कानून अपने हाथों में ले लिया हो, ऐसा भारत में पहली बार तो नहीं हुआ। हाल के समय में ऐसा तो कई बार आंदोलनों के नाम पर हो चुका है। ये राजस्थान के गुर्जर आंदोलनों के समय भी हुआ था, जब कथित रूप से आन्दोलनकारियों ने रेल की पटरियाँ उखाड़ दी थीं। इसी वर्ष फ़रवरी में गुर्जर नेता करोड़ी सिंह बैंसला अपने बेटे के साथ “राष्ट्रहित” में भाजपा में शामिल हो गए हैं। उस समय भी उन्होंने आठ दिन से राजस्थान में चल रहे आन्दोलन को रोकने की बात की और अपने समर्थकों से अवरोधों को हटा लेने कहा।

बिलकुल ऐसा ही तब भी हुआ था जब हरियाणा में जाट आन्दोलन कुछ दिन चला। फ़रवरी 2016 में हुए इस आन्दोलन में तो कथित रूप से 12 लोगों को मार डाला गया था और कथित “आन्दोलन” के दौरान दंगाइयों ने करोड़ों की संपत्ति भी लूट ली थी। इस आन्दोलन को रोकने के लिए पुलिस के अलावा सेना भी बुलानी पड़ी थी। फ़रवरी 2016 में ही ये आन्दोलन राजस्थान के भरतपुर जैसे इलाकों तक भी पहुँच चुका था और तब की मुख्यमंत्री सिंधिया ने आन्दोलनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील शुरू कर दी थी। कई जाट नेताओं ने इस दौरान शांति बनाए रखने की अपील की, जिससे किसी के कान पर जूँ भी नहीं रेंगी। अंततः जब जाटों के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की माँग राज्य सरकार द्वारा मान ली गई तब जाकर कहीं आन्दोलन थमा।

ऐसा ही एक आन्दोलन “पद्मावत” फिल्म को लेकर भी शुरू हो गया था। हिंसा के स्तर पर देखें तो इसमें कोई लूट या हत्या जैसी घटनाएँ नहीं हुई थीं। एक अंतर ये भी था कि दूसरे आंदोलनों को हिंसक बताने से परहेज रखती पेड परंपरागत मीडिया ने इस बार आन्दोलनकारियों के लिए खुलकर “राजपूत गुंडे” जैसे जुमलों का इस्तेमाल किया। बाकी आंदोलनों में होती हिंसा पर ऐसा क्यों नहीं हुआ, और इस आन्दोलन में “गुंडे” शब्द कैसे इस्तेमाल हुआ, ये अलग चर्चा का विषय हो सकता है। इस आन्दोलन में नतीजे के तौर पर फिल्म प्रतिबंधित नहीं हुई, नेतागण या राजनैतिक दल भी समर्थन में नहीं उतरे थे। इसके वाबजूद फिल्म में कई दृश्यों में फेरबदल करना पड़ा था।

ऐसे आंदोलनों की कड़ी को और आगे बढ़ाएँ तो अफवाहों पर आधारित एक और भी हिंसक आन्दोलन हुआ था। इस आन्दोलन में ऐसा मान लिया गया था कि असंवैधानिक एट्रोसिटीज एक्ट को सरकार हटाने जा रही है। सच्चाई ये थी कि एक असंवैधानिक काले कानून पर सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठा दिया था। मामला बस इतना था कि इस एक्ट में जाँच से पहले गिरफ़्तारी होनी चाहिए या नहीं, इस पर विचार करने कहा गया था। इस हिंसक आन्दोलन में भी मौतें हुईं। हाँ एट्रोसिटीज एक्ट के डर से पेड परंपरागत मीडिया इस बार किसी को “गुंडा” घोषित करने का साहस नहीं जुटा पाई। जैसा कि पहले भी होता था, वैसे ही एट्रोसिटीज एक्ट में बिना जाँच गिरफ़्तारी और जेल की असंवैधानिक परम्परा कायम रही।

एक “पद्मावत” फिल्म पर हुए विरोध को छोड़ दें तो बाकी सभी में भाजपा सरकारों का झुकना, या कहिए कि माँगें मान लेना साफ़ नजर आता है। गुर्जर आन्दोलन के करोड़ी सिंह बैंसला अब भाजपा में हैं। जाट आन्दोलन में भी माँगें मानी गईं। एट्रोसिटीज एक्ट पर भाजपा नेताओं ने ही जोर शोर से समर्थन दिया था और बिना जाँच गिरफ़्तारी को कायम रखा था। लेकिन, किन्तु, परन्तु, अब भाजपा की नैतिकता नजर नहीं आ रही। जब मामला भाजपा के ही एक विधायक पर बन रहा है तो एट्रोसिटीज एक्ट के तहत बिना जाँच गिरफ़्तारी के प्रावधान कहीं खो गए हैं। उनकी बेटी-दामाद द्वारा उन पर लगाए गए आरोपों में उनकी एट्रोसिटीज एक्ट में फ़ौरन गिरफ़्तारी होनी चाहिए।

बाकी बड़ा सवाल यह है कि कानून के शासन और नैतिकता, मूल्यों, आदर्शों की बातें करने वाली योगी सरकार क्या जनता के लिए अलग और अपने विधायक के लिए अलग मापदंड अपनाएगी? नेताजी के लिए “भीड़” का समर्थन आएगा, इस डर से नेताजी को छोड़ा भी जा सकता है! या फिर नेताजी भी वैसे ही जेल जाएँगे जैसे इस मामले में कोई साधारण व्यक्ति गया होता?

फुटपाथ पर सोता हूँ, मोबाइल भी किसी ने चुरा लिया: ओडिशा BJP MLA ने सुनाई अपनी व्यथा

अक्सर ऐसा देखा गया है कि नेता जी जैसे ही विधायक बनते हैं पॉश इलाके वाले बंगले में रहना शुरू कर देते हैं। लेकिन ओडिशा में एक ऐसा मामला देखने को आया है जहाँ भारतीय जनता पार्टी के तीन बार विधायक रह चुके मोहन चरण माँझी फुटपाथ पर सोने को मजबूर हैं। क्योंकि नवीन पटनायक सरकार ने उन्हें न तो कोई बंगला आवंटित किया है और न ही कोई सरकारी गेस्ट हाउस दिया है।

ओडिशा विधानसभा में बीजेपी के चीफ व्हिप मोहन चरण माँझी ने शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष के सामने उठाया। माँझी तीन बार से कियोनझार के विधायक हैं, लेकिन उन्हें अभी तक ओडिशा सरकार की तरफ से भुवनेश्वर में घर आवंटित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि विधायक की शपथ लेने के एक महीने के बाद भी उन्हें घर नहीं मिला है। माँझी की समस्या सुनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष एसएन पात्रो ने कहा कि उनकी सारी परेशानियाँ दूर की जाएँगी और उन्होंने इस बारे में बात करने के लिए अपने कक्ष में बुलाया।

माँझी ने बताया कि दो दिन पहले फुटपाथ पर सोने के दौरान उनका फोन चोरी हो गया, उनके निजी सचिव पर भी कुछ लोगों ने हमला किया। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्होंने गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव को भी बताया और कहा कि उन्हें कमरा आवंटित कर दें, लेकिन उन्होंने भी उनकी एक नहीं सुनी। माँझी ने गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव के बारे में बताते हुए कहा, “जब मैं उस अधिकारी से मिलने गया तो उसने ध्‍यान ही नहीं दिया, बैठने के लिए कुर्सी बढ़ाने की बात तो भूल ही जाइए। उन्होंने ये तक इशारा किया कि मैं उनके ऑफिस से निकल जाऊँ।”

बता दें कि, ओडिशा में बीजू जनता दल की सरकार है और बीजेपी यहाँ पर मुख्य विपक्षी दल है। राज्य में लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव हुए थे। जिसके बाद राज्य में बीजेडी ने नवीन पटनायक की अगुवाई में सरकार बनाई।

पति शाहिद नहीं देता था पैसे, परेशान रुखसार ने दूध के लिए रोते 8 महीने के बेटे का घोंटा गला!

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे से एक ऐसा वारदात सामने आया है, जिसे सुनकर किसी की भी रूह काँप जाएगी। खबर के मुताबिक, अपनी औलाद की सलामती के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाने वाली माँ ने अपने ही 8 महीने के बेटे की हत्या कर दी। कारण- क्योंकि वो भूखा था, वो दूध के लिए रो रहा था। 8 महीने का बच्चा अहद तीन दिन से भूखा था और दूध के लिए तेज आवाज में रो रहा था। आर्थिक तंगी से जूझ रही माँ रुखसार को जब भूख से तड़पते अपने बेटे की चीखें बर्दाश्त नहीं हुईं, तो उसने बच्चे की गला दबाकर उसकी चीख को हमेशा के लिए शांत कर दिया।

आरोपित माँ रुखसार का कहना है कि वो अपने बेटे अहद के लिए दूध का इंतजाम नहीं कर पा रही थी। अहद रात से ही दूध के लिए तेज आवाज में रो रहा था। रुखसार का कहना है कि वो उसे रात भर पानी पिलाने की कोशिश करती रही, मगर फिर भी अहद रोए जा रहा था। अहद का इस तरह से रोना रुखसार से बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने गला दबा कर उसे हमेशा के लिए सुला दिया।

नवभारत टाइम्स के गाजियाबाद संस्करण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

रुखसार की 4 साल की बेटी अनम ने पुलिस को बताया कि उसकी माँ (रुखसार) सुबह काफी गुस्से में थी और उसने गला दबाकर अहद की हत्या कर दी। फिलहाल पुलिस ने रुखसार को हिरासत में ले लिया है। रुखसार का पति शाहिद मुंबई में नौकरी करता है। बीवी से किसी बात को झगड़े के कारण शाहिद 4-5 महीने से घर पर रुपए-पैसे नहीं भेज रहा था। बड़ी मुश्किल से रुखसार अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थी। इसी दौरान कुछ समय पहले 8 महीने के अहद को खून संबंधित कोई बीमारी हुई। जैसे-तैसे 90 हजार रुपए जुटाकर रुखसार ने आगरा में उसका इलाज करवाया। गुरुवार की शाम को जब फिर से अहद को तेज बुखार आया तो डॉक्टर ने बिना पैसे के दवा देने से इनकार कर दिया। अफसोस! रात भर बच्चे के बुखार और भूख से रोने की तड़प को रुखसार ने शुक्रवार की सुबह उसे सदा के लिए सुला कर शांत कर दी।

शुक्रवार (जुलाई 12, 2019) को अपने बेटे की हत्या कर रुखसार उसके शव के पास ही बैठी रही और किसी को भी शव के पास नहीं आने दिया। हालाँकि, अनम से मिली जानकारी के बाद परिजन और आस-पड़ोस के लोग वहाँ पहुँचे। इससे रुखसार को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया। उसका कहना था कि जब बच्चे भूखे थे, तो कोई नहीं आया और अब भीड़ जमा हो गई है।

हालाँकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का कहना है कि अहद को सुबह ही दूध पिलाया गया था। इस रिपोर्ट में उसके पेट में दूध होने की बात कही गई है। डॉक्टरों ने भी अहद के तीन दिन से भूखे होने की बात को नकार दिया है। उनका कहना है कि बच्चे की आँत भी बिल्कुल सही है। डॉक्टर और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट शायद सरकारी लीपापोती भी हो सकती है। फिलहाल पुलिस जाँच में जुटी है और जाँच के बाद ही खुलासा हो पाएगा कि आखिर क्यों एक माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े आठ महीने के बेटे अहद को मौत की नींद सुला दिया!

‘जय श्री राम’ नहीं, क्रिकेट की वजह से हुई बच्चों में लड़ाई: इमाम अहमद मिस्बाही ने फैलाया झूठ

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में क्रिकेट मैच को लेकर मदरसा दारुल उलूम फैज ए आम के छात्रों और कुछ स्थानीय युवकों के बीच आपसी झड़प हुई और बात मारपीट तक पहुँच गई। इस मारपीट के बाद छात्र मदरसा पहुँचे और उन्होंने शहर काजी निसार अहमद मिस्बाही को मामले की जानकारी दी। इसके बाद निसार अहमद मिस्बाही ने आरोप लगाते हुए कहा कि मदरसे के बच्चों से जबरदस्ती ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए जा रहे थे और इसका विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की गई है। निसार अहमद ने इस मारपीट को मॉब लिंचिंग से जोड़ने की कोशिश भी की।

मीडिया द्वारा भी इस खबर को यह कहते हुए प्रकाशित किया गया कि बच्चों से ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए गए। द क्विंट ने इस घटना पर लिखा है- “उत्तर प्रदेश के उन्नाव में मदरसे के बच्चों को ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया। जब बच्चों ने नारे लगाने से इनकार किया तो उनके साथ मारपीट की गई, उनके कपड़े फाड़ दिए गए और साइकिलें तोड़ दी गईं।”

साथ ही, उन्नाव में जामा मस्जिद के इमाम का आरोप लगाया था कि इस घटना में हिंदूवादी संगठन बजरंग दल के लोग शामिल थे।

हालाँकि पुलिस द्वारा इस मामले की जाँच के बाद स्पष्ट हुआ है कि मजहबी नारे लगवाने के लिए मजबूर करने वाली बात एकदम मनगढंत और झूठी थी।

ADG (कानून-व्यस्था) उन्नाव ने क्रिकेट खेलने को लेकर दो पक्षों में हुई मारपीट की घटना को लेकर बताया कि इस मामले की जाँच में पता चला है कि मदरसे के बच्चों से धार्मिक नारे नहीं लगवाए गए थे। ऐसे झूठे आरोप लगाकर मेरठ और आगरा में भी शांति भंग करने का प्रयास किया गया, लेकिन जिला और पुलिस प्रशासन के चलते यह नाकाम हो गया।

पुलिस का कहना है कि प्रदेश में कहीं भी अफवाह और शांति भंग करने का प्रयास किया जाएगा तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस घटना को लेकर लोकभवन में ADG LO, IG LO और प्रमुख सचिव सूचना की प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया कि उन्नाव में क्रिकेट खेलने के चलते विवाद हुआ और क्रिकेट की वजह से ही बच्चों में झगड़ा हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों से कोई भी धार्मिक/मजहबी नारे नहीं लगवाए गए। अधिकारियों ने बताया कि उन्नाव, मेरठ और आगरा में असामाजिक तत्वों को गिरफ्तार किया गया है और बिना भेदभाव के लोगों पर कार्रवाई की गई है।

इमाम ने दिया घटना को सांप्रदायिक रंग

उन्नाव के जामा मस्जिद के इमाम निसार अहमद मिस्बाही ने इस घटना को लेकर मनगढंत आरोप लगाते हुए इसे सांप्रदायिक रंग देते हुए भड़काऊ बयान दिया था। इमाम ने कहा, “…आम तौर पर खेलने कहीं न कहीं जाते हैं। गुरुवार 2 बजे नमाज पढ़के हमारे 10-12 बच्चे छोटे-छोटे किसी की 12 साल, 13 साल, 14 साल उम्र है, जीआईसी ग्राउंड रेलवे के पास क्रिकेट खेल रहे थे। चार लड़के आए बड़े-बड़े और… एक्शन क्या है हमारा, अभी तो कोतवाल साहब हमारे आ गए हैं, चौकी इंचार्ज हैं आपके सामने, जो कानूनी प्रक्रिया है, वो की जा रही है, FIR की जा रही है। लेकिन चूँकि प्रशासन को हमने नाम और चेहरे सब सौंप दिए हैं, तीन आदमी की शिनाख्त कर दी है चार में से। कल हमारा जुमा है, अगर जुमा तक गिरफ्तारी नहीं हुई तो फिर हम बहुत… जो एक्शन कहीं भी नहीं हुआ होगा, वो होगा। चूँकि उन्नाव में अमन-शांति बनाने के लिए पूरी कोशिश की गई, और हमारे जिले में प्रशासन ने और हमारे यहाँ की पब्लिक ने ऐसा नहीं होने दिया। इसीलिए चार आदमी ने खराब किया है, अब प्रशासन की जिम्मेदारी है कि ये माहौल न बिगड़ने दे वरना जुमा है, कुछ भी हो सकता है।”

परिवार न होना, सत्ता का लालच न होने की गारंटी नहीं, यकीन न हो तो पढ़े मलिक काफूर की कहानी

अगर आने वाली पीढ़ियों के लिए सत्ता सुख छोड़ने का लोभ न हो, तो मनुष्य जनहित की सोचेगा और दूसरे कई शासकों की तरह सत्ता-संपत्ति को अपने ही परिवार की बपौती बनाए रखने पर ध्यान नहीं देगा, ऐसा लोग सोचते/मानते हैं। संभवतः इतिहास उलटकर न देखने का ऐसा नतीजा हुआ होगा। इतिहास के हिसाब से देखें तो ऐसा होना जरूरी नहीं है। उदाहरण के तौर पर हम मलिक काफूर को देख सकते हैं।

खम्भात पर हुए 1299 के आक्रमण में अलाउद्दीन खिलजी के एक सिपहसालार ने उसे पकड़ा था। कुछ उस काल के लिखने वाले बताते हैं कि उससे इस्लाम कबूल करवाकर खिलजी को सौंपा गया था। कुछ दूसरे इतिहासकार मानते हैं कि उसे 1000 दीनार की कीमत पर खरीदा गया था, इसीलिए काफूर का एक नाम ‘हजार दिनारी’ भी था। जो भी हो, 1306 आते-आते मलिक काफूर फौज़ी मामलों में अच्छा दखल रखने लगा था।

1309-11 के बीच उसने दक्षिण की ओर कदम बढ़ाए। काकतीय, होयसल और पांड्या जैसे राज्यों पर विजय पाने के बाद उसका दबदबा दरबार में भी काफी बढ़ चुका था। सलीम किदवई जैसे इतिहासकार मानते हैं कि मलिक काफूर और अलाउद्दीन खिलजी में समलैंगिक सम्बन्ध थे। अपने अंतिम दिनों में खिलजी सब कुछ भुला कर काफूर के चक्कर में पड़ा था।

खिलजी के बेटों- खिज्र खान और शादी खान की शादियाँ जिस मनसबदार अलप खान की बेटियों से हुई थी, उससे काफूर की अदावत भी रही। खिलजी की मौत के वक्त जब सत्ता की जंग शुरू हुई तो काफूर ने खबर उड़ाई कि खिज्र खान, उसकी बीवी और उसके ससुर अलप खान ने मिलकर खिलजी को जहर देने की साजिश रची थी। इस अफवाह की वजह से उसे अलप खान का क़त्ल करने का मौका मिल गया।

खिलजी के दो बेटों- ख़िज्र खान और शादी खान को काफूर ने अँधा करवा कर कैद कर दिया। काफूर कुल 30 दिन के आस-पास ही सुल्तान रहा था, वो भी सीधी तरह सुल्तान नहीं! उसने खिलजी के ही बेटे (छह साल के) शिहाबुद्दीन को शासक बनाया और उसकी माँ, यानी खिलजी की विधवा से निकाह रचा लिया। उसके खिलाफ दरबार में ही साजिशें शुरू हो गई थीं।

अलाउद्दीन खिलजी के पूर्व अंगरक्षक मुबश्शिर, बशीर, सालेह और मुनीर, मिलकर काफूर की हत्या की योजना बना रहे थे। शक की वजह से एक रात काफूर ने मुबश्शिर को अपने कमरे में बुलवाया। किस्मत से मुबश्शिर और उसके साथियों के पास बादशाह का अंगरक्षक होने की वजह से काफी पहले से ही हर जगह हथियार ले जाने की इजाजत थी। फ़रवरी, 1316 में किसी रोज जब काफूर ने उसका क़त्ल करने की कोशिश की, तो उल्टा वही मुबश्शिर के हाथों मारा गया।

उसका समलैंगिक और नपुंसक होना उसके खिलाफ जाता था लेकिन फिर भी उसके टूटे-फूटे मकबरे को फ़िरोज़ शाह तुगलक ने ठीक करवाया था। आज उसके मकबरे का भी कहीं पता नहीं चलता। बाकी अगर ऐसा लगता हो कि परिवार, बीवी बच्चों का न होना, लोगों को सत्ता के लालच से दूर रखेगा, तो इतिहास ऐसा नहीं सिखाता। हाँ आपको मानना हो, तो जरूर मान लीजिए।