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BJP को वोट देने पर पति ने की पत्नी की हत्या, ससुराल वालों पर FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ज़िले से एक चौंकाने वाली घटना का ख़ुलासा हुआ है। इस ज़िले के तरवनिया वार्ड नंबर-3, सैदपुर, के निवासी रामबचन ने अपनी पत्नी नीलम (25 वर्षीय) की कथित तौर पर बेरहमी से हत्या कर दी।

ख़बर के अनुसार, रामबचन नाम के इस शख़्स ने अपनी पत्नी को केवल इसलिए मार डाला क्योंकि उसकी पत्नी ने उसके कहे अनुसार बीएसपी को वोट देने की बजाए बीजेपी को वोट दे दिया था। हैवानियत पर उतारू इस शख़्स ने अपनी पत्नी को मारने के लिए फावड़े का इस्तेमाल किया। हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद वो तब तक लाश के पास खड़ा रहा जब तक कि मौक़े पर ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठी नहीं हो गई। भीड़ इकट्ठी होने के बाद वो वहाँ से भाग गया।

हत्या की ख़बर जब मृतका के परिजनों तक पहुँची तो उन्होंने उस गाँव में पहुँचकर हत्या के विरोध में सड़क जाम किया। सूचना पाकर गाजीपुर पुलिस ने मौके पर पहुँचकर पहले तो भीड़ को तितर-बितर किया और फिर मृतका के पति और ससुराल वालों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया। हालाँकि, मृतका (नीलम) की माँ ने रामबचन और उसके माता-पिता के ख़िलाफ़ दहेज को लेकर हत्या का मामला दर्ज करवाया है।

बता दें कि खानपुर पुलिस स्टेशन के सिंगारपुर के गहिरा बस्ती की रहने वाले ईशू राम की बेटी नीलम की शादी 19 जून 2014 को रामबचन के साथ हुई थी। उनके 2 बच्चे हैं। कुछ अन्य ख़बरों के अनुसार, रामबचन को अपनी पत्नी पर शक़ रहता था, इस वजह से दोनों के बीच आए दिन तकरार का माहौल रहता था। एक अन्य ख़बर के अनुसार, पत्नी पर शक़ करना भी हत्या की वजह हो सकती है।

SC ने की EVM से VVPAT मिलान की एक और याचिका खारिज, कहा- ‘लोकतंत्र को नुकसान पहुँचेगा’

मंगलवार (मई 21, 2019) को सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों के 100 फीसदी मिलान वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि अगर इस मामले में दखल दिया गया तो यह लोकतंत्र को नुकसान होगा।

इस याचिका को ‘टेक4ऑल’ नाम के टेक्नोक्रैटों के समूह द्वारा दायर किया गया था। उनकी दलील थी कि ईवीएम विश्वस्नीय नहीं हैं, इसकी टैपरिंग की जा सकती है। इसलिए उन्होंने न्यायालय से सभी ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों से मिलान की माँग की थी।

कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “इस मामले पर पहले ही मुख्य न्यायाधीश की बेंच फैसला दे चुकी है फिर आप इस मामले को वेकेशन बेंच के सामने क्यों उठा रहे हैं?” इस याचिका को बकवास बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही करते रहे तो इससे लोकतंत्र को नुकसान होगा।

गौरतलब है इससे पहले ऐसे ही एक मामले पर 7 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। इस दौरान विपक्ष द्वारा दाखिल की गई याचिका कोर्ट ने खारिज की थी।

दरअसल, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में 21 विपक्षी नेताओं द्वारा दायर याचिका में माँग की थी कि 50 फीसदी VVPAT पर्चियों की ईवीएम से मिलान करने का आदेश निर्वाचन आयोग को दिया जाए। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इससे पहले चुनाव आयोग ने विपक्ष की इस माँग पर कहा था कि वीवीपीएटी स्लिप काउंटिंग की वर्तमान पद्धति में कोई बदलाव नहीं होगा, और अगर ऐसा हुआ तो लोकसभा परिणाम 6-9 दिनों के बाद आएगा।

Exit Polls से नाराज़ मणिशंकर समर्थक पत्रकार इरीना अकबर ने देश की जनता को सुनाई खरी-खोटी

एग्जिट पोल्स के नतीजों से नाराज़ इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार ने देश की जनता को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया है। एग्जिट पोल्स में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को पूर्ण बहुमत मिलता दिखाया गया है। नाराज़ पत्रकार इरीना अकबर ने पहले तो ईवीएम, फिर देश की जनता को ही भला-बुरा कहा। इरीना अकबर ने अपनी ट्वीट में लिखा:

अगर भाजपा ईवीएम में गड़बड़ियाँ कर के फिर से चुनी जाती है तो ईवीएम पर से मेरा विश्वास उठ जाएगा। अगर भाजपा जनता द्वारा वोट देने के कारण फिर से सत्ता में आती है तो मेरा देश की जनता पर से ही विश्वास उठ जाएगा। दूसरी वाली स्थिति बहुत बुरी है, बहुत बुरी।

इरीना अकबर की इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाते हुए पाकिस्तान चले जाने की सलाह दी। लोगों ने इरीना को याद दिलाई कि जिन्हें इस देश पर और देश की जनता पर भरोसा नहीं था, उन्हीं के लिए 1947 में एक देश बनाया गया था, इरीना को वहीं चली जाना चाहिए। बाद में परेशान इरीना ने लिखा कि उन्होंने इस ट्वीट को लेकर आने वाली नोटिफिकेशन को म्यूट कर दिया है और ‘मूर्ख संघी’ उनके समय के लायक नहीं हैं। इरीना ने कहा कि संघी हंगामा मचा कर उन्हें डिस्टर्ब कर रहे हैं और उनका फोन नोटिफिकेशन्स के कारण बार-बार बज रहा है।

कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ झुकाव रखनी वाली इरीना ख़ुद को बिज़नेस वुमन बताती हैं और संजय झा जैसे कॉन्ग्रेस नेताओं के ट्ववीट्स को अक्सर रीट्वीट करती रहती हैं। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आध्यात्मिक दौरे पर भी निशाना साधा था और गिरोह विशेष के क्रंदन में शामिल होते हुए सवाल किया था कि पीएम जब ध्यान कर रहे थे, तब वहाँ कैमरा क्यों था? कुछ दिनों पहले इरीना अकबर ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, गायकों, अभिनेताओं और क्रिकेटरों पर निशाना साधते हुए कहा था कि इन लोगों ने वर्षों अपने क्षेत्र में काम कर के जो इज्जत कमाई, उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में एक ‘हत्यारे’ का समर्थन करते हुए ये इज्जत गँवा दी।

इरीना ने लिखा था कि एक ‘हत्यारे’ का समर्थन करते हुए इन लोगों ने जो इज्जत गँवाई है, क्या उसे फिर ये वापस पा सकेंगे? इरीना का इशारा किस तरफ था, ये समझा जा सकता है। इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा पीएम मोदी पर अभद्र टिप्पणी करते हुए उन्हें नीच कहे जाने का भी इरीना ने खुल कर समर्थन किया था। इरीना ने लिखा था कि मणिशंकर अय्यर बिलकुल सही थे और वो उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं।

एग्जिट पोल्स के नतीजे आने के बाद से ही लगातार गिरोह विशेष के पत्रकारों में बेचैनी दिख रही है। बीबीसी ने भी अपनी वेबसाइट पर राहुल गाँधी की प्रोफाइल में बदलाव करते हुए उनकी सफलता का वास्तविक लक्ष्य 2019 से बढ़ा कर 2014 कर दिया। बीबीसी ने राहुल को एक उम्दा बैकरूम ऑपरेटर कहा और अनाम विश्लेषकों के हवाले से दावा किया कि उनके पास राजनीतिक मुद्दों को लेकर व्यापक समझ है। बीबीसी ने प्रियंका गाँधी के चमत्कारिक व लोकप्रिय होने के भी दावे किये लकिन इसके पीछे का कारण नहीं बताया।

20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को 35+ सीटें: ‘क्रन्तिकारी’ पत्रकार का क्रन्तिकारी Exit Poll

पिछले कुछ दिनों से वह जिस भी मीडिया संस्थान में नौकरी करने जा रहे हैं, वहाँ से उन्हें निकाल बाहर किया जा रहा है। कभी अरविन्द केजरीवाल के साथ अपनी केमिस्ट्री को लेकर ‘क्रन्तिकारी’ का दर्जा पा चुके पुण्य प्रसून वाजपेयी पर अब उम्र के साथ-साथ नौकरी छूटने का असर भी साफ़-साफ़ दिख रहा है। जहाँ कई मीडिया चैनल, सर्वे एजेंसियाँ मिल कर एग्जिट पोल्स जारी कर रही हैं और फिर भी वो चेतावनी दे रहे हैं कि फाइनल नतीजे इससे बिलकुल अलग हो सकते हैं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ‘अपना ख़ुद का एग्जिट पोल’ जारी किया है। उन्होंने कहाँ-कहाँ जाकर मतदताओं से बात की, इस बारे में कुछ न ही पूछिए तो बेहतर है। वाजपेयी अब टीवी चैनलों से ऊपर उठ कर स्वयं में ही एक संस्थान बन बैठे हैं।

उनके एग्जिट पोल के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी की सीटें 282 से घट कर सीधा 145-152 पर आ जाएगी। कॉन्ग्रेस को 100 से अधिक आएँगी और यूपी महागठबंधन को 50 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। उन्होंने तृणमूल को 35 से भी अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। बंगाल में भाजपा केउद्भव को वाजपेयी ने सीधे तौर पर नकार दिया है। लेकिन, वाजपेयी ने इससे भी बड़ी ग़लती या यूँ कहें, ब्लंडर किया है। उन्होंने डीएमके के 35 से भी अधिक सीटें जीतने की बात कही है।

क्या डीएमके 35 से अधिक सीटें जीत सकती है? अगर पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसा विरिष्ठ और बड़ा पत्रकार इस तरह के दावे करे, तो भले ही अनुमानों में भिन्नता हो सकती है लेकिन कुछ बेसिक फैक्ट चेक तो उन्होंने किया ही होगा। लेकिन नहीं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी। ऐसी पार्टी, जो सिर्फ़ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, उसे वाजपेयी ने 35 सीटें दे दी है। ऐसा कैसे संभव है? क्या डीएमके द्वारा जीती गई एक सीट को दो या डेढ़ गिना जाएगा? 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी 35 सीटें कैसे जीत सकती है?

सबसे बड़ी बात कि मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पेज ने इस कथित एग्जिट पोल को शेयर भी किया। हो सकता है पुण्य प्रसून वाजपेयी का इरादा ही यही रहा हो- बिना फैक्ट जाने कुछ भी आँकड़े दे देना, ताकि फाइनल रिजल्ट्स आने तक कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग तो उनका वीडियो शेयर करें। अगर डीएमके तमिलनाडु की सारी सीटों पर चुनाव लड़ती तो पुण्य प्रसून वाजपेयी शायद उसे देश में पूर्ण बहुमत देते हुए स्टालिन के भारत का प्रधानमंत्री बनने का अनुमान लगा लेते।

इससे पहले भी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक नासमझी का परिचय तब दिया था, जब उन्होंने कहा था कि आचार संहिता लागू होते मोदी सरकार ‘केयरटेकर सरकार’ की भूमिका में आ जाएगी। इसपर उन्हें लताड़ लगाते हुए एक आईएएस अधिकारी ने उन्हें कहा था, “बाजपेयी जी, एंकरिंग आपको संवैधानिक विशेषज्ञ नहीं बनाती है। लोकसभा भंग होने पर ही सरकार केयर-टेकर बनती है। कृपया भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश का संविधान लागू न करें।” पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं लेकिन उनके ताज़ा कांडों से लगता है कि उन्हें संविधान और राजनीति पर ट्यूशन लेने की ज़रूरत है।

सोनिया, प्रियंका किस हैसियत से हत्यारों को माफ कर रही हैं? 20 अन्य लोगों की जान की कीमत क्या?

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की आज 28वीं पुण्यतिथि है। गाँधी परिवार के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत अन्य पार्टी नेताओं ने वीरभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, “पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि।”

एक तरफ जहाँ देश राजीव गाँधी की हत्या का शोक मना रहा है और उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है, वहीं उन 20 लोगों को पूरी तरह से भुला दिया जिन्होंने श्रीपेरंबदुर विस्फोट में अपनी जान गँवाई थी। जब-जब राजीव गाँधी के हत्यारों को माफ़ करने की बात सामने आती है, तो उन 20 लोगों को क्यों भुला दिया जाता है जिनके नाम के आगे गाँधी नहीं लगा हुआ था? चाहे सोनिया हों या प्रियंका गाँधी वाड्रा, आखिर किस हैसियत से ये लोग उन हत्यारों को रिहा करने या उनकी सजा कम करने की बात करती हैं? क्या ये हत्यारे सिर्फ राजीव गाँधी के हत्यारे थे? या इन्होंने अन्य 20 परिवारों से भी ऐसा करने की अनुमति ले रखी है? अगर नहीं तो कानून को अपना काम करने देना चाहिए और ऐसे मार्मिक मुद्दों पर राजनीति से बचना चाहिए।

हिन्दुस्तान टाइम्स – 22 मई 1991

राजीव गाँधी पहले देश के प्रधानमंत्री थे बाद में पिता या पति – शुद्ध राजनैतिक सिद्धांत यही कहता है। वह जनता के प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि थे और उनकी हत्या की माफ़ी का अधिकार किसी को भी नहीं। वस्तुतः किसी भी नागरिक की हत्या की माफी का अधिकार किसी को भी नहीं है। इसलिए देश के 20 आम नागरिक जो उस हादसे की भेंट चढ़ गए थे, उन्हें इस तरह भुला देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं। राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आप उनके शोक-संतप्त परिवारों की भावनाओं से नहीं खेल सकते।

राजीव गाँधी का संबंध राजनीतिक घराने से था और वर्चस्व राजनीति से। शायद इसलिए हर साल उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन वो 20 लोग आम नागरिक होने ज़्यादा शायद कुछ नहीं थे, इसलिए उन्हें श्रद्धाजंलि देना तो छेड़िए, उनके हत्यारों तक को माफ करने की बात चलती है, माफ कर भी दिया जाता है, विधानसभा से राज्यपाल को चिट्ठी लिखी जाती है लेकिन लगातार हार से परेशान कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में जीत (भले ही सहयोगियों द्वारा) का स्वर सुनने में व्यस्त है। विरोध करे भी तो कैसे करे! विरोध मतलब एक मजबूत दिख रहे सहयोगी का चला जाना।

गाँधी परिवार के लिए हो सके राजीव गाँधी को खोने का दर्द हो (और होना भी चाहिए) लेकिन उन्हें यह कतई नहीं मानना चाहिए कि उन 20 लोगों के परिवार का दर्द, गाँधी परिवार के दर्द से कुछ कम है। वो बात अलग है कि उन परिवारों का दर्द कभी सामने नहीं आ सका क्योंकि उन्हें अपना दर्द साझा करने के लिए आज तक कोई राजनीतिक मंच ही नहीं मिला। इसलिए गाँधी परिवार को हत्या और हत्यारों की माफी पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

गाँधी परिवार को कम से कम ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी के प्रवक्ता अमेरिकाई वी नारायणन को जरूर पढ़ना चाहिए। 14 जून 2018 को उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए एक आर्टिकल लिखा था। इस लेख में उन्होंने भी राजीव के साथ-साथ मरने वाले अन्य लोगों के परिवार वालों की भावनाओं का सम्मान करने की बात करते हुए सजा माफी पर आपत्ति जताई थी।

मध्य प्रदेश के बाद अब कर्नाटक सरकार पर भी संकट के बादल, राहुल गाँधी ने की बैठक

लोकसभा चुनाव ख़त्म होने के साथ ही विभिन्न न्यूज़ चैनलों द्वारा एग्जिट पोल्स किए गए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग अधिकांश एग्जिट पोल्स में बहुमत का आँकड़ा पार करता दिख रहा है। मोदी लहर का असर अब भोपाल और बंगलौर के राजनीतिक गलियारों तक पहुँच गया है। दोनों राजधानियों में सियासी पारा उच्च स्तर पर पहुँच गया है। इन राज्यों में सत्ता पर काबिज कॉन्ग्रेस पार्टी के पास ख़ुद के दम पर बहुमत का आँकड़ा नहीं है और सहयोगियों के भरोसे सरकार चल रही है। जहाँ कर्नाटक में भाजपा को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने अपने से काफ़ी कम विधायकों वाली पार्टी जेडीएस को मुख्यमंत्री पद सौंपा हुआ है, मध्य प्रदेश में बसपा और निर्दलीयों की मदद से कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है।

एग्जिट पोल्स के अनुसार, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन एक बड़ी हार की तरफ बढ़ रहा है। राज्य में 28 लोकसभा सीटें हैं और अधिकतर एग्जिट पोल्स में भाजपा 20 का आँकड़ा पार करती दिख रही है। राज्य की विधानसभा में भी 104 विधायकों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और 78 विधायकों के साथ दुसरे नंबर की पार्टी कॉन्ग्रेस उससे काफ़ी पीछे है। लोकसभा चुनाव के परिणाम अगर एग्जिट पोल्स के अनुसार आते हैं, फिर राज्य में अधिकांश लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा होने के कारण गठबंधन के लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

एक वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि कर्नाटक गठबंधन का पहला लक्ष्य अधिकतम लोकसभा सीट जीतने का था लेकिन अब यह लक्ष्य फेल होता दिख रहा है, ऐसे में गठबंधन को जारी रखने में कोई भलाई नहीं है। कर्नाटक कॉन्ग्रेस की कलह सतह पर न आ जाए, इस डर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पहले ही राज्य के नेताओं को गठबंधन बचाए रखने की नसीहत दे डाली है। इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्जिट पोल की मानें तो भाजपा राज्य में 23 से 25 लोकसभा सीटें जीत सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस को 3 से 5 सीटों के साथ संतोष करना पड़ेगा।

उधर मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को पत्र लिख कर कमलनाथ सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने की माँग की है। राज्य में 114 विधायकों वाली कॉन्ग्रेस और 109 विधायकों वाली भाजपा के बीच ज्यादा गैप नहीं है और कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रहे कई अन्य विधायकों ने नाराज़गी जताते हुए लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद अपना रुख स्पष्ट करने की बात कही है। मध्य प्रदेश सरकार 6 महीने पूरे हुए हैं, कर्नाटक में 1 वर्ष से कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार चल रही है। मार्च में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी को राज्य में 22 लोकसभा सीटें आ जाती हैं तो वो 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री बन जाएँगे।

कर्नाटक के कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ दिल्ली में राहुल गाँधी की बैठक भी हुई, जिसमें चुनाव परिणाम के बाद के हालातों से निपटने के तरीकों पर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने तो एग्जिट पोल्स के लिए भी ईवीएम पर अपना गुस्सा निकाला। मध्य प्रदेश में भाजपा को उम्मीद है कि कॉन्ग्रेस के कुछ विधायक नाराज़ होकर कमलनाथ के पक्ष में वोट नहीं करेंगे और सपा-बसपा के विधायक भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार किए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

देश की जनता पर है स्वरा भास्कर को शक, और बातें लोकतंत्र बचाने की करती हैं…

लगभग सभी न्यूज चैनल्स के एग्जिट पोल पर एनडीए के समर्थन में पूर्वानुमान देखकर मोदी विरोधियों के सुर बदलने लगे हैं। जो लोग कल तक इस बात का शोर मचा रहे थे कि इन लोकसभा चुनावों में जनता मोदी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकेगी, वही लोग अब अपनी पिछली बातों को सही साबित करने के लिए तरह-तरह की उलाहनाएँ दे रहे हैं। इसी सूची में फिल्म जगत का एक जाना-माना चेहरा स्वरा भास्कर भी शामिल हैं।

यूँ तो आपने चुनावी माहौल में स्वरा को पिछले दिनों उनके ‘दोस्त’ कन्हैया कुमार के समर्थन में प्रचार करते देखा होगा। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की रैली में शामिल होते देखा होगा या फिर लोगों के पोस्ट पर जाकर मोदी के लिए वोट न देने की अपील करते देखा होगा। लेकिन एग्जिट पोल आने के बाद आप स्वरा को नहीं बल्कि उनका एक नया ट्वीट देखिए! जिसमें उन्होंने किसी द्वेपान मित्रा का ट्वीट रिट्वीट करते हुए “BASICALLY…” लिखा है। द्वेपान के मुताबिक अगर लोकसभा की 543 सीटों पर भी भाजपा जीत जाती है, तब भी यह पार्टी कट्टर ही रहेगी, धर्मांध ही रहेगी। और स्वरा ने इसे शेयर करके इस बात पर अपनी सहमति जताई है।

इस ट्वीट पर स्वरा ने ‘बेसिकली’ लिखकर जहाँ भाजपा के ख़िलाफ़ अपनी कुंठा व्यक्त की, वहीं इस एक शब्द ने स्वरा और उनकी ‘क्रांतिकारी’ सोच पर सवालिया निशान लगा दिए। द्वेपान के इस ट्वीट को शेयर करके वो खुद ही अपनी बातोंं में फँस गईं। एक ओर जहाँ वो जनता के बीच जाकर लोकतंत्र और देश को बचाने की बातें करती रहीं, वहीं इस पोस्ट में वो देश की जनता पर अप्रत्यक्ष रूप से उंगली उठाती दिखीं। उन्होंने 543 सीटों पर भाजपा के आने की एक कल्पना की और कहा अगर ऐसा होता भी है तो भी वो पार्टी एक कट्टर पार्टी ही रहेगी। स्वरा की इस आभासी कल्पना का क्या मतलब है?

इसका मतलब है कि एक उनके विचारों के आगे देश की करोड़ों जनता का मत बेकार है। इसका यही पर्याय है कि सिर्फ एक वो ही सेकुलर देश की नागरिक हैं और बाकी सब भाजपा जैसी ‘कट्टर’ पार्टी के अधीन हैं। उनके कहने का क्या मतलब है कि अगर भाजपा को जनता 543 सीट देकर लोकसभा पहुँचाती है तो जनता बेवकूफ़ है! क्या नागरिक अपने मताधिकारों का प्रयोग देश में कट्टरता फैलाने के लिहाज़ से करेंगे?

सोचिए, भाजपा का हिंदूवादी चेहरा देखकर स्वरा को देश में कट्टरता पसरने का डर सताता रहता है! तब तो कन्हैया के जीतने पर हिन्दुओं को अपने धर्म पर खतरा मंडराता दिखना चाहिए! अगर पार्टी और व्यक्ति को विचारधारा से आँका और परखा जाता है तो कन्हैया तो कम्युनिस्ट हैं, हम कैसे मान लें कि कल को देश के उच्च पद पर आसीन होने के बाद कन्हैया इस बात पर जोर नहीं देंगे कि सबको कम्युनिस्ट होना पड़ेगा? कैसे मान लें कि वो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे कथित तौर पर दोबारा नहीं लगाएँगे, कैसे यकीन करें कि ऐसा शख्स देश की अखंडता को बचाए रखेगा जो अपनी बात पर ही कायम न रह पाया हो…

स्वरा ने अपने इस ट्वीट से केवल यह बताया है कि वो न चाहते हुए भी जानने-समझने लगी हैं कि देश मोदी के नेतृत्व में भाजपा को ही सत्ता में चाहता है, बल्कि इस बात को भी बताया है कि वो देश की जनता और उनके फैसलों के बारे में क्या सोचती हैं। देश की जनता ने स्वरा का हमेशा साथ दिया है, उनके काम की प्रशंसा की है। उनके नारीवादी जज्बे को सराहाया है। उसके बावजूद बिना सोचे-समझे ऐसा कमेंट उनकी सोच और समझ पर दूसरों को उन पर उँगली उठाने का मौक़ा देता है। ट्वीट कीजिए! लेकिन सोच समझकर। आपको पढ़ने-सुनने वाले लोग बहुत हैं, उसका गलत इस्तेमाल करेंगे तो यूजर्स ट्रोल करेंगे ही।

दब्बू होते हैं उत्तर भारत के वोटर, दक्षिण भारतीयों की तरह शिक्षित भी नहीं: कॉन्ग्रेसी शमा मोहम्मद ने उड़ाया मजाक

कॉन्ग्रेस की नेशनल मीडिया पैनलिस्ट शमा मोहम्मद ने दक्षिण भारतीय मतदाताओं को शिक्षित और उत्तर भारतीय मतदाताओं को अशिक्षित बताया है। हार्वेस्ट टीवी न्यूज़ चैनल पर कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ़ से एक बहस में हिस्सा लेते हुए शमा ने ये बातें कहीं। एग्जिट पोल्स के नतीजों से बौखलाई शमा ने कहा कि उत्तर भारत के मतदाता दक्षिण भारतीय मतदाताओं की तरह शिक्षित नहीं होते और वे मीडिया पर विश्वास जताते हैं। शमा ने कहा कि उत्तर भारतीय मतदाताओं को काफ़ी आसानी से और जल्दी प्रभावित किया जा सकता है। कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल समर्थित हार्वेस्ट टीवी पर बोलते हुए शमा ने ऐसा कहा।

डिबेट की एंकरिंग कर रहीं वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त ने जब शमा मोहम्मद से पूछा कि अगर एग्जिट पोल्स सही साबित हो जाते हैं, तब वह क्या कहेंगी? इस पर शमा ने कहा कि उत्तर भारत के वोटर्स व्हाट्सप्प पर आई चीजों पर आसानी से विश्वास करते हैं और जल्दी प्रभावित किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर भारतीयों के पास अक्सर व्हाट्सप्प सन्देश आते रहते हैं। भारतीय वायुसेना द्वारा की गई बालाकोट एयर स्ट्राइक पर नाराज़गी जताते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि इसके ऊपर मीडिया द्वारा सवाल नहीं पूछे गए।

शमा मोहम्मद ने आरोप लगाया कि मीडिया के लोग भाजपा प्रवक्ताओं से सवाल नहीं पूछते। उन्होंने दावा किया कि यूपीए के समय में हुए सर्जिकल स्ट्राइक्स को लेकर भी मीडिया ने भाजपा नेताओं से सवाल नहीं पूछे। बहस के दौरान स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव ने कॉन्ग्रेस पर मुद्दों को ठीक से न उठाने का आरोप लगाया। योगेंद्र यादव ने कहा कि मुख्य विपक्षी पार्टी होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने कई मुद्दों को ठीक से जनता के सामने नहीं रखा। बरखा दत्त के शो में शमा ने इजराइल और ऑस्ट्रेलिया के एग्जिट पोल्स का उदाहरण देते हुए सारे एग्जिट ग़लत होने की संभावना जताई।

योगेंद्र यादव के आरोपों का जवाब देते हुए शमा मोहम्मद ने कहा कि राहुल गाँधी ने अपनी हर एक जनसभा में बेरोज़गारी से लेकर किसानों तक के मुद्दे उठाए, कॉन्ग्रेस ने हर मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की हरसंभव कोशिश की। शमा ने योगेंद्र यादव को भी खरी-खरी सुनाई। उन्होंने कहा कि यादव ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाने की बजाए ख़ुद के प्रत्याशी क्यों नहीं खड़े किए? शमा मोहम्मद ने पूर्व आप नेता से पूछा कि उन्होंने नोटा का समर्थन क्यों किया? उन्होंने योगेंद्र यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में सभी को वोट करने की अनुमति होनी चाहिए।

12:45 के बाद सुनें शमा मोहम्मद का विवादस्पद बयान (साभार: हार्वेस्ट टीवी न्यूज़)

सोमवार (मई 20, 2019) को एक अन्य कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने भी अपने एक विवादस्पद ट्वीट में लिखा था कि केरल के लोग शिक्षित होते हैं, इसीलिए वो भाजपा को वोट नहीं करते। इस पर हमने आँकड़े गिनाए थे कि कैसे भारत से आतंकी संगठन आईएसआईएस ज्वाइन करने वाले सबसे ज्यादा केरल के ही लोग हैं। उदित राज ने इस दौरान साक्षरता और शिक्षा के बीच का अंतर भूलकर अपनी नासमझी का परिचय दिया। एग्जिट पोल्स के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने अब भाजपा की बजाए जनता को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया है, ऐसा प्रतीत होता है।

LS चुनाव में ‘हमारे पक्ष में’ परिणाम और मस्जिदों की सुरक्षा के लिए पढ़े जाएँ विशेष नमाज़: देवबंद

अजीबोगरीब फतवों के लिए मशहूर इस्लामिक यूनिवर्सिटी दारुल उलूम देवबंद ने भी लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों में रूचि दिखानी शुरू कर दी है। इस्लामिक संस्था ने मतगणना के ‘ख़ास परिणामों’ के लिए नमाज़ का आयोजन किया। रविवार (मई 19, 2019) को एग्जिट पोल्स के माध्यम से विभिन्न न्यूज़ एजेंसियों ने चुनाव परिणाम का अनुमान लगाया। अधिकांश एग्जिट पोल्स में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को पूर्ण बहुमत मिलता दिख रहा है। ऐसे में दारुल उलूम देवबंद एग्जिट पोल्स के नतीजों से ख़ुश नहीं है। नाराज़ मुफ़्ती महमूद हसन बुलंशहरी ने कहा, “अभी जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं, ऐसे समय में ज़रूरी है कि देश की शांति व समृद्धि के लिए नमाज़ पढ़ी जाए। मस्जिदों और इस्लामिक शिक्षकों की सुरक्षा के लिए भी यह महत्वपूर्ण है।

मुफ़्ती ने आगे कहा कि आपको इस बात का थोड़ा भी अंदाज़ा नहीं होता कि किसकी प्रार्थना सुनी जा रही है और देश बेहतरी की ओर बढ़ने लगे। उन्होंने सभी संस्थाओं से चुनाव परिणाम ज़ारी होने तक नियमित नमाज़ के बाद ‘ख़ास परिणाम’ के लिए अलग से प्रार्थनाएँ आयोजित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रार्थनाएँ 3 दिन पहले ही शुरू हो जानी चाहिए। मुफ़्ती ने संस्था के अनुयायियों से अपने पापों के लिए प्रायश्चित करने को कहा और बताया कि आजकल समाज में लालच की भावना बढ़ रही है।

देवबंद के मौलवियों ने मुफ़्ती के सुझाव को गंभीरता से लेते हुए इसका स्वागत किया है और ‘अपने पक्ष में’ चुनाव परिणाम हासिल करने के लिए प्रार्थनाओं का सिलसिला शुरू कर दिया है। मौलाना इशाक़ गोरा ने मुफ़्ती के सुझाव की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी मुस्लिमों को मज़हबी रूप से उनके सुझाव पर अमल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे लोकसभा चुनाव के परिणामों को लेकर आशंकित हैं। उन्होंने आगे कहा:

हमारे देश को एक ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो सबको साथ लेकर चले और भाईचारा, शांति और समरसता को बढ़ावा दे। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, कुछ राजनीतिक पार्टियाँ ऐसी हैं जो धर्म के आधार पर राजनीति करती हैं। ये सही नहीं है और ऐसी पार्टियों को जाना पड़ेगा। इसीलिए मुफ्ती ने जो प्रार्थनाओं की बात कही है, उसे गंभीरता से लेना चाहिए।

हाल ही में विवादित इस्लामिक संस्था देवबंद ने एक फतवे में औरतों के रमजान माह की विशेष नमाज तरावीह की जमात करने और मस्जिद में तरावीह की नमाज़ पढ़ने को ग़लत करार दिया था। देवबंद का तर्क था कि जब नमाज़ पढ़ने के लिए महिलाएँ मस्जिद नहीं जा सकतीं तो तरावीह के लिए उन्हें इजाज़त कैसे दे दी जाए। मुफ़्तियों ने कहा कि महिलाओं को तरावीह की नमाज़ घर के भीतर एकांत में अदा करनी चाहिए। इसके अलावा हाल में एक अन्य अजीब फतवा भी जारी किया गया।

हाल ही में दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी करते हुए पवित्र रमजान महीने में तरावीह की नमाज़ के दौरान लाइट बंद कर अंधेरा करने को ग़लत करार दिया। मस्जिदों में बिजली गुल कर अंधेरे या मध्यम रोशनी में नमाज़ अदा करने को मुफ्ती-ए-कराम ने रस्मन और ग़लत करार दिया। मुफ़्तियों ने मजहब के लोगों से इस्लाम में ईजाद की जा रही ‘नई-नई रस्मों एवं रिवाजों’ से बचने की सलाह दी।

राजीव गाँधी: PM जो मर कर वापस हुआ ‘ज़िंदा’, जिसे कॉन्ग्रेस ही नहीं दिला सकी ‘न्याय’

इन चुनावों में राजीव गाँधी यकायक मुद्दा बन गए- चुनावी भी, चर्चा का भी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भ्रष्टाचारी कहा, शेखर गुप्ता ने ‘डैशिंग, बाल-बच्चों वाला, युवा प्रधानमंत्री’, और सैम पित्रोदा के अनुसार उनकी जिंदगी में अर्थ ही राजीव गाँधी के भारत में इंटरनेट लाने से आया।

कभी 19 साल तक शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादक रहे थे, उसी इंडियन एक्सप्रेस के, जिसने राजीव गाँधी की आईएनएस विराट पर छुट्टियों का खुलासा किया, और बदले में उसके ऑफिस पर इनकम टैक्स के नाम पर सैन्य छापेमारी जैसी रेड पड़ी। उन पर इंडियन एक्सप्रेस के इसी ‘दुस्साहस’ के बदले कर्मचारियों को यूनियनबाजी के लिए उकसा कर अख़बार ठप करवाने की कोशिश का भी संदेह किया जाता है। सिख दंगों के भी दाग उन पर हैं।

राफ़ेल पर जब भी कॉन्ग्रेस आक्रामक हुई, उसके सामने पलट कर राजीव के समय का बोफोर्स घोटाला मुँह बाए खड़ा रहा। अगस्ता वेस्टलैंड भी कई लोगों को बोफोर्स 2.0 लगा, और जब क्रिश्चियन मिशेल को भारत लाया गया तो लगा कि काश इसी तरह मरहूम क्वात्रोची को भी पकड़ कर राज़ उगलवाए जा सकते!

और चुनाव खत्म हुए ठीक से दिन भर भी नहीं बीत पाया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने ऐलान कर दिया कि बस राज्यपाल साइन भर कर दें, उनकी सरकार राजीव गाँधी के कातिलों को रिहा करने के लिए तैयार बैठी है। ऐलान भी उनकी हत्या की तिथि 21 मई की पूर्व-संध्या को। मात्र दुर्योग, या राजनीतिक इशारा?

कातिलों की कानून के साथ कबड्डी

अगर राजीव गाँधी की हत्या के मुकदमे का इतिहास पढ़ा जाए तो यह न्याय कम, न्याय का मखौल ज्यादा लगेगा। पहले तो सुप्रीम कोर्ट में मृत्युदंड पाए 4 मुख्य अभियुक्तों में से नलिनी श्रीहरन के मृत्युदंड को उम्रकैद में केवल इसलिए बदल दिया गया कि वह महिला है, और उसने एक बच्ची को जन्म दिया था। उसकी पैरवी भी किसी और ने नहीं, राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गाँधी ने की। तीन अन्य आरोपियों के मृत्युदंड को सुप्रीम कोर्ट ने खुद उम्रकैद में बदल दिया था

उसके बाद लगभग 20 साल तक कानून से लुका-छिपी खेलने के बाद बाकी तीन अभियुक्तों मुरुगन, संतन, पेरारीवालन ने अपने मृत्युदंड में देरी के लिए कानून और सरकार को दोषी ठहराते हुए अपना मृत्युदंड भी माफ़ किए जाने की माँग की। तर्क यह दिया कि हम बीस साल कैद पहले ही काट चुके हैं, यह तो एक उम्रकैद के बराबर हो ही गया है। ऊपर से बीस साल से पता नहीं, जिंदगी मिलेगी या मौत इस डर ने जिंदगी और मानसिक संतुलन को तबाह कर दिया है- ऐसे में हमें मृत्यदंड दिया जाना अन्याय होगा। 2014 में उनकी बात मानते हुए अदालत ने उन्हें भी उम्रकैद में डाल दिया

उसके बाद शुरू हुई असली कबड्डी। जिस नलिनी को अगर रहम न मिलता महिला होने के नाते, जिन तीन कातिलों को अगर समय पर मृत्यदंड दे दिया गया होता तो आज होते ही न ज़िंदा, वह अब यह माँग कर रहे हैं कि उन्होंने एक उम्रकैद भर का समय काट लिया है तो उन्हें आज़ाद कर दिया जाए। और उनकी यह माँग पूरी करने के लिए तमिलनाडु की सरकार आतुर दिख रही है। आड़ ले रही है जनभावनाओं की।

सवाल  

पहला सवाल यह कि क्या एक उम्रकैद पूरी कर छूट जाने की सुविधा उन कैदियों को भी मिलनी चाहिए जिन्हें पहले मृत्युदंड मिला था और बाद में फाँसी में देर होने के चलते रहम खा कर उम्रकैद में डाल दिया गया। इस तरह तो उनके लिए दो बार रहम की गुंजाईश हो गई (जबकि आम, सीधे उम्रकैद पाए अपराधी को एक ही बार रहम मिलता है, बीस साल पूरे होने पर), जबकि उन्हें मृत्युदंड दिया ही इसलिए गया क्योंकि उनका अपराध किसी रहम के लायक नहीं समझा गया। यानि कम क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर सीधे केवल उम्रकैद होगी) पर केवल एक बार सजा में कमी का मौका, और ज्यादा क्रूर तरीके से हत्या (जिसपर मृत्युदंड होगा) में दो बार सजा में कमी का मौका? क्या यही संदेश देना चाहती है समाज में तमिलनाडु सरकार?

दूसरा सवाल यह कि यह ‘जनभावना’ के आधार पर कातिलों, आतंकियों की रिहाई का क्या मतलब है? यह ऐसी खतरनाक नज़ीर है जिसे कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके वाले, जेएनयू जैसे अर्बन नक्सलियों के गढ़ वाले देश में कैसे दुरुपयोग में लाया जाएगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।

और तीसरा सवाल यह कि जरा पलानिस्वामी खुद को राजीव गाँधी, या उस हमले में मारे गए 13 अन्य बेगुनाहों की जगह रख कर देखें? अगर उनके साथ ऐसा कुछ हो जाए, तो क्या वह अपने कातिलों का ऐसे बच निकलना पसंद करेंगे? राजीव गाँधी भ्रष्ट थे, इस ओर इशारा करने वाले पर्याप्त सबूत हैं। उनपर सिख दंगों समेत बहुत सारे ऐसे आरोप हैं जिनके लिए शायद वह जेल में होते अगर जिन्दा होते। लेकिन इस मामले में वह एक न्याय माँगते पीड़ित हैं, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री हैं। इतिहास अगर उन्हें उनके गुनाहों के लिए नहीं माफ़ करेगा तो हमें भी उनके कातिलों को ऐसे बच जाने देने के लिए जवाबदेह ठहराएगा।

नोट: मैं व्यक्तिगत तौर पर मृत्युदंड का विरोधी हूँ। पर यहाँ सवाल मृत्युदंड बनाम उम्रकैद का नहीं है। यहाँ सवाल है कम गंभीर अपराध और ज्यादा गंभीर अपराध के न्याय में विसंगति का।