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नेहरू-राजीव की तरह करिश्माई नेता हैं PM मोदी, शपथग्रहण में जाऊँगा: रजनीकांत

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित किया है और वे कार्यक्रम में सम्मिलित भी होंगे। प्रधानमंत्री के शपथग्रहण समारोह का समय गुरुवार (मई 30, 2019) को शाम 7 बजे रखा गया है। रजनीकांत ने बड़ा बयान देते हुए नरेन्द्र मोदी को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से उनकी तुलना की है। सुपरस्टार ने कहा कि पीएम मोदी भी नेहरू और राजीव की तरह की करिश्माई नेता हैं। रजनीकांत का यह बयान इसीलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा अब बंगाल और ओडिशा के बाद दक्षिण भारतीय राज्यों में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराना चाह रही है।

प्रधानमंत्री मोदी के शपथग्रहण समारोह के लिए तमिल सिनेमा के दोनों वरिष्ठ अभिनेताओं, रजनीकांत और कमल हासन को निमंत्रण भेजा गया है। कमल हासन ने अभी तक साफ़ नहीं किया है कि वे इसमें सम्मिलित होंगे या नहीं। हाल ही में गोडसे को हिन्दू आतंकवादी बता कर विवादों में फँसे कमल हासन पर इसके लिए केस भी दर्ज हुआ है। रजनीकांत ने कहा कि यह जीत मोदी की जीत है और वह एक करिश्माई नेता हैं। इस दौरान रजनीकांत ने कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी की भी बात की। कॉन्ग्रेस के ताज़ा नेतृत्व संकट पर उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं देना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष भी मज़बूत होना चाहिए।

रजनीकांत भी राजनीति में आ गए हैं लेकिन उन्होंने या उनकी पार्टी ने अभी तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है। 68 वर्षीय रजनीकांत ने अभी तक खुल कर अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन वो अक्सर मोदी की तारीफ़ करते हैं। भाजपा की जीत के बाद उन्होंने मोदी को बधाई दी थी, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने भी उन्हें धन्यवाद कहा था। चुनाव से पहले रजनीकांत ने कहा था कि मोदी उनके ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों पर भारी हैं। बता दें कि 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने रजनीकांत के आवास पर जाकर उनसे मुलाक़ात की थी।

‘द न्यूज़ मिनट‘ ने डीएमके के सूत्रों के हवाले से ख़बर प्रकाशित की है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में स्टालिन को आमंत्रण नहीं भेजा गया है। वेबसाइट ने लिखा है कि रजनीकांत ने अटल बिहारी वाजपेयी की भी तारीफ की और कहा कि तमिलनाडु में भी कामराज, जयललिता, एमजीआर और करूणानिधि जैसे करिश्माई नेता हुए हैं।

अगर सिनेमा की बात करें तो पिछले वर्ष रजनीकांत की 2 फ़िल्मों ‘2.0’ और ‘काला’ ने मिलकर 1000 करोड़ रुपए से भी अधिक की कमाई की है। हालाँकि, इससे पहले उनकी कुछ फ़िल्में नहीं चली थी लेकिन उन्होंने शानदार वापसी करते हुए संकेत दिया कि तमिल सिनेमा में अब भी वो वही ताक़त रखते हैं। उनकी ताज़ा फ़िल्म ‘पेट्टा’ अजीत कुमार की बड़ी फ़िल्म ‘विश्वासम’ से टकराने के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए का आँकड़ा पार करने में कामयाब रही। चर्चा है कि अपनी अगली फ़िल्म ‘दरबार’ के बाद रजनी सिनेमा इंडस्ट्री में सक्रियता कम कर के पूर्ण रूप से राजनीति पर ध्यान दे सकते हैं।

बंगाल में खिलता कमल: 3 MLA और 50 पार्षद दिल्ली आकर भाजपा में हुए शामिल

17वीं लोकसभा के नतीजों के बाद भी भाजपा ने ममता बनर्जी को झटके देना बंद नहीं किया है। ताजा खबर के अनुसार तृणमूल कॉन्ग्रेस के दो विधायक और 50 स्थानीय पार्षद भाजपा में शामिल हो गए हैं। इसके अलावा माकपा के विधायक देबेन्द्रनाथ रॉय भी भाजपा में शामिल हुए हैं। इन सभी ने बंगाल भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय की उपस्थिति में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिल्ली के अशोक रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में ग्रहण की।

और भी आएँगे: कैलाश विजयवर्गीय

कैलाश विजयवर्गीय ने पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि बंगाल के तीन विधायक और 50-60 पार्षद भाजपा का साथ आज थामेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि आगे और भी लोगों के भाजपा में शामिल होने की उम्मीद है। कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में कहा, “जैसे सात चरणों में लोकसभा का निर्वाचन हुआ, वैसे ही (दूसरी पार्टियों के नेताओं का) भाजपा में शामिल होना भी सात चरणों में होगा। आज तो केवल पहला चरण था।”

आज ही कंचरापाड़ा से तृणमूल के 16 पार्षदों ने ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस काउंसिलर पार्टी की सदस्यता छोड़ दी थी। तभी से कयासों में तेजी बढ़ गई थी। इसके अलावा लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक रैली के दौरान दिया गया बयान याद आ रहा था जिसमें उन्होंने दावा किया था कि 40 तृणमूल विधायक पार्टी छोड़ना चाहते हैं और उनके संपर्क में हैं। उसके बाद हालिया लोकसभा के निर्वाचन में भाजपा ने तृणमूल के गढ़ में सेंध लगाते हुए 18 सीटों पर जीत दर्ज की और 2014 में 39 में से 34 सीटें जीतने वाली ममता बनर्जी की पार्टी को मात्र 22 सीटों से संतोष करना पड़ा।

गर्लफ्रेंड के लिए MBA का पेपर लीक करवाने पर बसपा नेता फिरोज़ आलम गिरफ्तार

फिरोज़ आलम अलियास उर्फ़ राजा, जो कल तक अपनी एसयूवी की नेमप्लेट पर बसपा का नाम लिखकर आधा दर्जन लड़कों को लेकर घूमता था, उसे सोमवार (मई 27, 2019) को एमबीए का पेपर लीक करने के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया गया है।

अलियास ने माना है कि वो अपनी गर्लफ्रेंड की मदद करना चाहता था, जो कि एमबीए कर रही थी। इसके लिए उसने एएमयू के कर्मचारी इरशाद की सहायता ली। अलियास ने इरशाद से वादा किया कि वो उसकी विश्वविद्यालय में पक्की नौकरी लगवाएगा। राजा ने पुलिस को बताया है कि उसने अपनी गर्लफ्रेंड से वादा किया था कि वो उसके लिए परीक्षा पत्र जरूर लाकर देगा।

राजा ने बताया कि अपने दोस्त की नसीहत पर उसने अपनी गर्लफ्रेंड को पहले जाली उत्तर-पुस्तिका दे दी थी। जब लड़की को इसका एहसास हुआ, तो उसने अलियास से बात करना बंद कर दिया। इसके बाद नाराज़ गर्लफ्रेंड को मनाने के लिए अलियास और उसके दोस्त हैदर ने इरशाद को इस काम के लिए राजी किया। पूरे मामले का खुलासा होने के बाद हैदर और इरशाद, फिरोज के साथ जेल में हैं, जबकि लड़की अब भी फरार है।

इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक एसएसपी आकाश ने बताया है कि हैदर के फ्लैट को भी सील कर दिया गया है। क्योंकि इस फ्लैट को मीटिंग प्वॉइंट की तरह इस्तेमाल किया गया। ये फ्लैट हैदर के चाचा तहसीम सिद्दकी का है, जो समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के करीबी कहे जाते हैं। ये आरोपित लीक हुए पेपर को ₹2,000 प्रति व्यक्ति बेचने की प्लानिंग कर रहे थे। इसके लिए इन सभी ने व्हाट्सअप ग्रुप भी बना लिया था।

देश के विकास के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून जरूरी, रामदेव को मिला गिरिराज सिंह का समर्थन

बीजेपी नेता और बिहार के बेगूसराय से सांसद गिरिराज सिंह ने जनसंख्या नियंत्रण के मुद्दे पर योग गुरु बाबा रामदेव का समर्थन किया है। गिरिराज सिंह ने जनसंख्या नियंत्रण पर सख्ती पर सहमति जताते हुए कहा कि बढ़ती जनसंख्या विकास में बाधक है। गिरिराज ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण को लेकर बाबा रामदेव के दिए बयान को हमें सकारात्मक तरीके से लेना होगा। उन्होंने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण कानून जरूरी है, ताकि देश का विकास किया जा सके।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव ने हरिद्वार में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि देश जनसंख्या विस्फोट की स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं है और अब कानून के जरिए ही आबादी पर लगाम लगाई जा सकेगी। देश की आबादी को 150 करोड़ से अधिक नहीं होने दिया जाना चाहिए। रामदेव ने दो बच्चों की नीति का समर्थन करते हुए कहा था कि तीसरी संतान को वोट डालने समेत अन्य सरकारी अधिकार नहीं मिलने चाहिए। ऐसे बच्चे चाहे किसी भी जाति के हों, उनके चुनाव लड़ने और सरकारी नौकरियों के हक से भी वंचित किया जाना चाहिए। इसके अलावा दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले लोगों को सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में भी प्रवेश न दिया जाए। इससे देश में जनसंख्या वृद्धि अपने आप नियंत्रित हो जाएगी।

गौरतलब है कि इससे पहले रामदेव के इस बयान पर असदुद्दीन ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा था, “लोगों को असंवैधानिक बातें कहने से रोकने के लिए कोई कानून नहीं है, लेकिन रामदेव की बातों पर बेकार में ध्यान क्यों दिया जाता है? वह अपने पेट के साथ कुछ कर सकते हैं या अपने पैरों को घुमा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी अपना वोट देने का अधिकार सिर्फ इसलिए खो दें, क्योंकि वह तीसरी संतान हैं।” ओवैसी के इस बयान पर गिरिराज ने कहा, “ओवैसी की राजनीति नफ़रत की है और वो केवल नफ़रत फैलाते हैं, जबकि हम विकास की बातें कर रहे हैं तो इसमें भी उन्हें नफरत ही दिखती है।”

‘बालाकोट एयर स्ट्राइक पर प्रोपेगेंडा करना होता तो और भी भारी-भरकम हथियार गिराते’

बालाकोट पर एयर स्ट्राइक के बाद बहुत लोगों ने सेना और सरकार पर सवाल उठाए थे। अब इन्हीं सवालों का जवाब देते हुए एयर चीफ़ मार्शल बीएस धनोआ ने बयान दिया है। दरअसल, इंडिया टुडे से हुई बातचीत में एयर चीफ़ मार्शल बीएस धनोआ ने स्पष्ट किया है कि बालाकोट एयरस्ट्राइक को प्रोपेगेंडा की तरह इस्तेमाल करने की कोई मंशा नहीं थी, यही कारण है कि बॉर्डर के पार हवाई रेड के दौरान ज्यादा प्रबल हथियारों का प्रयोग नहीं किया गया।

एयर चीफ़ मार्शल बीएस धनोआ कहते हैं कि अगर इस स्ट्राइक को उन्हें प्रोपेगेंडा की तरह इस्तेमाल करना होता तो वे अधिक क्षमता वाले हथियारों का प्रयोग करते ताकि ज्यादा बड़े भूभाग को नष्ट किया जा सके लेकिन वो अतिरिक्त क्षति नहीं पहुँचाना चाहते थे। और इसी को देखते हुए बालाकोट हमले के लिए विशेष हथियारों (प्रीसिजन बेस्ड) का चुनाव किया गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कि उनका मकसद आतंकवादी कैंपों को निशाना बनाना था।

एयरचीफ ने 1999 के कारगिल युद्ध से सीखे सबक, बालाकोट के बाद का आकलन, विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान के वापसी के आसारों पर भी बात की। एयर चीफ मार्शल ने एयर मार्शल आर नांबियार, पश्चिमी वायु कमान के प्रमुख और लेफ्टिनेंट जनरल वाई के जोशी के साथ ‘Missing Man formation’ की उड़ान के बाद इस बातचीत में 20 साल पहले कारगिल युद्ध में मारे गए सैनिकों को भी याद किया। एयर चीफ धनोआ ने उन बाधाओं (limitations) के बारे में भी बात की, जिन पर कारगिल युद्ध के बाद काबू पाया गया।

उन्होंने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान वो छोटे-छोटे लक्ष्य भी उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती होते थे, लेकिन ये सब अब बदल गया है। उन्होंने बताया कि उस समय मिराज (लड़ाकू विमान) को ही छोटे लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल कर सकते थे, लेकिन अब सभी (वायु सेना के जेट) का प्रयोग किया जाता है।

बालाकोट स्ट्राइक पर एयरचीफ कहते हैं कि जब आप अपने देश की रक्षा करते हैं तो हताहतों की संख्या की कोई गारंटी नहीं होती है। अभिनंदन के आगे के भविष्य के बारे में धनोआ ने बताया कि निश्चित ही उन्हें विमान चलाने की अनुमति दी जाएगी लेकिन डाक्टरों की अनुमति के बाद ही ऐसा मुमकिन है।

गुरुग्राम: न मुस्लिम की टोपी उछली, न ‘जय श्री राम’, कुछ घटिया लोगों ने दिया मज़हबी रंग

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न सिर्फ़ एक कुशल प्रशासक बल्कि एक अनुभवी सफल और दक्ष राजनीतिज्ञ भी हैं। पीएम जब जनता के लिए बोल रहे होते हैं, चुनावी भाषण दे रहे होते हैं या किसी जनसभा अथवा रोड शो को संबोधित कर रहे होते हैं, तब उनका टोन अलग होता है। वहीं अगर वह रेडियो के माध्यम से मन की बात कर रहे होते हैं, टीवी के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित कर रहे होते हैं, तो उनका अंदाज़ अलग होता है। दूसरी तरफ़ भाजपा के वे सांसद हैं, जिन्होंने पीएम मोदी की ‘आदर्श ग्राम योजना’ का कचरा कर दिया। कई सांसदों ने इस ऐसी योजना को सड़क पर ला दिया, जिससे देश की सूरत बदल सकती थी। अव्वल तो यह कि वीआईपी कल्चर ख़त्म करने के लिए मोदी ने लाल बत्ती पर लगाम लगाई, जिसके बाद इसका प्रयोग बंद हुआ।

सांसदों को पीएम की महत्वपूर्ण सलाह

सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये सांसद पीएम का अनुकरण तो दूर, उनकी बातों तक पर ध्यान नहीं देते। आज के दौर में जब मीडिया के एक बड़े भाग का उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रोपगंडा फैलाना जानता है, विवादित बयान देने एवं ख़ासकर भाजपा नेताओं के सेलेक्टिव बयानों के सहारे भारत की एक ख़ास किस्म की छवि का निर्माण करना चाहता है, पीएम ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करने से पहले संसद में राजग के नव निर्वाचित सांसदों को संबोधित करते हुए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इसमें सबसे चर्चित उनका ‘छपास और दिखास’ वाला बयान रहा। हालाँकि, यह नया नहीं है।

जैसा कि ख़ुद नरेन्द्र मोदी ने कहा, ये चीजें भाजपा के अन्दर वाजपेयी काल से चली आ रही है। मोदी ने बताया कि जब वे लोग नए-नए आए थे, तब भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी ने उन सभी को एक महत्वपूर्ण सलाह दी थी। उस दौरान अटल-आडवाणी ने नेताओं को सलाह देते हुए कहा था कि वे ‘छपास और दिखास’ से बचें। इसका अर्थ हुआ कि अखबार में छपने और टीवी पर दिखने से बचें। मोदी ने अटल-आडवाणी की इसी सलाह को आगे बढ़ाया। 5 वर्षों में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न कर के लुटियंस गैंग को परेशान करने वाले मोदी ने चुनाव परिणाम आने से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस तो की लेकिन एक भी सवाल का जवाब न देकर ‘खान मार्किट’ के लोगों को उन्हीं के बीच आकर ट्रोल किया।

बिना लुटियंस के डिज़ाइनर पत्रकारों के बीच गए और बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस किए मोदी ने जनता से सीधे जुड़े रहने के कई तरीके विकसित किए हैं और उनका उन्हें फायदा भी मिला। पीएम मोदी की सलाह की बात हम इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि उनके द्वारा उपर्युक्त सलाह दिए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुए हैं, तब भी उसके भीतर भाजपा सांसद फँसने लगे हैं। इसकी शुरुआत क्रिकेट सेलेब्रिटी से नेता बने गौतम गंभीर ने की। गौतम गंभीर भारत के अव्वल सलामी बल्लेबाजों में से एक रहे हैं और हो सकता है कि सेलेब्रिटी होने के कारण ‘छपास और दिखास’ से उनका ख़ास लगाव हो। गंभीर के इस लगाव और नए विवाद की चर्चा करेंगे, लेकिन उससे पहले गुरुग्राम की उस घटना को समझते हैं, जिसके कारण यह सारा विवाद शुरू हुआ।

गुरुग्राम की घटना और ‘भेड़िया आया’ वाली कहानी

गुरुग्राम में एक युवक ने कुछ दावा किया। ध्यान दीजिए, दावा किया। वह युवक मुस्लिम है। उसका नाम है- बरकत अली। बरकत अली ने शिकायत दर्ज कराई कि उसे कुछ लोगों ने ‘जय श्री राम’ बोलने को मजबूर किया और ऐसा न करने पर उसके साथ मारपीट की गई। इतना ही नहीं, उनके द्वारा पहने गए इस्लामी स्कल कैप को हवा में उछल कर फेंक दिया गया। उसनें आरोप लगाया कि आरोपितों ने उसकी शर्ट भी फाड़ दी। पुलिस ने तत्काल एक्शन लिया और इस मामले में 15 लोगों को गिरफ़्तार किया गया और 50 से भी अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए, इसके बाद जो सामने आया वह चौंकाने वाला था। इसमें क्या आया, उससे पहले जानिए कि इस बीच क्या सब हुआ?

आजकल के डिज़ाइनर पत्रकारों को ऐसी ख़बरों को सांप्रदायिक रंग देने में आता है, जो सामान्य आपराधिक घटनाएँ होती हैं। चोरी-चकारी, आपसी विवाद और लूट तक की घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देने वाला मीडिया यह भूल रहा है कि इस चक्कर में ऐसी कई घटनाएँ मुख्यधारा का हिस्सा बन ही नहीं पातीं, जो असल में सांप्रदायिक होती है। जहाँ सम्प्रदाय, जाति और धर्म का कोई मामला ही नहीं हो वहाँ इसे जबरन जोड़ा जा रहा है, वहीं जहाँ सच में सांप्रदायिक वारदातें हो रही हैं, उसे छिपा दिया जा रहा है।

गौतम का बिना सोचे-समझे दिया गया गंभीर रिएक्शन

इस ट्रेंड की ख़ासियत यह है कि ध्रुव त्यागी की हत्या कर के मस्जिद भागने वाले आरोपित को लेकर तो कुछ नहीं कहा जाता लेकिन गुरुग्राम जैसी घटनाओं पर खुल कर बोला जाता है। गुरुग्राम की घटना में तमाम छानबीन का बाद पुलिस को जो पता चला, उसकी चर्चा करने से पहले जानते हैं कि इस बीच क्या सब हुआ? इस दौरान गौतम गंभीर ने 2 ट्वीट किए। इसमें उन्होंने भारत के सहिष्णु और धर्मनिरपेक्ष होने की दुहाई देते हुए ‘गुरुग्राम जैसी घटनाओं’ की निंदा करने की बात कही। गौतम को ये घटना अमेठी में भाजपा कार्यकर्ता की हत्या से भी ज्यादा गंभीर लगी। संसद में पीएम के ‘छपास और दिखास’ वाली सलाह को भूल चुके गंभीर ने अपने बयान को सही ठहराने के लिए मोदी के ही ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाले मन्त्र की दुहाई भी दी।

गौतम की इस गंभीर ग़लती पर लोगों ने उन्हें घेरा। अभी-अभी ईस्ट दिल्ली सीट से कॉन्ग्रेस नेता अरविंदर सिंह लवली और आम आदमी पार्टी की आतिशी को हरा कर संसद पहुँचे गंभीर से लोगों ने पूछा कि क्या जिस मामले पर वह कमेन्ट कर रहे हैं, उसकी तह तक वो गए हैं? क्योंकि, आज की मीडिया जिस तरह से ऐसे मामलों को रिपोर्ट करती है, बिना उसकी तह तक गए या उसके बारे में अतिरिक्त जानकारियाँ जुटाए, उसपर कमेन्ट कर देना लापरवाही नहीं है? ये मामला तब और गंभीर हो जाता है जब इसमें गौतम जैसे बड़े सेलेब्स फँस जाते हैं। गंभीर मीडिया के उसी जंजाल में फँसे, जिसे लेकर उन्हें व अन्य सांसदों को प्रधानमंत्री मोदी ने आगाह किया था। वो ख़ूब छपे, ख़ूब दिखे और सोशल मीडिया पर भी ख़ूब ट्रेंड हुए।

गौतम गंभीर से लोगों का यह पूछना लाजिमी था क्योंकि हाल के कुछ सालों में जिस भी घटना को सांप्रदायिक बोल कर मीडिया ने हंगामा किया, पत्रकारों ने भारत के असहिष्णु होने की बात कही, लिबरलों ने देश में नेगेटिविटी होने की बात कही और कथित सेकुलरों ने मुस्लिमों व अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की बात कही, वो घटनाएँ अंत में सांप्रदायिक नहीं निकलीं। ट्रेन में सीट को लेकर हुए विवाद में अगर किसी मुस्लिम की मौत हो गई, उसे भी सांप्रदायिक रंग दिया गया। एक लॉ छात्र ने मुस्लिम होने के कारण ख़ुद पर अन्य छात्रों द्वारा अत्याचार किए जाने की बात कही, बाद में यह भी झूठ निकली। 2016 में बरुन कश्यप नाम के निर्देशक ने आरोप लगाया कि उनके बैग को गाय की चमड़ी से बना समझ कर गौरक्षकों ने उन्हें धमकी दी। बाद में उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया कि हिन्दुओं से घृणा के कारण उन्होंने ख़ुद से यह कहानी गढ़ी।

गुरुग्राम की घटना का पूरा सच अब आया सामने

गौतम गंभीर सेलेब्रिटी हैं। उन्हें इन सब से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें तो ट्विटर पर कुछ फैंसी शब्दों का प्रयोग कर मीडिया में छपना है और दिखना है। इससे उनकी वाहवाही होगी, उनके बारे में लेख लिखे जाएँगे, उन्हें भाजपा के भातर रह कर भी सेक्युलर विचारधारा का वाहक बताया जाएगा इत्यादि-इत्यादि। गंभीर को भी इसी सेकुलर कीड़े ने काटा और कूल बनने के चक्कर में उनकी किरकिरी भी हुई। अब वापस गुरुग्राम की घटना पर आते हैं। पुलिस की छानबीन और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई के बाद पता चला कि न तो उक्त मुस्लिम युवक बरकत अली की इस्लामी स्कल कैप उछली गई और न ही उसकी शर्ट फाड़ी गई।

पुलिस ने साफ़-साफ़ कहा है कि यह कोई सांप्रदायिक घटना नहीं है बल्कि इसे जबरन सांप्रदायिक रंग दिया गया। पुलिस ऐसा यूँ ही नहीं कह रही, 15 लोगों की गिरफ़्तारी और 50 से भी अधिक सीसीटीवी खंगालने के बाद पुलिस ने यह निष्कर्ष निकाला। 24 घंटे तक पुलिस और प्रशासन द्वारा लगातार जाँच करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया। विडियो फुटेज के अनुसार, यह एक सामान्य मारपीट की घटना थी, जिसे पास ही झाड़ू लगा रहे किसी व्यक्ति ने देखा और बीच-बचाव किया। यह घटना शराब के नशे में अंजाम दी गई, जिसमें मारपीट तो हुई लेकिन इसमें कुछ भी सांप्रदायिक नहीं निकला।

अगर गौतम गंभीर ने सूरत अग्निकांड ट्रेजेडी को लेकर गुजरात सरकार पर निशाना साधा होता तो समझ में आता। अगर उन्होंने अमेठी में सुरेन्द्र हत्याकांड की निंदा की होती तो भी चलता, लेकिन उन्होंने सत्यता से परे एक ऐसी घटना को लेकर व्याख्यान दिया, जिसके कारण वह ख़ुद फँस गए। उक्त मुस्लिम युवक की टोपी को किसी ने हाथ तक नहीं लगाया था, ऐसा सीसीटीवी फुटेज में दिखा है। मारपीट के दौरान उसकी टोपी गिर गई, जिसके बाद उसनें उसे ख़ुद उठा कर अपने जेब में डाल लिया। लेकिन, मारपीट की इस घटना में इस्लामी स्कल कैप और ‘जय श्री राम’ का छौंक लगाते ही यह सांप्रदायिक घटना हो गई, जिसके आधार पर गिरोह विशेष ने मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल से भी जोड़ा।

केजरीवाल करेंगे अपनी JCB लेकर खुदाई शुरू, कहा- अटेंशन के साथ नहीं कर सकते कोई समझौता

लोकसभा चुनावों के बाद आम आदमी पार्टी अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एकदम सुस्त पड़ गए हैं। देखा जाए तो आराम करने और रिफ्रेशमेंट के लिए नरेंद्र मोदी को नहीं बल्कि अरविन्द केजरीवाल को केदारनाथ की गुफा में ध्यान लगाने के लिए भेजा जाना चाहिए था। लेकिन अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से जो निरंतर और पूर्ण मनोरंजन का राज्य बनाने का भरोसा दिलाया है, वो उस पर अडिग हैं।

दिल्ली को पूर्ण मनोरंजन दिलाने के लिए अरविन्द केजरीवाल ने कमर कसी ही थी कि नरेंद्र मोदी ने उनके काम में बाधा डालने के लिए एक और अड़ंगा डाल दिया, जिससे कि अरविन्द केजरीवाल को दिल्ली की जनता को पूर्ण मनोरंजन देने और बदले में सम्पूर्ण अटेंशन लेने में समस्या आने लगी है।

JCB को मिल रही है फुल TRP

सोशल मीडिया पर अचानक से जेसीबी की खुदाई ट्रेंड करता देख अरविन्द केजरीवाल के रोंगटे खड़े हो गए। जैसे ही उन्होंने सबसे हैंडसम व्यक्ति मनीष सिसोदिया से इस पूरे जेसीबी मामले की जानकारी माँगी, उन्हें पता चला कि मनीष सिसोदिया भी खुद निकटस्थ जेसीबी की खुदाई देखने निकल चुके हैं। यह देखकर अरविन्द केजरीवाल के आत्मसम्मान को बहुत ठेस लगी और उन्होंने आत्मचिंतन कर पता किया कि जनता जेसीबी की खुदाई में उनसे ज्यादा इंट्रेस्ट सिर्फ इसलिए ले रही है क्योंकि वो चुनाव में गठबंधन के लिए भीख माँगने की व्यस्तता के कारण
जनता को स्तरीय मनोरंजन देने में विफल रहे हैं और इसी वजह से उनका फैन बेस शिफ्ट होता जा रहा है।

चंदा माँगकर व्यक्तिगत JCB खरीदेंगे केजरीवाल

जनता का सारा ध्यान जेसीबी की ओर जाता हुआ देखकर अरविन्द केजरीवाल ने ऑनलाइन जनमत संग्रह करने का फैसला लिया, जिसमें किसी के भी भाग न लेने को ही जनता की “हाँ” समझकर अरविन्द केजरीवाल ने व्यक्तिगत जेसीबी खरीदने का निर्णय लिया और अंततः पार्टी कार्यकारिणी में तय किया गया कि इसके लिए वो जनता से चंदा भी माँगेंगे। लेकिन जब उनके व्यक्तिगत सलाहकार ने केजरीवाल को याद दिलाया कि “सर जी! जब रैपट खाने से ही चंदा नहीं आया तो फिर जेसीबी लेकर स्टंट दिखाने के लिए कैसे आएगा? वो भी जब हर गली-मोहल्ले में लोगों को फ्री में जेसीबी की खुदाई देखने को मिल जाती है तो फिर वो आपको चंदा देकर जेसीबी खरीदकर मारक मजा लेने आपके पास क्यों आएँगे?”

इस तथ्य की गंभीरता को समझकर अरविन्द केजरीवाल को थोड़ा सा निराशा जरूर हुई, लेकिन उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब उनसे JNU की फ्रीलांस प्रोटेस्टर और बलात्कार पीड़ितों के नाम पर चंदा इकठ्ठा कर के अकेले डकार जाने वाली हायब्रिड वामपंथ की डोमेस्टिक विचारक शेहला रशीद ने उनसे #मिशन_चंदा में सहयोग का वादा किया।

तीखी मिर्ची लिखे जाने तक आम आदमी वालंटियर्स और पार्ट टाइम वामपंथन शेहला रशीद के साथ कामरेड सड़कों पर लोगों से जेसीबी के आगे का पल्ला खरीदने लायक चंदा इकठ्ठा कर चुके थे। बाकी का चंदा उन्हें एक विश्वविद्यालय के छात्र ने अपनी स्कालरशिप देकर जुटाने की मदद की है, जिसके पीछे तर्क सिर्फ और सिर्फ पूंजीवादी बूर्जुआ जेसीबी के मनोरंजन पर एकाधिकार से जनता को निजात दिलाना बताया गया है।

मोदी जी ने नहीं दी खुदाई की परमिशन

अपनी व्यक्तिगत जेसीबी के माध्यम से जनता को पूरा मनोरंजन देकर सारी अटेंशन जुटाने के अरविन्द केजरीवाल के अरमानों को तब गहरा आघात लगा, जब उनकी यह फ़ाइल केंद्र सरकार द्वारा रोक दी गई और उन्हें अपनी व्यक्तिगत जेसीबी से खुदाई करने की इजाजत नहीं मिल पाई। गुस्साए अरविन्द केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर तुरंत इसमें सूँघकर मोदी और अमित शाह का हाथ बताते हुए खुलासा किया कि इस फ़ाइल को अनुमति न देने के पीछे भाजपा के इन्हीं दो नेताओं का हाथ है।

साथ ही, अरविन्द केजरीवाल ने बेहद भावुक कर देने वाले मार्मिक शब्दों में कहा, “मैं सिर्फ सड़कों पर लप्पड़ खाकर ही आखिर कब तक अटेंशन जुटाता रहूँगा? एक ओर स्वरोजगार का दिखावा करते हैं और दूसरी ओर मोदी जी चाहते हैं कि केजरीवाल के गाल रैपट खा-खाकर ही टेढ़े हो जाएँ और मैं मनोरंजन के नए आयाम न तलाश सकूँ ये किस तरह की राजनीति है?”

केजरीवाल के इस आरोप में उनके मशहूर ऑनलाइन ट्रोल और आँकड़ों यानी, फैक्ट एंड फिगर्स में बात करने वाले यूट्यूब एक्सपर्ट ध्रुव लाठी ने भी बताया कि मार्केट में ‘ऑलरेडी वन पॉइंट नाइन फाइव सिक्स हेक्सा डेसिमल‘ जेसीबी वर्किंग हैं जो मोदी जी ने विदेशी संस्थाओं के साथ टाई-अप कर के काम पर लगवाए हैं। इतने बड़े आँकड़ों को अंग्रेजी में इंटरनेट पर सुनने के बाद कई सोशल मीडिया विचारक और कॉन्सपिरेसी थ्योरी एक्टिविस्ट्स ने भी कहा है कि इतने बड़े आँकड़ों को अंग्रेजी में सुनने के बाद झूठा मानना बेवकूफी होगी।

इसके बाद केजरीवाल के वायदे के मुताबिक़, दिल्ली में चप्पे-चप्पे पर लगाए गए CCTV कैमरा के माध्यम से एक तस्वीर जारी हुई है। जिसमें व्यक्तिगत जेसीबी से खुदाई तो दूर, दूसरे किसी जेसीबी की खुदाई करते हुए देखने से केंद्र सरकार ने अरविन्द केजरीवाल को परमिशन देने से इंकार कर दिए जाने पर केजरीवाल की फूट-फूट कर रोती हुई एक दुर्लभ किन्तु मार्मिक तस्वीर सामने आई है।

फासिस्ट सरकार द्वारा जेसीबी खुदाई और दिखाई की अनुमति ना मिलने पर कार्यकर्ताओं द्वारा जबरन मौक़ा ए वारदात तक धरना देने के लिए अरविन्द केजरीवाल को उठाकर ले जाते हुए एकजुट आम आदमी कार्यकर्ता

बेटे के लिए 93 तो पार्टी के लिए सिर्फ़ 37 रैलियाँ: मुख्यमंत्री गहलोत से कॉन्ग्रेस आलाकमान नाराज़

राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। एक तरफ जहाँ प्रदेश के कृषि मंत्री अपना इस्तीफा देकर और फोन स्विच ऑफ कर के नैनीताल में मंदिरों के दर्शन को निकल भागे हैं, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे दिल्ली पहुँचे, जहाँ कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस अभी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व संकट से जूझ रही है और राहुल गाँधी सहित गाँधी परिवार के अन्य वफादार नेता लगातार बैठक कर रहे हैं। अभी हाल ही में ख़बर आई थी कि राहुल गाँधी ने अशोक गहलोत, पी चिदंबरम और कमलनाथ जैसे नेताओं को आड़े हाथों लिया।

राहुल गाँधी ने इन तीनों नेताओं को ‘पुत्र-प्रेम’ को पार्टी से ऊपर रखने का आरोप लगाया। राहुल गाँधी का मानना था कि अगर इन नेताओं ने अपने बेटों के क्षेत्रों में सारा समय खपाने की जगह पार्टी के चुनाव प्रचार पर ध्यान दिया होता तो शायद पार्टी को इतना नुकसान नहीं होता। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की रैलियों की पड़ताल करें तो आँकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। अशोक गहलोत ने कॉन्ग्रेस के लिए बाकी 24 सीटों पर जितनी मेहनत की, उसका ढाई गुना सिर्फ़ जोधपुर सीट को दिया क्योंकि उस सीट से उनके बेटे वैभव गहलोत चुनाव लड़ रहे थे।

जोधपुर अशोक गहलोत की पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। वह जोधपुर लोकसभा सीट को पाँच बार जीत चुके हैं। 1991, 1996 और 1998 लोकसभा चुनावों में उन्होंने इसी सीट से जीत की हैट्रिक लगाई थी। लेकिन, अब सब बदल गया है। रिपब्लिक टीवी की ख़बर के अनुसार, ताज़ा लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान गहलोत ने प्रदेश में कुल 130 रैलियाँ की, जिनमें से 93 रैलियाँ उन्होंने अकेले अपने बेटे वैभव के लिए कीं। अशोक गहलोत ख़ुद जोधपुर लोकसभा के अंतर्गत आने वाले सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। जोधपुर लोकसभा से 5 बार जीत चुके गहलोत ने सरदारपुरा विधानसभा से भी 5 बार जीत दर्ज की है।

इसी क्षेत्र में अब तक 10 चुनाव जीत चुके गहलोत की 93 रैलियों का कोई असर नहीं हुआ और उनके ख़ुद के ही विधानसभा क्षेत्र में उनके बेटे लीड नहीं ले सके। सरदारपुरा में वैभव गहलोत लगभग 18,000 मतों से पीछे छूट गए। मुख्यमंत्री के एक ही क्षेत्र में सीमित रह जाने का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा और पूरे राजस्थान में कॉन्ग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया। राज्य की सत्ताधारी पार्टी का इस तरह खाता भी न खोल पाना अशोक गहलोत के प्रति लोगों के असंतोष का भी परिचायक बना।

कुल मिलाकर देखें तो मुख्यमंत्री ने 71% रैलियाँ सिर्फ़ अपने बेटे के लिए की, बाकी की 29% रैलियाँ उन्होंने जोधपुर के अलावा अन्य क्षेत्रों में की। अब जब मंत्रियों द्वारा जवाबदेही तय करने की माँग की जा रही है, गहलोत पर दबाव बढ़ना तय है। जोधपुर में भाजपा उम्मीदवार गजेन्द्र सिंह शेखावत को 788888 मत मिले, वैभव गहलोत 514448 मत पाकर क़रीब पौने 3 लाख मतों से पीछे छूट गए। शेखावत को 58.6% मत मिले जबकि वैभव को कुल मतों का 38.21% हिस्सा ही मिल पाया। कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि अशोक गहलोत की इस मनमानी और लापरवाही के लिए पार्टी आलाकमान उन पर इस्तीफे का दबाव बना रहा है, जिसके लिए वह तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि राहुल उनसे नहीं मिले।

आँगनबाड़ी में रोज पढ़ने जाती है IAS की बेटी, राज्यपाल ने की सराहना

हम अक्सर देखते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपने बच्चे को बढ़िया से बढ़िया शिक्षा दिलवाने के लिए उसे प्राइवेट स्कूलों में भेजना उचित समझता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम मान चुके हैं कि हमारे समाज में सरकार द्वारा संचालित शिक्षा व्यवस्था चरमराई हालत में है। हम हाई क्लास लोगों के बच्चों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते देखते हैं तो मान लेते हैं कि सरकारी स्कूल उनके बच्चे में ये गुण विकसित नहीं कर पाएँगे।

ऐसी सोच के साथ जब हम चाहकर भी अपने बच्चे का एडमिशन प्राइवेट स्कूल में नहीं करवा पाते, तो खुद को कोसते हैं। ऐसे लोगों के लिए मध्य प्रदेश के डिस्ट्रिक्ट अधिकारी और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पंकज जैन एक उदाहरण होने चाहिए, जिन्होंने सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर यकीन जताया और अपनी बेटी का दाखिला किसी बड़े नर्सरी स्कूल की जगह आँगनबाड़ी में करवाया है।

मध्य प्रदेश के कटनी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पंकज जैन की बेटी का नाम पंखुड़ी है। वो हर रोज आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ने जाती हैं। जिसका श्रेय आईएएस अधिकारी पंकज जैन की सकारात्मक सोच को जाता है। वो चाहते तो अन्य अधिकारियों की तरह पंखुड़ी को भी किसी बड़े स्कूल में भेज सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

जिला मजिस्ट्रेट पंकज जैन का कहना है कि उनकी बेटी जिस आँगनबाड़ी में पढ़ने जाती है, उस केंद्र के अलावा वहाँ के चार-पाँच केंद्र किसी प्ले स्कूल से कम नहीं हैं। उनका कहना है कि जब कोई जिम्मेदार अधिकारी अपने बच्चों को ऐसे केंद्रों में भेजता है तो हालात अपने आप सुधरने लगते हैं। कोई कमी होने पर लोग इस पर खुद नज़र रख पाते हैं और सुधार लाने के लिए टोकते भी हैं।

पंकज जैन के इस कदम की जानकारी जब मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन को हुई तो उन्होंने आईएएस अधिकारी पंकज जैन को बधाई दी। राज्यपाल आनंदी बेन ने अपनी खुशी को जाहिर किया और उन्हें एक लेटर भी भेजा। इस पत्र में उन्होंने लिखा, “लोक सेवक समाज में प्रेरणा के केंद्र होते हैं, उनके आचरण का समाज पालन करता है। कर्तव्यों के प्रति आपकी सहजता ने मुझे काफी ज्यादा प्रभावित किया है, आपके इस प्रयास से शासकीय सेवकों का दायित्व बोध बढ़ेगा।”

पत्र में राज्यपाल ने आगे लिखा कि पंकज के इस कदम से सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी संचालन के प्रति सकारात्मक चेतना का संचार होगा। राज्यपाल ने मजिस्ट्रेट पंकज को शुभकामनाएँ दी और कहा कि आशा है वो लोकसेवा के रूप में इसी निष्ठा और समर्पण के साथ जनसेवा में लगे रहेंगे।

मध्य प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन का ये पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और हर जगह पंकज जैन के इस कदम को सराहना मिल रही है और उनकी तारीफ़ हो रही है।

CBI की रडार पर कमलनाथ के करीबी, दिग्विजय समेत 11 कॉन्ग्रेस प्रत्याशी की बढ़ सकती है मुश्किलें

आयकर विभाग ने अप्रैल में कमलनाथ के करीबियों के घर हुई छापेमारी के बाद इकट्ठा किए गए सबूत और उसकी रिपोर्ट सीबीआई को सौंप दी है। विभाग के इस कदम के बाद कमलनाथ के करीबियों की मुश्किलें बढ़नी तय है, क्योंकि इस मामले में बड़ी कार्रवाई हो सकती है। हालाँकि, कमलनाथ इस तरह के सभी आरोपों को खारिज कर चुके हैं। खबर के मुताबिक, आयकर विभाग ने चुनाव आयोग को जो सबूत और जाँच रिपोर्ट सौंपी है, वो हाल ही में खत्म हुए लोकसभा चुनाव के दौरान 11 कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों को कथित तौर पर भारी रकम ट्रांसफर किए जाने की ओर इशारा करती है। आरोप ये भी है कि ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी को ₹20 करोड़ की रकम का भुगतान किया गया।

बता दें कि, 7 अप्रैल, 2019 को जिन लोगों के यहाँ छापे मारे गए थे, उनमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ से जुड़े 5 लोग थे। आयकर विभाग ने जाँचकर्ताओं के बयान के साथ-साथ उनके अकाउंट को भी मिलाया है। इसके अलावा व्हाट्सएप चैट के जरिए पैसों के लेन-देन का भी पता लगाया गया है और साथ ही फोन पर की गई बातचीत भी रिकॉर्ड की गई है। इन पर आरोप है कि विभिन्न प्रत्याशियों के इस्तेमाल के लिए पैसे को डायवर्ट किया गया था। हालाँकि, फोन पर हुई बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट चुनाव आयोग के पास दाखिल नहीं किए गए हैं। चुनाव आयोग ने इस मामले में 4 मई को लिखित में सिफारिश की है कि इसमें सीबीआई जाँच की जाए।

जाँचकर्ताओं के रिकॉर्ड से पता चलता है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और इस बार भोपाल से चुनाव लड़ने वाले दिग्विजय सिंह उन प्रत्याशियों की सूची में शीर्ष पर हैं, जिन्हें तलाशी अभियान की जद में आए लोगों से चुनाव के लिए फंड मिले थे। आयकर विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, ये जानकारी ललित कुमार चलानी नामक शख्स के कम्प्यूटर से मिली है। ललित एक सीए हैं, जो कमलनाथ के पूर्व सहयोगी आरके मिगलानी और प्रवीण कक्कड़ के साथ काम कर चुके हैं।

ललित के जरिए कथित तौर पर लोकसभा प्रत्याशियों को 25 से 30 लाख रुपए की रकम दी गई। अकेले दिग्विजय सिंह को ही ₹90 लाख मिले। वहीं भुगतान से जुड़ी रसीदें महज दो मामलों में मिली हैं। पहली सतना से राजाराम प्रजापति और दूसरी बालाघाट से मधु भगत। इस मामले पर चुनाव आयोग का कहना है कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रत्याशियों ने जो खर्च किया है, उसका लेखा-जोखा जून के अंत तक आ जाएगा, जिसके बाद ही किसी तरह की कोई कार्रवाई की जाएगी।

जिन अन्य लोकसभा प्रत्याशियों को फंड मिलने का आरोप हैं, उनमें मंदसौर से मीनाक्षी नटराजन, मंडला से कमल माडवी, शहडोल से प्रमिला सिंह, सिद्धि से अजय सिंह राहुल, भिंड से देवाशीष जरारिया, होशंगाबाद से शैलेंद्र सिंह दीवान, खजुराहो से कविता सिंह नटिराजा और दामोह से प्रताप सिंह लोधी शामिल हैं।

इस मामले पर सीएम कमलनाथ ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा कि उनका इससे कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि ये मामला सीबीआई को भेजने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। आईटी विभाग के निष्कर्षों में यह भी आरोप है कि मध्यप्रदेश में सरकारी विभागें से बहुत बड़े पैमाने पर पैसा जुटाया गया। इस बारे में विस्तृत जानकारी कमलनाथ के पूर्व ओएसडी प्रवीण कक्कड़ के व्हॉट्सएप मैसेजों से मिले हैं।

इसके अनुसार, परिवहन विभाग के नाम पर 54.45 करोड़, एक्साइज विभाग के नाम पर 36.62 करोड़, खनन विभाग के नाम पर 5.50 करोड़, पीडब्ल्यूडी विभाग के नाम पर 5.20 करोड़ और सिंचाई विभाग के नाम पर 4 करोड़ रुपए कथित तौर पर ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी को ट्रांसफर किए गए। वहीं, चलानी के फोन से मिले सबूतों से पता चलता है कि ₹17 करोड़ कथित तौर पर ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी को ट्रांसफर किए गए थे। इन पैसों का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में होना था।