प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण का आधिकारिक समय गुरुवार (मई 30, 2019) को शाम 7 बजे तय किया गया है। राष्ट्रपति भवन के जयपुर गेट के पास आयोजित इस कार्यक्रम में 7000 लोगों के शिरकत करने की बात कही जा रही है। पश्चिम बंगाल में 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा ने इस बीच एक ऐसा निर्णय लिया है, जिससे पार्टी के कार्यकर्ताओं में अच्छा सन्देश जा रहा है। दरअसल, भाजपा ने बंगाल में चुनावों के दौरान हुई हिंसा में मारे गए कार्यकर्ताओं के परिवारों को भी शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्यौता दिया है।पश्चिम बंगाल में पिछले साल हुए पंचायत चुनाव और इस साल हुए लोकसभा चुनाव के दौरान कई भाजपा कार्यकर्ताओं की जानें गई हैं।
भाजपा ने उन कार्यकर्ताओं को सम्मान देने का निर्णय लेते हुए उनके परिवारों को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया है। इन कार्यकर्ताओं के परिवारों को भाजपा पदाधिकारियों की देखरेख में ट्रेन से दिल्ली लाया जाएगा। ये पदाधिकारी दिल्ली में भी इन लोगों का ख्याल रखेंगे। जिन कार्यकर्ताओं के परिवारों को आमंत्रित किया गया है, उनमें से 46 ऐसे हैं, जो पिछले वर्ष हुए पंचायत चुनावों के दौरान हुई राजनीतिक हिंसा में मारे गए थे। इनमें 5 ताज़ा लोकसभा चुनाव के दौरान हुई हिंसा में मारे गए कार्यकर्ताओं के परिवार हैं। दिल्ली में इन परिवारों के ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था भी पार्टी ही कर रही है।
मारे गए कार्यकर्ताओं में से अधिकतर बैरकपुर, कृष्णानगर, नदिया, पुरुलिया, मालदा, बाँकुरा, मिदनापुर, झरगाम और वीरभूम के रहने वाले थे। इनमें से कुछ कार्यकर्ताओं के परिवारों ने दिल्ली भाजपा मुख्यालय आकर अपनी पूरी आपबीती सुनाई थी। उन्होंने बताया था कि कैसे वह अब भी डर के साए में जी रहे हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस क़दम से पार्टी अपने कार्यकर्ताओं व उनकी परिवारों को यह सन्देश देना चाहती है कि उन्हें डरने की ज़रूरत नहीं है, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उनके सुख-दुःख में साथ खड़ा है। भाजपा लगातार कहती आ रही है कि 2018 में हुए पंचायत चुनाव से लेकर अब तक बंगाल में उनके 68 कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं।
पिछले वर्ष हुए पंचायत चुनाव में 20,000 सीटों पर तृणमूल के प्रत्याशी निर्विरोध जीत गए थे। इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था और पार्टी को मात्र 2 सीटें आई थीं। उस चुनाव में राज्य में भाजपा का वोट शेयर 17% था। लेकिन, 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीत कर सबको चौंका दिया है। इस वर्ष पार्टी का वोट शेयर भी बढ़ कर 40% के क़रीब पहुँच गया है। मृत कार्यकर्ताओं के परिवारों का इस समारोह में शामिल होना इसीलिए भी अहम है क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसमें शामिल होने वाली हैं।
तृणमूल सुप्रीमो ने कहा कि उन्होंने अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की है और वे सभी पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने वाले हैं। उन्होंने कहा कि चूँकि यह एक समारोह है, इसमें वह जाएँगी। बता दें कि चुनाव के दौरान ममता ने कहा था कि फ़ोनी तूफ़ान के लिए वह मोदी से इसीलिए नहीं मिलीं क्योंकि वह उन्हें प्रधानमंत्री नहीं मानतीं। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और ममता बनर्जी के बीच बड़ी खींचतान देखने को मिली।
केरल के कन्नूर से सांसद रहे एपी अब्दुल्लाकुट्टी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ़ की है। उन्होंने पीएम मोदी द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा में एक फेसबुक पोस्ट किया। इसके बाद नाराज़ कॉन्ग्रेस पार्टी ने उनसे स्पष्टीकरण माँगा है। अब्दुल्लाकुट्टी ने लिखा कि ताज़ा लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत आम जनता के बीच पीएम मोदी की विकास योजनाओं की स्वीकार्यता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की सफलता का सबसे बड़ा राज उनकी गाँधीवादी विचारधारा है, जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। इसके अलावा उन्होंने मोदी की स्वच्छ भारत योजना की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि इससे शहर, गाँव व कस्बों में साफ़-सफाई हुई है, कई टॉयलेट्स बने हैं और लोगों को खुले में शौच से मुक्ति मिली है।
अब्दुल्लाकुट्टी कन्नूर लोकसभा क्षेत्र से 2 बार जीत दर्ज कर चुके हैं। इसके अलावा वह कन्नूर विधानसभा क्षेत्र से विधायक भी रह चुके हैं। जानने वाली बात यह है कि कुछ वर्षों पहले तक सीपीएम में रहे अब्दुल्लाकुट्टी को पार्टी ने इसीलिए निकाल दिया था क्योंकि उस समय भी उन्होंने नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की थी। उन्हें 2009 में सीपीएम ने पार्टी का अनुशासन भंग करने का आरोप लगा कर निकाल दिया था। मोदी उस वक़्त गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अब्दुल्लाकुट्टी ने मोदी को लेकर मीडिया पर पक्षपाती होने का भी आरोप लगाया। पूर्व सांसद ने कहा कि मीडिया व राजनीतिक विशेषज्ञों ने पक्षपाती रवैये से मोदी की जीत का विश्लेषण किया है।
2009 में गुजरात मॉडल की प्रशंसा करने वाले अब्दुल्लाकुट्टी ने अब कहा है कि राजनीतिक विश्लेषकों व नेताओं को पीएम मोदी की आलोचना करते वक़्त कुछ वास्तविकताएँ ध्यान में रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मोदी ने 9.16 करोड़ परिवारों को टॉयलेट्स की सुविधा उपलब्ध कराई और 6 करोड़ परिवारों को एलपीजी गैस कनेक्शन भी दिए। गाँधीजी को याद करते हुए अब्दुल्लाकुट्टी ने बताया, “हमारे राष्ट्रपिता ने कहा था कि किसी भी योजना की रूपरेखा तैयार करने से पहले यह सोचना ज़रूरी है कि इससे सबसे ग़रीब व्यक्ति को क्या लाभ पहुँचेगा? मोदी ने इसे काफ़ी अच्छी तरह से वास्तविकता का रूप दिया है।“
Kerala Congress leader AP Abdullakutty has courted controversy by praising #PMModi for the massive victory in #LokSabhaElections2019. He also said the secret of PM’s success was that he had adopted Gandhian values.https://t.co/7vbQ5ID8fj
— The New Indian Express (@NewIndianXpress) May 28, 2019
अब्दुल्लाकुट्टी ने स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन सहित मोदी की कई ड्रीम योजनाओं की तारीफ की। केरल कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने कहा कि उनके ख़िलाफ़ मज़बूत एक्शन लिया जाएगा और उन्हें नोटिस भेज दिया गया है। केरल में कॉन्ग्रेस के नव निर्वाचित सांसद के मुरलीधरन ने कहा कि किसी कॉन्ग्रेस के व्यक्ति द्वारा पीएम मोदी की प्रशंसा करना अस्वीकार्य है और ग़लत है। वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने कहा इस मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता। सीपीएम ने भी अब्दुल्लाकुट्टी के इस बयान पर तंज कसा है।
केरल यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और नव निर्वाचित सांसद डीन कुरिआकोसे ने भी अब्दुल्लाकुट्टी के इस बयान का विरोध किया। कई नेताओं ने कहा कि अब्दुल्लाकुट्टी को कॉन्ग्रेस में लेकर आने वाले नेताओं को भी जवाब देना चाहिए। एक अन्य नव निर्वाचित सांसद राजमोहन उन्नीथन ने कहा कि अब्दुल्लाकुट्टी कभी भी पार्टी के प्रति वफादार नहीं रहे हैं और वो अपने लिए बेहतर मौके की तलाश में हैं। केरल में कॉन्ग्रेस की जीत के बावजूद इस तरह के बयान आना पीएम मोदी की पैन इंडिया लोकप्रियता को दर्शाता है।
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के समर्थकों द्वारा दलितों की पिटाई किए जाने की बात सामने आई है। अमर उजाला में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, मैनपुरी के नगला मान्धाता गाँव में यह घटना हुई। बता दें कि सपा के संस्थापक और संरक्षक मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कर्मभूमि मुख्य रूप से मैनपुरी ही रही है और वह यहाँ से 5 लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर चुके हैं। पिछली लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने यहाँ से जीत दर्ज की थी लेकिन 2 सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी थी। मुलायम ने ताज़ा लोकसभा चुनाव में भी यहाँ से जीत दर्ज की है। इसके बाद इलाक़े में यादवों की गुंडागर्दी शुरू हो गई है।
ग्राम पंचायत उनवा संतोषपुर के मजरा उनवा निवासी प्रेम सिंह सोमवार (मई 27, 2019) को खेतों में जानवर चराने गए थे। उनके पिता का नाम रामदास है। उनके साथ उनके परिवार का एक बच्चा भी था। उसी दिन शाम 4 बजे प्यास लगने पर वे एक ट्यूबवेल पर पानी पीने चले गए। यह ट्यूबवेल गाँव के किसी यादव की है। एक दलित को अपने ट्यूबवेल पर पानी पीते देख भड़के यादवों ने प्रेम सिंह को धमकाया। यादवों ने कहा “एक तो तुम लोगों ने लोकसभा चुनाव में महागठबंधन प्रत्याशी को वोट नहीं दिया और ऊपर से हमारे ही ट्यूबवेल में पानी पीते हो।” इसके बाद प्रेम सिंह के साथ मारपीट की गई। बच्चे को भी नहीं बख्शा गया।
जब वे अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुँचे तो पुलिस ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद जब प्रेमसिंह का भतीजा रिंकू उर्फ फौजी मंगलवार की सुबह क़रीब 8 बजे ट्यूबवेल के पास खेत में भूसा उठाने गया, तब यादवों ने उस पर भी हमला बोल दिया। जब शोर सुनकर रिंकू के घर के लोग पहुँचे तो हमलावरों ने उन सबकी लाठी-डंडे से पिटाई की। इतना ही नहीं, दहशत फैलाने के लिए हवाई फायरिंग भी की गई। पीड़ित पक्ष ने 100 नंबर पर पुलिस को सूचना दे दी। इसके कुछ देर बाद 100 नंबर वाली और चौबिया थाना पुलिस मौके पर पहुँची।
हमलावर अभी तक पुलिस की गिरफ़्त में नहीं आए हैं। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर उन्हें खदेड़ा लेकिन वे कई किलोमीटर तक भागने के बाद निकल गए। घायल रिंकू बीएसफ जवान है और उसके पिता का नाम रामनरेश है।मारपीट में प्रेम सिंह की पत्नी सीता देवी, गुलाब सिंह पुत्र लज्जाराम, उनकी पत्नी बीनू देवी, शशि पत्नी सुखबीर सिंह घायल हो गए। कहा जा रहा है कि जिस गाँव में प्रेम और रिंकू रहते हैं, उस गाँव में स्थित बूथ पर मुलायम सिंह यादव को कम वोट पड़े थे, यही यादवों की बौखलाहट का कारण है। यहाँ तक की दलित महिलाओं से भी मारपीट की गई, जिसमें कई महिला एवं पुरुष घायल हुए।
मैनपुरी में इस घटना के बाद लगातार तनाव बना हुआ है। दलितों की शिकायत पर पुलिस आगे की कारवाई करने में लगी हुई है। जिस तरह से दलितों, महिलाओं और यहाँ तक की बीएसएफ जवान तक को अपनी गुंडागर्दी का शिकार बनाया गया, उसे लेकर दलित समाज में आक्रोश है।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो मिला है। एक ईसाई कोयंबटोर स्थित सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन के प्रांगण में स्थापित आदियोगी शिव की प्रतिमा के आगे जाता है और वहाँ भगवन शिव का दर्शन और उन्हें नमन कर रहे हिन्दू भक्तों से चिल्ला कर तमिल में कुछ कहता है, जिसमें से मुझे खुद केवल एक शब्द समझ में आया- येसु। तमिल मित्रों को पूछा तो पता चला कि वह कह रहा है, “ध्यान से सुनो, सब लोग। योग, योगी या साँप इंसानों को नहीं बचा सकते। येसु ने तुम्हारे लिए खून बहा दिया। मैं अपना संदेश हिंदुस्तान को और इस प्रतिमा का अनावरण करने वाले पीएम को दे रहा हूँ। केवल येसु इंसानों के पापों को साफ कर सकता है। येसु, कृपया इंसानों की आँखें खोलो और हिंदुस्तान को बचाओ।”
स्कूलों में सुना था, मंदिर में, आश्रम में उम्मीद नहीं थी
यह पहली बार नहीं सुना है कि ‘तुम्हारे भगवान नकली हैं, इनसे कुछ नहीं होने वाला’, ‘सब मूर्ति-वूर्ति अन्धविश्वास है’, ‘आँख बंद करके बैठने (ध्यान मुद्रा) या शरीर ऐंठने (हठ योग) से क्या होता है? ऐसे भला शरीर ठीक हो सकता है?’, ‘येसु ही असली परमेश्वर हैं’- कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने से यह सब गाहे-बगाहे सुनने को मिल ही जाता था। वह भी इतने आहिस्ते-आहिस्ते हिन्दूफ़ोबिया का जहर भरा जाता था कि पता ही नहीं चलता था कब तर्क और विज्ञान पढ़ते-पढ़ते हम हिन्दुओं के तिलक-पूजा-तंत्र से लेकर राम-कृष्ण-पुनर्जन्म-योग सभी को एक झाड़ू से बकवास मानकर बुहारने लगते थे।
लेकिन वह स्कूल ‘उनका इलाका’ था- उनकी मर्जी जो पढ़ाएँ; हमारी गलती थी, हमारे माँ-बाप की गलती थी, हिन्दू समाज की गलती थी कि मिशनरियों जैसे उच्च-गुणवत्ता की शिक्षा तुलनात्मक रूप से कम दाम में मुहैया करने वाले स्कूल उतनी तादाद में नहीं खुले जितना होना चाहिए था। पर यह मामला वह नहीं है- यहाँ हमारे पवित्र, धार्मिक स्थल में आकर, हमारे गुरु के आश्रम में, हमारे महादेव की मूर्ति के सामने उसे फर्जी कहा जा रहा है। और बोलने वाले के हावभाव से साफ़ है कि वह अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त है- पता है उसे किसी ने टोक भी दिया तो पत्रकारिता का समुदाय विशेष “ऑल रिलीजंस आर ईक्वल” से लेकर “हिन्दू फासीवाद फैलना चालू; बेचारे मिशनरी को हिन्दू ‘पर्यटन’ स्थलों पर अपना प्रचार नहीं करने दिया जा रहा” का नाटक शुरू करने के लिए गिद्ध की तरह बैठा ही है।
कहाँ से आती है इतनी हिम्मत? कहाँ से आता है इतना दुस्साहस कि किसी के धार्मिक स्थल पर घुस कर उनके धर्म को नकली कहा जाए, उसका मजाक उड़ाया जाए? और कहीं से नहीं, हमारी तथाकथित ‘सेक्युलर’ व्यवस्था से ही, जहाँ हिन्दुओं के मंदिरों को सरकारें हड़प कर उनके खजाने निगल सकती हैं और अपने साहबों की सुविधा से मंदिर की परम्पराओं को बदल सकतीं हैं। जहाँ अदालत देश की लगभग 80% आबादी को बताती है कि उनकी परम्पराओं के लिए संविधान में सुरक्षा नहीं है, वह अनुच्छेद 25-30 केवल अल्पसंख्यकों को देते हैं ,जहाँ मीडिया गिरोह हिन्दुओं को Characterological Evil (चरित्र से ही बुरे, और ‘सुधार’ की सर्वथा आवश्यकता में) के रूप में प्रचारित करते हैं, जहाँ हिन्दुओं की आस्था और परम्परा से नफरत, उसका अपमान ‘प्रगतिशीलता’ की पहली शर्त है, और उनके सम्मान की बात भर करना आपको ‘कम्युनल’, ‘फासिस्ट’ और न जाने क्या-क्या बना देता है। यह दुस्साहस ऐसे ही हिन्दूफ़ोबिक ‘इकोसिस्टम’ से आता है।
मिशनरी की साम्राज्यवादी भाषा
इस मिशनरी की भाषा पर अगर गौर करें तो यह वही बोली बोल रहा है जो हिंदुस्तान को 190 साल अपने बूटों के तले रौंदने वाले अंग्रेज बोलते थे। और उनके संरक्षण में यहाँ की स्थानीय संस्कृति को लील लेने वाले मिशनरी पादरियों की यह बोली थी। हिंदुस्तान को (केवल) “साँप-मदारियों का देश” बताना महज नस्ली या चमड़ी के रंग पर आधारित नहीं, मज़हबी, पंथिक प्रपोगंडा था; वाइट सुप्रीमेसी की जड़ ईसाईयत में ही हैं- और यह वाइट क्रिश्चियन सुप्रीमेसी है। आज ईसाईयत दुनिया फैला लेने के बाद यह क्रिश्चियन सुप्रीमेसी है। इनके लिए हम हिन्दू हमेशा नरकोन्मुख अभिशप्त लोग होंगे, और हमें अपमानित कर, प्रताड़ित कर, भेदभाव कर भी ‘बचाना’ इनका “पवित्र कर्तव्य”- जैसे पिछली सदी में चमड़ी के पीछे छिपा वाइट मैन्स बर्डेन था, इस सदी में खुल कर क्रिश्चियन मैन्स बर्डेन है कि हम बेचारे हिन्दुओं को मूर्ति-पूजा के पाप से बचाएँ।
हमारी संस्कृति का हमारे विरुद्ध प्रयोग, साथ देने में हिन्दू भी कम नहीं
एक ओर ईसाईयत का मूल आधार ही मूर्ति-पूजा और देवताओं की अवैधता है, मूर्ति और देवता के पूजकों को कयामत के दिन नर्क में भेजने का ईसा का वादा है, दूसरी ओर ईसाई अपना पंथ हिंदुस्तान में फ़ैलाने के लिए हमारी संस्कृति और हमारे देवताओं के प्रयोग से पीछे नहीं रहते। नीचे कुछ ऐसी ही तस्वीरें हैं जिनमें ईसा मसीह को तो हिन्दू देवताओं मुरुगन (कार्तिकेय), दक्षिणमूर्ति शिव, देवी इत्यादि के रूप में दिखाया गया है, देवताओं का साथी (यानि “बस एक और देवता”) दिखाया गया है, ईसाई मिथक (माइथोलोजी) में घटी घटनाओं को हिन्दू शृंगार, रूप आदि दिए हैं- यानि ईसाईयत के आईने में हिन्दुओं को उतारने के लिए पिछले दरवाजा बनाया गया है। अधिकाँश चित्र स्वराज्य के लेख से हैं, बाकी गूगल पर “jesus appropriation” इमेज सर्च कर पाए जा सकते हैं।
उनका साथ देने में हिन्दू (या शायद हिन्दू नामधारी छद्म-हिन्दू?) भी पीछे नहीं हैं। कर्नाटक संगीत के मशहूर गायक टीएम कृष्णा को इस विकृत सेक्युलरिज्म के कीड़े ने ऐसा काटा कि वह चर्चों में घूम-घूमकर श्री राम की वंदना और प्रशंसा में लिखे गए त्यागराजा, मुत्तुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री के कीर्तनों को जीसस घुसेड़ कर गाने लगे। विरोध बढ़ा तो उन्होंने संघ परिवार के बहाने हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए घोषणा कर दी कि अब तो हर महीने जीसस और अल्लाह के लिए एक कर्नाटक संगीत का भजन जारी होगा।
तिस पर भी मानसिक ही नहीं आत्मा के स्तर तक से दिवालिया कुछ लोग इसे हिन्दुओं का ही दूसरे मतों के पवित्र प्रतीकों को ‘हड़पना’ बताने में लगे हैं।
सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं पर थोपी गई इस विकृत विचारधारा का अंत जरूरी है। आखिर हिन्दू ही क्यों पंथ-निरपेक्षता को ढोएँ? जिन्हें लगता है कि कभी-न-कभी दूसरे समुदाय (विशेष तौर पर अब्राहमी इस्लाम और ईसाईयत) हमें पलट के सम्मान देंगे, उनकी जानकारी के लिए ईशा फाउंडेशन के इस योग मंदिर के बाहर ॐ और सिखों के पवित्र चिह्न के अलावा ईसाई क्रॉस, समुदाय विशेष का चाँद सितारा भी बने हैं। उसके बावजूद जग्गी वासुदेव को आदियोगी प्रतिमा बनाने से लेकर उसका मोदी से अनावरण कराने तक हर कदम पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार हुआ- उनकी जमीन को आदिवासियों से हड़पी हुई बताया गया (जबकि उन्होंने दस्तावेज सामने रखकर जब चुनौती दी तो सब गायब हो गए), उन्हें मोदी के तलवे चाटने वाला बताया गया, जेएनयू में उनकी मौजूदगी के खिलाफ प्रपोगंडा हुआ और अब उनके ही आश्रम में उनके इष्ट देवता का अपमान हुआ है।
जरा सोचकर देखिए कि किसी चर्च या मस्जिद में अगर कोई हिन्दू ईसा या मोहम्मद पर सवाल भर पूछ दे तो लिबरल मीडिया गिरोह कितने दिन बवाल काटेगा? फिर यह सोचकर देखिए कि इसी मिशनरी ने अगर किसी मस्जिद, मजार या किसी मुस्लिम-बहुल इलाके में भी उनके मज़हब और पैगंबर का अपमान किया होता तो उसका क्या हाल होता? हिन्दुओं का भी धैर्य अंतिम छोर पर है- परीक्षा कम ही हो तो बेहतर होगा…
दी लल्लनटॉप की हालत देखकर बचपन की याद आती है, जब मेले में शाम ढलते ही आइसक्रीम, खिलौनों, चूड़ियों और मिठाई वाला चिल्लाता था – “बिक गया माल” और इस ‘बिक गया माल’ में वो 1 आइसक्रीम माँगने वाले को भी अपना सारा बचा हुआ स्टॉक भी थमाकर बस किसी भी तरह से वहाँ से भाग जाना चाहता था।
फेकिंग न्यूज़ की एक खबर का फैक्ट चेक किए हुए अभी महीना भी नहीं बीता था कि हिटलर के लिंग की नाप-छाप रखने वाला और महिलाओं की योनि में कसाव पर ‘गद्य’ लिखने वाले ‘दी लल्लनटॉप’ नामक पत्रकारिता के संक्रामक रोग ने एक नया कीर्तिमान रचा है। इस बार अपने पाठकों को मारक मजा देने की कसम को निभाते हुए दी लल्लनटॉप ने बहुत ही चतुराई से फेकिंग न्यूज़ की खबर का फैक्ट चेक तो नहीं किया लेकिन ‘वायरल’ ख़बरों के कच्चे माल के अभाव में एक ऐसी वेबसाइट की खबर का फैक्ट चेक किया जो व्यंग्य लेख लिखती है। इस वेबसाइट का नाम है ‘द फॉक्सी।’
सितंबर 12, 2018 को द फाक्सी द्वारा प्रकाशित किया गया यह व्यंग्य लेख फ़ूड ब्लॉगर्स पर लिखा गया था। लेकिन द फॉक्सी को तब शायद यह विचार नहीं आया होगा कि जर्नलिज़्म में दी लल्लनटॉप नाम की मीडिया गिरोहों की इस घातक टुकड़ी ने अपने पाठकों की तार्किक क्षमता को हल्के में लेकर मारक मजा देने की कसम खा रखी है।
फैक्ट चेक के लिए बाजार जब कोई खबर ना हो तो लल्लनटॉप और उन्हीं की तरह की एक विचाधारा रखने वाले स्टाकर से फैक्ट चेकर बने ऑल्ट न्यूज़ ने यह सबसे आसान तरीका बना लिया है कि फेकिंग न्यूज़ का ही फैक्ट चेक कर के जीवनयापन किया जाए। वैसे भी चुनाव नतीजों से हतोत्साहित दी लल्लनटॉप को फैक्ट चेक के नाम पर गोभी के पत्तों में कीड़ों तक को ढूँढता हुआ भी देखा गया है।
क्या है मामला?
हास्य-व्यंग्य लिखने वाली वेबसाइट द फॉक्सी ने अपनी वेबसाइट पर सितंबर 12, 2018 को एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था – “Delhi Police Arrests Food Blogger; Accused Of Enjoying Meals Without Even Having A Food Blog” यानी, दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया, जो अपने आप को फ़ूड ब्लॉगर बताकर कैफे और रेस्टॉरेंट्स से फ्री में खाना खाता था, जबकि उसका कोई फ़ूड ब्लॉग था ही नहीं।
Delhi Police Arrests Food Blogger; Accused Of Enjoying Meals Without Even Having A Food Blog https://t.co/dHZOo0PlGN
इस हेडलाइन को देखकर ही प्रथमद्रष्ट्या यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई व्यंग्य होगा। लेकिन जब बात ‘दी लल्लनटॉप’ की आती है तो मामला जरा दूसरा हो जाता है। दी लल्लनटॉप ने इस हेडलाइन को चुनाव के बाद समय निकालकर बेहद मार्मिक तरीके से इसका फैक्ट चेक अपने कर्मचारी से करवाया और फिर उसे यह यूट्यूब पर पढ़वाया भी गया क्योंकि अगर पकड़े भी गए तो दी लल्लनटॉप शायद जानता है कि जवाब में अपने पाठकों को ‘ही ही ही’ कर के अपनी विश्वसनीयता साबित कर सकता है और साहित्यिक तरीके से अपने पाठक को वो कसम याद दिला सकता है, जिसमें उन्हें मारक मजा दिलवाने की अटूट कसम खाई थी।
लगभग नौ महीने पुरानी इस फेकिंग न्यूज़ को दी लल्लनटॉप ने गंभीरता से लेते हुए इसे यूट्यूब पर भी बेचकर अपने पाठकों को जमकर उल्लू बनाया है। द फॉक्सी द्वारा अपने लेख में लिखे गए काल्पनिक नाम, स्वाति आदि को बेहद मार्मिक तरीके से दी लल्लनटॉप ने पड़ताल करते हुए अंत में निष्कर्ष भी निकालते हुए बताया कि इस फ़ूड ब्लॉगर को ऐसा करने के लिए जेल भी हुई।
निम्न तस्वीरों में आप ‘फैक्ट चेक’ की निर्मम हत्या होते हुए अपनी नग्न आँखों से देख सकते हैं
फैक्ट चेक हम शर्मिंदा हैंओह !! बेहद क्रिएटिव था, हालाँकि महँगा पड़ा। ही ही ही …खोजी स्तर – जेम्स बॉन्ड तृतीय
बता दें कि दी लल्लनटॉप में ऐसा चलता रहता है। अक्सर इन्हें ट्रैफिक जुटाने के लिए MEME बनाने वाले पेजों पर 10 पेजों के गद्य लिखते हुए भी पाया जाता है, जिसमें किसी न किसी तरीके से ये ब्राह्मणवाद से लेकर पितृसत्ता और मनुवाद को ठूँसकर ज्ञान देते हुए पाए जाते हैं। इसी तरह से हाल ही में दी लल्लनटॉप ने फेकिंग न्यूज़ की भी एक खबर का फैक्ट चेक किया था और अपने पाठकों को समझाया था कि यह फेकिंग न्यूज़ उन्हें फेक लगी इसलिए इसका फैक्ट चेक किया गया।
इसी तरह से गाड़ियों पर EVM भरकर ले जाने का भी झूठ दी लल्लनटॉप ने जमकर बेचा लेकिन फिर भी राहुल गाँधी की EVM हैक होने से नहीं रोक पाए। यह मीडिया का इतना बेशर्म पहलू है कि स्पष्टीकरण के बाद भी दी लल्लनटॉप के द्वारा यह खबर सोशल मीडिया से लेकर बाकायदा यूट्यूब तक पर दिखाकर जमकर भ्रांतियाँ, अफवाह और फेक न्यूज़ फैलाई गई।
हमारी सलाह
दी लल्लनटॉप को एवेंजर्स से समय में पीछे जाने वाली मशीन लाकर हिटलर और तमाम समकालीन लोगों के अंग विशेष की नाप-छाप पर ही ध्यान देना चाहिए और इस फैक्ट चेक के टंटे में नहीं पड़ना चाहिए। या फिर अपना नाम भी फेकिंग न्यूज़ वर्जन 2.0 कर लेना चाहिए। फिर भी अगर समय बिताने के लिए कुछ काम करना ही हो तो जेसीबी की खुदाई देखकर जीवनयापन कर सकते हैं। यदि हिटलर के लिंग की नाप रखने से दी लल्लनटॉप को फुरसत मिले, तो उसे समय निकालकर नरेंद्र मोदी द्वारा जारी की गई कुछ योजनाओं का लाभ भी उठाना चाहिए, (यदि नरेंद्र मोदी की योजनाओं को इस्तेमाल करने में उन्हें कोई आपत्ति ना हो तभी) और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना द्वारा कुछ लोन लेकर स्वरोजगार की राह अपनानी चाहिए। लोन के लिए अप्लाई करने की विस्तृत प्रक्रिया इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।
अभी हटा ली वीडिओ और अपडेट कर दिया आर्टिकल
हालाँकि, अब लल्लनटॉप ने विडियो हटा दिया है और आर्टिकल को भी अपडेट किया है। लेकिन, मूर्खता पकड़े जाने पर भी उन्होंने अपनी प्रकृति नहीं त्यागी और खुद को दोष देने की जगह फेक न्यूज़ के फैलाव पर दोष मढ़ा। जो लोग meme तक के फैक्ट चेक करते हों, उनके द्वारा ऐसा लंगड़ा कुतर्क रखना ठगी ही है। आप भी मूर्खतापूर्ण ‘नोट’ को यहाँ पढ़ लीजिए कि अपने आलस्य से इन्होंने न सिर्फ सितम्बर 2018 की ‘ख़बर’ का फैक्ट चेक किया बल्कि, ये भी नहीं देखा कि जब फैक्ट चेक कर रहे हैं तो कम से कम उसका उद्गम तो जान लें। फैक्ट चेक के समय तो आम लेख से कहीं ज्यादा सतर्कता होनी चाहिए, लेकिन लल्लनटॉप को क्या, वो तो मारक मज़ा देते हैं।
खेद प्रकट करते हुए भी दे दिया मारक मज़ा लल्लनटॉप का वो मार्मिक वीडियो, जिसकी वजह से फैक्ट चेक समाज में उनकी निंदा हो रही है जादू देखोगे ? – एक… दो …तीन… आया मारक मज्जा?क्या दी लल्लनटॉप ने आदित्य के पास जाकर उसे बताया कि उन्होंने आदित्य की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है?
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं। उन्होंने पिछले दिनों हुई कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में इस्तीफे की पेशकश भी की थी, मगर उसे नामंजूर कर दिया गया। इसके बावजूद राहुल गाँधी इस्तीफा देने की जिद पकड़े हुए हैं और तमाम कॉन्ग्रेसी नेता उन्हें मनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। इसी बीच भाजपा नेता हिमांत विश्व शर्मा ने इस पर चुटकी ली है। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी का अध्यक्ष पद पर बने रहना भाजपा के लिए अच्छा है, मगर लोकतंत्र के लिए नहीं। उनका कहना है कि जीवंत लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना बेहद जरूरी होता है।
14 साल तक कॉन्ग्रेस में रहने के बाद 2015 में भाजपा में शामिल हुए नेता हिमांत ने कहा, “अगर राहुल गाँधी अध्यक्ष पद पर बने रहते हैं, तो विपक्ष के लिए कोई उम्मीद नहीं है, मगर यदि भाजपा के नजरिए से देखें, तो अगर राहुल गाँधी अगले 50 वर्षों तक अध्यक्ष रहेंगे, तो हमें खुशी होगी।” इसके साथ ही उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के लिए एक जीवंत विपक्ष की आवश्यकता होती है, और जब तक राहुल गाँधी विपक्ष और कॉन्ग्रेस का चेहरा हैं, ऐसा होना संभव नहीं है। यदि विपक्ष के चेहरे के रूप में राहुल गाँधी न हो तो इसकी संभावना है कि आने वाले दिनों में एक उभरता हुआ जीवंत विपक्ष देखने को मिले।
बता दें कि, हिमांत विश्व शर्मा ने पूर्वोत्तर के लिए भाजपा की रणनीति को तैयार किया था जिससे पार्टी को सभी सात राज्यों में जीत हासिल करने में मदद मिली। असम में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने विपक्षी कॉन्ग्रेस पर स्पष्ट बढ़त ले ली थी और जून में खाली हो रही दो राज्यसभा सीटों को जीतने की उम्मीद की थी। इनमें से एक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सीट भी है।
गौरतलब है कि, हिमांत विश्व शर्मा ने रविवार (मई 26, 2019) को कहा कि भाजपा और उसके सहयोगी असोम गण परिषद (एजीपी) 14 जून को खाली होने वाले दो राज्यसभा सीटों के लिए एक-एक उम्मीदवार उतारेगी। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्रीय मंत्री और लोजपा नेता रामविलास पासवान को असम से राज्य सभा की सीट मिल सकती है। रामविलास पासवान ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा था।
‘कामसूत्र 3डी’, ‘फॉर अडल्ट्स ओनली’ जैसी फिल्मों और पाकिस्तानी सीरियल ‘माती’ में काम कर चुकी ऑल इंडिया प्रोफेशनल्स कॉन्ग्रेस की सदस्य एंड्रिया डिसूजा ने इल्जाम लगाया है कि पाकिस्तान में हुई हिंसा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं।
दरअसल, ट्विटर पर रिया नाम से मौजूद एंड्रिया ने पाकिस्तानी पत्रकार नाएला इनायत के ट्वीट को आधार बनाकर यह लिखा है। दरअसल पाकिस्तान के फुलादियून इलाके में ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू डॉक्टर के हिरासत में लिए जाने से माहौल तनावपूर्ण हो गया है और एंड्रिया का ट्वीट इसी संबंध में है। डॉक्टर पर कुरान जलाने का आरोप है, जिसके कारण भीड़ हिंदू इलाकों में जाकर उनकी दुकानों में आग लगा रही है।
PM Modi is blamed for incidents in Pakistan.?
When MusIims in India trust Modi more than Rahul Gandhi, here’s a nutKake pooping on SM.
— Lilly लिल्ली ಲಿಲ್ಲಿ ?? (@LillyMaryPinto) May 28, 2019
एंड्रिया का मानना है कि इस घटना के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं। अपने ट्विटर पर उन्होंने प्रधानमंत्री से जवाब माँगा कि क्या यही उनका ‘सबका साथ और सबका विकास है’, जिसका उन्होंने वादा किया था। अपने ट्वीट में एंड्रिया उर्फ़ रिया ने मोदी को देश का प्रधानमंत्री चुनने पर इंडिया को ‘गुड लक’ भी कहा है। लेकिन, यहाँ सोचने वाली बात यह है कि जिस घटना के लिए रिया अपने ट्विटर पर नरेंद्र मोदी के प्रति इतनी नाराज़गी दिखा रही हैं, वो वास्तविकता में भारत का मामला है ही नहीं।
Modi isnt the PM of Pakistan yet..wait for a few years maybe even that will be possible
तो, कोई यह कह रहा है कि मोदी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं हैं लेकिन कुछ साल बाद ऐसा मुमकिन हो सकता है। कुछ लोग उन्हें दो अलग-अलग देशों में फर्क बताने की जद्दोजहद में हैं। जबकि कुछ उनके शब्दों का मजाक उड़ा रहे हैं।
This is IQ level of Congress which is equivalent to number of seats.
निखिल वागले की ट्विटर आईडी पर उनकी न जाने कबकी (आत्म?)मुग्ध सी फोटो लगी है, जबकि उनकी आज की सच्चाई से वह कतई मेल नहीं खाती- और सच्चाई के धरातल से यही विसंगति उनके प्रोपोगेंडाकार के तौर पर व्यवहार और कथन में भी झलकती है। वह पत्रकारिता के समुदाय विशेष का हिस्सा हैं जिसने अंदर से तो दीवार पर लिखी इबारत पढ़ ली थी कि अब मोदी का समय आ गया है (और हिन्दुओं को बिलावजह गरियाने और हर कदम पर ‘गिल्टी’ महसूस कराने का समय जा चुका है) लेकिन गरिया इतना ज्यादा चुके थे कि अब सुर बदल लेना (जो बहुत सारों ने किया भी; कुछ ने 2013-14 में कर लिया, बरखा दत्त जैसे कुछ और अब कर रहे हैं) सम्भव नहीं। तो, उन्होंने अपने आपको मोदी को दूसरा कार्यकाल न मिलने के प्रबंध में झोंक दिया- और उनकी ट्विटर वॉल इस मेहनत की गवाह है।
लेकिन मेहनत रंग नहीं लाई और मोदी वापिस आ गया छाती पर मूँग दलने 5 और साल। तो अब उनकी मानसिक हालत भी उनकी ट्विटर प्रोफाइल पिक्चर जैसी ही है। दुश्चिंताओं (फर्जी लिबरलों के लिए) से भरे वर्तमान की बजाय शायद वह ‘सुनहरे’ भूतकाल में रहना पसंद कर रहे हैं- जहाँ वह भी लिबरलों के आदर्श नेता राजीव गाँधी जैसे ‘डैशिंग युवा’ थे, बागों में बहार थी, और यह लोग जो कुछ कह देते थे, जनता सर-आँखों पर बिना सोचे-समझे रख लेती थी। और उसी मानसिक हालत में यह ट्वीट आया है कि मोदी को ‘केवल’ 38% वोट मिला है, राजग को ‘केवल’ 45%- यानि 55% लोगों ने मोदी को नकार दिया है (और मोदी को चाहिए कि ‘जनादेश का सम्मान करते हुए’ प्रधानमंत्री की कुर्सी पर न बैठें!)
NDA got 45% vote, BJP 38%. 55% voted against Modi and BJP. Will you respect this mandate, Modiji?
‘धंधेबाज’ पत्रकारिता के ‘गोल्डन डेज़’ में उनके इस आकलन का सच में बड़ा महत्व होता- और पढ़कर शायद एक आम आदमी सही में सोचने लगता कि नहीं भाई, प्रधानमंत्री बहुत गलत कर रहा है, जब देश के 55% लोग उसे नहीं चाहते तो वो क्यों जबरदस्ती लोगों के सर पर सवार हो रहा है। पर वागले जी के दुर्भाग्य से वह (अ)सत्ययुग बीत चुका है- आज का आम आदमी उनकी अगर एक सुनता है, तो दिमाग में उसकी चार काट सोचता है, और ऑटो में बैठकर मेट्रो स्टेशन से ऑफिस जाते-जाते उन्हें आठ सुना भी देता है, और बेचारे वागले जी दोबारा अपनी ट्विटर प्रोफाइल पिक्चर वाले दिनों में लौट जाते हैं।
ट्वीट और सच्चाई- कोसों दूर
निखिल वागले का ट्वीट सही तथ्य की फेक न्यूज़ वाली पत्रकारिता के समुदाय विशेष की प्रवृत्ति का एक और उदाहरण है। यह सच है कि मोदी को 38% (ज्यादा-से-ज्यादा एनडीए का 45%) मत प्रतिशत मिला है, लेकिन उतना ही सच यह भी है कि इससे उनके शासन के अधिकार को कानूनी तो दूर, नैतिक चुनौती भी नहीं मिल सकती। क्यों? क्योंकि अगर इसी तर्क की कसौटी पर राहुल गाँधी (विपक्ष के अन्य किसी भी नेता) को कैसा जाए तो वह न केवल खरा नहीं उतरेगा, बल्कि उस बेचारे की तो कमर ही ध्वस्त हो जाएगी। राहुल गाँधी को मिले हैं 19.5% वोट, औरों के और भी कम हैं- तो प्रधानमंत्री किसे बनाया जाए, निखिल वागले के तर्क के अनुसार?
एक और बात, निखिल वागले यह भी नहीं बताते कि उनका तर्क निर्वाचन प्रक्रिया पर लागू ही नहीं होता। यह तर्क जनमत संग्रह के लिए होता है, जहाँ केवल दो विकल्प होते हैं- हाँ या न। जैसे ब्रिटेन में तीन साल पहले ‘ब्रेग्ज़िट’ जनमत संग्रह हुआ था- उसमें दो ही विकल्प थे, “हाँ” यानि ब्रिटेन को यूरोपियन संघ छोड़ देना चाहिए या फिर “ना” यानि ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में बने रहना चाहिए। इसके उलट हमारे देश की सामान्य लोकतान्त्रिक निर्वाचन प्रक्रिया में विकल्पों का अभाव नहीं होता- लोग जिसे मर्जी आए वोट दे देते हैं, और जिस पार्टी को लोकसभा क्षेत्रवार सर्वाधिक मतदान मिलता है, उसके प्रतिनिधि संसद पहुँचते हैं और अपने में से किसी एक को प्रधानमंत्री चुन लेते हैं। यहाँ सकारात्मक वोटिंग गिनी जाती है, नकारात्मक नहीं, और वह भी लोकसभा क्षेत्रवार तरीके से, देश का कुल जोड़ एक साथ लेकर नहीं।
अगर किसी नए ‘रंगरूट’ ने यही तर्क दिया होता तो एक बारगी यह सोचकर नज़रअंदाज़ किया जा सकता था कि वह नया है, जानकारी नहीं है। लेकिन इसी ‘धंधे’ में पक कर पक्के हुए निखिल वागले के द्वारा यह अनभिज्ञता नहीं, कुटिलता है, क्योंकि अगर इतने साल बाद भी वह ‘अनभिज्ञ’ हैं निर्वाचन और जनमत-संग्रह के अंतर से, तो वह इतने साल से कर क्या रहे थे?
सोशल मीडिया पर भी फजीहत
इस वाहियात किस्म के प्रपोगंडे को लेकर सोशल मीडिया पर भी निखिल वागले की खूब फजीहत हो रही है। थिंक टैंक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष अध्यक्ष समीर शरण और स्तंभकार प्रदीप सिंह ने उन्हें देश का राजनीतिक इतिहास और निर्वाचन प्रणाली सीखने की सलाह दी।
@waglenikhil जरा चुनाव आयोग की साइट देखिए और 1952, 1957 और 1962 में नेहरू के पक्ष में और खिलाफ पड़े वोट देख लीजिए। कभी पचास फीसदी वोट नहीं मिले। आज तक केवल मोरारजी देसाई की जनता पार्टी को पचास फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे। थोडी मेहनत किया कीजिए। क्यों अपना मजाक उड़वा रहे हैं।
MyNation के स्तंभकार और बंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के प्राध्यापक अभिषेक बनर्जी ने उनके नवनिर्वाचित भाजपा सांसद से बात करते-करते आपा खो देने पर भी उन्हें आड़े हाथों लिया। इस बहस में जब उन्होंने भाजपाईयों को गुंडा और नफरत फ़ैलाने वाला बताने की कोशिश की थी तो भाजपा सांसद ने उन्हें आईना दिखाते हुए पहले अपना ज्ञान पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को देने की सलाह दी थी। साथ ही तेजस्वी सूर्या ने उन्हें यह भी याद दिलाया था कि ट्विटर पर कैसे निखिल वागले अक्सर भाजपाईयों के खिलाफ होने वाली हिंसा के पक्ष में बहाने बनाते दिख जाते हैं। इस पर भी निखिल वागले जवाब देने की जगह खुद से पलट कर सवाल पूछे जाने को लेकर ही किंकर्तव्यविमूढ़ दिखे।
For a while now, Nikhil Wagle had been blabbering incoherently.
But that verbal thrashing from Tejaswi Surya has sent him over the edge.
प्रोपोगेंडा बंद कर ढंग की पत्रकारिता की दुकान खोलें वागले, मार्केट में बड़ा स्कोप है
वागले को अपने ही ट्वीट के नीचे आई प्रतिक्रिया का ‘सम्मान’ करते हुए ट्विटर से संन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि वहाँ उनको इस ज्ञान के लिए गालियाँ ज़्यादा पड़ रही हैं। मेजोरिटी और संख्या से जब इतना प्रेम है तो अपने ही कुतर्कों के अनुसार उन्हें जल्द ही ट्विटर छोड़कर अपना प्रलाप करने के लिए नई जगह ढूँढनी चाहिए।
खुद से सोचने-समझने की क्षमता रखने वाली जनता को बरगलाया नहीं जा सकता, उसके साथ प्रपोगंडा नहीं चल सकता। वह वागले के दुराग्रहों को तथ्य मानकर आँख बंद कर नहीं स्वीकार लेगी। लेकिन इसी मार्केट में असल पत्रकारिता का बहुत ‘स्कोप’ है- लेकिन पुरानी प्रोफाइल पिक्चर वाले, पुरानी पत्रकारिता वाले ‘वो भी क्या दिन थे!’ से बाहर आना पड़ेगा। निखिल वागले एन्ड फ्रेंड्स ध्यान देंगे?
लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली प्रचंड जीत के बाद देश के विपक्षी राजनीतिक दलों में अब उथल-पुथल का दौर चल पड़ा है। इस बीच, गुजरात में प्रमुख ओबीसी नेता के तौर पर उभरकर सामने आए अल्पेश ठाकोर ने 15 विधायकों द्वारा कॉन्ग्रेस को छोड़ने की बात कही है। उनका कहना है कि सभी विधायक पार्टी से तंग आ चुके हैं और पार्टी छोड़ रहे हैं।
Alpesh Thakor: It was our decision & the voice of my conscience that we don’t want to be here. We want to work for our people & the poor with help of the govt…Wait and watch, more than 15 MLAs are leaving Congress, everyone is distressed. More than half of the MLAs are upset. https://t.co/3HtNhItl3e
ठाकोर ने कहा, “यह हमारा फैसला था और मेरी अंतरात्मा की आवाज थी कि हम यहाँ (कॉन्ग्रेस में) नहीं रहना चाहते। हम सरकार की मदद से अपने लोगों और गरीबों के लिए काम करना चाहते हैं। इंतजार कीजिए और देखिए, 15 से ज्यादा विधायक कॉन्ग्रेस छोड़ रहे हैं, सभी तंग आ चुके हैं। आधे से ज्यादा विधायक परेशान हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मेरे लोग गरीब और पिछड़े हैं। उन्हें सरकार के समर्थन की जरूरत है। मैं परेशान था कि मैं अपने लोगों को वो नहीं दे सका, जिसका मैंने इरादा किया था। मेरे संगठन की राय है कि जहाँ हमारा सम्मान नहीं होता वहाँ हमें नहीं होना चाहिए।”
Gujarat MLA and OBC leader Alpesh Thakor said Congress leaders who reiterate that scams have taken place are suffering from a “chemical locha” (chemical imbalance) in their minds
बता दें कि, अल्पेश ठाकुर ने गुजरात विधानसभा 2017 से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ज्वाइन किया था और पिछले महीने लोकसभा चुनाव से पहले ये कहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था कि पार्टी के अंदर उनके समुदाय को अपमान का सामना करना पड़ रहा है। कॉन्ग्रेस के पास लोग नहीं है, पार्टी चेला-चपाटा से भरी हुई है। ठाकोर ने मंगलवार (मई 28, 2019) को समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा कि जो कॉन्ग्रेस नेता बार-बार ये बोल रहे हैं कि स्कैम हुआ है, उनके दिमाग में ‘कैमिकल लोचा’ है। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस इस बात को समझने में विफल रही कि वास्तव में लोग क्या चाहते हैं। वह सिर्फ ये नारा लगाते रहे- ‘घोटाला हुआ, घोटाला हुआ’। कोई घोटाला नहीं था, उनके दिमाग में घोटाला था, उनके दिमाग में कैमिकल लोचा था।”
Gujarat MLA and OBC leader Alpesh Thakor who resigned from the Congress party last month said that he will not join BJP though he is in contact with several of the BJP leaders.
अल्पेश ठाकोर ने सोमवार (मई 27, 2019) को गुजरात के डिप्टी सीएम नितिन पटेल से मुलाकात की थी। उस मुलाकात के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि वो भाजपा में शामिल हो सकते हैं। मगर अल्पेश ने भाजपा में शामिल होने की खबरों को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि वो एक विधायक हैं और वो अपने क्षेत्र से जुड़े कामों को लेकर कई नितिन पटेल से मुलाकात की थी। उनका भाजपा में शामिल होने का कोई इरादा नहीं है।
सोशल मीडिया पर यदि कथित बुद्धिजीवियों के अनुसार कोई ना चले तो उसे किस प्रकार घृणा का सामना करना पड़ सकता है, इसका उदाहरण हम पिछले कुछ सालों में देखते आए हैं। इस घृणा का सबसे ताजा शिकार बनी हैं ABP न्यूज़ चैनल की जर्नलिस्ट रुबिका लियाकत।
ट्विटर पर कुछ लोगों द्वारा रुबिका को सिर्फ इस वजह से अश्लील और बेहद भद्दी गालियाँ दी जा रही हैं क्योंकि वो उनकी विचारधारा से सहमत नहीं नजर आती हैं। टीवी जर्नलिस्ट रुबिका की एक तस्वीर को उनके विरोधियों द्वारा शेयर किया जा रहा है, जिसमें वो ‘आज तक’ के एंकर निशांत चतुर्वेदी के साथ हैं। रुबिका को इस तस्वीर द्वारा ट्रोल और अपमानित करने का प्रयास कर रहे अज़ीज़ मेवाती का कहना है कि रुबिका को उन्हें इस्लाम सिखाने की जरूरत नहीं है।
इस तस्वीर को भद्दी गालियों के साथ शेयर होता देखकर रुबिका लियाकत ने कॉन्ग्रेस समर्थकों को जवाब देते हुए ट्वीट में लिखा है, “सही तो ये होगा कि तुम्हारी माँ-बहन के सामने आकर तुम्हें इस्लाम का सही अर्थ समझाऊँ। ये हिंदुस्तान है तालीबान नहीं मेवाती। नफ़रत में इतने अंधे हो गए हैं आपके समर्थक @INCIndia कि मेरे भाई के साथ मेरी तस्वीर बेहूदगी के साथ शेयर कर रहे हैं।”
सही तो ये होगा कि तुम्हारी माँ-बहन के सामने आकर तुम्हें इस्लाम का सही अर्थ समझाऊँ। ये हिंदुस्तान है तालीबान नहीं मेवाती। नफ़रत में इतने अंधे हो गए हैं आपके समर्थक @INCIndia कि मेरे भाई के साथ मेरी तस्वीर बेहूदगी के साथ शेयर कर रहे हैं। https://t.co/0IhPct3jLE
रुबिका को इस्लाम की शिक्षा देने वालों से भी ऊपर कुछ ऐसे नाम हैं जिनके ट्विटर हैंडल से पता चलता है कि राहुल गाँधी उनके प्रधानमंत्री हैं। महिला सशक्तिकरण को एक जुमला बनाने वाली इस पार्टी के समर्थक रुबिका लियाकत को गैंगरेप की धमकी देते हुए देखे जा सकते हैं। अपने ट्वीट में निधि तलवार नाम की इस यूज़र ने लिखा है कि रुबिका लियाकत का गैंगरेप भी हो जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उसने मोदी हित को तरजीह दी है। साथी ही यह भी लिखा है कि 23 मई के जश्न को उन्होंने अपने इन विचारों के साथ फीका कर दिया है।
जितने भी लोग 23 मई का जश्न मना रहे थे मैंने अपने इस एक Tweet से सबका जश्न फीका कर दिया pic.twitter.com/XKDIgTMJ0P
निधि तलवार नाम की इस यूज़र ने कुछ अन्य ट्वीट में अपने विचार रखते हुए लिखा है कि भाजपा से हिन्दू वोट हथियाने का तरीका यही है कि अपर कास्ट और लोअर कास्ट के बीच दरार पैदा की जाए।
The Only Way To Snatch Hindu Votes From BJP Is To Create Rift Between Upper Cast And Backward Cast
यह इस्लाम पर प्रवचन करने वाली न्यूज एंकर रूबिका लियाकत है अब यह हमे इस्लाम सिखाएगी टीवी पर बैठ कर। pic.twitter.com/2KibEMnmjr
— Muhammad Varis Akhtar”guddoo”tarkulwa-deoria (@tarkulwa) May 28, 2019
राष्ट्रवादी विकास के लिए रुबिका लियाक़त सुधीर चौधरी और निशांत चतुर्वेदी के साथ आक्रामक रुख अपनाते हुई बड़े नसीब वाला पति होगा इसका जिसकी पत्नी पृथ्वी की रक्षकों में से है pic.twitter.com/5uzgM04F3R
— RafiAnsari رفیع انصاری चौकीदार ही चोर है (@RAnsari596) May 28, 2019
मोहतरमा रुबिका लियाक़त साहिबा इस्लाम को आप कितना समझती है यह बताने की लिए आपकी तस्वीर ही काफी है आपको जो सही लगता है कीजिये लेकिन खुदा के लिए इस्लाम को बदनाम मत कीजिये इस्लाम बेहूदापन को हरगिज़ पसन्द नहीं करता@RubikaLiyaquatpic.twitter.com/pSyNbrQT3V