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CPI नेता के घर ट्यूशन पढ़ने आती थी 12वीं की छात्रा, 1 साल तक करता रहा रेप: विरोध करने पर देता था मारने की धमकी, स्कूल में टीचर भी है सेबिन फ्रांसिस

केरल के कुन्नमकुलम में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के एक पदाधिकारी पर नाबालिग लड़की से यौन शोषण का आरोप लगा है। आरोपित का नाम सेबिन फ्रांसिस है जो सीपीआई में चिरनेलूर का शाखा सचिव पद संभाल रहा है। आरोपित एक स्कूल टीचर है और पीड़िता क्लास 12 में पढ़ने वाली उसकी छात्रा। सेबिन फ्रांसिस ने साल 2023 से पीड़िता का कई बार बलात्कार किया। विरोध करने पर नाबालिग को जान से मार डालने की धमकी दी जाती थी। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक घटना कुन्नम्कुलम थानाक्षेत्र की है। यहाँ सेबिन फ्रांसिस अकेले रहता है। उसकी शादी हो चुकी थी लेकिन कुछ कारणों से पत्नी से अलगाव हो गया। सेबिन सत्तारूढ़ वामपंथी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) में चिरनेलूर का शाखा सचिव है। वह एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता है। बताया जा रहा है कि कक्षा 12 में पढ़ने वाली एक नाबालिग छात्रा सेबिन से ट्यूशन पढ़ने उसके घर आया करती थी। इसी दौरान साल 2023 में सेबिन फ्रांसिस ने पीड़िता से अपने घर में ही रेप किया।

आरोप है कि पीड़िता ने लगातार सेबिन की इस हरकत का विरोध किया। विरोध के दौरान सेबिन नाबालिग को जान से मार डालने की धमकी देकर चुप करवा देता था। लगातर हो रहे यौन शोषण और सेबिन की धमकियों से पीड़िता परेशान हो गई। उसने अपने एक रिश्तेदार से अपनी व्यथा बताई। लड़की के रिश्तेदार ने फौरन ही सेबिन की हरकतों की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया।

सेबिन फ्रांसिस को गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़िता की काउंसिलिंग करवाकर उनको मेडिकल जाँच के लिए भेजा गया है। आरोपित को अदालत में पेश किया गया है जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस इस मामले में जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई कर रही है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर में गैर हिंदू ने कैसे किया प्रवेश? अमेरिकी राजदूत के ‘पतितपावन’ दर्शन की तस्वीरों से उठे सवाल, जानिए सच्चाई

भारत में अमेरिका के राजदूत 28 सितंबर 2024 को अपने परिवार सहित ओडिशा गए थे। वे जगन्नाथ पुरी मंदिर भी गए और ध्वजा परिवर्तन रीति देखी। बाद में उन्होंने अपना अनुभव सोशल मीडिया पर साझा किया। मीडिया में उनकी इस यात्रा की कई तस्वीरें भी आईं।

लोग उनका अनुभव देख खुश थे, लेकिन इस बीच सोशल मीडिया पर बातें होने लगीं कि पुरी मंदिर में तो गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेध है, फिर उन्हें कैसे भीतर जाने दिया गया? इस सवाल का जवाब ये है कि एरिक गार्सेटी ने पूरी तरह से जगन्नाथ मंदिर में में प्रवेश नहीं किया। इस मंदिर में गैर हिंदुओं के प्रवेश को लेकर बहुत सख्ती है। यहाँ तक कि इस्कॉन से जुड़े विदेशी श्रद्धालुओं जो हिंदू धर्म नहीं मानते उनको भी मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं है।

गार्सेटी ने ओडिशा यात्रा के दौरान जगन्नाथ मंदिर के भव्य ध्वज ‘पतितपावन’ के दर्शन किए। ये एक ध्वज परिवर्तन प्रक्रिया है। इसमें एक सेवायत 1000 साल पुराने मंदिर पर कुशलता से चढ़कर पुराने ध्वज को उतारकर वहाँ नया ध्वज फहराता है। इस रीति को देखने के लिए सैंकड़ों लोग मुख्य मंदिर के बाहर वहाँ इकट्ठा होते हैं।

गार्सेटी जगन्नाथपुरी मंदिर में इसी अनुष्ठान के साक्षी बने न कि वो चतुर्थ मूर्ति के दर्शन के लिए मुख्य मंदिर गए। उन्होंने पतितपावन भव्य ध्वज के दर्शन किए जो भगवान जगन्नाथ का प्रतिनिधित्व करता है।

यहाँ जानना जरूरी है कि ‘चतुर्थ मूर्ति’ के दर्शन का अर्थ है मुख्य मंदिर की आंतरिक संरचना में प्रवेश करना, और भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन की भव्य मूर्तियों के दर्शन करना। जो लोग मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, उन्हें केवल रथ यात्रा और स्नान पूर्णिमा के दौरान चतुर्ध मूर्ति के दर्शन का आशीर्वाद मिलता है, जब देवता मंदिर से बाहर निकलते हैं। रथ यात्रा के दौरान किसी भी धर्म या राष्ट्रीयता के लिए ग्रैंड रोड पर प्रवेश की कोई बाधा नहीं है।

गौरतलब है कि भगवान जगन्नाथ के मंदिर जिसे नष्ट करने की साजिश कई बार मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा की गई, लेकिन हर बार वो विफल हुए, वहाँ गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर बहुत बार विवाद हो चुका है। यहाँ गैर हिंदुओं को प्रवेश अनुमति न होने की वजह से संत कबीर, बीआर अंबेडकर, भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन, थाईलैंड की पूर्व रानी महाचक्री सिरिधरन और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाई थीं।

नोट: यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ है। इसे पूरा पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करें।

जम्मू-कश्मीर से लखनऊ तक मातम मना रहे भारत के धर्मांतरित मुस्लिम, हिजबुल्लाह के आतंकी सरगना नसरल्लाह से इनका रिश्ता क्या?

भारत के मुस्लिम समुदाय का जिन मजहबी नारों से खासा लगाव है, उनमें से एक है- “तेरा मेरा रिश्ता क्या- ला इलाहा इल्लल्लाह”। चाहे वह कश्मीर के आतंकी हों या फिर CAA विरोध के नाम पर हिंसा करने वाले इस्लामी दंगाई, इस नारे को हर विरोध प्रदर्शन में सुना जा सकता है।

जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लेकर सड़कों और गलियों में होने वाले मजहबी जलसों तक, यह नारा अक्सर सुनाई देता है। लेकिन जब इजरायल के हमले में मारे गए हिजबुल्लाह के आतंकी सरगना हसन नसरल्लाह की मौत के बाद, जम्मू-कश्मीर से लेकर लखनऊ तक भारतीय मुस्लिमों के बीच मातम का माहौल देखने को मिलता है, तब यह सवाल उठता है कि आखिर ये संबंध कैसा है? क्या ये रिश्तेदारी महज मजहबी है, या इसके पीछे कुछ और गहरी वजहें हैं?

वैसे, इजरायल के हमले में मारे गए आतंकी संगठन हिजबुल्लाह के सरगना सैयद हसन नसरल्लाह से ऐसी किसी ‘रिश्तेदारी’ का मुस्लिम दावा भी नहीं कर सकते। यदि ‘उम्माह’ से इसका वास्ता होता तो इस्लामिक वर्ल्ड में नसरल्लाह की मौत पर जश्न नहीं मनता। अरब देश हों या सीरिया… सुन्नी मुस्लिम इस मौत का खुलकर जश्न मना रहे हैं। यह बताता है कि फिरकों में बँटे इस्लाम में उम्माह की कुछ खास कूवत नहीं है।

यह दूसरी बात है कि भारत के धर्मांतरित मुस्लिम खुद को इस बेड़ी में जकड़ कर दुनिया के किसी भी हिस्से में हुई घटना को लेकर अपने ही देश में उपद्रव करते हैं। शायद इस उम्मीद में कि उन्हें इस्लामी जगत में ‘इज्जत’ नसीब हो। दोयम दर्जे के मुस्लिम वाले टैग से मुक्ति मिले। इन मुद्दों पर आगे हम विस्तार से आपको समझाएँगे…

‘उम्माह’ और उसकी असलियत

इस्लाम में ‘उम्माह’ का मतलब है- पूरी दुनिया के मुसलमान एक ‘रूहानी’ भाईचारे में जुड़े हुए हैं, और उन्हें एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। लेकिन जब नसरल्लाह की मौत पर अरब और सुन्नी मुस्लिम देशों ने खुलकर जश्न मनाया, तो उम्माह की यह अवधारणा भी सवालों के घेरे में आ गई। यदि वास्तव में उम्माह का कोई ठोस आधार होता, तो क्या इस्लामी जगत के कुछ हिस्से नसरल्लाह की मौत का स्वागत करते?

सुन्नी मुस्लिमों और शिया मुस्लिमों के बीच का यह मतभेद आज का नहीं है। सदियों से चले आ रहे इस संघर्ष ने इस्लाम के अंदर ही कई विभाजन पैदा कर दिए हैं। अरब देश, विशेषकर सुन्नी बहुल देश, नसरल्लाह की मौत को अपनी जीत मानते हैं।

इसके बावजूद, भारत के मुस्लिम समुदाय ने न सिर्फ इस्लामी उम्माह से जुड़ने की कोशिश की, बल्कि उन्होंने नसरल्लाह की मौत पर मातम भी मनाया। कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, शिया समुदाय के लोग इमामबाड़ों में शोक मनाते देखे गए। लखनऊ में तो यह मातम तीन दिनों तक जारी रहा, जहाँ बड़ी संख्या में लोग जमा हुए और इमामबाड़ों में हुसैनियों की तरह आंसू बहाते रहे।

लखनऊ में तीन दिन का मातम

लखनऊ के शिया समुदाय के बीच नसरल्लाह की मौत पर मातम एक प्रतीकात्मक घटना थी। इमामबाड़े में तीन दिन तक चलने वाला यह मातम यह दर्शाता है कि भारतीय मुस्लिम समुदाय, विशेषकर शिया मुस्लिम, वैश्विक शिया नेताओं के साथ अपने संबंधों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

यहाँ एक दिलचस्प बात यह भी है कि नसरल्लाह की मौत के बाद इस्लामिक जगत के सुन्नी मुसलमानों ने उसकी मृत्यु पर खुशी जताई, जबकि भारतीय शिया मुस्लिमों ने इसे एक बड़ी क्षति के रूप में देखा। यह अंतरराष्ट्रीय इस्लामी राजनीति में भारतीय मुस्लिमों के स्थान को लेकर भी एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

‘इज्जत’ की तलाश और भारतीय मुस्लिम

भारतीय मुस्लिम, विशेषकर शिया समुदाय, सदियों से अपनी मजहबी और सांस्कृतिक पहचान को इस्लामी दुनिया के केंद्र से जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन उन्हें अक्सर इस्लामी जगत में एक ‘दूसरे दर्जे’ का मुस्लिम माना जाता है। अरब के मुस्लिमों की नजर में भारतीय मुस्लिम चाहे कितनी भी मजहबी निष्ठा दिखा लें, उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता।

लखनऊ के इमामबाड़े में तीन दिन का मातम भी इसी ‘इज्जत’ की तलाश का एक हिस्सा है। भारतीय मुस्लिम समुदाय अपनी मजहबी और सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक इस्लामी पहचान से जोड़ने की कोशिश करता है। उन्हें लगता है कि अगर वे इस्लामी उम्माह का हिस्सा बनेंगे, तो उन्हें उस ‘दूसरे दर्जे’ के मुस्लिम होने के टैग से छुटकारा मिलेगा।

महबूबा मुफ्ती और राजनीतिक अवसरवाद

नसरल्लाह की मौत के बाद जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने चुनाव प्रचार को रोक दिया। यह एक स्पष्ट संकेत था कि कैसे भारत के मुस्लिम नेता अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मुद्दों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने न सिर्फ नसरल्लाह को एक शहीद के रूप में पेश किया, बल्कि उन्होंने इस मौके को मुस्लिम समुदाय को साधने के लिए एक अवसर के रूप में भी देखा।

महबूबा मुफ्ती ही नहीं, बल्कि नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के श्रीनगर लोकसभा सीट से सांसद रुहुल्लाह मेहदी ने भी ऐसा ही कदम उठाया। मेहदी ने भी चुनाव प्रचार बंद करने की तुरंत ही घोषणा कर दी, जैसे ही नसरल्लाह के मारे जाने की सूचना सामने आई।

इन दोनों नेताओं का यह कदम बताता है कि भारत में राजनीतिक नेता किस तरह अंतरराष्ट्रीय इस्लामी घटनाओं को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। कश्मीर में पहले से ही संवेदनशील माहौल था, और इस तरह की घटनाओं को उभारने से उन्हें अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने का एक और मौका मिल गया।

वैसे, मामला सिर्फ यूपी, कश्मीर या अन्य मुस्लिम बहुल इलाकों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई की एक मस्जिद तक में नसरल्लाह के पोस्टर लगा दिए गए और श्रद्धांजलि दी गई।

सीएए विरोध भी था महज बहाना

भारतीय मुस्लिमों का अपने देश में सड़कों पर उतरना कोई नई बात नहीं है। चाहे वह सीएए का मुद्दा हो या किसी भी वैश्विक इस्लामी घटना का, भारतीय मुस्लिम अक्सर बहुसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी असंतुष्टि जताते हैं। सीएए, जो कि विशेष रूप से गैर-मुस्लिम शरणार्थियों के लिए था, को लेकर मुस्लिमों का गुस्सा दिखाता है कि कैसे उन्हें हर कानून या फैसले में अपने खिलाफ कुछ न कुछ नजर आता है।

यह विरोध केवल राजनीतिक या सामाजिक नहीं था, बल्कि मजहबी भावनाओं से भी जुड़ा हुआ था। सीएए के विरोध के दौरान जो नारे लगाए गए, उनमें ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की ध्वनि भी सुनाई दी, जो दर्शाता है कि भारतीय मुस्लिम अपने विरोध को मजहबी रंग देने से भी पीछे नहीं हटते।

अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं भारतीय मुस्लिम

जब भारत के मुस्लिमों को अपने देश में कोई मुद्दा नहीं मिलता, तो वे अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को उठाकर अपनी असंतुष्टि दिखाते हैं। चाहे वह इजरायल-फिलिस्तीन का विवाद हो, या फिर इराक, सीरिया या लेबनान में होने वाली घटनाएँ, भारतीय मुस्लिम इन मुद्दों को अपने विरोध प्रदर्शनों में शामिल कर लेते हैं।

लखनऊ की घटना इसका एक और उदाहरण है। नसरल्लाह की मौत पर लखनऊ के शिया समुदाय ने जो मातम मनाया, वह सिर्फ एक मजहबी कर्तव्य नहीं था, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे भारतीय मुस्लिम वैश्विक इस्लामी घटनाओं से जुड़े रहना चाहते हैं।

भारत के मुस्लिमों की बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की मानसिकता

अब सवाल यह उठता है कि भारतीय मुस्लिमों का यह रवैया क्यों है कि वे हमेशा बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की कोशिश करते हैं? क्या यह उनकी मजहबी शिक्षा का परिणाम है, जहाँ काफिरों पर विजय पाने की बात की जाती है? भारत में जहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं, मुस्लिम समुदाय हमेशा अपनी पहचान को मजबूत करने की कोशिश करता रहता है। यह सिर्फ मजहबी पहचान की बात नहीं है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे वे अपने मजहबी कर्तव्यों के नाम पर राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं।

भारत के मुसलमान खुद को इस्लाम में दोयम दर्जे का मानते हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी पहचान और इज्जत की तलाश में इस्लामी जगत के मुद्दों को अपने देश में उठाते रहते हैं। उन्हें बहाना चाहिए बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने का, उन्हें डराने का। चाहे सीएए का मुद्दा हो, फिलिस्तीन का या फिर लेबनान का – भारतीय मुस्लिम हमेशा यही संदेश देने की कोशिश करते हैं कि जब चाहें, तब वे सड़कों पर उतर सकते हैं, और हिंदुओं को दबोच सकते हैं।

ऐसे में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि भारतीय मुस्लिम कब तक इस तरह की मानसिकता को अपनाए रखेंगे। कब तक वे अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मुद्दों को लेकर अपने ही देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे, और कब तक वे बहुसंख्यक हिंदुओं पर हावी होने की कोशिश करेंगे? बाकी यह तो तय ही है कि इस्लामी उम्माह का हिस्सा बनकर भी भारतीय मुस्लिमों को इस्लामी दुनिया में बराबरी का दर्जा नहीं मिलने वाला। अरब देशों के सुन्नी मुस्लिम उन्हें हमेशा ही एक ‘दूसरे दर्जे’ का मुस्लिम मानते रहेंगे।

‘आबादी बढ़ रही है मुसलमानों की, अब तुम्हारा राज खत्म होगा’: जो कार्यक्रम ‘संविधान’ के नाम पर उसमें सपा MLA महबूब अली ने ‘मजहब की ताकत’ का दिखाया खौफ

अपने नेताओं की विवादित बयानबाजी से आए दिन चर्चा में चल रही समाजवादी पार्टी की बदनामी में एक और इजाफा हुआ है। यह इजाफा सपा के टिकट पर अमरोहा से जीत कर आए विधायक महबूब अली ने कराया है। महबूब अली ने संविधान के नाम पर एक सार्वजनिक मंच से मुस्लिमों की आबादी बढ़ने का हवाला देते हुए भाजपा को चेतावनी दी है। इस दौरान महबूब अली ने मुगल काल का भी जिक्र किया। सपा विधायक द्वारा रविवार (29 सितंबर 2024) को दिए गए इस भड़काऊ बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वायरल हो रहे लगभग 1 मिनट के वीडियो में महबूब अली ने सबसे पहले मुस्लिमों का प्रतिशत बढ़ने की बात कही। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “आने वाले वक्त में समझ लो, अब तुम्हारा राज खत्म हो जाएगा।” हाथ से इशारा करते हुए महबूब अली आगे बोले, “आबादी बढ़ रही है मुसलमानों की इतनी। आगे सत्ता में आना नहीं है।” अपनी रफ्तार में महबूब अली ने आगे कहा कि ये काम तो उन मुगलों के बस का भी नहीं है जो 850 साल तक हुकूमत कर के गए हैं।

महबूब अली ने दावा किया कि आज देश को गुमराह करके चलाया जा रहा है लेकिन हिंदुस्तान की आवाम जाग चुकी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ इशारा करते हुए महबूब अली आगे बोले, “आने वाले 2027 के अंदर आप जाएँगे जरूर। और इंशाअल्लाह हम आएँगे जरूर।” महबूब अली की इस बयानबाजी पर मंच के साथ-साथ उनको सुन रही भीड़ ने भी तालियाँ बजाकर और शोर मचाकर समर्थन किया। इस वीडियो को शेयर करते हुए पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने लिखा, “उनका एजेंडा एकदम साफ है।”

महबूब अली ने यह विवादित बयान अमरोहा के पड़ोसी जिले बिजनौर में दिया है। रविवार (29 सितंबर) को वह बिजनौर में अपने समर्थकों सहित पहुँचे थे। “संविधान मानस्तंभ स्थापना’ के नाम पर हुआ ये कार्यक्रम शहर के रामलीला मैदान में आयोजित हुआ था। इस कार्यक्रम में मंच पर और श्रोताओ में हिन्दू समाज के भी कई लोग मौजूद थे। इन सभी में से किसी ने भी महबूब का विरोध नहीं किया। उलटे तालियाँ बजा कर उनका स्वागत किया गया।

2014: 222 हमले, 2024: 15 हमले… मोदी राज में आतंकवाद की टूटी कमर, जम्मू-कश्मीर में जवान हों या आम आदमी जानमाल का नुकसान 90% तक कम, आर्टिकल 370 हटाने से बदली तस्वीर

जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहे सुरक्षा बलों को पिछले 10 वर्षों में बड़ी सफलता मिली है। आँकड़ों के मुताबिक, राज्य में होने वाले आतंकी हमलों में काफी गिरावट आई है। सुरक्षा बलों को भी साल 2014 के मुकाबले इस साल काफी कम नुकसान हुआ है। इस बदलाव के पीछे स्थानीय लोग आर्टिकल 370 हटना और कई क्षेत्रों में विकास कार्य होना बता रहे हैं। हालाँकि जम्मू क्षेत्र में वोटिंग प्रतिशत में साल 2010 के मुकाबले इस बार गिरावट दर्ज की गई है।

TOI के मुताबिक, साल 2024 में 27 सितंबर तक जम्मू क्षेत्र में आतंकी 15 हमलों को अंजाम दे पाए हैं। इन हमलों में 11 आम नागरिक मारे गए। हमलों के बाद सुरक्षा बलों की आतंकियों से मुठभेड़ भी हुई। इन मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों के 17 जवानों को वीरगति मिली है। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में जम्मू क्षेत्र में 10 आतंकी भी ढेर किए गए हैं। अमूमन जम्मू के मुकाबले अधिक अशाँत रहने वाले कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद के आँकड़े जम्मू के मुकाबले पिछले 1 दशक में काफी कम हैं।

कश्मीर जोन की बात करें, तो कश्मीर में इस साल अब तक कुल 8 आतंकी हमले हुए हैं। इन हमलों में सुरक्षा बलों के 4 जवानों को वीरगति मिली है। आतंकियों द्वारा मारे गए आम नागरिकों की संख्या 5 है। सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में कश्मीर क्षेत्र में कुल 35 आतंकी ढेर हुए हैं। जम्मू और कश्मीर मिला कर इस साल अब तक कुल 23 आतंकी हमले हुए हैं। इन आतंकी हमलों में सुरक्षा बलों के कुल 25 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं। मारे गए आम नागरिकों की तादाद 16 बताई गई है।

क्या थे 2014 के आँकड़े

बताते चलें कि 10 साल पहले 2014 में हालात बदतर थे। तब जम्मू और कश्मीर मिला कर 222 आतंकी हमले हुए थे। इन हमलों में सुरक्षा बलों के 47 जवान बलिदान हुए थे। इसी दौरान 29 आम नागरिकों की भी जान चली गई थी। तब सुरक्षा बलों से हुई मुठभेड़ों के बाद कुल 110 आतंकी ढेर हुए थे। इस बदलाव के पीछे की वजह स्थानीय लोगों के साथ प्रशासनिक अधिकारियों ने भी जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटना और विकास कार्यों में तेजी आने को बताया है।

किसी के लिए ‘परोपकारी’, किसी के लिए ‘करिश्माई’: जो नसरल्लाह मरा वह आतंकी संगठन हिज्बुल्लाह का सरगना था, पर ‘सम्मानित’ बता मातम मना रहा है मीडिया

इस्लामी आतंकियों के मरने पर मार्मिक एंगल ढूँढकर उनके लिए संवेदना बटोरना मीडिया के लिए कोई नया काम नहीं है। वामपंथी मीडिया की आदत है कि आतंकी कितना ही बड़ा क्यों न हो, मगर वो उसके आतंक को धो-पोंछने में कोई कसर नहीं छोड़ते। हाल में मीडिया का ये चरित्र तब देखने को मिला जब इजरायल ने हिज्बुल्लाह चीफ नसरल्लाह को मौत के घाट उतारा।

अमेरिका से लेकर सीरिया तक में लोग इस कार्रवाई पर खुश हुए लेकिन वामपंथी मीडिया में मातम पसर गया। जैसे ही खबर आई कि इजरायल ने हसन नसरल्लाह का आतंक दुनिया से खत्म कर दिया है उसके बाद मीडिया पोर्टलों में उसके कुकर्मों का ब्योरा छपने की होड़ लग गई। धीरे-धीरे वैसे ये काम कई समाचार साइटों ने किया लेकिन न्यूयॉर्क पोस्ट, द गार्जियन, बीबीसी ने दो कदम उठकर ये ऐसा प्रोपगेंडा फैलाया कि पढ़ने में लगे नरसल्ला कितना भला आदमी था, जिसने हमेशा मुस्लिमों के साथ यहूदियों और ईसाइयों का अच्छा चाहा।

NYT का प्रोपगेंडा

पहले बात करते हैं न्यूयॉर्क टाइम्स की। नीचे दिए स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि कैसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने हिज्बुल्लाह चीफ को महान दिखाने के लिए बताया कि वो हमेशा से मुस्लिमों, यहूदियों और ईसाइयों के लिए समान फिलीस्तीन की कामना करता था। NYT ने आगे उसके लिए संवेदना बटोरने का काम किया।

अपने आर्टिकल में NYT ने नसरल्ला को एक शक्तिशाली ‘वक्ता’ बताया। साथ ही ये दिखाया कि कैसे वो शिया मुसलमानों में प्रिय था और हिज्बुल्लाह संगठन को खड़ा करके लेबनान में अपनी सामाजिक सेवाएँ देता था। इसके अलावा अपने आर्टिकल में नसरल्लाह की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर दिखाई गई जिसकी प्रतिष्ठा मिडल ईस्ट के देशों तक फैली हुई थी।

एसोसिएटिड प्रेस के लिए करिश्माई था नसरल्लाह

न्यू यॉर्क टाइम्स के बाद ‘द एसोसिएटिड प्रेस’ ने भी ऐसा ही किया। उन्होंने तो अपनी हेडलाइन से ही नसरल्लाह को इस तरह पेश किया जैसे वो आतंकी संगठन को चलाने वाला सरगना न होकर मानवता को बचाने वाला मसीह हो। शीर्षक में उसके लिए Charismatic and shrewd जैसे शब्द प्रयोग किए गए।

आगे उसके जीवन से जुड़े किस्सा बताए गए। लेख के भीतर उसे चतुर रणनीतिकार बताकर उसकी वाहवाही की। इतना ही नहीं ये भी बताया गया कि कैसे लेबनानी उसे सम्मान देते थे। उसके पास सैयद की उपाधि थी और वो एक प्रखर वक्ता भी था

जब लोगों ने इन विशेषणों को नसरल्ला के लिए देखा तो वो भड़क गए। AP की मंशा पर सवाल उठने शुरू हुए, लेकिन तब उन्होंने बिन कोई सफाई दिए चुपचाप आर्टिकल की हेडलाइन बदल दी। हेडलाइन में लिखा गया- लंबे समय से हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह कौन हैं? (Who is longtime Hezbollah leader Hassan Nasrallah?)

बीबीसी ने नसरल्लाह को दिखाया आंदोलनकारी और परोपकारी

न्यू यॉर्क पोस्ट और एपी की तरह बीबीसी गुजराती ने भी नसरल्लाह के लिए लिखा कि वो मिडल ईस्ट का सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक था। अपने लेख में बीबीसी ने दिखाया कि नसरल्लाह इतना प्रभावशाली आदमी था कि उसके ईरान से घनिष्ठ संबंध थे, जिसने हिजबुल्लाह को आज की राजनीतिक और सैन्य शक्ति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इस समूह का वो सम्मानित व्यक्ति था।

इसी तरह अपने लेख में एक आतंकी संगठन के लिए बीबीसी ने बातें इतनी बढ़ा-चढ़ा कर लिखीं कि पता ही नहीं चला कि हिज्बुल्लाह एक आतंकी संगठन है। ऐसा लगता है कि जैसे ये कितनी बड़ी सेना है जो अपने देश की रक्षा के लिए बनाई गई। हकीकत जबकि ये है कि इजरायल के विरुद्ध लड़ने के लिए हिज्बुल्लाह संगठन का जन्म हुआ था ताकि उत्तरी सीमा से इजरायल कमजोर रहे।

बीबीसी ने अपने लेख में नसरल्लाह के नेतृत्व में खड़े किए गए हिज्बुल्लाह को मानवतावादी दिखाने के लिए ये तक बताया कि हिज्बुल्लाह की सेना आधिकारिक लेबनानी सेना से भी अधिक शक्तिशाली हैं। इसका लेबनानी राजनीति में इतना प्रभाव है कि यह स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सेवा प्रदान करने में सबसे आगे हैं।

यूरो न्यूज के लिए हसन नसरल्लाह इस्लामी नेता

इसी तरह यूरो न्यूज की हेडलाइन देखिए। यूरो न्यूज ने घोषित आतंकी हसन नसरल्लाह को इस्लामी नेता लिखा है और ऐसे दिखाया है जैसे इजरायल आतंकी संगठन है जिसका विरोध वो दशकों से करता आया है।

जबकि, सच्चाई तो ये है कि हिज्बुल्लाह का अस्तित्व ही इजरायल के विनाश के लिए हुआ था। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला बोला था उसके अगले ही दिन हिज्बुल्लाह ने भी हमला किया था। क्या इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक्शन भी न ले।

आतंकियों से संवेदना वामपंथी मीडिया का पुराना धंधा

कुल मिलाकर ऐसे तमाम मीडिया संस्थान हैं जिन्होंने 28 सितंबर को हसन नसरल्लाह की मौत के बाद उसके आतंकी बैकग्राउंड को पूरी तरह ढाँकने का काम किया और उसे एक आतंकी संगठन का सरगना न दिखाकर एक परोपकारी इस्लामी नेता दिखाने की कोशिश की। उसके बचपन के हालातों को खबरों के तौर पर मुख्य रूप से ऐसे चलाया गया जैसे गरीबी के हालातों से निकलकर उसने मानवता को बढ़ावा देने में उसने कितना बड़ा योगदान दिया हो।

हकीकत जबकि ये है कि आतंकी संगठन का सरगना नसरल्लाह के ऊपर न जाने कितनी आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने का आरोप है। वहइजरायलियों पर किए जाने वाले अत्याचार का वो पुरजोर समर्थन करता था। उसके संगठन हिज्बुल्लाह में इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकी थे न कि समाजसेवी। आतंकी संगठन को खड़े रखना एक सामान्य समाज के लिए सम्मानजनक काम नहीं है जो मीडिया अपने लेखों में बता रहा है कि वो सम्मानित व्यक्ति था।

हिज्बुल्लाह- एक आतंकी संगठन

मालूम हो कि हिज्बुल्लाह को अमेरिका, यूरोपीय संघ, इजराइल समेत 60 से ज्यादा देशों ने आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा था, लेकिन फिर भी उसके लिए संवेदना वामपंथी मीडिया में बराबर है। ठीक उसी तरह जैसे कभी बगदादी के लिए थी, हमास के चीफ के लिए थी, लादेन के लिए थी…।

1983 में हिज्बुल्लाह ने बेरूत में अमेरिकी दूतावास पर हमला कराया था। उस समय करीबन 49 लोगों की मौत हुई थी और 30 से ज्यादा घायल थे। इसके बाद उसी साल इस संगठन ने बेरूत में फिर हमला किया जिसमें 240 अमेरिकियों की जान गई।

1989 में इस संगठन ने बैंगकॉक में सऊदी अरब के सेक्रेट्री को मौत के घाट उतारने का काम किया। 1992 में ब्यूनोस (Buenos) के इजरायली दूतावास पर पर बमबारी की जिसमें 29 लोग मरे और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए। 2 साल बाद ब्यूनोस में ही यहूदियों के सेंटर पर बम विस्फोट किए गए जिसमें 85 की मौत हुई और 300 से ज्यादा घायल हुए।

जिस हिज्बुल्लाह को मात्र एक इस्लामी संगठन बनाकर मीडिया दिखा रहा है वो हकीकत में आतंकी संगठन है जिसके बारे में मीडिया को खुलकर बताना आना चाहिए। इस्लामी प्रोपगेंडे से पत्रकारिता सालों से त्रस्त रही है। इजरायल जब खुलकर अपने देश के नागरिकों को बचाने के लिए डटकर आतंकियों को सामना कर रहा है तो क्या ये मीडिया का फर्ज नहीं है वो भी अपने पाठकों को… जिनसे उनका अस्तित्व है उन्हें सच दिखाने के लिए खड़े हों न कि लीपा-पोती के लिए।

अपनी बिगड़ी तबीयत पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आए मल्लिकार्जुन खड़गे, अमित शाह ने कर दिया उपचार: कहा- यह PM मोदी से कॉन्ग्रेस की नफरत और डर का प्रदर्शन

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जम्मू-कश्मीर की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखी टिप्पणी की थी, जिसपर गृह मंत्री अमित शाह कड़ा जवाब दिया है। खड़गे का बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि जब तक मोदी सत्ता में हैं, वह मरेंगे नहीं, ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। इस बयान पर गृह मंत्री अमित शाह ने प्रतिक्रिया देते हुए खड़गे के शब्दों को ‘अपमानजनक’ करार दिया।

अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पर खड़गे के बयान की आलोचना करते हुए लिखा, “कल (29 सितंबर 2024) कॉन्ग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे जी ने अपने भाषण में खुद, अपने नेताओं और अपनी पार्टी को शर्मिंदा कर दिया। अपनी कड़वाहट दिखाते हुए, उन्होंने बिना किसी वजह के प्रधानमंत्री मोदी को अपने निजी स्वास्थ्य के मामले में घसीटते हुए कहा कि वह तभी मरेंगे जब मोदी सत्ता से हटेंगे। यह दिखाता है कि इन कॉन्ग्रेस नेताओं के दिलों में मोदी जी के लिए कितनी नफरत और डर भरा हुआ है, वे हर समय उनके बारे में सोचते रहते हैं।”

‘PM मोदी आपके दीर्घायु की प्रार्थना करते हैं’

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार किसी के स्वास्थ्य के मुद्दे पर राजनीति नहीं करती। उन्होंने खड़गे के स्वास्थ्य को लेकर कहा, “जहाँ तक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के स्वास्थ्य की बात है, पीएम मोदी प्रार्थना करते हैं, मैं भी प्रार्थना करता हूँ कि खड़गे दीर्घायु हों और स्वस्थ रहें।” शाह ने यह भी कहा कि खड़गे को 2047 तक विकसित भारत का निर्माण होते देखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह स्वस्थ रहें।

उम्र का हवाला देते हुए कही थी बड़ी बात

29 सितंबर को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जम्मू-कश्मीर के बिलावर में एक रैली के दौरान आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि देते वक्त भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा था, “हम कश्मीर को राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लड़ेंगे। मैं 83 साल का हूँ, लेकिन जब तक प्रधानमंत्री मोदी सत्ता में हैं और भाजपा देश पर शासन कर रही है, मैं न तो चैन से बैठूँगा और न ही मरूँगा।” यह बयान उस समय दिया गया जब खड़गे शहीद जवानों के प्रति सम्मान व्यक्त कर रहे थे और वह खुद भी इस दौरान भावुक हो गए थे। कुछ पल के लिए उन्हें असहजता महसूस हुई, लेकिन उन्होंने जल्दी ही खुद को संभाल लिया और अपने भाषण को जारी रखा।

प्रधानमंत्री ने फोन पूछी थी खड़गे की तबियत

इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खड़गे को फोन कर उनका स्वास्थ्य जाना था। खड़गे की तबीयत जम्मू-कश्मीर के बिलावर में आयोजित चुनावी सभा के दौरान अचानक बिगड़ गई थी। इस दौरान पीएम मोदी ने खड़गे के स्वास्थ्य के प्रति चिंता जताई और उनसे फोन पर बातचीत की।

यह घटनाक्रम राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो गया है। एक ओर खड़गे का बयान, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की सरकार पर तीखे हमले किए, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री का उनके स्वास्थ्य के प्रति चिंता जताना, दोनों ही घटनाओं ने मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा बटोरी। अमित शाह ने भी खड़गे के बयान का जवाब देकर यह साफ कर दिया कि भाजपा इस प्रकार के व्यक्तिगत हमलों को गंभीरता से लेती है।

स्कूल में छात्राओं को दिखाए अश्लील वीडियो, 50 साल का लईक अहमद टोंक से गिरफ्तार: कानपुर की कोचिंग के बाथरूम में छात्रा के साथ अश्लील हरकत करने वाला साहिल सिद्दीकी भी अरेस्ट

राजस्थान और उत्तर प्रदेश से 2 अलग-अलग ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें टीचरों ने अपनी ही छात्राओं के साथ अश्लील हरकतें की हैं। राजस्थान के टोंक में 50 वर्षीय शिक्षक लईक अहमद कुरैशी ने अपनी छात्रा को अश्लील वीडियो दिखाए। UP के कानपुर में भी टीचर साहिल सिद्दीकी ने भी कोचिंग में पढ़ने वाली छात्रा से अश्लील हरकतें की हैं। दोनों आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

पहला मामला राजस्थान के टोंक से है। यहाँ के थानाक्षेत्र निवाई में एक सरकारी स्कूल है। इसी स्कूल में 50 वर्षीय लईक अहमद कुरैशी बतौर अध्यापक 16 वर्षों से कार्यरत है। आरोप है कि शुक्रवार (27 सितंबर 2024) को लईक अहमद ने अपने मोबाइल पर नाबालिग छात्राओं को अश्लील वीडियो दिखाई। इसी दौरान उसने छात्राओं से छेड़खानी भी की। छात्राओं ने घर आ कर परिजनों को इसकी जानकारी दी, तो परिजन भड़क उठे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्राओं के परिजनों ने पुलिस को मामले की सूचना दी। पुलिस ने एक पीड़िता के अभिभावक से तहरीर ले कर जाँच शुरू की और फिर आरोपित शिक्षक लईक अहमद को गिरफ्तार कर लिया गया। ग्रामीणों और पीड़िताओं के परिजनों ने लईक अहमद को बर्खास्त करने की माँग उठाई है। मामले में प्रशासन ने जाँच कर जरूरी कानूनी कार्रवाई की बात कही है।

साहिल सिद्दीकी की छात्राओं से अश्लील हरकत

राजस्थान की ही तरह, उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से भी एक शर्मनाक मामला सामने आया है। काकादेव क्षेत्र स्थित आई एन्ड आई कोचिंग सेंटर में बायोलॉजी के लेक्चरर साहिल सिद्दीकी पर गंभीर आरोप लगे हैं। कोचिंग संचालक आशीष श्रीवास्तव ने 28 सितंबर 2024 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने बताया कि 26 सितंबर को उन्हें कोचिंग में एक बंद लिफाफा मिला। जब उन्होंने लिफाफा खोला तो उसमें एक पेन ड्राइव थी, जिसमें कोचिंग के अंदर का एक वीडियो था। वीडियो में बॉयोलॉजी साहिल सिद्दीकी टॉयलेट में एक छात्रा के साथ अश्लील हरकतें कर रहा था।

वीडियो के मुताबिक, साहिल सिद्दीकी लगभग 10 मिनट तक छात्रा के साथ टॉयलेट में रहा और बाहर आने के बाद उसने उसे जबरन गले लगाया और किस किया। यह घटना कोचिंग के अंदर हुई, जिससे कोचिंग संचालक और छात्र-छात्राओं के माता-पिता गहरे सदमे में हैं। आशीष ने पुलिस को तहरीर दे कर साहिल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने इस तहरीर पर केस दर्ज कर के साहिल अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरू में जब साहिल अंसारी के खिलाफ आरोप लगे तो वो सारा ठीकरा कोचिंग संचालक आशीष पर फोड़ने लगा। 97 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर काम करने का दावा करते हुए वह इसे पैसों का आपसी विवाद साबित करना चाहा। हालाँकि जब उसका वीडियो सामने तो साहिल खामोश हो गया। वीडियो में साहिल छात्रा के साथ टॉयलेट में लगभग 10 मिनट तक अंदर ही रहा। टॉयलेट से निकल कर वह छात्र के गले पर किस करता है।

इस मामले में भी पीड़िता नाबालिग बताई जा रही है। आरोप है कि साहिल सिद्दीकी हिंदू छात्राओं को विशेष रूप से निशाना बना रहा था। आशीष श्रीवास्तव ने यह भी माँग की है कि साहिल के फंडिंग सोर्स और उसके पीछे की मंशा की भी जाँच की जाए। फिलहाल पुलिस साहिल सिद्दीकी के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर कानूनी कार्रवाई कर रही है। फ़िलहाल पुलिस ने साहिल अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है। उसके खिलाफ जाँच व अन्य कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

राँची में काली मंदिर के पास मिला प्रतिबंधित मांस, स्थानीय हिंदू भड़के: CCTV फुटेज में सब रिकॉर्ड, 3 जगह से मीट से भरे बोरे बरामद

झारखंड की राजधानी राँची में एक बार फिर धार्मिक उबाल पैदा हो गया जब काली मंदिर के सामने प्रतिबंधित मांस मिलने की खबर आई। इस घटना ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया। रविवार को काली मंदिर के सामने और राँची के दो अन्य स्थानों पर मांस के टुकड़े बिखरे पाए गए, जिसने लोगों के गुस्से को भड़काने का काम किया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती – CCTV फुटेज में साफ दिखा कि ये मांस ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर ले जाया जा रहा था और बोरे गिरते समय किसी ने देखा भी नहीं!

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रविवार (29 सितंबर 2024) राँची में एचबी रोड, थड़पखना में सुबह 11.15 बजे एक बोरी में प्रतिबंधित मांस मिला, जिसके बाद लोगों का गुस्सा फूट पाया। लोगों ने लालपुर-अलबर्ट एक्का चौक रोड को जाम कर दिया। वरीय पुलिस अधिकारियों के साथ दुर्गा पूजा समिति और बीजेपी के नेता-कार्यकर्ता भी मौके पर पहुँचे और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन लोगों का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

स्थानीय लोगों ने माँग की कि दोषियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाए और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला बताते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की। मंदिर के पास मांस मिलने की घटना के कारण धार्मिक स्थलों की सुरक्षा पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जब यह हंगामा जारी था, तभी राँची के दो और स्थानों – चडरी सरनास्थल रोड और काली मंदिर रोड पर भी मांस के टुकड़े पाए गए। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इन स्थानों से मांस को हटा लिया ताकि स्थिति और बिगड़ने न पाए। पर सवाल उठता है कि यह मांस यहाँ पहुँचा कैसे? और आखिरकार इसके पीछे कौन लोग हैं?

ट्रैक्टर-ट्रॉली में भरकर माँस की तस्करी? कितना बड़ा नेटवर्क?

मामले की जाँच में बड़ा खुलासा हुआ जब पुलिस ने CCTV फुटेज खंगाले। राँची के एसपी (ग्रामीण) सुमित अग्रवाल के मुताबिक, CCTV फुटेज में साफ दिखा कि सुबह 11:02 बजे एक ट्रैक्टर-ट्रॉली वहाँ से गुजरी थी, जिसमें से एक बोरी गिर गई थी। उस बोरी में प्रतिबंधित मांस भरा हुआ था। ये मांस सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग स्थानों पर मिला है, जिससे यह शक और गहरा हो गया है कि राँची में मांस की तस्करी का एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।

तीन जगहों पर माँस के टुकड़े बोरियों में भरे पाए गए हैं। ट्रैक्टर-ट्रॉली का पता नहीं चल पाया है। हैरानी की बात है कि पुलिस-प्रशासन सिर्फ लोगों के हंगामे को शांत करने में लगा रहा, और तथ्यों के सामने आने के बावजूद उस पर ध्यान नहीं दिया गया। बड़ा सवाल ये है कि उस ट्रैक्टर का क्या हुआ? उस पर लदे हुए अन्य बोरों में क्या था? अगर ये सबकुछ प्रतिबंधित मांस ही था, तो वो कहाँ से आया था और कहाँ गया? आखिर इसका पता पुलिस कब लगाएगी?

राँची जैसे शहर में खुलेआम और बेखौफ होकर प्रतिबंधित मांस की तस्करी की जा रही है और इतना बड़ा पुलिस-प्रशासन और खुफिया तंत्र क्या कर रहा है? बहरहाल, इस पूरे मामले में हंगामे और विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने इलाके में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं। हालात को शांत करने के लिए पुलिस ने आश्वासन दिया है कि मामले की जाँच तेज कर दी जाएगी और दोषियों को 48 घंटों के भीतर गिरफ्तार किया जाएगा। फिलहाल, पुलिस ने सभी संवेदनशील इलाकों में गश्त बढ़ा दी है और लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें।

इजरायल ने हिज्बुल्लाह के बाद हूती आतंकियों पर गिराए बम, कई हताहत: पाकिस्तान में नसरल्लाह की मौत पर शोक मनाते मुस्लिम आपस में लड़े

इजरायल ने हिज्बुल्लाह चीफ हसन नसरल्लाह का काम तमाम करने के बाद अब यमन में हूती आतंकियों पर निशाना साधा है। इस दौरान उन्होंने इजरायली एयरफोर्स के लड़ाकू विमानों से यमन के बंदरगाह शहर होदेइदाह में स्थित हूती आतंकियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले किए।

इस संबंध में इजरायली डिफेंस फोर्स ने ट्वीट जारी किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने इजरायली मिलिट्री इंटेलिजेंस डायरेक्टर के निर्देश पर एयरफोर्स ने रविवार (29 सितंबर 2024) को बड़े पैमाने पर ऑपरेशन में लड़ाकू विमानों से यमन के रास इस्सार और होदेइदाह में स्थित हूती विद्रोहियों के इलाके में हमला किया।

सेना के बयान के अनुसार, “आईडीएफ ने बिजली संयंत्रों और एक बंदरगाह पर हमला किया, जिसका इस्तेमाल तेल आयात करने के लिए किया जाता है।” इजरायली सेना का कहना है कि वह अपन देश के नागरिकों के लिए खतरा पैदा करने वाले किसी भी दुश्मन पर इसी तरह कार्रवाई करेंगे और उनके खात्मे के लिए ऐसे ही प्रतिबद्ध रहेंगे। चाहे वो कितना ही दूर क्यों न बैठा हो।

आईडीएफ के अनुसार, हूती आतंकियों पर हमला हाल में इजरायल पर हुए हमले के बदले किया गया है। इससे पहले उन्होंने शुक्रवार को हिज्बुल्लाह के चीफ हसन नसरल्लाह को मौत के घाट उतारा था। हूती आतंकियों पर हुए हमले में भी चार के मारे जाने की खबर है। वहीं 29 घायल बताए जा रहे हैं।

हूतियों पर हमले ऐसे समय में सामने आए हैं जब उन्होंने फिलीस्तीनियों के साथ एकजुटता दिखाने के चक्कर में हमले किए और इन हमलों को और तेज तब किया जब नसरल्लाह को मौत के घाट उतारा गया। हूती आतंकी अकेले नसरल्लाह की मौत पर रोना नहीं रो रहे थे। पाकिस्तान में भी इस्लामी कट्टरपंथी इसका शोक मना रहे हैं।

पाकिस्तान में भी इस्लामी कट्टरपंथी मना रहे नसरल्लाह की मौत का गम

सामने आई जानकारी के अनुसार नसरल्लाह के मारे जाने के खिलाफ पाकिस्तान के कराची में जमकर विरोध प्रदर्शन किया गया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प भी देखने को मिली। अधिकारियों ने बताया कि हिजबुल्लाह नेता हसन नसरल्लाह की हत्या का विरोध जताने के लिए प्रदर्शनकारी अमेरिकी वाणिज्य दूतावास की ओर जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो प्रदर्शनकारियों उग्र हो गए और हिंसा शुरू हो गई। इस दौरान पुलिस पर पथराव किया जाने लगा, उनसे झड़प हुई। आखिर में पुलिस ने उन्हें तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया।