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‘च**रों तुम्हें रहने नहीं देंगे…’ दिल्ली की तर्ज पर UP में भी हिंदू युवक पर हमला, होली पर अरबाज-शाहबाज-मुस्तफा ने किया अधमरा: पढ़ें- FIR में क्या-क्या लिखा है

होली के रंगों से सराबोर देश में दिल्ली के उत्तम नगर की तर्ज पर एटा के मोहल्ला काजी में एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। मुस्लिम समुदाय के तीन सगे भाइयों ने होली खेल रहे ST हिंदू युवक आकाश को कपड़ों पर रंग गिरने के बहाने गंदी गालियाँ दीं, फिर लाठी-डंडे और पिस्तौल की बट से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। पीड़ित की बहन और भाभी बचाने आईं तो उनके साथ भी मारपीट की गई।

आरोपितों ने पीड़ित दलित परिवार इलाका छोड़ने की धमकी देते हुए कहा, “तुम्हें यहाँ रहने नहीं देंगे, जान से मार देंगे।” यह घटना ठीक दिल्ली के उत्तम नगर वाली हत्या की तरह है, जहाँ होली के पानी के गुब्बारे के विवाद में मुस्लिम युवकों ने 26 वर्षीय तरुण कुमार की पत्थर मारकर हत्या कर दी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की तर्ज पर एटा जिले के सकीट थाना क्षेत्र के मोहल्ला काजी में 4 मार्च 2026 को रात 8 बजे ठीक वैसी ही घटना घटी। 22 वर्षीय आकाश पुत्र विनोद अपने घर के बाहर होली खेल रहा था। इसी दौरान मोहल्ले के ही अरबाज, शाहबाज और मुस्तफा (तीनों सगे भाई, अब्बू का नाम मुइल्तयार अली) उधर से गुजरे। गलती से रंग उनके कपड़ों पर गिर गया। इसके बाद तीनों ने आकाश की माँ-बहन को गंदी-गंदी गालियाँ देना शुरू कर दिया।

आकाश ने गालियाँ बंद करने को कहा तो आरोपियों ने उसे जमीन पर गिराकर लाठी-डंडों से जमकर पीटा। अरबाज ने अपने पास रखी तमंचे की बट से आकाश के सिर पर जोरदार वार किया। सिर फट गया, नाक में गंभीर चोट आई। खून से लथपथ आकाश की चीख सुनकर बहन और भाभी बचाने पहुँचीं तो मुस्तफा और अरबाज ने उनके साथ भी मारपीट की। काफी भीड़ इकट्ठा हो गई तो आरोपितों ने धमकाते हुए कहा, “च**रो, तुम्हें यहाँ रहने नहीं देंगे” और जान से मारने की धमकी देकर भाग गए।

एफआईआर की कॉपी

पीड़ित आकाश ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को सकीट थाने में लिखित तहरीर दी। इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2) (स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुँचाना), 351(3) (हमला), 352 (मारपीट) और अनुसूचित जाति एवँ जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(2)(va) लगाई गई। पीड़ित दलित समुदाय से है, इसी कारण SC/ST एक्ट भी दर्ज किया गया है।

FIR की कॉपी के मुताबिक, पीड़ित ने बताया, “प्रार्थी के माँ-बहन की गंदी गाली देने लगे… जमीन पर गिराकर लाठी डंडे से जमकर मारा पीटा… अरबाज ने तमंचे की बट से सिर पर वार किया… बहन बीना व भाभी वर्षा बचाने आईं तो मुस्तफा व अरबाज ने मारपीट की… चमारो तुम्हें यहाँ रहने नहीं देगें… जान से मारने की धमकी देते हुए भाग गए।”

थाना प्रभारी विदेश राठी ने बताया, “होली के दिन मोहल्ला काजी में मारपीट हुई, आकाश पुत्र विनोद को गंभीर चोटें आई हैं। चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया। तहरीर के आधार पर FIR दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। आरोपितों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज है, जाँच चल रही है।”

दिल्ली और एटा की घटनाओं का पैटर्न एक जैसा

मोहल्ला काजी में दोनों समुदायों के लोग रहते हैं। घटना के बाद हल्का तनाव है, लेकिन पुलिस ने भारी फोर्स तैनात कर स्थिति नियंत्रण में रखी है। आकाश का परिवार डरा हुआ है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि छोटी सी बात पर इस कदर बेरहमी से पीटा गया, जैसे दिल्ली में तरुण के साथ हुआ। दोनों मामलों में सगे भाइयों का गिरोह, होली का बहाना, गाली-गलौज से शुरू होकर हत्या/अधमरा करने तक का पैटर्न एक जैसा है। दिल्ली में उमरुद्दीन, कमरुद्दीन जैसे भाइयों ने तरुण को मार डाला, तो एटा में अरबाज, शाहबाज, मुस्तफा ने आकाश को निशाना बनाया।

होली पर मुस्लिमों का हमला
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

दोनों घटनाएँ त्योहार के मौके पर सांप्रदायिक हमलों के मामलों को उजागर करती हैं। हिंदू युवक छोटी सी गलती या बहाने पर निशाने पर आ जाते हैं। एटा पुलिस ने आश्वासन दिया है कि आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह घटना सिर्फ एक FIR नहीं, बल्कि पूरे देश में होली जैसे त्योहारों पर बढ़ते सांप्रदायिक हमलों का प्रतिबिंब है।

Ex मुस्लिम सलीम के हमलावरों के लिए रो रहे पड़ोसी, अब्बा कह रहा- ‘लोग बनेंगे डकैत’: क्या सिर्फ मजहब के आधार पर जीशान-गुलफाम के साथ खड़े कट्टरपंथी?

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में दो सगे भाइयों जीशान और गुलफाम ने Ex मुस्लिम और यूट्यूबर सलीम वास्तिक का गला रेत दिया था। घटना के कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने दोनों भाइयों का एनकाउंटर कर दिया। दोनों भाइयों ने रोके जाने की कोशिश के दौरान पुलिस पर फायरिंग की और क्रास फायरिंग में पुलिस की गोली लगने से मारे गए।

दोनों भाइयों ने जिस तरह सलीम की गर्दन काटी थी, उसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। दोनों भाइयों ने पेशेवर अपराधी की तरह सलीम पर चाकू से करीब एक दर्जन वार किए। एक भाई के पास एनकाउंटर के वक्त पुलिस को इटली की पिस्टल भी मिली थी। इससे साफ है कि दोनों भाई कोई एक दिन जाकर अचानक अपराधी नहीं बन गए बल्कि कट्टरपंथ का जहर उनके भीतर तक फैला था।

दोनों भाई एक टेलीग्राम ग्रुप ‘मुस्लिम आर्मी मेहदी मॉडरेटर’ से भी जुड़े थे जहाँ से उनके ‘जिहादी’ विचारों को पानी मिल रहा था। हजारों लोगों की मौजूदगी वाले इस कट्टरपंथी ग्रुप के जरिए लोगों के मन में घृणा भरी जा रही थी। ये सब बातें हम आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि अभी भी कुछ लोगों के लिए वे दोनों दरिंदे पाक साफ हैं, पीड़ित हैं और दोषी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार है।

सबसे पहले जीशान-गुलफाम के अब्बू बुनियाद अली की बात सुनते हैं। बुनियाद अली ने कहा कि जो आज बोया जा रहा है उसके काँटे 20 साल बाद निकलेंगे। बुनियाद ने कहा कि हिंदुस्तान में ऐसे काँटे बो दिए गए हैं कि आज की पीढ़ी तबाह हो गई है और उनके बच्चे डकैती करेंगे।

ये बुनियाद का कोई इकलौता बयान नहीं है, एक अन्य वीडियो में वो दोनों को शहीद बताता नजर आया। बुनियाद से पूछा गया कि दो बेटे मरे हैं, उसके चेहरे पर कोई दुख नहीं है। इस पर वो कहता है, “इस्लाम की हकीकत बताऊँ? हुसैन ने भी 72 शहीदों को कंधा दिया था।”

इसके अलावा बुनियाद ने एक अन्य शख्स से बातचीत में कहा, “कोर्ट कार्रवाई करे, सुप्रीम कोर्ट बैठा है, अगर सबने चूड़ियाँ पहन ली हैं तो फिर जैसे जिसका आए तो ठीक है। कोर्ट सब बेकार हो गए।” बुनियाद ने ड्रेमेटिक अंदाज में योगी आदित्यनाथ पर सवाल उठाए और कहा, “मुझे भी मार दो, खत्म करो।”

UP Tak के एक पत्रकार अमरोहा में उस गाँव में पहुँचे जहाँ दोनों भाई रहते थे। पत्रकार से बातचीत में जमील अहमद नाम के एक ग्रामीण ने कहा कि दोनों बहुत नेक लड़के थे और उनमें कोई फाल्ट नहीं था। वो बार दोनों को बेचारा कहता रहा और अंत में बोला कि एनकाउंटर गलत किया गया है।

जाकिर अली नाम के एक-दूसरे ग्रामीण ने कहा कि इस एनकाउंटर का पूरी बस्ती को अफसोस है। जाकिर बोलते-बोलते रोने लगा और कहने लगा कि रोजे में यहाँ किसी ने कुछ नहीं खाया है। हालाँकि, उसने यह जरूर कहा कि किसी ने उन्हें भड़काया होगा। मोहम्मद अयूब नाम के एक पड़ोसी ने कहा कि दोनों नेक बच्चे थे और ऐसे ही चले गए। अयूब ने कहा कि हमारी नजर में तो उन दोनों को कोई फॉल्ट नहीं है। जब अयूब से सलीम का गला रेते जाने को लेकर पूछा भी गया तो उन्होंने कहा कि इसकी उन्हें जानकारी नहीं है।

कट्टरपंथियों के लिए निकलता दर्द, गला रेतने पर खामशी

यह घटना केवल एक शख्स की गर्दन रेते जाने या कोई एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं है बल्कि यह कट्टरपंथी समाज की सोच और संवेदनाओं पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। और ऐसे में इन सभी लोगों के बयान सुनने के बाद एक सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जघन्य अपराध के आरोपियों के लिए आँसू बहाए जा रहे हैं जबकि उस व्यक्ति के दर्द और उसके परिवार की पीड़ा पर की कोई बात नहीं कर रहा है जिसकी गर्दन रेत दी गई, जिस पर चाकू से वार पर वार किए गए।

आरोपितों के गाँव के लोगों के मन में एक बार भी यह बात नहीं आई कि जीशान-गुलफाम ने कुछ गलत किया है। ऐसा क्यों हुआ होगा? क्या ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि सलीम ने इस्लाम की कट्टरता और कुरीतियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे तो क्या वो इस्लाम में होते हुए भी उम्माह का हिस्सा नहीं रहा था क्योंकि उसने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

यहाँ एक बात और जो भुला दी गई वो ये कि उन दोनों को कहीं सोते या पुण्य काम करते नहीं मारा गया। दोनों आरोपित पुलिस पर फायरिंग कर रहे थे और अपनी जान बचाने के लिए पुलिस की जान लेने पर आमादा थे। पुलिसकर्मी घायल तक हुए। तो ये कोई एकतरफा कार्रवाई नहीं थी लेकिन ऐसे मामलों में में जब पुलिस की कार्रवाई होती है तो अचानक सहानुभूति की लहर उठने लगती है। पीड़ित के लिए नहीं बल्कि आरोपित के लिए।

जब कोई अपराध इतना क्रूर हो कि वह इंसानियत की सीमाओं को ही पार कर जाए, तब आरोपित के लिए कितनी इंसानियत दिखानी चाहिए, क्या दिखानी भी चाहिए? अव्वल तो समाज को साफ शब्दों में यह कहना चाहिए कि ऐसी हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

ऐसे में एक खतरा और है, या यूँ कहें कि संदेश है वो ये कि अगर इस तरह के अपराध किए जाएँगे तब भी समाज का एक तबका आपकी मजहबी पहचान के आधार पर आपके साथ खड़ा रहेगा फिर चाहे आपने कितना ही वीभत्स गुनाह क्यों ना किया हो।

अगर मजहबी पहचान को न्याय और नैतिकता से ऊपर रख दिया जाएगा तो यह समाज के लिए गंभीर समस्या है और इस मामले में यही होता दिख रहा है। यह जानते हुए भी कि जीशान-गुलफाम ने गुनाह किया है लोग केवल मजहबी पहचान के आधार पर उसके साथ खड़े नजर आ रहे हैं।

इसी तरह की घटनाएँ ना केवल आपसी अविश्वास और सामाजिक तनाव बढ़ाती है बल्कि लोकतांत्रिक समाज के लिए बहुत नुकसानदायक हैं।

आधुनिक बिहार के ‘शिल्पकार’ की विदाई, 20 साल के ‘सुशासन’ के बाद जा रहे नीतीश: जानें- महिला शिक्षा से सुरक्षा तक, कैसे बदली राज्य की तकदीर

राजनीति की बिसात पर जब कोई मोहरा अपनी चाल चलता है, तो हार-जीत के आँकड़े गिने जाते हैं। लेकिन जब कोई जननायक विदा लेता है, तो आँकड़े नहीं, आँखें बोलती हैं। भारतीय राजनीति जब कोई नेता पद छोड़ता है, तो अक्सर सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसर जाता है, लेकिन पार्टी के कार्यकर्ताओं की आँखों में आँसू कम ही देखे जाते हैं। राजनीति की इस काजल की कोठरी में जहाँ हर कदम पर दाग लगने का डर रहता है, वहाँ एक नाम ऐसा है जिसने उजले कपड़े पहनकर प्रवेश किया और दो दशकों के सफर के बाद भी बेदाग निकल आया। वह नाम है ‘नीतीश कुमार’।

जिन पर न तो कभी परिवारवाद का साया पड़ा और न ही भ्रष्टाचार का कोई छींटा। आज जब नीतीश कुमार बिहार की सत्ता की बागडोर छोड़कर राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो यह केवल एक नेता का पद छोड़ना नहीं है, बल्कि बिहार के राजनीतिक इतिहास के एक स्वर्णिम ‘नीतीश युग’ का समापन है। नीतीश कुमार का यह कदम बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है।

2005 में जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तब बिहार प्रशासनिक कमजोरी, जातीय हिंसा और फिरौती जैसे अपराधों के गहरे संकट में था। आज 20 साल बाद, बिहार ने स्थिरता, विकास और संस्थागत मजबूती की एक लंबी दूरी तय कर ली है। नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाएँगे, ताकि वे संसद के दोनों सदनों और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य बनने की अपनी इच्छा को पूरा कर सकें। उनके इस प्रस्थान के साथ ही बिहार के विकास की वो गाथा याद आती है, जिसे उन्होंने अपने विजन और कठिन परिश्रम से लिखा है।

कानून का राज: ‘जंगलराज’ से ‘जीरो टॉलरेंस’ तक का सफर

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले बिहार की पहचान जातीय हिंसा, फिरौती के लिए अपहरण और चरमराई कानून-व्यवस्था से होती थी। शाम ढलते ही सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था। नीतीश ने सत्ता संभालते ही ‘थ्री सी’ (3C) का मंत्र दिया- करप्शन, क्राइम और कम्युनलिज्म के प्रति जीरो टॉलरेंस। उन्होंने पुलिस व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव किए और प्रशासनिक अनुशासन को प्राथमिकता दी।

नीतीश कुमार की सरकार ने ‘स्पीडी ट्रायल’ की शुरुआत की, जिससे कुख्यात अपराधियों को कम समय में सजा मिलना सुनिश्चित हुआ। इसके कारण अपराधियों में खौफ पैदा हुआ और वर्षों से फरार चल रहे बाहुबली सलाखों के पीछे पहुँचे। पुलिस स्टेशनों की कार्यप्रणाली में सुधार किया गया और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए नौकरशाही की जवाबदेही तय की गई। इसी सुरक्षा के माहौल ने आम जनता में वह भरोसा जगाया, जिससे राज्य में निवेश और आर्थिक गतिविधियों के द्वार खुले। आज बिहार में महिलाएँ रात में भी बेखौफ होकर घर से बाहर निकल सकती हैं, जो कभी एक सपना मात्र था।

आधी आबादी का सशक्तिकरण: साइकिल से लेकर 50% आरक्षण तक

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी जीत महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता रही है। उन्होंने महिलाओं को केवल ‘वोट बैंक’ नहीं समझा, बल्कि उन्हें राज्य के विकास का केंद्र बनाया। वर्ष 2006 में उन्होंने पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने का ऐतिहासिक फैसला लिया। यह देश में अपनी तरह की पहली पहल थी, जिसने हजारों महिलाओं को चूल्हे-चौके से निकालकर राजनीति की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। आज बिहार की पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी 55% तक पहुँच चुकी है।

शिक्षा के क्षेत्र में ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ और ‘पोशाक योजना’ ने एक सामाजिक क्रांति ला दी। सड़कों पर साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियाँ बदलते बिहार का सबसे सशक्त प्रतीक बन गईं। इसके साथ ही, ‘जीविका’ (SHG) कार्यक्रम के जरिए 1.40 करोड़ से अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया गया। आज ये ‘जीविका दीदियाँ’ न केवल अपना घर चला रही हैं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था में भी सक्रिय योगदान दे रही हैं। सरकारी नौकरियों में महिलाओं को मिलने वाला 35% क्षैतिज आरक्षण और पुलिस बल में 30% महिलाओं की मौजूदगी नीतीश सरकार की उन नीतियों का परिणाम है, जिसने बिहार को महिला सशक्तिकरण के वैश्विक मानचित्र पर ला दिया।

शिक्षा और स्वास्थ्य: बुनियादी ढांचे का पुनर्जन्म

शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए नीतीश सरकार ने शिक्षकों की बड़े पैमाने पर बहाली की और स्कूलों के भवन निर्माण पर जोर दिया। ‘अक्षर अंचल योजना’ के माध्यम से 67 लाख से अधिक महिलाओं को साक्षर बनाया गया। मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों में 33 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने सुनिश्चित किया कि बिहार की बेटियाँ हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें। अल्पसंख्यक और महादलित समुदाय के बच्चों के लिए ‘हुनर’ और ‘औजार’ जैसे कार्यक्रम चलाकर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षित किया गया।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी बदलाव की लहर स्पष्ट दिखी। वर्ष 2005 में जहाँ सरकारी अस्पतालों की स्थिति दयनीय थी, वहीं नीतीश सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक दवाइयों और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित की। ‘जननी बाल सुरक्षा योजना’ और ‘कन्या उत्थान योजना’ जैसे कदमों से संस्थागत प्रसव (Institutional Delivery) की दर 4% से बढ़कर 50% के पार पहुँच गई। आज हर जिले में आधुनिक सुविधाओं से लैस अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बिहार की बदलती तस्वीर बयाँ कर रहे हैं।

विकास का सात निश्चय और आधारभूत संरचना

नीतीश कुमार ने बिहार को सड़कों और पुलों का जाल दिया। ‘सात निश्चय’ योजना (1 और 2) के तहत ‘हर घर नल का जल’, ‘पक्की गली-नालियाँ’ और ‘हर घर बिजली’ जैसे वादों को धरातल पर उतारा। बिहार का बजट, जो 2004-05 में मात्र 24,000 करोड़ रुपए था, आज बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। प्रति व्यक्ति आय में भी लगभग 9 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है।

राजगीर में ‘ग्लास स्काई वॉक’, बिहार संग्रहालय, बापू टावर और पटना मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट्स ने बिहार को आधुनिकता से जोड़ा। वहीं, गंगा पथ (पटना का मरीन ड्राइव) और वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेस-वे जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर ने व्यापारिक गतिविधियों को नई गति दी। नीतीश सरकार ने पर्यटन को भी बढ़ावा दिया, जिससे राजगीर, बोधगया और वैशाली जैसे स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन केंद्र बन गए।

शराबबंदी: एक कड़ा और साहसी सामाजिक फैसला

नीतीश कुमार के सबसे चर्चित और विवादास्पद फैसलों में से एक रहा- पूर्ण शराबबंदी। 2016 में महिलाओं की माँग पर लिए गए इस फैसले ने राज्य के राजस्व को करीब 10 हजार करोड़ रुपए का नुकसान पहुँचाया, लेकिन इसका सामाजिक प्रभाव गहरा रहा।

अध्ययनों के अनुसार, शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में 35-40% की कमी आई और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। आलोचकों के बावजूद, नीतीश अपने इस फैसले पर अडिग रहे, क्योंकि वे इसे केवल एक कानून नहीं बल्कि एक व्यापक ‘समाज सुधार’ के रूप में देखते थे।

सुशासन के सारथी का विदाई संदेश

नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर किसी मिसाल से कम नहीं है। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद लोहिया के समाजवाद को अपनी रगों में बसाने वाले नीतीश ने बिहार को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाई है।

अक्सर उन्हें ‘पलटू राम’ कहकर आलोचना की जाती है, लेकिन हम बारीकी से देखें, तो उनके हर राजनीतिक कदम के केंद्र में बिहार का हित और ‘न्याय के साथ विकास’ का एजेंडा रहा है। उन्होंने गठबंधन भले ही बदले, लेकिन अपने शासन के मूल्यों और प्राथमिकताओं से कभी समझौता नहीं किया।

नीतीश कुमार ने राजनीति में वह शुचिता दिखाई जो आज के दौर में दुर्लभ है। जब वे सत्ता छोड़ रहे हैं, तो उनके पास विरासत के नाम पर न कोई महल है और न ही करोड़ों की बेनामी संपत्ति। उनके पास है तो बस करोड़ों बिहारियों का भरोसा और वो लाखों दुआएँ जो उन बेटियों ने दीं जिन्हें साइकिल और शिक्षा का पंख दिया।

राज्यसभा में उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति को एक अनुभवी और और दूरदर्शी ने नेतृत्व प्रदान करेगी। बिहार नीतीश को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में याद रखेगा जिसने धूल से सने राज्य को उठाकर विकास के शिखर की ओर अग्रसर किया।

नेपाली Gen-Z आंदोलन को दिशा देने वाले बालेन शाह बनेंगे PM, भारत में पढ़ाई लेकिन दिल में नफरत: जानें दिल्ली की तरफ झुकेंगे या बनेंगे अमेरिका के पिट्ठू?

नेपाल की राजनीति इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। 5 मार्च 2026 को हुए आम चुनाव के बाद जारी मतगणना के शुरुआती रुझानों में 35 वर्षीय बालेन शाह और उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को भारी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। 165 सीटों वाली संसद में उनकी पार्टी 100 से अधिक सीटों पर आगे बताई जा रही है।

यदि अंतिम परिणाम भी इसी दिशा में आते हैं तो नेपाल की राजनीति में दशकों से सक्रिय पारंपरिक दलों, नेपाली कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को बड़ा झटका लग सकता है। हालाँकि बालेन शाह का संभावित सत्ता में आना केवल राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राष्ट्रवादी बयानबाजी और पड़ोसी देशों पर तीखी टिप्पणियों से भी जोड़ा जा रहा है।

बालेन शाह खुद को नई पीढ़ी का नेता बताते हैं, लेकिन उनके आलोचक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो आक्रामक बयानबाजी, जनभावनाओं को भड़काने और राजनीतिक अस्थिरता से फायदा उठाने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनते हैं तो इसका असर केवल नेपाल की राजनीति तक सीमित रहेगा या भारत-नेपाल संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ेगा।

चुनावी रुझानों ने नेपाल की राजनीति में मचाया भूचाल

नेपाल में इस बार का चुनाव सामान्य परिस्थितियों में नहीं हुआ था। 2025 में देश गंभीर राजनीतिक संकट से गुजरा। सितंबर 2025 में सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध से शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन जल्द ही सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गया।

राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें लगभग 19 लोगों की मौत हुई और 300 से अधिक लोग घायल हुए। इन घटनाओं के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और संसद भंग हो गई।

इसके बाद नए चुनाव की घोषणा की गई। अब उसी राजनीतिक अस्थिरता के बाद हुए चुनावों में बालेन शाह की पार्टी को बड़ी बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यदि यह रुझान परिणामों में बदलता है तो यह नेपाल की राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन होगा।

कौन हैं बालेन शाह: रैपर से संभावित प्रधानमंत्री तक

बालेन शाह का पूरा नाम बालेंद्र शाह है। उनका जन्म 1990 में काठमांडू में हुआ था। उनके पिता राम नारायण शाह आयुर्वेद के चिकित्सक थे और उनकी माँ गृहिणी थीं। उन्होंने नेपाल में सिविल और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में भारत के कर्नाटक स्थित विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से मास्टर्स डिग्री हासिल की।

2015 में आए विनाशकारी नेपाल भूकंप के बाद उन्होंने पुनर्निर्माण के कुछ कार्यों में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी असली पहचान एक इंजीनियर के रूप में नहीं बल्कि रैपर और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के रूप में बनी। उनकी लोकप्रियता का आधार उनके गाने और सोशल मीडिया पोस्ट रहे, जिनमें वे नेपाल की राजनीति और नेताओं पर तीखे हमले करते थे।

बालेन शाह के कई रैप गाने नेपाल की राजनीति पर सीधा हमला करते थे। उनका गाना ‘बलिदान’ युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। इस गाने में उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था पर हमला करते हुए कहा कि देश को बचाने का दावा करने वाले नेता ही देश को बर्बाद कर रहे हैं। नेपाल के युवाओं के बीच यह गाने व्यवस्था विरोधी भावना को बढ़ाने वाले माने गए।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने इसी असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदलने का काम किया।

काठमांडू के मेयर बनकर बढ़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा

2022 में बालेन शाह ने काठमांडू के मेयर का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने पारंपरिक दलों के उम्मीदवारों को हराकर जीत हासिल की। उन्हें लगभग 61 हजार से अधिक वोट मिले। हालाँकि मेयर बनने के बाद उनका कार्यकाल भी विवादों से भरा रहा।

उन्होंने कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और राष्ट्रीय नेताओं के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आक्रामक बयान दिए। कुछ मामलों में उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिसे कई राजनीतिक विश्लेषकों ने गैर-जिम्मेदाराना बताया।

Gen-Z आंदोलन: समर्थन, उकसावे और राजनीतिक लाभ के आरोप

सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन में बालेन शाह का नाम लगातार चर्चा में रहा। 7 सितंबर 2025 को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर युवाओं के आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि Gen-Z की सोच और इच्छाशक्ति को समझना जरूरी है और वे उनके साथ हैं।

इसके अगले दिन काठमांडू समेत कई शहरों में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन जल्द ही हिंसक हो गए और कई जगह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। इस आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाने की माँग भी तेजी से बढ़ी।

आलोचकों का कहना है कि बालेन शाह ने युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक मौके में बदलने की कोशिश की। हालाँकि बाद में उन्होंने प्रदर्शनकारियों से शांत रहने की अपील भी की।

भारत विरोधी बयान और विवादों का लंबा इतिहास

बालेन शाह कई बार भारत को लेकर विवादित बयान दे चुके हैं। 2023 में जब भारत में संसद के नए भवन में ‘अखंड भारत’ का नक्शा चर्चा में आया तो इसके जवाब में उन्होंने अपने कार्यालय में ‘ग्रेटर नेपाल’ का नक्शा लगा दिया। इस नक्शे में भारत के कई क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया था।

इसी साल फिल्म ‘आदिपुरुष’ को लेकर भी उन्होंने विवाद खड़ा कर दिया। उनका आरोप था कि फिल्म में माता सीता को भारत की बेटी बताया गया है। इसके विरोध में उन्होंने काठमांडू में भारतीय फिल्मों की स्क्रीनिंग पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि बाद में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रतिबंध हटाना पड़ा।

नवंबर 2025 में बालेन शाह ने फेसबुक पर एक विवादित पोस्ट लिखी जिसमें भारत, अमेरिका और चीन के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया था। इस पोस्ट में उन्होंने कई देशों और राजनीतिक दलों के लिए गालियाँ लिखीं। बाद में यह पोस्ट हटा दी गई, लेकिन तब तक यह सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी थी।

उस पोस्ट में लिखा था: “F**k America, F**k India, F**k China, F**k UML, F**k Congress, F**k RSP, F**k RPP, F**k Maobaadi, Go to hell, you guys all combined can do nothing” दिलचस्प बात यह है कि बाद में बालेन उसी RSP पार्टी में शामिल हो गए, जिसे उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में निशाना बनाया था।

अमेरिका से करीबी संपर्क को लेकर उठते सवाल

बालेन शाह को लेकर यह चर्चा भी रही है कि उनके अंतरराष्ट्रीय संपर्क काफी मजबूत हैं। उन्हें 2023 में टाइम मैगजीन की प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया गया था। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी उन्हें काफी कवरेज मिली। काठमांडू के मेयर रहते हुए उनकी मुलाकात नेपाल में अमेरिकी राजदूत से कई बार हुई।

इन बैठकों की तस्वीरें भी सार्वजनिक हुईं। इसी वजह से नेपाल की राजनीति में कुछ लोग उन्हें अमेरिका के प्रभाव वाला नेता भी बताते हैं। हालाँकि उनके समर्थक इसे सामान्य कूटनीतिक संपर्क बताते हैं। नेपाल की विदेश नीति लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है।

बालेन शाह ने भी कई बार कहा है कि नेपाल को अपने हितों के आधार पर दोनों देशों के साथ संबंध रखने चाहिए। हालाँकि चुनाव के दौरान उन्होंने चीन से जुड़े कुछ औद्योगिक परियोजनाओं को अपने घोषणा पत्र से हटा दिया। कुछ विश्लेषकों ने इसे भारत को संदेश देने की कोशिश बताया। फिर भी यह स्पष्ट नहीं है कि सत्ता में आने के बाद वे भारत और चीन के बीच किस तरह की रणनीति अपनाएँगे।

अगर बालेन शाह बने PM तो भारत के लिए क्या चुनौती?

भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और आर्थिक संबंध भी काफी मजबूत हैं, लेकिन बालेन शाह के पिछले बयानों और विवादों को देखते हुए यह आशंका जताई जा रही है कि उनकी सरकार भारत के साथ संबंधों को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वे राष्ट्रवादी राजनीति के जरिए घरेलू समर्थन बनाए रखने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे समय-समय पर भारत-नेपाल संबंधों में तनाव पैदा हो सकता है। बालेन शाह की लोकप्रियता मुख्य रूप से सोशल मीडिया और युवाओं के बीच उनकी छवि पर आधारित है।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि लोकप्रियता और शासन क्षमता अलग चीजें होती हैं। नेपाल इस समय आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या एक रैपर से राजनेता बने नेता इन जटिल समस्याओं से निपट पाएँगे या उनकी राजनीति केवल जनभावनाओं को भड़काने तक ही सीमित रहेगी।

अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो नेपाल की राजनीति में एक नई शैली देखने को मिल सकती है। लेकिन यह भी संभव है कि उनकी आक्रामक और विवादास्पद राजनीति नेपाल के भीतर और पड़ोसी देशों के साथ नए तनाव पैदा कर दे।

आने वाले दिनों में अंतिम चुनाव परिणाम और उसके बाद बनने वाली सरकार यह तय करेगी कि बालेन शाह का उभार नेपाल के लिए स्थायी बदलाव साबित होगा या नई राजनीतिक अनिश्चितता की शुरुआत।

US का दावा कुछ भी हो, भारत लगातार खरीदता रहा है रूसी तेल: पढ़ें कैसे ‘जहाँ सस्ता मिले’ की नीति पर चलता रहा है हिंदुस्तान

भारतीय समय के मुताबिक अमेरिका ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को नई दिल्ली को 30 दिन का समय दिया कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी टैंकरों से कच्चा तेल खरीद सकता है, क्योंकि ईरान-इजराइल संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बाधित हो गई है। यह आधिकारिक आदेश सिर्फ उन शिपमेंट्स के लिए है जो अभी समुद्र में हैं। बयान में यह भी साफ कहा गया कि ईरान से ऐसे कोई खरीदारी की इजाजत नहीं दी जा रही, क्योंकि ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं।

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ की कि उन्होंने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को आने वाले खतरे से निपटने के लिए बड़ा फैसला लिया है, बिना रूस को कोई फायदा दिए। उन्होंने लिखा, “उनकी एनर्जी एजेंडा की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। ग्लोबल मार्केट में तेल का बहाव जारी रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का अस्थायी छूट दे रहा है।”

उस संदेश में सबसे अहम शब्द था ‘अलाउ’ यानी इजाजत देना। ट्रंप प्रशासन ने जोर देकर कहा कि वो भारत को जरूरी कच्चा तेल खरीदने के लिए रूसी टैंकरों से छूट ‘दे रहा है’। अपनी तारीफ बढ़ाने के लिए बेसेंट ने इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समझदारी और मेहरबानी बता दिया।

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

भारत के करीब 40 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से आता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है जो अभी ईरान के नियंत्रण में है। मोदी सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि देश एनर्जी सुरक्षा के मामले में बहुत आरामदायक स्थिति में है और हर दिन दो बार अपनी एनर्जी स्थिति का जायजा ले रहा है। स्टॉक की स्थिति भी अच्छी है और रोजाना भराई हो रही है। इसके अलावा भारत दूसरे स्रोतों से भी बात कर रहा है ताकि तेल का बहाव बिना रुके जारी रहे।

भारत सिर्फ अपने हितों को देखता है, अमेरिका को ‘अलाउ’ करने का कोई अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका का यह नया कदम कई असफल दबाव वाली रणनीतियों के बाद आया है, जिसमें अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाकर कुल 50 प्रतिशत करना और भारत को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ के नाम पर रूसी तेल छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। दूसरी ओर नई दिल्ली ने बार-बार जोर दिया कि उसके फैसले अपनी संप्रभुता और हितों पर आधारित हैं, इसलिए वो किसी चुनौती के सामने नहीं झुकने वाला।

मॉस्को से तेल की खरीद हर महीने विभिन्न कारणों से ऊपर-नीचे होती रही, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, भले ही वाशिंगटन कुछ भी कहे। असल में भारत रूसी विक्रेताओं से लगातार संपर्क में रहा ताकि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अपनी एनर्जी जरूरतें पूरी की जा सकें।

रीटर्स ने हाल ही में एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जो बात साफ कर देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की रूसी तेल खरीद निश्चित रूप से बढ़ गई। लेकिन यह इसलिए नहीं क्योंकि भारत ‘युद्ध को फंडिंग’ देना चाहता था। भारत का उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। भारत ने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था। और देश की जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदना भारत सरकार के लिए NATO नेताओं और यूरोपीय मीडिया को खुश करने से ज्यादा अहम था।

फोटो साभार: रायटर्स

रीटर्स के ऊपर वाले इन्फोग्राफिक में साफ दिखता है कि अक्टूबर 2025 के बाद भारत की रूसी तेल खरीद थोड़ी कम हुई, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, जैसा अमेरिका दावा करना चाहता है।

इसलिए अमेरिका का यह खुद को बड़ा बताना सिर्फ खोखली श्रेष्ठता का एक और प्रयास है जबकि वो खुद को मेहरबान महाशक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है, जो हकीकत से बिल्कुल उलट है।

अमेरिकी छूट से पहले ही रूसी तेल के कार्गो भारत लौट आए

भारत ने ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘इजाजत’ आने से पहले ही समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों से तेल लेना शुरू कर दिया था ताकि मिडिल ईस्ट से आने वाले कच्चे तेल की कमी पूरी हो सके, क्योंकि उस इलाके में तनाव बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले से सुरक्षित किए गए 1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल का बड़ा हिस्सा शायद अमेरिका के इस नए बयान से पहले ही लिया जा चुका था।

भारत सरकार के सूत्रों ने पहले ही कहा था कि फरवरी में रूस भारत का टॉप एनर्जी सप्लायर में से एक था। फरवरी में भारत ने 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया।

ब्लूमबर्ग के शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में रूसी कच्चे तेल के लगभग 1.5 करोड़ बैरल टैंकरों पर हैं जबकि सिंगापुर के पास और 70 लाख बैरल हैं। एक हफ्ते के अंदर ये सब भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कुछ और सूज सागर और भूमध्य सागर से होते हुए उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं।

रूसी तेल वाले टैंकरों ने अपने रूट बदलकर भारतीय बंदरगाहों की ओर इशारा करना शुरू कर दिया था, इससे पहले कि व्हाइट हाउस से ‘हम इजाजत दे रहे हैं’ वाला नोटिस आया। केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज जो उराल्स तेल ले जा रहे हैं, वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनी के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यह विकास “जल्द ही मात्रा को 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर ले जा सकता है।”

एक सूत्र ने बताया कि सूजमैक्स टैंकर ओड्यून जो लगभग 10 लाख बैरल ले जा रहा था। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 4 मार्च को पूर्वी पारादीप बंदरगाह पर राज्य रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को तेल देने के लिए दिखा।

इसके अलावा आईओसी को 7 मार्च यानी शनिवार को पश्चिम भारत के वडिनार बंदरगाह पर स्प्रिंग फॉर्च्यून से लगभग 7 लाख बैरल रूसी तेल मिलने की उम्मीद है। आईओसी के सूत्र ने बताया कि कंपनी रूस से खरीदारी तेज कर रही है जिसमें भारत के आसपास घूम रहे जहाजों पर रखे कंटेनर शामिल हैं।

मीडिया हाउस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि भारतीय जल क्षेत्र के पास लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल तैर रहा है और कुछ हफ्तों में पहुंच सकता है। एक और भारतीय रिफाइनर ने भी इस तेल का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई है। रितोलिया ने कहा, “अगर मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल कम हो जाता है तो भारतीय रिफाइनर जल्दी ही रूसी ग्रेड की ओर मुड़ सकते हैं।”

उन्होंने देखा कि सिंगापुर स्ट्रेट, अरब सागर क्षेत्र और हिंद महासागर में लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल जहाजों पर उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा तेल भी शामिल है।

ब्लूमबर्ग की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, केप्लर और वोर्टेक्सा के ट्रैकिंग विश्लेषण से पता चला कि दो टैंकर जो कुल 14 लाख बैरल उराल्स कच्चा तेल ले जा रहे हैं, वे इस हफ्ते भारतीय बंदरगाहों पर उतारने जा रहे हैं, पहले वे पूर्व की ओर जाने का संकेत दे रहे थे।

5 मार्च को मटारी नाम का आफ्रामैक्स टैंकर जो लगभग 7 लाख बैरल ले जा रहा था, वडिनार पहुँचने वाला था। अरब सागर में एक और सूजमैक्स इंड्री जो 730 हजार बैरल से ज्यादा उराल्स लेकर सिंगापुर जा रहा था, इस हफ्ते अचानक उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया। पिछले साल ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन तीनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

भारत अपनी नीति खुद बनाता है, व्हाइट हाउस की ‘इजाजत’ से नहीं

ऊपर दिया डेटा साफ कर देता है कि भारत को समय देने का अमेरिका का दावा सिर्फ एक हताश कोशिश है जहाँ उसे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। नई दिल्ली ने कभी इजाजत माँगी नहीं और न ही ऐसी किसी मेहरबानी की उम्मीद की थी क्योंकि वो चल रहे तनाव के बीच अपनी संप्रभु एनर्जी हितों का पीछा कर रही थी।

इसके अलावा इन आरोपों, जवाबों या रणनीतियों की बेकारता बार-बार साबित हो चुकी है क्योंकि ये मोदी सरकार के किसी फैसले को कभी प्रभावित नहीं करते। पिछले महीने केंद्र ने फिर दोहराया कि वो कच्चा तेल जहां सस्ता और अच्छी क्वालिटी का मिले वहां से आयात करता रहेगा।

भारतीय तेल कंपनियाँ गैर-प्रतिबंधित स्रोतों और भू-राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखकर काम करेंगी। यह वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कॉन्ग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति को बताया।

एक ऐसा ही किस्सा तब हुआ जब भारत ने अमेरिका के इस दावे का जवाब दिया कि वो रूस से तेल लेना ‘बंद’ करने पर सहमत हो गया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 फरवरी को कहा, “हमारे लिए एनर्जी खरीद के फैसलों में राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।” उन्होंने बताया कि पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और सप्लाई की विश्वसनीयता ही देश की खरीद नीति के पीछे मुख्य कारण हैं।

विदेश सचिव के अनुसार भारत की ‘सबसे बड़ी प्राथमिकता’ है अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें सही कीमत पर पर्याप्त ऊर्जा मिले, भरोसेमंद और सुरक्षित स्रोतों से।

उन्होंने कहा, “इसलिए हमारी आयात नीति एनर्जी के मामले में पूरी तरह इन्हीं उद्देश्यों से चलती है। हम किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और न ही रहना चाहते हैं। और स्रोतों का मिश्रण समय-समय पर बाजार की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बदलता रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा तरीका है कई स्रोतों को बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विविधता देना ताकि स्थिरता बनी रहे। इसलिए मैं कहूंगा कि इस क्षेत्र में जितना ज्यादा विविधता होगी, हम उतने ज्यादा सुरक्षित होंगे।” यह मजबूत जवाब तब आया जब ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और दोनों देशों के बीच व्यापार व्यवस्था के फ्रेमवर्क की घोषणा के दौरान 25 प्रतिशत टैरिफ घटा दिया।

जैसे ही संकेत मिला, भारत सरकार के सूत्रों ने फिर दोहराया कि रूसी कच्चा तेल भारत में आता रहेगा। भारत सरकार ने कहा, “आज हमारे पास होर्मुज स्ट्रेट में फंसे तेल से ज्यादा एनर्जी स्रोत हैं। हम कच्चे तेल, तेल उत्पादों और एलपीजी के मामले में आरामदायक स्थिति में हैं। हमारी मौजूदा स्टॉक स्थिति अच्छी है। हम दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों से अपनी सप्लाई बढ़ाएंगे और होर्मुज स्ट्रेट से आने वाली कमी पूरी करेंगे।”

भारत सरकार ने कहा, “हम 2022 से रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। 2022 में हम रूस से कुल आयात का सिर्फ 0.2 प्रतिशत ले रहे थे। फरवरी में हमने कुल कच्चे तेल आयात का 20 प्रतिशत रूस से लिया। फरवरी में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन आयात किया।”

ट्रंप को अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है, भारत को नहीं

ट्रंप प्रशासन में बिना वजह खुद को बधाई देने या सराहने की अजीब आदत है, जिसकी वजह से भारत के लगातार जवाबों के बाद खुद को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

दूसरी ओर नई दिल्ली लगातार अपने हितों की रक्षा कर रही है और मोदी सरकार इन हरकतों से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती। दोनों के बीच यह अब रूटीन बन गया है जहाँ वाशिंगटन कोई बेतुका आदेश या शिकायत लाता है और नई दिल्ली उसे अनदेखा कर देती है या विनम्रता से खारिज कर देती है।

इसी तरह मौजूदा व्हाइट हाउस प्रशासन ने ‘घमंडी दिखावा’ को अपनी आदत बना लिया है। चाहे ‘8 वैश्विक युद्ध रोकना’ हो या पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों से नियंत्रण, ट्रंप के दावे और जमीन पर उनका असल असर अक्सर मेल नहीं खाता। बहुध्रुवीय दुनिया प्रतिबंधों और टैरिफ से रिमोट कंट्रोल नहीं होती।

एक संप्रभु देश की नीति संप्रभु हितों पर चलती है। प्रतिबंध या टैरिफ सिर्फ भू-राजनीतिक हिचकी हैं जिन्हें कभी-कभी ठीक करना और पार करना पड़ता है। चाहे कच्चा तेल हो, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), दुर्लभ पृथ्वी तत्व या कोई भी वस्तु, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का जटिल जाल है।

कोई एक देश इसे धमकाकर या नखरे करके नहीं नियंत्रित कर सकता। भारत दशकों से इस जटिल जाल में नेविगेट कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के दावे सिर्फ अपने घरेलू MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए हैं।

भारतीय सरकार ऐसा नहीं करती। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा-इजराइल संघर्ष और पिछले कई सालों के कई परिदृश्यों में भारत का विदेश मंत्रालय ने अपनी बातचीत पूरी तरह आधिकारिक रखी है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया है।

ट्रंप प्रशासन के उलट भारत का विदेश मंत्रालय (एमईए) अपनी प्राथमिकताओं को रेखांकित करने के लिए सोशल मीडिया का खेल नहीं खेलता। उन्हें पता है क्या करना है और कहाँ अपनी बात साबित करनी है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

क्यों कमजोर पड़ रहा है चीन? पहली बार विकास दर 5% से नीचे: समझें- कैसे संकट में पड़ी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

चीन ने 2026 के लिए अपना जीडीपी विकास दर लक्ष्य 4.5 से 5 प्रतिशत रखा है। यह फैसला गुरुवार (5 मार्च 2026) को नेशनल पीपुल्स कॉन्ग्रेस (एनपीसी) के सत्र में प्रीमियर ली कियांग के गवर्नमेंट वर्क रिपोर्ट में घोषित किया गया। पिछले कई दशकों से चीन हर साल 7-8 प्रतिशत या कम से कम 5 प्रतिशत के आसपास का लक्ष्य रखता था। 1990-91 के बाद यह पहला मौका है जब लक्ष्य 5 प्रतिशत से नीचे चला गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला कमजोरी नहीं, बल्कि सावधानी और लचीलेपन की निशानी है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह मजबूरी का फैसला है।

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? चीन किन गंभीर मुश्किलों में फंस गया है? घरेलू बाजार पूरी तरह ठप क्यों हो गया है? रियल एस्टेट सेक्टर क्यों बर्बाद हो चुका है? वैश्विक तनाव, मिडिल ईस्ट का युद्ध, वेनेजुएला, यूक्रेन और अमेरिका की ट्रेड वॉर का क्या भयानक असर है? कम्युनिस्ट पार्टी की गलत नीतियाँ कितनी जिम्मेदार हैं? और क्या चीन सचमुच अमेरिका के सामने खड़ा हो सकता है या सिर्फ मौका देखकर बयानबाजी करता है और पीछे हट जाता है?

कुल मिलाकर देखें तो चीन की अर्थव्यवस्था अब संकट की चपेट में आ चुकी है और मजबूत दिखने वाला कागजी शेर असल में कमजोर पड़ रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ में समझें- लक्ष्य क्यों इतना कम किया गया?

चीन की अर्थव्यवस्था पिछले 40 सालों से तेजी से बढ़ती रही थी। 1980-90 के दशक में विकास दर 10 प्रतिशत से ऊपर रहती थी। लेकिन अब वह पुराना चमकदार दौर खत्म हो चुका है। 2025 में चीन ने मुश्किल से 5 प्रतिशत विकास हासिल किया, वह भी सिर्फ निर्यात के सहारे। लेकिन 2026 के लिए लक्ष्य घटाकर 4.5-5 प्रतिशत का रेंज कर दिया गया। यह रेंज इसलिए चुनी गई ताकि सरकार को असफलता छिपाने का बहाना मिले। अगर अर्थव्यवस्था और गिरे तो 4.5 प्रतिशत पर भी ‘सफलता’ का दावा कर लेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह 1991 के बाद सबसे कम लक्ष्य है और यह चीन की हार का इशारा है। न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्जियन जैसी रिपोर्ट्स में साफ कहा गया कि चीन अब ‘संख्या पहले’ की पुरानी चाल नहीं चला पा रहा। लोकल अधिकारी पहले झूठे आँकड़े देकर लक्ष्य पूरा करते थे, लेकिन अब संकट इतना गहरा है कि झूठ भी नहीं चल रहा। 15वीं फाइव ईयर प्लान (2026-2030) शुरू हो रही है, लेकिन रिपोर्ट में खुद स्वीकार किया गया कि घरेलू और वैश्विक दोनों तरफ ‘Grave and Complex’ यानी गंभीर और जटिल समस्याएँ हैं।

बेरोजगारी 5.5 प्रतिशत, 12 मिलियन नई नौकरियाँ, 2 प्रतिशत महंगाई, अनाज 700 मिलियन टन… ये सब लक्ष्य पुराने हैं, लेकिन असल में अर्थव्यवस्था इनसे भी नीचे फिसल रही है। घाटा 4 प्रतिशत रखा गया, लेकिन यह दिखावा है। असल में चीन मजबूरी में विकास दर कम कर रहा है क्योंकि पुरानी चालें फेल हो चुकी हैं।

घरेलू संकट में रियल एस्टेट की बर्बादी और गिरती माँग ने चीन को घुटनों पर ला दिया

चीन की सबसे बड़ी कमजोरी घरेलू बाजार है। आम लोग अब खर्च नहीं कर पा रहे हैं। चीनी लोग संशय की परिस्थितियों को देखते हुए सेविंग्स यानी डर के मारे बचत बढ़ा रहे हैं। चूँकि नौकरियाँ अनिश्चित है। युवाओं में बेरोजगारी बढ़ रही है। सोशल सेफ्टी का पैमाना टूट चुका है। सरकार से लेकर आम लोगों तक पर स्वास्थ्य, शिक्षा और पेंशन का बोझ बढ़ रहा है। ऐसे में साल 2025 में कंज्यूमर स्पेंडिंग पूरी तरह कमजोर रही है और व्यापारिक निवेश भी ठप सा हो गया है।

चीन में सबसे भयानक संकट रियल एस्टेट सेक्टर का है। यह सेक्टर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। पाँचवाँ-छठा साल चल रहा है संकट का, लेकिन इसका कोई अंत नहीं दिख रहा है। चीनी दिग्गज जैसे एवरग्रांडे पूरी तरह दिवालिया हो चुका है। पूरे चीन में 8 करोड़ से ज्यादा अनसोल्ड (बिना बिके) और खाली घर पड़े हैं। पूरे देश में घरों की कीमतें लगातार गिर रही हैं। आम लोगों की जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल चुकी है। लोगों का आत्मविश्वास टूट चुका है। चीन की जो लोकल सरकारें पहले जमीन बेचकर कर्ज चुकाती थीं, अब वह रास्ता भी बंद हो चुका है। उनके कर्ज भी आसमान छू रहे हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सेक्टर की बर्बादी जीडीपी पर हर साल 2 प्रतिशत पॉइंट्स का घातक असर डाल रही है। साल 2024-2025 में यही हुआ और 2026 में भी यही होता दिख रहा है। आम लोग नया घर खरीदने से डर रहे हैं। प्रॉपर्टी मार्केट अब ‘नया मॉडल’ बनाने की बात कर रहा है, लेकिन असल में यह हार का स्वीकारोक्ति है।

जनसंख्या संकट भी एक बड़ा फैक्टर

चीन की अर्थव्यवस्था पर जनसंख्या का संकट भी भारी पड़ रहा है। कई दशकों तक चीन की ‘एक-बच्चा नीति’ ने जनसंख्या वृद्धि को सीमित कर दिया। इसका असर अब साफ दिख रहा है। चीन में जन्म दर तेजी से गिर रही है। तो बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहीं, कामकाजी उम्र की आबादी घट रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। जब काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी तो उत्पादन क्षमता भी घटेगी। साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती आबादी का बोझ सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की आर्थिक वृद्धि आने वाले दशकों में और धीमी हो सकती है।

कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों की असफलता

चीन की आर्थिक संरचना पर ‘Chinese Communist Party’ का गहरा नियंत्रण है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति Xi Jinping ने निजी कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ाया है। टेक कंपनियों और निजी शिक्षा क्षेत्र पर सरकार की कड़ी कार्रवाई ने निवेशकों का भरोसा कमजोर किया। चीन की आर्थिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य अब तीन चीजों पर केंद्रित है- 1. तकनीकी आत्मनिर्भरता, 2. घरेलू स्थिरता, 3. पार्टी का नियंत्रण

इसके लिए चीन ने ‘डुअल सर्कुलेशन’ जैसी नीतियाँ लागू की हैं, जिनका लक्ष्य घरेलू बाजार को मजबूत करना और विदेशी निर्भरता कम करना है। लेकिन इन नीतियों की भी सीमाएँ हैं। जब सरकार अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक नियंत्रण रखती है, तो निजी क्षेत्र की पहल कमजोर पड़ सकती है।

व्यावहारिक तौर पर देखें तो चीन की सत्ताधारी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) दो बड़े सपने देख रही थी। पहला- टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेता बनना और दूसरा – घरेलू स्थिरता। इसके लिए शी जिनपिंग साल 2013 से ‘नई वैज्ञानिक क्रांति’ की बात कर रहे हैं। इसी नजरिए को आगे बढ़ाते हुए साल 2023 में न्यू क्वालिटी प्रोडक्टिव फोर्सेस लाया गया, जिसमें एआई और हाई-टेक पर फोकस रखा गया। लेकिन ये सपने अब टूटते दिख रहे हैं।

अब कम्युनिष्ट पार्टी कोई नतीजे नहीं दे पा रही है। ऐसे में चीन का कर्ज और बढ़ेगा। हालाँकि साल 2026 में फिस्कल डेफिसिट सिर्फ 4 प्रतिशत रखा गया है, लेकिन ये आँकड़ा बहुत बड़ा है।

बता दें कि चीन में दिसंबर 2025 में ‘Investment in people’ का नाटक रचा गया, जिसमें बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य बीमा, चाइल्डकेयर की बातें की गई। लेकिन ये सब उपाय अपर्याप्त साबित हुए हैं। दरअसल, इसका असल मकसद टेक सेक्टर को बचाना है, आम चीनी नागरिकों को नहीं। जाहिर है, कम्युनिष्ट पार्टी की नीतियाँ अब फेल हो चुकी हैं। भले ही दावा स्थिरता का हो, लेकिन ये नीतियाँ असलियत में संकट को बढ़ा ही रही हैं।

चीन की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वहाँ के लोग खर्च कम कर रहे हैं। आम तौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में विकास का मुख्य आधार घरेलू उपभोग होता है। लेकिन चीन में लंबे समय से अर्थव्यवस्था निवेश और निर्यात पर निर्भर रही है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने पिछले वर्षों में घरेलू माँग बढ़ाने की कोशिश जरूर की, लेकिन इसमें बहुत बड़ी सफलता नहीं मिली।

इसके पीछे कई कारण हैं-

  • लोगों की आय में धीमी वृद्धि
  • नौकरी को लेकर असुरक्षा
  • सामाजिक सुरक्षा की कमी
  • स्वास्थ्य और शिक्षा का बढ़ता खर्च

इन कारणों से लोग ज्यादा बचत करते हैं और कम खर्च करते हैं। यह स्थिति चीन की सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है क्योंकि अगर घरेलू बाजार मजबूत नहीं होगा तो आर्थिक वृद्धि भी सीमित हो जाएगी।

वैश्विक तनाव जैसे ट्रेड वॉर, मिडिल ईस्ट, वेनेजुएला और यूक्रेन ने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया

चीन अब वैश्विक मंच पर भी कमजोर दिख रहा है। अमेरिका का ट्रेड वॉर सबसे घातक हथियार साबित हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से साल 2025 में अमेरिका को चीनी निर्यात 20 प्रतिशत तक गिर गया। भले ही चीन का ट्रेड सरप्लस 1.2 ट्रिलियन डॉलर का रिकॉर्ड बनाता दिखा, लेकिन वो चीन सरकार की निर्यात पर निर्भरता का सबूत ही था, जिसका हल्ला डोनाल्ड ट्रंप कर ही रहे थे। अमेरिका की देखा-देखी अब मैक्सिको और यूरोप भी चीन पर टैरिफ लगा रहे हैं, ऐसे में चीन का निर्यात इंजन फेल होने वाला है।

दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा बाहरी दबाव यही अमेरिका के साथ उसकी प्रतिस्पर्धा है। जब अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार आई, तब चीन के खिलाफ बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए गए। इससे चीन के निर्यात को बड़ा झटका लगा। इसके बाद चीनी कंपनियों पर तकनीकी प्रतिबंध लगाए गए। सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी पर रोक लगा दी गई और चीनी कंपनियों पर निगरानी बढ़ा दी गई। इस व्यापार युद्ध ने चीन की आर्थिक रणनीति को बदल दिया। अब चीन तेजी से तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी और महँगी है।

अब मौजूदा समय में देखें तो मिडिल ईस्ट का युद्ध चीन की कमर तोड़ रहा है। ईरान पर हमले से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रभावित है। चीन रोज 10 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, ज्यादातर इसी रूट से… लेकिन उसके बंद होने से समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। समुद्र में रोके रखा गया तेल कब तक चीन की जरूरतें पूरी करेगा? उसे घूम फिर कर रूस की तरफ ही जाना होगा। वहीं, अफ्रीका की तरफ देखें तो चीन का सारा निवेश फँसता दिख रहा है, मिडिल ईस्ट की हालत खराब हो रही है।

एक तरफ वेनेजुएला में अमेरिका ने सीधा वार किया, जहाँ चीन के अरबों डॉलर के निवेश और लोन डूब गए। इसके साथ ही उसका सस्ता तेल मिलना भी बंद हो गया। वहीं, यूक्रेन युद्ध में भी चीन सिर्फ सस्ता तेल-गैस खरीदता रहा, लेकिन किसी की तरफ खुलकर सामने नहीं आ पाया।

ये सब दिखाते हैं कि चीन सुपरपावर का ढोंग भर रहा है। अमेरिका के सामने वो घुटने टेक देता है। इन सबमें चीन की मौकापरस्ती सामने आ चुकी है और उसकी फूट डालो- राज करो की नीति भी खुल चुकी है। क्योंकि जहाँ भी वो खतरा देखता है, वहाँ से वो तुरंत पीछे हट जाता है। साफ देखें तो वेनेजुएला, ईरान, रूस-यूक्रेन मामलों में चीन की सिर्फ बयानबाजी ही सामने आई, क्योंकि उसने कोई कदम उठाने की हिम्मत ही नहीं की।

क्या चीन सचमुच कागजी शेर साबित हो रहा है?

इसका जवाब के शब्द में ढूँढें तो हाँ, चीन अब कमजोर पड़ रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दिखावटी है। उसके पास निर्यात और हाई-टेक का सहारा तो है, लेकिन घरेलू संकट, रियल एस्टेट की बर्बादी, जनसंख्या आपदा और वैश्विक दबाव उसे तोड़ रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी की नीतियाँ स्थिरता का नाटक कर रही हैं लेकिन असल में आम चीनी नागरिकों को लूट रही हैं।

बहरहाल, चीन कमजोर पड़ चुका है। रियल एस्टेट संकट, गिरती माँग, ट्रेड वॉर और मिडिल ईस्ट तनाव ने उसे घेर लिया है। कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियाँ असफल साबित हो रही हैं। ऐसे में चीन की अर्थव्यवस्था अब दुनिया के लिए खतरे के सबूत के तौर पर दिख रही है।

अस्थिर दुनिया की भी मार झेलनी चीन की मजबूरी

दरअसल, आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अस्थिर हो चुकी है। कई बड़े संघर्षों ने वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों और व्यापार मार्गों पर असर पड़ता है। चीन की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अगर फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ता है, तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।

चीन की विकास दर को 4.5–5 प्रतिशत तक सीमित करना एक बड़ा संकेत है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रही है। रियल एस्टेट संकट, घटती घरेलू माँग, जनसंख्या समस्या, कम्युनिस्ट नीतियों की सीमाएँ और अमेरिका के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा… ये सभी कारक चीन की आर्थिक गति को प्रभावित कर रहे हैं।

हालाँकि चीन अभी भी एक बड़ी आर्थिक शक्ति है और उसकी तकनीकी महत्वाकांक्षाएँ बहुत बड़ी हैं। लेकिन यह भी साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था अब उस ‘चमत्कारी तेजी’ से नहीं बढ़ रही, जिसने उसे पिछले चार दशकों में वैश्विक शक्ति बनाया था।

5000 साल पुराना इतिहास, जमीन में धँसती जा रही प्रतिमा: जानें- राजस्थान में स्थित दुनिया के इकलौते ‘विभीषण मंदिर’ की कहानी, जिसे वक्फ संपत्ति बता हड़पने की हुई कोशिश

राजस्थान के कोटा जिले के कैथून कस्बे में हर साल होली के अवसर पर एक बेहद अनोखी परंपरा देखने को मिलती है। देशभर में होलिका दहन के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है लेकिन कैथून में इसके अगले दिन यानी धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

इसी खास परंपरा के साथ यहाँ पाँच दिवसीय विभीषण मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आस्था और परंपरा का संगम देखने के लिए पहुँचते हैं। इस वर्ष भी मेले की शुरुआत धूमधाम से हुई। राजस्थान के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर मेले के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

उन्होंने पहले विभीषण मंदिर में पूजा-अर्चना की और फिर मेला स्थल पर परंपरा के अनुसार हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन कर अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश दिया।

प्रदेश के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने किया मेले का शुभारंभ (फोटो साभार:ETV भारत)

होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की अनोखी परंपरा और देव विमानों की शोभायात्रा

कैथून का विभीषण मेला देश में अपनी तरह का अनूठा आयोजन माना जाता है। यहाँ परंपरा के अनुसार, पहले होलिका दहन होता है और उसके अगले दिन धुलेंडी पर हिरण्यकश्यप के पुतले को जलाया जाता है। इस परंपरा का संबंध भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की कथा से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि जब होलिका आग में जलकर नष्ट हो गई, तब असुर राजा हिरण्यकश्यप अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। उसी समय भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। इसी घटना की स्मृति में कैथून में धुलेंडी के दिन हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है।

यह परंपरा लगभग 45 वर्षों से लगातार निभाई जा रही है और हर साल इसके साथ भव्य मेले का आयोजन होता है। विभीषण मेले की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। आसपास के कई मंदिरों से देवताओं की प्रतिमाओं को सजाए गए देव विमानों में बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

ये देव विमान श्रद्धालुओं की भीड़ के साथ विभीषण मंदिर तक पहुँचते हैं, जहाँ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद सभी देव विमानों को मेला स्थल लाया जाता है। मेला स्थल पर आतिशबाजी, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और धार्मिक आयोजन होते हैं। कार्यक्रम के अंतिम चरण में मुख्य अतिथि द्वारा हिरण्यकश्यप के पुतले का दहन किया जाता है, जो धर्म की जीत और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।

दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर: हर साल दाने के बराबर जमीन में धंसती जा रही प्रतिमा

कैथून की पहचान केवल मेले तक सीमित नहीं है। यहाँ स्थित विभीषण मंदिर को दुनिया का इकलौता मंदिर माना जाता है जहाँ रावण के भाई विभीषण की पूजा होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर परिसर में एक विशाल चबूतरे के ऊपर छतरी के नीचे विभीषण की बड़ी प्रतिमा स्थापित है।

(फोटो साभार: News 18)

इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसका केवल धड़ से ऊपर का हिस्सा ही दिखाई देता है, जबकि बाकी भाग जमीन के अंदर धँसा हुआ माना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा हर साल थोड़ा-थोड़ा जमीन में और धँसती जाती है। मंदिर के पास एक प्राचीन कुंड भी है, जिसके निकट विक्रम संवत 1815 का शिलालेख मौजूद है।

विभीषण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

मंदिर की स्थापना को लेकर एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के समय सभी देवी-देवता, ऋषि-मुनि और राजा अयोध्या पहुँचे थे। इसी दौरान भगवान शिव ने पृथ्वी लोक की यात्रा करने की इच्छा जताई। यह सुनकर विभीषण ने निवेदन किया कि वह शिव और हनुमान को कांवड़ में बैठाकर भारत भ्रमण कराना चाहते हैं।

भगवान शिव ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया लेकिन एक शर्त रखी कि यात्रा के दौरान काँवड़ जहाँ भी जमीन से टिक जाएगी, वहीं यात्रा समाप्त मानी जाएगी। विभीषण ने एक विशाल लकड़ी की काँवड़ तैयार की जिसकी लंबाई लगभग 8 कोस (करीब 32 किलोमीटर) बताई जाती है। काँवड़ के एक हिस्से में भगवान शिव और दूसरे हिस्से में हनुमान जी विराजमान थे।

जब यह यात्रा प्राचीन नगर कौथुनपुर (आज का कैथून) से गुजर रही थी, तब काँवड़ का एक सिरा जमीन से लग गया। जिस स्थान पर शिवजी का भाग जमीन से टिका, वह स्थान आज चौरचौमा के नाम से जाना जाता है और वहाँ चोमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है।

दूसरा हिस्सा कोटा के रंगबाड़ी क्षेत्र में आकर टिका, जहाँ आज हनुमान जी का मंदिर स्थित है। वहीं कैथून में जहाँ विभीषण रुके, वहाँ विभीषण मंदिर की स्थापना मानी जाती है।

मंदिर के वर्तमान स्वरूप का इतिहास और वक्फ विवाद

मंदिर को पौराणिक रूप से हजारों साल पुराना माना जाता है लेकिन इसके वर्तमान ढाँचे का निर्माण बाद में हुआ। माना जाता है कि कोटा के शासक महाराव उम्मेद सिंह प्रथम ने 1770 से 1821 के बीच मंदिर की छतरी और संरचना का निर्माण करवाया था। मंदिर के आसपास के कई हिस्सों का समय-समय पर जीर्णोद्धार भी किया गया।

स्थानीय गौतम परिवार ने प्राचीन कुंड और अन्य संरचनाओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी इस परिवार के सदस्य विशेष अवसरों पर यहाँ पूजा करने आते हैं। मेला उद्घाटन के दौरान मंत्री मदन दिलावर ने मंदिर की जमीन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, इस भूमि को वक्फ संपत्ति बताकर कब्जाने की कोशिश की गई थी।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए वक्फ संशोधन कानून के बाद यह स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल वही संपत्ति वक्फ के नाम दर्ज होगी जो वास्तव में मुस्लिम समाज द्वारा दान की गई हो। इस कानूनी बदलाव और लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बाद कोर्ट ने विभीषण मंदिर की जमीन हिंदू समाज को वापस सौंपने के आदेश दिए।

दिलावर ने यह भी कहा कि राजस्थान सरकार ने निर्णय लिया है कि आबादी क्षेत्र में स्थित मंदिरों की जमीन के पट्टे मंदिर की मूर्ति के नाम जारी किए जाएँगे, ताकि भविष्य में कोई अवैध कब्जा न कर सके। मेला समारोह में मंत्री दिलावर ने कहा कि विभीषण ने अधर्म के मार्ग पर चल रहे अपने भाई रावण का साथ छोड़कर भगवान राम का साथ दिया था।

रामायण की कथा में विभीषण का यह निर्णय धर्म के पक्ष में खड़े होने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि कैथून में उन्हें विशेष सम्मान के साथ पूजा जाता है। होली के बाद हिरण्यकश्यप दहन की परंपरा, दुनिया का इकलौता विभीषण मंदिर और उससे जुड़ी कथाएँ इस स्थान को भारत के धार्मिक मानचित्र पर एक अलग पहचान देती हैं।

₹8300 करोड़/दिन, ₹18 लाख करोड़ खर्च का अनुमान: मिडिल ईस्ट युद्ध में जल रहे अमेरिकी डॉलर, जानें- ईरान पर हमले से US को कितना आर्थिक नुकसान?

युद्ध हमेशा सिर्फ मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की जान ही नहीं लेता बल्कि वह देश की अर्थव्यवस्था को भी खाली करता जाता है। बम-बारूद और मिसाइलों से जितना दुश्मन का नुकसान होता है उतना ही अपने देश के खजाने पर भी बोझ पड़ता है। मिडिल ईस्ट में इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध में भारी तबाही मची है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को ढेर कर दिया गया है और हजारों ईरानियों की जान चली गई है।

यह युद्ध जितना ईरान के लिए भारी है, उतना ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी। आँकलन बताते हैं कि हमले के पहले ही 24 घंटे में अमेरिका को करीब 779 मिलियन डॉलर (लगभग 6900 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़े थे। जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है, अगर यह युद्ध एक महीने या उससे ज्यादा समय तक चलता है तो यह खर्च कई लाख करोड़ रुपए तक पहुँच सकता है।

युद्ध का पहला दिन ही पड़ा भारी

ईरान पर अमेरिकी हमले के पहले 24 घंटे ही इस बात का संकेत दे चुके हैं कि यह युद्ध अमेरिका के लिए कितना महँगा साबित होने वाला है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ शुरुआती सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ने लगभग 779 मिलियन डॉलर खर्च कर दिए। इस खर्च में मिसाइल हमले, लड़ाकू विमानों की उड़ानें, सैन्य संसाधनों की तैनाती और युद्ध संचालन से जुड़ी अन्य गतिविधियाँ शामिल हैं।

इतना ही नहीं, इस हमले में अली खामेनेई और कई अन्य अहम सैन्य व राजनीतिक व्यक्तियों को निशाना बनाया गया औ इसके बाद पूरे मध्य-पूर्व में तनाव और तेजी से बढ़ गया है।

₹30 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा ₹30 लाख का ड्रोन

ईरान के सस्ते ड्रोन को मार गिराने के लिए अमेरिका को बेहद महँगी मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। सैन्य रिपोर्टों के मुताबिक, ईरानी ड्रोन को नष्ट करने के लिए अमेरिका ‘पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल’ का सहारा ले रहा है जिसकी कीमत ड्रोन की तुलना में कई गुना ज्यादा है।

जानकारी के अनुसार, ईरान के हमलावर ड्रोन की कीमत करीब 35,000 डॉलर यानी लगभग 29 लाख रुपए के आसपास होती है। वहीं, इन ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने के लिए इस्तेमाल की जा रही पैट्रिएट PAC-3 इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 3.7 मिलियन डॉलर यानी लगभग 30 से 31 करोड़ रुपए बताई जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 30 लाख रुपये के ड्रोन को गिराने के लिए करीब 30 करोड़ रुपए की मिसाइल खर्च की जा रही है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की परिस्थितियों में ऐसा करना जरूरी हो जाता है। उनका तर्क है कि अगर इन ड्रोन को समय रहते नहीं रोका गया तो वे एयरबेस, तेल रिफाइनरी, बिजली संयंत्र या अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकते हैं।

विमानवाहक पोत चलाना भी महँगा

युद्ध में सबसे ज्यादा खर्च उन बड़े सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर होता है जिन्हें युद्ध क्षेत्र में तैनात किया जाता है। जैसे अमेरिका का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत USS जेराल्ड रूडोल्फ फोर्ड। यह दुनिया का सबसे आधुनिक और शक्तिशाली कैरियर माना जाता है। लेकिन इसे चलाना बेहद महँगा है।

सुरक्षा अध्ययन संस्थान सेंटर फोर न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी (CNAS) के आँकड़ों के मुताबिक, एक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को चलाने में रोज करीब 6.5 मिलियन डॉलर (करीब 58 करोड़ रुपए) खर्च होते हैं। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने मध्य-पूर्व में ऐसे दो विमानवाहक पोत समूह तैनात किए थे। इसका मतलब है कि सिर्फ इन जहाजों को ऑपरेट करने में ही रोजाना सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।

युद्ध शुरू होने से पहले ही अरबों डॉलर झोंके गए

किसी भी युद्ध की असली लागत केवल उस दिन से शुरू नहीं होती जब पहली गोली चलती है। असली खर्च तो उससे पहले की सैन्य तैयारियों में होता है। ईरान पर हमले से पहले अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य तैयारी की थी। इसमें लड़ाकू विमानों को विभिन्न सैन्य अड्डों पर तैनात करना, नौसेना के जहाजों को रणनीतिक स्थानों पर भेजना और मध्य-पूर्व में पहले से मौजूद संसाधनों को नए सिरे से व्यवस्थित करना शामिल था।

इन तैयारियों पर अनुमानित रूप से लगभग 630 मिलियन डॉलर यानी करीब 5556 करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी युद्ध शुरू होने से पहले ही अमेरिका अरबों रुपए खर्च कर चुका था।

हर दिन ₹8300 करोड़ खर्च कर रहा अमेरिका

पत्रिका ‘द ऐटलांटिक’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी रक्षा विभाग ने युद्ध के खर्च को लेकर एक शुरुआती अनुमान तैयार किया था। इस अनुमान के मुताबिक अगर यह संघर्ष जारी रहता है तो अमेरिका को हर दिन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 8,300 करोड़ रुपए) खर्च करने पड़ सकते हैं। यानी सिर्फ एक दिन की लड़ाई में ही अमेरिका इतना पैसा खर्च कर रहा है जितना कई छोटे देशों का सालभर का बजट होता है।

इस खर्च में सैन्य अभियानों का संचालन, सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमानों की उड़ान, मिसाइल और बमों का इस्तेमाल, खुफिया निगरानी और युद्ध से जुड़े अन्य सैन्य संसाधनों का खर्च शामिल होता है। अमेरिकी सेना की मध्य-पूर्व कमान (CENTCOM) और पेंटागन के आँकड़ों के आधार पर तैयार किए गए एक ट्रैकर के अनुसार, गुरुवार तक इस संघर्ष पर अमेरिका का कुल खर्च 5.7 अरब डॉलर (लगभग 47,000 करोड़ रुपए) से भी अधिक हो चुका था।

अगर युद्ध लंबा चला तो लागत कई गुना बढ़ेगी

अर्थशास्त्रियों और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह युद्ध कुछ हफ्तों से ज्यादा चला तो अमेरिका के लिए इसकी आर्थिक कीमत बेहद भारी हो सकती है। पेन व्हार्टन बजट मॉडल के निदेशक और जाने-माने आर्थिक विश्लेषक केंट स्मेटर्स का अनुमान है कि अगर युद्ध लगभग एक महीने तक चलता है तो अमेरिका को करीब 210 बिलियन डॉलर यानी लगभग 18.87 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं।

यह रकम इतनी बड़ी है कि यह कई छोटे देशों की पूरी सालाना अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि युद्ध केवल सैन्य मोर्चे पर ही नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

मिडिल ईस्ट में पहले से ही भारी खर्च कर रहा अमेरिका

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका पहले से ही मध्य-पूर्व में भारी सैन्य खर्च कर रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया था तब से अमेरिका लगातार इजरायल को सैन्य सहायता दे रहा है। इस सहायता की कुल राशि लगभग 21.7 बिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है।

इसके अलावा अमेरिका ने यमन, ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य क्षेत्रों में चल रहे सैन्य अभियानों में भी भारी पैसा खर्च किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन अभियानों पर 9.65 से 12.07 बिलियन डॉलर तक खर्च हो चुके हैं। इस तरह कुल मिलाकर अमेरिका का खर्च 31 से 33 बिलियन डॉलर के बीच पहुँच चुका है।

हर दिन करोड़ों डॉलर खर्च सिर्फ सैनिक भेजने का

इंस्टीट्यूट फोर पॉलिसी स्टडीज (Institute for Policy Studies) के एक विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका सिर्फ सैनिकों और सैन्य संसाधनों को मिडिल ईस्ट में भेजने और वहाँ बनाए रखने पर ही रोज करीब 59 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह आँकड़ा सिर्फ सैनिकों की आवाजाही और तैनाती का है।

इसमें मिसाइल, बम, युद्धक विमानों की उड़ानें और उपकरणों के नुकसान जैसे खर्च शामिल ही नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक अमेरिका के तीन लड़ाकू विमान भी नष्ट हो चुके हैं जिन्हें गलती से कुवैत के एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया था।

बाद में सामने आता है युद्ध का असली खर्च

विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध की शुरुआती लागत अक्सर कम आँकी जाती है। 9/11 के बाद अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में जो युद्ध लड़े थे उनकी शुरुआती लागत का अनुमान बाद में कई गुना ज्यादा निकला। शुरुआत में कहा गया था कि इराक युद्ध पर करीब 50 बिलियन डॉलर खर्च होंगे लेकिन बाद में यह खर्च कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया।

‘ईरान ने हॉर्मूज की खाड़ी को भारत के लिए किया ब्लॉक’: कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम फैला रही भ्रम, जानिए क्या है इस दावे की हकीकत

होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए बंद नहीं है। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने साफ कर दिया है कि ये समुद्री रास्ता इजरायल अमेरिका, यूरोप के उसके सहयोगी देशों के जहाजों के लिए बंद किया गया है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा जारी है।

कॉन्ग्रेस फैला रही झूठ

कॉन्ग्रेस का कहना है कि ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह बंद कर दिया है। वहाँ से सिर्फ रूस और चीन के जहाज ही जा सकते हैं। इस लिस्ट में भारत का नाम नहीं है। कॉन्ग्रेस का ये भी कहना है कि इस समुद्री रास्ते के बंद होने से 10 हजार करोड़ का भारतीय सामान, 38 जहाज और 1100 नाविक फँसे हुए हैं।

कॉन्ग्रेस का कहना है कि इंडियन नेशनल शिप ओनर्स एसोसिएशन ने भारत सरकार से मदद की गुजारिश की है, लेकिन सरकार मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि भारत सरकार ने ईरान के साथ बातचीत के सारे रास्ते बंद कर लिए हैं।

अब कॉन्ग्रेस को कौन समझाए कि ईरान ने जिसके जहाज को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने पर हमला करने की बात कही है, उसमें भारत का नाम नहीं है। ईरान सिर्फ उन देशों के जहाजों को पार नहीं होने देगा जिसने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में इजरायल और अमेरिका का साथ दे रहा है।

भारत ने विश्व शांति की अपील की है। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कहा है कि वैश्विक स्थिरता को अभी सबसे ज्यादा खतरा है और शांति ही एकमात्र हर विवाद को सुलझाने का तरीका है। भारत ने ईरानी सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत पर शोक भी जताया है। ऐसे में भारत के जहाज पर ईरानी आक्रमण का खतरा नहीं है।

बीमा कंपनियों की मनाही का असर

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यूएस-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध की वजह से इस रास्ते पर कई दिनों से अनिश्चितता बनी हुई है और कमर्शियल ट्रैफिक रुक गए हैं। अब रहा सवाल वहाँ भारतीय सामानों के फँसे होने का, तो इसकी वजह बीमा कंपनियों का होर्मुज स्ट्रेट से होकर जाने वाले जहाजों पर से हाथ खींच लेना है। ब्रिटिश बीमा कंपनियों ने बीमा करना बंद कर दिया है, इसलिए आवाजाही रुकी है।

इंश्योरेंस कंपनियों ने शिपिंग कंपनियों को नोटिस दिया था कि वे ईरान पर इजराइल-US हमलों को देखते हुए इंश्योरेंस रोक देंगी और प्रीमियम बढ़ा देंगी। नॉर्थस्टैंडर्ड, अमेरिकन क्लब, स्वीडिश क्लब, स्कल्ड, गार्ड और लंदन पी एंड आई क्लब सहित प्रमुख बीमा कंपनियों ने पोत सुरक्षा के बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए युद्ध जोखिम बीमा वापस ले लिया था।

ये खतरा इजरायल और अमेरिका की ईरान पर किए गए हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के मारे जाने के बाद बढ़ा। ईरान ने इसके बाद स्ट्रेट होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर हमला करने की चेतावनी दी थी।

राष्ट्रपति ट्रंप ने जहाजों को सुरक्षा देने के लिए यूनाइटेड स्टेट्स डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (DFC) को खाड़ी में काम करने वाली शिपिंग लाइनों को तुरंत ‘बहुत सही कीमत’ पर पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस देने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अगर हालात और बिगड़ते हैं तो US नेवी टैंकरों को होर्मुज स्ट्रेट से एस्कॉर्ट करना शुरू कर सकती है। ऐसी परिस्थिति में जब भारत अपने लिए रास्ता तलाश रहा है, कॉन्ग्रेस लोगों को डरा रही है।

देश को भयभीत करने की कोशिश कर रही कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण देश के लोगों को खामियाजा उठाना पड़ेगा, क्योंकि एलजीपी, एलएनजी उसी रास्ते से आता है। मिडिल ईस्ट में होने वाले युद्ध का असर देश के फर्टिलाइजर, ट्रांसपोर्ट, माइनिंग, रेलवे, पॉवर, एग्रीकल्चर समेत कई सेक्टर्स पर पड़ेगा। आने वाले समय में जिस तरह से महँगाई बढ़ेगी और मंदी आएगी, हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

कॉन्ग्रेस ऐसा कह कर सरकार को आगाह करना चाहती है या देश को डराना चाहती है। मिडिल ईस्ट के देशों के साथ भारत के मधुर संबंध हैं और व्यापारिक रिश्ते भी काफी मजबूत हैं। भारत के लिए जब होर्मुज स्ट्रेट बंद नहीं है, तो फिर ऐसा संकट क्यों आएगा। भारत को रूस ने तेल देने की पेशकश भी कर चुका है। बाकी रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान का बयान

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ अमेरिका, इजरायल, यूरोप और उनके पश्चिमी सहयोगियों के जहाजों के लिए बंद है। यह घोषणा गुरुवार 5 मार्च 2026 को ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के जरिए की गई है।

रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि इंटरनेशनल कानून और संबंधित प्रस्तावों के मुताबिक, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान युद्ध के समय होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने को रेगुलेट करने का अधिकार रखता है। इसलिए इस रास्ते से अगर अमेरिका, इजराइल, यूरोप और उनके ‘समर्थकों’ का कोई भी जहाज इस रास्ते पर दिखेगा तो उसपर निश्चित रूप से हमला किया जाएगा।

इससे पहले ईरान ने साफ किया था कि वह चीनी झंडे लगे जहाजों को स्ट्रेट इस्तेमाल करने देगा। अब उसने दुनिया के बाकी देशों को भी ग्रीन सिग्नल दे दिया है, जो इस युद्ध में शामिल नहीं है या उसके खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं। ये पूरी दुनिया के लिए राहत भरी खबर है।

वेनेजुएला और ईरान पर चीन की चुप्पी ने किया साबित, वो सिर्फ मौका परस्त: नहीं है सुपरपॉवर जैसी कोई बात, फिर भी हमारे लिबरल्स की चाहत अलग

यूरोप में 9 नवंबर 1989 को एक दीवार गिरी इस दीवार का नाम बर्लिन वाल था। सोवियत रूस समर्थित ईस्ट जर्मनी और अमेरिका जैसी NATO पॉवर से समर्थित वेस्ट जर्मनी इसी के साथ एक हो गए। इस दीवार ने सिर्फ़ देश के दो हिस्सों को एकीकृत नहीं किया बल्कि 4 दशक से चले आ रहे कोल्ड वॉर को भी ख़त्म किया।

इसके साथ ही दुनिया बाई पोलेरिटी यानी द्विध्रुवीय व्यवस्था ख़त्म हो गई। राजनीति विज्ञानियों की द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार चाँदी हुई, उन्हें मल्टी पोलरिज्म, यूनीपोलरिज्म जैसे टर्म्स गढ़ने को मिले। कुछ ने कहा कि अब एक और कोई ताक़त खड़ी होगी और दुनिया वापस पुरानी व्यवस्था में आएगी। जबकि कुछ ने कहा कि मल्टी पोलरिज्म होगा।

2010s में जब चाइना की इकॉनमी 10 ट्रिलियन डॉलर पार हो गई तो बाई पोलर व्यवस्था वालों ने बताया कि चीन ही USSR का उत्तराधिकारी है। लेकिन पिछले एक महीने में ही ये स्मोक स्क्रीन छँट गई है।

पहले वेनेजुएला और अब ईरान, एक-एक करके उसके साथ अलायन्स रखने वाले देशों में अमेरिका मनमर्जी कर रहा है। इसके बदले में चीन के पास कोई जवाब नहीं है। चीन कुछ केसेस में सिर्फ़ बयान जारी करके पल्ला झाड़ ले रहा है और कहीं तो उसके पास ऑफर करने को बयान भी नहीं हैं।

एक-एक करके दोनों केसेज ने कैसे चीन की भद्द पिटवाई है, समझते हैं। सबसे पहले केस लेते हैं वेनेजुएला का।

वेनेजुएला मामले ने बताया, चीन सिर्फ मौकापरस्त

निकोलस मादुरो के राज में वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा ख़रीददार चीन ही रहा है, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट बताती है कि चीन 2025 में वेनेजुएला से 5 लाख बैरल प्रतिदिन ख़रीद रहा था। चाइनीज़ इन्वेस्टर्स ने वेनेजुएला के आयल सेक्टर में 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट भी किया है। और उसकी दोस्ती वेनेजुएला से तेल ख़रीदने तक ही नहीं बल्कि अपने हथियार बेचने की भी है। अमेरिकन थिंक टैंक CSIS की एक आर्म, चाइना पॉवर बताती है कि 2015 से 25 के बीच में चीन ने वेनेजुएला को लगभग 600 मिलियन डॉलर्स यानी 5000 करोड़ से ज्यादा के वेपन्स बेचे हैं।

इनमें आर्मर्ड व्हीकल्स से लेकर ट्रेनर एयरक्राफ्ट, मिसाइल, हेलीकॉप्टर तक शामिल हैं। यही नहीं बल्कि चीन की वेनेजुएला से संबंध भी रणनीतिक लेवल की हैं। इन सब के बाद भी जब जनवरी 2026 में एक ब्रीफ ऑपरेशन के बाद अमेरिका ने मादुरो को उठा लिया और वेनेजुएला में साइलेंट रिजीम चेंज कर दिया, तो चीन चुप हो गया। उसने सिर्फ़ एक बयान जारी करके इति श्री कर ली। UNSC में उसने अमेरिका की निंदा की और कहानी ख़त्म हो गई। यहाँ तक कि मादुरो के लिए छोड़िए, चीन ने अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट्स को भी ख़ासा प्रोटेक्ट नहीं किया। उसको वेनेजुएला से मिलने वाला तेल 50% तक घट गया।

और ये तेल ऐसा नहीं था कि वो ख़रीद रहा था जो कहीं और से भी ख़रीदा जा सकता था। ये तेल असल में चीन के लोन का रिपेमेंट था। लेकिन इन सबके बावजूद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने बयानों में मादुरो का नाम तक नहीं लिया और ना ही अमेरिका की खुले तौर पर निंदा की, कोई मिलिट्री या इकोनॉमिक एक्शन तो छोड़ दीजिए।

अगर ये पूरा एपिसोड इस बात को सिद्ध करने के लिए कम था कि चीन के पास ऐसी कंडीशंस में सिर्फ़ लिप सर्विस है और वो इकॉनमी चाहे 20 ट्रिलियन की हो गया हो, वो अमेरिका के बराबर खड़ी होने वाली शक्ति आज तक नहीं बन पाया है, तो ईरान पर हमला हो गया।

ईरान पर हमले के बाद भी चीन ने टाइट रखी जुबान

जहाँ मादुरो को अमेरिका ने सिर्फ़ गिरफ्तार किया था तो ईरान के ख़िलाफ़ उसने इजरायल के साथ मिलकर पूरा युद्ध छेड़ दिया और सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई को मार तक गिराया। इसके साथ ही ईरान की टॉप लीडरशिप भी ख़त्म कर दी गई। उसके एक्स प्रेसिडेंट को मार दिया गया। उसके न्यूक्लियर रिएक्टर्स पर हमला हुआ।

लेकिन तब भी चीन ने क्या किया? चीन ने वही घिसी पिटी बातें की, जिसमें UN चार्टर, संप्रभुता और वायलेशन जैसे शब्द शामिल थे, जिनकी हैसियत अन्तरराष्ट्रीय राजनीति में किसी फेंके हुए पेपर से ज्यादा नहीं है। इन फैक्ट चाइना ने बाक़ी देशों की तरह सुप्रीम लीडर खामनेई की मौत पर कोई शोक वग़ैरह भी नहीं घोषित किया।

ये सब तब हुआ, जब ईरान और चीन ने 25 साल की साझेदारी का समझौता कर रखा है। ईरान का लगभग 80% क्रूड चीन ख़रीदता है, ईरान चाइना की बेल्ट एंड रोड परियोजना का भी हिस्सा है। उसने लगभग 2 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट भी किया हुआ है, आर्म्स भी बेचे हैं।

तेहरान की मेट्रो से लेकर रेलवे लाइंस तक और पोर्ट्स से लेकर ऑयल इंडस्ट्री तक चीन का महत्वपूर्ण इन्वेस्टमेंट ईरान में है। लेकिन यहाँ भी सुप्रीम लीडर की मौत के बाद जिनपिंग का एक भी बयान तक नहीं आया। मिलिट्री इंटरवेंशन और ईरान को वेपन सपोर्ट तो बड़े दूर की बात है।

यानी दोनों केसेस में चीन सिर्फ़ बोलता रह गया और एक्शन के नाम पर उसने एक पुलिस कांस्टेबल को नहीं भेजा। जिन एनालिस्ट्स को ये लगता था कि उन्हें चीन दूसरे देशों बचाएगा क्योंकि वो अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी ताक़त बन चुका है, वो सारी एनालिसिस भी धरी रह गई।

यहाँ तक कि वो चाहे तो इस मामले में अमेरिका की तरह अपनी इकोनॉमिक पॉवर का भी यूज कर सकता है, सैंक्शंस लगा सकता है, एक्सपोर्ट रोक सकता है और अपनी मैन्यूफैक्चिरंग के बल पर कुछ डेंट जरूर क्रिएट कर सकता है, लेकिन उससे ये भी नहीं हुआ। क्योंकि चाइना इन सब में अपना सिर्फ़ फ़ायदा देखता है।

फिर भी हमारे लिबरल्स चाहते हैं- भारत युद्ध में कूद जाए

इस सब के बावजूद हमारे लिबरल – वामपंथी और कॉन्ग्रेसी चाहते हैं कि हम इस युद्ध में खामनेई की फोटो और ईरान का झंडा लेकर अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ें, इजरायल से रिश्ते तोड़ दें और उनकी सबमरीन, युद्धपोत सब कुछ ब्लॉक कर दें उनसे एकदम जंग मोड में आ जाएँ, अपनी तेल की सप्लाई ख़त्म कर दें।

और ये सब हम तब करें जब हमारे दर्जनों आयल के टैंकर्स और बाक़ी शिप ईरान के स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ बंद करने के चलते फँसे रहें। लेकिन कांग्रेसियों के कहने से हमारे नेशनल इंटरेस्ट को हम हैंपर नहीं करेंगे।

भारत ना मिलिट्री एक्शन लेगा और ना ऐसी फर्जी लिप सर्विस देगा जो संकट के समय काम ना आए। याद रखिए जो लोग चीन को USSR का उत्तराधिकारी बता रहे थे, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसी कंडीशंस में वो अपनी मिलिट्री भेजता था, अपनी सबमरींस भेजता था, UNSC में अमेरिका को मजबूर कर देता था। लेकिन चीन अपने हथियार और अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर इन्फ़िरियारिटी में ही जी रहा है। चाहे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उसके एयरडिफेंस का एक्सपोज होना हो या ईरान में उनके एयरडिफेंस के देखते देखते अयातुल्लाह खामनेई का सिटिंग डक बन जाना हो।

कुछ दिनों पहले की ही बात है जब अमेरिका ने जरा सा टैरिफ लगाया था तो चीन की इकॉनमी काँपने लगी थी। सच ये है कि चीन के सो कॉल्ड डिफेंस सिस्टम और उसकी सुपरपॉवर इकॉनमी को वॉर का कोई एक्सपोज़र नहीं है। 1979 के बाद चीन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा है।

आज चीन में ना वैसी मिलिट्री ऑपरेशन की हैसियत है और ना ही उस तरह का पॉवर प्रोजेक्शन करने की। हाँ! अगर उसे अमेरिका का सामना करना है तो उसे हमेशा भारत से बना के रखनी पड़ेगी, क्योंकि बिना भारत और रूस का साथ लिए वो सिर्फ़ बयान ही जारी कर पाएगा। निकोलस मादुरो का वेनेजुएला प्रॉपर सोशलिस्ट स्टेट था, यानी उन्हीं वैल्यूज को मानता था, जिनपर चाइना बना है।