उत्तर प्रदेश की मेरठ पुलिस ने 14 फरवरी 2026 को एक अम्मी और उसकी बेटी के खिलाफ केस दर्ज किया। आरोप है कि ये दोनों करीब 30 साल से भारत में रह रही थीं, जबकि वे पाकिस्तानी नागरिक हैं। इस मामले की शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता रुखसाना ने की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अम्मी-बेटी ने धोखे से भारतीय पहचान पत्र बनवा लिए। रुखसाना ने शिकायत में बताया कि पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद दोनों ने फर्जी तरीके से आधार कार्ड, वोटर आईडी और भारतीय पासपोर्ट तक हासिल कर लिया।
मीडिया से बात करते हुए SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि उन्हें फरहत मसूद नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली। वह दिल्ली गेट इलाके में रहता है। बताया जा रहा है कि फरहत मसूद पाकिस्तान गया था, जहाँ उसने सबा नाम की औरत से निकाह किया। वहीं पाकिस्तान में उनकी एक बेटी पैदा हुई। सबा और उसकी बेटी दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक हैं।
30 साल से बिना नागरिकता के रह रही पाकिस्तानी मां-बेटी#मेरठ : जली कोठी में रह रही मां-बेटी
⏩सबा उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और एनम फरहत
⏩ 30 साल से भारत में बिना भारतीय नागरिकता निवास
⏩ एसपी सिटी आयुष विक्रम ने FIR के बाद जांच के आदेश दिए
SSP ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह साफ हो गया है कि आरोपित बिना वैध भारतीय नागरिकता के यहाँ रह रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे पहले SP सिटी द्वारा की गई जाँच में भी आरोपों में सच्चाई पाई गई थी। जाँच में तथ्य सामने आने के बाद अब इस मामले में औपचारिक रूप से FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने बताया कि आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और पूरे मामले की गहराई से जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।
मामले में FIR की पूरी जानकारी
ऑपइंडिया ने इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी देखी है। इस FIR में सबा मसूद उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और उशकी बेटी ऐमन फरहत को मुख्य आरोपित बताया गया है। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS)2023 की कई धाराएँ लगाई गई हैं।
इनमें धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2), 351(2) और 352 शामिल हैं। ये धाराएँ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों से जुड़ी हुई हैं।
(फोटो साभार: UP पुलिस)
शिकायतकर्ता ने बताया कि सबा ने पाकिस्तान में फरहत मसूद से निकाह किया था और उनके बेटी ऐमन का जन्म वहीं 25 मई 1993 को हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि जब सबा भारत आई, तो ऐमन भी उसके साथ ही आई थी। ऐमन ने भारत में एंट्री सबा के पाकिस्तानी पासपोर्ट के जरिए की थी। उस पासपोर्ट में ऐमन का नाम और उसकी जन्मतिथि साफ-साफ दर्ज थी।
शिकायतकर्ता रुखसाना ने आगे बताया कि अम्मी और बेटी, दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद मेरठ में रह रही थीं। उन्होंने कभी भी कानूनी तरीके से भारतीय नागरिकता लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की। रुखसाना ने यह भी कहा कि ऐमन ने मेरठ में ही पढ़ाई की, जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक थी।
(फोटो साभार: UP पुलिस)
उन्होंने आगे बताया कि ऐमन के लिए भारतीय पासपोर्ट बनवाने के लिए फर्जी और बनावटी दस्तावेज तैयार किए गए। रुखसाना के मुताबिक, सबा ने भी दो अलग-अलग नामों से वोटर कार्ड बनवा लिए थे। इनमें एक सबा मसूद के नाम से और दूसरा नाजिया मसूद के नाम से था। शिकायत में कहा गया है कि ये सब जानबूझकर अपनी असली पहचान छिपाने और भारतीय अधिकारियों को धोखा देने के लिए किया गया।
रुखसाना ने अपनी शिकायत में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि आरोपित फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेजों के आधार पर कई बार पाकिस्तान और दूसरे देशों की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि सबा के अब्बा हनीफ अहमद कथित तौर पर पाकिस्तान नागरिक थे और उनका संबंध ISI से बताया जाता है। रुखसाना के अनुसार, इसी वजह से यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर हो जाता है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपित अपनी असली पहचान छिपाकर दिल्ली में सेना मुख्यालय और दूसरे सरकारी दफ्तरों में भी अकसर आते-जाते रहे हैं। FIR में यह भी दर्ज है कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने पहले इस मामले पर आपत्ति जताई थी तब उन्हें धमकाया और डराया गया था। रुखसाना का कहना है कि आरोपितों ने उन्हें यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक पहुँच है और पुलिस प्रशासन में भी उनके संबंध हैं।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। 2027 में ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में एआई अहम भूमिका निभाएगा। लेकिन इसका फायदा कुछ लोगों तक ही सीमित न रह जाए, इसके लिए सरकार कई योजनाएँ लेकर आई है। मूल रूप से एआई समाज में हर तबके तक पहुँच के साथ आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाएगा। सरकार ने एआई इकोसिस्टम को आकार देने में लगी हुई है।
कंप्यूटरिंग पावर, जीपीयू और अनुसंधान के अवसर हर व्यक्ति तक पहुँचे, इसलिए किफायती दरों पर इसे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। स्टार्टअप्स और इनोवेटर्स को विश्वस्तरीय एआई इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ा जा रहा है। इंडिया एआई मिशन की स्थापना की गई है।
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इसके अंतर्गत राष्ट्रीय कंप्यूटर सुविधा के माध्यम से 38000 से अधिक जीपीयू को शामिल किया गया है। एआई कोश में 9500 से अधिक डेटासेट और 273 क्षेत्रीय मॉडल शामिल हैं। राष्ट्रीय सुपर कंप्यूटरिंग मिशन से ऐरावत और परम सिद्धि एआई समेत 40 से ज्यादा पेटाफ्लॉप सिस्टम काम कर रहे हैं। इंडिया एआई और फ्यूटरस्किल्स पहल के माध्यम से अभी 500 पीएचडी, 5000 पोस्ट ग्रेजुएट और 8000 ग्रेजुएट स्टूडेंट्स की मदद की जा रही है।
अलग-अलग राज्यों में 570 एआई डेटा लैब और 27 इंडिया एआई लैब इनोवेशन को बढ़ावा दे रही हैं। करीब 90 फीसदी स्टार्टअप किसी न किसी एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे इनोवेशन के इकोसिस्टम में एआई की जड़ें गहरी होती जा रही है।
इंडिया एआई कंप्यूट, एआई एप्लिकेशन डेवलपमेंट पहल, एआई कोश समेत 7 स्तंभों पर आधारित ये ढाँचा भारत में अनुसंधान, कौशल विकास, नवाचार और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है। ये सारी कवायद देश को एआई पावरहाउस बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
भारत में एआई का बढ़ता इकोसिस्टम
भारत में एआई इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है अब करीब 60 लाख लोग इससे जुड़ गए हैं। देश में 1800 से अधिक ग्लोबल सेंटर हैं जिसमें से 500 से ज्यादा सेंटर्स में एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। देश में करीब 1.8 लाख स्टार्टअप्स हैं।
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पिछले साल के स्टार्टअप्स में करीब 90 फीसदी एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। उद्योग, बैंकिंग, बीमा, ऑटोमोटिव और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में एआई का करीब 60 फीसदी इस्तेमाल हो रहा है। बीसीजी के सर्वे के मुताबिक, करीब 26 फीसदी भारतीय कंपनियाँ एआई के इस्तेमाल में परिपक्व हो गई हैं।
एआई के 7 सिद्धांत
एआई के विकास में 7 बातों पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि नवाचार की प्रगति के लिए जोखिम कम करना जरूरी है। इसके लिए विश्वास जरूरी है। विश्वास वह मूलभूत सिद्धांत है जो भारत में सभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास और तैनाती का मार्गदर्शन करता है।
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जनता हर हाल में एआई के केन्द्र में रखा जाना चाहिए। एआई सिस्टम को इस तरह से इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि मानवीय और सामाजिक मूल्यों में वृद्धि हो और सबको इसका फायदा मिले। नवाचार को वरीयता मिले और सामाजिक-आर्थिक विकास हो, समावेशी विकास को बढ़ावा मिले और बगैर भेदभाव के हाशिए पर पड़े समुदायों तक इसका फायदा पहुँचे।
कृषि क्षेत्र में एआई
फसलों को होने वाली बीमारियों का पता लगाने, मौसम की भविष्यवाणी , मिट्टी की जाँच और उसकी उर्वरकता को बढ़ाने और सिंचाई को आधुनिक बनाने में एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पैदावार में जबरदस्त इजाफा होगा। सरकार ‘किसान ई-मित्र’ चैटबॉट बनाई है जिसके माध्यम से 11 भाषाओं में किसानों की मदद की जा रही है। 2025 तक 93 लाख सवालों के जवाब दिए गए।
डिजिटल कृषि मिशन के तहत 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी कार्ड बना कर 23.5 करोड़ खेती वाली जमीन का सर्वे कराया गया और एक डिजिटल आधार तैयार किया गया। राष्ट्रीय कीट निगरानी सिस्टम बनाया गया है जो 66 फसलों और उनमें लगने वाली 432 कीटों का पता लगाने के लिए 10000 लोगों को नियुक्त किया। ये किसानों को परामर्श देते हैं।
स्थानीय मानसून के हिसाब से खरीफ 2025 के लिए एआई आधारित परियोजना शुरू किया गया जो एसएमएस के जरिेए 13 राज्यों के 3.88 करोड़ किसानों को बुवाई और दूसरी जानकारी दी। यस टेक, क्रॉपिक और पीएमएफबीवाई व्हाट्सएप चैटबॉट बनाया गया।
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खेती की जाने वाली जमीन की मिट्टी की उर्वरकता और स्वास्थ्य का पता लगाने में एआई का इस्तेमाल हो रहा है। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और मृदा तनाव का पता चलता है। समय रहते किसान को बताया जाता है कि उसे क्या करना चाहिए। भारत की कृषि व्यवस्था में मानसून का काफी प्रभाव है इसलिए वर्षा के बदलते पैटर्न,तापमान में उतार चढ़ाव का पूर्वानुमान लगाता है।
इससे बुवाई का वक्त,सिंचाई, कीट प्रबंधन और खाद के उपयोग को लेकर किसानों को सही सलाह देता है। फसलों को होने वाले रोगों, कीटों की जानकारी देता है और फसलों को संभावित नुकसान से किसानों को बचाता है।
जलवायु संबंधी दूसरी जानकारी किसानों के लिए फायदेमंद हैं। उपग्रह से मिले चित्रों, ड्रोन, सेंसर और दूसरे माध्यम से मिली जानकारी को एआई एक साथ समीक्षा कर सही जानकारी उपलब्ध कराता है।
कृषि में आधुनिक मशीनों का उपयोग
खेती को सही तरीके से करने के लिए उसका विश्लेषण जरूरी है। जीपीएस, सेंसर, उपग्रहों और ड्रोन की मदद से एआई भूमि की सटीक जानकारी देता है। मिट्टी की क्वालिटी, नमी का स्तर, फसल की पौष्टिकता से संबंधित डेटा को स्थानीय स्तर पर जमा करता है और पानी, उर्वरक, कीटनाशक जैसे इनपुट का ठीक उसी स्थान और समय पर डाला जाना सुनिश्चित करता है , जहाँ और जितनी उनकी आवश्यकता होती है। इससे उत्पादकता बढ़ती है और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता है जिससे किसानों का खर्च कम हो जाता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान रोबॉटिक खेती को विकसित करने में लगा हुआ है। इसमें जीपीएस के सहारे खुद चलने वाले ट्रैक्टर, एआई द्वारा बीजों के चयन, जमीन की उर्वरकता का पता लगाना, सिंचाई में रॉबोट का इस्तेमाल ताकि बुवाई, कटाई से लेकर सिंचाई तक को मानव रहित बनाने पर विचार हो रहा है। इससे किसानों के खर्च कम होंगे। यहाँ तक कि फसलों की गुणवत्ता अच्छी होगी। उनकी निगरानी करना आसान हो जाएगा और फसलों की बीमारी, पोष्टिकता और बीमारियों का इलाज भी आसानी से हो जाएगा।
भारत सरकार ने 22 अक्टूबर 2025 को “फ्यूचर फार्मिंग इन इंडिया: एआई प्लेबुक फॉर एग्रीकल्चर” शीर्षक से एक बुकलेट जारी किया। इसमें छोटे किसानों को कैसे एआई का जिम्मेदारीपूर्वक इस्तेमाल किया जाए, इसकी जानकारी दी गई है। इससे किसानों को अच्छी और कम खर्च पर फसलों को पाने और बाजार तक पहुँचाने में मदद मिलेगी।
स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई
AI का उपयोग टीबी, कैंसर और न्यूरोलॉजी डिसऑर्डर का पता लगाने और उसके निदान में अहम भूमिका निभा रहा है। एआई भारत सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी में आ रही कमियों की जानकारी देता है। चिकित्सा उपकरणों, सेवाओं और दवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने और उन्हें किफायती बनाने में मदद कर रहा है। यहाँ तक कि दूर बैठ कर बीमारियों का इलाज और देखभाल करने में मदद कर रहा है।
राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है। रोग को फैलने से जुड़ी 4500 चेतावनी जारी की गई। अप्रैल 2023 से नवंबर 2025 के बीच 282 लाख टेलीमेडिसिन सुझावों में एआई का इस्तेमाल हुआ और एआई के बताए गए निदान के जरिए 12 लाख रोगियों की मदद की गई।
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रेडियोलॉजी एआई के द्बारा कैंसर के संभावित मामलों के लिए गांठों और केविटीज की पहचान हेतु डिजिटल एक्स-रे की ऑटोमेटेड रीडिंग लेता है। ये 8 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है। इससे विशेषज्ञों की कमी को पूरा करने में मदद मिल रही है।
शुगर पेशेंट की रेटिना की जाँच अक्सर होती है। इसके अलावा दिखाई कम देने पर रेटिना पर प्रेशर पड़ता है। ऐसे में एआई रेटिनल ट्रायज नॉन स्किल लोगों को भी रेटिना की तस्वीर लेने में मदद करता है, उसकी रिडिंग, ग्रेडिंग करता है और जरूरी होने पर विशेषज्ञों को दिखाने को कहता है। भारत का पहला एआई-सक्षम सामुदायिक स्क्रीनिंग कार्यक्रम दिसंबर 2025 में लॉन्च किया गया जीनोमिक-आयुर्वेद हाइब्रिड के माध्यम से प्रकृति और प्राचीन ग्रंथों के आधार पर रोग के संकेत पहचानने के लिए एआई का उपयोग हो रहा है। पारंपरिक ज्ञान के साथ एआई को एकीकृत करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने इसे एक ग्लोबल मॉडल के तौर पर मान्यता दी। कैंसर रोगियों के लिए बायोबैंक तैयार किया जा रहा है जिसमें कैंसर रोगियों की प्रोफाइल होगी और ये शोधकर्ताओं को कैंसर का जल्दी पता लगाने और एआई टूल्स विकसित करने में मदद करता है। स्वास्थ्य संबंधी धोखाधड़ी को रोकने में भी एआई सहायक है।
विभिन्न रोगों के निदान और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य परिणाम में सुधार लाने से लेकर स्वच्छ जल जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने तक भारत में स्वास्थ्य सेवा में एआई का नवाचारी उपयोग मानवता के लिए फायदेमंद है। मानव जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण चुनौतियों को हल करने, समावेशी सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और विकसित भारत @2047 के विजन को साकार करने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को साकार कर रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में एआई
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत एआई को CBSE पाठ्यक्रम, DIKSHA प्लेटफॉर्म और YUVAi जैसी पहल के माध्यम से छात्रों में कौशल का विकास किया जा रहा है। 38000 से अधिक GPUs ₹65 प्रति घंटे के हिसाब से मौजूद है जिससे एआई तक पहुँच को बढ़ावा मिला है। 5G अब 99.9 प्रतिशत जिलों में मौजूद है। इससे पूरे भारत में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिल रही है। ए
आईकोश साझा राष्ट्रीय संसाधन के रूप में 7,500+ डेटासेट और 273 मॉडल दे रहा है। क्राफ्ट्समेन ट्रेनिंग स्कीम यानी शिल्पकार प्रशिक्षण योजना के तहत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों सहित 31 नए जमाने के पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थानों के राष्ट्रव्यापी नेटवर्क के माध्यम से संचालित किए जा रहे हैं। अनुसंधान आधारित नवाचार को बढ़ावा देने के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
दरअसल एआई का लोकतांत्रिकरण किया जा रहा है यानी सबके लिए इसे सुलभ, किफायती और उपयोगी बनाना है। आर्थिक मौके बढ़ाना है।
(साभार-PIB)
भारत की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता इसकी सामाजिक पहचान और साझा ज्ञान प्रणालियों को आकार देती है। एआई का इस्तेमाल पांडुलिपियों के डिजिटाइज़ेशन, शैक्षणिक सामग्री के अनुवाद और आदिवासी और लुप्तप्राय भाषाओं को शामिल करके सांस्कृतिक और ज्ञान संपत्तियों को इस्तेमाल लायक बनाने के लिए किया जा रहा है।
एआई का इस्तेमाल सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्रों को डिजिटली जोड़ने के साथ-साथ कारीगरों को प्लेटफॉर्म और नए अवसर प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। सर्वम् एआई (Sarvam AI) भारतीय भाषाओं के लिए बड़े भाषा और स्पीच मॉडल विकसित कर रहा है, जिससे वॉइस इंटरफेस, दस्तावेजों की प्रोसेसिंग और नागरिक सेवाओं की आसान बनाया जा सके।
भाषिणी, राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत, में 350+ एआई मॉडल हैं, जिनमें स्पीच रिकग्निशन, मशीनी अनुवाद, टेक्स्ट-टु-स्पीच, ओसीआर और भाषा पहचानना शामिल हैं, जिससे डिजिटल सेवाएँ बहुभाषाई हो सकें।
बैंकिंग और वित्तीय सेवा
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल धोखाधड़ी का पता लगाने, व्यक्तिगत बैंकिंग, और कस्टमर सर्विस के लिए किया जा रहा है। इसका उपयोग संदिग्ध लेनदेन, बेनामी अकाउंट्स और असामान्य म्यूल अकाउंट्स के पैटर्न की पहचान करने के लिए किया जा रहा है। मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करके एआई बैंकिंग डेटा का विश्लेषण करता है, जिससे धोखाधड़ी का पता लगाने में मदद मिलती है और बैंकों को करोड़ों के नुकसान से बचाया जा सकता है।
एआई ग्राहकों के सामान्य खर्च करने के पैटर्न को सीखता है और यदि कोई लेन-देन सामान्य पैटर्न से अलग होता है, तो उसे संदिग्ध मानकर तत्काल कार्रवाई (जैसे कार्ड ब्लॉक करना) करता है।
जनरेटिव एआई का उपयोग लोन एप्रूवल के दौरान पहचान पत्रों और दस्तावेजों की सत्यता की जाँच करने के लिए किया जा रहा है, ताकि फर्जीवाड़े को रोका जा सके।
कोर्ट और न्याय दिलाने में एआई का इस्तेमाल
कानून और लोगों को न्याय दिलवाने में एआई का इस्तेमाल होने लगा है। साल 2023 में शुरू हुए ई-कोर्ट फेज III के माध्यम से कोर्ट रूम और लेखागारों में बदलाव आ गया है। एआई का उपयोग अदालती फैसलों के अनुवाद, केस प्रबंधन और अनुसूची के लिए किया जा रहा है। दस्तावेजों की डिजिटल फाइलिंग की जा रही है। वाद सूचियों को व्यवस्थित किया जा रहा है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई नियमित तौर पर हो रही है। कोर्ट के रिकॉर्ड और फैसले पूरे देश में कहीं भी देखा और पढ़ा जा सकता है।
(साभार-pib)
सरकार, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, एनआईसी और आईआईटी मद्रास जैसे संस्थानों की मदद से एआई टूल्स तैयार किया गया है जिससे मौखिक दलीलों का लिखना, फैसलों का अनुवाद, ईफाइलिंग में गलतियों को पहचानना, विधिक शोध शामिल है।
इसका असर किसी केस के फैसले के दौरान दोषी ठहराने, वाद-विवाद करने और तथ्यों को कोर्ट में रखने की परंपरा पर नहीं पड़ा है। लेकिन एआई का असर ये हुआ है कि अब लंबी सुनवाई की जरूरत नहीं है, तथ्यों को खोजने में कम वक्त, मातृभाषा में कोर्ट के फैसले की जानकारी, रिकॉर्ड ढूँढने में कम वक्त लगना जैसी सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसका न्यायिक फैसले के मूल भावना पर असर नहीं पड़ता है, बल्कि मुकदमों में होने वाली देरी और तनाव से लोग बचते हैं। तारीख पे तारीख से लोगों को निजात आगे मिलेगी, ऐसी उम्मीद है।
विनिर्माण में एआई की अहम भूमिका
विनिर्माण के क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। उद्योग और मोटर वाहनों की परिचालन दक्षता बढ़ाने में एआई अहम भूमिका निभा रहा है। इससे उत्पादन बढ़ाने, लागत कम करने और गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल रही है। सेंसर डेटा के द्वारा खराब होने से पहले ही मशीनों की पहचान कर उसकी मरम्मत कर दी जाती है, जिससे अचानक बंद होने जैसी परेशानियों से बचा जा सकता है।
AI-पावर्ड विज़न कम्प्यूटर सिस्टम उत्पाद की गुणवत्ता की जाँच करते हैं, जो मनुष्य द्वारा किए जाने वाले निरीक्षण से ज्यादा अच्छा होता है और गड़बड़ी जल्दी पकड़ में आ जाती है। एआई बाजार का विश्लेषण कर ये बताता है कि माँग कितनी है जिससे आपूर्ति का अंदाजा लग जाता है।
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना यानी डीपीआई के साथ एआई को जोड़कर सरकारी सेवाओं को सुलभ और कुशल बनाया जा रहा है। एआई का इस्तेमाल हर क्षेत्र में हो रहा है। इसका जिम्मेदारी से उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं और गवर्नेंस फ्रेमवर्क विकसित किए जा रहे हैं। ताकि देश में एआई सुशासन में मदद करे। विश्वास के साथ पूरे देश की भलाई और लोकतंत्र को मजबूत करने में एआई अहम भूमिका निभाए। भारत इस नजरिए के साथ भारत@ 2047 डिजिटल मिशन पर है।
पंजाब में कैंसर का संकट बेहद गंभीर होता जा रहा है। औसतन हर दिन आठ महिलाओं की कैंसर से मौत हो रही है। ताजा आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में करीब 2,700 महिलाओं की जान कैंसर के कारण जा चुकी है।
यह मामला 12 फरवरी को राज्यसभा में उठाया गया। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद बलबीर सिंह सीचेवाल ने सदन में इस गंभीर स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि यह पंजाब के अस्तित्व से जुड़ा विषय है। उन्होंने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार से तत्काल कदम उठाने की माँग की।
सीचेवाल ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा
सीचेवाल ने विशेष उल्लेख (Special Mention) के दौरान पंजाब में महिलाओं के बीच बढ़ते कैंसर मामलों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में कैंसर के मामलों में तेजी से हो रही बढ़ोतरी बेहद चिंताजनक है और इस पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में पंजाब में लगभग 2,700 महिलाओं की कैंसर से मौत हुई जो औसतन प्रतिदिन 8 महिलाओं की मृत्यु के बराबर है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच कुल 13,299 महिलाओं की कैंसर से जान गई। इनमें सबसे अधिक 7,186 मौतें स्तन कैंसर से हुईं, इसके बाद गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (Cervix Uteri) से 3,502 और अंडाशय कैंसर (Ovary cancer) से 2,611 महिलाओं की मृत्यु हुई।
उन्होंने आगे कहा, “चिंताजनक बात यह है कि 40 से 45 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में भी कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही बल्कि कम उम्र की महिलाओं के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है। उन्होंने पर्यावरणीय कारणों, खासकर जल प्रदूषण और कृषि में रासायनिक उर्वरकों के व्यापक उपयोग को इसके प्रमुख कारणों में बताया। उनका कहना था कि ये रसायन मिट्टी में मिलकर अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में पहुँच जाते हैं।
सीचेवाल ने कहा कि ये आँकड़े नीति बनाने वालों और समाज दोनों के लिए चेतावनी हैं और इस पर गंभीरता से ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
पंजाब में कैंसर के बढ़ते केस, इलाज में राहत की माँग
पर्यावरण प्रदूषण को कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना गया है। प्रदूषित पीने का पानी, खेती में केमिकल खाद और कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल और उद्योगों का कचरा इसके संभावित कारण बताए गए हैं। सीचेवाल ने कहा कि जब माताओं के स्तन दूध में DDT जैसे खतरनाक रसायन पाए गए तब जाकर इन रसायनों पर रोक लगाई गई। इससे साफ होता है कि जहरीले तत्व कितनी गहराई तक इंसानी शरीर में पहुँच सकते हैं।
उन्होंने सरकार से माँग की कि महिलाओं के लिए कैंसर का इलाज पूरी तरह मुफ्त किया जाए। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सरकारी या निजी अस्पतालों में इलाज के लिए कम से कम 75 से 80 प्रतिशत तक की सहायता दी जाए। उन्होंने कहा कि महिलाएँ परिवार और समाज की रीढ़ होती हैं, इसलिए पंजाब के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उनके स्वास्थ्य की रक्षा जरूरी है।
पंजाब को क्यों कहा जाता है कैंसर कैपिटल?
पंजाब खासकर मालवा क्षेत्र को लंबे समय से भारत की ‘कैंसर कैपिटल’ कहा जाता है। कृषि उत्पादन के लिए मशहूर मालवा आज ‘कैंसर बेल्ट’ के नाम से भी जाना जाने लगा है।
Asian Pacific Journal of Cancer Prevention में प्रकाशित एक शोध पत्र में पंजाब के 500 कैंसर मरीजों का अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन के अनुसार, 500 मरीजों में से 65% महिलाएँ और 35% पुरुष थे। महिलाओं में 50–54 और 60–64 वर्ष आयु वर्ग सबसे अधिक प्रभावित पाया गया। वहीं, पुरुषों में 65–69 और 60–64 वर्ष आयु वर्ग में कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया।
महिलाओं में सबसे अधिक स्तन कैंसर के मामले सामने आए, इसके बाद गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) और अंडाशय (ओवरी) का कैंसर प्रमुख रहा। पुरुषों में सबसे ज्यादा कोलन (बड़ी आंत) का कैंसर पाया गया, इसके बाद भोजन नली (इसोफेगस) और जीभ का कैंसर प्रमुख रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब में प्रति 1 लाख आबादी पर कम से कम 172 कैंसर मरीज दर्ज किए गए थे जबकि मालवा क्षेत्र में कैंसर के मामले और भी अधिक पाए गए। हाल के अनुमानों के मुताबिक मालवा में कैंसर की दर चिंताजनक स्तर तक पहुँच चुकी है। कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए कृषि रसायनों और कीटनाशकों को व्यापक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में लगभग 15 लाख कैंसर के मामले दर्ज किए गए जो 2022 में 14.6 लाख थे। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली में बदलाव, पर्यावरण प्रदूषण, आनुवंशिक कारण और देर से जाँच (डायग्नोसिस) कैंसर के मामलों में वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। हालाँकि, पूरे देश में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं लेकिन पंजाब की स्थिति विशेष रूप से गंभीर मानी जा रही है क्योंकि यहाँ प्रदूषण और कृषि केमिकल्स से इसका संबंध है।
पंजाब की ‘कैंसर ट्रेन’
पंजाब की कैंसर स्थिति का सबसे मार्मिक प्रतीक है बठिंडा-बीकानेर ट्रेन जिसे लोग ‘कैंसर ट्रेन‘ कहते हैं। हर रात करीब 9:30 बजे 12 डिब्बों वाली यह ट्रेन बठिंडा से सैकड़ों यात्रियों, जिनमें कई कैंसर मरीज होते हैं, को लेकर रवाना होती है। लगभग 325 किलोमीटर का सफर तय कर यह सुबह राजस्थान के बीकानेर पहुँचती है।
अधिकांश मरीज आचार्य तुलसी क्षेत्रीय कैंसर अस्पताल और रिसर्च सेंटर में इलाज कराने जाते हैं। बीकानेर में इलाज अपेक्षाकृत सस्ता होने के कारण बड़ी संख्या में मरीज दूसरे राज्य से रुख करते हैं। कैंसर मरीजों को ट्रेन में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलती है जबकि उनके साथ आने वाले को 75% किराया छूट दी जाती है।
मुख्यमंत्री पंजाब कैंसर राहत कोष योजना के तहत बीकानेर के कुछ अस्पतालों में मरीजों को 15 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। रातभर सफर कर इलाज के लिए जाते मरीजों के हाथों में मेडिकल फाइलों से भरे प्लास्टिक कवर, इस गंभीर संकट की दर्दनाक तस्वीर बन चुके हैं।
कौन हैं बलबीर सिंह सीचेवाल?
संत बलबीर सिंह सीचेवाल को ‘ईको बाबा’ के नाम से जाना जाता है। वह पंजाब के एक सिख पर्यावरण कार्यकर्ता, आध्यात्मिक नेता और राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें आम आदमी पार्टी (AAP) ने उनके पर्यावरण संरक्षण कार्यों के लिए नामित किया था।
उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान उस समय मिली जब उन्होंने काली बेईं नदी की सफाई का बड़ा अभियान चलाया। यह नदी लगभग 160 किलोमीटर बहने के बाद सतलुज और ब्यास नदियों में मिलती है। एक समय यह नदी औद्योगिक कचरे और दर्जनों गांवों के गंदे पानी के कारण पूरी तरह प्रदूषित होकर कूड़ाघर बन चुकी थी।
ऐसे हालात में संत सीचेवाल ने स्वयंसेवकों के सहयोग से एक विशाल जनआंदोलन खड़ा किया और नदी को पुनर्जीवित करने का काम किया। उनके इस प्रयास की विश्व स्तर पर सराहना हुई। वर्ष 2008 में उन्हें ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा ‘पर्यावरण के नायक’ (Hero of the Environment) सम्मान दिया गया। उस समय यह सम्मान पाने वाले वे एकमात्र भारतीय और एशियाई थे।
उन्होंने ‘सीचेवाल मॉडल’ भी शुरू किया जो कम लागत वाली अंडरग्राउंड सीवेज व्यवस्था है। इस प्रणाली के माध्यम से गंदे पानी को शुद्ध कर खेतों में उपयोग किया जाता है। इस मॉडल को पंजाब सरकार का समर्थन भी मिला है। संत सीचेवाल स्वास्थ्य समस्याओं विशेषकर कैंसर को प्रदूषण से जोड़ते हैं। वे साफ जल और साफ हवा के लिए लगातार आवाज उठाते रहे हैं और संसद में किसानों से लेकर पर्यावरण संकट तक के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रृति सागर ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
नई दिल्ली में 16 से 20 फरवरी 2026 तक होने जा रहा भारत-एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन 2026 (India AI Impact Summit 2026) अब शुरू हो चुका है। यह किसी विकासशील देश में होने वाला पहला वैश्विक AI शिखर सम्मेलन है और अब तक आयोजित 4 ग्लोबल AI समिट में इसे सबसे बड़ा आयोजन माना जा रहा है, जिसका फोकस जिम्मेदार, समावेशी और असरदार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर है। इस समिट को लेकर दुनिया भर में जबरदस्त उत्साह है और 100 से अधिक देशों से लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में विश्व भर के नेताओं, उद्योगपतियों, इनोवेटरों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और टेक्नोलॉजी को लेकर उत्साही लोगों का स्वागत किया है। PM मोदी ने X पर लिखा, “AI पर चर्चा करने के लिए पूरी दुनिया इकट्ठा है! समिट की थीम ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ है, जो मानव-केंद्रित प्रगति के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने की हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”
Bringing the world together to discuss AI!
Starting today, India hosts the AI Impact Summit at Bharat Mandapam in Delhi. I warmly welcome world leaders, captains of industry, innovators, policymakers, researchers and tech enthusiasts from across the world for this Summit. The…
समिट में 15–20 राष्ट्राध्यक्ष, 50 से अधिक मंत्री, 40 से ज्यादा भारतीय और वैश्विक कंपनियों के CEO और लगभग 500 बड़े इनोवेटर, शोधकर्ता और टेक्नोलॉजी लीडर्स शामिल होने वाले हैं। इसके साथ ही 500 से अधिक एआई स्टार्टअप्स अपने आइडिया और तकनीक का प्रदर्शन करेंगे और करीब 500 सत्र आयोजित किए जाएँगे जिससे यह AI पर केंद्रित सबसे बड़े वैश्विक आयोजनों में से एक बन गया है। आयोजकों के अनुसार, इस कार्यक्रम में करीब 2.5 लाख से ज्यादा लोगों के आने की उम्मीद है। इनमें 3,250 से ज्यादा वक्ता अपने विचार साझा करेंगे।
इस समिट की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ चर्चा नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस नतीजों पर जोर दिया जाएगा। समिट से पहले 1,300 से ज्यादा प्रस्ताव मिले और भारत सहित दुनिया भर में 500 से अधिक प्री-समिट कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके अलावा 7 प्रमुख कार्यक्रमों के जरिए 3 लाख से अधिक लोग इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े हैं जो इस आयोजन के प्रति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती रुचि को दिखा रहे हैं।
यह एक्सपो 70,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में फैले 10 Arena में आयोजित किया जाएगा। इसमें वैश्विक टेक कंपनियाँ, स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थान, अनुसंधान संगठनों, केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों की सक्रिय भागीदारी रहेगी।
कार्यक्रम में 13 देशों के पवेलियन भी स्थापित किए जाएँगे, जो AI इकोसिस्टम को मिल रहे वैश्विक सहयोग को प्रदर्शित करेंगे। इनमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड, सर्बिया, एस्टोनिया, ताजिकिस्तान और अफ्रीकी देशों के पवेलियन शामिल होंगे।
कौन-कौन प्रमुख नेता होंगे शामिल?
इंडिया–एआई इम्पैक्ट समिट में दुनिया के कई प्रमुख देशों के शीर्ष नेता हिस्सा ले रहे हैं। इस वैश्विक सम्मेलन में भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे, बोलिविया के उपराष्ट्रपति एडमंड लारा मोंटानो, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, क्रोएशिया के प्रधानमंत्री आंद्रेय प्लेंकोविच, एस्टोनिया के राष्ट्रपति अलार करिस, फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ऑरपो, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस हिस्सा लेंगे।
इसके साथ ही, गुयाना के उपराष्ट्रपति भरत जगदेव, कजाखस्तान के प्रधानमंत्री ओल्झास बेक्टेनोव, लिकटेंस्टीन के युवराज प्रिंस एलोइस, मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम, सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्सांदर वुचिच, स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी, स्पेन के राष्ट्रपति पेद्रो सांचेज, श्रीलंका के राष्ट्रपति कुमार दिसानायका, सेशेल्स के उपराष्ट्रपति सेबेस्टियन पिल्ले, स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गी पारमेलिन, नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री डिक स्कूफ और UAE से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायेद अल नाहयान समिट में शामिल हो रहे हैं।
इनके अलवे 45 से अधिक देशों के मंत्रीस्तरीय प्रतिनिधिमंडल तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के वरिष्ठ अधिकारी भी इस समिट में भाग लेंगे।
टेक लीडर्स का भी लगेगा जमावड़ा
शिखर सम्मेलन में वैश्विक तकनीकी जगत (Global Technology World) की कई बड़ी हस्तियाँ भाग ले रही हैं। इनमें ओपनएआई (OpenAI) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सैम ऑल्टमैन, गूगल डीपमाइंड के सह-संस्थापक और CEO सर डेमिस हसाबिस, गूगल और अल्फाबेट के CEO सुंदर पिचाई तथा एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई प्रमुख रूप से शामिल हैं। मेटा के चीफ AI अधिकारी अलेक्जेंडर वांग भी इस मंच का हिस्सा बन रहे हैं।
इसके अतिरिक्त एडोब के चेयरमैन और CEO शंतनु नारायण, एक्सेंचर की चेयरमैन और CEO जूली स्वीट, इंफोसिस के CEO और प्रबंध निदेशक सलील पारेख व एचसीएल टेक के CEO और प्रबंध निदेशक सी. विजयकुमार भी सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। माइक्रॉन के चेयरमैन, प्रेसिडेंट और CEO संजय मेहरोत्रा भी इसमें शामिल होंगे।
भारत और वैश्विक उद्योग जगत से जुड़े अन्य प्रमुख नामों में पेटीएम के संस्थापक और CEO विजय शेखर शर्मा, सेल्सफोर्स इंडिया की चेयरपर्सन और CEO अरुंधति भट्टाचार्य तथा मिस्ट्रल एआई के सह-संस्थापक और CEO आर्थर मेंश शामिल हैं। कुलमिलाकर कहें तो दुनिया के करीब 100 देशों के तकनीकी क्षेत्र के शीर्ष नेता इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं। इसे वैश्विक कंपनियों के लिए भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने और नई साझेदारियों के अवसर तलाशने के एक अहम मंच के रूप में भी देखा जा रहा है।
पहले तीन AI Summit कहाँ और कब हुए?
ग्लोबल स्तर पर AI के नियम, सुरक्षा और जिम्मेदार उपयोग को लेकर औपचारिक शिखर सम्मेलनों की शुरुआत साल 2023 से हुई। भारत से पहले 3 बड़े देशों में उच्च-स्तरीय AI समिट आयोजित की जा चुकी हैं। इन बैठकों में एआई के AI, उसके नियमन और देशों के बीच सहयोग जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई थी।
पहली AI समिट सबसे पहला सम्मेलन नवंबर 2023 में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में हुआ था। इसे AI सेफ्टी समिट कहा गया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य उन्नत AI मॉडलों से जुड़े संभावित खतरों को समझना था। इसमें AI के दुरुपयोग, साइबर हमलों, डीपफेक, जैविक और सैन्य जोखिमों जैसे विषयों पर चर्चा हुई। साथ ही देशों ने AI सुरक्षा पर मिलकर शोध करने और साझा मानक बनाने की जरूरत पर सहमति जताई।
दूसरी AI समिट इसके बाद मई 2024 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ। यहाँ चर्चा सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं रही बल्कि एआई गवर्नेंस, पारदर्शिता, कंपनियों की जिम्मेदारी और सिस्टम की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर भी बात हुई। टेक कंपनियों से कहा गया कि वे अपने उन्नत AI मॉडलों के जोखिम का आकलन सार्वजनिक करें और सुरक्षा उपायों को मजबूत बनाएँ।
तीसरी AI समिट तीसरा बड़ा सम्मेलन 2024 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित हुआ। इस बैठक में AI से मिलने वाले आर्थिक अवसरों, नवाचार, स्टार्टअप इकोसिस्टम, डेटा सुरक्षा और नैतिक मानकों पर जोर दिया गया। यूरोपीय देशों ने एआई के लिए सख्त नियम बनाने, डिजिटल अधिकारों की रक्षा करने और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने की बात रखी गई।
AI समिट के तीन सूत्र
India–AI Impact Summit 2026 को तीन बुनियादी सूत्रों के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है। ये सूत्र ग्लोबल स्तर पर AI के क्षेत्र में सहयोग की दिशा तय करने वाले मुख्य सिद्धांतों को लेकर तय किए गए हैं।
पहला सूत्र ‘जन’ है। इसके तहत मानव-केंद्रित AI को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। लक्ष्य यह है कि AI तकनीक लोगों के अधिकारों की रक्षा करे, आम नागरिकों तक सेवाओं की पहुँच आसान बनाए, तकनीक पर भरोसा मजबूत करे और समाज के हर वर्ग को उसका न्यायसंगत लाभ मिल सके।
दूसरा सूत्र ‘पृथ्वी’ है। इसके अंतर्गत पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार AI विकास पर ध्यान दिया गया है। इसमें ऊर्जा-कुशल प्रणालियों को बढ़ावा देना, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना और जलवायु संरक्षण से जुड़ी पहलों को समर्थन देना शामिल है ताकि AI का विकास पर्यावरण की सहनशीलता के अनुरूप हो।
तीसरा सूत्र ‘प्रगति’ है। इस सूत्र का उद्देश्य नवाचार, कौशल विकास और क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करना है। साथ ही, AI के माध्यम से उत्पादकता, आर्थिक विकास और तकनीकी उन्नति को बढ़ावा देकर समावेशी विकास सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है। समिट का मकसद यह है कि AI केवल तकनीकी प्रगति का माध्यम न बनकर, मानव कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और संतुलित आर्थिक विकास का आधार भी बने।
AI समिट के 7 चक्रों का क्या है संदेश?
भारत-एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में इस बार चर्चाएँ 7 प्रमुख ‘चक्रों’ के इर्द-गिर्द केंद्रित होंगी। ये चक्र उन अहम क्षेत्रों को सामने रखते हैं, जिनमें बहुपक्षीय सहयोग के जरिए समावेशी और सतत सामाजिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। शिखर सम्मेलन का उद्देश्य केवल विमर्श तक सीमित नहीं है बल्कि AI को मानव विकास, सामाजिक न्याय और आर्थिक प्रगति से जोड़ने की व्यापक रणनीति तैयार करना भी है।
पहला चक्र ‘मानव पूँजी’ पर केंद्रित है। इसके तहत कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए ऐसा तंत्र तैयार करने पर जोर दिया जाएगा, जिससे AI अर्थव्यवस्था के लिए कार्यबल तैयार हो सके। भारत के नजरिए से देखें तो यह पहल राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप युवाओं और पेशेवरों को नई तकनीकों के लिए सक्षम बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
दूसरा चक्र ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के लिए समावेशन से जुड़ा है। इसमें साझा AI समाधानों और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले मॉडलों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा होगी। इसका मकसद नागरिक-केंद्रित AI समाधान विकसित करना है ताकि सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं की पहुँच समाज के अंतिम व्यक्ति तक मजबूत हो सके।
तीसरा चक्र सुरक्षित और भरोसेमंद AI पर केंद्रित है। इसमें AI के वैश्विक सिद्धांतों को व्यवहारिक सुरक्षा और शासन ढाँचे में बदलने की दिशा में विचार-विमर्श होगा। भारत के लिए यह घरेलू AI गवर्नेंस को मजबूत करने, सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित तैनाती सुनिश्चित करने और नवाचार को बढ़ावा देते हुए आम जनता का विश्वास बनाए रखने में सहायक माना जा रहा है।
चौथा चक्र लचीलापन, नवाचार और दक्षता से जुड़ा है। इसमें बड़े पैमाने पर AI प्रणालियों से पैदा होने वाली पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी चुनौतियों के समाधान पर चर्चा की जाएगी। यह पहल इस बात पर जोर देती है कि AI का बढ़ता उपयोग पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और सामाजिक रूप से न्यायसंगत बना रहे ताकि वैश्विक स्तर पर तकनीकी असमानताएँ और न बढ़ें।
पाँचवाँ चक्र विज्ञान पर आधारित है। इसमें डेटा, कंप्यूटिंग संसाधनों और अनुसंधान क्षमता तक असमान पहुँच को कम करने पर विचार होगा ताकि AI के जरिए वैज्ञानिक रिसर्च की रफ्तार तेज की जा सके। भारत के लिए यह स्वास्थ्य, कृषि और जलवायु जैसे क्षेत्रों में रिसर्च को मजबूती देने और वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर माना जा रहा है।
छठा चक्र AI संसाधनों के लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य ऐसा वैश्विक तंत्र विकसित करना है, जिसमें AI विकास के बुनियादी साधन सभी के लिए सुलभ और किफायती हों। इससे भारत में स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और सार्वजनिक संस्थानों की ग्लोबल AI मूल्य श्रृंखला में समान भागीदारी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
सातवाँ और अंतिम चक्र आर्थिक विकास और सामाजिक भलाई के लिए AI के उपयोग पर केंद्रित है। इसमें ऐसे प्रभावशाली उपयोग मामलों की पहचान और समर्थन पर जोर दिया जाएगा, जो एआई के माध्यम से आर्थिक समृद्धि और सामाजिक कल्याण दोनों को आगे बढ़ा सकें।
कुल मिलाकर, शिखर सम्मेलन का फोकस इस बात पर है कि AI को केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन और समावेशी विकास के औजार के रूप में देखा जाए।
भारत के लिए क्यों खास है यह समिट?
India AI Impact Summit 2026 से ऐसे ठोस फैसलों की उम्मीद की जा रही है, जो भारत की प्राथमिकताओं के अनुरूप हों। इस शिखर सम्मेलन का मुख्य फोकस केवल AI पर चर्चा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसे जमीन पर लागू करने की व्यावहारिक रणनीति तैयार करने पर होगा ताकि सरकार और उद्योग दोनों स्तरों पर इसका प्रभावी इस्तेमाल हो सके।
समिट में AI के बेहतर उपयोग के लिए नीतियों के बीच तालमेल और संस्थागत समन्वय को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। इसका सीधा लाभ यह होगा कि अलग-अलग मंत्रालयों, राज्यों और उद्योगों के बीच स्पष्ट दिशा और सहयोग बनेगा जिससे योजनाओं को तेजी से लागू किया जा सके। साथ ही, AI से जुड़े शासन और नियामक ढाँचे को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया जाएगा ताकि नई तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षित और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से हो।
भारत जैसे बड़े देश के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की AI के लिए तैयारी का आकलन किया जाए। समिट में इस बात पर चर्चा होगी कि किन क्षेत्रों में AI आधारित औद्योगिक विकास की ज्यादा संभावनाएँ हैं और वहाँ किस तरह की नीतिगत व बुनियादी मदद की जरूरत है। इससे क्षेत्रीय असमानता कम करने और संतुलित औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, AI के उपयोग और संभावनाओं के बारे में व्यापक जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। सरकार, शिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप और उद्योग जगत के बीच दीर्घकालिक साझेदारी को बढ़ावा देकर एक मजबूत और जिम्मेदार AI इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में कदम उठाए जाएँगे।
यह शिखर सम्मेलन भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि यह AI को केवल एक उभरती तकनीक नहीं बल्कि आर्थिक विकास, बेहतर शासन, रोजगार सृजन और समावेशी प्रगति के साधन के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस आधार तैयार कर सकता है।
गुजरात के जूनागढ़ के गिरनार पर्वत की तलहटी में, प्रकृति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर वनों के बीच, महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर भावनाथ महादेव मंदिर में प्रतिवर्ष एक अनूठा मेला लगता है। यह मेला महज एक उत्सव नहीं बल्कि भक्ति, तपस्या और आध्यात्मिक मिलन का जीवंत अनुभव है।
मुझे याद है जब मैं पहली बार वहाँ पहुँचा था, मेरे मन में कई सवाल थे। इतनी भीड़ में मुझे शांति कैसे मिलेगी? संतों और भिक्षुओं के बीच मुझे आध्यात्मिकता का अनुभव कैसे होगा?
लेकिन जैसे ही मैं उस वातावरण में डूब गया, मुझे एहसास हुआ कि यह मेला बाहरी भीड़ और आंतरिक शांति का एक अद्भुत संगम था। आज मैं आपको अपने उस अनुभव के बारे में बताऊँगा, जिसमें मैं एक आम इंसान के सामान्य सवालों के साथ गया था और एक रहस्यमय अनुभूति, आध्यात्मिकता और आंतरिक यात्रा के साथ लौटा।
यात्रा का प्रारंभ: जूनागढ़ से भावनाथ तक
भावनगर से जूनागढ़ पहुँचने के बाद भावनाथ की यात्रा शुरू हुई। मैंने लोगों से भरी बस में शोरगुल के बीच यह यात्रा करने की योजना बनाई थी। जूनागढ़ शहर से गिरनार की तलहटी तक का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं है, मुश्किल से पाँच-छह किलोमीटर। जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती है, ऐसा लगता है कि यह दूरी भौगोलिक से ज्यादा मानसिक है।
शहर की सामान्य हलचल पीछे छूट जाती है और गिरनार का विशाल, शांत और गंभीर रूप सामने आ जाता है। बस में मेरे साथ बैठे कुछ लोग ‘हर हर महादेव’, ‘जय गिरनारी’ के नारे लगा रहे थे। एक बुजुर्ग दंपति अपने पोते को समझा रहे थे कि यह मेला क्यों खास है। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था और दूर अंधेरे में गिरनारी की परछाईं दिखाई दे रही थी, मानो जटाधारी योगी की आकृति हो।
पहाड़ियों की तलहटी में प्रवेश
गाड़ी जैसे ही पार्किंग क्षेत्र के पास पहुँची, यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई साधारण आयोजन नहीं था। गाड़ियों की लंबी कतार, पुलिस की मौजूदगी, स्वयंसेवक इधर-उधर भाग रहे थे। मैं पैदल ही आगे बढ़ा। सड़क के दोनों ओर अस्थायी दुकानों की कतारें थीं जिनमें रुद्राक्ष, त्रिशूल, भभूति, भगवा झंडे, भगवान शिव की तस्वीरें रखी थीं।
कहीं-कहीं गरमा गरम फाफड़ा-जलेबी की खुशबू, कहीं-कहीं चाय की केतलियों से उठती भाप। ढोल की थाप और ‘हर हर महादेव’ के जयकारे के बीच मैं भी भीड़ में समा गया। भीड़ तो थी, पर अराजक नहीं। सभी एक ही दिशा में बढ़ रहे थे भावनाथ महादेव की ओर। भावनाथ महादेव के मंदिर में कोई अनुष्ठान चल रहा था और विभिन्न संप्रदायों के संत और भिक्षु वहाँ एकत्रित हो रहे थे।
जैसे ही हम मंदिर परिसर पहुँचे, भिक्षुओं के शिविर दिखने लगे। दो कतारों में रावती लगी हुई थीं। कहीं धुआँ लगातार उठ रहा था, कहीं भिक्षु शांति से बैठकर मंत्रोच्चार कर रहे थे। मैं एक रावती के पास रुक गया, जहाँ जेरामबापा की गिरनारी उतरा रखी थी। वहाँ भोजन की व्यवस्था की जा रही थी।
सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय मुफ्त भोजन उपलब्ध था। चाय भी बाँटी जा रही थी। किसी ने मुझे भी बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर में बातचीत शुरू हो गई, कुछ राजकोट से आए थे, कुछ कच्छ से और कुछ महाराष्ट्र से। यहाँ केवल साधु ही नहीं थे बल्कि सेवाभावी लोग भी मौजूद थे।
काठियावाड़ के सदाचारी और दयालु लोग भी यहाँ सदाव्रत कर रहे थे, जैसे तोरणीय उतारो, परब उतारो और भूराभागत रावती। खाने-पीने का इंतजाम चल रहा था। खिचड़ी, कढ़ी, फराली व्यंजन परोसे जा रहे थे। पहली बार मुझे ऐसा लगा कि यह मेला केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक भी है। यहाँ सेवा और भक्ति दोनों साथ-साथ चल रही हैं।
रात गहरी होती जा रही थी, गिरनार पर बल्बों की पीली रोशनी फैल रही थी, जिससे एक अलग ही अनुभव हो रहा था, एक ऐसा अनुभव जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। मैं भीड़ के बीच से होते हुए भावनाथ मंदिर की ओर बढ़ा। मंदिर के दाहिनी ओर साधुओं की कुटियाएँ थीं जहाँ वे अपने सेवकों के साथ बैठे थे।
कुछ नागा बाबा अपनी इंद्रियों से अद्भुत करतब दिखा रहे थे, जैसे बैलगाड़ी खींचना या तलवारबाजी। अपने भव्य शरीर और लंबे बालों के साथ, वे मानो शिव के रुद्र रूप में प्रकट हुए प्रतीत होते थे। मैं मंदिर में लगी कतार में शामिल हो गया। कतार लंबी थी। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि लोग अधीर नहीं थे।
कुछ भजन गा रहे थे, कुछ जप कर रहे थे, कुछ बच्चों की देखभाल कर रहे थे। धीरे-धीरे हम मुख्य द्वार पर पहुँचे। मंदिर का शिखर प्रकाश में चमक रहा था। जब मेरी बारी आई और मैं गर्भगृह के सामने पहुँचा, तो एक पल के लिए सब कुछ शांत हो गया। भीड़ पीछे चल रही थी लेकिन उस क्षण समय थम गया। शिवलिंग पर राख देखकर, हाथ अनायास ही जुड़ गए।
यहीं मुझे एहसास हुआ कि दर्शन केवल देखने का नाम नहीं है, यह एक अनुभव है। यह भीतर तक कुछ छूता है। जैसे-जैसे आधी रात नजदीक आती गई, माहौल बदलने लगा। लोग एक दिशा में इकट्ठा होने लगे। ‘रावाड़ी शुरू होने वाली है’- ये शब्द बार-बार सुनाई दे रहे थे। तभी अचानक शंख की आवाज गूँजी। नागा साधु प्रकट हुए।
राख से ढके शरीर, बालों की लटें, त्रिशूल। गिरनार की पहाड़ियों से जयघोष की ध्वनि गूँज रही थी। कुछ लोग घोड़ों पर सवार थे, कुछ पैदल, कुछ अपने अखाड़े के झंडे लिए हुए। भीड़ रोमांचित थी। मोबाइल कैमरे ऊपर उठे हुए थे। मैंने भी यह सब देखा लेकिन कैमरे से ज्यादा अपनी आँखों से।
यह महज एक तमाशा नहीं था। यह त्याग, अनुशासन और परंपरा का सार्वजनिक प्रदर्शन था। उस क्षण मुझे एहसास हुआ कि इस मेले को महज़ एक त्योहार कहना काफी नहीं है। नागा साधु, अघोरी और विभिन्न अखाड़ों के साधु घोड़े, बैलगाड़ी, बग्गी या हाथी पर सवार होकर मृगीकुंड की ओर बड़े धूमधाम से प्रस्थान करते हैं।
जुलूस मृगीकुंड की ओर बढ़ा। मैं भी भीड़ के साथ वहाँ पहुँच गया। तालाब के चारों ओर श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह था। भिक्षु एक के बाद एक स्नान कर रहे थे। कहा जाता है कि यह विशेष स्नान पवित्रता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। मैंने भी पानी को छुआ। पानी ठंडा था। लेकिन भीतर कुछ अलग ही सिहरन हुई।
एक पल के लिए मुझे समझ नहीं आया कि यह ठंड थी या भीतर से कोई आवाज आ रही थी। इस अनुभव से मुझे बापूजी की कही बात याद आ गई, ‘मृगीकुंड श्री हरि विष्णु का हृदय है। वह जल सिद्ध योगियों का अमृत है और स्वयं शिव नाग साधु के वेश में यहाँ स्नान करते हैं’।
मेरे दादाजी ने एक बार मुझसे कहा था कि कुछ नागा साधु मृगीकुंड में स्नान करने के बाद कभी वापस नहीं लौटते। कोई नहीं जानता कि वे कहाँ जाते हैं और कौन हैं। शुरू में ये सब बातें मुझे झूठी और भ्रामक लगीं। मैं जानता था कि मन तार्किक बातों को समझ सकता है लेकिन उस समय ये सब बातें मुझे केवल अंधविश्वास या लोक मान्यताएँ ही लगती थीं।
मृगीकुंड के जल के स्पर्श ने मुझे याद दिलाया और हम सब फिर से मृगीकुंड के पास बैठ गए और अपना डेरा जमा लिया। एक ने कहा, “आज हमें देखना होगा कि ये साधु कब बाहर आएँगे।” कुछ नाग साधु राजसी वस्त्र पहने, हाथों में त्रिशूल लिए, गले में रुद्राक्ष और राख लपेटे हुए आए।
लगभग 35-40 साधु थे। उन्होंने लगभग 45 मिनट तक स्नान किया और फिर तालाब से बाहर आए। जब वे बाहर आए, तो उनकी संख्या कम हो गई थी, गिनने का समय नहीं था लेकिन संख्या लगभग 10-15 थी। फिर से मेरे मन में जिज्ञासा जागी कि शायद कुछ साधु अभी भी पानी में गोता लगा रहे हों या ध्यान कर रहे हों।
हम घंटों तक वहीं रुके रहे लेकिन वे साधु कहीं नहीं दिखे! किसी के लिए इतनी देर तक पानी में बिना साँस रोके बैठना संभव नहीं था। अंत में मैंने अपनी बुद्धि को एक तरफ रख दिया और भावनाथ मंदिर की ओर हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। यहाँ भी मुझे वही बात याद आई कि विज्ञान और बुद्धि से परे भी कुछ है और वह है ईश्वर का अहसास।
मैंने लोक कथाओं में सुना था कि अश्वत्थामा, पांडव, राजा भरतहारी और सिद्ध योगी नागा संन्यासियों के वेश में मृगीकुंड में स्नान करने आते हैं। उन भिक्षुओं को कुंड से बाहर न निकलते देख, मेरे मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठा कि क्या ये वही सिद्ध योगी थे? कौन जाने, शायद स्वयं शिव भी हों।
मैंने कुछ घंटों तक अपने मन को एकाग्र किया और फिर इस उलझन को अपने जीवन की सबसे अच्छी यादगार बना लिया और इसे अपने हृदय में संजो कर रखा। रात गहरी होती जा रही थी लेकिन मेला रुका नहीं। कहीं भजन-कीर्तन चल रहा था, कहीं संतवाणी प्रस्तुत की जा रही थी और कहीं लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे।
मेले में ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था अद्भुत थी। खाने में खिचड़ी, कढ़ी और फराली व्यंजन शामिल थे। सब कुछ मुफ्त और पवित्र मूल्य पर परोसा जा रहा था। ये रावती, खोडियार रस मंडल या मखवाद के चिनुबापू के उत्तर की रावती की तरह, सौराष्ट्र के संतों की प्रमुख धारणा को पुष्ट करती हैं- ‘ज्ञान टुकड़े तह हरि धुकदो’ (जहाँ भूखों को भोजन दिया जाता है, वहाँ भगवान (हरि) निवास करते हैं)।
मैं लक्ष्मण बरोट की कुटिया में बैठा था, जहाँ रात में भजन और संतवाणी का आयोजन हो रहा था। सौराष्ट्र के विख्यात कलाकार भजन गा रहे थे। ढोलक की थाप, हारमोनियम की धुन और सामूहिक गायन से वातावरण में भक्ति की एक अलग ही अनुभूति हो रही थी। लोग थके हुए थे, लेकिन वापस जाना नहीं चाहते थे।
यह महज एक धार्मिक समारोह नहीं था बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी था। रात धीरे-धीरे भोर में बदल रही थी। कुछ दुकानदार अपना सामान समेट रहे थे। कुछ लोग आराम करने के लिए जगह ढूंढ रहे थे। मैं मंदिर परिसर से थोड़ी दूरी पर खड़ा होकर गिरनार की ओर देख रहा था । कुछ घंटे पहले, यही जगह जयजयकार से गुलजार थी।
अब यहाँ शांति थी। यहीं मुझे इस मेले का गहरा अर्थ समझ आया। त्योहार क्षणभंगुर है, शिवत्व शाश्वत है। भीड़ आती-जाती रहती है लेकिन गिरनार हमेशा वहीं रहता है। लौटते समय मैंने एक बार पीछे मुड़कर मंदिर को देखा। मैं देखने आया था। मैं एक अनुभव लेकर लौट रहा हूँ।
भावनाथ मेला महज़ एक आयोजन नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी परंपराएँ जीवित हैं। यह सिखाता है कि आध्यात्मिकता का अर्थ भीड़ से भागना नहीं, बल्कि उस भीड़ के बीच शांति खोजना है। यह शिवरात्रि है। मेला समाप्त हो रहा है। लेकिन मेरे भीतर जो स्थिरता बची है, वह शायद लंबे समय तक बनी रहेगी।
हर-हर महादेव जय गिरनारी
यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
ICC टी-20 वर्ल्ड कप में भारत ने एक बार फिर बड़े मुकाबले में अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए पाकिस्तान को 61 रन से करारी शिकस्त दी और सुपर 8 में अपनी जगह पक्की कर ली। कोलंबो में खेले गए इस हाई-वोल्टेज मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 175 रन बनाए। जवाब में पाकिस्तान की पूरी टीम 18 ओवर में 114 रन पर सिमट गई।
मैन ऑफ द मैच ईशान किशन ने 40 गेंदों पर 77 रन की विस्फोटक पारी खेली। उनकी पारी में 10 चौके और 3 छक्के शामिल रहे। उन्होंने स्पिनरों के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाज़ी की और रन गति को लगातार बढ़ाया। बाद में पाकिस्तान टीम जब पिच पर बैटिंग करने उतरी तो कुछ ही ओवरों में पता चल गया कि मैच के परिणाम क्या होने वाले हैं।
पूर्व क्रिकेटरों ने दी बधाई, इरफान पठान ने डांस कर पूछा- पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?
भारत की जीत के बाद देशभर में जश्न का माहौल रहा। सोशल मीडिया पर भी इस जीत को लेकर उत्साह देखने को मिला। भारतीय क्रिकेट जगत के पुराने खिलाड़ियों ने भी जीत के लिए टीम के खिलाड़ियों के बेहद अलग अंदाज में बधाई दी।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने टीम इंडिया को जीत की बधाई देते हुए X पर लिखा, “ईशान किशन असली धुरंधर की तरह खेले। सभी छोटी टीमों में से पाकिस्तान को हराना भारत के लिए सबसे आसान लग रहा था क्योंकि T-20 क्रिकेट में उनका 17वीं सदी का अप्रोच था और उन्हें हमेशा की तरह अच्छी हार मिली। पूरी कंबल कुट्टई।”
Ishan Kishan played like a real Dhurandhar. Among all minnows Pakistan looked like the easiest to beat for Bharat because of their 17th century approach to T-20 cricket, and they have taken a proper beating as usual. Full kambal kuttai. #t20worldcup2026
इसी तरह मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लिखा, “पावरप्ले में भारत ने मैच अपने हाथ से छीन लिया। पहली इनिंग में ईशान किशन की बॉलिंग और दूसरी इनिंग में हमने जो जबरदस्त बॉलिंग देखी, उससे सारा फर्क पड़ा। हम हमेशा ड्राइवर सीट पर थे। आज रात भारत ने धमाल मचा दिया।”
The powerplay was where India took the game away from them.
Ishan Kishan in the first innings, and the clinical bowling we saw in the second innings, made all the difference.
We were always in the driver’s seat. India rocked it tonight!🇮🇳
पूर्व भारतीय ऑलराउंडर इरफान पठान का एक खास वीडियो तो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की हार पर चुटकी ली है। मैच खत्म होते ही इरफान पठान ने इंस्टाग्राम पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह मशहूर गाने ‘अफगान जलेबी’ पर थिरकते नजर आ रहे हैं। वीडियो के कैप्शन में लिखा, “पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?”
क्रिकेटर युवराज सिंह ने X पर लिखा, “बड़े गेम में बड़े कैरेक्टर की जरूरत होती है और लड़कों ने आज रात वही दिखाया! शांत दिमाग और मजबूती से खत्म करने की भूख एक यूनिट के तौर पर हमने जिस तरह से परफॉर्म किया, उस पर गर्व है! आगे बढ़ते रहो और ऊपर उठते रहो।”
Big games demand big character and the boys showed exactly that tonight! Calm heads and the hunger to finish strong 👏🏻 Proud of the way we delivered as a unit! Onward and upward. 🇮🇳🏏@BCCI#ICCMensT20WorldCup2026#IndVSPak
दूसरी ओर पाकिस्तान में निराशा स्पष्ट थी। पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन मोहसिन की आलोचना करते हुए प्रशासनिक ढाँचे पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि क्रिकेट की समझ रखने वाले लोगों को शीर्ष पदों पर होना चाहिए, तभी टीम का प्रदर्शन सुधर सकता है।
गुस्से में शोएब अख्तर ने नकवी को जाहिल और पद के लिए अयोग्य तक बताया। उन्होंने भारतीय न्यूज चैनलों से बात करते हुए अपना रोष प्रकट किया। उन्होंने कप्तान बाबर आजम के प्रदर्शन पर भी टिप्पणी की और टीम चयन व नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की।
एबीपी न्यूज पर बात करते हुए अख्तर ने माना है कि क्रिकेट नहीं जानते, PCB के चेयरमैन बन गए हैं, इस कारण पाकिस्तान टीम का यह हाल हो रहा है। शोएब अख्तर ने कहा, “एक आदमी जिसे कुछ नहीं पता, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन (मोहसिन नकवी) बन गया है, आप क्या कर सकते हैं? टीम कैसे चलेगी? आपने एक ऐसे खिलाड़ी (बाबर आजम) को सुपरस्टार बना दिया है जो आपको एक भी मैच नहीं जिता सकता। दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है नाकाबिल और जाहील आदमी को बड़ा काम देना।”
شعیب اختر نے انڈین چینل پر بیٹھ خوف کے بت توڑ دیے۔
کہا کہ محسن نقوی جیسے incompetent اور جاہل لوگوں نے پاکستان کے سب اداروں کی تباہی پھیر دی ہے۔ pic.twitter.com/Lij3DXugGk
पाकिस्तानी फैन्स की उम्मीदें टूटीं, विराट कोहली जैसे कप्तान की रखी माँग
पाकिस्तानी समर्थकों में भी गहरी निराशा दिखी। कई प्रशंसकों ने टीम की रणनीति, तैयारी और मानसिक मजबूती पर सवाल उठाए। कुछ ने भारतीय टीम की तारीफ करते हुए स्वीकार किया कि मौजूदा समय में भारत हर विभाग में बेहतर दिख रहा है।
फैन्स का मानना है कि टीम को राजनीति और आंतरिक विवादों से दूर रहकर पेशेवर तैयारी पर ध्यान देना होगा। तेज गेंदबाजी और ऑलराउंड प्रदर्शन के सामने पाकिस्तान के बल्लेबाजों की कमजोरी उजागर हुई।
एक ने कहा, “एकतरफा मैच था, अगर पाकिस्तान की अवाम बाबर आजम को किंग समझती है, तो उन्हें किंग की तरह बनना चाहिए, उन्हें विराट कोहली जैसा बनना चाहिए। विराट कोहली अगर आजम की जगह होते तो यह मैच इंडिया को आसानी से जिता देते। बाबर आजम किंग नहीं हैं और टीम में जगह पाने के लायक नहीं हैं। यह कोई टीम नहीं है, बस इधर-उधर से आए कुछ खिलाड़ियों का जमावड़ा है।”
#WATCH | Colombo, Sri Lanka: Maqbool, a fan of the Pakistan cricket team, says, "I think it has become a routine matter now. I was a little hopeful that we would win the match and at least give a fight. But it is like a routine matter. We do not have answers to Bumrah. We cannot… https://t.co/PueQP4FwKepic.twitter.com/9ozcy1bd4R
एक मकबूल नाम के फैन ने कहा, “मुझे थोड़ी उम्मीद थी कि हम मैच जीतेंगे और कम से कम कड़ी टक्कर देंगे। लेकिन यह तो एक आम बात हो गई है। हमारे पास बुमराह का कोई जवाब नहीं है। हम हार्दिक का सामना नहीं कर सकते। यही हाल है। हमेशा की तरह, टीम इंडिया ने शानदार प्रदर्शन किया। अगर इसी तरह का प्रदर्शन जारी रहा, तो हम भारत को नहीं हरा सकते। भारतीय टीम बहुत अच्छी है। और हम इस बात को स्वीकार करते हैं।”
बुरी तरह हारने का पाकिस्तान का रहा है इतिहास
गौरतलब है कि T20 वर्ल्ड Cup के इतिहास में भारत और पाकिस्तान के मैच हमेशा खास रहे हैं, हर बार पाकिस्तान का दावा रहता है कि वो पूरी तैयारी के साथ हैं, लेकिन हर बार उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती है। अब तक दोनों टीमों के बीच कुल 9 मुकाबले खेले गए हैं, जिनमें से भारत ने 8 में जीत दर्ज की है।
इनमें एक मुकाबला ऐसा भी रहा, जिसमें परिणाम सुपर ओवर से तय हुआ और वहाँ भी भारत ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए बाज़ी अपने नाम की। यह दर्शाता है कि करीबी परिस्थितियों में भी भारतीय टीम मानसिक मजबूती और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में सफल रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तान को इस टूर्नामेंट में भारत के खिलाफ केवल एक जीत हासिल हुई है-वह भी 2021 में।
सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में तेजी से फैल रहे ‘म्यूल अकाउंट्स’ के तेजी से बढ़ते नेटवर्क का पता लगाया है। जाँच एजेंसियों का मानना है कि हो सकता है इंटरनेशनल स्कैम सिंडिकेट के जरिए देश विरोधी गतिविधियों में लगे अलगाववादियों और आतंकियों तक ये पैसा पहुँच रहा हो।
न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, पिछले 3 सालों में पूरे क्षेत्र में 8000 से ज्यादा खातों की ऐसे खातों की पहचान कर उन्हें फ्रीज किया गया। अधिकारी अब ये जानने में लगे हैं कि इन अकाउंट्स से आने वाला पैसा आखिरकार किस-किस को मिला।
क्या है ‘म्यूल अकांउट’
म्यूल अकाउंटस साइबर क्राइम की सबसे कमजोर, लेकिन बेहद जरूरी हिस्सा होते हैं। इनके बिना अपराधियों को चोरी के फंड को क्रिप्टोकरेंसी जैसे अनट्रेसेबल डिजिटल एसेट्स में बदलना मुश्किल होता है। सेंट्रल सिक्योरिटी एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस और दूसरी एजेंसियों को इन अकाउंट्स को बैंकों के साथ मिलकर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।
एजेंसी उन बिचौलियों को भी ट्रैक करने में लगी है, जिन्हें ‘म्यूलर’ कहा जाता है। ये पूरी धोखाधड़ी में अहम रोल निभाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, 2017 में एनआईए ने जम्मू कश्मीर में गैर-कानूनी फाइनेंशियल फ्लो को रोकने के लिए सख्ती दिखाई, तो इनलोगों ने अपना तरीका बदल लिया और कथित तौर पर ‘डिजिटल हवाला’ का रास्ता अपनाया
एजेंसियाँ लगातार म्यूलर की तलाश कर रही हैं। पारंपरिक तरीकों से अलग ‘डिजिटल हवाला’ देश विरोधी नेटवर्क का नया तरीका है। म्यूलर सीधे ठगी करने के लिए लोगों से संपर्क नहीं करता और न ही किसी तरह का लिंक भेजता है। लेकिन वह ऐसे खातों की व्यवस्था करता है, जिसमें ठगी किए गए रकम सीधे जाएँ या ट्रांसफर किए जाएँ।
सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि भले ही म्यूल अकाउंट धारक सीधे ठगी नहीं करते, लेकिन वे मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल माने जाएँगे। ज्यादातर ऐसे खाते आम लोगों के नाम पर होते हैं। इन्हें पैसों का लालच दिया जाता है और इनके खातों का इस्तेमाल किया जाता है। उनलोगों से ऑनलाइन बैंकिंग समेत खाते की जानकारी लेकर कहा जाता है कि ये खाते अस्थाई रूप से ‘पार्किंग अकाउंट’ की तरह इस्तेमाल होगा। लेकिन ये खाते साइबर ठगी का पैसा इधर से उधर करने में इस्तेमाल किया जाता है।
दरअसल आसान कमाई का लालच देकर आम लोगों को झाँसे में लिया जाता है और ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाता है, जिससे ट्रांसनेशनल क्राइम नेटवर्क फलते-फूलते हैं।
एजेंसी ने एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक, स्कैम का पूरा इकोसिस्टम इन अकाउंट्स पर निर्भर करता है। पैसे के लिए कोई अकाउंट न होने पर, स्कैम पहले ही स्टेप में फेल हो जाता है। इसलिए जो लोग अपने अकाउंट किराए पर देते हैं, वे सिर्फ हालात के शिकार नहीं होते, बल्कि वे क्राइम के इंजन की तरह हैं।
जाँच में यह भी सामने आया है कि एक ठग एक वक्त पर 10 से 30 म्यूल खातों का इस्तेमाल कर सकता है। कई बार शेल कंपनियों के नाम का भी खाता खोलने में इस्तेमाल किया जाता है। एक दिन ये 40 लाख रुपए तक की लेने देन करने में इन शेल कंपनियों के खातों का इस्तेमाल किया जाता है। पैसे को कई खातों में तेजी से भेजा जाता है और छोटी-छोटी किश्तों में भेजा जाता है, ताकि एजेंसियों की नजर से बचा जा सके।
प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कहा जाता है
सेंट्रल एजेंसियों की एक पूरी स्टडी से यह भी पता चला है कि चीन, मलेशिया, म्यांमार और कंबोडिया जैसे देशों में लोग कथित तौर पर केंद्र शासित प्रदेश में नए लोगों को प्राइवेट क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट बनाने के लिए कह रहे हैं।
ये वॉलेट अक्सर डिजिटल फुटप्रिंट को छिपाने के लिए वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं और आमतौर पर इसके लिए केवाईसी वेरिफिकेशन की जरूरत नहीं होती है।
जम्मू कश्मीर पुलिस ने पूरे कश्मीर घाटी में वीपीएन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, क्योंकि इसका इस्तेमाल आतंकवादी अपनी पहचान छुपाने के लिए करते हैं।
महाशिवरात्रि का पावन पर्व भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह उस शिव चेतना का उत्सव है, जो सृष्टि के प्रत्येक कण में व्याप्त है। शिव, भारत की संस्कृति में देवता होने के साथ-साथ उस दार्शनिक सत्य की बात करते हैं, जो भारतीय मनीषा की आधारशिला रहा है। शिव भारत की संस्कृति के आवश्यक तत्व इसलिए हैं, क्योंकि वह भारत के जीवन दर्शन के प्रतीक हैं। आज जब दुनिया भौतिकता की अंधी दौड़ में भाग रही है, तब शिव का चिंतन आधुनिक पीढ़ी को वह दिशा दे सकता है, जिसकी उसे सर्वाधिक आवश्यकता है।
शिव की उपस्थिति भारतीय उपमहाद्वीप में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सभ्यता तक देखी जा सकती है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त ‘पशुपति’ मुद्रा, जिसमें एक आकृति योग मुद्रा में तीन मुख वाले और पशुओं से घिरी हुई है, शिव के आदिस्वरूप की ओर संकेत करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि शिव की उपासना 5000 वर्षों से भी अधिक समय से भारत में प्रचलित है। शिव के प्रत्येक रूप नटराज, दक्षिणामूर्ति, भैरव, रुद्र, शंकर, महाकाल, और अर्धनारीश्वर का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व है।
नटराज के रूप में शिव तांडव नृत्य करते हैं, जो सृष्टि के सृजन और संहार का प्रतीक है। दक्षिणामूर्ति के रूप में शिव मौन गुरु हैं, जो ज्ञान का संचार करते हैं। अर्धनारीश्वर के रूप में शिव पुरुष और स्त्री के पूरक स्वरूप को दर्शाते हैं। भैरव के रूप में शिव काल के भी काल हैं। ये सभी रूप हमें जीवन की नश्वरता और समय की महत्ता का बोध कराते हैं।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शिव की पूजा की अलग-अलग परंपराएँ हैं। किन्तु आज के दौर में शिव की आराधना करने के साथ-साथ, हमें शिव तत्व से बहुत कुछ सीखने की भी आवश्यकता है।
आज की पीढ़ी त्वरित संतुष्टि की आदी हो गई है। सोशल मीडिया, OTT प्लेटफॉर्म, फास्ट फूड, रील कल्चर ने इस पीढ़ी को घेर रखा है। इस भागदौड़ में शिव का जीवन हमें संयम और आत्म-नियंत्रण का पाठ सिखाता है। वे हजारों वर्षों तक ध्यान में लीन रहे। उन्होंने विष को कंठ में रोक लिया। उन्होंने भस्म को अंगारे में बदल दिया। यह सब आत्म-नियंत्रण के अद्भुत उदाहरण हैं।
आज की पीढ़ी को यह सीखना चाहिए कि जीवन में सफलता के लिए धैर्य और संयम आवश्यक हैं। त्वरित संतुष्टि क्षणिक सुख देती है, लेकिन स्थायी संतोष नहीं। शिव की तरह हमें भी अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए।
शिव विरोधाभासों से भरे हैं – वे योगी भी हैं और भोगी भी; गृहस्थ भी हैं और संन्यासी भी; विनाशक भी हैं और पुनर्निर्माता भी। आधुनिक जीवन भी विरोधाभासों से भरा है। करियर और परिवार के बीच संतुलन, निजी और सार्वजनिक जीवन में सामंजस्य, पारंपरिक मूल्यों और आधुनिकता के बीच तालमेल – ये सभी चुनौतियाँ हैं।
शिव हमें सिखाते हैं कि विरोधाभासों को दूर करने की आवश्यकता नहीं, उन्हें स्वीकार करना और उनमें संतुलन बनाना सीखना चाहिए। जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक-दूसरे का विरोधी न मानकर पूरक मानना चाहिए।
आज की पीढ़ी भौतिक सुख-सुविधाओं को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठी है। बड़ा घर, महंगी कार, ब्रांडेड कपड़े, नवीनतम गैजेट्स – यही सफलता के पैमाने बन गए हैं। शिव का साधारण जीवन, उनकी भस्म रमाने की आदत, उनका कैलाश पर निवास – ये सब हमें बताते हैं कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं बल्कि आंतरिक संतोष में है।
शिव को ‘भोलेनाथ’ कहा जाता है। वे सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं। रावण जैसे राक्षस ने भी जब उनकी आराधना की, तो उन्हें वरदान दिया। समुद्र मंथन में निकले विष को पीकर उन्होंने समस्त सृष्टि की रक्षा की। यह उनकी असीम करुणा का प्रतीक है।
आज की पीढ़ी में करुणा और क्षमा का भाव कम होता जा रहा है। प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में हम एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि सच्ची महानता करुणा और क्षमा में है। दूसरों की गलतियों को क्षमा करना, उनके प्रति सहानुभूति रखना, ये मानवीय गुण ही हमें सच्चा सुख दे सकते हैं।
शिव ध्यान में लीन रहते हैं। वे अपनी आंतरिक यात्रा में व्यस्त रहते हैं। आज का युवा बाहरी दुनिया में इतना खो गया है कि अपने भीतर झांकने का समय ही नहीं है। हम रोज़ सैंकड़ों लोगों से मिलते हैं, लेकिन कभी स्वयं से नहीं मिल पाते। सोशल मीडिया पर लाइक और कमेंट्स की संख्या उसकी पहचान बन गई है। शिव हमें सिखाते हैं कि सच्ची शांति और संतोष बाहर नहीं, भीतर है।
आज की पीढ़ी को ध्यान और आत्म-चिंतन का महत्व समझना चाहिए। प्रतिदिन कुछ समय मौन में बैठना, अपने विचारों को देखना, अपने जीवन के लक्ष्यों पर विचार करना – यह आदत ही उन्हें सच्ची सफलता दिला सकती है।
शिव का निवास हिमालय है, जो प्रकृति का सबसे सुंदर और शक्तिशाली रूप है। उनके गले में सर्प है, शरीर पर भस्म, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा। ये सभी प्रकृति के तत्व हैं। शिव और प्रकृति का अटूट संबंध है।
आज पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता का ह्रास – ये सब मानव की प्रकृति के प्रति लापरवाही के परिणाम हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करना, उसके साथ सामंजस्य बनाकर रहना ही जीवन का सच्चा मार्ग है। शिव की पूजा में बेलपत्र, धतूरा, आक, गंगाजल का उपयोग – ये सब प्रकृति से हमारे जुड़ाव को दर्शाते हैं।
शिव सबको अपनाते हैं – देवता भी, असुर भी; साधु भी, व्याध भी; विद्वान भी, अज्ञानी भी। उनके गणों में भूत-प्रेत, पिशाच, नाग-यक्ष सभी शामिल हैं। यह शिव की समावेशिता को दर्शाता है।
आज के समाज में विभाजन की भावना बढ़ रही है। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र के नाम पर लोग बँट रहे हैं। शिव का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि विविधता में एकता ही सृष्टि का मूल सिद्धांत है। सभी को समान रूप से अपनाना, किसी से भेदभाव न करना – यही शिव का संदेश है।
शिव के जीवन में अनेक असफलताएँ आईं – उनकी पत्नी सती ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया, उनके पुत्र गणेश ने उन्हें ही अपने घर में प्रवेश नहीं दिया, उन्होंने कामदेव को भस्म किया जिससे प्रेम का लोप हो गया। लेकिन हर असफलता से उन्होंने कुछ सीखा और आगे बढ़े।
आज की पीढ़ी असफलता से घबराती है। थोड़ी सी असफलता उन्हें तोड़ देती है। शिव हमें सिखाते हैं कि असफलता अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। हर असफलता से कुछ सीखना और आगे बढ़ना ही जीवन है।
महाशिवरात्रि के इस पावन अवसर पर हम शिव के उस स्वरूप का स्मरण करते हैं जो भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन में संयम और आनंद दोनों के लिए स्थान है, कि विरोधाभासों को स्वीकार करना ही जीवन की सच्ची कला है, कि भौतिकता से परे भी कुछ है, जिसके लिए जीना चाहिए।
आज की पीढ़ी को शिव से यह सीखना चाहिए कि सच्ची सफलता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, आंतरिक शांति में है। सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, आत्म-संतोष में है। सच्ची शक्ति दूसरों को दबाने में नहीं, उन्हें अपनाने में है।
शिव का संदेश सार्वभौमिक है, जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है। चाहे वह प्राचीन भारत का ऋषि हो या आधुनिक युग का युवा, शिव का चिंतन सबके लिए प्रासंगिक है। महाशिवरात्रि का यह पर्व हमें उसी चिंतन का अवसर प्रदान करता है – अपने भीतर झाँकने, अपने जीवन का मूल्यांकन करने, और शिव के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का।
उत्तरप्रदेश अब उत्तम प्रदेश बन गया है। यहाँ उत्सव होते हैं और कानून व्यवस्था तुरुस्त होने से गुंडा टैक्स, अवैध वसूली खत्म हो गई है। ये कहना है यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का। आँकड़े भी उनकी बातों को सही ठहराते हैं।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान कहा कि यूपी अब आस्था और विकास के संतुलन का मॉडल बन गया है। राज्य अब दंगों की जगह मंदिर प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर आगे बढ़ रह है।
मेलों में जुटे अपार श्रद्धालु
प्रयागराज का माघ मेला 2026 का सफल आयोजन हुआ जिसमें अब तक के कई बड़े आयोजनों को पीछे छोड़ दिया। 2013 के कुंभ मेले में 12 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए थे, लेकिन अब माघ मेले में 21 करोड़ श्रद्धालु आए। प्रयागराज के कुंभ मेला 2025 ने तो सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। इस मेले में करीब 66 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र गंगा में डुबकी लगाई। इस महाआयोजन की सफलता ने योगी सरकार के प्रति जनता में विश्वास भरा और माघ मेले में रिकॉर्ड तोड़ श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाने पहुँचे।
आँकड़ों की बात करें तो 2020 के माघ मेले में 4 करोड़, 2022 के माघ मेले में 4.30 करोड़, 2023 के माघ मेले में 9 करोड़ श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई। लेकिन माघ मेला 2026 में कई गुणा ज्यादा लोग पहुँचे। सिर्फ मौनी अमावस्या पर रिकॉर्ड 20 लाख श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। बसंत पंचमी के दिन 3.56 लाख लोग संगम में स्नान के लिए पहुँचे, माघी पुर्णिमा के दिन श्रद्धालुओं का आँकड़ा 21 करोड़ पार कर गया।
महाशिवरात्रि पर अंतिम स्नान के दिन करीब 1.5 करोड़ लोगों के संगम नगरी में आने और स्नान करने का अंदाज प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने लगाया है। इसके लिए घाटों की लंबाई बढ़ाई गई, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए।
मंदिरों की बात की जाए तो योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में अयोध्या का भव्य राममंदिर का निर्माण, अयोध्या में दूसरे मंदिरों और घाटों का विकास किया गया। इसके दर्शन करने करोड़ों लोग अब तक आ चुके हैं। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण हुआ जिससे श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई। संभल में 54 से ज्यादा मंदिरों की पहचान की गई है, जिसे विकसित किए जाएगा।
मऊ में 61 फीट ऊँची महादेव की मूर्ति और कॉरिडोर बनाया गया है। जिस जगह पर कॉरिडोर बनाया गया है, वहाँ कभी कचरे का ढेर हुआ करता था। लेकिन अब खूबसूरत गुलाबी पत्थरों से घाटों का सौंदर्यीकरण किया गया है। भगवान भोले की 61 फीट ऊँची प्रतिमा हर किसी का ध्यान खींचती है। दरअसल योगी राज में राज्य में करीब 300 पुराने मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया है। यही वजह है कि सीएम योगी ने विधानसभा में कहा कि यूपी अब उत्सव राज्य बन गया है। राज्य में पर्यटन को विकसित करने के लिए योगी सरकार ने 150 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं।
2017 से कोई सांप्रदायिक दंगा राज्य में नहीं हुआ
उत्तर प्रदेश में दंगों का इतिहास रहा है। 1978 का संभल का दंगा, 1980 का मुरादाबाद का दंगा, 2006 का अलीगढ़ दंगा, 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा, 2016 का बिजनौर हिंसा अहम हैं। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में इनमें से ज्यादातर दंगे हुए। लेकिन 2017 में योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनने के बाद राज्य में एक भी दंगा नहीं हुआ।
सीएम योगी ने इसकी चर्चा करते हुए विधानसभा में कहा कि यूपी में अब ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति है। गुंडाराज खत्म हो गया है। समाजवादी पार्टी के शासन काल में यूपी को लोग संदेह की दृष्टि से लोग देखते थे, प्रदेश की छवि काफी खराब थी, लेकिन अब राज्य का तेजी से विकास हुआ है और ‘बीमारू’ राज्य से ऊपर उठकर अब यूपी तेज विकास करने वाला राज्य बन गया है। अब यूपी गुंडा टैक्स, वसूली से मुक्त है। अब यूपी में ना कर्फ्यू है ना दंगा है, सब चंगा है।
महिलाएँ और व्यापारी भयमुक्त हुए- सीएम योगी
सीएम योगी ने विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान कहा कि एक वक्त था जब घर की बिटिया बाहर जाने के नाम से घबराती थी, व्यापारी अपना कारोबार समेट कर राज्य से बाहर जा रहे थे। 2017 से पहले राज्य में अपराधी अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे, माफिया खुला घूमते थे। लेकिन, अब राज्य में कानून व्यवस्था ऐसी हो गई है कि महिलाएँ खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं, व्यापारी अपना कारोबार शुरू करने में हिचक नहीं रहे हैं। दरअसल गुंडा टैक्स जैसी सभी तरह की रंगदारी सरकार ने रोक दी है।
विगत 8 वर्षों में उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 2,19,000 पुलिस कार्मिकों की भर्ती संपन्न की गई है, जिसमें 20 प्रतिशत महिला आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।
आज उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 44,000 से अधिक महिला पुलिस कार्मिक अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं।
सीएम योगी के शासन के दौरान 219000 से अधिक पुलिसकर्मियों की भर्ती की गई है। इनमें से 20 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए अनिवार्य किए गए। 2017 से पहले जब उत्तर प्रदेश पुलिस बल में 10,000 महिला पुलिसकर्मी थीं लेकिन पिछले 9 वर्षों में उनकी संख्या बढ़ कर 44,000 हो गई है।
सीएम योगी ने कहा है कि राज्य ट्रिपल टी यानी टेक्नोलॉजी, ट्रस्ट और ट्रांसफोर्मेशन का प्रतीक है और सामूहिक प्रयास से सुशासन राज्य में स्थापित हुआ है।
गुजरात के कई शहरों में कुछ मुस्लिम परिवार हिंदू बहुल इलाकों में ऊँची कीमत पर घर खरीदकर बस जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे और लोग भी उसी इलाके में बसने लगते हैं। सालों में ये घटनाएँ कभी-कभी हिंसक रूप भी ले लेती हैं और वहाँ की मूल हिंदू आबादी प्रभावित होने लगती है। उत्पीड़न, असुविधाजनक परिस्थितियों या अन्य कारणों से मूल हिंदू धीरे-धीरे अपने इलाके छोड़ने लगते हैं, जिससे जनसांख्यिकीय बदलाव का खतरा पैदा होता है।
इस समस्या से निपटने के लिए गुजरात में एक विशेष कानून है, जिसे ‘अशांतधारा’ कहा जाता है। यह कानून राज्य के कई शहरों में पहले ही लागू हो चुका है। भावनगर शहर के कई इलाकों में भी इसे लागू किया गया है, लेकिन जिले के अन्य गाँवों और तालुकों में यह समस्या अभी भी बनी हुई है। भावनगर का महुवा इलाका सबसे संवेदनशील माना जाता है।
महुवा शहर में भी अब अशांतधारा लागू करने की माँग उठ रही है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि हिंदू बहुल इलाकों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को घर दिए जा रहे हैं, जिसके कारण इलाके की जनसंख्या में तेजी से बदलाव आ रहा है।
पहले महुवा के सुखड़िया शेरी, खत्री शेरी, चाकुभाई नो खानचो, नगरवाड़ा, सेठ शेरी, नवा झम्पा और गोल बाजार जैसे इलाके पूरी तरह से हिंदू समुदाय से आबाद थे। वहाँ नवरात्रि, होली, दिवाली जैसे त्योहार धूमधाम से मनाए जाते थे। लेकिन अब इन इलाकों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के कारण हिंदू धीरे-धीरे इन क्षेत्रों से पलायन कर रहे हैं। इसी वजह से हिंदू संगठनों ने महुवा शहर में अशांतधारा कानून लागू करने की माँग की है।
अशांता कौन है?
गुजरात में 1980 के दशक में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के कारण अशांतधारा अधिनियम की जरूरत महसूस हुई। इस दशक के मध्य में अहमदाबाद, वडोदरा, खेड़ा, भरूच और सूरत जैसे शहरों में सांप्रदायिक दंगे भड़के और सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। कई हिंदू अपने घर छोड़कर पलायन करने को मजबूर हुए।
खाली पड़े इलाकों में मुस्लिम समुदाय की आबादी तेजी से बढ़ने लगी। इस दौरान कुछ मुस्लिम असामाजिक तत्व डरे हुए हिंदू नागरिकों से उनकी संपत्ति कम कीमत पर बेचने के लिए दबाव डाल रहे थे और उन संपत्तियों को खरीदकर तनाव और बढ़ा रहे थे।
इसी स्थिति को रोकने के लिए गुजरात सरकार ने 1986 में पहला ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ पेश किया, जो अध्यादेश के रूप में तुरंत लागू हो गया। इस कानून का मकसद अशांत क्षेत्रों में संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक लगाना था, ताकि हिंदू नागरिक इस समस्या से सुरक्षित रहें और जनसंख्या में अचानक बदलाव के खतरे को रोका जा सके।
लेकिन इस प्रारंभिक कानून में कई कमियाँ थीं, जैसे इसको सीमित समय में अमल में लाना और कई अन्य कानूनी खामियाँ। इन कारणों से कई अनियमित संपत्ति लेन-देन होने लगे।
इसी वजह से 1991 में इस कानून को निरस्त कर इसे और मजबूत बनाया गया और नया कानून ‘गुजरात अशांत क्षेत्र अधिनियम, 1991’ लागू किया गया। यह कानून स्थायी था और राज्य सरकार को बिना किसी अतिरिक्त आवश्यकता के किसी भी क्षेत्र को अशांत क्षेत्र घोषित करने का अधिकार देता था। इसका मुख्य कारण 1990 के दशक की शुरुआत में हुए दंगे थे, जिनमें संपत्तियों की अनियमित बिक्री से जनसंख्यात्मक बदलाव हुआ और हिंदू समुदाय पलायन करने लगा।
आगे चलकर 2019 में गुजरात विधानसभा ने इस कानून में महत्वपूर्ण संशोधन किए, जिन्हें 2020 में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने मंजूरी दी। इन संशोधनों के तहत कलेक्टर को विशेष शक्तियाँ दी गईं, जैसे कि इलाके में ध्रुवीकरण, अनुचित समूहीकरण और जनसंख्या परिवर्तन की जाँच करना। इनका उद्देश्य पुराने कानून की खामियों को दूर करना था, क्योंकि पहले लोग पावर ऑफ अटॉर्नी या अन्य तरीकों से संपत्ति हस्तांतरित कर कानूनी लूपहोल का फायदा उठा लेते थे।
हालाँकि, जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे इस्लामी संगठनों ने इन संशोधनों के खिलाफ गुजरात हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद जनवरी 2021 में हाई कोर्ट ने इन संशोधनों पर रोक लगा दी। 2023 में राज्य सरकार ने इन संशोधनों को वापस लेने का फैसला किया और नए संशोधनों की तैयारी शुरू की। वर्तमान में केवल मूल 1991 का कानून और कुछ पुराने संशोधन ही लागू हैं।
कानून के बुनियादी तत्व और प्रावधान
गुजरात के अशांत क्षेत्र अधिनियम के कुछ विशेष प्रावधान इसे अन्य कानूनों से अलग और प्रभावी बनाते हैं। धारा 3 के अनुसार, राज्य सरकार किसी शहर या गाँव के क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकती है, कलेक्टर की सूचना और जाँच के आधार पर। इस अधिसूचना के जारी होने के बाद, उस क्षेत्र में संपत्ति का कोई भी हस्तांतरण जैसे बिक्री, उपहार, विनिमय, पट्टा या आधिपत्य पत्र कलेक्टर की पूर्व स्वीकृति के बिना अवैध माना जाएगा।
हस्तांतरण के आवेदन में विक्रेता और खरीदार दोनों को हलफनामे के जरिए यह बताना होता है कि बिक्री स्वेच्छा से बिना किसी दबाव, धमकी या जबरदस्ती के की जा रही है और संपत्ति का उचित मूल्य बाजार के अनुसार निर्धारित किया गया है। कलेक्टर बॉम्बे भूमि राजस्व संहिता के अनुसार इस आवेदन की औपचारिक जाँच करते हैं, जिसमें पुलिस, राजस्व विभाग और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट भी शामिल होती है।
यदि कलेक्टर को लगता है कि 1991 अधिनियम की सीमाओं के भीतर यह स्थानांतरण सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है या यह स्वतंत्र सहमति और उचित मूल्य के मानदंडों को पूरा नहीं करता, तो वह आवेदन अस्वीकार कर सकता है। (नोट: 2020 के संशोधन में जोड़े गए ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ और ‘समूहीकरण’ के आधार पर अस्वीकृति के प्रावधानों पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है, इसलिए ये वर्तमान में लागू नहीं हैं।)
2020 के संशोधन ने ‘हस्तांतरण’ की परिभाषा को व्यापक किया, जिसमें बिक्री समझौता, GPA, नोटरीकृत दस्तावेज और धारा 53ए के तहत कब्जा शामिल है। इसके साथ ही पंजीकरण अधिनियम, 1908 में संशोधन किया गया, जिसके तहत अशांत क्षेत्र में किसी भी संपत्ति दस्तावेज के पंजीकरण के लिए कलेक्टर की स्वीकृति जरूरी है।
दंडात्मक प्रावधान भी कड़े हैं। कानून का उल्लंघन करने वालों को कम से कम 3 से 5 वर्ष की कैद और 1 लाख रुपये या संपत्ति के बाजार मूल्य का 10 प्रतिशत (जो अधिक हो) का जुर्माना हो सकता है। धारा 8 के अनुसार, कलेक्टर या राज्य सरकार का निर्णय अंतिम होगा और इसे किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
अधिनियम में विशेष जाँच दल (SIT) का भी प्रावधान है, जिसे राज्य सरकार बनाती है। इसमें कलेक्टर, पुलिस आयुक्त/SP और नगर आयुक्त जैसे अधिकारी शामिल होते हैं। यह SIT इलाके की स्थिति, जनसंख्या संतुलन, शहरी क्षेत्रों के समूह और संभावित खतरों की जाँच करके कलेक्टर की मदद करती है।
कुल मिलाकर, अधिनियम की संपूर्ण संरचना कलेक्टर के माध्यम से लागू होती है, जबकि उनके निर्णय के खिलाफ अपील राज्य सरकार (राजस्व विभाग) के समक्ष की जाती है। यह लंबी और जटिल प्रक्रिया इसे व्यवहार में अत्यंत कठोर और प्रभावी बनाती है।
अशांत नियम किन परिस्थितियों में लागू होता है?
अशांतधारा अधिनियम को लागू करने की पूरी प्रक्रिया तनावपूर्ण स्थिति, दंगे, हिंसा या लंबे समय से चल रहे सांप्रदायिक असंतुलन जैसे कारकों पर निर्भर करती है। अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, कलेक्टर और पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार किसी क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित करती है। आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि कलेक्टर ने क्षेत्र को अशांत घोषित किया है, लेकिन आधिकारिक अधिसूचना राज्य सरकार द्वारा ही जारी की जाती है।
यदि किसी क्षेत्र में पहले से सांप्रदायिक तनाव रहा हो या भविष्य में अशांति की संभावना हो, तो उस क्षेत्र पर अशांतधारा नियम लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, 2002 के दंगों के बाद अहमदाबाद के जुहापुरा, सरखेज और गोमतीपुर जैसे कई क्षेत्र अशांत घोषित किए गए, ताकि भय या दबाव में संपत्ति की खरीद-बिक्री को रोका जा सके।
अधिसूचना राज्य सरकार के राजपत्र में प्रकाशित की जाती है और इसकी अवधि आमतौर पर 5 साल निर्धारित होती है, जिसे स्थिति के अनुसार बढ़ाया जा सकता है। हाल ही में आनंद जिले के कुछ क्षेत्रों में इस अधिनियम की अवधि 5 साल के लिए बढ़ाई गई और यह राजपत्र में प्रकाशित भी की गई।
अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद, कलेक्टर की अनुमति के बिना उस क्षेत्र में किसी भी संपत्ति का हस्तांतरण कानूनी रूप से अमान्य होता है। कलेक्टर विक्रेता और खरीदार के आवेदन, उनके हलफनामे, पुलिस रिपोर्ट, पड़ोसियों के बयान और राजस्व दस्तावेजों की जाँच करता है। 1991 के अधिनियम के अनुसार, कलेक्टर की मुख्य जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि खरीदार की सहमति स्वतंत्र हो और संपत्ति का उचित बाजार मूल्य तय किया गया हो।
हालाँकि, 2020 के संशोधन में जोड़े गए जनसांख्यिकीय संतुलन में गिरावट और अनुचित समूहीकरण जैसे आधार हाई कोर्ट के स्थगन आदेश के कारण वर्तमान में लागू नहीं हैं। इसलिए आज कलेक्टर केवल 1991 के पारंपरिक मानदंडों के आधार पर ही हस्तांतरणों का निर्णय ले सकते हैं।
राज्य सरकार की पुनर्वास योजनाओं को इस कानून से छूट दी गई है, ताकि हिंसा से विस्थापित लोगों के लिए नई बस्तियों में संपत्ति को देना आसान रहे।
हाल के मामलों में भी इस कानून का असर देखा गया है। उदाहरण के लिए, सूरत में एक मुस्लिम महिला ने बिना अनुमति के संपत्ति खरीदी थी, जिसे कलेक्टर ने जब्त कर लिया क्योंकि यह हस्तांतरण अधिनियम के खिलाफ था। ऐसी स्थिति में संपत्ति या तो विक्रेता को वापस कर दी जाती है या कलेक्टर की हिरासत में रखी जाती है।
यह कानून वर्तमान में किन क्षेत्रों में लागू है?
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, गुजरात के कई जिलों में अशांतधारा कानून लागू है और राज्य सरकार समय-समय पर इसकी सूची अपडेट करती रहती है। अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, भरूच, पंचमहल, आनंद, नर्मदा, गोधरा, भावनगर, अमरेली और अन्य शहरों के कई क्षेत्रों को इस कानून के तहत घोषित किया गया है।
अहमदाबाद शहर के अधिकांश क्षेत्र इस अधिनियम के अंतर्गत आते हैं। सूची समय-समय पर बदलती रहती है, लेकिन जुहापुरा, मेघानीनगर, ओधव, गोमतीपुर, दानिलिम्दा, सरखेज-जमालपुर-कंकरिया जैसे क्षेत्र कई वर्षों से अशांतधारा के अंतर्गत हैं। हाल ही में अहमदाबाद के पश्चिमी हिस्से के वस्त्रपुर, थलतेज और बोडकदेव जैसे नए क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया और इसके लिए सार्वजनिक अधिसूचना जारी की गई।
यह अधिनियम सूरत, वडोदरा और आनंद जैसे जिलों के कई क्षेत्रों में भी लागू है। हाल ही में, आनंद शहर और जिले के कुछ क्षेत्रों का कार्यकाल 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया क्योंकि जिला प्रशासन ने स्थिति को स्थिर नहीं माना।
अशांत क्षेत्र घोषित करने और संपत्ति हस्तांतरण की अनुमति देने की पूरी प्रक्रिया जिला कलेक्टर, पुलिस कमिश्नर/SP और राजस्व विभाग की संयुक्त जाँच के तहत होती है। राज्य सरकार अशांत क्षेत्र को बढ़ाने या घटाने के लिए राजपत्र अधिसूचना जारी करती है।
वर्तमान में, विभिन्न अधिसूचनाओं के अनुसार राज्य में 1000 से अधिक क्षेत्र इस कानून के अंतर्गत आते हैं। इसका सबसे अधिक प्रभाव शहरों के पुराने और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में देखा जाता है।
इन क्षेत्रों में सभी संपत्ति लेन-देन कलेक्टर की स्वीकृति के अधीन होते हैं। चूँकि यह प्रक्रिया लंबी और सख्त है, कई लेन-देन अटक जाते हैं या स्वीकृति मिलने में महीनों लग जाते हैं। इसी कारण, अशांतधारा अधिनियम को गुजरात का सबसे सख्त और सीमित रूप से संपत्ति कानून माना जाता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)