Home Blog Page 93

वामपंथी, अर्बन नक्सली और हिडमा समर्थक: DU में जिस भीड़ ने ‘ब्राह्मण’ पहचान देखकर पत्रकार रुचि तिवारी पर किया हमला, जानिए उसमें कौन-कौन लोग थे शामिल

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में शुक्रवार (13 फरवरी 2026) को प्रो-यूजीसी प्रदर्शन के दौरान स्थिति उस समय बिगड़ गई, जब एक महिला पत्रकार पर भीड़ ने हमला कर दिया। ‘ब्रेकिंग ओपिनियन’ नाम के यूट्यूब चैनल से जुड़ी पत्रकार रुचि तिवारी आर्ट्स फैकल्टी परिसर में प्रदर्शन कवर करने पहुँची थीं। आरोप है कि SC-ST-OBC एक्टिविस्ट्स और वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेर लिया और मारपीट की।

13 फरवरी को यह प्रदर्शन SFI (भारतीय छात्र संघ), AISA (अखिल भारतीय छात्र संघ) और ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी जैसे वामपंथी छात्र संगठनों की ओर से आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की 2026 की उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा संबंधी नियमावली को लागू करने की माँग कर रहे थे, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्थगित कर रखा है। इस नियमावली को लेकर विवाद इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि इसमें जातिगत हिंसा के पीड़ितों की श्रेणी को केवल SC, STऔर OBC तक सीमित रखने की बात कही गई है, जिससे सामान्य वर्ग को बाहर रखा गया है।

इसी बीच जब रुचि तिवारी वहाँ रिपोर्टिंग कर रही थीं, तो करीब 50-100 लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। आरोप है कि उनका उपनाम ‘तिवारी’ सुनते ही कुछ लोगों ने चिल्लाकर कहा, “ये ब्राह्मण है, इसको पकड़ो।” एक वीडियो में कुछ लोग- मारो इसको, पता चलेगा और कोई बोल न देना यहाँ, काट के फेंक देंगे जैसी धमकी भरी बातें करते सुनाई दे रहे हैं। यह भी कहा गया कि उनके आने से पहले तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण था।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो में देखा जा सकता है कि भीड़ ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, धक्का-मुक्की की, मारपीट की और उनके कपड़े तक खींचने की कोशिश की। इस घटना ने कैंपस की सुरक्षा व्यवस्था और छात्र राजनीति में बढ़ते तनाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रुचि तिवारी ने बताया कि कैसे UGC समर्थकों की भीड़ ने ब्राह्मण होने की वजह से उन्हें निशाना बनाया

एक वीडियो में रुचि तिवारी ने खुद पूरी घटना बयान की। उन्होंने बताया कि जब वह प्रदर्शन स्थल पर एक अन्य रिपोर्टर से बात कर रही थीं, तभी अचानक बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएँ उनके पास आकर उन्हें घेरने लगीं।

रुचि के अनुसार, वहाँ मौजूद जाति आधारित एक्टिविस्ट्स ने आरोप लगाया कि वह वही महिला हैं जो एक दिन पहले जंतर-मंतर पर भी मौजूद थीं। इसके बाद भीड़ ने बिना कुछ सुने उन पर हमला कर दिया और धक्का-मुक्की व मारपीट शुरू कर दी।

रुचि तिवारी ने अपने बयान में बताया, “उन्होंने मेरे हाथ पकड़े, गर्दन दबोची, बाल खींचे और गला घोंटने की कोशिश की।” उनका कहना है कि जब उनके साथ आए सहयोगियों ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, तो भीड़ में शामिल पुरुषों और महिलाओं ने उनके साथ भी मारपीट की। इतना ही नहीं, उन पर झूठा आरोप लगाया गया कि वे महिला प्रदर्शनकारियों को गलत तरीके से छू रहे थे।

रुचि के मुताबिक, किसी तरह हमलावरों से निकलकर जब वह सड़क की तरफ अपने साथियों को ढूँढने गईं, तो वहाँ भी उन्हें दोबारा घेर लिया गया। उन्होंने बताया कि करीब 100-150 लोगों की भीड़ थी, जिनमें कई महिलाएँ भी शामिल थीं। आरोप है कि भीड़ ने उनके साथ मारपीट की, उनके कपड़े फाड़ने की कोशिश की, जबकि कुछ लोग पूरी घटना के वीडियो बना रहे थे।

रुचि तिवारी का कहना है, “उन्होंने मुझे सिर्फ इसलिए निशाना बनाया क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ।” उनके अनुसार, भीड़ में से आवाजें आ रही थीं, “ये ब्राह्मण है, पकड़ो इसे, इसके कपड़े फाड़ो, इसके कपड़े उतारो।”

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यही नारीवाद है, जब एक महिला पर हमला हो रहा था और उसे बचाने के लिए कोई आगे नहीं आया। उनका आरोप है कि जब उनके कपड़े फाड़ने और उनके कपड़े उतारने की कोशिश की जा रही थी, तब भीड़ में मौजूद कई पुरुष वीडियो बना रहे थे।

रुचि तिवारी के समर्थन में उतरी ABVP

‘ब्राह्मण’ जाति को लेकर एक महिला पत्रकार को भीड़ द्वारा घेरकर प्रताड़ित किए जाने की घटना पर बढ़ते आक्रोश के बीच अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने रुचि तिवारी के समर्थन में खुलकर बयान दिया है। ABVP के दिल्ली प्रदेश सचिव सार्थक शर्मा ने वामपंथी छात्र संगठनों द्वारा किए गए हमले की कड़ी निंदा की।

सार्थक शर्मा ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा, “मैं कुछ बातें साफ करना चाहता हूँ। वामपंथी संगठन प्रदर्शन कर रहे थे और वहाँ एक महिला पत्रकार, जो यूट्यूब चैनल चलाती हैं, मौजूद थीं। वह प्रदर्शन को कवर कर रही थीं और उन्होंने कुछ सवाल पूछे। शायद उन्हें वे सवाल पसंद नहीं आए या फिर उन्हें वह महिला पत्रकार ही पसंद नहीं आई, इसलिए उन्होंने इस तरह का व्यवहार किया, वीडियो में साफ दिख रहा है कि उनके पुरुष कार्यकर्ता भी उन्हें थप्पड़ मार रहे थे, भीड़ उन्हें घेर रही थी और घसीटकर ले जाया जा रहा था। इससे साफ हो गया है कि ये लोग महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि अभी तक उनकी पत्रकार से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन जानकारी मिली है कि उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। शर्मा ने आरोप लगाया कि SFI, AISA और अन्य वामपंथी छात्र संगठनों की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है, इसलिए वे झूठे आरोप लगाकर और ऐसे विवाद खड़े कर सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र समझदार हैं और सच-झूठ में फर्क करना जानते हैं।

वामपंथी-दक्षिणपंथी ग्रुप्स में झड़प, दोनों ने पुलिस में शिकायत कराई दर्ज

13 फरवरी को कैंपस का माहौल उस समय और तनावपूर्ण हो गया, जब कई यूट्यूबर्स जिनमें रुचि तिवारी भी शामिल थीं, उनके साथ कथित मारपीट की खबर के बाद वामपंथी और दक्षिणपंथी छात्र संगठनों के बीच टकराव शुरू हो गया। दोपहर करीब 1 बजे स्थिति और बिगड़ गई, जब प्रो-यूजीसी प्रदर्शन कर रहे वामपंथी छात्र और घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँचे दक्षिणपंथी छात्र आमने-सामने आ गए। देखते ही देखते नारेबाजी और धक्का-मुक्की का माहौल बन गया।

दक्षिणपंथी छात्र संगठनों का आरोप है कि वामपंथी छात्र समूह के सदस्यों ने पत्रकार रुचि तिवारी के साथ मारपीट की, छेड़छाड़ की और उनकी जाति को लेकर अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। वहीं वामपंथी संगठनों ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि किसी भी तरह का जाति संबंधी सवाल या टिप्पणी नहीं की गई और उन पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं।

इसी बीच वामपंथी छात्र संगठन AISA ने पलटवार करते हुए दावा किया है कि उसके DU सचिव और छात्रा अंजलि पर यूट्यूबर रुचि शांडिल्य और कुछ ABVP कार्यकर्ताओं ने हमला किया।

AISA का कहना है कि आर्ट्स फैकल्टी, DU में जब छात्र UCC नियमों को लागू करने और कैंपस से जातिगत भेदभाव खत्म करने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, उसी दौरान यह घटना हुई। संगठन के मुताबिक, उनके कार्यकर्ता हमलावरों के खिलाफ FIR दर्ज कराने गए थे। आरोप है कि जैसे ही वे शिकायत दर्ज कराने पहुँचे, 50 से ज्यादा ABVP सदस्य थाने के बाहर जमा हो गए, खिड़कियाँ तोड़ीं और प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ नारेबाजी की।

वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों ने भी AISA के आरोपों को खारिज किया है। मामला अब पुलिस तक पहुँच चुका है। दोनों पक्षों ने मौरिस नगर पुलिस स्टेशन में एक-दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने पुष्टि की है कि दोनों गुटों से शिकायतें मिली हैं और लगाए गए आरोपों की जाँच की जा रही है।

ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी: UGC के समर्थन में विरोध प्रदर्शन के पीछे का संगठन

प्रो-यूजीसी नियमों के समर्थन में हुआ यह प्रदर्शन “ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी” नामक मंच द्वारा आयोजित किया गया था। यह संगठन 8 फरवरी 2026 को गठित किया गया था, जिसे वे “यूजीसी रेगुलेशन्स समता आंदोलन” के तौर पर पेश कर रहे हैं।

इस फोरम की औपचारिक शुरुआत दिल्ली स्थित HKS सुरजीत भवन में की गई थी। कार्यक्रम में कई वामपंथी छात्र संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे, जिनमें SFI के सदस्य भी शामिल थे। बताया जा रहा है कि इस मंच का उद्देश्य UGC की 2026 की समानता संबंधी नियमावली को लागू कराने के लिए देशभर में अभियान चलाना है।

ऑल इंडिया फोरम फॉर इक्विटी से जुड़े मुख्य सदस्यों का बैकग्राउंड विवादित है। इस मंच के सदस्यों मेंडॉ जितेंद्र मीणा, डॉ लक्ष्मण यादव, महेश चौधरी और भंवर मेघवंशी जैसे अर्बन नक्सल विचारधारा वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा इस फोरम से वामपंथी छात्र और कथित सामाजिक संगठन भी जुड़े हैं। इनमें प्रमुख नाम- जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU), आइसा (AISA), एसएफआई (SFI), एनएसयूआई (NSUI), एआईएसएफ (AISF), एमएसएफ (MSF), आरवाईए (RYA), डीएसएफ (DSF), एएसए (ASA), एआईओबीसीएसए (AIOBCSA), सीआरजेडी (CRJD), कलेक्टिव इंडिया, बीएपीएसए (BAPSA), सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार, रिहाई मंच, सोशल जस्टिस आर्मी, ओबीसी आरक्षण संघर्ष समिति, जेएवाईएस (JAYS), बीपीवीएम, गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन आदि शामिल हैं।

वीडियो में दिख रही रुचि तिवारी को पकड़ने वाली महिला ने नवंबर 2025 में नक्सल समर्थक प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था

विडंबना यह रही कि जिसे प्रदर्शन को ‘समानता’ और ‘न्याय’ के नाम पर आयोजित किया गया था, वही प्रदर्शन ब्राह्मण विरोधी हिंसा के आरोपों में घिर गया। आलोचकों का कहना है कि जिन लोगों पर नक्सली विचारधारा को महिमामंडित करने के आरोप लगते रहे हैं, उनकी मौजूदगी के बीच इस तरह की आक्रामक घटना चौंकाने वाली नहीं है।

शुक्रवार की घटना के वायरल वीडियो में जिन छात्राओं को रुचि तिवारी को घेरते और पकड़ते हुए देखा गया, उनमें गुरकीरत कौर का नाम भी सामने आया है। वह भगत सिंह छात्र एकता मंच की अध्यक्ष बताई जा रही हैं।

गुरकीरत कौर पर पहले भी प्रतिबंधित छात्र संगठन कट्टरपंथी छात्र संघ (RSU) की खुलकर सराहना करने के आरोप लगे थे। RSU पर आरोप रहा है कि इसके जरिए माओवादी संगठनों ने युवाओं की भर्ती की और उन्हें भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसक गतिविधियों में शामिल किया।

उल्लेखनीय है कि प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (Maoist) के शीर्ष नेता और महासचिव बसवराजु को भी कभी RSU से जुड़ा बताया जाता रहा है। इन आरोपों को लेकर छात्र राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

गुरकीरत कौर का एक पुराना बयान भी सोशल मीडिया पर सामने आ रहा है, जिसमें वह कहती सुनाई दे रही हैं, “RSU ने आंदोलन को इतने क्रांतिकारी दिए हैं कि आज भी राज्य उसके नाम से कांपता है। सिर्फ RSU का नाम भर लेने से या छात्रों के फिर से एकजुट होकर वही क्रांतिकारी राजनीति शुरू करने की सोच से ही सत्ता डर जाती है।”

यह बयान उस समय का बताया जा रहा है जब वह प्रतिबंधित छात्र संगठन RSU के समर्थन में बोल रही थीं। इसी बयान को लेकर अब उनके खिलाफ राजनीतिक और वैचारिक विवाद फिर से तेज हो गया है।

वायरल वीडियो के अलावा कई चश्मदीद गवाहों ने भी दावा किया है कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ के बीच गुरकीरत कौर सक्रिय रूप से मौजूद थीं। गवाहों के मुताबिक, वह अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ सबसे आगे दिखाई दे रही है।

इन गवाहियों में यह भी कहा गया है कि उनके साथ नेहा नाम की छात्रा भी मौजूद थीं, जो AISA में ‘प्रेसिडेंट’ पद पर बताई जा रही हैं। इन दावों को लेकर छात्र संगठनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और मामले की जाँच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

एक और नाम AISA की अंजलि का था, जो हाल ही में प्रेसिडेंट का चुनाव हार गई थीं।

वीडियो में एक लड़की रुचि तिवारी के बाल खींचती हुई दिखी। बताया जा रहा है कि उसकी पहचान तन्वी के तौर पर हुई है, जो DU से मास्टर्स की स्टूडेंट है।

गौरतलब है कि जिन छात्राओं के नाम इस ताज़ा विवाद में सामने आ रहे हैं, वे नवंबर 2025 में हुए  ‘एंटी-पॉल्यूशन’ आंदोलन में भी शामिल रही थीं। उस प्रदर्शन में भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और खुद को पर्यावरणीय समूह बताने वाले ‘हिमखंड’ से जुड़े छात्र सक्रिय थे। आरोप है कि उस दौरान प्रदर्शनकारियों ने मारे गए माओवादी कमांडर मडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए और पुलिस पर मिर्ची व पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए।

बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कॉमरेड हिडमा अमर रहे और हर घर से हिडमा निकलेगा जैसे नारे लगाए गए। जब पुलिस ने हस्तक्षेप किया, तो प्रदर्शनकारियों ने न सिर्फ धक्का-मुक्की की, बल्कि पेपर स्प्रे का इस्तेमाल कर पुलिसकर्मियों की आँखों और चेहरे को नुकसान पहुँचाया।

इस मामले में 22 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दो FIR दर्ज की गईं, जिनमें से 16 को गिरफ्तार किया गया। 15 को सोमवार को पटियाला हाउस कोर्ट ने न्यायिक हिरासत में भेजा, जबकि एक आरोपित को खुद को नाबालिग बताने पर किशोर गृह भेजा गया। FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 197 भी जोड़ी गई, जो भारत की संप्रभुता, एकता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों या बयानों से संबंधित है।

दिसंबर 2025 में दिल्ली की एक कोर्ट ने गुरकीरत कौर, रवजोत कौर, क्रांति उर्फ प्रियंशु, आयशाह वफिया, अभिनाश सतपथी और इलाकलिया को जमानत दे दी थी। जमानत मिलने के बाद bsCEM की गुरकीरत कौर अब प्रॉ-यूजीसी प्रदर्शन में भी सक्रिय दिखीं और आरोप है कि वह उसी समूह का हिस्सा थीं जिसने रुचि तिवारी को घेरा और प्रताड़ित किया।

यह भी उल्लेखनीय है कि 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले bsCEM ने दिल्ली विश्वविद्यालय की दीवारों पर नारे लिखकर मतदान का बहिष्कार करने की अपील की थी। संगठन के सदस्यों ने एक ही रास्ता नक्सलबाड़ी जैसे नारे लगाए थे नक्सलबाड़ी वही स्थान है जहाँ से भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है। इसके अलावा इस कट्टर वामपंथी संगठन पर ब्राह्मण विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा देने के आरोप भी लगते रहे हैं।

‘ऊँची जातियों के साथ नहीं हो सकता भेदभाव’ – ये कहने वाली वकील दिशा वाडेकर हुईं गलत साबित

इसी महीने की शुरुआत में UGC नियमों से जुड़े मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील दिशा वाडेकर ने कई इंटरव्यू में कहा था कि अगर जाति-आधारित भेदभाव संबंधी प्रावधान को कास्ट-न्यूट्रल बना दिया जाए, तो फिर उस प्रावधान का उद्देश्य ही क्या रह जाएगा।

उन्होंने द टेलीग्राफ इंडिया से बातचीत में कहा था कि सेक्शन 3(सी) में जाति-आधारित भेदभाव को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC के खिलाफ होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। उनके मुताबिक, अगर इस परिभाषा में अन्य श्रेणियों को भी शामिल कर इसे पूरी तरह कास्ट-न्यूट्रल बना दिया जाए, तो फिर भेदभाव की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी।

एक अन्य साक्षात्कार में वाडेकर ने यह भी कहा कि वह यह नहीं कह रहीं कि सवर्ण या ऊपरी जाति के छात्र कभी उत्पीड़न का सामना नहीं करते, लेकिन उनके अनुसार ऐसे मामले व्यक्तिगत प्रकृति के होते हैं, न कि किसी जातिगत पहचान पर आधारित सामूहिक भेदभाव का परिणाम।

हालाँकि, पिछले कुछ समय में कैंपस में ब्राह्मण और बनिया समुदाय के खिलाफ नारेबाजी, दीवारों पर उकसाऊ और हिंसक संदेश लिखे जाने, ब्राह्मण कैंपस छोड़ो जैसे नारे, यहाँ तक कि कुछ मामलों में ब्राह्मण छात्रों का जनेऊ जबरन काटने जैसे आरोप भी सामने आए हैं।

आलोचकों का कहना है कि ऐसे घटनाक्रम वाडेकर के उस तर्क को चुनौती देते हैं, जिसमें सवर्ण समुदायों के खिलाफ समूह-आधारित जातिगत शत्रुता की संभावना को कमतर आंका गया। रुचि तिवारी के साथ उनकी ब्राह्मण पहचान को लेकर की गई बदसलूकी और हमला भी इसी बहस के केंद्र में आ गया है।

दिलचस्प बात यह है कि दिशा वाडेकर ने अधिवक्ताओं प्रसन्ना एस और इंदिरा जयसिंह के साथ मिलकर UCC बिल में शामिल किए जाने वाले 10 सुझावों का मसौदा तैयार किया था, जिनमें जाति-आधारित भेदभाव से जुड़ा बिंदु भी शामिल था।

वाडेकर का तर्क यह माना जाता है कि ब्राह्मण, ठाकुर या अन्य सामान्य वर्ग के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते। लेकिन रुचि तिवारी प्रकरण जहाँ आरोप है कि उन्हें उनकी ‘ब्राह्मण’ पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया इस दावे पर नए सिरे से सवाल खड़े कर रहा है।

फिलहाल यह मामला जाँच के अधीन है, लेकिन इस घटना ने एक व्यापक बहस छेड़ दी है, क्या जातिगत शत्रुता और हिंसा का शिकार केवल कुछ निर्धारित श्रेणियाँ ही हो सकती हैं या फिर सामाजिक तनाव की परिस्थितियों में कोई भी समुदाय लक्षित हो सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बांग्लादेश में एंटी-हिंदू वोटिंग का दिखा पैटर्न, बंगाल से सटे इलाकों में हिंदुओं की आबादी के बीच जमात की धाक: जानें- क्यों ये भारत के लिए चिंता की बात

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव (फरवरी 2026) में जमात-ए-इस्लामी की करीब 60 से ज्यादा सीटें जीतना भारत के लिए चिंता का विषय क्यों बन रहा है? यह सवाल खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जमात की जीत मुख्य रूप से भारत से सटे सीमावर्ती इलाकों में हुई है, जहाँ हिंदू आबादी 10-13% से अधिक है।

यह चुनाव शेख हसीना की सरकार के गिरने के बाद पहला बड़ा चुनाव था, जिसमें बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने भारी बहुमत हासिल किया, लेकिन जमात-ए-इस्लामी ने दूसरी सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सबको चौंका दिया।

बांग्लादेश चुनाव के नतीजों की अहम बातें

फरवरी 2026 के चुनाव में बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) की 299-300 सीटों (कुछ रिपोर्ट्स में 299, कुछ में 300 बताई गईं) के लिए मतदान हुआ। नतीजों के अनुसार-

  • बीएनपी और उसके गठबंधन ने 212 सीटें जीतीं, जिससे तारिक रहमान के नेतृत्व में सरकार बनना तय हो गया।
  • जमात-ए-इस्लामी ने अकेले 68 सीटें जीतीं, और उसके 11-पार्टी गठबंधन को कुल 77 सीटें मिलीं। यह जमात के इतिहास की सबसे बड़ी सफलता है (पहले कभी 12% से ज्यादा वोट नहीं मिले थे)।
  • नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) जो 2024 के छात्र आंदोलन से निकली और हसीना को हटाने वाले युवा कार्यकर्ताओं की पार्टी है। उसकी बुरी हालत रही और उसे सिर्फ 6 सीटें मिलीं। इससे साफ है कि पूरे देश ने उन कथित आंदोलनकारियों को बड़े स्तर पर नकार दिया। जनता ने अपेक्षाकृत कम कट्टर बीएनपी को चुना न कि ज्यादा कट्टर जमात-एनसीपी गठबंधन को।

शेख हसीना के समर्थक और आंदोलनकारी ताकतों को जनता ने ठुकरा दिया। छात्रों ने हसीना को हटाया था, हालाँकि चुनाव में उनकी पार्टी को महज 6 सीटें मिलना दिखाता है कि देश बदलाव चाहता था, लेकिन कट्टरपंथ नहीं। शहरी इलाकों, पढ़े-लिखे वर्ग और महिलाओं ने जमात को काफी हद तक नकारा, खासकर उनके महिलाओं के अधिकारों पर रूढ़िवादी बयानों के कारण लेकिन ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में जमात का प्रभाव बढ़ा दिख रहा है।

हिंदू आबादी वाले प्रमुख जोन और जमात की जीत

बांग्लादेश में हिंदू आबादी कुल 7.95-8% है (2022 जनगणना के अनुसार लगभग 1.3 करोड़)। लेकिन कुछ डिवीजन में यह ज्यादा है-

सिलहट डिवीजन: 13.51% हिंदू (सबसे ज्यादा)।
रंगपुर डिवीजन: 13.01% (या 12.98%)।
खुलना डिवीजन: 11.52-11.53% (पहले 12.85% था, गिरावट आई)।

ये तीनों डिवीजन ही ऐसे हैं जहाँ हिंदू 10% से ज्यादा हैं। अन्य डिवीजन में यह कम है।

सिलहट में जमात को सिर्फ 1 या बहुत कम सीट मिली। यह इलाका पूर्वोत्तर भारत (असम, मेघालय, त्रिपुरा) से जुड़ता है। यहाँ हिंदू-मुस्लिम संबंध अपेक्षाकृत बेहतर रहे और भारत विरोध कम था। इसलिए जमात का प्रभाव यहाँ कम रहा।

रंगपुर और खुलना में जमात का प्रभाव काफी बढ़ा दिखा। रंगपुर में कई सीटें (जैसे रंगपुर-1,2,3,5,6), गाइबंदा, जॉयपुरहाट आदि में जमात को जीत मिली तो खुलना में सतखीरा जिले की सभी 4 सीटें जमात ने जीत ली। यही नहीं, इस इलाके के कुछ अन्य जिलों में भी जमात ने मजबूत प्रदर्शन किया। ये इलाके पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, 24 परगना जैसे जिलों से जुड़े हैं।

इन इलाकों में जमात की जीत चिंता पैदा करती है क्योंकि यहाँ हिंदू आबादी ज्यादा है और ऐतिहासिक रूप से 1971 के युद्ध में जमात ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात को पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी माना जाता है। 1971 में उनकी भूमिका (राजाकारों के साथ) जगजाहिर है, जहाँ हिंदुओं पर अत्याचार हुए।

हरे रंग में जमात और सहयोगियों की सीटें, फोटो साभार: X_Epatrakaar

क्यों है भारत के लिए चिंता?

एंटी-हिंदू वोटिंग पैटर्न का संकेत: इन सीमावर्ती इलाकों में जहाँ हिंदू 11%+ हैं, मुस्लिम वोटरों का एकजुट होकर कट्टर जमात को वोट देना दिखता है। यह हिंदुओं के खिलाफ ध्रुवीकरण का संकेत हो सकता है। 1971 के बाद से कई मुस्लिम परिवार भारत से माइग्रेट होकर इन इलाकों में बसे और उनमें हिंदू विरोधी भावनाएँ बनी रहीं। जमात की जीत से लगता है कि कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं।

भारत विरोधी अभियान: जमात ने चुनाव में बीएसएफ (भारतीय सीमा सुरक्षा बल) के खिलाफ कैंपेन चलाया। बॉर्डर पर गोलीबारी, घुसपैठ जैसे मुद्दों पर भारत विरोध को भुनाया। पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों में यह जीत कट्टरपंथियों को मजबूती दे रही है। भारत को डर है कि इससे सीमा पर अशांति बढ़ सकती है, तस्करी, घुसपैठ या आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं। ऐसे में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत रहेगी।

ऐतिहासिक दुश्मनी: जमात 1971 में पाकिस्तान के साथ थी। आज भी पाकिस्तान से जुड़े होने का आरोप लगता है। भारत के साथ संबंधों में जमात हमेशा सतर्क रही। हालाँकि चुनाव से पहले कुछ जमात नेताओं ने ‘भारत के साथ काम करना होगा’ जैसे बयान दिए, लेकिन पश्चिम बंगाल से सटे ग्रामीण इलाकों में एंटी-इंडिया सेंटिमेंट मजबूत रहा। इसका फायदा जमात ने उठाया। उसने माहौल ही ऐसा तैयार किया था।

सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता: 4096 किमी लंबी सीमा पर रंगपुर-खुलना जैसे इलाकों में जमात की मजबूती से भारत की सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट हैं। व्यापार, पानी बंटवारा (तीस्ता जैसे मुद्दे) प्रभावित हो सकते हैं।

जनता का मैंडेट क्या कहता है?

देश स्तर पर बीएनपी की जीत दिखाती है कि जनता ने कट्टरपंथ को ज्यादा जगह नहीं दी। जमात को शहरी इलाकों में नकारा गया। महिलाओं और युवाओं ने उनके रूढ़िवादी विचारों (महिलाओं के अधिकारों पर) का विरोध किया। लेकिन ग्रामीण और बॉर्डर इलाकों में जमात का ‘धर्म और भारत विरोध’ कार्ड चला।

यह चुनाव ‘नए बांग्लादेश’ की शुरुआत है, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में जमात की जीत से हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर सवाल उठ रहे हैं। भारत को सतर्क रहना होगा, क्योंकि बीएनपी सरकार के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करेगी, लेकिन जमात जैसी विपक्षी ताकत दबाव डाल सकती है।

AR रहमान पर धुन ‘चुराने’ का आरोप, PS-2 के ‘वीरा राजा वीरा’ के लिए चुराया म्यूजिक: SC पहुँचा मामला, सोशल मीडिया पर लोगों ने शेयर की ‘चोरी’ वाली लिस्ट

गायक और संगीतकार ए आर रहमान एक बार फिर बड़े विवाद में घिर गए हैं। मणिरत्नम की तमिल फिल्म पोन्नियन सेल्वन 2 के चर्चित गीत ‘वीरा राजा वीरा’ को लेकर उन पर शास्त्रीय ध्रुपद रचना ‘शिव स्तुति’ की नकल करने का आरोप लगा है। सोशल मीडिया पर एक क्लिप वायरल हो रही है, जिसमें रहमान के गानों और ओरिजिनल गानों के बारे में बताया गया है।

इसमें पहला गाना ‘वीरा राजा वीरा’ है, जिसकी धुन सुनने में भी बिल्कुल ‘शिव स्तुति’ जैसी है। इसी तरह ‘ये हंसी वादियाँ, ये खुला आसमाँ’, जय हो और ‘जब तक है जान’ के ‘चल्ला’ और फेमस गाना ‘मुकाबला’ गाने के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं के गाने की धुन और असली धुन को पेश किया गया है। वीडियो में बताया गया है कि असली धुन किस फिल्म की है।

फेमस फिल्म ‘गजनी’ के ‘कैसे मुझे’, ‘येलो कार्ड’ के ‘ओनली वन’, ‘हेलो मिस्टर इथिरकाची’ मेम्फिस स्टॉम्प, रोजा-रोजा की धुन सिप्पी इरुक्कुट्ठू से चोरी की गई है। ‘ये हँसी वादियाँ’ की धुन ‘क्वाइट मैन’ से चोरी की गई है। फेमस गाना ‘जय हो’ की धुन ‘सिम्फोनी नंबर 40’ से ली गई है। ‘जब तक है जान’ के ‘चल्ला’ गाने की धुन असल में ‘सेव टुनाइट’ से ली गई है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, जहाँ कोर्ट ने रहमान और फिल्म निर्माताओं से मूल रचनाकार और परंपरा को उचित मान्यता देने पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। अब इस केस की अगली सुनवाई शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को होगी।

क्या है पूरा विवाद और किसने लगाए आरोप?

यह याचिका ध्रुपद शैली के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद फैय्याज वासिफुद्दीन डागर ने दायर की है। उनका कहना है कि ‘वीरा राजा वीरा’ गीत में उनके परिवार की पारंपरिक रचना ‘शिव स्तुति’ के सुर, ताल और संगीत संरचना का बिना अनुमति उपयोग किया गया है।

डागर परिवार का दावा है कि यह रचना उनके अब्बू नासिर फैयाजुद्दीन डागर और चाचा जहीरुद्दीन डागर ने 1970 के दशक में डागरवाणी परंपरा में तैयार की थी और पहली बार 1978 में एम्स्टर्डम में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत की गई थी। याचिकाकर्ता के अनुसार, रहमान की टीम में शामिल दो कलाकार पहले डागर परिवार के शिष्य रह चुके थे।

वे इस रचना से भली-भाँति परिचित थे। आरोप है कि उन्हीं के जरिए यह रचना रहमान तक पहुँची और बिना इजाजत इसे फिल्मी गीत में ढाल दिया गया। डागर का कहना है कि भले ही गीत के बोल अलग हों, लेकिन उसकी ताल, बीट, स्वरों की संरचना और भाव-प्रस्तुति ‘शिव स्तुति’ से मिलती-जुलती है, जो कॉपीराइट और नैतिक अधिकारों का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: परंपरा और मूल कलाकारों को मिले सम्मान

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि डागरवाणी परंपरा और डागर परिवार के योगदान को किसी परिचय की जरूरत नहीं। चीफ जस्टिस ने कहा कि डागर जैसे घरानों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में योगदान न दिया होता, तो आज के आधुनिक गायक बाजार में अपनी पहचान बना पाते?

वहीं जस्टिस बागची ने कहा कि इस मामले में मूल धुन की मौलिकता पर विवाद नहीं है, बल्कि सवाल लेखक और पहले प्रस्तोता को लेकर है। रहमान के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने स्वीकार किया कि गीत की प्रेरणा डागरवाणी परंपरा से ली गई है, लेकिन उन्होंने कानूनी पहलुओं पर अपना पक्ष रखा।

कोर्ट ने सुझाव दिया कि कम से कम यह स्वीकार किया जाए कि इस रचना का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन डागर परिवार के पूर्वजों द्वारा किया गया था। इस पर सिंघवी ने निर्देश लेकर अगली सुनवाई में जवाब देने की बात कही।

हिंदू समाज के पितृसत्तात्मक ‘नियमों’ में रेप सामान्य: IIT पटना प्रोफेसर डॉ प्रियांका त्रिपाठी का नया रिसर्च पेपर फिर से विवादों में घिरा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना की अंग्रेजी की प्रोफेसर डॉ प्रियांका त्रिपाठी एक बार फिर सुर्खियों में आ गई हैं। प्रियंका हाल के समय में हिंदू धर्म और उसके मूल तत्वों का अपमान करने के आरोप में आलोचना का सामना कर रही हैं।

इस बार उन्होंने एक नया विवादित शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, जेंडर्ड एंड कास्टिस्ट बॉडी: कास्ट(ई) इंग एंड कास्टिगेशन द फीमेल बॉडी इन सेलेक्ट बॉलीवुड फिल्म्स, जिसे बिदिशा पाल और पार्थ भट्टाचार्य के साथ मिलकर लिखा गया है। यह शोध पत्र भी उनके एजेंडा को बढ़ावा देने वाले विचारों और विवादित विषयों को लेकर चर्चा में है।

डॉ प्रियंका त्रिपाठी ने इस शोध पत्र में भी अपने विवादित दावों को साबित करने के लिए पुरुषवादी और हिन्दू-विरोधी व्यक्तियों का हवाला दिया है। इसमें उन्होंने सुरज येगड़े का जिक्र किया है, जो अपने खालिस्तानी तत्वों से जुड़े होने के लिए कुख्यात हैं।

इस त्रय ने हिंदू समाज का अपमान और बढ़ा दिया, एक और संदिग्ध व्यक्ति मीना कंदासामी का हवाला देते हुए। उन्होंने लिखा, “एक पुरुष के लिए, महिला घर की दलित है (Zecchini 62 में उद्धृत)। महिलाओं को अक्सर कमजोर लिंग माना जाता है, चाहे उनकी जाति, वर्ग या स्थिति कुछ भी हो। पितृसत्ता महिलाओं को एक सीमित लिंग आधारित ढाँचे में बाँध देती है, जिससे उन्हें वस्तुवादित ऑब्जेक्टिफाइड जीवन जीना पड़ता है।” इसके जरिए उन्होंने तर्क किया कि महिला होना मूल रूप से ‘दलितता’ से जुड़ा हुआ है।

इस शोध पत्र ने शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन (1994) और अनुभव सिन्हा की आर्टिकल 15 का हवाला दिया, जो खुद भी एक लेफ्ट विंग की साजिश में शामिल माने जाते हैं। इसने बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय को भी अपनी विकृत जातिवादी दृष्टिकोण से उठाने में कोई हिचक नहीं दिखाई।

लेखकों ने न केवल भारत में दलित समुदाय को आगे बढ़ाने के लिए किए गए ठोस प्रयासों, जैसे आरक्षण, को पूरी तरह नजरअंदाज किया, बल्कि उनके हालात की तुलना दक्षिण अफ्रीका में अपार्थीड से करके चौंका दिया।

उन्होंने लिखा, “अपार्थीड नस्लीय अलगाव और दक्षिण अफ्रीका के गैर-सफेद नागरिकों के खिलाफ आर्थिक और राजनीतिक भेदभाव का परिणाम था। भारत में दलित भी अलगाव की राजनीति का शिकार हैं। मुख्यधारा के भारतीय समाज में छुपा हुआ अपार्थीड मौजूद है, जो अलगाव के विचार को जन्म देता है। यह सब जाति व्यवस्था की श्रेणीबद्ध संरचना से उत्पन्न भौतिक अपार्थीड ही है। हालाँकि, दलित महिलाओं को अलग पहचान और अस्तित्व संबंधी संकटों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें ‘अशुद्ध’ शरीर के रूप में देखा जाता है।”

लेखकों ने हालाँकि जल्दी ही अपने असली उद्देश्य पर पहुँच गए, जो हिंदू धर्म की निंदा करना था। उन्होंने बड़ी निडरता से दावा किया कि बलात्कार पितृसत्तात्मक हिंदू समाज में सामान्य घटना है।

पत्र में लिखा गया, “बलात्कार की क्रिया पितृसत्तात्मक हिंदू समाज के ‘नियमों’ में सामान्यीकृत है और कड़े रूढ़िवादिता के अनिवार्य परिणाम से जुड़ी है। जीन चैपमैन (2014) का कहना है कि ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म महिलाओं के खिलाफ छोटी क्रियाओं को सामान्य मानता है और यह बताता है कि बलात्कार कोई अनियमित घटना नहीं है, बल्कि यह संरचित है।”

पत्र में शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन का हवाला देते हुए लिखा गया, “सिनेमाई दृश्य सार्वजनिक बलात्कार के कृत्य में सवर्ण पितृसत्ता का लगातार प्रदर्शन करता है।” इसके जरिए उन्होंने बड़े जाति समुदाय की और अधिक निंदा भी की।

दिलचस्प बात यह है कि इस शोध पत्र में प्रस्तुत निंदनीय दावों के लिए किसी भी प्रकार के वास्तविक आंकड़े या तथ्य की जरूरत नहीं है और ऐसे सिद्धांत बनाने वाले लोग, जो इसे शोध के नाम पर पेश करते हैं, आम तौर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई या परिणाम का सामना भी नहीं करते।

डॉ प्रियंका त्रिपाठी का इतिहास विवादों से भरा रहा है

दिलचस्प बात यह है कि इस शोध पत्र में प्रस्तुत निंदनीय दावों के लिए किसी भी प्रकार के वास्तविक आंकड़े या तथ्य की जरूरत नहीं है और ऐसे सिद्धांत बनाने वाले लोग, जो इसे शोध के नाम पर पेश करते हैं, आम तौर पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई या परिणाम का सामना भी नहीं करते।

इसके अलावा, यह पता चला है कि त्रिपाठी का ब्रिटेन की पब्लिशिंग कंपनी टेलर और फ्रांसिस के साथ गहरा संबंध है, जो लगातार भारत, हिंदुत्व, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) की आलोचना करता रहा है और यहाँ तक कि भारतीय लोकतंत्र का भी मजाक उड़ाता रहा है।

त्रिपाठी की वैचारिकता, काम और संबंध हिंदू विरोध (Hindumisia) में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं और ऐसे व्यक्ति को देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान में भारतीय टॉप मस्तिष्कों को पढ़ाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। सबसे चिंता की बात यह है कि शैक्षणिक संस्थानों में और भी कई लोग हैं जिनके विचार हिंदू विरोध से प्रभावित हैं।

यह बताना भी जरूरी नहीं कि वे भविष्य की पीढ़ियों में शिक्षा के नाम पर क्या बीजारोपण कर रहे हैं और अपने छात्रों के प्रति जाति या धर्म के आधार पर कितना पक्षपात कर रहे हैं। इसके अलावा, इनका उद्देश्य वास्तव में सच्चे रूप से दबे-कुचले समुदायों के मुद्दों को उठाना नहीं है, बल्कि उन्हें हिंदुओं पर हमला करने और अपनी विचारधारा फैलाने के लिए एक औजार के रूप में इस्तेमाल करना है।

इस तरह, यह साफ है कि यह पहली बार नहीं है जब अकादमिक जगत में हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया, अपमानित और निजी एजेंडों के लिए इस्तेमाल किया गया और यह अंतिम भी नहीं होगा। त्रिपाठी और उनके जैसे लोग भारतीय शिक्षा प्रणाली में व्याप्त गिरावट का प्रतीक हैं और अगर संस्थान, सरकार या समुदाय द्वारा कड़े सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो ये और अधिक फैलेंगे, खासकर उस समुदाय में जिसकी आस्था को ये लोग मजाक या पिटाई का विषय बना देते हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)



आसमान में बनेगा अभेद्य किला, जानें क्या है भारत का ‘प्रोजेक्ट कुशा’ जिसे कहा जा रहा है ‘स्वदेशी सुदर्शन चक्र’? कैसे यह दुश्मनों की मिसाइलों को बना देगा कबाड़

भारत अपनी सीमाओं को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित करने के लिए एक ऐसी ‘जादुई दीवार’ तैयार कर रहा है, जिसे पार करना किसी भी दुश्मन के लिए नामुमकिन होगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत ने अपनी रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है और अब पूरा फोकस ‘प्रोजेक्ट कुशा’ (Project Kusha) पर है।

इसे ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का नाम भी दिया जा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम है जो ड्रोन, फाइटर जेट और मिसाइलों को आसमान में ही ढूँढकर उन्हें आग के गोले में तब्दील कर देगा। DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) के वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि यह सिस्टम साल 2030 से भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनना शुरू हो जाएगा।

क्या है प्रोजेक्ट कुशा और इसका ‘थ्री-टियर’ कवच?

प्रोजेक्ट कुशा असल में भारत का अपना स्वदेशी ‘लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम’ (LRSAM) है। आपने रूस के प्रसिद्ध S-400 सिस्टम के बारे में सुना होगा, प्रोजेक्ट कुशा को भारत का S-400 ही माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘लेयर्ड डिजाइन’ है। इसका मतलब है कि यह सिस्टम एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग स्तरों (Levels) पर सुरक्षा प्रदान करेगा।

DRDO की लैब (DRDL) के निदेशक ए राजू के अनुसार, इस प्रोजेक्ट में तीन तरह की मिसाइलें विकसित की जा रही हैं- मार्क-1, मार्क-2 और मार्क-3। ये तीनों मिसाइलें मिलकर 60 किलोमीटर से लेकर 350-400 किलोमीटर तक के दायरे में एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाएँगी। अगर कोई दुश्मन मिसाइल 350 किमी दूर है, तो उसे मार्क-3 संभाल लेगा, और अगर कोई खतरा पास आ गया है, तो मार्क-1 और मार्क-2 उसे खत्म कर देंगे।

तीन मिसाइलों की ताकत: 60 से 400 किमी तक नो-फ्लाई जोन

प्रोजेक्ट कुशा की ये तीन मिसाइलें भारत की इंटरसेप्शन क्षमता (दुश्मन को बीच में ही रोकने की शक्ति) को नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्क-1 (M1) मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर तक होगी। यह उन खतरों के लिए है जो मध्यम दूरी तक पहुँच चुके हैं। इसके बाद आती है मार्क-2 (M2), जिसकी रेंज 250 किलोमीटर तय की गई है।

सबसे खतरनाक है मार्क-3 (M3), जो भारत की इंटरसेप्शन पावर को 350 से 400 किलोमीटर तक पहुँचा देगी। यह सिस्टम इतना एडवांस होगा कि यह न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि क्रूज मिसाइलों और ‘हाई-वैल्यू’ हवाई खतरों (जैसे दुश्मन के जासूसी विमान) को भी पलक झपकते ही पहचान लेगा। वायुसेना की योजना इसके 10 स्क्वाड्रन खरीदने की है, जो अगले दशक में भारत की हवाई सुरक्षा का मुख्य स्तंभ बनेंगे।

स्वदेशी ‘सुदर्शन चक्र’: आयात पर निर्भरता होगी खत्म

भारत अब तक लंबी दूरी के एयर डिफेंस के लिए रूस या अन्य देशों पर निर्भर रहता था। S-400 का आना एक बड़ी बात थी, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा भारत को इस मामले में ‘आत्मनिर्भर’ बना देगा। ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत भारतीय वैज्ञानिक मिसाइल गाइडेंस, सीकर तकनीक (जो मिसाइल को रास्ता दिखाती है) और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी जटिल तकनीकों को खुद भारत में ही विकसित कर रहे हैं।

जब यह सिस्टम पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तो यह भारत के मौजूदा सिस्टम जैसे ‘आकाश’ (जो कम दूरी के लिए है) और ‘S-400’ (जो बहुत लंबी दूरी के लिए है) के बीच के खाली स्थान को भर देगा। आकाश, कुशा और S-400 मिलकर एक ऐसी ‘मल्टी-लेयर’ सुरक्षा बनाएँगे कि दुश्मन का एक परिंदा भी भारतीय वायुक्षेत्र में पर नहीं मार सकेगा। इसे 2035 तक पूरी तरह से तैनात करने का लक्ष्य रखा गया है।

ट्रायल का दौर: काँसेप्ट से हकीकत की ओर बढ़ते कदम

प्रोजेक्ट कुशा अब केवल कागजों पर नहीं है, बल्कि यह डेवलपमेंटल ट्रायल के अहम फेज में प्रवेश कर रहा है। इसका मतलब है कि अब इन मिसाइलों के वास्तविक परीक्षण शुरू होने वाले हैं। पहले DRDO इसके तकनीकी ट्रायल करेगा, जिसमें देखा जाएगा कि मिसाइल का इंजन और रडार सही काम कर रहे हैं या नहीं। इसके बाद भारतीय वायुसेना के साथ ‘यूजर ट्रायल’ होंगे।

रणनीतिक दृष्टि से यह प्रोजेक्ट भारत की स्थिति को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देगा, जिनके पास अपना खुद का मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क है। इससे न केवल हमारी हवाई सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि युद्ध के समय हमारे रणनीतिक ठिकानों (जैसे परमाणु प्लांट, बड़े शहर और सैन्य बेस) को किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी।

आसमान में भारत की बढ़ती धमक और आत्मनिर्भरता

प्रोजेक्ट कुशा केवल एक मिसाइल प्रोग्राम नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भारत की ‘प्रोएक्टिव डिफेंस’ रणनीति का एक बड़ा हिस्सा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और सीमाओं पर बढ़ते तनाव के बीच, भारत ने यह समझ लिया है कि भविष्य के युद्ध जमीन से ज्यादा आसमान में लड़े जाएंगे। ड्रोन हमलों और हाई-स्पीड क्रूज मिसाइलों के दौर में, जिसके पास सबसे सटीक एयर डिफेंस होगा, वही देश सुरक्षित रहेगा।

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी जीत इसकी स्वदेशी तकनीक है। जब हम विदेशी सिस्टम खरीदते हैं, तो उनकी मरम्मत और पार्ट्स के लिए हमें दूसरे देशों की शर्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन ‘प्रोजेक्ट कुशा’ या ‘सुदर्शन चक्र’ पूरी तरह हमारा अपना होगा। यह भारत के वैज्ञानिकों की काबिलियत का प्रमाण है कि हम S-400 के टक्कर का सिस्टम खुद तैयार कर रहे हैं। 2030 से जब इसकी तैनाती शुरू होगी, तब भारत का आकाश वास्तव में एक ‘अभेद्य किला’ बन चुका होगा। यह ‘न्यू इंडिया’ की वह तस्वीर है जो न केवल अपनी रक्षा करना जानती है, बल्कि तकनीक के मामले में दुनिया को चुनौती देने के लिए भी तैयार है।

रोहतक से दिल्ली की ओर: परफॉर्मिंग आर्ट्स में हरियाणा का नया केंद्र बन रहा सुपवा

दिल्ली के भगवान दास रोड पर स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) लंबे समय से परफॉर्मिंग और विजुअल आर्ट्स का एक मजबूत केंद्र रहा है, जो दूर-दूर तक अपनी छाप छोड़ता आया है। लेकिन अब हरियाणा के रोहतक में स्थित दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसी सुपवा) तेजी से उभर रहा है। इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से मात्र 85 किलोमीटर दूर यह विश्वविद्यालय कला के क्षेत्र में नई उम्मीदों की किरण बनकर सामने आया है। मोदी सरकार के साथ ही 2014 में अस्तित्व में आया यह संस्थान ‘कला साधना परम दैवतम्’ के ध्येय वाक्य के साथ आगे बढ़ रहा है।

36 एकड़ के विशाल परिसर को प्रसिद्ध आर्किटेक्ट राज रेवाल ने डिजाइन किया है, जिसमें करीब 300 करोड़ रुपये का निवेश हुआ। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक चुनौतियों, संकाय की कमी और उपकरणों की अपर्याप्तता के कारण विश्वविद्यालय को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। फिल्म और टेलीविजन विभाग में देरी से कई बैच प्रभावित हुए- उदाहरण के लिए, 2017-2021 बैच ने 2024 में डिग्री पूरी की, जबकि 2018-2022 बैच को 2025 या 2026 तक इंतजार करना पड़ा। छात्रों के विरोध प्रदर्शन भी हुए, जो 2016 से 2023 तक विभिन्न रूपों में जारी रहे और 2024 में दो महीने से अधिक चला। इन सबके बावजूद संस्थान में नई ऊर्जा का संचार हो रहा है।

साल 2025 में डॉ. अमित आर्य के छठे कुलपति के रूप में कार्यभार संभालने के बाद सुपवा में सकारात्मक बदलावों की बयार बहने लगी। एक जाने-माने पत्रकार और मीडिया विशेषज्ञ डॉ. आर्य ने नेतृत्व संभालते ही पुरानी कमियों को दूर करने और संस्थान को नई दिशा देने का संकल्प लिया। अप्रैल 2025 में हरियाणा सरकार ने सुपवा को राज्य की सभी यूनिवर्सिटीज में फिल्म मेकिंग कोर्स शुरू करने के लिए मेंटर बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। साथ ही पंचकूला में हएमटी कालका की 100 एकड़ सरकारी जमीन पर फिल्म सिटी और गुरुग्राम में एक और फिल्म सिटी के लिए प्रक्रिया शुरू हुई। ये कदम हरियाणा में परफॉर्मिंग और विजुअल आर्ट्स के परिदृश्य को बदलने वाले साबित हो रहे हैं।

डॉ. आर्य ने सबसे पहले विश्वविद्यालय के पारंपरिक महोत्सव ‘सारंग’ को पुनर्जीवित करने का फैसला किया, जो कई वर्षों से बंद पड़ा था। उनके नेतृत्व में ‘सारंग’ को एनएसडी के भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के साथ जोड़कर राष्ट्रीय स्तर पर लाया गया। फरवरी 2026 में आयोजित चार दिवसीय ‘भारंगम’ (भारत रंग महोत्सव के 25वें संस्करण का हिस्सा) और ‘सारंग’ महोत्सव ने सुपवा को नई पहचान दी। महोत्सव की सफलता की गूँज दिल्ली-एनसीआर तक पहुँची, जिस पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी ने शुभकामनाएँ भेजीं और भविष्य में किसी आयोजन में शामिल होने की इच्छा जताई।

महोत्सव की शुरुआत प्रभु वंदना से हुई, जिसमें असम के शास्त्रीय नृत्य सत्रिया के माध्यम से कृष्ण की लीलाओं का सुंदर चित्रण किया गया। दिल्ली के पार्थ हजारिका ग्रुप ने ‘सत्त्रिया की आत्मा’ प्रस्तुत की, जिसमें चेहरे के भाव, हाथों की मुद्राएँ और शरीर की अभिव्यक्ति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सुधीर रेखरी के बैंड ने विविध गीतों की धुनों पर सभी को झूमने पर मजबूर किया। महोत्सव में रंगमंच, संगीत, नृत्य, कविता पाठ, लोक नृत्य और संवाद सत्रों का सिलसिला चला। सुपवा के 50 छात्रों ने कथक, भरतनाट्यम, भंगड़ा, कव्वाली और बॉडी मूवमेंट थियेटर जैसी प्रस्तुतियाँ दीं।

एनएसडी की ओर से आयोजित ‘भारंगम’ में दिल्ली, पंजाब और श्रीलंका से चार नाटकों का मंचन हुआ। 107 एनएसडी सदस्यों (कलाकार, टेक्निशियन, म्यूजिशियन) ने भाग लिया। श्रीलंका के अपूर्वा थिएटर ग्रुप का नाटक ‘कोलम्बा हाथे थोराना’ विशेष आकर्षण रहा। सिंहली भाषा में मंचित इस दो घंटे के प्रयोगात्मक नाटक में प्रेम, विवाह और संघर्ष के तीन भागों में इंसानी रिश्तों की नाजुकता को दर्शाया गया। प्रोजेक्टर पर सबटाइटल्स की मदद से भाषा की बाधा दूर हुई, लेकिन कलाकारों के अभिनय ने भाषा को पीछे छोड़ दिया। नाटक में निपुनी शारदा, थिलीनी जयमाली सहित आठ कलाकारों ने शानदार प्रदर्शन किया।

समापन समारोह में पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अवधी गीतों से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा, “सुपवा की धरती पर कुलपति डॉ. अमित आर्य ने कला का बीज बोया है और उसकी बागवानी व रखवाली की है। यहां आकर ऐसा लगा जैसे एनएसडी पहुँच गई हूँ।” उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शादी-विवाह के दौरान महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले गीतों में सहज अभिनय का उदाहरण दिया और छात्रों को अपनी अभिव्यक्ति को खुलकर सामने लाने की प्रेरणा दी।

‘नखरे वाली बन्नो आई पिया’ गीत पर अभिनेत्री मेघना मलिक भी उनके साथ नाचने को मजबूर हुईं। छात्र छात्राओं का जैसा समर्थन इस प्रदर्शन को मिला, इसे चार दिनों की सबसे सफल प्रस्तुति कही जा सकती है। जहाँ कलाकार के साथ साथ दर्शक दीर्घा में मौजूद पूरा जेन-जी समूह झूम रहा था।

अभिनेत्री मेघना मलिक ने कहा, “पहले अभिनय के लिए सिर्फ एनएसडी का नाम था, लेकिन अब सुपवा आपके शहर में है-इससे खूबसूरत क्या हो सकता है?” क्राइम रिपोर्टर श्रीवर्धन त्रिवेदी ने रंगमंच को संपूर्ण विद्या बताते हुए ऐसे आयोजनों की निरंतरता पर जोर दिया। अभिनेता विक्रम कोचर ने फैसले लेने की अहमियत पर प्रकाश डाला।

करीब 60 वॉलंटियर्स और पूरे सुपवा परिवार ने महोत्सव को सफल बनाया। डॉ. आर्य के नेतृत्व में तैयार रोडमैप के तहत भविष्य में ऐसे बड़े आयोजन नियमित होंगे। सुपवा अब एनएसडी जैसा विकल्प बन रहा है, जहाँ युवा कलाकारों को नई संभावनाएँ मिल रही हैं। हरियाणा में कला का नया अध्याय लिखा जा रहा है-उम्मीदों से भरा, ऊर्जा से लबरेज और सफलता की ओर अग्रसर।

असम की जिस ELF पर IAF के फाइटर जेट्स ने किया लैंड, वो आखिर है क्या? जानिए- कैसे युद्ध के समय काम करती है इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी, देश में और कहाँ-कहाँ बने हैं

भारत के सामरिक इतिहास में 14 फरवरी 2026 का दिन एक सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (14 फरवरी) को असम के डिब्रूगढ़ में C-130J सुपर हरक्यूलिस विमान से मोरन बाईपास पर बनी इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) पर लैंडिंग की।

चीन सीमा के सामरिक महत्व को देखते हुए पूर्वोत्तर में यह अपनी तरह की पहली सुविधा है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि युद्ध के समय वायुसेना का ‘ब्रह्मास्त्र’ है। यहाँ सुखोई-30 MKI और राफेल जैसे फाइटर जेट्स का ‘टच-एंड-गो’ अभ्यास यह बताता है कि अब भारत की सड़कें भी आसमान से आने वाली चुनौतियों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।

क्या होती है इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF)?

आसान भाषा में कहे तो ELF हाईवे का वह हिस्सा है जिसे सामान्य दिनों में गाड़ियों के चलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन आपातकाल में इसे कुछ ही घंटों के भीतर ‘रनवे’ में बदला जा सकता है। एक सामान्य सड़क और ELF में जमीन-आसमान का अंतर होता है। सामान्य सड़क फाइटर जेट्स का वजन नहीं सह सकती, लेकिन ELF को ICAO (International Civil Aviation Organization) के स्टैंडर्ड पर तैयार किया जाता है।

इसे बनाने में कंक्रीट और कोलतार की कई मोटी परतें बिछाई जाती हैं ताकि यह 40 टन के लड़ाकू विमान और 74 टन के भारी-भरकम मालवाहक विमानों (जैसे C-130J) का लैंडिंग लोड बर्दाश्त कर सके। इसकी बनावट में कोई बिजली के खंभे, ऊँचे पेड़ या डिवाइडर उस हिस्से में नहीं होते, ताकि विमान के पंख कहीं टकरा न जाएँ। इसके दोनों तरफ बाड़ (Fencing) लगाई जाती है ताकि जानवर या इंसान रनवे पर न आ सकें।

असम के अलावा देश में कहाँ-कहाँ हैं ये जादुई सड़कें?

भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है, जिसके तहत देशभर में कुल 28 इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) तैयार की जा रही हैं। पूर्वोत्तर भारत की बात करें तो असम में कुल 5 ऐसी स्ट्रिप बनाई जानी हैं, जिनमें मोरन की स्ट्रिप पहली और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।

लेकिन असम के अलावा भी देश के विभिन्न कोनों में कई महत्वपूर्ण एयरस्ट्रिप पहले से ही सक्रिय (Operational) हैं, जो भारत की सैन्य शक्ति को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करती हैं। राजस्थान के बाड़मेर (NH-925A) में स्थित स्ट्रिप भारत की पहली आधिकारिक ELF है, जिसका उद्घाटन 2021 में हुआ था।

पाकिस्तान सीमा के करीब होने के कारण यह पश्चिमी मोर्चे पर सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम मानी जाती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख स्ट्रिप्स हैं, पहली आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर, जहाँ 2015 और 2017 में मिराज और सुखोई जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की लैंडिंग कराकर दुनिया को भारत के बढ़ते सामर्थ्य का परिचय दिया गया था। दूसरी स्ट्रिप पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के सुल्तानपुर जिले में स्थित है, जहाँ प्रधानमंत्री मोदी स्वयं C-130J सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसकी क्षमता का प्रमाण दे चुके हैं।

तटीय और पहाड़ी क्षेत्रों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश के नेल्लोर (NH-16) को एक प्रमुख रणनीतिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया है। वहीं, पूर्वी तट पर ओडिशा के बालासोर (NH-16) में भी इसी तरह की सुविधा तैयार की गई है, ताकि बंगाल की खाड़ी की ओर से उत्पन्न होने वाले किसी भी खतरे का त्वरित जवाब दिया जा सके।

उत्तर में जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में बनी ELF सबसे चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इसे कठिन पहाड़ी भूगोल के बीच वायुसेना की सीधी पहुँच सुनिश्चित करने के लिए विशेष तौर पर निर्मित किया गया है। ये सभी एयरस्ट्रिप्स मिलकर भारत के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बनाती हैं, जो युद्ध या आपदा के समय भारतीय वायुसेना को किसी भी मुख्य एयरबेस पर निर्भरता के बिना तुरंत कार्रवाई करने की शक्ति देती हैं।

इमरजेंसी में ‘रिफिलिंग ऑयल’ और लॉजिस्टिक्स की क्या है तैयारी?

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर विमान हाईवे पर उतर गया, तो उसे तेल (ATF – Aviation Turbine Fuel) कहाँ से मिलेगा? इसके लिए वायुसेना और सरकार ने ‘मोबाइल रिफ्यूलिंग सिस्टम’ तैयार किया है। जब किसी हाईवे को ELF घोषित किया जाता है, तो उसके आसपास के डिपो में तेल का रिजर्व रखा जाता है।

आपातकाल यानि इमरजेंसी में विशालकाय टैंकर ट्रक, जिनमें हाई-प्रेशर पंप लगे होते हैं, सीधे हाईवे पर पहुँच जाते हैं। इसके अलावा, यहाँ ‘टेंपरेरी एटीसी (Air Traffic Control)’ केबिन बनाए जाते हैं। पोर्टेबल रडार और नेविगेशन सिस्टम को ट्रकों पर लोड करके स्ट्रिप के पास तैनात किया जाता है, जो पायलट को सुरक्षित लैंडिंग में मदद करते हैं। साथ ही, घायलों को निकालने के लिए हेलीकॉप्टर रिस्क्यू ज़ोन और मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की भी व्यवस्था इन स्ट्रिप्स के पास पहले से चिह्नित होती है।

युद्ध और आपदा में कैसे बदल जाएगी देश की तस्वीर?

ELF का महत्व सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। कल्पना कीजिए कि पूर्वोत्तर में भीषण बाढ़ या भूकंप आ जाए और मुख्य एयरपोर्ट के रनवे क्षतिग्रस्त हो जाएँ। ऐसी स्थिति में ये हाईवे स्ट्रिप्स जीवनदान साबित होंगी। यहाँ बड़े मालवाहक विमान उतरकर टनों राहत सामग्री, दवाइयाँ और बचाव दल (NDRF) पहुँचा सकते हैं।

युद्ध के नजरिए से देखें तो दुश्मन सबसे पहले एयरबेस और रडार को निशाना बनाता है। अगर हमारा मुख्य रनवे तबाह भी हो जाए, तो हमारे फाइटर जेट्स इन 28 अलग-अलग हाईवे स्ट्रिप्स से उड़ान भरकर दुश्मन को जवाब दे सकते हैं। इससे दुश्मन के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि भारतीय वायुसेना अगला हमला कहाँ से करेगी। इसे ‘डिस्पर्सल ऑफ एसेट्स’ कहा जाता है, यानी अपनी ताकत को एक जगह जमा न करके फैला देना।

असम और पूर्वोत्तर के लिए क्यों है यह ‘गेम चेंजर’?

असम का डिब्रूगढ़-मोरन इलाका चीन सीमा (LAC) के बहुत करीब है। यहाँ का भूगोल नदियों और पहाड़ों से भरा है। यहाँ 4.2 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप का बनना सुरक्षा की रीढ़ को मजबूत करता है। इसके साथ ही सरकार ब्रह्मपुत्र के नीचे अंडरवाटर रोड-रेल टनल और कई स्ट्रेटेजिक टनल बना रही है।

ये सभी प्रोजेक्ट्स मिलकर ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन नेक) पर हमारी निर्भरता को कम करेंगे। अगर कभी दुश्मन इस पतले गलियारे को रोकने की कोशिश भी करे, तो हमारी वायुसेना इन हाईवे स्ट्रिप्स के जरिए सेना की भारी तैनाती और रसद की सप्लाई जारी रख पाएगी। यह प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन का हिस्सा है जिसमें ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत पूर्वोत्तर को देश का विकास इंजन और रक्षा कवच बनाया जा रहा है।

सिर्फ एक सड़क नहीं, भारत का ‘अभय कवच’

डिब्रूगढ़ के मोरन में प्रधानमंत्री की लैंडिंग ने एक स्पष्ट संदेश भेज दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब अपनी सीमाओं पर केवल बुनियादी ढाँचा खड़ा नहीं कर रहा, बल्कि अपनी ‘फायरपावर’ को वहाँ शिफ्ट कर रहा है जहाँ से दुश्मन की संभावित चुनौती शुरू होती है।

चीन सीमा के इतने करीब फाइटर जेट्स का हाईवे पर उतरना यह दर्शाता है कि भारतीय वायुसेना अब पारंपरिक एयरबेस की मोहताज नहीं रही। अब हमारी हर मुख्य सड़क दुश्मन के लिए एक सक्रिय रनवे है। पूर्वोत्तर का भूगोल हमेशा से सेना के लिए एक चुनौती रहा है, लेकिन ELF जैसी सुविधाएँ इस चुनौती को ताकत में बदल देती हैं।

यह ‘प्रोएक्टिव’ डिफेंस का बेहतरीन उदाहरण है। मोबाइल रिफ्यूलिंग और पोर्टेबल एटीसी जैसी तैयारियाँ यह बताती हैं कि भारत अब किसी घटना के होने का इंतजार नहीं करता, बल्कि संभावित युद्ध की तैयारी शांति काल में ही पूरी कर लेता है। यह उस ‘न्यू इंडिया’ की तस्वीर है जो शांति का पक्षधर तो है, लेकिन अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए अपनी सड़कों को भी रणक्षेत्र बनाने का दम रखता है। पूर्वोत्तर अब भारत की सुरक्षा का सबसे मजबूत ढाल बन चुका है।

जन्म से तय जाति बदलती नहीं, चाहे धर्म बदल जाए: इलाहाबाद HC, समझें- कैसे इस फैसले का हो सकता है गलत इस्तेमाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने  मंगलवार (10 फरवरी 2026) को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति जन्म से तय होती है और अंतरजातीय विवाह या धर्म परिवर्तन के बाद भी नहीं बदलती।

यह टिप्पणी जस्टिस अनिल कुमार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला एक अनुसूचित जाति (SC) की महिला से जुड़ा है, जिसने अपनी जाति से बाहर विवाह किया था।

इस केस में दिनेश और आठ अन्य लोगों ने SC/ST एक्ट के तहत विशेष जस्टिस के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसकर हमला) और 354 (महिला की मर्यादा भंग करने की कोशिश) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया गया था। हालाँकि हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।

महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने उसके साथ मारपीट की, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। उसने शिकायत में बताया कि इस घटना में वह समेत तीन लोग घायल हुए थे। यह घटना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुई थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR और शिकायत में बताई गई दोनों घटनाएँ एक ही दिन और एक ही समय की हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपितों का यह दावा कि शिकायत बदले की भावना से दर्ज कराई गई है, स्वीकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत में साफ तौर पर मारपीट और जातिसूचक गालियों का जिक्र है और तीन लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना सही है।

कोर्ट ने दलीलें सुनीं और अपना फैसला सुनाया

अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और मौजूदा शिकायत से पहले महिला के खिलाफ ही एक FIR दर्ज की गई थी। उनका कहना था कि मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड में मौजूद है, जिससे साबित होता है कि उनके परिवार के अन्य लोग भी इस घटना में घायल हुए थे।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि महिला मूल रूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और वहाँ वह SC/ST समुदाय से संबंधित थी। लेकिन उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी कर ली है। आरोपितों का कहना था कि महिला ने यह सच छिपाया और खुद को अब भी SC/ST समुदाय की सदस्य बताकर मामला दर्ज कराया। उनके अनुसार, जब उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया, तो वह खुद को SC/ST समुदाय की महिला नहीं बता सकती।

आरोपितों ने आगे कहा कि किसी दूसरी जाति में विवाह करने के बाद महिला अपनी मूल जाति खो देती है और पति की जाति में शामिल हो जाती है। इसलिए उनके खिलाफ SC/ST एक्ट समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

हालाँकि कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में क्रॉस-केस (दोनों पक्षों की ओर से दर्ज मुकदमा) होना, दूसरी पार्टी की शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बनता। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपितों को तलब करने में कोई अवैधता नहीं है।

कोर्ट ने साफ कहा कि यह तर्क कि जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी करने के बाद महिला ने अपनी जाति खो दी, पूरी तरह बेबुनियाद है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन उसकी जाति नहीं बदलती। विवाह से भी जाति में कोई बदलाव नहीं होता। इसलिए आरोपितों की यह दलील टिकाऊ नहीं है। इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

विशेष न्यायाधीश, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का आदेश

SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट की कोर्ट में विशेष न्यायाधीश संजीव कुमार सिंह ने 27 जुलाई 2022 को ज्योतिराय देवी की शिकायत पर फैसला सुनाया। ज्योतिराय देवी ने कोर्ट से माँग की थी कि दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष, रिंकू, राजेश देवी और मंजू देवी को मुकदमे के लिए तलब किया जाए और उन्हें सजा दी जाए।

ज्योतिराय देवी ने खुद को अनुसूचित जाति (SC) का बताया और आरोप लगाया कि आरोपित जाट समुदाय के प्रभावशाली लोग हैं। कोर्ट के आदेश में दर्ज है कि पिछले साल उन्होंने गाँव प्रधान का चुनाव लड़ा था, जिसके बाद से आरोपितों से उनकी रंजिश चल रही थी।

शिकायत के मुताबिक 6 सितंबर 2021 को वह अपने घर के आंगन में खाना बना रही थीं, तभी उनके आंगन में कुछ ईंटें फेंकी गईं। उन्होंने इसका विरोध किया तो आरोप है कि दिनेश और महेंद्र लाठी लेकर घर में घुस आए।

भारत भूषण के पास देसी तमंचा था, टिकेश के हाथ में लोहे की पाइप थी, अजीत के पास हंसिया था और शुभम व रिंकू ईंट और डंडे लिए हुए थे। वहीं राजेश देवी के हाथ में भी ईंट थी और मंजू देवी भी डंडा लिए हुए बताई गईं।

शिकायत के अनुसार, आरोपित ने ज्योतिराय देवी और उनके परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की और गाली-गलौज की। आरोप है कि वह गाँव में खुलकर अपनी बात रखती थीं और खुद को एक नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही थीं, इसी वजह से आरोपित उन्हें सबक सिखाना चाहते थे।

शिकायत में कहा गया कि आरोपितों ने उन्हें धक्का देकर गिरा दिया और आपत्तिजनक बातें कहीं। इसी दौरान दिनेश ने उनके साथ अश्लील हरकत करते हुए उनके निजी अंगों को पकड़ लिया। वहीं महेंद्र, सतीश, राजेश देवी और मंजू देवी ने लाठी-डंडों और ईंटों से उनकी पिटाई की।

आरोप यह भी है कि भारत भूषण ने जान से मारने की नीयत से उनके परिवार वालों पर फायरिंग की। हालाँकि वे बाल-बाल बच गए, लेकिन ज्योतिराय देवी को चोटें आईं। शोर सुनकर पड़ोस के धर्मवीर और सीताराम मौके पर पहुँचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। इस दौरान आरोपितों ने उन्हें भी धमकाया और ज्योतिराय देवी को जान से मारने की धमकी देते हुए वहाँ से चले गए।

पुलिस शिकायत और कोर्ट के फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं

शिकायत में यह भी कहा गया कि घटना के बाद ज्योतिराय देवी रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुँचीं, लेकिन पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्होंने 21 सितंबर 2021 को अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को लिखित आवेदन दिया। हालांकि, इसके बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

मामले में ज्योतिराय देवी का बयान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज किया गया। उन्होंने अपने, विष्णु कुमार और रमेश की मेडिकल जाँच के रिपोर्ट की फोटोकॉपी भी SSP को सौंपने की बात कही।

इससे पहले उन्होंने धारा 156(3) CrPC के तहत भी एक आवेदन दिया था, जिस पर पुलिस स्टेशन से रिपोर्ट तलब की गई। उस रिपोर्ट में बताया गया कि दिनेश ने अलीगढ़ जिले के खैर थाने में आईपीसी की धाराएँ 147, 323, 308, 504 और 506 के तहत उनके पति विष्णु कुमार और आठ अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।

ज्योतिराय देवी ने अपने बयान में कहा कि संबंधित मेडिकल रिपोर्ट भी दी गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के लिए सभी विपक्षी पक्ष जिम्मेदार हैं। हालाँकि, उनके गवाह और पति विष्णु कुमार ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि राजेश देवी और मंजू देवी इस अपराध में शामिल थे। इस आधार पर उनके खिलाफ समन जारी करना उचित नहीं बताया गया।

फिर भी आदेश में कहा गया कि शिकायत से जुड़े साक्ष्यों की जांच के आधार पर IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसलिए उन्हें ट्रायल के लिए तलब करना उचित है।

कोर्ट ने दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष और रिंकू को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया।

कोर्ट ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर आवश्यक प्रतिरक्षा/दस्तावेज प्रस्तुत करे। साथ ही आरोपितों को 18 सितंबर 2022 को निर्धारित अगली सुनवाई में उपस्थित होने का भी आदेश दिया गया।

लोटन सिंह की FIR में विष्णु और उसके साथियों पर आरोप

मथना गाँव के लोटन सिंह (पुत्र भगवान सहाय) ने 7 सितंबर 2021 को खैर थाने में एक FIR दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि गाँव प्रधान (प्रधानी) के चुनाव में वोट न देने को लेकर विष्णु और उसके साथियों से उनकी रंजिश चल रही थी।

अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि 6 सितंबर 2021 की शाम करीब 6:30 बजे श्याम सिंह (पुत्र रमेश), जुगेंद्र सिंह (पुत्र रामलाल), विष्णु, सीताराम, महेंद्र सिंह, लाल सिंह उर्फ लालू (पुत्र यशवीर), हरीकिशन उर्फ कालू और श्याम सिंह उर्फ श्याम लाठी-डंडे और ईंट लेकर जबरन उनके घर में घुस आए और मारपीट शुरू कर दी।

उन्होंने आगे बताया कि शोर सुनकर गिर्राज के बेटे दिनेश और देवदत्त के बेटे सतीश बीच-बचाव के लिए पहुँचे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें भी पीट दिया। शिकायतकर्ता के अनुसार, “मेरे बेटे भारत और दिनेश को बुरी तरह पीटा गया। उनके सिर में गंभीर चोटें आई हैं और मुझे भी चोटें लगी हैं।”

उन्होंने आरोप लगाया कि मारपीट बेहद क्रूर थी। “मैं गंभीर हालत में थाने पहुँचा था। कल रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सका, इसलिए आज आया हूँ,” उन्होंने सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए कहा। इस मामले में पुलिस ने IPC की धाराएँ 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 308 (गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास) और 452 (घर में घुसकर हमला) के तहत केस दर्ज किया।

इस फैसले से दलित ईसाई आरक्षण का रास्ता खुल सकता है

यह फैसला भले ही दो पक्षों के बीच विवाद को सुलझाने के संदर्भ में दिया गया हो, लेकिन इसके सामाजिक असर हो सकते हैं। खासतौर पर कोर्ट की यह टिप्पणी कि अंतरजातीय विवाह के बाद भी महिला की SC/ST जाति की पहचान बनी रहती है और धर्म परिवर्तन से भी जाति नहीं बदलती कई नई बहसों को जन्म दे सकती है।

इस व्याख्या के आधार पर आशंका जताई जा रही है कि वे लोग जिन्होंने ईसाई या अन्य धर्म अपनाया है, वे भी SC/ST आरक्षण में हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं, जबकि मौजूदा व्यवस्था के तहत यह लाभ मुख्य रूप से हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय के अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के लिए निर्धारित है।

गौरतलब है कि पहले सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी जाति की पहचान खो देता है। कोर्ट ने कहा था कि “धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को उसकी पूर्व जाति से नहीं पहचाना जा सकता।” साथ ही यह भी रेखांकित किया गया था कि आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। यहाँ तक कि केवल आरक्षण लाभ पाने के लिए हिंदू धर्म में वापस आना भी संविधान के साथ छल माना गया है।

भारतीय अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बन चुके हैं, वे SC आरक्षण के हकदार नहीं हैं। पिछले वर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे लोगों की पहचान करें जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बावजूद SC दर्जे का लाभ लिया है, इसे संविधान के साथ धोखा बताया गया था।

दूसरी ओर, सैद्धांतिक रूप से ईसाई धर्म या अन्य मजहबों में जाति व्यवस्था नहीं मानी जाती। लेकिन भारत में ईसाई समुदाय के भीतर भी सामाजिक स्तर पर जातिगत पहचान देखने को मिलती है। कई लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी पुरानी जातिगत पहचान को सामाजिक रूप से बनाए रखते हैं और इसी आधार पर आरक्षण की माँग उठती रहती है।

आलोचकों का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म त्याग देता है, तो उसके साथ जुड़ी मूल सामाजिक संरचना को भी छोड़ना चाहिए। वहीं, यह भी कहा जाता है कि कुछ मिशनरी संगठनों द्वारा निचली जातियों के हिंदुओं को यह कहकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है कि वहाँ भेदभाव नहीं है। ऐसे में यदि वास्तविकता अलग हो, तो घर वापसी की राह भी खुली रहती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि ईसाई या अन्य धर्मों में परिवर्तित लोगों को भी SC/ST आरक्षण का लाभ दिया जाता है, तो इससे उन हिंदू SC/ST समुदायों पर सीधा असर पड़ेगा जो पहले से सीमित सीटों और नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। नए दावेदार जुड़ने से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अवसर और कम हो सकते हैं, जिससे पहले से वंचित वर्गों के लिए आगे बढ़ना और मुश्किल हो जाएगा।

कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि सरकार हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों से ही कर और दान का प्रबंधन करती है, इसलिए आरक्षण को हिंदू समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का एक माध्यम माना जाता है। ऐसे में यदि आरक्षण का दायरा बिना स्पष्ट नीति के व्यापक किया गया, तो उसके मूल उद्देश्य और स्वरूप पर असर पड़ सकता है।

इस तरह, इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले में की गई टिप्पणियाँ आगे चलकर कई कानूनी और सामाजिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकती हैं, खासकर हिंदू SC/ST समुदाय से जुड़े आरक्षण के प्रश्न पर।

( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )

ब्राह्मण विरोधी नफरत, कश्मीरी पंडितों का मजाक और विक्टिम कार्ड: अंबेडकरवादी लक्ष्य लेकी ने की साइबर बुलिंग, वकील ट्यूलिप शर्मा ने दर्ज कराई शिकायत

खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले लक्ष्य लेकी सोशल मीडिया पर विवादों में घिर गए हैं। IIM इंदौर से पढ़े और TedX स्पीकर लक्ष्य के खिलाफ क्रिमिनल लॉयर और इन्फ्लुएंसर ट्यूलिप शर्मा ने साइबर शिकायत दर्ज कराई है। उस पर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत फैलाने, जातिगत गालियाँ देने और महिलाओं को अपमानजनक मैसेज भेजने का आरोप है।

ऑपइंडिया से बातचीत में ट्यूलिप ने शिकायत के बारे में कहा कि ऐसा करना जरूरी था, क्योंकि लक्ष्य जैसे लोग एक जगह पर नहीं रुकते, वो लगातार ऐसी हरकतें करते रहते हैं।

लक्ष्य लेकी आईआईएम इंदौर के ग्रेजुएट हैं और टीईडीएक्स स्पीकर भी रह चुके हैं। वे ‘लक्ष्य स्पीक्स’ नाम से इंस्टाग्राम पेज और यूट्यूब चैनल चलाते हैं। इंस्टाग्राम पर उनके लगभग 5 लाख 53 हजार फॉलोअर्स हैं और यूट्यूब पर 14 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर्स।

ट्यूलिप ने भारतनाट्यम और देवदासी पर उसके दावों पर उठाए सवाल, तो लक्ष्य ने ब्राह्मणों को दी गालियाँ

ट्यूलिप शर्मा ने गुरुवार (12 फरवरी 2026) को अपने इंस्टाग्राम हैंडल @_tulipsharma पर एक वीडियो डाला। इसमें उन्होंने बताया कि लक्ष्य लेकी काफी समय से जाति-विरोध के नाम पर ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। उन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी है और इंटरनेट पर नफरत कोई नई बात नहीं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब कोई विरोधी राय बर्दाश्त न कर सके। वे ऐसे इन्फ्लुएंसर हैं जो अगर कोई उनके पोस्ट पर विरोधी कमेंट करे तो डीएम में आकर गंदी-गंदी बातें करते हैं।

ट्यूलिप ने बताया कि सब कुछ 11 फरवरी को शुरू हुआ जब लक्ष्य लेकी ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो डाला। उसमें उन्होंने दावा किया कि भारतनाट्यम को ब्राह्मणों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि भारतनाट्यम ब्राह्मणों की सांस्कृतिक चोरी है, असली डांस सदिर अट्टम या दासी अट्टम था जो देवदासियां करती थीं। उनका कहना था कि तमिल ब्राह्मण महिला रुक्मिणी देवी ने उस डांस के सेक्सुअल/इरोटिक हिस्से को हटा दिया, उसे साफ-सुथरा बना दिया, लेकिन ऐसा करते हुए सदिर अट्टम की असली जड़ों से इसे अलग कर दिया।

इसके जवाब में ट्यूलिप शर्मा ने कमेंट किया, “आपकी लॉजिक के मुताबिक, ‘ब्राह्मण’ महिला रुक्मिणी देवी ने देवदासियों के यौन शोषण के चक्र को खत्म कर दिया। अब इसमें समस्या क्या है? एक तरफ आप इसे दमनकारी व्यवस्था मानते हैं, फिर कोई सुधार करे तो भी समस्या है सिर्फ इसलिए कि सुधार करने वाली ‘ब्राह्मण’ है। हंसते हुए। जिंदगी में थोड़ी क्लैरिटी लाओ और व्हाट्सएप नॉलेज पर निर्भर मत रहो।”

लेकिन ट्यूलिप शर्मा के तर्क का तथ्यों से जवाब देने की बजाय लक्ष्य लेकी उनके डीएम में घुस आए और जातिगत गालियाँ देने लगे। अपने दावे के समर्थन में शर्मा ने बातचीत के स्क्रीनशॉट और स्क्रीन रिकॉर्डिंग भी शेयर किए।

ट्यूलिप शर्मा ने बताया कि बात ब्राह्मण लड़कियों की भी नहीं थी, फिर भी लक्ष्य लेकी अपनी ब्राह्मण एक्स गर्लफ्रेंड्स के बारे में डींगें हाँकने लगे। ट्यूलिप ने कहा, “बात ब्राह्मण लड़कियों की नहीं थी लेकिन लक्ष्य लेकी अपनी सारी एक्स को ब्राह्मण बताकर बहस जीतना चाहते थे। पूरी कम्युनिटी की लड़कियों को इस्तेमाल करके बहस जीतना दिखाता है कि वे कितने बड़े जातिवादी हैं।”

लक्ष्य लेकी की ब्राह्मण लड़कियों को ऑब्जेक्ट बनाने वाली सोच को और एक्सपोज करते हुए शर्मा ने बताया कि वो जाति खत्म करने के लिए ‘अंतरजातीय बच्चे’ पैदा करने की बात कर रहा था।

सोर्स: ट्यूलिप शर्मा का वीडियो

शर्मा ने वीडियो में कहा, “उनका पूरा प्रोफेशन ही ब्राह्मणों को गालियाँ देने पर टिका है और फिर वे अपनी ब्राह्मण एक्स के बारे में डींग मारते हैं। वे और आगे बढ़कर कहते हैं कि अंतरजातीय बच्चे बनाकर जाति खत्म कर रहे हैं।” शर्मा ने बातचीत का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।

एक वीडियो में लक्ष्य लेकी ने खुद कहा था कि वे अपनी एससी/एसटी कम्युनिटी के बाहर डेट करने की हिम्मत नहीं रखते, लेकिन ट्यूलिप शर्मा की एक फीमेल फॉलोअर के मैसेज बॉक्स में उसने लिखा, “ब्राह्मण गर्लफ्रेंड मुझे ब्लो जॉब देती है, प्रॉब्लम?”

ट्यूलिप शर्मा की इंस्टाग्राम स्टोरी से

कई पब्लिकली शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने ट्यूलिप शर्मा को डीएम में लिखा, “होली चॉप्ड, ब्राह्मण लड़की के लिए तुम बहुत बदसूरत हो।” एक और मैसेज में उन्होंने लिखा, “मेरी गर्लफ्रेंड तुमसे कहीं ज्यादा खूबसूरत है। तुम तो बॉयफ्रेंड वाली भी नहीं लगतीं।”

एक और मैसेज में लक्ष्य ने लिखा, “4 ब्राह्मण एक्स, सब तुमसे ज्यादा खूबसूरत।”

इस बीच ट्यूलिप शर्मा ने अपने फॉलोअर्स को बताया कि उन्होंने आईटी एक्ट और संबंधित बीएनएस सेक्शन के तहत लक्ष्य लेकी के खिलाफ साइबर शिकायत दर्ज करा दी है।

बैकलैश के बीच लक्ष्य लेकी ने दावा किया कि ट्यूलिप शर्मा ने उनके जातिवादी और अपमानजनक मैसेज के जो स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं, वे फेक हैं। उनका कहना है कि उन्हें फर्जी केस में फंसाने की कोशिश हो रही है।

एक और वीडियो में लक्ष्य ने फिर दोहराया कि शर्मा के साथ उनकी चैट के सारे स्क्रीनशॉट फेक हैं। इस अंबेडकरवादी जाति एक्टिविस्ट ने विक्टिम कार्ड खेला और खुद की तुलना रोहित वेमुला से कर दी।

लक्ष्य ने कहा कि रोहित वेमुला के साथ भी इसी तरह की तरकीबें इस्तेमाल की गई थीं। लक्ष्य का रोहित वेमुला से अपनी तुलना करना बहुत बेशर्मी भरा था, क्योंकि असल में तेलंगाना पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट में कहा गया था कि वेमुला एससी जाति से नहीं थे।

अक्सर घटिया प्रोपेगेंडा करता रहा है लक्ष्य लेकी

ज्यादातर कथित जाति-विरोधी ‘एक्टिविस्ट्स’ की तरह लक्ष्य लेकी भी जाति श्रेष्ठता के विरोध के नाम पर ब्राह्मणों को निशाना बनाता रहा है। एक वीडियो में उसने कहा कि दूसरे देशों में वेजिटेरियन होते हैं लेकिन भारत में ‘प्योर वेजिटेरियन’ होते हैं। ब्राह्मणों के शाकाहार से जुड़े धार्मिक विश्वास पर हमला करते हुए उसने कहा, “केवल भारत में ही ‘प्योर वेजिटेरियन’ का कॉन्सेप्ट है। क्योंकि यहाँ शाकाहार सिर्फ जानवरों के बारे में नहीं है। ये शुद्धता, श्रेष्ठता और जाति के बारे में है। ये कहने के बारे में है कि मैं भगवान के ज्यादा करीब हूँ और तुम मांस खाने वाले दलित कम हो। वो ब्राह्मणवादी नजरिया तो वीगन लोगों में भी दिखता है जब वे दलित एक्टिविस्ट्स को वीगन न होने पर शर्मिंदा करते हैं।”

लक्ष्य ने ये नैरेटिव फैलाया कि ‘प्योर’ शब्द का मतलब जातिगत श्रेष्ठता या भगवान से ज्यादा निकटता है, जबकि असल में ये सिर्फ शाकाहार में सख्ती को दिखाता है।

जुलाई 2025 में एक पॉडकास्ट में लक्ष्य ने दावा किया कि ब्राह्मणों ने मराठा योद्धा राजा छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भेदभाव किया। उसका कहना था कि ब्राह्मणों ने शिवाजी की जाति की वजह से उनका राजतिलक करने से इनकार कर दिया था और उन्हें बनारस से पुजारी बुलाने पड़े।

ये दावा कट्टर ‘जाति-विरोधी’ एक्टिविस्ट्स द्वारा गढ़ा गया ब्राह्मण-विरोधी नैरेटिव का हिस्सा है। हकीकत में स्थानीय ब्राह्मणों ने शिवाजी का ताज नहीं ठुकराया था क्योंकि उन्हें उनकी जाति से कोई समस्या थी, बल्कि इसलिए कि उन्हें ऐंद्रेय राजाभिषेक करना नहीं आता था। इसलिए बनारस से गागाभट्ट को बुलाया गया। ध्यान देने वाली बात ये है कि गागाभट्ट भी मराठी ब्राह्मण थे, उनका परिवार महाराष्ट्र के पैठण से था। छत्रपति शिवाजी महाराज के राजतिलक को लेकर विवाद वैदिक रीति बनाम तांत्रिक रीति को लेकर था।

अपने एक एक्स पोस्ट में लक्ष्य ने यादवों को हिंदू धर्म छोड़ने के लिए उकसाया क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर उनके साथ शादी के रिश्ते नहीं जोड़ते। उसने लिखा, “और यादव, अपनी राजनीतिक ताकत और क्षत्रियता के दावों के बावजूद, ठाकुरों और ब्राह्मणों द्वारा बराबर नहीं माने जाते। कोई अंतरजातीय शादी नहीं। कोई सम्मान नहीं। सिर्फ ग्रेडेड इनइक्वालिटी। मेरे यादव भाइयों और बहनों इस जाति पिरामिड का हिस्सा बनने की कोशिश मत करो।”

आश्चर्य की बात नहीं कि लक्ष्य लेकी 2020 के दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित उमर खालिद का फैन है। उन्होंने मुस्लिम विक्टिमहुड का नैरेटिव फैलाया और कन्हैया कुमार के राजनीतिज्ञ बनने की तुलना उमर खालिद के जेल में रहने से की, सिर्फ इसलिए कि खालिद मुस्लिम है।

खालिद की लंबी जेल पर दुख जताते हुए लक्ष्य ने लिखा, “दो स्टूडेंट लीडर्स। एक ही कैंपस। एक जैसे आरोप। लेकिन दो बहुत अलग किस्मत। कन्हैया कुमार आजाद हैं, मुख्यधारा की राजनीति में आ गए। उमर खालिद, एक मुस्लिम, बेल के बिना 5 साल जेल में। ये संयोग नहीं है। भारत में मुस्लिम होने की कीमत है।”

दिलचस्प बात ये है कि लक्ष्य ने कहा कि उमर खालिद ‘मुस्लिम होने की कीमत’ चुका रहा है, जबकि खालिद खुद को नास्तिक बताता रहा है।

इस्लामो-लेफ्टिस्टों द्वारा उमर खालिद के लिए समर्थन और सहानुभूति जुटाने के लिए फैलाए जा रहे झूठे नैरेटिव के विपरीत ऑपइंडिया ने पहले रिपोर्ट किया था कि 2023 और 2024 में 14 स्थगनों में से 7 स्थगन खुद उमर खालिद ने माँगे थे। इसलिए जमानत वापस लेना ‘देरी’ की वजह से नहीं था। जबकि इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम ‘अन्याय’ का रोना रोता रहता है, असल में आरोपित के वकील की नाकाम कोशिशों की वजह से खालिद इतने दिनों से जेल में हैं।

दरअसल, भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इस साल कहा था कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक ग्रुप्स की सोच में है जो अपने केस सिर्फ कुछ खास जजों से सुनवाना चाहते हैं। ऑपइंडिया ने बार-बार रिपोर्ट किया है कि खालिद की लीगल टीम ने फरवरी 2024 में ‘परिस्थितियों में बदलाव’ का हवाला देकर जमानत अर्जी वापस लेने से पहले कम से कम सात बार स्थगन माँगा था।

कई सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा शेयर किए गए स्क्रीनशॉट्स के मुताबिक लक्ष्य लेकी ने 1990 के दशक में इस्लामी आतंकवादियों द्वारा कश्मीरी पंडितों के सामूहिक नरसंहार और पलायन का भी मजाक उड़ाया। एक कमेंट के जवाब में लक्ष्य ने लिखा, “कश्मीर ब्राह्मणों का यही हालत था।” एक और में लिखा, “मुझे कुछ नहीं होगा, तुम्हारे कश्मीरी पंडित भाइयों की तरह।”

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

IIT पटना की प्रोफेसर डॉ प्रियंका त्रिपाठी कर रही सनातन को बदनाम, एजेंडा फैलाने में किया ‘शक्ति’ का इस्तेमाल: रिसर्च पेपर में हिंदुओं को बनाया निशाना

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) पटना उस समय विवादों में आ गया जब पता चला कि उसकी कर्मचारी डॉ. प्रियंका त्रिपाठी ने हिंदू शास्त्रों को तोड़-मरोड़कर अपना घिनौना एजेंडा आगे बढ़ाया है। रिसर्च पेपर में कहा गया है, “युगों से हिंदू मिथोलॉजी में प्रकृति को भारत में स्त्रीत्व से बहुत निकटता से जोड़ा गया है, और यह लेख यह विस्तार से बताएगा कि यह लेस्बियन अनुभवों को हेट्रोनोंमेटिव प्रकृति और पुरुष (शाब्दिक अर्थ पुरुष) द्वंद्व से परे शक्ति (यानी पावर) का वैकल्पिक स्रोत कैसे ऊर्जा प्रदान करता है।”

यह आपत्तिजनक बयान प्रियंका त्रिपाठी और छंदिता दास ने लिखा है। पेपर का शीर्षक है “(एन)क्वीयरिंग प्रकृति: डीकोलोनियल इकोफेमिनिज्म और लेस्बियन सब्जेक्टिविटी इन आउट! स्टोरीज फ्रॉम द न्यू क्वियर इंडिया” और यह अंतरराष्ट्रीय जर्नल “फेमिनिस्ट एनकाउंटर्स: ए जर्नल ऑफ क्रिटिकल स्टडीज इन कल्चर एंड पॉलिटिक्स” में प्रकाशित हुआ है। लेखकों ने यह भी दावा किया, “क्वियर इको-फेमिनिज्म के डीकोलोनियल संदर्भ में शक्ति न केवल फिक्स्ड हेट्रोसेक्शुअल कैटेगरी को प्रतिरोध दे सकती है, बल्कि क्वियर सब्जेक्टिविटी और सस्टेनेबिलिटी के संभावित रास्ते भी बना सकती है।”

पेपर में आगे कहा गया, “मुख्य रूप से प्रजातियों के बीच फ्लुइडिटी और इंटरकनेक्टिविटी पर साझा जोर, बाइनरी मैकेनिज्म से परे, यही वजह है कि डीकोलोनियल भारतीय अवधारणा प्रकृति और क्वियर इकोफेमिनिज्म गहराई से जुड़े हैं।” फिर आगे लिखा है, “प्रकृति और उससे जुड़े शक्ति के आध्यात्मिक विश्वास के डीकोलोनियल लेंस से लेस्बियन इकोफेमिनिज्म का पुनर्निर्माण प्रभावी हो सकता है, क्योंकि यह हर महिला और उसके पृथ्वी पर संबंधों की मौजूदगी को पारंपरिक अन्यिंग के तरीके से परे प्रशंसा करने की संभावनाएं देता है।”

इसी तरह लिखा गया, “लेस्बियन को प्रकृति के रूप में या प्रकृति में पहचानने की यह उत्तेजना उन्हें शक्ति से सशक्त बनाती है।” पेपर ऐसे ही हिंदू धर्म के मूल मूल्यों पर खुले हमलों से भरा हुआ है, ऐसी आजादी जो किसी अन्य धर्म के साथ नहीं ली जा सकती क्योंकि ‘सर तन से जुदा’ का डर रहता है।

इसके अलावा लेखिकाओं ने हिंदुत्व पर हमला करने और हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने का मौका नहीं छोड़ा और लिखा, “ऐसे मामलों में अक्सर उम्मीद की जाती है कि व्यक्तिगत चुनाव की आजादी और पहले से तय सामाजिक मानकों को जबरदस्ती सामंजस्य में लाया जाए। इससे छद्म पारिवारिक सम्मानजनकता और हिंदुत्व के बढ़ते कोड के तहत हेट्रोसेक्शुअल भारतीयता का निर्माण सुनिश्चित होगा (भरुचा, 1995; जुलुरी, 1999)।”

दास और त्रिपाठी ने हिंदू विश्वास के मूल सिद्धांतों के बार-बार उल्लंघन में कहा, “मौत में भी उनकी एकता, प्रकृति की गोद में, लेस्बियनिज्म की ऊँची शक्ति को दर्शाती है जो हर अनिवार्य दबाव को अस्वीकार करती है, ताकि परंपरा से बेहतर मौत को चुना जाए। यह निर्माण पश्चिमी साहित्य में बीसवीं सदी के मध्य में आम त्रासद लेस्बियन कहानी के मोटिफ पर आधारित है, लेकिन यहाँ हम यह भी तर्क दे रहे हैं कि इन युवा महिलाओं के लिए मौत मुक्ति है, सिर्फ विनाश नहीं। चुनी गई कहानियों में प्राकृतिक स्थानों में क्वियर प्रकृति का पुनर्निर्माण बहुत जानबूझकर किया गया है।”

प्रियंका त्रिपाठी कौन हैं?

प्रियंका त्रिपाठी ने आईआईटी खड़गपुर से पीएचडी की है। वे आईआईटी पटना में अंग्रेजी की एसोसिएट प्रोफेसर हैं और पहले ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज विभाग की हेड भी रह चुकी हैं। वे अमेरिका के ब्रिजवाटर स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित जर्नल ऑफ इंटरनेशनल विमेंस स्टडीज की फेलोशिप कोऑर्डिनेटर भी हैं।

आधिकारिक वेबसाइट ने बताया कि इसके अलावा वे जर्नल ऑफ ग्राफिक नॉवेल्स एंड कॉमिक्स (टेलर एंड फ्रांसिस) और ग्लोबल साउथ लिटरेरी स्टडीज (टेलर एंड फ्रांसिस) की एसोसिएट एडिटर हैं।

वेबसाइट ने बताया कि त्रिपाठी को पहले चार्ल्स वॉलेस इंडिया ट्रस्ट विजिटिंग फेलोशिप (2024-25) यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के स्कूल ऑफ हिस्ट्री और आईपीडी विजिटिंग रिसर्च फेलोशिप (2022-23) यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज इन द ह्यूमैनिटीज में मिल चुकी हैं।

वेबसाइट पर लिखा है, “उनकी ब्लूम्सबरी के साथ मोनोग्राफ है द जेंडर्ड वॉर: इवैल्यूएटिंग फेमिनिस्ट एथनोग्राफिक नैरेटिव्स ऑफ द 1971 वॉर ऑफ बांग्लादेश (2022)। नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ उनकी आने वाली मोनोग्राफ है- मन की बात एंड भारतीय आर्ट, कल्चर एंड हेरिटेज। वे मेडिकल ह्यूमैनिटीज, जेंडर स्टडीज, साउथ एशियन फिक्शन और ग्राफिक नॉवेल्स के क्षेत्र में काम करती हैं।”

पितृसत्ता का विरोध करने के नाम पर हिंदू धर्म का मजाक उड़ाना

त्रिपाठी ने अपनी गहरी समझ के साथ घोषणा की कि हिंदू पुरुषों ने जब पारंपरिक मातृसत्तात्मक हिंदू समाज में जीवन पोषण में अपनी भूमिका समझी तो शिवलिंग (फैलस) की पूजा शुरू की। इसके बाद उन्होंने अपने लेख ‘विमेन एंड वूंडेड सेल्फ: एक्सप्लोरिंग इंडियन विमेंस शॉर्ट फिक्शन इन इंग्लिश’ में हिंदू विवाह व्यवस्था और महिलाओं के दमन पर जहरीला प्रवचन लिखा है।

उन्होंने अपेक्षित रूप से हिंदू मिथोलॉजी और शास्त्रों का सहारा लेकर महिलाओं को पुरुषों से कमतर और दबाया हुआ दिखाने की अपनी तोड़ी-मरोड़ी कहानी साबित करने की कोशिश की। इन आरोपों में वैदिक काल में लड़कियों के जन्म के साथ चिंता और पोस्ट-वैदिक काल में इसे विपदा मानने के संदर्भ शामिल थे, जो घरेलू हिंसा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के दौरान किए गए।

त्रिपाठी को ‘पितृसत्तात्मक’ हिंदू समाज से भी काफी नफरत लगती है। उन्होंने दास के साथ सह-लिखित ‘एक्सप्लोरिंग द मार्जिंस ऑफ कोठा कल्चर: रिकंस्ट्रक्टिंग अ कोर्टेसन लाइफ इन नीलम सरन गौर की रेक्विम इन रागा जानकी’ में कोठा संस्कृति की तारीफ की।

दोनों ने आरोप लगाया, “महिलाओं का ऐसा अन्यीकरण हिंदू पितृसत्तात्मक समाजों का भी स्वाभाविक हिस्सा है जो मानते हैं कि महिलाएं अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकतीं, जिसमें मनुस्मृति पूरी तरह डींग मारती है कि बचपन में महिला पिता की, युवावस्था में पति की और बुढ़ापे में बेटे की होती है (घोष, मनुस्मृति)।”

पेपर ने तो यहाँ तक कह दिया, “भारतीय घरों के विपरीत जहाँ लड़कियों को समझौता करना सिखाया जाता है, कोठे में महिलाएँ अपने फैसले खुद लेने में ज्यादा अभ्यस्त होती हैं, बंधनों को उलट देती हैं (ओल्डनबर्ग 278)” कोठे की गहरी परेशानियों वाली जिंदगी की चौंकाने वाली तारीफ में।

आईआईटी प्रोफेसर और एंटी-इंडिया ‘टेलर एंड फ्रांसिस’ से रिश्ता

ऊपर लिखी बातें तो सिर्फ बाहरी हैं। असल में त्रिपाठी की भ्रष्ट विचारधारा काफी जहरीली है। जिसमें वो बार-बार हिंदू धर्म, उसकी परंपराओं और रीति-रिवाजों का उपहास करने में आनंद लेती हैं बिना किसी परिणाम के डर के। उनका यूके की कंपनी टेलर एंड फ्रांसिस से गहरा संबंध है जो नियमित रूप से एंटी-इंडिया और हिंदू-विरोधी सामग्री फैलाती है जिसने ‘हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति’ यानी हिंदुत्व को ईसाई समुदाय पर कथित हमलों के लिए जिम्मेदार ठहराया।

कंपनी ने भारतीय लोकतंत्र को ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ कहकर कमजोर किया और मानवाधिकार को लेकर देश को फटकार लगाई। एक अन्य रिलीज के जरिए लिखा गया, “संवैधानिक रूप से गारंटीड अधिकारों का पालन और प्रावधान करें ताकि भारतीय लोकतंत्र के चल रहे क्षरण को रोका जा सके।”

इसने ऐसी ही सामग्री को जगह दी जो देश के आंतरिक मामलों में दखल देती है और नागरिकता संशोधन कानून को भेदभावपूर्ण बताती है। टेलर एंड फ्रांसिस की प्रकाशन ने यूक्रेन पर भारत के संप्रभु रुख को पसंद नहीं किया और रूस से उसके मजबूत संबंध को ‘घरेलू राजनीतिक थिएटर’ से जोड़ा

निष्कर्ष

त्रिपाठी के आचरण का सच अब सामने आ गया है, लेकिन हकीकत यह है कि वे लंबे समय से ये हरकतें कर रही हैं। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान उनके जैसे तत्वों से भरे हैं जो हिंदू धर्म को दुनिया की हर बुराई से जोड़ने की कोशिश करते हैं और साथ ही इसे अपने खतरनाक एजेंडे को आगे बढ़ाने के प्लेटफॉर्म के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

यही बात उनके रिसर्च पेपर्स और काम में योगदान देने वालों से भी साफ है। इसलिए यह न सिर्फ सरकार बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि इसका भविष्य ऐसे समस्या वाली मानसिकता वाले लोगों के हाथ में है।

( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )