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मर्दाना जिस्म में छिपी ‘औरतों’ को नहीं मिलेगी पहचान, असली किन्नरों के पास ही होंगे सारे अधिकार: ‘ट्रांसजेंडर पर्सन्स संशोधन बिल 2026’ पास, जानिए हर डिटेल

केंद्र की मोदी सरकार ने एक ठोस कदम उठाते हुए ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल 2026 पास कर दिया है। इस कानून के जरिए देश में जेंडर पहचान को लेकर नियमों और अधिकारों को और साफ और मजबूत बनाने की कोशिश की गई है। सरकार का कहना है कि इस बिल का मकसद उन लोगों तक सुरक्षा और अधिकार पहुँचाना है, जो अपनी बॉयोलॉजिकल या सामाजिक पहचान के कारण भेदभाव का सामना करते हैं। साथ ही इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएँ भी आसान और स्पष्ट होंगी।

इस नए कानून में नुकसान या अपराध की गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग सजा (ग्रेडेड पनिशमेंट) का प्रावधान भी रखा गया है, ताकि न्याय ज्यादा संतुलित तरीके से दिया जा सके। कुल मिलाकर, सरकार इसे एक ऐसे कदम के रूप में पेश कर रही है, जो हाशिए पर खड़े समुदायों को मुख्यधारा में लाने और उनके अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में मदद करेगा।

अब जब दुनिया के कई देशों में जेंडर पहचान को लेकर बहस और उलझन बढ़ती जा रही है, भारत ने एक अलग रास्ता चुना है। सरकार ने साफतौर पर नियम तय करने और भ्रम खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल, 2026 के जरिए मोदी सरकार ने जेंडर पहचान से जुड़े कानूनों में स्पष्टता लाने की कोशिश की है। इसे सिर्फ बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था को ठीक करने वाला कदम माना जा रहा है।

साल 2019 के पुराने ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट में ‘खुद की महसूस की गई जेंडर पहचान’ को मान्यता दी गई थी। सुनने में यह अच्छा लगा, लेकिन इससे कई जगहों पर भ्रम और प्रशासनिक दिक्कतें पैदा हुईं। 2026 के नए संशोधन का मकसद इन्हीं समस्याओं को दूर करना है। आसान शब्दों में कहें तो अब जेंडर पहचान को लेकर मनमाने तरीके से अपनी पसंद बताने की छूट को सीमित किया गया है और इसे तय करने के लिए ज्यादा स्पष्ट और ठोस नियम बनाए गए हैं।

‘कुछ भी जायज है’ से लकर स्पष्ट परिभाषा तक

इस बिल में सबसे सीधे तरीके से साफ किया गया है कि ट्रांसजेंड व्यक्ति किसे माना जाएगा। पहले यह बात खुली हुई थी। लेकिन अब कानून इसे साफ तरीके से तय करता है। इसमें उन लोगों को शामिल किया गया है जिन्हें सामाजिक या बॉयोलॉजिकल आधार पर पहचाना जा सकता है। पारंपरिक ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे हिजड़ा, किन्नर, अरावनी और जोगता, साथ ही वे लोग जिनके जन्म से ही शरीर में लिंग से जुड़ी अलग विशेषताएँ होती हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें जबरदस्ती किसी पहचान में धकेला गया है।

साथ ही बिल यह भी बिल्कुल साफ करता है कि यह कानून हर तरह की खुद से घोषित की गई या बदलती रहने वाली पहचान को कवर करने के लिए नहीं है। यानी यह स्पष्टता जानबूझकर रखी गई है, ताकि कानून का दायरा साफ और समझने में आसान रहे।

सरकार ने परिभाषा को सख्त क्यों किया?

इस बदलाव के पीछे का कारण भी बिल में साफ बताया गया है। सरकार कहती है कि पहले जो परिभाषा थी, वह बहुत ज्यादा अस्पष्ट और व्यापक थी। इसकी वजह से यह तय करना मुश्किल हो जाता था कि असल में किसे सुरक्षा की जरूरत है और कानून को लागू करना भी कठिन हो जाता था।

सबसे जरूरी बात यह है कि कानून का मकसद हमेशा उन लोगों की मदद करना था जो सच में सामाजिक और व्यवस्था से जुड़ी भेदभाव (डिस्क्रिमिनेशन) का सामना करते हैं, न कि हर नई या बढ़ती हुई पहचान के दावों को शामिल करना।

यह अंतर बहुत जरूरी है। कल्याण से जुड़े कानून सिर्फ आदर्श बातें नहीं होते, बल्कि वे खास जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए बनाए जाते हैं। अगर परिभाषा बहुत ज्यादा बड़ी कर दी जाए, तो जो फायदे सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों के लिए हैं, वे कमजोर पड़ जाते हैं और सही लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाते। सरकार इसी बात को रोकना चाहती है।

बिल में सबसे जरूरी बात: सर्वनाम गिरोह की पहचान राजनीति पर लगाम

इस संशोधन (अमेंडमेंट) का सबसे अहम हिस्सा उसके उद्देश्य और कारण में दिखाई देता है। इसमें कहा गाय है कि एक साफ और सटीक परिभाषा देना जरूरी है और किसी व्यक्ति की पहचान सिर्फ उसकी अपनी पसंद, बदलने वाली विशेषताओं या खुद की घोषित पहचान के आधार पर तय नहीं की जा सकती।

यही इस सुधार की सबसे जरूरी बात है। इसका मतलब है कि अब पहले जैसी ढील नहीं रहेगी, जिससे नीतियों और कानून को लागू करने में उलझन पैदा होती थी। सीधी भाषा में कहें तो, सरकार ने व्यक्तिगत पहचान और कानूनी पहचान के बीच एक साफ लाइन खींच दी है। आप अपनी पहचान जैसे चाहें वैसे रख सकते हैं, लेकिन जब बात कानूनी, सरकारी लाभ और मान्यता की आएगी तो उसके लिए स्पष्ट और जाँचे जा सकने वाले नियम होंगे।

2019 के कानून में क्या गलती हुई?

साल 2019 में जो कानून बना था, वह लोगों की खुद की पहचान पर आधारित था। इसकी वजह से ट्रांसजेंडर की श्रेणी लगातार बढ़ती जा रही थी। सुनने में यह ठीक लगता है, लेकिन असल में इससे कई गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। जैसे कि सरकारी योजनाएँ कैसे लागू की जाएँ? आधिकारिक दस्तावेज कैसे बनाए जाएँ? जब पहचान बदलती रहे और उसे जाँचना मुश्किल हो, तो कानून कैसे लागू किया जाए?

नए संशोधित बिल में यह भी माना गया है कि ऐसी अस्पष्टता की वजह से कई कानूनों को लागू करना कठिन हो गया था और अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं में टकराव भी पैदा हो रहा था। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे गलत इस्तेमाल और असली हकदारों के नुकसान का खतरा बढ़ गया था। जब किसी खास और पहले से वंचित (पीड़ित) समूह के लिए बनाई गई श्रेणी बहुत ज्यादा बड़ी हो जाती है, तो जिन लोगों को सच में मदद की जरूरत है वे पीछे रह जाते हैं। यह संशोधन उसी समस्या को ठीक करने की कोशिश है।

असल जरूरतमंद को दी गई सुरक्षा

कुछ लोग इस बिल को सीमित बताते हैं, लेकिन असल में यह कई मायनों में सुरक्षा को और मजबूत करता है। संशोधित कानून में अब सख्त सजा का प्रावधान है। जैसे किसी का जबरन अंग-भंग करना, किसी को जबरदस्ती ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने पर मजबूर करना, मानव तस्करी और शोषण। इन गंभीर मामलों में, खासकर जब बच्चे शामिल हों, तो सजा उम्रकैद तक हो सकती है।

इससे ध्यान केवल पहचान की बहस से हटकर उन असली समस्याओं पर जाता है, जहाँ कानून की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

निष्कर्ष

ट्रांसजेंडर बिल 2026 का मकसद अधिकारों को कम करना नहीं है। इसका उद्देश्य कानून को साफ़, लागू करने लायक और निष्पक्ष बनाना है। साल 2019 का कानून एक शुरुआत था, लेकिन उसमें कई बातें साफ नहीं थीं। साल 2026 का यह संशोधन उन कमियों को दूर करता है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि सुरक्षा और लाभ सही लोगों तक पहुँचें, गलत इस्तेमाल रुके और कानून में स्पष्टता आए।

इस बिल का सबसे मूल विचार यह है कि बिना साफ परिभाषा के कोई भी कानून ठीक से काम नहीं कर सकता। दुनिया के कई देशों में इस बात को नजरअंदाज करने के कारण समस्याएँ सामने आ रही हैं, लेकिन भारत ने समय रहते इस पर कदम उठाया है।

भारत ने भ्रम की जगह स्पष्टता, अस्पष्टता की जगह ठोस व्यवस्था, और सिर्फ विचारों की जगह सही शासन को चुना है। हो सकता है कि कुछ लोगों को यह पसंद न आए, लेकिन एक सही तरीके से चलने वाले कानून की यही बुनियाद होती है।

इस तरह ट्रांसजेंडर बिल 2026 सिर्फ एक बदलाव नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत पहचान से जुड़े मुद्दों पर क्या रुख अपनाना चाहता है। और शायद यह दुनिया के लिए भी एक दिशा दिखाता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़नें के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

क्या है असम की सत्ता का गणित, कैसे मनोवैज्ञानिक लड़ाई में भारी पड़ रहे CM हिमंता बिस्वा सरमा, क्यों BJP के नेतृत्व वाले NDA के लिए जीत की हैट्रिक आसान?

असम में 9 अप्रैल 2026 को विधानसभा चुनाव  होने जा रहा है। पत्रकार का काम भविष्यवाणी करना नहीं बल्कि परिस्थितियों का विश्लेषण करना होता है। यूँ भी चुनाव अनिश्चितताओं से भरा होता है। फिर भी ऐसे पैटर्न बन जाते हैं, जिससे बदलाव कई बार स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं। ऐसी ही परिस्थिति असम चुनाव में दिख रही है।

असम की राजनीति पर दो दशकों से अधिक समय तक करीब से नजर रखने और पिछले कुछ महीनों से किए गए व्यापक जमीनी अवलोकन के आधार पर कहा जा सकता है कि 4 मई को जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे, तो बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए कम्फर्टेबल बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करती दिखेगी।

यह कोई दूरदर्शिता भी नहीं है। यह संरचनात्मक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक कारकों को जोड़कर देखने का नजरिया है। ये सत्ता पर काबिज एनडीए सरकार की तरफ झुक रहा है।

एजीपी प्रमुख अतुल बोरा और बीपीएफ प्रमुख हाग्रामा मोहिलरी के साथ हिमंता बिस्वा सरमा

एनडीए में भाजपा, असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) शामिल हैं, जो सामूहिक रूप से असम की लगभग सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा स्वयं सबसे अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है, जो गठबंधन के भीतर उसके प्रभुत्व को रेखांकित करता है।

लेकिन इस स्पष्ट एकजुटता के पीछे लेन-देन की राजनीति की कहानी छिपी हुई है। बीजेपी का बीपीएस और उसके प्रतिद्वंदी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल के साथ संबंध असम में गठबंधनों की अस्थिरता की कहानी कह रहा है। 2016 में बीपीएफ का समर्थन करने से लेकर 2020 के बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद चुनावों में यूपीपीएल का समर्थन करने और फिर 2025 में वापस बीपीएफ का समर्थन करने तक, भाजपा ने गठबंधन निर्माण के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाई है।

परिसीमन से राजनीतिक बदलाव तक

असम के चुनावी परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2023 के परिसीमन के दौरान आया। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया गया है, नई सीटें बनीं और जनसांख्यिकीय संतुलन को पुनर्निर्धारित किया गया। हालाँकि ये प्रैक्टिस ऊपरी तौर पर प्रशासनिक प्रतीत होते हैं, लेकिन इनके राजनीतिक परिणाम गहरे हैं।

जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, उनकी संख्या लगभग 35 से घटकर 24 रह गई है। चूँकि मुस्लिम मतदाता परंपरागत रूप से कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के प्रति एकजुट रहे हैं, इसलिए यह कमी विपक्ष की चुनावी क्षमता को सीधे तौर पर कमजोर करती है।

असम की मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से अधिक है। हालाँकि अधिक संख्या में मुस्लिम आबादी होने के बावजूद अब सीटों के मामले में इसका लाभ कम होता जा रहा है। 2021 में कॉन्ग्रेस करीब 30 फीसदी वोट हासिल किए थे, लेकिन केवल 29 सीटें जीती थीं। 2026 में इससे भी बदतर हालत हो सकते हैं।

कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच गठबंधन के अभाव में, यह वोट बैंक बंट सकता है। अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में बहुकोणीय मुकाबले में थोड़े के अंदर से हार-जीत होती है, ऐसे में अनिश्चितता की स्थिति हो सकती है, लेकिन ये जरूरी नहीं है कि ऐसी सीटें विपक्ष ही जीत जाएगी। इसके बजाय एनडीए के लिए मामूली अंतर से जीत हासिल करना ज्यादा आसान होगा।

सीएम सरमा के नेतृत्व का असर

यदि परिसीमन एनडीए की बढ़त के लिए संरचनात्मक आधार प्रदान करता है, तो नेतृत्व इसकी भावनात्मक और राजनीतिक ऊर्जा प्रदान करता है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा अभी भारत में सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों में से एक बनकर उभरे हैं।

सीएम सरमा की लोकप्रियता पारंपरिक पार्टी विचारधाराओं से परे है। उनका शासन मॉडल राज्य में बुनियादी ढाँचे के विकास, कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की सशक्त प्रशासनिक शैली मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है। सड़कें, पुल, स्वास्थ्य सुविधाएँ और डिजिटल सेवा वितरण ने कार्यकुशलता को और बढ़ाया है।

सीएम सरमा की राजनीतिक पकड़ भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आशीर्वाद यात्रा जैसे व्यापक जनसंपर्क अभियानों के माध्यम से उन्होंने मतदाताओं के साथ सीधा संबंध स्थापित किया है। ये महज राजनीतिक रैलियां नहीं हैं, बल्कि ये जनता से अपील हैं, जो एक ऐसे नेता के रूप में उनकी छवि को मजबूत करते हैं, जो वादे को पूरे करता है।

इसके विपरीत, असम में गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार को इस तरह की रणनीति अपनाने में कठिनाई हो रही है। बूथ स्तर पर संगठनात्मक कमजोरियाँ इस नुकसान को और बढ़ा देती हैं। भारत में चुनाव अब केवल संदेशों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सुनियोजित लामबंदी के माध्यम से भी जीते जाते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जहाँ भाजपा और उसका वैचारिक तंत्र निर्णायक बढ़त बनाए हुए है।

ध्रुवीकरण और पहचान का मुद्दा

बांग्लादेश से अवैध घुसपैठियों के मुद्दे पर चर्चा किए बिना असम की राजनीति का कोई भी विश्लेषण अधूरा है । यह राज्य में सबसे अधिक भावनात्मक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दों में से एक है।

भाजपा हिन्दू मतदाताओं को एकजुट करने के लिए लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है। डेमोग्राफी बदलाव और सांस्कृतिक संरक्षण को लेकर सरमा की बयानबाजी लोगों को जागरूक कर रही है। आलोचक इसे ध्रुवीकरण बताते हैं, लेकिन इसकी चुनावी प्रभावशीलता निर्विवाद है।

पिछले चुनावों में, भाजपा को एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के रूप में एक सुविधाजनक प्रतिद्वंद्वी मिल गया था, जिनकी छवि का इस्तेमाल जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरे के प्रतीक के रूप में किया गया था। एआईयूडीएफ के कॉन्ग्रेस से गठबंधन तोड़ने और उसके प्रभाव में कमी आने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

रकीबुल हुसैन जैसे व्यक्तियों को राजनीतिक हमलों के नए केंद्र के रूप में स्थापित किया है। कॉन्ग्रेस के भीतर आंतरिक मतभेदों के उजागर होने के बाद इसकी प्रासांगिकता और बढ़ गई है। भाजपा ने इन विभाजनों का प्रभावी ढंग से हथियार के रूप में उपयोग करते हुए कॉन्ग्रेस को परस्पर विरोधी हितों में सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ दल के रूप में चित्रित किया है।

विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस अक्सर अपनी ही गलतियों के प्रतिद्वंदियों को बल देती है। चुनाव प्रचार के अहम मौकों पर विवादित हस्तियों की मौजूदगी और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सार्वजनिक असहमति भाजपा को बने बनाए मुद्दे मुहैया करा देती है, जिन पर वह खुल कर अपनी राय रख सकती है।

दलबदल एक अहम वजह

चुनाव सिर्फ संख्या के बारे में ही नहीं, बल्कि धारणा के बारे में भी होते हैं। कॉन्ग्रेस से हुए दलबदल का भाजपा में बड़ा प्रभाव पड़ा है।

भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे नेता व्यक्तिगत रूप से चुनावी समीकरण को भले ही न बदल पाएँ, लेकिन उनके जाने से कॉन्ग्रेस के भीतर अस्थिरता को ओर मजबूती मिली है।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने दलबदलुओं को रोकने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रयास किए। अक्सर निर्णय अंतिम रूप दिए जाने के बाद भी विरोधाभाषी बयान आते रहे। इससे कॉन्ग्रेस में हताशा का दौर हैं। इसके विपरीत, भाजपा आत्मविश्वास से भरी, यहाँ तक कि हावी भी दिखाई देती है, जिससे उसकी मनोवैज्ञानिक बढ़त और भी मजबूत होती है।

सीएम सरमा ने कॉन्ग्रेस के भीतर अपने प्रभाव का दावा करके इस धारणा को और भी पुख्ता कर दिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वे दलबदल का अनुमान लगा सकते हैं या यहां तक ​​कि उसे अंजाम भी दे सकते हैं। चाहे ये दावे अतिशयोक्तिपूर्ण हों या नहीं, वे विपक्षी खेमे में अविश्वास पैदा करते हैं और मतदाताओं के भरोसे को कम करते हैं।

जमीन के बजाए कागजों में सिमटी कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के सामने एक मूलभूत समस्या है यह है कि पार्टी जमीनी हकीकत से दूर कागजों तक सिमट कर रह गई है। हालाँकि कॉन्ग्रेस गठबंधन में कई पार्टियाँ शामिल हैं, लेकिन उनकी संयुक्त शक्ति सीमित ही है।

अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के नेतृत्व वाली आर.डी. और ए.जे.पी. का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में तो है, लेकिन राज्यव्यापी संगठनात्मक क्षमता उनमें नहीं है। जिन निर्वाचन क्षेत्रों में वे चुनाव लड़ रहे हैं, उनमें से कई या तो नव-परिसीमित हैं या संरचनात्मक रूप से उनके लिए प्रतिकूल हैं। वर्तमान विधानसभा में दोनों पार्टियों के पास कुल मिलाकर केवल एक-एक सीट है, क्योंकि केवल अखिल गोगोई ही विधायक हैं। उनके लगातार हंगामे के कारण सत्ता-विरोधी लहर के बावजूद शिवसागर सीट पर उनका कब्जा बरकरार रहने की उम्मीद है, लेकिन लुरिंज्योति गोगोई की जीत अभी भी अनिश्चित है।

अति चर्चित 3G गठबंधन: गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई

चुनावी गणित में भले की प्रतिस्पर्धा दिख रही हो, लेकिन वोट का पूरी तरह ट्रांसफर करने की क्षमता का अभाव गठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करता है। चुनावों के लिए न केवल साझा लक्ष्य बल्कि जमीनी स्तर पर समन्वय भी आवश्यक है।

मतदाताओं के एक वर्ग में यह उम्मीद है कि गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिंज्योति गोगोई जैसे नेताओं के समर्थन में अहोम समुदाय एकजुट दिख रहा है। ये भाजपा को चुनौती दे सकता है। हालाँकि, परिसीमन ने इस समुदाय के प्रभाव को कम किया है जिससे विपक्ष को ज्यादा फायदा दिखता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

गायक जुबीन गर्ग की मौत का मुद्दा

सांस्कृतिक हस्ती जुबीन गर्ग के निधन ने असम की जन चेतना को झकझोर दिया है। बहुत कम ही ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्हें विभिन्न समुदायों में इतना व्यापक लोकप्रियता हासिल हो।

इतिहास बताता है कि भावनात्मक मुद्दे हमेशा चुनावी नतीजों में तब्दील नहीं होते। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ 2019-20 में हुए विरोध प्रदर्शन तीव्र और व्यापक थे, फिर भी वे भाजपा को 2021 में सत्ता में लौटने से नहीं रोक पाए।

ज़ुबीन गर्ग की विरासत, सीएए विरोधी भावना की तरह है। इसके वोट में तब्दील होने की संभावना कम है। वोट अक्सर शासन, पहचान और दूसरे राजनीतिक मुद्दों को लेकर असम में दिए जाते रहे हैं।

भाजपा को कमियों को करना होगा दुरुस्त

अपनी कई खूबियों के बावजूद, भाजपा कमजोरियों से मुक्त नहीं है। बीजेपी की निर्भरता इनदिनों कॉन्ग्रेस, एजीपी और अन्य पार्टियों से आए ‘बाहरी’ उम्मीदवारों पर काफी बढ़ गई है।

इसके घोषित उम्मीदवारों में नए चेहरे काफी हैं। इससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष की भावना पनप रही है, जो खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं। यदि आंतरिक असहमति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया, तो इससे स्थानीय स्तर पर दिक्कतें आ सकती हैं।

असम में भाजपा का पिछला रिकॉर्ड हाई संगठनात्मक अनुशासन का रहा है। सरमा और सोनोवाल जैसे नेताओं के नेतृत्व में, पार्टी ने आंतरिक विरोधों पर विजय पाई है।

असम में एनडीए की संभावित जीत किसी एक कारण की वजह से नहीं, बल्कि कई वजहों से होता हुआ दिख रहा है। परिसीमन ने चुनावी मानचित्र को भाजपा के पक्ष में बदल दिया है। विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है और संगठनात्मक रूप से कमजोर है। नेतृत्व, शासन और राजनीतिक संचार भाजपा को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। ध्रुवीकरण मतदाताओं के व्यवहार को लगातार प्रभावित कर रहा है और मनोवैज्ञानिक तौर पर सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में है।

चुनाव, बेशक, अब भी चौंकाने वाले हो सकते हैं। स्थानीय कारक, उम्मीदवारों से जुड़ी परिस्थितियाँ और मतदाताओं की भावनाओं में अंतिम समय में होने वाले बदलाव पूर्वानुमानों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन अप्रत्याशित उथल-पुथल को छोड़कर, भविष्य की दिशा स्पष्ट दिख रही है।

जब असम के मतदाता 4 मई को अपना फैसला सुनाएँगे, तो यह न केवल एक सरकार बल्कि एक राजनीतिक व्यवस्था को फिर से समर्थन होगा, बल्कि यह भाजपा की संरचनात्मक लाभ को रणनीतिक क्रियान्वयन के साथ संयोजित करने की क्षमता की भी जीत होगी।

(मूलरूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बहुविवाह पर प्रतिबंध, हलाला के खिलाफ प्रावधान और वसीयत ट्रांसफर के नए नियम: गुजरात विधानसभा में UCC पास, जानिए बिल में क्या-क्या है प्रावधान

गुजरात में यूनिफॉर्म सिविल कोड विधानसभा में पास हो गया है। उत्तराखंड के बाद गुजरात दूसरा ऐसा राज्य है, जहाँ यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने जा रहा है। विधानसभा ने इसे आसानी से पास कर दिया।

उत्तराखंड की तरह ही गुजरात के यूसीसी बिल में शादी, तलाक, विरासत, लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में सभी धर्मों, पंथों, आस्थाओं, समुदायों के लिए एक जैसे कानून लागू किये जा सकेंगे।

फिलहाल गुजरात, उत्तराखंड और गोवा को छोड़कर बाकी राज्यों में और केंद्र स्तर पर इन मामलों के लिए समुदायों के हिसाब से अलग-अलग कानून लागू हैं। इस कानून के बाद सभी समुदाय एक ही छत के नीचे आ जाएँगे।

यूसीसी बिल का कोई भी नियम अनुसूचित जनजाति (ST) और दूसरे ग्रुप पर लागू नहीं होगा, जिनके पारंपरिक अधिकार संविधान के तहत सुरक्षित हैं।

गुजरात विधानसभा में 24 मार्च 2026 को बिल पेश करते हुए मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने कहा कि यूसीसी उन अहम सुधारों में से एक है, जिसे पीएम मोदी लागू करने के लिए दृढ़ हैं। सामाजिक सौहार्द को बढ़ाना इसका मकसद है।

कमेटी का गठन

सरकार ने गुजरात में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की जरूरत का पता लगाने और एक कानूनी सुझाव देने के लिए रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपी।

इसमें उसने शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और उससे जुड़े सिविल मामलों में बराबरी, न्याय, सामंजस्य के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड अपनाने की सिफारिश की।

इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने बाद में बिल तैयार किया। राज्य सरकार ने कहा है कि यह बिल राज्य के सभी नागरिकों के लिए, चाहे उनका धर्म, जाति, पंथ या जेंडर कुछ भी हो, सिविल मामलों को चलाने के लिए एक जैसा कानूनी ढाँचा देकर इन सिफारिशों को लागू करेगा।

इसका मकसद धर्मनिरपेक्ष, लिंग, न्याय और सामाजिक सुधार के सिद्धांतों को बनाए रखना है, ताकि सामाजिक एकता और अखंडता को मजबूत किया जा सके।

आइए जानते हैं कि इस बिल में क्या-क्या नियम हैं।

शादी और तलाक के नियम

UCC एक से अधिक शादी पर रोक लगाता है। बिल में कहा गया है कि शादी के समय पहली शर्त यह होनी चाहिए कि दोनों (पति और पत्नी) में से किसी का भी कोई जीवनसाथी न हो। अगर पहले से कोई जीवनसाथी है, तो उनकी शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती। शादी की उम्र पुरुषों के लिए 21 और महिलाओं के लिए 18 रखी गई है, जो भारत में पहले से लागू कानून के मुताबिक है। इसके अलावा, यह शादी किसी भी मौजूदा कानून के तहत गैर-कानूनी नहीं होनी चाहिए।

अभी तक शादी को लेकर हिंदू, मुस्लिम समेत तमाम समुदायों के लिए अलग-अलग नियम और कानून थे। अब सभी को एक ही नियम के तहत लाया गया है, हालाँकि इसमें कुछ छूट दी गई है। UCC में शादी की रस्म को पूरी तरह से मान्यता दी गई है। यानी सप्तपदी, निकाह, आर्य समाज वैदिक रस्म, मंगल फेरे सभी को मान्यता दी गई है यानी कोई भी व्यक्ति अपनी परंपरा और मान्यताओं के अनुसार शादी कर सकता है, लेकिन कानूनी शर्तें भी पूरी करनी होंगी।

शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए कहा गया है कि हर शादी का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। भले ही वह गुजरात में हुई हो या न हुई हो। अगर दोनों में से कोई एक गुजरात का रहने वाला हो। रजिस्ट्रेशन तभी होगा जब शादी की शर्तें पूरी होंगी और शादी रस्म के अनुसार हुई हो।

7 साल की सजा का प्रावधान

कानून के अनुसार, विवाह का रजिस्‍ट्रेशन 60 दिनों के भीतर करना जरूरी होगा। ऐसा न करने पर 10 हजार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। जबरन शादी करने या धोखा देकर शादी करने अथवा दबाव बना कर शादी करने के मामलों में 7 साल तक की सजा का प्रावधान रखा गया है। बहुविवाह या एक से अधिक विवाह करने पर भी 7 साल की सजा का प्रावधान है।

तलाक के मामलों में भी नया प्रावधान किया गया है. इसके अनुसार अदालत की मंजूरी के बाद ही तलाक को वैध माना जाएगा और बिना ज्‍यूडिशियल प्रोसेस के किया गया तलाक अमान्य होगा। ऐसे मामलों में तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही महिलाओं को बिना शर्त दोबारा विवाह करने का अधिकार भी सुनिश्चित किया गया है।

तलाक के लिए भी डिक्री रजिस्ट्रेशन जरूरी है। यह गुजरात कोर्ट और बाहर के कोर्ट (अगर पति-पत्नी में से कोई एक गुजराती है) के ऑर्डर पर भी लागू होता है।

तलाक के नए मामलों के लिए, आखिरी फैसले की तारीख से 60 दिनों के अंदर डिक्री रजिस्टर करानी होगी। पुराने केस के लिए, कोड लागू होने के 1 साल के अंदर रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। अगर देरी होती है और रजिस्ट्रार को लगता है कि वजह सही है, तो रजिस्ट्रेशन बाद में भी किया जा सकता है।

अगर दोनों में से कोई एक बिना किसी सही वजह के छोड़ता है, तो कोर्ट जा सकते हैं, ज्यूडिशियल अलगाव को भी मान्यता दी गई है। अगर पति-पत्नी में से कोई एक बिना किसी सही वजह के दूसरे को छोड़ता है, तो दूसरा व्यक्ति कोर्ट जाकर वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए आवेदन कर सकता है। कोर्ट, ऐसी एप्लीकेशन में दी गई बातों की सच्चाई का पता लगाने के बाद और अगर रिजेक्ट करने का कोई कानूनी कारण नहीं है, तो वैवाहिक अधिकारों की बहाली का आदेश दे सकता है।

लेकिन ऐसे मामले में, अगर यह सवाल उठता है कि क्या अलग होने का कोई सही कारण है, तो उस कारण को साबित करने की जिम्मेदारी अलग होने वाले व्यक्ति की होगी। अगर कोर्ट का आदेश नहीं माना जाता है, तो यह तलाक का आधार बन जाएगा।

UCC में ज्यूडिशियल सेपरेशन का भी एक प्रोविजन है। इसके तहत पति-पत्नी कोर्ट की इजाजत से बिना तलाक के अलग रह सकते हैं। जहाँ शादी को मान्यता दी जाएगी, लेकिन दोनों साथ रहने के लिए मजबूर नहीं होंगे।

किस तरह की शादी रद्द की जा सकती है?

अगर शादी की मूलभूत शर्तों को तोड़ा गया है, तो ऐसी शादी को कोर्ट में अर्जी देकर रद्द किया जा सकता है। यह तलाक से अलग है, क्योंकि तलाक में यह माना जाता है कि शादी हो चुकी है, यहाँ यह कहकर ऑर्डर दिया जाता है कि शादी शुरू से ही लीगल नहीं थी।

जब शादी लीगल हो, लेकिन बाद में उसे रद्द करने के लिए अर्जी देनी पड़े। इसके कारण यह हैं कि दोनों में से किसी एक की सही सहमति नहीं ली गई हो या शादी जबरदस्ती की गई हो। इसके अलावा, अगर शादी के समय पत्नी पति के अलावा किसी और आदमी से प्रेग्नेंट हो या पति ने शादी के समय पत्नी के अलावा किसी और औरत को प्रेग्नेंट किया हो, तब भी शादी रद्द करने के लिए अर्जी दी जा सकती है।

इसके अलावा, अगर पति-पत्नी में से किसी एक ने शादी के समय अपनी पहचान छिपाई हो, तब भी शादी रद्द की जा सकती है। इससे ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों पर रोक लगेगी, जिसमें मुस्लिम लड़के अपनी पहचान छिपाकर हिंदू लड़कियों से शादी कर लेते हैं। हालाँकि, इस शादी को रद्द करने के आवेदन के लिए एक टाइम लिमिट भी दी गई है।

हलाला और बहुविवाह पर लगी रोक

शादी के एक साल से पहले तलाक की अर्जी नहीं दी जा सकती। खास मामलों में इसकी इजाजत है। अगर कोर्ट को लगता है कि जिसने एप्लीकेशन फाइल की है (पति-पत्नी में से) उसे बहुत ज्यादा परेशानी हो रही है या दूसरा व्यक्ति बहुत ज्यादा परेशानी खड़ी कर रहा है, तो वह एक साल से पहले भी इजाजत दे सकता है।

अगर बाद में पता चलता है कि एक साल पहले ली गई इजाजत गलत जानकारी के आधार पर या कुछ बातें छिपाकर ली गई थी, तो कोर्ट उसे कैंसल कर सकता है। हालाँकि, एक साल पूरा होने के बाद, व्यक्ति दोबारा तलाक के लिए अप्लाई करने के लिए स्वतंत्र है।

UCC इस्लामी प्रैक्टिस ‘हलाला’ पर भी रोक लगाता है, हालाँकि कुछ सरकारी पाबंदियों की वजह से इस शब्द का जिक्र नहीं है। लेकिन यहाँ साफ लिखा है कि एक बार तलाक या शादी रद्द करने का ऑर्डर पास हो जाने के बाद, पति-पत्नी कानूनी तौर पर दोबारा शादी कर सकते हैं यानी हलाला की जरूरत नहीं है।

अगर तलाकशुदा पति/पत्नी को दोबारा शादी करनी है, तो बिना किसी शर्त के दोबारा शादी की जा सकती है, जैसे कि दोबारा शादी से पहले किसी तीसरे व्यक्ति से शादी करना, वगैरह।

साथ ही, अगर शादी रद्द भी हो गई है, तो ऐसी शादी से होने वाले किसी भी बच्चे को जायज बच्चा माना जाएगा। कोर्ट ने बहुविवाह पर भी रोक लगा दी है।

वारिसों के लिए नियम

UCC में वारिसों के लिए भी विस्तार से नियम बताए गए हैं। इसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसकी प्रॉपर्टी किसे और कैसे मिलेगी। इसमें दो स्थितियां शामिल हैं – एक व्यक्ति की बिना वसीयत के मौत हो जाना और एक व्यक्ति की वसीयत लिखने के बाद मौत होना।

वसीयत के मामले में कोड एक तय ऑर्डर देता है कि प्रॉपर्टी पहले खून के रिश्तेदारों को मिलेगी और फिर बाकी रिश्तेदारों को। पहले अलग-अलग ग्रुप के लिए अलग-अलग नियम थे, जिन्हें अब एक कॉमन अरेंजमेंट से बदल दिया गया है। यह भी साफ किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति मर्डर का दोषी है, तो उसे प्रॉपर्टी नहीं मिलेगी। दूसरी ओर, अगर बच्चा गर्भ में है, तब भी उसे हक मिलेगा।

वसीयत के मामले में, कोड यह भी बताता है कि इसे कैसे मान्यता दी जाएगी और इसे कैसे लागू किया जाएगा। व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार प्रॉपर्टी बांटने का अधिकार दिया गया है, लेकिन यह भी पक्का किया गया है कि वसीयत धोखाधड़ी, दबाव या किसी और गैर-कानूनी तरीके से न बनाई गई हो। अगर वसीयत में कुछ साफ नहीं है, तो उसे ठीक से समझने और लागू करने के लिए भी नियम बनाए गए हैं।

इसके अलावा, यह भी बताया गया है कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद प्रॉपर्टी का मैनेजमेंट कैसे किया जाएगा। इसमें कहा गया है कि पहले कर्ज और दूसरी देनदारियाँ चुकाई जाएँगी। फिर प्रॉपर्टी बाँटी जाएगी। एग्जीक्यूटर या एडमिनिस्ट्रेटर वगैरह का रोल तय किया गया है, जो इस प्रोसेस को देखेंगे। इसके साथ ही बैंक अकाउंट और प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कानूनी प्रोसेस के बारे में भी डिटेल में बताया गया है। उत्तराधिकार के मामले में एक साफ एक जैसा और कानूनी तौर पर मजबूत सिस्टम बनाने की कोशिश की गई है।

लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता दी गई

कोड ने लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी है। कोड इस तरह के रिलेशनशिप को इस तरह बताया है कि एक आदमी और एक औरत एक शादीशुदा जोड़े की तरह एक ही घर में साथ रहते हैं।

इसके लिए जोड़े को रजिस्ट्रार के सामने एक स्टेटमेंट देना होगा। जो सिर्फ रिकॉर्ड के लिए होगा, इससे वह स्टेटस नहीं मिलेगा जो एक शादीशुदा जोड़े को मिलता है। शर्तें ये हैं कि दोनों बालिग होने चाहिए और वे किसी मना किए गए रिश्ते में नहीं होने चाहिए। हालाँकि यहाँ यह भी कहा गया है कि अगर रीति-रिवाज रिश्ते की इजाजत देते हैं, तो यह मनाही लागू नहीं होगी।

अगर कपल में से कोई एक शादीशुदा है या पहले से ही किसी दूसरे लिव-इन रिलेशनशिप में है या अगर दोनों में से कोई एक नाबालिग है, तो रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाएगा। साथ ही, इस मामले में उसके माता-पिता को बताना होगा। यहाँ भी शादी की तरह यह व्यवस्था की गई है कि अगर दोनों में से किसी एक पर दबाव डाला गया हो, उसे मजबूर किया गया हो या धोखा दिया गया हो, तो भी रजिस्ट्रेशन नहीं हो पाएगा।

एक जरूरी प्रावधान यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए किसी भी बच्चे को कपल का जायज बच्चा माना जाएगा और उसके अधिकारों की रक्षा की जाएगी।

लिव-इन खत्म करने के लिए, कोई भी पार्टनर टर्मिनेशन का स्टेटमेंट जमा करके औपचारिक रूप से रिश्ता खत्म कर सकता है, ऐसे में दूसरे को एक कॉपी दी जाएगी।

अगर लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिला को उसका पार्टनर छोड़ देता है, तो वह मेंटेनेंस का दावा करने की हकदार होगी और कोर्ट जा सकती है।

शादी से लेकर तलाक और विरासत तक की जानकारी गुजरात यूसीसी में विस्तार से दी गई है। यहाँ तक कि लिव इन रिलेशनशिप में शामिल महिलाओं को भी कानूनी सुरक्षा दी गई है। उनके बच्चों को कानूनी मान्यता दी गई है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने इसका विरोध किया है।

कॉन्ग्रेस इस कानून को धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप मान रही है। दरअसल कॉन्ग्रेस किसी समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं है, जबकि इसे संविधान के नीति निदेशक तत्व में शामिल किया गया था।

मिडिल ईस्ट संकट पर पाकिस्तान की मुरीद हुई कॉन्ग्रेस, भारत सरकार की कोशिशों पर मूँद ली आँखें: जानें- क्यों ईरान युद्ध में घुसना PAK के लिए मजबूरी?

फिलहाल दुनिया भर में जिस मामले पर प्राथमिकता से बात हो रही है, वह अमेरिका, इजरायल और ईरान का युद्ध है। भारत में भी आपको सड़क-मोहल्ले तक में इस युद्ध के बारे में चर्चा सुनाई देती है। युद्ध के प्रभाव से निजात के लिए भी सरकार आए दिन बयान जारी कर रही है कि भारत अलग-अलग देशों से बातचीत भी कर रहा है। यानी भारत की भूमिका तो है। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत को शायद आँखें मूँद ली हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की भागीदारी दिखाई दे रही है, जिसे कोई नहीं पूछ रहा।

यह हम नहीं वह खुद कह रही हैं। सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान और अमेरिका के युद्ध के समय पाकिस्तान एक अहम देश बनकर सामने आ रहा है, लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? यह कहते हुए कॉन्ग्रेस नेता सरकार से सवाल करती हैं, इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही? अगर यह हमारी विदेश नीति की बड़ी नाकामी नहीं है, तो फिर क्या है?

पाकिस्तान के हित में सुप्रिया श्रीनेत का बयान

दरअसल, सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर सुप्रिया श्रीनेत ने ईरान युद्ध को लेकर सरकार से सवाल करते हुए एक वीडियो जारी किया। वीडियो में सरकार से सवाल करने तक तो ठीक था, लेकिन पाकिस्तान के हित में बोलते हुए सुप्रिया श्रीनेत ने कॉन्ग्रेस की राजनीति की पोल खोलकर रख दी।

सुप्रिया श्रीनेत ने भारत सरकार पर सवाल उठाते हुए और पाकिस्तान के हित में बोलते हुए कहा, “मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने में मदद कर रहे हैं। सोचिए, पाकिस्तान जैसा देश इस समय ईरान से जुड़े ट्रंप के संकट में अहम देश बनकर सामने आ रहा है। लेकिन इस सब में भारत कहाँ है? इतने बड़े और अहम फैसलों में हमारी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही?”

इतना ही नहीं वह भारत को पाकिस्तान से कमतर आँकते हुए यह तक कहती हैं, “यह समझना मुश्किल है कि पाकिस्तान जैसा देश, जिसे अक्सर आतंकवाद से जोड़ा जाता है, इन अहम बातचीतों का हिस्सा है, जबकि भारत नहीं। यह स्थिति बिल्कुल भी सही नहीं लगती।”

मिडिल ईस्ट तनाव पर भारत की भूमिका

जैसा कि सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं कि ईरान युद्ध में भारत की कोई भूमिका नहीं दिखाई दे रही है। तो या तो वे भारतीय मीडिया की खबरों को फॉलो नहीं करती हैं, या वो लोगों को सच्चाई दिखाने के बजाए अपना नैरेटिव को आगे लाने की कोशिश कर ही हैं। क्योंकि सच्चाई ये नहीं है।

सच्चाई है कि 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान युद्ध के बाद से ही भारत लगातार मिडिल ईस्ट के देशों से संपर्क बनाए हुए है। 03 मार्च 2026 को ही मिडिल ईस्ट के ओमान, कुवैत और कतर के प्रमुखों से फोन पर बात की। इसी दिन प्रधानमंत्री ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी फोन पर बात की, जिसे लेकर नेतन्याहू ने भी खुशी जाहिर की थी।

यहाँ तक ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से भी प्रधानमंत्री मोदी की फोन पर बातचीत हुई। इस बातचीत में ईरानी राष्ट्रपति ने भारत की भूमिका को सराहा भी है और कहा कि भारत की कोशिशें जंग खत्म करने की दिशा में बहुत प्रभावी रही हैं। और दोनों नेताओं के बीच ये बातचीत ईद के मौके पर भी हुई, तब भी पीएम मोदी ने जल्द से जल्द मिडिल ईस्ट में तनाव खत्म होने के प्रयास जाहिर किए। युद्ध में अहम भूमिका निभा रहे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक खुद प्रधानमंत्री मोदी को फोन कर संकट पर चर्चा कर रहे हैं।

24 मार्च 2026 को राज्यसभा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि दक्षिण एशिया के ज्यादातर देशों के राष्ट्रध्यक्षों के साथ दो राउंड फोन पर बातचीत हो चुकी है और भारत गल्फ के सभी देशों के साथ संपर्क में है। इसी के साथ भारत ईरान, इजरायल और अमेरिका के भी संपर्क में है। पीएम मोदी ने यह भी दोहराया कि भारत का लक्ष्य संवाद और कूटनीति के माध्यम से क्षेत्र में शांति की बहाली करना है।

इतना ही नहीं युद्ध से भारत पर कोई बड़ा प्रभाव न पड़े, इसकी भी सरकार पूरी तैयारी कर रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर लगातार ईरान और खाड़ी देशों से बात कर रहे हैं। जिस तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हार्मुज’ को युद्ध के चलते बंद कर दिया गया है, भारत के अच्छे रिश्ते ही हैं जो वहाँ से दो भारतीय टैंकर मार्ग बंद होने के बावजूद गुजर चुके हैं। संकट की शुरुआत में ही मिडिल ईस्ट में रहने वाले भारतीय नागरिकों को सुरक्षित भारत वापस लाया गया।

ये सरकार के प्रयास ही हैं, जो वे जनता पर युद्ध का असर पढ़ने नहीं दे रहे हैं। बावजूद सरकार के प्रयासों का आभार जताने की जगह उल्टा धनुष और तीर लेकर निशाना बनाने में लगे हुए है। तर्क यही है कि भारत मिडिल ईस्ट से लेकर इजरायल और अमेरिका तक के संपर्क में है और आगे भी रहेगा। यहाँ भारत का रुख भी साफ होता है कि वह युद्ध नहीं चाहता, और शांति की बहली चाहता है। और इस युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल करने वालों को भी प्रधानमंत्री मोदी जवाब दे चुके हैं- हम सिर्फ भारत और उसके हितों के साथ हैं। तो सवाल तो बनता ही नहीं है कि भारत की इस युद्ध में कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।

ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भागीदारी कितनी और क्यों है?

रही पाकिस्तान की बात, तो ईरान युद्ध में पाकिस्तान क्यों घुसा पड़ा है? ये उसकी मजबूरी है। क्योंकि ईरान से जुड़ा कोई भी तनाव हो, पाकिस्तान उससे दूर रह ही नहीं सकता। क्योंकि मामला यहाँ सिर्फ वैश्विक राजनीतिक का नहीं, बल्कि उसकी खुद की सुरक्षा का भी है। वह खुद पर होने वाले हमले से डरा बैठा है।

वजह साफ है कि पाकिस्तान की सीधी सीमा ईरान से लगती है और अगर वहाँ हालात बिगड़ते हैं तो उसका असर सीधे पाकिस्तान पर पड़ता है। इसीलिए पाकिस्तान चाहे जितना तटस्थ दिखने की कोशिश करे, उसे हर समयय सतर्क रहना पड़ता है और मौके पर एक्टिव होना ही पड़ता है।

इस ईरान युद्ध में पाकिस्तान की भूमिका को और तेज बनाते हैं उसके रिश्ते, खासकर सऊदी अरब के साथ। सऊदी और ईरान की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है और पाकिस्तान अक्सर सऊदी के करीब नजर आता है। ऐसे में जब भी ईरान के खिलाफ माहौल बनता है, पाकिस्तान पर दबाव अपने आप बढ़ जाता है कि वह किस तरफ खड़ा है। वह चाहकर भी खुद को इससे अलग नहीं कर सकता।

मुल्क के अंदर के हालात भी उसे मजबूर करते हैं। पाकिस्तान में शिया और सु्न्नी दोनों समुदाय रहते हैं और ईरान शिया देश है। अगर ईरान से जुड़ा बड़ा टकराव होता है, तो पाकिस्तान के अंदर भी माहौल भड़कता है। यही डर उसे हर कदम सोच-समझकर चलने पर मजबूर करता है, लेकिन चुप बैठना उसके लिए ऑप्शन ही नहीं है।

लेकिन सच्चाई ये है कि बड़े फैसले लेने वाली ताकतें जैसे अमेरिका, ईरान या खाड़ी के बड़े देश पाकिस्तान को इस मुद्दे में कोई खास अहमियत नहीं देते। पाकिस्तान न तो इतना ताकतवर है कि वह खेल पलट दे और न ही उसके पास ऐसा प्रभाव है कि कोई उसे निर्णायक भूमिका दे। इसलिए उसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, चाहे वह कितना भी एक्टिव क्यों न दिखे।

इसके बावजूद पाकिस्तान खुद को इस मामले में दिखाने की कोशिश करता है, क्योंकि उसे अपनी इंटरनेशनल इमेज मजबूत करनी होती है और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते भी निभाने होते हैं। लेकिन असलियत यही है कि वह साइडलाइन पर खड़ा खिलाड़ी है, जिसे मैदान में जगह खुद बनानी पड़ती है।

सीधी बात ये है कि पाकिस्तान इस पूरे मामले में घुसा जरूर पड़ा है, लेकिन उसे कोई खास पूछ नहीं रहा। उसकी भागीदारी ज्यादा मजबूरी और दिखावे की है, जबकि असली खेल बड़े देश अपने हिसाब से खेल रहे हैं।

निष्कर्ष: फिर भी कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीद बन सरकार से कर रहे सवाल

वैश्विक राजनीति में पाकिस्तान की अहमियत कितनी है यह पूरी दुनिया जानती है। पाकिस्तान डर के मारे इधर-उधर फोन घुमा रहा है, लेकिन उखाड़ फिर भी कुछ नहीं पा रहा है। जबकि भारत की भूमिका पर दुनियाभर के नेता आभार जता रहे हैं। बावजूद भारत में कॉन्ग्रेसी पाकिस्तान के मुरीदन बन सरकार पर सवाल उठा रहे हैं।

चलो एक बार को सोचते हैं कि देश में विरोधी पार्टी होने के नाते कॉन्ग्रेस का सरकार से हर वो सवाल करना बनता है, जो वो चाहे। लेकिन सवालों में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा और उसके हित में बातें करना कहाँ तक ठीक है। या तो कॉन्ग्रेस धुरंधर 2 जैसी काल्पनिक फिल्म के दावों को सही मानकर बैठ गई है, जिसमें दावा किया गया है कि कॉन्ग्रेस पाकिस्तान से चलती है, क्योंकि सुप्रिया श्रीनेत और कॉन्ग्रेस के आए दिन पाकिस्तान के प्रति प्रेम से तो यही झलकता है।

सुप्रिया श्रीनेत को समझना होगा कि भारत की पाकिस्तान से कभी तुलना नहीं की जा सकती है। कहाँ एक वो देश, जिसका दुनियाभर में आतंकवाद गतिविधियों में नाम सामने आ रहा है। और कहाँ भारत, जो युद्ध जैसे संकट में भी स्थिर है और आगे भी हर संकट से लड़ने का जज्बा रखता है।

पेट्रोल-डीजल की कमी की अफवाह के बाद कई शहरों में लगी लंबी लाइनें: सरकार ने कही पर्याप्त आपूर्ति की बात, जानिए फ्यूल मिलने में क्यों हुई देरी

देशभर में तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है और किसी को परेशान होने की जरूरत नहीं है। केन्द्र सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय के बार-बार आश्वासन के बावजूद कई जगहों पर कालाबाजारी की वजह से लोगों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकने के लिए कई राज्यों में छापेमारी की गई है।

खुदरा दुकानों पर भी तेल- गैस की कोई कमी नहीं है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक, घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति सामान्य तरीके से हो रही है। गैस सिलेंडर मिलने के 25 दिन बाद आप बुक कर सकते हैं और फिर 3-5 दिनों के भीतर आपूर्ति की जा रही है। इसके बावजूद लोग घबराहट में बुक कर रहे हैं, हालाँकि ऐसी पैनिक बुकिंग में कमी आई है।

राज्यों को दिया जाने वाला कॉमर्शियल सिलेंडर भी सरकार ने बढ़ा दिया है। ऐसे सिलेंडर शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों सहित प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता में दी जा रही है। इतना ही नहीं, पीएनजी कनेक्शन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने राज्यों को नए एलपीजी कनेक्शन को बढ़ावा देने के लिए कहा है।

गुजरात में फैली पेट्रोल- एलपीजी को लेकर अफवाह

होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को आ रही परेशानी के बीच भारत की अब तक 5 जहाजें सुरक्षित आ चुकी हैं। अभी 20 और जहाजें फँसी हुई हैं, जिन्हें लाने की कोशिशें जारी हैं।

केन्द्र सरकार ने इंडस्ट्रियल डीजल की कीमत 22 रुपए प्रति लीटर बढ़ाए थे, जिसके बाद गुजरात के सूरत, राजकोट समेत कई शहरों के लोग थोड़े परेशान हुए , लेकिन स्थिति जल्द ही ठीक हो गई। सोमवार (23 मार्च 2026) को गुजरात में पेट्रोल और डीजल की कमी की अफवाह फैलने के बाद कई शहरों में लोग एक साथ फ्यूल खरीदने निकल पड़े और इस वजह से पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइन लग गई। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई।

हालात को देखते हुए डिप्टी चीफ मिनिस्टर हर्ष सांघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके साफ किया कि राज्य में पेट्रोल और डीजल की काफी सप्लाई है और कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी। लोगों को पैनिक होकर इधर-उधर जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने लोगों को सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी फैलाने से बाज आने और अफवाहों से दूर रहने की सलाह दी।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और मंत्री ऋषिकेश पटेल ने भी सरकार की तरफ से स्थिति साफ किया। पेट्रोल पंप ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष से लेकर कई दूसरे एसोसिएशन ने भी साफ किया है कि राज्य में फ्यूल की कमी नहीं है। हालात सामान्य करने के लिए पुलिस को भी उतरना पड़ा और लोगों को समझा कर घर वापस भेजना पड़ा।

एसोसिएशन और सरकार एक सुर में कह रहे हैं कि अभी राज्य में फ्यूल की कोई कमी नहीं है और सप्लाई काफी मात्रा में उपलब्ध है। असल में, दिक्कत सप्लाई की नहीं थी, बल्कि फ्यूल सप्लाई चेन और पेमेंट सिस्टम में कुछ बदलाव और कुछ लॉजिस्टिक दिक्कतों की वजह से कुछ जगहों पर फ्यूल पहुँचने में देरी हुई।

अभी तक नॉर्मल हालात में पेट्रोल पंप ऑपरेटर क्रेडिट सिस्टम पर फ्यूल लेते थे। यानी वे पहले फ्यूल खरीदते थे और शाम तक या कुछ तय समय में पेमेंट कर देते थे। युद्ध के हालात और दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावट की वजह से तेल कंपनियों ने हाल ही में एहतियात के तौर पर एडवांस्ड पेमेंट सिस्टम शुरू किया है। यानी पहले पैसा, बाद में फ्यूल।

हाल ही में, शुक्रवार (20 मार्च) को, स्टॉक हमेशा की तरह हर जगह पहुँच गया था। फिर शनिवार और रविवार वीकेंड थे और शनिवार को खास तौर पर ईद थी। इसलिए, भीड़ हमेशा से थोड़ी ज़्यादा थी। इन दिनों में, यह भी छिटपुट बातें चल रही थीं कि LPG के बाद पेट्रोल और डीज़ल में दिक्कत हो सकती है। हालात वैसे नहीं बने, सरकार बार-बार चीज़ें साफ़ कर रही थी, लेकिन फिर भी ऐसी अफ़वाहें फैलने लगीं, तो लोगों ने पहले से पेट्रोल खरीदना शुरू कर दिया। नतीजतन, इस शनिवार और रविवार को, वह एक फ़ैक्टर भी थोड़ा काम आया और फ़्यूल की बिक्री हमेशा से थोड़ी ज़्यादा हो गई।

दूसरी ओर, कंपनियों ने शुक्रवार शाम को बताया कि डीलरों को स्टॉक लेने के लिए एडवांस पेमेंट करना होगा। इसलिए, जो क्वांटिटी एडवांस में (क्रेडिट सिस्टम के दौरान) भेजी गई थी, वह नहीं भेजी गई। जिन पंप ऑपरेटरों का शनिवार और रविवार को एडवांस पेमेंट नहीं हो पाया, उन्हें सोमवार सुबह (23 मार्च) स्टॉक नहीं मिल पाया। इसलिए कई जगहों पर फ्यूल नहीं पहुँच सका।

एक तरफ लोगों का जमावड़ा रोज से ज्यादा था, इसलिए एक ही दिन में फ्यूल बिक गया। पंप जितना फ्यूल डेढ़ से दो दिन में बेचते थे, उतना एक ही दिन में बिक गया। दूसरी तरफ, पेमेंट सिस्टम की वजह से जो सप्लाई पहले मिलती थी, वह नहीं मिली और पेमेंट सिस्टम पहले लागू कर दिया गया। इन सबके कारण पंपों पर कुछ घंटों के लिए अफरा-तफरी मच गई।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए, गुजरात पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट मेहुल पटेल ने भी यही बातें कही। उनका कहना है कि पहले डीलर फ्यूल लेते थे और बाद में पेमेंट करते थे। अब पहले पेमेंट करना पड़ता है। इस बदलाव की वजह से सप्लाई में देरी हुई, लेकिन अब हालात नॉर्मल हैं और घबराने की जरूरत नहीं है।

माना जा रहा है कि सोमवार सुबह कुछ पेट्रोल पंप कुछ घंटों के लिए बंद होने की वजह फ्यूल की कमी नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक कारणों से पेमेंट सिस्टम में बदलाव था। इस वजह से सप्लाई में कुछ घंटों की देरी हुई। बाद में जैसे-जैसे सप्लाई आई, हालात धीरे-धीरे नॉर्मल होने लगे।

यह भी एक आम बात है कि अगर सच में कई पंपों पर पेट्रोल और डीज़ल की कमी थी, तो कल से गुजरात के लोगों ने एक ही दिन में इतना पेट्रोल पी लिया और जगह-जगह लाइन में लग गए, फ्यूल आया कहाँ से?

अफवाहें फैलाने में मीडिया का रोल रहा?

मीडिया का काम है हालात को वैसे ही दिखाना जैसे हैं, लेकिन जब ऐसे हालात बनें, तो सिर्फ कैमरा लेकर पंप पर दौड़ना और उसकी फोटो सर्कुलेट करना नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे अफ़वाहें फैलने, अधूरी जानकारी फैलने का खतरा रहता है। (और आखिर में यही हुआ!) लेकिन यह भी पता होना चाहिए कि इन डेवलपमेंट्स के पीछे, हालात के पीछे असली वजह क्या है। ज़्यादातर ने ये कोशिशें नहीं कीं और चैनलों ने सिर्फ़ यह स्टोरी चलाई कि ‘हर जगह पेट्रोल की कमी है’।

यह जानकारी सोशल मीडिया और मीडिया के माध्यम से फैल गई, जिसके चलते लोग पहले से इंतजाम करने के लिए पेट्रोल पंप पर इकट्ठा होने लगे, लंबी लाइनें लगने लगीं और अफरा-तफरी मच गई।

लोगों ने इंस्टाग्राम पर पेट्रोल पंप के पास जाकर वीडियो बना अपलोड करना शुरू कर दिया, जिससे अफवाह ज्यादा तेजी से फैली। हालात और खराब हो गए। लेकिन जब डिप्टी सीएम ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हालात के सामान्य होने की जानकारी दी तो धीरे धीरे सोशल मीडिया और मीडिया पर अफवाह न फैलाने की बात की जाने लगी।

राजस्थान में पेट्रोल खत्म होने की अफवाह

राजस्थान में भी 23 मार्च को पेट्रोल खत्म होने की अफवाह फैली। इसके बाद बीकानेर, जालोर, उदयपुर, आबू रोड़ और सलूम्बर जैसे जिलों में पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की कतारें लग गई। कई जगहों पर लड़ाई झगड़े हुए और पुलिस को बीच बचाव करना पड़ा।

जानकारों के मुताबिक ये सिर्फ अफवाह थी। राजस्थान में पेट्रोल डीजल की कोई कमी नहीं है और अगले कुछ दिनों तक तो किसी तरह की परेशानी नहीं आनी चाहिए। कारों, मोटरसाइकिलों और दूसरे वाहनों को आराम से पेट्रोल-डीजल मिल रहे हैं। किसी को पैनिक होने की जरूरत नहीं है। लोगों को अफवाहों से बचना होगा । बेवजह लंबी कतारों में खड़े होने की कोई जरूरत नहीं है।

सरकार ने इंडस्ट्रीयल डीजल और पेट्रोल महँगा किया है। सामान्य पेट्रोल-डीजल नहीं। चूँकि अब उधार डीजल और पेट्रोल की सप्लाई रोकी गई है। इसलिए डीलर्स के लिए अतिरिक्त जमा करना मुश्किल होगा साथ ही कैश फ्लो भी ठीक रहेगा।

दिल्ली में भी अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील

दिल्ली सरकार ने भी साफ किया है कि राज्य में एलपीजी, पेट्रोल, डीजल और पीएनजी की पर्याप्त आपूर्ति है। इसलिए अफवाहों पर ध्यान न दें और पैनिक न हों और जमाखोरी से बचें।

इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (आईजीएल) ने भी पुष्टि की है कि दिल्ली में घरेलू पीएनजी की आपूर्ति स्थिर है। प्राकृतिक गैस के आवंटन में घरेलू पीएनजी और परिवहन क्षेत्र (सीएनजी) के उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। पेट्रोल डीजल भी आम दिनों की तरह ही मिल रहे हैं।

राज्यों में कालाबाजारी को रोकने के लिए कदम उठाए हैं। अफवाहों को फैलाने के पीछे कालाबाजारी करने वालों का हाथ बताया जाता है। सोशल मीडिया इसमें बड़ा रोल अदा कर रहा है। केन्द्र सरकार लगातार तेल-गैस की सप्लाई को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए कई देशों के साथ डील कर चुकी है।

होर्मुज संकट से पहले जहाँ भारत के 27 देशों के साथ डील हो रही थी, वहीं अब 40 देशों के साथ तेल- गैस की आपूर्ति को लेकर डील हुई है। ऐसे में संयम के साथ जमाखोरों के चंगुल से बचने की जरूरत है और 25 दिनों बाद गैस की ऑनलाइन बुकिंग में कोताही नहीं बरतने की सलाह सरकार दे रही है।

एयरपोर्ट पर नमाज पढ़ो तो ठीक, दुर्गा सूक्तम का पाठ किया तो गलत: BJP नेता माधवी लता की Video देख किलस रहे इस्लामी कट्टरपंथी, नेटिजन्स ने कहा- प्रार्थना कक्ष पर सबका होता है हक

हाल ही में एक वीडियो सामने आया है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नेता कोम्पेला माधवी लता को दिल्ली के इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के प्रार्थना कक्ष में शांति से ‘दुर्गा सूक्तम’ का पाठ कर रही हैं। वीडियो में कुछ मुस्लिम महिलाएँ नमाज अदा करती दिख रही हैं। कहने को तो इसे ‘सेकुलर’ भारत का दृश्य कहना चाहिए, लेकिन किसको मालूम था कि इस्लामी कट्टरपंथियों को इससे भी आपत्ति हो सकती है।

सोशल मीडिया पर इस वीडियो को धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है। शेयर करने की वजह इसकी ‘सेकुलर’ खूबसूरती नहीं है, बल्कि इस वीडियो पर मुस्लिमों की कवायद करने वाले ‘एक्स’ अकाउंट्स कह रहे हैं कि BJP नेता का ‘दुर्गा सूक्तम’ का पाठ करना मुस्लिमों का उत्पीड़न है। वहीं असल में नेटिजन्स का कहना है कि प्रार्थना कक्ष हर धर्म के लोगों को प्रार्थना करने की इजाजत देता है, वहाँ एक तरफ नमाज और दूसरी तरफ ‘दुर्गा सूक्तम’ पढ़ने से आखिर समस्या क्या है?

वीडियो को मुस्लिमों का उत्पीड़न मानने वाले क्या कह रहे?

वीडियो को लेकर ‘द मुस्लिम’ नाम के ‘एक्स’ अकाउंट हैंडल ने कहा कि महिला प्रार्थना कक्ष में प्रवेश करते ही, BJP की माधवी लता ने मुस्लिम महिलाओं को देखकर पूजा अर्चना शुरू कर दी और उन्हें परेशान करने का प्रयास किया। आगे लिखता है, “मुस्लिम महिलाओं को देखकर ही उन्हें अपने धर्म की याद आती है।”

‘मुस्लिम IT सेल’ नाम से ‘एक्स’ हैंडल ने कहा कि माधवी लता ने महिलाओं के प्रार्थना कक्ष में प्रवेश किया और नमाज अदा कर रही मुस्लिम महिलाओं की उपस्थिति में पूजा अर्चना करने लगीं। आगे कहा, “सार्वजनिक स्थानों पर प्रार्थना कक्ष मौन, सम्मान और व्यक्तिगत भक्ति के लिए निर्धारित होते हैं, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी बाधा के प्रार्थना करने का अधिकार होना चाहिए।”

‘हरुन खान’ नाम के ‘एक्स’ यूजर ने कहा, “वहाँ मुस्लिम महिलाएँ नमाज पढ़ रही थीं, तभी उसने दुर्गा स्तुति का पाठ करना शुरू कर दिया। उसने मुस्लिम महिलाओं को उकसाने और परेशान करने की कोशिश की। यह किस तरीके का व्यवहार है?”

अल फारसी नाम के ‘एक्स’ यूजर ने कहा, “दिल्ली एयरपोर्ट पर महिलाओं के प्रार्थना कक्ष में प्रवेश करते ही BJP नेता माधवी लता ने मुस्लिम महिलाओं को प्रार्थना करते देख अचानक पूजा शुरू कर दी। उनका विश्वास इतना नाजुक है कि यह केवल मुस्लिमों की उपस्थिति में ही जागृत होता है। यह मुस्लिमों का उत्पीड़न है।”

देखा जा सकता है कि कैसे मुस्लिमों की पैरवी करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स को इस वीडियो से आपत्ति हो रही है। वह इसे मुस्लिमों का उत्पीड़न मान रहे हैं, जबकि यहाँ BJP नेता ने केवल शांति से प्रार्थना की है।

असम में वीडियो को कैसे देख रहे नेटिजन्स?

इनकॉगनिटो नाम के ‘एक्स’ यूजर का कहना है, “उन्होंने किसी से एक शब्द भी नहीं कहा। फिर भी, मुस्लिम इसे उत्पीड़न बता रहे हैं। यही वह जिहादी मानसिकता है, जिससे हम लड़ रहे हैं। हवाई अड्डे पर नमाज पढ़ने के कमरे सभी के लिए हैं, केवल मुस्लिमों के लिए नहीं।”

‘एक्स’ यूजर अभिजीत मजूमदार कहते हैं, “दुर्गा स्तुति ने इन कीड़ों को कितना भड़का दिया है, यह देखकर अच्छा लगा। इतनी सी दवा की दो बूँदें, और ये दर्द से चीखने लगते हैं। दिन में 5 बार लाउडस्पीकर से नमाज पढ़ने से भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।”

अपर्णा सिन्हा का कहना है कि मुस्लिम कहते हैं कि गंगा एक बहुधार्मिक नदी है, वे चिकन खाकर उसमें फेंक देंगे और नवराक्षि में गोमांस खाएँगे, यह उनकी मर्जी है। सिन्हा ने आगे कहा कि और यही मुस्लिम कहते हैं कि एयरपोर्ट पर प्रार्थना कक्ष में हिंदू महिला की प्रार्थना करने की हिम्मत कैसे हुई?

एडवोकेट विनीत जिंदल कहते हैं, “वे सड़कों पर अवैध रूप से नमाज पढ़ते हैं, इस पर कोई सवाल नहीं उठता, लेकिन अर कोई हिंदू निर्धारित स्थानों पर पूजा करता है तो उन्हें आपत्ति होती है और वे खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। बेशर्म इस्लामी लोग।”

नेटिजन्स का तर्क है कि एयरपोर्ट पर प्रार्थना कक्ष सभी धर्मों के लिए है, यहाँ कोई भी आकर अपने धर्म की प्रार्थना कर सकता है। इसके बावजूद कुछ मुस्लिमों की पैरवी करने वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स को इससे आपत्ति हो रही है, इस पर तर्कों के साथ नेटिजन्स ने उन्हें घेरा है।

कौन है BJP नेता माधवी लता?

कोम्पेला माधवी लता हैदराबाद से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कद्दावर नेता हैं। उन्होंने साल 2024 के लोकसभा चुनावों में हैदराबाद सीट से AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ चुनाव लड़ा था। हालाँकि, 3.38 लाख वोटों से हार गईं थीं।

वे हैदराबाद के डॉ. माधवी विरिंची हॉस्पिटल की चेयरपर्सन हैं। इसके साथ वे भरतनाट्यम डांसर भी हैं। हैदराबाद में वह सामाजिक कामों के लिए भी जानी जाती हैं। वह ट्रस्ट और संस्थाएं हेल्थकेयर, शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। वह लोपामुद्रा चैरिटेबल ट्रस्ट और लतामा फाउंडेशन की प्रमुख हैं।

माधवी लता सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय रहती हैं। हिंदुत्व के लिए वह अक्सर मुखर होती दिखाई देती है। दिल्ली एयरपोर्ट पर ‘दुर्गा सूक्तम’ का पाठ करने वाली वीडियो को भी उन्होंने अपने ‘एक्स’ अकाउंट से शेयर किया, जिसके कैप्शन में लिखा- “लोक कल्याण (दुनिया की भलाई) की ओर बढ़ने से पहले अपने अंदर की सफ़ाई और संतुलन ज़रूरी है। दिल्ली एयरपोर्ट के प्रार्थना कक्ष में मैंने दुर्गा सूक्तम की दिव्य श्लोकों में आत्मसात किया और ब्रह्माण्ड की माँ से ताकत ली।”

कैप्शन में ऐसा कुछ मंशा जाहिर नहीं होती है कि उन्होंने प्रार्थना कक्ष में महिलाओं को नमाज अदा करते देख दुर्गा सूक्तम का पाठ करना शुरू किया। वे केवल अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रार्थना करने पहुँची थी। बावजूद सोशल मीडिया पर इसे लेकर विवाद हुआ।

लोकसभा में 543 से बढ़कर 816 होगी सीट, महिलाओं को मिलेगा 33% आरक्षण: 2023 के ‘नारी वंदन अधिनियम’ में होने जा रहा संशोधन, जानिए कैसे पूरी होगी प्रक्रिया

केन्द्र सरकार मौजूदा सत्र में ही महिला आरक्षण संशोधन बिल ला रही है। 2023 में ये बिल लाया गया था। इसे जनगणना कराए जाने के बाद परिसीमन प्रक्रिया पूरी कर लागू करने की बात थी। लेकिन अब 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन कर महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। इसके तहत दो विधेयक लाए जाएँगे। इसमें सबसे पहले लोकसभा की कुल सीटों में 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जाएगी। इसके बाद 33 फीसदी आरक्षण महिलाओं को दिया जाएगा।

महिलाओं के लिए 273 लोकसभा सीटें

लोकसभा में वर्तमान में 543 सीटें हैं। इसकी आधी सीटें यानी करीब 274 सीटें बढ़ जाएँगी। इसके बाद लोकसभा के सीटों की संख्या 816 हो जाएगी। इसके बाद महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दी जाएगी अर्थात महिलाओं के लिए 273 सीटें लोकसभा में आरक्षित होंगी। महिला आरक्षण अधिनियम को नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है।

मोदी सरकार महिला सशक्तिकरण के तहत विधायिका में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने के लिए इसी सत्र में प्रस्ताव लाने जा रही है। इसके लिए जनगणना कराने का इंतजार नहीं किया जाएगा। 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी और 2029 लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू किया जाएगा।

लॉटरी से तय होंगी महिला सीटें

परिसीमन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए ‘परिसीमन अधिनियम’ समेत मौजूदा कानूनों में कई बदलाव किए जाएँगे। जानकारों के मुताबिक, महिलाओं के लिए कौन सी सीट आरक्षित की जाएगी, इसको तय करने के लिए लॉटरी सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे रोटेशन और निष्पक्षता बनी रहेगी। हालाँकि सिक्किम जैसे छोटे राज्यों में बदलाव नहीं किए जाने की बात सामने आ रही है।

महिला आरक्षण विधेयक 2023 में पारित हुई थी। उस वक्त नई जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी करने की बात कही गई थी। इसके आधार पर महिला आरक्षण लागू करने की बात थी। अर्थात पहले का महिलाओं का आरक्षण परिसीमन नई जनगणना पर निर्भर था। लेकिन अब 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

महिला आरक्षण संशोधन बिल को संसद की पटल पर रखा जाएगा। चूंकि यह संघीय ढाँचे (राज्य विधानसभाओं) को प्रभावित करता है, इसलिए इसे संसद में विशेष बहुमत (सदस्यों की कुल संख्या का बहुमत + 2/3 उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्य) से पारित किया जाएगा। इसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पारित किया जाएगा। फिर, राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये कानून बन जाएगा

एससी- एसटी की सीटें भी बढ़ेंगी

जानकारी के मुताबिक, अनुसूचित जाति और जनजाति श्रेणियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी। अभी एससी में 84 सीटें हैं जिसे बढ़ाकर 126 की जाएगी। अनुसूचित जनजाति की 47 सीटें लोकसभा की हैं, जिसे बढ़ाकर 70 किया जाएगा। इन सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी यानी आरक्षण में आरक्षण का प्रावधान लागू होगा।

विपक्षी दलों के साथ बैठक

केन्द्र सरकार महिला आरक्षण विधेयक को इस सत्र में ही लाने की मन बना चुकी है। इसलिए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी दलों के साथ बातचीत की है। विपक्षी नेताओं ने भी आपस में सलाह मशविरा किया है। सोमवार (23 मार्च 2026) को एनडीए के घटक दलों के नेताओं और सांसदों की भी बैठक गृहमंत्री शाह ने बुलाई। इसमें महिला आरक्षण लागू करने को लेकर रणनीति बनाई गई।

संसद के दोनों सदनों में बिल के पास होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ये भारतीय संविधान के मूलभूत ढाँचे में होने वाला सबसे बड़ा बदलाव होगा। ये बदलाव 2029 से लागू होगा। इसके बाद आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश में होने वाले चुनाव में यह लागू होगा।

कहा जा रहा है कि अगर महिला आरक्षण बिल विपक्ष की सहमति से पास हो जाता है तो सरकार इसे 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी टेस्ट कर सकती है। ऐसे में 2027 में होने वाला यूपी, उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव बन सकता है, जहाँ 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू हो ।

ई-रिक्शा चलाने की आड़ में मंदिरों-रेलवे स्टेशन पर लगवाए CCTV, PAK के लिए जासूसी: जानें- कौन है मीरा ठाकुर जिसे हथियार सप्लाई केस में मिली थी बेल

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में कौशांबी पुलिस ने मथुरा की रहने वाली मीरा ठाकुर को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया है। उसके तार पाकिस्तानी जासूसी नेटवर्क से जुड़े हैं। इससे पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उसे अवैध हथियारों और नकली नोटों के एक मामले में गिरफ्तार किया था, लेकिन बाद में मानवीय आधार पर उसे रिहा कर दिया गया था।

मौजूदा मामले में संवेदनशील जगहों पर CCTV कैमरे लगवाना, महत्वपूर्ण जगहों से जुड़ी जानकारी साझा करना और अवैध हथियारों की सप्लाई से उसके तार जुड़े हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह काफी खतरनाक है।

गाजियाबाद पुलिस ने इस मामले में 17 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है। पुलिस के अनुसार, आरोपी पाकिस्तान में बैठे एक हैंडलर से जुड़े थे, जिसकी पहचान सरफ़राज़ उर्फ सरदार के रूप में हुई है।

मीडिया से बात करते हुए, ट्रांस हिंडन के पुलिस उपायुक्त (DCP) धवल जायसवाल ने बताया कि ये गिरफ्तारियाँ खुफिया जानकारी के आधार पर की गई। ये गिरफ्तारियाँ गाजियाबाद और आस-पास के जिलों से की गई।

ई-रिक्शा चला रही थी मीरा ठाकुर

जाँच ​​में पता चला कि मीरा ठाकुर ई-रिक्शा चलाती थी और उसकी आड़ में जासूसी का काम करती थी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, ई रिक्शा चलाने पर किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं जा रहा था, जबकि वह जासूसी नेटवर्क का मुख्य आरोपित है।

खबरों के मुताबिक, सप्लाई नेटवर्क की लिस्ट में उसका नाम सबसे ऊपर था, और वह अलग-अलग ऑपरेटिव्स को जोड़ने वाली एक अहम कड़ी का काम करती थी। वह एक कोर ग्रुप का हिस्सा थी, जहाँ पाकिस्तानी हैंडलर सीधे वीडियो कॉल और सीक्रेट ऐप्स के जरिए बातचीत करता था। इनलोगों को काम के बदले में पैसे मिलते थे।

CCTV लगाना और धार्मिक स्थलों पर नजर रखना

इस नेटवर्क को संवेदनशील जानकारी इकट्ठा करने और शेयर करने का काम सौंपा गया था, जिसमें बड़े धार्मिक स्थलों और अहम संस्थानों की तस्वीरें और लोकेशन की जानकारी शामिल थी।

आरोपितों को रेलवे स्टेशनों जैसी अहम जगहों पर CCTV सिस्टम लगाने का काम भी सौंपा गया था। सूत्रों ने बताया कि खाटू श्याम जैसी जगहों की जानकारी शेयर की गई थी। किसी को शक न हो, इसलिए जासूसी की गतिविधियों में जान-बूझकर महिलाओं और नाबालिगों का इस्तेमाल किया गया था।

हथियारों की अवैध सप्लाई केस में बेल पर है

पुलिस सूत्रों ने बताया कि मीरा के हथियारों के अवैध डीलरों से सीधे संबंध थे और वह पूरे दिल्ली-NCR में अपराधियों को हथियार सप्लाई करती थी। उसका कई डीलरों से संपर्क था और उसने गैंगस्टरों से लेकर स्थानीय अपराधियों तक का एक नेटवर्क बना रखा था।

उसे पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हथियारों की अवैध तस्करी के एक मामले में गिरफ्तार किया था। उस ऑपरेशन के दौरान कई आरोपियों को पकड़ा गया और हथियार, कारतूस और नकली नोट बरामद किए गए। यह गिरोह मध्य प्रदेश से हथियार मंगाने और उन्हें उत्तरी राज्यों में बांटने के लिए सोशल मीडिया पर कोड वाले मैसेज का इस्तेमाल करता था।

जुलाई 2025 में मीरा को उसके मथुरा स्थित घर से गिरफ्तार किया गया, जहाँ से पाँच जिंदा कारतूस बरामद हुए; इसी आधार पर उसके खिलाफ Arms Act के तहत एक अलग मामला दर्ज किया गया। उसके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर, गिरोह के एक और सदस्य, शमसू खान को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने उसके कब्जे से पिस्तौल और नकली नोट बरामद किए। इससे पहले इस गिरोह के सदस्य कुलदीप, रवि और योगेश को भी गिरफ्तार किया गया था।

OpIndia द्वारा देखे गए अदालती दस्तावेजों के अनुसार, सितंबर 2025 में, नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने मानवीय आधार पर उसे बेल दे दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वह दो नाबालिग बच्चों की माँ है, जो अपनी देखभाल के लिए पूरी तरह उसी पर निर्भर हैं, और अगर उसे लंबे समय तक हिरासत में रखा गया, तो इसका उन बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा।

स्रोत- पटियाला हाउस कोर्ट, दिल्ली

हालाँकि उसे मानवीय आधार पर रिहा कर दिया गया था, लेकिन ऐसा लगता है कि मीरा ने अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं और उस मौके का इस्तेमाल पाकिस्तान के लिए जासूसी करने में किया।

मोबाइल फोन से विभिन्न जगहों के 100 से ज्यादा वीडियो और तस्वीरें बरामद की गई हैं। इन सामग्रियों का विश्लेषण किया जा रहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसने किस हद तक जासूसी की थी। नौशाद सहित अन्य आरोपी ने रेकी करने के लिए राज्यों भर में यात्रा करने में शामिल थे। नेटवर्क के भीतर संचार एन्क्रिप्टेड या गुप्त ऐप्स के माध्यम से होता था।

परिवार से अलग रहती है मीरा

मीरा ठाकुर मूल रूप से आगरा की रहने वाली है और मथुरा के औरंगाबाद इलाके में रह रही थी। उसने लगभग आठ साल पहले एक घर खरीदा था और अपने परिवार से अलग रहती थी। उसका पति मुकेश, जो पेशे से हलवाई है, कथित तौर पर लगभग दो साल पहले उससे अलग हो गया था।

उसकी दो बेटियाँ हैं और वह पड़ोसियों से बहुत कम बातचीत करती है। वह अपनी पहचान छिपाकर रहती थी। जाँच में यह भी पता चला है कि वह पहले राहुल उर्फ शमसू खान से जुड़ी हुई थी, जो कथित तौर पर हथियारों और नकली नोटों का तस्कर था और उसके संपर्क में आने के बाद वह अवैध गतिविधियों में शामिल हो गई।

मीरा पर सरकारी गोपनीयता अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और राजद्रोह तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अपना जेट इंजन बनाने की दिशा में बढ़ा भारत, ‘टेस्टिंग कॉम्प्लेक्स’ से फाइटर जेट्स में बनेगा आत्मनिर्भर: समझिए- DRDO की इस पहल के मायने

भारत ने अब उस क्षेत्र में कदम रख दिया है जहाँ पहुँचना दुनिया के गिने-चुने देशों के लिए ही संभव हो पाया है और वो है जेट इंजन निर्माण। यह एक ऐसी तकनीक है जिसे रक्षा क्षेत्र का ‘सबसे जटिल विज्ञान’ माना जाता है और यही अब भारत के आत्मनिर्भर मिशन का नया केंद्र बनता जा रहा है।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO के तहत काम करने वाली गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने देश में ‘नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स’ स्थापित करने की दिशा में बड़ी पहल शुरू कर दी है। यह पहल सिर्फ एक इंफ्रा का प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि भारत की सामरिक ताकत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने की तैयारी है।

दरअसल, जेट इंजन तकनीक पर आज तक कुछ ही देशों का दबदबा रहा है। ऐसे में भारत का इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ना रक्षा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और निर्णायक बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह कदम न सिर्फ भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को मजबूत करेगा बल्कि भविष्य में स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास को भी नई गति देगा।

जेट इंजन: आत्मनिर्भरता की सबसे कठिन परीक्षा

जेट इंजन बनाना किसी भी देश के लिए टेक्निकल सुप्रीमेसी की सबसे बड़ी कसौटी माना जाता है। यह सिर्फ एक मशीन नहीं बल्कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और वर्षों के शोध का परिणाम होता है। यही कारण है कि दुनिया में केवल कुछ ही देश इस क्षेत्र में पूरी तरह सक्षम हैं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन शामिल हैं।

भारत लंबे समय से इस विशिष्ट समूह में शामिल होने की कोशिश कर रहा है लेकिन उन्नत टेस्टिंग सुविधाओं की कमी इस राह में सबसे बड़ी चुनौती रही है।

अब तक भारत ने कई प्रयास किए हैं। इनमें सबसे प्रमुख रहा ‘कावेरी इंजन कार्यक्रम’ जिसे स्वदेशी जेट इंजन विकसित करने की दिशा में एक बड़ी पहल माना गया था। हालाँकि, यह परियोजना अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। इसके पीछे कई तकनीकी चुनौतियाँ थीं लेकिन सबसे अहम कारण मजबूत और आधुनिक टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव ही था।

नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स: गेम चेंजर इंफ्रास्ट्रक्चर

प्रस्तावित नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स भारत के लिए एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है। आसान शब्दों में समझें तो यह एक ऐसी जगह होगी जहाँ जेट इंजन के हर छोटे-बड़े हिस्से जैसे फैन, कंप्रेसर, कंबस्टर, टर्बाइन और आफ्टरबर्नर की जाँच और परीक्षण एक ही परिसर में किया जा सकेगा। अभी तक इन हिस्सों को अलग-अलग जगहों पर टेस्ट करना पड़ता था जिससे समय भी ज्यादा लगता था और प्रक्रिया भी मुश्किल हो जाती थी। इस कॉम्प्लेक्स के बनने के बाद पूरी टेस्टिंग एक ही जगह पर आसानी से हो सकेगी।

सबसे खास बात यह है कि यहाँ जमीन पर ही आसमान जैसी परिस्थितियाँ बनाई जा सकेंगी। यानी इंजीनियर लैब में ही 40,000 फीट की ऊँचाई, ठंडा तापमान और कम हवा के दबाव जैसी स्थितियों को तैयार कर पाएँगे। इससे इंजन को असली उड़ान से पहले ही पूरी तरह जाँचा जा सकेगा जिससे टेस्टिंग ज्यादा सटीक, तेज और कम खर्चीली हो जाएगी।

विदेशी निर्भरता से मुक्ति की दिशा में बड़ा कदम

आज भारत के ज्यादातर आधुनिक फाइटर जेट जैसे तेजस, विदेशी इंजनों पर चलते हैं। यानी हमें इंजन के लिए दूसरे देशों खासकर अमेरिका की कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह सहयोग अभी जरूरी है लेकिन इसमें कई दिक्कतें भी हैं। हमें पूरी तकनीक नहीं मिलती, इंजन में बदलाव या अपग्रेड करने की आजादी सीमित होती है और सप्लाई भी कभी-कभी अनिश्चित रहती है।

सरल शब्दों में कहें तो अगर भविष्य में देशों के बीच तनाव बढ़ता है, तो हमें इंजन मिलने में दिक्कत आ सकती है और इसका असर सीधे हमारी सेना की ताकत पर पड़ेगा। इसीलिए अपना खुद का जेट इंजन बनाना बहुत जरूरी है। यह सिर्फ तकनीक की बात नहीं है बल्कि देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अगली पीढ़ी के फाइटर जेट्स को मिलेगा बल

भारत इस समय एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) जैसे आधुनिक फाइटर जेट पर काम कर रहा है। ऐसे विमानों के लिए बहुत ताकतवर, भरोसेमंद और आधुनिक जेट इंजन की जरूरत होती है।

इसी दिशा में GTRE एक स्वदेशी हाई-थ्रस्ट इंजन विकसित कर रहा है लेकिन किसी भी जेट इंजन को तैयार करने से पहले उसे हजारों घंटों तक कड़ी जाँच से गुजरना पड़ता है। नेशनल एयरो इंजन टेस्ट कॉम्प्लेक्स बनने के बाद यह पूरी प्रक्रिया तेज और आसान हो जाएगी जिससे भारत अपने फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स में ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकेगा।

टेस्टिंग की ताकत: क्यों जरूरी है यह सुविधा?

जेट इंजन सिर्फ डिजाइन से नहीं बनता बल्कि बार-बार की कड़ी टेस्टिंग से तैयार होता है। इसे बहुत ज्यादा तापमान, दबाव और तेज गति जैसी परिस्थितियों में परखा जाता है। अगर इनमें थोड़ी भी कमी रह जाए तो उड़ान के दौरान बड़ा हादसा हो सकता है।

अब तक भारत को अपने इंजन की टेस्टिंग के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे समय और पैसा दोनों ज्यादा खर्च होते थे और साथ ही संवेदनशील तकनीक के बाहर जाने का खतरा भी बना रहता था। नया टेस्ट कॉम्प्लेक्स इन सभी समस्याओं को खत्म कर देगा।

रणनीतिक मजबूती और वैश्विक पहचान

आज के समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में तनाव बढ़ रहा है भारत के लिए अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करना बेहद जरूरी हो गया है। जेट इंजन जैसी अहम तकनीक में आत्मनिर्भरता भारत को और ताकतवर बनाएगी। आने वाले समय में जब भारत अपने खुद के इंजन से चलने वाले फाइटर जेट उड़ाएगा तो यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं होगी बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सपने की एक बड़ी जीत होगी।

भारत का यह कदम भले ही ज्यादा सुर्खियों में न दिखे लेकिन इसका असर बेहद बड़ा होने वाला है। जेट इंजन टेस्टिंग कॉम्प्लेक्स देश की रक्षा ताकत को नई ऊँचाई देगा, फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स को तेज करेगा और भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में लाने में मदद करेगा जो अपने दम पर इतनी जटिल सैन्य तकनीक विकसित करते हैं।

कॉन्ग्रेस-TMC से दूर जाता मुस्लिम वोटबैंक, बढ़ रहे ‘अपनी’ पार्टियों की ओर कदम: समझें- क्यों पश्चिम बंगाल में ओवैसी-हुमायूँ कबीर का गठबंधन दिखा सकता है दम

पश्चिम बंगाल की सियासत में 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक ऐसा गठबंधन सामने आया है जो मुस्लिम मतदाताओं की बदलती सोच को पूरी तरह उजागर कर रहा है। असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने तृणमूल कॉन्ग्रेस से निष्कासित पूर्व विधायक हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है।

असदुद्दीन ओवैसी ने टीएमसी सरकार पर मुसलमानों के साथ ‘अन्याय’ का आरोप लगाते हुए कहा कि यह गठबंधन मुस्लिम बहुल इलाकों में अल्पसंख्यकों की आवाज को मजबूत करेगा। कबीर की पार्टी पहले ही 182 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला कर चुकी है।

अब AIMIM रणनीतिक रूप से करीब 8 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जिनमें बीरभूम, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे मुस्लिम बहुल इलाके शामिल हैं। वहीं कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर और नौदा सीट से चुनाव लड़ेंगे। उनकी पार्टी ने काफी सारी सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा पहले से कर चुकी है।

यह गठबंधन महज सीट बँटवारे का नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटबैंक को पारंपरिक सेकुलर दलों से अलग करके ‘अपनी’ पहचान वाली पार्टियों के साथ खड़ा करने का बड़ा प्रयोग है।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट का गणित: 294 सीटों पर कितना असर?

पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं। 2011 जनगणना के अनुसार राज्य में मुसलमानों की आबादी 27.01 प्रतिशत थी, जो वर्तमान अनुमानों के मुताबिक 29-30 प्रतिशत के करीब पहुँच गई है। राजनीतिक रूप से यह वोट बैंक 85 मुस्लिम-बहुल सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है, जहाँ मुस्लिम आबादी 35 से 66 प्रतिशत तक है। इनमें मुर्शिदाबाद (66 प्रतिशत), मालदा (51 प्रतिशत), उत्तर दिनाजपुर (50 प्रतिशत), बीरभूम (37 प्रतिशत) और दक्षिण 24 परगना (35 प्रतिशत) जैसे जिले मुख्य हैं। अगर 25-30 प्रतिशत मुस्लिम वोट वाले इलाकों को भी जोड़ें तो प्रभावित सीटों की संख्या 110-120 तक पहुँच सकती है।

साल 2021 के चुनाव में टीएमसी ने इन 85 मुस्लिम-बहुल सीटों में से 75 पर जीत हासिल की थी (कुल 213 सीटें जीतीं)। भाजपा मात्र 5 सीटें ही ले पाई थी। लेकिन अब AJUP-AIMIM गठबंधन के आने से टीएमसी का वोट बैंक बंटने का खतरा साफ दिख रहा है। अगर गठबंधन 40-50 सीटों पर भी मजबूत प्रदर्शन करता है या मुस्लिम वोट शेयर 15-20 प्रतिशत तक पहुँच जाता है, तो टीएमसी को 50-70 सीटों का नुकसान हो सकता है।

कबीर का खुला दावा है कि अगर विधानसभा लटक गई तो उनकी पार्टी किंगमेकर बनेगी और मुस्लिम डिप्टी सीएम या यहाँ तक कि सीएम पद की माँग रखेगी। बता दें कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल 2026 को होंगे और मतगणना 4 मई को होगी।

महाराष्ट्र में दिखा ट्रेलर- जहाँ AIMIM ने 114-125 वार्ड जीतकर दिखाया दम

जनवरी 2026 के महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों में AIMIM ने 29 नगर निगमों में 114 से 125 वार्ड जीत लिए थे। इसकमें छत्रपति संभाजीनगर में 33 सीटें, मालेगांव में 21 और अन्य शहरों में अच्छी संख्या में वार्ड जीतकर पार्टी ने समाजवादी पार्टी, एमएनएस और एनसीपी को पीछे छोड़ दिया। AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा कि जनता अब पारंपरिक दलों पर भरोसा नहीं कर रही है।

सेकुलर दलों का नुकसान और बंगाल में गठबंधन की रणनीति

इन नतीजों से सबसे ज्यादा नुकसान टीएमसी, कॉन्ग्रेस और वापमंथी पार्टियों होता दिख रहा है, क्योंकि मुस्लिम वोटबैंक अब बंट रहा है। ओवैसी उन मुद्दों को उठाते हैं जिन पर पारंपरिक सेकुलर दल चुप रहते हैं, खासकर अल्पसंख्यक अधिकार, असुरक्षा और स्थानीय समस्याएँ। ऐसे में युवा मुस्लिम मतदाताओं में उनकी बोलने की शैली को बेहद पसंद किया जाता है।

पश्चिम बंगाल में गठबंधन की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट है। AIMIM तीन सीटें बीरभूम, तीन मुर्शिदाबाद और दो मालदा में लड़ेगी, जबकि AJUP बाकी सीटों पर। दोनों मिलकर मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी का वोट 10-15 प्रतिशत तक घटा सकते हैं। कबीर ने दिसंबर 2025 में मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ शैली की मस्जिद की नींव रखी थी, जिसके बाद टीएमसी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। इस इमोशनल कार्ड से मुस्लिम वोट ध्रुवीकृत होने की संभावना बढ़ गई है।

दोनों ताकतें कैसे एकजुट करेंगी मुस्लिम वोटबैंक?

ओवैसी राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम असुरक्षा और टीएमसी-कॉन्ग्रेस की ‘नाकामी’ का मुद्दा उठाते हैं। कबीर स्थानीय लीडर हैं, मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में उनकी पकड़ गहरी है। दोनों मिलकर वोट को दो हिस्सों में बाँटने की बजाय एकजुट करने का काम कर रहे हैं, जिसमें AIMIM राष्ट्रीय छवि देगी तो AJUP जमीनी ताकत। अगर यह सफल हुआ तो 2021 की टीएमसी की 213 सीटों वाली जीत दोहराना मुश्किल हो जाएगा।

दीदी बनाम बीजेपी से आगे बढ़ी राजनीतिक लड़ाई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का चुनाव अब ‘दीदी बनाम भाजपा’ से आगे बढ़कर ‘अस्तित्व की लड़ाई’ की ओर मुड़ गया है। ओवैसी (AIMIM) और हुमायूँ कबीर (AJUP) का गठबंधन उन इलाकों में सीधे तौर पर टीएमसी (TMC) की जड़ें खोदने की तैयारी में है, जहाँ मुस्लिम मतदाता 50% से अधिक हैं।

मुर्शिदाबाद यानी ‘किंगमेकर’ का अपना घर

मुर्शिदाबाद जिला इस गठबंधन का नर्व सेंटर (मुख्य केंद्र) है। यहाँ की लगभग 66% आबादी मुस्लिम है और जिले की 22 सीटों में से अधिकांश पर मुस्लिम मतदाता ही हार-जीत तय करते हैं। हुमायूँ कबीर यहीं के कद्दावर नेता हैं।

मुर्शिदाबाद की हरेक विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी (%) पर नजर डालें तो इस गठबंधन के प्रभाव का कारण भी साफ हो जाएगा। इसमें रेजीनगर सीट पर करीब 75% वोटर मुस्लिम हैं, जहाँ से खुद हुमायूँ कबीर खुद चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, नाओडा में 70% तक मुस्लिम वोटर हैं, जिसकी वजह से ये कबीर की दूसरी पसंदीदा सीट बन गई है। इस सीट पर उनका मजबूत जनाधार है। वहीं डोमकल में 85% तक मुस्लिम वोटर हैं, ये सीट कट्टरपंथी राजनीति का गढ़ भी मानी जाती है।

बात रानीनगर की करें तो यहाँ 80% तक मुस्लिम वोटर हैं। ये सीमावर्ती क्षेत्र है, ऐसे में यहाँ घुसपैठ और नागरिकता के मुद्दे हावी हैं। इसके अलावा भगवानगोला में करीब 82% आबादी मुस्लिम है, जहाँ AIMIM का संगठन पिछले दो सालों में बहुत मजबूत हुआ है। आखिरी सीट हरिहरपाड़ा की बात करें तो यहाँ भी करीब 75% मुस्लिम वोटर हैं। यहाँ के स्थानीय मुद्दों पर टीएमसी से नाराजगी का फायदा गठबंधन को मिल सकता है।

मालदा यानी उत्तर बंगाल का प्रवेश द्वार

मालदा में मुस्लिम आबादी करीब 51% है। यहाँ पारंपरिक रूप से कॉन्ग्रेस मजबूत रही थी, लेकिन 2021 में टीएमसी ने यहाँ बड़ी सेंध लगाई थी। अब ओवैसी यहाँ कॉन्ग्रेस और टीएमसी दोनों के वोटों में बँटवारा करेंगे। मालदा की हरेक विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी (%) पर नजर डालें तो इस गठबंधन के प्रभाव का कारण भी साफ हो जाएगा।

इसमें सुजापुर की करें तो करीब 90% मुस्लिम आबादी के साथ ये पश्चिम बंगाल की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीटों में से एक है। जाहिर सी बात है कि इन दलों की इस पर खास नजर है। वहीं, मोथाबाड़ी में 75% मुस्लिम वोटर हैं। यहाँ के युवा मतदाता ओवैसी की रैलियों में भारी भीड़ जुटाते हैं। कालियाचक की बात करें तो करीब 80% मुस्लिम आबादी वाला ये क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक रूप से सक्रिय माना जाता है। वहीं, 65% मुस्लिम वोटरों के साथ चांचल विधानसभा सीट टीएमसी के लिए ‘स्पॉइलर’ बन सकती है।

उत्तर दिनाजपुर पर बिहार के ‘सीमांचल’ का प्रभाव

बिहार के सीमांचल से सटे होने के कारण इस जिले पर ओवैसी का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखने की उम्मीद है। साल 2020 और 2025 में बिहार में मिली जीत की लहर यहाँ स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। यहाँ की विधानसभा सीटों पर मुस्लिम आबादी की बात करें तो चोपड़ा पर 65% वोटर मुस्लिम हैं। ये बिहार की किशनगंज सीट से सटा हुआ इलाका है।

इस्लामपुर में 72% की मुस्लिम आबादी भी अब खुलकर इन पार्टियों के पक्ष में आ सकती है। गोवालपोखर में 78% मुस्लिम वोटर हैं, और ओवैसी ने यहाँ अपनी रैलियों में ‘अपनी पहचान’ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया है। जबकि चकूलिया में 70% मुस्लिम आबादी भी इन दोनों पार्टियों के लिए किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है।

दक्षिण 24 परगना और बीरभूम, इस बार TMC के किले में पड़ने वाली है दरार

ये जिले ममता बनर्जी के सबसे मजबूत गढ़ रहे हैं, लेकिन फुरफुरा शरीफ के प्रभाव और अब हुमायूँ कबीर की नई पार्टी के कारण यहाँ के समीकरण बदल रहे हैं। विधानसभा सीट और मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखें तो मेटियाब्रुज विधानसभा सीट पर करीब 80% मुस्लिम आबादी है। ये इलाका दक्षिण 24 परगना (कोलकाता का मिनी पाकिस्तान कहा जाने वाला क्षेत्र) है।

इसके साथ ही इसी दक्षिण 24 परगना जिले की कैनिंग पूर्व सीट पर 70% के मुस्लिम वोटर अल्पसंख्यक राजनीति के केंद्र में रहते हैं। वहीं, मगरहाट पश्चिम सीट पर मुस्लिम वोटरों की आबादी करीब 65% है।

बीरभूम की बात करें तो झारखंड से सटे इस जिले की मुरारई विधानसभा सीट पर 80% मुस्लिम आबादी है। तो नलहाटी में भी करीब 70% मुस्लिम वोटर हैं।

यह गठबंधन टीएमसी के लिए ‘खतरनाक’ क्यों है?

अक्सर छोटे दलों को ‘वोट कटवा’ कहा जाता है, लेकिन ओवैसी और कबीर का गठबंधन 149 सीटों पर लड़कर यह संदेश दे रहा है कि वे जीतने के लिए मैदान में हैं। यदि वे औसतन हर सीट पर 20,000 से 30,000 वोट भी हासिल करते हैं, तो टीएमसी का ‘मार्जिन’ खत्म हो जाएगा।

हुमायूँ कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रखना और ओवैसी का ‘अब्बा’ और ‘हिजाब’ जैसे मुद्दों पर बोलना, उन युवा मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करता है जो महसूस करते हैं कि टीएमसी केवल ‘दिखावे की सेकुलर’ है और हिंदुओं को खुश करने के लिए उनके अधिकारों से समझौता करती है।

ओवैसी पर अक्सर ‘बाहरी’ होने का आरोप लगता है, लेकिन हुमायूँ कबीर के साथ आने से इस गठबंधन को ‘लोकल फेस’ मिल गया है। कबीर जानते हैं कि बंगाल की गलियों में संगठन कैसे खड़ा किया जाता है।

पश्चिम बंगाल की 120 से अधिक सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं। ओवैसी और हुमायूँ कबीर की यह जुगलबंदी अगर 50 ऐसी सीटों पर अपना प्रभाव दिखा देती है जहाँ मुस्लिम आबादी 50% से अधिक है, तो 2026 में ममता बनर्जी के लिए सत्ता की राह बेहद कठिन हो जाएगी। यह चुनाव केवल मुख्यमंत्री चुनने का नहीं, बल्कि बंगाल की ‘मुस्लिम राजनीति’ का नया वारिस चुनने का भी होगा।

नई मुस्लिम राजनीति का उदय

ये सारे घटनाक्रम भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस, एसपी या टीएमसी जैसे दलों की छाया में नहीं रहना चाहते। ऐसे में वो अपनी पार्टियों जैसे AIMIM, AJUP या इस्लाम पार्टी के साथ खुलकर खड़े हो रहे हैं।

यह बदलाव सेकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी है। मुस्लिम वोट बँटने से विपक्ष कमजोर होगा और सत्तारूढ़ दलों को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय में यह मुस्लिम राजनीति को मजबूत बनाएगा। महाराष्ट्र ने ट्रेलर दिखाया, पश्चिम बंगाल में पूरा शो शुरू हो चुका है। उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक और बिहार में भी ऐसे संकेत मिल रहे हैं। 2026 का बंगाल चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटबैंक की नई दिशा का भी होगा। यह नया अध्याय भारतीय लोकतंत्र को और दिलचस्प बना देगा।