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व्यापार पर बात, ममता बनर्जी करने लगी ‘मुस्लिम वोट बैंक’ का बचाव: क्या हैं बंगाल CM के बयान के मायने, क्यों BJP नेता ने इसे बेलडांगा हिंसा से जोड़ा?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में नबन्ना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उद्योगपतियों और बिजनेस लीडर्स को संबोधित किया। यह मंच बंगाल में निवेश, व्यापार और औद्योगिक विकास के माहौल पर बातचीत के लिए था। लेकिन इसी मंच से ममता बनर्जी ने अपनी मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के सबूत दिए।

कार्यक्रम को संबोधित कर अपने भाषण में ममता बनर्जी कहती हैं, “अगर हम 30 प्रतिशत समुदाय के आदमी से झगड़ा करें, तो वो रोज रोड अवरोध करेगा। आपकी कंपनी बंद कर देगा। हमारा जीना हराम कर देगा। हम चाहते हैं सब बराबर रहें। कोई किसी के मसलों में हस्तक्षेप न करे।”

ममता बनर्जी के बयान का यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब कुछ ही दिन पहले बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा इलाके में मुस्लिम भीड़ ने बवाल मचाया था। भीड़ ने सड़क और रेलवे जाम किया, वाहनों में तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की।

बीजेपी ने ममता बनर्जी के इस बयान को आड़े हाथों लेते हुए इसे बेलडांगा में हुई हिंसा से जोड़ा है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कहा, “इस तरह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेलडांगा में हुई हिंसा को उचित ठहराया और मूलरूप से यह कहा कि उनके वोट बैंक को पूरे प्रदेश में उत्पात मचाने का अधिकार है और वह कोई कार्रवाई नहीं करेंगी।”

मुस्लिमों को खुश करने के लिए ममता बनर्जी ने व्यापारिक मंच का किया उपयोग

बीजेपी ने इसे बेलडांगा से सिर्फ इसीलिए जोड़ा क्योंकि ममता बनर्जी का बयान और मकसद उसी कम्युनिटी के लोगों का बचाव करता हुआ दिखाई देता है, जिसने बेलडांगा की सड़कों पर उपद्रव मचाया था। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में भले ही किसी जगह या घटना का नाम न लिया हो, लेकिन शब्दों का चुनाव और समय अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

यहाँ सवाल यह है ही नहीं कि ममता बनर्जी ने किसी घटना का नाम लिया या नहीं। सवाल यह है कि उन्होंने क्या कहा, किस मंच से कहा और किस संदर्भ में कहा? नबन्ना का मंच व्यापारियों के लिए था। वहाँ से संदेश यह जाना चाहिए था कि राज्य में विकास और व्यापार को कैसे आगे बढ़ाया जाए। लेकिन इसके बजाए बयान का फोकस इस बात पर रहा कि एक खास कम्युनिटी (मुस्लिमों) को नाराज करने का नतीजा क्या हो सकता है।

ममता बनर्जी ने यह नहीं कहा कि सड़क जाम करने गलत है। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो कोई भी ऐसा करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। इसटे उलट वह ऐसा करने वाली मुस्लिम भीड़ का बचाव करते हुए इतने बड़े मंच से लोगों को उन उपद्रवियों से डरने का संदेश दे रही हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम वोटबैंक पर मंडराए खतरे को निपटाने की रणनीति

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आगे कहती हैं कि सरकार चाहती है कि सब लोग अपनी-अपनी जिंदगी जिएँ, कोई किसी के मामलों में दखल न दे। यह वचन सुनने में काफी उदार लगते हैं। लेकिन जब इसे जमीनी हकीकत के साथ जोड़ा जाता है, तो कई असहज सवाल खड़े होते हैं। अगर सच में सबको बराबरी का अधिकार है तो बार-बार सड़क जाम और विरोध के जरिए हिंदुओं को दबाने की राजनीति बंगाल की पहचान क्यों बन गई है?

मुस्लिमों के क्राइम पर बराबरी की बात करने से ममता बनर्जी ने केवल उनके अपराधों को ढकने का काम किया है। मुस्लिम तुष्टीकरण में ममता बनर्जी इतना डूब चुकी हैं कि उन्हें मतलब ही नहीं है कि वो कौन-से मंच पर हैं? वो सिर्फ इस कोशिश में लगी हैं कि कहीं उनका मुस्लिम वोटबैंक हाथ से न निकल जाए। वैसे भी आगामी विधानसभा चुनावों में TMC पर मुस्लिम वोटबैंक खोने का खतरा मंडरा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधानसबा चुनाव 2026 में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखवाने वाले TMC के बागी नेता हुमायूं कबीर TMC के खिलाफ मुस्लिम गठबंधन खड़ा करने जा रहे हैं। इस गठबंधन में प्रतिबंधित संगठन PFI का राजनीतिक दल SDPI से लेकर फुरफुरा शरीफ मस्जिद के राजनीतिक दल ISF शामिल होने जा रहा है। खबरें यह भी हैं कि कॉन्ग्रेस को भी गठबंधन में शामिल होने का न्योता मिला है।

तो अगर यह मुस्लिम गठबंधन बन भी जाता है, तो सबसे ज्यादा खतरा ममता बनर्जी की TMC को ही है, क्योंकि उनकी आधी राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण के ही भरोसे है। क्योंकि पिछले कई सालों में ममता बनर्जी की सरकार में हिंदुओं पर लगातार अत्याचार और हमले पर चुप्पी दर्ज कर उन्होंने अपना मुस्लिम वोटबैंक मजबूत किया है। पिछले साल 2025 में फुरफुरा शरीफ में इफ्तार पार्टी अटेंड करना भी इसी मुस्लिम वोटबैंक को खुश करना था। और आने वाले चुनावों में भी उनकी यही रणनीति है।

ममता बनर्जी की ‘बराबरी’ की बात और जमीनी हकीकत

अब बिजनेस लीडर्स के मंच से सामने आया ममता बनर्जी का यह बयान, भले ही मुख्यमंत्री इसे अलग संदर्भ में पेश कर रही हों, लेकिन यह सवाल छोड़ जाता है कि बंगाल में बार-बार सड़क जाम, दंगे और उपद्रव आखिर किसका काम है? बेलडांगा हो या इससे पहले सामने आई बाकी हिंसाओं की घटना हो, अक्सर दिखता रहा है कि विरोध के नाम पर कानून हाथ में लेने वाली भीड़ एक ही पहचान से जुड़ी होती है।

मुख्यमंत्री यह भी कहती हैं कि सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है और कोई किसी के मसलों में दखल न दे। लेकिन यह बात तब खोखली लगने लगती है, जब जमीनी हकीकत कुछ और कहती है। अगर सबको अपनी इच्छा से जीने का अधिकार है, तो फिर हिंदुओं को यह सलाह क्यों दी जाती है कि वे मुस्लिम बहुल इलाको में न जाएँ? क्यों हिंदू पलायन कर रहा है? क्यों ममता सरकार की पुलिस हिंदुओं को प्रदर्शन करने पर लाठियों से कूटती है? क्यों हिंदुओं के धार्मिक जुलूस पर पत्थरबाजी होती है?

संदेशखाली की घटनाओं के दौरान भी यही पैटर्न देखने को मिला। हिंदू पीड़ितों की शिकायतों पर गंभीरता से बात करने की बजाए ममता सरकार ने आरोपों का रुख RSS और BJP की ओर मोड़ दिया। इससे पता चलता है कि मुस्लिमों के क्राइम पर ममता बनर्जी की सरकार बराबरी की बात करती है, लेकिन हिंदुओं पर हुए अत्याचार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करती है।

निष्कर्ष: ममता बनर्जी का दोहरा रवैया

देखा जाए तो ममता बनर्जी की राजनीति मुस्लिम तुष्टीकरण पर केंद्रित होकर रह गई है। जो वो बिजनेस लीडर्स के मंच से भी मुस्लिमों को खुश करने वाले बयान देने से खुद को नहीं रोक पा रही हैं। जब बेलडांगा में मुस्लिमों द्वारा सड़कों पर अवरोध और उपद्रव करने वाली मुस्लिम भीड़ को लेकर ‘बराबरी’ और ‘अधिकार’ की याद आ जाती है, वहीं हिंदुओं पर सालों से हो रहे अत्याचारों के मामलों में या तो आरोप दूसरों के सिर मढ़ दिए जाते हैं या फिर चुप्पी साध ली जाती है।

अंबेडकर, माधवी जाधव और नासिक की 26 जनवरी… वर्दी वाली का ये रोना-धोना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं

नासिक में महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन के गणतंत्र दिवस भाषण में वन विभाग के एक अधिकारी द्वारा बाधा डालना, कोई भावनात्मक मामला नहीं है और न ही यह केवल डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रति श्रद्धा का मुद्दा है। यह संस्थागत पतन का एक गंभीर मामला है। राज्य के पदाधिकारी संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन्हें संवैधानिक पद पर बैठे नेताओं का सम्मान करने का आदेश होता है।

क्या थी घटना

गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद गिरीश महाजन ने अपने आधिकारिक भाषण में डॉ. अंबेडकर का नाम नहीं लिया। यह चूक, चाहे जानबूझकर की गई हो या नहीं, वन विभाग की कर्मचारी माधवी जाधव ने पकड़ ली और भाषण के बीच में ही स्पष्टीकरण माँगा। पुलिस ने इस दौरान हस्तक्षेप किया, उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया और मामला देखते ही देखते एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गया।

महाजन ने बाद में स्पष्ट किया कि यह चूक अनजाने में हुई थी और उन्होंने माफी माँगी। उन्होंने कहा कि वे अपने भाषणों में नियमित रूप से अंबेडकर का जिक्र करते हैं और उनका मकसद अंबेडकर का अपमान करना नहीं था। सामान्य लोकतांत्रिक और नागरिक मानकों के अनुसार, यह मामला यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।

इसके बजाय यह एक साजिश के तहत गुस्से में बदल गया, जिसमें ‘अंबेडकर की पहचान मिटाने’ के आरोप लगे, एफआईआर दर्ज करने की माँग और राजनीतिक नेताओं द्वारा मंत्री को हटाने की माँग शामिल थी।

माधवी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए घोषणा की कि गिरीश महाजन द्वारा किया गया तथाकथित ‘पाप’ इतना गंभीर था कि उन्हें माफ नहीं किया जा सकता। उन्होंने दावा किया कि आगामी महाकुंभ में पवित्र स्नान भी इसे धो नहीं पाएगा।

यह तनाव बहुत कुछ कहता है। यह न केवल महाकुंभ में स्नान करने की हिंदू संस्कारों के प्रति घोर अवमानना ​​को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार उपेक्षा को अब अपमान के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, और किस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था के कुछ वर्गों ने अंबेडकर को एक ऐसे व्यक्ति में बदल दिया है जिनका आह्वान अब प्रतीकात्मक या श्रद्धापूर्ण नहीं, बल्कि अनिवार्य हो गया है।

भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार है कि किसी नेता पर ‘अपमान’ का आरोप उसके कहे गए शब्दों के लिए नहीं, बल्कि उसके अनकहे शब्दों के लिए लगाया गया है।

खतरनाक है यह बदलाव

संविधान में ऐसा कोई प्रावधान, कानूनी आदेश या परंपरा नहीं है, जो गणतंत्र दिवस के प्रत्येक भाषण में डॉ. अंबेडकर के नाम को अनिवार्य कर दे। भाषण शपथ पत्र नहीं होते। वे जोर, संदर्भ और विषयवस्तु को दर्शाते हैं। कोई मंत्री राष्ट्रवाद, संघवाद, शिवाजी महाराज या समकालीन शासन के बारे में बात कर सकता है, वह किसी अहम व्यक्ति का नाम नहीं भी ले सकता है।

यदि ‘अपमान’ का मापदंड केवल उल्लेख न करने तक सीमित कर दिया जाए, तो कोई भी भाषण सुरक्षित नहीं रहेगा। हर भाषण को बाधित किया जा सकता है। हर मंत्री पर आरोप लगाया जा सकता है। हर चूक को दुर्भावना के रूप में पेश किया जा सकता है।

व्यक्तिगत शिकायत की आड़ में राजनीतिक सक्रियता

माधवी जाधव कोई आम नागरिक नहीं थीं जो असहमति व्यक्त कर रही हों। वह एक संवैधानिक समारोह में ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी थीं। सेवा नियम, प्रशासनिक अनुशासन और भारतीय राज्य की मूलभूत संरचना के अनुसार, नौकरशाहों और वर्दीधारी कर्मियों को आधिकारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते समय राजनीतिक रूप से तटस्थ रहना आवश्यक है।

लोकतंत्र विरोधी नहीं, घोर अनुशासनहीनता

मंत्री के माफी माँग लेने के बावजूद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग की गई। इससे पता चलता है कि यह टकराव संवैधानिक मूल्यों को लेकर नहीं, भावनात्मक आवेश में उठाया गया।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात उसकी प्रतिक्रिया थी। सियासत करने वालों ने माधवी के काम की तारीफ की अनुशासनहीनता को नजरअंदाज किया और कर्तव्य की अवहेलना करने के बावजूद उसे सराहा।

प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने पर भी अधिकारी का विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तारीफ की। मुंबई की कॉन्ग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि यह ‘हर स्वाभिमानी मराठी मानुष की आवाज’ है।

कॉन्ग्रेस नेता शमा मोहम्मद ने वन अधिकारी को ‘बहादुर’ बताया और संविधान के निर्माता का कथित तौर पर अपमान करने के आरोप में महाजन को तुरंत बर्खास्त करने की माँग की।

कॉन्ग्रेस का समर्थन करनेवाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वन अधिकारी की तारीफ की और उन्हें सलाम किया।

जब राजनीतिज्ञ ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों की अनुशासनहीनता का सार्वजनिक रूप से समर्थन करते हैं, तो वे वैचारिक टकराव को पुरस्कृत कर रहे होते हैं, दंडित नहीं। सरकारी कर्मचारियों से उम्मीद की जाती है कि वे निष्पक्ष रहें, लेकिन यहाँ मामला उल्टा हो गया।

संस्थाएँ होती हैं कमजोर

अंबेडकर की आलोचना, अनदेखी और पूजनीय बनाना एक और चिंताजनक पहलू है। ऐसा तब है जब डॉ. अंबेडकर स्वयं नायक पूजा के प्रबल आलोचक थे। संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “धर्म में भक्ति, आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है। लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा तानाशाही की ओर ले जाने वाला निश्चित मार्ग है।”

लेकिन आज, उनके नाम पर काम करने का दावा करने वाले कई लोगों ने उन्हें नायक बना दिया है, जिसके खिलाफ वे खुद थे। एक ऐसा प्रतीक जिसका नाम लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके बिना ये ईशनिंदा माना जाएगा।

यह श्रद्धांजलि नहीं, साधन के रूप में उपयोग है

सबसे अहम बात यह है कि ऐसे काम स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अंबेडकर का उल्लेख न करना कोई अपराध नहीं है। यह कदाचार भी नहीं है। गणतंत्र दिवस के भाषण में किसी भी विषय पर बात की जा सकती है और इसके लिए किसी निर्धारित वैचारिक ढाँचे का पालन करना अनिवार्य नहीं है।

यदि कल कोई मंत्री जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सावरकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस या किसी अन्य ऐतिहासिक व्यक्ति का नाम छोड़ दे, तो क्या इससे भी व्यवधान उत्पन्न करना उचित होगा? भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक यात्रा में सदियों से अनगिनत योगदानकर्ताओं का हाथ रहा है। कोई भी भाषण उन सभी का नाम नहीं ले सकता, और न ही इसकी अपेक्षा की जानी चाहिए।

भाषण को लेकर गुस्से की निरर्थकता को इस बात से भी समझी जा सकती है कि स्वतंत्रता के बाद से, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों या यहाँ तक कि कुछ प्रमुख हस्तियों ने गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर सैकड़ों भाषण दिए हैं। किसी को भी कभी भी सभी स्वतंत्रता सेनानियों या संविधान निर्माताओं के नाम गिनाने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। किसी पर भी भगत सिंह, विवेकानंद या अंबेडकर का ‘अपमान’ करने का आरोप नहीं लगाया गया है, सिर्फ इसलिए कि उनके नाम किसी विशेष भाषण में नहीं लिए गए।

तो फिर यह अपवाद क्यों?

इसका उत्तर सिद्धांतों में नहीं, राजनीति में निहित है।

सीआईएसएफ अधिकारी ने कंगना रनौत पर हमला किया

नासिक की घटना कोई छोटी बात नहीं है। यह दिखाता है कि नौकरशाही और वर्दीधारी सेवाओं का राजनीतिकरण कितना हुआ और लगातार होता ही जा रहा है। हाल में सबसे चर्चित उदाहरण 2024 की वह घटना है, जब सीआईएसएफ अधिकारी कुलविंदर कौर ने कथित तौर पर हवाई अड्डे पर सांसद कंगना रनौत को थप्पड़ मारा था। कौर ने बाद में रनौत की किसान विरोध प्रदर्शनों पर की गई टिप्पणियों का हवाला देकर अपने कृत्य को सही ठहराया था।

कुलविदर का थप्पड़ मारना सुरक्षा और प्रोटोकॉल दोनों का ही उल्लंघन था। लेकिन इसके बाद जो हुआ वह और भी चिंताजनक था। कौर को निलंबित और स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन संस्थागत स्तर पर इसकी कोई कड़ी निंदा नहीं हुई। इसके बजाय, सार्वजनिक हस्तियों ने खुलेआम हमले को ‘सामान्य’ बताया। संगीतकार विशाल ददलानी ने तो कार्रवाई होने पर उन्हें नौकरी दिलाने का भी प्रस्ताव रखा। राजनीतिक समर्थकों ने उनके आचरण को विरोध का साहसी आवाज कहा।

इससे जो संदेश गया वह यह था कि यदि राजनीतिक विचार से सहमत न हो तो राजनीतिज्ञों का विरोध करने का अधिकार ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों को भी है, लेकिन ये कैसे हो सकता है?

नासिक की घटना इसी तर्क को पुष्ट करती है। अधिकारी को साहसी के रूप में चित्रित किया गया है। मंत्री, माफी माँगने के बावजूद दोषी के रूप में पेश किए जाते हैं, क्योंकि वे भाजपा से हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी है। इसलिए कॉन्ग्रेस समर्थकों का वह निशाना बनते हैं। अनुशासन को दमन के रूप में देखा जाता है। तटस्थता को नैतिक कायरता बताकर खारिज कर दिया जाता है।

बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के नए नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया। गणतंत्र दिवस पर बरेली नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने इस प्रवृत्ति को और भी स्पष्ट कर दिया है। हालाँकि इस्तीफा देना एक व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन अग्निहोत्री द्वारा अपने इस्तीफे को सरकारी नीतियों के खिलाफ राजनीतिक विरोध के रूप में पेश करना एक बार फिर प्रशासन और राजनीति के बीच की रेखा को धुँधला करता है।

संवैधानिक लोकतंत्र के लिए निष्पक्ष प्रशासन जरूरी

सरकारी और प्रशासनिक सेवा में शामिल व्यक्ति पर निष्पक्ष होने की जिम्मेदारी है। वो किसी संगठन का हिस्सा नहीं बन सकते। उनकी तटस्थता ही देश और समाज के लिए जरूरी है। एक बार जब अधिकारी स्वयं को निर्णायक समझने लगते हैं और व्यक्तिगत या वैचारिक विश्वास के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधियों का विरोध करने के लिए सशक्त हो जाते हैं, तो सत्ता की श्रृंखला टूटती है।

आज अंबेडकर का नाम नहीं लेने पर सरकारी अधिकारी को शिकायत है। कल जाति, धर्म, भाषा, आरक्षण नीति या आस्था भी इसका कारण हो सकती है। यदि हर अधिकारी को लगता है कि उसे ड्यूटी के दौरान व्यवधान डालने, नाटकीय ढंग से इस्तीफा देने या राजनेताओं के साथ दुर्व्यवहार करने का अधिकार है, तो शासन व्यवस्था ठप्प हो जाएगी।

गणतंत्र दिवस केवल संविधान को अपनाने और मानने का ही दिन नहीं है, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था, संयम, प्रक्रिया, संस्थागत सीमाओं और भूमिकाओं के प्रति सम्मान का भी दिन है। नासिक की घटना में इन सभी सिद्धांतों का उल्लंघन किया।

कर्तव्य के दौरान राजनीतिक सक्रियता साहस नहीं है। यह कर्तव्य का उल्लंघन है। और जब ऐसे उल्लंघन को सराहा जाता है, प्रोत्साहित किया जाता है और उसका राजनीतिकरण किया जाता है, तो यह अपवाद नहीं रह जाता, बल्कि एक संक्रामक रोग बन जाता है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ लिंक करें)

होमी भाभा-संजय गाँधी से जनरल रावत और अजित पवार तक: 1965 से 2026 तक का वो खौफनाक इतिहास, जब हवाई दुर्घटनाओं में दिग्गजों ने गँवाई जान

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार (28 जनवरी 2026) सुबह बारामती में एक विमान हादसे में दुखद निधन हो गया। मुंबई से उड़ान भरने के बाद लैंडिंग के दौरान उनका चार्टर्ड प्लेन अनियंत्रित होकर खेतों में जा गिरा और धू-धू कर जल उठा। इस हादसे ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया है। अजित पवार अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे कई काले पन्नों से भरा है जब ‘आसमानी सफर’ ने देश के कई राजनेताओं को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।

जब सरहद पर पाकिस्तानी हमले का शिकार हुआ गुजरात के मुख्यमंत्री का विमान

19 सितंबर 1965 की वह शाम भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक पन्नों में से एक है, जब गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता का विमान पाकिस्तानी वायु फौज ने बीच हवा में मार गिराया था। भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान मेहता अपनी पत्नी सरोजबेन, तीन स्टाफ सदस्यों और एक पत्रकार के साथ कच्छ सीमा के दौरे पर थे। जैसे ही उनका विमान मीठापुर से उड़ा, पाकिस्तानी फाइटर जेट के पायलट कैश हुसैन ने उसे घेर लिया।

विमान उड़ा रहे रिटायर्ड पायलट जहाँगीर इंजीनियर ने विंग्स हिलाकर दया का संकेत भी दिया, लेकिन पाकिस्तानी फौज के आदेश पर महज 100 मीटर की ऊँचाई पर विमान को मिसाइल से नेस्तनाबूद कर दिया गया। इस कायराना हमले में मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी समेत विमान में सवार सभी 8 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। यह देश के लोकतांत्रिक इतिहास की पहली और इकलौती घटना थी, जब युद्ध के दौरान किसी मुख्यमंत्री के नागरिक विमान को निशाना बनाया गया।

आल्प्स की पहाड़ियों में दफन हुआ भारत का ‘परमाणु सपना’

24 जनवरी 1966 की वह सर्द सुबह भारत के लिए एक ऐसी त्रासदी लेकर आई, जिसने देश के वैज्ञानिक भविष्य की नींव हिला दी। भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक और महान वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा एयर इंडिया के विमान ‘कंचनजंघा’ से जिनेवा जा रहे थे, तभी फ्रेंच आल्प्स की माउंट ब्लांक चोटियों से टकराकर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस खौफनाक हादसे में भाभा समेत सभी 117 लोगों की मौत हो गई। हालाँकि, आधिकारिक रिपोर्ट ने इसे नेविगेशनल गलती बताया, लेकिन महज 18 महीने में परमाणु बम बनाने का दावा करने वाले भाभा की मौत पर आज भी साजिश के बादल मंडराते हैं। कई थ्योरीज दावा करती हैं कि भारत की परमाणु शक्ति को रोकने के लिए सीआईए (CIA) ने विमान में बम लगाया था। ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री के निधन के महज दो हफ्ते बाद हुई इस घटना ने पूरे राष्ट्र को एक गहरे शून्य में धकेल दिया था।

संजय गाँधी की वो आखिरी उड़ान: रोमांच जब बन गया काल

अजित पवार के प्लेन क्रैश ने आज पूरे देश को 46 साल पुराने उस मंजर की याद दिला दी, जिसने इंदिरा गाँधी के लाडले संजय गाँधी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था। 23 जून 1980 की वो सुबह दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट पर आम दिनों जैसी ही थी, जब 33 साल के तेजतर्रार नेता संजय गाँधी अपने नए ‘पिट्स एस-2ए’ विमान में सवार हुए। इंदिरा गाँधी के उत्तराधिकारी माने जाने वाले संजय गाँधी अपनी बेबाक शैली और युवाओं में जबरदस्त पैठ के लिए जाने जाते थे। उस दिन वे काफी उत्साहित थे और सुबह करीब 8 बजे अपने प्रशिक्षक सुभाष सक्सेना के साथ हवा में कलाबाजियाँ दिखाने के लिए उड़ान भरी।

अगले 11 मिनट तक आसमान में रोमांच का खेल चलता रहा। विमान कभी गोते लगाता तो कभी अचानक ऊँचाई छूता। लेकिन 12वें मिनट में जैसे ही संजय गाँधी ने खतरनाक करतब दिखाने के लिए विमान को नीचे झुकाया, अचानक इंजन बंद हो गया। देखते ही देखते विमान जमीन पर आ गिरा और सब कुछ खत्म हो गया। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अस्पताल पहुँचीं और बेटे का बेजान शरीर देखा तो वे फफक कर रो पड़ीं। उस एक हादसे ने न केवल एक माँ की गोद सूनी की, बल्कि देश की राजनीति का रुख भी हमेशा के लिए बदल दिया।

माधवराव सिंधिया: नियति का वो क्रूर फैसला और ग्वालियर का ‘काला रविवार’

30 सितंबर 2001 की वह सुबह ग्वालियर के लिए किसी आम दिन जैसी ही शुरू हुई थी, लेकिन दोपहर होते-होते आसमान से आई एक खबर ने पूरे देश को सन्न कर दिया। कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और ग्वालियर के ‘महाराज’ माधवराव सिंधिया को उस दिन वास्तव में कानपुर की एक रैली में नहीं जाना था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तबीयत खराब होने के कारण सिंधिया जी ने उनके स्थान पर रैली में जाने का फैसला किया। उन्होंने सुबह फोन पर अपने करीबियों से कहा था कि शाम को लौटकर मीटिंग करेंगे, पर वह शाम कभी नहीं आई। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के करहल में भारी बारिश के बीच उनका निजी ‘सेसना’ विमान आग का गोला बनकर खेतों में जा गिरा।

जैसे ही यह खबर फैली कि विमान में माधवराव सिंधिया सवार थे, ग्वालियर से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया। ग्वालियर की सड़कों पर सन्नाटा पसर गया और हजारों लोग बदहवास होकर ‘जयविलास पैलेस’ की ओर दौड़ पड़े। शहर के 90 फीसदी घरों में उस शाम चूल्हा नहीं जला था। हर आँख नम थी और हर दिल अपने लाडले नेता के लिए दुआ कर रहा था। उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब का वो मंजर ऐतिहासिक था। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पूरी संसद को एक विमान से ग्वालियर लाने का फैसला किया था। महात्मा गाँधी के बाद यह देश का पहला ऐसा शोक जलसा था, जहाँ किसी गैर-पदेन नेता के लिए लाखों लोग बिलख-बिलख कर सड़कों पर उतर आए थे।

जीएमसी बालयोगी: लोकसभा के वो ‘सबसे युवा’ अध्यक्ष जिनका सफर तालाब में थम गया

गंती मोहन चंद्र बालयोगी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने महज 51 साल की उम्र में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। वे लोकसभा के सबसे युवा और पहले दलित अध्यक्ष थे, जिन्हें उनकी शालीनता और कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहने के लिए जाना जाता था। एक वकील और मजिस्ट्रेट से अपना करियर शुरू करने वाले बालयोगी ने संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए कई कड़े सुधार किए। उन्होंने ही सबसे पहले सदन के ‘वेल’ में हंगामा करने वाले सांसदों के स्वतः निलंबन का नियम बनाया और सांसदों के लिए आचार संहिता लागू की। साल 2001 के संसद हमले के बाद सुरक्षा पुख्ता करने में भी उनकी भूमिका अहम रही थी।

3 मार्च 2002 की वह सुबह उनके जीवन की आखिरी सुबह साबित हुई। आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में सफर के दौरान उनका ‘बेल 206’ हेलीकॉप्टर तकनीकी खराबी और घने कोहरे का शिकार हो गया। पायलट को धुँध के कारण रास्ता नहीं दिखा और उसने जमीन समझकर हेलीकॉप्टर को एक तालाब में उतारने की कोशिश की, जिससे यह भयानक हादसा हो गया। इस क्रैश में बालयोगी समेत उनके सुरक्षा अधिकारी और पायलट की मौके पर ही मौत हो गई। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि उनके अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर को विजयवाड़ा, हैदराबाद और दिल्ली ले जाया गया, जहाँ हजारों लोगों ने नम आँखों से अपने प्रिय ‘शांतिदूत’ को विदाई दी।

सहारनपुर के आसमान में थमी ओपी जिंदल और सुरेंद्र सिंह की धड़कनें

31 मार्च 2005 की वह दोपहर हरियाणा की राजनीति के लिए एक काला साया लेकर आई, जब सहारनपुर के पास हुए एक हेलिकॉप्टर क्रैश में दिग्गज बिजनेसमैन और तत्कालीन ऊर्जा मंत्री ओम प्रकाश जिंदल का निधन हो गया। वे चंडीगढ़ से दिल्ली जा रहे थे, तभी अचानक हेलिकॉप्टर के इंजन में खराबी आ गई। इस भयानक हादसे में जिंदल के साथ हरियाणा के कृषि मंत्री चौधरी सुरेंद्र सिंह और पायलट कर्नल टीएस चौहान की भी मौके पर ही मौत हो गई।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हेलिकॉप्टर के गिरते समय सुरेंद्र सिंह को दिल का दौरा पड़ा था, जबकि ओपी जिंदल का सिर खिड़की से टकराने की वजह से उन्हें जानलेवा चोट आई। इस दुर्घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था क्योंकि जिस हेलिकॉप्टर ने यह गोता खाया था, वह बिल्कुल नया था।

वाई एस राजशेखर रेड्डी: पहाड़ियों में खो गया आंध्र का नायक

2 सितंबर 2009 की वह सुबह आंध्र प्रदेश के लिए किसी काल से कम नहीं थी। मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी (YSR) अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘प्रजापथम’ के लिए चित्तूर जिले की ओर निकले थे। सुबह 8:38 बजे जब उनके बेल-430 हेलीकॉप्टर ने हैदराबाद के बेगमपेट एयरपोर्ट से उड़ान भरी तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह उनकी आखिरी यात्रा होगी। करीब एक घंटे बाद, जब हेलीकॉप्टर नल्लामाला के घने और खतरनाक जंगलों के ऊपर से गुजर रहा था, अचानक ATS से उसका संपर्क टूट गया। पूरा सरकारी अमला और सुरक्षा एजेंसियाँ सन्न रह गईं। बारिश इतनी तेज थी कि घंटों तक कुछ पता नहीं चला और अफवाहें उड़ने लगीं कि कहीं नक्सलियों ने मुख्यमंत्री का अपहरण तो नहीं कर लिया?

अगले 24 घंटे तक पूरा देश साँसें थामकर टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहा। तलाशी अभियान में सेना के सुखोई विमान, इसरो के सैटेलाइट और थर्मल इमेजिंग की मदद ली गई। अगले दिन सुबह करीब 9:20 बजे वायुसेना को ‘पसुरुतला’ पहाड़ियों (पिजन हिल के सामने) पर हेलीकॉप्टर का मलबा दिखा। जब राहतकर्मी और मीडिया की टीमें वहाँ पहुँचीं, तो मंजर खौफनाक था। हेलीकॉप्टर के टुकड़े पाँच एकड़ में बिखरे थे और इंजन जलकर खाक हो चुका था।

डीजीसीए (DGCA) की जाँच में खुलासा हुआ कि यह कोई साजिश नहीं, बल्कि एक तकनीकी चूक और पायलट की गलती थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हेलीकॉप्टर के गियरबॉक्स में खराबी आ गई थी और उसे ठीक करने के चक्कर में पायलटों ने नियंत्रण खो दिया। साथ ही, उड़ान से पहले जरूरी सुरक्षा जाँच भी पूरी नहीं की गई थी।

तवांग की पहाड़ियों में खो गए दोरजी खांडू, पाँच दिन बाद मिला मलबा

30 अप्रैल 2011 की सुबह अरुणाचल प्रदेश के लिए एक काले साये की तरह आई, जब मुख्यमंत्री दोरजी खांडू का पवन हंस हेलीकॉप्टर तवांग से ईटानगर जाते समय रहस्यमयी तरीके से लापता हो गया। उड़ान भरने के महज 20 मिनट बाद, 13,000 फीट ऊँचे सेला दर्रे के पास पहुँचते ही एटीसी से उनका संपर्क टूट गया। अगले पाँच दिनों तक पूरा देश और राज्य सरकार गहरी चिंता में रही, क्योंकि खराब मौसम और भारी बर्फबारी के बीच भारतीय वायु सेना के सुखोई विमान और इसरो के सैटेलाइट भी मलबे का सटीक पता नहीं लगा पा रहे थे।

आखिरकार, बुधवार सुबह चीन सीमा के पास लुगुथांग गाँव के लोगों ने मलबे की सूचना दी, जहाँ मुख्यमंत्री का निर्जीव शरीर और दुर्घटनाग्रस्त हेलीकॉप्टर के अवशेष मिले थे। इस दिल दहला देने वाले हादसे में मुख्यमंत्री के साथ सवार चार अन्य लोगों की भी दुखद मौत हो गई थी।

जनरल बिपिन रावत: कुन्नूर की पहाड़ियों में थम गई देश के पहले ‘चीफ’ की सांसें

8 दिसंबर 2021 का वो काला दिन भारत कभी नहीं भूल सकता, जब तमिलनाडु के कुन्नूर की पहाड़ियों में हुए एक दर्दनाक हेलीकॉप्टर हादसे ने देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत को छीन लिया। जनरल रावत अपनी पत्नी मधुलिका रावत और 11 अन्य सैन्य कर्मियों के साथ Mi-17 V5 चॉपर में सवार होकर वेलिंगटन जा रहे थे। रक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट और जाँच से साफ हुआ है कि यह हादसा किसी तकनीकी खराबी या साजिश का नतीजा नहीं था, बल्कि अचानक बदले मौसम और घने बादलों की वजह से हुई ‘पायलट की चूक’ (ह्यूमन एरर) थी। चश्मदीदों ने बताया कि विमान तेजी से पेड़ों से टकराया और पल भर में आग के गोले में तब्दील हो गया।

हैरानी की बात यह है कि जनरल रावत के हेलीकॉप्टर को ‘मास्टर ग्रीन’ कैटेगरी का क्रू उड़ा रहा था, जो सबसे कम विजिबिलिटी में भी विमान संभालने में माहिर माने जाते हैं। 16 मार्च 1958 को जन्मे जनरल रावत का सैन्य सफर 1978 में गोरखा राइफल्स से शुरू हुआ था और अपनी काबिलियत के दम पर वे भारतीय सेना के प्रमुख और फिर देश के पहले सीडीएस बने। 18वीं लोकसभा की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच वायुसेना के जो 34 हादसे हुए, उनमें कुन्नूर का यह क्रैश सबसे ज्यादा झकझोर देने वाला था। इस एक दुर्घटना ने न केवल एक जांबाज योद्धा को खो दिया, बल्कि भारतीय सैन्य नेतृत्व में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया जिसे भरना नामुमकिन है।

लंदन की उड़ान बनी आखिरी सफर, विमान हादसे में विजय रूपाणी का निधन

12 जून 2025 की वो तारीख गुजरात के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई, जब सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी एक भीषण विमान हादसे का शिकार हो गए। वे अहमदाबाद एयरपोर्ट से एयर इंडिया की फ्लाइट के जरिए अपनी बेटी से मिलने लंदन जा रहे थे। चश्मदीदों के मुताबिक, टेक-ऑफ के कुछ ही देर बाद विमान अपना संतुलन खो बैठा और एक भयावह दुर्घटना का शिकार हो गया। इस रूह कँपा देने वाले हादसे में विजय रूपाणी समेत विमान में सवार सभी 241 यात्रियों की मौत हो गई। उनकी पहचान करना इतना मुश्किल था कि हादसे के कई दिनों बाद DNA मिलान के जरिए उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि हो सकी।

राजकोट में हुए उनके अंतिम संस्कार में जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहाँ हजारों लोगों ने अपने प्रिय नेता को नम आँखों से अंतिम विदाई दी। 21 तोपों की सलामी के बीच जब विजय रूपाणी का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ, तो पूरा शहर शोक की लहर में डूबा था। गुजरात ने अपना एक सादगी पसंद और मिलनसार नेता एक ऐसी आसमानी आफत में खो दिया, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।

भीषण धमाके, आग की लपटें और सब खाक: अजित पवार के विमान हादसे की आँखों देखी, शोक और शंकाओं के बीच जाँच शुरू

महाराष्ट्र के लिए बुधवार (28 जनवरी 2026) का दिन एक दर्दनाक और स्तब्ध कर देने वाली घटना लेकर आया। महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार की विमान हादसे में मौत की खबर ने देशभर में लोगों को स्तब्ध कर दिया। मुंबई से बारामती जाते समय जिस विमान में वह सवार थे, वह लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। खेतों में गिरे इस विमान में गिरते ही आग लग गई और कुछ ही पलों में वह पूरी तरह जलकर खाक हो गया। इस हादसे में विमान में सवार सभी 5 लोगों की मौत हो गई।

मुंबई से बारामती जा रहे थे अजित पवार

बुधवार को महाराष्ट्र के अजित पवार मुंबई से बारामती के लिए रवाना हुए थे। बारामती पहुँचकर उन्हें चुनाव प्रचार से जुड़े 4-5 कार्यक्रमों में शामिल होना था और जनसभाओं को संबोधित करना था। इसी सिलसिले में उन्होंने चार्टर विमान से यात्रा की थी। यह विमान बारामती एयरपोर्ट पर लैंडिंग की तैयारी में था लेकिन हवाई पट्टी तक पहुँचने से पहले ही हादसे का शिकार हो गया। बताया जा रहा है कि दुर्घटना स्थल रनवे से करीब तीन किलोमीटर पहले का इलाका था, जो खेतों और ग्रामीण क्षेत्र से घिरा हुआ है।

लैंडिंग के दौरान बिगड़ा संतुलन

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विमान जैसे ही नीचे उतरना शुरू हुआ, उसी दौरान उसका संतुलन बिगड़ता नजर आया। स्थानीय लोगों ने बताया कि विमान लैंडिंग की कोशिश में लड़खड़ा रहा था और कुछ सेकंड तक ऐसा लग रहा था कि वह सुरक्षित उतर जाएगा लेकिन पल भर में स्थिति बदल गई। देखते ही देखते विमान हवाई पट्टी से भटक गया और पास के खेतों की ओर जा गिरा। गिरते ही तेज आवाज हुई और आग की लपटें उठने लगीं।

लैंडिंग की दूसरी कोशिश में हादसा

लाइव फ्लाइट ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म Flightradar24 से मिले डेटा के मुताबिक, दुर्घटनाग्रस्त लियरजेट 45 (VT-SSK) विमान बारामती एयरपोर्ट पर उतरने की दूसरी कोशिश कर रहा था। जानकारी के अनुसार, पायलट ने पहली बार लैंडिंग का प्रयास किया लेकिन किसी कारणवश वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद विमान को दोबारा ऊंचाई पर ले जाकर रनवे पर उतारने की कोशिश की गई। एविएशन की भाषा में इस प्रक्रिया को गो-अराउंड कहा जाता है। दुर्भाग्यवश, दूसरी कोशिश के दौरान विमान नियंत्रण खो बैठा और जमीन पर गिर गया, जिससे यह हादसा हो गया।

Flightradar24 का डेटा

विमान क्रैश के बाद हुए 4-5 धमाके

हादसे के चश्मदीदों का कहना है कि विमान जमीन से टकराते ही उसमें आग लग गई। खेतों में गिरते ही विमान पूरी तरह आग की चपेट में आ गया। चारों ओर धुआँ फैल गया और कुछ ही क्षणों में आग ने विकराल रूप ले लिया। मलबे से उठती लपटें और तेज धमाकों की आवाज सुनकर आसपास के गाँवों से लोग मौके की ओर दौड़ पड़े।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विमान के क्रैश होने के तुरंत बाद 4-5 जोरदार धमाके हुए। हादसे के बाद विमान आग का गोला बन गया और लगातार विस्फोटों की आवाज आती रही। लोगों का कहना है कि धमाकों के कारण कोई भी व्यक्ति विमान के नजदीक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। आग की लपटें इतनी ऊँची थीं कि दूर से ही यह साफ नजर आ रहा था कि विमान पूरी तरह नष्ट हो चुका है।

प्रत्यक्षदर्शियों ने क्या बताया?

मौके पर मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि उसने अपनी आँखों से विमान को नीचे आते देखा। उसके अनुसार, विमान जब उतर रहा था तो ऐसा लग रहा था कि वह किसी भी क्षण गिर सकता है। कुछ ही सेकंड में वही हुआ और विमान खेतों की ओर जा गिरा। पहले किसी को अंदाजा नहीं था कि यह किसका विमान है। लोगों को लगा कि पास मौजूद पायलट ट्रेनिंग सेंटर का कोई विमान होगा। बाद में जानकारी मिली कि यह विमान महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता को लेकर आ रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, विमान गिरने से पहले काफी अस्थिर दिखाई दे रहा था और फिर करीब 200 फीट गहरी खाई की ओर जा गिरा। इसके बाद विस्फोट हुए और आग तेजी से फैल गई।

आग के कारण नहीं हो सकी मदद

हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोग मदद के लिए मौके पर पहुँचे। लोगों ने विमान से यात्रियों को बाहर निकालने की कोशिश भी की लेकिन आग इतनी तेज थी कि कोई भी पास नहीं जा सका। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आग और धमाकों के कारण हालात बेहद भयावह थे। कई लोगों की आँखों के सामने यह हादसा हुआ और वे चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई और कुछ ही देर में वहाँ भीड़ जमा हो गई।

उस विमान की कहानी जिसमें सवार थे अजित पवार

जिस विमान में अजित पवार सवार थे, वह VSR वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित और VT-SSK के रूप में पंजीकृत Learjet 45XR था। यह कंपनी भारत की प्रमुख नॉन-शेड्यूल्ड यानी चार्टर विमान ऑपरेटिंग कंपनियों में से एक है। Learjet 45XR एक हाई-परफॉर्मेंस सुपर-लाइट बिजनेस जेट है, जिसे तेज रफ्तार, बेहतर फ्यूल एफिशिएंसी और ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता के लिए जाना जाता है। यह विमान आमतौर पर शॉर्ट और मीडियम रूट्स की उड़ानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

Learjet 45XR का विंगस्पैन करीब 47 फीट बताया जाता है और इसका वजन लगभग 9,752 किलोग्राम है। यह विमान 1990 के दशक में डिजाइन किया गया था और इसे सुपर-लाइट बिजनेस जेट कैटेगरी में Cessna Citation Excel के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था। इस विमान के केबिन में खड़े होने की जगह नहीं होती लेकिन Learjet सीरीज की पहचान हमेशा हाई-स्पीड परफॉर्मेंस रही है। इसी वजह से इसे बिजनेस और चार्टर फ्लाइट्स के लिए पसंद किया जाता रहा है।

VSR वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना वीके सिंह द्वारा की गई थी और कंपनी का मालिकाना हक भी उनके पास है। यह कंपनी प्राइवेट जेट चार्टर, हेलिकॉप्टर रेंटल, मेडिकल इवैकुएशन यानी एयर एम्बुलेंस और एयरक्राफ्ट लीजिंग जैसी सेवाएँ देती है। कंपनी की फ्लीट में Learjet 45XR के अलावा Beechcraft Super King Air B200 और Agusta 109 हेलिकॉप्टर जैसे विमान भी शामिल हैं। इसका हेड ऑफिस नई दिल्ली के महिपालपुर में स्थित है और कंपनी एंड-टू-एंड एविएशन कंसल्टेंसी और एयरक्राफ्ट मैनेजमेंट सेवाएँ भी देती है।

शोक और शंकाएँ

अजित पवार के निधन पर देश भर में शोक की लहर दौड़ गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से लेकर प्रधानमंत्री मोदी और तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों, नेताओं और अन्य हस्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। हालाँकि, शोक के बीच इस हादसे को लेकर संदेह भी जताया जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई नेताओं ने इस हादसे की जाँच की माँग की है। हादसे की जाँच करने की माँग करने वाले लोगों में अजित पवार के साथी और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और सपा के नेता एसटी हसन भी शामिल हैं।

ममता बनर्जी ने कहा, “यहाँ नेता भी सुरक्षित नहीं हैं। मुझे नहीं पता क्या दिक्कत है। मुझे पता चला था कि वो बीजेपी की सरकार का नेतृत्व करने वाले हैं और आज अचानक उनका निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सही जाँच होनी चाहिए। क्या यह बेवजह डर फैलाना है या कोई साजिश।”

हादसे के कारणों की होगी जाँच

फिलहाल इस भीषण विमान हादसे के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। शुरुआती तौर पर यह कहा जा रहा है कि लैंडिंग के दौरान विमान का कंट्रोल बिगड़ गया था। वहीं, नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने बताया है कि दुर्घटना स्थल का निरीक्षण करने और जाँच शुरू करने के लिए विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो की टीम बारामती के लिए रवाना हो गई है और इस हादसे की जाँच करेगी।

‘संगीत के एक युग का अंत’: लोगों के दिलों पर राज करने वाले सिंगर अरिजीत सिंह ने छोड़ी ‘प्लेबैक सिंगिंग’; जानें उनके निजी जीवन से लेकर हासिल किए मुकाम तक सबकुछ

म्यूजिक प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले बॉलीवुड के फेमस सिंगर अरिजीत सिंह ने अचानक प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास लेकर अपने फैंस को चौंका दिया। सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर खुद अरिजीत ने इस फैसले के पीछे कई कारण बताए हैं। यह खबर सुनकर सोशल मीडिया पर लोग इसे संगीत के ‘एक युग का अंत’ बता रहे हैं।

सबसे पहले इंस्टाग्राम पर अरिजीत सिंह ने अपने संन्यास लेने की जानकारी दी। उन्होंने लिखा, “हेलो, आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। इतने वर्षों तक श्रोताओं के रूप में मुझे इतना प्यार देने के लिए आप सभी का धन्यवाद। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि अब से मैं प्लेबैक सिंगर के रूप में कोई नया काम नहीं लूँगा। मैं इस पेशे को अलविदा कह रहा हूँ। यह एक शानदार सफर रहा।”

इंस्टाग्राम पर प्लैबैक सिंगिग छोड़ने का ऐलान करते अरिजीत सिंह का पोस्ट (फोटो साभार: Instagram-arijitsingh)

यह खबर सामने आते ही हर उस इंसान का दिल भारी हो गया, जिसने कभी अरिजीत की आवाज में अपना दर्द, अपना प्यार और अपनी तन्हाई सुनी थी। सोशल मीडिया लोगों ने इसे संगीत के एक ‘युग का अंत’ बताया है। अरिजीत के फैंस उनके संन्यास लेने के पीछे की वजह जानने के लिए भी उत्सुक थे। तभी अरिजीत सिंह ने अपने प्राइवेट ‘एक्स’ अकाउंट पर इसके पीछे कई कारण बताए।

अरिजीत सिंह के संन्यास लेने के पीछे कारण

इस साल 2026 में अरिजीत सिंह के पास कई प्रोजेक्ट्स लाइनअप में थे। लेकिन अब वे कोई नया प्रोजेक्ट साइन नहीं करेंगे। यह खुद अरिजीत सिंह ने फैंस को बताया है। उन्होंने अपने प्राइवेट ‘एक्स’ अकाउंट पर ट्वीट कर प्लेबैक सिंगिंग छोड़ने का कारण भी बताया।

उन्होंने लिखा, “इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है, कई कारण हैं और मैं काफी लंबे समय से यह करने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार मैंने सही हिम्मत जुटाई। एक कारण तो सरल है- मैं जल्दी बोर हो जाता हूँ। इसीलिए मैं स्टेज पर वही गाने अलग-अलग अरेंजमेंट्स में परफॉर्म करता हूँ। तो बात ये है कि मुझे बोरियत हो गई। मुझे कुछ दूसरा म्यूजिक करने की जरूरत है ताकि जी सकूँ।”

इसके अलावा एक और कारण बताते हुए अरिजीत सिंह ने कहा, “मैं किसी नए सिंगर को उभरते हुए देखकर असली मोटिवेशन पाना चाहता हूँ।” उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास अब भी कुछ पेंडिंग प्रोजेक्ट्स हैं, जिन्हें वह पूरा करेंगे। इसीलिए हो सकता है कि इस साल भी अरिजीत के कुछ गाने रिलीज होते देखने को मिलें।

उन्होंने फैंस को एक और बात साफ कही, “मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं संगीत बनाना बंद नहीं करूँगा।”

अरिजीत सिंह का निजी जीवन

अरिजीत सिंह का निजी जीवन भी उनकी आवाज की तरह ही शांत, सादा और दिखावे से दूर रहा है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में जन्मे अरिजीत सिंह को बचपन से ही संगीत का माहौल मिला। सिख परिवार से ताल्लुक रखने वाले अरिजीत के पिता कक्कर सिंह और माँ अदिति सिंह ने उनकी संगीत के प्रति रूचि को समझा और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दियाष

अपने ही शहर में अरिजीत ने शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग ली और बहुत कम उम्र में सुरों से गहरा रिश्ता बना लिया। बाद में करीब 18 साल की उम्र में उन्हें टीवी रियलिटी शो ‘फेम गुरुकुल’ में हिस्सा लिया, जहाँ से उन्हें पहली बार पहचान मिली।

शोहरत मिलने के बाद भी अरिजीत ने अपनी निजी जिंदगी को हमेशा निजी ही रखा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2013 में उनकी पहली शादी ‘फेम गुरुकुल’ की ही साथी कंटेस्टेंट रूपरेखा बनर्जी से हुई, लेकिन यह रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चल सका और दोनों का तलाक हो गया।

इसके एक साल बाद 2014 में अरिजीत ने तारापीठ मंदिर में कोयल रॉय से शादी की। बताया जाता है कि कोयल की पहले की शादी से एक बेटी भी है। इतनी बड़ी लोकप्रियता के बावजूद अरिजीत आज भी लाइमलाइट से दूर, अपने परिवार और संगीत के बीच एक साधारत जिंदगी जीना पसंद करते हैं।

म्यूजिक इंडस्ट्री में अरिजीत सिंह का 14 साल का करियर

आज जब 38 साल के अरिजीत सिंह ने प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपना करियर खत्म करने का ऐलान किया है, तो यह जानने की जरूरत है कि उन्होंने एक दशक से ज्यादा तक फैंस के दिलों पर राज किया। अरिजीत सिंह ने अपने म्यूजिक करियर की शुरुआत साल 2005 में की थी।

उस वक्त वह टीवी रियलिटी शो ‘फेम गुरुकुल‘ में नजर आए थे। हालाँकि, वह शो जीत नहीं पाए, लेकिन उनकी आवाज ने लोगों का ध्यान जरूर खींच लिया। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और म्यूजिक सीखते रहे, छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स पर काम किया और इंडस्ट्री में खुद को टिकाए रखा।

शुरुआती साल अरिजीत सिंह के लिए आसान नहीं थे। कई सालों की मेहनत के बाद 2011 में फिल्म ‘मर्डर 2’ का गाना ‘फिर मोहब्बत’ का बड़ा कदम बना। लेकिन असली पहचान उन्हें 2013 में फिल्म ‘आशिकी 2’ के गाने ‘तुम ही हो’ से मिली। इस एक गाने ने अरिजीत को हर दिल की आवाज बना दिया।

इसके बाद चन्ना मेरेया, अगर तुम साथ हो, राब्ता, ऐ दिल है मुश्किल जैसे गानों ने उनके सफर को ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। एक शांत , सादा-सा लड़का अपनी मेहनत और सुरों के दम पर म्यूजिक इंडस्ट्री का सबसे बड़ा नाम बन गया और यही अरिजीत सिंह का असली सफर है।

अरिजीत सिंह को पद्म श्री समेत कई सम्मान मिले

अरिजीत सिंह के अवॉर्ड्स उनकी आवाज और मेहनत की सबसे बड़ी पहचान हैं। उन्होंने अपने करियर में इतने सम्मान हासिल किए कि बहुत कम सिंगर्स उस मुकाम तक पहुँच पाए। फिल्मफेयर अवॉर्ड अरिजीत के करियर का सबसे अहम पड़ाव माना जाता है। उन्हें पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड साल 2014 में ‘आशिकी 2’ के सुपरहिट गाने ‘तुम ही हो’ के लिए मिला।

इसके बाद उन्होंने साल 2016 में ‘सोच न सके’ (एयरलिफ्ट), 2017 में ‘चन्ना मेरेया’ (ऐ दिल है मुश्किल), 2019 में ‘ऐ वतन’ (राजी) और 2023 में ‘केसरिया’ (ब्रह्मास्त्र) के लिए बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता। इतने कम समय में बार-बार यह अवॉर्ड जीतना फैंस के बीच उनकी आवाज की लोकप्रियता का सबूत बनी।

इसके साथ ही ‘नेशनल फिल्म अवॉर्ड’ अरिजीत के करियर का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है। उन्हें 2019 में फिल्म ‘पद्मावत’ के गाने ‘बिन्ते दिल’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर) से सम्मानित किया गया। इसके अलावा अरिजीत सिंह को IIFA अवॉर्ड्स में भी कई बार सम्मान मिला।

‘तुम ही हो’, ‘चन्ना मेरेया’ और ‘केसरिया’ जैसे गानों के लिए उन्हें IIFA में बेस्ट मेल सिंगर चुना गया। इसी तरह जी सिने अवॉर्ड्स, स्क्रीन अवॉर्ड्स, स्टार गिल्ड अवॉर्ड्स और मिर्ची म्यूजिक अवॉर्ड्स में भी वह बार-बार बेस्ट सिंगर के तौर पर सम्मानित होते रहे। खास बात यह रही कि कई सालों तक एक ही साल में उन्हें अलग-अलग अवॉर्ड शोज में एक साथ सम्मान मिला।

सरकार ने भी अरिजीत के संगीत में योगदान को पहचाना और उन्हें साल 2025 में पद्म श्री से सम्मानित किया, जो संगीत के क्षेत्र में उनके लंबे और प्रभावशाली योगदान की आधिकारिक मान्यता है। इतने बड़े-बड़े अवॉर्ड्स मिलने के बावजूद अरिजीत सिंह ने कभी खुद को सेलिब्रिटी के तौर पर नहीं दर्शाया। वह सादी जिंदगी जीते हुए लोगों का प्यार बँटोरते रहे।

लग्जरी कारों से लेकर विदेशी वाइन और दवाओं तक, ‘मदर ऑफ ऑल डील’ से सब होगा सस्ता: जानिए भारत-EU के महा-समझौते की पूरी ABCD

भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने मंगलवार (27 जनवरी 2026) को वैश्विक व्यापार के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। करीब 18 सालों की लंबी बातचीत के बाद नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में मुक्त व्यापार समझौते यानि फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर इआधिकारिक हस्ताक्षर हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के व्यापारिक इतिहास का सबसे बड़ा और अहम समझौता करार दिया। इस डील से न केवल 27 यूरोपीय देशों के बाजार भारतीयों के लिए खुलेंगे, बल्कि आम जनता के लिए लग्जरी कारों से लेकर विदेशी वाइन और कैंसर की दवाओं तक, बहुत कुछ सस्ता होने वाला है।

क्या है यह ‘मदर ऑफ ऑल डील’ और क्यों है इतनी खास?

यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ (यानी सभी समझौतों की जननी) कहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों को व्यापार के जरिए एक-दूसरे से जोड़ता है। अगर दुनिया की कुल कमाई (GDP) को देखें, तो उसका चौथा हिस्सा (25%) अकेले भारत और यूरोप के पास है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा है कि यह डील ऐसी बनाई गई है जिससे भारत और यूरोप, दोनों की तरक्की हो।

यह समझौता भारत के लिए एक बड़ी जीत है क्योंकि अब व्यापार के लिए हमें सिर्फ चीन या अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। पीएम मोदी के अनुसार, यह डील आपसी भरोसे और बराबरी के रिश्ते पर टिकी है। इस महा-समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि साल 2032 तक यूरोप को भेजा जाने वाला भारत का सामान दोगुना हो जाएगा, जिससे देश में लाखों युवाओं के लिए नौकरी के नए मौके खुलेंगे।

आम जनता के लिए खुशखबरी: क्या-क्या होने वाला है सस्ता?

इस ऐतिहासिक समझौते का सबसे बड़ा फायदा आपकी जेब को होने वाला है। अब यूरोप से आने वाली 90% से ज्यादा चीजों पर या तो टैक्स बिल्कुल खत्म हो जाएगा या बहुत कम लगेगा। उदाहरण के लिए, मर्सिडीज, ऑडी और BMW जैसी शानदार कारें, जो पहले भारी टैक्स (110%) की वजह से बहुत महंँगी थीं, अब धीरे-धीरे सस्ती होंगी क्योंकि उन पर टैक्स घटकर सिर्फ 10% रह जाएगा।

खाने-पीने के शौकीनों के लिए तो यह किसी लॉटरी जैसा है। विदेशी वाइन पर लगने वाला भारी टैक्स 150% से घटकर सिर्फ 20% रह जाएगा और बीयर के दाम भी करीब आधे हो जाएँगे। साथ ही, इटली का पास्ता, चॉकलेट, जैतून का तेल (Olive Oil) और विदेशी फलों के जूस अब आपके घर के बजट में फिट हो सकेंगे क्योंकि इन पर लगने वाला फालतू टैक्स हटा दिया गया है। सबसे बड़ी राहत सेहत को लेकर है। कैंसर की दवाइयाँ और इलाज में काम आने वाली आधुनिक मशीनें 11% तक सस्ती होंगी, जिससे आम आदमी के लिए इलाज का खर्च कम होगा।

राज्यों को मिलेगा बड़ा बूस्ट: पीयूष गोयल का ‘मास्टर मैप’

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक नक्शे (मैप) के जरिए बताया है कि यह डील भारत के हर राज्य के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इस समझौते की वजह से भारत के राज्यों से बाहर जाने वाले सामान (निर्यात) में करीब 6.4 लाख करोड़ रुपए की भारी बढ़ोतरी हो सकती है। आसान शब्दों में कहें तो, अब हमारे राज्यों में बना सामान यूरोप के बाजारों में जमकर बिकेगा।

जैसे, पंजाब और हरियाणा से मशीनों और फर्नीचर का व्यापार बढ़ेगा, तो गुजरात से हीरे-जवाहरात और रसायनों (केमिकल्स) की माँग बढ़ेगी। महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य दवाइयों और बिजली के सामान (इलेक्ट्रॉनिक्स) के बड़े केंद्र बन जाएँगे। वहीं, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे समुद्री किनारों वाले राज्यों से मछली, झींगा और मसालों को यूरोप भेजना बहुत आसान हो जाएगा। उत्तर प्रदेश और राजस्थान की मशहूर कलाकृतियों (हैंडीक्राफ्ट्स) और चमड़े के सामान को भी यूरोप के 27 देशों में बिना किसी रोक-टोक के बेचा जा सकेगा। यह हमारे छोटे और मंझोले व्यापारियों (MSME) के लिए तरक्की का सबसे बड़ा मौका है।

सुरक्षा और रक्षा में नई शुरुआत: अब मिलकर लड़ेंगे भारत और यूरोप

सिर्फ व्यापार ही नहीं, भारत और यूरोप ने एक ऐतिहासिक ‘सुरक्षा और रक्षा समझौता’ भी किया है। यूरोपीय नेता उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि आज की अशांत दुनिया में भारत और यूरोप जैसे दो बड़े लोकतांत्रिक देशों का साथ आना पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। जापान और दक्षिण कोरिया के बाद भारत एशिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है, जिसके साथ यूरोप ने इतना खास और गहरा रक्षा समझौता किया है।

इस समझौते का सीधा मतलब यह है कि अब भारत और यूरोप मिलकर आतंकवाद, इंटरनेट के जरिए होने वाले खतरों (साइबर अटैक) और समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर एक साथ काम करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह डील दिखाती है कि दोनों पक्षों के बीच भरोसा कितना बढ़ गया है। दुनिया में आज जो उथल-पुथल मची है, उसे देखते हुए भारत और यूरोप का यह कदम शांति और संतुलन बनाए रखने में बहुत मददगार साबित होगा।

भारतीय निर्यातकों की ‘चांदी’: कपड़ों से लेकर जेम्स-ज्वेलरी तक

यह डील सिर्फ विदेश से सामान खरीदने के बारे में नहीं है, बल्कि हमारे देश के व्यापारियों के लिए तरक्की का नया रास्ता है। इसका सबसे बड़ा फायदा हमारे कपड़ा उद्योग को होगा। अब तक भारतीय कपड़ों पर यूरोप में 10% टैक्स लगता था, जो अब बिल्कुल खत्म (जीरो) हो जाएगा। इससे हमारे कपड़े सस्ते होंगे और भारत इस मामले में वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों को पछाड़कर दुनिया में सबसे आगे निकल सकता है।

साथ ही, आईटी (IT) सेक्टर में काम करने वाले भारतीयों के लिए भी अच्छी खबर है। अब उनके लिए यूरोप में अपनी सेवाएँ देना और वहाँ जाकर काम करना बहुत आसान हो जाएगा। यही नहीं, हीरे-जवाहरात, खिलौने और चमड़े का सामान बेचने वाले व्यापारियों को भी अब बिना किसी भारी टैक्स के यूरोप के बड़े शहरों में अपना सामान बेचने का मौका मिलेगा। जानकारों का कहना है कि इस पूरे बदलाव से भारत के लाखों युवाओं को नौकरी के नए और बेहतर अवसर मिलेंगे।

एंटोनियो कोस्टा का ‘गोवा कनेक्शन’ और भावुक संदेश

यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने इस बड़ी मीटिंग में एक बहुत ही दिल छू लेने वाली बात कही। उन्होंने बड़े गर्व के साथ सबको बताया कि वे सिर्फ यूरोप के एक बड़े नेता ही नहीं हैं, बल्कि उनका भारत से गहरा रिश्ता है क्योंकि वे भारतीय मूल के नागरिक (OCI) भी हैं। उन्होंने कहा, “मेरा परिवार गोवा से ताल्लुक रखता है, जहाँ से मेरे पिता का परिवार विदेश गया था। इसीलिए, मेरे लिए यह समझौता सिर्फ व्यापार का मामला नहीं, बल्कि दिल का जुड़ाव है।”

कोस्टा ने महात्मा गाँधी की बात दोहराते हुए कहा कि दुनिया में शांति लड़ाई-झगड़े से नहीं, बल्कि सबको न्याय मिलने से आती है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारत और यूरोप के बीच हुआ यह समझौता करीब 200 करोड़ लोगों (2 अरब) के लिए तरक्की और भरोसे का एक नया दौर शुरू करेगा।

ग्रीन एनर्जी और जलवायु परिवर्तन पर बड़ा कदम

इस समझौते में धरती और पर्यावरण को बचाने का भी पूरा ध्यान रखा गया है। यूरोपीय संघ अगले दो सालों में भारत को प्रदूषण (ग्रीनहाउस गैसों) को कम करने के लिए करीब 500 मिलियन यूरो की बड़ी आर्थिक मदद देगा। साथ ही, दोनों ने मिलकर ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ यानी साफ-सुथरी ऊर्जा पर काम करने के लिए एक खास टीम (टास्क फोर्स) बनाने का फैसला किया है।

इसके अलावा, भारत और यूरोप ने मिलकर ‘इंडिया-मिडल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) को और मजबूत बनाने पर बात की। यह एक ऐसा रास्ता है जो भारत को खाड़ी देशों के जरिए यूरोप से सीधे जोड़ेगा। इससे न सिर्फ व्यापार बहुत तेज होगा, बल्कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना विकास करने में भी मदद करेगा।

समझौता क्या यह वाकई गेम-चेंजर है?

18 साल के लंबे इंतजार के बाद हुआ यह समझौता भारत के लिए पासा पलटने वाला साबित होगा। यह डील ऐसे समय पर हुई है जब दुनिया भर के बाजारों में काफी उथल-पुथल मची है। भारत ने बहुत समझदारी दिखाते हुए अपने किसानों और छोटे व्यापारियों के हितों को सुरक्षित रखा है। इसीलिए खेती-किसानी के सामान (डेयरी प्रोडक्ट्स) और छोटी कारों को इस समझौते से बाहर रखा गया है (25 लाख से कम की कारों पर टैक्स में कोई छूट नहीं दी गई है)।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस डील से ‘मेक इन इंडिया’ को पूरी दुनिया में नई पहचान मिलेगी। जब भारत में बना सामान यूरोप में बिना किसी अतिरिक्त टैक्स के बिकेगा, तो हमारे कारखानों में उत्पादन बढ़ेगा और लोगों को काम मिलेगा। इससे भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का सपना जल्द पूरा हो सकेगा। यह समझौता साफ़ तौर पर दिखाता है कि आज की दुनिया में भारत की आर्थिक ताकत कितनी तेज़ी से बढ़ रही है।

मोदी सरकार में हम विदेशी ताकतों के गुलाम नहीं: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर ट्रंप के दावों की बार-बार पोल खोल रहा भारत, UN से अमेरिका-पाकिस्तान को ‘ताकत का संदेश’

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNSC) में भारत ने एक बार फिर कोई नई बात नहीं कही, बल्कि वही बात दोहराई जिसे वह शुरू से कहता आ रहा है। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार निशाने पर पाकिस्तान ही नहीं, भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव रुकवाने का दावा करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी रहे। क्योंकि भारत ने ट्रंप के इस दावे को कभी नहीं माना। UN के मंच से साफ शब्दों में यह जता दिया गया कि भारत अपने फैसले खुद लेता है, किसी के दबाव में नहीं आता और न ही किसी को श्रेय बाँटने की राजनीति करता है।

यह पूरा मामला संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओपन डिबेट का है, जिसका विषय था- ‘अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन की पुन: पुष्टि शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के मार्ग।’ इसमें बात अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और बहुपक्षीय व्यवस्था की हो रही थी। लेकिन पाकिस्तान ने इस मंच को इस्तेमाल भी वही पुरानी चाल चलने के लिए किया- भारत पर आरोप, खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश और आतंकवाद के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कवायद।

इसी बहस में पाकिस्तान की ओर से उसके UN प्रतनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर बयान दिया। अहमद ने यह जताने की कोशिश की कि भारत ने हालात को बिगाड़ा, सैन्य तनाव बढ़ाया और क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला। उनकी पूरी स्पीच इसी नैरेटिव पर टिकी थी कि पाकिस्तान किसी आक्रामक कार्रवाई का शिकार हुआ और भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी की। यह बयान दरअसल कोई नई बात नहीं थी, बल्कि वही पुराना पाकिस्तान-स्टाइल बचाव था, जिसमें सच्चाई से ज्यादा शोर होता है।

इसके तुरंत बाद भारत की तरफ से UN के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने जवाब दिया और बहस की दिशा ही बदल दी। उनके शुरुआती शब्द थे, “मैं अब सुरक्षा परिषद के निर्वाचित सदस्य और पाकिस्तान के प्रतिनिधि की टिप्पणियों का जवाब दे रहा हूँ, जिनका एकमात्र उद्देश्य मेरे देश और मेरे लोगों को नुकसान पहुँचाना है। उन्होंने पिछले साल मई में चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर का झूठा और स्वार्थपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है।”

पाकिस्तान की सीजफायर की गुहार की बात दोहराई

पर्वतनेनी हरीश ने साफ शब्दों में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान जो कहानी सुना रहा है, वह झूठी, भ्रामक और अपने फायदे के लिए गढ़ी गई है। हरीश ने कहा कि पाकिस्तान को भारत के आतंरिक मामलों, खासकर जम्मू-कश्मीर पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वही देश दशकों से सीमापार आतंकवाद को ‘न्यू नॉर्मल’ नीति के तौर पर इस्तेमाल करता आया है।

हरीश ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर कोई युद्ध नहीं था, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत का नपा-तुला, जिम्मेदार और सीमित जवाब था। भारत का उद्देश्य न तो हालात को भड़काना था और न ही किसी तरह की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को न्योता देना था। उन्होंने रिकॉर्ड पर यह तथ्य रखा कि ऑपरेशन के बाद भी पाकिस्तान कई दिनों तक भारत को धमकाता रहा, लेकिन जब उसे यह समझ आया कि वह इस स्थिति को संभाल नहीं सकता, तब 10 मई 2025 को खुद पाकिस्तानी सेना ने भारत से सीजफायर की गुहार लगाई।

यहीं पर पूरा नैरेटिव पलट जाता है। क्योंकि जब भारत यह कहता है कि लड़ाई रोकने की पहल पाकिस्तान की तरफ से हुई, तो डोनाल्ड ट्रंप के वे तमाम दावे अपने आप कठघरे में आ जाते हैं। ट्रंप बार-बार यह कहते रहे हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव रुकवाया। भारत ने न तब इसका समर्थन किया और न अब। UN के मंच से भारत ने बिना किसी का नाम लिए यह साफ कर दिया कि सीजफायर किसी तीसरे देश के दबाव या मध्यस्थता से नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मजबूरी से हुआ था।

ट्रंप के सीजफायर के दावे खारिज, अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं आता भारत

अगर डोनाल्ड ट्रंप की बात करें, तो वे हर बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम में खुद को निर्णायक खिलाड़ी के तौर पर पेश करते हैं। भारत-पाकिस्तान तनाव भी इससे अलग नहीं रहा। पिछले कुछ समय में ट्रंप बार-बार सार्वजनिक मंचों, इंटरव्यू और राजनीतिक भाषणों में यह दावा करते हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव रुकवाया।

लेकिन भारत ने कभी इस दाने को स्वीार नहीं किया। न सरकार ने, न विदेश मंत्रालय ने और न ही किसी आधिकारिक मंच पर। भारत ने जानबूझकर ट्रंप को श्रेय नहीं दिया, क्योंकि सच्चाई यह थी कि सीजफायर किसी तीसरे देश के दबाव या मध्यस्थता से हुआ ही नहीं था। और यहीं से ट्रंप की बेचैनी शुरू होती है।

इसके बाद भी ट्रंप की टैरिफ की धमकियाँ, भारत के खिलाफ बयानबाजी वगैरह देखने को मिला। लेकिन भारत नहीं झुका। वह आज भी उसी बयान पर टिका है कि सीजफायर में ट्रंप का हाथ नहीं, बल्कि पाकिस्तान की गुहार थी। भारत ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत अपने फैसले खुद लेता, न कि किसी विदेशी ताकतों के कहने पर।

UN में भी भारत ने वही बात दोहराई कि वह अपने फैसले खुद लेता है और श्रेय की राजनीति का हिस्सा नहीं बनता है। इस तथ्य से ट्रंप के तमाम दावे अपनेआप ढह जाते हैं। अगर लड़ाई रोकने की गुहार पाकिस्तान ने लगाई औऱ फैसला भारत ने अपने विवेक से लिया, तो फिर किसी तीसरे देश के ‘युद्ध रुकवाने’ का दावा महज राजनीतिक आत्मप्रचार बनकर रह जाता है। UN में भारत ने यही बात बेहद सधे, लेकिन बेहद साफ शब्दों में दुनिया के सामने रख दी।

विपक्ष का भ्रम धाराशाही

यह पूरा तथ्य सिर्फ पाकिस्तान या ट्रंप तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत के भीतर चल रही सियासी बहस पर भी सीधा हमला करता है। UN में भारत का यह स्पष्ट बयान विपक्षी दलों की उस सियासी छतरी में भी छेद करता है, जिसके नीचे बैठकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाया जाता रहा है। खासकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का वो ‘नरेंद्र-सरेंडर‘ वाले भ्रम को धाराशाही करता है।

याद करना जरूरी है कि यही कॉन्ग्रेस थी, जिसके शासन में देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर 26/11 जैसे आतंकी हमले हुए। सैंकड़ों लोग मारे गए, लेकिन तब UPA सरकार में भारत का जवाब क्या था? इन्हीं लोगों ने तब विदेशी ताकतों के दबाव में आकर पाकिस्तान पर हमला नहीं किया।

आज वही विपक्ष में आकर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल करते हैं कि उन्होंने ट्रंप की बयानबाजी का तुरंत जवाब क्यों नहीं दिया। उन्हें यह समझने में दिक्कत होती है कि हर प्रतिक्रया कैमरे के सामने दी जाने वाली नहीं होती। मोदी सरकार ने जो किया, वह करके दिखाया। मोदी सरकार में जब-जब भारत पर हमला हुआ, तो जवाब दिया गया। चाहे वह उरी सर्जिकल स्ट्राइक हो या ऑपरेशन सिंदूर।

इसीलिए यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया बयान नहीं था। यह भारत की आंतरिक राजनीति को संदेश भी था। विपक्ष चाहे कितना भी शोर मचा ले कि सीजफायर ट्रंप के कहने पर हुआ है, पर मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह भ्रम तोड़ दिया है। अब न फैसले विदेशी ताकतों के दबाव में होते हैं, बल्कि भारत के अपने आकलन पर होते हैं।

IIT दिल्ली में जाति सम्मेलन : दलितों को फिलिस्तीनियों से जोड़ने और जाति प्रथा को ग्लोबल उत्पीड़न बताने की कोशिश, दिव्या द्विवेदी और इक्वालिटी लैब्स का प्रोपेगेंडा

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी दिल्ली ने 16 से 18 जनवरी के बीच कैंपस में हुई ‘क्रिटिकल फिलॉसफी ऑफ कास्ट एंड रेस’ विषय पर कॉन्फ्रेंस को विवादास्पद मानते हुए इसकी जाँच शुरू की है। आधिकारिक बयान में IIT दिल्ली ने कहा कि उसने संबंधित फैकल्टी मेंबर्स, वक्ताओं के कंटेंट और उसपर जताई गई आपत्तियों की जाँच के लिए एक कमेटी बनाई है।

इंस्टीट्यूट ने आगे कहा कि कमेटी की जाँच रिपोर्ट आने के बाद प्रोटोकॉल के मुताबिक एक्शन लिया जाएगा। इंस्टीट्यूट ने देश के प्रति अपनी जवाबदेही, एकेडमिक और इंस्टीट्यूशनल गाइडलाइंस को पालने करने की बात कही है।

कॉन्फ्रेंस में क्या हुआ

तीन दिनों तक यह कार्यक्रम IIT दिल्ली की मेन बिल्डिंग के सीनेट हॉल में चला। इसे 2001 में साउथ अफ्रीका के डरबन में हुए नस्लवाद पर विश्व कॉन्फ्रेंस के 25 साल पूरे होने पर रखा गया था।

आयोजकों के मुताबिक, कॉन्फ्रेंस का मकसद जाति और वंश पर आधारित भेदभाव को नस्लीय भेदभाव के साथ वैश्विक मंच पर रखना था। यह कार्यक्रम जाति, नस्ल, जेंडर, धर्म आदि मुद्दों पर वैश्विक नजरिया तैयार करने की कोशिश की गई। दरअसल यह एक ऐसे नेटर्वक का निर्माण करने की कोशिश थी, जो मानवाधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठा सके। इसलिए कार्यक्रम के दौरान विचार विमर्श, लेक्चर, पैनल डिस्कशन, राउंड टेबल, बुक लॉन्च और फिल्म स्क्रीनिंग की गई।

बाहर से देखने पर यह सब अच्छा लग सकता है, लेकिन इस कॉन्फ्रेंस ने जाति व्यवस्था पर एकतरफ़ा राय दी। कार्यक्रम को इस तरह से पेश किया गया जैसे भारत में अल्पसंख्यकों और दलितों के साथ बहुत ज्यादा भेदभाव किया जाता है।

कॉन्फ्रेंस का आयोजन IIT दिल्ली की दिव्या द्विवेदी और सौजन्या तमालपकुला ने ह्यूमैनिटीज़ और सोशल साइंसेज़ डिपार्टमेंट की मदद से किया था। दिव्या द्विवेदी वही प्रोफ़ेसर हैं जिन्होंने एक बार एक न्यूज़ चैनल पर डिबेट के दौरान दावा किया था कि हिंदू धर्म 20वीं सदी में बना था। उन्होंने द कारवां के लिए लिखे एक आर्टिकल में हिंदू धर्म को ‘धोखा’ भी कहा था।

वक्ताओं में इंटरनेशनल ‘एक्टिविस्ट’ और ‘स्कॉलर’ शामिल थे, जिनमें इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन भी शामिल थीं, जो जाति को नस्ल-आधारित बताने और वैश्विक मंच पर विवादित टिप्पणियों के लिए कुख्यात रही हैं। ‘इक्वालिटी लैब्स’ अमेरिका में जाति की बात को आगे बढ़ा रही है, उसका दावा है कि अमेरिका में आकर बसे ऊँची जाति के भारतीय अक्सर भारतीय मूल के साथियों और SC/ST समुदाय के कर्मचारियों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं।

कई बार व्याख्यान के दौरान जाति भेद को नस्ल भेद से जोड़ा गया। ग्लोबल गवर्नेंस, धर्म और आज के राजनीतिक आंदोलनों पर चर्चा की गई। दलित मुद्दों की तुलना दूसरे अंतरराष्ट्रीय झगड़ों से की गई। इन सेशन में ‘जाति के आधार पर भेदभाव’ को दूर करने के लिए इंटरनेशनल गठबंधन बनाने की बात कही गई।

दिव्या द्विवेदी कौन हैं और क्या करती हैं

दिव्या द्विवेदी IIT दिल्ली में ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं, जो इस कॉन्फ्रेंस की मुख्य आयोजक थी। वह फिलॉसफी और लिटरेचर पढ़ाती हैं। पिछले दस सालों में वह एक ऐसी सिद्धांतवादी के तौर पर उभरी हैं, जो कहता है कि भारत में न केवल अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है, बल्कि दलित, आदिवासी और निचली जातियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

उनके एकेडमिक करियर में इंटरनेशनल पब्लिशर्स के साथ पब्लिकेशन, यूरोपियन इंस्टीट्यूशन्स में फेलोशिप और UNESCO से जुड़े प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी एडवाइजरी की भूमिका शामिल हैं। यानी उनके पास ग्लोबल मंच मौजूद है, जहाँ वह भारत के खिलाफ जहर उगलती हैं और लोगों का नजरिया बदलने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

हिंदू धर्म और हिंदू पहचान पर विवादित बयान देती रही हैं

द्विवेदी का दृष्टिकोण हमेशा हिन्दू विरोधी रहा है। 2019 में एक टेलीविज़न डिबेट के दौरान, उन्होंने कहा, “हिंदू धर्म बीसवीं सदी की शुरुआत में इस बात को छिपाने के लिए बनाया गया था कि निचली जाति के लोग ही भारत में असली बहुसंख्यक हैं।” उन्होंने आगे दावा किया कि महात्मा गाँधी ने ‘एक झूठी हिंदू बहुसंख्यक और एक नई हिंदू पहचान बनाने में मदद की’। उन्होंने आगे कहा कि इस राजनीतिक सोच को ‘खत्म’ कर दिया जाना चाहिए।

इन विचारों को उन्होंने विवादित मैगज़ीन, द कारवां में बताया। ‘द हिंदू होक्स’ शीर्षक वाले लेख में हिंदू पहचान को ऊँची जाति के एलीट वर्ग द्वारा जानबूझकर बनाई गई पॉलिटिकल फिक्शन के तौर पर पेश किया गया। लेख में उन्होंने तर्क दिया कि ‘हिंदू’ शब्द ज़ुल्म से जुड़ा हुआ है और इसमें ऊँची जातियों का दबदबा है।

ऐसे दावों को नतीजों की तरह पेश किया जाता है, जिससे परंपराओं और अलग-अलग जातियों के लाखों हिंदुओं के धार्मिक अनुभव के लिए बहुत कम जगह बचती है। हिंदू धर्म को एक ‘छल’ के तौर पर पेश करके, वह असल में सनातन धर्म को माननेवालों की अवहेलना करती है। इस बात को भी नजरअंदाज करती हैं कि लाखों लोग अपने धर्म को कैसे समझते और मानते हैं।

G20 में हिन्दू धर्म को खत्म करने की कही बात

द्विवेदी का सोच वाला रवैया 2023 में भारत में G20 मीटिंग के दौरान और भी साफ़ हो गया। उस दौरान, उन्होंने फ्रेंच ब्रॉडकास्टर फ्रांस 24 के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि वह हिंदू धर्म के बिना भारत के भविष्य को देखती हैं। दिव्या द्विवेदी ने विदेशी मीडिया के सामने आर्यन थ्योरी की बात करते हुए भारत से हिन्दू धर्म को मिटाने की वकालत की।

दिव्या ने कहा, “दो भारत हैं। बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार करने वाले नस्लीय जाति व्यवस्था का अतीत का भारत और फिर भविष्य का भारत है, जो जाति उत्पीड़न और हिंदू धर्म के बिना एक समतावादी भारत है। यह वह भारत है जिसका अभी तक प्रतिनिधित्व नहीं आया है, लेकिन वह इंतजार कर रहा है, दुनिया को अपना चेहरा दिखाने के लिए तरस रहा है।”

फ्रांस 24 के पत्रकार ने उनसे सवाल करते हुए भारतीय रिक्शा चालक की कहानी बताते हुए उनसे उनकी राय पूछी कि भारत द्वारा किए गए डिजिटलीकरण और वैश्वीकरण जैसे उपायों से देश के नागरिकों को कैसे लाभ हो रहा है। उन्होंने दिव्या द्विवेदी को बताया कि कैसे रिक्शा चालक ने उन्हें समझाया कि पीएम मोदी की डिजिटल इंडिया पहल ने उन्हें न केवल अपने ग्राहकों, बल्कि पूरी दुनिया से जुड़ने और अपना व्यवसाय बढ़ाने में मदद की। इस पर दिव्या ने कहा कि ये मीडिया की गढ़ी हुई कहानियाँ हैं।

IIT दिल्ली कॉन्फ्रेंस में फिर जाति-नस्ल को जोड़ा

द्विवेदी ने CPCR3 में कहा, ‘डरबन के बचे हुए हिस्से: जाति और नस्ल की एक क्रिटिकल फिलॉसफी की ओर’ नाम से एक पेपर पेश किया। हालाँकि पेपर का पूरा टेक्स्ट या उनके प्रेजेंटेशन का वीडियो अभी पब्लिक में उपलब्ध नहीं है, लेकिन पेपर का एब्स्ट्रैक्ट खुद ही बहुत कुछ बताता है। वैश्विक सैद्धांतिक और राजनीतिक प्रतिमानों के भीतर जाति और नस्ल को परिभाषित करते हुए उन्होंने व्याख्यान दिया।

स्रोत-IIT दिल्ली

मार्च 2025 में ऑक्सफ़ोर्ड प्रेस से छपे इस पेपर में, द्विवेदी ने यह दावा दोहराया कि ‘कास्ट इज रेस प्लस’, यह नारा 2001 के डरबन कॉन्फ्रेंस से आया था। उन्होंने तर्क दिया कि जाति और नस्ल में काफी समानता है, जिसकी जड़ें उन्होंने पूर्व औपनिवेशिक और औपनिवेशिक ‘आर्यन डॉक्ट्रिन’ के तौर पर पेश की। उनके अनुसार, यह सिर्फ भेदभाव ही नहीं बल्कि नस्लवाद का सबसे मुखर रूप ‘पैलियो रेसिज़्म’ है।

स्रोत-ऑक्सफोर्ड प्रेस

उन्होंने आगे कहा कि जाति को नस्ल के बराबर मानने का विरोध मुख्य रूप से इस तथाकथित एकरूपता के साथ टकराव को रोकने के लिए है। यह तर्क सिर्फ इसलिए दिए जा रहे थे कि ये साबित किया जा सके कि हिंदू समाज सुधार योग्य या अंदरूनी रूप से बहुलवादी नहीं है। यह समाज को एक स्वाभाविक रूप से नस्लीय व्यवस्था के रूप में दिखाता है, जिसे ग्लोबल विचारधारा के जरिए चुनौती दी जानी चाहिए।

हिन्दू धर्म को बदनाम करने की साजिश

द्विवेदी का नजरिया धर्म, इतिहास, सामाजिक व्यवहार और राजनीतिक शक्ति को एक ही फ्रेमवर्क में समेट देता है। हिंदू धर्म को दबदबे का एक ज़रिया बना दिया गया है, जाति को पूरी तरह से नस्लीय बना दिया गया है, और अलग राय को विद्वानों की असहमति के बजाय नैतिक टालमटोल माना गया।

यह लेफ्ट-लिबरल बुद्धिजीवियों के साथ ये बहुत बड़ी समस्या है। उनके हिसाब से, यह ‘मेरा रास्ता या हाईवे’ है। कोई भी जो उनके तर्क को काउंटर करने के लिए कोई दूसरा नैरेटिव या नजरिया पेश करता है, वह राइट-विंगर बन जाता है, चाहे वह तर्क कितना भी सही क्यों न हो।

उनका काम जाति को नस्ल और हिंदू पहचान को धोखा बताकर भारत के अंदरूनी सामाजिक प्रक्रिया में बाहरी दखल को न्योता देना है। यह उन देसी सुधार आंदोलनों, फिलॉसॉफिकल परंपराओं और सोशल मोबिलिटी को गलत साबित करता है जो उनकी थीसिस से मेल नहीं खाते।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि G20 के दौरान एकेडमिक कॉन्फ्रेंस या इंटरनेशनल मीडिया जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म का उनका बार-बार इस्तेमाल यह दिखाता है कि यह कहानी सिर्फ़ एकेडमिक जाँच नहीं है, बल्कि स्कॉलरशिप के तौर पर पेश की गई पॉलिटिकल वकालत है।

IIT दिल्ली में उनकी भूमिका क्यों मायने रखती है

जब IIT दिल्ली जैसे पब्लिक फंडेड प्रीमियर इंस्टिट्यूशन में इस तरह का सिद्धांत घर कर जाता है, तो यह ज्यादा चिंताजनक है। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) को लंबे समय से लेफ्ट-लिबरल, एंटी-हिंदू और एंटी-इंडिया कहानियों का हब माना जाता रहा है, ज़्यादातर इसलिए क्योंकि ऐसी आइडियोलॉजी को बिना किसी मतलब के प्रशासनिक दखल से फलने-फूलने दिया गया है।

एकेडमिक आजादी का मतलब आइडियोलॉजिकल मोनोपॉली नहीं है। द्विवेदी के इस कॉन्फ्रेंस में दुनिया को देखने का उनका नजरिया दिखा, जहाँ बैलेंस या काउंटर करने वाला कोई नहीं था। चिंता यह नहीं है कि उनके विचार विवादित हैं। चिंता यह है कि इन विचारों को एकेडमिक आम सहमति के तौर पर आगे बढ़ाया जाता है, एलीट इंस्टिट्यूशन के ज़रिए बढ़ाया जाता है, और इंटरनेशनल लेवल पर भारतीय सच्चाई के तौर पर पेश किया जाता है। यही वजह है कि उनके रोल, उनकी कॉन्फ्रेंस और उनके इंटेलेक्चुअल नेटवर्क की जांच जरूरी है।

इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन कौन हैं?

थेनमोझी सुंदरराजन इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। वह खुद को एक ट्रांसमीडिया आर्टिस्ट, थ्योरिस्ट और फ्यूचरिस्ट बताती हैं। वह धर्म, नस्ल, जाति, जेंडर, टेक्नोलॉजी और न्याय पर एक दलित अमेरिकन कमेंटेटर हैं। उन्होंने पहले भी हिंदू धर्म, हिंदू समाज और संस्कृति पर आपत्तिजनक बयान दिए हैं। कॉन्फ्रेंस के लिए उनका टॉपिक था ‘दलित अमेरिकियों पर नस्लीय और जातिगत विषमताओं का असर’।

स्रोत- आईआईटी दिल्ली

उनका संगठन, इक्वालिटी लैब्स, अमेरिका में सबसे असरदार एंटी-ब्राह्मण ग्रुप में से एक बनकर उभरा है। वह ‘द ट्रॉमा ऑफ कास्ट’ की लेखिका भी हैं और उन्होंने जातिवाद को नस्ल, ज़ुल्म वाली व्यवस्था और नरसंहार बता कर इसे इंटरनेशनल बनाने की कोशिश की और एक अहम आवाज के तौर पर खुद को स्थापित किया।

थेनमोझी सुंदरराजन की लीडरशिप में, इक्वालिटी लैब्स ने हिंदू समाज, खासकर ब्राह्मण समुदायों को दूसरी जातियों को दबाने वाला दिखाने वाली कहानियों को आगे बढ़ाया है।

इक्वालिटी लैब्स और इसका विवादास्पद रिकॉर्ड

इक्वालिटी लैब्स ने दुनिया भर का तब ध्यान खींचा जब ट्विटर के पूर्व CEO जैक डोर्सी ने ‘स्मैश ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ यानी जातिवाद को बताने वाली बाह्मणवादी पितृसत्ता लिखे एक प्लेकार्ड के साथ पोज़ दिया। यह पोस्टर खुद सुंदरराजन ने डिज़ाइन किया था। यह तस्वीर संगठन की पहचान बन गई, जो सुधार के बजाय सामाजिक दुश्मनी को बढ़ावा देता है।

स्रोत- फाइल फोटो

इस संगठन ने साउथ एशियन अमेरिकन्स के बीच बड़े पैमाने पर जातिगत भेदभाव का दावा करने वाली रिपोर्ट्स पर ऑर्गनाइज़ेशन फॉर माइनॉरिटीज़ इन इंडिया (OFMI) के साथ मिलकर काम किया है। OFMI की स्थापना भजन सिंह भिंडर ने की थी, जो ISI से जुड़े थे। इसमें पीटर फ्रेडरिक भी शामिल थे, जिन्होंने बार-बार हिंदू राजनीतिक हस्तियों और संगठनों को टारगेट किया। इन संबंधों के बावजूद, इक्वालिटी लैब्स को एक्टिविस्ट लॉमेकर्स और मीडिया आउटलेट्स द्वारा जाति वाद के खिलाफ एक आवाज के तौर पर बताया गया।
पॉलिटिकल लॉबिंग और आइडियोलॉजिकल कैंपेनिंग

इक्वालिटी लैब्स का US डेमोक्रेटिक पार्टी के जस्टिस डेमोक्रेट्स विंग में काफी असर है। इस संगठन ने यूनाइटेड स्टेट्स में इंडिया के सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट के खिलाफ आक्रामक कैंपेन चलाया, जिसमें जेनोसाइड के आरोपों को बढ़ावा दिया गया और ‘स्टॉप हिंदू फासिज़्म’ जैसे नारे पॉपुलर किए गए।

विवादित दावा और गुगल का इंटरव्यू रोका गया

सौंदरराजन ने बार-बार विवादित दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि वैदिक काल में संस्कृत सिर्फ ब्राह्मणों के लिए थी और मनुस्मृति में दलितों के कानों में पिघला हुआ शीशा डालने का आदेश दिया गया था। इन दावों पर कई स्कॉलरों ने विरोध जताया। उन्होंने योग की परंपरा का भी विरोध किया।

अप्रैल 2022 में, गूगल ने सुंदरराजन की एक तय इंटरव्यू स्थगित कर दी थी, क्योंकि इससे वर्कप्लेस पर विवाद होने और आपसी दुश्मनी पैदा होने का खतरा था। टेक की बड़ी कंपनी ने साफ किया कि गूगल में जाति के आधार पर भेदभाव की कोई जगह नहीं है, लेकिन वह ऐसे सेशन होस्ट नहीं करेगी जिनसे कर्मचारियों के बीच फूट पड़ने का खतरा हो।

खालिस्तानियों और SB403 विवाद से लिंक

सौंदरराजन ने सिख्स फॉर जस्टिस के खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नून के साथ स्टेज शेयर किया। इस पर भी दुनिया का ध्यान गया। इस बात को US कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार रितेश टंडन ने भी हाईलाइट किया था। यह इवेंट वाशिंगटन DC में हुआ था, और बाद में हिंदू एडवोकेसी ग्रुप्स ने इस इवेंट की तस्वीरें शेयर की थीं।

इक्वालिटी लैब्स ने प्रस्तावित एंटी-कास्ट डिस्क्रिमिनेशन बिल का कैलिफोर्निया में समर्थन किया था, जो अब खत्म हो चुके सिस्को कास्ट केस पर काफी हद तक निर्भर था। गवर्नर गेविन न्यूसम द्वारा बिल वापस किए जाने को सुंदरराजन ने बड़ा झटका कहा और इसे ‘दिल तोड़ने वाला’ बताया। यह एक तरह से अमेरिकन लॉ में कास्ट नैरेटिव्स को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश माना जा सकता है।

आरुषि पुनिया द्वारा दलित- फ़िलिस्तीनियों की तुलना

कॉन्फ्रेंस के दौरान एक वक्ता आरुषि पुनिया ने ‘दलितों और फ़िलिस्तीनियों में क्या समानता है?’ विषय पर अपनी बात रखी। आरुषि IIT दिल्ली से ट्रेनिंग लेने वाली स्कॉलर हैं, जहाँ उन्होंने दलित और फ़िलिस्तीनी लिटरेचर और दुख की कहानियों की तुलना करते हुए अपनी PhD पूरी की।

वह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग फ़ेलो भी रही हैं और इंडियन एक्सप्रेस, मिडिल ईस्ट आई और दूसरे लेफ़्ट झुकाव वाले पब्लिकेशन जैसे प्लेटफ़ॉर्म के लिए लिख चुकी हैं।

मई 2024 में इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख में, उन्होंने तर्क दिया कि दलितों और फ़िलिस्तीनियों को ‘एथनो-नेशनल स्टेट्स’ के हाथों ज़ुल्म, बेइज़्ज़ती, खत्म करने की कोशिश के एक जैसे अनुभव हैं। उन्होंने भारतीय सोशल ऑर्डर की तुलना इज़राइल फ़िलिस्तीन संघर्ष से की, जिसमें कथित तौर पर हावी ग्रुप दबे हुए लोगों पर नस्लीय कंट्रोल करते हैं।

उनके आर्टिकल ने बार-बार हिंदू समाज और भारतीय राज्य व्यवस्था को ‘जायोनिज़्म’ यानी यहूदी व्यवस्था जैसा बताया और कहा कि जाति, गाजा और वेस्ट बैंक में इजराइल के कामों की तरह ही नस्लीय दबदबे के एक रूप के तौर पर काम करती है।

यह तुलना बहुत गलत है। दलित भारत के नागरिक हैं जिनके पास संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व से लेकर वो सारे अधिकार हैं जो देश के किसी भी नागरिक को मिले हुए हैं। इसके उलट, फ़िलिस्तीनी एक जियोपॉलिटिकल लड़ाई में हैं जिसमें बॉर्डर, जंग, हमास जैसे टेररिस्ट ग्रुप और दूसरे देशों के दावे शामिल हैं। एक सभ्यता के अंदर सामाजिक भेदभाव को दो देशों की लड़ाई से तुलना करना कोई स्कॉलरशिप नहीं है, बल्कि सोच को सवाल है।

उन्होंने जाति के ज़ुल्म और जंग में शामिल इलाके के लोगों की तुलना की। इस दौरान इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि ऐसे तर्क ऐतिहासिक सच्चाई को मिटा देते हैं, और जातीय भेदभाव के शिकार लोगों को हथियारों वाली लड़ाइयों की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

यह सोच सुधार या न्याय को आगे नहीं बढ़ाती। इसके बजाय, यह भारतीय समाज को स्वाभाविक रूप से ज़ुल्मी और ग्लोबल झगड़े वाले इलाकों के बराबर दिखाने की एक बड़ी एकेडमिक सोच को बढ़ावा देती है।

यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है

IIT दिल्ली में CPCR3 कॉन्फ्रेंस को लेकर हुआ विवाद भारत के एकेडमिक स्थानों में एक बड़े मुद्दे की ओर इशारा करता है। जिसे जाति और भेदभाव पर एक एकेडमिक चर्चा के तौर पर पेश किया गया, वह एक छोटी और एकतरफ़ा कहानी को बढ़ावा देने लगा, जिसने हिंदू समाज को स्वाभाविक रूप से ज़ुल्मी और सुधार से परे दिखाया।

दिव्या द्विवेदी ने कॉन्फ्रेंस आयोजित की और इक्वालिटी लैब्स की फाउंडर थेनमोझी सुंदरराजन की मौजूदगी से कॉन्फ्रेंस का नेचर और साफ़ हो गया। हिन्दुओं की जातिगत भेदभाव को ग्लोबल झगड़े के पैटर्न के तौर पर दिखाना और नस्लवाद से जोड़ने की कोशिश की यह पहली घटना नहीं है। यह तरीका सुधार के बारे में कम और टकराव के बारे में ज्यादा है, जो अक्सर विश्वसमुदाय का ध्यान खींचने के लिए किया जाता है।

ऐसी कॉन्फ्रेंस अकेले नहीं होतीं। इसी तरह के इवेंट तेज़ी से कैंपस में ऑर्गनाइज़ किए जा रहे हैं, जहाँ एक्टिविस्ट की बातों को एकेडमिक आम सहमति के तौर पर पेश किया जाता है, जबकि दूसरे नज़रिए को नज़रअंदाज़ किया जाता है। जब जाति को बार-बार नस्ल के बराबर माना जाता है और भारत की सामाजिक सच्चाइयों की तुलना युद्ध के मैदानों से की जाती है, तो इससे बातचीत के बजाय बँटवारा होता है।

एकेडमिक आजादी का मतलब सोच पर मोनोपॉली नहीं है। IIT दिल्ली जैसे इंस्टीट्यूशन की जिम्मेदारी है कि वे बैलेंस, इंटेलेक्चुअल सख्ती और सच्ची बहस को बढ़ावा दें। कॉन्फ्रेंस को लेकर जाँच कमेटी बनाने का फैसला एक जरूरी कदम है, लेकिन बड़ा मुद्दा अभी भी बना हुआ है।

यह एपिसोड तो बस शुरुआत है। जब तक ऐसी बातों और कॉन्फ्रेंस की और करीब से जाँच नहीं की जाती, तब तक एकेडमिक जगहें सीखने वाली जगह के बजाय तय सोच से चलने वाली पॉलिटिकल नेरेटिव गढ़ने वाली जगह बनने लगेगी।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

पढ़ाई छूटी, स्टेशन पर कटी रातें और अब मिला पद्मश्री: पढ़ें- सत्यनारायण नुवाल की कहानी जिनकी सोलर इंडस्ट्रीज के हथियारों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में दिखाया जलवा

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन सत्यनारायण नुवाल को ट्रेड और इंडस्ट्री के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, उनकी कंपनी द्वारा बनाए गए ‘नागास्त्र’ हथियार सिस्टम का पिछले साल मई में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया था।

नुवाल, सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (SDAL) के भी चेयरमैन हैं, जो देश की पहली और सबसे बड़ी निजी सैन्य-स्तरीय विस्फोटक निर्माण इकाइयों में से एक मानी जाती है। खास बात यह है कि SDAL ने ब्रह्मोस मिसाइल के लिए बूस्टर भी उपलब्ध कराए हैं।

उद्योग और समाज में असाधारण योगदान के लिए चुने गए सत्यनारायण नुवाल हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से पद्मश्री पाने वाले इकलौते कारोबारी हैं। उन्होंने TOI से बातचीत में कहा, “मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुझे इतना बड़ा सम्मान मिलेगा। यह पुरस्कार देश के लिए मेरी जिम्मेदारी को और बढ़ाता है। रक्षा क्षेत्र में कारोबार करने का मकसद मुनाफा नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा है।”

नुवाल पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं। उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में बेहद साधारण शुरुआत की थी, जब वह कोल इंडिया लिमिटेड को व्यावसायिक विस्फोटक सप्लाई करते थे। उस दौर में वह अकेले यात्रा करते थे और कई बार रेलवे प्लेटफॉर्म पर घंटों इंतजार करना पड़ता था। बाद में 2010 में उनकी कंपनी ने सैन्य-स्तरीय विस्फोटक बनाना शुरू किया और रक्षा क्षेत्र में प्रवेश किया।

74 वर्षीय नुवाल बताते हैं, “निजी क्षेत्र की किसी कंपनी के लिए यह बिल्कुल नया क्षेत्र था। मैं अक्सर सशस्त्र बलों को सप्लाई से जुड़ी दिक्कतों के बारे में सुनता था और समझ गया था कि देश को इस क्षेत्र में और उद्यमियों की जरूरत है। इसी सोच के साथ हमने रक्षा क्षेत्र में छोटा-सा योगदान देने का फैसला किया।”

इस महीने SDAL के दौरे के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पुष्टि की कि कंपनी का नागास्त्र ड्रोन-आधारित लॉइटरिंग म्यूनिशन भारत की इस अहम सैन्य कार्रवाई में दुश्मन के ठिकानों पर सटीक निशाना साधने में सफल रहा।

नुवाल ने उस दौरान बताया था, “अमेरिका या अन्य देशों में एक साथ चार मिसाइलें दागी जा सकती हैं लेकिन हमारा ‘भार्गवास्त्र’ एक साथ 60 माइक्रो-मिसाइलें फायर करता है। दुनिया में ऐसा सिस्टम अभी कहीं और मौजूद नहीं है।” भार्गवास्त्र एक मल्टी-लेयर माइक्रो-मिसाइल एंटी-ड्रोन या काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS) है।

रक्षा मंत्री को ‘प्रलय’ शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल के बारे में भी जानकारी दी गई थी। कंपनी के एक अधिकारी ने बताया, “हम प्रलय के लिए कई मोटर बनाते हैं लेकिन हमारी क्षमता पूरी मिसाइल बनाने की भी है। अगर मौका मिले तो हम दो महीने में पूरी मिसाइल विकसित कर सकते हैं।”

इसके अलावा SDAL ने SE-BEX-2 नाम का हाई-एनर्जी मटीरियल भी विकसित किया है, जिसे परमाणु बम के बाद सबसे शक्तिशाली विस्फोटक माना जाता है और जो पारंपरिक TNT से लगभग दोगुना ताकतवर है। SDAL पहली निजी कंपनी बनी जिसने सेना को पूरा म्यूनिशन सिस्टम उपलब्ध कराया, जिसमें पुराने मॉडल की जगह मल्टीमोडल हैंड ग्रेनेड भी शामिल हैं।

कंपनी ने शुरुआत में पिनाका रॉकेट के ऑर्डर पूरे किए। इसके बाद इसने मल्टीमोडल ग्रेनेड बनाए, जो किसी निजी कंपनी द्वारा तैयार किया गया पहला पूरा सिस्टम था। समय के साथ कंपनी ने एंटी-ड्रोन सिस्टम और ड्रोन निर्माण में भी कदम बढ़ाया। हाल ही में SDAL ने नागपुर के मिहान-SEZ में रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के लिए जमीन खरीदी है।

आर्थिक तंगी के कारण छोड़नी पड़ी पढ़ाई

फोर्ब्स की सूची के अनुसार, सत्यनारायण नुवाल भारत के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं। उनकी कुल संपत्ति लगभग 5.2 अरब डॉलर (46,500 करोड़ से अधिक) आंकी गई है। रक्षा क्षेत्र में उनकी कंपनी को व्यापक पहचान मिली है और यह सशस्त्र बलों के लिए विस्फोटक बनाने का सरकारी लाइसेंस पाने वाली भारत की पहली निजी कंपनी थी।

हालाँकि, इस विशाल कारोबारी साम्राज्य की नींव राजस्थान के भीलवाड़ा के एक साधारण परिवार में पड़ी थी। उनके पिता एक सरकारी अकाउंटेंट थे, जो बचपन से ही व्यावसायिक समझ विकसित करने पर जोर देते थे। आर्थिक तंगी के कारण नुवाल 10वीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके।

इसके बाद वह अपने गुरु के साथ मथुरा में एक साल रहे और छोटे-मोटे व्यवसायों में हाथ आजमाया। उन्होंने फोर्ब्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, “पढ़ाई से ज्यादा मेरी रुचि कारोबार करने में थी।” घर लौटने के बाद उन्होंने फाउंटेन पेन की स्याही बनाने, लीजिंग बिजनेस और ट्रांसपोर्ट कंपनी जैसे कई प्रयोग किए।

इसी दौरान 19 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई और जिम्मेदारियाँ बढ़ती चली गईं। परिवार का खर्च चलाने के लिए वह 1977 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर चले गए, जहाँ एक रिश्तेदार के साथ काम किया। कई बार हालात ऐसे थे कि उन्हें रेलवे स्टेशन पर ही रात गुजारनी पड़ती थी।

इसी दौरान उनकी मुलाकात अब्दुल सत्तार अल्लाह भाई से हुई, जिनके पास गनपाउडर डिपो था और विस्फोटक इस्तेमाल का लाइसेंस था। नुवाल ने वह जगह 1,000 महीने के किराए पर लेने की कोशिश की लेकिन यह रकम भी उनके लिए बड़ी थी। धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ा और उन्हें कोयला खदानों से बड़े ऑर्डर मिलने लगे।

1984 तक उनकी कंपनी कंसाइनमेंट एजेंसी बन गई और 1990 तक वह एक बड़े डीलर बन चुके थे।

एक नई सुबह की शुरुआत

1990 का दशक नुवाल के लिए निर्णायक साबित हुआ। अपने लंबे अनुभव के आधार पर उन्होंने 1995 में नागपुर में सोलर इंडस्ट्रीज की स्थापना की। उन्होंने बैंक से 60 लाख रुपए की व्यवस्था की और अपनी अन्य बचत भी इसमें लगाई। इसके बाद उन्होंने स्लरी विस्फोटकों का उत्पादन शुरू किया और आगे चलकर डेटोनेटर के साथ बड़े पैमाने पर विस्फोटक निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा। कोल इंडिया लिमिटेड भी उनकी कंपनी के प्रमुख ग्राहकों में शामिल था।

2006 में कंपनी ने शेयर बाजार में कदम रखा। उस समय कंपनी का शुद्ध मुनाफा लगभग 11 करोड़ रुपए और टर्नओवर 78 करोड़ रुपए था। जुटाई गई पूंजी से उत्पादन बढ़ाया गया और 13 नई इकाइयाँ स्थापित की गईं। सोलर इंडस्ट्रीज ने जाम्बिया, घाना, नाइजीरिया, तुर्की, तंजानिया और दक्षिण अफ्रीका में प्लांट लगाए।

इसके अलावा थाईलैंड, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी उत्पादन इकाइयाँ शुरू कीं। भारत में कंपनी की मौजूदगी नौ राज्यों के 29 शहरों तक फैल गई। यह देश की पहली निजी कंपनी बनी जिसे सशस्त्र बलों के लिए हथियार और विस्फोटक बनाने का सरकारी लाइसेंस मिला। नुवाल समझ चुके थे कि भविष्य में गोला-बारूद का स्वदेशी निर्माण जरूरी होगा।

इसलिए उन्होंने ग्रेनेड, मध्यम और बड़े कैलिबर का गोला-बारूद, हाई एनर्जी एक्सप्लोसिव (HMX), प्रोपेलेंट और वॉरहेड बनाने की क्षमता विकसित की। सोलर इंडस्ट्रीज को करीब 450 करोड़ रुपए का मल्टीमोड हैंड ग्रेनेड सप्लाई का ऑर्डर मिला, जो दो साल में पूरा किया जाना था। यह भारत के रक्षा इतिहास में पहली बार था जब किसी निजी कंपनी को ऐसा गोला-बारूद ऑर्डर मिला।

संदीप मेटैलिक्स के चेयरमैन संदीप अग्रवाल ने नुवाल के संघर्षों को याद करते हुए कहा, “उन्होंने खनन उद्योग को विस्फोटक सप्लाई करने से शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने ऐसे सिस्टम विकसित किए, जो पहले निजी क्षेत्र में नहीं थे। 2010 से उन्होंने रक्षा क्षेत्र में निवेश शुरू किया और अब जाकर कंपनी को उसका फल मिलना शुरू हुआ है।”

आज सोलर इंडस्ट्रीज DRDO द्वारा विकसित कई रणनीतिक मिसाइल प्रणालियों जैसे प्रलय, पिनाका, आकाश और अन्य गाइडेड वेपन सिस्टम के निर्माण में भारत की प्रमुख निजी साझेदार है। कंपनी सॉलिड रॉकेट मोटर और प्रोपल्शन सिस्टम की भी बड़ी सप्लायर है।

सत्यनारायण नुवाल को सोलर इंडस्ट्रीज को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए भी जाना जाता है। शिक्षा, समाज कल्याण और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में उनके योगदान की देशभर में सराहना हुई है। उन्हें मिला पद्मश्री सम्मान न केवल उनके कारोबारी सफर की उपलब्धि है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में उनकी अहम भूमिका को भी रेखांकित करता है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

लातूर भूकंप से पैदा ‘सेवा’ का संकल्प, 33 साल में हुआ ‘इंटरनेशनल’: 20+ देशों में पहुँचाया सनातक का ‘सेवा परमो धर्म’ भाव, जानिए- RSS से प्रेरित संगठन की वैश्विक गाथा

जब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े सेवा कार्यों की बात होती है तो सबसे पहले सेवा भारती का नाम जहन में आता है। एक ऐसा संगठन जो दशकों से भारत के कोने-कोने में निस्वार्थ सामाजिक सेवा करता आ रहा है। परंतु सेवा की यह यात्रा यहीं तक सीमित नहीं है। आज हम आपको RSS के विचार परिवार के उस संगठन की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने भारतीय सेवा-भावना को देश की सीमाओं से बाहर निकालकर वैश्विक मंच तक पहुँचा दिया है। एक ऐसा संगठन, जो भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के दर्जनों देशों में पीड़ित मानवता के लिए आशा और सहारा बना है- सेवा इंटरनेशनल।

आपदा के दर्द से जन्मी सेवा इंटरनेशनल

1993 का साल। महाराष्ट्र के लातूर में भूकंप ने हर ओर तबाही मचा दी थी। मकान ढह चुके थे, परिवार उजड़ गए थे और चारों तरफ दर्द, डर और बैचनी का माहौल था। इसी अफरा-तफरी और संकट के बीच कुछ ऐसे लोग एक साथ आए, जिनका एक ही संकल्प था कि पीड़ितों के दुःख को कम करना है और मानवता के नाते मदद के लिए आगे आकर हाथ बढ़ाने हैं । यही वह क्षण था, जब सेवा इंटरनेशनल की यात्रा शुरू हुई। यानी किसी बड़े संगठित मिशन की तरह नहीं बल्कि सेवा-भाव और संवेदनशीलता के साथ।

लातूर भूकंप के दौरान शुरू हुई यह छोटी-सी पहल जल्द ही एक बड़े विचार में बदलने लगी। भारत से दूर रह रहे भारतीयों यानी भारतीय प्रवासी समुदाय ने महसूस किया कि वे अपनी जड़ों से जुड़कर अपने देश और समाज के लिए कुछ कर सकते हैं। इसी सोच ने सेवा इंटरनेशनल को दिशा दी। भारतीय दर्शन की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, इस संगठन की आत्मा बनी। धीरे-धीरे यह छोटा सा दीपक एक तेज लौ में बदल गया जिसने दुनिया भर में बसे भारतीयों को सेवा के लिए एक मंच दिया।

समय के साथ सेवा इंटरनेशनल का विस्तार भारत से बाहर भी होने लगा। आज यह संगठन दुनिया के 20 से अधिक देशों में सक्रिय है और आपदा, संकट या जरूरत के समय मानवता के साथ खड़ा दिखाई देता है। 16 मई 1997 को सेवा इंटरनेशनल को औपचारिक रूप से भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत पंजीकृत किया गया। यह कदम संगठन के लिए एक मजबूत आधार बना, जिससे उसकी सेवा गतिविधियों को दीर्घकालिक दिशा मिली।

शुरुआती दौर में सेवा इंटरनेशनल का मुख्य फोकस प्राकृतिक आपदाओं के समय त्वरित राहत और सहायता पर था। लेकिन जैसे-जैसे अनुभव बढ़ा, संगठन की सोच भी व्यापक होती चली गई। अब सेवा इंटरनेशनल केवल राहत तक सीमित नहीं है बल्कि शिक्षा, रोजगार व कौशल विकास, स्वास्थ्य और स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और नेतृत्व विकास जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

सेवा इंटरनेशनल ने अपने कार्यों को संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDGs) से जोड़ा है ताकि मदद सिर्फ तात्कालिक न होकर टिकाऊ और दूरगामी हो। उद्देश्य यही है कि समुदायों को केवल सहायता न दी जाए बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाया जाए कि वे भविष्य की चुनौतियों का सामना खुद कर सकें।

UN के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स

लातूर की त्रासदी से जन्मा यह सेवा आंदोलन आज एक वैश्विक पहचान बन चुका है जो संकट में फंसी मानवता के लिए सहारा और सेवा को जीवन-मूल्य मानने वालों के लिए प्रेरणा है।

भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में सेवा इंटरनेशनल की सेवा कहानी

सेवा इंटरनेशनल ने बीते बीते वर्षों में आपदाओं के समय जमीन पर उतरकर लगातार काम किया है। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि सेवा इंटरनेशनल ने अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में 45 से अधिक बड़ी आपदाओं में सक्रिय भूमिका निभाई है जिनमें 2013 में पाकिस्तान में की गई मदद भी शामिल है। इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़, चक्रवात, क्लाउडबर्स्ट, सूखा, सुनामी, औद्योगिक दुर्घटनाएँ और हाल के वर्षों में COVID-19 जैसी महामारी भी शामिल हैं। यह काम भारत के लगभग सभी राज्यों के साथ-साथ नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में भी किया गया।

सेवा इंटरनेशनल की ताकत उसका व्यापक स्वयंसेवी नेटवर्क है। संगठन के साथ 1 लाख 52 हजार से अधिक स्वयंसेवक जुड़े हैं जो संकट के समय बिना किसी स्वार्थ के सेवा में जुट जाते हैं। इसके अलावा 1200 से अधिक साझेदार संगठन भी इसके साथ मिलकर काम करते हैं जिससे राहत कार्य तेजी से और बड़े स्तर पर संभव हो पाता है। इसी संगठित प्रयास का परिणाम है कि सेवा इंटरनेशनल आपदा के शुरुआती दिनों में ही प्रभावित इलाकों तक पहुँचने में सफल रहती है।

आँकड़ों के अनुसार, सेवा इंटरनेशनल ने अब तक यहाँ 25 लाख से अधिक लोगों को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से सहायता पहुँचाई है। इनमें वे परिवार शामिल हैं जिन्होंने आपदा में अपना घर, रोजगार या आजीविका खो दी थी। संगठन का प्रयास केवल भोजन या दवाइयों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पीड़ितों को दोबारा सामान्य जीवन में लौटाने पर भी जोर दिया जाता है।

यही वजह है कि सेवा इंटरनेशनल राहत के बाद पुनर्निर्माण के काम को प्राथमिकता देती है। अब तक संगठन ने 35,000 से अधिक गाँवों, घरों और सामुदायिक भवनों के निर्माण में योगदान दिया है। ये निर्माण कार्य उन क्षेत्रों में किए गए हैं जहाँ लोग पूरी तरह से बेघर हो चुके थे और उनके पास दोबारा जीवन शुरू करने के साधन नहीं बचे थे।

शिक्षा को भी सेवा इंटरनेशनल ने अपने सेवा कार्यों का अहम हिस्सा बनाया है। संगठन ने अब तक 275 से अधिक स्कूल और छात्रावास बनाए हैं ताकि आपदा या गरीबी के कारण बच्चों की पढ़ाई न रुके। ये शैक्षणिक संस्थान मुख्य रूप से ग्रामीण, आदिवासी और आपदा-प्रभावित इलाकों में स्थापित किए गए हैं।

इसके साथ-साथ सेवा इंटरनेशनल रोजगार और आत्मनिर्भरता पर भी काम कर रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में 55 से अधिक प्रशिक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं, जहाँ युवाओं और महिलाओं को कौशल विकास और रोजगार से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से संगठन ने 492 स्वयं सहायता समूह भी बनाए हैं जिससे वे आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें और अपने परिवार की जिम्मेदारी सँभाल सकें।

सेवा इंटरनेशनल का प्रयास केवल किसी एक आपदा या समय तक सीमित नहीं है। आज संगठन के साथ 18,000 से अधिक सामुदायिक सदस्य जुड़े हुए हैं जो सेवा को एक अभियान नहीं बल्कि समाज के प्रति कर्तव्य मानते हैं। आँकड़े साफ दिखाते हैं कि सेवा इंटरनेशनल भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में केवल राहत देने वाला संगठन नहीं है बल्कि यह संकट के बाद जीवन को दोबारा खड़ा करने की एक सतत और भरोसेमंद कोशिश का नाम बन चुका है।

कोविड-19 के काल में सेवा इंटरनेशनल का कार्य

कोविड-19 जैसी कठिन और भयावह महामारी के समय, जब हर तरफ अनिश्चितता और डर का माहौल था तब सेवा इंटरनेशनल ने मानवता के साथ खड़े रहकर समाज को संबल देने का कार्य किया। संगठन ने कोविड-19 के कठिन दौर में 30 लाख से अधिक लोगों तक अपनी सेवाएँ पहुँचाई। संगठन ने जरूरतमंद परिवारों तक 22,500 से अधिक दूध के पैकेट पहुँचाए। कोरोना योद्धाओं और आम लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 1100 से ज्यादा PPE किट और N95 मास्क वितरित किए गए।

इस सेवा अभियान की सबसे बड़ी ताकत 1260 से अधिक वे स्वयंसेवक रहे, जिन्होंने अपने परिवार और निजी सुरक्षा की परवाह किए बिना दिन-रात लोगों की मदद की। भूख से जूझ रहे लोगों के लिए 2,08,800 से अधिक ताजा पका हुआ भोजन तैयार कर सम्मान के साथ परोसा गया और 18,800 से ज्यादा स्टे-एट-होम राशन किट उन परिवारों तक पहुँचाई गईं, जिनके चूल्हे बुझने की कगार पर थे। महामारी के दौरान सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए 77,454 से अधिक कपड़े के मास्क बनाए और बाँटे गए।

इस संकट में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी एक मानवीय पहल की गई जिसमें 1625 से अधिक महिला स्वयं सहायता समूहों ने घर पर मास्क बनाकर न केवल सेवा की बल्कि अपने परिवार की आजीविका को भी सहारा दिया। सेवा का दायरा केवल इंसानों तक सीमित नहीं रहा बल्कि 4,000 से अधिक गायों और कुत्तों जैसे बेसहारा जानवरों को भी भोजन उपलब्ध कराया गया। स्वच्छता और स्वास्थ्य की जरूरतों को समझते हुए 3,100 से अधिक हाइजीन किट वितरित की गईं और 3,113 से ज्यादा मरीजों को उपचार की सुविधा दिलाई गई। यह पूरा प्रयास केवल आँकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि करुणा, संवेदना और निस्वार्थ सेवा की वह मिसाल है, जिसने संकट के समय हजारों लोगों को उम्मीद और भरोसा दिया।

दुनियाभर में सेवा इंटरनेशनल के कार्य

सेवा इंटरनेशनल न केवल भारत में बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया सहित दर्जनों देशों में भी सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों को सेवा, सहयोग और इंसानियत की भावना से जोड़ने का काम करता है।

सेवा इंटरनेशनल की उपस्थिति
सेवा इंटरनेशनल की वैश्विक उपस्थिति

सेवा इंटरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 के अनुसार, संगठन ने वर्ष भर में वैश्विक स्तर पर मानवीय सेवा का व्यापक प्रभाव दर्ज किया है। दुनिया में सेवा इंटरनेशनल के अलग-अलग कार्यों से 8,73,656 से अधिक लोगों के जीवन सीधे प्रभावित हुए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में किए गए कार्यों का उद्देश्य केवल तात्कालिक सहायता नहीं बल्कि लंबे वक्त तक लोगों का सशक्तिकरण रहा है। इन प्रयासों के माध्यम से वंचित और संकटग्रस्त समुदायों तक आवश्यक संसाधन और सहयोग पहुँचाने का कार्य किया गया है।

इस वैश्विक सेवा अभियान की रीढ़ रहे 11,180 से अधिक समर्पित स्वयंसेवक, जिन्होंने मिलकर 91,795 घंटे से अधिक समय सेवा कार्यों को दिया। साथ ही, 138 से अधिक सहयोगी संस्थाओं और संगठनों के साथ साझेदारी ने सेवा इंटरनेशनल की पहुँच और प्रभाव को और मजबूत किया है। ये आँकड़े दर्शाते हैं कि संगठित प्रयास, स्वयंसेवकों की प्रतिबद्धता और सहयोग की शक्ति के माध्यम से सेवा इंटरनेशनल दुनियाभर में मानवता की सेवा को प्रभावशाली रूप से आगे बढ़ा रहा है।

आगे की राह

सेवा इंटरनेशनल के महासचिव और अंतर्राष्ट्रीय संयोजक केजी श्याम परांडे ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “सेवा इंटरनेशनल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर विद्यमान समस्याओं को समझते हुए उनके स्थायी और व्यावहारिक समाधान विकसित करना है। संस्था प्रत्येक देश में वहाँ के कानूनों, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का पूर्ण सम्मान करते हुए अपने सेवा कार्यों का संचालन करती है।”

उन्होंने कहा, “सेवा इंटरनेशनल का मानना है कि सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है और जिस समाज व देश में हम रहते हैं, उसकी सेवा करना तथा वहाँ के लोगों के कल्याण के प्रति संवेदनशील रहना हमारा नैतिक दायित्व है। इसी भाव के साथ सेवा इंटरनेशनल के कार्यकर्ता आज विश्व के विभिन्न देशों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।”

आगे के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए केजी श्याम परांडे ने कहा कि सेवा इंटरनेशनल का लक्ष्य केवल तात्कालिक राहत तक सीमित नहीं है बल्कि स्थानीय समुदायों को दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना संस्था की प्राथमिकता है। उनके अनुसार, संस्था का प्रयास है कि जहाँ भी सेवा इंटरनेशनल कार्य करे वहाँ शांति, सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास का वातावरण बने। सेवा इंटरनेशनल की दीर्घकालिक सोच आपदा के समय राहत पहुँचाने के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के माध्यम से लोगों को सशक्त करना है ताकि वे भविष्य में किसी भी संकट का सामना स्वयं कर सकें।

परांडे ने कहा, “हमारा उद्देश्य यही है कि जिस समाज में हम काम करें, वहाँ लोगों के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव आए और शांति व मानवीय मूल्यों को मजबूती मिले।”