क्या है कैली का मामला
दरअसल केस एक कैलिफॉर्निया में रहने वाली 15 साल की लड़की कैली का है, जिसने 6 साल में यूट्यूब शुरू किया और 9 साल में इंस्टाग्राम, फिर टिकटॉक और स्नैपचैट यूज किया। सोशल मीडिया के बचपन से इस्तेमाल करने की उसे लत लग गई। उसका डिप्रेशन बढ़ा और सुसाइड के ख्याल आने लगे। ऐसे कई केस सिर्फ अमेरिका में ही चल रहे हैं, जिसमें बच्चों के पैरेंट्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसा डिजाइन करने का आरोप लगाया है, जिससे बच्चे इसे देखें और बार-बार उन्हें देखने का मन करे।
घंटों इन पर वक्त बिताने की वजह से बच्चों और टीनएजर्स की शारीरिक और मानसिक सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।। ये आरोप मेटा के फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सअप, गुगल के यूट्यूब पर लगे हैं।
जुकरबर्ग से सवाल-जवाब
जानबूझकर बच्चों को लत लगाने का इंस्टाग्राम पर आरोप लगाते हुए वकील मार्क लेनियर ने जुकरबर्ग से पूछा कि क्या इंस्टाग्राम एडिक्टिव है। इस पर जुकरबर्ग ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन कहा कि प्लेटफॉर्म ज्यादा वैल्यू देता है, इसलिए यूजर्स इस पर ज्यादा वक्त बिताते हैं। वकील ने 2018 में जकुरबर्ग और एपल के सीईओ टिम कुक के बीच हुए ईमेल एक्सचेंज को दिखाया। मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि यह यूजर्स की भलाई के लिए था।
प्लेटफॉर्म को बेहतर बनाने के लिए एपल के साथ मिलकर काम करने की उन्होंने कोशिश की थी। उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि हमारी कंपनी और एपल मिल कर और अच्छा कर सकते हैं, इसलिए मैं टिम से इस बारे में बात करना चाहता था।”
वकील ने लड़की के पुराने दस्तावेज भी दिखाए और जुकरबर्ग से पूछा कि 2015 में जब वह इंस्टाग्राम पर अपना अकाउंट बनाई थी तो उस वक्त 40 लाख यूजर्स 13 साल से कम उम्र के थे और 10-12 साल के 30 फीसदी अमेरिकी बच्चे इंस्टाग्राम का यूज कर रहे थे। उम्र की वैरिफिकेशन कैसे किया जाता है और बच्चों को कैसे अनुमति दी जाती है।
क्या 9 साल का बच्चा उस फाइन प्रिंट को पढ़ेगा जो सावधानी के रूप में लिखे जाते हैं। क्या इन बच्चों को प्लेटफॉर्म ने अनुमति दे दी है। इस पर जुकरबर्ग ने कहा कि कंपनी 13 साल से कम उम्र के बच्चों को अनुमति नहीं देती, लेकिन बच्चे झूठ बोल कर अपना उम्र बढ़ा देते हैं। अगर 13 साल से कम उम्र होती है तो कंपनी अकाउंट हटा देती है। हालाँकि उन्होंने माना कि उम्र का वेरिफिकेशन करना आसान नहीं होता है।
कंपनी इसको लेकर कई बदलाव कर रही है। नए टूल्स ला रही है। इस दौरान तीखे सवालों से झुझला कर जुकरबर्ग ने कहा कि उम्र चेक करने को लेकर कई समस्याएँ आ रही है, जिसके समाधान में कंपनी लगी हुई है।
कैली के मामले में उन्होंने कहा कि बच्ची को मानसिक बीमारी पहले से थी, उसकी वजह इंस्टाग्राम नहीं है। इस मुद्दे पर इंस्टाग्राम के हेड एडम मोसेरी जब कोर्ट में पेश हुए थे तो उन्होंने भी कहा था कि इंस्टाग्राम से वजह से बच्ची की तबियत नहीं बिगड़ी है। माना जा रहा है कि ट्रॉयल मार्च 2026 के अंत तक खत्म हो जाएगा। इसके बाद कोर्ट का फैसला आएगा, जिसका असर कंपनियों के साथ-साथ यूजर्स पर भी पड़ेगा।
कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिए
ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में 16 साल से छोटे बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया है। ऐसा करने वाला ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश है। फ्रांस की नेशनल असेंबली ने भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन का समर्थन किया है। ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर ब्रिटेन में भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने की तैयारी हो चुकी है।
नॉर्वे में भी सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया गया है। इसके लिए पहले 13 साल निश्चित किया गया था, जिसे अब 15 साल किया जा रहा है। ऑस्ट्रिया, पोलेंड, ग्रीस, डेनमार्क आदि देश भी बच्चों पर होने वाले असर की स्टडी कर रहे हैं और उस आधार पर फैसला लेंगे।
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने पीएम मोदी से की अपील
फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की दिशा में आगे बढ़ गया है। एआई इम्पैक्ट समिट में शामिल होने आए फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने प्रधानमंत्री मोदी से बच्चों को लेकर खास अपील की। उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि भारत में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चे के सोशल मीडिया अकाउंट पर बैन हो। उन्होंने कहा कि जिस चीज की इजाजत असल दुनिया में नहीं है, वह बच्चों को इंटरनेट पर भी नहीं दिखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और इंटरनेट को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाना प्लेटफॉर्म, सरकार और रेगुलेटर की जिम्मेदारी है। पीएम मोदी के सामने मैक्रों ने कहा कि फ्रांस के अलावा ग्रीस, स्पेन जैसे दूसरे देश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं, भारत से भी उन्हें उम्मीद है कि बच्चों और टीनएजर्स की सुरक्षा के लिए कदम उठाया जाएगा।
भारत के सोशल मीडिया बैन करने की माँग
भारत की एक चौथाई आबादी 14 साल से कम की है। भारतीय पेरेंट्स परेशान है कि उनके बच्चे हमेशा सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे फीचर्स जैसे इनफिनिट स्क्रॉल, नोटिफिकेशन, फिल्टर्स इन बच्चों को बाँधे रखते हैं। उन्हें न तो खाने-पीने की चिंता रहती है और न ही कहीं आना-जाना चाहते हैं।
पढ़ना-लिखना, बाहर खेलना, दूसरी एक्टिविटी बंद हो गए हैं। अकेले हाथ में फोन लेकर हँसना, खेलना और बिजी रहना। परिवार के बीच रह कर भी बच्चे परिवार से दूर होते जा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, सोशल मीडिया की लत लगने पर बच्चों में डिप्रेशन, गलत कंटेंट देखना, ऑनलाइन गलत संगति में पढ़ना, आत्मविश्वास का कम होगा, साइबर बुलिंग का खतरा रहता है। भारत में भी सोशल मीडिया पर रोक की माँग होने लगी है।
भारत में बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन की तैयारी
भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तैयारी शुरू हो गई है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसके संकेत दे दिए हैं। उन्होंने कहा है कि उम्र के आधार पर सोशल मीडिया पर पाबंदियों को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों से बातचीत की है। 16 साल से कम उम्र के बच्चों को इसके असर से कैसे बचाया जाए, सरकार का ध्यान इस पर है। उन्ह
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, प्लेटफॉर्म को कहा जाना चाहिए कि वह 16 साल से कम उम्र के बच्चों का प्लेटफॉर्म बंद कर दे। लेकिन भारत जैसे देश में इसे उम्र पूछ कर बैन करवाना आसान नहीं है। बच्चे झूठ बोल सकते हैं। आईडी वेरिफिकेशन होता है तो प्राइवेसी और निगरानी का खतरा बढ़ जाता है।
बच्चे वीपीएन का इस्तेमाल कर इसे चला सकते हैं। इसलिए बैन लगाना आसान काम नहीं है। जानकारों के मुताबिक, “प्लेटफॉर्म्स भले ही बैन लागू करें, लेकिन टीनएजर्स वीपीएन का इस्तेमाल करके या अपने से बड़ों के अकाउंट से या फिर नए कम मॉडरेशन वाले ऐप्स से इसे बायपास कर सकते हैं. इससे नुकसान कम नहीं होगा, बल्कि बस अकाउंट बदल जाएँगे। ”
असल जरूरत है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लत लगाने वाले डिजाइन को रेगुलेट किया जाए। उनके फीचर्स बदलें जाएँ, बच्चों की प्रोफाइलिंग रोकी जाए, रिसर्च को फंड किया जाए और एक स्वतंत्र रेगुलेटर को मजबूती दी जाए।


