दिल्ली सीमाओं पर जुटने के लिए बेचैन किसान प्रदर्शनकारी सरकार की एक सुनने को तैयार नहीं हैं। मोदी सरकार कुछ दिन पहले उनके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का प्रस्ताव लाई थी, लेकिन कृषि संघों ने और किसानों के नेता बने बैठे लोगों ने इसे फौरन नामंजूर कर दिया। बिन ये सोचे कि इस प्रस्ताव में क्या-क्या खास चीजें थीं और उससे उन्हें क्या लाभ हो सकता था।
ऐसा करने पीछे उनकी मंशा क्या है इसे समझने के लिए पंजाब में होने वाली खेती, उसमें आने वाली लागत समेत कई चीजों को समझना जरूरी है। इनसे पता चलता है कि विविधता की ओर बढ़कर किस तरीके से किसानों का फायदा हो सकता था लेकिन वो उन कृषि संघों के जंजाल में फँसे हैं जिनका मकसद किसानों के हित में आवाज उठाना नहीं, बल्कि अपने व बिचौलियों के हित को बचाना है।
आइए, आपको सरकार की उन कोशिशों के बारे में संक्षिप्त में बताएँ जिसकी जानकारी सरकारी सूत्रों से हुई:
18 फरवरी 2024 को, केंद्र सरकार और पंजाब के किसान संघों के बीच बातचीत हुई। इस दौरान नरेंद्र मोदी सरकार ने किसानों के हित में एक अनूठा समाधान प्रस्तावित किया और कहा कि वह पंजाब के किसानों के साथ पाँच फसलों पर समझौता करने को तैयार हैं।
सरकार द्वारा लाए गए प्रस्ताव का उद्देश्य किसानों को गेहूँ और धान से हटकर विविधता लाने में मदद करना था और इसके लिए समझौता सरकारी एजेंसियों
(CCI, NAFED, आदि) के माध्यम से किया जाता। सबसे खास बात यह थी कि सरकार के इस प्रस्ताव में फसलों की मात्रा नहीं सीमित की गई थी।
सूत्र कहते हैं कि पारिस्थितिक दृष्टिकोण से, यह प्रस्ताव पंजाब के लिए आदर्श था क्योंकि वहाँ भूजल स्तर चिंताजनक रूप से कम हो गया है। डायनेमिक ग्राउंडवाटर रिसोर्सेज असेसमेंट ऑफ इंडिया-2017 रिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब में 138 मूल्यांकन किए गए ब्लॉकों में से 109 अतिशुष्क, दो गंभीर रूप से शुष्क, 5 अर्ध-शुष्क थे। सिर्फ इसमें केवल 22 सुरक्षित हैं।
ऐसे हाल में राज्य का कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 23.93 बीसीएम आँका गया है। वहीं वार्षिक निष्कर्षण योग्य भूजल संसाधन 21.59 बीसीएम। बावजूद इसके, वार्षिक भूजल निकासी 35.78 बीसीएम थी यानी निकासी 166 फीसद थी। निकासी का यह आँकड़ा किसी भी राज्य में से सबसे अधिक है। राजस्थान में ये आँकड़ा 140 प्रतिशत से कम है।
ऐसे में छोटे किसान के लिए, पिछले कुछ वर्षों में भूजल निकालने की लागत बढ़ गई है। अब अगर किसान उन फसलों को उगाएँ जिनमें पानी की खपत कम होती है तो इनपुट लागत अपने आप कम हो जाएगी।
पंजाब के अधिकांश क्षेत्र में गेहूँ और धान (2020-21 में 85%) की खेती होती है। वहीं सरकार ने जिन फसलों जैसे कपास, दालों और मक्का आदि के लिए एक के लिए ऑफर दिया था, उनमें पारिस्थितिकी तंत्र (बाजार, खरीदार, रसद, इनपुट आपूर्ति, आदि) उतना महत्वपूर्ण नहीं है। बस सिर्फ सरकारी समर्थन की आवश्यकता है वो सरकार देने को तैयार है।
फिलहाल, खेती के क्षेत्र के संदर्भ में, पंजाब में मक्का 1.5% है, कपास 3.2% है, और दालें केवल 0.4% हैं। सरकार के प्रस्ताव से किसानों को मौका मिलता कि वह इन फसलों की ओर बढ़ें और नए बाजार व खरीदारों से मिलें। खासकर निजी क्षेत्र में, जिससे उन्हें अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलते।
केंद्र के प्रस्ताव को अस्वीकार करके, कृषि संघों ने अपने कुछ समय के हितों के लिए पंजाब के किसानों के दीर्घकालिक हितों को दाँव पर लगा दिया है। वह किसानों को गेहूँ और धान से ऊपर उठकर कुछ नया नहीं करने दे रहे हैं। इन यूनियनों की वजह से न केवल किसानों नए बाजार में संभावनाएँ तलाशने से अछूते हैं बल्कि इनकी इसी जिद्द के कारण भूजल तनाव भी बढ़ रहा है और किसानों को इनपुट लागत भी ज्यादा आ रही है। अंततः, यह कुछ वर्षों में कुछ बेल्टों को धान और गेहूँ की खेती के लिए अनुपयुक्त बना सकता है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को और नुकसान होगा।
कृषि संघ, जिनके बारे में स्थानीय रूप से जाना जाता है कि वो मुख्य रूप से आढ़तियों से बने हैं, वे अपने भारी उस कमीशन को भी प्राथमिकता दे रहे हैं जो वे एपीएमसी मंडियों में गेहूँ और धान के व्यापार से कमाते हैं। उनके लिए किसानों के हित से ज्यादा बिचौलियों का कमीशन महत्वपूर्ण है चाहे उसमें पंजाब के किसानों का नुकसान ही क्यों न होता रहे।
गूगल का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सर्च इंजन ‘जेमिनी’ विवादों में फँस गया है। गूगल के जेमिनी पर हिन्दू भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा है। इसी के साथ ही इस पर गोरी चमड़ी वाले लोगों की उपलब्धियों को नजरअंदाज करने और हर बात में लिबरल विचारधारा घुसाने का आरोप भी लगा है। इसके कारण AI टीम के मुखिया को माफ़ी माँगनी पड़ी है।
यह सारा मामला AI सर्च इंजन से फोटो जनरेट करने को लेकर जुड़ा हुआ है। एक्स (पहले ट्विटर) पर बुधवार (21 फरवरी 2024) को ‘माइक इन स्पेस’ (@mikeinspace/X) नाम के हैंडल ने एक ट्वीट डाला। इसमें उन्होंने बताया, “मैंने गूगल जेमिनी से ‘बिटकॉइनर की स्टीक खाते हुए’ एक इमेज बनाने के लिए कहा और इसने मुझे एक हिन्दू महिला को बीफ़ खाते हुए दिखाया। मुझे लगता है यह गूगल के सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील होने का प्रयास है।”
I asked Google Gemini to generate an image of a "Bitcoiner eating a steak" and it gave me a *hindu* woman eating *beef*. I guess this is Google trying to be culturally sensitive? ? pic.twitter.com/EuECohu2ov
उन्होंने आखिरी लाइन में गूगल पर तंज कसा, क्योंकि गूगल सदैव ही सभी संस्कृतियों का सम्मान करने का दावा करता है। ऐसे में एक हिन्दू महिला को बीफ खाते हुए दिखाने को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने जो फोटो ट्विटर पर साझा की है, उसमें माथे पर तिलक लगाई हुई एक महिला बीफ खाते हुए दिखती है। ऐसे में उन्होंने प्रश्न उठाया कि जहाँ एक हिन्दू बिटक्वाइनर (बिटक्वाइन बनाने वाला) हो सकता है, वह बीफ कभी नहीं खाएगा।
लोगों ने भी इस बात पर प्रश्न उठाए कि ऐसा क्यों है, जबकि गूगल का सीईओ एक भारतीय हिन्दू है। इसके बाद और भी कुछ ट्वीट वायरल हुए, जहाँ गूगल जेमिनी इतिहास से छेड़छाड़ करता दिखा। जेमिनी से जब एक व्यक्ति ने ग्रीक लोगों की फोटो जनरेट करने को कहा तो Gemini ने उन्हें अश्वेत दिखाया जबकि असल में वह गोरी चमड़ी वाले थे। इसने पोप को भी अश्वेत दिखाया।
New game: Try to get Google Gemini to make an image of a Caucasian male. I have not been successful so far. pic.twitter.com/1LAzZM2pXF
इससे जब मध्यकालीन योद्धाओं की तस्वीर दिखाने को कहा गया तो इसने इसमें कोई भी यूरोपियन योद्धा को शामिल नहीं किया, जबकि असल में मध्यकाल में बड़ी संख्या में यूरोप में युद्ध हो रहे थे और इसमें गोरी चमड़ी वाले योद्धा शामिल थे।
I’m trying to come up with new ways of asking for a white person without explicitly saying so. pic.twitter.com/VufLkgzqHg
इससे जब वाइकिंग योद्धाओं की एक फोटो जनरेट करने को कहा गया तो इसने यहाँ काले लोगों को दिखाया, जबकि असल में वाइकिंग योद्धा नॉर्वे जैसे देशों के थे और गोरी चमड़ी वाले थे। इसका परिणामों को बदलना लोगों को गुस्सा दे गया। हालाँकि, जब जेमिनी से ज़ुलु योद्धाओं की फोटो जारी करने को कहा गया तो इसने एकदम सही फोटो जारी की। दरअसल, ज़ुलु अफ़्रीकी योद्धा थे।
पोप को काला दिखाने, ऐतिहासिक तथ्यों को सही से ना प्रदर्शित करने और सब कहीं अफ़्रीकी मूल के लोगों की प्रधानता प्रस्तुत करने के चक्कर में जेमिनी की खूब लानत मलानत हुई। इसके बाद जेमिनी के मुखिया जैक क्राव्जी ने माफ़ी माँगी। जैक गूगल की AI डिवीजन के प्रमुख हैं।
उन्होंने इस विषय में एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “हमें इस बात की जानकारी है कि जेमिनी कुछ ऐतिहासिक लोगों के विषय में गलत इमेज बना रहा है। हम इस समस्या को तुरंत ठीक करने के लिए काम कर रहे हैं।”
We are aware that Gemini is offering inaccuracies in some historical image generation depictions, and we are working to fix this immediately.
As part of our AI principles https://t.co/BK786xbkey, we design our image generation capabilities to reflect our global user base, and we…
उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक लोगों के विषय में अधिक सावधानी की जरूरत होती है और इसे ऐसा किया जाएगा। हालाँकि, उनके इस बयान पर लोगों ने पूछा कि जेमिनी आखिर अंग्रेज या यूरोपियन लोगों के साथ ही क्यों कर रहा है।
बिहार के कटिहार में पिंकी खातून नामक एक महिला को बेटी को जन्म देने के कारण अपने ही परिवार द्वारा प्रताड़ित किए जाने का मामला सामने आया है। महिला ने बताया कि उसका शौहर उसकी बहुत पिटाई करता है, दिन में बस एक बार खाने के लिए देता है। कभी दोपहर में तो कभी शाम को ही पीटने लगता है। पीड़िता ने बताया कि उसे सोने तक नहीं दिया जाता है, जमीन पर लेटने को कहा जाता है। प्रताड़ना देने में सास, ससुर और शौहर – सब मिले हुए हैं।
महिला ने आरोप लगाया कि उसका हाथ-पाँव बाँध दिया गया और फिर मुँह में जबरदस्ती बैंगन के खेत में डालने वाला ज़हर डाल दिया गया। बकौल पिंकी खातून, उसके ससुराल वालों की साजिश है कि उसकी हत्या कर के उसके शौहर मोहम्मद तस्लीम का निकाह कहीं और करा दिया जाए। ये सब इसीलिए किया जा रहा है क्योंकि उसने बेटा नहीं, बेटी को जन्म दिया है। इतना ही नहीं, आरोप है कि छोटी सी बच्ची को भी मारने के लिए ये लोग गन्ने के खेत में लेकर गए थे, लेकिन पीड़िता ने किसी तरह अपनी बेटी को बचाया।
ससुराल वाले अब बहू को अस्पताल में छोड़ कर फरार हो गए हैं। घटना कटिहार के बरारी प्रखंड की है। आरोप है कि बेटी होने पर ससुराल वालों ने बहू को ज़हरीला पदार्थ खिला दिया और उसकी हत्या करने की कोशिश की। पिंकी खातून का इलाज कटिहार के सदर अस्पताल में चल रहा है। वो अनारकली गाँव की रहने वाली है, जिसका निकाह दुर्गापुर के मोहम्मद तस्लीम से 2021 में धूमधाम से किया गया था। अम्मी-अब्बू ने जम कर दहेज़ भी दिया था।
कटिहार में बेटे की चाहत में ससुराल वाले बने हैवान, पहले बहु को किया प्रताड़ित फिर खिला दी जहरhttps://t.co/jZcJFnSDYf
पिंकी खातून का कहना है कि 2 साल तक ससुराल में उसके साथ अच्छा व्यवहार हुआ, लेकिन बेटी के जन्म के बाद शौहर के साथ-साथ सास साजिमा खातून और ससुर जयदुल हक इन सभी ने मिल कर मारपीट शुरू कर दी। जो सास, ससुर और पति प्यार करते थे वही अब उसकी पिटाई करने लगे। पिंकी खातून के साथ ऐसा किया जा रहा था, ताकि वो खुद घर छोड़ कर चली जाए। ऐसा नहीं हुआ तो ज़हर दे दिया। अस्पताल में इलाज के बाद किसी तरह पीड़िता की जान बच गई है।
गुजरात के नर्मदा जिले की एक अदालत ने लव जिहाद के मामले में बेटे और अब्बा को सजा का एलान किया है। खुद को हिन्दू बताकर जनजातीय समुदाय की एक नाबालिग लड़की से रेप करने वाले इम्तियाज को 10 साल की सजा सुनाई गई है। वहीं, उसके अब्बा शब्बीर को 3 साल की सजा दी गई है। दोनों पर अदालत ने जुर्माना भी लगाया है। इम्तियाज इसके पहले भी एक हिंदू लड़की के साथ घिनौनी हरकत कर चुका है।
इम्तियाज ने पीड़िता का अश्लील वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल भी किया था। इसी पीड़िता से इम्तियाज के साथ-साथ उसके अब्बा शब्बीर ने भी दुष्कर्म का प्रयास किया था। दरअसल, पीड़िता शब्बीर के पास उसके बेटे इम्तियाज के पास शिकायत लेकर गई थी। शब्बीर ने नाबालिग की शिकायत सुनने के बजाय उससे अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा का है। यहाँ जनजातीय समुदाय की 17 साल की एक नाबालिग लड़की को इम्तियाज पठान हिन्दू बनकर मिला था। उसने अपना नाम भावीन बताया था। इसके बाद इम्तियाज ने लड़की को अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। उसने शादी का झाँसा देकर लड़की को झाँसे में ले लिया। उस समय पीड़िता 12वीं की परीक्षा दे रही थी।
एक दिन आरोपित इम्तियाज ने नाबालिग लड़की का अपहरण कर लिया और अलग-अलग जगहों पर ले जाकर उसका रेप करता रहा। जब लड़की इस हरकत का विरोध करती तो इम्तियाज उसे शादी के नाम पर बहला देता था और उसे चुप करा देता था। आरोप है कि इसी दौरान इम्तियाज ने लड़की के अश्लील वीडियो भी बना लिए। उसने यही वीडियो दिखाकर पीड़िता को मुँह बंद रखने की धमकी भी दी।
एक दिन पीड़िता को इम्तियाज के बैग में से उसका पहचान पत्र मिला। तब जाकर लड़की को इम्तियाज के मुस्लिम होने की जानकारी हुई। पीड़िता फ़ौरन ही इम्तियाज़ के अब्बू शब्बीर के पास शिकायत लेकर गई। बकौल पीड़िता, शब्बीर ने उसकी शिकायत पर ध्यान नहीं दिया। वह लड़की के सीने और शरीर के अन्य अंगों को बदनीयती से छूने लगा। लड़की ने इसका विरोध किया और जैसे-तैसे लौटकर घर आई।
घर पहुँचकर नाबालिग लड़की ने अपने पिता को सारी बात बताई। आखिरकार लड़की के पिता ने डेडियापाड़ा पुलिस में FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने पॉक्सो एक्ट सहित अन्य धाराओं में मामला कर दर्ज लिया। इसके बाद इम्तियाज और उसके अब्बा शब्बीर को गिरफ्तार कर लिया। नर्मदा जिले की अदालत में चले इस मामले में आखिरकार अब फैसला सुनाया गया।
अदालत ने इम्तियाज़ पठान को 10 साल की कठोर कारावास के साथ 17 हजार रुपए की जुर्माने की सजा सुनाई है। वहीं, इम्तियाज़ के अब्बा शब्बीर को भी 3 साल की सजा सुनाई गई। शब्बीर को जुर्माने के तौर पर 6 हजार रुपए भी भरने होंगे। अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह नाबालिग पीड़िता को 50,000 रुपए का मुआवजा दे।
पहले भी कर चुका है हिन्दू लड़की से निकाह
नर्मदा कोर्ट के वकील जीतेंद्र गोहिल ने बताया कि आरोपितों को POCSO एक्ट के तहत सजा मिली है। उन्होंने बताया आरोपित मुस्लिम होने के बावजूद हिंदू नाम से पहचान पत्र बना रखा था और हिंदू लड़कियों को अपना शिकार बनाता था और उन्हें प्रेमजाल में फँसाकर उनके साथ बलात्कार करता था। इसमें उसका अब्बू शब्बीर भी साथ देता था।
आरोपित इम्तियाज ने 10 साल पहले भी नंदोड़ तालुका के एक गाँव की रहने वाली हिंदू लड़की से निकाह किया था। इस निकाह से उसे एक बेटी भी पैदा हुई थी, जो अब सात साल की है। बाद में इम्तियाज अपनी बेटी और बीवी को छोड़ कर भाग निकला था। वह डेडियापाड़ा तालुका इलाके में रहने लगा और यहीं पर भावीन नाम से नाबालिग जनजातीय हिंदू लड़की को अपने जाल में फँसा लिया।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने ‘रिपब्लिक बांग्ला’ के पत्रकार सन्तु पान को जमानत दे दी है। इसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए झटका माना जा रहा है, क्योंकि पश्चिम बंगाल की TMC (तृणमूल कॉन्ग्रेस) सरकार संदेशखाली में महिलाओं के यौन शोषण के मामलों को दबाने में लगी है। इसी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते वक्त सन्तु पान को लाइव कैमरे के सामने बंगाल पुलिस गिरफ्तार कर के ले गई थी। इसके बाद देश भर में कई पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन किया था।
‘रिपब्लिक’ ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि कलकत्ता हाईकोर्ट ने रिपोर्ट करने के अधिकार की सुरक्षा की है। मीडिया संस्थान ने इसे प्रेस फ्रीडम की जीत करार दिया है। साथ ही ये भी कहा कि संदेशखाली के मुद्दे को दबाने की ममता बनर्जी की साजिश औंधे मुँह गिरी है। इस मामले में ‘रिपब्लिक’ की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने पैरवी की। कोलकाता स्थित ‘रिपब्लिक बांग्ला’ के न्यूज़रूम में सन्तु पान को बेल मिलने के बाद जश्न का माहौल रहा।
संदेशखाली का मुद्दा पिछले 1 महीने से गर्म है। TMC नेता शाहजहाँ शेख, उसके शागिर्दों शिबू हाजरा व उत्तम सरदार और इनके गुर्गों पर आरोप है कि ये सुंदर महिलाओं को घर से उठा कर स्थानीय पार्टी दफ्तर में ले जाते थे और उनका यौन शोषण करते थे। महिलाओं को ये अपने हिसाब से जितने दिन मन हो अपने पास रखते थे। ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ (NCW) की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इलाके का दौरा कर थाने में महिलाओं की शिकायत दर्ज करवाई।
#TruthPrevails | Santu Pan, R Bangla Reporter Granted Bail, Calcutta High Court Stays Probe
साथ ही ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ (NCST) ने भी इन घटनाओं पर आपत्ति जताते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और DGP (पुलिस महानिदेशक) से जवाब तलब किया है। राज्यपाल CV आनंद बोस पीड़िताओं से मिल चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी को पुलिस वहाँ नहीं जाने दे रही थी, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के बाद वो पीड़िताओं से मिलने पहुँचे। अब उच्च न्यायालय ने पत्रकारों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को फटकार भी लगाई है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज वाले पश्चिम बंगाल के संदेशखाली का मुद्दा इस समय सुर्ख़ियों में है। यहाँ बड़ी संख्या में महिलाओं ने सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों पर घर से उठाने और यौन शोषण करने के आरोप लगाए हैं। शाहजहाँ शेख पहले से ही फरार है। वहीं, संदेशखाली की सच्चाई दिखाने वाली मीडिया को बंगाल पुलिस उठा कर ले जा रही है।
इतना ही नहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता शाहजहाँ शेख की सच्चाई बताने वाली पीड़ित महिलाओं की पहचान उजागर की जा रही है और उन पर दमन चक्र चलाया जा रहा है। इस बीच देश की परंपरागत मीडिया ने इस खबर ना उतनी तवज्जो दी है और ना ही इस मामले में ढिलाई बरतने पर ममता बनर्जी सरकार की आलोचना हुई है।
सुंदरबन के द्वीपीय इलाके संदेशखाली में अब तक क्या हुआ, घर से महिलाओं को उठाकर ले जाने और उनका यौन शोषण करने के आरोप कहाँ से आए, बंगाल पुलिस ने इस मामले में अब तक क्या किया, बंगाल की सरकार प्रेस की आजादी को कैसे छीन रही है और हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी की सरकार से क्या कहा….. ये सब जानने की जरूरत है।
मीडिया की आजादी पर हमला, पत्रकारों पर FIR
संदेशखाली पर रिपोर्ट करने से रोकने के लिए ममता सरकार का दमनचक्र जारी है। सरकार के निशाने पर मीडियाकर्मी हैं, जो संदेशखाली का सच देश को दिखाना चाहते हैं। बंगाल की पुलिस ऐसे पत्रकारों को कैमरे के सामने से उठाकर ले जा रही है और उन पर FIR दर्ज कर रही है। इस मामले में सबसे पहले रिपब्लिक बांग्ला के रिपोर्टर संतू पान को 19 फरवरी, 2024 को गिरफ्तार किया गया।
संतू को जिस समय गिरफ्तार किया गया, उस समय वे लाइव थे। उन्हें कैमरे के सामने से ही बंगाल पुलिस उठा ले गई। संतू की पत्नी ने इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से शिकायत की है। संतू पान संदेशखाली का सच अपने दर्शकों को लगातार दिखा रहे थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद भी जब सच बाहर आता रहा तो बंगाल पुलिस ने एक और पत्रकार सुमन डे के खिलाफ FIR दर्ज कर ली।
सुमन ABP आनंद (बांग्ला चैनल) से जुड़े हैं। उन पर संदेशखाली से सम्बंधित एक शो करने के लिए FIR दर्ज की गई है। बंगाल की पुलिस ने उनके इस शो को गलत बताया और उन पर मामला दर्ज कर लिया। संदेशखाली में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है और यहाँ की हकीकत को बाहर नहीं आने दिया जा रहा है।
गिरफ्तार किए गए पत्रकार संतू को गुरुवार (22 फरवरी 2024) को जमानत मिल गई है। उनके खिलाफ एक महिला के घर में घुसने का मामला दर्ज कर दिया गया है। उनको कहीं ले भी जाया गया है। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि उन्होंने संदेशखाली का सच दिखाने की हिम्मत की थी। संतू की गिरफ्तारी के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक पत्रकारों ने प्रदर्शन किए हैं।
बंगाल पुलिस ने ही उजागर कर दी पीड़िता की पहचान
एक तरफ बंगाल सरकार पत्रकारों का दमन कर रही है तो दूसरी तरफ संदेशखाली की पीड़िताओं की पहचान भी उजागर कर रही है। इसको लेकर बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा सरकार पर हमलावर हो गई है। भाजपा ने पीड़िताओं से मिलने और इनकी बात सुनने की माँग के साथ-साथ आरोपितों पर कार्रवाई की माँग की है।
इस बीच ममता सरकार ने महिलाओं की पीड़ा सुनने के बजाय इस बात में दिलचस्पी दिखाई कि इस पूरे मामले को कैसे पूरी तरह दबा दिया जाए। बंगाल सरकार ने यहाँ बड़ी संख्या में पुलिस तैनात किया है। ये आरोप भी सामने आए हैं कि बंगाल पुलिस पीड़िताओं को ही परेशान कर रही है। दरअसल, बंगाल पुलिस बलात्कार के मामले को पहले ही खारिज कर चुकी है।
Shame on @WBPolice for sheer irresponsibility of releasing the picture (now deleted, after my tweet) of the victim of violence at Sandeshkhali & undermining both the rights of the victim as well as the law and order system of our Nation…#shamefulpic.twitter.com/IRreLTN2sh
बंगाल पुलिस ने एक महिला का असली बयान सुनाने के नाम पर उसकी पहचान उजागर कर दी। साथ ही उसका फोटो भी सोशल मीडिया पर डाल दिया। इसका विरोध हुआ तो ट्वीट हटा लिया गया। ऐसे भी आरोप हैं कि पुलिस पीड़िताओं को चुप कराने की कोशिश कर रही है। महिलाओं का आरोप है कि उनके घरों में पुलिस की वर्दी में लोग घुसे और धमकाया। महिलाओं ने बताया कि वे डर के साए में जी रही हैं।
क्या है संदेशखाली की वर्तमान स्थिति?
संदेशखाली में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और विपक्षी नेता भी पहुँचे। महिलाओं ने आपबीती NCW चीफ से सुनाई है। महिलाओं के साथ हुई बर्बरता को सुनकर NCW चीफ ने बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की है। देश भर में आलोचना के बाद वहाँ बलात्कार के 2 मामले दर्ज किए गए हैं। एक FIR बलात्कार, जबकि दूसरी सामूहिक बलात्कार की दर्ज हुई है।
एक FIR तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता शिबू हाजरा और उसके दो गुर्गों- उमर अली गाजी और भानू मंडल के विरुद्ध दर्ज की गई है। वहीं, एक मामले में उत्तम सरदार और शिबा हाजरा को आरोपित बनाया गया है।हालाँकि, इन दोनों ही मामलों में मुख्य आरोपित शाहजहाँ शेख का नाम नहीं है। पीड़िताओं ने शाहजहाँ को ही सरगना बताया है। शाहजहाँ को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का करीबी बताया जाता है।
जहाँ उत्तम सरदार और शिबू हाजरा की गिरफ्तारी हो चुकी है, वहीं शेख शाहजहाँ अब भी बंगाल पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका है। वह जनवरी से ही गायब है। उसको पकड़ने के लिए राज्य की पुलिस की कोई ख़ास तत्परता भी सामने नहीं आई है। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी बंगाल पुलिस और सरकार को फटकार लगाई है।
संदेशखाली में विपक्षी नेताओं के जाने पर भी ममता सरकार ने प्रतिबन्ध लगा रखा है। भाजपा के नेता सुवेंदु अधिकारी को इसके लिए कोर्ट तक का सहारा लेना पड़ा। दरअसल, यहाँ की अधिकांश पीड़िताएँ अनुसूचित जाति/जनजाति समाज से हैं। इस कारण इसका संज्ञान राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने लिया है। मानवाधिकार आयोग ने राज्य के डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी से जवाब माँगा है।
क्या है पूरा मामला, कहाँ से हुई शुरुआत?
बंगाल में एक जिला है उत्तरी 24 परगना। यहाँ के सुंदरबन डेल्टा में टापू पर बसा हुआ है संदेशखाली। यहाँ 5 जनवरी 2024 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक टीम CRPF के कुछ जवानों के साथ पहुँची थी। यह टीम बंगाल में हुए राशन घोटाला मामले में स्थानीय तृणमूल कॉन्ग्रेस नेता और पंचायत सदस्य शाहजहाँ शेख से पूछताछ करने आई थी। इस दौरान टीम पर हमला हो गया और कई अधिकारी एवं जवान घायल हुए।
यह मामला मीडिया में कुछ दिन तक चला और दब गया। शाहजहाँ शेख वहाँ से फरार हो चुका था और उसके घर पर ताला लटक रहा था। इस घटना के एक महीने बाद यानी 8 फरवरी 2024 को यहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ सड़क पर उतरीं। इन्होंने जो खुलासे किए वह सन्न करने वाले थे। महिलाओं ने आरोप लगाया कि शाहजहाँ शेख और उसके चेले शिबू हाजरा और उत्तम सरदार ने यहाँ अपना आतंक कायम कर रखा है।
महिलाओं ने कहा कि शाहजहाँ और उसके गुर्गों को जो भी महिला पसंद आती है, उसे वे घर से उठा ले आते हैं। जितने दिन मन होता है, उसे अपने पास रखते हैं और फिर ‘मन भर जाने’ पर महिला को वापस कर देते हैं। यदि कोई महिला इसका विरोध करती है तो उसके घरवालों को प्रताड़ित किया जाता है और हत्या तक की धमकी दी जाती है। इन आरोपों के कई वीडियो भी सामने आए।
महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान झाडुओं और लाठियों के साथ टीएमसी के गुंडों को दौड़ाया भी। आरोप सामने आने के बाद मामले को दबाने के लिए शाहजहाँ के आदमी दबाव बनाने लगे। महिलाओं ने बताया कि उनके घरों पर रात में टॉर्च मारी जाती है और उनके दरवाजों को पीटा जाता है। यौन शोषण के अलावा महिलाओं ने आरोप लगाए कि ये लोग मछली पालन के लिए उनकी जमीनों पर कब्जा कर चुके हैं।
एसोसिएशन ऑफ रेप क्राइसिस सेंटर्स इन इजरायल (एआरसीसीआई) ने बुधवार (21 फरवरी 2024) को संयुक्त राष्ट्र को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में इजराइल पर 7 अक्टूबर 2023 को गाजा के आतंकवादी संगठन हमास की ओर से हुए हमले के दौरान महिला-लड़कियों को जिस से व्यवस्थित तरीके से आतंकियों ने निशाना बनाया, उसकी विस्तार से जानकारी दी गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इजरायली महिलाओं-लड़कियों के प्राइवेट पार्ट को चाकुओं से गोदा गया, गैंगरेप किया गया, उनके गुप्तांग में ग्रेनेड डाल दिया गया, कीलें घुसा दी गई और फिर गुप्तांगों में गोली मार कर जान ले ली गई।
एआरसीसीआई ने बताया है कि हमास के आतंकियों ने इजरायली महिलाओं-लड़कियों का गैंगरेप किया, उनके परिवार के सामने उनकी इज्जत लूटी, ताकि उनके परिजन तिल-तिल कर मरते रहे, और फिर सभी को मार भी दिया गया। कई मामलों में लड़कियों-महिलाओं के गुप्तांगों को चाकुओं से गोदा गया, उनके अंगों को काट कर निकाला गया और फिर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया। ऐसी ही बर्बरता पुरुषों के साथ भी बरती गई, पहले उनके सामने ही उनकी साथी के साथ कई-कई आतंकियों ने गैंगरेप किया, फिर उनके गुप्तांगों में गोली मार दी और पुरुष के गुप्तांगों को भी काट कर दिया गया और फिर गोली मार कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।
ARCCI की रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवादियों ने “नोवा फेस्टिवल से भागे युवा महिलाओं और पुरुषों का पीछा कर उन्हें पकड़ा गया और उनके बालों को पकड़कर खींचते हुए ले जाया गया। उन्हें शिकार की तरह नोचा गया और फिर जान से मार दिया गया।”
रिपोर्ट में बताया गया है कि “हमास के आतंकियों ने इस तरह के यौन-अपराधों को जान-बूझकर अंजाम दिया। उन्होंने इसे आतंक फैलाने के तरीके के रूप में चुना। कई पीड़ितों के शव बंधे हुए पाए गए, तो कईयों को बेड़ियों से जकड़कर उनका गैंगरेप किया गया। महिलाओं और पुरुषों, दोनों के ही गुप्तांगों को बेरहमी से क्षत-विक्षत किया गया। कई बार उनके गुप्तांगों को चाकुओं से गोद डाला। उन्होंने गुप्तांगों में गोलियाँ मारी और शरीर के अन्य अंगों को भी चाकुओं से काटा। ऐसा उन्होंने परिवार वालों के सामने किया, ताकि उनकी दहशत बढ़े।” उन्होंने परिजनों के सामने इसलिए लड़कियों-महिलाओं की आबरू लूटी, ताकि परिवार के लोग अपमान से ही मर जाएँ।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह के भयानक यौन अपराध एकाध मामले में या छिटपुट की घटना नहीं थी, बल्कि इसे व्यापक तौर पर योजना के तहत अंजाम दिया गया, ताकि हमास का डर इजरायलियों के दिलों में बैठ जाए।
नोवा म्यूजिक फेस्टिवल से जुड़े एक पीड़ित ने ARCCI को बताया कि उसने हर तरफ लड़कियों के शवों को पड़े देखा, किसी के शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं था, तो किसी के निचले हिस्से पर। एक अन्य पीड़ित गैड लिबर्जन ने कहा कि उसके कानों में लगातार लड़कियों के चीखने की आवाजें आ रही थी। ‘ऐसा लग रहा था, जैसे उसके साथ बलात्कार किया जा रहा हो। उन लड़कियों को पिकअप में घसीटकर ले जाया गया, जहाँ उनका चिल्लाना बढ़ जाता था, फिर पुरुषों के चीखने की आवाजें सुनी और फिर गोलियों की तड़तड़ाहट…और फिर सबकुछ शांत। क्योंकि वो सारे लोग बलात्कार के बाद मार दिए गए।’
एक अन्य गवाह ने एआरसीसीआई को बताया, “वहाँ ऐसी लड़कियां थीं, जिनकी बलात्कार की वजह से कूल्हे तक टूट गए थे।” इस तरह के यौन अपराध सिर्फ नोवा फेस्टिवल वाली जगह ही नहीं, बल्कि किबुत्जिम और गाजा बॉर्डर के साथ लगे गाँवों में भी अंजाम दिया गया।
हमास आतंकियों के हमलों वाली जगह पर राहत कार्यों को अंजाम देने वाले लोगों ने बताया कि कई शवों पर कपड़े थे ही नहीं, या नाम मात्र के बचे थे। उनके जननांगों से खून रिस रहा था। उनमें चाकुओं से वार किया गया था। उनके अंग क्षत-विक्षत थे। कई लड़कियों और महिलाओं का उनके ही बेडरूम में गैंगरेप किया गया। उनके गुप्तांगों में वीर्य मिले और उनमें चाकुओं से काटने के निशान मिले। कई महिलाओं के गुप्तांगों में कीलें और हथगोले तक ठूँस दिए गए, तो कई शव ‘बूबी ट्रैप्ड’ थे, यानि बाँधकर इस तरह से लटकाए गए थे, कि उनका उत्पीड़न किया जा सके।
लेखक डॉ. कार्मिट क्लार-चलामिश और नोगा बर्जर ने अपनी गवाही में बताया है कि लगभग 90% मामलों में ड़ितों के साथ परिवार के सदस्यों सहित अन्य लोगों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया था। ARCCI ने यह भी बताया कि सैन्य ठिकानों पर भी इजरायलियों का यौन शोषण किया गया और गुप्तांगों में गोली मार दी गई।
इजरायल-हमास युद्ध
गौरतलब है कि पिछले साल 7 अक्टूबर को, लगभग 3000 हमास आतंकवादी ज़मीन, समुद्र और हवा से इज़राइल में उतरे और शिशुओं और विदेशी नागरिकों सहित 1,200 से अधिक इज़राइलियों की हत्या कर दी । उन्होंने क्रूरतापूर्वक हमला किया और महिलाओं का बलात्कार किया। इस दौरान महिलाओं के परेड के वीडियो भी सोशल मीडिया पर फैलाए गए। यही नहीं, 230 से अधिक इजरायली और विदेशी नागरिकों को बंधक भी बना लिया गया। इसके बाद से इजरायल ने गजा में हमास के खात्मे के लिए ऑपरेशन चलाया हुआ है।
अमेरिका में जाह्नवी कंडुला नामक भारतीय छात्रा की हत्या कर दी गई थी। अब खबर आई है कि इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारी केविन डवे पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा। केविन डवे उस दौरान फोन कॉल पर था और गाड़ी चला रहा था, उसी दौरान टक्कर हुई और लड़की की मौत हो गई। किंग काउंटी प्रॉसिक्यूटर ऑफिस ने बुधवार (21 फरवरी, 2024) को कहा कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में इस केस को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।
अटॉर्नी ने एक बयान जारी कर के बताया है कि जाह्नवी कंडुला की मौत दिल दहलाने वाली है, और इसने किंग काउंटी और पूरी दुनिया में समुदायों को प्रभावित किया है। जाह्नवी कंडुला की उम्र मात्र 23 वर्ष ही थी। उनकी मौत 23 जनवरी, 2023 को हुई थी, जब वो सड़क पार कर रही थीं। उसी दौरान केविन डेव के पास ड्रग्स ओवरडोज की एक फोन कॉल आ गई। घटना के समय वो 120 किलोमीटर/घंटा की रफ़्तार से गाड़ी चला रहा था।
जैसे ही जाह्वनी कंडुला को पुलिस पेट्रोलिंग वाली गाड़ी की ठोकर लगी, वो 100 फ़ीट दूर उछल कर गिर गईं। मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी। सिएटल पुलिस डिपार्टमेंट का एक बॉडीकैम वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें एक अन्य पुलिस अधिकारी डेनिएल ऑडरेर को इस मौत का मजाक बनाते हुए देखा गया था। उसने हँसते हुए कहा था कि उस लड़की की जान की कीमत कम थी। अब अटॉर्नी ने कहा है कि वाशिंगटन स्टेट लॉ के हिसाब से मामला चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
पुलिस अधिकारी की इस टिप्पणी के बाद उसे पेट्रोलिंग की ड्यूटी से हटा दिया गया था और ‘नॉन ऑपरेशनल’ कार्यों में लगा दिया गया था। जाह्नवी मूल रूप से हैदराबाद की रहने वाली थीं। अब कहा जा रहा है कि कवि डेव एक पाथ्मिक्ता वाली कॉल को रिसीव कर रहा था और इसके लिए पुलिस विभाग ने उससे निवेदन किया था। अटॉर्नी का ये भी कहना है कि इस दौरान उसकी गाड़ी की इमरजेंसी लाइट्स ऑन थी और आवाजाही कर रहे बाकी लोगों ने सायरन की आवाज़ सुनी थी।
This is Jaahnavi Kandula, an Indian immigrant student. It’s been one year since she was ran over & brutally k!lled by a Seattle Police Officer Kevin Dave. She was 23 not 26. The leaked body cam recordings of Daniel Auderer, Vice President of Seattle Police Officers Guild, where… pic.twitter.com/veHI5Agt1r
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान जाह्नवी कंडुला सड़क पर बने इंटरसेक्शन की तरफ भागने लगीं। साथ ही बताया गया है कि उन्होंने ईयरफोन लगा रखा था, जिससे उन्हें सुनाई कम दे रहा होगा। जबकि स्थानीय मीडिया का कहना था कि केविन डेव की गाड़ी की स्पीड बहुत ज्यादा थी और दुर्घटना का कारण यही थी। जाह्नवी कंडुला की माँ सिंगल मदर हैं, जो एक शिक्षिका हैं। वो नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के साउथ लेक यूनियन कैम्पस में पढ़ती थीं। दिसंबर 2023 में उन्हें स्नातक होना था।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद शहर में स्थित ‘दारुल उलूम मदरसा’ विवादित फतवों के कारण चर्चा में कई बार रहा है। लेकिन, इस बार उसने भारत विरोधी फतवा जारी कर अपनी कट्टर मानसिकता का प्रमाण दिया है। दारुल उलूम ने अपने फतवे में गजवा-ए-हिंद को मान्यता दे दी है। इस फतवे से बताया गया है कि भारत पर आक्रमण के दौरान मरने वाले महान शहीद कहलाए जाएँगे और उन्हें जन्नत मिलेगी। इस फतवे के खिलाफ अब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सहारनपुर पुलिस के अधिकारियों को कार्रवाई के लिए नोटिस जारी किया है।
दरअसल, दारुल उलूम की साइट (darulifta-deoband.com) पर सवाल किया गया था कि क्या हदीस में भारत पर आक्रमण का जिक्र है जो उपमहाद्वीप में होगा? और जो भी इस जंग में शहीद होगा, वो महान शहीद कहलाएगा। और जो गाजी होगा वो जन्नती होगा।
darulifta-deoband.com पर उर्दू में पूछा गया प्रश्न और उसका जवाब
इसी सवाल के जवाब में दारुल उलूम की ओर से फतवा जारी किया गया। फतवे में ‘सुन्न अल नसा (Sunan-al-Nasa) ‘ नाम की किताब का जिक्र करते हुए कहा गया है कि इस किताब में गजवा-ए-हिंद को लेकर पूरा का पूरा चैप्टर है। इसमें हजरत अबू हुरैरा की हदीस का जिक्र करते हुए कहा गया है- “अल्लाह के संदेशवाहक ने भारत पर हमले का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैं जिंदा रहा तो इसके लिए मैं अपनी खुद की और अपनी संपत्ति की कुर्बानी दे दूँगा। मैं सबसे महान शहीद बनूँगा।”
इस फतवे में ये भी बताया गया कि देवबंद की मुख्तार एंड कंपनी ने इस मशहूर किताब को प्रिंट किया है।
दारुल उलूम देवबंद द्वारा दिया गया सवाल का जवाब
सहारनपुर के डीएम और एसपी को एक नोटिस
अब इस फतवे में जहाँ भारत पर आक्रमण की बात को उचित ठहराने का प्रयास हुआ है। वहीं राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने सहारनपुर जिले के डीएम और एसपी को एक नोटिस जारी कर इस मामले में FIR दर्ज करने को कहा।
एनसीपीसीआर ने नोटिस में कहा कि ये मदरसा भारत के बच्चों को देशविरोधी तालीम दे रहा है। इससे इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। बच्चों में देश के प्रति नफरत पैदा होगी। आयोग ने कहा कि बच्चों को अनावश्यक रूप से परेशान करना या शारीरिक कष्ट देना तो किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 का उल्लंघन है।
NCPCR द्वारा की गई शिकायत
उन्होंने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि गजवा-ए-हिंद को लेकर हाल ही में आए फतवे के मामले में आयोग सीपीसीआर अधिनियम, 2005 की धारा 13 (1) के तहत आईपीसी और जेजे अधिनियम, 2015 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश देती है। उन्होंने पुलिस से फौरन इस मामले में दारुल उलूम देवबंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कहा। साथ ही संबंधित कार्रवाई की रिपोर्ट 3 दिन के भीतर आयोग को भेजने को कहा।
NCPCR द्वारा की गई शिकायत
बता दें कि इससे पहले साल 2022 और 2023 में भी आयोग ने दारुल उलूम की साइट पर जारी विवादित फतवों का खुलासा किया था और माँग की थी कि इसकी साइट को ब्लॉक किया जाए और एफआईआर हो, लेकिन प्रशासन ने इसमें कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे में आयोग कहता है कि अगर कोई प्रतिकूल परिणाम ऐसी तालीम के कारण आए तो फिर उसके लिए जिला प्रशासन भी बराबर का जिम्मेदार होगा।
देश में ‘किसान आंदोलन 2.0’ शुरू हो चुका है। कॉन्ग्रेस पार्टी मोदी सरकार पर सिख विरोधी होने का आरोप लगा रही है। दिल्ली आने के लिए हरियाणा की सीमा पर डटे अधिकतर किसान पंजाब के ही हैं। पिछली बार जब किसान आंदोलन हुआ था तो खालिस्तानी ताकतों ने उसे हाईजैक कर लिया था और जम कर उत्पात मचाया था। देश में लोकसभा चुनाव से पहले विभाजन वाली राजनीति खेली जा रही है। हालाँकि, पंजाब और सिखों के इतिहास को समझने के लिए हमें जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को भी देखना पड़ेगा।
जब बात पंजाब में उग्रवाद की आती है तो हमें इंदिरा गाँधी का दौर याद आ जाता है जब स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना को घुसना पड़ा था, क्योंकि कॉन्ग्रेस के समर्थन से ही पैदा हुआ आतंकी जरनैल सिंह भिंडराँवाले वहाँ छिपा हुआ था। तब तक वो देश के लिए एक नासूर बन चुका था। इस कारण ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाना पड़ा। हालाँकि, यही इंदिरा गाँधी की हत्या का भी कारण बना जब सिख अंगरक्षकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। इसके बाद सिख नरसंहार हुआ, राजीव गाँधी ने ‘कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ वाला बयान दिया।
लेकिन, पंजाब के इतिहास का एक ऐसा ही अध्याय नेहरू काल से भी जुड़ा है। जब भारत स्वतंत्र हुआ तब ये 552 रियासतों में बँटा हुआ था, जिन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल ने एक किया। 1956 में ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ आया, जिसके तहत नए प्रदेशों का निर्माण हुआ और पूर्व के प्रदेशों की सीमाओं में परिवर्तन किया गया। मैसूर से केरल, मद्रास से आंध्र प्रदेश, पंजाब से हिमाचल प्रदेश (तब केंद्र शासित) और असम से त्रिपुरा और मणिपुर (दोनों केंद्र शासित) को अलग किया गया। दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला।
हालाँकि, ये वो और भी था जब ‘पंजाबी सूबा मूवमेंट’ भी चल रहा था। इसके तहत सिख लोग अपने लिए भारत के भीतर ही एक स्वतंत्र राज्य का गठन चाहते थे, जहाँ के नियम-कानून उनके हिसाब से हों। इसे हम खालिस्तानी आतंकी विचारधारा का पूर्वज कह सकते हैं। लेकिन, जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रधानमंत्री रहते ‘पंजाब सूबा मूवमेंट’ की माँग को स्वीकार नहीं किया। 1966 में ‘पंजाब पुनर्गठन अधिनियम’ के तहत इसे अलग राज्य का दर्जा मिला, नेहरू के निधन के 2 वर्ष बाद।
पंजाबी सूबा, अकाली दल और खालिस्तान का पूर्वज
अलग पंजाबी सूबा की माँग वाले अभियान का नेतृत्व ‘अकाली दल’ कर रहा था। कॉन्ग्रेस पार्टी खुलेआम इसके विरोध में थी। 1950 तक प्रतापसिंह कैरों की अध्यक्षता वाली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने अपनी पूरी ताकत इस मुहिम के विरोध में झोंकी हुई थी। उस दौरान आर्य समाज भी पंजाब में सक्रिय था। पंजाब के कई हिन्दुओं ने पंजाबी भाषा को अपना मानने से इनकार कर दिया था। ‘अकाली दल’ का जोर था कि लोग अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में पंजाबी ही दर्ज कराएँ।
फिर तत्कालीन पीएम नेहरू ने इस समस्या का ये तोड़ निकाला कि पंजाब में जनगणना के दौरान भाषा दर्ज ही न की जाए। इस तरह 1951 में भाषा के नाम ही पंजाब में दरारें पैदा हो गई थीं। एक तरफ आक्रामक रवैया वाले ‘अकाली दल’ के समर्थक थे, दूसरी तरफ पंजाब का गैर-सिख समुदाय। 4 जनवरी, 1952 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पटियाला में दिए गए भाषण में स्पष्ट कहा कि पंजाब सूबे के निर्माण से देश का विभाजन होगा। उन्होंने खुल कर ऐलान किया, “मैं दोबारा भारत का बँटवारा नहीं होने दूँगा। मैं और कोई परेशानी खड़ी नहीं होने दूँगा, पूरी ताकत से इसे दबाऊँगा।”
जनता का साथ भी देश के पहले आम चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी को मिला और ‘शिरोमणि अकाली दल’ को पराजय का सामना करना पड़ा। अमृतसर और गुरदासपुर जैसे सिख बहुल जिलों में भी कॉन्ग्रेस ने ही बाजी मारी। जालंधर और गुरदासपुर में तो ‘अकाली दल’ का खाता तक नहीं खुला। पार्टी ने पतित सांप्रदायिकता और बेईमानी को अपनी हार की वजह बताई और अलग पंजाब सूबे की माँग जारी रखी। इस दौरान ये जिक्र करना आवश्यक है कि उस दौरान ‘ईस्ट पंजाब’ प्रान्त हुआ करता था।
ईस्ट पंजाब मतलब पंजाब का वो इलाका जो विभाजन के बाद भारत में रह गया। वहीं वेस्ट पंजाब पाकिस्तान में चला गया। 1950 में भारत के संविधान में ईस्ट पंजाब को ही पंजाब कहा गया। फिर PEPSU (पटियाला एन्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन) का गठन हुआ, 8 विभिन्न रियासतों और 2 छोटे रियासतों को मिला कर। उस दौरान शिमला और कसौली भी इसी का हिस्सा हुआ करते थे। 1956 में इसे ‘स्टेट ऑफ पंजाब’ कहा गया और 1966 में इसे पंजाब का उस रूप में गठन हुआ जिसे हम आज देखते हैं, हरियाणा (तब पंजाब का दक्षिणी हिस्सा) बना और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बना।
जब राज्य पुनर्गठन आयोग बना था तब 1954 में उसके समक्ष ‘अकाली दल’ ने ज्ञापन देकर भाषा के आधार पर पंजाब के गठन की माँग की। उसने ज्ञापन देकर बताया कि पंजाब एक अलग भाषा है, जिसके पास गुरुमुखी लिपि भी है जो ब्राह्मी से उत्पन्न हुई है। वहीं कॉन्ग्रेस ने पंजाब, PEPSU और हिमाचल प्रदेश – इन तीनों को मिला कर उसने पंजाबी सूबा के निर्माण की माँग की। जनसंघ ने इसमें दिल्ली को भी मिला कर ‘महा पंजाब’ राज्य के गठन की माँग की।
राज्य पुनर्गठन आयोग ने पंजाबी को हिंदी से अलग भाषा नहीं माना और जन-समर्थन के अभाव को कारण बता कर अलग सूबे के गठन की माँग को अस्वीकार कर दिया था। तत्कालीन केंद्र सरकार मानती थी कि पंजाब का भाषा के आधार पर विभाजन का अर्थ होगा धर्म के आधार पर बँटवारा, जिसका दंश देश झेल चुका था। जबकि पंजाब में बड़ी संख्या में हिन्दीभाषी भी थे। आँकड़ों की मानें तो आंदोलन में सक्रिय 12,000 सिखों को 1955 में और 26,000 सिखों को 1956 में गिरफ्तार किया गया था।
उस समय हालात ऐसे हो गए थे कि अप्रैल 1955 में अमृतसर प्रशासन ने ‘पंजाबी सूबा’ और ‘महा पंजाब’ के नारों को ही प्रतिबंधित कर दिया। उस दौरान ‘सीने के बीच गोली खाएँगे, पंजाबी सूबा बनाएँगे’ नारा भी लगाया जाता था। SAD ने नारे के बैन होने के बाद एक बड़ी बैठक बुलाई। 10 मई, 1955 से आंदोलन की घोषणा की गई। रोज अमृतसर स्थित अकाल तख़्त के सामने प्रार्थना के लिए दर्जनों सिख जमा होते थे, फिर पंजाबी सूबा के समर्थन में नारेबाजी होती थी।
स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई
जुलाई में आंदोलन तेज़ हो गया और बड़ी संख्या में सिख ‘अकाल तख़्त’ के समक्ष पहुँचे। स्वर्ण मंदिर के आसपास सुरक्षा का भारी बंदोबस्त किया गया। कई हथियारों के लाइसेंस रद्द किए गए। ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC)’ के पास जो हथियार थे उन्हें भी सरकार ने जब्त करने की कोशिश की। इसके बाद स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई हुई। डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस अश्विनी कुमार ने 4 जुलाई, 1955 को फ़ोर्स के साथ स्वर्ण मंदिर परिसर में मार्च किया।
वहाँ स्थित कम्युनिटी किचन को सील कर लिया गया और लंगर बंद करवा दिया गया। पुलिस वहाँ से बर्तन तक उठा कर ले गई। गुरु रामदास सराय होटल में भी छापेमारी हुई। स्वर्ण मंदिर के कई मुख्य ग्रंथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। SGPC और SAD के दफ्तरों को सील कर लिया गया। स्वर्ण मंदिर की परिक्रमा वाले मार्ग पर आँसू गैस के गोले दागे गए। परिसर के भीतर ही पुलिस ने फ्लैग मार्च किया। पूरे दिन ये कार्रवाई चली और इस दौरान स्वर्ण मंदिर का मुख्य दरवाजा बंद रखा गया।
1955 में स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई की तस्वीर
इस दौरान स्वर्ण मंदिर से 237 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद सिख और ज्यादा उग्र हो गए। अकेले जुलाई महीने के पहले हफ्ते में गिरफ्तार सिखों की संख्या 8000 के पार पहुँच गई थी। आखिरकार पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री भीम सिंह सचर को नारों पर से बैन हटाने पड़े। ‘अकाली दल’ के नेता मास्टर तारा सिंह को रिहा करना पड़ा। खुद मुख्यमंत्री को सितंबर महीने में स्वर्ण मंदिर पहुँच कर इस कार्रवाई के लिए माफ़ी माँगनी पड़ी थी। इसे ‘मिनी ब्लू स्टार’ ऑपरेशन भी कहा जाता रहा है।
पंजाब और सिखों को लेकर 1955 में नेहरू के विचार
जवाहरलाल नेहरू का स्पष्ट मानना था कि ‘पंजाबी सूबा आंदोलन’ सांप्रदायिक है। उनका कहना था कि उन्हें बड़ा दुःख होता है जब वो सिखों को एक निरर्थक मुद्दे पर आंदोलन करते देखते हैं। उन्होंने कहा था कि ‘अकाली दल’ जो कर रहा है उससे न उसे फायदा होगा न देश को। उन्होंने पूछा था कि क्या देश में एक और गृह युद्ध शुरू किया जा रहा है? उन्होंने कहा था कि अगर हर छोटा बड़ा समूह अपनी ताकत इसी तरह दिखाने लगेगा तो इससे देश का नुकसान होगा।
उन्होंने पंजाब और सिखों और हिन्दुओं से अपील की थी कि वो झगड़े को छोड़ें और राज्य को अराजकता से बाहर लाएँ। अगस्त 1955 में जवाहरलाल नेहरू ने पंजाब के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर जेल में बंद अकालियों को रिहा करने के लिए कहा था, क्योंकि वो एक-दो महीने भीतर रह चुके थे। उन्होंने माना था कि इनकी संख्या हजारों में है, ऐसे में उन्हें समूहों में रिहा किया जाए। इस तरह नेहरू और कॉन्ग्रेस तब पंजाबी सूबा आंदोलन के खिलाफ थे, जबकि आज के कॉन्ग्रेसी खालिस्तानी आंदोलन को भी हवा देते हैं।
खालिस्तानी आज भी जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते हैं। ‘अकाल तख़्त’ के पूर्व जत्थेदार जसबीर सिंह रोड ने कहा था कि स्वतंत्रता से पूर्व जवाहरलाल नेहरू ने सिखों से जो वादा किया था, वो उन्होंने नहीं निभाया। बकौल जसबीर सिंह, जूते पहने पुलिसकर्मियों ने तब गोल्डन टेम्पल में घुस कर ‘अकाल तख़्त’ पर गोलीबारी की थी। उन्होंने दावा किया था कि कई सिख उस हमले में मारे गए थे। रोड ने जुलाई 2020 में इसकी 75वीं बरसी पर इसका जिक्र किया था।