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प्राइवेट पार्ट में ग्रेनेड घुसाया, चाकू भी… इस्लामी आतंकियों ने परिवार वालों के सामने किया गैंगरेप: ARCCI की रिपोर्ट, इतनी बार रेप कि कमर की हड्डियाँ भी टूटी

एसोसिएशन ऑफ रेप क्राइसिस सेंटर्स इन इजरायल (एआरसीसीआई) ने बुधवार (21 फरवरी 2024) को संयुक्त राष्ट्र को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में इजराइल पर 7 अक्टूबर 2023 को गाजा के आतंकवादी संगठन हमास की ओर से हुए हमले के दौरान महिला-लड़कियों को जिस से व्यवस्थित तरीके से आतंकियों ने निशाना बनाया, उसकी विस्तार से जानकारी दी गई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इजरायली महिलाओं-लड़कियों के प्राइवेट पार्ट को चाकुओं से गोदा गया, गैंगरेप किया गया, उनके गुप्तांग में ग्रेनेड डाल दिया गया, कीलें घुसा दी गई और फिर गुप्तांगों में गोली मार कर जान ले ली गई।

एआरसीसीआई ने बताया है कि हमास के आतंकियों ने इजरायली महिलाओं-लड़कियों का गैंगरेप किया, उनके परिवार के सामने उनकी इज्जत लूटी, ताकि उनके परिजन तिल-तिल कर मरते रहे, और फिर सभी को मार भी दिया गया। कई मामलों में लड़कियों-महिलाओं के गुप्तांगों को चाकुओं से गोदा गया, उनके अंगों को काट कर निकाला गया और फिर उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया गया। ऐसी ही बर्बरता पुरुषों के साथ भी बरती गई, पहले उनके सामने ही उनकी साथी के साथ कई-कई आतंकियों ने गैंगरेप किया, फिर उनके गुप्तांगों में गोली मार दी और पुरुष के गुप्तांगों को भी काट कर दिया गया और फिर गोली मार कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया।

ARCCI की रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवादियों ने “नोवा फेस्टिवल से भागे युवा महिलाओं और पुरुषों का पीछा कर उन्हें पकड़ा गया और उनके बालों को पकड़कर खींचते हुए ले जाया गया। उन्हें शिकार की तरह नोचा गया और फिर जान से मार दिया गया।”

रिपोर्ट में बताया गया है कि “हमास के आतंकियों ने इस तरह के यौन-अपराधों को जान-बूझकर अंजाम दिया। उन्होंने इसे आतंक फैलाने के तरीके के रूप में चुना। कई पीड़ितों के शव बंधे हुए पाए गए, तो कईयों को बेड़ियों से जकड़कर उनका गैंगरेप किया गया। महिलाओं और पुरुषों, दोनों के ही गुप्तांगों को बेरहमी से क्षत-विक्षत किया गया। कई बार उनके गुप्तांगों को चाकुओं से गोद डाला। उन्होंने गुप्तांगों में गोलियाँ मारी और शरीर के अन्य अंगों को भी चाकुओं से काटा। ऐसा उन्होंने परिवार वालों के सामने किया, ताकि उनकी दहशत बढ़े।” उन्होंने परिजनों के सामने इसलिए लड़कियों-महिलाओं की आबरू लूटी, ताकि परिवार के लोग अपमान से ही मर जाएँ।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह के भयानक यौन अपराध एकाध मामले में या छिटपुट की घटना नहीं थी, बल्कि इसे व्यापक तौर पर योजना के तहत अंजाम दिया गया, ताकि हमास का डर इजरायलियों के दिलों में बैठ जाए।

नोवा म्यूजिक फेस्टिवल से जुड़े एक पीड़ित ने ARCCI को बताया कि उसने हर तरफ लड़कियों के शवों को पड़े देखा, किसी के शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई कपड़ा नहीं था, तो किसी के निचले हिस्से पर। एक अन्य पीड़ित गैड लिबर्जन ने कहा कि उसके कानों में लगातार लड़कियों के चीखने की आवाजें आ रही थी। ‘ऐसा लग रहा था, जैसे उसके साथ बलात्कार किया जा रहा हो। उन लड़कियों को पिकअप में घसीटकर ले जाया गया, जहाँ उनका चिल्लाना बढ़ जाता था, फिर पुरुषों के चीखने की आवाजें सुनी और फिर गोलियों की तड़तड़ाहट…और फिर सबकुछ शांत। क्योंकि वो सारे लोग बलात्कार के बाद मार दिए गए।’

एक अन्य गवाह ने एआरसीसीआई को बताया, “वहाँ ऐसी लड़कियां थीं, जिनकी बलात्कार की वजह से कूल्हे तक टूट गए थे।” इस तरह के यौन अपराध सिर्फ नोवा फेस्टिवल वाली जगह ही नहीं, बल्कि किबुत्जिम और गाजा बॉर्डर के साथ लगे गाँवों में भी अंजाम दिया गया।

हमास आतंकियों के हमलों वाली जगह पर राहत कार्यों को अंजाम देने वाले लोगों ने बताया कि कई शवों पर कपड़े थे ही नहीं, या नाम मात्र के बचे थे। उनके जननांगों से खून रिस रहा था। उनमें चाकुओं से वार किया गया था। उनके अंग क्षत-विक्षत थे। कई लड़कियों और महिलाओं का उनके ही बेडरूम में गैंगरेप किया गया। उनके गुप्तांगों में वीर्य मिले और उनमें चाकुओं से काटने के निशान मिले। कई महिलाओं के गुप्तांगों में कीलें और हथगोले तक ठूँस दिए गए, तो कई शव ‘बूबी ट्रैप्ड’ थे, यानि बाँधकर इस तरह से लटकाए गए थे, कि उनका उत्पीड़न किया जा सके।

लेखक डॉ. कार्मिट क्लार-चलामिश और नोगा बर्जर ने अपनी गवाही में बताया है कि लगभग 90% मामलों में ड़ितों के साथ परिवार के सदस्यों सहित अन्य लोगों के सामने सामूहिक बलात्कार किया गया था। ARCCI ने यह भी बताया कि सैन्य ठिकानों पर भी इजरायलियों का यौन शोषण किया गया और गुप्तांगों में गोली मार दी गई।

इजरायल-हमास युद्ध

गौरतलब है कि पिछले साल 7 अक्टूबर को, लगभग 3000 हमास आतंकवादी ज़मीन, समुद्र और हवा से इज़राइल में उतरे और  शिशुओं और विदेशी नागरिकों सहित 1,200 से अधिक इज़राइलियों की हत्या कर दी । उन्होंने क्रूरतापूर्वक हमला किया और महिलाओं का बलात्कार किया। इस दौरान महिलाओं के परेड के वीडियो भी सोशल मीडिया पर फैलाए गए। यही नहीं, 230 से अधिक इजरायली और विदेशी नागरिकों को बंधक भी बना लिया गया। इसके बाद से इजरायल ने गजा में हमास के खात्मे के लिए ऑपरेशन चलाया हुआ है।

‘पर्याप्त सबूत नहीं’: अमेरिका में भारतीय छात्रा के हत्यारे पुलिस अधिकारी पर नहीं चलेगा मुकदमा, मजाक बनाते हुए कहा गया था – ‘उसकी जान की कीमत कम’

अमेरिका में जाह्नवी कंडुला नामक भारतीय छात्रा की हत्या कर दी गई थी। अब खबर आई है कि इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारी केविन डवे पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा। केविन डवे उस दौरान फोन कॉल पर था और गाड़ी चला रहा था, उसी दौरान टक्कर हुई और लड़की की मौत हो गई। किंग काउंटी प्रॉसिक्यूटर ऑफिस ने बुधवार (21 फरवरी, 2024) को कहा कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में इस केस को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।

अटॉर्नी ने एक बयान जारी कर के बताया है कि जाह्नवी कंडुला की मौत दिल दहलाने वाली है, और इसने किंग काउंटी और पूरी दुनिया में समुदायों को प्रभावित किया है। जाह्नवी कंडुला की उम्र मात्र 23 वर्ष ही थी। उनकी मौत 23 जनवरी, 2023 को हुई थी, जब वो सड़क पार कर रही थीं। उसी दौरान केविन डेव के पास ड्रग्स ओवरडोज की एक फोन कॉल आ गई। घटना के समय वो 120 किलोमीटर/घंटा की रफ़्तार से गाड़ी चला रहा था।

जैसे ही जाह्वनी कंडुला को पुलिस पेट्रोलिंग वाली गाड़ी की ठोकर लगी, वो 100 फ़ीट दूर उछल कर गिर गईं। मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी। सिएटल पुलिस डिपार्टमेंट का एक बॉडीकैम वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें एक अन्य पुलिस अधिकारी डेनिएल ऑडरेर को इस मौत का मजाक बनाते हुए देखा गया था। उसने हँसते हुए कहा था कि उस लड़की की जान की कीमत कम थी। अब अटॉर्नी ने कहा है कि वाशिंगटन स्टेट लॉ के हिसाब से मामला चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

पुलिस अधिकारी की इस टिप्पणी के बाद उसे पेट्रोलिंग की ड्यूटी से हटा दिया गया था और ‘नॉन ऑपरेशनल’ कार्यों में लगा दिया गया था। जाह्नवी मूल रूप से हैदराबाद की रहने वाली थीं। अब कहा जा रहा है कि कवि डेव एक पाथ्मिक्ता वाली कॉल को रिसीव कर रहा था और इसके लिए पुलिस विभाग ने उससे निवेदन किया था। अटॉर्नी का ये भी कहना है कि इस दौरान उसकी गाड़ी की इमरजेंसी लाइट्स ऑन थी और आवाजाही कर रहे बाकी लोगों ने सायरन की आवाज़ सुनी थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दौरान जाह्नवी कंडुला सड़क पर बने इंटरसेक्शन की तरफ भागने लगीं। साथ ही बताया गया है कि उन्होंने ईयरफोन लगा रखा था, जिससे उन्हें सुनाई कम दे रहा होगा। जबकि स्थानीय मीडिया का कहना था कि केविन डेव की गाड़ी की स्पीड बहुत ज्यादा थी और दुर्घटना का कारण यही थी। जाह्नवी कंडुला की माँ सिंगल मदर हैं, जो एक शिक्षिका हैं। वो नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के साउथ लेक यूनियन कैम्पस में पढ़ती थीं। दिसंबर 2023 में उन्हें स्नातक होना था।

गजवा-ए-हिंद (भारत पर इस्लामी कब्जा)’ पर दारुल उलूम देवबंद का फतवा, एक्शन में NCPCR: पुलिस को 3 दिन में कार्रवाई कर माँगा जवाब

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद शहर में स्थित ‘दारुल उलूम मदरसा’ विवादित फतवों के कारण चर्चा में कई बार रहा है। लेकिन, इस बार उसने भारत विरोधी फतवा जारी कर अपनी कट्टर मानसिकता का प्रमाण दिया है। दारुल उलूम ने अपने फतवे में गजवा-ए-हिंद को मान्यता दे दी है। इस फतवे से बताया गया है कि भारत पर आक्रमण के दौरान मरने वाले महान शहीद कहलाए जाएँगे और उन्हें जन्नत मिलेगी। इस फतवे के खिलाफ अब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सहारनपुर पुलिस के अधिकारियों को कार्रवाई के लिए नोटिस जारी किया है।

दरअसल, दारुल उलूम की साइट (darulifta-deoband.com) पर सवाल किया गया था कि क्या हदीस में भारत पर आक्रमण का जिक्र है जो उपमहाद्वीप में होगा? और जो भी इस जंग में शहीद होगा, वो महान शहीद कहलाएगा। और जो गाजी होगा वो जन्नती होगा।

darulifta-deoband.com पर उर्दू में पूछा गया प्रश्न और उसका जवाब

इसी सवाल के जवाब में दारुल उलूम की ओर से फतवा जारी किया गया। फतवे में ‘सुन्न अल नसा (Sunan-al-Nasa) ‘ नाम की किताब का जिक्र करते हुए कहा गया है कि इस किताब में गजवा-ए-हिंद को लेकर पूरा का पूरा चैप्टर है। इसमें हजरत अबू हुरैरा की हदीस का जिक्र करते हुए कहा गया है- “अल्लाह के संदेशवाहक ने भारत पर हमले का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैं जिंदा रहा तो इसके लिए मैं अपनी खुद की और अपनी संपत्ति की कुर्बानी दे दूँगा। मैं सबसे महान शहीद बनूँगा।”

इस फतवे में ये भी बताया गया कि देवबंद की मुख्तार एंड कंपनी ने इस मशहूर किताब को प्रिंट किया है।

दारुल उलूम देवबंद द्वारा दिया गया सवाल का जवाब

सहारनपुर के डीएम और एसपी को एक नोटिस

अब इस फतवे में जहाँ भारत पर आक्रमण की बात को उचित ठहराने का प्रयास हुआ है। वहीं राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने सहारनपुर जिले के डीएम और एसपी को एक नोटिस जारी कर इस मामले में FIR दर्ज करने को कहा।

एनसीपीसीआर ने नोटिस में कहा कि ये मदरसा भारत के बच्चों को देशविरोधी तालीम दे रहा है। इससे इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। बच्चों में देश के प्रति नफरत पैदा होगी। आयोग ने कहा कि बच्चों को अनावश्यक रूप से परेशान करना या शारीरिक कष्ट देना तो किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 का उल्लंघन है।

NCPCR द्वारा की गई शिकायत

उन्होंने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि गजवा-ए-हिंद को लेकर हाल ही में आए फतवे के मामले में आयोग सीपीसीआर अधिनियम, 2005 की धारा 13 (1) के तहत आईपीसी और जेजे अधिनियम, 2015 के तहत कार्रवाई करने का निर्देश देती है। उन्होंने पुलिस से फौरन इस मामले में दारुल उलूम देवबंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का कहा। साथ ही संबंधित कार्रवाई की रिपोर्ट 3 दिन के भीतर आयोग को भेजने को कहा।

NCPCR द्वारा की गई शिकायत

बता दें कि इससे पहले साल 2022 और 2023 में भी आयोग ने दारुल उलूम की साइट पर जारी विवादित फतवों का खुलासा किया था और माँग की थी कि इसकी साइट को ब्लॉक किया जाए और एफआईआर हो, लेकिन प्रशासन ने इसमें कोई कार्रवाई नहीं की। ऐसे में आयोग कहता है कि अगर कोई प्रतिकूल परिणाम ऐसी तालीम के कारण आए तो फिर उसके लिए जिला प्रशासन भी बराबर का जिम्मेदार होगा।

जब नेहरू ने स्वर्ण मंदिर में पुलिस घुसवा ‘पंजाबी सूबा मूवमेंट’ आंदोलन को कुचला, 8000 किए गए थे गिरफ्तार, लंगर बंद कर ले गए थे बर्तन

देश में ‘किसान आंदोलन 2.0’ शुरू हो चुका है। कॉन्ग्रेस पार्टी मोदी सरकार पर सिख विरोधी होने का आरोप लगा रही है। दिल्ली आने के लिए हरियाणा की सीमा पर डटे अधिकतर किसान पंजाब के ही हैं। पिछली बार जब किसान आंदोलन हुआ था तो खालिस्तानी ताकतों ने उसे हाईजैक कर लिया था और जम कर उत्पात मचाया था। देश में लोकसभा चुनाव से पहले विभाजन वाली राजनीति खेली जा रही है। हालाँकि, पंजाब और सिखों के इतिहास को समझने के लिए हमें जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को भी देखना पड़ेगा।

जब बात पंजाब में उग्रवाद की आती है तो हमें इंदिरा गाँधी का दौर याद आ जाता है जब स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना को घुसना पड़ा था, क्योंकि कॉन्ग्रेस के समर्थन से ही पैदा हुआ आतंकी जरनैल सिंह भिंडराँवाले वहाँ छिपा हुआ था। तब तक वो देश के लिए एक नासूर बन चुका था। इस कारण ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चलाना पड़ा। हालाँकि, यही इंदिरा गाँधी की हत्या का भी कारण बना जब सिख अंगरक्षकों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। इसके बाद सिख नरसंहार हुआ, राजीव गाँधी ने ‘कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ वाला बयान दिया।

लेकिन, पंजाब के इतिहास का एक ऐसा ही अध्याय नेहरू काल से भी जुड़ा है। जब भारत स्वतंत्र हुआ तब ये 552 रियासतों में बँटा हुआ था, जिन्हें सरदार वल्लभभाई पटेल ने एक किया। 1956 में ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ आया, जिसके तहत नए प्रदेशों का निर्माण हुआ और पूर्व के प्रदेशों की सीमाओं में परिवर्तन किया गया। मैसूर से केरल, मद्रास से आंध्र प्रदेश, पंजाब से हिमाचल प्रदेश (तब केंद्र शासित) और असम से त्रिपुरा और मणिपुर (दोनों केंद्र शासित) को अलग किया गया। दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला।

हालाँकि, ये वो और भी था जब ‘पंजाबी सूबा मूवमेंट’ भी चल रहा था। इसके तहत सिख लोग अपने लिए भारत के भीतर ही एक स्वतंत्र राज्य का गठन चाहते थे, जहाँ के नियम-कानून उनके हिसाब से हों। इसे हम खालिस्तानी आतंकी विचारधारा का पूर्वज कह सकते हैं। लेकिन, जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रधानमंत्री रहते ‘पंजाब सूबा मूवमेंट’ की माँग को स्वीकार नहीं किया। 1966 में ‘पंजाब पुनर्गठन अधिनियम’ के तहत इसे अलग राज्य का दर्जा मिला, नेहरू के निधन के 2 वर्ष बाद।

पंजाबी सूबा, अकाली दल और खालिस्तान का पूर्वज

अलग पंजाबी सूबा की माँग वाले अभियान का नेतृत्व ‘अकाली दल’ कर रहा था। कॉन्ग्रेस पार्टी खुलेआम इसके विरोध में थी। 1950 तक प्रतापसिंह कैरों की अध्यक्षता वाली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने अपनी पूरी ताकत इस मुहिम के विरोध में झोंकी हुई थी। उस दौरान आर्य समाज भी पंजाब में सक्रिय था। पंजाब के कई हिन्दुओं ने पंजाबी भाषा को अपना मानने से इनकार कर दिया था। ‘अकाली दल’ का जोर था कि लोग अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में पंजाबी ही दर्ज कराएँ।

फिर तत्कालीन पीएम नेहरू ने इस समस्या का ये तोड़ निकाला कि पंजाब में जनगणना के दौरान भाषा दर्ज ही न की जाए। इस तरह 1951 में भाषा के नाम ही पंजाब में दरारें पैदा हो गई थीं। एक तरफ आक्रामक रवैया वाले ‘अकाली दल’ के समर्थक थे, दूसरी तरफ पंजाब का गैर-सिख समुदाय। 4 जनवरी, 1952 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पटियाला में दिए गए भाषण में स्पष्ट कहा कि पंजाब सूबे के निर्माण से देश का विभाजन होगा। उन्होंने खुल कर ऐलान किया, “मैं दोबारा भारत का बँटवारा नहीं होने दूँगा। मैं और कोई परेशानी खड़ी नहीं होने दूँगा, पूरी ताकत से इसे दबाऊँगा।”

जनता का साथ भी देश के पहले आम चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी को मिला और ‘शिरोमणि अकाली दल’ को पराजय का सामना करना पड़ा। अमृतसर और गुरदासपुर जैसे सिख बहुल जिलों में भी कॉन्ग्रेस ने ही बाजी मारी। जालंधर और गुरदासपुर में तो ‘अकाली दल’ का खाता तक नहीं खुला। पार्टी ने पतित सांप्रदायिकता और बेईमानी को अपनी हार की वजह बताई और अलग पंजाब सूबे की माँग जारी रखी। इस दौरान ये जिक्र करना आवश्यक है कि उस दौरान ‘ईस्ट पंजाब’ प्रान्त हुआ करता था।

ईस्ट पंजाब मतलब पंजाब का वो इलाका जो विभाजन के बाद भारत में रह गया। वहीं वेस्ट पंजाब पाकिस्तान में चला गया। 1950 में भारत के संविधान में ईस्ट पंजाब को ही पंजाब कहा गया। फिर PEPSU (पटियाला एन्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन) का गठन हुआ, 8 विभिन्न रियासतों और 2 छोटे रियासतों को मिला कर। उस दौरान शिमला और कसौली भी इसी का हिस्सा हुआ करते थे। 1956 में इसे ‘स्टेट ऑफ पंजाब’ कहा गया और 1966 में इसे पंजाब का उस रूप में गठन हुआ जिसे हम आज देखते हैं, हरियाणा (तब पंजाब का दक्षिणी हिस्सा) बना और चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश बना।

जब राज्य पुनर्गठन आयोग बना था तब 1954 में उसके समक्ष ‘अकाली दल’ ने ज्ञापन देकर भाषा के आधार पर पंजाब के गठन की माँग की। उसने ज्ञापन देकर बताया कि पंजाब एक अलग भाषा है, जिसके पास गुरुमुखी लिपि भी है जो ब्राह्मी से उत्पन्न हुई है। वहीं कॉन्ग्रेस ने पंजाब, PEPSU और हिमाचल प्रदेश – इन तीनों को मिला कर उसने पंजाबी सूबा के निर्माण की माँग की। जनसंघ ने इसमें दिल्ली को भी मिला कर ‘महा पंजाब’ राज्य के गठन की माँग की।

राज्य पुनर्गठन आयोग ने पंजाबी को हिंदी से अलग भाषा नहीं माना और जन-समर्थन के अभाव को कारण बता कर अलग सूबे के गठन की माँग को अस्वीकार कर दिया था। तत्कालीन केंद्र सरकार मानती थी कि पंजाब का भाषा के आधार पर विभाजन का अर्थ होगा धर्म के आधार पर बँटवारा, जिसका दंश देश झेल चुका था। जबकि पंजाब में बड़ी संख्या में हिन्दीभाषी भी थे। आँकड़ों की मानें तो आंदोलन में सक्रिय 12,000 सिखों को 1955 में और 26,000 सिखों को 1956 में गिरफ्तार किया गया था।

उस समय हालात ऐसे हो गए थे कि अप्रैल 1955 में अमृतसर प्रशासन ने ‘पंजाबी सूबा’ और ‘महा पंजाब’ के नारों को ही प्रतिबंधित कर दिया। उस दौरान ‘सीने के बीच गोली खाएँगे, पंजाबी सूबा बनाएँगे’ नारा भी लगाया जाता था। SAD ने नारे के बैन होने के बाद एक बड़ी बैठक बुलाई। 10 मई, 1955 से आंदोलन की घोषणा की गई। रोज अमृतसर स्थित अकाल तख़्त के सामने प्रार्थना के लिए दर्जनों सिख जमा होते थे, फिर पंजाबी सूबा के समर्थन में नारेबाजी होती थी।

स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई

जुलाई में आंदोलन तेज़ हो गया और बड़ी संख्या में सिख ‘अकाल तख़्त’ के समक्ष पहुँचे। स्वर्ण मंदिर के आसपास सुरक्षा का भारी बंदोबस्त किया गया। कई हथियारों के लाइसेंस रद्द किए गए। ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (SGPC)’ के पास जो हथियार थे उन्हें भी सरकार ने जब्त करने की कोशिश की। इसके बाद स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई हुई। डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस अश्विनी कुमार ने 4 जुलाई, 1955 को फ़ोर्स के साथ स्वर्ण मंदिर परिसर में मार्च किया।

वहाँ स्थित कम्युनिटी किचन को सील कर लिया गया और लंगर बंद करवा दिया गया। पुलिस वहाँ से बर्तन तक उठा कर ले गई। गुरु रामदास सराय होटल में भी छापेमारी हुई। स्वर्ण मंदिर के कई मुख्य ग्रंथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। SGPC और SAD के दफ्तरों को सील कर लिया गया। स्वर्ण मंदिर की परिक्रमा वाले मार्ग पर आँसू गैस के गोले दागे गए। परिसर के भीतर ही पुलिस ने फ्लैग मार्च किया। पूरे दिन ये कार्रवाई चली और इस दौरान स्वर्ण मंदिर का मुख्य दरवाजा बंद रखा गया।

1955 में स्वर्ण मंदिर में पुलिसिया कार्रवाई की तस्वीर

इस दौरान स्वर्ण मंदिर से 237 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद सिख और ज्यादा उग्र हो गए। अकेले जुलाई महीने के पहले हफ्ते में गिरफ्तार सिखों की संख्या 8000 के पार पहुँच गई थी। आखिरकार पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री भीम सिंह सचर को नारों पर से बैन हटाने पड़े। ‘अकाली दल’ के नेता मास्टर तारा सिंह को रिहा करना पड़ा। खुद मुख्यमंत्री को सितंबर महीने में स्वर्ण मंदिर पहुँच कर इस कार्रवाई के लिए माफ़ी माँगनी पड़ी थी। इसे ‘मिनी ब्लू स्टार’ ऑपरेशन भी कहा जाता रहा है।

पंजाब और सिखों को लेकर 1955 में नेहरू के विचार

जवाहरलाल नेहरू का स्पष्ट मानना था कि ‘पंजाबी सूबा आंदोलन’ सांप्रदायिक है। उनका कहना था कि उन्हें बड़ा दुःख होता है जब वो सिखों को एक निरर्थक मुद्दे पर आंदोलन करते देखते हैं। उन्होंने कहा था कि ‘अकाली दल’ जो कर रहा है उससे न उसे फायदा होगा न देश को। उन्होंने पूछा था कि क्या देश में एक और गृह युद्ध शुरू किया जा रहा है? उन्होंने कहा था कि अगर हर छोटा बड़ा समूह अपनी ताकत इसी तरह दिखाने लगेगा तो इससे देश का नुकसान होगा।

उन्होंने पंजाब और सिखों और हिन्दुओं से अपील की थी कि वो झगड़े को छोड़ें और राज्य को अराजकता से बाहर लाएँ। अगस्त 1955 में जवाहरलाल नेहरू ने पंजाब के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर जेल में बंद अकालियों को रिहा करने के लिए कहा था, क्योंकि वो एक-दो महीने भीतर रह चुके थे। उन्होंने माना था कि इनकी संख्या हजारों में है, ऐसे में उन्हें समूहों में रिहा किया जाए। इस तरह नेहरू और कॉन्ग्रेस तब पंजाबी सूबा आंदोलन के खिलाफ थे, जबकि आज के कॉन्ग्रेसी खालिस्तानी आंदोलन को भी हवा देते हैं।

खालिस्तानी आज भी जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते हैं। ‘अकाल तख़्त’ के पूर्व जत्थेदार जसबीर सिंह रोड ने कहा था कि स्वतंत्रता से पूर्व जवाहरलाल नेहरू ने सिखों से जो वादा किया था, वो उन्होंने नहीं निभाया। बकौल जसबीर सिंह, जूते पहने पुलिसकर्मियों ने तब गोल्डन टेम्पल में घुस कर ‘अकाल तख़्त’ पर गोलीबारी की थी। उन्होंने दावा किया था कि कई सिख उस हमले में मारे गए थे। रोड ने जुलाई 2020 में इसकी 75वीं बरसी पर इसका जिक्र किया था।

‘108 अवैध मजारें जमींदोज, बाकी के लिए बुलडोजर तैयार’: गुजरात के गृह मंत्री ने याद दिलाया- कॉन्ग्रेस ने कैसे मंदिर से हटवाई थी मूर्तियाँ

गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने कहा है कि उनके राज्य में अब तक 108 अवैध मजार जमींदोज कर गई हैं। उन्होंने जूनागढ़ के ऊपरकोट में बनाई गई अवैध मजारों के गिराए जाने की बात बताते हुए कहा- “हमारा बुलडोजर हर उस इमारत को गिराने के लिए तैयार है जो कि साजिशन बनाई गई है।”

गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने बुधवार (21 फरवरी, 2024) को गुजरात विधानसभा में यह बातें कही। वह गृह मंत्रालय द्वारा दिए गए बजट को लेकर गुजरात विधानसभा में हो रही चर्चा में हिस्सा ले रहे थे। इस दौरान उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों पर हमला भी बोला और अपनी सरकार के कामकाज के बारे में बताया।

उन्होंने कहा, “जो बिंदु MLA अमित शाह भाई के द्वारा यहाँ उठाया गया कि कॉन्ग्रेस के राज के दौरान अहमदाबाद के जमालपुर में एक जैन मंदिर से मूर्तियों को हटाया गया था। अब दादा (सीएम भूपेन्द्र पटेल) का बुलडोजर राज्य के हर कोने में घूम रहा है जिससे कोई भी मंदिर या देवस्थान साजिशन किसी जगह से हटाया ना सके। अब किसी को नहीं मालूम कि यह बुलडोजर कहाँ जाएगा।”

इसके बाद उन्होंने बताया कि राज्य में 108 अवैध मजार को ढहाया गया है जो कि अतिक्रमण करके बनाई गई थीं। मंत्री हर्ष सांघवी ने बताया, “अब तक 108 मजार राज्य में गिराई गई हैं और राज्य की संपत्तियों को मुक्त कराया गया है। सोमनाथ के पास किया गया अवैध कब्जा भी हटाया गया है। दादा का बुलडोजर 20 फीट चौड़ी गली और 80 मीटर चौड़ी रोड में घुस सकता है।”

उन्होंने इस दौरान जूनागढ़ के ऊपरकोट किले में बनाई गई अवैध मजारों के गिराए जाने की बात भी की। मंत्री हर्ष सांघवी ने कहा, “कोई नहीं जानता कि ऊपरकोट में इतनी मजारें कहाँ से आ गईं। इतनी जल्दी यहाँ मजार कैसे बन सकती हैं।”

जूनागढ़ किले के पास से हटवाई गई थी अवैध मजारें

गौरतलब है कि मई 2023 में राज्य सरकार जूनागढ़ के इस किले में सैकड़ों अवैध मजारों को जमींदोज कर दिया था। इस दौरान कुछ और इमारतें भी यहाँ गिराई गईं थीं। इस किले की सरकार ने ₹74 करोड़ की लागत से मरम्मत भी करवाई थी। यहाँ मजारें गिराए जाने के दौरान मुस्लिमों ने प्रदर्शन भी किया था।

हर्ष सांघवी ने सदन को बताया कि राज्य में तेजी से अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि यह अभियान द्वारका से प्रारम्भ हुआ था और अब यह सूरत, जामनगर, पोरबंदर, सूरत, पावागढ़ और अहमदाबाद तक पहुँच चुका है। उन्होंने अपने भाषण के दौरान राज्य में नवरात्रि के दौरान रात भर गरबा को अनुमति दिए जाने की बात की और कहा- “अगर मेरे राज्य में लोग गरबा नहीं करेंगे तो क्या पाकिस्तान में करेंगे।”

आक्रांताओं की हिंसा से बचाने के लिए देवी-देवताओं, महिलाओं को घर में लाया गया… राम मंदिर से महिलाएँ फिर होंगी स्वतंत्र-सुरक्षित

22 जनवरी, 2024 को अयोध्या में प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर पूरे देश का उत्साह अभूतपूर्व था। इस आयोजन के लिए जिस तरह से भारतवर्ष के सभी भागों के लोग एक साथ आए, वह उन लोगों के लिए एक मजबूत खंडन के रूप में काम कर रहा है, जो संशयवादी थे और मंदिरों के स्थान पर अस्पतालों या विश्वविद्यालयों के निर्माण को प्राथमिकता देते थे या दे रहे हैं।

अयोध्या शहर में तेजी से होती हुई प्रगति और विकास श्री राम लला मंदिर के परिवर्तनकारी प्रभाव को प्रकट करता है। यह सांस्कृतिक पुनुरुत्थान, अयोध्या से भी आगे चारों ओर विस्तृत रूप में फैला हुआ है, जो सम्पूर्ण भारतवर्ष में सनातन धर्म के पुनर्जागरण में अतुलनीय योगदान दे रहा है। यह उद्घाटन और इसका प्रभाव पहले से ही ध्यान देने योग्य है, जो एक बड़े आंदोलन का संकेत है, जो श्री राम मंदिर के पुनःस्थापन के साथ तेजी से गति पकड़ रहा है।

इस सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण से प्राप्त होने वाले विभिन्न परिणामों का विश्लेषण और उनका अनुमान लगाना अभी बहुत जल्दबाजी होगी। यद्यपि, इस बात का अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे सनातन सभ्यता का आर्थिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान होगा, लेकिन इस बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि भारतवर्ष में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के लिए इसका क्या अर्थ हो सकता है। यह एक ऐसा विषय रहा है, जिसके लिए भारतवर्ष को अतीत में अत्यंत बुरी प्रतिष्ठा का तथाकथित ठप्पा लगाया गया है।

यहाँ तक की नारीवादी, वामपंथी समूह और स्वघोषित उदारवादी भी इसे महिलाओं से नहीं जोड़ रहे हैं। वे इस विकास का विश्लेषण एक स्पष्ट चिंता, हताशा, क्रोध और निराशा की भावना के साथ कर रहे हैं। ये सारे नारीवादी, वामपंथी समूह और स्वघोषित उदारवादी इसे बहुसंख्यकवाद के उदय, फासीवादी राज्य के पुनरुत्थान, लोकतंत्र में गिरावट, धर्मनिरपेक्षता की हानि, महिलाओं की स्थिति में गिरावट और अल्पसंख्यक अधिकारों के दमन के रूप में देखते हैं। वे शायद ही अयोध्या में मंदिर को महिलाओं के खिलाफ हिंसा जैसे मुद्दों के संभावित समाधान के रूप में जोड़ेंगे।

पिछले 20 वर्षों से महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के रूप में, मैं भारतवर्ष में इस कार्यक्रम की क्षमता को देख सकती हूँ और मैं यह कह सकती हूँ कि यह घटना, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की रोकथाम के लिए; समाधान खोजने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

वैश्विक स्तर पर नारीवादी, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा (जिसमें घरेलू हिंसा के साथ-साथ यौन हिंसा भी सम्मिलित है), से निपटने के लिए समाधान की तलाश में व्यस्त हैं। दुर्भाग्य से, प्रत्येक गुजरते हुए वर्ष में, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का भयावह खतरा बना रहता है, क्योंकि विभिन्न सरकारी या गैर-सरकारी संस्थानों के अभिलेखों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से सम्बंधित आंकड़े या तो स्थिर रहते हैं या फिर बढ़ते रहते हैं।

उपनिवेशीकरण, मंदिर और महिलाएँ

अयोध्या का राम मंदिर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से निपटने में कैसे सहायता कर सकता है, यह समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि उपनिवेशीकरण, मंदिर और महिलाएँ आपस में एक दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं।

विश्व के अधिकांश भागों में उपनिवेशीकरण या आक्रमण का एक पैटर्न, एक तरीका रहा है। जहाँ भी ऐसा हुआ, इसने मूल आबादी की अपनी संस्कृति और धार्मिक प्रथाओं से जुड़ाव को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इसे उपनिवेशवादी के मूल्यों, विश्वासों और धर्म से बदल दिया गया या ये कह लीजिए कि उपनिवेशवादियों या आक्रमणकारियों ने अपने मूल्यों, विश्वासों और धर्म को जबरन स्थापित किया। उदाहरण के लिए, ईरान से पारसी धर्म और अफगानिस्तान से बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म का सफाया किया गया।

यद्यपि इस सन्दर्भ में, भारतवर्ष एक अपवाद रहा है क्योंकि एक हजार साल से भी अधिक समय तक उपनिवेशीकरण और तमाम आक्रमणों के बाद भी यहाँ की सनातन संस्कृति नष्ट नहीं हुई। तुर्की, मंगोल, फ़ारसी, ब्रिटिश, पुर्तगाली, डेनिश, डच, फ्रांसीसी आदि सभी लोगों ने चरणबद्ध तरीके से, एक हजार साल से भी अधिक की लंबी अवधि में मजबूत प्रतिरोध का सामना करते हुए भारतवर्ष पर आक्रमण किए और अपने-अपने उपनिवेश बनाए। इस सभी आक्रमणों और प्रतिरोधों के बावजूद सनातन धर्म बच तो गया, परंतु यह काफ़ी कमज़ोर रह गया और इसका सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।

भारतवर्ष के उत्तरी क्षेत्र (जिसे आज उत्तरी भारत कहा जाता है) में मंदिरों का बड़े पैमाने पर अपवित्रीकरण, विनाश और लूटपाट का मुख्य उद्देश्य भारत की सभ्यतागत विरासत की जड़ों को हिलाना था। यह एक सर्वविदित और स्थापित तथ्य है कि लगभग आठ सौ वर्षों तक, दिल्ली में इस्लामी और मुगल शासन के समय, कोई भी मंदिर आक्रमणकारियों से बचा ही नहीं था और 1939 में बिड़ला के लक्ष्मीनारायण मंदिर के निर्माण तक नए मंदिरों के जीर्णोद्धार या निर्माण का कोई प्रयास संभव नहीं हो सका था।

दूसरा प्रभाव महिलाओं की स्थिति और उनके हिंसा के अनुभव को लेकर था। इस कथन को संदर्भ देने के लिए अमेरिकी इतिहासकार विल दुरान्ट ने भारत पर इस्लामी आक्रमण को मानव इतिहास की सबसे खूनी घटनाओं में से एक बताया है। यह स्पष्ट है कि उस समय भारत में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उनकी दुर्दशा अकल्पनीय स्तर पर थी। बलात्कार, अपहरण, यौन गुलामी, जबरन धर्म परिवर्तन जैसी घटनाएँ बड़े पैमाने पर थीं। ऐसा कहा जाता है कि दुनिया भर में लाखों महिलाओं का अपहरण कर उन्हें बाजारों में बेच दिया गया था।

उपनिवेशीकरण का प्रत्यक्ष रूप में और अप्रत्यक्ष रूप में दोतरफा प्रभाव पड़ता है। उपनिवेशीकरण न मात्र महिलाओं के विरुद्ध गंभीर हिंसा सहित स्वदेशी समुदायों के विरुद्ध सीधे तौर पर हिंसा करता है, बल्कि यह उन सुरक्षात्मक कारकों को भी नष्ट करता है, जो महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा और समर्थन करने वाली स्वदेशी सांस्कृतिक प्रथाओं में विद्यमान हैं। आक्रमणों और उपनिवेशीकरण से उत्पन्न आघातों से हैरान, परेशान और असहाय पीड़ित स्वदेशी समुदाय अक्सर अपनी महिलाओं की स्वतंत्रता पर रोक लगाकर उनको सुरक्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयत्न करते हैं और महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करना अपने आप में हिंसा का कारण बन जाता है, एक ऐसी हिंसा जो आक्रमणकारियों या उपनिवेशवादियों द्वारा नहीं, बल्कि उनके अपने स्वदेशी समुदाय द्वारा की जाती है।

समय की गति के साथ यह प्रवृति समाज में इस तरह व्याप्त हो जाती है कि हिंसा के अंतर्निहित कारणों को भुला दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि स्वदेशी संस्कृति स्वयं हिंसा को स्वीकृति देती है। भारतवर्ष में इसके अनेकों उदाहरण हैं जैसे बेटे को प्राथमिकता देना, बेटी की अपेक्षा बेटे के जन्म पर अधिक जश्न मनाना, प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, महिलाओं का पर्दा करना, महिलाओं और लड़कियों की गतिशीलता और शिक्षा पर प्रतिबंध इत्यादि।

अतः यहाँ इस बात पर चर्चा हो रही है कि मंदिर और महिलाएँ कैसे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। आक्रमण और उपनिवेशीकरण के समय मंदिर और महिलाएँ दोनों ही सार्वजनिक रूप से असुरक्षित रहे, लूट, डकैती और बलात्कार जैसे घृणित अपराधों के प्रति संवेदनशील रहे। परिणामस्वरूप आक्रमण, जबरदस्ती और विनाश के बहुत सारे हिंसक चरणों के समय, सनातन संस्कृति की प्रथाओं और धर्म को बचाने के लिए, हमारे पूजनीय देवताओं के साथ हमारे संबंधों को सुरक्षित रखने के लिए, हमारे मंदिरों और महिलाओं को घर के अंदर लाया गया।

सनातन धर्म का पुनरुत्थान और महिलाओं की स्थिति का पुनर्स्थापन

उपनिवेशीकरण का उद्देश्य स्वदेशी संस्कृति, स्वदेशी महिलाओं और स्वदेशी ज्ञान की रक्षा करना बिलकुल भी नहीं रहा है। यदि हम इतिहास को देखें तो पाएँगे कि ऐसा अफ़्रीका, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भी हुआ है। उपनिवेशवादी राज्य कभी भी एक रक्षक के रूप में कार्य नहीं करता है, इसलिए उपनिवेशवादियों की प्रणालियाँ और संरचनाएँ उपनिवेशित आबादी की सुरक्षा और भलाई के लिए नहीं बनी हैं।

यदि हम ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण लें तो पाएँगे कि उपनिवेशीकरण के दो सौ वर्षों के अंदर, ऑस्ट्रेलियाई आदिवासी/मूल निवासी हजारों वर्षों की अपनी संस्कृति से पूरी तरह से बेदख़ल कर दिए गए। वर्तमान समय में ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी महिलाएँ तुलनात्मक रूप में वहाँ की गैर-स्वदेशी आबादी से अधिक हिंसा का अनुभव करती हैं। सुलह, सामंजस्य और उपचार की प्रक्रिया में, ऑस्ट्रेलिया इस बात को स्वीकार करता है कि आदिवासी/मूलनिवासी समुदायों की महिलाओं के विरुद्ध हिंसा उपनिवेशीकरण और उनकी संस्कृति से टूटे हुए संबंधों का ही परिणाम है। सभी उपलब्ध अभिलेख और साक्ष्य बताते हैं कि उपनिवेशीकरण से पूर्व ऑस्ट्रलियाई आदिवासी/मूलनिवासी समुदायों में हिंसा उनकी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं थी। इस हिंसा को संबोधित करने का एक महत्वपूर्ण तरीका यह है कि आदिवासी समुदाय अपनी संस्कृति से टूटे हुए संबंधों को पुनर्स्थापित करे।

पूर्वजों की संस्कृति से जुड़ना और इस बात को प्रकाश में लाना कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को संस्कृति द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया था – यह बात महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के समाधान खोजने के हिस्से के रूप में अत्यंत महत्वपूर्ण है। सभ्यता और संस्कृति के साथ वापस जुड़ना वर्तमान में भारतवर्ष में हो रहा है, व्युपनिवेशीकरण प्रक्रिया जिसके परिणामस्वरूप भारतवर्ष में पुनः सनातन धर्म का पुनरुत्थान हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता के सौ साल पूरे होने तक पच्चीस साल के लिए पाँच संकल्प किए हैं।

दूसरे संकल्प में औपनिवेशिक मानसिकता के किसी भी निशान को जड़ से मिटाना है और तीसरे संकल्प में, अपनी मूल जड़ों पर गर्व करने की बात कही गई है। इस तरह, पहली बार, भारतवर्ष में सरकार द्वारा उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने की प्रक्रिया की रूपरेखा को प्रस्तावित किया गया है। हमारे मंदिरों, पूजाघरों का पुनर्स्थापन व्युपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। उपनिवेशवाद से मुक्ति के साथ महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के साथ-साथ ऐसे अनेकों समाधान भी आएँगे, जो केवल भारतवर्ष ही पूरी दुनिया को दे सकता है।

श्री राम और अयोध्या मंदिर की महत्ता

महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा को रोकने के लिए जन-जन तक पहुँचने और उनसे जुड़ने की आवश्यकता है। लोगों से जुड़ाव को अत्यंत मजबूत बनाने की आवश्यकता है, लोगों से अपील करने की आवश्यकता है और विशेष रूप से महिलाओं के संबंध में उनके मूल्यों पर विचार करने की आवश्यकता है। यही वे मूल्य हैं, जिनके लिए पूरी दुनिया संघर्ष कर रही है, और इनकी रोकथाम के लिए विकसित किए गए विभिन्न कार्यक्रम अभी तक आशाजनक परिणाम नहीं दे रहे पा रहे हैं।

ये सारे कार्यक्रम महिलाओं के प्रति सम्मान की संस्कृति निर्माण पर केंद्रित हैं। मात्र ये कहने से की महिलाओं का सम्मान किया जाए, इससे काम नहीं चलता। ऐसे सामाजिक मूल्य जो जन मानस में गहरे हों व उनकी प्राचीन समय से मान्यता हो, यह अत्यंत जरूरी है। किन्तु संस्कृति में गहराई से अपनी जड़ें जमाए इन मूल्य प्रणालियाँ को मात्र कुछ ही वर्षों में दोबारा नहीं बनाया जा सकता। इनको प्रगाढ़ होने में कई सौ वर्ष लग जाते हैं।

और इसी कारण से श्री राम और श्री राम लला मंदिर का बहुत बड़ा महत्व है। श्री राम और राम राज्य इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि हजारों वर्षों से हिंसा कभी भी सनातन संस्कृति का हिस्सा नहीं थी, हालाँकि अतीत में श्री राम और रामायण के प्रतीकों को धूमिल करने के अनेकों प्रयास लोगों द्वारा किए गए हैं। अनेकों वामपंथी इतिहासकारों, तथाकथित नारीवादियों और कुछ राजनीतिक समूहों ने श्री राम को स्त्रीद्वेषी और जय श्री राम के नारे को आक्रामकता और हिंसा की अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

यद्यपि, अयोध्या में संपन्न हुई प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम की सहज और झूठी प्रतिक्रिया से पता चलता है कि ये वामपंथी इतिहासकारों, तथाकथित नारीवादियों और कुछ राजनीतिक पार्टियों के समूह अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्त करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं। पूरे भारतवर्ष और दुनिया भर में सनातनियों द्वारा अपनी सभ्यता और संस्कृति से जो गहरा भावनात्मक जुड़ाव दिखाया जा रहा है, वह आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित है। इससे पता चलता है कि इस घटना के विषय में हम जितना सोच सकते हैं, उससे कहीं अधिक बड़े निहितार्थ होंगे।

जब अधिक से अधिक लोग श्री राम से जुड़ेंगे, जो मात्र श्री राम नहीं बल्कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम हैं, एक ऐसे भगवान जो शुद्ध चरित्र, अनुशासन, निष्पक्षता और न्याय के अवतार हैं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आना निश्चित है। यह सर्वविदित है कि श्री राम महिलाओं की गरिमा के लिए सदैव खड़े रहे और अपनी पत्नी सीता के प्रति अपमान का बदला लेने के लिए पहाड़ों और समुद्रों को पार किया, उन पर विजय प्राप्त की। यदि भारतवर्ष में पुरुष श्री राम से प्रेरणा लें तो समय के साथ इसका सीधा परिणाम महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में कमी के रूप में सामने आएगा। इसके अलावा, राम राज्य एक आदर्श शासन का प्रतीक है, जहाँ कानून और नियम का शासन है। जब कानून-व्यवस्था सुदृढ़ रहती है तो महिलाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है।

हालाँकि सम्पूर्ण विश्व में भारतवर्ष को महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में अग्रणी देश के रूप में प्रचारित किया गया है, लेकिन विभिन्न कुप्रथाओं को सफलतापूर्वक संबोधित करने का अपना एक लम्बा अनुभव रहा है। उदाहरण के लिए सती-प्रथा, बाल विवाह, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या। भारत में बलात्कार के लिए कड़े कानून हैं और महिलाओं को घरेलू हिंसा के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की जाती है। भारतवर्ष में सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि महिलाएँ सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में स्थानीय शासन और संसद में सार्थक रूप से प्रतिभाग करें।

संसद द्वारा पास नवीनतम महिला आरक्षण, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, महिला नेतृत्व को सबसे आगे रखने में एक प्रभावी भूमिका निभाएगा। भारतवर्ष में जो भी प्रयास किए जा रहे हैं, वे मात्र अलंकरण नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे हजारों वर्षों की सभ्यतागत पृष्ठभूमि है, जहाँ स्त्री देवत्व को सदैव प्रकृति, शक्ति, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, काली और देवी के रूप में सम्मान दिया गया है।

अंततः संक्षेप में, जब एक सुंदर चित्रकारी पर वर्षों-वर्ष के दुर्व्यवहार और लापरवाही के कारण धूल की मोटी परतें जमा हो जाती हैं, तो वह बदसूरत लगने लगती है। हमारी सुंदर सनातन सभ्यता पर बाह्य आक्रमणों और उपनिवेशीकरण ने यही काम किया है। परन्तु यदि ठोस प्रयास करते हुए इस धूल को मिटा दिया जाए और उपनिवेशवाद के निशानों को मिटा दिया जाय, तो पुनः वही खूबसूरत चित्रकारी (पेंटिंग) फिर से सामने उभरकर आ जाएगी। एक ऐसी चित्रकारी (पेंटिंग) जिसमें महिलाओं का सम्मान किया गया है और उन्हें हिंसा और किसी भी प्रकार के भेद-भाव से मुक्त रखा गया है।

मंदिर को अगर दान-चढ़ावे में मिले ₹1 करोड़ तो सरकार को देना होगा ₹10 लाख: कर्नाटक में कॉन्ग्रेस ने किया बिल पास, BJP ने पूछा- निशाने पर सिर्फ हिंदू धर्म क्यों?

कर्नाटक सरकार ने हाल में ‘कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक 2024’ पारित किया है। यह विधेयक सरकार को अधिकार देता है कि वह मंदिरों से टैक्स वसूल सकें।

इस बिल के अनुसार अगर किसी हिंदू मंदिर का राजस्व 1 करोड़ है तो सरकार उनसे 10 फीसद टैक्स ले सकती है और जिनका राजस्व 1 करोड़ से कम है लेकिन 10 लाख रुपए से ज्यादा है तो उनसे सरकार 5 प्रतिशत कर ले सकती है।

बताया जा रहा है कि इस बिल में ये भी कहा गया है कि एक निगमित निकाय के मामले में सदस्यों को हिंदू और अन्य धर्मों दोनों से नियुक्त किया जा सकता है।

इस विधेयक के पारित होने के बाद प्रदेश के भाजपा नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया। कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष विजयेंद्र येदियुरप्पा ने कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार हिंदू विरोधी नीतियाँ अपनाकर अपना खाली खजाना भरना चाहती है।

उन्होंने एक्स पोस्ट में लिखा कि कॉन्ग्रेस सरकार राज्य में लगातार हिंदू विरोधी नीतियाँ अपना रही है। अब उसकी हिंदू मंदिरों के राजस्व पर टेढ़ी नजर है। सरकार ने अपने खाली खजाने को भरने के लिए हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती विधेयक पारित किया है। सरकार हिंदू मंदिरों से धन जुटाकर अपने दूसरे उद्देश्य पूरा करेगी।

विजयेंद्र ने कहा कि सरकार 1 करोड़ से अधिक कमाई वाले मंदिरों से आय का 10% टैक्स लेगी। भक्तों द्वारा भगवान को चढ़ाए गए धन का इस्तेमाल मंदिर और भक्तों की सुविधा के लिए होना चाहिए। यदि इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए आवंटित किया जाता है, तो यह लोगों के साथ हिंसा और धोखाधड़ी होगी। येदियुरप्पा ने आश्चर्य जताया कि कर्नाटक सरकार केवल हिंदू मंदिरों को ही क्यों निशाना बना रही है। अन्य धर्मों को क्यों नहीं?

बीजेपी द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने के बाद मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने विजयेंद्र पर पलटवार किया। उन्होंने भाजपा पर धर्म को राजनीति में लाने का आरोप लगाया। साथ ही उन्होंने कहा- “हिंदुत्व की सच्ची समर्थक तो कॉन्ग्रेस है। लेकिन भाजपा हमेशा कॉन्ग्रेस को हिंदू विरोधी दिखाकर लाभ लेती है। पर, हिंदू धर्म के सच्चे समर्थक हम हैं, क्योंकि वर्षों से कॉन्ग्रेस ने मंदिर और हिंदू हितों की रक्षा की है।”

गन्ने की MSP 8% बढ़ाई गई, सैटेलाइट के कलपुर्जों की मैन्युफैक्चरिंग में 100% FDI, पशुधन उद्यमिता में 50% सब्सिडी: मोदी कैबिनेट ने लिए बड़े फैसले

मोदी सरकार ने बुधवार (21 फरवरी, 2024) की रात को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कैबिनेट द्वारा लिए गए कई अहम फैसलों की जानकारी दी। ‘किसान आंदोलन 2.0’ के बीच मोदी सरकार ने गन्ने की खरीद की किम्मत बढ़ा दी है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट ने बैठक में फैसला लिया कि 2024-25 के लिए गन्ने की कीमत 8% बढ़ाते हुए 340 रुपए प्रति क्विंटल कर दी जाएगी। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश समेत देश भर के 5 करोड़ किसानों को इसका सीधा फायदा होगा।

फ़िलहाल गन्ने का MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) 315.10 रुपए प्रति क्विंटल है। 1 अक्टूबर, 2024 से नई बढ़ी हुई कीमतें लागू होंगी। बैठक के बाद बताया गया कि पहले से ही भारत गन्ने के लिए दुनिया में सबसे अधिक कीमत चुकाने वाला देश है। भाजपा ने इसे किसानों की आय दोगुनी करने की ‘मोदी की गारंटी’ की दिशा में कदम उठाया है। इसके अलावा महिला सुरक्षा के लिए चल रही योजना को भी 2024-26 तक जारी रखने का फैसला लिया गया है।

इस परियोजना पर कुल 1179.72 करोड़ रुपए का व्यय होगा, जिसमें से 885.49 रुपए केंद्रीय गृह मंत्रालय खर्च करेगा। बाकी के 294.23 करोड़ रुपए ‘निर्भया फंड’ से दिए जाएँगे। ये योजना 2021-22 ही चल रहा है। महिला सुरक्षा की दिशा में सख्त कानून से लेकर तुरंत न्याय तक के प्रावधान किए जा रहे हैं। प्रदेश सरकारों के साथ सहयोग करते हुए इस योजना को चलाया जा रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बाढ़ प्रबंधन और सीमा क्षेत्र कार्यक्रम (FMBAP) को जारी रखने की मंजूरी भी प्रदान की।

बाढ़ नियंत्रण और कटाव-रोधी उपायों को इस परियोजना के जरिए अमल में लाया जाता है। इसमें अगले 5 वर्षों के लिए 4100 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया है। विशेष श्रेणी के राज्यों (उत्तर-पूर्व के 8 राज्य और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर) में 90% हिस्सेदारी केंद्र की होगी, बाकी राज्यों में 60% बजट केंद्र सरकार देगा। केंद्र सरकार ने सैटेलाइट्स के लिए पुर्जे बनाने में 100% FDI, अर्थात विदेशी निवेश की अनुमति दे दी है।

सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग, संचालन, डेटा उत्पादों, जमीन और उपयोगकर्ता क्षेत्रों में 74% FDI की अनुमति दी गई है। चाणक्यपुरी के राजनयिक एन्क्लेव स्थित सुषमा स्वराज भवन में 3 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिपरिषद की बैठक होगी। देश में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। पशुधन उद्यमिता को लेकर भी बड़ा फैसला लिया गया है। घोड़े, गधे, खच्चर और ऊँट जैसे जानवरों से संबंधित उद्यमिता में 50 लाख रुपए तक की सब्सिडी (50%) मिलेगी, जबकि वीर्य केंद्र और न्यूक्लियस ब्रीडिंग फार्म्स की स्थापना के लिए 10 करोड़ रुपए प्रदान किए जाएँगे।

गर्भवती बीवी को डॉक्टरों से रखा दूर; नॉर्मल बच्चे को पैदा करने की जिद में देखा करता था यूट्यूब… जच्चा-बच्चा की मौत के बाद केरल पुलिस की हिरासत में नयाज

केरल के करक्कमंडपम में मंगलवार (20 फरवरी 2024) को प्रसव के दौरान एक महिला और उसके नवजात बच्चे की मौत हो गई है। पुलिस ने इस मामले में महिला के शौहर को गिरफ्तार किया है। आरोपित का नाम नयाज़ है, जिसके खिलाफ आशा वर्करों ने शिकायत दर्ज करवाई है। आरोप है कि नयाज एक्यूपंक्चर विधि से अपनी बीवी समीरा बीवी का इलाज करवा रहा था। वह किसी भी डॉक्टर को अपने घर में घुसने भी नहीं देता था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना करक्कमंडपम के पूनथुरा इलाके की है। यहाँ रहने वाला नयाज साउंड सिस्टम का काम करता है। घर में उसकी 36 वर्षीया बीवी समीरा थी। समीरा 3 बच्चों की माँ थी। उसके तीनों बच्चे सर्जरी से हुए थे। समीरा चौथी बार गर्भवती हुई थी। इलाके की आशा वर्करों का कहना है कि पूरे 9 माह में एक बार भी नयाज ने अपनी बीवी को डॉक्टरों को नहीं दिखाया था।

नया किसी भी स्वास्थ्यकर्मी को अपने घर में घुसने नहीं देता था। माना जा रहा है कि नयाज किसी भी हाल में अपना चौथा बच्चा सामान्य प्रसव से ही पैदा करना चाहता था। हालाँकि, सामान्य प्रसव की संभावना न के बराबर थी, इसके बावजूद नयाज अपनी जिद पर अड़ा रहा। वह सामान्य प्रसव के तरीके यूट्यूब पर देखा करता था।

नयाज अपने किराए के मकान में सिर्फ एक एक्यूपंचर डॉक्टर को बुलाता था। जैसे-तैसे करके एक बार एक स्वास्थ्यकर्मी नयाज के घर के अंदर पहुँच गई। तब जाकर लोगों को समीरा के प्रेग्नेंट होने की जानकारी हुई थी। हालाँकि, अपने शौहर की ज़िद को देखते हुए समीरा किसी से भी अपनी डिलीवरी के बारे में बात नहीं करती थी।

उसकी बीवी की गर्भावस्था के बारे में जानकारी मिलते ही स्थानीय लोगों ने नयाज से अपनी बीवी का इलाज करवाने की गुजारिश की। इस गुजारिश पर नयाज ने खुद को अपनी बीवी का ध्यान रखने में सक्षम बताया। आखिरकार 20 फरवरी को प्रसव के दौरान समीरा की मौत हो गई। नवजात बच्चे को भी नहीं बचाया जा सका।

इस घटना की जानकारी होने पर आशा वर्करों ने पुलिस में नयाज के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। पुलिस ने नयाज के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज करके उसे हिरासत में ले लिया है। आरोपित नयाज से पूछताछ की जा रही है।

अलवर में जहाँ कटती थी गाय उस मंडी को चलाता था वारिस, बना रखा था IPS का फर्जी कार्ड: रिपोर्ट में बताया- सप्लाई के लिए चोरी की गाड़ियों का होता था इस्तेमाल

राजस्थान के अलवर में हाल ही में एक गोमांस मंडी का खुलासा हुआ। किशनगढ़बास स्थित रूंध गिदावड़ा के बीहड़ में मेदावास निवासी इकबाल और वारिस पर इसका संचालन करने का आरोप लगा। अब पुलिस की जाँच में सामने आया है कि इसके मुख्य साजिशकर्ता वारिस ने एक फर्जी IPS वाला कार्ड तक बना रखा था। इस बीफ मंडी को चलाने के लिए उसने हरियाणा और राजस्थान की पुलिस से साँठगाँठ कर रखी थी। इन्होने सरकारी जमीन पर कब्ज़ा किया, निगम कर्मियों को अपने साथ मिलाया, फिर बिजली कनेक्शन तक ले लिया।

अभी न सिर्फ ये दोनों फरार हैं, बल्कि हब्बी, मन्नान, शाहरुख, साहुन और सोहिल भी अभी फरार चल रहे हैं। इक़बाल को ये जिम्मेदारी दी गई थी कि वो आरोपितों की जमानत से लेकर बीफ सप्लायर तक उपलब्ध कराए। दोनों आरोपितों ने कई वर्षों तक अवैध कमाई कर के बड़े-बड़े मकान तक बनवा रखे थे। रूंध गिदावड़ा में बीफ मंडी चलाई जाती थी। गायों की तस्करी कर उन्हें राजस्थान से हरियाणा लाया जाता था। फिर गायों का क़त्ल कर के उन्हें बीफ सप्लायरों को बेच दिया जाता है।

सप्लाई के लिए चोरी की गाड़ियों और बाइक का इस्तेमाल किया जाता था। गाँव में ही फिर बीफ बिरयानी बनाई जाती थी। सिवायचक में जमीन कब्जे को लेकर पुलिस की ओर से बुलडोजर चलाने की कार्रवाई भी की गई है। वहाँ पर कुल 3000 बीघा जमीन है, जिसमें से 1200 बीघा जमीन पर अवैध कब्ज़ा कर लिया गया है। मकानों को ध्वस्त किया गया है, बिजली के पोल गिरा कर ट्रांसफॉर्मर हटाए गए हैं और खेती भी नष्ट की गई है। खुद कलक्टर अर्पिता शुक्ला ने इलाके का दौरा किया।

ADM के नेतृत्व में उच्च-स्तरीय जाँच समिति गठित की गई है। पुलिस धर-पकड़ के लिए कॉम्बिंग ऑपरेशन चला रही है। IG उमेश चंद्र दत्ता ने भी इलाके का निरीक्षण किया है और सख्ती बरतने के आदेश दिए हैं। पुलिस की 9 टीमें दबिश दे रही है, 5 आरोपित गिरफ्तार भी हुए हैं। हिन्दू संगठनों ने किशनगढ़बास के तोप चौराहे पर विरोध प्रदर्शन किया। भाजपा नेता ज्ञानदेव आहूजा ने भरोसा दिलाया है कि किसी भी आरोपित को नहीं छोड़ा जाएगा।