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नक्सलवाद मुक्त भारत, भय मुक्त भारत: ‘लाल आतंक’ के गर्त से निकलकर शिक्षा-रोजगार-विकास से जुड़ रहा जनजातीय समाज

यह दौर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को वर्षों की मानसिक गुलामी और गुमनाम भय से मुक्त करने का है। विगत एक दशक में राष्ट्र की उत्तरोत्तर प्रगति को देखकर कभी–कभी मुझे लगता है कि सही मायनों में भारत 1947 में नहीं, अपितु 2014 में स्वतंत्र हुआ है। देश की महनीय जनता ने 2014 में अपनी बागडोर संघ, सनातन और संस्कृति के प्रति श्रद्धा और भारत की प्रतिष्ठा को समृद्ध करने वाली पार्टी भाजपा के हाथ में सौंपकर इस नए भारत का सूत्रपात कर दिया है।

65 वर्ष की जो आधी और तथाकथित स्वतंत्रता हमें मिली थी, उसके साथ विभाजन की त्रासदी, अखंडित भारत और बौद्धिकता के नाम पर आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद का भय भी मिला। हम स्वतंत्र हुए लेकिन हमारी आत्मा किसी बंधन में थी। वर्तमान सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने सबसे पहले ऐसे निर्णय लेने का साहस दिखाया, जिससे हम स्वतंत्रता की सोंधी महक को अनुभव कर सकें।

आजादी का अमृत महोत्सव, जी–20 में भारतीय नेतृत्व, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, नशामुक्त भारत, तीन तलाक की मुक्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, CAA, ऑपरेशन सिंदूर, आत्मनिर्भर भारत, सबका साथ सबका विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा जैसे तमाम विचार इस देश की जनता को पहली बार सुनने-देखने को मिले। इसके साथ ही नई भारतीय न्याय संहिता में समाज हित के लिए कुछ सांविधिक परिवर्तन जैसे कदम उठाकर सरकार ने भारत की न्याय व्यवस्था को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।  

इसी क्रम में, नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आरंभ हुआ। उनका यह विचार मुझे राजनीतिक समीकरण से अधिक सुरक्षा बलों के उन हजारों योद्धाओं और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे आम जनता की आत्मा की शांति के हवन जैसा लगा, जिन्हें नक्सलवादियों द्वारा बेरहमी से मार दिया गया था। हमने वह भयानक दौर भी देखा है, जब वामपंथियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वनवासी समाज की भोली-भाली जनता को इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम पकड़ानी थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए गए, जिन्हें किताबें देनी थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के कांटे बो दिए गए।

यह कितना सुखद है कि आज भारत उसी वनवासी समाज के एक गुमनाम नायक बिरसा मुंडा की जयंती को वैश्विक आधार देते हुए उन्हें ‘भगवान बिरसा मुंडा’ की उपाधि से विभूषित कर रहा है। वर्षों तक विकास के नाम पर जिस समाज को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित करके रखा गया, आज सरकार उनके अधिकार के लिए नियम बना रही है। वर्तमान सरकार के गठन को एक दशक बीत चुका है। आतंकवाद और नक्सलवाद की जड़े हिलने लगी हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भारत को नक्सलवाद मुक्त करने का संकल्प लेकर उपेक्षित जनता को भी विकसित भारत के विजन से जोड़ दिया है।

विकसित भारत की जो संकल्पना इस देश ने की है, गृहमंत्री ने उससे भी सुंदर, सशक्त और समर्थ भारत देने का प्रण लिया है। नक्सलमुक्त भारत का भाव इतना पावन है कि उसकी सिद्धि होनी निश्चित है। आप सोचिए कि कैसा देश बनाया जा रहा था, जहाँ सत्ता में बने रहने के लिए अपने ही राष्ट्र के कुछ हिस्से को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर नक्सलवादी बना दिया गया। जिस समाज को बराबर की हिस्सेदारी मिलनी थी, उसे उपेक्षा मिली। यह पहली बार हुआ, जब देश के प्रथम नागारिक और राष्ट्र के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक वनवासी महिला को बैठने का अवसर मिला।

यह भी पहली बार हुआ जब प्रधान मंत्री और गृह मंत्री ने नक्सलवाद प्रभावित लोगों को उस गर्त से निकाल कर उन्हें शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ा और उनसे निरंतर सार्थक संवाद किया। गृह मंत्री ने स्वयं उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की। 

भाजपा और संघ की मूल भावना में सेवा, समर्पण और त्याग है। इसी के माध्यम से भारत सुशासन की बुनियाद तैयार करने में सफल हुआ है। प्रधानमंत्री ने वामपंथ के वैचारिक उग्रवाद से देश को मुक्त करने के लिए नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान आरंभ कर दिया है जिसे गृह मंत्री द्वारा विस्तार कर दिया जा रहा है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि नक्सलवाद से मुक्ति का अभियान किसी विचारधारा का एजेंडा नहीं, बल्कि सुशासन द्वारा समाज में हिंसा, निरंकुशता को समाप्त करने का प्रण है।  एक दशक पूर्व नक्सलवाद, आतंकवाद की जो घटनाएँ प्रतिदिन हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी, वो पिछले एक दशक में लगभग 60 प्रतिशत कम हुईं हैं।

वामपंथियों द्वारा संरक्षित और पोषित उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका था, जो नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़े जमाए हुए था। भारत के वनवासी क्षेत्रों में, मुख्यत: छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में इनकी गतिविधियाँ निरंतर भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं। गृह मंत्रालय के एक आँकड़े के अनुसार, 2013 में जहाँ लगभग 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वह वर्तमान में 10 के आस-पास रह गई है। गृह मंत्री के द्वारा इन्हें भी 31 मार्च 2026 तक समूल खत्म करने का लक्ष्य तय कर दिया गया है। 

बीते छह महीनों के आँकड़ों को ही यदि देखा जाय, तो नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में सबसे निर्णायक बात यह रही कि सुरक्षा बलों ने सीधे नक्सली नेतृत्व को निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के घने जंगलों में चले अभियानों में मोदम बालकृष्ण उर्फ बाला कृष्णा, दंडकारण्य और आंध्र-ओडिशा क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ उसेंडी विकल्प, शीर्ष सैन्य रणनीतिकार माने जाने वाले कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा और लंबे समय से वांछित नक्सली कमांडर गणेश उइके को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में मार गिराया।

इनके अलावा बीजापुर, नारायणपुर और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में हुए बड़े ऑपरेशनों में कई सशस्त्र नक्सली ढेर किए गए, जिससे नक्सलियों के संगठन की फील्ड कमांड, हथियार नेटवर्क और मनोवैज्ञानिक बढ़त पूरी तरह टूट गई। इन्हें निष्क्रिय करके गृह मंत्री ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि अब नक्सलवाद के लिए भारत की धरती पर न तो सुरक्षित ठिकाने हैं और न ही नेतृत्व का संरक्षण है।

गृह मंत्री ने एक तरफ जहाँ नक्सलवाद ग्रस्त समाज के लोगों को उससे मुक्त होकर जीने का अवसर दिया, वहीं दूसरी तरफ उनके वैचारिक समर्थकों को चुनौती भी। एक नागरिक के रूप में हम सभी गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति की भावना को जानते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अमित शाह के नेतृत्व में यह देश नक्सलवाद से मुक्त होकर भयमुक्त भारत बनेगा।

संगम तीरे फिर से ‘आस्था का महाकुंभ’, जानिए क्या है प्रयागराज माघ मेला का माहात्म्य, कल्पवास रहस्य क्या है: योगी सरकार ने दी दिव्यता-भव्यता-नव्यता

नए साल की शुरुआत के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज एक बार फिर आस्था के महासागर में डूबने को तैयार है। 3 जनवरी 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी 2026 तक चलने वाला माघ मेला 2026 लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है। महाकुंभ 2025 की भव्य सफलता के बाद यह माघ मेला उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक और बड़ी परीक्षा है।

योगी सरकार ने इसे महाकुंभ मॉडल पर आयोजित करने का फैसला किया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और दिव्य अनुभव मिल सके। अनुमान है कि इस बार 12 से 15 करोड़ श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाने आएँगे।

माघ मेला कुंभ का छोटा रूप माना जाता है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व किसी से कम नहीं। त्रिवेणी संगम पर माघ मास में स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। यह मेला न केवल स्नान का पर्व है, बल्कि तप, संयम और आत्मशुद्धि का भी महोत्सव है।

माघ मेला का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माघ मास को विशेष स्थान प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार, माघ में गंगा स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम दुनिया का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति के सभी जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

माघ मेला हर साल आयोजित होता है, जबकि कुंभ हर 12 साल में और अर्धकुंभ हर 6 साल में। लेकिन महाकुंभ 2025 की सफलता के बाद यह माघ मेला विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि संगम पर माघ स्नान से आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में सुख-शांति आती है। यह पर्व संयम, दान और भक्ति का प्रतीक है।

कल्पवास: तपस्या की अनुपम परंपरा

माघ मेले का सबसे खास हिस्सा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है कल्प (लंबे समय) तक वास करना। श्रद्धालु पौष पूर्णिमा (3 जनवरी 2026) से महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) तक संगम तट पर टेंट में रहते हैं और कठोर तपस्या करते हैं।

कल्पवास के मुख्य नियम हैं

  • जमीन पर सोना, कुश के आसन पर।
  • दिन में एक बार सादा भोजन (फल, दूध, सात्विक आहार)।
  • ब्रह्मचर्य का पालन।
  • रोजाना संगम स्नान।
  • भजन-कीर्तन, रामायण-महाभारत पाठ और ध्यान।

शास्त्रों में कहा गया है कि कल्पवास करने से व्यक्ति को 12 साल की तपस्या का फल एक साथ मिल जाता है। यह मोक्ष प्राप्ति का सीधा मार्ग माना जाता है। लाखों कल्पवासी संगम तट पर छोटे-छोटे टेंट लगाकर रहते हैं और पूरी अवधि सादगी से बिताते हैं।

2026 में प्रमुख स्नान तिथियाँ

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर आयोजित माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं, जिनमें तीन अमृत स्नान (शाही स्नान) शामिल हैं। ये तिथियाँ हिंदू पंचांग के अनुसार निर्धारित हैं और प्रत्येक का विशेष धार्मिक महत्व है। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में संगम स्नान से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा पूर्वजन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं (पद्म पुराण, प्रयाग माहात्म्य)।

इन दिनों लाखों-करोड़ों श्रद्धालु संगम तट पर एकत्र होते हैं, जहाँ पवित्र डुबकी के साथ भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और तपस्या का वातावरण बनता है। अमृत स्नान के अवसर पर साधु-संतों के अखाड़ों की भव्य पेशवाई निकलती है, जिसमें हाथी-घोड़ों पर सवार नागा साधु, ध्वज-पताकाएँ और ढोल-नगाड़ों की गूँज देखते ही बनती है। यह दृश्य सनातन परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।

माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं। इनमें तीन अमृत स्नान सबसे महत्वपूर्ण हैं-

3 जनवरी 2026 (पौष पूर्णिमा): यह माघ मेले और कल्पवास की औपचारिक शुरुआत की तिथि है। पहला प्रमुख स्नान इसी दिन होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूर्ण कला में स्नान करने से मन की शुद्धि और आत्मिक शांति मिलती है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि पौष पूर्णिमा पर संगम स्नान से व्यक्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन कल्पवासी टेंट लगाकर तपस्या शुरू करते हैं और मेला क्षेत्र पूरी तरह जीवंत हो उठता है।

14 जनवरी 2026 (मकर संक्रांति): पहला अमृत स्नान इसी दिन होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर यह पर्व मनाया जाता है, जिसे उत्तरायण का आरंभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन स्नान, दान और तिल गुड़ का सेवन विशेष पुण्यदायी है (महाभारत, अनुशासन पर्व)। अमृत स्नान में अखाड़ों की पेशवाई सबसे आकर्षक होती है- जूना अखाड़ा, निरंजनी, महानिर्वाणी आदि अखाड़े भव्य जुलूस के साथ संगम की ओर बढ़ते हैं। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देकर स्नान करते हैं।

29 जनवरी 2026 (मौनी अमावस्या): माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व। इस दिन मौन व्रत रखकर स्नान करने की परंपरा है, जिससे इंद्रियों पर संयम और आत्मचिंतन होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि मौनी अमावस्या पर प्रयाग स्नान से मोक्ष प्राप्ति का द्वार खुलता है और सभी पाप धुल जाते हैं। यह दिन मेले में सबसे अधिक भीड़ वाला होता है, क्योंकि इसे मुख्य स्नान माना जाता है। कल्पवासी विशेष रूप से इस तिथि का इंतजार करते हैं।

2 फरवरी 2026 (बसंत पंचमी): दूसरा अमृत स्नान। यह विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा का पर्व है। पीले वस्त्र धारण कर, सरस्वती पूजन और स्नान से बुद्धि-विवेक की प्राप्ति होती है। भागवत पुराण में वसंत पंचमी का महत्व वर्णित है। पेशवाई फिर से निकलती है और संगम तट पीले फूलों व वस्त्रों से सज जाता है।

12 फरवरी 2026 (माघ पूर्णिमा): तीसरा अमृत स्नान। माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूर्ण शक्ति से स्नान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विष्णु पुराण के अनुसार, इस दिन संगम स्नान से हजारों गोदान का फल मिलता है। अखाड़ों की अंतिम भव्य पेशवाई इस दिन होती है।

15 फरवरी 2026 (महाशिवरात्रि): अंतिम स्नान और मेले का समापन। भगवान शिव की आराधना के साथ स्नान से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिव पुराण में महाशिवरात्रि पर प्रयाग स्नान को परम पुण्यकारी बताया गया है।

योगी सरकार ने की है भव्य तैयारियाँ

महाकुंभ 2025 की ऐतिहासिक सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने माघ मेला 2026 को भी उसी स्तर पर आयोजित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री योगी ने कई बार तैयारियों की समीक्षा की और सख्त निर्देश दिए थे कि 31 दिसंबर 2025 तक सभी व्यवस्थाएँ पूरी हो जाएँ, जोकि पूरी हो चुकी है।

मुख्य तैयारियाँ इस प्रकार हैं-

क्षेत्र विस्तार: मेला क्षेत्र को 800 हेक्टेयर तक बढ़ाया गया है। टेंट सिटी, सेक्टर और घाटों का निर्माण तेजी से हुआ।
सुरक्षा व्यवस्था: हजारों पुलिसकर्मी, सीसीटीवी, ड्रोन और एआई आधारित निगरानी। मुख्य स्नान पर VIP प्रोटोकॉल पूरी तरह समाप्त।
स्वच्छता और स्वास्थ्य: संगम तट पर गहरी सफाई, अस्थाई अस्पताल, एम्बुलेंस और डॉक्टरों की टीम।
यातायात और पार्किंग: विशेष ट्रेनें, बसें और पार्किंग व्यवस्था। ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार।
बिजली और पानी: पूरे क्षेत्र में 24 घंटे बिजली और स्वच्छ पेयजल।
पर्यटन सुविधाएँ: पहली बार 4 अस्थाई पर्यटन सूचना केंद्र, जहाँ गाइड और होटल की जानकारी मिलेगी।
बजट: शुरुआत में ही ₹42 करोड़ की स्वीकृत, साथ ही महाकुंभ के बचे बजट से अतिरिक्त व्यवस्थाएँ की गई हैं।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि माघ मेला सनातन परंपरा का जीवंत रूप है। सरकार का लक्ष्य है कि हर श्रद्धालु को सुरक्षित और दिव्य अनुभव मिले।

माघ मेला के लिए भदोही की ज्ञानपुर जेल में बनाए गए खास कालीन (फोटो साभार: X_DM_Bhadohi)

योगी सरकार में हिंदू त्योहारों की भव्य परंपरा

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2017 से उत्तर प्रदेश में हिंदू त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को नई ऊँचाई मिली है। पहले ये पर्व साधारण और स्थानीय स्तर पर मनाए जाते थे, लेकिन अब वे विश्व स्तरीय, रिकॉर्ड बनाने वाले और करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाले हो गए हैं। सरकार का फोकस सनातन संस्कृति के सम्मान, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता पर रहा है। इससे न केवल आस्था मजबूत हुई, बल्कि पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बढ़ावा मिला। यह परंपरा अब उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुकी है।

आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों से समझते हैं कि कैसे ये आयोजन भव्य और दिव्य बने-

अयोध्या में दीपोत्सव की अनुपम छटा

दीपावली पर अयोध्या का दीपोत्सव अब विश्व प्रसिद्ध है। योगी सरकार ने इसे राम नगरी की आध्यात्मिक गरिमा से जोड़ा। हर साल सरयू तट पर लाखों दीये जलाए जाते हैं। 2025 में 26 लाख 17 हजार से अधिक दीयों से शहर रोशन हुआ, जिसने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए- सबसे अधिक दीये जलाने और 2,128 वेदाचार्यों द्वारा सामूहिक सरयू आरती का।

यह आयोजन लेजर शो, रामलीला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा होता है। पहले जहाँ कुछ हजार दीये जलते थे, अब लाखों की संख्या और विश्व रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि सरकार ने सनातन परंपरा को कितनी भव्यता दी है।

महाकुंभ 2025: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम

प्रयागराज में महाकुंभ 2025 ऐतिहासिक रहा। 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई, जो विश्व रिकॉर्ड है। योगी सरकार ने इसे सबसे सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाया। इस आयोजन से राज्य की अर्थव्यवस्था को 3.5 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित लाभ मिला। पहले कुंभ मेले में व्यवस्थाएं सीमित होती थीं, लेकिन अब यह वैश्विक स्तर का दिव्य आयोजन बन चुका है।

महाकुंभ 2025 के दौरान श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से बरसाए गए थे फूल (फोटो साभार: X_SwachhKumbh)

काँवड़ यात्रा: आस्था में पुष्पवर्षा की बौछार

सावन में कांवड़ यात्रा को भव्य बनाया गया। मुख्यमंत्री योगी खुद हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करते दिखे हैं और रूट का हवाई निरीक्षण करते हैं। 2025 में भी मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर यह नजारा देखा गया। हजारों सीसीटीवी, प्रकाश व्यवस्था, पानी और सुरक्षा के इंतजाम से यात्रा सुगम हुई। पहले असुविधाओं की शिकायतें आती थीं, अब यह आस्था का सुरक्षित और दिव्य पर्व बन चुका है।

वाराणसी में देव दीपावली की रोशनी

कार्तिक पूर्णिमा पर काशी के घाट 25 लाख दीयों से जगमगाते हैं। 2025 में लेजर शो, ग्रीन आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे और भव्य बनाया। मुख्यमंत्री योगी खुद भी क्रूज से देव दीपावली का भव्य नजारा देख चुके हैं। यह देवताओं की दिवाली के रूप में विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो रही है।

यह परंपरा सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है। माघ मेला 2026 भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महाकुंभ मॉडल पर आयोजित हो रहा है। प्रयागराज एक बार फिर विश्व को संदेश देगा कि भारत की आस्था और संस्कृति अमर है।

‘स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल) की मूर्ति लग सकती है तो नायकों की क्यों नहीं?’: 1000+ अंग्रेजों को धूल चटाने वाले कल्लर योद्धाओं के बनेंगे स्मारक, जानिए मद्रास HC ने फैसले में क्या कहा

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने शुक्रवार (26 दिसंबर 2025) को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1755 के नथम कनवै युद्ध (Natham Kanvai Battle) की याद में स्मारक बनाने का रास्ता साफ कर दिया। जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने वकील शिवा कलैमणि अंबलम की याचिका पर यह फैसला दिया।

याचिकाकर्ता थन्नारसु कल्लर नाडु चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी भी हैं। उन्होंने डिंडीगुल जिले के नथम तालुक के पुथुर गाँव में अपनी निजी पट्टा भूमि पर स्तूप बनाने की अनुमति माँगी थी, जिसे तहसीलदार ने पहले खारिज कर दिया था।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अगर स्टेन स्वामी (अर्बन नक्सल, जिसकी जेल में ही मौत हुई) का स्मारक बनाया जा सकता है, तो आजादी के नायकों का क्यों नहीं? हाई कोर्ट ने साफ कहा कि आजादी के नायकों का स्मारक बनाने के लिए किसी अनुमति की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए।

18वीं सदी के युद्ध से लेकर शतरंज चैंपियनशिप तक: सफलता से और सफलता मिलती है

कोर्ट ने फैसले में कहा, “सफलता के कई पिता होते हैं, जबकि असफलता अनाथ होती है। सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।”

कोर्ट ने भारत की शतरंज में अभूतपूर्व उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए एक रोचक तुलना पेश की और चेन्नई को देश की शतरंज राजधानी के रूप में स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु से निकलने वाले असाधारण शतरंज खिलाड़ी आज वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु अब इस खेल के कई सुपरस्टार खिलाड़ियों का घर बन चुका है। वर्तमान विश्व चैंपियन गुकेश डोम्माराजू चेन्नई के रहने वाले हैं। इसके अलावा आर प्रज्ञानानंदा, वैशाली रमेशबाबू, प्रणेश, इलमपार्थी, अरविंद चितंबरम जैसे उच्च एलो रेटिंग वाले कई ग्रैंडमास्टर भी इसी राज्य से आते हैं। कोर्ट ने प्रसिद्ध शतरंज ग्रैंडमास्टर आर बी रमेश का भी उल्लेख किया, जिन्होंने चेन्नई में चेस गुरुकुल की स्थापना की और प्रज्ञानानंदा तथा भारत सुब्रमणियम सहित भारत के कई अंतरराष्ट्रीय शतरंज चैंपियनों को तैयार किया।

कोर्ट ने इस सफलता का श्रेय शतरंज की महान हस्ती विश्वनाथन आनंद को देते हुए कहा कि यह सब एक व्यक्ति की जीतों के कारण संभव हो सका। जज ने स्पष्ट किया कि सफलता आगे और अधिक सफलताओं को जन्म देती है, यह प्रेरणा और उत्साह पैदा करती है तथा परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देती है। इसी कारण सफलता का उत्सव मनाना आवश्यक है।

कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि इसी भावना के तहत भारत सरकार हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाती है, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की जीत का प्रतीक है। कोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ जीत या शत्रु से टकराने के प्रयासों ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

स्वतंत्रता में तमिलनाडु की भूमिका

इसके बाद कोर्ट ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तमिलनाडु की अहम भूमिका की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह 1857 से भी बहुत पहले इसी धरती से शुरू हुआ था।

कोर्ट ने कहा, “तमिलनाडु का स्वतंत्रता आंदोलन में अद्वितीय योगदान रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में नहीं, बल्कि उससे कहीं पहले तमिल भूमि से शुरू हुआ था। इसके कई उदाहरण दिए जाते हैं। यह कोर्ट इन ऐतिहासिक विवादों में जाने में सक्षम नहीं है, लेकिन यह न्यायिक संज्ञान ले सकती है कि मदुरै क्षेत्र में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर मिली थी।”

कोर्ट ने कहा कि इस संदर्भ में कई नाम याद आते हैं, जिनमें मरुदु बंधु, वेलुनाचियार, पुली थेवर, कट्टाबोम्मन, ऊमैथुरै, वलुक्कुवेली अंबलम सहित अनेक वीर योद्धा शामिल हैं और यह सूची और भी लंबी है। जज ने जोर देकर कहा कि जिन युद्धों में देशी लोगों ने औपनिवेशिक सेना को पराजित किया, उनका उत्सव मनाना उतना ही आवश्यक है, जितना उन वीर सैनिकों के नामों को याद रखना। उन्होंने कहा कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों और भारी कीमत चुकाकर प्राप्त की गई हर जीत को संजोकर रखा जाना चाहिए और शहीदों की स्मृति का सम्मान किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता, जो एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं, उसने ऐसे दस्तावेज और सामग्री प्रस्तुत की है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि साल 1755 में नथम दर्रे (नथम कनवै) में मेलूर कल्लरों और अंग्रेजी सेना के बीच एक भीषण संघर्ष हुआ था, जिसमें कल्लर समुदाय की जीत हुई थी।

नाथम कनवई युद्ध और कल्लार समुदाय

इसके बाद कोर्ट ने नथम कनवै युद्ध के इतिहास को सामने रखते हुए बताया कि थिरुमोगुर (कोइलकुडी) मंदिर की पीतल की मूर्तियाँ अंग्रेज सैनिकों द्वारा लूट ली गई थीं। इन मूर्तियों को कर्नल अलेक्जेंडर हेरॉन के नेतृत्व में ले जाया जा रहा था और यह दल नथम कनवै दर्रे को पार करने वाला था। इसी दौरान कल्लर समुदाय के लोग बड़ी संख्या में एकत्र हुए और पवित्र मूर्तियों को वापस हासिल करने के लिए हेरॉन तथा उसकी सेना पर हमला कर दिया।

कोर्ट के अनुसार इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान गई, लेकिन इसके बावजूद कल्लर समुदाय सभी मूर्तियों को सुरक्षित रूप से वापस लेने में सफल रहा। बताया गया कि इस लड़ाई के बाद केवल करीब 30 सिपाही ही जीवित बचे, जो कर्नल हेरॉन के साथ त्रिचिरापल्ली लौट पाए।

जज ने कल्लर समुदाय की योद्धा परंपरा पर भी प्रकाश डाला और उनकी तुलना राजपूतों तथा गोरखाओं से की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंग्रेजों ने जानबूझकर इस समुदाय को अपराधी जनजाति के रूप में चिन्हित किया और उनके खिलाफ अत्याचार किए।

कोर्ट ने कहा, “कल्लर समुदाय की पृष्ठभूमि एक युद्धक समुदाय की रही है। उनकी तुलना गोरखाओं और राजपूतों से की जा सकती है। इसी कारण अंग्रेजों ने उन्हें ‘अपराधी जनजाति’ करार दिया। इस समुदाय ने दशकों तक दमन और असहनीय कठिनाइयों को झेला, जब तक कि महान नेता पासुम्पोन मुथुरामलिंगा थेवर ने उन्हें इस कलंक से मुक्त नहीं कराया।”

ऐतिहासिक घटनाओं को याद करने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है

कोर्ट ने कहा कि यह याचिका निस्संदेह विलंब से दायर की गई है, लेकिन इस मामले में लेचेस (यानी अनुचित देरी के कारण दावा खारिज किए जाने का सिद्धांत) को लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया, “जब तक विवादित मेमो प्रभावी है, तब तक याचिकाकर्ता याचिका में उल्लेखित स्थल पर स्तूप स्थापित नहीं कर सकता। इसलिए केवल देरी के आधार पर याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता।”

अधिकारियों की ओर से यह दलील दी गई कि अनुमति न दिए जाने के पीछे एकमात्र कारण आसन्न संसदीय चुनाव थे। इस पर जज ने कहा, “अब प्रतिवादी यह कह रहे हैं कि क्षेत्राधिकार वाली पुलिस से रिपोर्ट मंगाई गई है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है,” लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस तर्क से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

जज ने टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता आखिरकार देशी सेनाओं की औपनिवेशिक शक्तियों पर जीत की स्मृति में एक स्तूप स्थापित करना चाहता है। ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों का उत्सव मनाया जाना चाहिए और उन्हें स्मृति के रूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए। मैं पहले ही यह राय व्यक्त कर चुका हूँ कि किसी स्वतंत्रता सेनानी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए, वह भी केवल अपनी पट्टा भूमि पर, किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती,” उन्होंने पूर्व में दिए गए एक फैसले का हवाला देते हुए कहा।

उन्होंने आगे कहा, “जैसे किसी व्यक्ति का घर उसका किला होता है, वैसे ही उसकी भूमि उसका अधिकार क्षेत्र होती है। राज्य केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही हस्तक्षेप कर सकता है। किसी वैधानिक या कॉमन लॉ अधिकार को किसी कार्यकारी आदेश या सरकारी निर्देश के माध्यम से सीमित या समाप्त नहीं किया जा सकता। केवल ऐसा कानून, जो संविधान के विपरीत न हो, ही इन अधिकारों पर प्रभाव डाल सकता है।”

कोर्ट ने उस समय यह भी स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक पूजा के लिए किसी धार्मिक भवन के निर्माण हेतु जिला कलेक्टर से पूर्व अनुमति आवश्यक हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा अपने आदर्श या श्रद्धेय व्यक्ति के सम्मान में प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को सीमित या बाधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रतिमा स्थापना से संबंधित ऐसा कोई वैधानिक कानून या नियम अस्तित्व में नहीं है।

यूएपीए-आरोपी कैथोलिक जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी का स्मारक

जज ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के आरोपित रहे कैथोलिक जेसुइट पादरी दिवंगत स्टैनिस्लॉस लौर्दुस्वामी उर्फ स्टैन स्वामी की प्रतिमा स्थापना से जुड़े मामले का भी उल्लेख किया।

उन्होंने बताया कि उस मामले में तहसीलदार ने पहले अनुमति देने से इनकार कर दिया था, लेकिन बाद में इसी कोर्ट ने प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति दी थी। जज ने स्टैन स्वामी के विवादास्पद जीवन का भी जिक्र किया, जो कथित रूप से राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा रहा।

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे विवादित और बदनाम व्यक्ति की प्रतिमा लगाने के लिए किसी प्रकार की अनुमति आवश्यक नहीं है, तो देश के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण अध्याय को सम्मान देने के लिए अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की, “यह सही है कि समाज के कुछ वर्ग स्टैन स्वामी को आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाला मानते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि वह UAPA के तहत दर्ज एक मामले में आरोपित थे। उनकी मृत्यु जेल में हुई। यदि स्टैन स्वामी की स्मृति में एक पत्थर का स्तंभ स्थापित करने के लिए अनुमति आवश्यक नहीं है, तो निश्चित रूप से नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्तूप स्थापित करने के लिए भी किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि स्टैन स्वामी को 2018 के भीमा कोरेगाँव एल्गार परिषद मामले में मुख्य साजिशकर्ता के रूप में नामजद किया गया था। उन पर माओवादियों के साथ मिलकर लोकतंत्र को कमजोर करने और देश को नुकसान पहुँचाने के लिए जीवन समर्पित करने के आरोप थे।

इसके अलावा, जब वह जेसुइट संचालित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट (ISI) के निदेशक थे, उस दौरान बाद में केंद्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को वहाँ कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी गई थी।

कोर्ट ने विडंबना की ओर इशारा करते हुए कहा कि जिस भूमि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसे व्यक्ति ने काम किया, उसी भूमि पर उसकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जबकि देश के लिए बलिदान देने वाले अनेक वीर आज भी गुमनाम हैं, उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं मिला है या फिर उन्हें अपने महान बलिदानों की मान्यता के लिए मृत्यु के बाद भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

फैसले की घोषणा कर दी गई है

जज ने सरकार के एक पूर्व आदेश से संबंधित अपने पुराने फैसले का हवाला दिया और साफ किया कि वह निर्देश केवल सार्वजनिक स्थलों पर लागू होता है, न कि पट्टा (निजी) भूमि पर।

उन्होंने फैसले को और स्पष्ट करते हुए कहा, “बेशक सरकार को यह अधिकार है कि वह निजी स्थानों पर भी प्रतिमाओं की स्थापना को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून बनाए। लेकिन जब तक ऐसा कोई कानून अस्तित्व में नहीं आता, तब तक केवल परिपत्रों या सरकारी आदेशों के जरिए किसी व्यक्ति के अपनी पट्टा भूमि पर प्रतिमा स्थापित करने के अधिकार को छीना नहीं जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारी आदेश केवल प्रतिमाओं की स्थापना से जुड़ा है, जबकि वर्तमान मामला एक स्तूप स्थापित करने का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में कोई विवाद नहीं है और न ही किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की आशंका है, इसलिए सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि उपरोक्त पूर्व निर्णय इस मामले में भी समान रूप से लागू होगा, चाहे सरकार का आदेश मौजूद क्यों न हो। फिर कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, “इन परिस्थितियों को देखते हुए विवादित मेमो को निरस्त किया जाता है। याचिकाकर्ता को याचिका में उल्लिखित भूमि पर नथम कनवै युद्ध की स्मृति में स्मारक स्तूप स्थापित करने की पूरी स्वतंत्रता है। यह रिट याचिका स्वीकार की जाती है। किसी प्रकार की लागत नहीं लगाई जाती।”

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

‘बांग्लादेश में तो बस एक हिंदू जला है, हम तुम सबको फूँक देंगे’: गुजरात के सानंद में इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं पर की पत्थरबाजी; OpIndia से महिलाएँ बोलीं- मुस्लिमों के कारण घर से बाहर निकलना मुश्किल

गुजरात के अहमदाबाद के कलाना गाँव में एक हिंदू परिवार पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। पुलिस घटना की जाँच कर रही है, लेकिन मामले में बांग्लादेश से जुड़ा पहलू भी सामने आया है। पीड़ितों का कहना है कि बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की हत्या के बाद, गाँव के एक हिंदू युवक द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक पोस्ट से मुस्लिम हमलावर भड़क उठे।

यह बात तब सामने आई जब ऑपइंडिया ने पीड़ितों से मुलाकात की और उनसे बातचीत की। इस घटना में सबसे पहले जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, वह एक हिंदू नाबालिग था। हमले में उसके पिता भी घायल हो गए। उन्होंने अस्पताल में इलाज के दौरान ऑपइंडिया से बात की।

पीड़ित के पिता ने बताया कि उनके बेटे ने बांग्लादेश में दीपू दास की हत्या के बारे में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उसने न्याय की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पोस्ट को देखने के बाद स्थानीय मुस्लिमों ने उसे धमकी दी कि बांग्लादेश में एक हिंदू को जला दिया गया है और अगर उसने ऐसी पोस्ट डाली तो पूरे ठाकुरवास को जला दिया जाएगा।

स्थानीय हिंदू महिलाओं का आरोप: बेटियों और बहनों को लंबे समय से किया जा रहा परेशान

इसके अलावा स्थानीय महिलाओं ने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानीय मुस्लिम पुरुष पिछले 12 महीनों से उन्हें परेशान कर रहे हैं। हिंदू महिलाओं और बेटियों को घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है, उनके प्रति अश्लील इशारे किए जाते हैं। हिंदुओं का आरोप है कि तिलक लगाने पर उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं और गाँव में कोई भी हिंदू त्योहार या उत्सव शांतिपूर्वक नहीं मनाने दिया जा रहा है।

एक अन्य महिला ने आरोप लगाया कि काम से लौटने पर उसके पति या परिवार के अन्य सदस्यों की पिटाई की जाती है। हिंदू बहनों और बेटियों के घर से बाहर निकलने पर उनसे अश्लील इशारे करवाए जाते हैं। उसने माँग की कि आरोपितों को सजा दी जाए और हिंदुओं को न्याय मिले।

अन्य महिलाएँ रोते हुए और अपनी आपबीती सुनाते हुए उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी से न्याय की माँग कर रही थीं। महिलाओं ने बताया कि वे तीन दिनों से बिना भोजन-पानी के ये सब सहन कर रही हैं और अब उन्हें न्याय चाहिए। एक अन्य महिला ने ठाकुर समाज के नेता अल्पेश ठाकुर से भी सवाल किए।

गाँव की एक हिंदू महिला ने पत्थरबाजी के बारे में बताते हुए कहा कि एक ही दिन में इतने सारे पत्थर आना संभव नहीं है और इसके लिए पहले से योजना बनाई गई होगी। उन्होंने बताया कि सुबह उठकर जब वह चाय-पानी कर रही थीं, तभी पत्थरबाजी शुरू हो गई। ऑपइंडिया ने उनके घर के दृश्य भी दिखाए हैं।

फुटेज में दिख रहा है कि पाइपों समेत घर की छत गिर गई है। घर में मौजूद महिला ने बताया कि जब वह कपड़े धो रही थी, तभी छत से पत्थर गिरने लगे। इसके अलावा जहाँ उसका बच्चा सो रहा था, वहाँ भी पत्थर गिरे। उसने बताया कि इतने ज्यादा पत्थर गिर रहे थे कि उसके घर की छत गिर गई।

पूरी घटना क्या थी?

यह पूरी घटना सोमवार (29 दिसंबर 2025) की रात को घटी। इसके बाद मंगलवार (30 दिसंबर 2025) की सुबह भी पथराव हुआ। बाद में पुलिस बल गाँव पहुँचा और तलाशी अभियान चलाया। वहीं दूसरी ओर, कार्रवाई के डर से आरोपित अपने घरों से भागकर गाँव के खेतों में छिप गए, जहाँ ड्रोन की मदद से तलाशी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

एक नाबालिग हिंदू व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख समेत 22 मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने सानंद जीआईडीसी पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 115(2), 352, 351(3), 189(2), 191(2), 190, 194(2), 324(2) और 125(ए) के तहत आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की जाँच शुरू की और बाद में 42 लोगों को हिरासत में लिया।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

हाथ में कुरान, उमर खालिद को चिट्ठी और मोदी से घृणा: साधारण नहीं है जोहरान ममदानी का न्यूयॉर्क में मेयर बनना, समझिए इस्लामी कट्टरपंथी क्यों हैं खुश

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।

ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।

ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।

भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।

ऑपरेशन कगार, नक्सलवाद पर प्रहार और 50 साल का संघर्ष: जानिए 2025 में कैसे मजबूत हुई आतंरिक सुरक्षा, शाह ने लिखी लाल आतंक के खात्मे की पटकथा

जब अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा तय की, तो यह कोई नारा या राजनीतिक दावा नहीं था। यह एक स्पष्ट डेडलाइन थी। डेडलाइन तभी तय की जाती है जब जमीन पर नतीजे साफ दिखने लगते हैं और लड़ाई जीत की ओर अंतिम चरण में पहुँच जाती है।

नक्सलवाद भारत की सबसे लंबी आंतरिक सुरक्षा चुनौती रही है, जो करीब 50 साल तक चली। कई सरकारें बदलीं, बड़े वन क्षेत्र नक्सलियों के गलियारे के नाम से जाने गए और लंबे समय तक सरकार का लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करने से ज्यादा उसे नियंत्रित करना रहा। पहले मुठभेड़, बातचीत और हिंसा कम करने पर जोर दिया जाता था। जीत की बात बहुत संभलकर की जाती थी। लेकिन 2025 में यह सोच पूरी तरह बदल गई।

साल 2025 सिर्फ लाल आतंकियों के साथ मुठभेड़ों की संख्या बढ़ने का साल नहीं था, बल्कि यह नक्सलवाद को व्यवस्थित तरीके से तोड़ने का साल बना। नक्सल संगठन की वरिष्ठ नेतृत्व संरचना टूट गई, उनके सुरक्षित इलाके खत्म हो गए, भर्ती तंत्र कमजोर पड़ गया और लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह गिर गया। कई जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आ गए। सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और उनके ठिकाने एक-एक कर खत्म होते चले गए।

यह सिर्फ प्रगति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे आंदोलन का अंतिम चरण था जो कभी खुद को शोषितों की आवाज बताता था, लेकिन अब केवल डर और हिंसा के सहारे टिका हुआ था। नक्सलवाद के खात्मे का दावा कोई राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि जमीनी आँकड़ों और घटनाओं पर आधारित निष्कर्ष है, जो सभी एक ही दिशा में इशारा करते हैं।

औपचारिक घोषणा भले ही 2026 में हो, लेकिन हकीकत यह है कि 2025 में ही नक्सलवाद की हार तय हो चुकी थी। यह लड़ाई अब पलटने वाली नहीं है। नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

2025 ने सब कुछ क्यों बदल दिया

दशकों तक भारत की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई एक ही चक्र में घूमती रही। किसी बड़े हमले या घात के बाद सुरक्षा बलों का अभियान चलता, फिर उसके बाद बातचीत, संघर्षविराम या राजनीतिक ठहराव आ जाता। लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि काबू में रखना था। सड़कें सुरक्षित रहें, चुनाव शांतिपूर्ण हों, जानमाल का नुकसान कम हो और हिंसा शहरों तक न पहुँचे। नक्सलवाद को एक स्थायी बीमारी की तरह देखा गया, जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। यह सोच 2025 में निर्णायक रूप से टूट गई।

2025 में बदलाव सिर्फ कार्रवाई की तीव्रता का नहीं था, बल्कि इरादे का था। सरकार ने नक्सलवाद को अब इलाके संभालने की समस्या नहीं माना, बल्कि एक ऐसे संगठन के रूप में देखा जिसे जड़ से खत्म करना है। प्रतीकात्मक मौजूदगी की जगह लगातार और स्थायी नियंत्रण पर जोर दिया गया। कुछ दिनों या हफ्तों के लिए नहीं, बल्कि महीनों तक। जो जंगल पहले माओवादी ठिकाने माने जाते थे, वहाँ अब सिर्फ छापे नहीं पड़े, बल्कि उन्हें घेरा गया, नक्शे बनाए गए और स्थायी रूप से कब्जे में लिया गया।

इस दौर में दुविधा की कोई जगह नहीं छोड़ी गई। न संघर्षविराम का दिखावा किया गया और न ही अभियानों के साथ-साथ समानांतर बातचीत चलाई गई। सुरक्षा तंत्र का संदेश साफ था। अब यह दौर जगह देने या बातचीत करने का नहीं, बल्कि पूरी जगह छीन लेने का है।

इस स्पष्टता का सीधा असर जमीन पर दिखा। स्थानीय लोगों को लगा कि सुरक्षा बल अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप से आए हैं, जिससे खुफिया जानकारी की गुणवत्ता बेहतर हुई। नक्सली लड़ाकों को समझ आने लगा कि पहले की तरह भाग निकलने के रास्ते अब बंद हो चुके हैं।

शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडर के बीच दूरी बढ़ती गई। नक्सल आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत समय का इंतजार करने की क्षमता अब उसके खिलाफ काम करने लगी। पहले नक्सलवाद सरकारों के बदलने का इंतजार कर के बचा रहता था। लेकिन 2025 में उसे एक ऐसी ताकत से टकराना पड़ा जो न रुक रही थी, न इंतजार कर रही थी, बस लगातार दबाव बनाकर उसे तोड़ती जा रही थी।

ऑपरेशन कगार और नया सुरक्षा सिद्धांत

अगर 2025 में नक्सलवाद के खिलाफ नीति बदली, तो ऑपरेशन कगार उस नीति को जमीन पर लागू करने का सबसे साफ उदाहरण बना। यह कोई एक दिन की कार्रवाई या सुर्खियाँ बटोरने वाला अभियान नहीं था। यह एक नई रणनीति का नाम बन गया लंबे समय तक चलने वाला, खुफिया जानकारी पर आधारित और बिना किसी समझौते के चलने वाला अभियान है।

ऑपरेशन कगार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसका मकसद सिर्फ नक्सली इलाकों में घुसकर कार्रवाई करना नहीं था, बल्कि इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना था। पहले सुरक्षा बल मुठभेड़ के बाद वापस लौट जाते थे, लेकिन अब वे गहरे जंगलों में टिककर बैठते है, जहाँ पहले पहुँचना भी मुश्किल था।

नक्सलियों के संचार तंत्र को बाधित किया गया, हथियारों के भंडार बरामद हुए, उनके आने-जाने के रास्ते बंद किए गए और ठिकानों को पूरी तरह नष्ट किया गया। जंगल, जो पहले नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने थे, अब उनके लिए बंद क्षेत्र बन गए।

इस अभियान में एक बड़ा बदलाव यह भी था कि लक्ष्य किसे बनाया गया। पहले हमलों के बाद छोटे-छोटे नक्सली दस्तों के पीछे दौड़ा जाता था, लेकिन अब ध्यान इलाका कमांडरों, ज़ोनल नेताओं और वरिष्ठ नक्सली अधिकारियों को खत्म करने पर रहा, जो पूरे संगठन को जोड़े रखते थे।

छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में नक्सलियों की ताकत सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि अनुशासन और नेतृत्व संरचना में थी। जैसे ही यह रीढ़ टूटने लगी, पूरा आंदोलन बिखरने लगा।

तालमेल इस रणनीति की एक और अहम कड़ी थी। केंद्रीय बल, राज्य पुलिस और विशेष जंगल युद्ध इकाइयाँ आपस में रीयल टाइम खुफिया जानकारी साझा करते हुए एक साथ काम कर रही थीं।

अब अभियान न तो संसाधनों की कमी से रुके और न ही राजनीतिक हिचकिचाहट से। जब तक नतीजा नहीं निकला, दबाव लगातार बनाए रखा गया। ऑपरेशन कगार इस नई हकीकत का प्रतीक बन गया कि सरकार अब नक्सली इलाकों में सिर्फ जाती नहीं है, बल्कि उन्हें वापस लेती है और वहाँ टिककर रहती है।

लीडरशिप का सिर कलम करना: माओवादियों की पूरी टॉप कमांड को तोड़ना

नक्सलवाद को निर्णायक गिरावट की ओर ले जाने वाली सबसे बड़ी वजह सिर्फ इलाकों का नुकसान नहीं था, बल्कि उसके नेतृत्व ढाँचे का व्यवस्थित सफाया था। दशकों तक माओवादी आंदोलन झटके सहता रहा, क्योंकि उसकी कमांड चेन सुरक्षित रहती थी। लड़ाके बदले जा सकते थे, लेकिन कमांडर नहीं। 2025 में यही समीकरण पलट गया।

लगातार चले अभियानों में एरिया कमेटी के सदस्य, ज़ोनल कमांडर और वरिष्ठ रणनीतिकार एक-एक कर खत्म किए जाने लगे। ये कोई नाम मात्र के चेहरे नहीं थे, बल्कि वही लोग थे जो हमलों की योजना बनाते थे, भर्ती चलाते थे, पैसों का प्रबंधन करते थे और अलग-अलग नक्सली दस्तों को जोड़कर रखते थे। जब इन दिमागों को हटाया गया, तो आंदोलन सिर्फ कमजोर नहीं हुआ, बल्कि लकवाग्रस्त हो गया। इसका असर तुरंत दिखा।

नेतृत्व या तो मारा गया या लगातार भागता रहा। नतीजा यह हुआ कि स्थानीय दस्तों के पास न दिशा बची, न आदेश। आपूर्ति की कड़ियाँ टूट गईं, खुफिया जानकारियाँ लीक होने लगीं और संगठन के भीतर अविश्वास बढ़ गया। कई इलाकों में नक्सली लड़ाके लड़ने के बजाय बिखर गए।

सबसे अहम बात यह रही कि संगठन के पास कोई भरोसेमंद दूसरी पंक्ति तैयार नहीं थी। पुराना नेतृत्व उम्रदराज़ हो चुका था और नए भर्ती न तो वैचारिक रूप से मज़बूत थे, न ही उनके पास जमीनी लड़ाई का अधिकार या अनुभव था। नतीजतन, जो बचा वह हथियारों से लैस लेकिन नेतृत्वहीन संगठन था।

भीड़ के बजाय कमांड ढाँचे को निशाना बनाकर, सरकार ने वह कर दिखाया जो दशकों की मुठभेड़ें नहीं कर पाईं। उसने माओवादियों की एक संगठित आंदोलन के रूप में काम करने की क्षमता ही तोड़ दी। यही वजह है कि 2025 के बाद नक्सलवाद सिर्फ पीछे नहीं हटा, बल्कि अपने आप बिखरने लगा।

सैकड़ों की संख्या में सरेंडर, सरकार का संदेश: हथियार डालो या मरो

मुठभेड़ें दबाव दिखाती हैं, लेकिन आत्मसमर्पण टूटन का संकेत होता है। 2025 में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की संख्या किसी भी गोलीबारी से ज्यादा बोलती दिखी। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में सैकड़ों नक्सली कैडरों ने हथियार डाल दिए, जिनमें इनामी कमांडर और वरिष्ठ नक्सली नेता भी शामिल थे, जो वर्षों से संगठन के भीतर सक्रिय थे।

ये लोग कोई बाहरी समर्थक नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित लड़ाके और संगठनकर्ता थे, जो आत्मसमर्पण के जोखिमों को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने एक मुठभेड़ के डर से नहीं, बल्कि इसलिए हथियार डाले क्योंकि नेतृत्व खत्म हो चुका था, जंगलों के सुरक्षित ठिकाने टूट चुके थे और भागने के रास्ते बंद हो गए थे। आत्मसमर्पण अब एक वास्तविक और सुरक्षित रास्ता बन चुका था।

सरकार की पुनर्वास नीतियों और सुरक्षा की गारंटी ने यह साफ कर दिया कि हथियार डालना अब कोई जाल नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है। सच्चाई यह है कि कोई विद्रोह सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होता कि वह हथियारों में कमजोर पड़ गया हो। वह तब खत्म होता है, जब उसके अपने लड़ाके लड़ाई को बेकार मानने लगते हैं। 2025 में नक्सलवाद का यही मोड़ सामने आया, जब उसके अपने कैडर ही इस लड़ाई से मुंह मोड़ने लगे।

सीजफायर का शोर और सरकार ने इसे नजरअंदाज क्यों किया

जैसे-जैसे दबाव बढ़ा और माओवादी ढाँचा टूटने लगा, वैसे-वैसे संघर्षविराम की माँगें तेज होने लगीं। इन अपीलों को वामपंथी सोच वाले कुछ कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी के हिस्सों ने आगे बढ़ाया, जो लंबे समय से बातचीत की वकालत करते रहे हैं। लेकिन यह कोई वास्तविक शांति पहल नहीं थी, बल्कि कमजोर पड़ चुके नक्सल आंदोलन की दबाव बनाने की रणनीति थी।

इतिहास गवाह है कि संघर्षविराम का फायदा माओवादी संगठन अक्सर फिर से संगठित होने, हथियार जुटाने और अपनी पकड़ लौटाने के लिए करते रहे हैं। इस बार सरकार ने किसी भी तरह के रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो उसके आत्मविश्वास को दिखाता है।

बातचीत समस्या के समाधान का साधन हो सकती है, लेकिन टूटते हुए आंदोलनों को बचाने का जरिया नहीं। संघर्षविराम की माँग ठुकराकर सरकार ने साफ संदेश दिया कि यह दौर नक्सलवाद के पतन को संभालने का नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने का है।

2026 में औपचारिक घोषणा होगी, युद्ध खत्म हो जाएगा

मार्च 2026 में जब सरकार आधिकारिक रूप से नक्सलवाद के अंत की घोषणा करेगी, तो वह असल जीत का नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक औपचारिकता होगी। निर्णायक बदलाव पहले ही हो चुका है। 2025 तक नक्सल आंदोलन अपना नेतृत्व, इलाकाई पकड़, भर्ती क्षमता और वैचारिक ताकत, ये चारों स्तंभ खो चुका था, जिनके सहारे ऐसे आंदोलन टिके रहते हैं।

अब जो बचा है, वह कोई संगठित ताकत नहीं, बल्कि बिखरे हुए अवशेष हैं। कभी एक सतत नक्सली क्षेत्र माने जाने वाला रेड कॉरिडोर अब अस्तित्व में नहीं है। जो जंगल पहले नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने थे, वहाँ अब लगातार सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। क्रांति की अनिवार्यता का माओवादी दावा अपनी ही अप्रासंगिकता के बोझ तले ढह चुका है।

इसका मतलब यह नहीं कि बंदूकों के शांत होते ही काम खत्म हो जाता है। हिंसा से बाहर आए इलाकों में सुशासन, विकास और लंबे समय तक राजनीतिक जुड़ाव जरूरी होता है। हिंसा से पैदा हुआ खालीपन अगर स्थायी रूप से और साफ तौर पर राज्य द्वारा नहीं भरा गया, तो हालात दोबारा बिगड़ सकते हैं।

लेकिन एक निष्कर्ष अब साफ है और उस पर सवाल उठाना मुश्किल है, भारत नक्सलवाद के सिर्फ पतन को नहीं, बल्कि उसके पूर्ण समापन को देख चुका है। घोषणा भले 2026 में हो, लेकिन हर मायने में नक्सलवाद का अंत 2025 में ही हो गया था।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी टीम के ध्रुव मिश्रा की है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

GROK इस लड़की को बिन कपड़े के दिखाओ… X पर खुलेआम एलन मस्क के ‘स्पाइसी AI’ से की जा रही ऐसी डिमांड: महिलाओं की निजता और सुरक्षा को लेकर उठे कई सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बेहद परेशान करने वाला ट्रेंड सामने आया है। लोग महिलाओं की सामान्य तस्वीरों पर xAI द्वारा बनाए गए एलन मस्क के AI चैटबॉट Grok को टैग करके उनसे महिलाओं के कपड़े बदलने, उन्हें बिकिनी पहनाने या और ज्यादा बोल्ड और अश्लील दिखाने को कह रहे हैं।

मई 2025 से Grok के लिए जानबूझकर नियम काफी ढीले रखे गए हैं। अब जब ऐसे अनुरोध बड़ी संख्या में आ रहे हैं, तो यह चैटबॉट बिना झिझक तस्वीरें एडिट करके महिलाओं को सेक्सुअल तरीके से प्रस्तुत कर रहा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये AI से बदली गई तस्वीरें बिल्कुल असली जैसी दिखती हैं।

सीधे तौर पर कहें तो अजनबी लोग महिलाओं की तस्वीरें, जो अक्सर बिल्कुल सामान्य और गैर-यौन संदर्भ (non-sexual context) में शेयर की गई होती हैं, उसे उठा रहे हैं और सबके सामने एक AI से उन्हें ‘नंगा’ करने को कह रहे हैं।

Grok ऐसी तस्वीरें बनाकर जवाब दे रहा है, जिनमें महिलाएँ बिकिनी या इसी तरह के कपड़ों में दिखाई देती हैं। हैरानी की बात यह है कि अगर कोई यूजर महिला की पोज को भी वासना से भरा हुआ बनाने को कहता है, तो Grok वह भी कर देता है।

इसका असर तुरंत और साफ दिख रहा है। X पर Grok के रिप्लाई सेक्शन में ऐसे गैर-सहमति से बदले गए फोटो की भरमार हो गई है, जिससे भारी नाराजगी फैल रही है। दिलचस्प बात यह है कि Grok के X अकाउंट का मीडिया टैब बंद कर दिया गया है, लेकिन अगर कोई रिप्लाई सेक्शन में जाए, तो वहाँ अब भी ऐसी तस्वीरें भरी पड़ी हैं।

आमतौर पर AI चैटबॉट निजी माहौल में काम करते हैं। OpenAI का ChatGPT भी कुछ हद तक ऐसी इमेज बनाने की क्षमता रखता है, लेकिन वह सब निजी चैट तक सीमित रहता है। Grok यह सब खुलेआम, सबके सामने कर रहा है।

जो कंटेंट बाकी जगहों पर ब्लॉक हो जाता है या निजी चैट तक सीमित रहता है, वह यहाँ सार्वजनिक रूप से दिख रहा है। इससे अपमान, शर्मिंदगी और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। जब OpIndia ने खुद Grok से पूछा कि यह सब क्यों हो रहा है, तो Grok ने जवाब दिया कि एलन मस्क ने उसे जानबूझकर ‘स्पाइसी’ AI के रूप में पेश किया है, जिसमें बाकी AI की तुलना में कम पाबंदियाँ हैं।

ग्रोक का ऑपइंडिया को दिया गया जवाब

मस्क खुद कह चुके हैं कि Grok उन सवालों के जवाब देगा, जिनसे दूसरे AI बचते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि Grok हर सीमा को धकेल रहा है और लापरवाह बन गया है। भले ही वह पूरी नग्नता से इनकार करता हो, लेकिन गैर-सहमति वाले सेक्सुअल कंटेंट की बिल्कुल सीमा तक पहुँच जाता है। कुछ यूजर्स का तो यह भी दावा है कि थोड़ी चालाकी से नग्नता की रोक भी पार की जा सकती है।

Grok का यह रवैया Google के Gemini या OpenAI के ChatGPT से बिल्कुल अलग है। ये दोनों बेहद लोकप्रिय AI हैं और निजी आउटपुट में भी सख्त फिल्टर लगाते हैं। कहीं अगर गलती हो भी जाए, तो उसका दायरा सीमित रहता है। Grok के मामले में नुकसान इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसका आउटपुट सार्वजनिक होता है।

यह भी देखा गया है कि Grok की टाइमलाइन लगभग पूरी तरह महिलाओं को डिजिटल तरीके से ज्यादा बोल्ड बनाने वाली तस्वीरों से भरी रहती है। जो एक सामान्य AI टूल होना चाहिए था, वह voyeurism (ताक-झाँक) की सार्वजनिक गैलरी बन गया है।

नैतिक प्रभाव, महिलाओं की सहमति और गरिमा

यह ट्रेंड सहमति, स्वायत्तता और गरिमा जैसे बुनियादी नैतिक मूल्यों पर सीधा हमला है। महिलाओं की तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना बदली जा रही हैं और उन्हें बिकिनी में दिखाया जा रहा है। यह AI का कोई अच्छा प्रयोग नहीं है, बल्कि निजता का खुला उल्लंघन है।

इस तरह की हरकतें महिलाओं की डिजिटल स्वायत्तता छीन लेती हैं और उन्हें मनोरंजन, ट्रोलिंग या उत्पीड़न का सामान बना देती हैं। यह image-based sexual abuse है, जिसे आज गंभीर मानसिक आघात देने वाला उत्पीड़न माना जाता है।

एक कानूनी विशेषज्ञ के शब्दों में, यह गलती से हुआ महिला-विरोध नहीं है, बल्कि डिजाइन से किया गया है। Grok की ढीली और उकसाने वाली सोच इस तरह के दुरुपयोग को आसान बनाती है और उसे सार्वजनिक मंच देकर और बढ़ावा देती है।

डिजिटल सहमति को भी असली दुनिया की सहमति जितना ही गंभीर माना जाना चाहिए। ऑनलाइन शेयर की गई तस्वीर किसी को उसे सेक्सुअल रूप से बदलने की इजाजत नहीं देती। बिना अनुमति किसी सामान्य फोटो को सेक्सुअल फोटो में बदलना डीपफेक पोर्न और मॉर्फिंग जैसे अपराधों जैसा ही है।

इसका नुकसान केवल सैद्धांतिक नहीं है। पीड़ित महिलाओं को शर्मिंदगी, बदनामी, डर और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई महिलाएँ यह सब देखकर ऑनलाइन फोटो डालना ही बंद कर रही हैं, जो महिलाओं की डिजिटल मौजूदगी पर डर का साया डाल देता है।

इसका सांस्कृतिक नुकसान भी है। अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह और खतरनाक डीपफेक, ब्लैकमेल और रिवेंज पोर्न तक पहुँच सकता है। Grok द्वारा इस व्यवहार को ‘मजेदार’ बताना इसकी असलियत को छिपाता है। यह बड़े पैमाने पर गैर-सहमति से किया गया यौन शोषण है, जो डिजाइन संबंधी विकल्पों के कारण संभव हुआ है और सार्वजनिक वितरण द्वारा और भी बढ़ गया है।

भारत में कानूनी पहलू और डिजिटल अधिकार

भारत में कानून के लिहाज से देखें तो किसी महिला की फोटो को बिना अनुमति सेक्सुअल इमेज में बदलना केवल अनैतिक ही नहीं, बल्कि गैरकानूनी भी हो सकता है। भले ही कानून में डीपफेक शब्द साफ तौर पर न लिखा हो, लेकिन कई धाराएँ ऐसे कृत्यों को कवर करती हैं।

आईटी एक्ट की धारा 66E निजता के उल्लंघन को दंडित करती है। भले ही बिकिनी को नग्नता न माना जाए, लेकिन AI से बनाई गई ऐसी तस्वीरें महिला की निजता और गरिमा पर हमला करती हैं। IPC की धारा 354D साइबर स्टॉकिंग से जुड़ी है। अगर किसी महिला को बार-बार इस तरह टारगेट किया जाए या उसकी बदली हुई तस्वीरें फैलायी जाएँ, तो यह ऑनलाइन उत्पीड़न माना जा सकता है।

IT एक्ट की धारा 67 और 67A अश्लील कंटेंट फैलाने पर रोक लगाती हैं। अगर AI आउटपुट ज्यादा अश्लील हो जाता है, तो उसे शेयर करने वाले जिम्मेदार हो सकते हैं। धारा 509, मानहानि के कानून और महिलाओं का अशोभनीय चित्रण निषेध अधिनियम भी लागू हो सकते हैं।

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत फोटो व्यक्तिगत डेटा है और बिना सहमति उसका इस्तेमाल कानून के खिलाफ है। IT रूल्स 2021 के अनुसार, प्लेटफॉर्म को ऐसे कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई करनी होती है।

भारतीय अदालतें भी अब डीपफेक जैसे मामलों को गंभीरता से ले रही हैं। कई हस्तियों को AI से बने फर्जी कंटेंट के खिलाफ राहत मिली है। अदालतें साफ कह चुकी हैं कि बिना अनुमति किसी की तस्वीर या पहचान का इस्तेमाल उसकी गरिमा और निजता का उल्लंघन है।

पीड़ित महिलाओं के पास क्या हैं विकल्प

अगर किसी भारतीय महिला की तस्वीर का इस तरह दुरुपयोग होता है, तो उसके पास रास्ते मौजूद हैं। सबसे पहले सबूत इकट्ठा करें, जैसे स्क्रीनशॉट, लिंक, यूजरनेम और समय। X पर रिपोर्ट करें और साफ लिखें कि तस्वीर बिना सहमति बदली गई है।

स्थानीय साइबर क्राइम सेल या पुलिस में शिकायत दर्ज कराएँ। राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल और राष्ट्रीय महिला आयोग से भी संपर्क किया जा सकता है। साइबर सुरक्षा एनजीओ या कानूनी सहायता संस्थाओं से मदद लें। दोष खुद पर न लें, गलती तकनीक का दुरुपयोग करने वालों की है। जरूरत पड़े तो कोर्ट से आदेश लेकर कंटेंट हटवाया जा सकता है।

यह पूरा मामला जवाबदेही, सख्त मॉडरेशन और सोच में बदलाव की माँग करता है। Reddit जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही गैर-सहमति वाले पोर्न और डीपफेक पर रोक लगा चुके हैं। पुराने ट्विटर में भी ऐसी नीतियाँ थीं। आज का X, इसके उलट, ऐसा AI होस्ट कर रहा है जो यही सब पैदा कर रहा है।

xAI और X को तुरंत सख्त नियम लागू करने होंगे। ‘एजि’ या ‘बोल्ड’ होने के नाम पर सहमति तोड़ने की कोई नैतिक या तकनीकी वजह नहीं हो सकती। अगर बाकी AI किसी की तस्वीर बिना अनुमति बदलने से इनकार कर सकते हैं, तो Grok भी कर सकता है। प्लेटफॉर्म स्तर पर भी साफ रिपोर्टिंग, तेज कार्रवाई और बार-बार गलती करने वालों पर बैन जरूरी है।

इसके साथ-साथ सोच में बदलाव भी जरूरी है। महिलाओं को डिजिटल तरीके से उतारने की उत्सुकता समाज की गहरी समस्या दिखाती है। डिजिटल सहमति पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि AI कुछ कर सकता है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे बिना जिम्मेदारी इस्तेमाल किया जाए। xAI को तो कदम उठाने ही होंगे, लेकिन यूजर्स को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

BJP के बढ़ते कदम और INDI गठबंधन में डर: जानिए 2026 में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में किसकी होगी असली परीक्षा, TMC से लेकर DMK की साख है दांव पर

भारत में 2026 का साल सियासी नजरिए से काफी अहम है। इस दौरान देश के 4 प्रमुख राज्यों और 1 केन्द्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी में चुनाव होने वाले हैं। इसके अलावा यूपी में स्थानीय निकाय चुनाव भी होने वाला है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए काफी अहम है। जहाँ चुनाव होने हैं, उनमें पूर्व में पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर का असम, दक्षिण के तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी शामिल है।

विपक्ष की साख दांव पर

इनमें से तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विपक्षी INDI गठबंधन की सरकार है। असम और पुद्दचेरी में एनडीए सरकार है। इस लिहाज से देखा जाए तो 2026 का चुनाव विपक्ष के लिए काफी अहम है। उनकी साख दांव पर है। क्योंकि ये राज्य राजनीतिक ताकत, मनोवैज्ञानिक बढ़त और 2029 की राष्ट्रीय रणनीति—तीनों को तय करने वाला है। ये चुनाव तय करेगा कि विपक्ष की 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति क्या होगी। इन तीन राज्यों में बीजेपी कभी सत्ता में नहीं रही। इसलिए बीजेपी के पास खोने के लिए इन राज्यों में कुछ भी नहीं है।

ममता की ‘एकला चलो रे’ की नीति

पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की। पिछले 15 सालों से लेफ्ट को सत्ता से हटा कर सत्तासीन हुई ममता बनर्जी की टीएमसी यूँ तो इंडी गठबंधन का हिस्सा है, जिसमें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट दोनों पार्टियाँ हैं। लेकिन, बंगाल में ममता बनर्जी न तो कॉन्ग्रेस को उभरने देना चाहती है और न ही लेफ्ट की बैसाखी पर चलना चाहती है। वह अपने दम पर चुनाव जीतना चाहती हैं। इसलिए पिछले चुनाव में भी ‘एकला चलो रे’ की नीति का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ रही है।

चुनाव जीतने के लिए नित योजनाओं की घोषणा हो रही है। एसआईआर का विरोध कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़े करने की कोशिश हो रही है। इसके अलावा बंगाली अस्मिता का सवाल उठा कर लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। बंगाल में अगर तृणमूल कांग्रेस जीत जाती है तो INDI गठबंधन में उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी।

आगामी लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को झुका कर ममता बनर्जी दिल्ली का रास्ता तय करने की कोशिश कर सकती हैं। वह राज्य की जिम्मेदारी अपने भतीजे अभिषक बनर्जी को सौंप सकती है। ये दावा कर सकती हैं कि लगातार हार रहे विपक्ष को उन्होंने हौसला दिया है और बीजेपी के जीत के अभियान पर ब्रेक लगाया है।

वहीं बीजेपी भी अपना पूरा दमखम बंगाल में लगा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिया, भ्रष्टाचार, घोटाला, महिला सुरक्षा, डेमोग्राफी जैसे मुद्दे के दम पर वह हिन्दू वोटरों को एकीकृत करने की कोशिश कर रही है। साथ ही वादा कर रही है कि राज्य में अगर बीजेपी सत्ता में आई तो विकास की बयार बहेगी।

तमिलनाडु दक्षिण भारत का सबसे मजबूत भाजपा-विरोधी किला माना जाता है। तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके की सरकार है। कॉन्ग्रेस इसे समर्थन करती है। तमिलनाडु में जीत से इंडी गठबंधन कह सकता है कि दक्षिण भारत पूरी तरह विपक्ष के साथ है। एनडीए कहीं नहीं है। उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत की राजनीति के लिए ये निर्णायक है, यानी मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में तमिलनाडु काफी अहम है।

बंगाल- तमिलनाडु को जीतने में जुटी बीजेपी

मौजूदा भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं। इन दोनों गढ़ों का राजनीतिक रूप से ढहना देश में विपक्ष की आवाज के काफी कमजोर पड़ जाने का संकेत होगा। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अब तक इन दोनों अभेद्य राजनीतिक किलों को भेदने में सफल नहीं हो सकी है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में यह जोड़ी पूरी तैयारी और उम्मीद के साथ पहली बार इन दुर्गों को फतह करने के इरादे से मैदान में उतरेगी।

तमिलनाडु में बीजेपी चुनाव दर चुनाव अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में, बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राज्य की सभी 39 सीटें गंवा दी थी और DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया था। हालाँकि बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा था। लोकसभा चुनाव 2019 में यह 3.7% से बढ़कर 2024 में 11.24% हो गया। यह राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे अधिक वोट शेयर है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 4 सीटें जीती थीं। तमिलनाडु की छोटी छोटी पार्टियों को लेकर लोकसभा चुनाव 2024 में उतरी बीजेपी इस बार पूरा जोर लगा रही है। एनडीए की पूर्व सहयोगी एआईएडीएमके को भी साथ लेने की कोशिश की जा रही है।

जीतने पर स्टालिन का बढ़ जाएगा दबदबा

अगर स्टालिन अपने राजनीतिक दुर्ग को सुरक्षित रखने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की रणनीति और मुद्दों के निर्धारण में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा। वे खुद को उस तरह की केंद्रीय भूमिका में देखने लगेंगे, जैसी भूमिका एन.टी. रामाराव ने 1990 के दशक में निभाई थी। रामाराव ने उस वक्त केंद्र की राजीव गाँधी की सरकार को चुनौती देने के लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर दी थी। इस वक्त केन्द्र में मोदी सरकार है इसलिए डीएमके अपनी ताकत इंडी गठबंधन में वर्चस्व स्थापित करने में लगा सकता है।

केरल में उपस्थिति दर्ज करा चुकी है बीजेपी

केरल में बीजेपी का कमल स्थानीय निकाय चुनाव में खिला है। पार्टी ने 40 साल से कब्जा वाले तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत दर्ज की। इससे पार्टी काफी उत्साहित है। बीजेपी ने त्रिशूर लोकसभा सीट भी जीती थी। हालाँकि राज्य में लेफ्ट की सरकार है और कॉन्ग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। दोनों पार्टियाँ इंडी गठबंधन में शामिल हैं। ऐसे में बीजेपी का पूरा फोकस राज्य में कॉन्ग्रेस की यूडीएफ को बेदखल कर मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है।

इसके लिए हिन्दुओं को पार्टी साथ ला रही है, जो अब तक वामपंथी दलों के साथ रहे हैं। धर्मांतरण जैसे मुद्दे बीजेपी जोरशोर से उठा रही है। अगर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट को विधानसभा चुनाव में कमजोर करने में बीजेपी सफल होती है, तो बीजेपी की मनोवैज्ञानिक जीत होगी और इंडी गठबंधन काफी कमजोर हो जाएगा। यूँ भी पूरे देश में लेफ्ट के पास एकमात्र राज्य केरल बचा है। यहाँ से जाने का मतलब है देश से कम्यूनिस्टों का खात्मा।

असम बीजेपी का ‘अजय किला’

पूर्वोत्तर में भाजपा का सबसे मज़बूत राज्य असम है। यह पूर्वोत्तर के ‘अभेद्य किले’ की तरह है। असम विधानसभा चुनाव इंडी गठबंधन के लिए सबसे मुश्किल लेकिन सबसे अहम है। इसकी जीत से पूर्वोत्तर का द्वार विपक्ष के लिए खुल जाएगा। लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाली हिमंता सरकार यहाँ जमकर पसीना बहा रही है। केन्द्र की योजनाओं का लोगों को फायदा हुआ है। रेलवे से कनेक्शन और सड़कों से सुदूर इलाकों का जुड़ना जनता को काफी फायदा पहुँचा रहा है।

बीजेपी ने राज्य में घुसपैठ के खिलाफ अभियान चला रखा है। घुसपैठियों को राज्य से बाहर करने और एसआईआर के द्वारा उनकी पहचान की जा रही है। अब देखना होगा कॉन्ग्रेस अपना वजूद यहाँ बचा पाती है या नहीं। पुद्दुचेरी विधासभा में बीजेपी-एआईएडीएमके के साथ कॉन्ग्रेस-डीएमके गठबंधन की टक्कर है। इस केन्द्र शासित प्रदेश को लेकर भी दोनों गठबंधन आमने-सामने हैं।

सबको कोर्ट ने कर दिया बरी, फिर 19 साल के विशाल कुमार को चाकुओं से गोदकर किसने मार डाला?: केरल के कॉलेज में हुई थी ABVP वर्कर की हत्या, पढ़िए अदालत के फैसले की डिटेल

केरल के मावेलिक्कारा की एक एडिशनल सेशंस कोर्ट ने मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को साल 2012 के चर्चित विशाल कुमार हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में नामजद सभी 20 आरोपितों को बरी कर दिया है। जज पीपी पूजा ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) आरोपितों के खिलाफ लगे आरोपों को बिना किसी शक के साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। ऑपइंडिया के पास इस केस के फैसले की कॉपी मौजूद है।

अदालत ने अपने फैसले में इस बात से इनकार नहीं किया कि ABVP कार्यकर्ता विशाल कुमार की हत्या हुई थी, लेकिन कानूनी तौर पर यह साफ नहीं हो सका कि असल में यह हत्या किसने की। कोर्ट के मुताबिक, सबूतों के अभाव में इतनी बड़ी भीड़ को इस अपराध के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, दूसरी ओर सरकारी पक्ष ने कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।

यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए किसी गहरे जख्म की तरह है। ऐसा इसलिए नहीं कि कोर्ट से बिना सबूत सजा देने की उम्मीद थी, बल्कि इसलिए क्योंकि बरी करने के जो कारण बताए गए, उन्होंने पूरी व्यवस्था की नाकामी को उजागर कर दिया। कोर्ट के फैसले से साफ हुआ कि जिस दिन विशाल की हत्या हुई, उसी दिन से शुरू हुई जाँच में बुनियादी कमियाँ थीं। पुलिस न तो शुरुआती बयान को ठीक से दर्ज कर पाई, न ही समय पर कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई। इसके अलावा, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे और पहचान की प्रक्रिया व हथियारों की बरामदगी में भी भारी गड़बड़ी थी।

सिस्टम की इन लापरवाहियों की वजह से मामले में इतने छेद और विरोधाभास पैदा हो गए कि एक भीड़भाड़ वाले कैंपस में हुई हत्या का कानूनी नतीजा यह निकला कि किसी को सजा नहीं दी जा सकी। अंत में यह मामला एक ऐसी दुखद सुर्खी बनकर रह गया कि 13 साल पहले एक युवा ABVP कार्यकर्ता की सरेआम चाकू मारकर हत्या कर दी गई, लेकिन कानून की नजर में उसे ‘किसी ने नहीं मारा’।

जुलाई 2012 का कैंपस हत्याकांड

यह घटना जुलाई 2012 की है, जब विशाल कुमार सिर्फ 19 साल के थे। वह चेंगनूर के रहने वाले थे और कोन्नी के एनएसएस (NSS) कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष के छात्र होने के साथ-साथ ABVP के एक्टिव कार्यकर्ता भी थे। 16 जुलाई की सुबह, वह नए छात्रों का स्वागत करने के लिए क्रिश्चियन कॉलेज पहुँचे थे। सरकारी पक्ष के अनुसार, वहाँ ‘कैंपस फ्रंट’ के कुछ सदस्य आए और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के साथ गाली-गलौज और बहस करने लगे।

देखते ही देखते यह बहस हिंसक झड़प में बदल गई, जिसमें चाकू और अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया गया। विशाल बीच-बचाव कर मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे थे, उन पर ही चाकू से हमला कर दिया गया। इस हमले में विशाल के अलावा विष्णुप्रसाद और श्रीजीत नाम के दो अन्य ABVP कार्यकर्ता भी घायल हुए थे।

हमले के तुरंत बाद विशाल को चेंगन्नूर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें कोट्टायम मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन अगले दिन तड़के विशाल ने दम तोड़ दिया। यह कोई ऐसी घटना नहीं थी जो किसी सुनसान जगह या अकेले में हुई हो। यह सब कुछ एक कॉलेज के गेट के बाहर हुआ, जहाँ राजनीति की वजह से माहौल पहले से ही गरमाया हुआ था और उस वक्त वहाँ सैकड़ों छात्र मौजूद थे।

यह जानकारी बेहद अहम है क्योंकि कोर्ट के फैसले में बार-बार एक ही बात सामने आई- ऐसी स्थिति में, जहाँ घटना सैकड़ों लोगों के सामने हुई हो, सरकारी पक्ष (Prosecution) को या तो बहुत मजबूत और स्वतंत्र सबूत पेश करने चाहिए थे या फिर अपने मुख्य गवाहों के जरिए एक ऐसी कहानी रखनी चाहिए थी जिसमें कोई बदलाव या शक की गुंजाइश न हो। लेकिन, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष की दलीलों में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया जिससे आरोपितों का दोष पक्का हो सके।

कौन थे आरोपित और क्यों गहराया सियासी साया?

अदालत ने जिन 20 लोगों को बरी किया है, उन्हें ‘कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया’ (CFI) का सदस्य बताया गया था। यह संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (PFI) की छात्र शाखा थी, जिस पर भारत सरकार ने सितंबर 2022 में प्रतिबंध लगा दिया था। इस मामले में एक अन्य आरोपित घटना के समय नाबालिग था, इसलिए उसका केस अलग कर दिया गया और उसकी सुनवाई अलाप्पुझा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) में चल रही है।

कोर्ट द्वारा बरी किए गए लोगों की सूची में आशिक, शफीक, अंसार फैसल, आसिफ मोहम्मद, नसीम, सानुज, अल्थाज, समीर राऊथर, सफीर, अफजल, अब्दुल वहाब, शिबिन हबीब, शाहजहां मौलवी, नवाज शरीफ, समीर, सजीव और सलीम जैसे नाम शामिल थे।

इन सभी पर हत्या, घातक हथियारों के साथ गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा होने, दंगा भड़काने, बंधक बनाने और साजिश रचने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगे थे। कुछ लोगों पर आरोपितों को शरण देने का भी आरोप था। दूसरी ओर, बचाव पक्ष (डिफेंस) का तर्क था कि मामले को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया ताकि राजनीति के चलते ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसमें फँसाया जा सके। उनका कहना था कि हमला सिर्फ एक व्यक्ति ने किया था, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए बाकी लोगों को भी इस ट्रायल में घसीट लिया गया।

निष्कर्ष के तौर पर, अदालत का फैसला बचाव पक्ष के तर्कों के काफी करीब रहा। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि कोर्ट ने बचाव पक्ष की हर बात मान ली, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि सरकारी पक्ष (Prosecution) सजा दिलाने के लिए जरूरी कड़े कानूनी मापदंडों और सबूतों को पेश नहीं कर पाया।

यहीं पर पीड़ित के नजरिए से मामले को देखना जरूरी हो जाता है। भले ही सबूतों की कमी होने पर अदालतों को आरोपितों को बरी करना पड़ता है, लेकिन असली सवाल यह है कि सबूत इतने कमजोर क्यों रह गए? कोर्ट के फैसले ने जाँच में उन कमियों की ओर इशारा किया है जिनसे बचा जा सकता था। ये कमियाँ सीधे तौर पर पुलिस और सरकारी पक्ष की उन नाकामियों को उजागर करती हैं, जिन्हें अगर समय रहते सुधारा जाता तो शायद नतीजा कुछ और होता।

तेरह साल की यात्रा और देरी की कीमत

शुरुआत में इस मामले की जाँच स्थानीय पुलिस ने की थी, जिसे बाद में क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। पुलिस ने नाबालिग सहित कुल 20 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। पूरे ट्रायल के दौरान सरकारी पक्ष ने 55 गवाहों और 205 दस्तावेजों को अदालत के सामने पेश किया और समय-समय पर कई अधिकारियों ने इस केस की कमान संभाली।

अक्सर देखा जाता है कि जब केस सालों तक खिंचता है, तो गवाह अपनी बात से मुकरने लगते हैं और पुरानी यादें धुंधली हो जाती हैं, जिसका असर केस पर पड़ता है। लेकिन इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि केस की कमजोरियाँ केवल समय बीतने की वजह से नहीं थीं। जाँच में कई बड़ी खामियाँ तो पहले दिन से ही मौजूद थीं, जैसे शुरुआती जानकारी (FIR) को सही ढंग से दर्ज न करना, गवाहों की पहचान की सही प्रक्रिया का पालन न करना और बरामद किए गए सबूतों को दस्तावेजों में ठीक से पेश न कर पाना।

अदालत के इस फैसले को एक सबक की तरह देखा जाना चाहिए कि कैसे कानूनी प्रक्रिया में ‘संदेह का लाभ’ पैदा होता है। यहाँ अपराध तो साफ था, लेकिन पुलिस ने केस को कानूनी कसौटी पर इतनी मजबूती से खड़ा नहीं किया कि वह अदालत की जिरह का सामना कर पाता।

पहली खामी: केस का शुरुआती वर्जन ही निकला कमजोर

अदालत के फैसले में सरकारी पक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कोर्ट ने माना कि केस की शुरुआती जानकारी (FIR) और उससे जुड़े दस्तावेजों के साथ हेरफेर की गई थी। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पुलिस का यह दावा भरोसे के लायक नहीं है कि घटना की रिपोर्ट सुबह 11:45 बजे लिखनी शुरू कर दी गई थी।

बचाव पक्ष की दलीलों में दम पाते हुए कोर्ट ने नोट किया कि दस्तावेजों को असली समय से पहले का दिखाने की कोशिश की गई (Antitimed) और शायद तारीखें भी पीछे की डाली गई थीं। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि ये कागजात घटना के अगले दिन, यानी 17 जुलाई 2012 को सुबह 10:45 बजे कोर्ट पहुँचे थे। कोर्ट ने साफ कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि पुलिस ने कागजी कार्रवाई में जानबूझकर समय और तारीखों का खेल किया था।

यह कोई छोटी-मोटी तकनीकी गलती नहीं थी। किसी भी आपराधिक मामले में, शुरुआत में दी गई जानकारी (FIR) जितनी जल्दी और भरोसेमंद तरीके से दर्ज होती है, केस उतना ही मजबूत होता है। लेकिन जब शुरुआती कहानी ही शक के घेरे में आ जाए, तो पूरी जाँच ऐसी लगने लगती है जैसे उसे बाद में अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ा गया हो। खासकर तब, जब बाद में दिए गए बयानों में नए नाम, भूमिकाएँ और मकसद जोड़ दिए जाते हैं जो शुरुआत में कहीं थे ही नहीं।

कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि पुलिस स्टेशन में सूचना कब मिली और उसे कैसे दर्ज किया गया, ये दावे भी भरोसे लायक नहीं हैं। कानून का सीधा सा नियम है- अगर अदालत शुरुआती कहानी को ही संदिग्ध मान ले, तो बाद में गवाहों द्वारा जोड़े गए नए तथ्यों को ‘कहानी में मिर्च-मसाला’ मानकर खारिज करना बहुत आसान हो जाता है।

दूसरी बड़ी बात: पुलिस ने आधी-अधूरी और एकतरफा कहानी सुनाई

अदालत के फैसले का एक अहम हिस्सा उस टकराव की वजह और वहाँ मौजूद अन्य छात्र संगठनों से जुड़ा था। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) ने यह छिपाया कि असल में विवाद शुरू कैसे हुआ था। उन्होंने सिर्फ ABVP सदस्यों के पक्ष को ही सामने रखा, जिससे पुलिस की पूरी कहानी शक के घेरे में आ गई।

अदालत की यह टिप्पणी बेहद गंभीर है क्योंकि यह सिर्फ किसी गवाह के बयान बदलने का मामला नहीं था। जज ने माना कि पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में पूरी सच्चाई पेश नहीं की- जैसे कि विवाद की असली जड़ क्या थी, वहाँ कौन-कौन लोग मौजूद थे और वह झड़प वास्तव में कैसे शुरू हुई थी। इस अधूरे सच की वजह से पूरा केस कानूनी तौर पर कमजोर साबित हुआ।

कॉलेज कैंपस जैसे राजनीतिक माहौल में हुई घटनाओं के मामले में अदालतें निष्पक्षता और ठोस सबूतों की उम्मीद करती हैं। अगर मौके पर कई अलग-अलग गुट मौजूद थे, तो कोर्ट यह उम्मीद करता है कि पुलिस या तो स्वतंत्र गवाह पेश करे या कम से कम पूरी घटना का एक निष्पक्ष और साफ मंजर अदालत के सामने रखे। कोर्ट की सख्ती यह इशारा करती है कि इस केस की जाँच और सुनवाई के दौरान इन बुनियादी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया, जिससे पूरी कहानी एकतरफा नजर आई।

जब चश्मदीद ही नहीं जीत पाए कोर्ट का भरोसा

सरकारी पक्ष ने अपना पूरा भरोसा घायल चश्मदीदों पर टिकाया था, जो घटना के वक्त विशाल के साथ थे। आमतौर पर अदालतों में घायल गवाहों की बात को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि वे मौके पर मौजूद थे और असली हमलावरों को छोड़कर किसी निर्दोष को फँसाने का उनका कोई इरादा नहीं होगा।

लेकिन, कोर्ट फिर भी गवाहों की सच्चाई, उनकी बातों में तालमेल और कानूनी प्रक्रिया की बारीकी से जाँच करता है। इस मामले में, कोर्ट ने बार-बार पाया कि शुरुआती बयानों में बहुत सी बातें गायब थीं, जिन्हें बाद में जोड़कर सुधारने की कोशिश की गई। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या गवाह आरोपितों को पहले से जानते थे? कोर्ट ने कहा कि अगर मुख्य गवाह आरोपितों को पहले से जानता था, जैसा कि उसने बाद में दावा किया, तो यह बात पहली रिपोर्ट (FIR) में ही होनी चाहिए थी। शुरू में इन जानकारियों का न होना आरोपितों की पहचान, वहाँ उनकी मौजूदगी और उनकी भूमिका पर गहरा शक पैदा करता है।

यहीं पर जाँच में देरी और लचर दस्तावेजीकरण का खामियाजा भुगतना पड़ा। नियम यह है कि अगर गवाह हमलावरों को पहले से जानता है, तो वह बात तुरंत रिकॉर्ड होनी चाहिए। और अगर वह उन्हें नहीं जानता, तो पुलिस को कानूनी तरीके से ‘शिनाख्त परेड’ (Identification Procedure) करानी चाहिए थी। पुलिस और सरकारी पक्ष दोनों ही मोर्चों पर फेल रहे। उन्होंने न तो शुरू में आरोपितों की पहचान दर्ज की और न ही बाद में अनजान हमलावरों की सही तरीके से पहचान करवाई। इसी उलझन और लापरवाही की वजह से पूरा केस कोर्ट में टिक नहीं पाया।

बड़ी कानूनी चूक: पहचान परेड न होने से मिला आरोपितों को फायदा

अदालत के फैसले में बार-बार एक ही बड़ी कमी सामने आई- आरोपितों की पहचान से जुड़े सबूतों की कमजोरी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले के हालात को देखते हुए, बिना ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (शिनाख्त परेड) के केवल गवाहों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब गवाहों ने समय के साथ अपने बयानों में बदलाव किए हों, जिससे उनकी विश्वसनीयता कम हो गई हो।

कम से कम एक आरोपित के मामले में तो यह नोट किया गया कि किसी भी गवाह ने शिनाख्त परेड के जरिए उसकी पहचान नहीं की थी। असल में, सरकारी पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार ही नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि कई आरोपितों की पहचान सही कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई थी।

यह कोई छोटी चूक नहीं थी। जब आरोपित पहले से परिचित न हों, तो ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह गवाह की याददाश्त और पहचान की शुद्धता को तब सुरक्षित कर लेती है जब यादें ताजा होती हैं और गवाह ने मीडिया या पुलिस के जरिए आरोपितों की तस्वीरें न देखी हों।

जब पुलिस इस कदम को छोड़ देती है, तो बरसों बाद अदालत में खड़े होकर आरोपित की तरफ उंगली उठाना बेअसर हो जाता है, क्योंकि तब बचाव पक्ष आसानी से कह सकता है कि गवाह सिर्फ उसी व्यक्ति की तरफ इशारा कर रहा है जिसे पुलिस ने ‘आरोपित’ बताया है।

भीड़ द्वारा किए गए हमले के मामलों में पहचान और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति की मौके पर मौजूदगी ही पुख्ता तरीके से साबित नहीं हो पाती, तो पूरे समूह को दोषी ठहराने का कानूनी आधार ही ढह जाता है।

असली मकसद पर सवाल: शुरू में गायब था ‘लव जिहाद’ का दावा

सरकारी पक्ष ने दलील दी थी कि विशाल की हत्या का एक कारण यह भी था कि वह ‘लव जिहाद’ जैसी गतिविधियों का विरोध कर रहा था। लेकिन अदालत के फैसले ने इस दावे की पोल खोल दी। जज ने नोट किया कि शुरुआती बयानों में इस तरह की किसी भी बात का जिक्र तक नहीं था। यहाँ तक कि गवाहों ने भी खुद यह माना कि जाँच के शुरुआती दौर में उन्होंने ऐसा कोई बयान पुलिस को नहीं दिया था।

कानून की नजर में, जब किसी घटना का मकसद काफी समय बाद बताया जाता है, तो अदालतें उसे संदेह की दृष्टि से देखती हैं। हालाँकि, प्रत्यक्ष सबूत होने पर मकसद बताना हमेशा जरूरी नहीं होता, लेकिन जब चश्मदीदों की गवाही कमजोर पड़ने लगे, तो ‘मकसद’ ही वह कड़ी होती है जो पूरी कहानी को जोड़कर रखती है। और अगर यह कड़ी ही बाद में जोड़ी गई महसूस हो, तो पूरा केस और भी कमजोर हो जाता है।

यहाँ मुद्दा यह नहीं था कि ‘लव जिहाद’ का दावा हकीकत में सच था या झूठ। मुद्दा यह था कि पुलिस ने केस को कैसे तैयार किया। अगर पुलिस चाहती थी कि अदालत इस मकसद को गंभीरता से ले, तो उसे इसे शुरुआत में ही दर्ज करना चाहिए था और इसके पक्ष में ठोस सबूत जुटाने चाहिए थे। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं किया गया।

कमजोर कड़ियाँ: देरी से कागजी कार्रवाई और गवाहों का गायब होना

अदालत के फैसले में तलाशी और सबूतों की बरामदगी के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। विशेष रूप से उस आरोपित के घर की तलाशी को लेकर, जिस पर चाकू मारने का आरोप था। कोर्ट ने गौर किया कि जिस अधिकारी ने उस आरोपित के घर की तलाशी ली थी, न तो उसका नाम गवाहों की सूची में शामिल किया गया और न ही उसे गवाही के लिए बुलाया गया। इसके अलावा, तलाशी का मेमो (दस्तावेज) 17 जुलाई 2012 को तैयार किया गया बताया गया, लेकिन वह कोर्ट में 25 जुलाई को पहुँचा।

किसी भी गंभीर मुकदमे में तलाशी के कागजात का देरी से पहुँचना और तलाशी लेने वाले अधिकारी को पेश न करना, बचाव पक्ष के लिए किसी तोहफे से कम नहीं होता। इससे यह तर्क देने का मौका मिल जाता है कि सबूतों के साथ बाद में छेड़छाड़ की गई है या कागजी कार्रवाई मनगढ़ंत है। अदालत को सबूतों को सीधे तौर पर ‘झूठा’ घोषित करने की जरूरत नहीं होती। साबित करने के तरीके में इतनी देरी और लापरवाही ही उस सबूत को अविश्वसनीय बनाने के लिए काफी होती है।

कोर्ट का साफ कहना: फॉरेंसिक रिपोर्ट से भी नहीं मिली मदद

जब चश्मदीदों के बयानों पर विवाद छिड़ता है, तो अक्सर फॉरेंसिक जाँच ही पुलिस के डूबते हुए केस को बचाती है। लेकिन इस मामले में, कोर्ट के फैसले ने साफ कर दिया कि फॉरेंसिक से भी कोई खास मदद नहीं मिली। अदालत ने गौर किया कि बरामद किए गए सबूतों (हथियार और कपड़े) पर खून तो था, लेकिन वह इतनी कम मात्रा में था कि उसकी उत्पत्ति या ब्लड ग्रुप का पता लगाना नामुमकिन था। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कपड़ों पर इंसान का खून मिलना ही किसी को दोषी साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि यह पक्का न हो जाए कि वह खून पीड़ित का ही था।

अक्सर नाकाम साबित होने वाले मुकदमों में यही पैटर्न देखा जाता है। जब हथियार या कपड़ों का पीड़ित से कोई पुख्ता वैज्ञानिक कनेक्शन नहीं जुड़ पाता, तो अदालतें उसे ठोस सबूत नहीं मानतीं- खासकर तब, जब गवाहों की बातें पहले से ही शक के घेरे में हों। इसका मतलब यह नहीं है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पुलिस की कहानी को गलत साबित किया, बल्कि इसका मतलब यह है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट इतनी मजबूत नहीं थी कि वह आरोपितों को सजा दिलाने के लिए जरूरी ‘कानूनी मानक’ को पार कर पाती।

नाकाम कोशिश: जब हत्या ही साबित न हुई, तो साजिश का आरोप भी फेल

जब अदालत ने पाया कि हत्या का मुख्य मामला ही संदेह से परे साबित नहीं हो सका, तो साजिश और अपराधियों को पनाह देने जैसे अतिरिक्त आरोपों के टिकने की गुंजाइश बहुत कम रह गई। कोर्ट के फैसले ने इशारा किया कि पुलिस यह ठोस तरीके से साबित नहीं कर पाई कि आरोपितों ने हमलावरों को शरण दी थी या कानून के मानकों के अनुसार उनके बीच कोई साजिश रची गई थी।

यह सिर्फ कोई तकनीकी नतीजा नहीं था, बल्कि इससे यह पता चला कि सरकारी पक्ष ने एक बहुत बड़ा जाल तो बुना, लेकिन उसकी बुनियाद को मजबूत करना भूल गया। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अक्सर यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि मामले की गंभीरता दिखाने के लिए बहुत से लोगों पर साजिश और सामूहिक हमले की धाराएँ लगा दी जाती हैं। लेकिन इसका जोखिम यह है कि अगर आरोपितों की पहचान और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह पुख्ता न हो, तो यही फैलाव केस की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। हर नया आरोपित संदेह का एक नया बिंदु बन जाता है, जिससे बचाव पक्ष को केस में छेद करने का मौका मिल जाता है और आखिरकार अदालत को फैसला सुनाने में झिझक होने लगती है।

अब आगे क्या?

सरकारी पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है। अब हाई कोर्ट यह देखेगा कि क्या निचली अदालत ने सबूतों को समझने में कोई गलती की, क्या कानूनी सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू किया गया और क्या बरी करने के फैसले को पलटा जा सकता है। हालाँकि, बरी किए गए आरोपितों के खिलाफ अपील जीतना आसान नहीं होता, क्योंकि ऊपरी अदालतें तब तक दखल नहीं देतीं जब तक कि फैसले में कोई बहुत बड़ी और साफ गलती न दिखे।

लेकिन इन कानूनी उलझनों के बीच एक कड़वा सच नहीं बदलता। विशाल कुमार सिर्फ 19 साल का था। कॉलेज के गेट के बाहर हुए हमले में चाकू लगने से उसकी जान चली गई और वह कभी घर नहीं लौटा। उसके परिवार ने 13 साल तक इंसाफ का इंतजार किया, लेकिन जो फैसला आया उसने उनके जख्मों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया।

अगर हमारा सिस्टम भविष्य में ऐसे नतीजों से बचना चाहता है, तो उसे इस फैसले से सबक लेना होगा। इसके लिए कोर्ट पर उंगली उठाने के बजाय उन जाँच अधिकारियों और वकीलों की जवाबदेही तय करनी होगी जो शुरू से ही जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में नाकाम रहे। जब शुरुआती रिपोर्ट संदिग्ध हो, पहचान परेड न हुई हो, गवाह अपनी बातें बदलें और फॉरेंसिक रिपोर्ट साथ न दे, तो अदालत का फैसला पहले से ही तय हो जाता है। ऐसे में आरोपित आजाद हो जाते हैं, पीड़ित की यादें एक बार फिर दफन हो जाती हैं और समाज के सामने एक खौफनाक जुमला सच बनकर रह जाता है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए सामान्य नहीं होना चाहिए।

विशाल कुमार को किसी ने नहीं मारा। ऐसा इसलिए नहीं कि कत्ल नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए क्योंकि सरकार और पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि कातिल कौन था।

कोर्ट का फैसला आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कभी भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था पश्चिम बंगाल, आज ‘आर्थिक तबाही’ की कगार पर खड़ा: समझें- कैसे वामपंथियों और TMC की नीतियों ने अर्थव्यवस्था की ध्वस्त

कभी भारत की आर्थिक ताकत का प्रतीक पश्चिम बंगाल आज अभूतपूर्व गिरावट का शिकार हो चुका है। 1960 में यह देश के सबसे अमीर राज्यों में तीसरे नंबर पर था, लेकिन आज 24वें स्थान पर लुढ़क गया है। राज्य की जीडीपी में हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत से घटकर 5.6 प्रतिशत रह गई है, जबकि प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा से 16.3 प्रतिशत कम हो गई है।

यह गिरावट पिछले 60 सालों की है, जब दूसरे पिछड़े राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे थे। कम्युनिस्ट राज की वैचारिक जिद और ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार की नीतियाँ इस बर्बादी की मुख्य वजह हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के डेटा से साफ होता है कि कैसे राज्य ने खुद अपनी संरचनात्मक गिरावट को अंजाम दिया। इस रिपोर्ट में हम टाइमलाइन के जरिए देखेंगे कि कैसे कम्युनिस्टों की मिलिटेंट यूनियनिज्म और ममता राज की उद्योग-विरोधी नीतियों ने बंगाल को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया।

कभी देश का आर्थिक लीडर था बंगाल

1960 के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि भारत का औद्योगिक केंद्र था। 1960-61 में यहां की सापेक्ष प्रति व्यक्ति आय 127.5 प्रतिशत थी, यानी औसत बंगाली राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा कमाता था। कलकत्ता बंदरगाह, जूट उद्योग की एकाधिकार स्थिति और जेसप, ब्रेथवेट जैसी इंजीनियरिंग कंपनियां यहां की ताकत थीं। महाराष्ट्र और दिल्ली के साथ यह राज्य निवेशकों का पहला विकल्प था।

भारत में क्षमता निर्माण के लिए कोई भी पूँजी यहीं आती थी। लेकिन यह दौर ज्यादा नहीं चला। 1967 में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने के बाद राज्य में अस्थिरता आई। नक्सलवाद के संघर्ष ने कंपनियों को मजदूरों की छंटनी करने या भागने पर मजबूर किया। बेरोजगारी बढ़ी और अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार बनी, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नियंत्रण में थी। शुरू में राज्य शांत था, लेकिन कम्युनिस्टों की प्रो-लेबर नीतियाँ जल्दी ही मिलिटेंट बन गईं।

कम्युनिस्ट राज में उग्र यूनियनिज्म और पूँजी का पलायन से ‘डेथ क्रॉस’

पश्चिम बंगाल की इंडस्ट्रियल गिरावट कोई दुर्घटना नहीं थी। दरअसल, 1960 के अंत से बंगाल की समृद्धि का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। 1980-81 तक सापेक्ष आय 96.9 प्रतिशत रह गई। यह वह ‘डेथ क्रॉस’ था जब औसत बंगाली औसत भारतीय से गरीब हो गया। कुछ वामपंथी इतिहासकार फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी जैसे बाहरी कारणों को दोष देते हैं, लेकिन मुख्य जख्म खुद का लगाया हुआ था।

कम्युनिस्ट राज में उग्र ट्रेड यूनियनवाद का उदय हुआ। ‘घेराव’ को हथियार बनाकर उद्योगों को बंधक बनाया गया। मुनाफे को ‘पाप’ माना गया और उद्योगपतियों को अपमानित किया गया। पूँजी ने भागना शुरू कर दिया। नवाचार के लिए जरूरी ‘एनिमल स्पिरिट्स’ कोलकाता से निकलकर मुंबई और गुजरात चले गए। 1970 में 678 स्ट्राइक्स और 128 लॉकआउट्स हुए, लेकिन 2003 तक स्ट्राइक्स घटकर 32 रह गईं जबकि लॉकआउट्स 400 हो गए। इससे 2.56 करोड़ मैन-डे लॉकआउट्स में खो गए।

कम्युनिस्टों ने छोटे उद्योगों पर फोकस किया, लेकिन मल्टीनेशनल निवेश रोक दिया गया। साल 1994 की नीति में विदेशी निवेश का स्वागत किया गया, लेकिन हल्दिया पेट्रोकेमिकल जैसे प्रोजेक्ट्स में भी देरी हुई। परिणामस्वरूप 1950-51 में राष्ट्रीय उत्पादन में 27 प्रतिशत हिस्सा 2007-08 तक 3.9 प्रतिशत रह गया। राजनीतिक हिंसा और बंद की वजह से स्थिति बिगड़ती गई। कम्युनिस्टों की पार्टी पर सरकारी नियंत्रण ने नौकरशाही को जकड़ लिया।

वैचारिक जाल में फंसा बंगाल छूट गया पीछे

साल 1991 में भारत ने लाइसेंस राज तोड़ा, तो दक्षिणी राज्य जैसे कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने आईटी पार्क बनाए और ग्लोबल सप्लाई चेन को आकर्षित किया। लेकिन बंगाल ‘वैचारिक समय जाल’ में फँसा रहा। 70 के दशक का ट्रॉमा बना रहा। उग्रता कम हुई, लेकिन पूँजी के प्रति दुश्मनी की छवि बनी रही। कर्नाटक, आंध्र ने संपदा बढ़ाई, जबकि बंगाल कृषि आधारित कम विकास में फँस गया। इससे 1990 से 2010 तक रैंकिंग 15 से 21वें नंबर पर गिर गई।

निवेश डेटा बताता है कि 1991-2003 में बंगाल को 4,542 लेटर्स ऑफ इंटेंट मिले, लेकिन सिर्फ 14.6 प्रतिशत लागू हुए, जबकि गुजरात में 16 प्रतिशत। प्रति व्यक्ति निजी निवेश बंगाल में 1,952 रुपए था, गुजरात में 20,725 रुपए। इंफ्रास्ट्रक्चर में बंगाल 1980-81 में 9वें स्थान से 1990-91 में नीचे गिर गया। बिजनेस शुरू करने में 258 दिन लगते थे, जबकि अहमदाबाद में 144। कम्युनिस्ट राज की ये नीतियाँ राज्य को पिछड़ा बनाती रहीं।

ममता राज में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन 2.0, सिंगुर स्टैंडऑफ बना टर्निंग प्वॉइंट

इंडस्ट्री का डेटा पश्चिम बंगाल की इस त्रासदी का कंकाल है, तो सिंगुर उसका दिल। 2008 में रतन टाटा का सिंगुर में नैनो प्लांट लगाने का फैसला एक मोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में विपक्षी आंदोलन ने टाटा को सानंद, गुजरात जाने पर मजबूर कर दिया। इससे ग्लोबल निवेशकों में संदेश गया कि बंगाल में जमीन अधिग्रहण राजनीतिक जोखिम से भरा है। ऐसे में बंगाल को दूसरी बार डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन झेलना पड़ा।

कम्युनिस्टों की तरह टीएमसी ने भी बंदों और राजनीतिक हिंसा को जारी रखा। साल 2011-2025 में 6,600 कंपनियाँ भागने को मजबूर हुईं, जिनमें 110 लिस्टेड कंपनियाँ भी शामिल हैं। राज्य में एफडीआई सिर्फ 2,534 करोड़ रुपए आई और वो टॉप 10 में भी जगह नहीं बना पाई।

2024-25 का ऑडिट बताता है बर्बादी का हाल

आज के समय का डाटा डराने वाला है। साल 1960 में रैंक 3 वाला राज्य 2024 में रैंक 24 पर आ चुका है। औसत बंगाली औसत भारतीय से 16.3 प्रतिशत कम कमाता है। तमिलनाडु, जो शुरू में नीचे था, सापेक्ष आय 150 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया, जबकि बंगाल पूरी तरह से उलटफेर झेल रहा है।

फिस्कल डेफिसिट 38 प्रतिशत जीएसडीपी है, डेट-टू-जीएसडीपी 37.08 प्रतिशत। टैक्स कलेक्शन सुस्त (5.45 प्रतिशत जीएसडीपी), क्योंकि बड़ा अनौपचारिक सेक्टर है। सोशल ट्रांसफर्स 90.7 प्रतिशत तक पहुँच गए, लेकिन चुनावों से पहले बढ़ाए गए, जो वोटबैंक पॉलिटिक्स लगते हैं।

साल 2025 में ममता सरकार द्वारा लाए ‘रिवोकेशन ऑफ वेस्ट बंगाल इंसेंटिव स्कीम्स’ बिल से 1993 से दिए जा रहे इंसेंटिव्स वापस ले लिए गए। इससे डालमिया और बिड़ला ग्रुप को 430 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। हालाँकि ममता सरकार का ये कदम प्रॉमिसरी एस्टॉपल और आर्टिकल 14, 19 का उल्लंघन भी है।

कम्युनिस्ट-ममता राज ने विरासत में छोड़ी बर्बाद इंडस्ट्री

पश्चिम बंगाल की यह आर्थिक गिरावट छह दशकों की नीतियों का नतीजा है, जहाँ राजनीतिक एकजुटता को पूंजी संचय से ऊपर रखा गया। कम्युनिस्टों ने क्लास एनेमी बनाकर उद्योगों को तबाह किया, जबकि ममता ने सिंगुर जैसे आंदोलनों से निवेश रोका। आज बंगाल अनौपचारिक सेक्टर पर निर्भर है, जहाँ रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, कंस्ट्रक्शन और कृषि में रोजगार है, लेकिन टैक्स कम मिलता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल की स्थिति सुधर सकती है? क्योंकि अगर बंगाल आज बर्बाद हो चुका है, तो इसके पीछे कम्युनिस्ट-ममता राज की जिम्मेदारी साफ दिख रही है। ऐसे में अब जनता को भी ये सोचना होगा कि वो ऐसी पार्टी की सरकार बनाए, जो राज्य को आगे लेकर जाए, न कि 60 साल से बर्बादी की गर्त में जाते राज्य को और भी बर्बाद करे। बहरहाल, इसका निर्णय बंगाल की जनता को इसी साल यानी विधानसभा चुनाव में ही करना भी होगा।