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‘भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की उदाहरण सहित व्याख्या करें?’: जामिया मिलिया इस्लामिया ने BA की परीक्षा में पूछा सवाल, ऑपइंडिया से बोले रजिस्ट्रार- कार्रवाई करेंगे

दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में अब पढ़ाई के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने की साजिशें शुरू हो गई हैं। प्रोपेगेंडा भी ऐसा कि भारत की छवि को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं। जामिया यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने खुद तो मान लिया है कि देश में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा होती है और यही बात छात्रों से जबरन कहलवाई जा रही है।

जामिया के मुस्लिमों से जुड़े सवाल पर विवाद

दरअसल, यह विवाद परीक्षा में पूछे गए एक सवाल से शुरू हुआ है। जामिया मिलिया इस्लामिया में BA (Honours) Social Work के सेमस्टर एग्जाम में सवाल पूछा गया है कि ‘Discuss the atrocities against Muslim Minorities in India giving suitable examples’ यानी ‘भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचारों पर उचित उदाहरणों के साथ चर्चा करें’। इस सवाल के बाद सोशल मीडिया पर जामिया को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई।

सोशल मीडिया पर शुरू हुई आलोचना

जैसे ही एग्जाम से जुड़ी यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर इसे लेकर जामिया पर सवाल उठने शुरू हो गए। कहीं लोगों ने इसे बांग्लादेश की हिंसा से जोड़ा तो कहीं इसे जामिया का पुराना पैटर्न बताया गया है।

VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. प्रवेश कुमार चौधरी ने X पर एक पोस्ट में इसे चिंता जनक बताया है। उन्होंने X पर लिखा, “…विषय पर उदाहरण सहित चर्चा का प्रश्न पूछा जाना अत्यंत चिंताजनक है।” उन्होंने कहा, “आज जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर बर्बर अत्याचार हो रहे हैं। ऐसे समय में भारत के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की परीक्षा में इस प्रकार का प्रश्न पूछा जाना देश और हिंदू समाज के विरुद्ध है।”

एक X यूजर ने लिखा, “जामिया में बच्चे को हिन्दुओं एवं अन्य धर्म के प्रति कट्टर बनाया जा रहा है। सरकार संज्ञान ले।” एक अन्य ने लिखा, “जामिया करके एक यूनिवर्सिटी है भारत में, जो अपने स्टूडेंट्स को एग्जाम के नाम पर कैसे रैडिकलाइज कर रही है।” इसी तरह सैकड़ों लोगों ने जामिया पर सवाल उठाते हुए इस मामले में कार्रवाई करने की बात कही है।

रजिस्ट्रार ने कहा- कार्रवाई करेंगे

इस मामले में जामिया मिलिया इस्लामिया का प्रशासन बात करने से बच रहा है। हमने इस मामले में सोशल वर्क विभाग के प्रमुख रवींद्र रमेश पाटिल से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई। उनके अलावा हमने परीक्षा विभाग से जुड़े एहतशाम उल हक से भी बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उनसे भी संपर्क नहीं हो सका। इस मामले में हमने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मोहम्मद मेहताब आलम रिजवी से बात की है।

मेहताब आलम रिजवी ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि इस तरह के प्रश्न पूछा जाना पूरी तरह से गलत है। रिजवी ने इसे प्रश्न-पत्र सेट करने वालों पर टाल दिया है। हालाँकि, उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में इस बात का आश्वासन दिया है कि इस तरह के सवाल पूछने वालों की जाँच की जाएगी और जो जरूरी होगा वो कार्रवाई भी की जाएगी।

जामिया की मीडिया संयोजक साईमा सईद ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि मामले की जाँच शुरू कर दी गई है और इसे बनाने वाले टीचर को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। उन्होंने इस तरह के सवाल पूछे जाने को पूरी तरह गलत बताया है।

पहले भी हिंदुओं के साथ भेदभाव का सामने आया है मामला

यह कोई पहली बार नहीं है जब गैर-मुस्लिमों का इस तरह उत्पीड़न किया गया है या उनके साथ भेदभाव की रिपोर्ट सामने आई है। पिछले वर्ष दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में गैर-मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव और उनपर डाले जाने वाले धर्मांतरण के दबाव को लेकर ‘कॉल फॉर जस्टिस’ ट्रस्ट की एक रिपोर्ट सामने आई थी।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि गैर-मुस्लिम महिला सहायक प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में शुरू से ही भेदभाव महसूस किया जहाँ मुस्लिम कर्मचारी गैर मुसलमानों के साथ दु‌र्व्यवहार और भेदभाव करते थे। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि गैर-मुस्लिम महिला सहायक प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में शुरू से ही भेदभाव महसूस किया जहाँ मुस्लिम कर्मचारी गैर मुसलमानों के साथ दु‌र्व्यवहार और भेदभाव करते थे।

रिपोर्ट में कहा गया था कि एक अनुसूचित जनजाति के एक पूर्व छात्र ने बताया था कि कैसे Med पूरा करने के दौरान एक मुस्लिम शिक्षक ने उनसे क्लास में कहा था कि जब तक वह इस्लाम का पालन नहीं करते, उसकी MED पूरी नहीं होगी। 

UP में ‘खेत तालाब योजना’ की सफल कहानी, अब बारिश के भरोसे नहीं रहे बुंदेलखंड के किसान: योगी सरकार ने बनवाए 37000+ तालाब, भूजल स्तर भी सुधरा

उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही ‘खेत तालाब योजना’ पानी बचाने और सिंचाई में मदद करने वाली एक बड़ी योजना है। यह योजना 2017 में शुरू हुई थी। इसका मकसद है कि किसान अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब बनवाएँ, बारिश का पानी उसमें जमा करें और सूखे के दिनों में फसलों की सिंचाई के लिए उसका इस्तेमाल करें।

यह योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत चल रही है और भारत सरकार से भी पैसा मिलता है। राज्य और केंद्र सरकार मिलकर 50-50 फीसदी खर्च उठाते हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य है कि भूजल पर निर्भरता कम हो, सिंचाई ज्यादा भरोसेमंद बने और खेती मजबूत हो।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इस योजना ने सूखे वाले इलाकों में बड़ा बदलाव लाया है। पहले यह योजना बुंदेलखंड के सात जिलों में शुरू हुई थी, अब पूरे राज्य के कई जिलों में फैल चुकी है। ऑपइंडिया ने आरटीआई के जरिए जो आधिकारिक आँकड़े हासिल किए हैं, वे बताते हैं कि इस योजना का दायरा लगातार बढ़ता गया है।

क्यों शुरू की गई खेत तालाब योजना?

दशकों से बुंदेलखंड के किसान सूखे, सूखे कुओं और फसल खराब होने की समस्या से जूझते थे। गर्मी आते ही हैंडपंप सूख जाते थे और खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहती थी। खेत तालाब योजना इसी समस्या का छोटा-मोटा, स्थानीय समाधान है। खेत में बने तालाब बारिश का पानी रोकते हैं, जिसे किसान जरूरत पड़ने पर फसल को पानी दे सकते हैं। लंबे समय में भूजल स्तर भी सुधरता है।

यूपी तक की एक रिपोर्ट में बुंदेलखंड के बदलाव को ‘खामोश बदलाव’ बताया गया है। खेतों में छोटे तालाब बनने से अब साल भर सिंचाई हो रही है। पानी की उपलब्धता बढ़ने से खेती सुधरी है और किसानों को मछली पालन से अतिरिक्त कमाई भी हो रही है।

खेत तालाब योजना कई चरणों में, बुंदेलखंड से हुई शुरुआत

उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट के अनुसार योजना की शुरुआत बुंदेलखंड के सात जिलों में हुई थी। पहले चरण में 12.20 करोड़ रुपए खर्च करके 2,000 तालाब बनाए गए। ये सात जिले थे झाँसी, जालौन, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा।

अगले चरण में योजना 73 जिलों तक फैली। इसके लिए 167 विकास खंडों को चुना गया, जहाँ पानी की जरूरत ज्यादा थी और भूजल की स्थिति चिंताजनक थी। इन 73 जिलों में 27.88 करोड़ रुपए खर्च करके 3,384 तालाब बनाए गए। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार ने लगातार पैसा दिया।

पूरे उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत अब तक 37,403 तालाब बन चुके हैं। एक तरफ जहाँ साल 2017-18 में 2,000 तालाब बने थे, तो 2022-23 में सबसे ज्यादा 6,306 तालाब बने।

साल दल साल बने तालाबों की संख्या

आरटीआई से मिली अहम जानकारियाँ, बुंदेलखंड को मिला सबसे ज्यादा फायदा

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के मृदा संरक्षण विंग ने ऑपइंडिया के आरटीआई के जवाब में बताया कि योजना शुरू होने से अब तक 37,403 तालाब बनाए गए हैं। राज्य सरकार ने कुल 311.43 करोड़ रुपए अनुदान दिए हैं।

आँकड़ों से पता चलता है कि शुरुआती सात बुंदेलखंड जिले हर साल सबसे ज्यादा लाभ पाते रहे हैं। 2016-17 से 2024-25 तक के कुल अनुदान में इन जिलों पर लगातार फोकस रहा।

इस योजना के तहत झाँसी में सबसे ज्यादा 6,213 तालाब बने, बाँदा में 4,743, जालौन में 4,504, महोबा में 4,321, चित्रकूट में 4,228, हमीरपुर में 3,922 और ललितपुर में 3,200 तालाब बने।

जिलावास तालाब की स्थिति

यह निरंतरता दिखाती है कि बुंदेलखंड को सिर्फ शुरुआती प्रयोग नहीं समझा गया, बल्कि योजना के फैलने के बाद भी यहाँ सरकार की ओर से बड़ा सहयोग मिलता रहा।

जमीन पर लोगों की राय और योजना का मकसद

आँकड़ों से आगे बढ़कर लाभार्थियों की बात करें, तो लाभ पाने वाले लोगों की बातें योजना के उद्देश्य से बिल्कुल मेल खाती हैं। बाँदा के लुकतरा गाँव में लोगों ने बताया कि अब रोजमर्रा के पानी और पशुओं के लिए पानी उपलब्ध है, खेती बारिश पर निर्भर नहीं रह गई है। झाँसी के एक किसान ने कहा, “हम अब बारिश पर निर्भर नहीं रहते।”

यूपी तक से बात करते हुए झाँसी के एक सरकारी कृषि अधिकारी ने योजना की कार्यप्रणाली के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अनुदान सीधे डीबीटी से किसानों के खाते में जाता है। झाँसी में छह हजार से ज्यादा तालाब बन चुके हैं। आरटीआई के आँकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। अधिकारी ने कहा कि योजना से स्थानीय भूजल स्तर में काफी सुधार हुआ है।

बुंदेलखंड के बाहर भी योजना का विस्तार

बुंदेलखंड के बाद योजना कई अन्य जिलों में फैली। इनमें मेरठ, गाजियाबाद, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बागपत, गौतम बुद्ध नगर, अलीगढ़, हाथरस, कासगंज, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, उन्नाव, मैनपुरी, इटावा, औरैया, बरेली, बिजनौर, बदायूँ, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अयोध्या, अंबेडकर नगर, गोंडा आदि शामिल हैं।

योजना का यह विस्तार दिखाता है कि राज्य सरकार ने पहले बुंदेलखंड पर फोकस किया और फिर पूरे उत्तर प्रदेश के पानी की समस्या वाले इलाकों तक पहुँचाया।

खेत तालाब योजना के लिए यूपी-केंद्र सरकार ने दिया फंड

खेत तालाब योजना के लिए पैसा चरणबद्ध तरीके से बढ़ता गया। 2016-17 में ₹12.20 करोड़, 2017-18 में ₹24.50 करोड़, 2018-19 में ₹43.22 करोड़ दिए गए। बाद के सालों में भी खर्च बड़ा रहा। 2022-23 में सबसे ज्यादा ₹63.51 करोड़, फिर 2023-24 में ₹35.81 करोड़ और 2024-25 में ₹10.77 करोड़। कुल मिलाकर अब तक 311.43 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।

खेत तालाब योजना के तहत साल दर साल सरकार द्वारा दिए गया फंड

तालाबों के साइज के आधार पर सरकार देती है पैसा

मान लीजिए कि इस योजना में दो साइज के तालाब हैं, दोनों की गहराई 3 मीटर है। छोटा तालाब 22x20x3 मीटर का होता है, जिसकी अनुमानित लागत 1,05,000 रुपए है। मध्यम तालाब 35x30x3 मीटर का होता है, लागत 2,28,400 रुपए है।

इसके लिए किसानों को 50 फीसदी अनुदान मिलता है, जो डीबीटी से सीधे खाते में जाता है। आमतौर पर काम की प्रगति और पूरा होने पर किस्तों में पैसा मिलता है। इससे छोटे-सीमांत किसानों के लिए निर्माण आसान हो जाता है और वे खुद भी योगदान देते हैं।

खेत तालाब योजना के लिए पात्रता, किसे मिलती है प्राथमिकता और योजना की शर्तें क्या हैं

खेत तालाब योजना में अनुसूचित जाति-जनजाति, अल्पसंख्यक और छोटे-सीमांत किसानों को प्राथमिकता है, लेकिन आरटीआई जवाब में राज्य कृषि विभाग ने कहा कि इस तरह का अलग डेटा रखा नहीं जाता। किसान को आवेदन करना पड़ता है, जिला स्तर से मंजूरी मिलती है। एक किसान को सिर्फ एक तालाब के लिए ही मदद मिल सकती है।

इस योजना के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी है और रजिस्ट्रेशन में खेत तालाब विकल्प चुनना पड़ता है।

एक बड़ी शर्त यह है कि लाभार्थी के पास पिछले सात साल में कृषि या उद्यान विभाग से लगा हुआ और अभी चल रहा माइक्रो सिंचाई सिस्टम (ड्रिप या स्प्रिंकलर) होना चाहिए।

कैसे आवेदन करें, कहाँ करें और जरूरी कागजात क्या चाहिए

खेत तालाब योजना के लिए आवेदन उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के पोर्टल agridarshan.up.gov.in पर ऑनलाइन करना होता है।

आवेदक अपनी और जमीन की जानकारी भरते हैं, जरूरी दस्तावेज अपलोड करते हैं और आवेदन के समय टोकन राशि जमा करते हैं। चयन पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर होता है। इसकी पात्रता का सत्यापन होता है और फिर आगे का प्रोसेस होता है।

जरूरी दस्तावेजों में आमतौर पर आधार कार्ड, बैंक विवरण, खसरा-खतौनी जैसे जमीन के कागजात, हाल की फोटो, घोषणा-पत्र और माइक्रो सिंचाई से जुड़े दस्तावेज (तीन पक्षीय समझौता जहाँ लागू हो) शामिल होते हैं।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने खेत तालाब योजना से लंबे समय का समाधान चुना है, न कि सिर्फ तत्काल राहत के लिए। इस योजना में बारिश का पानी जमा करना और स्थानीय स्तर पर सिंचाई को जोड़ा गया है। डीबीटी से अनुदान सीधे किसानों तक पहुँचता है। इन सबके साथ योजना ने जमीन पर ठोस नतीजे दिए हैं, खासकर सूखे से जूझते बुंदेलखंड में।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

क्या 1 अप्रैल 2026 से इनकम टैक्स अधिकारी आपके ईमेल और WhatsApp चैट को ट्रैक कर पाएँगे? जानें- क्या है इस भ्रम का सच और नए नियम

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि भारत का इनकम टैक्स विभाग जल्द ही हर व्यक्ति की जासूसी कर पाएगा। यूजर्स का दावा है कि नए आयकर कानून के द्वारा टैक्स अधिकारियों को प्राइवेसी भंग करने और ईमेल, चैट और दूसरे कम्युनिकेशन की जाँच करने की बहुत ज़्यादा पावर मिल जाएगी।

अभी चल रही ऑनलाइन चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि इस कानून के 1 अप्रैल 2026 से लागू होने के बाद लोगों की प्राइवेसी से समझौता होगा और उनके मौलिक अधिकार कम हो जाएँगे। उनका कहना है कि इस कानून से भारत सरकार को ईमेल, मैसेज, इंस्टेंट मैसेजिंग चैट वगैरह तक बिना किसी रोक-टोक के एक्सेस मिल जाएगा।

स्रोत-x

लेकिन, यह पहली बार नहीं है जब इंटरनेट पर ऐसी अफवाहें फैली हैं कि इनकम टैक्स अधिकारी को किसी भी नागरिक के ईमेल और WhatsApp मैसेज पढ़ने का अधिकार मिल जाएगा। ऐसी डरावनी बातें लगभग हर बार सामने आती हैं, जब केंद्र टैक्स चोरी रोकने के लिए इनकम टैक्स एक्ट के नियमों को सख्त करने पर विचार करता है। इन्हें ‘मौलिक अधिकारों’ पर चिंता के तौर पर पेश किया जाता है। जनता को गुमराह करने के लिए और सरकार पर दबाव बनाने के लिए अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर ऐसी बातें फैलाई जाती है।

पिछले दस सालों में, टैक्स चोरी में क्लाउड स्टोरेज, एन्क्रिप्टेड फोन, ईमेल इनबॉक्स, ट्रेडिंग ऐप, ई-वॉलेट, बेनामी डिजिटल आइडेंटिटी और मैसेज जैसे डिजिटल टूल्स में एक बड़ा बदलाव आया है। अब पुलिस की तलाशी अभियान में पूरा जोर डिजिटल उपकरणों पर होता है। इससे ज्यादातर सबूत मिल ही जाते हैं।

प्रस्तावित इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 247 के लिए पॉलिसी कॉन्टेक्स्ट देता है, जिसे इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 132 में शामिल पारंपरिक सर्च और सीजर क्लॉज जैसा बताया गया है।

इनकम टैक्स एक्ट 2025 के सेक्शन 247 की जरूरत क्यों है?

इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 247 के द्वारा टैक्स जाँच के लिए कोडिफाइड सर्च और सीजर प्रोविजन लाया गया है। ये एक्ट 1 अप्रैल 2026 को पुराने आयकर विभाग 1961 एक्ट की जगह लेगा।

यह क्लॉज़ आयकर अधिकारियों को उन लोगों के खिलाफ तलाशी की इजाजत देता है, जिसे पहले से ही फॉर्मल लीगल प्रोसीडिंग्स मसलन- समन या नोटिस दिए जा चुके हैं। उन पर इस बात का भी शक हो कि उस व्यक्ति ने टैक्स चोरी की है और जाँच के दौरान इनकम से जुड़े दस्तावेज या जरूरी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड छिपाए हैं। सेक्शन 247 एक टारगेटेड इन्वेस्टिगेशन टूल है, जो डिजिटल इकोनॉमिक रियलिटीज़ को देखते हुए अधिकारियों को अपडेट करता है। यह बिना वारंट वाला सर्विलांस लॉ नहीं है।

कानून में सेक्शन 247 के तहत चल रही टैक्स कार्रवाई के मामले में ये जरूरी है। इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी अधिकारी किसी भी अनजान व्यक्ति के फोन, ईमेल, बैंक अकाउंट और सोशल मीडिया अकाउंट की तलाशी लेना शुरू कर दे।

यह अधिकार तभी काम आता है, जब कोई कानूनी समन या नोटिफ़िकेशन हो, जिसमें अकाउंट बुक या दूसरे कागजात दिखाने के लिए कहा गया हो और टैक्सपेयर उसे नहीं दिखा रहा हो अथवा अधिकारियों को जब इनकम या प्रॉपर्टी के कागजात छिपाने का कोई सबूत मिल जाए। यह भारतीय टैक्स कानून के बुनियादी नियम के मुताबिक ही है।

सेक्शन 247 में वर्चुअल डिजिटल स्पेस को खास तौर पर शामिल किया गया है, जो ऑनलाइन अकाउंट, क्लाउड स्टोरेज, ईमेल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बैंकिंग, इन्वेस्टिंग और ट्रेडिंग पोर्टल, या किसी भी डिजिटल लेनदेन से जुड़ा है। इसमें फाइनेंशियल या कम्युनिकेशन डेटा को शामिल किया गया है।

वर्तमान में ज्यादातर फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन और जरूरी सबूत अब फिजिकल अकाउंट बुक के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्टोर किए जाते हैं, इसलिए यह एक्सप्लेनेशन जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह परिभाषा टैक्स विवादों में सबूत के तौर पर डिजिटल डेटा के महत्व को दर्शाती है।

टैक्सपेयर की प्राइवेसी को लेकर आलोचक उठा रहे सवाल

सेक्शन 247 को लेकर विरोधियों का कहना है कि सुरक्षा न होने पर टैक्स अधिकारी प्राइवेट डिजिटल अकाउंट या सोशल मीडिया को हैक कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ जानकारों ने एक्सेस कोड को ओवरराइड करने की टर्मिनोलॉजी की तुलना प्राइवेट डिवाइस या क्लाउड डेटा तक बिना वारंट के एक्सेस से की है और इसे प्राइवेसी के लिए खतरा बताया है।

मीडियानामा के अनुसार, विरोधियों का दावा है कि यह क्लॉज़ टैक्स अधिकारियों को लोगों के कंप्यूटर, सेल फोन और यहाँ तक कि ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट को भी हैक करने की इजाजत देता है।

हालाँकि, ये सिर्फ उनलोगों के डिजिटल अकाउंट को खंगालने की इजाजत देता है, जिस पर इनकम टैक्स चुराने का शक हो और पहले से समन या नोटिस दिया जा चुका हो। कानून किसी के भी डिजिटल अकाउंट को अपनी मर्ज़ी से एक्सेस करने का अधिकार अधिकारियों को नहीं देता।

दरअसल इनकम टैक्स एक्ट 1961 का सेक्शन 132 भी इसकी इजाजत देता है, लेकिन इसमें जाँच प्रक्रिया काफी लंबी है। यानी सेक्शन 247 मॉडर्न बनाता है और बताता है कि ये अधिकार डिजिटल मामलों में कैसे लागू होते हैं।

तलाशी के दौरान जिन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए उसे भी नए कानून से मजबूती मिलती है। पुराने टैक्स कानून की तरह नए कानून में ऑथराइज़ेशन ऑर्डर के लिए आग्रह करने, टैक्सपेयर को लिखित जानकारी देने, ज़ब्त किए गए सामान की पूरी जानकारी देने के लिए पंचनामा बनाने और टैक्सपेयर को पूरी जानकारी आधिकारिक तौर पर मिले, ये सुनिश्चित करता है।

ये सुरक्षा रेगुलर एनफोर्समेंट फ्रेमवर्क का हिस्सा हैं और सेक्शन 247 से खत्म नहीं होती हैं। इसके अलावा अगर टैक्सपेयर्स को लगता है कि उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वे कोर्ट में तलाशी प्रक्रिया को चुनौती दे सकते हैं। कुछ मामलों में ज्यूडिशियल रिव्यू अभी भी मौजूद है।

पारंपरिक सर्च स्किल्स असल अकाउंट बुक्स या सेफ या ऑफिस में स्टोर किए गए रिकॉर्ड्स पर फोकस करते थे। आजकल, जरूरी सबूत बैंक ट्रांजैक्शन लॉग, ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट स्टेटमेंट, ईमेल, ऑटोमैटिक पोर्टफोलियो रिकॉर्ड, या कम्युनिकेशन चैनल मेटाडेटा में भी मिल सकते हैं।

अगर उस सबूतों को ठीक से एक्सेस नहीं किया जाए, तो टैक्स अधिकारियों को पूरी जानकारी नहीं मिल पाती है। लीगल असेसमेंट से पता चलता है कि आज के समय में काली कमाई का पता लगाने और उसके खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सर्च करना जरूरी है, खास कर डिजिटल एसेट्स और डेटा का।

एक आम गलतफहमी यह है कि सेक्शन 247 सभी डिजिटल पर्सनल जानकारी तक बिना रोक-टोक के एक्सेस की इजाज़त देता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यदि आयकर अधिकारियों को लगता है कि किसी व्यक्ति के पास अघोषित संपत्ति या अघोषित आय है, तो वे अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना संबंधित इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को खंगाल सकते हैं। इसमें व्यक्तिगत कंप्यूटर डेटा से लेकर कॉर्पोरेट दस्तावेज़ तक सब कुछ शामिल है।

इस धारा के तहत व्यक्तियों या कंपनियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना अनिवार्य है, जिसमें एक्सेस कोड और अन्य उपकरण शामिल हैं, ताकि कर अधिकारी डिजिटल रिकॉर्ड की जाँच कर सकें।

इसके अलावा अगर टैक्स पेयर को लगता है कि उसके साथ अधिकारियों ने गलत किया है तो वह कोर्ट में विरोध जता सकता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट के प्राइवेसी रूलिंग (के.एस. पुट्टास्वामी) के अनुसार, निजता का अधिकार आर्टिकल 21 के तहत मौलिक अधिकार हैं, लेकिन सरकारी वजहों से इसे रोका भी जा सकता है।

धारा 247 आयकर को आधुनिक बनाती है, ताकि डिजिटल प्रौद्योगिकी के युग में जवाबदेही को बढ़ावा दिया जा सके। अनुपालन को सुगम बनाया जा सके और कर चोरी की विकसित होती तकनीकों से निपटा जा सके।

इनकम टैक्स एक्ट 2025 का सेक्शन 247 एक अच्छा अपडेटेड मैकेनिज्म है, जो भारतीय टैक्स कानून को मॉडर्न फाइनेंशियल रियलिटी के साथ जोड़ता है।

यह गारंटी देता है कि हर तरह की इनकम, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक या ट्रेडिशनल लेजर में डॉक्यूमेंटेड हो, अथॉरिटीज द्वारा देखी जा सकती है। ऑथराइजेशन, रीज़निंग बिलीफ और प्रोसीजरल प्रोटेक्शन का लीगल स्ट्रक्चर जो टैक्सपेयर्स के अधिकारों को बनाए रखता है, उसे भी बनाए रखा गया है। यह एक संतुलित अप्रोच है, जो प्राइवेसी से समझौता किए बगैर संवैधानिक मापदंडों के मुताबिक सिस्टम को मॉडर्न बनाता है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मोइनुद्दीन ने ‘अब्बू के उकसाने पर’ गुजरात में हिंदू पिता-पुत्र को मारा चाकू, एक ही समुदाय के लोगों को बार-बार बना रहा निशाना: मीडिया ने बताया ‘मानसिक रूप से अस्थिर’, जानें- पीड़ित ने क्या कहा

गुजरात के आणंद जिले के खंभात शहर से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ मोइनुद्दीन नाम के एक शख्स एक हिंदू पिता और बेटे पर चाकू से हमला कर दिया गया। मीडिया के एक हिस्से में आरोपित को ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताया जा रहा है लेकिन पीड़ित परिवार का आरोप है कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और जानबूझकर सिर्फ एक ही समुदाय को निशाना बना रहा है। पीड़ित परिवार का यह भी कहना है कि आरोपित के पिता ने पुलिस के सामने धमकी भरे अंदाज में कहा कि ‘जो करना है कर लो’ और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की।

इस मामले में खंभात सिटी पुलिस ने आरोपित के अब्बा सज्जादहुसैन अकबरहुसैन सैयद, भाई मोहम्मद सोहेब सज्जादहुसैन सैयद और अम्मी तेजबीबानिशा सज्जादहुसैन सैयद के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है और आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है। ऑपइंडिया के पास इस FIR की कॉपी मौजूद है। पुलिस ने तीनों के खिलाफ BNS की धाराएँ 125(A), 125(B), 352, 351(3), 54 और गुजरात पुलिस ऐक्ट की धारा 135 के तहत केस दर्ज किया है।

यह घटना रविवार (21 दिसंबर 2025) को खंभात के पीठ बाजार इलाके में हुई। शिकायतकर्ता निहाल रावल की इस इलाके में ‘चामुंडा जनरल स्टोर’ नाम से दुकान है। FIR के मुताबिक, 21 दिसंबर की सुबह निहाल रावल अपनी दुकान पर अपने पिता संजयभाई के साथ बैठे हुए बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान नकरटनी पोल इलाके का रहने वाला मोइनुद्दीन सैयद हाथ में चाकू लेकर दुकान में घुस आया और गाली-गलौज करने लगा। आरोप है कि इस दौरान उसने चिल्लाकर कहा, “मेरे अब्बू सज्जाद हुसैन ने कहा है कि दो-तीन रावल को मारकर आओ।”

इसके बाद आरोपित ने निहाल पर चाकू से हमला करने की कोशिश की लेकिन निहाल ने दुकान का काउंटर आगे कर दिया जिससे वह बच गया। हालाँकि, आरोपित ने दोबारा हमला करने की कोशिश की। इस बार निहाल के पिता संजयभाई ने बीच में आकर कुर्सी आगे की लेकिन इसके बावजूद उनके बाएँ हाथ पर चाकू लग गया और खून बहने लगा। घटना के बाद मौके पर लोग इकट्ठा हो गए और मोइनुद्दीन को पकड़कर उसके घर ले जाया गया। आरोप है कि इसी दौरान आरोपित के अब्बू, भाई और अम्मी ने पीड़ित परिवार को धमकाना शुरू कर दिया। पुलिस ने पूरे मामले में FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

पीड़ित को दी जान से मारने की धमकी

पीड़ित निहाल रावल ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि जब वह थाने में मौजूद थे और पुलिस के सामने पूरी घटना की जानकारी दे रहे थे, उसी दौरान आरोपित के पिता ने उन्हें खुलेआम धमकाया। निहाल के अनुसार, आरोपी के पिता ने कहा, “मेरा बेटा पागल है, वह घर से चाकू लेकर निकला था। मेरा बेटा हर जगह घूमेगा, जो करना है कर लो।” उसने यह भी धमकी दी, “अगर तुमने मोइनुद्दीन के खिलाफ कोई शिकायत की तो मैं तुम्हें जान से मार दूँगा।” इन सभी बातों की पुष्टि FIR में हुई है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि मोइनुद्दीन ने पहले खंभात के रहने वाले कमलेश रावल, अनिल रावल और गोपालभाई रावल पर हमला किया था। उसने बार-बार रावल समुदाय के लोगों को ही निशाना बनाया और हमला किया। कहा जाता है कि उसने करीब 6 बार अलग-अलग लोगों पर हमला किया और यह भी सच है कि सभी पीड़ित रावल समुदाय से थे।

मीडिया ने आरोपित को बताया ‘मानसिक रूप से अस्थिर’

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स, वीडियो और अन्य संदर्भों में आरोपी मोइनुद्दीन को लगातार ‘मानसिक रूप से अस्थिर‘ बताया जा रहा है। वहीं, शिकायतकर्ता नेहल ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि मोइनुद्दीन पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ है और जो कुछ भी कर रहा है, जानबूझकर और सोच-समझकर कर रहा है।

नेहल का तर्क है कि अगर मोइनुद्दीन सच में मानसिक रूप से अस्थिर होता, तो वह अपने ही घर में चाकू से हमला करता या अपने आसपास रहने वाले अन्य मुसलमानों पर भी हमला करता लेकिन ऐसा नहीं है। उसके हमले सिर्फ हिंदू रावल समुदाय के लोगों पर ही हो रहे हैं। नेहल ने मीडिया से सवाल करते हुए कहा कि आमतौर पर मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति बिना भेदभाव के सभी पर हमला करता है, यहाँ तक कि अपने परिवार वालों पर भी। फिर ऐसा क्यों है कि मोइनुद्दीन ऐसा नहीं कर रहा?

आगे बात करते हुए नेहल ने कहा कि मोइनुद्दीन का चलना, बोलना और व्यवहार पूरी तरह सामान्य है लेकिन इसके बावजूद उसे ‘पागल’ या ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल पुलिस मोइनुद्दीन के कथित ‘मानसिक अस्थिरता’ से जुड़े सर्टिफिकेट की जाँच कर रही है और अगर इसमें कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी ‘वर्ग विशेष’ के आरोपी को मीडिया द्वारा ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताया गया हो। बीते कई वर्षों से ऐसे कई मामलों में, जहाँ पीड़ित हिंदू और आरोपी मुस्लिम रहा है। मीडिया ने आरोपित को बचाने के लिए उसे मानसिक रूप से अस्थिर बताने की कोशिश की है। नेहल का कहना है कि इस मामले में भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

हाँ, भारत हिंदू राष्ट्र है और यह संविधान में लिखे जाने की जरूरत नहीं

भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है, इस छोटे वाक्य के निहितार्थ बड़े हैं। यह वाक्य भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। भारत को हिंदू राष्ट्र मानें या ना, इस पर लंबे वक्त से चर्चा होती रही है। अब इसकी चर्चा फिर शुरू हुई है और इसके पीछे है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत का कोलकाता में दिया गया एक बयान।

संघ के 100 साल पूरे होने पर देश में कई जगहों पर संवाद कार्यक्रम हो रहे हैं और कोलकाता में ऐसे की एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है और यह संविधान में लिखे होने की आवश्यकता नहीं है। कॉन्ग्रेस ने चिर-परिचित अंदाज में इसका विरोध किया और उन्हें संविधान विरोधी तक कह दिया है।

मोहन भागवत ने क्या है?

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “संविधान की प्रस्तावना हिंदुत्व को ही बताती है। उसमें हिंदू शब्द नहीं है लेकिन सब उपासनाओं को स्वतंत्रता है। न्याय है, स्वतंत्र है, समता है। यह सब कहाँ से आया? डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने कहा है कि यह मैंने फ्रांस से नहीं लिया बल्कि यह तथागत बुद्ध से लिया। बंधु भाव, उन्होंने कहा है संसद में भाषण में कहा है बंधु भाव यही धर्म है तो धर्म पर आधारित संविधान, ये किसकी विशेषता है ये हिंदू राष्ट्र की विशेषता है।”

उन्होंने कहा, “हिंदू शब्द का उपयोग नहीं किया, हिंदू शब्द के बारे में रिजर्वेशंस भी होंगे लेकिन स्वभाव से तो सब लोग वही थे। उन्होंने जो निर्माण किया उसमें उसी की छाया है। फिर हिंदू राष्ट्र बहुत पुराना है। सूर्य पूर्व में उगता है, कब से उगता है पता नहीं तो अब इसको भी संविधान की मंजूरी चाहिए क्या? हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है।”

भागवत ने आगे कहा, “भारत को मातृभूमि मानने वाला, भारतीय संस्कृति पर श्रद्धा रखने वाला और भारतीय पूर्वजों का गौरव मन में रखने वाला एक भी व्यक्ति हिंदुस्तान की भूमि पर जब तक जीवित है तब तक भारत हिंदू राष्ट्र है। ये संघ का विचार है। और इसलिए हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है।”

उन्होंने कहा, “अभी मन में आया संसद के कि बदलो और उसमें शब्द डालो वो डालेंगे नहीं डालेंगे तो भी ठीक है कुछ उस शब्द से मतलब नहीं है क्योंकि हम है हम हिंदू है हमारा हिंदू राष्ट्र है यह सत्य है किसी पोथी में लिखा होगा नहीं लिखा होगा जो है सो है वो बदलेगा नहीं।”

कॉन्ग्रेस का विरोध

कभी भगवान राम के अस्तित्व तक सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस के लिए भागवत भी संविधान विरोधी हो गए हैं। कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि संविधान नहीं कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि भागवत के बयान से पता चलता है कि उन्हें ना संविधान की परवाह है और ना वह उसका सम्मान करते हैं। लेकिन क्या वाकई इस देश को हिंदू राष्ट्र को होने के लिए किसी संवैधानिक दर्जे की ही जरूरत है।

भारत बेशक एक हिंदू राष्ट्र ही है

भारत एक हिंदू राष्ट्र है। यह कोई राजनीतिक बहस नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक पहचान है। इसे केवल कानून-संविधान तक सीमित करके देखना इस विचार के साथ अन्याय होगा। भारत का हिंदू राष्ट्र होना इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है जो ‘सनातन काल’ से एक राष्ट्र के रूप में रहा है। जब देश में आधुनिक संविधान, संसद या मौजूदा लोकतांत्रिक ढाँचा नहीं था, तब भी भारत एक हिंदू राष्ट्र था।

भारत हजारों साल पुरानी सभ्यता है। जब दुनिया के अधिकतर देश पैदा भी नहीं हुए थे, तब भारत में वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ रचे जा चुके थे। यह धरती हमेशा से सनातन विचारों की भूमि रही है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि ‘हिंदू’ धर्म से आगे बढ़कर जीवन जीने का तरीका है।

भारत की राष्ट्रीय पहचान या कहें तो हिंदू पहचान, किसी एक राजनीतिक सहमति से नहीं बनी है बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक यात्रा का परिणाम है। भारतीय परंपरा में हिंदू होना इस राष्ट्र की उस जीवन-दृष्टि को स्वीकार करना है जिसमें विविधता का विरोध नहीं बल्कि सम्मान किया जाता है। भारत में दर्शन की अनेक धाराएँ विकसित हुईं जिनमें ईश्वर को मानने वाली भी थीं और न मानने वाली भी लेकिन सभी को इसी सभ्यता के भीतर स्थान मिला। सबको ‘हिंदू’ माना गया और सबने इस राष्ट्र को पुण्यभूमि के रूप में स्वीकार भी किया।

भारत की सामाजिक चेतना, उसके त्योहार, उसकी भाषाएँ, उसकी परंपराएँ, उसकी लोक-संस्कृति ये सब एक साझा धारा से निकली हैं। जब राष्ट्र की बहुसंख्यक आबादी, उसकी ऐतिहासिक स्मृति और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता एक ही दर्शन को माने तो राष्ट्र की पहचान उसी से बनती है। यही पहचान भारत के हिंदू राष्ट्र होने को साबित करती है।

संविधान भारत के शासन-ग्रंथ है लेकिन वह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का निर्माता नहीं है बल्कि उससे ही संविधान को प्रेरणा मिली है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसी अवधारणा और न्याय, स्वतंत्रता और समता जैसे तत्व भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद थे। पंथनिरपेक्षता का भारतीय स्वरूप भी इसी हिंदू सभ्यता की देन है जिसमें राज्य सभी पंथों को सम्मान देता है ना कि धर्म को समाज से काट देता है।

हालाँकि, हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि यहाँ दूसरे धर्मों के लोग सुरक्षित नहीं होंगे। सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। दुनिया में अगर किसी एक देश ने सबसे ज़्यादा धर्मों को शरण दी है, तो वह भारत है। पारसी हों, यहूदी हों सबको भारत ने अपनाया। यह हिंदू सोच की वजह से ही संभव हुआ क्योंकि हिंदू विचार ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का विचार सिखाता है।

भारत एक हिंदू राष्ट्र है क्योंकि इसकी सोच हिंदू है, इसकी आत्मा हिंदू है और इसका इतिहास हिंदू है। यह राष्ट्र सभी का है लेकिन इसकी दिशा और दर्शन सनातन हैं। हिंदू राष्ट्र का मतलब है कि सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान और सबके साथ विकास। यही भारत की सच्ची पहचान है। इसलिए हिंदू राष्ट्र को मान्यता देने के लिए संविधान में किसी शब्द को जोड़ने की आवश्यकता नहीं क्योंकि भारत की आत्मा पहले से ही हिंदू है।

डीप स्टेट से दूतावास तक… इस्लामी कट्टरपंथियों की आड़ में भारत को घेर रहे पश्चिमी देश, टैरिफ के बाद ‘टेरर’ को बनाया हथियार: जानें PM मोदी कैसे तोड़ रहे चक्रव्यूह

भारत के विकास की गाड़ी को पटरी से उतारने और अपना पिछलग्गू देश बनाने के लिए अमेरिका लगातार प्रयासरत है। भारत पर 25 फीसदी टैरिफ के बाद रूस से ऑयल मँगाने के नाम पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया गया। भारत के अंदर असंतोष को हवा देने के लिए फंडिंग की गई। किसान आंदोलन से लेकर महिला पहलवान आंदोलन तक के विदेशी फंडिंग की बात सामने आई। इतना ही नहीं एक के बाद एक पड़ोसी देशों में ‘भारत विरोध’ का माहौल डीप स्टेट, चीन और अमेरिका बना रहा है।

हिन्दुओं और भारत विरोध की राह पर बांग्लादेश

मोहम्मद यूनुस का बांग्लादेश हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा और इस्लामी कट्टरता के तांडव का पर्याय बन गया है। जमात ए इस्लामी की इसमें अहम भूमिका है। छात्र संगठनों, धार्मिक नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से लगातार भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ी जा रही है। 85 साल का मोहम्मद यूनुस सत्ता की भूख मिटाने के लिए पााकिस्तान से लेकर अमेरिका तक का कठपुतली बना हुआ है। कट्टरपंथियों का नंगा नाच हो रहा है। हिन्दुओं के खिलाफ नफरत चरम पर है।

दो साल में बांग्लादेश में दो बार राष्ट्रव्यापी हिंसा और आगजनी हुई, जिसके टारगेट पर हिन्दू रहे। कट्टरपंथियों का युवा चेहरा उस्मान हादी की हत्या के बाद भारत के खिलाफ माहौल बनाया गया। रैलियों में कट्टरपंथियों से लेकर बांग्लादेश के पूर्व सैन्य अधिकारी तक भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।

अमेरिका का दोगलापन उजागर

इस्लामी कट्टरपंथियों ने जिस बेदर्दी से हिंदू युवक दीपू दास की हत्या की और उसके शव को फाँसी पर लटकाया और आग लगा दी। वह हिन्दुओं में दहशत फैलाने के लिए काफी था। लेकिन दीपू दास की विभत्स हत्या पर अमेरिका ने चुप्पी साध ली, जबकि हादी की हत्या पर दुख जताया। इससे अमेरिका का दोगलापन छलकता है। सभी जानते हैं कि हादी भारत का मुखर विरोधी था। उसकी मौत पर उसके ‘इंकलाब मंच’, जिसका वह प्रवक्ता था, ने साफ कहा था कि भारतीय वर्चस्व के संघर्ष में अल्लाह ने महान क्रांतिकारी उस्मान हादी को ‘शहीद’ के रूप में स्वीकार किया है। इसके बावजूद अमेरिकी दूतावास ने कहा कि हम ‘हादी के परिवार, उनके दोस्तों और उनके समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना’ व्यक्त करते हैं।

यही हाल जर्मनी, ब्रिटेन जैसे कई यूरोपीय देशों का भी रहा। जर्मन दूतावास ने हादी की मौत पर बांग्लादेश के राष्ट्रीय शोक के मौक़े पर शनिवार को झंडा झुका दिया।

दूतावास ने एक्स पर लिखा, “शरीफ उस्मान हादी के निधन पर राष्ट्रीय शोक दिवस के दौरान बांग्लादेश और उसके लोगों के साथ पूरी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए, फ्रैंको-जर्मन दूतावास में झंडे को आधा झुका दिया गया है।” वहीं ढाका में ब्रिटिश उच्चायोग ने एक्स पर लिखा, “युवा नेता शरीफ़ उस्मान हादी के निधन से हम दुखी हैं. इस कठिन समय में हम उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं.”

बांग्लादेश में 2024 से हिन्दुओं के खिलाफ रची जा रही साजिश

जुलाई 2024 में बांग्लादेश में पहली बार आरक्षण के खिलाफ छात्रों का आंदोलन सड़कों पर हुआ। उनकी माँग कोटे को खत्म करने की थी, लेकिन जब आंदोलन कट्टरपंथियों के हाथों में आ गया, तो ये माँग शेख हसीना को हटाने की हो गई।

कुछ दिनों में ही शेख हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी और बांग्लादेश में 8 अगस्त 2024 को अचानक मुहम्मद यूनुस की एंट्री हुई और वह बांग्लादेश के मुखिया बन गए। यूनुस के सत्ता में आते ही हिंसा हिन्दुओं की तरफ घूम गया। मंदिर तोड़े जाने लगे, हिन्दुओं को नौकरियों से निकाला जाने लगा। उनकी संपत्तियों को लूटा गया और अब फिर वही हो रहा है।

शेख हसीना को हटाने में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ!

बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ था। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पर दशकों से दुनिया भर में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की साजिश रचने और सरकारें गिराने के आरोप लगते रहे हैं।

इसकी रणनीति हमेशा यही रही है कि जिस सरकार से अमेरिकी हितों को खतरा हो, उसके खिलाफ माहौल बनाया जाए, चाहे विरोधी आंदोलनों को हवा देना हो, अलगाववाद और हिंसा भड़कानी हो, चुनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर सीधे तख्तापलट और गुप्त सैन्य कार्रवाई करनी हो। 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों को भड़का कर प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया।

हसीना ने खुद अमेरिका पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें इसलिए हटवाया, क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने से इनकार कर दिया और बांग्लादेश की संप्रभुता पर समझौता नहीं किया। इसके बाद शेख हसीना को अपदस्थ करवा दिया गया।

यूनुस अंतरिम सरकार के मुखिया बनते ही पाकिस्तान से ‘रिश्ते सुधारने’ की बात करते हैं। वह बांग्लादेश जो अपनी आजादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी जुल्म सहे। बांग्लादेश की महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने रेप किया, बच्चों को मार डाला। वह इस्लाम के नाम पर उसी कट्टरपंथी पाकिस्तानी जमात का साथ दे रहा है।

भारत को पड़ोसियों द्वारा घेरा जा रहा

नेपाल से लेकर मालद्वीप तक में ‘भारत विरोध’ को शह दिया गया। नेपाल में जेनजी आंदोलन के दौरान भारत विरोधी बयान सामने आए। लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल द्वारा अपने नक्शों में शामिल करने से तनाव बढ़ा। नेपाल की चीन से नजदीकी इसके पीछे माना जा रहा है।

मालदीप की मुइज्जू सरकार बनते ही ‘भारत विरोध’ का झंडा बुलंद किया। भारतीय सेना की टुकड़ी हो हटाने से लेकर कई कदम उठाए। मुइज्जू ने राष्ट्रपति बनने के बाद पारंपरिक रूप से भारत के बजाय तुर्की की अपनी पहली विदेश यात्रा की, और बाद में चीन की राजकीय यात्रा पर गए। मालदीव ने चीन के साथ सैन्य सहायता समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। चीन पाकिस्तान के बाद छोटे-छोटे ये पड़ोसी लगातार भारत को परेशान कर रहे हैं। इनके पीछे भी अमेरिका, डीप स्टेट और चीन का हाथ है।

हालाँकि 2 साल के भीतर ही मालदीव को समझ आ गया कि उसे भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधारना होगा। मालदीव को समझ आया कि चीन से दोस्ती की ‘कीमत’ क्या है और भारत बगैर किसी ‘कीमत’ के उसके साथ खड़ा रहा है, और जब ऐसा नहीं हुआ है तो वह संकट में पड़ा है। यही वजह है कि मोइज्जू भारत दौरे पर भी आए और रिश्तों में पड़ी खटास को दूर करने की कोशिश की।

दरअसल पाकिस्तान अमेरिका की गोद में जाकर बैठ गया है। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कुछ दिनों में तीन बार अमेरिका घूम कर आ चुके हैं। इस दौरान अमेरिका के मनमुताबिक समझौता कर लिया है।

यही वजह है कि अब फिलिस्तीन में हमास के खिलाफ पाकिस्तानी सेना को ‘शांति सेना’ के हिस्से के रूप में लगाए जाने की बात की जा रही है। जो पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बांग्लादेश से रिश्ते बनाता है और वहाँ कट्टरवाद का बीज बोता है, वही पाकिस्तान हमास के खिलाफ सेना भेजने पर राजी हो जाता है। जाहिर है पाकिस्तान से राष्ट्रपति ट्रंप खुश हैं।

भारत के खिलाफ लगातार हो रही साजिश

पीएम मोदी ने भारतीय हितों को सर्वोपरि रखा है, इसलिए भारत के खिलाफ लगातार साजिश रची जा रही है। भारत को अंदर और बाहर हर तरह से घेरने की तैयारी वर्षों से की जा रही है। सीएए के खिलाफ आंदोलन, शाहीन बाग, किसान आंदोलन, महिला पहलवानों का आंदोलन सबके पीछे विदेशी फंड की बात सामने आई। इन आंदोलनों को लेकर ईडी ने साफ तौर पर पीएफआई की फंडिंग की बात की थी।

इतना ही नहीं पीएफआई से कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के संपर्क की बात भी ईडी ने कही थी। किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान केन्द्र सरकार ने अमेरिकन अरबपति जॉज सोरोस के नेतृत्व वाला ऑपन सोसाइटी फाउंडेशन पर आंदोलन को आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया था। आंदोलन का मकसद भारत की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना और देश को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत पर खुद उनके सहयोगियों ने भी विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया था।

खालिस्तानियों को लगातार समर्थन दे रहा डीप स्टेट

कनाडा से ऑस्ट्रेलिया तक खालिस्तानी आतंकियों को डीप स्टेट लगातार मदद कर रहा है। यही वजह है कि इन देशों में भारत विरोध देखा जा रहा है। कनाडा में आए दिन भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारतीय तिरंगे का अपमान हो रहा है।

हाल ही में डीप स्टेट से जुड़ा ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री, नेता और इन्फ्लुएंसर गुंथर फेलिंगर ने भारत को टुकड़ों में बाँटने की बात कही थी। खालिस्तानी समर्थक हैंडल पर उसने आतंकवादियों को भारत को काटकर अलग देश बनाने का तरीका बताया था। वह भारत और पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहता है।

फेलिंगर ने एक्स पर लिखा कि उसने खालिस्तान नैरिटिव एक्स हैंडल के साथ 2 घंटे तक चर्चा की कि खालिस्तान की आजादी के लिए क्या किया जाए और रूस समर्थक भारतीय नेता नरेन्द्र मोदी के चंगुल से कैसे आजाद किया जाए। हालाँकि भारत में उसका पोस्ट प्रतिबंधित कर दिया गया।

कई देशों में सत्ता पलट कर चुका है डीप स्टेट और अमेरिका

1954 में ग्वाटेमाला में ऑपरेशन PBSuccess के जरिए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज को गिरा दिया गया, क्योंकि उनकी जमीन सुधार नीतियों से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान थीं। 1957-58 में इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की सरकार को अस्थिर करने के लिए CIA ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन ऑपरेशन फेल हुआ और अमेरिका की पोल खुल गई।

1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए Bay of Pigs आक्रमण कराया गया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। 1963 में वियतनाम में अमेरिकी समर्थन से राष्ट्रपति Ngô Đình Diệm के खिलाफ तख्तापलट हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।

1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेन्दे को हटाने के लिए CIA ने विपक्ष और सेना को समर्थन दिया, जिससे तानाशाह पिनोशे सत्ता में आया। 1979-1989 के बीच CIA ने ऑपरेशन Cyclone चलाकर अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर से मुजाहिदीन आतंकियों को फंड किया, जिसके नतीजे में तालिबान पैदा हुआ।

समय के साथ CIA ने अपनी रणनीति बदली और खुली बगावत या सीधा तख्तापलट करने के बजाय ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए सरकारें गिराने का खेल शुरू किया। बिल क्लिंटन के दौर में NGO और मीडिया नेटवर्क को हथियार बनाया गया।

जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी, USAID, ओमिद्यार नेटवर्क आदि के जरिए देशों में अस्थिरता फैलाई गई। भारत में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें नाकाम कर दिया।

तकनीकी मोर्चे पर भी CIA सक्रिय रही 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को Stuxnet वायरस से निशाना बनाया गया। सीरिया गृहयुद्ध में बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों को फंड और ट्रेनिंग दी गई और ट्रंप ने भी CIA को असद को हटाने का आदेश दिया।

2024 में असद की सरकार गिरी और अब वहाँ pro-US शराअ सत्ता में है। वेनेजुएला में भी 2020 में अमेरिकी प्राइवेट मिलिट्री और विपक्षी नेताओं की मदद से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की कोशिश हुई, लेकिन वह पकड़ी गई।

लैटिन अमेरिका CIA का पसंदीदा निशाना रहा है। 1964 में ब्राजील के राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को हटाया गया, क्योंकि उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ माना जा रहा था। 2023 में फिर से ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा को हटाने के लिए ‘Maidan-style uprising’ की कोशिश की गई, जिसमें बोल्सोनारो समर्थकों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट पर हमला किया, लेकिन CIA का दाँव उल्टा पड़ गया।

राष्ट्रपति लूला अब BRICS देशों का खुला समर्थन कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं।

अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ भारत नहीं झुका

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिए लेकिन भारत नहीं झुका , बल्कि दृढ़ता से खड़ा रहा है। खासकर रूस से तेल खरीदने और कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत व्यापार के दूसरे विकल्प तलाश रहा है और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे निर्यात में वृद्धि हुई है और भारत को अमेरिकी टैरिफ से भारी नुकसान नहीं हुआ है।

भारत ने ट्रंप प्रशासन की माँगों के आगे घुटने टेकने के बजाय, अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए और वैकल्पिक बाजारों की तलाश की, जिससे यह पता चला कि वह ‘बंदूक की नोक पर’ कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी संप्रभुता और किसानों के हितों की रक्षा सबसे पहले करेगा। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकॉनोमी’ भी करार दे दिया।

इसको लेकर देश के अंदर भी मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी ट्रंप के सुर में सुर मिलाया। लेकिन भारत अंदरुनी और बाहरी दबाव के आगे नहीं झुका।

नतीजा ये रहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ (वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 8% की वृद्धि दर्ज की गई और दूसरी छमाही में 8.5 % की वृद्धि) ने ‘डेड इकॉनोमी’ बोलने वाले लोगों के चेहरे पर तमाचे जड़ दिए। यहाँ तक कि IMF ने 2025 के लिए अपने अनुमान को बढ़ाकर 6.6% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। OECD ने 2025 के लिए ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। S &P का अनुमान है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद वित्त वर्ष 2026 में 6.5% और 2027 में 6.7% बढ़ेगा।

भारत ने निकाला ट्रंप की टैरिफ का तोड़

भारत ने अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए दूसरे विकल्प तलाशे हैं। कई देशों और देशों के समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए। खास कर आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) और आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (ECTA) किए हैं। नवंबर 2025 में भारत का कुल निर्यात 19.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और टैरिफ के बावजूद अमेरिका के निर्यात में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

जिन देशों और ब्लॉक के साथ समझौते हो चुके हैं, उनमें यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन देश, ओमान, मॉरीशस समेत कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं। वहीं यूरोपीय संघ, चिली, न्यूजीलैंड के साथ बातचीत अंतिम दौर में हैं। इनके साथ समझौता कभी भी हो सकता है।

फिलहाल भारत का 26 देशों के साथ एफटीए है और 26 देशों के साथ ही प्राथमिक व्यापार समझौता यानी पीटीए है। इसके अलावा 50 से अधिक देशों के साथ व्यापारिक वार्ता चल रही है। इसकी सफलता के बाद चीन को छोड़ कर करीब सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के व्यापार समझौते हो जाएँगे। इससे भारत का निर्यात भविष्य में तेजी से बढ़ने की संभावना है।

भारत के इन कदमों ने ही भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बना दिया है और 2027-28 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। इस प्रगति का श्रेय ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ मजबूत घरेलू खपत और ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ शासन जैसे कदमों को दिया जा रहा है, जिससे भारत की जीडीपी में तेजी से वृद्धि हुई है।

महाराष्ट्र निकाय चुनाव में महायुति का जलवा, ‘ट्रिपल इंजन’ चलाकर किया MVA का सफाया: गठबंधन की राजनीति के भी मिले सबक तो ठाकरे ब्रदर्स का निकला दम

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सत्ताधारी महायुति ने अपनी ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया है कि विपक्षी महाविकास आघाड़ी (MVA) की नींव ही हिल गई। रविवार (21 दिसंबर 2025) को घोषित शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने साफ बता दिया कि राज्य की सियासत पर बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति का दबदबा अब जमीनी स्तर तक पहुँच चुका है।

महाराष्ट्र की कुल 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से महायुति ने 213 सीटों पर कब्जा जमाया, जिसमें बीजेपी को 129, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 51 और अजित पवार की एनसीपी को 33 सीटें मिलीं। दूसरी तरफ MVA को महज 52 सीटों से संतोष करना पड़ा- कॉन्ग्रेस को 36, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 8 और शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) तो बिल्कुल ही खाता खोलने में नाकाम रही, जीरो पर अटक गई।

यह चुनाव महज स्थानीय निकायों की जंग नहीं था, बल्कि 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद की पहली बड़ी कसौटी था, जहाँ महायुति ने अपनी ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार को स्थानीय स्तर पर भी मजबूत कर लिया। दो चरणों में हुए मतदान (2 और 20 दिसंबर) में कुल 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों पर वोट पड़े, जिसमें पार्षदों की कुल संख्या 6,900 के आसपास थी।

महायुति ने न सिर्फ अध्यक्ष पदों पर 213 का कब्जा किया, बल्कि पार्षदों में भी 48% से ज्यादा (लगभग 3,300) हासिल किए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे ‘रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन’ बताया, जो 2017 के 1,602 पार्षदों से दोगुना है।

लेकिन सवाल यह है कि गठबंधन की राजनीति में साथ रहकर भी MVA क्यों हारी? अलग लड़ने पर राज ठाकरे और शरद पवार जैसे दिग्गज क्यों फेल साबित हुए? और महायुति की सफलता के पीछे क्या राज था? आइए इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।

संगठन, रणनीति और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ से मिली महायुति को सफलता

महायुति की जीत कोई संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति और जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन का नतीजा है। सबसे पहले बीजेपी की संगठनात्मक ताकत को देखिए, तो बीजेपी ने 2024 विधानसभा चुनावों में 132 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन लोकल बॉडी में उसकी पैठ पहले से ही गहरी थी।

इस बार बीजेपी ने विदर्भ (100 में 58) और मराठवाड़ा (52 में 25) जैसे क्षेत्रों में साफ झाड़ू लगाई यानी विपक्षियों को छितर-बितर करते हुए क्लीन स्वीप की तरफ कदम बढ़ाया। बाकी जगहों पर अधिकतर उसके ही राज्य-केंद्र के सहयोगी जीते। विदर्भ में महायुति ने कुल 73 सीटें लीं, तो विपक्षी गठबंधन की कॉन्ग्रेस को चंद्रपुर जैसी एक-दो जगहों पर ही सफलता मिली।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी का ‘मोदी फैक्टर’ यहाँ काम आया, खासकर केंद्र की योजनाओं जैसे PMAY, उज्ज्वला और जल जीवन मिशन का प्रचार स्थानीय स्तर पर प्रभावी रहा। फडणवीस की छवि ‘विकास पुरुष’ के रूप में भी काम आई, खासकर शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस से।

दूसरा बड़ा कारण रहा महायुति गठबंधन की ‘स्प्लिट स्ट्रैटेजी’। महायुति ने जहाँ जरूरी था, वहां सीट शेयरिंग की, लेकिन ज्यादातर जगहों पर अलग-अलग लड़ी। उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित पवार की एनसीपी ने 60 में 12 सीटें जीतीं, जहाँ शरद पवार का गढ़ माना जाता था। बारामती जैसे गढ़ में अजित की जीत ने चाचा शरद को करारा झटका दिया। तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने कोंकण (27 में 10) और उत्तरी महाराष्ट्र (49 में 12) में अपनी मराठी मानुस की छवि को मजबूत किया।

सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग पोस्ट्स में लोग इसे ‘दुश्मनी का दाँव’ बता रहे हैं, जहाँ महायुति के दल एक-दूसरे से टकराए… लेकिन ये टकराव फ्रेंडली फाइट जैसी दिखी और विपक्षी गठबंधन की पार्टियों को कोई मौका तक नहीं मिला।

तीसरा स्थानीय मुद्दों पर फोकस। महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में पानी की किल्लत, सड़कें, कचरा प्रबंधन और रोजगार जैसे मुद्दे हावी थे। महायुति ने इन्हें केंद्र-राज्य की योजनाओं से जोड़कर प्रचार किया। इसी बदौलत शहरों में बीजेपी ने 10-15% वोट शेयर बढ़ा लिया। इसके अलावा EVM और चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों के बावजूद महायुति ने ‘पारदर्शिता’ का दावा किया। हिंदुस्तान टाइम्स के एनालिसिस में कहा गया कि महायुति की जीत ‘विपक्ष के फूट’ का फायदा रही।

चौथा और अहम कारण रहा महायुति के पक्ष में युवा और महिला वोटरों का झुकाव। साल 2024 विधानसभा में महिलाओं को 33% टिकट देने का फॉर्मूला यहाँ भी चला। महिलाओं ने ‘महायुति की महिला सशक्तिकरण’ योजनाओं की तारीफ की। कुल मिलाकर महायुति की सफलता ने साबित कर दिया कि ‘ट्रिपल इंजन’ अब लोकल लेवल पर भी दौड़ रहा है। यह जीत मुंबई, पुणे जैसे नगर निगम चुनावों के लिए बूस्टर डोज जैसे है।

एकता की परीक्षा में फेल, आंतरिक कलह का शिकार रही महाविकास आघाड़ी

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में महाविकास आघाड़ी (MVA) की हार सिर्फ नंबरों की नहीं, बल्कि रणनीति और एकता की हार है। 2022 में सत्ता गँवाने के बाद MVA ने 2024 लोकसभा में कुछ संभलाव दिखाया था, लेकिन विधानसभा में 46% वोट शेयर के बावजूद हार गई।

अब लोकल बॉडी में 52 सीटें तक सिमट चुकी एमवीए के लिए यह खतरे की घंटी है कि कैसे वो एकजुटता से बिखरते ही निकाय चुनाव में धरातल पर आ गिरी। इन चुनावों में कॉन्ग्रेस को 36 सीटें तो मिली, लेकिन बाकी दोनों पार्टियाँ नाममात्र की लड़ाई भी नहीं लड़ पाईं। इन नतीजों के कारणों को कुछ इस तरह से समझते हैं कि…

पहला कारण रहा- गठबंधन में फूट: MVA ने सीट शेयरिंग की कोशिश की, लेकिन शिंदे और अजित गुट के गुट ने विपक्ष को नुकसान पहुँचा दिया। उदाहरणस्वरूप, जहाँ MVA ने शिंदे शिवसेना के खिलाफ लड़ा, वहां अजित NCP ने काउंटर किया। कोंकण में उद्धव की शिवसेना को महज 1 सीट मिली, जबकि शिंदे को 10। ऐसे में महाविकास आघाड़ी के लिए महायुति के एकदम विपरीत नतीजे ‘गठबंधन का कब्रिस्तान साबित हुए। वो सही जगह पर सही कॉम्बिनेशन के साथ सत्ता पक्ष को चैलेंज नहीं कर पाई

दूसरा कारण है- नेतृत्व संकट: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने मराठी अस्मिता का कार्ड खेला, लेकिन ‘रिमोट कंट्रोल’ वाली उसकी छवि ने नुकसान ही किया। शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8 सीटें मिलीं, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित के सामने वे बौने साबित हुए। बारामती में शरद का ‘फेल’ होना प्रतीकात्मक है, जिसमें चाचा अपना ही गढ़ भतीजे के हाथों हार गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने विदर्भ में 23 सीटें लीं, लेकिन राज्य स्तर पर उसकी कमजोर संगठन ने बाकी क्षेत्रों में नुकसान किया।

तीसरा कारण रहा- मुद्दों पर फोकस की कमी: MVA ने महँगाई, बेरोजगारी और किसान मुद्दों पर प्रचार किया, लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास के एजेंडे में पीछे रही। टाइम्स ऑफ इंडिया के लाइव अपडेट्स में कहा गया कि विपक्ष ने EVM और पैसे के दुरुपयोग के आरोप लगाए, लेकिन सबूत न होने से जनता ने नकार दिया। मराठवाड़ा में MVA को 10 सीटें मिलीं, लेकिन BJP के 39 के आगे पूरा गठबंधन ही बौना साबित हुआ।

चौथा कारण रहा- राज ठाकरे का ‘जीरो’: महाराष्ट्र निकाय चुनाव में MNS ने अलग लड़कर क्या साबित किया? कुछ भी नहीं। मुंबई और ठाणे जैसे मराठी बहुल इलाकों में भी MNS का वोट शेयर 1% से नीचे रहा। ठाकरे का ‘माराठी मानुस’ नारा पुराना हो चुका, और युवा वोटर मोदी-फडणवीस के विकास मॉडल की ओर मुड़े। ZEE न्यूज के अनुसार, यह MNS की ‘राजनीतिक मौत’ है।

साथ रहकर हार, अलग लड़कर बेकार; कुछ ऐसा रहा MVA गठबंधन का हाल

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों को अगर देखें, तो ये MVA के लिए कुछ ऐसा रहा- ‘साथ में रहकर भी हार, अलग लड़े तो एकदम बेकार।’ MVA ने एकजुट होकर लड़ा, लेकिन आंतरिक खींचतान ने सब बर्बाद कर दिया। उद्धव और शरद के बीच सीट बँटवारे पर झगड़े हुए, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता दिखा। जबकि महायुति ने ‘स्प्लिट’ रणनीति से फायदा उठाया, जहाँ उनका आपसी टकराव हुआ, वहाँ भी कुल वोट शेयर 55% रहा।

राज ठाकरे की MNS का केस अलग: 2017 में 8% वोट शेयर वाली पार्टी अब महाराष्ट्र में अपना प्रभाव खो चुकी है। मीम्स में अब राज ठाकरे को ‘जीरो वाले हीरो’ कहा जा रहा है। वहीं, शरद पवार (83 वर्षीय) की उम्र और परिवारिक फूट ने NCP(SP) को कमजोर किया। साफ है कि अजित के साथ जाने वाले मराठा वोटरों ने शरद को छोड़ दिया है। इसके ‘जनरेशनल शिफ्ट’ भी कह सकते है।

क्षेत्रवाद समझें- कहाँ किसने मारी बाजी

विदर्भ- महायुति का किला: 100 में 73 सीटें। BJP का 58 का जलवा। MVA को 23 सीटें मिली, लेकिन कॉन्ग्रेस को… बाकी खाता भी नहीं खोल पाए।

मराठवाड़ा: महायुति ने 52 में 39 सीटें जीत ली, जिसमें BJP ने 25 सीटें जीती। साथी शिंदे गुट ने 8 सीटें जीती, जबकि MVA 10 पर सिमट गई।

पश्चिमी महाराष्ट्र: यहाँ भी महायुति का जलवा रहा। 60 में 45 सीटें महायुति ने जीती, जिसमें अकेले NCP ने 12 सीटें जीतकर अपना दबदबा दिखाया। रही सही कसर सहयोगियों ने पूरी कर दी।

उत्तरी महाराष्ट्र: इस जोन में भी महायुति का जलवा रहा। कुल 49 सीटों में से 36 पर BJP-SS ने जीत दर्ज की।

कोंकण: इस इलाके की 27 में 20 सीटों पर शिवसेना-शिंदे ने जीत हासिल की। ये एकनाथ शिंदे की मातृभूमि भी है।

भविष्य में नगर निगम और विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा असर

यह जीत महायुति को मुंबई, पुणे, BMC जैसे ब्रेन सेंटर के लिए मजबूत करेगी। वो बढ़े हुए मनोबल के साथ मैदान में उतरेगी। वहीं महाविकास आघाड़ी को विधानसभा चुनाव से पहले अपनी पूरी रणनीति को रीसेट करने की जरूरत है।

महाराष्ट्र की जनता ने सिखाए सियासत के नए सबक

महाराष्ट्र की यह जंग बता गई कि गठबंधन में एकता जरूरी है। हालाँकि बिना ठोस रणनीति के एक होकर लड़ना भी कोई फायदा नहीं दिला पाएगा। चूँकि यहीं पर महायुति ने साबित कर दिया कि ‘विभाजन’ भी जीत का हथियार हो सकता है।

वैसे हाल के विधानसभा चुनाव को छोड़कर उससे पहले का विधानसभा चुनाव (2019) देखें, जिसमें बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग होकर चुनाव लड़ा था और एनसीपी-कॉन्ग्रेस को अलग-थलग करके चुनाव हरा दिया था। वो जीत इस निकाय चुनाव की जीत जैसी ही दिखती है। हालाँकि तब 4 दल आपस में लड़ रहे थे, लेकिन इस बार दलों की संख्या 6 हो गई, जिसमें सबसे मजबूत 3 दलों ने मिलकर MVA के तीन दलों की पूरी राजनीति ही बर्बाद करके रख दी।

मंदिर टूटे-घर लूटे-महिलाओं का हुआ गैंगरेप… रवीश जी, अनाप-शनाप नहीं है बांग्लादेश से आती हिंदुओं के उत्पीड़न की हजारों खबर, हादी और दीपू की हत्या को एक समान बताना बंद करिए

प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार को बांग्लादेश में एक बार फिर भड़की हिंसा पर चिंता सताई है। शेख हसीना की सरकार गिरने के समय फैली हिंसा को उचित ठहराने वाले रवीश कुमार इस बार कुछ अलग अंदाज में सामने आए हैं। अपनी नई वीडियो में उन्होंने शेख हसीना की सरकार गिरने के समय हुई हिंसा में हिंदुओं पर हुए अत्याचार को झुठलाया है और मीडिया पर अनाप-शनाप खबरें चलाने का आरोप लगाया है।

दरअसल, रवीश कुमार ने हाल ही में उस्मान हादी की मौत पर बांग्लादेश में भड़की हिंसा पर 18 मिनट का वीडियो अपलोड किया है। वीडियो में वह खुद को ‘निष्पक्ष’ दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ते-पढ़ते बीच में अपना प्रोपेगेंडा उजागर कर ही देते हैं। रवीश कुमार कहते हैं, “शेख हसीना को हटाने के समय जब हिंदुओं के साथ अत्याचारों की खबरें सामने आईं। तब गोदी मीडिया में अनाप-शनाप और झूठी खबरें चलने लगीं, जिसका बांग्लादेश में विरोध भी हुआ और वहाँ की जनता हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गई।”

यहाँ रवीश कुमार शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद अगस्त 2024 से हिंदुओं पर बड़े पैमाने पर हुए हमलों को झूठी और अनाप-शनाब खबरें बता रहे हैं, जिनमें मंदिरों पर तोड़फोड़, घरों और दुकानों में आगजनी, महिलाओं के रेप और हत्याएँ शामिल रहीं। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं की विस्तृत कवरेज की है।

रवीश कुमार को यह जानने की जरूरत है कि शेख हसीना की सरकार गिरते ही केवल 4 से 20 अगस्त 2024 के भीतर ही हिंदू अत्याचार की 2000 से अधिक घटनाएँ दर्ज हुईं। इनमें 5 हिंदू मारे गए, 157 हिंदू परिवारों के घर लूटे, 70 से अधिक हिंदू मंदिर तोड़े गए, 219 से अधिक हिंदू महिलाओं से गैंगरेप के मामले सामने आए और 78 लड़कियों का जबरन धर्मांतरण हुआ। उसी अगस्त 2024 में 4 हजार से अधिक हिंदुओं को देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

उन्हें पता होना चाहिए कि यह घटनाएँ अनाप-शनाप नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की OHCHR रिपोर्ट में भी इसे सही ठहराया गया है। रिपोर्ट में साफतौर से कहा गया है कि बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने का जश्न मना रहे लोगों के ‘जुलूस’ के दौरान हुए। हमलावर BNP और जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथी नेता थे।

इतना ही नहीं रवीश कुमार ने भारत-विरोधी उस्मान हादी को ‘उभरता छात्र नेता’ बताया है और उसे ‘उन्हें’ और ‘थे’ भाषा का प्रयोग करते हुए सम्मान दिया है। संतुलन बनाने के लिए उस्मान हादी को भारत-विरोधी बातें करने का जिक्र तो किया है, लेकिन अगले ही पल उसे सम्मानपूर्वक दर्शकों के सामने पेश किया है। यहाँ तक कि उस्मान हादी की हत्या को साजिश करार देने की भी पूरी कोशिश की, जबकि बांग्लादेश पुलिस की जाँच अब भी जारी है।

लेकिन रवीश कुमार ने इसका कहीं जिक्र नहीं किया कि इसी हादी ने पूर्वोत्तर राज्यों को बांग्लादेश का हिस्सा बनाने वाला नक्शा भी शेयर किया था। रवीश कुमार उस्मान हादी को ‘छात्र नेता’ बताकर अपने देश में भ्रष्टाचार और सही मुद्दों पर लड़ने वाला ‘सच्चा देशभक्त’ बताना भी नहीं भूले। वह हिंदू युवक दीपू चंद्र दास और इस्लामी कट्टरपंथी उस्मान हादी की हत्या को समान नजरिए से देख रहे हैं।

रवीश कुमार को यह समझना होगा कि दोनों हत्याएँ अलग हैं। दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या हिंदूओं पर अत्याचार का हिस्सा है, जिसमें पूरी हिंदू समाज को उदाहरण देने की कोशिश की गई है कि अगर वह बांग्लादेश में आवाज उठाएँगे तो उनका भी यही हाल किया जाएगा। जबकि उस्मान हादी की हत्या सांप्रदायिक हिंसा नहीं है, उस पर गोली चलाने वाले नकाबपोश का कोई अता-पता नहीं है। हादी के हत्यारों के भारत का हाथ होने और भारत भागने वाले दावे को भी बांग्लादेश पुलिस पहले ही खारिज कर चुकी है,।

यहाँ दिलचस्प बात यह है कि रवीश कुमार पहले मान चुके हैं कि शेख हसीना की सरकार गिरने के लिए हुए प्रदर्शनों में हिंसा फैली थी और इन प्रदर्शनकारी की पैरवी भी कर चुके हैं। लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि यह हिंसा साफतौर पर हिंदू-विरोधी थी। यहाँ उन्हें मुस्लिमों को अत्याचारी और हिंदुओं को पीड़ित बताने में डर लगता है। इसमें उस्मान हादी जैसे इस्लामी कट्टरपंथ को वह ‘छात्र नेता’ का सम्मान देकर बांग्लादेश की हिंसक भीड़ का समर्थन नहीं तो और क्या कर रहे हैं?

गाय काटने से इनकार किया तो मुस्लिमों ने जनजातीय युवक की कुल्हाड़ी से कर दी हत्या, पुलिस ने हसन-हुसैन को किया गिरफ्तार: गुजरात के नवसारी का मामला

गुजरात के नवसारी जिले के डाभेल गाँव में एक हिंदू जनजातीय युवक दीपक कालिदास राठौड़ की सरेआम पिटाई कर हत्या कर दी गई। आरोप है कि यह हमला गाँव के कुछ मुस्लिम दबंगों ने किया जिनमें नाबालिग भी शामिल हैं। दावा किया गया है कि सभी आरोपित कसाईयों के परिवार से जुड़े हैं।

युवक ने एक वीडियो में बताया था कि वह कसाईयों के यहाँ काम करता था लेकिन जब उसे गाय काटने के लिए कहा गया तो उसने इनकार कर दिया। इसी वजह से उससे दुश्मनी के चलते हमला किया गया। 15 दिसंबर की शाम करीब 6:30 बजे, घर लौटते समय आरोपितों ने उसे कब्रिस्तान के पास रोककर गालियाँ दीं और कुल्हाड़ी से हमला किया।

गंभीर चोटें लगने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। नवसारी पुलिस ने FIR दर्ज कर आरोपितों को गिरफ्तार कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

इलाज के दौरान दीपक की हुई मौत, FIR में लगा हत्या का आरोप

दीपक को गंभीर चोटें लगने के बाद अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। मारोली पुलिस की टीम भी पहुँची और दीपक के बयान के आधार पर FIR दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की।

पुलिस ने हसन मोहम्मद एकलवाया, हुसैन शौकत एकलवाया और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ BNS की धारा 115(2), 117(2), 352, 351(3), 54 और अत्याचार अधिनियम की धारा 3(1)(आर)(एस), 3(2)(5-ए) तथा गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया। बाद में दीपक की मौत हो गई और पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ हत्या की धारा भी इसमें जोड़ दी।

इस मामले में स्थानीय हिंदू संगठनों ने इलाज के दौरान दीपक का बयान वीडियो पर रिकॉर्ड किया, जो ऑपइंडिया के पास मौजूद है। वीडियो में दीपक ने बताया कि उसे इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने आरोपितों को गाय काटने से मना किया था।

दीपक ने यह भी कहा कि आरोपित लंबे समय से उसे परेशान कर रहे थे और उसके परिवार ने पहले भी मारोली पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। दीपक ने वीडियो में यह भी बताया कि पहले भी उनके साथ मारपीट हुई थी लेकिन मारोली पुलिस उनकी शिकायत सुनने को तैयार नहीं थी और उन्हें बार-बार बाहर निकाल दिया गया।

पुलिस क्या कह रही है?

नवसारी के डीएसपी (एससी/एसटी सेल) एच बी चंदू ने ऑपइंडिया को बताया कि पीड़ित परिवार ने पहले कोई आवेदन नहीं दिया था। हाल की घटना के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और दीपक की मृत्यु के बाद हत्या की धाराएँ भी जोड़ी गई हैं। उन्होंने कहा कि सभी आरोपितों को पकड़ लिया गया है और नवसारी पुलिस इस मामले में औपचारिक कार्रवाई कर रही है। भविष्य में अगर और आरोपित पाए गए तो उनके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी।

‘सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए’: हिंदू कार्यकर्ता

दीपक को पहले भी गाय न काटने पर पीटा गया था। उस समय उसने मीडिया को बताया था कि मुस्लिम पुरुष उसे गाय काटने के लिए दबाव दे रहे थे और मना करने पर मारपीट कर रहे थे। यह वीडियो भी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

दीपक की मौत के बाद उसकी पत्नी ने पुलिस पर आरोप लगाया कि वह पहले दो बार पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज करा चुकी थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे उसके पति की हत्या हो गई।

हिंदू कार्यकर्ता जय पटेल नागराज ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि पुलिस ने सिर्फ तीन लोगों को आरोपित बनाया है जबकि घटना में तीन से ज्यादा लोग शामिल थे। उन्होंने कहा कि हिंदू समुदाय की माँग है कि आरोपितों को गाँव में सार्वजनिक रूप से पेश किया जाए और गुजरात में सख्त कार्रवाई की जाए।

पुलिस का कहना है कि सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और अन्य लोगों के शामिल होने को लेकर मामले की जाँच की जा रही है। नागराज ने पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की।

पहले से भी विवादों में घिरा है ये गाँव

जलालपुर तालुका के डाभेल गाँव में मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है जबकि हलपति हिंदू समुदाय की आबादी बहुत कम है। गाँव के निवासी शौकत एकलवाया उर्फ शौकत दम की छवि एक कट्टर मुस्लिम की मानी जाती है। उनके खिलाफ पहले भी गौहत्या और मारपीट के कई मामले दर्ज हो चुके हैं, जिन्हें पुलिस ने भी सत्यापित किया है।

स्थानीय लोग और हिंदू कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मुस्लिम परिवार पूरे गाँव में भय का माहौल बना रखा है और कई निर्दोष लोगों को सरेआम पीटा जाता है लेकिन कोई शिकायत दर्ज नहीं करा सकता।

डाभेल गाँव पहले भी विवादों में रहा है। 2023 में मारोली पुलिस ने अहमद मोहम्मद सुजान के घर पर छापा मारा, जो यहाँ ‘स्नैक्स सेंटर’ चला रहा था। तब पता चला कि वह लोगों को चिकन और मटन के नाम पर गोमांस से भरे समोसे बेच रहा था और पिछले चार सालों से यह काम कर रहा था। इसके अलावा, गाँव के मुसलमान और आसपास के हिंदू भी इन समोसों का खा रहे थे। पुलिस ने अहमद को गिरफ्तार कर आगे की कार्रवाई शुरू की।

वलसाड के सांसद ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की, कार्रवाई का आश्वासन दिया

दीपक की मौत के बाद स्थानीय भाजपा नेता अस्पताल पहुँचे और पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की। इसके बाद वलसाड से भाजपा सांसद धवल पटेल भी दाभेल गाँव में मृतक के परिवार के घर पहुँचे। उन्होंने परिवार को न्याय का भरोसा दिलाया है।

धवल पटेल ने इस मौके पर खुद को जनजातीय और दलित समुदाय का मसीहा बताने वाले नेताओं पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जनजातीय समुदाय के नाम पर सिर्फ राजनीति करते हैं।

उन्होंने चैतर वासावा और अनंत पटेल जैसे नेताओं का नाम लेते हुए कहा कि ये नेता आदिवासियों के नाम पर नवसारी, अंबाजी, उमरगाम जैसे इलाकों में घूमते रहते हैं लेकिन जब किसी मुस्लिम द्वारा एक जनजातीय युवक की हत्या होती है, तो ये लोग सामने तक नहीं आते। धवल पटेल ने कहा कि ऐसे नेताओं की चुप्पी की वजह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है और वे अपने वोट खोने के डर से इस मामले पर बोलने से बच रहे हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

सरकार की प्रतिबद्धता, लोगों की ‘चिंता’ और अरावली पर भ्रम: जानें- सुप्रीम कोर्ट के जिस 100 मीटर वाले फैसले पर हुआ विवाद, क्या है उसकी असली कहानी

सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इन दिनों #SaveAravalli का मुद्दा चर्चा में है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कुछ ही दिनों में अरावली रेंज को ध्वस्त कर दिया जाएगा। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से शुरु हुआ है और इसे लेकर लोगों के अपने तर्क हैं तो वहीं सरकार का अपना पक्ष भी है। इस खबर में अरावली से लेकर लोगों और सरकार के पक्ष और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आसान भाषा में समझेंगे।

हिमालय से भी करोड़ों वर्ष पहले मौजूद थी अरावली

अरावली केवल पहाड़ियों की एक श्रृंखला नहीं है बल्कि यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है। इतनी पुरानी कि जब हिमालय का जन्म भी नहीं हुआ था तो उससे करोड़ों साल पहले अरावली मौजूद थी।

भूवैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार, अरावली पर्वतमाला की उम्र करीब 2.5 अरब वर्ष मानी जाती है। यह समय पृथ्वी के प्रारंभिक प्रीकैम्ब्रियन युग का था, जब धरती अभी स्थिर आकार ले रही थी। इसके विपरीत हिमालय अपेक्षाकृत युवा पर्वतमाला है, जिसका निर्माण लगभग 5-6 करोड़ वर्ष पहले भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ।

भौगोलिक दृष्टि से अरावली पर्वतमाला लगभग 670-692 किमी लंबी है। यह गुजरात से शुरू होकर राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक फैली है। माउंट आबू में स्थित गुरु शिखर (1,722 मीटर) इसका सबसे ऊँचा शिखर है। दिल्ली की ‘रिज’ जिसे अक्सर राजधानी की ‘हरी दीवार’ या ‘ग्रीन लंग्स’ कहा जाता है भी अरावली का ही विस्तार है।

क्यों हमारे लिए जरूरी है अरावली?

अरावली पर्वतमाला का महत्व केवल भूगोल तक सीमित नहीं है बल्कि यह उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन की एक रक्षक की तरह काम करती है।

अरावली पर्वतमाला इंडो-गंगा के उपजाऊ मैदानों और थार रेगिस्तान के बीच एक प्राकृतिक दीवार का काम करती है। यदि यह पर्वतमाला न होती, तो राजस्थान का थार रेगिस्तान धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैलकर हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुँच सकता था। इसी कारण इसे मरुस्थलीकरण (Desertification) को रोकने वाली प्राकृतिक ढाल माना जाता है।

यह पर्वत श्रृंखला क्षेत्र की जलवायु को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है। इसकी पहाड़ियाँ गर्म हवाओं की गति को नियंत्रित करती हैं, जिससे तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता और वर्षा भी संतुलित रहती है। अरावली का एक बड़ा योगदान जैव-विविधता के संरक्षण में भी है। इसकी पहाड़ियों और जंगलों में अनेक प्रकार के पेड़-पौधे, पक्षी और वन्य जीव पाए जाते हैं। ये जंगल न केवल पर्यावरण को संतुलित रखते हैं बल्कि आसपास के क्षेत्रों को हरा-भरा बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।

भूजल के दृष्टिकोण से अरावली अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी चट्टानों और मिट्टी की संरचना वर्षा के पानी को जमीन के भीतर जाने में मदद करती है। इससे भूजल पुनर्भरण होता है और कुएँ, बावड़ियाँ व ट्यूबवेल लंबे समय तक जल से भरे रहते हैं। अरावली पर्वतमाला से ही चंबल, साबरमती और लूनी जैसी महत्वपूर्ण नदियाँ निकलती हैं, जो राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के बड़े हिस्से को जल उपलब्ध कराती हैं। ये नदियाँ कृषि, पेयजल और स्थानीय जीवन का आधार हैं।

इसके अलावा अरावली क्षेत्र खनिज संसाधनों से समृद्ध रहा है। यहाँ बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर और ग्रेनाइट के साथ-साथ सीसा, जस्ता, तांबा, सोना और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। इसी कारण यह क्षेत्र लंबे समय से खनन गतिविधियों का केंद्र रहा है।

हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में पत्थर और रेत खनन ने गंभीर समस्याएँ पैदा की हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ा है, जंगल नष्ट हुए हैं और वर्षा जल का जमीन में समाना कम हुआ है। इसके चलते भूजल स्तर तेजी से गिरा है और पर्यावरण संतुलन बिगड़ने लगा है।

सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जिससे शुरू हुआ विवाद

सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर अरावली के समर्थन में किया जा रहा प्रदर्शन सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद आया है। कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना था कि अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को अपने-आप ‘जंगल’ नहीं माना जाएगा।

CJI बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस NV अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि ICFRE जैसे विशेषज्ञ निकाय द्वारा वैज्ञानिक मूल्यांकन के बिना नई खनन गतिविधियों को अनुमति देना पर्यावरण और पारिस्थितिकी के हित में नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि MPSM तैयार होने के बाद ही यह तय होगा कि किन क्षेत्रों में खनन संभव है और किन क्षेत्रों को संरक्षण की आवश्यकता है।

लॉइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी फैसले में कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की ऑपरेशनल परिभाषा को मंजूरी दी है। इसके तहत अरावली हिल्स किसी भी ऐसे स्थलरूप (Landform) को माना जाएगा जिसकी ऊँचाई स्थानीय सतह से कम से कम 100 मीटर हो। साथ ही, परिभाषा में अरावली रेंज ऐसे दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर की दूरी में होने को माना गया है।

इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र को ‘सस्टेनेबल माइनिंग प्लान’ करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि खनन योग्य क्षेत्रों, पर्यावरण-संवेदी क्षेत्रों और उन क्षेत्रों की पहचान हो जहाँ खनन बैन होना चाहिए। खनन के बाद पुनर्वास और बहाली की योजना के लिए भी निर्देश दिए गए हैं। इसी दौरान कोर्ट से पूरे अरावली क्षेत्र में पूर्ण खनन प्रतिबंध की माँग की गई थी जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया है। कोर्ट का मानना है कि इससे अवैध खनन को बढ़ावा मिल सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा

क्या अब खत्म हो जाएगी अरावली?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई लोगों में डर है कि इससे खनन कारोबारियों के लिए रास्ते खुल जाएँगे। एक्सपर्ट्स का मानना है कि नई परिभाषा के बाद करीब 90% हिस्सा ‘अरावली क्षेत्र’ के दायरे से बाहर हो जाएगा। 1990 के दशक से पर्यावरण मंत्रालय ने खनन को केवल स्वीकृत परियोजनाओं तक रखने तक के नियम बनाए थे लेकिन इनका खूब उल्लंघन हुआ और अब एक्सपर्ट मान रहे हैं कि खनन को कानूनी रूप मिल सकता है।

हालाँकि, यह फैसला किसी भी तरह से अरावली में कटाई या पूरी तरह नष्ट कर देने की इजाजत नहीं देता है। कोई जमीन अगर पहले से ही वन भूमि है या किसी कानून के तहत वो संरक्षित है तो उस पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ता है। वहीं, इस फैसले से राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को जमीन की व्याख्या से जुड़ा ज्यादा ताकत मिलती है। यानि अगर जंगल के क्षेत्र को सरकार चाहे तो ‘गैर-वन क्षेत्र’ बताया जा सकता है। इसी से लोगों को डर है लेकिन सरकार इसे बेकार का डर बताकर खारिज कर रही है।

केंद्र सरकार क्या कह रही है?

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव का कहना है कि खनन को लेकर किसी भी तरह की छूट नहीं दी गई है और इसे लेकर भ्रम फैलाना बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मात्र 0.19% हिस्से में ही खनन की पात्रता हो सकती है।

उन्होंने कहा, “अरावली भारत के 4 राज्यों और कुल 39 जिलों में है। अरावली की याचिका 1985 से चल रही है और इसमें खनन के लिए कड़े नियम होने चाहिए हम भी इसका समर्थन करते हैं।”

भूपेंद्र यादव का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का सभी राज्यों से कहना था कि अरावली की सभी जगह एक जैसी परिभाषा होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि इसी कड़ी में 100 मीटर को माना गया है और यह ऊँचाई 1968 की रिचर्ड मर्फी स्टडी के आधार पर तय की गई है। साथ ही, भूपेंद्र यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि इस 100 मीटर में पहाड़ी के बॉटम को भी काउंट किया जाएगा।

इसके अलावा अगर 2 पहाड़ियों के बीच में 100 मीटर का अंतर है तो वो जमीन भी अरावली रेंज मानी जाएगी। उनका कहना है कि अरावली के मौजूदा क्षेत्र का 90% हिस्सा इस परिभाषा के तहत अरावली क्षेत्र में आ गया है।

भूपेंद्र यादव ने कहा, “कुल अरावली का क्षेत्र 1.4 लाख वर्ग किलोमीटर है और अभी 39 जिलों में 217 वर्ग किलोमीटर में ही माइनिंग हो सकती है। इसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट से अनुमित मिलती है। दिल्ली में माइनिंग की ना इजाजत है और ना ही आगे होगी। यहाँ के फॉरेस्ट रिजर्व जस के तस ही रहेंगे।”

इस विवाद पर सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है और सरकार की बातों को देखें-समझें तो लगता है कि जितना बखेड़ा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हो रहा है असल में कहानी उससे अलग है।