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डीप स्टेट से दूतावास तक… इस्लामी कट्टरपंथियों की आड़ में भारत को घेर रहे पश्चिमी देश, टैरिफ के बाद ‘टेरर’ को बनाया हथियार: जानें PM मोदी कैसे तोड़ रहे चक्रव्यूह

भारत के आर्थिक विकास की गति को रोकने के लिए अमेरिका समेत पश्चिमी देश जुट गए हैं। बांग्लादेश में कट्टरवाद की मदद कर 'भारत विरोध' को लगातार हवा दी जा रही है। दरअसल भारत को हर तरीके से घेरने की कोशिश की जा रही है। पहले ही अमेरिका ने 50 फीसदी टैरिफ लगाकर भारत को झुकाना चाहा और अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की।

भारत के विकास की गाड़ी को पटरी से उतारने और अपना पिछलग्गू देश बनाने के लिए अमेरिका लगातार प्रयासरत है। भारत पर 25 फीसदी टैरिफ के बाद रूस से ऑयल मँगाने के नाम पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाकर भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका दिया गया। भारत के अंदर असंतोष को हवा देने के लिए फंडिंग की गई। किसान आंदोलन से लेकर महिला पहलवान आंदोलन तक के विदेशी फंडिंग की बात सामने आई। इतना ही नहीं एक के बाद एक पड़ोसी देशों में ‘भारत विरोध’ का माहौल डीप स्टेट, चीन और अमेरिका बना रहा है।

हिन्दुओं और भारत विरोध की राह पर बांग्लादेश

मोहम्मद यूनुस का बांग्लादेश हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा और इस्लामी कट्टरता के तांडव का पर्याय बन गया है। जमात ए इस्लामी की इसमें अहम भूमिका है। छात्र संगठनों, धार्मिक नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से लगातार भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ी जा रही है। 85 साल का मोहम्मद यूनुस सत्ता की भूख मिटाने के लिए पााकिस्तान से लेकर अमेरिका तक का कठपुतली बना हुआ है। कट्टरपंथियों का नंगा नाच हो रहा है। हिन्दुओं के खिलाफ नफरत चरम पर है।

दो साल में बांग्लादेश में दो बार राष्ट्रव्यापी हिंसा और आगजनी हुई, जिसके टारगेट पर हिन्दू रहे। कट्टरपंथियों का युवा चेहरा उस्मान हादी की हत्या के बाद भारत के खिलाफ माहौल बनाया गया। रैलियों में कट्टरपंथियों से लेकर बांग्लादेश के पूर्व सैन्य अधिकारी तक भारत के ‘सेवन सिस्टर्स’ को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।

अमेरिका का दोगलापन उजागर

इस्लामी कट्टरपंथियों ने जिस बेदर्दी से हिंदू युवक दीपू दास की हत्या की और उसके शव को फाँसी पर लटकाया और आग लगा दी। वह हिन्दुओं में दहशत फैलाने के लिए काफी था। लेकिन दीपू दास की विभत्स हत्या पर अमेरिका ने चुप्पी साध ली, जबकि हादी की हत्या पर दुख जताया। इससे अमेरिका का दोगलापन छलकता है। सभी जानते हैं कि हादी भारत का मुखर विरोधी था। उसकी मौत पर उसके ‘इंकलाब मंच’, जिसका वह प्रवक्ता था, ने साफ कहा था कि भारतीय वर्चस्व के संघर्ष में अल्लाह ने महान क्रांतिकारी उस्मान हादी को ‘शहीद’ के रूप में स्वीकार किया है। इसके बावजूद अमेरिकी दूतावास ने कहा कि हम ‘हादी के परिवार, उनके दोस्तों और उनके समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना’ व्यक्त करते हैं।

यही हाल जर्मनी, ब्रिटेन जैसे कई यूरोपीय देशों का भी रहा। जर्मन दूतावास ने हादी की मौत पर बांग्लादेश के राष्ट्रीय शोक के मौक़े पर शनिवार को झंडा झुका दिया।

दूतावास ने एक्स पर लिखा, “शरीफ उस्मान हादी के निधन पर राष्ट्रीय शोक दिवस के दौरान बांग्लादेश और उसके लोगों के साथ पूरी एकजुटता प्रदर्शित करते हुए, फ्रैंको-जर्मन दूतावास में झंडे को आधा झुका दिया गया है।” वहीं ढाका में ब्रिटिश उच्चायोग ने एक्स पर लिखा, “युवा नेता शरीफ़ उस्मान हादी के निधन से हम दुखी हैं. इस कठिन समय में हम उनके परिवार, मित्रों और समर्थकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं.”

बांग्लादेश में 2024 से हिन्दुओं के खिलाफ रची जा रही साजिश

जुलाई 2024 में बांग्लादेश में पहली बार आरक्षण के खिलाफ छात्रों का आंदोलन सड़कों पर हुआ। उनकी माँग कोटे को खत्म करने की थी, लेकिन जब आंदोलन कट्टरपंथियों के हाथों में आ गया, तो ये माँग शेख हसीना को हटाने की हो गई।

कुछ दिनों में ही शेख हसीना को देश छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी और बांग्लादेश में 8 अगस्त 2024 को अचानक मुहम्मद यूनुस की एंट्री हुई और वह बांग्लादेश के मुखिया बन गए। यूनुस के सत्ता में आते ही हिंसा हिन्दुओं की तरफ घूम गया। मंदिर तोड़े जाने लगे, हिन्दुओं को नौकरियों से निकाला जाने लगा। उनकी संपत्तियों को लूटा गया और अब फिर वही हो रहा है।

शेख हसीना को हटाने में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ!

बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन में डीप स्टेट और अमेरिका का हाथ था। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पर दशकों से दुनिया भर में सत्ता परिवर्तन (Regime Change) की साजिश रचने और सरकारें गिराने के आरोप लगते रहे हैं।

इसकी रणनीति हमेशा यही रही है कि जिस सरकार से अमेरिकी हितों को खतरा हो, उसके खिलाफ माहौल बनाया जाए, चाहे विरोधी आंदोलनों को हवा देना हो, अलगाववाद और हिंसा भड़कानी हो, चुनाव में हस्तक्षेप करना हो, या फिर सीधे तख्तापलट और गुप्त सैन्य कार्रवाई करनी हो। 2024 में बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों को भड़का कर प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया।

हसीना ने खुद अमेरिका पर आरोप लगाया था कि उसने उन्हें इसलिए हटवाया, क्योंकि उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप पर अमेरिकी सैन्य अड्डा बनाने से इनकार कर दिया और बांग्लादेश की संप्रभुता पर समझौता नहीं किया। इसके बाद शेख हसीना को अपदस्थ करवा दिया गया।

यूनुस अंतरिम सरकार के मुखिया बनते ही पाकिस्तान से ‘रिश्ते सुधारने’ की बात करते हैं। वह बांग्लादेश जो अपनी आजादी की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी जुल्म सहे। बांग्लादेश की महिलाओं के साथ पाकिस्तानी सैनिकों ने रेप किया, बच्चों को मार डाला। वह इस्लाम के नाम पर उसी कट्टरपंथी पाकिस्तानी जमात का साथ दे रहा है।

भारत को पड़ोसियों द्वारा घेरा जा रहा

नेपाल से लेकर मालद्वीप तक में ‘भारत विरोध’ को शह दिया गया। नेपाल में जेनजी आंदोलन के दौरान भारत विरोधी बयान सामने आए। लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल द्वारा अपने नक्शों में शामिल करने से तनाव बढ़ा। नेपाल की चीन से नजदीकी इसके पीछे माना जा रहा है।

मालदीप की मुइज्जू सरकार बनते ही ‘भारत विरोध’ का झंडा बुलंद किया। भारतीय सेना की टुकड़ी हो हटाने से लेकर कई कदम उठाए। मुइज्जू ने राष्ट्रपति बनने के बाद पारंपरिक रूप से भारत के बजाय तुर्की की अपनी पहली विदेश यात्रा की, और बाद में चीन की राजकीय यात्रा पर गए। मालदीव ने चीन के साथ सैन्य सहायता समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। चीन पाकिस्तान के बाद छोटे-छोटे ये पड़ोसी लगातार भारत को परेशान कर रहे हैं। इनके पीछे भी अमेरिका, डीप स्टेट और चीन का हाथ है।

हालाँकि 2 साल के भीतर ही मालदीव को समझ आ गया कि उसे भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधारना होगा। मालदीव को समझ आया कि चीन से दोस्ती की ‘कीमत’ क्या है और भारत बगैर किसी ‘कीमत’ के उसके साथ खड़ा रहा है, और जब ऐसा नहीं हुआ है तो वह संकट में पड़ा है। यही वजह है कि मोइज्जू भारत दौरे पर भी आए और रिश्तों में पड़ी खटास को दूर करने की कोशिश की।

दरअसल पाकिस्तान अमेरिका की गोद में जाकर बैठ गया है। पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कुछ दिनों में तीन बार अमेरिका घूम कर आ चुके हैं। इस दौरान अमेरिका के मनमुताबिक समझौता कर लिया है।

यही वजह है कि अब फिलिस्तीन में हमास के खिलाफ पाकिस्तानी सेना को ‘शांति सेना’ के हिस्से के रूप में लगाए जाने की बात की जा रही है। जो पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बांग्लादेश से रिश्ते बनाता है और वहाँ कट्टरवाद का बीज बोता है, वही पाकिस्तान हमास के खिलाफ सेना भेजने पर राजी हो जाता है। जाहिर है पाकिस्तान से राष्ट्रपति ट्रंप खुश हैं।

भारत के खिलाफ लगातार हो रही साजिश

पीएम मोदी ने भारतीय हितों को सर्वोपरि रखा है, इसलिए भारत के खिलाफ लगातार साजिश रची जा रही है। भारत को अंदर और बाहर हर तरह से घेरने की तैयारी वर्षों से की जा रही है। सीएए के खिलाफ आंदोलन, शाहीन बाग, किसान आंदोलन, महिला पहलवानों का आंदोलन सबके पीछे विदेशी फंड की बात सामने आई। इन आंदोलनों को लेकर ईडी ने साफ तौर पर पीएफआई की फंडिंग की बात की थी।

इतना ही नहीं पीएफआई से कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के संपर्क की बात भी ईडी ने कही थी। किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान केन्द्र सरकार ने अमेरिकन अरबपति जॉज सोरोस के नेतृत्व वाला ऑपन सोसाइटी फाउंडेशन पर आंदोलन को आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया था। आंदोलन का मकसद भारत की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना और देश को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत पर खुद उनके सहयोगियों ने भी विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया था।

खालिस्तानियों को लगातार समर्थन दे रहा डीप स्टेट

कनाडा से ऑस्ट्रेलिया तक खालिस्तानी आतंकियों को डीप स्टेट लगातार मदद कर रहा है। यही वजह है कि इन देशों में भारत विरोध देखा जा रहा है। कनाडा में आए दिन भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारतीय तिरंगे का अपमान हो रहा है।

हाल ही में डीप स्टेट से जुड़ा ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री, नेता और इन्फ्लुएंसर गुंथर फेलिंगर ने भारत को टुकड़ों में बाँटने की बात कही थी। खालिस्तानी समर्थक हैंडल पर उसने आतंकवादियों को भारत को काटकर अलग देश बनाने का तरीका बताया था। वह भारत और पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगलता रहता है।

फेलिंगर ने एक्स पर लिखा कि उसने खालिस्तान नैरिटिव एक्स हैंडल के साथ 2 घंटे तक चर्चा की कि खालिस्तान की आजादी के लिए क्या किया जाए और रूस समर्थक भारतीय नेता नरेन्द्र मोदी के चंगुल से कैसे आजाद किया जाए। हालाँकि भारत में उसका पोस्ट प्रतिबंधित कर दिया गया।

कई देशों में सत्ता पलट कर चुका है डीप स्टेट और अमेरिका

1954 में ग्वाटेमाला में ऑपरेशन PBSuccess के जरिए राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्ज को गिरा दिया गया, क्योंकि उनकी जमीन सुधार नीतियों से अमेरिकी कंपनियाँ परेशान थीं। 1957-58 में इंडोनेशिया में राष्ट्रपति सुकर्णो की सरकार को अस्थिर करने के लिए CIA ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन ऑपरेशन फेल हुआ और अमेरिका की पोल खुल गई।

1961 में क्यूबा में फिदेल कास्त्रो को हटाने के लिए Bay of Pigs आक्रमण कराया गया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। 1963 में वियतनाम में अमेरिकी समर्थन से राष्ट्रपति Ngô Đình Diệm के खिलाफ तख्तापलट हुआ और उनकी हत्या कर दी गई।

1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर अयेन्दे को हटाने के लिए CIA ने विपक्ष और सेना को समर्थन दिया, जिससे तानाशाह पिनोशे सत्ता में आया। 1979-1989 के बीच CIA ने ऑपरेशन Cyclone चलाकर अफगानिस्तान में सोवियत समर्थित सरकार के खिलाफ अरबों डॉलर से मुजाहिदीन आतंकियों को फंड किया, जिसके नतीजे में तालिबान पैदा हुआ।

समय के साथ CIA ने अपनी रणनीति बदली और खुली बगावत या सीधा तख्तापलट करने के बजाय ‘सॉफ्ट पावर’ के जरिए सरकारें गिराने का खेल शुरू किया। बिल क्लिंटन के दौर में NGO और मीडिया नेटवर्क को हथियार बनाया गया।

जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्थाओं फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी, USAID, ओमिद्यार नेटवर्क आदि के जरिए देशों में अस्थिरता फैलाई गई। भारत में भी ऐसी कोशिशें हुईं लेकिन मोदी सरकार ने इन्हें नाकाम कर दिया।

तकनीकी मोर्चे पर भी CIA सक्रिय रही 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को Stuxnet वायरस से निशाना बनाया गया। सीरिया गृहयुद्ध में बशर अल-असद के खिलाफ विद्रोहियों को फंड और ट्रेनिंग दी गई और ट्रंप ने भी CIA को असद को हटाने का आदेश दिया।

2024 में असद की सरकार गिरी और अब वहाँ pro-US शराअ सत्ता में है। वेनेजुएला में भी 2020 में अमेरिकी प्राइवेट मिलिट्री और विपक्षी नेताओं की मदद से राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हटाने की कोशिश हुई, लेकिन वह पकड़ी गई।

लैटिन अमेरिका CIA का पसंदीदा निशाना रहा है। 1964 में ब्राजील के राष्ट्रपति जोआओ गौलार्ट को हटाया गया, क्योंकि उन्हें अमेरिकी हितों के खिलाफ माना जा रहा था। 2023 में फिर से ब्राजील में राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा को हटाने के लिए ‘Maidan-style uprising’ की कोशिश की गई, जिसमें बोल्सोनारो समर्थकों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट पर हमला किया, लेकिन CIA का दाँव उल्टा पड़ गया।

राष्ट्रपति लूला अब BRICS देशों का खुला समर्थन कर रहे हैं और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं।

अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ भारत नहीं झुका

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिए लेकिन भारत नहीं झुका , बल्कि दृढ़ता से खड़ा रहा है। खासकर रूस से तेल खरीदने और कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत व्यापार के दूसरे विकल्प तलाश रहा है और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिससे निर्यात में वृद्धि हुई है और भारत को अमेरिकी टैरिफ से भारी नुकसान नहीं हुआ है।

भारत ने ट्रंप प्रशासन की माँगों के आगे घुटने टेकने के बजाय, अन्य देशों के साथ व्यापार समझौते किए और वैकल्पिक बाजारों की तलाश की, जिससे यह पता चला कि वह ‘बंदूक की नोक पर’ कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी संप्रभुता और किसानों के हितों की रक्षा सबसे पहले करेगा। इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकॉनोमी’ भी करार दे दिया।

इसको लेकर देश के अंदर भी मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की गई। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी ट्रंप के सुर में सुर मिलाया। लेकिन भारत अंदरुनी और बाहरी दबाव के आगे नहीं झुका।

नतीजा ये रहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ (वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 8% की वृद्धि दर्ज की गई और दूसरी छमाही में 8.5 % की वृद्धि) ने ‘डेड इकॉनोमी’ बोलने वाले लोगों के चेहरे पर तमाचे जड़ दिए। यहाँ तक कि IMF ने 2025 के लिए अपने अनुमान को बढ़ाकर 6.6% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। OECD ने 2025 के लिए ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 6.7% और 2026 के लिए 6.2% कर दिया है। S &P का अनुमान है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद वित्त वर्ष 2026 में 6.5% और 2027 में 6.7% बढ़ेगा।

भारत ने निकाला ट्रंप की टैरिफ का तोड़

भारत ने अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए दूसरे विकल्प तलाशे हैं। कई देशों और देशों के समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए। खास कर आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) और आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते (ECTA) किए हैं। नवंबर 2025 में भारत का कुल निर्यात 19.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और टैरिफ के बावजूद अमेरिका के निर्यात में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।

जिन देशों और ब्लॉक के साथ समझौते हो चुके हैं, उनमें यूएई, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन देश, ओमान, मॉरीशस समेत कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं। वहीं यूरोपीय संघ, चिली, न्यूजीलैंड के साथ बातचीत अंतिम दौर में हैं। इनके साथ समझौता कभी भी हो सकता है।

फिलहाल भारत का 26 देशों के साथ एफटीए है और 26 देशों के साथ ही प्राथमिक व्यापार समझौता यानी पीटीए है। इसके अलावा 50 से अधिक देशों के साथ व्यापारिक वार्ता चल रही है। इसकी सफलता के बाद चीन को छोड़ कर करीब सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के व्यापार समझौते हो जाएँगे। इससे भारत का निर्यात भविष्य में तेजी से बढ़ने की संभावना है।

भारत के इन कदमों ने ही भारत को दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बना दिया है और 2027-28 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। इस प्रगति का श्रेय ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ मजबूत घरेलू खपत और ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ शासन जैसे कदमों को दिया जा रहा है, जिससे भारत की जीडीपी में तेजी से वृद्धि हुई है।

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रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

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