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महाराष्ट्र निकाय चुनाव में महायुति का जलवा, ‘ट्रिपल इंजन’ चलाकर किया MVA का सफाया: गठबंधन की राजनीति के भी मिले सबक तो ठाकरे ब्रदर्स का निकला दम

महाराष्ट्र की कुल 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से महायुति ने 213 सीटों पर कब्जा जमाया, जिसमें बीजेपी को 129, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 51 और अजित पवार की एनसीपी को 33 सीटें मिलीं।

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सत्ताधारी महायुति ने अपनी ताकत का ऐसा प्रदर्शन किया है कि विपक्षी महाविकास आघाड़ी (MVA) की नींव ही हिल गई। रविवार (21 दिसंबर 2025) को घोषित शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने साफ बता दिया कि राज्य की सियासत पर बीजेपी की अगुवाई वाली महायुति का दबदबा अब जमीनी स्तर तक पहुँच चुका है।

महाराष्ट्र की कुल 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से महायुति ने 213 सीटों पर कब्जा जमाया, जिसमें बीजेपी को 129, एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 51 और अजित पवार की एनसीपी को 33 सीटें मिलीं। दूसरी तरफ MVA को महज 52 सीटों से संतोष करना पड़ा- कॉन्ग्रेस को 36, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 8 और शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) तो बिल्कुल ही खाता खोलने में नाकाम रही, जीरो पर अटक गई।

यह चुनाव महज स्थानीय निकायों की जंग नहीं था, बल्कि 2024 के विधानसभा चुनावों के बाद की पहली बड़ी कसौटी था, जहाँ महायुति ने अपनी ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार को स्थानीय स्तर पर भी मजबूत कर लिया। दो चरणों में हुए मतदान (2 और 20 दिसंबर) में कुल 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों पर वोट पड़े, जिसमें पार्षदों की कुल संख्या 6,900 के आसपास थी।

महायुति ने न सिर्फ अध्यक्ष पदों पर 213 का कब्जा किया, बल्कि पार्षदों में भी 48% से ज्यादा (लगभग 3,300) हासिल किए। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसे ‘रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन’ बताया, जो 2017 के 1,602 पार्षदों से दोगुना है।

लेकिन सवाल यह है कि गठबंधन की राजनीति में साथ रहकर भी MVA क्यों हारी? अलग लड़ने पर राज ठाकरे और शरद पवार जैसे दिग्गज क्यों फेल साबित हुए? और महायुति की सफलता के पीछे क्या राज था? आइए इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।

संगठन, रणनीति और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ से मिली महायुति को सफलता

महायुति की जीत कोई संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति और जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन का नतीजा है। सबसे पहले बीजेपी की संगठनात्मक ताकत को देखिए, तो बीजेपी ने 2024 विधानसभा चुनावों में 132 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन लोकल बॉडी में उसकी पैठ पहले से ही गहरी थी।

इस बार बीजेपी ने विदर्भ (100 में 58) और मराठवाड़ा (52 में 25) जैसे क्षेत्रों में साफ झाड़ू लगाई यानी विपक्षियों को छितर-बितर करते हुए क्लीन स्वीप की तरफ कदम बढ़ाया। बाकी जगहों पर अधिकतर उसके ही राज्य-केंद्र के सहयोगी जीते। विदर्भ में महायुति ने कुल 73 सीटें लीं, तो विपक्षी गठबंधन की कॉन्ग्रेस को चंद्रपुर जैसी एक-दो जगहों पर ही सफलता मिली।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी का ‘मोदी फैक्टर’ यहाँ काम आया, खासकर केंद्र की योजनाओं जैसे PMAY, उज्ज्वला और जल जीवन मिशन का प्रचार स्थानीय स्तर पर प्रभावी रहा। फडणवीस की छवि ‘विकास पुरुष’ के रूप में भी काम आई, खासकर शहरी विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस से।

दूसरा बड़ा कारण रहा महायुति गठबंधन की ‘स्प्लिट स्ट्रैटेजी’। महायुति ने जहाँ जरूरी था, वहां सीट शेयरिंग की, लेकिन ज्यादातर जगहों पर अलग-अलग लड़ी। उदाहरण के तौर पर, पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित पवार की एनसीपी ने 60 में 12 सीटें जीतीं, जहाँ शरद पवार का गढ़ माना जाता था। बारामती जैसे गढ़ में अजित की जीत ने चाचा शरद को करारा झटका दिया। तो एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने कोंकण (27 में 10) और उत्तरी महाराष्ट्र (49 में 12) में अपनी मराठी मानुस की छवि को मजबूत किया।

सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग पोस्ट्स में लोग इसे ‘दुश्मनी का दाँव’ बता रहे हैं, जहाँ महायुति के दल एक-दूसरे से टकराए… लेकिन ये टकराव फ्रेंडली फाइट जैसी दिखी और विपक्षी गठबंधन की पार्टियों को कोई मौका तक नहीं मिला।

तीसरा स्थानीय मुद्दों पर फोकस। महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में पानी की किल्लत, सड़कें, कचरा प्रबंधन और रोजगार जैसे मुद्दे हावी थे। महायुति ने इन्हें केंद्र-राज्य की योजनाओं से जोड़कर प्रचार किया। इसी बदौलत शहरों में बीजेपी ने 10-15% वोट शेयर बढ़ा लिया। इसके अलावा EVM और चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों के बावजूद महायुति ने ‘पारदर्शिता’ का दावा किया। हिंदुस्तान टाइम्स के एनालिसिस में कहा गया कि महायुति की जीत ‘विपक्ष के फूट’ का फायदा रही।

चौथा और अहम कारण रहा महायुति के पक्ष में युवा और महिला वोटरों का झुकाव। साल 2024 विधानसभा में महिलाओं को 33% टिकट देने का फॉर्मूला यहाँ भी चला। महिलाओं ने ‘महायुति की महिला सशक्तिकरण’ योजनाओं की तारीफ की। कुल मिलाकर महायुति की सफलता ने साबित कर दिया कि ‘ट्रिपल इंजन’ अब लोकल लेवल पर भी दौड़ रहा है। यह जीत मुंबई, पुणे जैसे नगर निगम चुनावों के लिए बूस्टर डोज जैसे है।

एकता की परीक्षा में फेल, आंतरिक कलह का शिकार रही महाविकास आघाड़ी

महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में महाविकास आघाड़ी (MVA) की हार सिर्फ नंबरों की नहीं, बल्कि रणनीति और एकता की हार है। 2022 में सत्ता गँवाने के बाद MVA ने 2024 लोकसभा में कुछ संभलाव दिखाया था, लेकिन विधानसभा में 46% वोट शेयर के बावजूद हार गई।

अब लोकल बॉडी में 52 सीटें तक सिमट चुकी एमवीए के लिए यह खतरे की घंटी है कि कैसे वो एकजुटता से बिखरते ही निकाय चुनाव में धरातल पर आ गिरी। इन चुनावों में कॉन्ग्रेस को 36 सीटें तो मिली, लेकिन बाकी दोनों पार्टियाँ नाममात्र की लड़ाई भी नहीं लड़ पाईं। इन नतीजों के कारणों को कुछ इस तरह से समझते हैं कि…

पहला कारण रहा- गठबंधन में फूट: MVA ने सीट शेयरिंग की कोशिश की, लेकिन शिंदे और अजित गुट के गुट ने विपक्ष को नुकसान पहुँचा दिया। उदाहरणस्वरूप, जहाँ MVA ने शिंदे शिवसेना के खिलाफ लड़ा, वहां अजित NCP ने काउंटर किया। कोंकण में उद्धव की शिवसेना को महज 1 सीट मिली, जबकि शिंदे को 10। ऐसे में महाविकास आघाड़ी के लिए महायुति के एकदम विपरीत नतीजे ‘गठबंधन का कब्रिस्तान साबित हुए। वो सही जगह पर सही कॉम्बिनेशन के साथ सत्ता पक्ष को चैलेंज नहीं कर पाई

दूसरा कारण है- नेतृत्व संकट: उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने मराठी अस्मिता का कार्ड खेला, लेकिन ‘रिमोट कंट्रोल’ वाली उसकी छवि ने नुकसान ही किया। शरद पवार की एनसीपी (SP) को 8 सीटें मिलीं, लेकिन पश्चिमी महाराष्ट्र में अजित के सामने वे बौने साबित हुए। बारामती में शरद का ‘फेल’ होना प्रतीकात्मक है, जिसमें चाचा अपना ही गढ़ भतीजे के हाथों हार गया। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने विदर्भ में 23 सीटें लीं, लेकिन राज्य स्तर पर उसकी कमजोर संगठन ने बाकी क्षेत्रों में नुकसान किया।

तीसरा कारण रहा- मुद्दों पर फोकस की कमी: MVA ने महँगाई, बेरोजगारी और किसान मुद्दों पर प्रचार किया, लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास के एजेंडे में पीछे रही। टाइम्स ऑफ इंडिया के लाइव अपडेट्स में कहा गया कि विपक्ष ने EVM और पैसे के दुरुपयोग के आरोप लगाए, लेकिन सबूत न होने से जनता ने नकार दिया। मराठवाड़ा में MVA को 10 सीटें मिलीं, लेकिन BJP के 39 के आगे पूरा गठबंधन ही बौना साबित हुआ।

चौथा कारण रहा- राज ठाकरे का ‘जीरो’: महाराष्ट्र निकाय चुनाव में MNS ने अलग लड़कर क्या साबित किया? कुछ भी नहीं। मुंबई और ठाणे जैसे मराठी बहुल इलाकों में भी MNS का वोट शेयर 1% से नीचे रहा। ठाकरे का ‘माराठी मानुस’ नारा पुराना हो चुका, और युवा वोटर मोदी-फडणवीस के विकास मॉडल की ओर मुड़े। ZEE न्यूज के अनुसार, यह MNS की ‘राजनीतिक मौत’ है।

साथ रहकर हार, अलग लड़कर बेकार; कुछ ऐसा रहा MVA गठबंधन का हाल

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों को अगर देखें, तो ये MVA के लिए कुछ ऐसा रहा- ‘साथ में रहकर भी हार, अलग लड़े तो एकदम बेकार।’ MVA ने एकजुट होकर लड़ा, लेकिन आंतरिक खींचतान ने सब बर्बाद कर दिया। उद्धव और शरद के बीच सीट बँटवारे पर झगड़े हुए, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता दिखा। जबकि महायुति ने ‘स्प्लिट’ रणनीति से फायदा उठाया, जहाँ उनका आपसी टकराव हुआ, वहाँ भी कुल वोट शेयर 55% रहा।

राज ठाकरे की MNS का केस अलग: 2017 में 8% वोट शेयर वाली पार्टी अब महाराष्ट्र में अपना प्रभाव खो चुकी है। मीम्स में अब राज ठाकरे को ‘जीरो वाले हीरो’ कहा जा रहा है। वहीं, शरद पवार (83 वर्षीय) की उम्र और परिवारिक फूट ने NCP(SP) को कमजोर किया। साफ है कि अजित के साथ जाने वाले मराठा वोटरों ने शरद को छोड़ दिया है। इसके ‘जनरेशनल शिफ्ट’ भी कह सकते है।

क्षेत्रवाद समझें- कहाँ किसने मारी बाजी

विदर्भ- महायुति का किला: 100 में 73 सीटें। BJP का 58 का जलवा। MVA को 23 सीटें मिली, लेकिन कॉन्ग्रेस को… बाकी खाता भी नहीं खोल पाए।

मराठवाड़ा: महायुति ने 52 में 39 सीटें जीत ली, जिसमें BJP ने 25 सीटें जीती। साथी शिंदे गुट ने 8 सीटें जीती, जबकि MVA 10 पर सिमट गई।

पश्चिमी महाराष्ट्र: यहाँ भी महायुति का जलवा रहा। 60 में 45 सीटें महायुति ने जीती, जिसमें अकेले NCP ने 12 सीटें जीतकर अपना दबदबा दिखाया। रही सही कसर सहयोगियों ने पूरी कर दी।

उत्तरी महाराष्ट्र: इस जोन में भी महायुति का जलवा रहा। कुल 49 सीटों में से 36 पर BJP-SS ने जीत दर्ज की।

कोंकण: इस इलाके की 27 में 20 सीटों पर शिवसेना-शिंदे ने जीत हासिल की। ये एकनाथ शिंदे की मातृभूमि भी है।

भविष्य में नगर निगम और विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा असर

यह जीत महायुति को मुंबई, पुणे, BMC जैसे ब्रेन सेंटर के लिए मजबूत करेगी। वो बढ़े हुए मनोबल के साथ मैदान में उतरेगी। वहीं महाविकास आघाड़ी को विधानसभा चुनाव से पहले अपनी पूरी रणनीति को रीसेट करने की जरूरत है।

महाराष्ट्र की जनता ने सिखाए सियासत के नए सबक

महाराष्ट्र की यह जंग बता गई कि गठबंधन में एकता जरूरी है। हालाँकि बिना ठोस रणनीति के एक होकर लड़ना भी कोई फायदा नहीं दिला पाएगा। चूँकि यहीं पर महायुति ने साबित कर दिया कि ‘विभाजन’ भी जीत का हथियार हो सकता है।

वैसे हाल के विधानसभा चुनाव को छोड़कर उससे पहले का विधानसभा चुनाव (2019) देखें, जिसमें बीजेपी और शिवसेना ने अलग-अलग होकर चुनाव लड़ा था और एनसीपी-कॉन्ग्रेस को अलग-थलग करके चुनाव हरा दिया था। वो जीत इस निकाय चुनाव की जीत जैसी ही दिखती है। हालाँकि तब 4 दल आपस में लड़ रहे थे, लेकिन इस बार दलों की संख्या 6 हो गई, जिसमें सबसे मजबूत 3 दलों ने मिलकर MVA के तीन दलों की पूरी राजनीति ही बर्बाद करके रख दी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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