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हिंदुओं का नरसंहार- बकवास, पाकिस्तान की पोल खोलना- प्रोपगेंडा: ध्रुव राठी की Video में जाहिलपन और मुस्लिम प्रेम ही एजेंडा

आखिरकार जर्मनी में बैठकर खुद को भारत का ‘शुभचिंतक’ होने का दावा करने वाले ध्रुव राठी ने आदित्य धर की फिल्म ‘धुरंधर’ का काउंटर वीडियो निकाल ही दिया। लोग इसी इंतजार में बैठे थे, क्या सच में? क्योंकि वीडियो पर आई लोगों की प्रतिक्रिया को देखकर तो ऐसा लगता नहीं है। काउंटर वीडियो से पहले ध्रुव राठी की हवाबाजी का भी कोई असर लोगों पर नहीं पढ़ा। लेकिन जब सोशल मीडिया पर ट्रोल हुए, तो ध्रुव राठी वीडियो पर कमेंट ऑफ करके बैठ गए।

जी हाँ, तो हम आपको बताते हैं कि आखिर ध्रुव राठी ने अपनी वीडियो में ऐसी क्या आग लगाई, जिससे उसे कमेंट ही ऑफ करने पढ़ गए। ये हम आपको इसलिए बता रहे हैं, ताकि वीडियो देखने के बाद आप ये न कहें कि जितना सोचा था, उतना तो वीडियो में कुछ नहीं था और आपका समय भी जाया न जाए।

ध्रुव राठी का अगला पेशा ‘फिल्ममेकिंग’?

‘धुरंधर’ फिल्म के काउंटर वीडियो में अगर ध्रुव राठी को लेकर बात होनी चाहिए, तो वह है उसकी फिल्ममेकिंग स्किल्स पर। क्या कॉपी किया है, वाह! वीडियो के शुरुआत में वह अपनी एक काल्पनिक ‘ऑपरेशन भवंडर’ नामक फिल्म के कुछ सीन दिखाते हैं, जो धुरंधर से ही प्रभावित है। पर वीडियो की शुरुआत फिल्म से करने का यहाँ असली मकसद देश का नेतृत्व करने वाले सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को ‘सुरेंदर गोभी’ बुलाकर जाहिलपन के अलावा कुछ नहीं है।

और रही बात ध्रुव राठी की अपनी फिल्म की तुलना ‘धुरंधर’ से करने की, तो यह हो ही नहीं सकता। ‘ऑपरेशन भवंडर’ बनाने पर ध्रुव राठी केवल इसीलिए मजबूर हुए क्योंकि एक बार उन्होंने ही कहा था- “अगर किसी को फिल्म से दिक्कत है, तो जा बना लो अपनी मूवी और जो दिखाना है दिखाओ।”

तो ध्रुव राठी ने दिखा दिया, जो वह लोगों को दिखाना चाहते थे। हमेशा की तरह भारत का ‘शुभचिंतक’ बनते हुए सरकार को निशाना बनाना। वैसे भी उनकी फिल्म पूरी ‘नकलची’ है, तो शायद वे इस पेशे में भी केवल नकल करके ही आगे बढ़ पाएँगे। वैसे ही जैसे वो अपना यूट्यूब चैनल सरकार को कोसकर चला पा रहे हैं।

‘धुरंधर’ प्रेरित या काल्पनिक फिल्म?

ध्रुव राठी की वीडियो में आगे बढ़ेंगे तो यहाँ प्रेरित (Inspirational) और काल्पनिक (Fictional) पर ज्ञान देने की कोशिश की जाती है। ध्रुव राठी को आपत्ति होती है कि कैसे एक बॉलीवुड फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रभावित हो सकती है और इसे ‘झूठा प्रोपेगेंडा’ करार देते हैं। क्योंकि उनके अनुसार जासूस केवल ‘टाइगर’ और ‘पठान’ फिल्मों की तरह होते हैं, जो विदेश में घूमकर केवल ‘चटपटे’ गानों पर नाचते हैं और ‘लव स्टोरी’ की आड़ में दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। वहीं धुरंधर में जासूस का किरदार एक गंभीर व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, जिसे देश की परवाह है और अपने टारगेट से बिल्कुल नहीं भटका है। तो यह उनके मनमुताबिक सही नहीं है।

यहाँ बहस प्रेरित और काल्पनिक को लेकर है। भारत की घटनाओं से प्रभावित फिल्म पर बात करते हुए ध्रुव राठी ‘हिटलर’ तक पहुँच जाते हैं। माना कि वह NRI हैं, लेकिन देश के मुद्दों पर बात करते हुए विदेशी उदाहरण देना कहाँ तक ठीक है? वो भी एक ऐसे नाम से, जो तानाशाही के लिए जाना जाता है जबकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। फिर ध्रुव राठी कहते हैं कि वे भारत के ‘शुभचिंतक’ हैं।

फिल्म में कितना प्रोपेगेंडा है?

ध्रुव राठी के मुताबिक, फिल्म एक प्रोपेगेंडा है। लेकिन कितना है और कितना नहीं, यह भी वह खुद ही सेट करना चाहते हैं। प्रोपेगेंडा बताने के लिए वह एक सच्ची घटनाओं से ‘प्रभावित’ फिल्म को तथ्यों से साबित करने में लगे हैं। पाकिस्तान में जासूस भेजने पर सरकार का इनकार हो या फिल्म में रहमान डकैत की मौत का सच हो। वे इस कहानी को मीडिया के आर्टिकल्स को दिखाकर झूठ बताने की कोशिश कर रहे हैं। वो भी पाकिस्तानी मीडिया से। और दूसरी तरफ वे फिल्म के ‘प्रभावित’ होने के बावजूद उसमें दिखाई गई सच्ची घटनाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।

वीडियो में वह बताते हैं कि ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘द ताज स्टोरी’ जैसी सच पर आधारित फिल्में इनके लिए बकवास हैं, जिनके नाम पर वे लिबरल और वामपंथी लोगों को अपनी यूट्यूब ऑडियन्स बनाने में सफलता हासिल कर चुके हैं। अब बारी है ‘धुरंधर’ से दर्शक बँटोरने की, जिसको वो खुद भी एक ‘आकर्षक’ फिल्म मानते हैं। चूँकि फिल्म दुनियाभर में 800 करोड़ से ऊपर की कमाई कर चुकी है।

मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश

इतना ही नहीं वीडियो में मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश की गई और हिंदुओं को निशाना बनाया गया। ध्रुव राठी ने वीडियो में दावा किया कि 1947 से अब तक हुए हमलों में हिंदू और मुस्लिम दोनों की भागीदारी है। लेकिन वह एक भी ऐसा हमला नहीं बता पाते, जिसमें हिंदू ‘आतंकवादी’ हो।

उनका कहना है कि अगर एक हिंदू ISI की मुखबिरी करे तो वो सिर्फ हिंदू है, जबकि मुस्लिम आतंकी हमले में शामिल हो तो वह पूरे मजहब की देशभक्ति पर सवाल उठाया जाता है। लेकिन ध्रुव राठी यह बताना भूल गए कि ‘आतंकी हमलों’ का मकसद ही काफिरों के खिलाफ जिहाद होता है। शायद वह भूल गए कि पहलगाम हमले में धर्म पूछकर गोली मारी गई थी।

यहाँ देशभक्ति पर सवाल क्यों न उठाया जाए? जब देश में रहते हुए एक मुस्लिम को ‘वंदे मातरम’ बोलने में आपत्ति है, जो कि एक देशभक्ति गीत है। यहाँ ध्रुव राठी का मुस्लिमों के हित में बात कर भारत के मुस्लिमों से सब्सक्राइबर्स बँटोरने का उद्देश्य दिखाता है, क्योंकि पहले से ही उनकी आधी ऑडियन्स पाकिस्तान की है।

कॉन्ग्रेस का बचाव करने का प्रयास

ध्रुव राठी की वीडियो के मुताबिक, फिल्म में दिखाया गया कि 26/11 मुंबई हमले का खुफिया इनपुट होने के बावजूद कॉन्ग्रेस सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया। जबकि फिल्म में तत्कालीन सरकार को लेकर बात तक नहीं की गई। यहाँ ध्रुव राठी काउंटर करने के लिए ‘मोदी सरकार’ में हुए आतंकी हमले की पहले से खुफिया इनपुट होने का दावा करते हैं, वो भी विदेशी सोर्स से।

यहाँ लोगों को यह दर्शाया जा रहा है कि देश पर आतंकी हमला होना विफलता है, जबकि यह बताना जरूरी नहीं समझते कि क्या हमलों की वजह क्या थी और करने वाला कौन था? इन्होंने यहाँ उन्होंने केवल कॉन्ग्रेस की छवि को सुधारना चुना, बिना जनता को अहम जानकारी दिए।

वीडियो के आखिर में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और जवाहरलाल नेहरू का जिक्र करने से खुद को नहीं रोक पाते हैं। उनको परेशानी हो गई कि इनका नाम आजकल संसद में ज्यादा सुनने लगा है, वह भी नैगेटिव रोल में। लेकिन पीएम मोदी को ‘सुरेंदर गोभी’ कहना उनके मुताबिक सही है। पीएम मोदी और उनकी माताजी को गाली देने वालों पर उन्होंने चुप्पी साधी। आखिर में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेकर चेतावनी दी कि अगर भवंडर बन गई, तो आप क्या करेंगे? इससे साफ है कि ध्रुव राठी अपनी अधिकतर वीडियो की तरह बिना बीजेपी और पीएम मोदी का नाम लिए व्यूज नहीं बँटोर सकते हैं। यह उनकी कन्टेन्ट स्ट्रैटजी बन गई है।

क्या है ISRO का ड्रॉग पैराशूट, जिसका रेल की पटरी पर किया गया ट्रायल: जानिए मनुष्य को अंतरिक्ष से लाने वाला ये सफल परीक्षण गगनयान के लिए कितना अहम

गगनयान मिशन की सुरक्षा के लिए अहम ‘ड्रॉग पैराशूट’ का सफल परीक्षण कर इसरो ने बड़ी कामयाबी हासिल की है। यह सफलता देश के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को भरोसेमंद और सुरक्षित बनाने की दिशा में निर्णायक कदम है। 18-19 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ में ये परीक्षण टर्मिनल बैलिस्टिक रिसर्च लेबोरेटरी यानी TBRL की रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS) पर किया गया।

‘गगनयान’ की दिशा में बड़ा कदम

गगनयान क्रू मॉड्यूल विकास के लिए ड्रॉग पैराशूट का यह क्वालिफिकेश टेस्ट है। यह परीक्षण गगनयान क्रू मॉड्यूल के डिसेलेरेशन सिस्टम यानी गति को कम करन वाली सिस्टम को विकसित करने के लिए किए गए। गगनयान क्रू मॉड्यूल में 4 तरह के कुल 10 पैराशूट शामिल हैं।

इसका मकसद मुश्किल परिस्थियों में भी ड्रॉग पैराशूट की विश्वसनीयता बनी रहे और सफलतापूर्वक क्रू मेंबर्स टचलेंडिंग कर सकें, इसके लिए की गई है। इस दौरान ये भी सामने आया कि उड़ान की स्थितियों में बदलाव के बावजूद पैराशूट मजबूत और सक्षम था। इसमें डीआरडीओ, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र और एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने अहम योगदान दिया है।

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी 2026 में बिना क्रू वाले गगनयान मिशन के पहले लॉन्च की तैयारी कर रही है।

केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने एक्स पर ट्वीट कर कहा कि भारत मानव स्पेस मिशन की दिशा में एक कदम और बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि ISRO ने 18-19 दिसंबर 2025 को चंडीगढ़ में TBRL की RTRS फैसिलिटी में गगनयान क्रू मॉड्यूल के लिए ड्रॉग पैराशूट डिप्लॉयमेंट क्वालिफिकेशन टेस्ट सफलतापूर्वक पूरे किए।

उन्होंने कहा कि इन टेस्टों ने अलग-अलग फ्लाइट कंडीशंस में ड्रॉग पैराशूट के परफॉर्मेंस और भरोसेमंद होने की पुष्टि करता है। यह भारत के मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन के लिए पैराशूट सिस्टम को क्वालिफाई करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

क्या है ड्रॉग पैराशूट

ड्रॉग पैराशूट छोटे कॉनिकल रिबन तरह की पैराशूट होती है, जिनका व्यास 5.8 मीटर होता है। ये क्रू मॉड्यूल के पृथ्वी पर उतरने से पहले काम करने वाले पैराशूटों में से है। इन्हें पायरो-आधारित उपकरणों (मोर्टार) के भीतर पैक किया जाता है, जो कमांड मिलने पर इन्हें बाहर निकालते हैं।

ड्रॉग पैराशूट अंतरिक्ष यान को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसकी गति को कम करता है और उसे स्थिर करता है, ताकि बाद में मेन पैराशूट पूरी तरह सुरक्षित खुल सके और अंतरिक्ष यान की गति को और कम किया जा सके। ये प्रक्रिया अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए बेहद जरूरी है। किसी भी अंतरिक्ष यान के लिए ये प्रक्रिया सबसे जटिल मानी जाती है।

गगनयान क्रू मॉड्यूल की डिसेलेरेशन सिस्टम में चार अलग-अलग तरह के कुल 10 पैराशूट हैं। शुरुआत दो ‘एपेक्स कवर सेपरेशन’ पैराशूट से होती है। ये सबसे पहले पैराशूट कम्पार्टमेंट के सुरक्षा कवच को अलग करते हैं।

इसके बाद दो ड्रॉग पैराशूट आते हैं, जो घूमते हुए मॉड्यूल को स्थिर करने और उसकी स्पीड को सुरक्षित लेवल तक कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

एक बार जब ड्रॉग अपना काम पूरा कर लेते हैं , तो सीक्वेंस में तीन पायलट पैराशूट बाहर निकलते हैं। ये पायलट फिर तीन बड़े मेन पैराशूट निकालते हैं, जो क्रू मॉड्यूल की वेलोसिटी को और कम करते हैं ताकि मिशन में सवार एस्ट्रोनॉट्स के लिए सुरक्षित टचडाउन यानी जमीन या समुद्र में उतरना सुनिश्चित किया जा सके।

ड्रॉग पैराशूट खास तौर पर बहुत जरूरी होते हैं, क्योंकि उन्हें अंतरिक्ष यान के वायुमंडल में घुसने के तुरंत बाद काम करना होता है। ये बहुत डायनामिक फेज होता है, जहाँ एयरोडायनामिक लोड और फ्लाइट की स्थिति दोनों में काफी बदलाव होते हैं।

इस परीक्षण का मकसद बहुत ज्यादा और असामान्य स्थितियों में ड्रॉग पैराशूट के परफॉर्मेंस, विश्वसनीयता और मजबूती को अच्छी तरह से वेरिफाई करना था। RTRS-आधारित दोनों ट्रायल ने सभी तय लक्ष्यों को पूरा किया। इससे यह साबित हुआ कि सिस्टम फ्लाइट पैरामीटर में बड़े बदलावों को झेल सकता है और सफलतापूर्वक काम कर सकता है।

रेल ट्रैक से ‘गगन’ की सैर

रेल की पटरियों पर हम अंतरिक्ष की सैर की कल्पना भी नहीं कर सकते, लेकिन इसरो ने इसे सच कर दिखाया है। मिशन गगनयान के सबसे मुश्किल प्रक्रिया में से एक क्रू मॉड्यूल के धरती में प्रवेश करने के दौरान अपनाने वाली प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कर।

रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड का उपयोग करना इसरो की इंजीनियरिंग सूझबूझ को दर्शाता है। ये सफलता बताता है कि भारत अपने पहले मानव मिशन की दिशा में तकनीकी तौर पर तेजी से बढ़ रहा है साथ ही ये भी सुनिश्चित कर रहा है कि सुरक्षा मानको पर 100 फीसदी खड़ा उतरे।

इसरो ने टेस्ट के सफल समापन को गगनयान पैराशूट सिस्टम को मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए क्वालिफाई करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम बताया।

वही व्यवस्था टिकेगी जो जमीन से उठी हो, संगठन में तपी हो, जिसके केंद्र में राष्ट्र हो: BJP के ‘नवीन’ प्रयोग के निहितार्थ

राजनीतिक निर्णय मोटे तौर पर पर दो प्रकार के होते हैं। एक, तुरंत शोर मचाते हैं। सुर्खियाँ बटोरते हैं। दूसरे, बिना शोर किए राजनीति की दिशा बदल देते हैं। नितिन नवीन (Nitin Nabin) का भारतीय जनता पार्टी (BJP) का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाना दूसरे प्रकार का निर्णय है।

नितिन नवीन को यह दायित्व न तो भावनात्मक लहर से मिली है। न ही यह किसी तात्कालिक चुनावी मजबूरी का प्रतिफल है, भले कुछ लोगों को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और नवीन की जाति (कायस्थ) में कनेक्शन दिखता हो।

यह एक सुनियोजित संगठनात्मक निर्णय है। इसका अर्थ आज से कहीं अधिक, आने वाले वर्षों में समझ आएगा। यह फैसला बीजेपी की उस राजनीतिक प्रक्रिया की उपज है, जिसे पार्टी दशकों से धैर्य के साथ गढ़ती आई है। इस प्रक्रिया में कोई भी पहले कार्यकर्ता बनता है और फिर नेता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक के पुत्र हैं।

यह प्रक्रिया वंशवाद के स्तर पर भी दूसरे दलों से बीजेपी को अलग करती है। सुनिश्चित करती है कि राजा का बेटा ही राजा नहीं बनेगा। उसे भी संगठन के अन्य बेटों की तरह जमीन पर खुद को खपाना होगा। बार-बार खुद को साबित करना होगा। उसे जो कुछ भी प्राप्त होगा, वह उसके पिता के कार्य या नाम के आधार पर नहीं होगा। उसे अपने सामर्थ्य से उसे लेना होगा।

नितिन नवीन का यह उभार आकस्मिक नहीं। इस निर्णय ने फिर से यह स्पष्ट कर दिया है बीजेपी में नेतृत्व का रास्ता ड्राइंग रूम या मम्मी की कोठरी से नहीं निकलता। वह संगठन की धूल भरी पगडंडियों से होकर गुजरता है।

राहुल गाँधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव जैसे लोग जिन्हें राजनीतिक कद विरासत में मिली है, उनके महिमामंडन के लिए ‘युवा’ शब्द का भारतीय राजनीति में इतना दुरुपयोग हो चुका है कि अब किसी नेतृत्व को युवा बताना उसे कमतर आँकने जैसा लगता है। फिर भी नितिन नवीन को केवल युवा चेहरा कहकर निपटा देना भारी भूल होगी, क्योंकि भाजपा में युवा होना केवल महिमामंडन के लिए ही उपयोगी नहीं है। इसका अर्थ होता है उनकी राजनीति में युवाओं जैसी बेचैनी, जोखिम और संघर्ष का दिखना।

यहाँ दायित्व कई परीक्षाओं को उतीर्ण करने के बाद प्राप्त होता है। यह ‘वंश वृक्ष’ से नहीं निकलता। संगठन की पाठशाला में तपकर आता है। नितिन नवीन इसी पाठशाला से निकले एक युवा नेतृत्व हैं। उन्होंने बूथ से लेकर बिहार की सड़कों पर राजनीति सीखी है। फाइलों और फैसलों से टकराकर खुद को सींचा है। फिर राष्ट्रीय भूमिका में प्रवेश किया है।

नितिन नवीन एकमात्र युवा नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी में नेतृत्व उत्तराधिकार से नहीं, प्रदर्शन से मिला है। अनुराग ठाकुर, तेजस्वी सूर्या, पुष्कर सिंह धामी जैसे उदाहरण पार्टी में भरे पड़े हैं। ये सभी बताते हैं कि युवा नेतृत्व का अर्थ उम्र से ही नहीं है। यह अथक परिश्रम और अनुशासन से आता है। उत्तराधिकार और प्रदर्शन का यह अंतर नितिन नवीन या अनुराग ठाकुर के पिता का नाम उल्लेख करने से कमतर नहीं हो जाता है। यही अंतर आज भारतीय राजनीति की दिशा तय कर रही है। आगे करती रहेगी।

बीजेपी का युवा नेतृत्व मॉडल उन कार्यकर्ताओं के लिए उम्मीद बनता है, जो अन्य दलों में भैया/दीदी/भौजी का जिंदाबाद करते, पोस्टर लगाते और दरी बिछाते खत्म हो जाते हैं। बीजेपी का संदेश साफ है- संगठन में खुद को झोंककर रखोगे तो शीर्ष तक जाओगे।

दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस, सपा या राजद जैसे दलों के कार्यकर्ताओं को पता होता है कि शीर्ष पर पहुँचने के लिए उन्हें अपना बाप बदलना पड़ेगा। इसलिए नितिन नवीन का राष्ट्रीय स्तर पर आना, राहुल-अखिलेश-तेजस्वी जैसों की राजनीति के लिए सीधी चुनौती है। बीजेपी यह चुनौती भाषणों से नहीं, संरचना से दे रही है।

वंशवादी राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह खुद को बदल नहीं सकती। कथित प्रयोगों के नाम पर भी वह​ हर बार ‘नई पैकिंग में पुराना माल’ ही परोसती है। इसके उलट बीजेपी पुराने ढाँचे में नए लोगों को जिम्मेदारी देती है। संगठन चलता रहता है, चेहरे बदलते रहते हैं। आज नितिन नवीन हैं। कल कोई और होगा। लेकिन इसे प्राप्त करने की पात्रता नहीं बदलेगी। यही वह बात है जो उसे इस देश के अन्य सभी राजनीतिक दलों से अलग करती है।

बीजेपी आज जो कुछ कर रही है, वह केवल सत्ता में बने रहने की राजनीतिक लड़ाई नहीं है। यह राजनीतिक संस्कृति गढ़ने की भी लड़ाई है। यही क्रम चलता रहा तो आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति की संस्कृति भी दो हिस्सों में साफ बँटी दिखेगी।

एक तरफ बीजेपी जैसी पार्टी होगी। जहाँ नेतृत्व तैयार किया मिलेगा। संगठन गतिमान रहेगा। दूसरी ओर वे वंशवादी दल होंगे, जहाँ नेतृत्व विरासत में मिला होगा। कार्यकर्ता हाशिए पर रहेंगे और संगठन मृत दिखेगा।

नितिन नवीन का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनना कोई सामान्य संगठनात्मक फेरबदल ही नहीं है। यह एक स्पष्ट राजनीतिक घोषणा है कि बीजेपी भविष्य को संयोग के भरोसे नहीं छोड़ेगी। वह नेतृत्व तैयार कर रही है जो उसकी यात्रा को आगे लेकर जाएगी।

यह निर्णय उन दलों के लिए चेतावनी भी है, जो अब भी यह मानकर चल रहे हैं कि राजनीति उनकी खानदानी जागीर है। समय ने इस सोच वाली राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। अब चेहरा नहीं, चरित्र महत्वपूर्ण है। उपनाम नहीं, उपयोगिता मायने रखती है।

इस बदलाव के कारण धीरे-धीरे हाशिए की ओर जा रही राहुल गाँधी, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसों की पारिवारिक राजनीति को एक दिन उस पाताल में पहुँचा देगी, जहाँ से ऐसी राजनीति की वापसी संभव नहीं होगी। उस दिन यह पूरी तरह सुनिश्चित हो जाएगा कि भारतीय लोकतंत्र में वही राजनीतिक व्यवस्था टिकेगी

जो जमीन से उठी हो। संगठन में तपी हो। जिसके केंद्र में राष्ट्र हो।

विरोध प्रदर्शन के नाम पर हल्ला, हिंदुओं का उत्पीड़न करके सब शांत: बांग्लादेश से लेकर पाकिस्तान के कट्टरपंथियों का पैटर्न एक, पहला नहीं है ‘दीपू चन्द्र’ केस

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मचाया जा रहा बवाल हर जगह सुर्खियों में है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर लूट, हिंसा और हत्याओं को जिस तरह अंजाम दिया जा रहा है ये किसी से छिपा नहीं है। इस बीच दीपू चंद्र नाम के हिंदू का नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। दीपू इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता का शिकार हुआ एक नाम है जिसे ईशनिंदा के इल्जाम में घेरकर मार दिया गया।

सोशल मीडिया पर दीपू की सारी वीडियोज मौजूद हैं। किसी में वो थाने में बैठा दिख रहा है, किसी में वो इस्लामी कट्टरपंथियों से घिरा दिख रहा है, किसी में सैंकड़ों कट्टरपंथी उसे नंगा करके मार रहे हैं और किसी में उसे पेड़ से लटकाकर जलाया जा रहा है।

ये वीडियोज इतनी हृदयविदारक हैं कि एक सामान्य इंसान के लिए इन्हें देखना मुश्किल हो जाए। जैसे-जैसे लोगों के पास ये वीडियो पहुँच रही है उसके साथ सवाल भी उठ रहे हैं कि बांग्लादेश में हिंदू किस डर-दहशत में रह रहे हैं।

विरोध प्रदर्शन का पुराना ‘खूनी पैटर्न’

खैर! इस वक्त चूँकि बांग्लादेश में हिंसा की चर्चा हर जगह है इसलिए हम और आप दीपू पर बात भी कर रहे हैं वरना हकीकत तो यही है कि इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शन का यही पैटर्न है। वो पहले किसी मुद्दे के नाम पर विरोध करने सड़क पर आते हैं और अंत हिंदुओं के साथ उत्पीड़न, महिलाओं पर हत्याचार और हत्याओं से ही होता है।

बांग्लादेश में करीब 1 साल ही हुआ है जब शेख हसीना को सत्ता से निकालने के लिए हिंसा भड़की थी। उस समय उसे छात्रों का प्रदर्शन कहकर सराहा जा रहा था पर जमीन पर क्या हो रहा था वो याद है क्या आपको? उस हिंसा में 100+ मौत हुई थी जिसमें हिंदू पार्षद हरधन रॉय हारा और काजल रॉय जैसे लोगों के नाम शामिल थे। इस्लामी कट्टरपंथियों ने उस हिंसा में भी चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया था। न नेता छोड़े गए थे और न ही पत्रकार न कलाकार।

कट्टरपंथियों ने सबको निशाना बनाया था और जिन्हें छोड़ा था उनकी आपबीती और ज्यादा दर्दनाक थी। हिंदू महिलाओं को दो विकल्प दिए गए थे या तो वो रेप करवाएँ-घर लुटवाएँ या फिर अपने परिजनों की मौत होते सामने देखें।

ईशनिंदा: अल्पसंख्यकों के खिलाफ सबसे आसान हथियार

ये आईना सिर्फ 1 साल पहले छात्र क्रांति के नाम पर फैलाई गई हिंदू विरोधी हिंसा का नहीं, बल्कि इतिहास में हुए ज्यादातर इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन की सच्चाई है जिसे शुरुआत में विरोध का नाम दिया जाता और उसका अंत हिंदुओं के उत्पीड़न व कत्ल से होता है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जब नारा-ए-तकबीर और अल्लाह-हू-अकबर जैसे नारों की गूँज के बीच हिंदू मार दिए गए।

बांग्लादेश जैसे इस्लामी मुल्कों में हिंदुओं के उत्पीड़न के लिए के लिए ईशनिंदा जैसे इल्जाम एक बहुत आसान हथियार है जिसका इस्तेमाल ये कभी भी किसी के भी खिलाफ कर लेते हैं। इसी साल की बात करें चटगाँव के पटेंगा काठगढ़ में हिंदू युवक को मुस्लिम भीड़ ने अगवा करके जमकर प्रताड़ित किया था। लड़के का नाम प्रांत तालुकदार था। भीड़ ने उस समय उस पर भी ईशनिंदा का आरोप लगाया था।

इसी तरह दिसंबर 2024 में एक घटना सामने आई थी जब आकाश दास नाम के युवक पर ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर इस्लामी भीड़ विरोध करने सड़क पर आई थी और उसका अंत उन्होंने 130 हिंदू घरों व 20 मंदिरों को जलाकर किया था।

इससे पहले नवंबर 2024 में करीमगंज उपजिला में रहने वाले रिदॉय रोबी दास की हत्या कर दी गई थी। रिदॉय नाई का काम करता था और उन्हें 3 मौलानाओं ने किडनैप कर बुरी तरह पीटा और यातनाएँ दी, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी। इसमें मौलानाओं ने मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध का कारण बताया था।

उससे पहले अक्तूबर 2024 में एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने हृदय पाल नामक एक हिंदू लड़के पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगाकर फरीदपुर जिले के बोलमारी में कादिरदी डिग्री कॉलेज को घेर लिया था और मारने की कोशिश की गई थी।

अफवाहें और सरहद पार की दरिंदगी

बांग्लादेश के खगराचारी और रंगमती में मुस्लिम भीड़ ने धनंजय और रुबेल त्रिपुरा नामक हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्या की थी। यह हिंसा एक मुस्लिम अपराधी की मौत के बाद फैलाई गई अफवाह के कारण हुई थी। जिसमें जनजातीय और अल्पसंख्यक समुदायों ने बंगालियों पर हमला बताया था।

एक और मामला पाकिस्तान के सियालकोट से सामने आया था, जहाँ एक श्रीलंकाई शख्स प्रियांथा कुमारा को ईशनिंदा के आरोप में उग्र इस्लामी भीड़ ने प्रताड़ित किया था और जलाकर मार डाला था। इस भयानक और दर्दनाक घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

यह इस बात की गवाह है कि बांग्लादेश में हिंदू होना अब अपनी जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। ईशनिंदा का आरोप कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों के लिए हिंदुओं के कत्ल का एक ‘लाइसेंस’ बन चुका है। दीपू चंद्र की जलती हुई चिता और रिदॉय रोबी दास जैसी नृशंस हत्याएँ यह साबित करती हैं कि जब मजहबी उन्माद सर चढ़कर बोलता है, तो कानून और इंसानियत दोनों दम तोड़ देते हैं।

सबसे डरावनी बात यह है कि इन हमलों को अक्सर ‘जन आक्रोश’ या ‘राजनीतिक विरोध’ का जामा पहना दिया जाता है, जबकि हकीकत में यह हिंदुओं के खिलाफ एक सोची-समझी नफरत है। पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, पैटर्न एक ही है- अफवाह फैलाओ, भीड़ जुटाओ और हिंदुओं को खत्म कर दो। यदि दुनिया ने अब भी इन कट्टरपंथियों के खूनी खेल पर चुप्पी नहीं तोड़ी, तो दक्षिण एशिया से अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने की यह साजिश सफल हो जाएगी।

1200+ पीड़ित, युवतियों के साथ बाथटब में क्लिंटन और बिल गेट्स-माइकल जैक्सन-ट्रंप का जिक्र: जानें एपस्टीन फाइल्स में क्या-क्या मिला?

अमेरिका के न्याय विभाग ने शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को दुनिया के सबसे विवादित सेक्स स्कैंडल ‘जेफ्री एपस्टीन फाइल्स’ से जुड़े तीन लाख दस्तावेज सार्वजनिक किए। यह खुलासा कॉन्ग्रेस द्वारा पास किए गए कानून ‘एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ के तहत हुआ। इन दस्तावेजों में कोर्ट रिकार्ड, ईमेल, फोटो, वीडियोज और जाँच से जुड़ी सामग्री शामिल है।

इन फाइलों में जेफ्री एपस्टीन और उसकी सहयोगी गिस्लेन मैक्सवेल द्वारा नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के कई सबूत सामने आए हैं। इसके अलावा कई हाई-प्रोफाइल हस्तियों और नेताओं के नाम भी दस्तावेजों में आए। हालाँकि, बड़ी संख्या में कंटेंट रेडैक्ट की गई है ताकि पीड़ितों की पहचान सुरक्षित रहे, जाँच प्रभावित न हो और आपत्तिजनक तस्वीरें सार्वजनिक न हों।

यह खुलासा अमेरिका और पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। नई तस्वीरें और दस्तावेज दिखाते हैं कि कैसे एपस्टीन ने अपनी ताकत, पैसा और संपर्कों का इस्तेमाल कर नाबालिग लड़कियों का शोषण किया।

दस्तावेजों में क्या है?

न्याय विभाग ने 4 बड़े डेटा सेट में हजारों दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं। इन फाइलों में कोर्ट रिकार्ड, ईमेल, ऑडियो रिकॉर्डिंग्स, फोटो और वीडियो शामिल हैं। फाइलें न्याय विभाग की वेबसाइट पर अपलोड की गईं लेकिन भारी ट्रैफिक के कारण साइट पर यूजर्स को इंतजार करना पड़ा।

कई पन्नों पर पीड़ितों की पहचान सार्वजनिक करने से बचने के लिए नाम और फोटो ब्लैक बॉक्स से छिपाए गए हैं। 254 मसाज थेरेपिस्ट की सूची पूरी तरह से रेडैक्ट की गई है। कुछ तस्वीरों में अर्धनग्न अवस्था में या नग्न अवस्था में महिलाएँ दिखाई दे रही हैं, जिनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए ब्लैक बॉक्स लगाए गए हैं।

विशेष फोटो और फाइलों में बिल क्लिंटन को हॉट टब में, क्लिंटन और गिस्लेन मैक्सवेल को पूल में, राजकुमार एंड्रू को पाँच महिलाओं की गोद में लेटे हुए और एपस्टीन के घर की सुरक्षा कैमरा फुटेज, वॉइस रिकॉर्डर और VHS टेप जैसी चीजें शामिल हैं।

हाई प्रोफाइल लोगों का नाम आया सामने

दस्तावेजों में कई हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों का नाम आया। इनमें से सबसे चर्चा बिल क्लिंटन की तस्वीरों को लेकर है। क्लिंटन हॉट टब में और पूल में मैक्सवेल के साथ नजर आए। हालाँकि, उन्होंने कभी भी इन आरोपों में सीधे तौर पर गलती स्वीकार नहीं की।

मिक जैगर और माइकल जैक्सन भी एपस्टीन के सोशल सर्कल में दिखाई दिए। कोई भी प्रत्यक्ष अपराध का सबूत नहीं मिला लेकिन उनकी मौजूदगी सार्वजनिक हुई हैं। राजकुमार एंड्रू की तस्वीरें भी जारी की गईं, जिसमें वह पाँच महिलाओं की गोद में लेटे हुए नजर आए। एंड्रू ने इन आरोपों का हमेशा खंडन किया है।

डोनाल्ड ट्रंप के नाम एपस्टीन की नोटबुक में आए लेकिन किसी भी फाइल में उनके सीधे अपराध का सबूत नहीं है। ट्रंप ने पहले फाइल्स के रिलीज के खिलाफ विरोध किया लेकिन कॉन्ग्रेस के दबाव के बाद कानून पास होने पर दस्तावेज सार्वजनिक किए गए हैं।

बॉडी मसाज के नाम पर बुलाई जाती थी नाबालिग लड़कियाँ, फिर होता था शोषण

इनसे पता चला कि 250 से अधिक नाबालिग लड़कियों का शोषण किया गया था। साथ ही, इन दस्तावेजों में 1,200 से अधिक पीड़ितों या उनके परिवारों से जुड़ी जानकारी भी सामने आई है। कई लड़कियों का यौन शोषण एपस्टीन और मैक्सवेल ने 10 साल तक किया।

नई तस्वीरों में महिलाओं के शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर व्लादिमीर नाबोकोव के उपन्यास ‘लोलिता’ के अंश लिखे मिले है। यह उसके नाबालिगों के प्रति असामान्य और खतरनाक रुचि को दर्शाता है। एपस्टीन ने लिटिल सेंट जेम्स द्वीप और प्राइवेट जेट ‘लोलिता एक्सप्रेस’ का इस्तेमाल पीड़ितों को लाने और शोषण के लिए किया।

एक लड़की वर्जीनिया गिउफ्रे ने एपस्टीन के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। गिउफ्रे ने कहा कि जब वह 16 साल की थी और डोनाल्ड ट्रंप के मार-ए-लागो क्लब में काम कर रही थी, तब उसकी मुलाकात मैक्सवेल से हुई। मैक्सवेल ने उसे मसाज थेरेपी का प्रस्ताव दिया और फिर उन्हें एपस्टीन के पास ले गई। इसके बाद, एपस्टीन ने उसे अपने विला में ले जाकर 3 साल तक यौन शोषण किया।

रेडैक्शन के बावजूद कई तस्वीरें और रिकॉर्ड्स अभी भी ब्लैक बार्स के पीछे हैं, जिससे पूरी तस्वीर साफ नहीं है। दस्तावेजों में कुछ फाइलें दिखाती हैं कि पीड़ित लड़कियों को ग्रुप सेक्स और जबरन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।

एपस्टीन की सहयोगी और प्रेमिका मैक्सवेल को 2021 में दोषी ठहराया गया। उसे नाबालिग लड़कियों की भर्ती और शोषण में मदद करने का दोषी पाया गया और 20 साल की जेल की सजा मिली।

एपस्टीन पेशे से फाइनेंसर और व्यवसायी था लेकिन उसकी असली पहचान एक दोषी, सेक्स अपराधी और नाबालिग लड़कियों के शोषक के तौर पर है। उसके पास अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स के पास लिटिल सेंट जेम्स नाम का अपना द्वीप था, जिसे ‘एपस्टीन आइलैंड’ भी कहा जाता है। इस द्वीप पर केवल प्राइवेट जेट, हेलीकॉप्टर या नाव से ही पहुँचा जा सकता था।

इस द्वीप पर एपस्टीन पार्टियों का आयोजन करता था, जिनमें दुनिया भर के पैसे वाले लोग, प्रभावशाली और प्रसिद्ध लोग शामिल होते थे। हालाँकि, पार्टियों में खाने-पीने और शराब के मजे लेते हुए लोग दिखते थे, लेकिन असल में वहाँ नाबालिग लड़कियों का यौन शोषण और ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ित लड़कियों को एंटी-एजिंग दवाएँ दी जाती थीं और उन्हें बॉडी मसाज के बहाने बुलाया जाता था और ग्रुप सेक्स के लिए मजबूर किया जाता था।

यौन शोषण पूल, हॉट टब, गेस्ट हाउस और निजी कमरों में होता था। कर्मचारी बताते हैं कि ये पार्टियाँ कई दिनों तक चलती थीं और नाबालिग लड़कियों का शोषण लगातार होता था। एपस्टीन ने अपनी दौलत, शक्ति और प्रभाव का इस्तेमाल कर लड़कियों को फँसाया और उनके जीवन को तबाह कर दिया।

नेटवर्किंग का भी जरिया थी एपस्टीन की पार्टियाँ

एपस्टीन ने अपने द्वीप का इस्तेमाल केवल सेक्स स्कैंडल के लिए नहीं किया बल्कि इसे नेटवर्किंग और गोपनीय बैठकों के लिए भी इस्तेमाल किया। यहाँ उन लोगों के बीच छिपी बैठकों का आयोजन होता था, जो सार्वजनिक रूप से कभी आमने-सामने नहीं मिल सकते थे। डिनर, सामाजिक कार्यक्रम और फंडरेजिंग से जुड़ी चर्चाएँ भी यहाँ होती थीं।

एपस्टीन ने खुद को एक कनेक्टर के रूप में दिखाया है और इन बैठकों को अपने कैलेंडर में लिखा है। अरबपति बिल गेट्स ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने दुनिया भर के धनी लोगों से जुड़ने के लिए एपस्टीन से मुलाकात की हालाँकि उन्होंने इसे अपनी गलती कहा।

कहा जाता है कि एपस्टीन ने अपने द्वीप पर व्यावसायिक बैठकों का आयोजन भी किया, जिनमें नेता, निवेशक, फाइनेंस एक्सपर्ट, वैज्ञानिक और अन्य लोग भी शामिल होते थे। इन बैठकों का उद्देश्य अमीर और प्रभावशाली लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना था।

हालाँकि, द्वीप पर कोई ठोस और स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है कि यहाँ किसी प्रकार के व्यापारिक सौदे या लेन-देन हुआ करते थे। इस तरह, एपस्टीन का द्वीप केवल सामाजिक और व्यावसायिक नेटवर्किंग का केंद्र भी था, जो उसकी शक्ति और प्रभाव का विस्तार करने में मदद करता था।

ट्रंप सरकार पर दस्तावेज सार्वजनिक करने को लेकर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों का दबाव था। शुरुआत में ट्रंप इसके खिलाफ थे लेकिन जब इस संबंध में कानून पास हो गया तो सरकार को दस्तावेज जारी करने पड़े।

अब न्याय विभाग की जिम्मेदारी है कि वह कॉन्ग्रेस को एक पूरी रिपोर्ट देगा। इस रिपोर्ट में बताया जाएगा कि कौन-सी जानकारी जनता के सामने लाई गई, कौन-सी रोकी गई और उसे छिपाने की वजह क्या थी।

विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान: 2047 के विकसित भारत का शैक्षणिक रोडमैप, औपनिवेशिक ढाँचे से मुक्त हो उच्च शिक्षा के भारतीयकरण का प्रयास

अपने दूसरे कार्यकाल के प्रारंभ से ही मोदी सरकार शिक्षा क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तनों के लिए प्रयत्नशील है। हालाँकि, इन परिवर्तनों की पृष्ठभूमि पहले कार्यकाल में ही तैयार होने लगी थी। इस क्रम में भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की समाप्ति) विधेयक–2018 के मसौदे को विभिन्न हितधारकों से परामर्श और प्रतिक्रिया लेने के लिए सार्वजनिक किया गया था। व्यापक विचार-विमर्श और जनभागीदारी से निर्मित राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 उच्च शिक्षा क्षेत्र में सुधार का अगला महत्वपूर्ण कदम था।

मैकॉले और मैकॉले-पुत्रों द्वारा निर्मित-विकसित भारत का शिक्षा-तंत्र भारत और भारतीयों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं को पूरा करने में असफल रहा है। इसलिए इस औपनिवेशिक तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए उसे भारत केंद्रित बनाने और उसके भारतीयकरण पर जोर दिया जाता रहा है। भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनराविष्कार और प्रतिष्ठा राष्ट्रीय शिक्षा नीति की केंद्रीय चिंता रही है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाकर और उसकी पहुँच सर्वसाधारण तक सुनिश्चित करके ही भारत में अंतर्निहित अपरिमित  संसाधनों और भारतवासियों की असीम क्षमताओं का पूर्ण विकास संभव है।

गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ शिक्षा, समाजोपयोगी नवाचारी शोध तथा युवा पीढ़ी के कौशल विकास द्वारा ही राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने उपरोक्त विधेयक में आंशिक परिवर्तन करते हुए उसके कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक–2025’ को संयुक्त संसदीय समिति को विचारार्थ प्रेषित किया गया है। यह सम्पूर्ण उच्च शिक्षा क्षेत्र का एकमात्र नियामक तंत्र होगा। हालाँकि, चिकित्सा शिक्षा, फार्मेसी और विधि की शिक्षा इसके दायरे में नहीं होगी।

अभी उच्च शिक्षा क्षेत्र में अनेक नियामक संस्थाएँ कार्यरत हैं। उनके अपने–अपने मानदंड व मापदंड हैं। UGC, AICTE, NCTE, वास्तु परिषद, कृषि विज्ञान अनुसंधान परिषद, दूरस्थ और मुक्त शिक्षा, ऑनलाइन और डिजिटल शिक्षा तंत्र, ICSSR, ICAR, नैक, NIRF जैसी एक दर्जन से अधिक नियामक संस्थाएँ देश के कला, विज्ञान, व्यवसाय, अभियांत्रिकी, शिक्षा, प्रबंधन, कृषि शिक्षा आदि अनुशासनों से सम्बंधित उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों की संबद्धता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग, वित्तपोषण और नियंत्रण आदि काम करती हैं।

इन अलग-अलग नियामक संस्थाओं के अधीन उच्च शिक्षा पृथक्करण और बहुपरतीय नियंत्रण का शिकार थी। देश भर में ऐसे अनेक उच्च शिक्षण संस्थान व शोध-संस्थान हैं, जहाँ एक साथ कई प्रकार के पाठ्यक्रम पढ़ाए जाते हैं एवं इनसे सम्बद्ध शोध-कार्य किया जाता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी संस्थानों को क्रमशः बहु-अनुशासनिक बनाने पर जोर दिया गया है। विभिन्न पेशेवर और परम्परागत संस्थानों की आपसी दूरी और अलगाव के ‘स्टील फ्रेम’ की क्रमिक समाप्ति की जा रही है।

इन बहु-अनुशासनिक उच्च शिक्षण संस्थानों व शोध-संस्थानों को अपनी मान्यता, मूल्यांकन, प्रत्यायन, रैंकिंग एवं वित्तपोषण आदि के लिए अलग-अलग नियामक संस्थाओं का दरवाजा खटखटाना पड़ता था। इस प्रक्रिया में ये संस्थान अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करते रहे हैं। कई बार इन नियामक संस्थाओं में अनियमितता एवं पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने का दोषारोपण भी होता रहा है। पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं उनके कार्यान्वयन में भी ये नियामक संस्थाएँ दोषमुक्त नहीं रही हैं। ये स्वायत्त नियामक संस्थाएँ आपसी टकराव और अंतर्विरोध का भी शिकार रही हैं। इससे संबंधित संस्थानों को अनावश्यक अड़चन और अवरोध का सामना करना पड़ता है। 

इसीलिए केंद्र सरकार ने इन सभी नियामक संस्थाओं की कार्यशैली का मूल्यांकन करते हुए इन्हें एक सर्वसक्षम निकाय के अधीन लाने का निर्णय लिया है। अब अलग-अलग नियामक संस्थाओं में बँटी-बिखरी हुई उच्च शिक्षा एक ही नियामक संस्था ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक–2025, जो कि सीधे तौर पर शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में काम करेगा। यह UGC एक्ट–1956, AICTE एक्ट–1987  और NCTE–1993 का स्थान लेगा। इस तरह के एकल और केंद्रीकृत निकाय की संस्तुति राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2009) और यशपाल समिति (2010) ने भी की थी। यह आयोग विभिन्न संस्थाओं के आपसी सामंजस्य, समन्वय और सक्रियता के अभाव और लालफीताशाही के प्रभाव की समाप्ति और जवाबदेही और पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करेगा।

इस आयोग की विशेषता यह है कि यह एक साथ देश के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शीर्षस्थ उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, NIT, IIIT आदि का नियमन और नियंत्रण करते हुए उनके मूल्यांकन, प्रत्यायन एवं रैंकिंग आदि का काम करेगा। चेयरमैन के अलावा इसके 12 सदस्य और होंगे।

इस आयोग के विकसित भारत शिक्षा विनियमन परिषद, विकसित भारत मानक परिषद और विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद जैसे तीन आयाम (वर्टिकल) होंगे। यह आयाम नियमन, मान्यता और व्यावसायिक मानक निर्धारण का कार्य करेंगे। अब तक इन संस्थानों के वित्तपोषण का काम यूजीसी आदि कई एजेंसियां करती थीं। अब यह कार्य सीधे शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों को मौजूदा अलग-अलग नियामक संस्थाओं के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी एवं ये शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में तत्पर हो सकेंगे। 

यह आयोग भारत में उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और सर्वसुलभ बनाने के लिए उत्तरदायी होगा। यह एकीकृत निकाय देशभर की उच्च शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम, अधिगम और मानकों में स्तरीकरण सुनिश्चित करेगा। संस्कारपूर्ण, कौशल संवर्द्धक  और रोजगारपरक शिक्षा देने वाले सर्वसमावेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता, संरक्षण और प्रोत्साहन देने का काम भी यह आयोग करेगा। इसके अलावा निर्धारित मानकों, प्रक्रियाओं और गुणवत्ता का अनुपालन न करने वाले संस्थानों पर 10 लाख से लेकर 2 करोड़ रुपए तक जुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया गया है।

यह आयोग उच्च शिक्षण संस्थानों के दोहरे-तिहरे नियमन की वर्तमान व्यवस्था का सरलीकरण और स्तरीकरण करेगा, ताकि शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन में दोहरा/तिहरा हस्तक्षेप न हो। इस आयोग द्वारा उच्च शिक्षा में मानकों और गुणवत्ता के संबंध में पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण और योग्यता आधारित निर्णय के माध्यम से विनियमन किया जायेगा।

इस आयोग को अधिगम परिणामों (लर्निंग आउटकम) पर विशेष ध्यान देने के अलावा शैक्षणिक मानकों में सुधार, संस्थानों के शैक्षणिक प्रदर्शन का मूल्यांकन, संस्थानों का परामर्श, शिक्षकों का प्रशिक्षण, अधुनातन शैक्षिक पद्धतियों और प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देने आदि का काम भी करना होगा। यह आयोग संस्थानों के नियमन और संचालन के लिए अनुकूलित वातावरण बनाते हुए अधिक लचीलेपन के साथ स्वायत्तता प्रदान करेगा। इस आयोग के पास उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने तथा स्तरहीन और कागजी संस्थानों को बंद कराने की शक्ति भी होगी।

औपनिवेशिक काल से ही जनसंख्या के अनुपात में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या एवं गुणवत्ता की दृष्टि से भारत की स्थिति सुखद नहीं है। भारत लगभग एक हजार विश्वविद्यालयों एवं चालीस हजार कॉलेजों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अनुपात में यह बहुत सीमित है। भारत में सार्वजनिक उच्च शिक्षा का स्तर भी चिंताजनक है। भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के स्तरीकरण, विस्तार और विकास की अत्यधिक आवश्यकता एवं असीम संभावनाएँ हैं। 

उच्च शिक्षा की वर्तमान दशा स्वतंत्रता के बाद देश में अपनाई गयी उच्च शिक्षा नीति के मूलभूत दोषों को उजागर करती है। किंतु अब यह नव निर्मित आयोग उच्च शिक्षा की खामियों को चिह्नित करते हुए उन्हें दूर करने तथा शिक्षा के स्तरीकरण और भारतीयकरण का काम करेगा। यह शिक्षा तंत्र के विस्तार को भी सुनिश्चित करेगा।

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित करते हुए भारत को ज्ञान अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होगा। उच्च शिक्षण संस्थानों को योग्य शिक्षक और सक्षम नेतृत्व प्रदान करने में भी इस आयोग द्वारा निर्मित नीतियों और मानकों की निर्णायक भूमिका होगी। इस एकीकृत और सर्वसक्षम आयोग के गठन से समय, श्रम–ऊर्जा, संसाधन और धन की भी बचत होगी।

उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सरकार को उच्च शिक्षा तंत्र में भारी निवेश करने की भी आवश्यकता होगी। 

भारत सरकार ने इस आयोग के साथ ही विगत 04 अगस्त, 2023 को ‘राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन अधिनियम’ को  भी संसद से पारित कराया है। भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की भांति यह फाउंडेशन भी अनुसंधान की दशा व दिशा को बदलने की युगांतकारी पहल है। यह फाउंडेशन गणित, प्राकृतिक विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और पृथ्वी विज्ञान, स्वास्थ्य और कृषि तथा मानविकी और सामाजिक विज्ञान की अंतर्क्रिया और अभिक्रिया को संभव करेगा। यह अनुसंधान, नवाचार एवं उद्यमिता के लिए रणनीतिक दिशा एवं आवश्यक संसाधन और ढांचागत सुविधाएं प्रदान करने वाला देश का सर्वोच्च निकाय होगा।

आज भारत चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा लहरा रहा है। यह भारत के वैज्ञानिकों की गंभीर अनुसंधान-वृति का प्राप्य है। भारत की प्राचीनतम अनुसंधान-वृत्ति का पुनराविष्कार, प्रोत्साहन इस फाउंडेशन के ध्येय है। संसाधनों की कमी और लालफीताशाही को समाप्त करके और अनुसंधान को समाज और उद्योग जगत से जोड़कर ही भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनाया जा सकता है। सन् 2021 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का दायित्व संभालने के बाद से ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भारत के विकास में शिक्षा क्षेत्र की भूमिका को पहचानते हुए उसमें आमूलचूल बदलाव की पहल की है।

भारतीय शिक्षा तंत्र को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने की भी आवश्यकता है क्योंकि बहुत से प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर स्थापित कर रहे हैं। हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को इनके साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए इच्छाशक्ति, गुणवत्ता और साधन– संसाधनों की महती आवश्यकता होगी। इस आयोग के गठन को लेकर अकादमिक जगत में संशय और असुरक्षा का वातावरण है।

इसे सार्वजनिक उच्च शिक्षा के ध्वस्तीकरण के द्वारा शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण की कोशिश बताया जा रहा है। इस विधेयक में शुल्क के निर्धारण और नियंत्रण का प्रावधान नहीं होने से शिक्षा के बाजारीकरण का भी खतरा है। उच्च शिक्षा में महँगे होने और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं, गांवों और गरीबों के लिए वहनीय और स्तरीय शिक्षा का द्वार बंद होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि शिक्षा जैसी मानव समाज की अनिवार्य आवश्यकता को कॉरपोरेटों के हवाले कर दिया जाएगा।

अनुदान को लेकर राज्य विश्वविद्यालयों और राज्य सरकारों को भी चिंता हो रही है। उनका मानना है कि इस उच्च शिक्षा तंत्र में केंद्रीकरण बढ़ेगा और एक ही संस्था सर्वशक्तिप्रधान हो जाएगी। इन चिंताओं का इसका संज्ञान लेते हुए सार्वजनिक शिक्षा में निवेश बढ़ाकर और उसे समावेशी और सर्वसुलभ बनाकर ऐसी आशंकाओं और आलोचनाओं पर पूर्ण विराम लगाने की आवश्यकता है। उच्च शिक्षा फंडिंग एजेंसी को लेकर भी बौद्धिक जगत आशंकित और असुरक्षित है। जबकि यह योजना सार्वजनिक शिक्षा–तंत्र के आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने, भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाई गई है।

यह सच है कि शिक्षा तंत्र को सिर्फ सरकार का दायित्व न मानकर सभी हितधारकों को उसमें भागीदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। नियुक्ति–प्रक्रिया में गुणवत्ता और पारदर्शिता, संचालन में दूरदर्शिता और सक्षमता, आधारभूत ढांचे के निर्माण में आंशिक और आनुपातिक भागीदारी और उत्पादकता में वृद्धि करने के लिए सभी हितधारकों को अपना सर्वोत्तम योगदान देने के बारे में

गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। दायित्व–विमुख और अधिकार–सचेत बौद्धिक समाज उच्च शिक्षा तंत्र न तो सरकार से प्रश्न पूछने का नैतिक साहस रखता है, और न ही देश और समाज का कल्याण करने की सामर्थ्य रखता है। यह हास्यास्पद ही है कि कुछ विपक्षी और दक्षिण भारत के सांसदों ने इस अधिष्ठान के नाम पर तंज कसते हुए इसे हिंदी थोपने की कोशिश बताया है। यह सकारात्मक सुधारों को स्वीकारते हुए उनके बेहतर कार्यान्वयन की दिशा में संगठित प्रयास करने का समय है, अन्यथा उच्च शिक्षा तंत्र भी स्कूली शिक्षा तंत्र की गति को प्राप्त हो जाएगा।

‘सट्टेबाजी का साम्राज्य’ बनाया, युवराज-रैना-धवन जैसे सितारों को फँसाया: अब ED कर रही सबकी संपत्तियाँ अटैच, जानें क्या है 1xBet जिसके चंगुल में आई बड़ी-बड़ी हस्तियाँ

भारत में अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने अब तक की सबसे सख्त कार्रवाइयों में से एक को अंजाम दिया है। हालिया कार्रवाई में शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को ED ने अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म 1xBet से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में नामी क्रिकेटरों, फिल्मी सितारों और सार्वजनिक हस्तियों की 7.93 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अस्थायी रूप से अटैच कर दीं।

इससे पहले भी इसी मामले में अक्टूबर 2025 में कार्रवाई हो चुकी थी। अब तक कुल मिलाकर 19.07 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ इस केस में ED के शिकंजे में आ चुकी हैं। यह कार्रवाई सिर्फ सेलेब्रिटीज तक सीमित नहीं है बल्कि इसके तार म्यूल अकाउंट्स, शेल कंपनियों, लग्जरी शादियों और राजनीतिक कनेक्शन तक जुड़ते नजर आ रहे हैं।

क्या है 1xBet मामला और क्यों हुई ताजा कार्रवाई?

ED की जाँच के मुताबिक, 1xBet एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के खेल वाला प्लेटफॉर्म है, जो भारत में बिना किसी वैध लाइसेंस या सरकारी अनुमति के काम कर रहा था। भारत में ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कानून बेहद सख्त हैं और इसके बावजूद 1xBet ने क्रिकेट, फुटबॉल, ई-स्पोर्ट्स और वर्चुअल गेम्स पर बड़े पैमाने पर बेटिंग करवाई।

ED का कहना है कि इस अवैध गतिविधि से जो कमाई हुई, उसे सीधे भारत में लाने के बजाय विदेशी कंपनियों, डिजिटल वॉलेट्स और कई स्तरों में ट्रांजैक्शन करके वैध दिखाने की कोशिश की गई। इसी अवैध कमाई को कानून की भाषा में ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ कहा जाता है। ED ने इन्हीं पैसों से खरीदी गई संपत्तियों को PMLA कानून के तहत अस्थायी रूप से अटैच किया है।

किन-किन नामी हस्तियों पर गिरी गाज?

ED की इस कार्रवाई में कई बड़े और चर्चित नाम सामने आए हैं। इनमें पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह और रॉबिन उथप्पा शामिल हैं। इसके अलावा फिल्म और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से अभिनेता सोनू सूद, अभिनेत्री उर्वशी रौतेला, नेहा शर्मा, तृणमूल कॉन्ग्रेस की पूर्व सांसद और अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती और अभिनेता अंकुश हाजरा का नाम भी इस केस में जुड़ा है।

इससे पहले अक्टूबर 2025 में ED ने इसी 1xBet मामले में शिखर धवन और सुरेश रैना से जुड़ी 11.14 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच की थीं। इस तरह यह साफ हो गया है कि जाँच का दायरा लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं।

किसकी कितनी संपत्ति अटैच की गई?

ED द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, युवराज सिंह की करीब 2.5 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच की गई हैं। रॉबिन उथप्पा से जुड़ी संपत्तियों का मूल्य 8.26 लाख रुपए बताया गया है। अभिनेत्री उर्वशी रौतेला की 2.02 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ अटैच हुई हैं, जो उनकी माँ के नाम पर रजिस्टर्ड थीं।

अभिनेता सोनू सूद की 1 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ, मिमी चक्रवर्ती की 59 लाख रुपए, अंकुश हाजरा की 47.20 लाख रुपए और नेहा शर्मा की 1.26 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ इस कार्रवाई में शामिल हैं। ED का दावा है कि ये सभी संपत्तियाँ सीधे या परोक्ष रूप से 1xBet से जुड़े अवैध पैसों से खरीदी गई थीं।

सेलेब्रिटीज पर ED के आरोप क्या हैं?

ED की जाँच में सामने आया है कि इन सभी सेलिब्रिटीज ने जानबूझकर विदेशी कंपनियों और एजेंट्स के जरिए विज्ञापन और एंडोर्समेंट एग्रीमेंट किए। सीधे 1xBet का प्रचार करने के बजाय इसके सरोगेट ब्रांड्स जैसे 1xBat और 1xBat Sporting Lines को प्रमोट किया गया।

इससे भारतीय कानूनों में सीधे प्रतिबंध से बचने की कोशिश की गई। इन प्रमोशन्स के बदले मिलने वाला पैसा भारत में सीधे न आकर विदेशी एंटिटीज और कई लेयर्ड ट्रांजैक्शन्स के जरिए भेजा गया, ताकि पैसों के असली स्रोत को छिपाया जा सके। ED का कहना है कि यह पूरा नेटवर्क मनी लॉन्ड्रिंग के क्लासिक पैटर्न पर काम कर रहा था।

भारत में कैसे काम करता रहा 1xBet नेटवर्क?

ED के मुताबिक, 1xBet ने भारत में अपने यूजर्स बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन वीडियो, डिजिटल विज्ञापन और यहाँ तक कि प्रिंट मीडिया का भी इस्तेमाल किया। सीधी ब्रांडिंग पर कानूनी खतरे को देखते हुए सरोगेट विज्ञापन को हथियार बनाया गया।

सेलेब्रिटीज और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के जरिए प्लेटफॉर्म को भरोसेमंद और लोकप्रिय दिखाने की कोशिश की गई, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इससे जुड़ें और सट्टेबाजी करें।

म्यूल अकाउंट, लग्जरी शादी और राजनीतिक एंगल

जाँच के दौरान ED को मनी लॉन्ड्रिंग का एक चौंकाने वाला पहलू भी मिला। दिल्ली के एक Rapido बाइक-टैक्सी ड्राइवर के बैंक अकाउंट में सिर्फ 8 महीनों के भीतर 331.36 करोड़ रुपए के लेनदेन का पता चला। ड्राइवर की आय और जीवनशैली इस रकम से बिल्कुल मेल नहीं खाती थी।

पूछताछ में उसने इन ट्रांजैक्शन्स की जानकारी से इनकार किया। ED को शक है कि यह एक म्यूल अकाउंट था, जिसका इस्तेमाल अवैध पैसों को इधर-उधर करने के लिए किया गया। इसी अकाउंट से राजस्थान के उदयपुर में एक हाई-प्रोफाइल डेस्टिनेशन वेडिंग पर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए जाने के सबूत भी मिले हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस शादी में एक युवा राजनेता की मौजूदगी की भी जाँच हो रही है।

प्रॉपर्टी अटैच होने का मतलब क्या होता है?

ED द्वारा प्रॉपर्टी अटैच करने का मतलब तुरंत जब्ती नहीं होता। यह 180 दिनों की अस्थायी कार्रवाई होती है। इस दौरान संपत्ति मालिक के नाम पर ही रहती है लेकिन उसे बेचा या गिरवी नहीं रखा जा सकता। ED को इस अवधि में PMLA कोर्ट के सामने सबूत पेश करने होते हैं।

अगर कोर्ट में यह साबित हो जाता है कि संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी है, तो उसे जब्त कर नीलाम किया जाता है और पैसा सरकारी खजाने में जाता है। अगर आरोप साबित नहीं होते, तो संपत्ति मालिक को वापस कर दी जाती है। 1xBet का नाम सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि कई देशों में विवादों से जुड़ा रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और रूस जैसे देशों में इसके खिलाफ कार्रवाई या जाँच चल चुकी है। इस पर मनी लॉन्ड्रिंग, नाबालिगों से जुड़ी बेटिंग, यूजर्स को भुगतान न करने और वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। भारत में इसे किसी भी तरह की कानूनी मान्यता हासिल नहीं है।

VB-G RAM G में राज्य सरकारें भी देंगी 40% तक पैसा, जवाबदेही बढ़ाने के लिए बदला गया फंडिंग पैटर्न: समझिए- 2 गुना ज्यादा बजट से ग्रामीणों को कैसे मिलेगा फायदा

संसद में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G विधेयक या जी राम-जी विधेयक पास हो गया। विपक्ष ने इसका नाम बदलने को लेकर विरोध किया, जबकि सरकार ने इसे महात्मा गाँधी नेशनल रूरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट (MGNREGA या मनरेगा) की जगह कई बदलावों के साथ ग्रामीण विकास को नई दिशा देने वाला कदम बताया।

लोकसभा में सरकार ने कहा कि मनरेगा 20 साल पहले बनाई गई योजना है, तब से अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवर्तन हुए हैं। इसीलिए मनरेगा की जगह जी राम-जी कानून विकसित ग्रामीण भारत को ध्यान में रखते हुए लाया गया है। केंद्र सरकार ने VB-G RAM G योजना की फंडिंग को लेकर बड़ा बदलाव किया है। अब केंद्र सरकार ने इसकी फंडिंग में राज्य सरकारों को भी भागीदार बनाया है, ताकि इससे राज्यों की जवाबदेही भी बढ़ सके।

राज्य सरकार की फंडिंग का क्या है नया पैटर्न?

नए जी राम-जी बिल के तहत रोजगार से जुड़ी योजनाओं का खर्च अब केवल केंद्र सरकार पर निर्भर नहीं रहेगा। इस नए प्रस्ताव में साफ किया गया है कि राज्य सरकारों को भी रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अपने बजट से पैसा देना होगा। नए बिल में फंडिंग का नया पैटर्न सेट किया गया है।

पुराने मनरेगा स्कीम में राज्य सरकारों को मजदूरी से जुड़ी कोई भी धनराशि नहीं देनी पड़ती थी। हालाँकि योजना से जुड़े कामों में सामग्री और अन्य खर्च राज्य सरकार देते थे, पर मनरेगा के तहत पूरी फंडिंग केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इसमें बदलाव किया गया है।

प्रस्ताव के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघायल, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम), हिमालयी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) में रोजगार से जुड़े कुल खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार देगी, जबकि 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को अपने बजट से देनी होगी।

मनरेगा और जी राम-जी में मूलभूत अंतर (फोटो साभार: PIB)

वहीं अन्य सभी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और केरल में रोजगार से जुड़े खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी।

समझें- कितना खर्च करेगी सरकार? राज्यों का हिस्सा कितना होगा

केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविक मिशन (ग्रामीण)- VB-G RAM G के लिए हर साल करीब ₹1,51,282 करोड़ का खर्च आएगा। ये राशि मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक कामों पर खर्च की जाएगी। इस राशि में राज्यों का हिस्सा भी शामिल है।

हालाँकि कुल ₹1,51,282 करोड़ में से केंद्र सरकार का अनुमानित हिस्सा ₹95,692.31 करोड़ होगा। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है।

खास बात ये है कि केंद्र सरकार ने जो बजट इस योजना के लिए रखा है, वो मौजूदा 2025-26 में मनरेगा के लिए रखी गई ₹86,000 करोड़ के फंड से करीब 2 गुना होगा। अकेले केंद्र सरकार का खर्च भी पिछले खर्च से बढ़ेगा। जाहिर सी बात है कि अब तक लोगों को मिलने वाले 100 दिन के रोजगार की जगह जब 125 दिन का रोजगार मिलेगा, तो उनकी कमाई भी बढ़ेगी और सरकारों का खर्च भी।

राज्य पहले के ढाँचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे, पर ये प्रक्रिया हमेशा विवादित रहती थी। राज्य अपने हिस्से के पैसों की माँग करते रहते थे, लेकिन अब केंद्र और राज्यों के खर्च का आँकड़ा साफ होने से न सिर्फ ये विवाद सुलझेगा, बल्कि फंड को लेकर पारदर्शिता भी आएगी।

राज्य की साझा फंडिंग से रोजगार में देरी का बहाना कैसे होगा खत्म?

अब रोजगार उपलब्ध कराने में देरी का बहाना खत्म हो जाएगा क्योंकि ‘जी राम-जी’ बिल में फंडिंग की जिम्मेदारी सिर्फ केंद्र सरकार तक सीमित नहीं रखी गई है। पहले मनरेगा में रोजगार के लिए पैसा पूरी तरह से केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब इस नई योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारों की अनिवार्य वित्तीय हिस्सेदारी तय की गई है।

यानी अगर किसी राज्य में रोजगार की माँग बढ़ती है, तो वह यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि केंद्र से पैसा नहीं आया है। राज्यों को भी अपने बजट से तय हिस्सा देना होगा, जिससे फंड की उपलब्धता बनी रहेगी और काम शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान मनरेगा के दौरान सामने आने वाली फंडिंग से जुड़ी अड़चनों को दूर करेगा।

इसके अलावा में फंड जारी करने की समयसीमा और जवाबदेही को भी स्पष्ट रूप से तय किया गया है। केंद्र या राज्य, दोनों में से अगर कोई तय समय पर पैसा जारी नहीं करता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। इससे रोजगार के काम फाइलों में अटकने के बजाए जमीनी स्तर पर जल्दी शुरू हो सकेंगे।

रोजगार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया कैसे होगी तेज और प्रभावशाली?

नए ‘जी राम-जी’ विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने में तेजी और प्रभावशीलता दोनों बढ़ेंगी क्योंकि इसमें मनरेगा की तुलना में कई बदलाव किए गए हैं। सबसे पहले रोजगार की गारंटी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों तक कर दी गई है, यानी अब हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को साल में 125 दिन मजदूरी का वैध अधिकार मिलेगा, जिससे काम के दिनों और आय दोनों में वृद्धि होगी। इससे गाँवों में ज्यादा दिन काम उपलब्ध किया जाएगा, जिससे ग्रामीणों को सालभर अधिक आमदनी हो सकेगी।

दूसरा, नए बिल में काम के भुगतान का तरीका भी सुधारा गया है। मजदूरी का भुगतान हफ्ते में एक बार या 15 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य होगा, जिससे मजदूरों को पैसे जल्दी और नियमित तौर पर मिलेंगे और उन्हें लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

इसके अलावा योजना को चार प्रमुख क्षेत्रों- जल सुरक्षा, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका से जुड़े काम और आपदा-रोधई ढाँचे में विभाजित किया गया है, जिससे कामों की विविधता और गुणवत्ता बढ़ेगी और ग्रामीणों को विभिन्न प्रकार के अवसर मिलेंगे। इसका उद्देश्य है कि अब काम बिखरे हुए नहीं होंगे, बल्कि गाँव की असली जरूरतों के हिसाब से तय किए जाएँगे।

कंडोम खरीदना हुआ पाकिस्तान की ‘औकात’ से बाहर, रेट सस्ते कराने IMF के पास पहुँचा तो मिली दुत्कार: बढ़ती आबादी के खतरे से PM तक चिंता में, जानें भारत पर क्या होगा असर

दुनिया के 5वें सबसे अधिक आबादी वाले मुल्क पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का संकट लगातार गहराता जा रहा है। इस बीच आवाम के लिए गर्भनिरोधक साधन आज भी महँगे और पहुँच से दूर की चीज बने हुए हैं। पाई-पाई को मोहताज पाकिस्तान में हालात ऐसे हैं कि एक साधारण कंडोम का पैकेट भी बड़ी आबादी की पहुँच से बाहर है। इस संकट से निपटने के लिए पाकिस्तान ने एक योजना बनाई कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर लगने वाला 18 प्रतिशत जनरल सेल्स टैक्स (GST) हटाकर उन्हें सस्ता किया जाए लेकिन अब यह योजना भी अधर में लटक गई है।

IMF ने कंडोम पर GST हटाने से किया मना

दरअसल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान सरकार को बड़ा झटका देते हुए गर्भनिरोधक उत्पादों पर GST हटाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला उस समय आया है जब खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ देश की तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर खुले मंच से चिंता जता चुके हैं। पाकिस्तान की आबादी सालाना करीब 2.55 प्रतिशत की खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है और यह पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर और भारी बोझ डाल रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघीय राजस्व बोर्ड (FBR) ने IMF के सामने प्रस्ताव रखा था कि कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक साधनों से 18% GST हटाया जाए जिससे आने वाले बजट से पहले कीमतें कम की जा सकें। IMF ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि प्रधानमंत्री का अगस्त 2025 का निर्देश भी कागजों तक सीमित रह गया।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कई महीने पहले ही FBR को निर्देश दिया था कि वह IMF के साथ इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए। इसके बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई दौर की बातचीत की लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में अधिकारियों ने साफ कर दिया कि IMF अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

IMF के अधिकारियों ने बंद दरवाजों के पीछे हुई बातचीत में साफ शब्दों में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को बता दिया कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर किसी भी तरह की टैक्स राहत पर 2026-27 के बजट से पहले विचार ही नहीं किया जाएगा। यानी आम जनता को राहत देने की बात फिलहाल पूरी तरह टाल दी गई है।

पाकिस्तानी पक्ष ने बातचीत के दौरान सिर्फ कंडोम और गर्भनिरोधक साधनों पर ही नहीं बल्कि महिलाओं की जरूरत से जुड़े सैनिटरी पैड और शिशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाले बेबी डायपर पर भी GST घटाने का प्रस्ताव रखा था। हालाँकि, IMF ने इन सभी सुझावों को सख्ती से खारिज कर दिया। IMF का तर्क था कि इन उत्पादों से सरकार को होने वाली टैक्स आय बहुत बड़ी है और इसे छोड़ना उनके हिसाब से ‘आर्थिक अनुशासन’ के खिलाफ होगा।

खास तौर पर बेबी डायपर को लेकर IMF ने कड़ा रुख अपनाया। अधिकारियों के मुताबिक, IMF ने यह दलील दी कि बेबी डायपर का टैक्स बेस करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपए के आसपास है और इसमें किसी भी तरह की छूट देने से सरकारी राजस्व को बड़ा झटका लग सकता है। यानी बच्चों की बुनियादी जरूरत भी पाकिस्तान में सिर्फ एक ‘रेवेन्यू आइटम’ बनकर रह गई है।

इस फैसले का सीधा असर आम पाकिस्तानी परिवारों पर पड़ रहा है। महँगाई पहले ही आसमान छू रही है, स्वास्थ्य सुविधाएँ बदहाल हैं और अब परिवार नियोजन के साधन भी महँगे बने रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भनिरोधक तक आसान पहुँच न होने से अनियोजित जन्म बढ़ेंगे, जिससे गरीबी, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्याएँ और गहराएँगी।

बढ़ती आबादी का ‘राष्ट्रीय आपातकाल’

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या फंड (UNPF) के आँकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान की मौजूदा जनसंख्या 25.5 करोड़ के आस-पास है। इसमें 36.4% आबादी 0-14 वर्ष के बीच है जबकि 59.6% आबादी 15-64 साल के बीच की है। वहीं, देश की 4% आबादी की उम्र 65 वर्ष से अधिक है।

सतही तौर पर पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का खतरा ना दिखे लेकिन पाकिस्तान के आर्थिक हालात आबादी के बोझ को सहने लायक नहीं बचे हैं। विश्व बैंक के रिकॉर्ड के मुताबिक, पाकिस्तान की आबादी में करीब 45% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर है।

खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आबादी के संकट को स्वीकार किया है। अगस्त 2025 में एक बैठक के दौरान उन्होंने देश में बढ़ती जनसंख्या दर को ‘चिंताजनक और खतरनाक रुझान’ बताया और कहा है कि इससे निपटने के लिए तुरंत राष्ट्रीय नीति की जरूरत है।

पाकिस्तान की आबादी के संकट को खुद सरकार ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ मान रही है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के योजना, विकास और विशेष पहल मंत्री एहसान इकबाल ने जनसंख्या प्रबंधन पर हुई एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए साफ शब्दों में कहा कि आबादी का मामला देश के लिए बेहद गंभीर और खतरनाक रूप ले चुका है। बैठक में बोलते हुए एहसान इकबाल ने माना कि जनसंख्या नियोजन का असर नागरिक के जीवन के हर पहलू पर पड़ता है अब चाहे वह स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या रोजगार।

इकबाल ने कहा कि मौजूदा 2.55% की सालाना जनसंख्या वृद्धि दर के हिसाब से 2050 तक पाकिस्तान की आबादी 38.6 करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है। यह अनुमान साफ संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान पर जनसंख्या का दबाव कई गुना बढ़ने वाला है। वह भी ऐसे समय में जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।

पाकिस्तान में बढ़ती आबादी से और बढ़ता संकट

पाकिस्तान की आबादी अब उसका संकट बनती जा रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से लेकर खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास पर इसका गंभीर असर दिखाई पड़ रहा है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री सैयद मुस्तफा कमाल ने विश्व जनसंख्या दिवस 2025 पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि पाकिस्तान में आबादी बढ़ने की रफ्तार ‘खतरनाक स्तर’ तक पहुँच चुकी है।

इसी दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने जनसंख्या संकट के गंभीर नतीजों की ओर इशारा करते हुए चौंकाने वाले आँकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि देश में 2.5 करोड़ से अधिक बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल से बाहर हैं क्योंकि बढ़ती आबादी का दबाव शिक्षा व्यवस्था झेल नहीं पा रही। यह आँकड़ा अपने आप में पाकिस्तान के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, जहाँ अगली पीढ़ी बिना शिक्षा के आगे बढ़ रही है।

सरकारी अस्पतालों की हालत पर टिप्पणी करते हुए मंत्री ने कहा कि वहाँ मरीजों की भीड़ किसी सार्वजनिक रैली जैसी दिखाई देती है। यह बयान पाकिस्तान की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई बयान करता है, जहाँ अस्पताल इलाज के केंद्र कम और अव्यवस्था की तस्वीर ज्यादा बन चुके हैं। वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने भी जनसंख्या वृद्धि के आर्थिक असर को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित आबादी देश के संसाधनों, सामाजिक ढाँचे और आर्थिक स्थिरता पर भारी दबाव डाल रही है।

पाकिस्तान में UNFPA के प्रतिनिधि Luay Shabaneh ने करीब एक हफ्ते पहले ‘डॉन’ में लिखा, “25 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में बेसिक रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विस तक पहुँच लोगों के लिए आज भी एक संघर्ष है। 16% शादीशुदा महिलाओं को आज भी फैमिली प्लानिंग की सुविधा नहीं मिलती है और गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की दर लगभग 32% पर अटकी हुई है।” उन्होंने लिखा, “पाकिस्तान में सालाना 3.5 मिलियन अनचाही प्रेग्नेंसी होती हैं और इनमें से 61% का नतीजा इंड्यूस्ड अबॉर्शन (गर्भपात) होता है, जो अक्सर असुरक्षित होता है।”

पाकिस्तान में ‘प्रजनन संकट’

IMF से पाकिस्तान को मिला झटका इसलिए भी मुश्किलें बढ़ाने वाला है क्योंकि पाकिस्तान अनचाही प्रेग्नेंसी से जूझ रहा है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हर साल पाकिस्तान में करीब 1 करोड़ 27 लाख गर्भधारण होते हैं। इनमें से लगभग 60 लाख गर्भ ऐसे होते हैं, जिनकी योजना पहले से नहीं बनाई गई होती। यानी औसतन हर साल होने वाला हर दूसरा गर्भ अनचाहा होता है। यह स्थिति साफ दिखाती है कि देश में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुँच और परिवार नियोजन को लेकर जागरूकता कितनी कमजोर है।

पाकिस्तान के फेडरल हेल्थ सेक्रेटरी हामिद याक़ूब शेख ने इसे राष्ट्रीय आपात स्थिति बताया है। उनके मुताबिक बिना योजना के होने वाले जन्म सिर्फ जनसंख्या का मसला नहीं हैं बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण व्यवस्था पर सीधा असर डालने वाली विकास की बड़ी समस्या है। आजादी के 77 साल में पाकिस्तान की आबादी 7 गुना बढ़ गई है जबकि अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक विकास की रफ्तार कछुए जैसी है।

पाकिस्तान में गर्भनिरोधकों की पहुँच को लेकर पहले से ही संकट है और IMF ने इसे और बढ़ा दिया है। ग्रामीण और गरीब इलाकों में रहने वाली लाखों महिलाओं तक आधुनिक गर्भनिरोधक साधन नहीं पहुँच सके हैं। पाकिस्तान में कम साक्षरता और स्वास्थ्य शिक्षा की कमी के चलते गर्भनिरोधक को लेकर कई गलत धारणाएँ फैली हुई हैं। बहुत-सी महिलाओं को लगता है कि परिवार नियोजन से हमेशा के लिए बाँझपन हो जाता है या फिर यह धर्म के खिलाफ है।

एक बड़ी समस्या महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर भी है। कब-कितने बच्चे पैदा हो महिलाओं को पाकिस्तान में इसका अधिकार ही नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वो अपने फैसले खुद नहीं ले पाती हैं।

ऐसी अनचाही प्रेगनेंसी का असर हर स्तर पर दिखता है। अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, मातृ-मृत्यु दर बढ़ी हुई है और करीब 40% बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं। बेरोजगारी-गरीबी भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में पहले से खस्ताहाल आर्थिक ढाँचे पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है। अपने आर्थिक फैसलों के लिए IMF पर मजबूर पाकिस्तान की समस्याएँ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं।

क्या पाकिस्तान की बढ़ती आबादी भारत के लिए चिंता की बात है?

1944 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र में संगठन के सिद्धांतों में कहा गया था कि ‘कहीं भी गरीबी, हर जगह समृद्धि के लिए एक खतरा है’। यह बात आज भी लागू होती है। यही समस्या भारत के लिए भी है। पाकिस्तान की तेजी से बढ़ती आबादी भारत के लिए सबसे पहले सुरक्षा के लिहाज से चिंता पैदा करती है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक पाकिस्तान की जनसंख्या 35 करोड़ तक जा सकती है। इतनी बड़ी आबादी को रोजगार, शिक्षा और संसाधन न मिलने की स्थिति में आंतरिक अस्थिरता बढ़ना तय है। पड़ोसी होने के नाते इसका असर सबसे अधिक भारत पर ही पड़ने की संभावना है।

पाकिस्तान की बढ़ती आबादी के साथ पानी, जमीन और रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। अधिकतर इलाकों में संसाधनों की कमी पहले से ही मुश्किलें पैदा कर रही है। आगे चलकर अगर परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं तो में सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ, तस्करी और अपराध बढ़ने की आशंका रहती है। भारत-पाकिस्तान सीमा पहले ही संवेदनशील है और यदि पाकिस्तान में जनसंख्या दबाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।

बांग्लादेश में भारत विरोध की आड़ में बड़ा खेल, लोकतंत्र को खत्म कर इस्लामी शासन लाने की तैयारी: यूनुस की शह पर हिंदुओं और ‘बंगालियों’ को खत्म कर रहे कट्टरपंथी

बांग्लादेश आजकल सड़कों पर खूनखराबे और आगजनी की आग में जल रहा है। एक तरफ छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका, तो दूसरी तरफ उसी आग में अब इस्लामी कट्टरपंथियों का उभार हो रहा है। लेकिन असली खेल क्या है? यह सब भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने और लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश लगती है।

जमात-ए-इस्लामी, नेशनल सिटिजन पार्टी और छात्र शिबिर जैसे गुट सड़कों पर कोहराम मचा रहे हैं। वे हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं, भारत से जुड़ी हर चीज को जलाने पर तुले हैं। शेख हसीना की आवामी लीग को बैन कर उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं का सफाया हो रहा है। लोकतंत्र की बहाली को पीछे धकेलकर अब इस्लामी शासन लाने की कोशिश हो रही है और इसके लिए रेफरेंडम की ढाल इस्तेमाल की जा रही है।

बांग्लादेश में सेकुलरिज्म को जड़ से उखाड़ा जा रहा है। शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, उनके परिवार की यादें मिटाई जा रही हैं और बांग्लादेश के जन्म की असली कहानी को भुला दिया जा रहा है।

जो देश कभी बांग्ला अस्मिता के नाम पर पाकिस्तान से अलग हुआ था, आज वही इस्लामी खिलाफत की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर जिसने 1971 में बंगालियों का कत्लेआम किया था, वही ताकतें अब आईएसआई के साथ हाथ मिलाकर बंगाली संस्कृति को नष्ट कर रही हैं।

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएँ चरम पर हैं और कट्टरपंथी ताकतें हावी हो रही हैं। मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार में शामिल युवा नेता बार-बार भारत के खिलाफ बयान दे रहे हैं। हिंदुओं पर हमले बढ़ रहे हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं और अल्पसंख्यकों की जान-माल की रक्षा नहीं हो पा रही। अब जबकि फरवरी 2026 में चुनाव होने वाले हैं, ठीक दो महीने पहले हिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है। सवाल यह है कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या यह भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने की कोशिश है?

सत्ता बचाए रखने के लिए भारत विरोधी लहर को और भड़का रही यूनुस सरकार

सारे घटनाक्रमों के तार जोड़ें, तो साफ है कि बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा करके चुनाव टालने की साजिश रची जा रही है। अगर चुनाव टल गए, तो यूनुस सरकार बिना वोट के ही सत्ता में बनी रहेगी। ऐसे में इस्लामी कट्टरपंथी लोकतंत्र को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे। भारत विरोध का नैरेटिव इसी साजिश का हिस्सा है, जो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाता है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

साल 2024 के कथित छात्र विद्रोह के बाद से यूनुस सरकार के दौरान यह नैरेटिव तेज हुआ है, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए और आरोप लगाया कि हमलावर भारत भाग गए हैं। इससे देश में ध्रुवीकरण बढ़ता है और चुनाव का माहौल बिगड़ता है, जिससे चुनाव टालने का बहाना मिल जाता है।

भारत-पाक 1971 युद्ध और कट्टरपंथ की जड़ों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी

बांग्लादेश का इतिहास समझे बिना वर्तमान स्थिति को नहीं समझा जा सकता। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना था। उस समय पाकिस्तानी सेना ने बंगालियों पर अत्याचार किए थे। लाखों लोगों का कत्लेआम किया गया। लाखों महिलाओं का बलात्कार हुआ और संपत्ति का विनाश किया गया।

इन सबमें जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टियों ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात के नेता और कार्यकर्ता पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों को मारते थे और वे रजाकार नामक मिलिशिया बनाकर अत्याचार करते थे। भारत ने मुक्ति वाहिनी का साथ देकर बांग्लादेश की आजादी में मदद की थी, जिससे लाखों बंगालियों की जान बची। लेकिन अब वही जमात-ए-इस्लामी फिर से सक्रिय हो गई है और पाकिस्तान की मदद से बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है।

बांग्लादेशियों पर जुल्म ढाने वाले जमात को यूनुस सरकार ने दी है खुली छूट

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास पाकिस्तान समर्थक रहा है। 1971 की युद्ध में इसने पाकिस्तानी सेना की मदद की थी और युद्ध अपराधों में शामिल थी। युद्ध के बाद शेख मुजीब ने इसे बैन किया था, लेकिन बाद में यह फिर उभरी। अब यूनुस सरकार ने जमात पर से बैन हटा लिया है, और इसके नेता जेल से बाहर हैं। इससे कट्टरपंथ को बल मिला है। पाकिस्तान की आईएसआई जमात के जरिए बांग्लादेश में अराजकता फैला रही है, ताकि भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। पूर्व भारतीय राजनयिक वीना सिकरी ने कहा है कि जमात पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रही है और भारत विरोधी प्रदर्शनों में इसकी भूमिका है।

अपनी पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है पाकिस्तान

पाकिस्तान की पुरानी रणनीति है- भारत को दुश्मन बनाकर पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाना। 1971 की हार की यादों को मिटाने के लिए पाकिस्तान इस्लामी ताकतों को मजबूत कर रहा है। शेख हसीना के बेटे ने भी कहा है कि पाकिस्तान बांग्लादेश को भारत के खिलाफ बेस बनाना चाहता है और यूनुस शासन में यह बढ़ रहा है।

यह ऐतिहासिक घाव अब फिर से खुल रहे हैं। शेख मुजीब की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, जो बांग्लादेश के जन्म का प्रतीक हैं। बांग्ला संस्कृति और राष्ट्रवाद को दबाकर इस्लामी पहचान थोपी जा रही है। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसी संगठन, जो मदरसों से जुड़े हैं, अब सड़कों पर हैं। वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। इससे बांग्लादेश की सेकुलर छवि पूरी तरह से खतरे में आ चुकी है।

अशांति के दौर में यूनुस सरकार की भूमिका

पिछले साल अगस्त में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंसा का सिलसिला शुरू हो गया। छात्र विद्रोह के नाम पर प्रदर्शन हुए, लेकिन जल्दी ही यह कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया। यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र बहाल करने का वादा निभाया नहीं। इसके बजाय, इस्लामी समूहों को बढ़ावा दिया गया। जमात-ए-इस्लामी और छात्र शिबिर जैसे संगठन अब खुलेआम सक्रिय हैं। वे सड़कों पर हिंसा कर रहे हैं, अवामी लीग के दफ्तर जला रहे हैं और मीडिया पर हमले कर रहे हैं।

छात्र नेता शरीफ ओस्मान हादी की मौत के बाद हिंसा भड़क उठी। प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए, भारतीय उच्चायोग पर हमला किया और हिंदुओं को निशाना बनाया। मायमेंसिंह जिले में एक हिंदू मजदूर को ब्लासफेमी के आरोप में लिंच कर दिया गया। हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और अल्पसंख्यक डर के साए में जी रहे हैं। पत्रकारों, मीडिया दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन यूनुस सरकार इस पर चुप है। यूनुस ने हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हुए इसे ‘फ्रिंज एलिमेंट्स की हरकत करार दिया है। हालाँकि यूनुस भारत पर फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं।

अवामी लीग को बैन करने के खिलाफ प्रदर्शन हुए, लेकिन उन्हें दबाया जा रहा है। 2025 में अवामी लीग बैन विरोधी प्रदर्शन देशव्यापी हो गए, लेकिन सरकार ने उन्हें कुचला। इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। यूनुस पर आरोप है कि वे चुनाव में धांधली करके इस्लामी ताकतों को सत्ता सौंपना चाहते हैं। पाकिस्तान समर्थित समूह अराजकता फैला रहे हैं, ताकि चुनाव टल जाएँ। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का राज है, और हिंसा का उद्देश्य अस्थिरता पैदा करना है।

भारत विरोध के नैरेटिव को हवा दे रहा है पाकिस्तान

बांग्लादेश में चुनाव से पहले भारत विरोधी नैरेटिव तेज हो जाता है। इसका मुख्य कारण राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2024 के छात्र विद्रोह के बाद से यह बढ़ा है। प्रदर्शनकारी भारत विरोधी स्लोगन लगा रहे हैं, और अवामी लीग के ऑफिसों पर हमले हो रहे हैं। इस आग को पाकिस्तान समर्थित तत्व और इस्लामी ग्रुप हवा दे रहे हैं। भारत ने पाकिस्तान की भूमिका को चिन्हित किया है।

पाकिस्तान की भूमिका पुरानी है। वह भारत को दुश्मन बनाकर बांग्लादेश में अराजकता फैलाता है। हाल की घटनाओं में पाकिस्तान का रोल बताया गया है, जो 1971 की यादों को मिटाने की कोशिश है। आईएसआई जमात-ए-इस्लामी के जरिए काम कर रही है। पूर्व राजदूत वीना सिकरी ने कहा कि पाकिस्तान ने शेख हसीना को हटाने में जमात का इस्तेमाल किया। बांग्लादेश में पाकिस्तान मजबूत सरकार नहीं चाहता, क्योंकि इससे भारत से रिश्ते मजबूत होते हैं। कमजोर सिस्टम से वह बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।

इस्लामी कट्टरपंथ के उभार से लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर बढ़ा खतरा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ रहा है। यूनुस सरकार ने जमात और अन्य समूहों पर बैन हटा लिया, जिससे वे मजबूत हुए। ये समूह पाकिस्तान समर्थित हैं और अराजक माहौल से फायदा उठा रहे हैं। वे खुलकर काम कर रहे हैं, और लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसे संगठन मदरसों से जुड़े हैं, और वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं। सेकुलरिज्म को खत्म किया जा रहा है। शेख मुजीब की यादों को मिटाया जा रहा है और बांग्ला संस्कृति दबाई जा रही है।

रेफरेंडम की आड़ में इस्लामी शासन लाने की कोशिश है। हिंदू, ईसाई और अहमदिया जैसे अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन सरकार चुप है। यूनुस ने कहा कि बांग्लादेश में इस्लामी अतिवाद नहीं है, लेकिन पिछले दिनों चार मंदिरों पर हमले हुए और एक पुजारी की हत्या हुई। यह सब लोकतंत्र को निशाना बना रहा है। हिंसा से चुनावी प्रक्रिया बाधित हो रही है और जानकार कहते हैं कि यूनुस सरकार हिंसा का इस्तेमाल करके चुनाव टाल रही है।

हिंसा का असली मकसद है चुनाव को टालना

फरवरी 2026 के चुनाव से पहले हिंसा बढ़ना संयोग नहीं है। इसका उद्देश्य अराजकता फैलाकर चुनाव टालना है। आलोचक कहते हैं कि यह अस्थिरता को इस्तेमाल करके चुनाव असुरक्षित बताने की रणनीति है। यूनुस सरकार की चुप्पी मिलीभगत का संकेत है। वे हिंसा को फेक न्यूज कहते हैं, लेकिन इससे चुनाव में देरी हो सकती है। इस्लामी कट्टरपंथी छात्र पार्टियाँ चुनाव टालने की माँग कर रही हैं और पाकिस्तान की छाया में यह साजिश रची जा रही है।

बांग्लादेश में बज रही खतरे की घंटी

बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह सिर्फ आंतरिक अस्थिरता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय खतरा है। भारत-घृणा की आड़ में इस्लामी शासन लाने की साजिश सफल हुई, तो पूर्वोत्तर असुरक्षित हो जाएगा। हिंदू अल्पसंख्यकों का सफाया होगा और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ेगा। अंतरिम सरकार को सख्ती से कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाना चाहिए। रेफरेंडम को बहाने न बनाएँ, चुनाव समय पर कराएँ।

बांग्लादेश के जो लोग 1971 में भारत के साथ मिलकर पाकिस्तानी अत्याचारों के खिलाफ लड़े थे, अब फिर से सेकुलर बांग्ला अस्मिता को बचाने के लिए खड़े हों। वरना जो देश बंगाली गौरव का प्रतीक था, वह इस्लामी तानाशाही का शिकार हो जाएगा। समय रहते सजग रहें, वरना इतिहास खुद को दोहराएगा।