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ध्रुव राठी और कॉन्ग्रेस का ‘गिग वर्कर्स’ वाला प्रोपेगेंडा हुआ फ्लॉप: 31 दिसंबर को नहीं रुकी डिलीवरी, ऑपइंडिया के रियलिटी चेक में सच आया सामने

बीते कई दिनों से सोशल मीडिया और वामपंथी पोर्टल्स द्वारा यह माहौल बनाया जा रहा था कि 31 दिसंबर 2025 को देश के करोड़ों गिग वर्कर्स (स्विगी, ज़ोमैटो, ज़ेप्टो और ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर्स) हड़ताल पर रहेंगे। ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर और कॉन्ग्रेस समर्थित संगठनों ने पूरी ताकत लगा दी थी कि नए साल के जश्न के मौके पर देश की सेवाओं को ठप कर दिया जाए।

लेकिन ऑपइंडिया के रियलिटी टेस्ट और ग्राउंड रिपोर्ट में यह दाँव पूरी तरह उल्टा पड़ता नजर आया। काम पर निकले युवाओं और सामान्य रूप से होती डिलीवरी ने यह साफ कर दिया कि भड़काने की साजिशें पूरी तरह ‘फ्लॉप’ रही हैं।

राघव चड्ढा की मौजूदगी और ध्रुव राठी का प्रोपेगेंडा

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा को गिग वर्कर्स के साथ देखा गया। राघव चड्ढा ने इसे संसद में उठाए गए मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की, ताकि हड़ताल को एक राजनीतिक आधार दिया जा सके।

वहीं, जर्मनी में बैठे यूट्यूबर ध्रुव राठी ने वीडियो जारी कर लोगों से अपील की थी कि वे 31 दिसंबर को इन ऐप्स का इस्तेमाल न करें और गिग वर्कर्स से अपनी एक दिन की कमाई छोड़ने को कहा। देखते ही देखते पूरा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इस मुहीम में कूद पड़ा, लेकिन असलियत में जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखा।

ऑपइंडिया का रियलिटी टेस्ट: डिलीवरी जारी, हड़ताल गायब

ऑपइंडिया की पत्रकार ने इस कथित हड़ताल की सच्चाई जानने के लिए खुद ग्राउंड जीरो से जाँच की। जब उन्होंने ऐप्स पर ऑर्डर प्लेस किए, तो न केवल ऑर्डर आसानी से स्वीकार किए गए, बल्कि समय पर डिलीवर भी हुए।

डिलीवरी करने आए युवाओं से जब बातचीत की गई, तो उन्होंने साफ कहा, “हम अपनी कमाई नहीं छोड़ सकते, हमें काम करना है।” युवाओं ने किसी भी तरह की हड़ताल का हिस्सा होने से इनकार कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रोपेगेंडा चलाने वाले लोग असल श्रमिकों की जरूरतों से कोसों दूर हैं।

संजय गावा और कॉन्ग्रेस का संदिग्ध कनेक्शन

वहीं, गिग वर्कर्स की हड़ताल पर जाने के बारे में जब ऑपइंडिया के पत्रकार ने जाँच की, तो इस दौरान एक संगठन का नाम ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स (AIGPWU) सामने आया, जिसके अध्यक्ष संजय गावा हैं। यह संगठन सीधे तौर पर कॉन्ग्रेस से जुड़ा हुआ है और गावा की तस्वीरें मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गाँधी के साथ मौजूद हैं।

जब ऑपइंडिया ने संजय गावा को फोन किया, तो पहले उन्होंने कहा कि उन्हें हड़ताल के बारे में कुछ पता ही नहीं है। लेकिन जब दोबारा फोन किया गया, तो वे अपनी बात से पलट गए और दावा करने लगे कि उनका संगठन इसमें शामिल है। एक राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपनी ही तथाकथित हड़ताल पर इस तरह का विरोधाभासी बयान पूरी साजिश की कलई खोल देता है।

देश को ठप करने की पुरानी ‘टूलकिट’

यह पहली बार नहीं है जब किसी विशेष वर्ग को भड़काकर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की गई हो। चाहे लेबर कोड बिल हो, किसान आंदोलन हो या ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल- हर बार एक ही पैटर्न दिखाई देता है।

केंद्र सरकार ने पहले ही नए लेबर कोड में गिग वर्कर्स के हितों का ध्यान रखा है, लेकिन वामपंथी और कॉन्ग्रेसी मानसिकता वाले लोग केवल राजनीति चमकाने के लिए इन युवाओं की आजीविका को खतरे में डाल रहे हैं। जिस तरह इन ताकतों ने कभी कानपुर जैसे औद्योगिक हब को हड़तालों के जरिए खंडहर बना दिया था, अब वैसी ही कोशिश नए भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ की जा रही है।

प्रोपेगेंडा हार गया, पेट की भूख जीत गई

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि ध्रुव राठी जैसे ‘करोड़पति यूट्यूबर्स’ के लिए एक दिन की कमाई छोड़ने का ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन गिग वर्कर्स के लिए जो हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते हैं, काम ही उनकी पूजा है।

31 दिसंबर को देश की जनता को परेशान करने और अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का जो सपना लुटियंस दिल्ली और विदेशी जमीन पर बैठकर देखा गया था, उसे भारत के मेहनतकश युवाओं ने सड़क पर उतरकर और अपना काम जारी रखकर चकनाचूर कर दिया है। माहौल बनाने की सारी कोशिशें फेल रहीं और सच्चाई की जीत हुई।

विचारधाराओं की जंग के 100 साल: क्यों भारत में समाप्ति की कगार पर वामपंथ और समाज के हर तबके तक पहुँचता RSS

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत केवल स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ रहा था बल्कि एक गहरी वैचारिक जंग भी उसके भीतर आकार ले रही थी। यह जंग थी स्वाधीनता के बाद के भारत को परिभाषित करने की। इसके दो ध्रुव थे- एक तरफ था कि क्या भारत सभ्यता की जड़ों, सांस्कृति की निरंतरता और समाज को केंद्र में रखने वाली सोच के साथ आगे जाएगा तो वहीं, दूसरी तरफ था कि क्या भारत पश्चिम या अन्य देशों से आयातित एक वैचारिक फ्रेमवर्क के सहारे खुद को नई तरह में गढ़ेगा। इसी संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुव बने- वामपंथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)।

विचारधारा की लड़ाई कोई दिन, महीनों या कुछ वर्षों की नहीं होती बल्कि इसमें दशकों लगते हैं, सैकड़ों साल तक यह जंग चलती रहती है। आज हम 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में हैं और RSS व CPI की स्थापना के 100 वर्ष हो गए हैं। सौ वर्षों के इस वैचारिक टकराव में आज स्थिति यह है कि वामपंथ भारत में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर हाशिये पर सिमटता दिख रहा है जबकि RSS समाज के लगभग हर तबके, हर शहर-गाँव तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। RSS की यह ताकत और वामपंथ की कमजोरी आकस्मिक नहीं बल्कि कई कारणों का परिणाम है जिसकी चर्चा हम इस लेख में करेंगे।

आयातित विचारधारा और मजबूत सांस्कृतिक शुरुआत: शुरुआती दिनों में CPI और RSS

वामपंथ का मूल समझे जाने वालीं मार्क्सवाद, लेनिनवाद जैसी धाराएँ यूरोप और रूस के औद्योगिक-सामाजिक संदर्भों से निकली थीं। भारत के लिए यह आयातित विचार था। वैसे तो 1920 में एम.एन. रॉय, मोहम्मद अली, एम.पी.टी. आचार्य जैसे लोगों ने देश से बाहर थे ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी। बाद में 1925 में कानपुर में एक सम्मेलन हुआ, जहाँ भारत के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे कम्युनिस्ट संगठन एक साथ आए और CPI को औपचारिक रूप मिला। अब वही इसका स्थापना दिवस माना जाता है।

वामपंथी विचारधारा उस समय आकर्षक लगी क्योंकि वह शोषण और असमानता के खिलाफ कड़ी बात करती थी। लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा यह रही कि इसने भारतीय समाज को केवल ‘अमीर-गरीब’ या ‘वर्ग’ के नजरिये से देखा जबकि भारत का समाज परंपरा, धर्म, जाति और संस्कृति से मिलकर बना एक जटिल ढाँचा है।

इसी दौर में 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। RSS का उद्देश्य सत्ता पाना नहीं बल्कि समाज को मजबूत बनाना था। उसने राष्ट्र को सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई माना। संघ ने ऊपर से विचार थोपने के बजाय समाज के बीच जाकर काम करने का रास्ता चुना।

1925 से अबत तक संघ की असली ताकत उसकी तीन बातों में है- शाखा, प्रचारक और गुरु दक्षिणा। शाखा में रोज की गतिविधियों से अनुशासन और चरित्र का निर्माण होता है। प्रचारक अपना निजी जीवन त्यागकर संगठन को गाँव-गाँव तक ले जाते हैं। गुरु दक्षिणा से संघ आत्मनिर्भर रहता है और किसी बाहरी दबाव पर निर्भर नहीं होता। इन्हीं तीनों ने मिलकर RSS को सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा का जीवंत आंदोलन बनाया।

वामपंथी पार्टी में टूट और RSS का विस्तार

आजादी के बाद का शुरुआती समय वामपंथ के लिए राजनीतिक मजबूती जैसा था तो वहीं RSS के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। 1951-52 के पहले आम चुनाव में कॉन्ग्रेस के बाद CPI दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा तो वहीं RSS पर महात्मा गाँधी की हत्या के आरोप लगाकर उसपर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। हालाँकि, इस लड़ाई में संघ तपकर और निखरा और मजबूती के साथ देश सेवा में जुटा रहा।

1957 में केरल में वामपंथी सरकार बनने के बाद CPI बेशक मजबूत दिख रही थी लेकिन 1950–60 के दशक में अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ते मतभेदों का असर भारत पर भी पड़ा। 1964 में इसी वैचारिक टकराव के चलते CPI से अलग होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) CPI(M) बनी। 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन ने सशस्त्र क्रांति की राह अपनाने वाले धड़े को जन्म दिया। 1969 में CPI (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) बनी, जिससे आगे चलकर कई नक्सली संगठन बने। अंततः 2004 में CPI (माओवादी) का गठन हुआ।

वामपंथ का आंदोलन जहाँ टूटने लगा था, वहीं RSS ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को केंद्र में रखकर लंबी दूरी की योजना बनाई थी। RSS ने सीधे राजनीतिक दल के रूप में काम करने के बजाय समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग संगठन खड़े किए। 1948 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) छात्रों के लिए बनी। 1955 में भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने श्रमिक वर्ग में काम शुरू किया। इसी तरह विद्या भारती (शिक्षा), विश्व हिंदू परिषद (धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र), सेवा भारती (सेवा कार्य) जैसे संगठन बनते गए। ‘आनुषांगिक मॉडल’ से संघ विस्तार करता रहा।

भारत की संस्कृति: दो ध्रुवों पर खड़े RSS और वामपंथ

वामपंथ की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि उसने भारत को कभी समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की। उसका वैचारिक जन्म यूरोप की फैक्ट्रियों, वहाँ के मजदूर संघर्ष और चर्च बनाम राज्य की लड़ाई से हुआ था। वामपंथियों के वैचारिक बाप कार्ल मार्क्स ने 19वीं सदी में धर्म को ‘जनता के लिए अफीम’ कहा तो भारत में भी वामपंथियों ने वही मान लिया। भारत में धर्म कभी सिर्फ पूजा-पाठ नहीं रहा। यहाँ धर्म जीवन का तरीका है, संस्कार है, समाज को जोड़ने वाली डोर है। वामपंथ ने यह फर्क कभी समझा ही नहीं और बिना सोचे-समझे वही विदेशी चश्मा भारत की आँखों पर चढ़ाने की कोशिश की।

यहीं से वामपंथ भारत से कटना शुरू हुआ। उसने मंदिर, त्योहार, परंपरा, राष्ट्रभाव- सबको शक की नजर से देखा। कभी कहा कि ये शोषण के औजार हैं, कभी कहा कि ये पिछड़ेपन की निशानी हैं। होली, दीवाली, राम, कृष्ण, गीता ये सब वामपंथ के लिए या तो ‘मिथ’ थे या ‘अफीम’। सवाल यह है कि जो चीजें करोड़ों लोगों को जोड़ती हैं अगर उन्हें आप लगातार गाली देंगे, तो लोग आपसे जुड़ेंगे या दूर भागेंगे?

इसके उलट RSS ने वो रास्ता लिया जो भारत को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करता है। संघ ने संस्कृति को बोझ नहीं, ताकत माना और उसने परंपरा को साथ लेकर आगे बढ़ता गया। RSS ने हिंदू त्यौहारों को शाखाओं पर भी मनाया। जहाँ वामपंथ को भारत की पहचान से समस्या थी तो वहीं RSS ने उसी पहचान को समाधान माना। वामपंथ के लिए धर्म और राष्ट्र सब संदेह के घेरे में रहे तो RSS ने उन्हीं के सहारे लोगों को एकजुट किया।

हिंसा VS सेवा: वामपंथ VS RSS

हिंसा का प्रश्न इस वैचारिक जंग का एक अहम पहलू रहा है। वामपंथी आंदोलनों का एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र संघर्ष और क्रांति की अवधारणा से जुड़ा रहा। नक्सलवाद इसका चरम उदाहरण है, जहाँ ‘देश के खिलाफ युद्ध’ को वैध ठहराया गया। इसके चलते जनजातीय क्षेत्रों में विकास रुक गया, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रभावित हुईं और आम नागरिक हिंसा के बीच पिसता रहा। वामपंथियों के हमलों में सैकड़ों सुरक्षाबलों के जवान मारे गए।

केरल में वामपंथियों ने RSS के कार्यकर्ताओं तक को निशाना बना गया। वैचारिक युद्ध को हत्याओं तक पहुँचा दिया गया, स्वयंसेवकों को मारा-पीटा गया। इसके उदाहरण के तौर पर सदानंदन मास्टर जैसे स्वयंसेवक हैं। कम्युनिस्टों ने 1994 में उनके पैर काट दिए और अब उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा के सांसद के तौर पर मनोनीत किया है।

इसके उलट RSS ने सैद्धांतिक रूप से हिंसा को संगठनात्मक साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया। 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध और लगातार आलोचनाओं के बावजूद RSS ने स्वयं को सामाजिक कार्यों, आपदा राहत, शिक्षा और सेवा के माध्यम से स्थापित किया। इससे उसकी छवि एक ‘ग्रासरूट’ संगठन की बनी, ना कि केवल विरोध की राजनीति करने वाले समूह की।

RSS देश के दूर-दराज और उपेक्षित इलाकों में सेवा कार्यों के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम से लेकर सेवा भारती जैसे दर्जनों संगठन अपने-अपने तरीके से सेवा कार्यों में जुटे हैं। वनवासी कल्याण आश्रम देशभर में 20,000 से अधिक एकल विद्यालय चला रही है, जिनके माध्यम से लगभग 30 लाख आदिवासी बच्चों को बुनियादी शिक्षा मिल रही है। एकल विद्यालय की व्यवस्था सरल लेकिन प्रभावशाली है, जहाँ एक ही शिक्षक पूरे गाँव के बच्चों को पढ़ाता है।

वहीं, सेवा भारती जैसे संगठन शहरों और गाँवों दोनों में गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए काम कर रहे हैं- चाहे वह स्वास्थ्य शिविर हों, आपदा के समय राहत पहुँचाना हो या महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। ऐसे ही प्रयासों के जरिए आरएसएस से प्रेरित करीब 1.6 लाख से अधिक सेवा प्रकल्प देशभर में चल रहे हैं, जहां स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के समाज को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं। ये काम किसी विदेशी फंड या बड़े प्रचार के सहारे नहीं बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के त्याग और समाज की भागीदारी से चल रहे हैं। RSS ने सेवा को समाज को स्थायी रूप से सशक्त करने का माध्यम मान लिया है।

वामपंथी शासन की विफलता वैचारिक पतन की बड़ी वजह

करीब दो दशक पहले तक भारतीय राजनीति में वामपंथी दल एक निर्णायक ताकत माने जाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट पार्टियों ने कुल 59 सीटें जीती थीं और केंद्र की सत्ता में उनकी भूमिका इतनी प्रभावी थी कि UPA सरकार बाहर से उनके समर्थन पर टिकी थी। इसके बाद शुरू हुआ पतन अब लगभग अस्तित्व के संकट तक पहुँच चुका है।

2004 में 59 सीटों से शुरू हुआ लेफ्ट का सफर 2009 में सिमटकर 24 सीटों पर आ गया। 2014 में यह संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गई और 2019 में तो वामपंथ महज 5 लोकसभा सीटों तक सीमित हो गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही कुल सीटों की संख्या थोड़ी बढ़ी हो लेकिन यह बढ़त भी राजनीतिक तौर पर रसातल में जाने का संकेत ही है। इनमें वामपंथी पार्टियों को 8 सीटें मिलीं।

राज्यों में भी कमोबेश स्थिति यही है। वामपंथी शासन की विफलताओं का सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल है। CPI(M) ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक राज्य की सत्ता संभाली। इतनी लंबी अवधि किसी भी दल को एक मजबूत विकास मॉडल खड़ा करने का अवसर देती है लेकिन बंगाल में उलटा हुआ। इस दौर में राज्य से उद्योग पलायन करता गया, कृषि विकास की रफ्तार थम गई और गरीबों की स्थिति देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में और बदतर हो गई। स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, भ्रष्टाचार बढ़ा और राजनीतिक हिंसा आम होती चली गई। नतीजा यह हुआ कि 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बाहर कर दिया। आज बंगाल में पार्टी लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है।

कुछ ऐसा ही हाल त्रिपुरा में देखने को मिला। यहाँ वामपंथी दल 1993 से 2018 तक यानी 25 साल तक सत्ता में रहे। लंबे शासन के बावजूद वे जनता की नई आकांक्षाओं के साथ खुद को ढाल नहीं सके। एंटी-इनकंबेंसी, संगठनात्मक जड़ता और बदलते राजनीतिक माहौल को न समझ पाने की कीमत उन्हें 2018 में चुकानी पड़ी, जब बीजेपी ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।

आज अगर भारत में वामपंथ का कोई आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता है तो वह केरल है। राज्य में फिलहाल वामपंथी सरकार है लेकिन राजनीतिक स्तर पर यहां भी चेतावनी के संकेत साफ हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरे केरल से वामपंथी दलों को सिर्फ एक सीट मिली। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी गैर-लेफ्ट फ्रंट ने बढ़त बनाई है और पहली बार तिरुवनंतपुरम में बीजेपी का मेयर बना। यह बदलाव बताता है कि जिस केरल को लेफ्ट का अभेद्य किला माना जाता था, वहाँ भी जमीन खिसक रही है।

वामपंथी पार्टियों का पतन सिर्फ चुनावी गणित का मामला नहीं है बल्कि उनके पास कोई ऐसा ठोस विकास मॉडल नहीं है जिसे वे देश के सामने प्रेरणादायक रूप में रख सकें। दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद न बंगाल, न त्रिपुरा और न ही अन्य राज्यों में वे ऐसा आर्थिक और सामाजिक ढाँचा खड़ा कर पाए जिसे उनकी उपलब्धि कहा जा सके। नतीजा यह है कि कभी राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने वाली लेफ्ट पार्टियाँ अब धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई हैं।

बौद्धिक मोर्चे पर भी पिछड़ता वामपंथ

कई दशकों तक भारत के विश्वविद्यालयों, मीडिया और साहित्यिक जगत पर वामपंथी विचारधारा का गहरा असर रहा। JNU हो, दिल्ली यूनिवर्सिटी हो या हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी हो इन जैसे परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों का वर्चस्व था और मीडिया में भी मार्क्सवादी विश्लेषण को ही बौद्धिक मानक माना जाता था। आज यह वामपंथ बौद्धिक विमर्श लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

इस गिरावट का एक बड़ा कारण 1991 में सोवियत संघ का पतन रहा। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि भले ही भारत कभी कम्युनिस्ट देश नहीं रहा लेकिन भारतीय वामपंथ वैश्विक कम्युनिज्म से वैचारिक प्रेरणा लेता था। सोवियत संघ के टूटने से उस वैचारिक आधार को गहरा झटका लगा। इसके बाद भी भारतीय लेफ्ट आत्ममंथन करने के बजाय पुरानी भाषा और संरचनाओं में उलझा रहा जिससे नए विचारों का अभाव साफ दिखाई देने लगा।

विश्वविद्यालयों में यह बदलाव और स्पष्ट है। कभी वामपंथी राजनीति के गढ़ माने जाने वाले जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी में अब दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी विचारों का असर बढ़ा है। एक अध्ययन के अनुसार, वामपंथ जाति जैसे जटिल सामाजिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से समझने और संबोधित करने में असफल रहा। वर्ग संघर्ष तक सीमित सोच ने उसे सामाजिक रूप से कमजोर किया और छात्रों के बड़े वर्ग से दूरी बढ़ी।

मीडिया में भी वामपंथी प्रभाव कम हुआ है। भारतीय लेफ्ट संगठनात्मक बिखराव और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। बदलते डिजिटल दौर और नए पाठक वर्ग के साथ तालमेल न बैठा पाना भी उसकी कमजोरी बना है। वामपंथ की इस वैचारिक कमजोरी से जो खाली जगह बनती गई उसे RSS और उससे जुड़े विचारक भरते गए।

RSS और उससे जुड़े विचारकों ने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद को लेकर एक वैकल्पिक बौद्धिक विमर्श सामने रखा। यह विमर्श केवल वामपंथ के विरोध या प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि हिंदू परंपरा को आधुनिक संदर्भ में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास रहा है। इसके माध्यम से समाज को जोड़ने और साझा सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया।

इतिहास के क्षेत्र में RSS से जुड़े विचारकों ने वैकल्पिक चर्चाएँ प्रस्तुत कीं, स्कूली किताबों तक में जो नैरेटिव वामपंथी लेखकों द्वारा बनाया गया था उसको क्रमश: तोड़ने की जारी हैं। सही और वैकल्पिक इतिहास छात्रों और समाज के समक्ष लाया जा रहा है। RSS के इतिहास संकलन समिति या अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना जैसे संगठन ‘इतिहास, संस्कृति, परम्परा आदि के क्षेत्र में प्रामाणिक, तथ्यपरक तथा सर्वांगपूर्ण इतिहास-लेखन’ के काम में जुटे हैं। इसे राष्ट्रवाद को पश्चिमी नजरिए से नहीं बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से समझने में मदद मिल रही है। संघ से जुड़े सुरुचि जैसे प्रकाशन राष्ट्रवाद और संघ से जुड़ी पुस्तकें लोगों को उपलब्ध करवा रहे हैं। ऐसे कई संगठन हैं जो इसे ध्यान में रखकर बौद्धिक विमर्श की एक जमीन तैयार कर रहे हैं।

संस्कृति के स्तर पर RSS ने ‘अखंड भारत’ जैसी अवधारणाओं को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाया है जिसमें प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों तक फैला हुआ बताया गया। इस नजरिए में इतिहास को केवल राजनीतिक घटनाओं से बढ़कर सांस्कृतिक संपर्क, विचारों और परंपराओं के आदान-प्रदान के रूप में देखा गया। जो सीधे तौर पर भारतीय सभ्यता की निरंतरता और व्यापक प्रभाव को दिखाता है। समय के साथ RSS ने खुद को बदला है और डिजिटल युग सोशल मीडिया और नए संचार माध्यमों के जरिए संघ का दृष्टिकोण व्यापक समाज में लोगों तक पहुँचा है।

क्यों हाशिए पर चला गया वामपंथ?

भारत में वामपंथ की वैचारिक और राजनीतिक गिरावट के पीछे उसका मूल दृष्टिकोण एक बड़ा कारण रहा है। वामपंथ की राजनीति का केंद्र हमेशा सत्ता, राज्य और सिस्टम रहा। उसका मानना था कि सरकार और संस्थानों पर नियंत्रण के जरिए समाज को बदला जा सकता है। यही वजह रही कि जैसे-जैसे वामपंथ चुनावों में कमजोर पड़ा, वैसे-वैसे उसका सामाजिक और बौद्धिक प्रभाव भी सिकुड़ता चला गया। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सत्ता से बाहर होते ही उसका जमीनी आधार तेजी से ढहता दिखा।

इसके उलट, RSS ने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उसके लिए सत्ता की अनूकुलता एक साधन भर रही। सरकारें बदलीं, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं लेकिन RSS का संगठन और उसका सामाजिक काम जमीन पर लगातार चलता रहा। यही कारण है कि सत्ता में उतार-चढ़ाव के बावजूद उसका विस्तार रुका नहीं और समाज में उसकी पकड़ बनी रही।

वामपंथ की एक बड़ी वैचारिक कमजोरी यह रही कि उसने खुद को ‘प्रगतिशील’ और जनता को ‘पिछड़ा’ मान लिया। उसने ऊपर से समाज को दिशा देने का रवैया अपनाया। इस सोच ने आम लोगों और वामपंथी नेतृत्व के बीच दूरी पैदा कर दी। वहीं, RSS ने समाज को उपदेश देने के बजाय उसके साथ चलने की रणनीति अपनाई। शाखाओं, सेवा कार्यों और अन्य गतिविधियों के जरिए उसने लोगों से सीधा जुड़ाव बनाया।

समय के साथ वामपंथ का विमर्श आम समाज से खिसकता चला गया। किसान, मजदूर या छोटे कस्बों के युवाओं की भाषा और समस्याएँ उसकी राजनीति और लेखन में कम होती गईं। उसका दायरा विश्वविद्यालयों, अंग्रेजी अखबारों, सेमिनार हॉल और एयर-कंडीशंड बहसों तक सिमट गया। नतीजा यह हुआ कि आम जनता खुद को उस विमर्श से जुड़ा महसूस नहीं कर पाई।

हर चुनावी और वैचारिक असफलता के बाद वामपंथ ने आत्ममंथन करने के बजाय जनता, मीडिया या सिस्टम को दोष देना ज्यादा आसान समझा। इसके उलट, RSS ने समय के साथ जरूरत पड़ने पर अपनी रणनीति, काम करने के तरीके में बदलाव किए लेकिन अपने मूल विचार से समझौता नहीं किया। यही फर्क आज साफ दिखाई देता है।

आज वामपंथ हताश और बिखरा हुआ नजर आता है। वहीं, RSS बिना ज्यादा शोर किए, बिना खुद को इकलौता बुद्धिजीवी घोषित किए लगातार समाज में अपनी जड़ें गहरी करता गया। यही अंतर भारत में वामपंथ की गिरावट और नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के उभार को समझने की कुंजी है।

2026: भारत का वर्ष- नेतृत्व, निर्णायकता और दिशा

जब हम एक और अंग्रेजी नववर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, तो इतिहास के दो वाक्य स्मृति में कौंधते हैं। एक, गोपाल कृष्ण गोखले का कथन कि ‘बंगाल जो आज सोचता है, भारत कल सोचता है’। दूसरा, लोकसभा में सुषमा स्वराज का निर्भीक उद्घोष कि ‘हाँ, हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम वंदे मातरम् गाने की वकालत करते हैं…’।

सनातन परंपरा में भले ही अंग्रेजी नववर्ष का कोई आध्यात्मिक महत्व न हो, किंतु वैश्विक समयबोध में यह केवल कैलेंडर परिवर्तन नहीं रह गया है। कुछ वर्ष ऐसे होते हैं, जो इतिहास की धुरी मोड़ देते हैं। 2026 ऐसा ही वर्ष है।

पिछले कई दशकों तक भारत से यह अपेक्षा की जाती रही कि वह हर मुद्दे पर ‘स्पष्टीकरण’ दे। कभी कश्मीर पर, कभी नागरिकता कानून पर तो कभी अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रबोध पर।

लेकिन 2026 में भारत उस दौर से आगे निकल चुका है। आज का भारत सफाई नहीं देता। आज का भारत दिशा देता है। विमर्श निर्धारित करता है।

यह वर्ष उस आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि सभ्यतागत चेतना से उपजता है। वही चेतना जिसने भारत को सहस्राब्दियों तक जीवित रखा।

नववर्ष 2026 का संदेश: भारत- उदीयमान शक्ति नहीं, निर्णायक शक्ति

1 जनवरी 2026 से भारत BRICS की अध्यक्षता सँभाल रहा है। यह महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि वैश्विक विमर्श की धुरी सँभालने का क्षण है।

आज की विश्व व्यवस्था में भारत;

  • ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है
  • पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन का केंद्र है
  • लोकतंत्र, तकनीक और संस्कृति का जीवंत संगम है

जहाँ अमेरिका नेतृत्व खोने की बेचैनी में है, जहाँ यूरोप अपनी पहचान और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, वहीं भारत स्थिरता और विश्वास का आधार बनकर उभरा है।

राष्ट्रवाद अब गाली नहीं, मॉडल है

एक समय था जब राष्ट्रवाद को पिछड़ेपन का पर्याय बताया गया। भारत को समझाया गया कि ‘सेकुलर और आधुनिक’ दिखने के लिए अपनी जड़ों से दूरी बनानी होगी। सुषमा स्वराज के जिस संबोधन का मैंने शुरुआत में जिक्र किया है, वह इसी टीस से निकली थी।

लोकसभा में 11 जून 1996 का उनका यह संबोधन इस विकृति के विरुद्ध चेतावनी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि देश को यह समझना होगा कि धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसे किस प्रकार विकृत किया गया।

इसी विकृति का परिणाम बंगाल ने भी भुगता। हिंदुओं के नरसंहार के बाद जिस प्रदेश ने विभाजन झेला, स्वतंत्रता के पश्चात उसी पर तुष्टिकरण, वामपंथी हिंसा और घुसपैठ को थोप दिया गया।

आज पश्चिम बंगाल पुनः वैचारिक और सामाजिक संकट के चौराहे पर खड़ा है। 2026 का विधानसभा चुनाव कोई साधारण राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है। यह बंगाल के आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना की परीक्षा है। आज के भारत की सोच के साथ खड़ा होने का वर्ष है। फिर से उस वैभव की ओर लौटने का वर्ष है, जिसने गोखले को वह बात कहने को प्रेरित किया था, जिसके बिना आज भी बंगाल की बात पूर्ण नहीं होती है।

सेकुलरिज्म का अंत, सभ्यतागत राष्ट्रवाद का उदय

2026 में वह कृत्रिम सेकुलर विमर्श बिखर चुका है, जिसने राष्ट्रबोध को अपराधबोध में बदल दिया था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद को पुनः सम्मानजनक और वैश्विक रूप से स्वीकार्य बनाया है।

आज भारत का राष्ट्रवाद;

  • समावेशी है
  • आत्मविश्वासी है
  • वैचारिक रूप से स्पष्ट है
  • वैश्विक रूप से स्वीकार्य है

भारत ने यह सिद्ध किया है कि आधुनिकता के लिए आत्मविस्मरण आवश्यक नहीं और सहयोग के लिए संप्रभुता का त्याग अनिवार्य नहीं है।

ऑपइंडिया की भूमिका: सिर्फ खबर नहीं, वैचारिक हस्तक्षेप

नववर्ष 2026 में ऑपइंडिया की भूमिका केवल समाचार देने तक सीमित नहीं है। यह उस नैरेटिव के विरुद्ध खड़ा मंच है, जिसने;

  • भारत को निरंतर अपराधी ठहराया
  • हिंदू समाज को अपराध बोध से भरा
  • राष्ट्रहित को संदेह का विषय बना दिया

ऑपइंडिया का लक्ष्य स्पष्ट है- तथ्यों के साथ निर्भीकता और राष्ट्र के साथ स्पष्ट प्रतिबद्धता।

2026: किसका वर्ष?

यह वर्ष उनका नहीं होगा;

  • जो विदेशी प्रमाण-पत्र के बिना कुछ नहीं मानते
  • जो भारत की प्रत्येक उपलब्धि में संशय खोजते हैं
  • जो अपनी ही सभ्यता से संकोच करते हैं

यह वर्ष उनका होगा;

  • जो भारत को नेतृत्व करते देखना चाहते हैं
  • जो इतिहास से लज्जित नहीं, प्रेरित होते हैं
  • जो जानते हैं कि प्रगति जड़ों से कटकर नहीं आती

2026 का संकल्प

इस नववर्ष, ऑपइंडिया अपने पाठकों से केवल एक ही संकल्प चाहता है- सच के पक्ष में खड़े रहिए, भ्रम से लड़िए, और भारत को समझने में गर्व महसूस कीजिए।

2026 भारत के लिए परीक्षा नहीं, उद्घोषणा है। यह उस भारत की घोषणा है जो अब पूछता नहीं, बताता है।

सपा की गोद में बैठी दैनिक भास्कर की ‘रशियन’ पत्रकारिता, अपने राजनीतिक आका को तेल लगाने के लिए खुद का न निकालो जनाजा

आजकल मीडिया और राजनीति का गठजोड़ इतना घिनौना हो चुका है कि राष्ट्रीय स्तर के अखबार और कथित समाजवादी दल मिलकर समाज में विकृति फैला रहे हैं। दैनिक भास्कर जैसे बड़े न्यूजपेपर, जो कभी विश्वसनीयता का दावा करते थे, अब सनसनीखेज हेडलाइंस के जरिए क्लिकबेट और अश्लील इंसिनुएशन परोस रहे हैं। हालिया उदाहरण देखिए, दैनिक भास्कर की एक खबर का शीर्षक- “नेताजी रशियन के साथ मनाएँगे नया साल।”

यह शीर्षक उत्तर प्रदेश की राजनीति पर आधारित एक रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसमें कुमार विश्वास की राज्यसभा सीट की महत्वाकांक्षा और अखिलेश यादव की पार्टी की आंतरिक कलह का जिक्र है। लेकिन भास्कर ने जानबूझकर ‘रशियन’ शब्द को ऐसे ट्विस्ट किया कि यह रूसी महिलाओं के प्रति एक घटिया, यौन संकेत देने वाला इंसिनुएशन बन गया।

दैनिक भास्कर की खबर का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: Bhaskar website)

यह कोई संयोग नहीं है। सस्ते कॉमेडियन ‘रशियन’ शब्द का स्टीरियोटाइप के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं और अब दैनिक भास्कर जैसे संस्थान अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए इसे मेनस्ट्रीम बनाना चाहते हैं। ‘रशियन’ शब्द का द्विअर्थी इस्तेमाल विदेशी महिलाओं खासकर रूसी महिलाओं को वेश्यावृत्ति या सस्ते मनोरंजन से जोड़ता है। भास्कर की हेडलाइन ने इस शीर्षक से ठीक यही काम किया और राजनीतिक खबर को अश्लील जोक में बदल दिया।

क्या यह पत्रकारिता है या कॉमेडी शो का सस्ता स्टंट? दैनिक भास्कर जैसे राष्ट्रीय अखबार का यह स्तर देखकर शर्म आती है। पाठकों को सूचना देने की बजाय, वे उनके मन में विकृति पैदा कर रहे हैं। महिलाओं का सम्मान तो दूर, एक पूरे देश रूस का अपमान कर रहे हैं। रूस भारत का पुराना मित्र है, जो हर संकट में साथ खड़ा रहा। लेकिन भास्कर के लिए यह सब TRP और क्लिक्स का खेल है।

और यह अकेला मामला नहीं है। भास्कर की ‘ये बात खरी है’ सीरीज पहले से ही विवादों में रही है, जहां तथ्यों को तोड़-मरोड़कर सनसनी पैदा की जाती है। अब वे कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता परोस रहे हैं। पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन यह काम करते थे, अब कथित पत्रकार जोकर बनकर देश के मित्र राष्ट्र का मजाक उड़ा रहे हैं। क्या यही है जिम्मेदार पत्रकारिता?

राष्ट्रीय अखबार होने का मतलब यह थोड़े है कि आप समाज में जहर घोलें। भास्कर के संपादक और रिपोर्टर शायद भूल गए हैं कि उनका काम सूचना देना है, न कि पाठकों के दिमाग में गंदगी भरना। यह नारी सम्मान का अपमान है, रूसी महिलाओं की गरिमा का अपमान है और भारत-रूस मैत्री का अपमान है।

अब आते हैं समाजवादी पार्टी पर, जो इस घटिया खबर को लपककर अपनी गंदी राजनीति चमकाने में लग गई। सपा के मीडिया सेल ने भास्कर की इसी खबर को शेयर करते हुए लिखा, “भाजपा और उसके गठबंधन सहयोगी दलों के नेताओं का चाल चरित्र चेहरा सबके सामने सार्वजनिक है। भाजपा नेताओं को रशियन चाहिए, ये भाजपाई कितने गंदे चाल चरित्र के हैं ये सब सबको दिखाई दे रहा है अब।”

वाह! क्या स्तर है समाजवादी पार्टी का। एक सनसनीखेज हेडलाइन को आधार बनाकर वे पूरे भाजपा और उसके सहयोगियों पर कीचड़ उछाल रहे हैं। लेकिन ये वही समाजवादी पार्टी है, जिसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने एक बार बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि “लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं।”

उस बयान ने पूरे देश को हिला दिया था, महिलाओं के सम्मान पर सवाल उठाए थे। आज उनके वारिसान इसी पार्टी में बैठकर दूसरों के चरित्र पर लेक्चर दे रहे हैं?

समाजवादी पार्टी की यह दोहरी मानसिकता जगजाहिर है। जब उनके अपने नेता महिलाओं के प्रति संवेदनहीन बयान देते हैं, तब चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन राजनीतिक फायदा देखकर घटिया हेडलाइंस को हथियार बना लेते हैं। अखिलेश यादव की पार्टी महिलाओं के सम्मान की दुहाई देती है, लेकिन खुद ऐसी खबरों को बढ़ावा देकर समाज में विकृति फैला रही है। यह राजनीति नहीं, घटियापन है।

सपा को याद रखना चाहिए कि जनता सब देख रही है- उनका चाल, चरित्र और चेहरा। वे भारत के मित्र रूस का अपमान करके क्या साबित करना चाहते हैं? कि वे सत्ता के लिए कितने नीचे गिर सकते हैं?

यह प्रकरण मीडिया और विपक्ष की गिरती साख को उजागर करता है। दैनिक भास्कर जैसे अखबार को चाहिए कि वे अपनी हेडलाइंस पर संयम बरतें, सनसनी की बजाय तथ्य परोसें। ‘रशियन’ जैसे शब्दों का दुरुपयोग बंद करें, जो एक पूरे राष्ट्र और उसकी महिलाओं का अपमान है। और समाजवादी पार्टी को चाहिए कि वे अपनी पुरानी गलतियों पर माफी माँगें, मुलायम सिंह के उस बयान पर आत्मचिंतन करें, बजाय दूसरों पर कीचड़ उछालने के।

यह मामला सिर्फ एक शीर्षक या एक ट्वीट तक सीमित नहीं है, बल्कि मीडिया की गिरती भाषा, राजनीतिक दलों की विकृत मानसिकता और महिलाओं के प्रति समाज में फैलाए जा रहे ज़हरीले संकेतों का गंभीर उदाहरण बन चुका है। जिस शब्दावली और संदर्भ में ‘रशियन’ शब्द को परोसा गया, वह न सिर्फ स्त्री-सम्मान के खिलाफ है, बल्कि एक सम्प्रभु राष्ट्र और भारत के मित्र देश रूस का खुला अपमान भी है। यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा कि क्या राष्ट्रीय स्तर का अख़बार और एक राजनीतिक दल मिलकर समाज को उसी गटर में ढकेल रहे हैं, जहाँ कभी स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर सस्ते जोक सुनाए जाते थे।

भास्कर ऐसा इसलिए भी करता है, ताकि वो विपक्ष की राजनीति के काम आ सके। यही कारण है कि उसकी इस घटिया पत्रकारिता को प्रोमोट करते हुए समाजवादी पार्टी ने उसे शेयर किया है।

बहरहाल, जनता अब जाग चुकी है। ऐसे जोकरों को नकारने का समय आ गया है। दैनिक भास्कर जैसे मीडिया हाउस और सपा जैसे दल अगर नहीं सुधरे, तो उनका हश्र वही होगा जो सस्ते जोकर्स का होता है- जनता की नजरों में गिरना और भुला दिया जाना।

UP पुलिस ने निकाली बंपर वैकेंसी, युवाओं को योगी सरकार ने दिया नए साल का तोहफा: 32679 पदों के लिए OTR जरूरी, जानें- कैसे करें अप्लाई

उत्तर प्रदेश में नए साल में योगी सरकार ने युवाओं को तोहफा दिया है। युवाओं के सरकारी नौकरी की वैकेंसी निकली है। उत्तर प्रदेश पुलिस में आरक्षी नागरिक पुलिस एवं समकक्ष पदों पर सीधी भर्ती- 2025 के अंतर्गत कुल 32679 पदों के लिए वैकेंसी निकली है। इसके लिए अभ्यर्थी को ऑनलाइन आवेदन करना होगा। आवेदन करने की तिथि 31/12/2025 से 30/01/2026 यानी पूरे एक महीना है।

आवेदन करने से पहले अभ्यर्थी को रजिस्ट्रेशन करना होगा। वन टाइम रजिस्ट्रेशन के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड यानी uppbpb.gov.in पर जाकर वन टाइम पंजीकरण कराना अनिवार्य है।

इसके तहत आरक्षी नागरिक पुलिस (पुरुष/ महिला), आरक्षी पीएसीसी/ सशस्त्र पुलिस ( पुरुष), महिला बटालियन हेतु महिला आरक्षी, आरक्षी विशेष सुरक्षा बल ( पुरुष), आरक्षी घुडसवार पुलिस (पुरुष), जेल वार्डर की नियुक्ति होगी।

आरक्षी नागरिक पुलिस (पुरुष/ महिला)

इसके लिए अनारक्षित सीटों की संख्या 4191, ईडब्लूएस के लिए 1046, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 2826, अनुसूचित जाति के लिए 2198 और अनुसूचित जनजाति के लिए 208 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 10469 सीट उपलब्ध हैं।

आरक्षी पीएसीसी/ सशस्त्र पुलिस ( पुरुष)

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 6060, ईडब्लूएस के लिए 1512, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 4083, अनुसूचित जाति के लिए 3176 और अनुसूचित जनजाति के लिए 300 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 15131 सीट उपलब्ध हैं।

आरक्षी विशेष सुरक्षाबल (पुरुष)

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 538, ईडब्लूएस के लिए 134, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 362, अनुसूचित जाति के लिए 281 और अनुसूचित जनजाति के लिए 26 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 1341 सीट उपलब्ध हैं।

महिला बटालियन हेतू महिला आरक्षी

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 916, ईडब्लूएस के लिए 228, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 615, अनुसूचित जाति के लिए 478 और अनुसूचित जनजाति के लिए 45 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 2282 सीटें उपलब्ध हैं।

आरक्षी घुडसवारी पुलिस

इसके लिए पुरुष अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं। इसमें अनारक्षित सीटों की संख्या 30, ईडब्लूएस के लिए 7, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 19, अनुसूचित जाति के लिए 14 और अनुसूचित जनजाति के लिए 1 सीट है। यानी कुल मिलाकर 71 सीटें उपलब्ध हैं।

जेल वार्डर पुरुष श्रेणी

अनारक्षित सीटों की संख्या 1314, ईडब्लूएस के लिए 327, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 885, अनुसूचित जाति के लिए 688 और अनुसूचित जनजाति के लिए 65 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 3279 सीट उपलब्ध हैं।

जेल वार्डर महिला श्रेणी

इस कटेगरी में अनारक्षित सीटों की संख्या 44, ईडब्लूएस के लिए 10, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 28, अनुसूचित जाति के लिए 22 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 106 सीट उपलब्ध हैं।

आवेदन करने के लिए सामान्य, ईडब्लूएस और अन्य पिछड़ा वर्ग को 500 रुपए और दूसरे वर्ग को 400 रुपए जमा करने होंगे।

शैक्षणिक योग्यता

भारत के किसी भी बोर्ड द्वारा 12वीं पास या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त समकक्ष योग्यता होना आवश्यक है। आवेदन करते वक्त सर्टिफिकेट की कॉपी भी संलग्न करना है। 12वीं परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी इसके पात्र नहीं होंगे।

उम्र सीमा

पुरुष अभ्यर्थी 1.7.2025 को 18 साल पूर्ण कर चुका हो और 22 से ज्यादा का नहीं हो। यानी अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 2003 से पहले और 1जुलाई 2007 के बाद का नहीं होना चाहिए

महिला अभ्यर्थी 1.7.2025 को 18 साल पूर्ण कर चुकी हो और 25 साल से ज्यादा की नहीं हो यानी महिला अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 2000 से पहले और 1 जुलाई 2007 के बाद नहीं हुआ हो। हालाँकि पिछड़ा वर्ग, एससी और एसटी उम्मीदवारों की अधिकतम उम्रसीमा में छूट दी गई है।

चयन की प्रक्रिया

उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा, पीईटी व पीएसटी के आधार पर किया जाएगा। लिखित परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवार शारीरिक पात्रता परीक्षा या शारीरिक दक्षता परीक्षा के लिए पात्र माने जाएँगे। इसके बाद डॉक्यूमेंट्स वेरिफिकेशन के लिए बुलाया जाएगा।

पर्यटन से तीर्थाटन की ओर: नए साल से पहले काशी-मथुरा-वृंदावन और अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब, आस्था से आकार ले रही ‘हिंदू इकोनॉमी’

नए साल 2026 के मौके पर अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे आस्था के नगरों में श्रद्धा का एक अलग ही भाव दिखाई दे रहा है। देश के कोने-कोने से लाखों लोग इन पवित्र नगरियों में पहुँच रहे हैं ताकि नए साल की शुरुआत भगवान के दर्शन और मन की शांति के साथ कर सकें। गलियों, घाटों और मंदिरों में उमड़ा जनसैलाब ऐसा है मानो कोई ‘मिनी महाकुंभ’ लगा हो।

यह केवल धार्मिक यात्रा भर नहीं है बल्कि भारत की सोच में आ रहे बदलाव की तस्वीर भी है। इस व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को ‘हिंदू इकोनॉमी’ के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ साल पहले तक नए साल का मतलब सिर्फ पार्टी, क्लब और शोर-शराबा हुआ करता था लेकिन आज लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। परंपरा और विकास के इस संगम ने तीर्थाटन को सिर्फ आस्था नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और आत्मगौरव का प्रतीक बना दिया है।

अयोध्या, काशी और मथुरा में आस्था का समागम

देश के हर कोने में और हर बड़े तीर्थस्थल पर लाखों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। उत्तर प्रदेश के इन तीन प्रमुख धार्मिक शहरों में इस समय श्रद्धालुओं की इतनी भारी भीड़ है कि प्रशासन के लिए भी इसे संभालना एक बड़ी चुनौती बन गया है। राम-कृष्ण-शिव के जयकारे लगाते लोग किसी भी तरह बस अपने ईष्ट के दर्शन पाने के लिए बेताब, बैचेन हैं।

वाराणसी (काशी)- वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है। बीते तीन दिनों में 11 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर चुके हैं। अनुमान है कि साल के आखिरी दिन यहाँ करीब 6 लाख लोग पहुँचेंगे और नए साल के पहले दिन 9-10 लाख तक भक्तों की संख्या पहुँच सकती है। भीड़ का आलम यह है कि मंदिर के बाहर भक्तों की कतारें 3 किलोमीटर तक लंबी हो गई हैं।

भीड़ को लगातार आगे बढ़ाने के लिए भक्तों को शिवलिंग के पास रुकने का मौका नहीं मिल रहा है और औसतन 10 सेकंड से भी कम समय में दर्शन करने पड़ रहे हैं। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने 3 जनवरी तक ‘स्पर्श दर्शन’ (शिवलिंग को छूकर पूजा करना) पर पूरी तरह रोक लगा दी है, ताकि लाइनें तेजी से चलती रहें।

अयोध्या धाम- अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए वर्ष के अंतिम सप्ताह में ही भारी भीड़ उमड़ रही है। प्रतिदिन 1.50 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर रहे हैं। साल के आखिरी दिन में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी सालगिरह मनाई गई। इस पावन अवसर पर यहाँ लगभग 5 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना की गई थी।

इस बार भक्तों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण कर्नाटक से आई सोने की राम प्रतिमा है, जिसकी कीमत करीब 30 करोड़ रुपए बताई जा रही है और जिस पर बेशकीमती हीरे-जवाहरात जड़े हैं। शहर की सुरक्षा और व्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद वहाँ पहुँचकर सारी तैयारियों की निगरानी कर रहे हैं।

मथुरा-वृंदावन- मथुरा-वृंदावन में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। बांके बिहारी मंदिर के पास गलियों में तिल रखने की जगह नहीं है। भीड़ इतनी अनियंत्रित हो गई है कि मंदिर प्रबंधन ने भक्तों से लिखित अपील की है कि वे 5 जनवरी तक वृंदावन न आएँ।

श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचने के लिए 3 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ रहा है। गिरिराज, नंदगाँव और बरसाना में भी भारी भीड़ देखी जा रही है। शहर के चारों ओर पार्किंग स्थल चिन्हित किए गए हैं ताकि यातायात को सुचारू रखा जा सके।

जब मंदिर ने ताजमहल को पीछे छोड़ा

भारत में दशकों से पर्यटन का मतलब ‘ताजमहल’ हुआ करता था लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह बदल गई है। साल 2024-25 के सरकारी आँकड़ों पर नजर डालें तो एक ऐतिहासिक सच सामने आता है। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में साल भर में करीब 18 करोड़ 10 लाख लोग पहुँचे। वहीं दूसरी ओर, दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल को देखने वालों की संख्या 16 करोड़ 70 लाख रही। इसका मतलब यह है कि राम मंदिर ने ताजमहल को करीब 1 करोड़ 40 लाख के अंतर से पीछे छोड़ दिया है। भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी मंदिर ने दुनिया भर में मशहूर ताजमहल की लोकप्रियता और वहाँ पहुँचने वाले लोगों की संख्या (फुटफॉल) को मात दी है।

आस्था के नए केंद्र और टूटते रिकॉर्ड सिर्फ अयोध्या ही नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रमुख मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की संख्या ने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। साल 2024 के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर में 8.30 करोड़ से ज्यादा भक्तों ने माथा टेका। अगर हम सिर्फ पिछले साल यानी 1 जनवरी 2025 की बात करें, तो उस एक अकेले दिन में अयोध्या में 5 लाख, काशी में 7 लाख और उज्जैन के महाकाल मंदिर में 6 लाख लोगों ने दर्शन किए थे। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड जैसा है कि एक ही दिन में लाखों लोग भगवान का आशीर्वाद लेने पहुँचे। जिस तरह की भीड़ इस समय (दिसंबर 2025 के अंत में) देखी जा रही है, उससे साफ है कि आने वाले नए साल 2026 की शुरुआत में ये पिछले सारे रिकॉर्ड भी टूट जाएँगे।

ये आँकड़े साबित करते हैं कि भारत के लोगों की पसंद अब बदल रही है। लोग अब घूमने-फिरने के लिए केवल ऐतिहासिक स्मारकों या किलों को ही नहीं चुन रहे बल्कि अपनी आस्था और धर्म से जुड़े केंद्रों पर जाना उनकी पहली पसंद बन गया है। यही कारण है कि आज अयोध्या और काशी जैसे शहर पर्यटन के वैश्विक नक्शे पर सबसे ऊपर उभर कर आए हैं।

‘हिंदू इकोनॉमी’ का उदय: करोड़ों का कारोबार

तीर्थस्थलों पर उमड़ने वाली यह भीड़ अब केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसने देश की अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार दे दी है। इसे हम ‘आस्था की अर्थव्यवस्था’ कह सकते हैं, जहाँ लोगों की श्रद्धा से हजारों करोड़ों का कारोबार हो रहा है।

होटल और रहने का कारोबार– धार्मिक शहरों में इस समय ठहरने की जगह मिलना किसी चुनौती से कम नहीं है। अयोध्या, वाराणसी और मथुरा के सभी होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाएँ 100% फुल हो चुकी हैं। भारी माँग के कारण होटलों ने अपना किराया सामान्य दिनों की तुलना में 30% से 50% तक बढ़ा दिया है। इतना ही नहीं, जो लोग अपने घरों में ‘होम-स्टे’ (मेहमानों को ठहराने की सुविधा) चलाते हैं, उन्हें भी सामान्य से दोगुनी कीमत मिल रही है। लोग भगवान के दर्शन के लिए इतने उत्साहित हैं कि वे रहने के लिए मोटी रकम खर्च करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। पहले जो दुकानदार दिन का ₹1000 कमाते थे, अब वे ₹5000 से ₹8000 तक कमा रहे हैं।

फूल और प्रसाद का बाजार- भक्ति के इस माहौल ने स्थानीय किसानों और व्यापारियों की लॉटरी लगा दी है। अनुमान है कि केवल नए साल के इन दो-तीन दिनों के भीतर अयोध्या, काशी और मथुरा में करीब 20 लाख गुलाब और 2 हजार टन गेंदा फूल बिक जाएँगे। यह फूल और प्रसाद का व्यापार इतना बड़ा हो चुका है कि इससे करोड़ों रुपए का लेन-देन हो रहा है। इससे न केवल शहर के व्यापारियों को फायदा हो रहा है, बल्कि आसपास के गाँवों के उन किसानों की किस्मत भी बदल रही है जो फूलों की खेती करते हैं।

परिवहन और यात्रा, कमाई में चार गुना उछाल– लोग इन तीर्थ स्थलों पर पहुँचने के लिए हर संभव रास्ता अपना रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से आने वाली सभी ट्रेनें और फ्लाइट्स कई हफ्ते पहले ही पूरी तरह बुक हो चुकी हैं। स्थानीय स्तर पर भी परिवहन का काम बहुत तेजी से बढ़ा है। ई-रिक्शा, ऑटो और टैक्सी चलाने वालों की चाँदी हो गई है। यात्रियों की भारी भीड़ के कारण इन चालकों की रोजाना की कमाई में 4 गुना तक की बढ़ोतरी देखी गई है।

अयोध्या में लगभग ₹85,000 करोड़ की विकास परियोजनाओं ने रोजगार के लाखों नए द्वार खोले हैं। एविएशन, ट्रांसपोर्ट, और सेवा क्षेत्र में युवाओं को मनमाफिक अवसर मिल रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले युवाओं का औसत वेतन ₹40,000 प्रति माह तक पहुँच गया है, जो इस क्षेत्र में आर्थिक क्रांति का प्रमाण है।

मोदी-योगी के विजन से विरासत की पुनर्स्थापना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत में आस्था और विकास के बीच दशकों से खड़ी की गई झूठी बहस को खत्म कर दिया है। लंबे समय तक भारत पर शासन करने वाली विचारधारा द्वारा यह मान्यता थोपी गई कि धार्मिक चेतना आधुनिक राष्ट्र-निर्माण के खिलाफ है लेकिन मोदी-योगी मॉडल ने आस्था को भारत की सांस्कृतिक शक्ति और आर्थिक ताकत के रूप में परिभाषित किया है। यही वजह है कि आज तीर्थ केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि राष्ट्र की चेतना-प्रेरणा-अर्थ तंत्र को गति देने वाले केंद्र बन चुके हैं।

अयोध्या इस बदलाव का सबसे ठोस प्रमाण है। 500 वर्षों के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद रामलला का अपने भव्य मंदिर में विराजमान होना केवल धार्मिक घटना नहीं बल्कि सांस्कृतिक की फिर से स्थापना थी। इसके साथ ही अयोध्या का पूरा कायाकल्प जिसमें हवाई अड्डे से लेकर आधुनिक सड़कें, पर्यटन ढांचा और नागरिक सुविधाएँ हैं वो दिखाता है कि आस्था और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर ने इसी दर्शन को और मजबूती दी जहाँ श्रद्धा को सुव्यवस्था, सौंदर्य और सुगमता के साथ जोड़ा गया। काशी आज वैश्विक तीर्थाटन का बड़ा केंद्र बनकर उभरी है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा बल मिला है।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के तीर्थों पर सुरक्षा, सफाई और व्यवस्था में बड़ा सुधार हुआ है। प्रयागराज महाकुंभ, मथुरा-वृंदावन और चित्रकूट जैसे स्थानों पर भी यह साफ दिखाई देता है कि परंपरा और आधुनिक शासन-प्रशासन साथ-साथ चल सकते हैं। मोदी-योगी की जोड़ी ने मंदिरों और तीर्थों को पिछड़ेपन की सोच से बाहर निकालकर उन्हें विरासत और विकास का केंद्र बना दिया है।

यह बदलाव सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। आज त्योहारों, नए साल और खास मौकों पर बड़ी संख्या में लोग तीर्थों की ओर जा रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत गर्व और आत्मविश्वास के साथ अपने संस्कारों और जड़ों की ओर फिर से लौट रहा है। मोदी–योगी के नेतृत्व ने आस्था को खुलकर अपनाने का भरोसा दिया है। यही सच्चे अर्थों में विरासत की वापसी है और विकसित भारत की मजबूत नींव भी।

उच्च विकास दर, नियंत्रित महँगाई, घटती बेरोजगारी और संतुलित अर्थव्यवस्था: जानें- कैसे भारत ने 2025 में लिखी विकास की नई परिभाषा

साल 2025 भारत की आर्थिक यात्रा का एक स्वर्णिम अध्याय साबित हुआ। वैश्विक स्तर पर व्यापारिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक मंदी की आशंकाओं के बावजूद भारत ने अपनी मजबूत घरेलू माँग, दूरदर्शी नीतियों और साहसिक सुधारों के बल पर न केवल स्थिरता बनाए रखी, बल्कि नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं। बात चाहे सैन्य ताकत (ऑपरेशन सिंदूर) की हो या आर्थिक ताकत की… पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत अपनी ही रफ्तार में आगे बढ़ता रहा।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो पिछले छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है। यह पिछले वर्ष की इसी तिमाही के 5.6 प्रतिशत और पहली तिमाही के 7.8 प्रतिशत से काफी अधिक है।

इस मजबूत प्रदर्शन ने भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष पर बनाए रखा। भारत की जीडीपी अब 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुकी है, जिससे हम जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 2.5 से 3 वर्षों में भारत जर्मनी को पछाड़कर तीसरे स्थान पर पहुँच जाएगा और 2030 तक जीडीपी 7.3 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी।

इस विकास की मुख्य वजह मजबूत निजी खपत रही, जो घरेलू माँग का प्रमुख चालक है। साथ ही सरकारी पूंजीगत व्यय की प्राथमिकता, जीएसटी और आयकर सरलीकरण जैसे सुधारों ने उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा दिया।

प्रमुख क्षेत्रों में चौतरफा गति को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने जीडीपी विकास अनुमान को 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी इसी आशावाद को दोहराया है, जिसमें विश्व बैंक ने 2026 में 6.5 प्रतिशत विकास का अनुमान लगाया है। मूडीज को उम्मीद है कि भारत 2026 में 6.4 प्रतिशत और 2027 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली जी-20 अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

आईएमएफ ने 2025 के लिए अपने अनुमान बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत और 2026 के लिए 6.2 प्रतिशत कर दिए हैं। ओईसीडी ने 2025 में 6.7 प्रतिशत और 2026 में 6.2 प्रतिशत विकास का पूर्वानुमान लगाया है, तो एसएंडपी ने जारी वित्त वर्ष में 6.5 प्रतिशत और अगले वर्ष 6.7 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है।

एशियाई विकास बैंक ने अपने 2025 के पूर्वानुमान को बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है और फिच ने मजबूत उपभोक्ता माँग के कारण वित्त वर्ष 26 के अनुमान को बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। ये सभी आँकड़े जी-20 देशों में सबसे अधिक है।

विकास के इस सफर में तीन प्रमुख स्तंभ उभरकर सामने आए हैं, उच्च विकास, स्थिरता और आत्मविश्वास। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं के बीच भारत की घरेलू माँग ने अर्थव्यवस्था को संभाला। हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स जैसे क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई), क्रेडिट वृद्धि और शहरी खपत सभी सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। वाणिज्यिक क्षेत्र में मजबूत क्रेडिट प्रवाह और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट की मजबूती ने निवेश को प्रोत्साहित किया।

आम जनता को घटती महँगाई से बड़ी राहत

महँगाई के मोर्चे पर 2025 भारत के लिए राहत भरा वर्ष रहा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महँगाई जनवरी 2025 में 4.26 प्रतिशत से शुरू होकर नवंबर तक घटकर 0.71 प्रतिशत पर आ गई, जो कई वर्षों का निचला स्तर है। यह आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य (सहिष्णुता बैंड +/-2 प्रतिशत) से काफी नीचे है। मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट रहा, विशेषकर सब्जियाँ, दालें और अनाज में। इसकी वजह से खाद्य महंगाई नवंबर में -3.91 प्रतिशत तक नकारात्मक हो गई।

आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए महँगाई अनुमान को 2.6 प्रतिशत से घटाकर 2.0 प्रतिशत कर दिया। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) महँगाई भी नवंबर में -0.32 प्रतिशत पर रही। इस अनुकूल महँगाई परिदृश्य ने आरबीआई को नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत करने की गुंजाइश दी। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए एक दुर्लभ ‘गोल्डीलॉक्स पीरियड’ है, जहाँ विकास तेज है और महँगाई कम। कम महँगाई से घरेलू बचत बढ़ी, खपत मजबूत हुई और मौद्रिक नीति में लचीलापन आया।

बेरोजगारी में ऐतिहासिक गिरावट दिखी, रोजगार सृजन को नई गति मिली

बेरोजगारी और आर्थिक गतिविधि की गति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ती है, वस्तुओं और सेवाओं के अधिक उत्पादन से श्रम की माँग बढ़ती है, जिससे रोजगार के अधिक अवसर पैदा होते हैं और बेरोजगारी कम होती है। इस संदर्भ में भारत की घटती बेरोजगारी दर इसकी आर्थिक गति की मजबूती को दर्शाती है। विकास की निरंतरता को देखते हुए, भारत के बेहतर होते रोजगार परिणाम निरंतर विकास और रोजगार सृजन के बीच अच्छे तालमेल को दिखाते हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार, नवंबर 2025 में 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर घटकर 4.8 प्रतिशत हो गई, जो कई महीनों का निचला स्तर है। महिलाओं की बेरोजगारी में भारी कमी आई, ग्रामीण महिलाओं में 4.0 प्रतिशत से 3.4 प्रतिशत और शहरी में 9.7 प्रतिशत से 9.3 प्रतिशत रही, तो ग्रामीण बेरोजगारी 3.9 प्रतिशत और शहरी 6.5 प्रतिशत पर रही।

श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) सात महीनों के उच्चतम स्तर 55.8 प्रतिशत पर पहुँची, जबकि श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) 53.2 प्रतिशत हो गया। ये आँकड़े बताते हैं कि अधिक लोग कार्यबल में शामिल हो रहे हैं और उन्हें रोजगार मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि और निर्माण तथा शहरी में सेवा क्षेत्र ने रोजगार बढ़ाए। महिलाओं की भागीदारी बढ़ना विशेष रूप से उत्साहजनक है।

भारत की युवा जनसंख्या (10-24 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 26 प्रतिशत) एक बड़ा अवसर है। सुधारों से गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन हुआ, जो समावेशी विकास सुनिश्चित कर रहा है। विकास और रोजगार के बीच का चक्र मजबूत हुआ, तेज विकास से अधिक नौकरियां और अधिक नौकरियों से मजबूत खपत।

निर्यात में मजबूती, वैश्विक बाजारों में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी

भारत ने व्यापार के बाहरी क्षेत्र ने भी मजबूती दिखाई। नवंबर 2025 में मर्चेंडाइज निर्यात बढ़कर 38.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 19 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। प्रमुख वस्तुएँ जैसे इंजीनियरिंग गुड्स (23 प्रतिशत वृद्धि), इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पादों ने योगदान दिया। सेवा निर्यात भी मजबूत रहा, अप्रैल-नवंबर में 8.65 प्रतिशत बढ़कर 270 बिलियन डॉलर के करीब।

विदेशी मुद्रा भंडार 686 बिलियन डॉलर पर पहुँचा, जो 11 महीनों से अधिक के आयात को कवर करता है। चालू खाता घाटा जीडीपी के 1.3 प्रतिशत पर सीमित रहा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भारी वृद्धि हुई, जिसमें अप्रैल-सितंबर में शुद्ध एफडीआई 127 प्रतिशत बढ़ा। व्यापार समझौतों से न्यूजीलैंड, ओमान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और ईएफटीए देशों के साथ संबंध मजबूत हुए।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नेक्स्ट-जेनरेशन रिफॉर्म्स से बही सुधारों की बयार

ये उपलब्धियाँ बिना ठोस आधार के हासिल नहीं हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में 2025 को ‘सुधारों का वर्ष’ कहा, जहाँ भारत ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर सवार हुआ। सुधारों का इंजन भारत की जनसांख्यिकी, युवा ऊर्जा और लोगों का जज्बा है।

जीएसटी सुधारों में दो मुख्य स्लैब (5% और 18%) लागू किए गए। घरों, MSMEs, किसानों और ज्यादा लेबर वाले सेक्टर्स पर टैक्स का बोझ कम किया गया है। इसका मकसद विवादों को कम करना और बेहतर कंप्लायंस सुनिश्चित करना है। इस सुधार से कंज्यूमर सेंटिमेंट और डिमांड को बढ़ावा मिला है। सुधार लागू होने के बाद फेस्टिव सीजन में बिक्री बढ़ी है।

इस साल आयकर में अभूतपूर्व राहत मिली है। पहली बार सालाना 12 लाख रुपए तक कमाने वाले लोगों को कोई इनकम टैक्स नहीं देना पड़ा। साल 1961 के पुराने इनकम-टैक्स एक्ट को आधुनिक और सरल इनकम टैक्स एक्ट, 2025 से बदल दिया गया है। ये सभी सुधार मिलकर भारत को एक पारदर्शी, टेक्नोलॉजी-आधारित टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन की ओर ले जा रहे हैं।

इसके अलावा सरकार ने एमएसएमई के लिए ‘छोटी कंपनियों’ की परिभाषा बढ़ाकर टर्नओवर 100 करोड़ तक कर दिया है। इससे हजारों कंपनियों के लिए कंप्लायंस का बोझ और उससे जुड़ी लागत कम होगी। भारत सरकार ने भारतीय बीमा कंपनियों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी है। इससे बीमा कवरेज और नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ, लोगों को बेहतर बीमा विकल्प मिलेंगे।

भारत सरकार ने लेबर सुधारों में 29 पुराने कानूनों को चार नए कोड में समाहित किया। भारत ने एक ऐसा लेबर फ्रेमवर्क बनाया है जो कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता है और साथ ही बिजनेस इकोसिस्टम को भी बढ़ावा देता है। ये सुधार सही वेतन, समय पर वेतन भुगतान, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थलों पर केंद्रित हैं। ये वर्कफोर्स में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। संविदा श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को ESIC और EPFO के अंतर्गत लाया गया है, जिससे औपचारिक वर्कफोर्स का दायरा बढ़ा है।

इस साल सबसे महत्वपूर्ण कदम रहा न्यूक्लियर एनर्जी में SHANTI एक्ट से प्राइवेट भागीदारी को खोलने का। SHANTI एक्ट भारत की क्लीन-एनर्जी और टेक्नोलॉजी के सफर में एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम है। न्यूक्लियर साइंस और टेक्नोलॉजी के सुरक्षित, पक्के और जवाबदेह विस्तार के लिए एक मजबूत ढाँचा सुनिश्चित करता है। भारत को AI युग की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है, जैसे डेटा सेंटर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज को पावर देना। इन सबसे ज्यादा रोजगार और ग्रोथ होगी।

मोदी सरकार ने विकसित भारत- G RAM G एक्ट, 2025 रोजगार गारंटी फ्रेमवर्क रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। इससे गाँव के इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को मजबूत करने की दिशा में खर्च बढ़ेगा। इसका मकसद ग्रामीण काम को ज्यादा इनकम और बेहतर एसेट्स सुनिश्चित करने का जरिया बनाना है।

शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो इस साल मोदी सरकार ने शिक्षा में सिंगल रेगुलेटर का प्रस्ताव रखा है। इसके तरह UGC, AICTE, NCTE जैसी कई ओवरलैपिंग बॉडीज को ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ (Viksit Bharat Shiksha Adhishthan) से बदल दिया जाएगा। इस कदम से देश में इंस्टीट्यूशनल ऑटोनॉमी को मजबूत किया जाएगा, साथ ही इनोवेशन और रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

विकसित भारत की ओर बढ़ती राष्ट्र की यात्रा

साल 2025 ने साबित किया कि भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी अपनी राह खुद बनाने में सक्षम है। उच्च विकास, कम महँगाई, घटती बेरोजगारी और मजबूत निर्यात ने अर्थव्यवस्था को नई ताकत दी। सुधारों ने नींव मजबूत की। 2047 के विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह वर्ष मील का पत्थर है। आने वाले वर्षों में सुधारों की यह गति जारी रहेगी, क्योंकि भारत की उड़ान अब रुकने वाली नहीं।

काशी, मथुरा, मदुरै… साल 2025 में हिंदुओं की लड़ाई जारी, अदालतों में न्याय मिलने की जगह मिला सिर्फ स्टे ऑर्डर: जानें- किस तरह की कानूनी लड़ाई लड़ रहे सनातनी

2025 में धार्मिक झगड़े एक बार फिर भारत के न्याय सिस्टम में सबसे आगे रहे। मंदिर-मस्जिद झगड़ों से लेकर प्रशासन और राज्य के दखल के सवाल भी कोर्ट के चौखट तक गए। देश भर की अदालतों को बार-बार उन मामलों पर फैसला सुनाने के लिए कहा गया, जहाँ आस्था, कानून, इतिहास और पब्लिक ऑर्डर एक-दूसरे से जुड़े थे। हालाँकि इस साल इन मामलों में न्याय की सक्रियता के बावजूद बहुत कम फैसले सामने आए।

ज्यादातर हाई-प्रोफाइल झगड़ों पर अंतरिम रोक, यथास्थिति बनाए रखने के आदेश, कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटियों और प्रक्रिया में देरी की वजह से होल्डिंग पैटर्न में डाल दिया गया। अंतिम फैसला न देकर अदालतों ने अशांति को रोकने को प्राथमिकता दी। इसकी वजह से समाधान असल में टल गया।

साल 2025 न्यायिक बंद होने से नहीं बल्कि न्यायिक सावधानी से तय हुआ, जैसा कि वाराणसी में ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि विवाद, मदुरै के कार्तिगई दीपम विवाद और मध्य प्रदेश में भोजशाला विवाद से पता चलता है। ये मामले धार्मिक झगड़ों को कानूनी तौर पर आखिरी फैसला देने के बजाय अंतरिम कंट्रोल के जरिए मैनेज करने के एक जैसे पैटर्न को दिखाते हैं।

आखिर धार्मिक विवाद के मामले कैसे और क्यों अनसुलझे रह गए? 2025 के आखिर में हर विवाद की क्या स्थिति थी और यह लंबी कानूनी उलझन भारत में धार्मिक मुकदमों के भविष्य के लिए क्या संकेत देती है।

अंतरिम आदेशों का साल, फैसलों का नहीं

2025 में धार्मिक झगड़ों में एक बात आम थी कि आखिरी फैसले के बजाय अंतरिम तरीकों पर लगातार भरोसा किया गया। मालिकाना हक, पूजा के अधिकार या ऐतिहासिक दावों के सवालों को सुलझाने के बजाय, अदालतों ने बार-बार कुछ समय के लिए कानूनी तरीकों से कार्रवाई रोकने का विकल्प चुना।

कोर्ट ने कई मामलों में सर्वे, निरीक्षण या निर्माण से जुड़े कामों को रोकने के लिए कुछ समय के लिए रोक लगाई । यथास्थिति बनाए रखने का आदेश आम तरीका बन गया। कुछ मामलों- जैसे बांके बिहारी मंदिर विवाद में, अदालतों ने रोजमर्रा के कामों को मैनेज करने के लिए कमेटियाँ बनाईं, जिससे असल में जरूरी फैसले टाल दिए गए।

इस तरह के न्यायिक तरीके की वजह हिंसा और तनाव पैदा होने का खतरा था। कई झगड़ों में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने की बात सामने आई। इसको देखते हुए अदालतें ऐसे फैसले देने से सतर्क दिखीं, जो स्थिति को खराब कर सकते हैं। इसके अलावा ये झगड़े राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा संवेदनशील थे। मंदिर-मस्जिद विवाद हो या उसके प्रशासन से जुड़ा कोई मसला, इसके फैसले से राजनीतिक लामबंदी, धरना प्रदर्शन और फैसले पर सवाल उठने का खतरा बना रहता है।

अदालतों को पता है कि वे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माहौल में काम कर रहे थे। आखिरकार, जज संवैधानिक रूप से मुश्किल रास्ते पर चल रहे थे। पूजा की जगहें (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991 में धार्मिक आजादी, सेक्युलरिज़्म और ऐतिहासिक दावों से जुड़े सवाल संवैधानिक तौर पर मुश्किलें पेश करते हैं। अदालतें मिसाल कायम करने के बजाए, फैसला देने में सावधान दिखीं।

पूरे साल लगातार न्यायालय की सुनवाई के बावजूद, 2025 में कोई भी बड़ा धार्मिक विवाद पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ। हर केस अलग-अलग प्रक्रिया के स्टेज पर लटका हुआ है।

ज्ञानवापी–काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद, वाराणसी

2025 में ज्ञानवापी विवाद में कानूनी कार्यवाही जारी रही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों पर रोक लगाई, जबकि वाराणसी कोर्ट ने 1991 के मूल मुकदमे को ट्रांसफर करने की याचिका खारिज की और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) सर्वेक्षण पर सुनवाई जारी रही। इसमें व्यास जी के तहखाने की छत की मरम्मत और सुरक्षित रखने की माँग पर बहस हुई, साथ ही अवैध धन उगाही और धार्मिक स्थलों पर नमाजियों की संख्या जैसे विवाद भी सामने आए, लेकिन कोई बड़ा अंतिम फैसला नहीं आया, मामला कोर्ट में अटका रहा।

इससे पहले जनवरी 2024 में कोर्ट ने आदेश दिया कि ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में पूजा की इजाजत देने के लिए इंतजाम किए जाएँ। 1991 के असली मुकदमे की मेंटेनेबिलिटी को पहले 2022 में बरकरार रखा गया था।

यह मामला 1991 में देवता आदि विश्वेश्वर की ओर से दायर एक मुकदमे से शुरू हुआ था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर की जगह पर बनाई गई थी।

2021 में, पाँच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में एक अलग मुकदमा दायर करके मस्जिद कॉम्प्लेक्स के अंदर मौजूद मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत माँगी थी।

शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर, संभल

यह विवाद तब शुरू हुआ जब संभल के एक सिविल कोर्ट ने नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद की जगह के सर्वे की इजाज़त दी। हिंदुओं का दावा था कि मस्जिद कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर की जगह पर है। मस्जिद की मैनेजमेंट कमिटी सर्वे के ऑर्डर को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के पास एक कुएं से जुड़े म्युनिसिपल नोटिस पर रोक लगा दी और स्टेटस रिपोर्ट माँगी।

अगस्त 2025 में कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और हिंदू याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया। यथास्थिति के ऑर्डर को बाद में फिर बढ़ा दिया गया। साइट पर किसी भी सर्वे या बदलाव पर रोक लगा दी गई। यह पूरा मामला अदालती कार्यवाही और तनावपूर्ण माहौल के बीच फँसा रहा, जिसमें कई नई याचिकाएं दायर हुईं और कोर्ट में मामला लंबित है।

मदुरै कार्तिगई दीपम लैंप विवाद (तमिलनाडु)

यह विवाद इस बात पर है कि क्या हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जला सकते हैं, जहाँ भगवान मुरुगन मंदिर और दरगाह दोनों हैं। हिंदू भक्तों का कहना है कि पहाड़ी की चोटी पर दीया जलाना एक जरूरी और लंबे समय से चली आ रही धार्मिक प्रथा है, और राज्य और HR&CE डिपार्टमेंट ने कानून और व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे बार-बार रोका है। दिसंबर 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत माँगने वाली याचिका को मंजूरी दे दी।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर मैनेजमेंट को 3 दिसंबर को त्योहार के दिन पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम दीया जलाने का इंतजाम करने की इजाजत दी और निर्देश दिया। तमिलनाडु सरकार ने परंपरा और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए आदेश का विरोध किया।

त्योहार के दिन विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और झड़पें हुई। इसके बाद सेंट्रल सिक्योरिटी फोर्स को पूरे इलाके में तैनात कर दिया गया। हाई कोर्ट ने बाद में अपने निर्देशों को लागू करने में कथित नाकामी के लिए राज्य के अधिकारियों को नोटिस जारी किया। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और मामला अभी भी पेंडिंग है।

बांके बिहारी मंदिर मैनेजमेंट विवाद (वृंदावन)

यह विवाद ऐतिहासिक बांके बिहारी मंदिर के कंट्रोल और एडमिनिस्ट्रेशन को लेकर है, जिसे पारंपरिक रूप से सेवायत परिवार मैनेज करते आए हैं। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रोजमर्रा के कामकाज और श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए एक ताकतवर मंदिर मैनेजमेंट कमेटी बनाई थी।

यह कमेटी उत्तर प्रदेश के एक ऑर्डिनेंस की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने तक बनाई गई थी, जिसने मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन को एक कानूनी ट्रस्ट के तहत ला दिया था। दिसंबर 2025 में मंदिर की मैनेजमेंट कमेटी और एक सेवायत ने कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के दायरे और अधिकार पर सवाल उठाते हुए एक नई याचिका दायर की। फिलहाल यह मामला 2026 की शुरुआत में आगे की सुनवाई के लिए लिस्टेड है।

अजमेर शरीफ दरगाह गिराने का मामला

दिसंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रभावित पक्षों को सुनवाई का मौका दिए बिना अजमेर शरीफ दरगाह कॉम्प्लेक्स के अंदर के स्ट्रक्चर गिराने से केंद्र सरकार को रोक दिया था। यह अंतरिम आदेश दरगाह के एक खादिम की अर्जी पर दिया गया था, जिसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ माइनॉरिटी अफेयर्स के कथित अतिक्रमण हटाने के नोटिस को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन करने पर ज़ोर दिया और केंद्र को दरगाह ख्वाजा साहिब एक्ट, 1955 के तहत दरगाह कमेटी बनाने में तेजी लाने का भी निर्देश दिया। मामला अभी भी पेंडिंग है।

2026 का स्वागत ऐसे ही बड़े धार्मिक झगड़ों के अनसुलझे सवालों से होगा। 2025 में ज्यादातर मामलों में अंतिम फैसले को टाला गया और अंतरिम फैसले से काम चलाया गया। हालाँकि इस सावधानी भरे तरीके से शायद तुरंत अशांति को रोका जा सका हो, लेकिन इसने यह भी पक्का किया कि इतिहास, अधिकारों और संवैधानिक व्याख्या के बुनियादी सवालों को टाल दिया गया। जैसे-जैसे ये झगड़े 2026 में आगे बढ़ेंगे, न्यायपालिका के सामने चुनौती यह होगी कि क्या लगातार रोक संवैधानिक स्पष्टता की जगह ले सकती है या निर्णायक समाधान आखिरकार जरूरी हो जाएगा।

(यह मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

$1=14 लाख रियाल, 42% महँगाई दर और सड़कों पर हजारों Gen Z: मुल्लाओं को हटाने तक पहुँचा ईरान का ‘आर्थिक आंदोलन’, जानें- क्यों प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़ा है अमेरिका

ईरान में आर्थिक संकट के चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी है। तेहरान से शुरू हुए ये प्रदर्शन कई शहरों में फैल चुके हैं। लोगों के बीच ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ का डॉलर के मुकाबले में रिकॉर्ड गिरावट और 42 प्रतिशत पहुँची महँगाई को लेकर गुस्सा है। लोग सड़कों पर उतरकर ईरान के इस्लामी रिजीम का विरोध कर रहे हैं, इनमें बड़ी संख्या में Gen Z छात्र-छात्राएँ भी शामिल हैं।

सबसे पहले 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ग्रैंड बाजार के दुकानदारों और व्यापारियों ने विरोध शुरू किया। विरोध में दुकानें बंद रखी गईं। इसके बाद विरोध तेहरान, इस्फहान, शिराज, मशहद, हमेदान और तमाम शहरों तक फैल गया। तीन दिन से जारी प्रदर्शन के कुछ वीडियो सामने आ रहे हैं, जिसमें लोग सड़कों पर उतरकर नारे लगा रहे हैं- ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’, ‘आजादी-ए-आजादी’ और ‘तानाशाही का अंत हो।’

प्रदर्शनों पर ईरान की सरकार ने कहा कि वह बातचीत के लिए तैयार है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने गृह मंत्री को प्रतिनिधियों से बातचीत करने का निर्देश दिया। साथ ही राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर मोहम्मदरेजा फरजिन का इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया और उनकी जगह पूर्व अर्थव्यवस्था एवं वित्त मंत्री अब्दोलनासेर हेम्मती को नियुक्त किया गया है।

विरोध प्रदर्शन में Gen Z छात्रों की भागीदारी

इन प्रदर्शनों में जेन जी छात्र देशभर के 10 प्रमुख विश्वविद्यालयों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें तेहरान की 7 सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी शामिल हैं। इल्ना और सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, मध्य शहर इस्फहान के टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के साथ ही यज्द और जंजन जैसे शहरों के संस्थानों में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

तेहरान के अमीरकबीर यूनिवर्सिटी, ख्वाजे नसीर और बाकी कैंपसों में छात्रों ने हड़ताल, भूख हड़ताल और कैंटीन के घटिया भोजन को सड़क पर फेंककर विरोध जताया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस की आँसू गैस, फायरिंग और गिरफ्तारियों की कार्रवाई भी सामने आई हैं, फिर भी छात्र डटकर प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।

अमीरकबीर यूनिवर्सिटी के पास IRGC के बसिज बलों ने छात्रों पर हमला किया, जिसमें एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया और कई को गिरफ्तार किया गया। जेन जी की यह भागीदारी साल 2022 के महसा अमीनी प्रदर्शनों की याद दिलाती है और आंदोलन को नई ताकत दे रही है।

ईरान में आर्थिक उथल-पुथल

ईरान में ये प्रदर्शन देश में जारी आर्थिक संकट को लेकर हो रहे हैं। यह संकट ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ की भारी गिरावट से शुरू हुआ, जो आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों, खराब सरकारी नीतियों और वैश्विक दबाव से अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जिससे महँगाई आसमान छूने लगी और लोग सड़कों पर उतर आए।

यूँ तो ईरान की मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहले ही कमजोर थी, लेकिन दिसंबर 2025 में यह ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गई- एक अमेरिकी डॉलर के बदले 14 लाख रियाल। पहले जहाँ एक डॉलर से 50-60 हजार रियाल मिलते थे, अब लाखों रियाल चाहिए। इससे आयात होने वाले सामान जैसे तेल, दवा, अनाज महँगे हो गए। ईरान वैसे भी तेल बेचकर कमाई करता है, लेकिन प्रतिबंध से डॉलर नहीं मिल पाते इसीलिए रिजर्व खत्म हो गए।

देश में महँगाई दर 42 प्रतिशत तक बढ़ गई, यानी पिछले साल की तुलना में चीजें औसतन 42 प्रतिशत महँगी हो गईं। उदाहरण के लिए रोटी, दूध, सब्जी की कीमतें 72 प्रतिशत तक उछल गईं। एक आम परिवार जो पहले एक लाख में गुजारा कर लेता था, अब 2 से 3 लाख भी कम पड़ जाते हैं। इतना सब होने के बाद केंद्रीय बैंक प्रमुख ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे मुद्रा स्थिर नहीं कर पाए।

इस्लामी शासन से परेशान ईरान

ईरान में जारी प्रदर्शनों में शामिल लोग इस्लामिक रिजीम यानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली इस्लामी सरकार के खिलाफ हैं, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से चली आ रही है। शुरू में आर्थिक गुस्सा था, लेकिन अब लोग तानाशाही शासन के खिलाफ विद्रोह बना चुके हैं, जहाँ ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे गूँज रहे हैं।

प्रदर्शनकारी इन्हें ‘मुल्ला तानाशाह’ कहकर कोस रहे हैं, क्योंकि देश का पैसा सैन्य हथियारों, प्रॉक्सी युद्दों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) पर खर्च किया जा रहा है, बजाए जनता की भलाई पर। देश में खासकर महिलाओं के हिजाब कानून और सख्त इस्लामी नियमों से तंग आ चुके हैं।

तेहरान के विश्वविद्यालयों में छात्र ‘इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद’ चिल्ला रहे हैं और धार्मिक प्रतीकों को निशाना बना रहे हैं। व्यापारी भी कह रहे हैं कि रिजीम की नीतियों से अर्थव्यवस्था बर्बाद हुई, न कि अमेरिकी सैंक्शंस से। यह 1979 क्रांति के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह लगता है, जहाँ लोग धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की माँग कर रहे हैं।

ईरान में प्रदर्शन पर अमेरिका का बयान और भूमिका

ईरान में इस्लामी शासन के विरोध में जारी प्रदर्शनों पर अमेरिका ने खुलकर समर्थन जताया है। खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों को प्रोत्साहित किया और इस्लामी शासन की आलोचना की। ट्रंप ने ईरान की अर्थव्यवस्था को ‘टूट चुकी’ बताया और कहा कि सरकार हर विरोध को दबाने के लिए लोगों पर गोली चलाती है।

29 दिसंबर 2025 को मार-ए-लागो में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “ईरान में जब भी दंगे होते हैं या कोई समूह बनता है। वे लोगों पर गोली चला देते हैं। वे लोगों को मार देते हैं।” उन्होंने इस्लामी रिजीम को ‘क्रूर’ करार दिया और कहा कि देश में सालों से असंतोष है, लेकिन रिग चेंज की सीधी माँग नहीं की। ट्रंप ने मुद्रा ‘रियाल’ की गिरावट और महँगाई पर फोकस किया।

UN राजदूत माइक वॉल्टज ने एक्स पर लिखा, “ईरान के लोग आजादी चाहते हैं। हम तेहरान और पूरे देश में प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं।” वहीं अमेरिकी सरकार के फारसी अकाउंट ने कहा कि वाशिंगटन ईरानी लोगों की आवाज को सुनने का समर्थन करता है और रिजीम से भी मौलिक अधिकारों का सम्मान करने को कहा। साथ ही इस्लामी शासन की प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की भी निंदा की। ये बयान प्रदर्शन के तेज करने में सहायक साबित हुए।

बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर सैंक्शंस बढ़ाए हैं, जो आर्थिक संकट की जड़ हैं। लेकिन प्रदर्शनों पर अप्रत्यक्ष समर्थन देकर दबाव बनाया। ईरानी की इस्लामी सरकार ने इन बयानों को हस्तक्षेप बताया है, जबकि राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने बातचीत का संकेत दिया है।

रक्षा मंत्रालय की ₹4666 करोड़ की मेगा डिफेंस डील: 4 लाख स्वदेशी CQB कार्बाइन और ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो से लैस होगी सेना, जानें कैसे बढ़ेगी भारत की ताकत

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने साल 2025 के जाते-जाते देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को सरकार ने कुल 4,666 करोड़ रुपए के दो बड़े रक्षा समझौतों पर मुहर लगाई। इस डील के तहत सेना और नौसेना को 4.25 लाख से ज्यादा नई ‘कार्बाइन’ बंदूकें और समंदर की गहराई में तबाही मचाने वाले 48 ‘हैवी वेट टॉरपीडो’ मिलेंगे।

यह कदम न केवल हमारी सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ा देगा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को भी हकीकत में बदलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हमारे जवान पुराने हथियारों को छोड़, आधुनिक स्वदेशी तकनीक से लैस होकर सरहदों की रक्षा करेंगे।

क्या हैं ये हथियार और कैसे करते हैं काम?

जब हम सेना की ताकत की बात करते हैं, तो ये दोनों हथियार युद्ध के मैदान में पासा पलटने का दम रखते हैं। सबसे पहले बात करते हैं CQB कार्बाइन की, जो असल में एक छोटी और बहुत हल्की ऑटोमेटिक बंदूक है। इसे खास तौर पर उन मौकों के लिए बनाया गया है जब दुश्मन बहुत करीब हो, जैसे कि किसी घर के अंदर छिपे आतंकियों से मुकाबला करना हो या घने जंगलों में आमने-सामने की मुठभेड़ हो।

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बहुत छोटी होने के कारण तंग जगहों पर आसानी से घुमाई जा सकती है और पलक झपकते ही ढेर सारी गोलियाँ बरसा देती है, जिससे दुश्मन को संभलने या छिपने का मौका ही नहीं मिलता।

वहीं दूसरी ओर, हैवी वेट टॉरपीडो को आप आसान शब्दों में ‘पानी के नीचे चलने वाली मिसाइल’ कह सकते हैं। ये आकार में बहुत बड़े और बेहद शक्तिशाली होते हैं, जिन्हें हमारी पनडुब्बियों (Submarines) के जरिए समंदर की गहराई से छोड़ा जाता है।

इनका मुख्य काम पानी की सतह पर तैर रहे दुश्मन के बड़े युद्धपोतों या पानी के नीचे छिपी उनकी पनडुब्बियों को ढूँढ निकालना और उन्हें सीधा निशाना बनाकर तबाह करना है। इनके आने से समंदर के अंदर हमारी मारक क्षमता और भी ज्यादा घातक हो जाएगी।

स्वदेशी गन से लैस होंगे जवान, ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा

भारतीय थल सेना और नौसेना को और भी आधुनिक बनाने के लिए सरकार 2,770 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इस भारी-भरकम बजट से 4.25 लाख से भी ज्यादा नई कार्बाइन बंदूकें खरीदी जाएँगी।

सबसे अच्छी बात यह है कि यह पूरा सौदा विदेशी कंपनियों के बजाय भारत की अपनी कंपनियों, जैसे भारत फोर्ज और PLR सिस्टम्स (अडानी डिफेंस और इजरायल की कंपनी का साझा प्रयास) के साथ हुआ है। इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा और हमारी सेना को बेहतरीन हथियार मिलेंगे।

इन नई बंदूकों के आने से हमारे जवानों को बहुत बड़ा फायदा होगा। दरअसल, अभी तक हमारे सैनिक पुराने समय के भारी-भरकम हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे, जिन्हें ढोना और इस्तेमाल करना थोड़ा मुश्किल होता था। लेकिन ये नई कार्बाइन वजन में काफी हल्की हैं और चलाने में भी बहुत आसान हैं, जिससे युद्ध या मुठभेड़ के समय जवान और भी फुर्ती से दुश्मन का मुकाबला कर सकेंगे।

यह पूरी डील ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। इन बंदूकों का लगभग 60% हिस्सा भारत फोर्ज कंपनी खुद बनाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब हमें हथियारों के लिए दूसरे देशों का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा।

साथ ही, भारत में इनका निर्माण होने से हजारों लोगों के लिए नौकरी के नए रास्ते भी खुलेंगे। अगले 5 सालों के भीतर ये आधुनिक बंदूकें हमारे जांबाज सिपाहियों के हाथों में पहुँच जाएँगी, जिससे उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

दुश्मन के लिए काल बनेंगे ‘ब्लैक शार्क’

भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को और भी घातक बनाने के लिए सरकार ने इटली की कंपनी (WASS) के साथ 1,896 करोड़ रुपए का एक बड़ा समझौता किया है। इस डील के जरिए भारत को 48 ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो मिलेंगे, जो अपनी रफ्तार और अचूक निशाने के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। ये टॉरपीडो हमारी नौसेना की उन 6 आधुनिक ‘कलवरी क्लास’ (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों में लगाए जाएँगे, जिन्हें पूरी शान से मुंबई के मझगाँव डॉक में तैयार किया गया है।

इन टॉरपीडो की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें दुनिया के सबसे आधुनिक सेंसर लगे हुए हैं, जो दुश्मन की लोकेशन को तुरंत पकड़ लेते हैं। इनकी रफ्तार इतनी तेज है कि एक बार दागे जाने के बाद दुश्मन को बचने या भागने का मौका भी नहीं मिलता।

इन टॉरपीडो की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होगी और 2030 तक सभी 48 टॉरपीडो भारत पहुँच जाएँगे। इनके आने के बाद हिंद महासागर में भारत की पकड़ और भी मजबूत हो जाएगी और दुश्मन की कोई भी पनडुब्बी हमारी सीमा में घुसने की हिम्मत नहीं कर पाएगी।

क्यों खास है यह समझौता और भारत को क्या फायदे होंगे?

इस रक्षा सौदे से भारत को तीन बड़े और सीधे फायदे होने वाले हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि अब सेना से पुरानी तकनीक की छुट्टी हो जाएगी। हमारे जवान काफी समय से उन हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे जो अब पुराने पड़ चुके थे। इस डील के बाद हमारे सैनिकों के पास दुनिया के सबसे आधुनिक और खतरनाक हथियार होंगे, जिससे युद्ध के मैदान में उनकी ताकत और सुरक्षा दोनों बढ़ जाएगी।

दूसरा बड़ा फायदा यह है कि इससे देश की प्राइवेट कंपनियों को बहुत मजबूती मिलेगी। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में हथियार बनाने का काम भारत की निजी कंपनियों को सौंपा गया है। इसका असर सिर्फ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की छोटी-छोटी कंपनियों (MSMEs) को भी हथियारों के कल-पुर्जे बनाने का ऑर्डर मिलेगा। इससे न केवल स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा देश की आर्थिक मजबूती से जुड़ा है। रक्षा मंत्रालय ने इस साल (2025-26) में अब तक 1.82 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के हथियारों का सौदा किया है। इस भारी-भरकम रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों के पास जाने के बजाय भारत की अपनी कंपनियों की जेब में जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश का पैसा देश के अंदर ही रहेगा, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था और भी मजबूत होगी और हम रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ेंगे।