प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टूरिज्म क्रांति ने विदेशी सैलानियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा किया है, जिसने तमाम राज्यों को फायदा पहुँचाया है। इस कड़ी में बंगाल जो 2023-2024 में पर्यटन के मामले में तीसरे नंबर पर था वो 2025 में दूसरे नंबर पर आ गया है। भारत के लिए जाहिर है कि ये गर्व की बात है लेकिन इस ग्रोथ का सारा क्रेडिट अब अकेले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लेती दिख रही हैं।
उन्होंने इस संबंध में ट्वीट कर खुद अपनी पीठ थपथपाई है। जबकि सच्चाई ये है कि 2011 से सत्तासीन ममता बनर्जी का प्रयास कहीं नजर नहीं आता है। वहीं मोदी सरकार आने के बाद शुरू किए गए प्रयास जैसे- इनक्रेडिबल इंडिया, ई वीजा, मेडिकल वीजा के साथ-साथ क्रूज से लेकर सड़क तक किए गए विकास का फायदा बंगाल को मिला है।
बंगाल बना दूसरा पसंदीदा स्पॉर्ट
विदेशी पर्यटकों के लिए बंगाल पहले तीसरा और अब दूसरा सबसे पसंदीदा टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। पूर्व में सबसे आगे महाराष्ट्र और उसके बाद गुजरात था। मगर, अब लिस्ट में बंगाल ने गुजरात, राजस्थान और दिल्ली को पीछे छोड़ते हुए दूसरे स्थान पर आ गया है।
Proud to share that West Bengal has emerged as one of the most favoured international tourist destinations in the country, and has achieved another great milestone!!
In the recently released India Tourism Data Compendium 2025 by Ministry of Tourism, Government of India , West…
बंगाल को लेकर इस साल के शुरुआत में ही खबरें आ रही थी कि इस वर्ष बंगाल में आने वाले टूरिस्टों की पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती हैं। अब ये रिपोर्ट देखकर लगता है कि इस वर्ष हुआ भी यही। बता दें कि केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के ‘भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025’ ने राज्य को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या के मामले में देश भर में दूसरे स्थान पर रखा है। देख सकते हैं बंगाल विदेशी टूरिस्टों की लुभाने में नंबर 2 पर आया है। संख्या 3.12 मिलियन रही।
अब ये वृद्धि अचानक से बंगाल में कैसे देखने को मिली। इसके पीछे के कारण मोदी सरकार के अथक प्रयास हैं।
सांस्कृतिक समृद्धि और त्यौहारों ने विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया है। कोलकाता में होने वाले दुर्गापूजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। दुर्गा पूजा वह समय है जब बंगाल में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। लेकिन, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की मेहनत का नतीजा है कि दिसंबर 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता में होने वाले दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया। इसे ‘धर्म और कला के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ माना। जाहिर है इससे शिल्पकारों, कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिला, जो सालभर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मशगूल रहते हैं।
ई वीजा और मेडिकल वीजा
बंगाल के प्राइवेट अस्पतालों में बांग्लादेशी मेडिकल विज़िटर्स बड़ी संख्या में आते हैं। इसकी वजह बंगाल का सीमा से सटा होना और आसानी से मेडिकल वीजा मिलना है। ये लोग ममता के गिरते हुए हेल्थ सिस्टम को भी नजरअंदाज कर यहाँ पहुँचते हैं।
पीएम मोदी की ‘हील इन इंडिया’ पहल निजी क्षेत्र के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने का कार्यक्रम है। इसका फायदा बंगाल को भी हो रहा है। केन्द्र सरकार ने मेडिकल वीजा मिलना भी आसान कर दिया है। इसलिए बांग्लादेशी मेडिकल विजिटर्स रिकॉर्ड संख्या में बंगाल पहुँचे। ई वीजा की वजह से लोगों को वीजा मिलना भी सुलभ हो गया है। इसलिए पर्यटकों की संख्या में काफी बढोतरी हुई है।
इनक्रेडिबल इंडिया
भारत में रिकॉर्ड तोड़ विदेशी टूरिस्ट आने का कारण इनक्रेडिबल इंडिया है, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू किया था और PM नरेंद्र मोदी ने ई-वीज़ा, मेडिकल वीज़ा, ग्लोबल कैंपेन और आसान एंट्री से इसे सुपरचार्ज किया है। अतिथि देवो भव: अवधारणा के साथ शुरू इस योजना को 2017 में नई जान आ गई। ‘इनक्रेडिबल इंडिया 2.0’ को डिजिटल और सोशल मीडिया पर काफी प्रोत्साहित किया गया। सरकार ने तो ‘वन स्टेट, वन ग्लोबल डेस्टिनेशन’ भी शुरू करने जा रही है। इसका लक्ष्य 2047 तक हर राज्य के एक डेस्टिनेशन को दुनिया में मशहूर करना है। जाहिर से इसका फायदा हर राज्य को होगा।
अतुल्य भारत डिजिटल पोर्टल शुरू किया गया। इसे भारत में आने वाले पर्यटकों के लिए खास तौर पर बनाया गया। यह यात्रियों को पर्यटन स्थलों को ढूँढने और शोध से लेकर योजना बनाने, बुकिंग करने, यात्रा करने और वापस लौटने तक सभी जरूरी जानकारी और सेवाएँ देता है। ‘बुक योर ट्रैवल’ फीचर उड़ानों, होटलों, कैब की बुकिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिससे यात्रियों की पहुँच बेहतर होती है। जाहिर से इसका फायदा भी बंगाल को मिला।
अतुल्य भारत होमस्टे योजना
पर्यटकों की सुविधा के लिए केन्द्र सरकार ने स्वैच्छिक होमस्टे योजना शुरू की, ताकि पर्यटकों को कहीं ठहरने में दिक्कत न हो और स्थानीय जनता को भी आमदनी हो। योजना के तहत 5 से 6 गाँव में 5 से 10 होम स्टे हो सकता है जिसके लिए 5 करोड़ रुपए तक की सहायता की जा रही है।
जनजातीय पर्यटन सर्किट का विकास
स्वदेश दर्शन योजना के तहत थीम आधारित सर्किट विकसित की जा रही है। रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट आदि। इस योजना के तहत जनजातीय होम स्टे परियोजना भी शुरू किया गया है। ताकि पर्यटकों के आने जाने वाली जगहों का विकास किया जा सके। इसके लिए केन्द्र सरकार धन मुहैया कराती है।
तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिए प्रशाद योजना
इसके तहत राज्य के अहम तीर्थस्थलों को संरक्षित करना और उन तक पहुँचने के लिए सुविधाएँ बढ़ाया गया है। जैसे त्रिपुरा संदुरी मंदिर, चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, पटना साहिब की विकास योजनाएँ।
घरेलू पर्यटकों को अपने देश के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए सरकार ने प्रोत्साहित किया। इसके लिए ‘देखो अपना देश’ पहल की गई
विशिष्ट पर्यटन उपक्षेत्रों को विकसित किया गया है जैसे उत्सव पर्यटन, साहसिक पर्यटन, विवाह पर्यटन और क्रूज पर्यटन। इसमें भारत के त्यौहारों, आयोजनों से लेकर पर्वतारोहण को बढ़ावा देने, ‘इंडिया सेज आई डू’ के तहत मैरिज डेस्टिनेशन सेंटर को बढ़ावा देना शामिल है।
क्रूज पर्यटन का विकास
क्रूज पर्यटन का फायदा भी कोलकाता को मिला है। बंगाल में कई तरह की क्रूज सेवाएं शुरू हो गई हैं, जिनमें ‘बंगाल गंगा क्रूज’ अहम है। इसके अतिरिक्त, भारत और आसियान देशों के बीच बंगाल की खाड़ी में एक नए क्रूज पर्यटन कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है। कोलकाता से शुरू होने वाली एक लग्जरी क्रूज सेवा भी है, जो हुगली नदी के किनारे बंगाल की संस्कृति और वास्तुकला को दर्शाती है।
बीजेपी ने ममता बनर्जी के पर्यटकों की संख्या में इजाफे को लेकर सवाल किया है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर सीएम ममता बनर्जी से पूछा है कि आखिर किस काम का वे क्रेडिट ले रही हैं, जबकि पर्यटन को मोदी सरकार की प्राथमिकता में एक है।
Mamata Banerjee’s shameless “proud milestone” for Bengal tourism?
A blatant CREDIT THEFT from the tourism revolution unleashed under Prime Minister Narendra Modi, while the only “international visitors” she seems most invested in facilitating are those who conveniently bolster… https://t.co/oeR8OeZQ7h
जाहिर है विधानसभा चुनाव को देखते हुए ममता सरकार हर क्रेडिट लेना चाहेगी। पर्यटन से न सिर्फ राज्य की आय बढ़ती है बल्कि आम नागरिक को काफी फायदा होता है। करीब 15 सालों से ममता बनर्जी ने पर्यटन के विकास के लिए कुछ खास नहीं किया। सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध बंगाल को इन सालों में काफी फायदा पहुँचाया जा सकता था।
दिल्ली में इंडिया गेट के पास C-हेक्सागन में 23 नवंबर 2025 को तथाकथित ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट की सच्चाई तब सामने आ गई जब नक्सलवाद का महिमामंडन करते हुए नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। इसका आयोजन लेफ्ट-विंग स्टूडेंट संगठन भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और द हिमखंड ने किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिसवालों पर पेपर स्प्रे से हमला भी किया।
हिंसा को देखते हुए 22 लोगों पर केस दर्ज किया गया। पुलिस ने उनमें से 16 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें से 15 को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है जबकि एक नाबालिग को जुवेनाइल सेफ हाउस भेज दिया गया है। जैसे-जैसे इन लोगों और ग्रुप्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हुई, उनका कच्चा चिट्ठा सामने आ गया।
अधिकारियों ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 197 भी लागू की है। ये धारा तब लागू की जाती है, जब देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचने का खतरा हो।
bsCEM उन 40+ संगठनों में से एक है, जिन्होंने ‘कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन’ या CASR नाम का एक ग्रुप बनाया है। इंस्टाग्राम पर ये लोग ‘किस किस को कैद करोगे’ नाम का एक पेज चलाते हैं। संगठन तथाकथित ‘राजनीतिक कैदियों’ की रिहाई के लिए कैंपेन करते हैं।
यह ग्रुप 2018 से एक्टिव हुआ है। सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी 2022 से देखी जा सकती है, जब उन्होंने अब गुजर चुके नक्सली प्रोफेसर गोकरकोंडा नागा साईबाबा (GN साईबाबा) की रिहाई के लिए एक कैंपेन शुरू किया था। वे नक्सल ऑर्गनाइज़ेशन से जुड़े होने की वजह से जेल में थे। GN साईबाबा की जेल में मौत हो गई थी।
(स्रोत-इंस्टाग्राम)
इससे पहले, इसका हिंदी शीर्षक ‘किस किस को कैद करोगे’ वाला एक गाना था, जो 2018 में रिलीज हुआ था।
CASR के बैनर तले जो संगठन एक्टिव हैं, इनका इतिहास विवादास्पद रहा है। इनमें से कई संगठनों ने मार्च 2023 में ‘लेट कश्मीर स्पीक’ प्रोपेगैंडा इवेंट का समर्थन किया था। हंगामे के बाद दिल्ली पुलिस ने इवेंट की परमिशन रद्द कर दी, जिसके बाद इवेंट कैंसिल कर दिया गया।
ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO)
ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्टूडेंट विंग है, जो 2009 में बनी थी। AIRSO खुद को एक स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका अपना लिटरेचर इसकी आइडियोलॉजी को साफ करता है। यह संगठन 1960 और 70 के दशक के हिंसक विद्रोहों का समर्थन करता है। यह नक्सलवाद को एक ‘महान संघर्ष’ के तौर पर देखता है और उस दौर के खून-खराबे को भारत के युवाओं को ‘जागृति’ करने के लिए जरूरी बताता है।
(स्रोत- फेसबुक)
इसका मकसद देशभर में एक ‘ताकतवर और व्यापक’ स्टूडेंट्स फ्रंट बनाना है, जो नक्सली हिंसा को हवा दे सके। AIRSO कोई स्टूडेंट्स बॉडी नहीं है, यह एक सोच को बढ़ावा देने वाला प्लेटफॉर्म है, जो स्टूडेंट एक्टिविज्म की आड़ में नक्सलवाद को बढ़ावा देता है।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA)
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) एक रेडिकल स्टूडेंट्स मूवमेंट है। यह 1990 में बना था और यह ‘क्रांतिकारी बदलाव’ और ‘एक नई दुनिया’ के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करता है। हालाँकि यूनिवर्सिटी कैंपस में, खासकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में इसकी सोच जगजाहिर है। जहाँ हर साल गर्व से लाल झंडा लहराया जाता है। यह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की स्टूडेंट विंग है। उन्होंने भारत के मोस्ट वांटेड नक्सली माडवी हिड़मा की हत्या की निंदा की थी।
AISA का लिटरेचर नियो-लिबरल हमलों, इंपीरियलिस्ट हमलों से भरा हुआ है। यह टकराव वाली ‘स्ट्रीट पॉलिटिक्स’ का जश्न मनाता है और अपने एक्टिविज्म को फीस बढ़ाने से लेकर अमेरिकन इंपीरियलिज़्म तक हर चीज के खिलाफ लड़ाई के तौर पर दिखाता है।
यह स्टूडेंट्स का संगठन कम और कैंपस में चलने वाली रेडिकल मशीनरी ज्यादा है, जो लगातार शिकायतों और विरोध पर चलती है। स्टूडेंट अधिकारों की आड़ में शिक्षण संस्थान में अस्थिरता का माहौल पैदा करती है।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF)
1936 में बनी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई की स्टूडेंट विंग है। यह अक्सर खुद को भारत की आजादी के लिए काम करने वाला पहला स्टूडेंट फेडरेशन बताती है। इसे कैंपस में CPI के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए जिंदा रखा गया है।
(स्रोत फेसबुक)
AISF की खुद की तारीफ करने वाली कहानी में जवाहरलाल नेहरू, APJ अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नामों का ज्यादा जिक्र किया जाता है। यह संगठन अभी भी आज़ादी से पहले वाले दौर से निकल नहीं पाया है। दरअसल AISF बहुत पहले ही स्टूडेंट-सेंट्रिक मुद्दों से भटक गया है और अब CPI की पुरानी पॉलिटिक्स का एक थका हुआ, सिद्धांतवादी हिस्सा बनकर काम करता है। संगठन आज के स्टूडेंट्स की असली चिंताओं को दूर करने के बजाय पुरानी यादों से ही चिपका रहता है।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR)
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) खुद को एक नॉन-प्रॉफिटेबल संगठन के तौर पर दिखाता है जो ‘कानून और न्याय के बीच की खाई को पाटने’ का दावा करता है। लेकिन इसका ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयाँ करता है। 2006 में बना और सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड यह संगठन वर्कशॉप और सेमिनार के जरिए मुफ्त कानूनी मदद, फाइनेंशियल मदद और कानूनी साक्षरता प्रोग्राम चलाने का दावा करता है।
लेकिन APCR का नाम बार-बार विवादित मामलों में सामने आया है। संभल हिंसा और हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों जैसी हिंसक घटनाओं में आरोपी लोगों को कानूनी मदद दी है। इसकी तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट’ न्यूट्रल डॉक्यूमेंटेशन से ज़्यादा एकतरफा प्रोपेगैंडा लगती हैं, जो कुछ ग्रुप्स को बचाने और दूसरों को बदनाम करने के लिए बनाई गई हैं।
APCR में सीनियर वकील और एक्टिविस्ट शामिल हैं, फिर भी यह संगठन सिविल राइट्स बॉडी के तौर पर कम और एक ‘एडवोकेसी फ्रंट’ के तौर पर ज्यादा काम करता है। सांप्रदायिक मामलों के आरोपितों को बचाने के लिए सामने आता रहा है।
APCR के हर्ष मंदर और सबा नकवी जैसे लोगों के साथ भी मज़बूत रिश्ते हैं। हर्ष मंदर अपनी भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। इस साल मई में, उन्होंने ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की तरफ से सरकार से बातचीत करने की कोशिश की। CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उन्हें सिटीजन (अमेंडमेंट) एक्ट के बारे में झूठ और फर्जी जानकारी का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार के खिलाफ मुस्लिमों को भड़काते देखा गया था। 2023 में, मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने उनके NGO के खिलाफ जाँच की सिफारिश की थी और 2024 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने FCRA उल्लंघन मामले में उनसे जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की थी।
सबा नकवी अपनी विवादित टिप्पणियों और लगातार हिंदू विरोधी रवैये के लिए जानी जाती हैं। जून 2022 में, उन्होंने ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग का अपमान किया था। इस साल मई में, जब भारत ने पहलगाम में हुए जानलेवा आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान पर जवाबी हमला किया, तो नकवी भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की अपील करते नजर आए।
इमरान भी APCR से जुड़े हैं। मसूद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘बोटी बोटी काटने’ की धमकी दी थी। उनकी जहरीली टिप्पणियों ने उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों का तारा बना दिया।
भीम आर्मी
सतीश कुमार, विनय रतन सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा 2015 में शुरू की गई भीम आर्मी खुद को दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले एक अंबेडकरवादी संगठन के रूप में पेश करती है। दरअसल यह एक बहुत ज्यादा टकराव वाला संगठन बन गया है, जो सड़कों पर भीड़ जुटाने, आक्रामक तेवर दिखाने और पहचान की राजनीति को बांटने पर फलता-फूलता है।
हालाँकि यह उत्तर प्रदेश में सैकड़ों मुफ्त स्कूल चलाने का दावा करता है, लेकिन ये संगठन लोगों को उकसाना, रैलियाँ करना और दलित-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिशों में लगा रहता है।
इसका मिशन ‘टकराव वाली सीधी कार्रवाई’ है। चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व वाला यह संगठन अक्सर खुद को ‘बहुजन पहचान’ से जोड़ता है। संगठन खुल कर BJP को अपना मुख्य राजनीतिक दुश्मन कहता है। पिछले कुछ सालों में भीम आर्मी का नाम कई हिंसक घटनाओं में सामने आया। 2017 के सहारनपुर झड़पों से लेकर CAA के खिलाफ प्रदर्शनों में इसकी आक्रामक भूमिका रही।
बार-बार संवैधानिक वफादारी का दावा करने के बावजूद, इस ग्रुप ने लगातार कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट के बजाय उग्र आंदोलनों का सहारा लिया। असल में यह राजनीतिक फायदे के लिए जातिगत दरारों का फायदा उठाने की कोशिश करता है।
सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर रोहिणी घावरी नाम की एक महिला ने कई लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद करने का आरोप लगाया है। इस साल जून में, आजाद के संगठन के लोगों ने प्रयागराज में हंगामा किया। ये लोग निजी क्षेत्रों में आरक्षण की माँग कर रहे हैं।
फरवरी 2024 में, उन पर प्रशासनिक अधिकारियों को धमकी देने का आरोप लगा। उल्टे उन्होंने अधिकारियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस किया, जबकि यह एक्ट हाशिए पर पड़े समुदायों को ज़ुल्म से बचाने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, ना कि राजनीतिक फायदे के लिए। हाल ही में लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक महिला को फर्जी SC/ST केस करने पर 3.5 साल जेल की सजा सुनाई थी।
भीम आर्मी स्टूडेंट फ़ेडरेशन (BASF) BASF भीम आर्मी की स्टूडेंट विंग है।
भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM)
भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) खुद को स्टूडेंट्स ‘डेमोक्रेटिक’ ग्रुप के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका आइडियोलॉजिकल झुकाव कुछ और बयाँ कर रहा है। 2018 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में bsCEM बना। ये खुद को भगत सिंह और चारु मजूमदार के क्रांतिकारी सिद्धांतों को मानने वाला बताता है। संगठन का मानना है कि स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ का हिस्सा बनना चाहिए और ‘पुराने को तोड़कर एक नया समाज बनाना चाहिए।’
यह स्टूडेंट एक्टिविज़्म नहीं है, यह DU कैंपस के लिए रीपैकेज किया गया पुराने जमाने का मार्क्सवादी आंदोलन है।
इसके बैनर और पर्चों में बार-बार माओ का जिक्र आता है। एजुकेशन सिस्टम को ‘सड़ा हुआ’ कह कर स्टूडेंट्स को ‘दबे-कुचले लोगों’ के साथ जुड़ने का आह्वान करते हैं। ये ‘हिन्दू आइडियोलॉजी’ के सख्त खिलाफ हैं। यह संगठन CAA-NRC, किसान आंदोलन, कैंपस में उत्पीड़न के मामलों पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने का दावा करता है, और यहाँ तक कि एक मैगज़ीन भी निकालता है जो खुद को ‘क्रांतिकारी नजरिया’ बताता है।
bsCEM एक स्टूडेंट सपोर्ट बॉडी की तरह कम और दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर काम करने वाली एक रेडिकल मोबिलाइज़ेशन यूनिट की तरह ज्यादा काम करता है। यह आंदोलन, विचारधारा को बढ़ावा देने और व्यवस्था के खिलाफ बयानबाजी पर फलता-फूलता है।
कलेक्टिव
कलेक्टिव खुद को एक स्टूडेंट-यूथ मूवमेंट बताता है जो ‘इंडिया के लिए एक सोशलिस्ट फ्यूचर बना रहा है’, लेकिन इसका प्रोग्राम स्टूडेंट-सेंट्रिक होने के बजाय एक अनफिल्टर्ड आइडियोलॉजिकल मैनिफेस्टो जैसा लगता है।
मार्च 2021 में अपने पहले दिल्ली स्टेट कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी सोच सामने आ गई। इसमें पूँजीवाद के खत्मे, सर्वहारा क्रांति की बात की गई। इसमें कहा गया कि स्टूडेंट्स और ‘मेहनतकश लोगों’ की लीडरशिप में एक क्रांतिकारी बगावत ही देश को बचा सकती है।
कलेक्टिव के मुताबिक, आज इंडिया ‘ दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों के दबदबे’ में है, जिन्हें नियो-लिबरल कैपिटलिज्म, ग्लोबल फाइनेंस, और कथित तौर पर एंटी-साइंटिफिक, एंटी-सेक्युलर ट्रेंड्स से ताकत मिली है। यह ऑर्गनाइजेशन RSS और BJP को मेन विलेन बताता है। शासन पर ‘असहमति की हर आवाज को क्रिमिनलाइज करने’ का आरोप लगाता है। NEP से लेकर इकोनॉमिक रिफॉर्म्स तक हर पॉलिसी को इंपीरियलिस्ट इंटरेस्ट्स से सपोर्टेड एक कॉर्पोरेट कॉन्सपिरेसी के तौर पर दिखाया जाता है।
यह ग्रुप स्टूडेंट्स को सीखने वालों के तौर पर नहीं, बल्कि दुनिया भर में चल रहे एंटी-कैपिटलिस्ट संघर्ष में सबसे आगे रहने वाले लोगों के तौर पर दिखाता है। यह नक्सलवाद का महिमामंडन करता है और भगत सिंह से लेकर लैटिन अमेरिकी आंदोलनकारियों तक के क्रांतिकारियों को याद करता है। इसकी नजर में, आधुनिक शिक्षा ‘पूंजीवादी सोच का तंत्र’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ की जानकारी दी जानी चाहिए।
हाल ही में कश्मीर टाइम्स के ऑफिस पर रेड पड़ने के बाद कलेक्टिव उसके सपोर्ट में आया था। पुलिस ने ऑफिस से गोला-बारूद बरामद किया था।
22 जनवरी 2024 को रामलला प्राण प्रतिष्ठा के वक्त राम मंदिर निर्माण को लेकर कलेक्टिव ने एक्स पर लिखा, ” भारत में बीजेपी-आरएसएस ने पर्यटन बढ़ाया”
COLLECTIVE कोई छात्र संगठन नहीं है। बल्कि ये मार्क्सवादी सोच के लोगों का प्लेटफॉर्म है। क्रांतिकारी बदलाव के लिए जोर दे रहा है। इसका लिटरेचर सरकार के खिलाफ बयानबाजी और विचारधारा की चिंता से भरा है। स्टूडेंट एंगेजमेंट के नाम पर, यह कैपिटलिज़्म, पेट्रियार्की, जाति के ढाँचे, चुनावी पॉलिटिक्स और यहाँ तक कि इंडियन स्टेट के मौजूदा आइडिया को भी खत्म करने की माँग करता है। फिलहाल यह कैंपस में काम करने वाले सबसे चरमपंथी ग्रुप्स में से एक बन गया है।
कमेटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP)
कमेटी फॉर द रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP) का गठन 2003 में हुआ था। रोना विल्सन, अमित भट्टाचार्य और SAR गिलानी ने इसे बनाया था। मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने प्रतिबंधित CPI (माओवादी) का एक फ्रंट बताया है।
‘सिविल लिबर्टीज़’ के बैनर तले काम करते हुए, यह उन लोगों की बिना शर्त रिहाई के लिए कैंपेन चलाता है जिन्हें यह ‘राजनीतिक कैदी’ कहता है।
इसके संस्थापकों में विवादास्पद रोना विल्सन भी शामिल हैं। पुणे पुलिस को पहले उनके दिल्ली घर से एक सनसनीखेज लेटर मिला था, जिसमें कहा गया था कि माओवादी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करने के लिए ‘राजीव गाँधी-टाइप’ योजना बनाने की सोच रहे हैं।
इसके लिए M4 राइफल और दूसरी चीजें खरीदने के लिए 8 करोड़ रुपये माँगे गए थे। विल्सन को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद केस में गिरफ्तार किया गया था। जाँच कर्ताओं ने आरोप लगाया कि वह शहरी नेटवर्क और जंगल में रहने वाले माओवादी कैडर के बीच कोऑर्डिनेट करता था और दोषी नक्सल विचारक जीएन साईबाबा का करीबी सहयोगी था।
छह साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद, विल्सन को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 8 जनवरी 2025 को ट्रायल में लंबी देरी के कारण बेल दे दी थी और 24 जनवरी को सख्त शर्तों पर रिहा कर दिया गया था, जिसमें अपना पासपोर्ट सरेंडर करना और NIA के सामने रेगुलर पेश होना शामिल था। हालाँकि उन्होंने किसी तरह के माओवादी लिंक से इनकार किया है, लेकिन विल्सन से SAR गिलानी जैसे लोगों के साथ उनके कनेक्शन को लेकर बार-बार पूछताछ की गई है।
दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC)
दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC) खुद को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक’ मास ऑर्गनाइज़ेशन बताता है, लेकिन असल में यह कैंपस में लेफ्ट-विंग पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर काम करता है।
2015 में बना यह ग्रुप बहस और असहमति को आवाज देने दावा करता है। इसका एक्टिविज़्म लगातार जामिया में बड़े लेफ्ट-इस्लामिस्ट इकोसिस्टम के साथ जुड़ा रहा है। यह स्टूडेंट मुद्दों को एकेडमिक चिंताओं के बजाय आइडियोलॉजिकल लड़ाइयों को आगे बढ़ाने के लिए एक गेटवे के तौर पर इस्तेमाल करता है।
कैंपस में होने वाले टकराव के दौरान ग्रुप का बर्ताव खुद ही सब कुछ बताता है। जून 2022 में, DISSC ने ABVP द्वारा ऑर्गनाइज़ किए गए एक एनवायरनमेंटल अवेयरनेस इवेंट को फिजिकली ब्लॉक करने के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया (अब बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया की स्टूडेंट विंग) जैसे इस्लामिस्ट ग्रुप्स के साथ हाथ मिलाया।
प्रोटेस्ट करने वालों ने जामिया के गेट बंद कर दिए, ‘नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हू-अकबर’, ‘ABVP मुर्दाबाद’ और ‘ABVP कैंपस छोड़ो’ के नारे लगाए। पर्यावरणविद इम्तियाज अली और DUSU प्रेसिडेंट अक्षित दहिया को कैंपस में घुसने से रोका। ABVP को ‘इस्लामोफोबिक’ और ‘नफरत फैलाने वाला’ कहा गया।
दरअसल DISSC एक स्टूडेंट बॉडी कम और लेफ्ट-इस्लामिस्ट कोएलिशन का फ्रंटलाइन पार्टिसिपेंट ज़्यादा है जो नियमित जामिया के कैंपस में पुलिसिंग का काम करता है, विरोधी विचारों को दबाता है और गैर-पॉलिटिकल घटनाओं को भी अग्रेसिव तरीके से आइडियोलॉजिकल बैटलग्राउंड के तौर पर दिखाता है।
डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (DSU)
डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (DSU) जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक्टिव चरमपंथी स्टूडेंट ऑर्गनाइज़ेशन है। यह ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स फेडरेशन (AIRSF) का हिस्सा है और साफ़ तौर पर तथाकथित ‘न्यू डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन’ के लक्ष्यों के लिए काम करता है, जो किसी स्टूडेंट-सेंट्रिक मकसद के बजाय कट्टर लेफ्ट एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलॉजी पर आधारित है।
DSU को 2016 में JNU की बदनामी के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है। 9 फरवरी 2016 को DSU के सदस्यों और सहयोगियों ने संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु और कश्मीरी अलगाववादी मकबूल भट की फाँसी दिए जाने का विरोध करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। कैंपस में ‘अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ जैसे नारे लगाए गए थे। DSU के पूर्व लीडर उमर खालिद को कन्हैया कुमार और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ गिरफ्तार किया गया था।
उमर खालिद का रास्ता DSU के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम को और दिखाता है। बाद में उसे UAPA के तहत 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया। जाँचकर्ताओं ने हिंसा की साजिश में उसके शामिल होने का आरोप लगाया। खालिद के बैकग्राउंड पर भी सवाल उठे हैं, क्योंकि उसके पिता, सैयद कासिम रसूल इलियास, अब बैन हो चुके आतंकवादी संगठन SIMI के सदस्य थे।
DSU एक स्टूडेंट संगठन के तौर पर कम और एक कट्टर-लेफ्ट पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर ज़्यादा काम करता है, जिसने एक्टिविज़्म की आड़ में बार-बार कैंपस में कट्टरपंथी बातों को आगे बढ़ाया है।
डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF)
डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF) दिल्ली यूनिवर्सिटी में लेफ्ट-विंग टीचर्स का एक संगठन है जो खुद को ‘डेमोक्रेटिक’ एकेडमिक स्पेस का डिफेंडर मानता है। यह लंबे समय से कैंपस में होने वाले आंदोलनों में शामिल रहा है, जिसमें मोदी सरकार की शिक्षा पहल, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी और पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनेट को खत्म करने के कदम जैसे केंद्रीय सुधारों का विरोध किया गया है।
फ्रेटरनिटी मूवमेंट
फ्रेटरनिटी मूवमेंट, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया की स्टूडेंट विंग है और ‘डेमोक्रेसी, सोशल जस्टिस और फ्रेटरनिटी’ के नारे के साथ काम करती है। नरम सोच के बावजूद, ग्रुप ने बार-बार खुद को कट्टरपंथी सोच के साथ जोड़ा है। फैटरमिटी दिल्ली में तथाकथित एंटी-पॉल्यूशन प्रोटेस्ट में मौजूद संगठनों में से एक था।
दिसंबर 2019 में एंटी-CAA प्रदर्शन के दौरान, इसके मेंबर्स ने कालीकट इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी ब्लॉक कर दिया था। वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया को खुद सैयद कासिम रसूल इलियास जैसे लोग लीड करते हैं, जो SIMI के पूर्व मेंबर और उमर खालिद के पिता हैं, और लंबे समय से इस्लामिस्ट झुकाव वाले एक्टिविज़्म से जुड़े रहे हैं।
कई विवादित एक्टिविस्ट फ्रेटरनिटी मूवमेंट से जुड़े हैं, जिनमें आफरीन फातिमा और आयशा रैना शामिल हैं। फातिमा ने पार्लियामेंट अटैक के दोषी अफजल गुरु का पब्लिकली बचाव किया है, और बार-बार फैसले पर ‘दोबारा सोचने’ की अपील की। उन्होंने राम मंदिर के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठाए। मीडिया में मशहूर रैना ने शरजील इमाम का खुलकर सपोर्ट किया, उसके खिलाफ पुलिस एक्शन को ‘विच हंट’ कहा और भड़काऊ अलगाववादी भाषणों के बावजूद उसके खिलाफ केस हटाने की माँग की।
इसलिए, फ्रेटरनिटी मूवमेंट स्टूडेंट राइट्स प्लेटफॉर्म के तौर पर नहीं, बल्कि वेलफेयर पार्टी के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम के पॉलिटिकल एक्सटेंशन के तौर पर काम करता है, जो अक्सर कैंपस एक्टिविज्म की आड़ में एक्सट्रीमिस्ट, पोलराइजिंग और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नैरेटिव को सपोर्ट करता है।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL)
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL) खुद को न्याय, बराबरी और ह्यूमन राइट्स के लिए कमिटेड ‘आम लोगों के वकील’ के तौर पर दिखाता है। इसका कॉन्स्टिट्यूशन इंडियन स्टेट को इंपीरियलिस्ट और दमनकारी दिखाना है। एंटी-इंपीरियलिस्ट संघर्षों को सपोर्ट करने का वादा करता है। कागज़ पर यह वकीलों और लीगल एक्टिविस्ट्स की एक नेशनल बॉडी है। हालाँकि, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की फाइंडिंग्स बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती हैं।
एल्गार परिषद केस में NIA चार्जशीट के मुताबिक, IAPL बैन CPI (माओवादी) का एक फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन है। इन्वेस्टिगेटर्स ने गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए, जिसमें बताया गया कि ग्रुप की एक्टिविटीज़, फैक्ट-फाइंडिंग मिशन, लीगल सपोर्ट नेटवर्क और मीटिंग्स में अक्सर ऐसे लोग शामिल होते थे, जिन पर माओवादी होने का शक है।
एक गवाह ने 2018 में कश्मीर में फैक्ट-फाइंडिंग विज़िट के बारे में बताया कि यहाँ माओवादी सोच वाले वकील के अलावा भी लोग थे। जब यह बात आरोपित अरुण फरेरा को बताई गई, तो कथित तौर पर वह ‘बस मुस्कुराया’।
NIA ने इस बात पर जोर दिया कि IAPL का काम कानूनी एक्टिविज़्म की आड़ में लगातार माओवादी एजेंडा को आगे बढ़ाना था। माओवादी मामलों से जुड़े कई एक्टिविस्ट इसके जरिए काम करते थे। हालाँकि कुछ सदस्यों ने विचारधारा के मतभेदों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया, लेकिन एजेंसी का कहना है कि इस संगठन ने माओवादी नेटवर्क को सपोर्ट देने वाले एक कवर स्ट्रक्चर के तौर पर काम किया है।
मानवाधिकारों की सुरक्षा के अपने दावों के बावजूद, यह संगठन CPI (माओवादी) के बड़े शहरी सपोर्ट सिस्टम के हिस्से के तौर पर बार-बार जाँच में सामने आया है। ऑपरेटिव को बचाने, बातों पर असर डालने और चरमपंथी मकसदों को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी राय, वकालत और फैक्ट-फाइंडिंग मिशन का इस्तेमाल करता है। हालाँकि, संगठन ने दावा किया है कि उसका CPI (माओवादी) से कोई लेना-देना नहीं है।
नज़रिया मैगज़ीन
नज़रिया मैगज़ीन खुले तौर पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी पब्लिकेशन है जो भारत को ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवाद’ देश के तौर पर दिखाता है और खुद को ‘क्रांतिकारी पॉलिटिक्स’ के लिए एक आइडियोलॉजिकल हथियार के तौर पर पेश करता है। यह जोर देता है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद ही ‘वर्ग संघर्ष’ को खत्म कर एक नई सोशलिस्ट व्यवस्था बनाने का एकमात्र रास्ता है।
2024 में, नज़रिया उस वक्त एक बड़े स्कैंडल में फँस गया, जब उसके समर्थक ने मुकुंदन नायर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसका सपोर्ट करने के बजाय, नज़रिया ने एक इंटरनल कमेटी बनाई जिसने आरोपी के खिलाफ ही सिफारिश की। जब सर्वाइवर ने एतराज़ किया, तो ऑर्गनाइज़ेशन ने उसे नवंबर 2024 में निकाल दिया और उस पर ‘इंपीरियलिस्ट आइडियोलॉजी’ और ‘कम्युनिस्ट मोरैलिटी’ का उल्लंघन करने के आरोप लगाते हुए बयान जारी कर दिया। ये हमले सर्वाइवर को बदनाम करने और आरोपी को बचाने के लिए किए गए।
बाद में सर्वाइवर ने बताया कि bsCEM से जुड़े एक्टिविस्ट ने उसे बदनाम करने और झूठे दावे फैलाने में हिस्सा लिया था। तस्वीरें सामने आईं जिनमें bsCEM के सदस्य मुकुंदन के साथ मिलते-जुलते दिखे, जबकि उन्होंने निजी तौर पर माना था कि उन्हें आरोपों के बारे में पता था।
इस मामले में नज़रिया, bsCEM, FACAM और यहाँ तक कि SfPD ने पूरे घटनाक्रम को आइडियोलॉजिकल लड़ाई में बदल दिया, कमेंट्स डिलीट कर दिए, आलोचना करने वालों को ब्लॉक कर दिया और सर्वाइवर के ट्रॉमा का इस्तेमाल पॉलिटिकल पॉइंट बनाने के लिए किया।
इस एपिसोड ने नज़रिया के दोगलेपन को सामने ला दिया, जिसमें एक ऐसे ग्रुप का खुलासा हुआ जो एक यौन उत्पीड़न के आरोपित को बचाता है, जबकि आइडियोलॉजिकल शुद्धता बनाए रखने के लिए अपने ही कर्मचारी को बदनाम करता है।
रिहाई मंच
यह एक पॉलिटिकल फ्रंट है जो दमन का विरोध करने का दावा करता है। यह एंटी-CAA और किसान विरोध प्रदर्शनों सहित कई विरोध प्रदर्शनों में शामिल था।
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI)
स्टूडेंट्स फेडरेशन इन इंडिया एक लेफ्ट-विंग स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन है। ऑपइंडिया ने इस ऑर्गनाइजेशन को बड़े पैमाने पर कवर किया है। इसे यहाँ चेक किया जा सकता है।
यूनाइटेड पीस अलायंस
यूनाइटेड पीस अलायंस एक पॉलिटिकल फ्रंट है जिसे मीर शाहिद सलीम लीड कर रहे हैं, जिसे कश्मीर में ‘दमन के खिलाफ विरोध’ के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर बनाया गया है। हालाँकि यह शांति और अधिकारों की भाषा का इस्तेमाल करता है, लेकिन यह ग्रुप लगातार भारत सरकार के खिलाफ बयानबाजी करता है, खासकर आर्टिकल 370 के हटने के बाद।
संगठन के चेयरमैन सलीम अक्सर कहते हैं कि केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 से कश्मीरियों को ‘डराया’ और ‘दबाया’ है। उनके नेतृत्व में, यूनाइटेड पीस अलायंस ने कॉन्फ्रेंस की हैं। 5 अगस्त को जश्न मानने का विरोध किया और इसे ‘ब्लैक डे’ के तौर पर मनाने की वकालत की।
ग्रुप की गतिविधियां 370 विरोधी भावनाओं को बढ़ाने, संवैधानिक बदलावों को दमन के तौर पर दिखाने और इन दावों के इर्द-गिर्द पॉलिटिकल लामबंदी करने के इर्द-गिर्द घूमती हैं। शांति में योगदान देने के बजाय, यूनाइटेड पीस अलायंस एक और प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करता है, जो अधिकारों की वकालत की आड़ में अलगाववादी बयानबाजी को जिंदा रखता है।
यूथ 4 स्वराज (Y4S)
यूथ 4 स्वराज (Y4S) योगेंद्र यादव की पॉलिटिकल पार्टी, स्वराज इंडिया की स्टूडेंट-यूथ विंग है। हालाँकि यह खुद को ‘अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स’ और सूखा राहत से लेकर कैंपस एक्टिविज्म तक के मुद्दों पर युवाओं को इकट्ठा करने के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर दिखाता है, लेकिन इस ऑर्गनाइजेशन पर सेक्शुअल असॉल्ट और इंस्टीट्यूशनल उदासीनता के गंभीर आरोप लगे हैं।
2020 में, Y4S की एक पुरानी मेंबर ने यूथ 4 स्वराज के उस समय के प्रेसिडेंट मनीष कुमार पर सबके सामने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसने कहा कि उसने योगेंद्र यादव और दूसरे सीनियर नेताओं को इस गलत काम के बारे में बताया था, लेकिन उसकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। उसके बयान के मुताबिक, स्वराज इंडिया के मेंबर्स ने उसे मेंटली ट्रॉमा दिया और आखिरकार उसे इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। असॉल्ट की रिपोर्ट करने के बाद भी, मनीष कुमार किसानों के प्रोटेस्ट के दौरान सिंघु बॉर्डर पर Y4S को रिप्रेजेंट करते रहे।
सर्वाइवर ने यह भी आरोप लगाया कि जब उसने सीधे योगेंद्र यादव से बात की, तो उन्होंने चुप्पी साध ली, जबकि स्वराज इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट अविक साहा ने उसे सिर्फ पुलिस के पास जाने के लिए कहा। इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि संगठन ने गलत काम करने वालों को बचाया, जबकि आवाज उठाने वाली महिलाओं को बदनाम किया गया।
दूसरे संगठनों में ASA, BSM, CEM, CSM, CTF, LAA, फोरम अगेंस्ट रिप्रेशन तेलंगाना, कर्नाटक जनशक्ति, मजदूर अधिकार संगठन, मजदूर पत्रिका, NAPM, निशांत नाट्य मंच, न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव (NTUI), पीपल्स वॉच, समाजवादी जनपरिषद, समाजवादी लोक मंच, बहुजन समाजवादी मंच, वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन (WSS), नौरोज, इनोसेंस नेटवर्क और दूसरे शामिल हैं।
कुल मिलाकर, इंडिया गेट पर हुए इवेंट्स और इन संगठनों की प्रोफाइल से यह साफ है कि ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट एयर क्वालिटी इंडेक्स के ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में जाने को लेकर नहीं था। बल्कि यह एक कोऑर्डिनेटेड आइडियोलॉजिकल एजेंडा को आगे बढ़ाने के बारे में था, जो नक्सलियों को महिमामंडित करता है, भारतीय संस्थानों को कमजोर करता है और देश के खिलाफ कैंपस, कोर्ट और ‘सिविल राइट्स’ की भाषा को हथियार बनाता है।
स्टूडेंट्स की संस्थाओं और ‘अधिकारों’ के ग्रुप्स से लेकर वकीलों के फ्रंट और कश्मीर प्रेशर ग्रुप्स तक, bsCEM और CASR के आस-पास का नेटवर्क कोई अचानक नहीं बना है। यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जो भारत विरोधी बयानबाजी को नॉर्मल मानता है। गंभीर आरोपों का सामना कर रहे लोगों को सजा से बचाता है। यह रिपोर्ट OpIndia सीरीज की बस शुरुआत है, जो सिलसिलेवार तरीके से नक्सल समर्थक, लेफ्ट-झुकाव वाले ग्रुप्स के ऑर्गनाइज़ेशनल जाल को सामने लाएगी। उनके भारत विरोधी गतिविधियों का पर्दाफाश करेगी।
दिल्ली के रेड फोर्ट के पास 10 नवंबर 2025 को हुए भयानक कार ब्लास्ट ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। एक सफेद ह्युंडई i20 कार में भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक लादकर सुसाइड बॉम्बर डॉक्टर उमर उन नबी ने धमाका किया। इस धमाके में 15 निर्दोष लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए।
दिल्ली पुलिस ने तत्काल यूएपीए और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया, जबकि केंद्र सरकार ने इसे साफ तौर पर आतंकी हमला घोषित कर दिया। एनआईए की जाँच में सामने आया कि उमर पुलवामा का डॉक्टर था, जो फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर था और जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिंद जैसे इस्लामिक मिलिटेंट ग्रुप्स से जुड़ा था।
उसके सहयोगी डॉक्टर मुजम्मिल अहमद गनई, अदील मजीद राथर, शकील और शाहीन सईद भी गिरफ्तार हुए, जो ‘टेरर डॉक्टर्स’ के नेटवर्क का हिस्सा थे। इस घटना ने ‘व्हाइट-कॉलर टेररिज्म’ को सबके सामने उजागर किया।
इसके बाद तो इसे आतंकी हमला कहने में कोई भी गुंजाइश भी नहीं बची। केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भी इसे ‘एंटी-नेशनल फोर्सेस’ द्वारा किया गया हेसियन टेरर एक्ट करार दिया। जाँच में सीसीटीवी फुटेज से ये भी सामने आया कि उमर ने कार को रेड फोर्ट मेट्रो स्टेशन के पास पार्क किया और ट्रैफिक सिग्नल पर विस्फोट किया।
डीएनए टेस्ट से उमर की पहचान हुई, जो फरीदाबाद रेड्स के बाद घबराकर दिल्ली की ओर भागा था। एनआईए ने 2900 किलो विस्फोटक बरामद किए, जो जैश के हैंडलरों से जुड़े थे। यह साफ हो गया था कि पाकिस्तान में पल रहे टेरर मॉड्यूल एक्टिव हैं और उन्होंने ही देश में अशांति फैलाने की कोशिश की।
आतंकी शब्द से परहेज करता ‘द हिंदू’
ऐसे स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद ‘द हिंदू’ जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अपने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में ‘आतंकी’ शब्द लिखने से पूरी तरह परहेज किया।
द हिंदू ने ब्लास्ट के बाद से लेकर अब तक उमर को ‘डॉक्टर’, ‘आरोपित’, ‘संदिग्ध’ या ‘मैन’ ही लिखा है। 17 दिन बीतने के बाद भी उनकी हेडलाइंस अब तक अस्पष्ट हैं। हेडलाइन्स में ‘डॉक्टर उमर की कार में ब्लास्ट’, ‘आरोपित डॉक्टर गिरफ्तार’, ‘रेड फोर्ट ब्लास्ट में संदिग्ध की भूमिका’ लिखा गया है।
यहाँ तक कि जहाँ ‘टेररिस्ट’ लिखा, वहाँ इस शब्द को सिंगल कोट्स में डाल दिया, मानो अब तक उन्हें संदेह ही है। और ये वह पाठक के मन में भी पैदा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी ‘कार ब्लास्ट’, ‘एक्सप्लोडिंग कार’ आदि का पैटर्न रहा बिना ‘आतंकवादी हमला’ लिखे।एक तरह से यह पत्रकारिता नहीं बल्कि टेरर सिम्पैथी कहा जाना चाहिए।
पहले भी दिखा वामपंथ का नैरेटिव पैटर्न
यह कोई पहली बार नहीं है। द हिंदू की रिपोर्टिंग में अक्सर यह पैटर्न दिखता है कि जब भी किसी घटना को धो-पोंछना होता है, किसी आरोपित को पाक साफ दिखाना होता है को तो शब्दों से खेला जाता है। दिल्ली ब्लास्ट में भी द हिंदू की अब तक रिपोर्ट्स की हेडलाइंस इसी पैटर्न को दर्शाती हैं।
पहली– ‘रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट, डॉक्टर संदिग्ध’- पर आतंकी नहीं।
ये हेडलाइंस द हिंदू की दुविधा साफ तौर पर दिखाती हैं। सरकार आतंकी कह रही, NIA यूएपीए (UAPA) लगा रही, लेकिन द हिंदू 27 नवंबर 2025 तक भी ‘टेररिस्ट’ बोलने से हिचक रही। उनकी रिपोर्ट्स में अक्सर ‘terrorist’ की जगह ‘militant’, ‘gunman’, ‘accused’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। यह वही अप्रोच है जो अल-जजीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखती है। वहाँ भी आतंकी कहने से बचा जाता है और भाषा को इस तरह गढ़ा जाता है कि पाठक के मन में संदेह पैदा हो।
पुराने ढर्रे पर चल रहा द हिंदू
द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउसेज का ये पुराना हथकंडा है। पुलवामा अटैक, 26/11 या ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इन्होंने टेररिस्ट को ‘मिलिटेंट’, ‘आरोपित’ कहा। शब्दों से खेलकर ये वामपंथी मीडिया हाउस अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं- आतंकवादी हमले को ‘इंसिडेंट’ और हमलावर को आतंकी के बजाय ‘डॉक्टर’ और आरोपित लिखते हैं जैसे उसने लोगों को मारा नहीं बल्कि सिर्फ चप्पल चुराई हो।
द हिंदू, अल जजीरा की तर्ज पर ही काम करता है। जैसे अल-जजीरा हमास को ‘मिलिटेंट’ कहता है वैसे ही द हिंदू भी आतंकी को मानवीकरण करता दिखता है। इसके पीछे उसका उद्देश्य साफ है- पाठकों में संदेह डालना कि ‘क्या बंदा सच में टेररिस्ट था?’
वामपंथी मीडिया की कलाबाजी अब भी जारी है, भले आम जनता जाग चुकी हो। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स इन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं, लेकिन ये अपनी लाइन नहीं छोड़ते। इनकी कोशिश यही रहती है कि किसी भी घटना को इस तरह पेश किया जाए कि पाठक के मन में सरकार और एजेंसियों की बात पर सवाल उठे।
द हिंदू की यह मानसिकता कहीं न कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है। जब NIA जैश लिंक बता रही, तो ‘डॉक्टर नेटवर्क’ कहना आंतक को ग्लोरिफाई करता है फरीदाबाद में 2900 किलो आईईडी बरामद हुए, जो कार बॉम्ब में इस्तेमाल किए गए, फिर भी द हिंदू उसे ‘ब्लास्ट’ लिखता है। यह पत्रकारिता नहीं, प्रोपगैंडा है।
ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जाए तो ‘द हिंदू’ का वामपंथी झुकाव साफ है। नेहरू युग से ये कॉन्ग्रेस-समर्थक रहे। इमरजेंसी में भी चुप्पी साधे रखी। अब मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बुनते रहते हैं।
जाँच में दिखा जैश से संपर्क, द हिंदू ने छिपाया
रेड फोर्ट ब्लास्ट पर भी पाकिस्तान से जुड़ा लिंक और तथ्यों को छिपाया और जैश-ए-मोहम्मद को महज एक ‘ग्रुप’ कहा। दिल्ली ब्लास्ट में पकड़े गए सभी आरोपितों का सीधा जुड़ाव पाकिस्तान-स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से था।
जाँच एजेंसियों ने पाया कि ‘हंजुल्ला’ नामक जैश हैंडलर ने डॉक्टरों और छात्रों को बम बनाने के वीडियो भेजे और उन्हें कट्टरपंथी बनाया। डॉक्टर उमर उन नबी, मुजफ्फर अहमद राठर और शहीन शाहिद जैसे आरोपितों ने छात्रों को भर्ती कर ‘व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल’ तैयार किया।
2019 में हुए पुलवामा हमलों में आरोपित तुफैल अहमद भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था और दिल्ली हमलों में भी इसका हाथ था। इस मॉड्यूल को 26 लाख रुपये की फंडिंग मिली थी। इस लिहाज से ये पूरी तरह साफ है कि यह हमला कोई स्थानीय घटना या दुर्घटना नहीं थी बल्कि जैश का संगठित आतंकी ऑपरेशन था। इसके बावजूद द हिंदू संशय में दिख रहा है।
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।
जनता को दिख रहा द हिंदू का सच
जब किसी को संदिग्ध कहा जाता हो तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में शक हो कि उसने अपराध किया है, लेकिन उसके खिलाफ औपचारिक आरोप या सबूत अभी तक पुख्ता नहीं हुए। संदिग्ध शब्द पाठक के मन में और भी ज्यादा अनिश्चितता पैदा करता है। यह बताता है कि व्यक्ति पर शक है, लेकिन यह पक्का नहीं कि उसने अपराध किया।
इसके अलावा जब हम किसी को अक्यूज्ड या आरोपित लिखते हैं तो इसका मतलब है कि उसके ऊपर अपराध का महज आरोप लगा है। वह आतंकी नहीं हो सकता या कोर्ट ने उसे दोषी नहीं ठहराया तो वह सही भी हो सकता है।
इसके अलावा द हिंदू का ‘मैन’ शब्द का उपयोग अपराध की गंभीरता को कम करने जैसा है। यह व्यक्ति को सिर्फ एक आम इंसान की तरह पेश करता है, न कि आतंकी या अपराधी की तरह। इससे पाठक के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या वह सच में आतंकी था या सिर्फ एक आम आदमी जिसे फँसाया गया।
अब पाठकों के सोचने का तरीका बदल चुका है। वे सही और गलत लिखने का फर्क समझने लगे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर #HinduHidesTerror ट्रेंड हुआ। इस पर लोग द हिंदू की हेडलाइंस को साझा कर रहे थे।
ज्यादातर पाठक अब डिजिटल न्यूज पढ़ते हैं, जिसमें स्पष्ट रिपोर्टिंग और बात शामिल हो। मीडिया की भूमिका लोकतंत्र का चौथा खंभा है, लेकिन द हिंदू इसे तोड़ रहा। अगर आतंकी को ‘डॉक्टर’ कहा/लिखा जाएगा तो युवाओं में रेडिकलाइजेशन/ कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। द हिंदू को आईना देखना चाहिए कि 17 दिन बाद भी वह किस दुविधा में है कि आतंकी को आतंकी लिखने में डर रहा है।
भले ही आज पाठक ज्यादा जागरूक हो गए हैं और उनके सोचने का तरीका बदल गया है, लेकिन द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अब भी अपने पैंतरे दिखाने से बाज नहीं आते। इनकी कोशिश यही रहती है कि लोगों के दिमाग में शक की परत छोड़ दी जाए।
मथुरा के वृंदावन में ब्रजभूमि को शराब-मुक्त बनाने की माँग इन दिनों फिर तेज है। इसी कड़ी में अपनी आवाज एक हिंदू कार्यकर्ता व गौ रक्षक दक्ष चौधरी ने भी उठाई। हालाँकि अब खबर है कि उन्हें एक शिकायत के बाद अरेस्ट कर लिया गया है।
बताया जा रहा है कि दक्ष को सुनरख तिराहा स्थित एक वाइन शॉप का जबरन शटर बंद कराने के मामले में शिकायत के बाद पकड़ा गया। अब अन्य हिंदू कार्यकर्ता उनकी रिहाई की माँग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं।
हिंदू संगठनों का कहना है कि दक्ष चौधरी को जल्दी से ज्दी रिहा किया जाए, क्योंकि उन्होंने कोई गलत कार्य नहीं किया है, बल्कि उन्होंने ब्रजभूमि को मांस-मदिरा मुक्त करने के दुकान बंद कराई थी।
वीडियो वायरल और दक्ष की गिरफ्तारी
जितेंद्र कुमार की शिकायत पर 18 नवंबर 2025 को वृंदावन थाना में दक्ष चौधरी, अभिषेक ठाकुर, शिब्बो, कपिल, अकू पंडिर और 10-15 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 191(2), 352, 351(3), 127(2), 131 और 324(4) के तहत FIR दर्ज की गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि दक्ष की गिरफ्तारी, दुकान का शटर बंद कराने वाली वीडियो वायरल होने के बाद और सेल्समैन जितेंद्र की तहरीर पर हुई। पुलिस ने दक्ष चौधरी, अभिषेक ठाकुर, शिब्बो, कपिल और अक्कू पंडित सहित 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज किया।
सेल्समैन जितेंद्र कुमार ने FIR में कहा है, “17 नवंबर 2025 की शाम को करीव 8.30 बजे मैं अपने अंग्रेजी शराब की दुकान पर मौजूद था, मेरे साथ मेरे तीन साथी दिनेश, मुकेश, जसवीर मौजूद थे तभी दो गाडी जिनके न UP83 Y 9200 व DL5CU 4512 में सवार होकर दक्ष चौधरी, अभिषेक ठाकुर, शिब्बो पुत्र राजेश, कपिल पुत्र सुशील व अक्कू पंडित एवं दस पंद्रह व्यक्ति अज्ञात मेरे ठेका पर आये और आकर मेरे साथियो के साथ गाली गलौज की व इतना धमकाया तथा ठेके का शटर गिराकर हम सभी लोगो को अन्दर बन्द कर दिया।”
FIR में उन्होंने कहा, “वहाँ पर खरीदारी करने आए लोगों के साथ गाली गलौज की व जान से मारने की धमकी दी और वहाँ से उन ग्राहको को भगा दिया। इनके द्वारा किये गये ग्राहको व हम लोगो में भय व्याप्त हो गया है। इन लोगो द्वारा मेरे पास दो अन्य दुकाने जो देशी व बीयर की है को जबरजस्ती डराकर धमकाकर उनके कर्मचारियो से अभद्रता करते हुये शटर गिराकर उनको बन्द कर दिया। सभी ग्राहको को गाली गलौज करते हुये जान से मारने धमकी देते हुए भगा दिया।”
दक्ष पर यह भी आरोप है कि उन्होंने गुस्से में आकर पुलिस को भी कुछ बातें कही थी। गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही देर रात बड़ी संख्या में समर्थक वृंदावन कोतवाली पहुँचे और शांतिपूर्ण तरीके से ब्रज भूमि को मांस-मदिरा मुक्त करने की माँग रखते हुए प्रदर्शन किया।
गिरफ्तारी के बाद, पुलिस ने बयान जारी कर कहा, “17 नवंबर 2025 को एक घटना घटित हुई, जिसमें कुछ लोगों ने जबरदस्ती एक शराब की दुकान बंद कर दी। इसके खिलाफ वृंदावन थाने में कुछ नामजद और 10-15 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई। इनमें से पाँच व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”
थाना वृन्दावन क्षेत्रान्तर्गत दिनांक 17.11.2025 को कुछ व्यक्तियो द्वारा जबरन शराब के ठेका को बन्द कराये जाने का प्रयास किया गया था । जिसके सम्बन्ध मे थाना वृन्दावन पर सुसंगत धाराओ में अभियोग पंजीकृत किया गया था । आज दिनांक 24.11.2025 को नामजद एवं अज्ञात मे से कुल 05 व्यक्तियो की… pic.twitter.com/IYTPJuYo3z
उनको निर्दोष बता रहे उनके समर्थकों का कहना है कि शटर बंद कराने के पीछे उनका केवल एक उद्देश्य था कि उस रास्ते पर मदिरा की दुकान बंद हो, जिससे प्रेमानंद महाराज आते-जाते हैं। उनका कहना है कि सनातनियों को झूठे आरोपों में फँसाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर अब गिरफ्तार युवाओं के समर्थन में पोस्ट कर उनको रिहा करने की माँग तेज हो गई है। वहीं अपील भी की जा रही है कि सभी इस कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाएँ और एकजुट हों।
Breaking ? These innocent hindus are in judicial custody in Mathura, No one is supporting them on ground level, neither UP Police nor UP govt, Their only hope is us, so hindus it's time to raise the voice for them!
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान के बाद शुरू हुई मुहिम
17 नवंबर 2025 को आयोजित सनातन सभा में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वार धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा था कि ब्रजभूमि की पवित्रता बनाए रखने के लिए शराब के ठेकों को हटाया जाना चाहिए। इसी अपील के बाद कई युवाओं ने क्षेत्र में शराब बिक्री का विरोध शुरू किया और उसी क्रम में वाइन शॉप का शटर बंद कराया गया।
युवाओं ने यह दावा किया कि यह विरोध किसी व्यक्तिगत लाभ या नुकसान के लिए नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और समाज की सुरक्षा के लिए था। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सेल्समैन जितेंद्र की तहरीर पर पुलिस ने दक्ष चौधरी, अभिषेक ठाकुर, शिब्बो, कपिल और अक्कू पंडित सहित 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी।
शिब्बो और कपिल की पहले ही गिरफ्तारी हो चुकी थी, उसके बाद पुलिस ने दक्ष चौधरी, युधिष्ठिर, अमित, अभिषेक और दुर्योधन को ऋषिकेश से गिरफ्तार कर लाई।
समर्थक बोले- यह लूट नहीं, संस्कृति की रक्षा है
प्रदर्शन में मौजूद जग्गा कर्मयोगी ने कहा, “इन युवाओं ने किसी तरह की चोरी या हिंसा नहीं की। उन्होंने सिर्फ ब्रजभूमि को शराब से मुक्त करने की माँग रखी है। भावना में आकर शटर गिरा देना अपराध नहीं, बल्कि समाज और धर्म के लिए उठाया गया कदम है।”
उन्होंने आगे कहा कि संतों और धर्माचार्यों को आगे आकर इस आंदोलन का समर्थन करना चाहिए, क्योंकि ब्रजभूमि का स्वरूप भक्ति, संस्कार और धार्मिकता का केंद्र है, शराब का बाज़ार नहीं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि ब्रजभूमि को धार्मिक धरोहर माना जाता है, तो यहाँ शराब और मांस की दुकानों की अनुमति देना विरोधाभासी है। लोगों का आग्रह है कि शासन-प्रशासन स्थानीय भावनाओं का सम्मान करे और वृंदावन सहित पूरे ब्रज क्षेत्र को पूर्ण रूप से शराब-मुक्त घोषित किया जाए।
असम सरकार ने मंगलवार (25 नवंबर, 2025) को ऑफिशियल त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमीशन की रिपोर्ट की कॉपी 126 मेंबर वाले हाउस के मेंबर और दूसरे लोगों में बांटी। इसके अलावा नॉन-गवर्नमेंट जस्टिस (रिटायर्ड) टी.यू. मेहता कमीशन की रिपोर्ट भी असेंबली में पेश की। दोनों ही रिपोर्ट 1983 हिंसा को लेकर थी। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने कभी भी रिपोर्ट को सदन के पटल पर नहीं रखा।
40 साल बाद असम की हिमंत सरकार ने रिपोर्ट रख कर कॉन्ग्रेस के सियासत की पोल खोल दी। चार महीने चली इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए
कब हुआ तिवारी आयोग का गठन
तिवारी आयोग का गठन 21 अगस्त 1983 को किया गया था। माना गया कि 6 महीने में आयोग अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। आयोग ने 1983 में जनवरी से अप्रैल तक राज्य में फैली अशांति और हालात को लेकर जाँच की। मई 1984 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को सौंपा। आयोग में एस मनोहरन आईएएस, को सेक्रेटरी बनाया गया जबकि सीएक वर्मा और आरसी जैन दोनों रिटायर आईएएस थे, उन्हें सदस्य के तौर पर शामिल किया गया। 9 फरवरी 1984 तक 257 गवाहों से पूछताछ की गई। इनमें 106 आधिकारिक और 151 गैर आधिकारिक थे।
आयोग ने एडवोकेट जनरल एसएन भुइयां, वकील एसएल लश्कर, असम सरकार के वकील बुरागोहे समते कई लोगों का पक्ष भी सुना। असम पुलिस की भी राय जानी। कमीशन ने पहले राउंड में सभी जिलों में घूमकर स्थिति को परखा। दूसरे दौर में हर जिले के गणमान्य लोगों और न्यूज पेपर्स के एडिटर्स, पुलिस वगैरह से जानकारी ली। वजह क्या था? क्यों सैकड़ों की संख्या में लोग जमा हुए? घटनास्थल से हजारों सबूत आयोग ने जमा किए। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की।
रिपोर्ट में कहा गया कि किछार और नॉर्थ कछार हिल्स को छोड़कर पूरे राज्य में हिंसा फैली और लोग प्रभावित हुए।
हिंसा की शुरुआत फरवरी 1983 में हुए विवादित तीन-चरण के विधानसभा चुनावों के दौरान हुआ, जब असम में राष्ट्रपति शासन था। इसमें हजारों लोग मारे गए। इसके बावजूद चुनाव हुए और हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। मुख्यमंत्री सैकिया ने ही त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में जाँच आयोग बनाया था।
1984 में जस्टिस मेहता के नेतृत्व में भी एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया था जिसने असम हिंसा की जाँच की। दोनों रिपोर्ट सीएम सैकिया को सौंपे गए। लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। 1985 में प्रफुल्ल महंत सरकार ने कोशिश की, लेकिन सदन के पटल पर नहीं रख सकी। करीब 40 साल बाद बीजेपी की हिमंत सरमा सरकार ने रिपोर्ट विधानसभा में पेश की है, जिस पर बवाल मचा हुआ है।
चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं- रिपोर्ट
नेल्ली हिंसा के दौर में ही तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार ने असम में चुनाव कराने का फैसला लिया। इसपर विपक्ष पार्टियों ने सत्ता हासिल करने के लिए कॉन्ग्रेस पर चुनाव कराने का आरोप लगाया। लेकिन तिवारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे खारिज कर दिया है। रिपोर्ट कहता है कि चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं था। रिपोर्ट में 1950,1954,1960, 1968 1972 1977,1978, 1979, 1980, 1981 और 1982 में हुए हिंसा का जिक्र किया। ज्यादातर हिंसा का चुनाव से कोई संबंध नहीं था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह बात मान ली जाती है कि हिंसा का खतरा होने पर चुनाव नहीं होना चाहिए, तो यह राजनीतिक ब्लैकमेलिंग होता और उसके गंभीर नतीजे होंगे। ये पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरे में डालने जैसा है। इसमें कहा गया है कि “हमारा देश एक गरीब और विकासशील देश है। यहाँ रोज कई मुद्दे आते हैं । भारत जैसे देश में क्षेत्रीय और दूसरे मुद्दे हावी हैं। राज्यों के बीच पानी और नदियों के जल बंटवारे की समस्या है। सरकारी सेवा से जुड़े लोगों को पे स्केल की दिक्कत है। फैक्ट्री कर्मचारी वेज और वर्किंग कंडीशन से परेशान हैं। छात्रों के यूनियन परीक्षा और पढ़ाई को लेकर परेशान हैं। किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने की समस्या है।”
1983 हिंसा में हजारों लोग मारे गए
त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में बनी तिवारी आयोग ने 1983 के शुरुआती 4 महीनों की परिस्थितियों के बारे में बताया है। उस समय विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य में बड़े आंदोलन का दौर जारी था। राज्य में बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में इस दौरान 8019 हिंसक घटनाएँ हुई। 248292 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा, जबकि 225951 लोग बेघर हुए। करीब 22 रेलवे की संपत्तियों का नुकसान हुआ और 85 रेलवे ट्रैक प्रभावित हुए। 22436 प्राइवेट घरों को आग के हवाले कर दिया गया।
रिपोर्ट में हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताते हुए ‘मुस्लिम हिंसा’ की चर्चा
रिपोर्ट में उस दौर की हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसक घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देना गलत है। पूरा समाज हिंसा का दंश भुगत रहा है। आरोपित किसी एक समुदाय के नहीं है। कई जगह असमिया लोग आरोपित हैं, लेकिन वे बांग्लाभाषी हैं।
कई जगहों पर मुस्लिम भीड़ ने असमिया लोगों पर आक्रमण किया। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने अपने समुदाय के लोगों का साथ दिया। नेल्लई के चमरिया और नलबारी और कामपुर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में ऐसा हुआ। चोलखोवा इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने अप्रवासियों पर हमले में साथ दिया। कई इलाकों में पीड़ित और आक्रमणकारी दोनों बहुसंख्यक समुदाय के थे। इसलिए इसे सांप्रदायिक हिंसा की तरह नहीं देखा जा सकता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जनसंख्या का वितरण असम में इस तरह का है जिससे एक समुदाय एक इलाके में बहुसंख्यक है, वही दूसरे इलाके में अल्पसंख्यक है। जब हिंसा फैली तो इसकी प्रतिक्रिया भी हुई और पूरा इलाका इस ‘पागलपन’ का शिकार हुआ।
हिंसा के लिए AASU और AAGSU को जिम्मेदार ठहराया
रिपोर्ट में हिंसा की जिम्मेदारी असम गण संग्राम परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन पर डाली गई। इसमें कहा गया AASU और AAGSU दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं। इस बात के बहुत सारे सबूत हैं कि चुनाव रोकने के लिए, आगजनी, दंगे करवाए गए।
बिल्डिंग,पुल, रेलवे संपत्ति को नुकसान और बंद के दौरान हिंसक घटनाएँ योजनाबद्ध तरीके से की गई। आयोग के अनुसार, बंद, विरोध और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने जैसी गतिविधियां पहले से तय थीं, लेकिन बाद में हालात आंदोलनकारी नेताओं के नियंत्रण से बाहर हो गए।
चुनाव कराना काफी मुश्किल भरा फैसला था
तिवारी आयोग ने भी माना कि तत्कालीन डीजीपी (स्पेशल ब्रांच) ने चुनाव में मशीनरी को होनेवाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी दी थी। इसमें कहा गया कि असम में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सालों से एक चुनौती बनी हुई है। सालों से प्रशासन को पंगू बनाने की कोशिश की गई। यहाँ चुनाव करना खुद में काफी मुश्किल काम है।
राज्य के सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट करने वाले हैं और बाहर से आए पोलिंग एजेंट को ये काम करना है। लोकल प्रेस में बैलेट पेपर प्रिंट करने से मना कर दिया है। राज्य में दूसरे अरेंजमेंट बाहर से करने होंगे।
इसमें कहा गया कि पोलिंग स्टेशन, परिवहन के रास्ते और पुल पर हमले हो सकते हैं। इसके अलावा दूसरी जरूरतों को पूरा करना भी नामुमकिन-सा है। काफी लोगों की जान जा सकती है और संपत्ति बर्बाद हो सकते हैं।
असमिया लोगों का अल्पसंख्यक बनने का डर ‘काल्पनिक’ नहीं
तिवारी रिपोर्ट में कहा गया है कि असमी लोगों के अंदर का ‘भय’ कोई ‘काल्पनिक’ नहीं है। कई ज़िम्मेदार गवाहों ने इस बात की गवाही दी है और जनगणना के आंकड़े और रिपोर्ट इस बात को साबित करते हैं। असमिया पहचान पर खतरा बहुत पहले से है। ब्रिटिश एडमिनिस्ट्रेटर और जनगणना कमिश्नर ने भी देखा था, जिन्हें न तो कोई मतलब था और न ही कोई भेदभाव और न ही इस मामले में उनका कोई पर्सनल या ग्रुप इंटरेस्ट था। आयोग के सामने पेश किए गए सबूतों से पता चलता है कि विदेशी, भाषा आदि मुद्दे दशकों से लोगों के मन में उथल-पुथल मचा रहे थे। ये पहले भी कई बार हिंसा की वजह बने।
असमिया पहचान को बचाने जाने की जरूरत
बाहर से आए प्रवासियों की ओर से जमीन कब्जा करने को अहम वजह बताते हुए कहा गया है कि असमिया लोगों के मन में इसको लेकर डर घुस गया है, इसका समाधान होना चाहिए। रिपोर्ट में कश्मीर की तर्ज पर भूमि सुरक्षा कानून लागू करने की सिफारिश की गई। इसके अलावा गैर-असमिया लोगों को भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाने की भी सलाह दी गई है। NRC की पैरवी की गई है और किसे ‘असमिया’ माना जाएगा, इसको लेकर भी सुझाव दिए गए हैं।
कैसे बदली डेमोग्राफी?
असम की डेमोग्राफी में जबरदस्त बदलाव देखा गया है। राज्य में 1872 में देश के दूसरे राज्यों के साथ जनगणना कराया गया। 1901 से 1971 के बीच यहाँ जनसंख्या वृद्धि ने सबका ध्यान खींचा। 1901 में 32.90 लाख यहाँ की जनसंख्या थी, वहीं 1971 में 146.25 लाख हो गई।
तिवारी रिपोर्ट पेज नंबर 37
असम में अप्रवासियों की बात करें तो इसका पता 1951, 1961 और 1971 में चलता है। 1951 में 12.86 लाख अप्रवासी थे। इनमें से सिर्फ पाकिस्तानी अप्रवासियों की संख्या 8.02 लाख थी। जबकि दूसरे राज्यों के 4.35 लाख लोग थे।
1971 की जनगणना के मुताबिक, 15.03 लाख प्रवासियों में से 8.96 लाख सिर्फ पाकिस्तानी थे। जबकि दूसरे राज्यों से 5.25 लाख और नेपाल से 75866 थे। 1981 में असम में जनगणना नहीं किया गया था।
इससे पता चलता है कि असमिया लोगों को अपनी संस्कृति और जमीन की चिंता क्यों हुई। लगातार पाकिस्तानी भीड़ राज्य के संसाधनों पर कब्जा जमाने लगा और लोगों को सांस्कृतिक रक्षा की जरूरत महसूस हुई। इसलिए तिवारी आयोग ने एनआरसी की जरूरत महसूस की थी।
छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने वाली है। सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विवाद और तनाव बढ़ रहा है। कई बार हालात इतने खराब हुए कि पुलिस और प्रशासन को दखल देना पड़ा। अभी राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसमें धर्म बदलने से पहले DM की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे मजबूत करने की जरूरत है।
नए कानून का उद्देश्य साफ है- कोई भी व्यक्ति बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर किसी को डर दिखाकर, लालच देकर, दबाव डालकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की जानकारी कानूनी रूप से दर्ज हो, ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो और जनजातीय इलाकों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन जबरन या अवैध धर्मांतरण पर सख्त रोक लगाएगा।
नए कानून में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?
सरकार के नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ी बात यह है कि अब धर्म बदलना पहले की तरह आसान नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उसे तय समय पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित जानकारी देनी होगी, ताकि सरकार को पता रहे कि धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से हो रहा है या किसी दबाव में। अगर कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे धर्मांतरण को मान्य नहीं माना जाएगा। यानी कागजों पर वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं होगा।
इसके साथ ही ड्राफ्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर किसी ने किसी को लालच देकर, डर दिखाकर, धमकाकर या धोखा देकर धर्म बदलवाने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जब तक प्रक्रिया को मजबूत और सख्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना मुश्किल है।
एक और अहम मुद्दा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन कराना’, जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है। नए कानून में छत्तीसगढ़ भी इस तरह के मामलों पर सख्ती बढ़ा सकता है। अगर कोई व्यक्ति केवल शादी करवाने के मकसद से धर्म परिवर्तन करवाता है या किसी को ऐसा करने पर मजबूर करता है, तो ऐसी शादी को कोर्ट अवैध घोषित कर सकेगी। यानी सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन की कोशिश अब गंभीर अपराध माना जा सकता है।
इस कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए। हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे में रहकर ही मिलेगा। नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति दबाव, धोखे या लालच का शिकार न बने। सरकार का मानना है कि इससे खासकर जनजातीय इलाकों में फैल रहा तनाव कम होगा, वहाँ होने वाले झगड़े और सामाजिक विभाजन थमेगा और समाज में स्थिरता बनी रहेगी।
भारत के किन राज्यों में पहले से लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?
भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून की शुरुआत बहुत पहले ओडिशा से हुई। ओडिशा ने 1967 में पहला कानून बनाया था, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने पर सजा का प्रावधान रखा गया। इसके एक साल बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया। समय बीतने के साथ, अलग-अलग राज्यों ने महसूस किया कि धर्मांतरण के मामलों में नए तरीके सामने आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाना शुरू किया।
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने अपने कानूनों में और कड़े नियम जोड़े हैं। इन राज्यों का साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को डर दिखाकर, पैसा या नौकरी का लालच देकर, या शादी का झाँसा देकर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश करता है, तो यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।
अधिकतर राज्यों में यह अपराध गैर-जमानती है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के भी आरोपित को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती। अगर पीड़ित व्यक्ति नाबालिग हो, महिला हो, या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय से हो, तो सजा और अधिक कड़ी कर दी जाती है, क्योंकि ये वर्ग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।
कई राज्यों में तो स्वेच्छा से, यानी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन पर भी नियम बहुत साफ हैं। जिसे खुद से धर्म परिवर्तन करवाना है, उसे पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को 30 से 60 दिन पहले लिखित रूप से बताना होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि अधिकारियों को पता रहे कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई दबाव या लालच नहीं है।
इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है कि लोगों को सुरक्षा देना, उन्हें धोखे से बचाना और धार्मिक स्वतंत्रता को सही अर्थों में सुरक्षित रखना।
अवैध धर्मांतरण का गलत इस्तेमाल कैसे होता है?
धर्मांतरण को लेकर सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब इसे किसी योजना के तहत, संगठित तरीके से किया जाता है। खासकर तब, जब कमजोर या सरल-सहज लोगों को निशाना बनाया जाता है। कई जगहों पर देखा गया है कि कुछ समूह धीरे-धीरे किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हैं।
इसका असर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहता। इससे उस क्षेत्र की जनसंख्या का संतुलन बदलने लगता है। जब किसी एक समुदाय की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो स्थानीय राजनीति, पंचायतों के फैसले, प्रशासनिक ढाँचा और सामाजिक माहौल पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। कई बार यह बदलाव वहाँ रहने वाले पुराने समुदायों के लिए चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है।
दूसरा बड़ा नुकसान तब होता है जब बाहरी या संगठित समूह जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी परंपराओं, देवी-देवताओं और जीवनशैली से दूर करने की कोशिश करते हैं। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, और जब उन्हें तेजी से किसी नए मजहब की ओर मोड़ा जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है। कई गाँवों में परिवार आपस में बँट जाते हैं, त्यौहार अलग-अलग हो जाते हैं और सामाजिक रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है।
कुछ मामलों में ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों का इस्तेमाल संगठन अपने प्रचार, अपनी संख्या बढ़ाने या गलत गतिविधियों के लिए भी करते हैं। कमजोर या भावनात्मक रूप से टूटे लोगों को प्रभावित करना आसान होता है और ऐसे लोग अनजाने में कट्टरपंथी सोच के शिकार बन सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी इस खतरे को समझ चुका है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए कई राज्य सरकारें कानूनों को और सख्त कर रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, डर, दिखावे या चालाकी से लोगों का धर्म परिवर्तन ना करवा सके। सरकारों का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर धर्म परिवर्तन साफ, सुरक्षित और पूरी तरह अपनी इच्छा से हो, न कि किसी चाल या दबाव का नतीजा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वज की स्थापना एक रस्म से आगे बढ़कर एक ऐतिहासिक घटना है। यह वह क्षण है, जिसमें सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष और करोड़ों-करोड़ राम भक्तों की भावनाएँ एक प्रतीक के रूप में आसमान में लहरा उठीं।
भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उद्घोष इस ध्वज को देश का बड़ा वर्ग गर्व, आस्था और सभ्यता के पुनरुत्थान के रूप में देख रहा है तो वहीं तथाकथित लिबरल वर्ग इससे दुखी है। वामपंथी गुटों से लेकर लिबरल्स और पाकिस्तान तक सब परेशान हैं।
लिबरल्स की एक जमात इस बात से दुखी हो गई है कि राम मंदिर पर ध्वज फहराने के लिए खुद प्रधानमंत्री क्यों चले गए। जब प्रधानमंत्री मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम में पहुँचे थे, तब भी इस जमात के पेट में मरोड़ उठने लगी थीं। वामपंथी पार्टी CPI के महासचिव डी राजा भी इन दुखी लोगों की जमात में शामिल हैं। राजा ने इसके विरोध में X पर एक लंबा पोस्ट लिखा है।
राजा ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी देश के सामने अयोध्या में भगवा झंडा फहरा रहे हैं और इसे ‘भारतीय सभ्यता के पुनरुत्थान’ का प्रतीक बता रहे हैं। यह सिर्फ संशोधनवाद नहीं है बल्कि यह एक संकीर्ण, बहिष्कारवादी विचारधारा के साथ हमारे संवैधानिक इतिहास को फिर से लिखने का एक बेशर्म प्रयास है। यह बेहद चिंताजनक है कि देश के सर्वोच्च पद का इस्तेमाल हमारे संविधान में निहित बहुलवाद का जश्न मनाने के बजाय RSS के वैचारिक एजेंडे को वैध बनाने के लिए किया जा रहा है।”
Despite the Supreme Court verdict stating that the demolition of the Babri Masjid was a criminal act, for which no one has been held accountable, PM Modi stands before the nation, raising a saffron flag in Ayodhya and claiming it as the symbol of “resurgence of Indian… pic.twitter.com/k9fQOqGGQB
उन्होंने कहा कि हम सबका झंडा तिरंगा है और इस घटना को तमाशा बताया है। यकीनन तिरंगा इस राष्ट्र की पहचान है जो आजादी के बाद आया है। उसका सम्मान है और पूरा राष्ट्र उसके सम्मान में नतमस्तक है। पर डी राजा ये क्यों भूल गए कि भगवा झंडा और राम राज्य का प्रतीक ध्वज हजारों वर्ष पुराने इस राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधि है। हिंदुओं के मन में उसके लिए अपार श्रद्धा है।
डी राजा हिंदुओं की आस्था की तुलना तमाशे से कर सकते हैं, उन्हें कोई कुछ नहीं कहने वाला है। क्योंकि इस देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज सहिष्णुता को अपने मन में, अपनी आत्मा में आत्मसात किए हुए है। डी राजा को समझने की जरूरत है कि क्या वो ऐसा किसी और मजहब के प्रतीक के लिए कहने की हिम्मत जुटा पाएँगे। जवाब सीधा सा है नहीं, और इसकी वजह आप-हम सब जानते हैं। डी राजा ऐसे कहने वाले अकेले नहीं है।
वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ‘द हिंदू’ की पत्रकार सुहासिनी हैदर भी इससे दुखी हैं और लोगों को भी भ्रम में डालने की कोशिश कर रही हैं। हैदर ने X पर पोस्ट कर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा, “विचित्र विरोधाभास – पिछले कुछ वर्षों से अन्य सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय तिरंगा फहराने के लिए कहा गया है लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आज धार्मिक ध्वज फहराएँगे।”
Curious contradiction- shrines of all other faiths have been asked to raise the national tricolour for the past few years, but the PM and CM, who have sworn by the constitution will raise a religious flag today. pic.twitter.com/WRcB32WiYq
सुहासिनी हैदर जिस संविधान की दुहाई दे रही हैं क्या वो प्रधानमंत्री को अपना धर्म मानने से रोकता है? क्या वो देश के हर नागरिक को अपना धर्म मानने की आजादी का अधिकार नहीं देता है। सुहासिनी को मतलब ना संविधान से ना धर्म उन्हें बस मतलब अपने प्रोपेगेंडा से है। जाहिर है कि राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा सभी जगह फहराया जाता है, खुद राम मंदिर के परिसर में भी बीते 15 अगस्त 2025 को तिरंगा फहराया गया था।
रामजन्मभूमि परिसर में तिरंगा (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
इन वामपंथियों द्वारा तिरंगे को भगवा का विरोधी साबित करने की कोशिशें की जा रही हैं लेकिन वो भूल गए हैं कि भगवा हमेशा से इस राष्ट्र कि चेतना का आधार था, है और रहेगा। हालाँकि, इसके होने से तिरंगा की शान में ना कमी आती है और ना होगी।
सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबका कथित ‘बाबरी मस्जिद’ को फिर से बनाए जाने की वकालत भी कर रहा है। अयोध्या से करीब 850 किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में तो सत्तारूढ़ TMC के एक विधायक हुमायूँ कबीर ने 6 दिसंबर 2025 को बाबरी नाम की मस्जिद बनाने का एलान भी कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी ऐसे स्वर दिखे हैं। ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’ नाम के एक हैंडल ने फिर ‘बाबरी’ बनाने की बात कही है।
राम मंदिर के धर्म ध्वज से जुड़ी एक पोस्ट पर जवाब देते हुए हैंडल ने लिखा, “बाबरी का विनाश न तो हिंदुओं के लिए कोई सभ्यतागत उपलब्धि है और न ही व्यापक उम्माह के लिए, यह तो बस एक प्रतीक है जिसे हागिया सोफिया की तरह उलटा जा सकता है।” हैंडल से आगे लिखा गया, “इस बीच, पंजाब, सिंध, बंगाल और कश्मीर जैसे हिंदू सभ्यता के उद्गम स्थलों से हिंदू धर्म का सफाया हो चुका है, जिसे उलटा नहीं जा सकता।”
Loss of Babri is neither a civilisational achievement for Hindus nor L for broader Ummah, it is just a symbol which can be reversed like Hagia Sophia
राजीव निगम नाम के एक यूजर ने धर्म ध्वज की स्थापना को नौटंकी बताया है। अभिनेता अनुपम खेर ने X पर एक पोस्ट में लिखा कि हमारे जीते जी अयोध्या में हमें श्री राम मंदिर पर ध्वजारोहण समारोह का शुभ अवसर प्राप्त हुआ इससे बड़े सौभाग्य की बात क्या हो सकती है। इस पर राजीव निगम से लिखा, “फुल नौटंकी चालू आहे” यानी पूरी तरह से नौटंकी चल रही है।
सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की भरमार है जो प्रभु राम के धर्म ध्वज की स्थापना किए जाने से दुखी हैं। भारत में वामपंथी और लिबरल तो दुखी हैं ही, साथ में ही पड़ोसी देश पाकिस्तान भी रो रहा है। वो भारत पर आरोप लगाते हुए UN तक से गुहार लगाने पहुँच गया है।
पाकिस्तान भी परेशान, UN तक लगाई गुहार
देश में तो प्रोपेगेंडा फैलाने वाले परेशान हैं हीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान भी परेशान है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा बयान जारी कर राम मंदिर के धर्म ध्वज की स्थापना पर सवाल उठाए हैं।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है, “पाकिस्तान ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की जगह पर बने तथाकथित ‘राम मंदिर’ पर झंडा फहराने पर गहरी चिंता जताई है। सदियों पुरानी इबादत गाह बाबरी मस्जिद को 6 दिसंबर 1992 को फासीवादी सोच से प्रेरित कट्टरपंथी भीड़ ने गिरा दिया था।”
पाकिस्तान ने आगे कहा, “भारत में बाद की कानूनी प्रक्रिया, जिसमें जिम्मेदार लोगों को बरी कर दिया गया और गिराई गई मस्जिद की जगह पर मंदिर बनाने की इजाज़त दी गई, अल्पसंख्यकों के प्रति भारतीय सरकार के भेदभाव वाले रवैये के बारे में बहुत कुछ बताती है।” पाकिस्तान ने कहा, “भारतीय मुसलमान लगातार बढ़ते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने का सामना कर रहे हैं।”
पाक ने कहा, “UN और संबंधित इंटरनेशनल संस्थाओं को इस्लामिक विरासत की सुरक्षा और सभी माइनॉरिटीज के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा पक्का करने में एक कंस्ट्रक्टिव भूमिका निभानी चाहिए। पाकिस्तान भारत सरकार से अपील करता है कि वह मुसलमानों समेत सभी धार्मिक समुदायों की सुरक्षा पक्का करे।”
?PR No.3️⃣5️⃣0️⃣/2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣
Pakistan calls international attention to rising Islamophobia and heritage desecration in India
— Ministry of Foreign Affairs – Pakistan (@ForeignOfficePk) November 25, 2025
पाकिस्तान के दुख को समझा भी जा सकता है। वो खुद भुखमरी और गृह युद्ध जैसी स्थितियों से जूझ रहा है और फौज हर तरफ से पिट रही है। ऐसे में आवाम का ध्यान भटकाने के लिए ऐसी हरकतों का सहारा लेना पड़ रहा है। भारत के वामपंथियों की आदत ही खराब हो गई है। इस वर्ग को हर ऐसे क्षण में खामी तलाशने की आदत सी हो गई है, जैसे उन्हें भारत की आत्मा को समझना ही नहीं बल्कि उससे स्वयं को अलग रखना है।
यह वही विचारधारा है जिसने 2019 में राम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी निराशा ही जताई थी। तब भी तर्कों की लंबी फेहरिस्त पेश की गई कभी सेक्युलरिज्म खतरे में है, कभी राजनीति धर्म के बिना भी चल सकती है और कभी इतिहास मिटाया जा रहा है। पर सच यह है कि जो इतिहास मिटाया गया था, वह अब फिर से स्थापित हुआ है। जिनकी स्मृति सैकड़ों वर्षों तक दबा दी गई थी, आज वह फिर सबके हृदय में प्रफुल्लित हो रही है। यह धर्म ध्वज उसी स्मृति का प्रत्यक्ष रूप है।
आज जब ध्वज फहरा रहा है, तभी यह सदा पीड़ित लिबरल समूह उसमें भी राजनीति, बहुसंख्यक वर्चस्व, राजनीतिक हिंदुत्व जैसी चीजें ढूँढ रहा है। सवाल यह है कि जब किसी समुदाय की सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान होता है तो यह वर्ग असंतोष क्यों महसूस करता है?
ऐसा लगता है कि भारत की प्राचीन पहचान को स्वीकार करना उन्हें असुविधाजनक लगता है। यह वर्ग भूल जाता है कि राम मंदिर का निर्माण किसी सत्ता की इच्छा से कहीं आगे बढ़कर समाज की सामूहिक स्मृति और सैकड़ों वर्षों के संघर्ष का परिणाम है। आज राम मंदिर पर स्थापित धर्म ध्वज से कुछ लोगों को समस्या है, क्योंकि उन्हें यह मानना मुश्किल लगता है कि भारत का सांस्कृतिक चरित्र जाग रहा है और वह भी आत्मविश्वास के साथ। यह काल भारत के स्व: के बोध का काल है। राम मंदिर के शिखर पर फहराया यह ध्वज ‘भारत माँ’ के मस्तक पर तिलक की तरह है।
इस्लामी आतंकवाद को एक बड़ा झटका देते हुए, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसमें उनके प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) की कुछ शाखाओं को विदेशी आतंकी संगठन/फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FTO) और खासतौर पर स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट्स (SDGTs) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
इस कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट राष्ट्रपति को एक ज्वाइंट रिपोर्ट सौंपेंगे। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की किसी भी शाखा या सब-डिविजन जैसे लेबनान, जॉर्डन और मिस्र में सक्रिय चैप्टर्स को FTO और SDGT घोषित करने की बात भी शामिल होगी।
ट्रंप के पहले कार्यकाल की महत्वाकांक्षाओं को ये कदम पूरा करता है। उस दौरान उन्होंने इस आतंकी संगठन के खिलाफ समीक्षा का आदेश दिया था, लेकिन नौकरशाही विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी।
ट्रंप की ओर से मुस्लिम ब्रदरहुड की समीक्षा के आदेश को गति देने का काम कॉन्ग्रेस के दोनों पार्टियों के प्रयासों ने किया। इसमें मुस्लिम ब्रदरहुड टेररिस्ट डेजिग्नेशन एक्ट-2025 और रिपब्लिकन नेताओं का यह तर्क शामिल था कि मुस्लिम ब्रदरहुड एक ‘अंतरराष्ट्रीय इस्लामवादी संगठन’ है।
व्हाइट हाउस ने कहा है कि पूरे मुस्लिम ब्रदरहुड को एक साथ आतंकी संगठन घोषित नहीं किया जाएगा, पर ट्रंप का ये कदम अमेरिका की नीति में एक बड़ा बदलाव हो सकता है। ट्रंप का ये कदम इस समय में काफी अहम है जब वे गाजा में शांति बहाल करने की कोशिश में लगे हैं।
इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि इजरायल-फिलीस्तीन संघर्ष महज जमीन का विवाद नहीं है, बल्कि मूल रूप से धार्मिक संघर्ष है, जहाँ दोनों पक्षों के क्षेत्रीय दावे युद्ध का कारण बने हैं।
ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि फिलीस्तीनी इस्लामी आतंकी संगठन हमास ने 1988 के अपने चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ संपत्ति बताया और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने का संकल्प लिया जब तक कि आखिरी यहूदी की हत्या न हो जाए। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन मिलता रहा है और उसने 7 अक्टूबर 2023 के नरसंहार के बाद इजरायली नागरिकों और सेना पर हवाई हमले किए।
2017 के दस्तावेजों में हमास ने खुद को मुस्लिम ब्रदरहुड से दूर दिखाने की कोशिश की, ताकि मिस्र के साथ संबंध बेहतर हो सकें। उसने यहूदियों और जायोनिस्टों में फर्क करने की बात भी कही। लेकिन 2023 की हिंसा ने उसकी दोहरी नीति और यहूदियों के प्रति नफरत को सामने ला दिया। 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के पाखंड और नफरत को पूरी तरह उजागर कर दिया।
गौरलतब है कि मुस्लिम ब्रदरहुड को औपचारिक रूप से आतंकी संगठन घोषित करना अमेरिकी सरकार के लिए हमेशा ही कठिन रहा है। यह संगठन डिसेंट्रलाइज्ड है और अलग-अलग देशों में इसकी शाखाएँ हैं। इसी कारण कानूनी विशेषज्ञों और खुफिया अधिकारियों के लिए पूरे संगठन पर एक साथ आतंकी ठप्पा लगाना चुनौतीपूर्ण रहा है।
इसी वजह से ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि जरूरत पड़ने पर केवल विशिष्ट शाखाओं को ही FTO या SDGT घोषित किया जाएगा।
मुस्लिम ब्रदरहुड: सोशियो-पॉलिटिकल मूवमेंट से वैश्विक इस्लामी नेटवर्क तक
1928 में मिस्र के इस्माइलिया में स्थापित मुस्लिम ब्रदरहुड या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ आज भी दुनिया के सबसे प्रभावशाली इस्लामी राजनीतिक आंदोलनों में से एक है। इसकी स्थापना एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी।
उसने इसे पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और उस्मानी साम्राज्य के बाद इस्लामी मूल्यों के खत्म होने की आशंका के आधार पर शुरू किया था। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिक आंदोलन के रूप में शुरू किया। ये चैरिटी और इस्लामी वकालत पर केंद्रित था।
अपने शुरुआती वर्षों में मुस्लिम ब्रदरहुड ने कमजोर और उदासीन सरकारों की ओर से पैदा की गई खाइयों को भरा। इसने मिस्र में गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनाईं, साथ ही इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सर्वोच्चता) को सेक्यूलेरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) और साम्राज्यवाद का इलाज बताया।
मुस्लिम ब्रदरहुड का मकसद में एक बात साफ है कि भले ही इसकी शुरुआत हिंसा से जुड़ी न रही हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा इसका रास्ता रहा है।
मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो कहता है- “अल्लाह हमारा मकसद है, पैगंबर हमारे मार्गदर्शक हैं; क़ुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी तवक्को है।”
1930 के दशक तक मुस्लिम ब्रदरहुड (MB) के सदस्य लाखों की संख्या में पहुँच गए और उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1936 में यह इस्लामी संगठन राजनीति में उतरा, धर्मनिरपेक्ष वफ्द पार्टी का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विरोध-प्रदर्शन किए।
हालाँकि MB की पैरामिलिट्री विंग (अर्धसैनिक शाखा) ‘सीक्रेट अप्परैटस’, जिसे स्पेशल अप्परैटस या अल-निजाम अल-खास भी कहा जाता है, ने हिंसा, राजनीतिक हत्याओं और विध्वंसक गतिविधियों को अंजाम दिया।
1948 में सीक्रेट अप्परैटस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री महमूद एल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने इस्लामी संगठन पर बैन लगाया था। 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए अल-बन्ना की हत्या कर दी।
मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अप्परैटस के सदस्य कठिन शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण लेते थे। उन्हें हथियारों का इस्तेमाल और अंडरग्राउंड ऑपरेशंस को अंजाम देने की ट्रेनिंग दी जाती थी।
धोखे और गोपनीयता (तकिय्या) में खुद को पारंगत करके, इस अप्परैटस से जुड़े जिहादी राजनीतिक दलों, सेनाओं, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शैक्षिक संस्थानों और यहाँ तक कि एनजीओ में भी घुसपैठ और उसे अलग-थलग करते थे।
1966 में फाँसी की सजा पाने वाले सैयद कुत्ब के नेतृत्व में मुस्लिम ब्रदरहुड और अधिक कट्टरपंथी हो गया। अपनी लेखों, खासतौर पर माइलस्टोन्स (मा’आलिम फि अल-तारीक) के जरिए, कुत्ब ने तकफीर (मुसलमानों को धर्मत्यागी/काफिर घोषित करना) जैसी बातों को बढ़ावा दिया और कहा कि नए राष्ट्र-राज्य ‘गैर-इस्लामी’ हैं।
कुत्ब ने यह प्रोपेगेंडा भी फैलाया कि इस्लामी शरीयत कानून को पूरी तरह लागू करने में नेताओं और सरकारों की असफलता के कारण मुस्लिम दुनिया फिर से प्री-इस्लाम ‘अज्ञानता’ (जाहिलियत) की स्थिति में लौट गई है।
कुत्ब के कट्टर या अधिक शुद्ध इस्लामी कहा जाने वाला दृष्टिकोण जिहादियों के बीच व्यापक रूप से गूँजा और कई तकफीरी समूहों को प्रेरित किया। इन समूहों ने तकफीर का इस्तेमाल उन मुसलमानों की हत्या को जायज ठहराने के लिए किया जिन्हें वे धर्मत्यागी या पूरा मुसलमान नहीं मानते थे।
चाहे मिस्र का इस्लामिक जिहाद हो या बाद में अल-कायदा, सभी ने कुत्ब के जाहिलियत, तकफीर और जिहाद के उसूलों से प्रेरणा ली और गैर-मुसलमानों के साथ उन मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराया जिन्हें वे काफिर मानते थे।
मुस्लिम ब्रदरहुड की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने में अरब स्प्रिंग काफी कारगर रहा। 2012 में MB ने चुनाव जीते और मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति चुना। लेकिन 2013 में तत्कालीन जनरल अब्देल फत्ताह अल-सीसी के नेतृत्व में सैन्य तख्तापलट हुआ और मोर्सी को हटा दिया गया। इस्लामी संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया और इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया गया।
मुस्लिम ब्रदरहुड भले ही यह कहता हो कि उसने हिंसा का रास्ता छोड़कर अपने उद्देश्यों के लिए लोकतांत्रिक तरीका अपना लिया है, लेकिन वरिष्ठ स्तर पर संगठन छोड़ चुके सदस्यों और स्वतंत्र विशेषज्ञों के आकलन से संकेत मिलता है कि उसका गुप्त तंत्र अब भी छिपे हुए नेटवर्क के जरिये काम कर रहा है।
मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को राजनीतिक स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसमें काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस भी शामिल है, को ‘विदेशी आतंकी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ माना जाएगा।
यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल कर हमले की साजिश रचने वाले आंदोलन से जुड़े लोगों को गिरफ्तार करने के बाद अप्रैल में इस समूह पर बैन लगा दिया। इसी साल जनवरी में यूएई ने यूनाइटेड किंगडम-आधारित 8 संगठनों को मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया।
मुस्लिम ब्रदरहुड की बाहरी अव्यवस्थित संरचना के कारण ये अपना अस्तित्व और संचालन बनाए रखती है, जबकि इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ खड़े देशों के लिए ठोस कार्रवाई करना कठिन हो जाता है। कुल मिलाकर, मुस्लिम ब्रदरहुड ‘सोशल वेलफेयर’, राजनीति और आतंकवाद को अपनी जरूरत के अनुसार जोड़कर चलाते रहने से ही अस्तित्व में है।
मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठन घोषित करने के लिए ट्रंप की कोशिशें चुनौतियों से भरी हैं। 2013 में मिस्र के MB पर लगाए गए प्रतिबंध भले ही तुरंत राहत देने वाला कदम लगा हो, लेकिन आखिरकार इसने हिंसक और उग्रपंथी समूहों में भारी इजाफा किया। सिनाई प्रायद्वीप में सलाफी-जिहादी समूह उभर कर सामने आए, जिनमें आईएसआईएस से जुड़े गुट भी शामिल थे।
मुस्लिम ब्रदरहुड और अल जजीरा कनेक्शन
दोहा स्थित अल-जजीरा भले ही मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर से घोषित शाखा न हो, लेकिन इसे इस्लामी संगठन का चेहरा (मेगाफोन) माना जाता है। 2017 में सऊदी अरब, यूएई और मिस्र का कतर के साथ राजनयिक विवाद हुआ क्योंकि कतर पर मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास का समर्थन करने का आरोप था।
सऊदी अरब ने अल-जजीरा और उसके सहयोगी चैनलों को बंद करने की माँग भी की थी, क्योंकि उसका आरोप था कि कतर अल-जजीरा का इस्तेमाल इस्लामी उग्रवाद भड़काने और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे जिहादी संगठनों को समर्थन देने के लिए करता है। उस समय अल-जजीरा ने निर्वासित मुस्लिम ब्रदरहुड नेता यूसुफ अल-करदावी की बातें ब्रॉडकास्ट की थी।
अरब स्प्रिंग के दौरान अल-जजीरा की पक्षपाती और प्रोपेगेंडा से भरी रिपोर्टिंग को भी भूला नहीं जा सकता। जनवरी 2024 में एक यमनी-ब्रिटिश पत्रकार अदनान अल-अमेरी ने खुलासा किया कि अल-जजीरा कतर सरकार के इशारे पर मुस्लिम ब्रदरहुड का एजेंडा चलाता है।
अल-अमेरी ने इजरायली अखबार द जेरूसलम पोस्ट को बताया कि उसने दोहा में अल-जजीरा के युवा चैनल जीम (Jeem) TV के लिए काम किया। शुरुआत में उन्हें कतर मुखपत्र के इस खतरनाक एजेंडे के बारे में पता नहीं था, लेकिन 2010 के दशक के मध्य में उन्हें इसका एहसास हुआ।
उस समय अल-अमीरी का अपना देश यमन, हूतियों के कब्जे में था और यूएई और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले खाड़ी देश मिलकर बमबारी कर रहे थे। यही दोनों देश अन्य खाड़ी देशों से कतर को अलग-थलग करने के पीछे भी थे। जब यमन में गृहयुद्ध छिड़ा, तो देश का दक्षिणी हिस्सा यूएई और सऊदी अरब दोनों के प्रति सहानुभूति रखता था।
यमनी-ब्रिटिश पत्रकार ने बताया कि अल-जजीरा में काम करने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रचार को दोहराना पड़ता है। उन्होंने कहा, “जब आप उनके न्यूज़ चैनल के लिए काम करते हैं, तो उन्हें जरूरत होती है कि आप उनके मुस्लिम ब्रदरहुड एजेंडे को बढ़ावा दें और अगर आप वैचारिक रूप से उनके साथ नहीं हैं, तो वे आपको खरीदने की पूरी कोशिश की जाएगी।” अदनान अल-अमेरी ने यह भी कहा कि अल-जजीरा हमास का समर्थन करता है।
अल-जजीरा का लगातार चलता भारत विरोधी प्रोपेगेंडा
कतर स्थित इस्लामी प्रोपेगेंडा चलाने वाला अल-जजीरा भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार पक्षपाती बयानबाजी करता रहता है। चाहे 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगे हों, नागरिकता संशोधन अधिनियम या अयोध्या राम मंदिर मुद्दा, अल-जजीरा लगातार मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को गढ़ता रहा है और भारतीय हिंदू बहुमत को दोषी ठहराता रहा है।
अल-जजीरा को मुस्लिम पीड़ितत्व (विक्टिमहुड) की नकली कहानियाँ गढ़ने की आदत है जबकि वह इस्लामी आतंकवाद और उग्रवाद की असल घटनाओं को कम आंककर दिखाता है।
ऑपइंडिया ने पहले ही रिपोर्ट किया था कि अल-जजीरा ने 2002 के गोधरा नरसंहार को कम महत्व दिया, जबकि असल में 31 मुस्लिमों को साबरमती एक्सप्रेस को आग लगाने का दोषी पाया गया था। इस अग्निकांड में 59 हिंदू (ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे) मारे गए थे।
2024 में बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमलों के दौरान भी अल-जजीरा ने मुस्लिम भीड़ के हिंदुओं की हत्या, बलात्कार, घरों की लूटपाट और मंदिरों की तोड़फोड़ को ‘राजनीतिक बदला’ बताने की कोशिश की।
इस इस्लामी प्रोपेगेंडा संगठन ने भारतीय मीडिया पर भी आरोप लगाया कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों की रिपोर्टिंग करने वाले इस्लामोफोबिक हैं। अल-जजीरा कश्मीर मुद्दे पर भी भारत विरोधी भूमिका निभाता है और कश्मीरी पंडितों के कष्टों को कम आंकता रहा है।
अल-जजीरा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी झूठ फैलाता रहा है, खासकर 2002 के गुजरात दंगों को लेकर, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को पहले ही क्लीन चिट दे दी है।
इस प्रोपेगेंडा आउटलेट ने भारत और हिंदुओं के प्रति नफरत करने वाले व्यक्तियों को भी मंच दिया है। अल-जजीरा का कश्मीर पर विशेष पेज है, जहाँ वे भारत को अत्याचारी के रूप में दिखाते हैं और युद्धग्रस्त फिलीस्तीन की स्थिति के साथ इसे समानांतर दिखाने की कोशिश करते हैं।
हाल के महीनों में, अल-जजीरा ने भारत में ‘आई लव मुहम्मद’ विवाद की रिपोर्ट करते हुए तथ्य छिपाए और मुस्लिमों को उत्पीड़न का शिकार साबित करने की कोशिश की। इस वर्ष अप्रैल में, जब वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे मुस्लिम भीड़ ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंदुओं पर हमले किए तो अल-जजीरा ने इस्लामी अत्याचारों को कमतर बताया और हिंसा को वक्फ कानून के खिलाफ ‘प्रदर्शन’ के रूप में पेश करने का प्रयास किया।
इसके अलावा, मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत ने पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के अंदर इस्लामी आतंकवादी ठिकानों पर हमला किया तब अल-जजीरा ने पाकिस्तान के नैरेटिव को आगे बढ़ाया।
इसने फेक न्यूज भी चलाई कि पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना की पायलट स्क्वाड्रन लीडर शिवानी सिंह को पकड़ लिया। इेसे दोनों पक्षों ने खारिज किया और बाद में शिवानी सिंह की तस्वीर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ सोशल मीडिया पर आई, जिससे कतर के इस्लामी प्रोपेगेंडा वाले मीडिया आउटलेट के झूठ सबके सामने उजागर हो गए।
भारत में मुस्लिम ब्रदरहुड की छाया
हालाँकि मुस्लिम ब्रदरहुड का भारत में प्रत्यक्ष तौर पर कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन इसकी विचारधारा का भारत में इस्लामी संगठनों पर काफी असर पड़ा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरण दी थी।
प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन जैसे स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं पर जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों का सहारा लेते हैं।
दोनों ने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, धर्मनिरपेक्ष एजेंडे का विरोध करने और बहुसंख्यक समुदाय के साथ मुख्यधारा सरकार को ‘मुसलमानों का उत्पीड़न करने वाले’ के तौर पर पेश करने पर भरोसा किया।
कई कश्मीरी इस्लामी आतंकी संगठन भी मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रभावित बताए जाते हैं, जिसने ऐतिहासिक रूप से अलगाववादी आंदोलनों का समर्थन किया है और भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा दिया है। बौद्धिक ढाँचा उपलब्ध कराने के अलावा, मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े समूहों के बारे में यह भी बताया गया है कि वे भारत-विरोधी जिहादी लोगों को आर्थिक और प्रोपेगेंडा को बढ़ाने वाली सहायता देते हैं।
2021 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने भारत के खिलाफ़ #BoycottIndianProducts अभियान शुरू किया, जिसका लक्ष्य भारत के आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाना था। यह अभियान सोशल मीडिया पर उस समय शुरू हुआ जब असम में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ चलाए गए बेदखली अभियान के दौरान हिंसा हुई थी, क्योंकि कुछ अतिक्रमणकारियों ने पुलिस पर हमला कर दिया था।
इस घटना के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए, पाकिस्तान और तुर्की, मिस्र और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों के लोगों ने भारत में बने उत्पादों का बहिष्कार करने का अभियान शुरू किया।
जाहिर तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े कई मीडिया संस्थानों ने इस भारत-विरोधी अभियान को बढ़ावा देने वाले ‘समाचार लेख’ भी प्रकाशित किए। इनमें अल-जजीरा भी शामिल है।
2023 में मुस्लिम ब्रदरहुड ने इस्लामी पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने भारत की छवि खराब करने की साजिश रची। उस समय डिजिटल फॉरेंसिक्स, रिसर्च एंड एनालिटिक्स सेंटर (DFRAC) ने रिपोर्ट किया कि मुस्लिम ब्रदरहुड खाड़ी देशों में काम करने वाले हिंदुओं के खिलाफ भी बदनाम करने वाला अभियान चलाता है।
इस्लामी आतंकवाद से निपटने में डोनाल्ड ट्रम्प का दोहरा रवैया साफ दिखाई देता है। वह सीरिया के नामित आतंकी-से-राजनीतिज्ञ बने शारा और पाकिस्तान की इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाली फौज द्वारा चलने वाली व्यवस्था को समर्थन देते हैं, जबकि मुस्लिम ब्रदरहुड के खिलाफ कार्रवाई करते हैं।
हालाँकि, मुस्लिम ब्रदरहुड पर समीक्षा के बाद ट्रम्प की कार्रवाई भारत को इस्लामी आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाले विदेशी नेटवर्क के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है।
ये रिपोर्ट मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ
26 नवंबर हर भारतीय के लिए बहुत गौरवशाली दिन है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था। इसलिए एक दशक पहले, साल 2015 में NDA सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था।
हमारा संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है, जो निरंतर देश के विकास का सच्चा मार्गदर्शक बना हुआ है। ये भारत के संविधान की ही शक्ति है जिसने मुझ जैसे गरीब परिवार से निकले साधारण व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर पहुँचाया है। संविधान की वजह से मुझे 24 वर्षों से निरंतर सरकार के मुखिया के तौर पर काम करने का अवसर मिला है। मुझे याद है, साल 2014 में जब मैं पहली बार संसद भवन में प्रवेश कर रहा था, तो सीढ़ियों पर सिर झुकाकर मैंने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को नमन किया। साल 2019 में जब चुनाव परिणाम के बाद मैं संसद के सेंट्रल हॉल में गया था, तो सहज ही मैंने संविधान को सिर माथे लगा लिया था।
संविधान दिवस पर हम डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद समेत उन सभी महान विभूतियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अपना अहम योगदान दिया है। डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर की भूमिका को भी हम सभी याद करते हैं, जिन्होंने असाधारण दूरदृष्टि के साथ इस प्रक्रिया का निरंतर मार्गदर्शन किया। संविधान सभा में कई प्रतिष्ठित महिला सदस्य भी थीं, जिन्होंने अपने प्रखर विचारों और दृष्टिकोण से हमारे संविधान को समृद्ध बनाया।
साल 2010 में जब संविधान के 60 वर्ष हुए थे, तब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। हमने संविधान के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट करने के लिए एक प्रयास किया। 2010 के उस साल में गुजरात में ‘संविधान गौरव यात्रा’ निकाली गई थी। इस पवित्र ग्रंथ की प्रतिकृति को एक हाथी के ऊपर रखकर मैंने उस भव्य यात्रा की अगुवाई की थी।
जब संविधान के 75 वर्ष पूरे हुए, तो ये हमारी सरकार के लिए ऐतिहासिक अवसर बनकर आया। हमें देशभर में विशेष अभियान चलाने का सौभाग्य मिला। संविधान के 75 वर्ष होने पर हमारी सरकार ने संसद का विशेष सत्र आयोजित किया और राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान भी चलाया। ये अभियान जन-भागीदारी का बड़ा उत्सव बन गया।
इस वर्ष का संविधान दिवस कई कारणों से विशेष है:
यह वर्ष सरदार पटेल जी और भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती का है। सरदार पटेल जी के नेतृत्व और सूझबूझ ने देश का राजनीतिक एकीकरण सुनिश्चित किया। ये सरदार पटेल जी की ही प्रेरणा है जिसने हमारी सरकार को जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 की दीवार गिराने के लिए प्रेरित किया। आर्टिकल 370 हटने के बाद वहां भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है और लोगों को संविधान प्रदत्त सभी अधिकार मिले हैं।
भगवान बिरसा मुंडा जी का जीवन आज भी हमें जनजातीय समुदाय के लिए न्याय, गरिमा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है।
इस साल हम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव भी मना रहे हैं। वंदे मातरम हर दौर में प्रासंगिक रहा है। इसके शब्दों में हम भारतीयों के सामूहिक संकल्प की गूंज निरंतर सुनाई देती रही है। इस वर्ष हम श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के 350वें वर्ष को भी मना रहे हैं। उनका जीवन और शहादत की गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है।
इन सभी का जीवन हमें उस कर्तव्य को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है, जिसे हमारे संविधान ने भी सबसे अहम बताया है। हमारे संविधान का आर्टिकल 51A मौलिक कर्तव्यों को समर्पित है। ये कर्तव्य हमें सामाजिक और आर्थिक प्रगति प्राप्त करने का रास्ता दिखाते हैं। महात्मा गाँधी ने हमेशा नागरिकों के कर्तव्यों पर बल दिया था। वे मानते थे कि जब हम ईमानदारी से कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो हमें अधिकार भी स्वत: मिल जाते हैं।
देखते ही देखते इस सदी के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब आने वाला समय हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण है। साल 2047 तक आजादी के 100 वर्ष हो जाएँगे। साल 2049 में संविधान निर्माण के 100 वर्ष पूरे हो जाएँगे। हम आज जो नीतियाँ बनाएँगे, जो निर्णय लेंगे, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों पर…आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। हमारे सामने विकसित भारत का लक्ष्य है इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए ही आगे बढ़ना है।
हमें राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा। देश ने हमें कितना कुछ दिया है। इसके लिए हम सबके मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। जब हम इस भावना से जीवन जीते हैं, तो कर्तव्य अपने आप जीवन का स्वभाव बन जाता है। अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए हमें अपने हर काम को पूरी क्षमता और पूरी निष्ठा से करने का प्रयास करना होगा। हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ाने वाला हो। हमारा हर कार्य देशहित से जुड़े उद्देश्यों को पूरा करने वाला हो। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो सपने देखे थे, उन्हें पूरा करने का दायित्व हम सबका है। जब हम अपने काम को कर्तव्य की भावना के साथ करेंगे तो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी।
संविधान ने हमें मतदान का अधिकार दिया है। एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि मतदान का कोई अवसर छोड़े नहीं। हमें 26 नवंबर को स्कूलों में, कॉलेजों में उन युवाओं के लिए विशेष सम्मान समारोह आयोजित करने चाहिए, जो 18 वर्ष के हो रहे हैं। हमें उन्हें यह महसूस कराना चाहिए कि वे अब केवल छात्र या छात्रा नहीं, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी हैं। स्कूलों में हर वर्ष 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान करने की परंपरा विकसित होनी चाहिए। जब हम इस तरह युवाओं में जिम्मेदारी और गर्व का भाव जगाएंगे, तो वे जीवनभर लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति समर्पित रहेंगे। यही समर्पण एक सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।
आइए, इस संविधान दिवस पर हम अपने महान राष्ट्र के कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में अपने दायित्वों का पालन करने का संकल्प दोहराएँ। ऐसा करके ही हम विकसित और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान दे सकेंगे।
ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल किया गया घातक हथियार Hammer का उत्पादन अब भारत में होगा। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत ये रक्षा उपक्रम के क्षेत्र में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसके अलावा Katana weapon भारतीय सेना को मिलने वाला है। इसके लिए भारत की एक रक्षा कंपनी ने फ्रांस-जर्मनी की रक्षा कंपनी KNDS के साथ समझौता किया है। ये दोनों हथियार अचूक निशाना लगाने के लिए मशहूर हैं।
भारत ने कई ऐसे समझौते किए हैं जिसका मकसद तकनीक हासिल करना और भारत में हथियारों का निर्माण है। राफेल के पार्ट्स ‘फ्यूजलाज’ के उत्पादन के लिए हैदराबाद में संयंत्र लग रहे हैं। इसके लिए डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड के बीच समझौता हुआ है।
फ्रांस की कंपनी सेफ्रान और डीआरडीओ के बीच 120 KN शक्ति वाला स्वदेशी जेट इंजन विकसित करने पर समझौता हुआ है, जिसकी तकनीकि भारत को ट्रांसफर की जाएगी। यानी निकट भविष्य में भारत में ऐसे इंजन का उत्पादन भी शुरू हो जाएगा, जो पाँचवी पीढ़ी के फाइटर जेट में इस्तेमाल होगा।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ में दिखा Hammer का जलवा
पहले बात करते हैं Hammer की। भारत और फ्रांस के बीच राफेल के सबसे खुँखार हथियार Hammer को लेकर डील पक्की हो गई है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड यानी BEL और फ्रांस की साफ्रान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस ने मिलकर Hammer को भारत में ही बनाने का फैसला किया है।
एयरो इंडिया 2025 के दौरान फरवरी में दोनों कंपनियों ने एमओयू साइन किया था। लेकिन अब दोनों ने मिलकर ज्वाइंट वेंचर कंपनी यानी जेवीसी बनाने पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ये कंपनी प्राइवेट लिमिटेड होगी जिसमें दोनों का शेयर 50-50 फीसदी होगा। नई कंपनी हैमर के निर्माण, आपूर्ति और दीर्घकालिक रखरखाव की जिम्मेदारी संभालेगी।
BEL के सीएमजी मनोज जैन और साफ्रान के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट अलेक्जेंडर जिग्लर ने समझौते पर साइन किए। इस दौरान रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार और सफरान के सीईओ ओलिवियर एंड्रीज मौजूद थे।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में ये एक अहम कदम है।
अचूक निशाने के साथ जरूरत के मुताबिक बदल लेता है टारगेट
HAMMER यानी Highly Agile Modular Munition Extended Range का इस्तेमाल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारतीय सेना ने किया। इसके सटीक टारगेट से पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया। इसकी बनावट ऐसी है कि इसे हल्के फाइटर प्लेन तेजस से लेकर राफेल तक में आसानी से फिट किया जा सकता है। ये बेहद सटीक और लंबी दूरी का एयर टू ग्राउंड हथियार है।
खराब मौसम, धुंध हो या देर रात का अंधेरा, हैमर की गाइडेंस तकनीक उसे टारगेट पर निशाना लगाने में मदद करती है। राफेल के साथ इसे ज्यादातर फिट किया गया है। फ्रांस का ये सबसे आधुनिक एयर टू ग्राउंड स्मार्ट बम है। ये दुश्मन के बंकर, कमांड सेंटर, रडार और पुलों को 70 किलोमीटर दूर से भी उड़ा सकता है। ये उड़ते हुए भी अपना रास्ता बदल सकता है और जैमिंग की परवाह नहीं करता।
HAMMER (फोटो साभार- NDTV)
इसकी खासियत यह भी है कि कम ऊँचाई से छोड़े जाने पर भी ये उतने ही घातक तरीके से टारगेट पर हिट करता है। भारत में इसका उत्पादन होने पर सेना को जल्दी जल्दी ये हथियार मिल पाएगी और लागत भी कम आएगा।
HAMMER के 60 फीसदी स्वदेशीकरण का टारगेट
शुरुआत में कुछ पार्ट्स फ्रांस से आएँगे। धीरे-धीरे हैमर के 60 फीसदी पार्ट्स का उत्पादन भारत में ही होगा। इनमें इलैक्ट्रॉनिक्स, मैकेनिकल और सब एसेम्बली से जुड़े पार्ट्स शामिल हैं। इसकी क्वालिटी, एसेम्बली और टेस्टिंग BEL करेगी। इसका फायदा ये होगा कि सेना को सप्लाई करना आसान होगा। खर्च कम लगेंगे। भारत में पार्ट्स के बनने पर नई नौकरियाँ निकलेंगी। भारत का पैसा विदेश नहीं जाएगा। तेजस को भी हैमर का साथ आसानी से मिल जाएगा।
भविष्य में कटाना हथियार भी भारतीय बेड़े में शामिल होगा। भारत की रक्षा और एयरोस्पेस कंपनी ने सेना को आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराने के मकसद से फ्राँस-जर्मन रक्षा समूह के साथ 20 नवंबर 2025 को समझौता किया। समझौते के मुताबिक, दोनों कंपनियाँ भारतीय सेना को कटाना हथियार की आपूर्ति करेगी।
कटाना प्रिसिजन-गाइडेड हथियार मिलेगा सेना को
कटाना एक 155 मिमी का प्रिसिजन-गाइडेड हथियार है, जिसे फ्रांस‑जर्मनी की रक्षा कंपनी KNDS ने विकसित किया है। भविष्य में भारतीय सेना को एडवांस और सटीक तोपखाना गोला‑बारूद उपलब्ध कराने के लिए केएनडीएस के साथ भारत की रक्षा कंपनी SMPP ने समझौता किया है। कटाना की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सटीकता है, यानी यह दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों पर सटीक वार कर सकता है। इसमें लगा नेविगेशन सिस्टम इसे राह दिखाता है।
कंपनी आधुनिक तोपखाना सिस्टम का भी निर्माण करेगी। बताया गया है कि एसएमपीपी और उसकी सहयोगी कंपनियाँ मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के लिए कटाना हथियार भारतीय सेना को उपलब्ध कराएँगे। साथ ही देश में आधुनिक तोपखाना, गोला-बारूद बनाएँगे।
कटाना बैलिस्टिक रेंज, एक्सटेंडेड रेंज और हाई प्रिसिजन जैसे अलग‑अलग मॉडल में उपलब्ध है। इसका तोपखाना और गोला-बारूद भारतीय सेना की मौजूदा 155 मिमी तोपों के साथ आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सेना की आक्रामक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। ये समझौता ऐसे वक्त हुआ है, जब सेना को आधुनिक तोपखाना और गोला- बारूद की सख्त जरूरत है।
‘राफेल सपोर्ट हब’ बन सकता है भारत
यूरेशियन टाइम्स में भारत के पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का एक लेख छपा है। इसमें भारत के राफेल फाइटर जेट के ग्लोबल हब बनने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। अनिल चोपड़ा के मुताबिक, भारतीय सेना ने 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल खरीदने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजा है। भारत अगर 114 राफेल खरीदता है तो वो एफ4 वैरिएंट होंगे। भारत के पास फिलहाल राफेल F3R वैरिएंट है, जिसे और अपग्रेड किया गया है।
इसमें करीब 2 लाख करोड़ रुपए यानी 22 अरब डॉलर का खर्च होगा। अगर ये ऑर्डर दे दिया जाता है तो देश के इतिहास में ये सबसे बड़ा डिफेंस डील होगा। वायुसेना के पास फिलहाल 36 राफेल हैं और 26 मरीन राफेल का ऑर्डर नौसेना के लिए कर दिया गया है। ये मरीन परमाणु हथियारों को ढोने में सक्षम होंगे।
एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के मुताबिक, राफेल विमानों के फ्यूजलाज का भारत में निर्माण शुरू होने वाला है। इसके लिए डसॉल्ट एविएशन और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड यानी टीएएसएल के बीच जून 2025 में समझौता हुआ। हैदराबाद में फ्यूजलाज बनाने के लिए संयंत्र लगाया जा रहा है। ये पहला मौका है जब राफेल से जुड़ा कोई पार्ट्स फ्रांस के बाहर बन रहा है।
राफेल का फ्यूजलाज (फोटो साभार-Thibaud MORITZ / AFP)
बताया जा रहा है कि साल 2028 तक हर महीने 2 फ्यूजलाज बनने यहाँ शुरू हो जाएँगे। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को नई ताकत मिलेगी। डसॉल्ट पहले ही टाटा के साथ मिलकर हर साल 25 फ्यूजलाज बनाने पर सहमत हो चुका है। इसके अलावा भारत में एक एमआरओ प्लांट, एम-88 इंजनों के ओवरहॉल की सुविधा भी विकसित की जा चुकी है।
दुनियाभर में राफेल की बढ़ती माँगों को देखते हुए माना जा रहा है कि निकट भविष्य में भारत एशिया में ‘राफेल सपोर्ट हब’ बन जाएगा
फ्रांस के साथ मिलकर एडवांस इंजन बनाने की तैयारी
अनिल चोपड़ा के मुताबिक, फ्रांस की कंपनी सेफ्रान और डीआरडीओ ने संयुक्त इंजन कार्यक्रम शुरू करने पर सहमति जताई है। इसके तहत 120 KN शक्ति वाला स्वदेशी जेट इंजन विकसित किया जाएगा। भारत इसका इस्तेमाल पाँचवी पीढ़ी के फाइटर प्लेन AMCA के लिए करेगा।
सफ्रान ने 100 फीसदी तकनीक ट्रांसफर को मंजूरी दे दी है। इसमें अहम क्रिस्टल ब्लेड तकनीक भी शामिल है। धीरे धीरे इंजन की क्षमता 140KM तक किया जाएगा। दुनियाभर में अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस के पास ऐसे इंजन वाले फाइटर जेट हैं। चीन भी अब तक पाँचवी पीढ़ी का फाइटर जेट नहीं बना पाया है। उसे भी 5-7 साल अभी और लग सकते हैं।