देश में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक स्वार्थ में से क्या ज़्यादा जरूरी है। चुनाव आयोग द्वारा चलाई जा रही मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के डर से, हजारों अवैध बांग्लादेशी नागरिक अपना बोरिया-बिस्तर लेकर देश छोड़कर भाग रहे हैं। पश्चिम बंगाल के हाकिमपुर बॉर्डर पर 500 से अधिक लोग फँसे हुए हैं, क्योंकि बांग्लादेश के अधिकारी उन्हें वापस नहीं आने दे रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक भारी हंगामा किया और ‘लोकतंत्र पर हमला’ बताया, आज वही प्रक्रिया बिना किसी विवाद के देश से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकाल रही है।
घुसपैठियों का ‘उल्टा पलायन’: SIR ने दिखाया आईना
पश्चिम बंगाल के हाकिमपुर बॉर्डर आउटपोस्ट पर पिछले कुछ दिनों से असामान्य हलचल देखी जा रही है। लोगों का समूह, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं जल्दबाजी में अपने घर छोड़कर बांग्लादेश लौटने की कोशिश कर रहे हैं। BSF अधिकारी इसे ‘रिवर्स एक्सोडस’ या ‘उल्टा पलायन’ कह रहे हैं। ये वे लोग हैं जो कई सालों से कोलकाता के उपनगरों जैसे हावड़ा, न्यू टाउन और साल्ट लेक में छिपकर रह रहे थे।
इन भागने वाले लोगों के बयान खुद उनकी अवैधता साबित करते हैं। अब्दुल मोमिन नाम के एक अवैध प्रवासी ने बताया कि वह एक दलाल को पैसे देकर भारत आया था। उसने कहा, “जब SIR शुरू हुआ तो डर लगने लगा।” वहीं, एक अन्य महिला तकलीमा खातून ने कहा कि वह एक दशक से घरेलू सहायक का काम कर रही थी, लेकिन ‘मेरे पास कोई दस्तावेज नहीं हैं। अब मैं सतखीरा (बांग्लादेश) लौटना चाहती हूँ।’ उनके इस डर की असली वजह यही है कि उनके पास भारतीय नागरिकता का कोई कानूनी सबूत नहीं है।
VIDEO | West Bengal: In view of the SIR, a large numbers of Bangladeshi nationals, who had been living in Bengal for over 13 years are now lining up at Hakimpur, a border region between India and Bangladesh in West Bengal, waiting to return to their home country.
BSF ने इन लोगों को भारत की सीमा में वापस आने से रोक दिया है, जबकि बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) उन्हें अपने देश में घुसने नहीं दे रहे। नतीजतन, 500 से ज़्यादा लोग जीरो लाइन पर फँसकर रह गए हैं। यह घटना स्पष्ट करती है कि SIR, CAA और NRC जैसी प्रक्रियाएँ देश की सुरक्षा और अवैध लोगों की पहचान के लिए कितनी जरूरी हैं।
विपक्ष का हंगामा: ‘वोट चोरी’ का शोर और राजनीतिक हथकंडे
SIR प्रक्रिया, जो कानूनी रूप से मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए चलाई जाती है, उसे विपक्षी दलों ने ‘लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा हमला’ बताया। बिहार में यह प्रक्रिया शुरू होते ही विपक्ष ने चालें चलना शुरू कर दिया। उन्होंने पटना हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस पर रोक लगाने की माँग की, हालाँकि कोर्ट ने SIR पर रोक लगाने से मना कर दिया।
विपक्षी दलों ने चुनावी रैलियों में इस प्रक्रिया के खिलाफ गलत जानकारी फैलाई। राहुल गाँधी ने अपनी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान SIR को मुख्य मुद्दा बनाया और इसे ‘चुनावी धोखा’ और ‘वोट चोरी की साजिश’ करार दिया।
राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में काम कर रहा है। तमिलनाडु में सीएम स्टालिन ने भी इसे वोट चुराने की योजना बताया। यह पूरा विरोध केवल राजनीतिक माहौल खराब करने और सत्य से ध्यान भटकाने के लिए था।
विरोधाभास देखिए, जिस विपक्ष ने SIR को ‘साजिश’ बताया, वह आज तक एक भी लिखित शिकायत दर्ज नहीं करा पाया कि किसी वैध मतदाता का नाम जानबूझकर गलत तरीके से हटाया गया हो। उनका असली मकसद मतदाता सूची की शुद्धता नहीं, बल्कि चुनावी माहौल में आयोग की साख पर चोट करना है। वे जानते हैं कि अवैध घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से बाहर करने पर उनका वोट बैंक खतरे में आ जाएगा।
SIR: लोकतंत्र की शुद्धि और सच की जीत
चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया को पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी बताया। यह प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाताओं के पंजीकरण नियम, 1960 के तहत चलती है। बिहार में SIR के तहत 65 लाख नाम हटाए गए थे (जिनमें मृत, पलायन कर चुके और डुप्लीकेट नाम थे)। आयोग ने स्पष्ट किया कि नाम हटाए जाने के बाद भी इच्छुक नागरिकों के पास ‘दावे और आपत्तियाँ’ दर्ज कराने का पूरा अधिकार है।
SIR की जाँच में ऐसे कई मामले सामने आए जहाँ सालों से लापता या मृत माने जा रहे लोग ‘जिंदा’ पाए गए, जब उनका नाम वोटर लिस्ट से हटने पर उन्होंने जाँच के लिए आवेदन किया। इस प्रक्रिया ने उन लोगों को भी अपनी पहचान साबित करने का मौका दिया जो किसी कारणवश सूची से बाहर थे, लेकिन यह उन अवैध घुसपैठियों को बाहर करने में सफल रहा जो पहचान छुपाकर देश में रह रहे थे। SIR ने दिखाया कि निष्पक्ष प्रक्रिया डर केवल उन्हें पैदा करती है जो कानूनी रूप से गलत हैं।
SIR, CAA और NRC जैसी प्रक्रियाएँ देश की सुरक्षा, संसाधनों की रक्षा और स्वच्छ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। विपक्षी दलों का SIR के खिलाफ खड़ा होना केवल उनके राजनीतिक स्वार्थ और अवैध वोट बैंक को बचाने की कोशिश है।
पश्चिम बंगाल बॉर्डर पर अवैध बांग्लादेशियों का यह ‘उल्टा पलायन’ दिखाता है कि सत्य की जीत हुई है और देश के नियम-कानून को हल्के में नहीं लिया जा सकता। देश को सबसे पहले असली नागरिकों के हितों की रक्षा करनी चाहिए, न कि अवैध घुसपैठियों के।
‘RJD के माल हई रे’ और ‘यादव का माल हई रे’ जैसे गाने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों में खूब चर्चा में रहे। केवल यही नहीं राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मण जाति पर भी ऐसे गाने बने हैं, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हैं। ऐसे गानों ने बिहार में जातिवाद फैलाने की कोशिश की, जिससे समाज में नफरत फैलती है।
जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाले ऐसे गाने समाज में भेदभाव को हवा देते हैं। खासकर चुनावों के समय सोशल मीडिया और लोक-कार्यक्रमों में ऐसे गानों का इस्तेमाल बढ़ जाता है। इससे चुनाव केवल जातिवाद के केंद्र में सिमटकर रह जाते हैं। इन जातिगत गानों से समाज को प्रभावित होने से बचाने की जरूरत है।
कौन-कौन से जातिवादी गाने बनाए गए?
बिहार में ऐसे कई गानें बने हैं, जिनसे केवल एक खास जाति को निशाना बनाया गया है। इनमें यादव, ब्राह्मणों, राजपूत, भूमिहार से लेकर सभी जाति के गाने बनाए गए हैं। ये गाने जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं। कुछ जातिवाद फैलाने वाले लोकप्रिय गाने हैं-
ऐसे जातिगत गाने प्रचलित भी जल्दी हो जाते हैं। इनकी वजह है बिहार का डीजे कल्चर, खासकर शादी-ब्याह, जुलूस और चुनावी रैलियों में बजने वाले गानों का प्रभाव बेहद व्यापक होता है। जब ऐसे अवसरों पर जातिगत गाने तेज आवाज में बजाए जाते हैं तो वे सुनने वालों के दिमाग में अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ और दूसरी के लिए ‘नीचा’ वाला भाव जागृत करते हैं।
चुनाव के समय राजनीतिक दलों के समर्थक ऐसे गानों की रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाकर शेयर करते हैं ताकि अपनी जाति के मतदाताओं पर प्रभाव छोड़ सकें। ये वीडियो इंस्टाग्राम, फेसबुक, रील्स जैसे प्लैटफॉर्म पर जल्दी वायरल होते हैं और वोटरों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं।
वहीं शादी समारोह जैसे सार्वजनिक अवसरों पर ये गाने डीजे या चलती धुन के रूप में बजाए जाते हैं। इन्हें लोकल सिंगर्स और स्टेज आर्टिस्ट गाते हैं, जिन्हें गानों में जातिगत संदर्भ जोड़ने का फायदा होता है क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता और पहचान बढ़ती है।
इससे भी अधिक चुनावी माहौल में इन गानों का गहरा असर आम जनता पर पड़ता है। चुनावी माहौल में राजनीतिक दल इन जातिगत गानों से जाति के आधार पर अपने मतदाताओं को आकर्षित करते हैं। ये सब ‘जाति-आधारित संदेश’ फैलाने से शुरू होता है, जो समाज में जहर बनकर सामने आता है।
जातिगत गीतों से समाज में क्या समस्या हो रही है?
सोशल मीडिया के जमाने में इन जातिगत गानों का चलन बढ़ता जा रहा है। शॉर्ट वीडियो की ‘डोज’ के साथ ये गाने लाखों लोगों के बीच वायरल हो जाते हैं। और जिन जाति के गाने होते हैं, वे एक-दूसरे के खिलाफ नफरत पर उतर पड़ते हैं। नतीजा यह होता है कि एक पढ़ा-लिखा सामान्य युवक और स्कूली बच्चे तक इन गीतों की भाषा में सोचने लगते हैं। इससे समाज न सिर्फ विभाजित होता है बल्कि लोगों के बीच प्रतिद्विंदी वाली भावना भी पनपने लगती है।
समस्या केवल इन जातिगत गानों को बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों को इन्हें स्वीकारना इससे भी खतरनाक है। जब जाति आधारित गानों को लाखों व्यूज मिलते हैं, जब उन्हें रील्स में बार-बार इस्तेमाल किया जाता है और जब आम लोग इन्हें जोश के नाम पर आगे बढाते हैं, तो यह दिखाता है कि जातिवाद सिर्फ राजनीति का हिस्सा नहीं रहा बल्कि यह मनोरंजन का साधन बन चुका है।
कई बार इन जातिगत गानों पर आपत्ति भी जताई गई है। नेहा सिंह राठौर, गुंजन सिंह, समर सिंह जैसे कलाकारों के खिलाफ जातिवादी या उकसावे वाले गानों को लेकर कानूनी शिकायत भी दर्ज हुई है। क्योंकि उनके गानों को जातिवाद-विशुद्ध (Casteist) पाया गया। लेकिन ये जातिगत गाने कार्रवाई तक सीमित नहीं है, इनका सोशल मीडिया दर्शकों में गहरा प्रभाव पड़ चुका है। यह वो कंटेन्ट है जो कहीं न कहीं से उभरकर सामने आ ही जाता है।
जातिगत गीतों के प्रभाव से कैसे बचा जाए?
जातिगत गीतों पर प्रतिबंध लगाना ही केवल इस समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि इसके प्रभाव से भी लोगों को बचाने की जरूरत है। सरकार को निश्चित रूप से ऐसे कन्टेंट पर नजर रखनी चाहिए और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा ताकि जाति के प्रति उकसावे वाले गीत तेजी से फैल ही न सकें।
लेकिन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी समाज में बैठे आम लोगों की है। जब तक लोग ऐसे गानों को मनोरंजन मानकर उन्हें व्यूज, लाइक्स और शेयर करते रहेंगे तब तक मनोरंजन के बड़े चेहरे और राजनीतिक दल जनता को जातिगत गीतों से निशाना बनाते रहेंगे।
फिलहाल इसका निदान शिक्षा और जागरूकता है। समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों को बैठक बुलानी चाहिए और इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। आम लोगों में संदेश फैलाना चाहिए कि जातिगत गीत कोई मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के लिए जहर है।
टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने मंगलवार (18 नवंबर 2025) को काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) को राज्य कानून के तहत विदेशी आतंकवादी संगठन और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन घोषित कर दिया। इस घोषणा में CAIR को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ सूचीबद्ध किया गया है, जिसे एबॉट ने इसका उत्तराधिकारी संगठन बताया।
इस फैसले के बाद दोनों संगठनों पर टेक्सास में जमीन खरीदने-बेचने पर रोक लग गई है। इसके अलावा इन संगठनों की किसी भी तरह से मदद करने वालों के लिए कड़ी नागरिक और आपराधिक सजाओं का रास्ता भी खुल गया है।
स्रोत: एक्स
घोषणा में क्या कहा गया है?
गवर्नर एबॉट के आदेश में सबसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के इतिहास और विचारधारा का उल्लेख किया गया। इसमें इसे एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिस्ट आंदोलन बताया गया, जिसकी नींव हथियारबंद जिहाद और शरिया कानून लागू करने वाले वैश्विक खिलाफत के लक्ष्य पर रखी गई थी।
एबॉट ने इसके संस्थापक हसन अल-बन्ना और बाद में इसके सुप्रीम गाइड मोहम्मद बदी के बयानों का हवाला देकर कहा कि संगठन के उद्देश्यों में लगातार यही सोच बनी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि मुस्लिम ब्रदरहुड का नेटवर्क दुनिया भर में फैला है, जिसमें हमास भी शामिल है, जो इसका फ़िलिस्तीनी शाखा के रूप में शुरू हुआ था।
इसके बाद आदेश में CAIR का जिक्र किया गया और इसे अमेरिका में मौजूद मुस्लिम ब्रदरहुड के नेटवर्क का हिस्सा बताया गया। एबॉट ने इसके लिए फेडरल जाँचों, होली लैंड फ़ाउंडेशन टेरर फाइनेंसिंग केस के कानूनी निष्कर्षों और कई शैक्षणिक अध्ययनों का हवाला दिया, जिनमें CAIR के हमास और उससे जुड़े ढाँचे के साथ संबंध बताए गए थे।
आदेश में यह भी कहा गया कि 2008 में FBI ने CAIR के साथ अपने आधिकारिक संबंध खत्म कर दिए थे, और 2023 में बाइडेन प्रशासन ने भी कुछ संघीय दस्तावेजों से CAIR से जुड़े उल्लेख हटा दिए थे।
घोषणा का सबसे बड़ा हिस्सा उन CAIR से जुड़े व्यक्तियों पर केंद्रित था, जिन्हें बाद में आतंकवाद से जुड़े अपराधों में पकड़ा गया या उजागर किया गया। एबॉट ने इन मामलों को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया ताकि यह दिखाया जा सके कि CAIR सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ढाँचा चरमपंथी नेटवर्कों से परिचालन स्तर पर भी जुड़ा हुआ है।
घोषणा में CAIR से जुड़े व्यक्तियों का उल्लेख
घोषणा में कई ऐसे लोगों के नाम दर्ज किए गए जो कभी CAIR के नेतृत्व, स्टाफ या फंडरेज़िंग नेटवर्क का हिस्सा रहे थे और बाद में आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए या आरोपित हुए। एबॉट ने कहा कि यह एक लंबे समय से चल रहा पैटर्न है कि CAIR ऐसे लोगों को अपने संगठन में महत्वपूर्ण जगह देता रहा है जिनके आतंकवादी संगठनों से सक्रिय संबंध रहे हैं।
सबसे प्रमुख नाम घसान इलाशी का था, CAIR टेक्सास के संस्थापक बोर्ड सदस्य और होली लैंड फाउंडेशन के कोषाध्यक्ष। उन्हें 2009 में आतंक वित्तपोषण के लिए दोषी ठहराया गया था और 65 साल की सजा मिली थी।
दूसरा नाम अब्दुरहमान आलामूदी का था, जिसने CAIR द्वारा आयोजित एक रैली में भाषण दिया था और खुद को हमास और हिज्बुल्लाह का समर्थक बताया था। बाद में वह अल-कायदा को फंडिंग करने का दोषी पाया गया।
तीसरा नाम रैंडल टॉड रोयर का था, जो CAIR में कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट और सिविल-राइट्स कोऑर्डिनेटर था। उसे 2004 में अल-कायदा और तालिबान की मदद की साजिश के लिए 20 साल की जेल हुई।
इसके बाद नाम आया बासेम खाफागी का, जो CAIR में कम्युनिटी रिलेशंस डायरेक्टर था। उसने 2003 में बैंक और वीजा फ्रॉड की बात कबूल की थी और उस पर पैसा कट्टरपंथी संगठनों को भेजने और अमेरिका पर आत्मघाती हमलों को बढ़ावा देने वाली सामग्री प्रकाशित करने के आरोप थे।
घोषणा में रबीह हद्दाद का नाम भी था, जो CAIR के लिए फंड जुटाता था। उसे ग्लोबल रिलीफ फ़ाउंडेशन के मामले में गिरफ्तार किया गया और बाद में देश से निकाला गया। यह संगठन 2002 में अल-कायदा को फंडिंग के चलते बंद किया गया था।
सूची में मुथन्ना अल-हनूटी का नाम भी शामिल था, मिशिगन का CAIR डायरेक्टर, जिसे 2011 में इराक के दो लाख बैरल तेल लेने और सद्दाम हुसैन की मदद के लिए प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में दोषी ठहराया गया।
एक और बड़ा नाम सामी अल-अरियान का था, पीआईजे (पैलेस्टीनियन इस्लामिक जिहाद) का फाइनेंसर और दोषी आतंकवादी। CAIR ने उसे 2014 में ‘Promoting Justice Award’ दिया था और 2020 के एक कार्यक्रम में भी उसे मंच दिया, जहाँ उसने CAIR का समर्थन बढ़ाने की अपील की।
घोषणा में निहाद अवाद का जिक्र था, CAIR के लंबे समय से कार्यकारी निदेशक। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले पर खुशी जताई थी। इन गंभीर आरोपों और नामों के जवाब में CAIR ने ग्रेग एबॉट को कोर्ट में घसीटने की धमकी दी और उन्हें इजराइल फर्स्ट राजनेता कहा, साथ ही आरोप लगाया कि वह अमेरिकी मुसलमानों को बदनाम करने के लिए महीनों से एंटी-मुस्लिम माहौल बना रहे हैं।
स्रोत: एक्स
CAIR और उसका भारत विरोधी प्रचार
CAIR एक इस्लामिस्ट संगठन है, जिसने कई बार भारत और हिंदुओं के खिलाफ बयान दिए हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि CAIR के रिश्ते आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। यह संगठन लगातार हिंदू-विरोधी हिंदूफोबिक अभियान और प्रोपेगैंडा फैलाता रहा है। पहले भी CAIR ने अत्यंत हिंदूफोबिक ‘Dismantling Global Hindutva’ कॉन्फ़्रेंस का खुलकर समर्थन किया था।
CAIR ने जनवरी 2022 में राणा अय्यूब की रिपोर्ट के आधार पर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा चलाया। उन्होंने प्रेस रिलीज जारी कर हिंदी फिल्म ‘सूर्यवंशी’ को थिएटरों में रिलीज न करने की माँग की और फिल्म को घृणित और खतरनाक हिंदुत्व प्रेरित एंटी-मुस्लिम प्रोपेगैंडा तक बता दिया। CAIR ने पाकिस्तानी आतंकी आफिया सिद्दीकी को भी रिहा करने की माँग की है, जो अमेरिकी सेना और FBI पर हमले के लिए 86 साल की सजा काट रही है।
उसी साल CAIR ने Still Suspect: The Impact of Structural Islamophobia नाम से रिपोर्ट जारी की और दावा किया कि अमेरिका में मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, CAIR को एक साल में 6,720 शिकायतें मिलीं, जिनमें इमिग्रेशन, यात्रा संबंधी भेदभाव, कानून प्रवर्तन, सरकारी दखल, स्कूल घटनाएँ और फ्री स्पीच जैसे मुद्दे शामिल थे।
CAIR का दावा है कि अमेरिकी सरकार का भेदभाव मुसलमानों को अधिक प्रभावित करता है। लेकिन विरोधाभास यह है कि जो CAIR अमेरिका में इस्लामोफोबिया की शिकायत करता है, वही भारत में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को लगातार बढ़ावा देता है।
दिसंबर 2022 में भी CAIR ने न्यू जर्सी में एक मोबाइल ट्रक पर दिखाए गए 26/11 हमले के वीडियो और लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों के नामों पर आपत्ति जताई और इसे नफरत फैलाने वाला कहा, जबकि वीडियो में सिर्फ सच दिखाया गया था।
CAIR कई बार आफिया सिद्दीकी जैसे आतंकवादियों के समर्थन में भी खड़ा रहा है। जून 2023 में, जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका गए, तो वह सुनीता विश्वनाथ के साथ एक चर्चा में बैठे दिखाई दिए। वह HfHR नामक कट्टर हिंदू-विरोधी संगठन की सह-संस्थापक है और CAIR तथा ICNA जैसे संगठनों के लिए कार्यक्रम आयोजित करती रही है।
इसके अलावा राहुल गाँधी ने 2024 में कट्टर इस्लामिस्ट और भारत-विरोधी अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर से भी मुलाकात की। ओमर इस्लामिस्ट एजेंडे को बढ़ावा देती हैं, मुस्लिम अपराधियों पर हुई कार्रवाई को इस्लामोफोबिया बताती हैं और आतंकवाद पर सवाल उठाने से बचती हैं।
वह 9/11 हमले को भी हल्के में लेते हुए CAIR के एक कार्यक्रम में बोली थीं कि यह कुछ लोगों ने कुछ कर दिया और इसके कारण मुसलमान अमेरिका में अपने अधिकार खो रहे हैं। इन सभी घटनाओं से CAIR के विचार, नेटवर्क और उसके भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।
इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास के साथ संबंध
ध्यान देने वाली बात यह है कि CAIR के रिश्ते फ़िलिस्तीनी इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। हमास का मानवाधिकार उल्लंघन का लंबा इतिहास है। यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन सहित कई देशों ने हमास को आधिकारिक तौर पर आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ लिंक करें।)
दिल्ली में लाल किला के पास धमाका करने वाले आतंकी उमर नबी का हाल ही में एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में उमर ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ यानी फिदायीन बनने को सही ठहरा रहा है। वह इसे ‘शहादत का ऑपरेशन’ बताकर पेश करता है। यह वीडियो उन उदारवादी-बुद्धिजीवियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों पर ढकी उस सच्चाई को दिखाता है, जो दावा करती हैं कि ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ है। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को वीडियो बाहर आने से परेशानी हो रही है।
ये लोग मीडिया पर इस वीडियो को प्रसारित करने के लिए सवाल उठा रहे हैं और चाहते हैं कि मजहब की बात न हो। वीडियो सामने आने पर मजहब के लिए फिदायीन बनने वाले उमर नबी का महिमामंडन करने में भी लगे कुछ कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को यकीन नहीं हो रहा कि एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच में शामिल कैसे हो सकता है? वे आतंकवादी की मुस्लिम पहचान को अब भी नकार रहे हैं।
उमर नबी के वीडियो का अनुवाद
उमर नबी ने यह रोंगटे खड़े करने वाला वीडियो दिल्ली में धमाका करने से ठीक पहले रिकॉर्ड किया था। वीडियो में वह बिल्कुल प्रोफेशनल अंग्रेजी भाषा में बात कर रहा है। यह उस ‘व्हाइट कॉलर आतंकवाद’ का सबूत है, जिसका पिछले कई दिनों से जाँच एजेंसियाँ पर्दाफाश करने में लगी हुई हैं। फरीदाबाद, सहारनपुर से लेकर कश्मीर तक अब तक 5 से अधिक डॉक्टर पेशे आतंकी पकड़े जा चुके हैं।
Terrorist Umar had recorded a video message shortly before the #RedFort blast. A well-educated man, fluent in English, well settled, rich and yet chose to blow himself up in the name of religion. If this isn’t an eye-opener, what is?
वीडियो में उमर नबी कहता है, “आत्मघाती हमलों का सबसे अहम मुद्दा यह है कि जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि वह किसी तय समय और स्थान पर निश्चित रूप से मरने जा रहा है तो वह एक खतरनाक मानसिकता में चला जाता है। वह खुद को एक ऐसी स्थिति में रखता है, जहाँ वह मान लेता है कि मौत ही उसकी एकमात्र मंजिल है।”
उमर नबी आगे कहता है, “हकीकत यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय व्यवस्था में ऐसी सोच या ऐसी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह जीवन, समाज और कानून तीनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।”
ऐसा पहली बार हुआ है जब आत्मघाती हमले के आतंकी का वीडियो सामने आया है। वीडियो सामने आने से काफी लोगों को परेशानी तो हुई, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि ऐसे वीडियो समाज में फैलने चाहिए ताकि भारत का हर नागरिक इस्लामी कट्टरपंथी की सोच वाली ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले लोगों से बचकर रह सके। क्या पता ऐसे इस्लामी कट्टरपंथी हमारे आसपास ही घूम रहे हों।
लिबरल का ‘इस्लाम से आतंकी विचारधारा’ को ढकने की तमाम कोशिश
वहीं आतंकी उमर नबी की इस वीडियो पर कुछ लिबरल और बुद्धिजीवी तिलमिला गए। ऐसे लोगों ने वीडियो को ‘संवेदनशील’ बताया और आतंकी की छवि पर पर्दा डालने के साथ-साथ इस ‘इस्लाम’ से जोड़ने पर नाराजगी जाहिर की। यह उनका हमेशा वाला प्रोपेगेंडा है। जो सिर्फ ‘मुस्लिमों की हिंसा और क्राइम’ पर आम लोगों को भटकाने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये लोग सबसे पहले मीडिया को निशाना बनाते हैं।
ऐसी ही एक इस्लामी कट्टरपंथी RJ सैयमा ने आतंकी उमर नबी की वीडियो सामने लाने वाली मीडियो को निशाना बनाया लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले इस आतंकी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखने से कतराई। सैयमा ने लिखा, “मेनस्ट्रीम न्यूज मीडिया आतंकी का वो वीडियो क्यों शेयर कर रहे हैं! ये बहुत ही विचलित करने वाला है और मैं सोच भी नहीं सकती कि इसे देखकर पीड़ितों के परिवारों पर क्या बीत रही होगी! सनसनीखेज TRP का ये दौर कितना विचलित करने वाला है! बिल्कुल निंदनीय।”
यहाँ सैयमा की ही तरह द हिंदू (The Hindu) की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह लिखती हैं, “उस आत्मघाती हमलावर का वीडियो पोस्ट करना बंद करो, तुम बस उसके जहरीले बयान को बढ़ावा दे रहे हो।”
विजेता सिंह के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X-@vijaita)
इसी क्रम में लिबरल सोच वाली ऋचा द्विवेदी भी अपनाी ‘अलोकप्रिय राय’ लिखती हैं, “डॉक्टर से आत्मघाती हमलावर बने व्यक्ति का वीडियो सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए और इसे निश्चित रूप से टेलीविजन पर प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए।”
ऋचा द्विवेदी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (साभार: X- @RichhaDwivedi)
कुछ इस्लामी कट्टरपंथी को वीडियो सामने आने से ‘असहज’ हो जाते हैं और सवाल करते हैं, “जब जाँच पूरी नहीं हुई है तो यह वीडियो, निगरानी फुटेज, जाँच संबंधी जानकारी आदि मीडियो को कौन दे रहा है?”
एक्स यूजर का स्कीनशॉट (साभार: @salman_sayyid)
वहीं इन इस्लामी कट्टरपंथियों को यकीन नहीं होता कि आखिर एक डॉक्टर इस तरह की चरमपंथी सोच वाला कैसे हो सकता है। ये लोग ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता’ वाले मनगढ़ंत बयान को उछालने में लग जाते हैं। एक एक्स यूजर ने लिखा, “यह वीडियो एक स्पष्ट चेतावनी है कि आतंकवाद धर्म, शिक्षा या पेशेवर पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं है। यह एक खतरनाक विकृति है, एक सामाजिक रोग है जो हमारे युवाओं के मन में घर कर गया है और हमारे समाज के ताने-बाने के लिए खतरा बना हुआ है।”
एक्स यूजर के पोस्ट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- @tabishhaji)
इन लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों ने आतंकवाद एक धर्म तक सीमित नहीं है वाले प्रोपेगेंडा को बढ़ाने की तमाम कोशिश की। यहाँ तक कि मीडिया पर वीडियो उजागर करने को लेकर सवाल उठाया। ये लोग दिल्ली ब्लास्ट में मारे गए 15 लोगों की जान गवाने वाले परिवारों का दर्द तो समझ रहे हैं लेकिन इस्लामी कट्टरपंथ से बढ़ते आतंक को नजरअंदाज कर देते हैं।
लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों का दोहरा सच
इससे यह साफ हो गया कि उमर नबी का वीडियो सामने आते ही लिबरल और इस्लामी कट्टरपंथियों को जो बेचैनी दिखी, वह दरअसल उनकी अपनी दोहरी राजनीति का पर्दाफाश है। यह वही लोग हैं जो हर मंच पर सच दिखाने का दावा करते हैं लेकिन जैसे ही कोई वीडियो उनकी पसंदीदा कथाओं पर चोट करता है, तुरंत उसे छिपाने में लग जाते हैं।
आतंकी उमर नबी का वीडियो ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराता है, उसे इस्लाम में जरूरी बताता है और युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन इस जहर पर इन कथित लिबरल की जुबान अचानक सिल जाती है। इनके लिए आतंक का समर्थन करने वाला ‘भटका हुआ नौजवान‘ होता है, जबकि यही लोग गुजरात दंगों में ‘बाबू बजरंगी’ के स्टिंग ऑपरेशन की क्लिप्स दुनिया को दिखाना चाहते हैं। क्योंकि वहाँ एजेंडा पूरा होता है।
ये वही लोग है जो हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर आंतकी बुरहान वानी को ‘हेडमास्टर का बेटा’ कहकर भावनात्मक एंगल देते हैं और लेकिन ‘सुसाइड बॉम्बिंग’ को सही ठहराने वाले उमर नबी पर खामोश रहते हैं। उमर नबी का ठीक दिल्ली ब्लास्ट से पहले ‘सुसाइड-बॉम्बिंग’ पर वीडियो बनाने की यही वजह होगी, क्योंकि इन आतंकियों को पता है कि भारत के लिबरल इनके अपराध को ‘शहादत’ बताने के लिए अब भी बैठे हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव में मनचाहा नतीजा न मिलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने अब एक नया ड्रामा शुरू कर दिया है। अब पार्टी सोशल मीडिया पर काउंटिंग के नंबरों पर सवाल उठाकर ऐसा माहौल बना रही है मानो वोट गिनती में कोई बड़ी ‘सेटिंग’ हुई हो। सोशल मीडिया पर ‘122 की सेटिंग’ जैसे नारे उछालकर कॉन्ग्रेस समर्थकों के बीच वैसा ही भ्रम पैदा किया जा रहा है, जैसा हर चुनाव हारने के बाद विपक्ष करने की कोशिश करता है।
लेकिन असली सवाल ये है, जब 2023 में कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस भारी मतों से जीती थी, तब क्या उन्होंने अपनी गिनती को भी इसी तरह जाँचा था? अगर हर बड़ी जीत ‘सेटिंग’ है, तो क्या वो जीत भी सेटिंग थीं? और बिहार में RJD की 93-95-97 हजार वाली जीतों पर कॉन्ग्रेसी क्यों खामोश है? आईए एक बार जान लेते है बीजेपी-NDA की जीत को ‘सेटिंग’ बताने वाली कॉन्ग्रेस खुद कितनी ‘सेटिंग’ कर चुकी है।
कॉन्ग्रेस की 100/122 वाली ‘सेटिंग’ का आरोप
बिहार चुनाव नतीजों के बीच कॉन्ग्रेस ने ‘EVM वाली 122 की Setting’ लिखकर ट्वीट किया, मानो मशीनों से ही खेल हो गया हो।
कॉन्ग्रेस का पूरा नैरेटिव यही है कि सिर्फ BJP–NDA की सीटों में कुछ गड़बड़ी है, बाकी जगह सब सामान्य।
कर्नाटक: जब कॉन्ग्रेस के विनर ‘77000’ की लाइन में थे
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के कई उम्मीदवार भी इसी पैटर्न से जीते थे। उदाहरण के लिए- बंगारापेट (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार एस एन नारायणस्वामी को 77292 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार हो हराया था।
मुधोल (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार टिम्मापुर रामप्पा बालाप्पा को 77298 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
कारवार (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार सतीश कृष्णा सैल को 77445 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
कित्तूर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार बाबसाहेब पाटिल को 77536 वोट मिले और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को हराया था।
अगर वोट के आखिरी दो या तीन अंक ‘सेटिंग’ हैं, तो जब कॉन्ग्रेस के जीतने वाले उम्मीदवारों के वोट भी 77000 की लाइन में आकर 292, 298, 445 या 536 पर खत्म हो रहे थे, तब यह ‘जीत की सेटिंग’ क्यों नहीं लगी? तब तो सब कुछ सही था।
तेलंगाना: क्या यहाँ भी ‘87000’ वाली ‘सेटिंग’ थी?
यही हाल तेलंगाना विधानसभा चुनावों में भी था, जहांँ कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की थी। मेडक (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मायनामपल्ली रोहित को 87126 वोट मिले थे।
नागरकुरनूल (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार डॉ कुचकुल्ला राजेश रेड्डी को 87161 वोट मिले थे।
महबूबनगर (जनरल) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार येन्नम श्रीनिवास रेड्डी को 87227 वोट मिले थे।
चेन्नूर (एससी) विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार विवेक वेंकट स्वामी को 87541 वोट मिले थे।
यहाँ पर भी वोटिंग का आँकड़ा 87,000 की लाइन में एक-दूसरे के बेहद करीब था। लेकिन तब तो कॉन्ग्रेस ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया। इसका मतलब साफ है, जब खुद की जीत होती है, तो यह ‘ईमानदार गिनती’ होती है, और जब हार होती है, तो यह ‘EVM वाली सेटिंग’ बन जाती है।
बिहार में RJD की 90+ वाली ‘सेटिंग’ पर चुप्पी क्यों?
अब बात करते हैं बिहार के हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों की। कॉन्ग्रेस-RJD के साथ गठबंधन में थी, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनकी सहयोगी RJD की उन सीटों पर क्या ‘सेटिंग’ थी, जहाँ उनके उम्मीदवार भी भारी वोटों से जीते हैं?
महिषी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार गौतम कृष्णा को 93752 वोट मिले तो वहीं, गोह विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अमरेंद्र कुमार को 93624 वोट मिले। ये ‘93 वाली सेटिंग‘ किसने की?
परू विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंकर प्रसाद को 95272 वोट मिले तो वहीं, ब्रह्मपुर विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार शंभू नाथ यादव को 95828 वोट मिले। ये ‘95 वाली सेटिंग‘ किसने की।
इसके अलावा, टिकारी विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अजय कुमार को 97550 वोट मिले और वारसलीगंज विधानसभा सीट से आरजेडी उम्मीदवार अनीता को 97833 वोट मिले। ये ’97 वाली सेटिंग’ किसने की। इसका मतलब यह है कि सिर्फ बीजेपी-NDA के जीतने वाली सीटों पर ही उन्हें ‘गड़बड़ी’ नजर आती है।
हार छुपाने का बचकाना तरीका
असलियत यह है कि वोटों की गिनती में संख्या किसी भी अंक पर खत्म हो सकती है, यह कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि लाखों वोटर्स की अलग-अलग पसंद का गणित है। जब कर्नाटक और तेलंगाना में कॉन्ग्रेस को जीत मिली, तो यही आँकड़े उनकी सफलता का प्रमाण थे।
लेकिन बिहार में हारने के बाद, इस तरह के बेबुनियाद और फर्जी आरोप लगाना सिर्फ अपनी हार को छुपाने का एक बचकाना तरीका है, जो लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया पर से लोगों का भरोसा कम करने की कोशिश है। कॉन्ग्रेस को चाहिए कि वह EVM पर सवाल उठाने से पहले अपनी कमियों पर ध्यान दे।
देश में नक्सलवाद अब अपनी अंतिम साँसे गिन रहा है। 2014 में जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, नक्सलियों के खिलाफ एक से बढ़कर एक ऑपरेशन किए गए। 2014 से पहले नक्सलियों के प्रति अपनाए गए ढूलमुल रवैये को त्याग कर केन्द्र सरकार ने बातचीत, सुरक्षा, समन्वय और ऑपरेशन पर आधारित नीति बनाई। इसका असर यह है कि बड़े बड़े नक्सली या तो सरेंडर कर रहे हैं या फिर सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा रहे हैं।
गृहमंत्री अमित शाह की घोषित डेडलाइन से 12 दिन पहले माओवादी नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने मार गिराने में सफलता पाई। गृहमंत्री शाह ने देश से नक्सलियों के समूल नाश की डेडलाइन 31 मार्च 2026 रखा है। हिड़मा की मौत के बाद अब जनता ये उम्मीद लगाए बैठी है कि 2026 की पहली तिमाही बचे- खुचे नक्सलियों के लिए ‘काल’ साबित होगा।
हिड़मा की मौत, नक्सलवाद पर जबरदस्त प्रहार
आज की तारीख में, माओवादियों की ताकत काफी कम हो गई है। सबसे जवान सदस्य हिड़मा ही था, जिसकी समझ और तकनीक से नक्सलियों ने बड़े-बड़े हमले किए। उसके खात्मे ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।
अधिकांश नेता या तो आत्मसमर्पण कर चुके हैं या मारे जा चुके हैं। कई नक्सलियों की उम्र हो चली है। कई वरिष्ठ माओवादी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। नेतृत्व का अभाव, वैचारिक तौर पर आकर्षण की कमी, नए लोगों का आना कम होना इसके ढ़हने में अहम भूमिका निभा रहा है। सुरक्षा बल हर नक्सली किले को भेद चुके हैं। संसाधनों की कमी है। यही वजह है कि नक्सली क्षेत्र अब गिनती के रह गए हैं।
गृहमंत्री शाह ने दिया सुरक्षाबलों को ‘टारगेट’
पिछले साल जब गृहमंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की तारीख मुकर्र की थी, तो इसका फायदा ये हुआ था कि सुरक्षाबलों को एक ‘गोल’ मिल गया था।
सुरक्षाकर्मियों ने कई इलाकों को नक्सल मुक्त कर एक कीर्तिमान रच दिया। एक के बाद एक क्षेत्र नक्सलमुक्त होते गए। कई नक्सली नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ सरेंडर किया। कई लोगों को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया।
इसी क्रम में नक्सलियों का फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा हिड़मा था, जिसे खत्म करने के लिए गृहमंत्री शाह ने सुरक्षाबलों को 30 नवंबर 2025 तक का समय दिया था। इसे वक्त रहते पूरा कर लिया गया।
नक्सलवाद के खिलाफ मोदी सरकार ने उठाए कई कदम
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नक्सलवाद पर लगाम कसने के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ बनाई। इसका असर ये हुए कि 2024 तक नक्सल से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आयी।
पिछले 10 सालों में नक्सल प्रभावित इलाकों में 576 पुलिस स्टेशन बनाए गए। इस दौरान नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर 18 रह गए। अक्टूबर 2025 तक 1,225 नक्सलियों ने सरेंडर किया और करीब 270 नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया गया।
नक्सलियों से मुठभेड़ में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या में 73% की कमी आयी। नक्सली हिंसा में मरने वाले आम नागरिकों की संख्या भी 70% कम हुई।
20 सालों में सबसे बड़ी कामयाबी है हिड़मा का खात्मा
लगभग तीन दशकों तक, माडवी हिड़मा का नाम बस्तर के जंगलों में खौफ का पर्याय था। माओवादियों का सबसे खूंखार कमांडर और संगठन के हर निर्णय में दखलंदाजी करने वाला वह एकमात्र आदिवासी नेता था।
अधिकारियों का मानना है कि उसकी मौत पिछले 20 सालों में माओवादियों के लिए सबसे बड़ा झटका है। वह न सिर्फ सुरक्षाबलों पर हुए बड़े-बड़े हमलों के लिए जिम्मेदार था, बल्कि कम उम्र और जंगलों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ ऐसा जनजातीय नेता था, जिसकी पकड़ संगठन पर सबसे ज्यादा थी। वह नक्सलियों के लिए प्रेरणा था।
हिडमा की कहानी सुकमा-बीजापुर सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव पुवर्ती से शुरू होती है, जिसे कुछ साल पहले तक माओवादियों का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था।
1991 में वह 17 साल की उम्र में नक्सली संगठन से जुड़ा, करीब 3 दशक तक संगठन के साथ जुड़े रहने की वजह से उसे सब कुछ पता था। सुरक्षाबलों पर हुए ज्यादातर हमलों की रणनीति उसने बनाई। उसकी मौत हर दृष्टि से देश को राहत देने वाला है।
छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों में उसका अच्छा खासा प्रभाव था। बस्तर के नक्सलियों में जनजातीय लोग ज्यादा हैं। नेताविहीन होने पर ये लोग अब सरेंडर करने के लिए मजबूर होंगे। हिड़मा पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का नेता था। 2009 से 2021 के बीच घात लगाकर किए गये सुरक्षाबलों पर हमले उसने किए।
इन हमलों में 2010 में हुआ ताड़मेटला हमला, जिसमें 76 सीआरपीएफ जवान बलिदान हुए। 2017 में बाँकुपारा का हमला। इसमें 12 सीआरपीएफ के जवान मारे गए। 2017 में हुआ बुर्कापाल का हमला जिसमें 25 सीआरपीएफ के जवानों की जान गई। 2021 में हुआ तेकुलगुडेम-पेडागेलुर का हमला, जिसमें 22 डीआरजी, एसटीएफ और कोबरा जवानों ने बलिदानी दी।
इसके अलावा झीरम घाटी का वो हमला, जिसने छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस को नेतृत्वविहीन कर दिया था, हिड़मा की साजिश का नतीजा था। कुछ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने उसे ‘कसाई’ बताया है।
हर बार चकमा देकर भाग निकलता था हिड़मा
हिडमा को पकड़ने या मारने के लिए कई बड़े अभियान चलाए गए। भेज्जी और बुरकापाल हत्याकांड के बाद 2017 में शुरू किए गए ऑपरेशन प्रहार में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय बलों ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। कई दिनों तक, टीमें टोंडामरका के जंगलों में तलाशी लेती रहीं।
पुलिस का मानना था कि हिड़मा बुरी तरह घायल हो गया है, लेकिन कुछ महीनों बाद सुरक्षाबलों पर हुए हमले में उसका नाम आया।
2021 का तेकुलगुडेम मुठभेड़ एक और उदाहरण था। पुवर्ती के पास हिडमा की मौजूदगी की खुफिया जानकारी मिलने पर, सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के लगभग 800 जवान इलाके में पहुँचे, लेकिन वे साजिश का शिकार हो गए। एक पहाड़ी पर तैनात हिडमा की बटालियन ने लगातार एलएमजी से गोलीबारी की, जिसमें 22 जवान मारे गए।
साल 2025 के शुरुआत में करेगुट्टा हिल्स में सबसे बड़े माओवादी-विरोधी अभियान में 25,000 जवानों को शामिल किया गया था। इस अभियान का मकसद भी हिड़मा को घेरना था। इस अभियान में 31 नक्सली मारे गए, लेकिन हिडमा एक बार फिर बच निकला।
इस बार आंध्र प्रदेश का पहाड़ी इलाका, उसका तीन लेयर का सुरक्षा घेरा और हथियार उसे नहीं बचा पाया और सुरक्षाबलों ने हिड़मा के साथ उसकी पत्नी राजे, बॉर्डीगार्ड और तीन नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया।
सुरक्षाबलों ने पिछले 10 सालों में जनजातीय समाज के बीच अपनी पैठ बढ़ाई है। इन क्षेत्रों में विकास की पहुँच हो गई है। कई पुलिस थाने ऐसे इलाकों में बन गए हैं और सबसे बड़ी बात वैचारिक तौर पर कमजोर नक्सलियों से जुड़ने के लिए नई पीढ़ी तैयार नहीं है। यही वजह है कि 2026 में नक्सलियों के खात्मे की तैयारी देश कर चुका है।
नक्सलवाद के खात्मे का प्रण ले चुकी मोदी सरकार लगातार एक के बाद नक्सलियों को ढेर करती जा रही है। इस बीच बड़े-बड़े नक्सली हथियार छोड़कर देश की मुख्य धारा से भी जुड़ रहे हैं। हाल ही में एनडीटीवी के पावर प्ले में गृहमंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलियों के खात्मे की तारीख 31 मार्च 2026 बताई थी। साथ ही नक्सलियों को चेतावनी देते हुए माडवी हिड़मा को 30 नवंबर से पहले खत्म करने की भविष्यवाणी की थी।
12 दिन पहले मारा गया टॉप नक्सली हिड़मा
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सुरक्षाबलों को मोस्ट वांटेड हिड़मा को खत्म करने के लिए 30 नवबंर 2025 तक का डेडलाइन तय किया था। लेकिन सुरक्षा बलों ने 12 दिन रहते अपना टारगेट पूरा कर लिया और 1 करोड़ का ईनामी हिड़मा मारा गया।
छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सीमा पर खूंखार नक्सली माडवी हिड़मा को सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में मार गिराया। हिड़मा पर 1 करोड़ का ईनाम था। नक्सल का हार्डकोर कमांडर माडवी हिड़मा के साथ 5 और नक्सली भी मारे गए हैं। इसमें उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का, बॉडीगार्ड देवे, लकमल, कमलू, मल्ल शामिल है। लाल आतंक के इस टॉप कमांडर के मारे जाने पर सुकमा में पटाखे फोड़कर लोगों ने जश्न मनाया।
आंध्रप्रदेश के डीजीपी ने ऑपरेशन की जानकारी देते हुए कहा, “अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेदुमिल्ली में पुलिस और माओवादियों के बीच एनकाउंटर सुबह 6 से 7 बजे के बीच हुई। इसमें एक शीर्ष माओवादी लीडर समेत 6 माओवादी मारे गए।”
हमेशा बच कर निकल जाता था हिड़मा
नक्सली हिड़मा के जुड़े अभियान के दौरान सुरक्षाबलों ने 27 माओवादियों को हिरासत में लिया। घटनास्थल से एके47, 1 रिवॉल्वर, 1 पिस्टल बरामद किया गया है। कृष्णा जिले के पेनामलुरु पुलिस ने भी अभियान चलाया था।
इस अभियान के तहत सुकमा से सटे अल्लुरी सीताराम जिले के पास उसका एनकाउंटर किया गया। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सटा हुआ है। पुलिस को इस इलाके में नक्सलियों के छिपे होने की खबर मिली थी। सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी। मंगलवार सुबह (17 नवंबर 2025) से ही नक्सलियों के साथ डीआरजी जवानों की मुठभेड़ चल रही थी, जिसके बाद टॉप नक्सली के मरने की खबर आई है।
बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को संभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिड़मा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसका काम तमाम कर दिया।
नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश , तेलंगाना, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे हिस्सों में घने जंगल हैं। इन क्षेत्रों में फोन नेटवर्क ठीक से काम नहीं करता है। ऐसे में सुरक्षाबलों को जानकारी मिलने के बाद जब तक अभियान शुरू किया जाता है, ये नक्सली नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा का भी यही हाल है। यहाँ मुखबिर ही काम आते हैं। ऐसे में हिड़मा का मारा जाना सुरक्षाबलों के लिए बड़ी कामयाबी है।
बीफ खाने का शौकीन था
अनुसूचित जनजाति का एकमात्र टॉप नक्सली 24 घंटे हथियारों के साथ सुरक्षा घेरे में रहता था। उसके दिन की शुरुआत सुबह 4 बजे हो जाती थी। पूरी यूनिट को वह व्यायाम करवाता था। फिर आगे की रणनीति के लिए योजना बनाता था। वह बीफ खाने का शौकीन था और शुगर की वजह चावल छोड़ दिया था और अब सिर्फ रोटी खाता था।
टेक्नोफ्रेंडली भी था नक्सली हिड़मा
टॉप नक्सली हिड़मा को तकनीक की अच्छी समझ थी। माओवादियों को वह तकनीक की जानकारी देता था। इसलिए सुरक्षाबलों के लिए वह ‘काल’ बन गया था। एनडीटीवी के मुताबिक, उसकी सुरक्षा 3 से 4 घेरे की होती थी। बाहरी घेरे को जैसे ही सुरक्षाबलों के आने का आभास होता था, वह उनसे भिड़ जाते थे। इस बीच हिड़मा भाग जाता था।
हिड़मा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।
झीरमघाटी अटैक का मास्टरमाइंड
झीरमघाटी में हिड़मा ने 2013 में हमला कर पूरे कॉन्ग्रेस नेतृत्व को खत्म कर दिया था। मारे गए नेताओं में पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल,उनके बेटे दिनेश पटेल, बीजापुर के नेता टाइगर महेन्द्र कर्मा, पूर्व विधायक उदय मुदलियार समेत 27 लोग शामिल थे। इस दौरान नक्सलियों ने टाइगर महेन्द्र कर्मा पर 100 से ज्यादा गोलियाँ बरसाई।
2021 में सुकमा- बीजापुर में सुरक्षाबलों पर हमला
3 अप्रैल 2021 को छत्तीसगढ़ के सुकमा-बीजापुर के घने जंगलों में सुरक्षाबलों ने ‘ऑपरेशन प्रहार’ के तहत नक्सलियों को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। इस दौरान घात लगाकर नक्सलियों ने कायराना हमला किया। इस हमले में 22 जवान बलिदान हो गए और 30 से ज्यादा घायल हो गए। इसमें सीआरपीएफ, डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड और स्पेशल टास्क फोर्स के जवान थे।
दरअसल सुरक्षाबलों को जानकारी मिली थी कि माड़वी हिड़मा जंगलों में छिपा हुआ है। लेकिन ये जानकारी जानबूझकर नक्सलियों ने फैलाई थी। सुरक्षाबलों के पहुँचते ही 3 तरफ से करीब 250 नक्सलियों ने उन्हें घेर लिया और 4 घंटे तक गोलियाँ चलाई। इस दौरान ग्रेनेड और रॉकेट लॉन्चरों का भी इस्तेमाल किया गया था। नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के हथियार भी लूट लिए थे।
2010 दंतेवाड़ा हमले का मास्टरमाइंड
6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने 76 सीआरपीएफ जवानों को मार दिया था। ये जवान वहाँ रूटीन सर्च ऑपरेशन चला रहे थे। यूनिट के 150 जवान जंगल की तरफ गए। इन्हें अंदाजा नहीं था कि नक्सली वहाँ घात लगाकर इनका इंतजार कर रहे हैं।
ऊँची झाड़ियाँ और घुमावदार रास्ते का इस्तेमाल कर करीब 1000 वहाँ पहुँच कर तैयारी कर रहे थे। जब जवान वहाँ पहुँचे तो सब कुछ शांत था। सर्च ऑपरेशन कर जब ये लोग वापस लौट रहे थे, तभी तेज धमाका हुआ। जब तक वे संभल पाते, चारों ओर से अँधाधुंध फायरिंग शुरू हो गयी। इस दौरान 76 जवानों ने अपनी जान दे दी।
एक मात्र जनजातीय समुदाय था टॉप नक्सली था
हिड़मा का जन्म सुकमा के पुवाार्ती में 1981 में हुआ था। 1996 में मात्र 17 साल की उम्र में वह नक्सलियों से जुड़ गया। उसे हिड़मा हिदमल्लाडु और संतोष भी कहा जाता था। वह गोंड जनजाति समुदाय का था। इस इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ था।
इसलिए उसके लिए निकलकर भागना और सुरक्षाबलों को साजिश में फँसाना आसान था। बड़े-बड़े नक्सली हमले की साजिश रचने के साथ साथ उसने खुद को बचाने के कई तरकीब आजमाए थे। लेकिन सरकार के प्रण के आगे उसकी तरकीब काम नहीं आई और सुरक्षाबलों ने उसे मार गिराया।
दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत ने एक बार कहा था कि भारत को 2 मोर्चों पर नहीं ढाई मोर्च पर लड़ाई लड़नी है। 2 मोर्चे यानी पाकिस्तान और चीन हमारे सामने हैं और आधा मोर्चा देश के भीतर ही छिपा बैठा है। इसकी कोई तय सूरत नहीं है लेकिन उसकी सीरत भारत विरोध ही है। भारत के खिलाफ बयानबाजी और आतंकी व भारत विरोधी तत्वों को कवर फायर देना, यही काम इस आधे मोर्चे का है। इसका जिक्र क्यों? क्योंकि हो सकता है कि यह खबर पढ़ते हुए आपको इस मोर्चे की याद आए, खैर आगे बढ़ते हैं।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एक बयान के कुछ हिस्से पढ़िए। उन्होंने लाल किले के सामने विस्फोट पर कहा है, “कश्मीर की मुसीबत लाल किले के सामने बोल पड़ी है।” जनसत्ता में छपे एक बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा, “जो युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए तैयार थे, वे अब खुद को विस्फोट करने के लिए तैयार हैं, यह सोचने की जरूरत है।”
मुफ्ती ने कहा आगे है, “हमसे कहाँ गलती हुई। केंद्र सरकार को सोचना होगा। आपने यहाँ के युवाओं से वादा किया था कि आप उनके हाथों से पत्थर और बंदूकें लेकर उन्हें लैपटॉप देंगे। लेकिन आज आपने उसी युवा को आत्मघाती हमलावर बना दिया है।”
आतंकियों के लिए महबूबा का दर्द कोई पहली बार या नया नही हैं। आतंकी बुरहान वानी से लेकर अफजल गुरु और यासीन मलिक तक उनकी नजरों में हालात के मारे लोग रहे हैं। वो इनको मिली सजा के लिए न्याय व्यवस्था तक पर सवाल खड़े कर चुकी हैं और अब आतंक की पौध को तैयार करने का ठीकरा भी केंद्र सरकार के सिर मढ़ देना चाहती हैं।
द वायर में महबूबा का अफजल और यासीन के लिए लेख
अब आते हैं महबूबा के बयान पर और समझने की कोशिश करते हैं कि वो केंद्र को निशाना बना रही हैं लेकिन क्यों? हो सकता है कि केंद्र की योजनाओं को लेकर सवाल हों, कई लोगों में नाराजगी पर भी हो सकती है लेकिन क्या इतनी नाराजगी कि लोग आतंकी बन जाएँ? जाहिर है ऐसा कतई नहीं है, तो बात साफ है कि महबूूबा मुफ्ती अपने इस बयान के सहारे किसी को तो बचाने की कोशिश कर रही हैं।
महबूबा मुफ्ती ने दोष बेशक केंद्र पर मढ़ दिया लेकिन शायद इसकी आड़ में जहर बोने वालों को बचाने की भी कोशिश चल रही है। वह उन्हें कवर फायर देने पर आमादा हैं जिनकी वजह से नौजवान किताबों और लैपटॉप से खीचकर बम-बारूद की ओर जा रहे हैं। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन क्या दिल्ली से चलाए जाते हैं? कल को कहीं महबूबा यह सवाल ना उठा दें कि इन आतंकी संगठनों की विचारधाराएँ संसद में बैठकर लिख जा रही हैं?
महबूबा का सवाल आतंकी कैंपों में दी जाने वाली ट्रेनिंग पर नहीं है, वहाँ फैलाई जाने वाली नफरत पर नहीं है और पाकिस्तान से आने वाली फंडिंग पर भी नहीं है। वो बस केंद्र सरकार और उसकी नीतियों को ही आतंकवाद का जिम्मेदार बताना चाहती हैं। वो उस मजहबी कट्टरता को नहीं देखती हैं जो युवाओं के मन में भरी जा रही है।
भारत 140 करोड़ लोगों का देश है। तरह की परेशानियाँ यहाँ हैं, रोजगार की दिक्कतें हैं, असमानता और संघर्ष भी है लेकिन क्या देश के लोग बारूद बनकर फट गए हैं? क्या देश के युवा अपनी समस्याओं का समाधान टिफिन या जूते में बम बाँधकर निकालता है? यह कहना कि किसी युवा के हाथ में बंदूक इसलिए आई क्योंकि सरकार ने लैपटॉप नहीं दिया, आतंकियों की विचारधारा को एक राजनीतिक तर्क में बदलने की कोशिश है।
सरकार ने कश्मीर के विकास के लिए लगातार काम किया है। शिक्षा से लेकर पर्यटन और रोजगार के अवसर बनाए गए हैं लेकिन कुछ राजनीतिक दल और अलगाववादी समूह हर समस्या के पीछे एक ही कहानी बताते हैं- नाराजगी।
इसी कथित नाराजगी का इस्तेमाल आतंकी संगठन अपने रिक्रूटमेंट के लिए करते रहते हैं। गुमराह करने वाली किताबें, उकसाने वाले भाषण, मजहबी लोगों और स्थानों से फैलाए गए कट्टर संदेश और बॉर्डर के उस पार से आने वाले हथियार-पैसे, ये जिस आतंकी इकोसिस्टम की देन है उस पर महबूबा जैसे लोग सवाल नहीं उठाते हैं।
महबूबा का तर्क है कि केंद्र ने युवाओं को पत्थर और बंदूकें छुड़ाकर लैपटॉप देने का वादा किया था। हाँ, वादा किया था और बड़े पैमाने पर दिया भी गया। जम्मू-कश्मीर में स्कूल-कॉलेजों के लिए नई इमारतें बनीं, मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ीं, पर्यटन के रिकॉर्ड टूटे, खेल के मैदान भरे, उद्योग ने दस्तक दी और युवाओं ने स्टार्टअप शुरू किए।
महबूबा कभी यह नहीं पूछतीं कि इतने सकारात्मक बदलावों के बीच भी आतंकी संगठन क्यों सक्रिय हैं, कौन उन्हें बनाए रखता है, कौन उनके लिए भर्ती करने का माहौल तैयार करता है। यह सवाल भी तो उठना चाहिए कि जो युवा पढ़ाई के लिए तैयार थे उन्हें ‘शहादत’ के नाम पर कौन तैयार करता है?
केंद्र सरकार को दोष देना आसान है। आतंकी विचारधारा से सवाल पूछना और उसके कटघरे में खड़ा करना मुश्किल हैं। कश्मीर के युवाओं के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रही महबूबा मुफ्ती को इन चालबाजियों से बाहर आने की जरूरत है। जनता ने आपको नकार दिया है और आपके इन विचारों को अपने वोट से नकार दिया है।
कश्मीर के युवाओं ने बार-बार दिखाया है कि वे खेल, शिक्षा, कला और व्यापार अन्य क्षेत्रों में भी कमाल का काम कर सकते हैं। कुछ नेता जो चाहते हैं कि उनका दर्द के बहाने वो अपनी राजनीतिक दवाई तलाश कर सकें उनसे युवाओं को बचना ही होगा।
केरल के कुन्नूर में 41 साल के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) अनीश जॉर्ज ने आत्महत्या कर ली। अब इस आत्महत्या मामले से वामपंथी धड़ा SIR की प्रक्रिया को बदनाम करने में जुटा है। वामपंथी मीडिया पोर्टल द न्यूज मिनट (TNM) से लेकर प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई ऐसा दावा कर रहे हैं कि BLO ने SIR के काम के दबाव में आकर आत्महत्या का कदम उठाया है।
हालाँकि, आत्महत्या मामले के पीछे का सच तो जाँच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन इसी बीच कॉन्ग्रेस ने केरल की CPI(M) सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि केरल के BLO की आत्महत्या में CPI(M) का हाथ है। कॉन्ग्रेस ने कहा कि CPM ने ही BLO को आत्महत्या करने पर मजबूर किया।
केरल में BLO की हत्या पर कॉन्ग्रेस का CPM पर आरोप
केरल में BLO अनीश जॉर्ज की आत्महत्या मामले में कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि इसके पीछे INDI गठबंधन की सहयोगी CPM का हाथ है। कन्नूर जिला कॉन्ग्रेस कमेटी (DCC) के अध्यक्ष मार्टिन जॉर्ज ने सोमवार (18 नवंबर 2025) को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में BLO, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता और बूथ लेवल एजेंट (BLA) वैशाख के बीच बातचीत का एक ऑडियो जारी किया।
द इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के मुताबिक, इस ऑडियो में अनीश बता रहे हैं कि CPM घर-घर जाकर SIR प्रक्रिया पर दखल डाल रही है। ऑडियो से साफ हो रहा है कि CPM ने कहा कि नियुक्त BLA को घरों की पहचान करने में मदद के लिए BLO के साथ जाना चाहिए। लेकिन BLA भेजने के बजाए CPM ने अपने शाखा सचिव चंद्रन को BLO के साथ भेज दिया।
यही आरोप लगाते हुए कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीशन ने भी दोहराया कि BLO अनीश जॉर्ज पर CPM ने दबाव डाला था। CPM चाहती थी कि कॉन्ग्रेस के BLA उनके साथ न जाए, इसी कारण BLO अनीश ने आत्महत्या कर ली।
#WATCH | Thiruvananthapuram, Kerala | On the death of a BLO in Kannur, allegedly by suicide, LoP Kerala Assembly & Congress leader VD Satheesan says, "All the BLOs are overloaded. They cannot afford the work entrusted to them by the Election Comission… Election Comission… pic.twitter.com/Nnt6YRnyEX
आत्महत्या पर राजदीप सरदेसाई से लेकर TNM ने SIR को बनाया निशाना
जहाँ केरल के BLO पर कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाए कि इसमें CPM का हाथ है। वही देश के कुछ मीडिया संस्थान ने आत्महत्या मामले में SIR को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटे। राजदीप सरदेसाई से लेकर द न्यूज मिनट (TNM) की फाउंडर धान्या राजेन्द्रन ने धड़ल्ले से खबरें चलाईं कि BLO ने SIR प्रक्रिया के काम के दबाव में आकर आत्महत्या की है।
The suicide of a BLO, Aneesh Grorge, in Kerala during the SIR process raises significant questions. Aneesh faced pressure to steer clear of Congress BLA, allowing their INDI partner CPM BLA to manipulate the voter list in that region through his involvement.
इंडिया टुडे ने ‘SIR के दबाव में आकर 2 लोगों की मौत; BLO की आत्महत्या से चुनाव सूची संशोधन प्रभावित’ जैसी हेडलाइन से खबरें चलाई। ऐसे नैरेटिव की खबरें गढ़ने वाले भी संस्थान के ही पत्रकार राजदीप सरदेसाई हैं। उन्होंने इस मामले पर पूरी रिपोर्ट की और जबरन BLO की आत्महत्या मामले से SIR को बदनाम किया।
राजदीप सरदेसाई ने लिखा, “हकीकत जानिए भारत: अवास्तविक लक्ष्यों और समय-सीमाओं के चलते तीन अलग-अलग राज्यों में SIR को लेकर 2 कथित आत्महत्याएँ और एक BLO द्वारा आत्महत्या का प्रयास किया गया। क्या चुनाव आयोग हमेशा की तरह इसे नजरअंदाज कर देगा? एक ऐसी खबर देखिए जो आपको प्राइम टाइम पर उन तथाकथित न्यूज चैनलों पर नहीं मिलेंगी, जहाँ शोर-शराबा और विपक्ष की आलोचना ‘असली’ खबरों से ज्यादा मायने रखती है।”
Get real India: 2 alleged deaths by suicide, one suicide attempt of BLOs over SIR in 3 diff states because of unrealistic targets and deadlines. Will @ECISVEEP as always brush it aside? Watch a story that you won’t find on prime time across so called news channels where noise and… https://t.co/z44f59PDQw
कुछ मीडिया पोर्टल ने भी इसी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाया। द न्यूज मिनट (TNM) नाम मीडिया पोर्टल ने लिखा- ‘केरल में BLO ने आत्महत्या की, परिवार ने SIR पर काम के दबाव का आरोप लगाया।’ ऐसी हेडलाइन से लोगों को भ्रमित किया गया। इस आर्टिकल में केवल BLO के परिवार के बयान को अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया गया, जबकि पूरी कहानी नहीं बताई गई।
फोटो साभार: The News Minute
द न्यूज मिनट की फाउंडर धन्या राजेन्द्रन ने भी खबर को आगे बढ़ाया और BLO की आत्महत्या को SIR के जिम्मे डाल दिया गया।
यह सब उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है, जिसमें इन वामपंथी मीडिया संस्थानों ने बिहार में SIR प्रक्रिया का विरोध किया और कई सवाल उठाए। लेकिन नतीजतन, बिहार में मतदान प्रतिशत बढ़ा और यहाँ तक कि जनता भी इस प्रक्रिया से खुश नजर आई।
क्या है केरल में BLO की आत्महत्या का पूरा मामला?
केरल के कन्नूर में रविवार (16 नवंबर 2025) को BLO अनीश जॉर्ज अपने घर में मृत पाए गए। 44 साल के अनीश एक स्कूल कर्मचारी हैं, जिन्हें राज्य में चल रही SIR प्रक्रिया के दौरान वार्ड संख्या 18 के लिए BLO की जिम्मेदारी दी गई थी। पय्यान्नूर पुलिस ने इस मामले में अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है।
वहीं, जाँच शुरू होने से पहले ही मीडिया में खबरें प्रसारित की गईं कि अनीश जॉर्ज ने SIR के काम के दबाव में आकर आत्महत्या की है। इन खबरों को BLO के परिवार का हवाला देकर चलाया गया। परिवार का कहना है कि अनीश रात-रात भर जगकर काम करते थे। वहीं कॉन्ग्रेस के आरोप हैं कि CPM ने अनीश को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया है।
कैसे वामपंथी मीडिया ने SIR विरोधी प्रोपेगेंडा को BLO की आत्महत्या से जोड़ा
केरल में BLO की आत्महत्या को वामपंथी मीडिया ने अपने सटीक नैरेटिव से जोड़कर देखा। ये वामपंथी मीडिया, जो बिहार में SIR शुरू होने से इसका विरोध कर रही है। वह अब इतनी निर्दयी हो चुकी है कि किसी की आत्महत्या को भी मीडिया ने प्रोपेगेंडा बना लिया। क्योंकि अब तक जाँच में साफ नहीं हो सका है कि आखिर आत्महत्या के पीछे क्या वजह थी, तो मीडिया ने अपना SIR विरोधी नैरेटिव चुना और धड़ल्ले से आगे बढ़ाया।
उल्लेखनीय है कि बिहार चुनाव 2025 में सफल रहा SIR अब देश के तमाम राज्यों में शुरू हो चुका है। इसके तहत मतदाता सूची को साफ करने का काम किया जा रहा है। कई बार चुनाव आयोग के SIR पर स्पष्टीकरण देने के बावजूद भी वामपंथी मीडिया और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम इसका विरोध कर रहा है। और अब यह विरोध किसी की जान की कीमत से भी बड़ा हो गया है। इससे यह तो साफ हो गया कि वामपंथी मीडिया और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम का SIR विरोध इससे भी निचले स्तर तक गिर सकता है।
16 नवंबर 2025 को जब ऑपइंडिया की टीम पंजाब विश्वविद्यालय पहुँची तो ग्राउंड पर चल रहा नजारा वैसा नहीं दिख रहा था जैसा कि सोशल मीडिया में चर्चा में है। कैंपस के अंदर कई छात्र शांतिपूर्वक धरना स्थल पर बैठे थे और बार-बार अपनी वही साधारण माँग दोहरा रहे थे- सीनेट चुनावों की तारीख घोषित की जाए।
जिन छात्रों से ऑपइंडिया ने बात की, वे चाहते थे कि चुनाव की तारीख घोषित हो जाएँ तो वे तुरंत कक्षाओं में लौटें और अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करें। उनके चेहरों पर पाठ्यक्रम छूट जाने की चिंता साफ दिखाई दे रही थी। पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र स्पष्टता चाहते थे, अव्यवस्था नहीं।
एक छात्र अवतार सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाएगा, हमारी हड़ताल समाप्त हो जाएगी। उसने बताया कि छात्रों को पता है कि सीनेट चुनाव कराने में 200 दिन से अधिक लगते हैं और वे किसी से रातों-रात चमत्कार की माँग नहीं कर रहे। वे चाहते थे कि प्रक्रिया शुरू हो, जो विश्वविद्यालय ने कुछ दिन पहले ही घोषित कर दी है।
हालाँकि जैसे ही छात्र-समूह के घेरे से बाहर निकल कर देखना शुरू किया तो पाया कि नजारा पूरी तरह बदल जाता है। वहाँ ट्रैक्टर, लंगर वाहन, लाउडस्पीकर (हालाँकि हमारे जाने के समय वे शांत थे), राजनीतिक बैनर, किसान यूनियन के झंडे और ऐसे समूह मौजूद थे जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।
खुद को यूनियन सदस्य, राजनेता और कार्यकर्ता कहने वाले ये लोग उस जगह पर कब्जा किए बैठे थे जो असल में विश्वविद्यालय के पूर्व या वर्तमान छात्रों की होनी चाहिए।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट
कुछ ऐसा ही किसान आंदोलन के दौरान भी हुआ था, जहाँ किसानों की वास्तविक समस्याएँ राजनीतिक अवसरवाद और पहचान-आधारित लामबंदी के शोर में दब गई थीं। पंजाब विश्वविद्यालय में सीनेट चुनावों की शांतिपूर्ण माँग अब राज्य बनाम केंद्र के टकराव में घसीट ली गई है। जाहिर है, इस नए बवंडर में सबसे ऊँची आवाजें छात्रों की नहीं बल्कि उन लोगों की थीं जो छात्रों के आंदोलन के पीछे अपने एजेंडे चला रहे थे।
10 नवंबर को विश्वविद्यालय के गेट तोड़े जाने के साथ ही ये साफ हो गया कि बाहरी लोग अपने एजेंडे के साथ आए थे। FIR में भी यह दर्ज है कि गेट नंबर 1 को जबरन खोलने वाली भीड़ में बड़ी संख्या गैर-छात्र शामिल थे। पुलिस अधिकारियों ने बयान में कहा कि हालाँकि कुछ पीयू छात्र आगे थे, लेकिन बैरिकेड तोड़ने और धक्का-मुक्की करने का काम उन लोगों ने किया जिनका विश्वविद्यालय से कोई लेना-देना नहीं था।
फिर भी इन झड़पों को सीनेट मुद्दे का स्वाभाविक परिणाम बताया जा रहा है। सच्चाई यह है कि ये टकराव अवसरवादी हस्तक्षेप का नतीजा हैं और खुद छात्र भी इसे जानते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पंजाव विश्वविद्यालय की कुलपति रेनू विग तक ने ये कहा कि छात्रों ने कहा है कि ये अब सीनेट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा, “छात्रों ने ये मुझसे सामने से तो नहीं कहा, लेकिन वार्डेन और कमेटी के जरिए उन्होंने ये बात पहुँचाई है कि वे लाचार महसूस कर रहे हैं।”
छात्र असल में क्या चाहते हैं और कैसे उनके अंदर डर बैठाया जा रहा है
अगर हम स्लोगन, पॉलिटिकल स्पीच, यूनियन का अंदाज और सोशल मीडिया पर चल रहे शोर को देखें तो पता चलेगा कि छात्रों की माँगे काफी स्पष्ट हैं। वे चाहते हैं कि सीनेट चुनावों के जरिए बहाल हो।
वे चाहते हैं कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार एक वैध गवर्निंग बॉडी (शासी निकाय) बने। सलाथ ही वे चाहते हैं कि पिछले एक साल की अनिश्चितता खत्म हो। वे चंडीगढ़ के मालिकाना हक की माँग करने वालों में से नहीं हैं।
वे विश्वविद्यालय पर पहचान-आधारित दावा नहीं कर रहे। वे संघवाद के नारे नहीं लगा रहे। वे केंद्र से यह नहीं कह रहे कि अपना सामान बाँधकर केंद्र शासित प्रदेश को छोड़ दे।
ऑपइंडिया की छात्रों से हुई बातचीत से साफ था कि वे सीनेट पर स्पष्टता चाहते हैं और जैसे ही चुनाव की तारीख घोषित हो, तुरंत कक्षाओं में लौटकर पढ़ाई शुरू कर सकें।
हालाँकि उनका विरोध केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें सीनेट सदस्यता को नामांकन-आधारित बनाने की एक अधिसूचना थी। इसे केंद्र सरकार पहले ही वापस ले चुकी है। ऐसे में वे केंद्र के खिलाफ नहीं हैं। वे बस अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।
हमने देखा कि कैंपस के अंदर एक और अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें छात्रों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे ही केंद्र सीनेट पर ‘कब्जा’ करेगा, वैसे ही विश्वविद्यालय तानाशाह बन जाएगा, फीस बढ़ा दी जाएगी और पंजाब हमेशा के लिए इस संस्थान को खो देगा।
यही बातें हमें उन लोगों ने दोहराईं जो छात्र नहीं थे लेकिन स्थल पर मौजूद थे। यह डर बैठाया जा रहा है। यह स्वाभाविक नहीं है और यह छात्रों के बजाय राजनीतिक समूहों के हितों को कहीं अधिक साधता नजर आता है।
कानाफूसी इस बात की भी है कि केंद्र सरकार की ये अधिसूचना विश्वविद्यालय को राज्य से ‘छीनने’ की कोशिश थी। इस स्थिति को उसी दिन सुलझ जाना चाहिए था जब केंद्र ने अधिसूचना वापस ली, फिर भी ये किसी तरह अस्तित्व के संकट के रूप में बदल गई। असल में ये असमंजस अचानक नहीं है।
यह वही नजारा है जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई समूहों ने डर, पहचान और अविश्वास की समानांतर कहानियाँ चलाईं। किसान आंदोलन ने किसानों और यूनियन के बीच गहरी खाई बना दी थी। मूल मुद्दे दूसरे एजेंडों के शोर में दब गए थे।
यहाँ भी पंजाबियत, केंद्र बनाम राज्य राजनीति, क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक पहचान की कहानियाँ छात्रों के विश्वविद्यालय के आंतरिक चुनावों की माँग पर हावी हो गई हैं।
सीनेट और सिंडिकेट क्या हैं?
सीनेट और सिंडिकेट पंजाब विश्वविद्यालय की दो वैधानिक गवर्निंग बॉडी (शासी संस्थाएँ) हैं। सीनेट सर्वोच्च प्राधिकरण है, जिसमें निर्वाचित स्नातक, प्रोफेसर, छात्र प्रतिनिधि और केंद्र-राज्य के नामित सदस्यों समेत सौ से अधिक सदस्य शामिल होते हैं।
सीनेट नीतियाँ बनाती है, बजट को मंजूरी देती है, नियुक्तियों की देखरेख करती है और प्रमुख शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णय लेती है। सिंडिकेट कार्यकारी निकाय के तौर पर काम करती है, जिसमें लगभग पंद्रह से बीस सदस्य होते हैं। जहाँ सीनेट निर्णय लेती है, वहीं सिंडिकेट उन निर्णयों को लागू करती है।
राजनीतिक यूनियन, किसान समूह और मजदूर संगठन प्रदर्शन पर कैसे हावी हो रहे हैं
अगर कोई अब भी ये मानता है कि यह केवल छात्रों द्वारा चलाया गया आंदोलन है तो उसने पिछले कुछ दिनों में पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा स्थल का दौरा नहीं किया। जब ऑपइंडिया कैंपस पहुँचा तो धरना स्थल पर ट्रैक्टर, लंगर स्टॉल, राजनीतिक पोस्टर और छात्रों से परे लोग हर तरफ मौजूद थे।
यह पैटर्न नया नहीं है। हमने इसे किसान आंदोलन के दौरान भी देखा था। कुछ खास समूह किसी वैध शिकायत को पहचानने में माहिर होते हैं, ‘समर्थन’ के नाम पर आंदोलन में प्रवेश करते हैं और फिर धीरे-धीरे आंदोलन की दिशा और आवाज बदल देते हैं। इसके बाद मूल मुद्दा अपनी पहचान खो देता है। यहाँ भी ठीक वही हुआ है।
सीनेट चुनाव की माँग से शुरू हुआ ये प्रदर्शन भी अब इस तरह से बदल रहा है-
पंजाब बनाम केंद्र मुद्दा
पंजाब बनाम हरियाणा
चंडीगढ़ का मालिकाना हक
पंजाबियत के नारे
टुकड़ों में आ रही राजनीतिक पार्टियाँ
10 नवंबर 2025 को बाहरी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के दौरान, एसएसपी कनवदीप कौर गेट पर चढ़ गईं और भीड़ को समझाने की कोशिश की। अंदर घुसने की कोशिश कर रहे बाहरी लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस बिना बल प्रयोग किए उन्हें रोक नहीं सकती थी।
प्रदर्शनकारियों ने गेट तोड़ दिए और लोगों की भारी भीड़ कैंपस में घुस गई। उस दिन ट्रैक्टर, ट्रॉली, यूनियन प्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यकर्ता और संगठनों के झंडे लेकर लोग कैंपस में दाखिल हुए जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।
असल में तो न पुलिस और बाहरी समूहों, संगठनों और व्यक्तियों को ऐसे आंदोलनों में दखल न देकर बाहर ही रहना चाहिए। लेकिन घटनाएँ वैसी नहीं हुईं जैसी होनी चाहिए थीं।
आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल वहाँ पहुँचे। किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल, हरिंदर लखोवाल और इंदरपाल बैंस अपने कार्यकर्ताओं के साथ आए। यहाँ तक कि जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह के पिता और उग्रवादी नेताओं के परिवारजन भी कैंपस पहुँच गए।
लखा सिधाना जैसे गैंगस्टर से कार्यकर्ता बने लोग, गायक सतिंदर सरताज और कई अन्य लोग कैंपस पहुँचे। असली छात्र नेता, जिन्हें पूरे आंदोलन की आवाज होना चाहिए था, उन्हें किनारे कर दिया गया ताकि ये नेता मंच पर बोल सकें।
प्रदर्शन में इन लोगों की घुसपैठ के साथ एक अलग ही शब्दावली आ गई। इसके तहत ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ और ‘राज करेगा खालसा’ जैसे नारे हवा में गूँजने लगे। इन नारों का सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, न ही इनका पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम और लोकतांत्रिक निकायों की बहाली से कोई संबंध है। इनका पूरा संबंध राजनीतिक स्थिति बनाने, पहचान बताने और यह छवि गढ़ने से है कि विश्वविद्यालय सभी छात्रों और स्टेकहोल्डर्स के बजाय एक विशेष सांस्कृतिक समूह का है।
इस शोर के बीच छात्रों की असल माँगें लगभग खो गई। राजनीतिक खिलाड़ियों की इन प्रदर्शनों की अपेक्षाएँ छात्रों की अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग हैं और इन्हीं दो एजेंडों के बीच की खाई ही इस अव्यवस्था का कारण बन रही है।
निहंगों की मौजूदगी और खालिस्तानी विचारधारा का परिचय
उस दिन कैंपस में पहुँचे कई समूहों में निहंग भी शामिल थे। ऑपइंडिया ने आंदोलन के दौरान मौजूद एक निहंग से बातचीत की। सतही तौर पर उन्होंने बार-बार यह कहा कि वे केवल ‘बच्चों’ का समर्थन करने आए हैं।
उन्होंने अपनी मौजूदगी को अभिवावक और सुरक्षात्मक जैसा बताया। लेकिन बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसी लाइन कही जिसने यह साफ कर दिया कि उनकी सोच अलग है और उसका सीनेट चुनावों से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने लगभग शब्दशः कहा, “जब हिंदू भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन जब दूसरे कुछ माँगते हैं तो समस्या बन जाती है।”
उन्होंने ‘खालिस्तान’ शब्द का साफ शब्दों में इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उन्हें करने की जरूरत भी नहीं थी। जो भी पंजाब को लंबे समय से कवर करता है, वह समझता है कि ‘दूसरे कुछ माँगते हैं’ का मतलब किस संदर्भ में किया जा रहा है। यह एक सांकेतिक भाषा है, जिसका इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो अलगाववादी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन सीधे कानूनी जाँच के घेरे में नहीं आना चाहते।
यहीं पर आंदोलन चुनावों और कैंपस लोकतंत्र से कहीं आगे एक खतरनाक क्षेत्र में चला जाता है। जब निहंग समूहों के प्रतिनिधि असंबंधित राष्ट्रीय तुलना करने लगते हैं और विश्वविद्यालय आंदोलन के अंदर पहचान-आधारित शिकायतों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं तो इसका मतलब है कि आंदोलन उनके वैचारिक संदेशों का व्यापक जरिया बन गया है।
सीनेट आंदोलन को लीड कर रहे छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल या यूनियन को आंदोलन में आने के लिए नहीं कहा। लेकिन जैसे ही गेट जबरन खोले गए और बाहरी समूह अंदर आए तो वह जगह छात्रों के नियंत्रण में नहीं रही।
आंदोलन तितर- बितर हो गया और एक बार ऐसा होने पर वे किस्से जो असल मुद्दे से कोई संबंध नहीं रखते, ‘समर्थन’ के नाम पर चुपचाप आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं। जिन छात्रों से हमने बात की, उन्होंने कहा कि ये समूह ‘मौजूद होने चाहिए’ क्योंकि वे उनका समर्थन करते हैं।
हालाँकि कुछ आवाजें ऐसी भी थीं जो उलझन में थीं और यहाँ तक कि छात्रों के आंदोलन के हड़प लिए जाने को नापसंद करती थीं। उदाहरण के तौर पर, हिंदुस्तान स्टूडेंट एसोसिएशन (HSA) के अधिकारियों ने अलगाववादी नारों और विश्वविद्यालय पर पंजाब के दावे का समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया।
मोर्चे के अंदर दरारें- पंजाब बनाम हरियाणा नैरेटिव हावी
जैसे-जैसे गेट के बाहर राजनीतिक तमाशा तेज होने लगा, पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा के अंदर पहली असली असहजता देखने को मिली। 12 नवंबर को, पीयू कैंपस स्टूडेंट्स’ काउंसिल के संयुक्त सचिव और पहले के हलफनामे अभियान का प्रमुख चेहरा रहे मोहित मंडेराना ने मोर्चा से इस्तीफा दे दिया। उसका इस्तीफा एक अहम संकेत है क्योंकि यह वह बात सामने रखता है जो कई छात्र व्यक्तिगत तौर पर कानाफूसी करते रहे हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं- आंदोलन अपने मकसद से भटक गया है।
हालाँकि वह ‘बीजेपी और आरएसएस विचारधारा’ के डर को फैलने से रोक नहीं पाए। अपने बयान में उसने कहा, “यह संघर्ष पंजाब विश्वविद्यालय को राजनीतिक हस्तक्षेप, खासकर बीजेपी और आरएसएस विचारधारा से बचाने के लिए था। लेकिन 10 नवंबर का आंदोलन क्षेत्रीय मालिकाना हक के बारे में हो गया, विश्वविद्यालय को बचाने के बारे में नहीं।” ये बयान बताता है कि किस तरह हर तरह से डर फैलाने की कोशिश की जा रही है।
एक वीडियो में उसे कहते हुए देखा गया कि यह ‘पंजाब और हरियाणा’ का निजी मामला है और वे इसे घर पर ही सुलझा लेंगे। उसने कहा, “हमें किसी दिल्ली एजेंट की जरूरत नहीं है।”
दूसरी ओर, कुछ छात्रों ने ऑपइंडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वे ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ नारों की बाढ़, सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना न रखने वाले नेताओं के घुसने और अचानक ऑनलाइन फैल रही उस जानकारी से बेहद असहज थे जिसमें दावा किया जा रहा था कि हरियाणा विश्वविद्यालय को ‘कब्जा’ करना चाहता है।
ध्यान देने वाली बात ये है कि पंजाब बनाम हरियाणा का यह नैरेटिव नया नहीं है। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। तब से इन राज्यों के बीच यह खींचतान हमेशा रही है, लेकिन यह विश्वविद्यालय कैंपस में पहले कभी इस तरह नहीं घुसी थी।
सीनेट चुनावों को इतिहास में भी कभी भी क्षेत्रीय लड़ाई में नहीं बदला गया। दोनों राज्यों के छात्र दशकों से एक साथ पढ़ते आए हैं। हरियाणा के अपने विश्वविद्यालय हैं और वह पीयू को फंड नहीं करता। हिमाचल के भी अपने संस्थान हैं। असल में यह मुद्दा क्षेत्रीय नहीं बल्कि प्रशासनिक था।
लेकिन जैसे ही राजनीतिक खिलाड़ी मैदान में उतरे, ‘पंजाब का आखिरी प्रतीक खतरे में’ का नैरेटिव आगे बढ़ाना आसान हो गया। सीनेट का मुद्दा जमीन, पहचान और इतिहास के नारों में बदल गया। स्वाभाविक रूप से, हरियाणा आधारित छात्र समूहों ने प्रतिक्रिया दी और आंदोलन कानून की बजाय भावनाओं का युद्धक्षेत्र बन गया।
इसलिए मंडेराना का इस्तीफा सिर्फ असहमति नहीं था। यह आंदोलन पर हावी होने को लेकर पैदा हुई पहली साफ दरार थी। अगर अंदरूनी लोग ही एकमत नहीं हैं, तो यह केवल समय की बात है कि छात्र अपनी जगह वापस हासिल कर पाएँ या आंदोलन अपने ही बोझ तले ढह जाए।
वर्तमान आंदोलन में एबीवीपी की स्थिति
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पंजाब विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पविंद्र सिंह नेगी ने ऑपइंडिया को बताया कि एबीवीपी छात्रों के साथ खड़ी है और सीनेट चुनावों की तारीख घोषित करने की उनकी असल माँग का समर्थन करती है।
हालाँकि संगठन सक्रिय रूप से आंदोलन में भाग नहीं ले रहा क्योंकि इसे बाहरी लोगों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार पहले ही अधिसूचना वापस ले चुकी है और हाई कोर्ट ने भी छात्रों को कक्षाओं में लौटने को कहा है, ऐसे में आंदोलन जारी रखने का कोई ठोस कारण नहीं बचता।
उनके अनुसार अब बाहरी लोग आंदोलन को पूरी तरह अलग दिशा में ले जा रहे हैं ताकि अपने एजेंडे साध सकें। उन्होंने स्थगित परीक्षाओं पर भी चिंता जताई क्योंकि इससे परिणामों में देरी होगी और प्लेसमेंट में समस्याएँ आएँगी।
उन्होंने कहा, “आज भी छात्र हमसे मिले। वे स्थगित परीक्षाओं को लेकर चिंतित थे। अगर समय पर परिणाम नहीं आए तो वे प्लेसमेंट की तारीख़ों से कैसे मेल खाएँगे?”
छात्रों में डर कैसे पैदा किया जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है
राजनीति में डर एक शक्तिशाली हथियार है, खासकर तब जब इसे ऐसे युवा छात्रों के समुदाय में डाला जाए जो पहले से ही शैक्षणिक अनिश्चितता में जी रहा हो। पिछले सप्ताह छात्रों में कुछ अलग ही तरह के डर जानबूझकर फैलाए गए हैं जैसे कि-
केंद्र का नियंत्रण आने पर विश्वविद्यालय तानाशाही बन जाएगा
फीस अचानक बहुत बढ़ जाएगी
चुनाव कभी नहीं होंगे
पंजाब विश्वविद्यालय को पंजाब से ‘छीन लिया’ जाएगा
चंडीगढ़ स्थायी रूप से बदल दिया जाएगा
पंजाब की पहचान पर हमला हो रहा है
यह विश्वविद्यालय को बचाने का ‘आखिरी मौका’ है
इनमें से हर डर तथ्यों के आधार पर सवालों के घेरे में है लेकिन राजनीतिक रूप से सही है।
ये नैरेटिव हॉस्टल्स या कक्षाओं के अंदर से नहीं निकले। ये बाहर से आए- भावनाओं से ओतप्रोत भाषण देने वाले किसान यूनियन नेताओं से, बार-बार पंजाबियत के नारे दोहराने वाले पहचान-आधारित समूहों से, केंद्र-विरोधी नया मुद्दा तलाशने वाले राजनीतिक नेताओं से और आंदोलन को अपनी गैर-जरूरी शिकायतों के लिए युद्धक्षेत्र मानने वाले वैचारिक तत्वों से ये नैरेटिव देखने को मिले।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर
जब मैंने कानून की अच्छी जानकारी रखने वाले एक ‘समर्थक’ से पूछा कि फीस कैसे बढ़ेगी जबकि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों का फी स्ट्रक्चर भी बहुत किफायती है तो वह केवल इतना ही कह पाया, “ऐसे ही होता है, नहीं?”
हालाँकि डर तथ्यों से कहीं तेज फैलता है, खासकर तब जब हजारों लोग विश्वविद्यालय के बाहर खड़े होकर यह नारा लगा रहे हों कि ‘पंजाब का आखिरी संस्थान छीना जा रहा है।’
इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा मंत्रालय ने 7 नवंबर को विवादित अधिसूचना वापस ले ली थी। सीनेट संरचना बहाल कर दी गई थी। विश्वविद्यालय ने 9 नवंबर को कार्यक्रम उपराष्ट्रपति कार्यालय को भेज दिया था।
यहाँ तक कि हाई कोर्ट ने भी माना कि कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए और चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए। फिर भी, ऐसे कारणों से जिनका पीयू अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है, कई समूह चाहते हैं कि आंदोलन जारी रहे।
क्यों? क्योंकि अव्यवस्था से उन्हें फायदा मिलता है।
जो हो रहा है वह व्यवस्थित रूप से भड़काया गया भावनात्मक उकसावा है और डर का हर नया दिन उन समूहों की मदद करता है जिनकी सीनेट चुनावों में नहीं, बल्कि आंदोलन को जिंदा रखने में काफी दिलचस्पी है।
हाई कोर्ट का दखल और डर का नैरेटिव का कैसे हुआ पर्दाफाश
14 नवंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में शायद सबसे तार्किक बात दी। पूर्व सीनेट सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो अहम बातें कहीं, जो अगर आंदोलनकारी सच में शांति चाहते तो कैंपस को तुरंत शांत कर सकती थीं।
पहली, कोर्ट ने साफ कहा कि शैक्षणिक गतिविधियाँ तुरंत शुरू होनी चाहिए। जजों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि छात्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए हैं और प्रशासनिक मुद्दों के कारण शिक्षा को रोका नहीं जा सकता।
जब वकील ने कहा कि छात्र सीनेट चुनावों में देरी के कारण आंदोलन कर रहे हैं, तो पीठ ने सीधे कहा, “कृपया अपनी कक्षाओं में वापस जाएँ।”
यह कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। एक संवैधानिक अदालत की ओर से छात्रों को पढ़ाई पर लौटने का निर्देश उस पूरे डर को कमजोर करता है, जो फैलाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय टूटने या कब्जे के कगार पर है।
दूसरी, कोर्ट ने कहा कि चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए और विश्वविद्यालय पहले ही कार्यक्रम उपराष्ट्रपति (कुलपति) को भेज चुका है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम में कार्यक्रम के लिए कुलपति की ‘मंजtरी’ की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब है कि प्रक्रिया पहले से ही आगे बढ़ रही है।
केंद्र का पक्ष रखने वाले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इस बात कि पुष्टि की कि-
विवादित अधिसूचना वापस ले ली गई है सरकार चाहती है कि चुनाव हों कार्यक्रम प्रक्रिया में है यह एक विशाल अभ्यास है, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख पंजीकृत स्नातक मतदाता शामिल हैं
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव के लिए ‘सौहार्दपूर्ण वातावरण’ जरूरी है। यह एक सामान्य बात है कि इतनी बड़ी प्रक्रिया बैरिकेड तोड़ने, बाहरी भीड़ और राजनीतिक नारों के बीच नहीं हो सकती।
कुल मिलाकर हाई कोर्ट ने छात्रों की चुनाव कराए जाने की असली माँग को आधिकारिक रूप से मान्यता दी और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन के आसपास का अराजक माहौल बिल्कुल अनावश्यक है। कोर्ट के शब्द सीधे उन डर फैलाने वाले नैरेटिव को काटते हैं जिन्हें यूनियनों और राजनीतिक समूहों ने हवा दी थी।
बाहरी लोग आंदोलन को जारी क्यों रखना चाहते हैं और इसमें कौन-से राजनीतिक लाभ हैं
आंदोलन छात्रों की मूल माँग से कहीं आगे क्यों चला गया, यह समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कैंपस को अशांत बनाए रखने से किसे फायदा हो रहा है। खास बात ये हा कि इनमें से कोई भी लाभार्थी छात्र नहीं हैं।
राजनीतिक दल
आम आदमी पार्टी (AAP), कॉन्ग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसे दलों के लिए पंजाब विश्वविद्यालय एक आसान प्रतीकात्मक युद्धक्षेत्र है। चुनाव नजदीक हैं और नैरेटिव लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में पीयू को ‘पंजाब की पहचान का आखिरी किला खतरे में’ के रूप में पेश किया जा रहा है।
कैंपस में मार्च करना, नारे लगाना और केंद्र पर हमला करना उन्हें राजनीतिक लाभ देता है, जिसका सीनेट से कोई लेना-देना नहीं है।
AAP के मंत्री पहुँचे, कॉन्ग्रेस के विधायक भावनाओं से भरा भाषण देने लगे, SAD नेता पंजाब के रक्षक बनकर सामने आए। लेकिन जब पीयू का बजट घटाया गया, हॉस्टलों में कमी आई या शैक्षणिक निर्णय टाले गए, तब ये नेता कहाँ थे? विश्वविद्यालय के प्रति उनका अचानक दिखा ‘प्यार’ समयबद्ध है, सच्चा नहीं।
किसान यूनियन
संयुक्त किसान मोर्चा में विभाजन और 2021 के बाद घटती भीड़ के चलते कई यूनियनें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने को बेताब हैं। छात्र आंदोलनों का समर्थन उन्हें नैतिक अधिकार का आभास देता है, जबकि सीनेट चुनावों का कृषि मुद्दों से कोई संबंध नहीं है।
साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर
इसी वजह से पंजाब में यूनियन नेताओं को पूरे जत्थों के साथ ट्रैक्टर और ट्रॉलियों में आते देखा गया। ‘पंजाब के लिए लड़ते किसान पुत्र’ जैसी तस्वीर वहाँ भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, लेकिन छात्रों की चिंताओं से रणनीतिक रूप से पूरी तरह अलग है।
मजदूर यूनियन और वैचारिक संगठन
ये समूह आंदोलनों को अपने राजनीतिक नैरेटिव आगे बढ़ाने का अवसर मानते हैं। उनके नारे शायद ही कभी छात्रों की माँगों से मेल खाते हैं। बल्कि वे अपने वही वैचारिक फैलाव दोहराते हैं जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई संगठन मूल शिकायत से परे जाकर आंदोलन से जुड़ गए थे।
इनमें से कई संगठनों को अराजकता से ही लाभ मिलता है। आंदोलन जितना लंबा चलता है, उन्हें उतना ही अधिक मंच और दिखने का मौका मिलता है।
कट्टरपंथी- अलगाववादी आवाजें
खालिस्तान के समर्थकों के समानांतर निहंग जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी भी एक और परत दिखाती है। ये लोग पीयू को एक प्रतीकात्मक स्थल मानते हैं- एक ऐसी जगह जो पंजाब की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। अगर वे छात्र आंदोलन के अंदर इतिहास में हुए विश्वासघात, राज्य दमन या सांस्कृतिक मालिकाना हक के नैरेटिव बो देंगे तो उन्हें कैंपस से कहीं आगे वैचारिक लाभ मिलता है।
विपक्षी दल और केंद्र-विरोधी नैरेटिव
केंद्र की वापस ली गई अधिसूचना को बीजेपी पर हमला करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि वह अधिसूचना अब सक्रिय ही नहीं है। यह ठीक वही रणनीति है जो किसान कानूनों के साथ अपनाई गई थी।
हालाँकि वे 2021 में वापस ले लिए गए थे, फिर भी वे राजनीतिक दलों, यूनियनों और तथाकथित कार्यकर्ताओं के लिए डर फैलाने का साधन बने हुए हैं।
कंटेंट क्रिएटर्स और कार्यकर्ता
हमें नए दौर के आंदोलन लाभार्थियों को नहीं भूलना चाहिए। इन्फ्लुएंसर्स, हाशिये के कार्यकर्ता, स्थानीय आंदोलनकारी और कुछ छात्र नेता खुद अराजकता जारी रहने पर सामाजिक पूँजी हासिल करते हैं।
एक सुलझा हुआ आंदोलन उन्हें कुछ नहीं देता। एक लंबा खिंचता आंदोलन उन्हें अनुयायी, दृश्यता और ‘युवा नेता’ की पहचान देता है, भले ही उनका मूल मुद्दे से बहुत कम संबंध हो।
इन सभी परतों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। छात्र स्पष्टता चाहते हैं। बाहरी लोग संकट चाहते हैं।
इसका सबसे सरल प्रमाण पीयू छात्र अवतार सिंह से मिला। उन्होंने हमें सीधे बताया कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होगा, हड़ताल समाप्त हो जाएगी। हालाँकि उन्होंने किसान और मज़दूर यूनियनों की मौजूदगी का समर्थन किया, जो शुरुआत से ही टालना चाहिए था।
छात्र 240 दिन की समयसीमा समझते हैं। वे प्रशासनिक प्रक्रिया समझते हैं। वे केंद्र से नहीं डरते। वे पीयू को बंधक बनाने की कोशिश नहीं कर रहे।
यह बाहरी लोग हैं जो आंदोलन को जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि सीनेट कार्यक्रम उनकी उपयोगिता समाप्त कर देता है।
निष्कर्ष- असली खतरा है आंदोलन का हड़पना, न कि केंद्र
दो सप्ताह के आंदोलन, बैरिकेड्स, एफआईआर और राजनीतिक नाटकों के बाद असली सवाल बहुत सरल है। असल खतरा क्या है? केंद्र ने अपनी अधिसूचना वापस ले ली है। हाई कोर्ट ने सीनेट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। पीयू अधिनियम स्पष्ट है।
असली खतरा यह है कि छात्रों की चुनाव तिथियों की माँग कितनी आसानी से किसान यूनियनों, मजदूर समूहों, राजनीतिक दलों और पहचान-आधारित संगठनों द्वारा हड़प ली गई।
जो छात्र केवल पढ़ाई करना चाहते हैं, उन्हें डर के नैरेटिव से प्रभावित किया जा रहा है जबकि बाहरी लोग कैंपस का इस्तेमाल अपनी प्रासंगिकता के लिए कर रहे हैं। अदालत चाहती है कि कक्षाएँ फिर से शुरू हों। केवल वे लोग जिनके राजनीतिक मकसद हैं, अराजकता को जारी रखना चाहते हैं।
ये रिपोर्ट मूल रूप से अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।