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कभी केरल की पहली महिला IPS बन जमाई थी धाक, अब तिरुवनंतपुरम में वामपंथियों को दी मात: जानिए कौन हैं BJP की श्रीलेखा, हर जगह छाया है नाम

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है। केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) आर श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में सस्थामंगलम वार्ड से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार के तौर पर शानदार जीत दर्ज की है।

इस जीत के साथ ही वह न सिर्फ वामपंथ के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रहीं बल्कि भाजपा की ओर से तिरुवनंतपुरम की पहली महिला महापौर बनने की सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर कर सामने आई हैं।

45 साल से लगातार नगर निगम पर काबिज वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को इस बार करारी हार मिली है। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 101 में से 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।

श्रीलेखा की व्यक्तिगत जीत इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आई है। एक सख्त, बेबाक और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में पहचानी जाने वाली श्रीलेखा ने अब पूरी ताकत के साथ राजनीति में कदम रख दिया है।

केरल की पहली महिला IPS का लंबा और बेदाग सफर

तिरुवनंतपुरम में जन्मी आर श्रीलेखा का पालन-पोषण भी यही हुआ है। जनवरी 1987 में उन्होंने इतिहास रचते हुए केरल की पहली महिला IPS अधिकारी बनी थी। उस दौर में जब पुलिस सेवा को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, श्रीलेखा ने अपनी काबिलियत से न सिर्फ जगह बनाई बल्कि ऊँचे पद तक पहुँचीं।

करीब 33 साल के अपने सेवा काल में उन्होंने केरल पुलिस के कई अहम विभागों में काम किया। वे जिला पुलिस प्रमुख रहीं, क्राइम ब्रांच, विजिलेंस, फायर फोर्स, मोटर वाहन विभाग और जेल विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा उन्होंने CBI में भी सेवाएँ दीं।

CBI में रहते हुए उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में सख्त कार्रवाई की। भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी बेखौफ छवि के चलते उन्हें ‘रेड श्रीलेखा’ के नाम से भी जाना गया। वह अनुशासन, पारदर्शिता और कड़क प्रशासन के लिए मशहूर रहीं।

साल 2017 में उन्हें पुलिस महानिदेशक (DGP) पद पर प्रमोट किया गया। इसके साथ ही वे केरल की पहली महिला DGP बनीं। उन्होंने दिसंबर 2020 में रिटायरमेंट ले ली।  

रिटायरमेंट के बाद राजनीति में एंट्री

रिटायरमेंट के बाद आर श्रीलेखा ने कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। साल 2017 के अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में उन्होंने अभिनेता दिलीप को झूठा फंसाए जाने का दावा किया, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया। इसके अलावा उन्होंने कॉन्ग्रेस से निष्कासित नेता राहुल ममकुटाथिल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने में हुई देरी पर सवाल उठाए, जिस पर काफी चर्चा हुई।

इन बयानों के चलते कुछ लोग उनके समर्थक बने तो कुछ आलोचक, लेकिन यह साफ हो गया कि श्रीलेखा अब चुप रहने वालों में से नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली।

भाजपा में शामिल होने के बाद जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और कार्यशैली से प्रभावित होकर पार्टी में आई हैं। पार्टी में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने का फैसला किया।

नगर निगम चुनाव में उन्होंने तिरुवनंतपुरम के सस्थामंगलम वार्ड से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की। खुद श्रीलेखा ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि इस वार्ड में अब तक किसी उम्मीदवार को इतनी बड़ी बढ़त नहीं मिली थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान LDF और कॉन्ग्रेस की ओर से उनके खिलाफ लगातार व्यक्तिगत हमले किए गए, लेकिन जनता ने उन सभी आलोचनाओं को नकार दिया।

इस चुनाव में भाजपा ने 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनते हुए 45 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर दिया। हालाँकि भाजपा एक सीट से पूर्ण बहुमत से चूक गई लेकिन निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से निगम में सत्ता का रास्ता साफ माना जा रहा है।

क्या श्रीलेखा बनेंगी पहली महिला महापौर?

तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने केरल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए है। 101 वार्डों वाले निगम में भाजपा को 50 सीटें मिली हैं, जबकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) 29 और कॉन्ग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) 19 सीटों पर सिमट गया। दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं। इस परिणाम के साथ ही निगम पर 45 सालों से चले आ रहे वामपंथी शासन का अंत हो गया।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और भाजपा से विजयी रहीं श्रीलेखा को महापौर बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। उनका प्रशासनिक अनुभव, सख्त छवि और चुनावी जीत भाजपा के लिए मजबूत नेतृत्व विकल्प मानी जा रही है।

कभी बेंगलुरु में जानलेवा भगदड़ तो अब कोलकाता में मेसी के कार्यक्रम में अराजकता: गैर NDA शासित राज्यों में कैसे कानून-व्यवस्था को ताक पर रख होते हैं आयोजन

कोलकाता में फुटबॉल फैन्स के लिए जो पल सपनों जैसा माना जा रहा था, वह कुछ ही मिनटों में अफरातफरी, तोड़फोड़ और पुलिस के लाठीचार्ज में बदल गया। लियोनेल मेसी का विवेकानंद युवा भारती क्रीड़ांगन (साल्ट लेक स्टेडियम) में छोटा सा दौरा न केवल हजारों फैन्स को निराश कर गया बल्कि एक बार फिर यह दिखा दिया कि गैर NDA दलों द्वारा शासित राज्यों में भीड़-भाड़ वाले आयोजनों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में कितनी खामियाँ रहती हैं।

कोलकाता में फैली अराजकता कोई अकेली शर्मनाक घटना नहीं है। इस साल की शुरुआत में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की IPL जीत के जश्न के दौरान हुई दुखद भगदड़ में कम-से-कम 11 लोगों की जान चली गई थी। एक घटना में तोड़फोड़ और अराजकता हुई जबकि दूसरी में लोगों की जान ही चली गई। हालाँकि, दोनों ही मामलों की मूल वजह TMC और कॉन्ग्रेस की सरकार की प्रशासनिक विफलता है।

वैश्विक शर्मिंदगी की वजह बना कोलकाता

मेसी अपने इंटर मियामी के साथियों रोड्रिगो दे पॉल और लुइस सुआरेज के साथ सॉल्ट लेक स्टेडियम पहुँचे। उनके आने से वहाँ भगदड़ जैसी स्थिति बन गई, जिसे किसी भी सक्षम प्रशासन को पहले से ही संभाल लेना चाहिए था। अर्जेंटीना के फुटबॉल स्टार मेसी मोहन बागान और डायमंड हार्बर के मैच के दूसरे हाफ में स्टेडियम में आए। जैसे ही उनकी ऑडी मैदान पर आई, फील्ड पर मौजूद लोग उनके पास दौड़ पड़े।

पुलिस, कैमरा-मैन, पिच पर घुसने वाले लोग, आयोजक, मंत्री और VIP सब एक साथ जुट गए। सुरक्षा के बजाय आयोजक बार-बार बस यही कहते रहे, “कृपया उन्हें जगह दें, कृपया मैदान खाली करें।” इस एक वाक्य ने ही विफलता को स्पष्ट कर दिया कि राज्य ने अपने ही आयोजन स्थल पर अपना नियंत्रण खो दिया था।

काले कपड़े पहने और सुरक्षाकर्मियों से घिरे मेसी को बढ़ती भीड़ के बीच हिलने-डुलने में भी मुश्किल हो रही थी। मैदान पर 15 मिनट से अधिक समय बिताने के बावजूद, आयोजक बुनियादी तौर पर देखने के लिए एक गलियारा भी नहीं बना पाए थे।

हजारों टिकट धारक, जिनमें से कई ने 10,000 रुपए तक का भुगतान किया था, उन्हें मुश्किल से ही देख पा रहे थे। प्रेस बॉक्स से भी मेसी मुश्किल से दिखाई दे रहे थे जबकि फोटोग्राफर भीड़ के बीच यह अंदाजा लगाते रह गए कि आखिर महान खिलाड़ी कहाँ हैं।

कार्यक्रम के आयोजक सताद्रु दत्ता और पश्चिम बंगाल के खेल मंत्री अरूप बिस्वास सहित कई मंत्रियों और VVIP की मौजूदगी ने फुटबॉलर के आसपास अफरा-तफरी को और बढ़ा दिया। यह मेसी के प्रशंसकों के लिए एक सुखद क्षण होना चाहिए था लेकिन यह एक राजनीतिक तमाशा बन गया, जिससे जनता का गुस्सा और भड़क उठा।

‘मेसी-मेसी’ के नारे जल्द ही जोरदार हूटिंग में बदल गए। कुछ ही मिनटों में, लोगों का गुस्सा तोड़फोड़ में तब्दील हो गया। प्लास्टिक की बोतलें और मलबा ग्राउंड पर फेंका गया। स्टेडियम की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी तेजी से बिगड़ी कि पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा।

स्टेडियम में प्रवेश करने के महज 22 मिनट बाद, मेसी को उनकी कार तक वापस ले जाया गया। उनके जाते समय, प्रशंसकों ने ‘वी वॉन्ट मेसी’ के नारे लगाए। इस अफरा-तफरी और अव्यवस्था के बीच कई लोग उस फुटबॉल दिग्गज को देखे बिना ही चले गए, जिसे देखने के लिए उन्होंने भारी कीमत चुकाई थी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बाद में एक्स (X) पर माफी माँगी और एक सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जाँच समिति बनाने की घोषणा की। यह विपक्ष की जानी-पहचानी आदत है- पहले घटना हो जाने देना और फिर बाद में पछतावा जताना, ना कि पहले से सही शासन व्यवस्था करना।

बेंगलुरु: वही विफलता, जो जानलेवा बन गई

अगर कोलकाता में हुई घटना एक चेतावनी थी, तो बेंगलुरु में साल की शुरुआत में वही त्रासदी पहले ही घट चुकी थी।

इस साल RCB ने 18 साल बाद अपनी पहली IPL ट्रॉफी जीती। इस जश्न के लिए एम चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भारी भीड़ जमा हुई थी। ऐसा होना था यह पहले से साफ-साफ नजर आ रहा था। लोगों का जोश और उत्साह कितना बड़ा होगा, इसका अंदाजा पहले ही लगाया जा सकता था। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक में कोई ठोस तैयारी नहीं की गई।

परिणामस्वरूप भगदड़ हुई, जिसमें 11 लोगों की मौत और दर्जनों घायल हुए। प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और वायरल वीडियो से पता चला कि एंट्री पॉइंट्स पर भीड़ फँस गई थी, भीड़ पर कोई नियंत्रण नहीं था, बैरिकेडिंग कमजोर थी, पुलिस और आपातकालीन व्यवस्था पूरी तरह तैयार नहीं थी।

लोग कंधे से कंधा सटाकर खड़े थे, न आने-जाने के लिए साफ रास्ते थे जो कि भीड़ प्रबंधन के बुनियादी नियमों का खुले आम उल्लंघन है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव निर्मित त्रासदी थी।

यह विफलता पिछले साल मुंबई में टीम इंडिया की टी20 विश्व कप विजय परेड के आयोजन से बिलकुल अलग है। NDA नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार के तहत मरीन ड्राइव पर खुले बस में जुलूस निकाला गया, जिसमें नरीमन पॉइंट से चौपाटी तक भारी भीड़ जुटी थी। सटीक योजना, बहु-स्तरीय सुरक्षा और पुलिस की मजबूत तैनाती के कारण कोई बड़ी घटना नहीं हुई।

बेंगलुरु में तो खुली बस परेड का प्रयास भी नहीं किया गया। फिर भी, स्टेडियम में आयोजित यह उत्सव भी घातक साबित हुआ।

शासक के बिना शासन

कोलकाता में हुए अराजकता और इस साल पहले बैंगलुरु में हुई भीषण त्रासदी एक ही पैटर्न को दिखाती हैं। विपक्ष की सरकारें व्यवस्था से ज्यादा दिखावे को तवज्जो देती हैं, सिस्टम की जगह प्रतीकों पर ध्यान देती हैं और सख्ती लागू करने के बजाय तुष्टिकरण करती हैं।

वे पुलिस को राजनीति का औजार बना देती हैं। अनुशासन लागू करने से कतराती हैं। उन्हें ‘सख्त’ दिखने का डर रहता है और जब हालात हाथ से निकल जाते हैं, तो वही पुराना तरीका अपनाया जाता है- माफी, मुआवजे की घोषणा और जाँच समितियाँ। कानून-व्यवस्था कोई वैकल्पिक काम नहीं है। यही सरकार की वैधता की बुनियाद होती है।

कोलकाता में लाठीचार्ज के बीच बिना किसी को दिखे मेसी का निकाल लिया जाना और बेंगलुरु में इस साल प्रशंसकों का कुचले जाकर मारे जाना ये कोई दुर्भाग्यपूर्ण संयोग नहीं हैं। ये गहरी शासन-व्यवस्था की नाकामी के लक्षण हैं।

भारत को घटना के बाद माफी माँगने वाली सरकारें नहीं चाहिए। भारत को ऐसी सरकारें चाहिए जो अराजकता पैदा होने से पहले ही उसे रोकें। बार-बार विपक्ष-शासित राज्यों ने यह दिखाया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे शासन के सबसे बुनियादी काम में भी वे पूरी तरह नाकाम हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

तुषार शर्मा की हत्या, हाशिम की गिरफ्तारी और बुलडोजर एक्शन: जानिए उत्तराखंड के खटीमा में क्यों हो रहा बवाल, हिंदू क्या माँग लेकर सड़क पर उतरे

उत्तराखंड के खटीमा में जुमे के दिन पुरानी रंजिश में हिंदू युवक तुषार शर्मा की हाशिम ने चाकू से गोदकर हत्या कर दी। तुषार की हत्या से पूरे इलाके में माहौल बिगड़ गया। गुस्साए स्थानीय लोगों ने सड़कों पर उतरकर खूब हंगामा किया। खटीमा में रविवार (14 दिसंबर 2025) को BNS की धारा 163 लागू की गई है।

पुलिस ने आरोपित हाशिम को एनकाउंटर में गिरफ्तार कर लिया, उसके पैर में गोली लगी है। सोशल मीडिया पर भी घटना से संबंधित कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि तुषार की हत्या उसकी हिंदू पहचान के चलते की गई है। हमलावर की शब्द थे- “ये हिंदू है। इसको मारो चाकू।” आइए जानते हैं निर्मम हत्या से लेकर मचे बवाल की पूरी सच्चाई।

कहासुनी के बाद तुषार पर चाकू घोंपा, दो अन्य भी घायल

शुक्रवार (12 दिसंबर 2025) को ऊधर सिंह नगर जिल के खटीमा में रोडवेज बस अड्ड् के पास हुई चाकूबाजी की घटना ने अब तूल पकड़ लिया है। आश्रम पद्धति विद्यालय के पीछे वाले मकान में रहने वाले 24 साल के तुषार शर्मा पर हाशिम और उसके 5 साथियों ने हमला किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना रात लगभग 9.30 बजे की है, जब तुषार, सलमान और अभय बस अड्डे के पास चाय की दुकान पर खड़े थे। तभी गोटिया इस्लामनगर से आए हाशिम और कुछ युवकों से तुषार की कहासुनी हो गई।

देखते ही देखते दोनों गुटों में मारपीट शुरू हो गई। तभी अचानक हमलावरों ने तुषार पर चाकू से वार किया। इस हमले में सलमान और अभय को भी गंभीर रूप से घायल हुए। तीनों घायलों को जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर ने तुषार को मृत घोषित कर दिया। वहीं दो घायलों को इलाज के लिए हायर सेंटर रेफर किया गया। यह भी सामने आया कि दोनो गुटों में पुरानी रंजिश चल रही थी।

दो साल पहले तुषार की हुई थी शादी

तुषार शर्मा ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करने वाला एक मामूली युवक था। दो साल पहले ही तुषार की शादी हुई थी। तुषार के पिता मनोज शर्मा कैंची-चाकू पर धार लगाने का काम करते हैं। तुषार की मौत से पूरा परिवार सदमे में है।

पति की हत्या के बाद पत्नी ने कहा कि तुषार के हाथ पीछे बाँधकर चाकू घोंपा गया। उन्होंने कहा कि घर में उनके ससुर 60 साल के हैं। वे सरकार से मुआवजा और नौकरी चाहती हैं। साथ ही इंसाफ की माँग करते हुए आरोपितों को मौत के घाट सुलाने और फाँसी की सजा का सरकार से आग्रह किया है।

तुषार की हत्या पर स्थानीय लोगों का प्रदर्शन

तुषार की हत्या के बाद स्थानीय लोगों के बीच आक्रोश है। अगले दिन शनिवार (13 दिसंबर 2025) को गुस्साए लोगों ने जुलूस निकाला और आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। हत्या के विरोध में व्यापारियों ने दुकानें बंद रखी। पूरे इलाके में तनाव की स्थिति के बीच भारी पुलिसबल तैनात किया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं संग सैंकड़ों लोगों ने घटनास्थल के पास चाय की दुकान को आग के हवाले कर दिया, जो कथित तौर पर आरोपित हाशिम के अब्बा की थी। आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ की। लोगों ने इकट्ठा होकर खटीमा कोतवाली का घेराव कर आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की।

घटना के विरोध में सितारगंज मार्ग, टनकपुर मार्ग, मेलाघाट मार्ग और पीलीभीत मार्ग के अधिकतर व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद रखीं। खटीमा के मुख्य चौराहे और रोडवेज स्टॉपेज के पास भी गुस्साए लोगों की भीड़ ने जाम लगाने का प्रयास किया। लेकिन पुलिस ने लोगों को समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। साथ ही आरोपितों की जल्द गिरफ्तारी का आश्वासन दिया।

खटीमा में धारा 163 लागू

इस दौरान पुलिस और गुस्साए लोगों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई। वहीं पुलिस ने जामा मस्जिद के सामने इकट्ठा हो रहे लोगों पर भी लाठीचार्ज किया। पूरे इलाके में माहौल बिगड़ने के बीच भारी पुलिस बल तैनात किया गया और मुख्य चौक के 200 मीटर के दायरे में धारा 163 लागू की गई। पुलिस ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी।

आरोपित हाशिम पर पुलिस ने कसी नकेल

पुलिस ने खटीमा में हुई चाकूबाजी की घटना में मुख्य आरोपित हाशिम की पहचान की। पुलिस को सूचना मिली कि घटना के बाद हाशिम खटीमा से भागने की फिराक में है, जिसके बाद पुलिस ने इलाके में छापेमारी और घेराबंदी की।

पुलिस ने हाशिम को तलाश लिया, लेकिन उसने पुलिसकर्मियों पर फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में हाशिम पर फायरिंग की, जो उसके पैर में जा लगी। घायल हाशिम को तुरंत स्थानीय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसका इलाज जारी है। अस्पताल से सामने आई तस्वीरों में हाशिम पुलिस से माफी माँगता नजर आ रहा है।

खटीमा SSP मणिकांत मिश्रा का कहना है कि तुषार की हत्या मामले में दो अन्य आरोपितों की भी पहचान कर ली गई है। पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार दबिश दे रही है। उन्होंने क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने की भी अपील की।

प्रशासन की बुलडोजर कार्रवाई

वहीं खटीमा प्रशासन ने शनिवार (13 दिसंबर 2025) को आरोपित हाशिम के अब्बा की चाय की दुकान पर बुलडोजर कार्रवाई की। यह कार्रवाई घटनास्थल के पास लोक निर्माण विभाग की जमीन पर किए गए अतिक्रमण को हटाने का हिस्सा रही।

इस दौरान उपजिलाधिकारी, तहसीलदार, एडिशनल एसपी, सीओ समेत भारी पुलिस बल मौजूद रहा। उपजिलाधिकारी ने कहा कि अतिक्रमण स्थल पर अराजक तत्वों के जमावड़े की शिकायत आती रहती है, इसीलिए अतिक्रमण को ध्वस्त किया गया है।

धुरंधर और टूटता बॉलीवुड नैरेटिव: सिनेमा से लौट रही है भारत की दबाई गई स्मृति

हिंदी फिल्म धुरंधर (Dhurandhar) ने फिर से उन सवालों को चर्चा में ला दिया है, जिससे भारत का मनोरंजन उद्योग खासकर बॉलीवुड भागता है। इसकी सफलता ने बॉलीवुड के नैरेटिव गैंग को इस कदर हिला दिया है कि जो मनोरंजन के नाम पर ‘एजेंडा’ परोसते रहे हैं, वे अब ‘प्रोपेगेंडा’ चिल्ला रहे हैं।

इस सबकी शुरुआत ‘द कश्मीर फाइल्स’ से हुई। इसके बाद ‘धुरंधर’ तक की यात्रा में कई फिल्में आ चुकी हैं जो बताती हैं कि असल में जमीन पर क्या हुआ था। कौन पीड़ित था और कौन अपराधी।

सिनेमा की दुनिया में आए इस बदलाव ने उस नैरेटिव को तोड़ दिया है जो सालों तक आतंकी को ‘मजबूर’, हिंदू को ‘विलेन’ और भारत को ‘गिल्टी’ दिखाकर गढ़ा गया था। स्क्रीन पर जिहाद को रोमांस बनाकर तो मंदिर को पाखंड का केंद्र दिखाकर परोसा गया।

ऐसा नहीं है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ से पहले कश्मीर की पृष्ठभूमि पर फिल्में नहीं बनी थी। लेकिन इससे पहले की फिल्मों में एक सुनियोजित तरीके से कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार छिपाया गया। कुछ गिनी-चुनी फिल्मों को छोड़ दें तो सेना पर जो भी फिल्में बनीं, उनमें उन्हें अक्सर ‘दमनकर्ता’ के तौर पर दिखाया गया। उन्हें कठोर, भावशून्य या सिस्टम का हत्यारा के तौर पर पेश किया गया। मानो राष्ट्र की सुरक्षा उनका कर्तव्य न होकर, किसी पर अत्याचार करना ही उनका मिशन हो।

एक तरफ हिंदू चरित्रों को खलनायक, अज्ञानी, ढोंगी, लालची, अत्याचारी, जातिवादी, कट्टर, अंधविश्वासी के सीमित रेखाचित्रों में उतारा गया, दूसरी तरफ गैर हिंदू चरित्रों को अक्सर नेकदिल, संतुलित, सभ्य, उदारवादी, बुद्धिमान और इंसानियत की चाशनी में डूबोकर परोसा गया।

समस्या सिनेमाई विविधता नहीं है। समस्या वह नैरेटिव है, जिसमें हमेशा एक धार्मिक समुदाय के लोग विलेन और अन्य मजहबी लोग सहृदय और पीड़ित ही नजर आते हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ हो या ‘धुरंधर’ वे सीधे इसी खेल पर अटैक कर रहे हैं और ठेकेदारों से पूछ रहे हैं कि संतुलन किधर है? सत्य किधर है? बिना फिल्टर वाली कहानियाँ कहाँ दबी हैं?

इन सवालों को महज यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन है। असल में सिनेमा मनोरंजन के साधन से कहीं अधिक, स्मृति की मशीन है। जो स्क्रीन पर दिखता है वह आम लोगों के मस्तिष्क पर भी प्रभाव छोड़ता है। फिर एक समय आता है वही धीरे-धीरे समाज का ‘सच’ भी बन जाता है।

ऐसा भी नहीं है कि यह सब अनजाने में हुआ। यह तयशुदा सांस्कृतिक नैरेटिव का हिस्सा था। उद्देश्य यह था कि बॉलीवुड एक ऐसी दुनिया गढ़े, जिसमें अपराधी का दिल सोने का हो। आतंकवादी की ‘मजबूरी’ हो। राष्ट्र विरोध किसी ‘कला’ का नाम हो।

यदि यह भूल अनजाने में हुआ होता तो किसी अनुपमा चोपड़ा को ‘धुरंधर’ को टेस्टोस्टेरोन हेवी, श्रिल नेशनलिज़्म और एंटी-पाकिस्तान नैरेटिव वाला सिनेमा कहने की जरूरत ही नहीं होती। फिल्म क्रिटिक्स गिल्ड (FCG) दूसरे पक्ष के लोगों की प्रतिक्रिया को ऑनलाइन हमलों और डराने-धमकाने का तमगा नहीं देता। रितिक रोशन को इस सिनेमा में ‘राजनीति’ नहीं दिखती।

ऐसा भी नहीं है कि यह सब पहली बार हुआ है। गैंग बनाकर इसी तरह ‘द कश्मीर फाइल्स’ से लेकर ‘द केरला स्टोरी’ के पक्ष की आवाज को दबाने के प्रयास हुए, क्योंकि इन फिल्मों ने बताया कि आतंकवाद को लेकर बॉलीवुड की रहस्यमयी सहानुभूति रही है।

आप किसी भी पुरानी फिल्म को उठा लीजिए। ‘मिशन कश्मीर’ का आतंकी हो या ‘फना’ का या फिर ‘रोजा’ और ‘दिल से’ का, आतंकवाद को हमेशा ‘भावनात्मक संघर्ष’ के रूप में दर्शकों के सामने परोसा गया। यह बताया गया कि बम फेंकने वाले का भी मन कच्चा होता है। गोली चलाने वाले के भीतर एक प्रेम कथा दबी होती है।

इसका नतीजा क्या निकला? धीरे-धीरे नवयुवकों के मन में आतंक/अपराध के प्रति एक रोमांटिक धुंध घर करती गई। असल पीड़ित यानी आम नागरिक कहीं पीछे छूट गए। पर्दे पर भावनाओं का सैलाब बहाकर आतंकवाद के असल स्वरूप, उसकी विचारधारा, उसके मजहब, उसके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की चर्चाओं को गौण कर दिया गया। जमीन पर बम के धमाके दहशत फैला रहे थे, पर्दे पर कैमरा आत्मा के महासागर में उतरकर आतंकवादी का ‘चोटिल हृदय’ दिखा रहा था।

दूसरी तरफ कहानी कोई भी हो, कैसी भी हो, धार्मिक हिंदू ​चरित्रों का चित्रण हास्यास्पद, लालची या ढोंगी तरीकों से किया गया। हिंदुत्व को लेकर अक्सर संकीर्ण दृष्टिकोण गढ़ा गया। मानो भारतीय अध्यात्म का मतलब केवल कर्मकांड और अंधविश्वास से ही है। सामाजिक न्याय को इस तरह एकपक्षीय रूप में उभारा गया कि केवल हिंदू चरित्र दमनकारी दिखे।

इसका नतीजा क्या निकला? दशकों तक देश का आम हिंदू भ्रमित और दबा हुआ रहा। बिना पहचान के केवल कहानी को आगे बढ़ाने का संसाधन भर बनकर रह गया। उसकी पहचान एक ऐसे समाज की बना दी गई जो प्रतिरोध नहीं करता। जिसकी कोई आवाज नहीं है। जिसके संस्कार मात्र ढोंग हैं। ‘संकीर्णता’ और ‘रूढ़िवादिता’ का उस पर बॉलीवुड ने ठप्पा ऐसे चिपका दिया कि वह वर्षों तक सांस्कृतिक भ्रम में जीता रहा।

इतना ही नहीं बॉलीवुड ने राष्ट्र को लेकर भी एक विकृत छवि गढ़ी। भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा को हवा दी। राष्ट्रभक्ति को भावनात्मक अतिवाद की तरह दिखाया। देश की समस्याओं का दोष हमेशा सिस्टम पर, हिंदुओं पर और उनके नेतृत्व पर थोपा गया। समाधान हमेशा विदेश में, इस्लाम में, ईसाइयत में दिखाया गया। इन सिनेमाई कथाओं के जरिए लगातार यह संकेत दिया गया कि भारत के भीतर कोई समाधान नहीं है। सच्ची आजादी, सच्ची आधुनिकता, सच्चा विवेक, हमेशा ‘वेस्ट’ से आता है।

इस नैरेटिव को गढ़ते समय बॉलीवुड के गैंग ने 2014 की कल्पना नहीं की होगी। उसने सोचा भी नहीं होगा कि कोई नरेंद्र मोदी आएगा और इस नैरेटिव को छिन्न-भिन्न कर देगा। वह सांस्कृतिक भ्रम में जी रहे हिंदुओं में ऐसी चेतना का प्रवाह करेगा कि उन्हें ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ कहने में संकोच नहीं होगा।

इस गैंग ने सोशल मीडिया जैसे किसी प्लेटफॉर्म की कल्पना नहीं की होगी जो आम हिंदुओं को अपनी कहानी कहने की अनुमति देता हो। दूसरे की गढ़ी कहानी ही सुनने/देखने की मजबूरी से स्वतंत्रता देती हो।

इन बदलावों ने आज बॉलीवुड की उस एकतरफ़ा संवेदनशीलता को उघाड़कर रख दिया है- जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आम नागरिक, उनकी पीड़ा और राष्ट्र के प्रति संवेदना कहीं बैकग्राउंड में दब जाती थी। अब ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’, ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में नया नैरेटिव गढ़ रही हैं। कश्मीरी हिंदुओं के पलायन और पीड़ा से लेकर आतंकवादी साजिशों को मुख्यधारा में दिखा रही हैं। पर्दे पर कहानियाँ पहली बार बिना फिल्टर के दर्शकों के सामने आ रही हैं।

यह नया सिनेमा किसी ‘प्रतिकार’ की भाषा नहीं बोलता, बल्कि वह कहानी कहता है जो कही नहीं गई। उन कहानियों को पर्दे के संसार से परिचित करा रही है, जिन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया था।

यही कारण है कि जब ऐसी कहानियों को जनता का भरपूर समर्थन और प्यार मिलता है तो लेफ्ट-लिबरल बेचैन हो जाते हैं। वे क्रोधित होते हैं। पूछते हैं- हमारा नैरेटिव कौन तोड़ रहा है? उनके साक्षात्कारों में, बयानों में, लेखों में, सोशल मीडिया पोस्टों में, फिल्म फेस्टिवल के मंचों पर एक ही आवाज होती है- यह प्रोपेगेंडा है।

बॉलीवुड का पुराना गठजोड़ आज भले अपने ही बोए हुए संवादों में उलझ चुका है। लेकिन यह यात्रा अभी लंबी है। संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। वह दिन भी आएगा जब नैरेटिव होना पर्याप्त नहीं होगा। उसके हर संवाद, हर फ्रेम को, जनता के थिएटर में सत्य के परीक्षण से गुजरना पड़ेगा। असल में यही वह बड़ा डर है जिसने पुराने फिल्म अभिजात्यों की नींद उड़ा रखी है। वे जान चुके हैं कि कौन सी कहानी भारत के परदे पर दिखेगी और कौन सी नहीं, यह अधिकार आम जनता उनसे धीरे-धीरे छीन रही है।

‘द कश्मीर फाइल्स’ से लेकर ‘धुरंधर’ जैसी फिल्में, केवल फिल्म नहीं हैं। वे एक संदेश दे रही हैं कि यह देश अब अपनी कहानी खुद लिखेगा। अपने पात्र खुद गढ़ेगा। अपनी त्रासदी, अपनी विजय, अपने संघर्ष, अपनी स्मृति- सबको खुद परिभाषित करेगा।

कौन हैं पंकज जो UP भाजपा के होंगे चौधरी, कभी PM मोदी पैदल ही पहुँच गए थे इनके घर

उत्तर प्रदेश बीजेपी के आगामी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में पंकज चौधरी का नाम लगभग तय हो चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रस्तावक बनने से पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता साफ दिखाई दे रही है। 14 दिसंबर 2025 को पंकज चौधरी का नाम प्रदेश अध्यक्ष के रूप में आधिकारिक तौर पर घोषित किए जाने की संभावना है। वर्तमान अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल समाप्त हो चुका है।

कुशल नेता और सामाजिक संतुलन के लिए अहम कदम

पंकज चौधरी को यूपी भाजपा की कमान सौंपी जा रही है, जिनके नेतृत्व में पार्टी ओबीसी समाज के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश करेगी। यह पार्टी के लिए एक रणनीतिक कदम है, खासकर 2027 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर। साथ ही, योगी आदित्यनाथ और पंकज चौधरी दोनों ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के पड़ोसी जिलों से होने के कारण पूर्वांचल क्षेत्र में पार्टी का प्रभाव और संतुलन बेहतर हो सकता है।

राजनीतिक यात्रा: पार्षद से सांसद तक

पंकज चौधरी का राजनीतिक सफर 1989 में गोरखपुर नगर निगम के पार्षद के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद वह डिप्टी मेयर बने और 1991 में पहली बार सांसद चुने गए। उन्होंने लगातार सात बार महाराजगंज लोकसभा सीट से जीत हासिल की और भाजपा में अपनी मजबूत पकड़ बनाई। 2021 से वह केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत हैं।

150 मीटर पैदल चलकर पंकज चौधरी के घर पहुँचे थे PM

केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी का कद तब और बढ़ गया था, जब 7 जुलाई 2023 को गीता प्रेस के शताब्दी समारोह के लिए गोरखपुर दौरे पर आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के उनसे मिलने का फैसला किया। पीएम मोदी की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संकरी गली के कारण उनका वाहन लगभग 150 मीटर दूर ही रुक गया था, जिसके बाद वह राज्यपाल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ पैदल चलकर पंकज चौधरी के घर पहुँचे।

पैदल चलकर पंकज चौधरी के घर पहुँचे थे पीएम मोदी

वहाँ उनकी माता उज्ज्वला चौधरी ने आरती उतारी और उन्हें ₹101 और हनुमान जी की मूर्ति सगुन के रूप में भेंट की। प्रधानमंत्री करीब 12 मिनट तक रुके, बच्चों से दुलार किया, और इस दौरान उन्होंने पंकज चौधरी से बड़े ही विनम्र भाव से पूछा था कि ‘जूता निकाल के अंदर जाना है’, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था।

परिवार और सामाजिक प्रभाव

पंकज चौधरी का परिवार भी राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहा है। उनके पिता स्वर्गीय भगवती प्रसाद चौधरी बड़े जमींदार थे, और माँ उज्ज्वला चौधरी ने महाराजगंज जिला पंचायत की अध्यक्षता की थी। उनकी पत्नी भाग्यश्री चौधरी भी सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं और उनका परिवार क्षेत्रीय राजनीति में एक मजबूत प्रभाव रखता है।

व्यवसायिक पृष्ठभूमि

राजनीति के अलावा पंकज चौधरी आयुर्वेदिक तेल ‘राहत रूह’ के निर्माता हरबंशराम भगवानदास कंपनी के मालिक भी हैं, जो पूर्वांचल में बहुत लोकप्रिय है। यह उनके व्यवसायिक प्रभाव को दर्शाता है, जो उन्हें क्षेत्रीय राजनीति में एक किंग मेकर की स्थिति में लाता है।

जातीय प्रभाव और चुनावी रणनीति

पंकज चौधरी कुर्मी समुदाय से आते हैं, जो यूपी में यादवों के बाद सबसे बड़ा OBC वर्ग है। पार्टी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बना कर इस वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव में गैर-यादव OBC वोटों को आकर्षित किया जा सके। यह कदम पार्टी को संगठन में संतुलन और सामाजिक प्रतिनिधित्व में भी मदद करेगा।

संपत्ति और राजनीतिक महत्व

पंकज चौधरी की संपत्ति 41 करोड़ रुपए से अधिक है, जिसमें कृषि भूमि, आवासीय और व्यावसायिक संपत्तियाँ शामिल हैं। उनके पास एक साफ-सुथरी राजनीतिक छवि है, जो पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनके नेतृत्व में पार्टी के लिए कई चुनावी लाभ हो सकते हैं।

पंकज चौधरी का उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में चयन पार्टी के लिए एक रणनीतिक और दूरदर्शी कदम है। उनकी राजनीतिक अनुभव, सामाजिक प्रभाव और ओबीसी समुदाय के साथ जुड़ाव यूपी भाजपा को आगामी चुनावों में मजबूती प्रदान करेगा।

ड्रग तस्करी का डर पुराना, अब टेरर फंडिंग का लगेगा आप पे इल्जाम: जानिए ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर कैसे धमकी देकर फँसा रहे जालसाज, समझ लें कॉल आने पर क्या करना होगा

साइबर ठगों ने अब धोखाधड़ी का एक और भी खतरनाक और मनोवैज्ञानिक (Psychological) तरीका अपना लिया है, जिसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) कहा जाता है। इसमें अपराधी पुलिस या सीबीआई जैसी सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को वीडियो कॉल करते हैं। वे पीड़ितों पर किसी बड़े अपराध, जैसे मनी लॉन्ड्रिंग या आतंकी साजिश में शामिल होने का झूठा आरोप लगाते हैं और तुरंत ‘गिरफ्तार’ करने की धमकी देते हैं।

खासकर हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह पाकिस्तानी जासूसों को पकड़ा गया, उसी का बहाना बनाकर आम लोगों को डराया जा रहा है कि उनके नाम पर देश विरोधी काम हो रहा है। डर के मारे लोग खुद को निर्दोष साबित करने के लिए ठगों के बताए फर्जी ‘सरकारी खातों’ में अपनी जीवन भर की कमाई ट्रांसफर कर देते हैं। अकेले भारत में इस तरह की धोखाधड़ी में लोग ₹3,000 करोड़ से ज़्यादा गँवा चुके हैं।

पहले कैसे होती थी डिजिटल धोखाधड़ी?

पहले के समय में डिजिटल धोखाधड़ी ज्यादातर तकनीकी चालों पर आधारित होती थी। इसमें अपराधी सीधे लोगों की तकनीकी जानकारी की कमी का फायदा उठाते थे। सबसे आम तरीका फिशिंग और ओटीपी स्कैम था, जिसमें ठग खुद को बैंक कर्मचारी या कस्टमर केयर अधिकारी बताकर फोन करते थे। वे खाते में गड़बड़ी, KYC अपडेट या कार्ड ब्लॉक होने का डर दिखाते थे और बहाने से एटीएम पिन, डेबिट कार्ड नंबर या OTP पूछ लेते थे। जैसे ही ओटीपी मिलता, कुछ ही मिनटों में खाते से पैसे गायब हो जाते थे और पीड़ित को तब तक कुछ समझ नहीं आता था।

एक और तरीका सिम स्वैप फ्रॉड का था। इसमें अपराधी किसी तरह पीड़ित की निजी जानकारी हासिल कर लेते थे और टेलीकॉम कंपनी से उसका सिम बंद करवा देते थे। इसके बाद उसी नंबर का नया सिम अपने नाम पर जारी करवा लेते थे। इससे बैंक के सभी मैसेज, कॉल और OTP अपराधियों के पास पहुँचने लगते थे। फिर वे आराम से बैंक अकाउंट में लॉगिन कर पैसे निकाल लेते थे, जबकि असली खाताधारक को तब तक पता भी नहीं चलता था कि उसके सिम के साथ कुछ गलत हो चुका है।

इसके अलावा रिमोट एक्सेस फ्रॉड भी काफी आम था। इसमें अपराधी किसी बहाने से पीड़ित को एक ऐप डाउनलोड करने को कहते थे, जैसे कि कस्टमर सपोर्ट ऐप या स्क्रीन शेयरिंग ऐप। जैसे ही ऐप डाउनलोड होता, अपराधी फोन या कंप्यूटर का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते थे। फिर वे सामने बैठकर ही बैंकिंग ऐप खोलते, ट्रांजेक्शन करते और खाते से पैसा निकाल लेते थे, जबकि पीड़ित सिर्फ स्क्रीन पर सब कुछ होता हुआ देखता रह जाता था।

कई मामलों में अपराधी लॉटरी या इनाम का लालच भी देते थे। लोगों को फोन या मैसेज करके बताया जाता था कि उन्होंने बड़ी लॉटरी, कार या लाखों रुपए का इनाम जीत लिया है। इनाम पाने के लिए उनसे पहले ‘रजिस्ट्रेशन फीस’, ‘प्रोसेसिंग चार्ज’ या ‘टैक्स’ के नाम पर कुछ पैसे भेजने को कहा जाता था। जैसे ही लोग लालच में आकर पैसे भेजते थे, अपराधी गायब हो जाते थे और न तो इनाम मिलता था, न ही भेजा गया पैसा वापस आता था।

कुल मिलाकर, पहले की डिजिटल धोखाधड़ी में अपराधी तकनीकी तरीकों और लालच का इस्तेमाल करते थे। वे सीधे बैंक की जानकारी, ओटीपी या डिवाइस तक पहुँच बनाने की कोशिश करते थे। लेकिन अब यही अपराधी एक कदम आगे बढ़कर डर, दबाव और मानसिक तनाव का सहारा लेने लगे हैं, जिसे आज हम ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए और खतरनाक फ्रॉड के रूप में देख रहे हैं।

डर/’डिजिटल अरेस्ट’ नया हथियार

साइबर अपराधियों ने अब लोगों को ठगने के लिए केवल टेक्नोलॉजी (तकनीक) का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है। अब वे लोगों के डर का फायदा उठाकर उन्हें फँसाते हैं। इसी नए और खतरनाक तरीके को ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहते हैं।

  • सरकारी अधिकारी बनकर धमकाना- इस तरीके में अपराधी खुद को सीबीआई, पुलिस, ईडी या कस्टम विभाग के बड़े अधिकारी बताते हैं। वे स्पूफिंग नाम की तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे आपके फोन पर असली सरकारी एजेंसी का नंबर दिखाई देता है, ताकि आपको तुरंत यकीन हो जाए। वे अक्सर आपको डराते हैं कि आपके बैंक खाते, आधार कार्ड या फोन नंबर का इस्तेमाल किसी बड़े और गंभीर अपराध (जैसे मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स तस्करी या आतंकी फंडिंग) में हुआ है।

हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले जैसी सच्ची घटनाओं का बहाना बनाकर भी वे लोगों को फँसाते हैं। उदाहरण के लिए, वे किसी 67 साल की महिला को फोन करके डराते हैं कि उनका खाता हजारों करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। कुछ मामलों में, वे पहले TRAI का अधिकारी बनकर फोन करते हैं, और फिर तुरंत ‘क्राइम ब्राँच’ को कॉल ट्रांसफर करके दबाव बनाना शुरू कर देते हैं।

  • वीडियो कॉल पर ‘नकली कोर्ट’ दिखाना- डर पैदा करने के लिए अपराधी आपको वीडियो कॉल पर आने को कहते हैं। कॉल पर वे खुद पुलिस की वर्दी या जज के काले कपड़े पहनकर बैठते हैं। वे पीछे का बैकग्राउंड भी किसी फर्जी पुलिस स्टेशन या कोर्ट रूम जैसा दिखाते हैं। वे पीड़ित को नकली सरकारी पहचान पत्र और नोटिस भी भेजते हैं।

इसके बाद वे पीड़ित को धमकी देते हैं कि उसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ के तहत पकड़ा गया है, और अगर उसने उनकी बात नहीं मानी तो उसे तुरंत जेल भेज दिया जाएगा या उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। कुछ बड़े मामलों में, जैसे ₹58 करोड़ के एक केस में, ठग 40 दिनों तक लगातार वीडियो कॉल पर बने रहे और नकली कोर्ट की सुनवाई करके बार-बार जुर्माना या शुल्क भरने के लिए दबाव बनाते रहे।

  • डर दिखाकर पैसे हड़पना- डर और दबाव के आगे हार मानकर, पीड़ित खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए अपराधियों की बात मानने लगता है। ठग उन्हें समझाते हैं कि ‘जाँच’ या ‘जमानत’ के लिए उन्हें तुरंत अपनी सारी रकम उनके बताए ‘सरकारी खातों’ में ट्रांसफर करनी होगी। अपराधी पीड़ितों को किसी से भी बात न करने की धमकी देते हैं, यहाँ तक कि अपने परिवार से भी नहीं।

इसी डर के कारण, पीड़ित मिनटों के अंदर अपनी जिंदगी भर की कमाई (करीब 80 से 90 प्रतिशत) ठगों के खातों में बार-बार ट्रांसफर कर देता है। जाँच में पता चला है कि ठगी का यह सारा पैसा फिर क्रिप्टोकरेंसी में बदला जाता है और म्यांमार या अरब देशों में बैठे अपराधियों के पास पहुँच जाता है, जहाँ ये गैंग ‘स्लेव कंपाउंड्स’ में बैठकर लोगों को ठगने का काम करते हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुजरात के कुछ ऐसे ही आरोपितों पर ₹104 करोड़ से ज्यादा की ठगी का आरोप लगाया है, जिन्होंने पूरा नकली पुलिस स्टेशन ही बना रखा था।

डिजिटल अरेस्ट के झाँसे से बचने के आसान तरीके

यह जरूरी है कि आप इन साइबर जालसाजों के डर के झाँसे में न आएँ और समझदारी से काम लें। इसके लिए ये तीन आसान उपाय अपनाएँ।

  • फौरन उठाएँ ये कदम- अगर कोई आपको अचानक फोन करके खुद को पुलिस, सीबीआई, या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताता है और आपको किसी बड़े अपराध में फँसा होने की बात कहकर डराता है, तो बिना देर किए तुरंत कॉल काट दें। यह बात हमेशा याद रखें कि किसी भी सरकारी अधिकारी या एजेंसी को फोन या वीडियो कॉल पर पैसे देने की कोई जरूरत नहीं होती।

वे कभी भी ‘जाँच फीस’, ‘जमानत राशि’ या ‘वेरिफिकेशन चार्ज’ के लिए आपसे ऑनलाइन पैसा नहीं माँगते। अगर वीडियो कॉल पर कोई वर्दी में भी दिखे तो भी घबराएँ नहीं, क्योंकि भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम की कोई चीज नहीं है।

  • सच्चाई की जाँच करें और शिकायत दर्ज कराएँ- फोन काटने के बाद तुरंत उस सरकारी एजेंसी (जैसे CBI या पुलिस) के ऑफिशियल हेल्पलाइन नंबर पर खुद फोन करें और इस दावे की सच्चाई पता लगाएँ। अगर आपको लगता है कि आपको ठगा जा रहा है या कोई आपको धमकी दे रहा है, तो देरी न करें।

तुरंत नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करके या www.cybercrime.gov.in पर जाकर शिकायत दर्ज कराएँ। साथ ही, अपने बैंक को तुरंत सूचित करें। बैंक को बड़े लेनदेन के बारे में जरूर बताएँ और हमेशा कूलिंग पीरियड (एक समय सीमा जो बड़ी रकम ट्रांसफर करने से पहले मिलती है) का इस्तेमाल करें ताकि गलती होने पर उसे सुधारा जा सके।

  • हमेशा रहें सुरक्षित और सचेत- सुरक्षित रहने के लिए, सबसे पहले अपने परिवार और खासकर बुजुर्गों को इन स्कैम के बारे में बताकर उन्हें जागरूक करें। फोन पर कभी भी अपना पासवर्ड, एटीएम पिन या ओटीपी (OTP) किसी के साथ शेयर न करें, बैंक भी यह जानकारी कभी नहीं माँगता। अगर अपराधी आपको धमकाएँ कि आप किसी से बात न करें तो यह सबसे बड़ा खतरे का निशान है। तुरंत अपने परिवार और दोस्तों को बताएँ ताकि आप अकेले न पड़ें।

सरकार और बैंकों के नियम-कानून

लोकसभा में सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने चिंता जताते हुए कहा कि लोगों को इन डिजिटल धोखाधड़ी से बचाने के लिए सरकार और बैंकिंग सिस्टम को बड़े और जरूरी बदलाव करने होंगे।

पहला, उन्होंने AI-आधारित सुरक्षा नियम लागू करने की माँग की। इसका मतलब है कि बैंकों के सिस्टम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल हो। यह AI, किसी भी ग्राहक के खाते से हो रहे अचानक और बड़ी रकम के असामान्य लेनदेन को तुरंत पहचान ले (जैसे एक बूढ़े व्यक्ति का अचानक लाखों रुपए भेजना)। ऐसे लेनदेन को खतरे का निशान (Red Flag) मानकर AI तुरंत रोक दे, ताकि ठगी पूरी न हो सके।

दूसरा, बृजमोहन अग्रवाल ने एस्क्रो मैकेनिज्म नाम की एक व्यवस्था शुरू करने का सुझाव दिया। यह एक तरह की सुरक्षा तिजोरी की तरह काम करेगी। जब कोई ग्राहक किसी नए व्यक्ति को बहुत बड़ी रकम भेजेगा, तो वह रकम तुरंत उस व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगी, बल्कि कुछ समय के लिए बैंक के पास सुरक्षित रहेगी। इससे पीड़ित को अपनी गलती का एहसास होने और उसे सुधारने का जरूरी समय मिल जाएगा, जिससे पैसा डूबने से बच जाएगा।

इसके अलावा, उन्होंने बैंकों की लापरवाही पर भी उंगली उठाई। उन्होंने महाराष्ट्र के उस बड़े मामले का उदाहरण दिया जहाँ एक व्यक्ति ने 40 दिनों के अंदर 27 बार जाकर ₹58 करोड़ ट्रांसफर कर दिए, लेकिन बैंक के सुरक्षा सिस्टम ने कोई अलर्ट या चेतावनी जारी नहीं की।

सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि बैंकों को अपने संदेहास्पद गतिविधि पहचानने वाले सिस्टम को बहुत मजबूत बनाना होगा। साथ ही, महाराष्ट्र साइबर विभाग और SBI जैसी संस्थाएँ लगातार लोगों को चेतावनी दे रही हैं कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है और पुलिस कभी फोन पर पैसे नहीं माँगती है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ सिर्फ एक साइबर क्राइम नहीं है, यह भरोसे और डर का सुनियोजित हत्यारा है। यह दिखाता है कि अपराधी अब केवल तकनीकी कमजोरियों को नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान को निशाना बना रहे हैं। जिस देश में लोग कानून और सरकारी अधिकारियों का बेहद सम्मान करते हैं, वहाँ सरकारी वर्दी का डर सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।

यह जरूरी है कि बैंक और सरकारें मिलकर काम करें। केवल लोगों को जागरूक करने से काम नहीं चलेगा। जैसा कि सांसद अग्रवाल ने कहा, जब कोई व्यक्ति दबाव में आकर अपनी जिंदगी की 80% कमाई मिनटों में ट्रांसफर कर देता है, तो हमारा बैंकिंग सिस्टम उसे ‘स्टैंडर्ड ट्रांजैक्शन’ मानकर आँखें बंद नहीं कर सकता। कड़े AI-आधारित सुरक्षा नियम, अनिवार्य कूलिंग पीरियड, और बैंकों की जवाबदेही ही इस नए मानसिक आतंकवाद को रोक सकती है। लोगों को भी यह समझना होगा कि कानून हमेशा कागज पर, आमने-सामने और सही प्रक्रिया से काम करता है, न कि एक अचानक आए वीडियो कॉल पर डर पैदा करके।

‘योगी सरकार नहीं होती तो सजा नहीं मिलती’: बहराइच हिंसा में मारे गए राम गोपाल मिश्रा के भाई बोले- ‘सपा के सरकार होत तो उल्टा हमहै सब बंद होए जात’

उत्तर प्रदेश के बहराइच में अक्टूबर 2024 को हुए सांप्रदायिक दंगों के दोषियों को कोर्ट ने सजा सुनाई है। कोर्ट ने दंगों के मुख्य दोषी सरफराज उर्फ रिंकू को कोर्ट ने फाँसी की सजा दी है, 9 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस मामले में मृतक राम गोपाल मिश्रा के भाई हरिमिलन ने योगी सरकार को धन्यवाद कहते हुए कहा कि वो सरकार द्वारा की गई पैरवी से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा कि अगर बीजेपी की सरकार नहीं होती, तो उन्हें न्याय नहीं मिलता। न्याय मिलना तो छोड़िए, उल्टे हम पीड़ितों के खिलाफ ही कार्रवाई होती।

रामगोपाल मिश्रा के भाई हरिमिलन मिश्रा ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि उन्होंने कहा है कि योगी सरकार है तभी आरोपितों को सजा हो पाई है। वरना सपा सरकार होती तो हमें (हिंदुओं) को ही जेल में बंद कर दिया जाता। उन्होंने अवधी में बोलते हुए कहा, “योगी सरकार न होत भाजपा कै, तो इहो सजा कहाँ होई पावत। सपा के सरकार होत तो उल्टा हमहै सब बंद होए जात।”

हरिमिलन ने कहा कि 3 अन्य आरोपितों के बरी होने से उन्हें आगे चलकर दिक्कत हो सकती है, पता नहीं कैसे वो बरी हो गए।

हरिमिलन मिश्रा ने रामगोपाल मिश्रा के साथ हुई हैवानियत को भी बयाँ किया। उन्होंने बताया कि जब भाई का शव उन्हें मिला था, पोस्टमार्टम के बाद.. तब भी पैरों की उंगलियों से खून रिस रहा था। नाखून उखड़े हुए थे। चार्जशीट और कोर्ट के फैसले में भी यही बात है।

हरिमिलन मिश्रा ने योगी सरकार द्वारा की गई पैरवी पर संतुष्टि जताई। उन्होंने कहा कि अगर सपा सरकार होती, तो हम लोगों को ही जेल में सड़ा दिया जाता।

बता दें कि गुरुवार (11 दिसंबर 2025) को बहराइच की एक कोर्ट ने मामले में सुनवाई करते हुए 10 लोगों को दंगों का दोषी करार देकर सजा सुनाई। कोर्ट ने सरफराज को राम गोपाल मिश्रा की हत्या के अपराध में फाँसी की सजा दी है, जबकि बाकी 9 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इनमें सरफराज के अब्बा अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब उर्फ सबलू भी शामिल हैं।

अन्य दोषियों में सैफ, जावेद, जीशान, ननकाउ, शोएब और मरुफ शामिल हैं। हालाँकि, पर्याप्त सबूतों के अभाव में तीन अन्य लोगों खुर्शीद, शकील और अफजल को बरी कर दिया गया। कोर्ट का यह फैसला अक्टूबर 2024 में हुई घटना के 14 महीने बाद आया है।

गौरतलब है कि यह घटना 13 अक्टूबर 2024 को बहराइच के रेहुआ मंसूर गाँव में दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान घटी। जब गाँव के मुस्लिमों ने विसर्जन में गाने पर विवाद शुरू किया, जो देखते ही देखते ही हिंसा में बदल गया। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर पथराव किया, जिसमें कई घायल हुए। पत्थरबाजी में विसर्जन के लिए ले जाई जा रही दुर्गा पूजा की मूर्तियों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया। जवाबी हिंसा में हिंदुओं ने आसपास के घरों और दुकानों में भी तोड़फोड़ की।

हिंसा के दौरान राम गोपाल मिश्रा पर छत पर चढ़कर हरे झंडे को हटाने का आरोप लगाया गया था। इसी के चलते सरफराज उर्फ रिंकू ने राम गोपाल मिश्रा को गोली मार दी। इस मामले में पुलिस ने कुल 13 FIR दर्ज कराई, जिनमें से 11 हरदी पुलिस थाने और दो रामगाँव पुलिस थाने में दर्ज की गईं।

पुलिस ने घटना की जाँच के बाद मुख्य आरोपित समेत 13 लोगों को आरोपित बनाया। इनमें से 5 आरोपितों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई, जिनमें अब्दुल हमील, मोहम्मद तालिब उर्फ सबलू, मोहम्मद सरफराज अहमद उर्फ रिंकू, शकील अहमद उर्फ बबलू और खुर्शीद शामिल थे। बाद में बाकी 8 आरोपितों पर भी NSA लगाया गया।

कार्तिगई दीपम पर फैसला देने वाले मद्रास HC के जज स्वामीनाथन के खिलाफ सियासी साजिश, महाभियोग की आड़ में DMK-कॉन्ग्रेस का न्यायपालिका पर हमला

तमिलनाडु की पवित्र थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम की लौ जलाने का पारंपरिक अधिकार अब एक संवैधानिक संकट में बदल चुका है। मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने कानूनी तर्कों के साथ हिंदू समुदाय के इस प्राचीन अनुष्ठान को हरी झंडी दिखाई, लेकिन DMK के नेतृत्व में INDI गठबंधन ने इसे ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ का हथियार बताते हुए जज के खिलाफ महाभियोग का नोटिस ठोक दिया। 9 दिसंबर 2025 को लोकसभा स्पीकर को सौंपे गए इस नोटिस पर प्रियंका गाँधी, अखिलेश यादव समेत 120 सांसदों के हस्ताक्षर हैं।

यह महज एक फैसले का मामला नहीं, बल्कि एंटी-हिंदू ताकतों की लंबी साजिश का हिस्सा है, जहाँ DMK, कॉन्ग्रेस, वामपंथी दल और इस्लामी कट्टरपंथी मिलकर न्यायपालिका को भी अपने निशाने पर ले रहे हैं। हिंदू परंपराओं को कुचलने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर हमला बोलना इनकी पुरानी आदत है, और यह पहला मौका नहीं जब किसी जज को हिंदुओं के हक में सही फैसला देने के लिए बदनाम किया गया हो।

कोर्ट के फैसले को नहीं मान रही DMK सरकार

कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो कार्तिगई मास की पूर्णिमा पर मनाया जाता है। यह प्रकाश की विजय का प्रतीक है, जहां दीपक जलाकर अंधकार पर अच्छाई की जीत का उत्सव होता है। छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा निर्मित थिरुपरनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवासों में से पहला है। ये कार्तिगई दीपम उत्सव का केंद्र रहा है। पहाड़ी को काटकर तराशा गया यह मंदिर रोजाना तीन बार पूजा-अभिषेक और दीप आराधना का साक्षी है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस्लामी कट्टरपंथी तत्व पहाड़ी पर कब्जे की कोशिश कर रहे हैं।

मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने यहाँ नमाज की माँग की, नाम बदलने की साजिश रची, और अब दीपम जलाने की परंपरा को ही चुनौती दे रहे हैं। पहाड़ी की चोटी पर स्थित ‘दीपथून’ (दीपस्तंभ) पर पारंपरिक रूप से दीपक जलाया जाता रहा है, लेकिन सिकंदर बादूशा दरगाह के निकट होने के कारण DMK सरकार ने इसे ‘संवेदनशील’ बताकर रोक लगा दी।

मद्रास हाई कोर्ट के जज ने दी थी दीपक जलाने की अनुमति

जस्टिस स्वामीनाथन की सिंगल बेंच ने 4 दिसंबर 2025 को शाम 6 बजे तक दीपक जलाने की अनुमति दी। उन्होंने साल 1923 के पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इससे मुस्लिम समुदाय के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। बल्कि दीप न जलाने से मंदिर की भूमि पर मालिकाना हक कमजोर हो सकता है। उन्होंने दरगाह प्रबंधन की अनधिकृत कब्जे की कोशिशों पर चेतावनी दी और कहा कि मंदिर प्रशासन को सतर्क रहना होगा।

जब DMK सरकार ने कानून-व्यवस्था का बहाना बनाकर आदेश की अवहेलना की, तो जज ने बाइबिल का उद्धरण देते हुए हताशा जताई, “हे पिता, इन्हें माफ कर दो, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं।” उन्होंने मुख्य सचिव को समन जारी किया और ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ पर सवाल उठाया।

जज स्वामीनाथन के आदेश के खिलाफ डीएमके सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट की डबल बेंच (जस्टिस जयचंद्रन और के.के. रामकृष्णन) में अपील की, लेकिन डबल बेंच ने भी सिंगल बेंच के आदेश को सही ठहराया, कहा कि इसमें कोई नियम उल्लंघन नहीं है। CISF की सुरक्षा का आदेश पुलिस की नाकामी के कारण दिया गया था।

अल्पसंख्यक वोटबैंक के लिए न्याय पालिका को बनाया जा रहा निशाना

DMK का यह कदम महज संयोग नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश है। पार्टी ने आरोप लगाया कि जज का फैसला 2017 की खंडपीठ के फैसले के खिलाफ है और चुनाव से पहले सांप्रदायिक तनाव फैला रहा है। नेता टीआर बालू ने लोकसभा में कहा, “भाजपा तमिलनाडु में दंगे भड़काने की कोशिश कर रही है। दीप सरकारी अधिकारी जलाएँगे, न कि अदालत के आदेश पर कुछ लोग।” लेकिन सच्चाई यह है कि DMK की यह प्रतिक्रिया अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है। 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले हिंदू परंपराओं को कुचलकर मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्ड खेला जा रहा है।

कॉन्ग्रेस की प्रियंका गाँधी और सपा के अखिलेश यादव जैसे नेता हस्ताक्षर देकर इस साजिश में शरीक हो गए हैं, जो INDI गठबंधन की एंटी-हिंदू छवि को और मजबूत करता है। कॉन्ग्रेस का इतिहास ही गवाह है इंदिरा गांधी काल से लेकर सोनिया-राहुल तक, हर बार हिंदू धरोहर (जैसे अयोध्या, काशी) पर हमला बोला गया। अब मद्रास हाईकोर्ट को निशाना बनाकर वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रहार कर रहे हैं।

हिंदुओं के पक्ष में सही कानूनी फैसले को नहीं पचा पाती एंटी-हिंदुत्ववादी पार्टियाँ

यह पहला मौका नहीं है जब एंटी-हिंदू ताकतें जजों को हिंदू पक्ष में फैसला देने के लिए निशाना बना रही हैं। 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कई जजों को ‘हिंदूवादी’ बताकर बदनाम किया गया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले पर कॉन्ग्रेस-VKP ने ‘न्यायिक पक्षपात’ का शोर मचाया, जबकि फैसला कानूनी तर्कों पर आधारित था। केरल में सबरीमाला मंदिर केस में जस्टिस इंडु मल्होत्रा ने हिंदू परंपराओं का बचाव किया, तो वामपंथी-कॉन्ग्रेस गठबंधन ने उन्हें ‘संघी’ करार दिया।

जब जज स्वामीनाथन ने पक्ष में दिए फैसले, तब की थी वाहवाही

डीएमके और इंडी गठबंधन की दोगली राजनीति को इसी बात से समझ लीजिए कि जब विद्वान जज स्वामीनाथन ने ‘उनकी विचारधारा के लोगों’ के पक्ष में फैसले दिए थे, तब यही लोग उनकी वाहवाही कर रहे थे। जैसे तमिलनाडु में साल 2022 के ‘सवुक्य’ शंकर केस में जस्टिस स्वामीनाथन ने अवमानना पर जेल का आदेश दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने उसे जमानत भी दे दी। तब तो उनके फैसले का विरोध नहीं हुआ।

यही नहीं, उन्होंने ही तब्लीगी जमात केस (2020) में मुस्लिम समुदाय को सहानुभूति देकर रिहाई का आदेश दिया था। तब भी उनका कोई विरोध नहीं किया गया, लेकिन जैसे ही उन्होंने हिंदू अधिकारों की रक्षा की, तो DMK-इंडी ने महाभियोग का हथियार उठा लिया।

इस्लामी कट्टरपंथियों के पक्ष में हर हद पार करने को तैयार है INDI गठबंधन

इस्लामी कट्टरपंथियों की भूमिका भी कम नहीं। थिरुपरनकुंद्रम में दरगाह प्रबंधन ने 1923 के फैसले के बावजूद अनधिकृत कब्जे की कोशिश की, जो ‘लैंड जिहाद’ का हिस्सा है। वो इस विवाद के केंद्र में हैं। मुस्लिम समुदाय द्वारा पूरे भारत में मंदिरों पर कब्जे की घटनाएँ काशी विश्वनाथ से ज्ञानवापी, मथुरा से लेकर तमिलनाडु के छोटे मंदिरों तक इसकी गवाही देती हैं। और द्रविड़ आंदोलन की आड़ में इस्लामी वोट बैंक पर निर्भर DMK इन कट्टरपंथियों को खुला संरक्षण दे रही है।

DMK ही नहीं, कॉन्ग्रेस-सपा भी हुई बेनकाब

एक तरफ डीएमके ने 2019 के CAA विरोध में इस्लामी दंगाइयों का साथ दिया, तो अब वो कार्तिगई दीपम को ‘ध्रुवीकरण’ बताकर हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचा रही है और अब भी इस्लामी कट्टरपंथियों का ही साथ दे रही है।

वैसे, कॉन्ग्रेस के बारे में पूरा देश जानता है कि कॉन्ग्रेस का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ सिर्फ दिखावा है। असल में वो हमेशा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। जज स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर प्रियंका गांधी का हस्ताक्षर इसकी पुष्टि करता है। एक तरह कॉन्ग्रेस की टॉप लीडरशिप उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट के लिए राम मंदिर जाती है, तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में हिंदू परंपरा के खिलाफ खड़ी हो जाती है।

ठीक इसी तरह से सपा का अध्यक्ष अखिलेश यादव एक तरफ यूपी में योगी सरकार पर ‘हिंदूवादी’ होने का आरोप लगाता है… लेकिन मौका मिलते ही वो तमिलनाडु के हिंदू जज को निशाना बना रहा है। यह दोहरा चरित्र एंटी-हिंदू गठबंधन की पहचान है।

वापमंथियों की हिंदू विरोधी भूमिका किसी से छिपी नहीं

वामपंथियों की भूमिका इस साजिश को और गहरा बनाती है। CPI(M) और CPI ने हमेशा हिंदू त्योहारों को ‘फासीवादी’ बताकर विरोध किया। एक तरफ वो केरल में सबरीमाला पर महिलाओं को प्रवेश दिलवाने के नाम पर हिंदू परंपराओं को तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ तमिलनाडु में कार्तिगई दीपम को ‘पितृसत्तात्मक’ करार दे रही है। उसकी वैचारिक लड़ाई धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू-विरोधी है। अब INDI गठबंधन में शामिल होकर वो भी महाभियोग का समर्थन कर रही है।

सिर्फ दबाव बनाने की राजनीति कर रही इंडी गठबंधन

कुल मिलाकर देखा जाए तो इंडी गठबंधन द्वारा जज स्वामीनाथन के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव न्यायपालिका पर सीधा हमला है। कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं, “महाभियोग हाईकोर्ट जज के लिए असंभव सा है। उसके लिए दो-तिहाई बहुमत चाहिए। लेकिन यह दबाव बनाने का हथियार है।” फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में DMK की अपील लंबित है, लेकिन संसद में मोर्चा खोलकर वे जजों को डराना चाहते हैं। यह 1993 के हाईकोर्ट जजों के महाभियोग प्रयासों की याद दिलाता है, जब कॉन्ग्रेस ने राजनीतिक फैसलों पर जजों को निशाना बनाया था।

इस पूरे प्रकरण से साफ है कि DMK-कॉन्ग्रेस-वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथी गठजोड़ हिंदू धरोहर को मिटाने पर तुला है। थिरुपरनकुंद्रम की तरह ही तमिलनाडु के अन्य मंदिरों तिरुवन्नामलाई के महा दीपम से लेकर रामनाथस्वामी तक पर कब्जे की साजिश चल रही है। 1923 का फैसला साफ कहता है कि दीपथून मंदिर की संपत्ति है, लेकिन DMK सरकार ने इसे नजरअंदाज किया। विपक्ष का तर्क ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ का है, लेकिन असल में वे हिंदू को ‘आक्रामक’ दिखाकर मुस्लिम वोट एकत्र कर रहे हैं।

यह साजिश सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं, यह पूरे भारत की राजनीति को प्रभावित करेगी। 2026 चुनावों में DMK हिंदू-विरोधी कार्ड खेलेगी, लेकिन जनता जाग चुकी है। सोशल मीडिया पर #SaveKartigaiDeepam ट्रेंड कर रहा है, जहाँ लाखों हिंदू जज स्वामीनाथन का समर्थन कर रहे हैं।

बहरहाल, कार्तिगई दीपम की यह लौ हिंदू प्रतिरोध की प्रतीक बनेगी। DMK-इंडी का यह गठजोड़ असफल होगा, क्योंकि संविधान न्यायपालिका की रक्षा करता है। लेकिन सवाल यह है कि कब तक हिंदू परंपराओं को तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाया जाएगा? वैसे, एंटी-हिंदू ताकतों को याद रखना चाहिए कि प्रकाश की लौ कभी बुझती नहीं, वह तो अंधेरे को ही निगल जाती है।

दुर्गा विसर्जन का जुलूस, इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ और रामगोपाल मिश्रा की हत्या: बहराइच हिंसा को भूले तो नहीं आप, कैसे हिंदू की हत्या पर HAHA करने का हो रहा था काम

उत्तर प्रदेश के बहराइच में दुर्गा विसर्जन जुलूस में हुई हिंसा पर एक बार फिर बातें होनी शुरू हो गई हैं। यह वही घटना है, जिसमें राम गोपाल मिश्रा को भगवा झंडा फहराने पर गोली मार दी गई थी। गोली मारने वाले सरफराज उर्फ रिंकू को कोर्ट ने एक साल बाद फाँसी की सजा सुनाई है। कोर्ट का फैसला उन लोगों के लिए शायद पढ़ना मुश्किल हो जो राम गोपाल की हत्या के बाद भी उसे मारने वालों को ‘मासूम’ दिखाने की कोशिश कर रहे थे।

गुरुवार (11 दिसंबर 2025) को स्थानीय सत्र न्यायालय (Session Court) ने बहराइच में हिंदू-विरोधी हिंसा पर फैसला सुनाया। पुलिस ने नामजद किए 13 आरोपितों में 10 को कोर्ट ने दोषी करार दिया। हिंसा में मुख्य आरोपित सरफराज उर्फ रिंकू को रामगोपाल मिश्रा की हत्या का दोषी मानते हुए फाँसी की सजा सुनाई गई।

वहीं अन्य आरोपित सरफराज के अब्बा अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब उर्फ सबलू समेत सैफ, जावेद, जीशान, ननकाउ, शोएब और मरुफ को कोर्ट ने हिंसा का दोषी माना और सभी दोषियों को आजीवन कारवास की सजा सुनाई। अब इन दोषियों को सजा उनके किए की सजा मिल चुकी है, तो आइए पन्ने पलटते हैं और बताते हैं बहराइच हिंसा का पूरा घटनाक्रम।

दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर क्या हुआ था?

मामला 13 अक्टूबर 2025 को बहराइच के थानाक्षेत्र हरदी महाराजगंज की है। जब हिंदू श्रद्धालू धूमधाम से गाने बजाते हुए दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जा रहे थे। विसर्जन जुलूस मुस्लिम मोहल्ले में पहुँचा तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने गाने बजाने पर आपत्ति जताई और जुलूस पर पत्थरबाजी शुरू कर दी।

पत्थरबाजी में विसर्जन के लिए ले जाई जा रहीं दुर्गा प्रतिमा भी क्षतिग्रस्त हो गई। पत्थरबाजी पर गुस्साए हिंदुओं ने जवाबी कार्रवाई में आसपास के घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की। इसी बीच रामगोपाल मिश्रा ने एक घर की छत पर चढ़कर हरा झंडा हटाकर भगवा ध्वज फहराया।

कितनी बेरहमी से रामगोपाल मिश्रा की हत्या हुई?

भगवा ध्वज फहराने से इस्लामी कट्टरपंथियों ने राम गोपाल मिश्रा की बेरहमी से हत्या कर दी। सलमान नाम के व्यक्ति के घर पर अब्दुल हमीद और उसके बेटे सरफराज ने रामगोपाल को गोली मार दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, राम गोपाल को टॉर्चर किया गया था। गोली मारने के बाद भी रामगोपाल को करंट लगाकर प्रताड़ित किया गया। उनके पैर के नाखून उखाड़े गए और धारदार हथियारों से हमला किया गया। आँखों के पास नुकीली चीज मारी गई थी।

करंट लगाने के कारण रामगोपाल मिश्रा को ब्रेन हैमरेज हो गया था। बर्बरता की वजह से उनका खून भी बहा था और ज्यादा इन्हीं दोनों कारणों से रामगोपाल मिश्रा की मौत हुई। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताया गया कि अब्दुल हमीद के घर की छत पर खून के धब्बे और काँच की बोतलों के टुकड़े भी मिले। संभवतः रामगोपाल मिश्रा पर काँच की बोतलों से वार किया गया था। इस प्रताड़ना की बात रामगोपाल मिश्रा की पत्नी ने भी बताई थी।

चश्मदीदों ने क्या कहा?

दुर्गा जुलूस में पथराव के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा पर चश्मदीद स्थानीय लोगों ने कहा कि यह हिंसा एक सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दी गई, जिसमें मस्जिद में ऐलान कर भीड़ को उकसाया गया था। हिंसा का शिकार हुए विनोद कुमार मिश्रा ने बताया विवाद की शुरुआत अब्दुल हमीद के बेटे सरफराज ने छत से पत्थर फेंककर की।

विनोद कुमार मिश्रा के मुताबिक, इस्लामी कट्टरपंथियों ने दुर्गा प्रतिमा पर ईंटे फेंकी गई। डीजे वाले को भी खींचकर मारा गया। अब्दुल हमीद ने अपने बेटे सरफराज का बचाव करते हुए पाकिस्तान का गाना बजाया। पुलिस इस वक्त तक मूकर्दशक बनकर खड़ी रही। लेकिन जैसे ही हिंदुओं ने जवाब देने की कोशिश की तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।

एक और चश्मदीदी चंद्रपाल मिश्रा ने बताया कि बहराइच हिंसा राम मंदिर बनने के बाद से मुस्लिमों का गुस्सा था। उन्होंने कहा कि हिंदू कई बार मुस्लिमों के ताजिया में भी शामिल हुए, लेकिन कोरोनाकाल में मुमकिन नहीं हो सका। इसी बात की नाराजगी से मुस्लिमों ने हिंसा की।

हिंदुओं की जवाबी कार्रवाई और पुलिस ने क्या लिया एक्शन?

रामगोपाल मिश्रा की हत्या मामले में उनके भाई हरिमिलन मिश्रा ने हिंसा के दिन 13 अक्टूबर 2025 पुलिस में तहरीर दी। तहरीर में 6 मुस्लिमों को नामजद किया गया। इसी तहरीर पर पुलिस ने बहराइच हिंसा की 13 में से पहली FIR दर्ज की। बाद में पुलिस ने हत्या और दंगा मामले में 7 और लोगों को नामजद किया।

हिंदू युवक रामगोपाल मिश्रा की हत्या के अगले दिन उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए भारी संख्या में जुटे लोग बेकाबू हो गए और उन्होंने कई वाहनों और एक ऑटोमोबाइल शोरूम में आग लगा दी और एक अस्पताल में तोड़फोड़ की। इस तनाव के बाद जिले में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई। सीएम योगी आदित्यनाथ ने स्थिति नियंत्रण करने के लिए ADG (कानून एवं व्यवस्था) अमिताभ यश और गृह सचिव संजीव गुप्ता को घटनास्थल पर भेजा।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने घटना पर सख्त एक्शन लिया। हरदी थाना इंचार्ज और महाराजगंज चौकी के सब इंस्पेक्टर शिव कुमार को सस्पेंड कर दिया गया। इसके अलावा भी बड़े आला अफसर को निलंबित करने की सूचना सामने आई थीं।

पुलिस ने आरोपितों पर BNS की धारा 103(2) (मॉब लिंचिंग में हत्या), धारा 191(2), 191(3), 190, 109(2), 249, 61(2) और आर्म्स एक्ट की धारा 30 के तहत ट्रायल शुरू किया। इन सभी धाराओं में 2 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।

पुलिस की चार्जशीट में क्या कहा गया?

पुलिस ने जाँच के बाद 11 जनवरी 2025 को सेशन कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। इस चार्जशीट में पुलिस ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ये कोई आम विवाद नहीं था, बल्कि ‘ठंडे दिमाग से की गई क्रूर और समाज को भयभीत करने वाली घटना’ थी, जिसमें रामगोपाल मिश्रा को 9 गोलियाँ मारी गई।

पुलिस ने सबूत के तौर पर ‘फोरेंसिक और बॉलिस्टिक परीक्षण’ को अदालत में पेश किया, जिससे यह साबित किया गया कि हथियार उन्हीं लोगों द्वारा इस्तेमाल किया गया था, जिनके नाम FIR में हैं। साथ ही पुलिस ने बताया कि रामगोपाल को टॉर्चर किया गया था। उसके शरीर पर कई घाव और चोटें भी मिली, जो न केवल हत्या बल्कि डर फैलाने के उद्देश्य को दर्शाती हैं।

चार्जशीट में यह भी उल्लेख किया गया कि हिंसा के बाद इलाके में हालात नियंत्रण से बाहर हो गए। दुकानें, वाहन और अस्पतालों को आग के हवाले कर दिया गया, जिससे इलाके में डिफैक्टो कर्फ्यू जैसा माहौल बन गया और इंटरनेट सेवा बंद करनी पड़ी। पुलिस ने उन्हीं 13 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर चार्जशीट दाखिल की, जिनमें गोली चलाने वालों के अलावा में भीड़ में हिंसा पथराव और आगजनी में शामिल लोगों के नाम शामिल थे।

अभियोजन पक्ष ने भी कोर्ट में कहा कि यह हिंसा पूरी तरीके से धार्मिक शांति भंग करने और धार्मिक वर्चस्व का संदेश देने के इरादे से की गई और इसीलिए इसे ‘सबसे दुर्लभ मामलों’ के रूप में देखा जाना चाहिए और कहा था कि आरोपितों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

बहराइच की सेशन कोर्ट में गुरुवार (12 दिसंबर 2025) को बहराइच हिंसा पर 142 पन्नों का आदेश जारी किया। इस आदेश में 13 में से 10 आरोपितों को दोषी माना गया। हिंसा के मुख्य आरोपित सरफराज उर्फ रिंकू को फाँसी की सजा और अन्य 9 आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

फैसले में कोर्ट ने मनुस्मृति के एक श्लोक का भी उल्लेख करते हुए अपराध पर कठोर सजा की आवश्यकता बताई। कोर्ट ने फैसले में मनुस्मृति के दोहे- ‘दंड शास्ति प्रजा: सर्वा दंड एवाभिरक्षति। दंड सप्तेषु जागर्ति, दंड धर्म विदुवर्धा’ का जिक्र किया।

इसका अर्थ है- ‘राजधर्म के पालन के लिए दंड विधान आवश्यक है। दंड के भय से ही समाज में अनुशासन बना रहता है। जन-धन की सुरक्षा के लिए अपराधियों को दंडित करना शासक का परम धर्म है।’ कोर्ट ने माना कि राम गोपाल मिश्रा की निर्ममत हत्या समाज के लिए भयावह अपराध है।

फैसले पर उदारवादी क्यों किलसे?

बहारइच हिंसा में कोर्ट का फैसला उन लोगों के लिए शायद पढ़ना मुश्किल होगा जो आरोपितों को मासूम दिखाने की कोशिश कर रहे थे। राम गोपाल मिश्रा की निर्मम हत्या को आरोपित सरफराज का गुस्सा बताने की कोशिश की गई। यहाँ हिंदुओं की जवाबी कार्रवाई इन लोगों को गलत लगी, लेकिन यह अनदेखा कर गए कि शुरुआत मुस्लिमों ने की थी। हिंसा पर सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी खूब जश्न मनाया था।

दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस पर पत्थरबाजी करना उनके लिए आम बात है और ऐसी घटनाएँ आए दिन सामने आती हैं। लेकिन हिंदुओं की जवाबी कार्रवाई इनसे बर्दाश्त नहीं होती। राम गोपाल मिश्रा के भगवा ध्वज फहराने से आपत्ति हो गई कि उसे मौत के घाट सुला दिया। इतनी निर्मम हत्या को ये उदारवादी लोग मामूली साबित करने में लगे रहे और आरोपितों को मासूम। अब कोर्ट का फैसला इन उदारवादी लोगों के मुँह पर तमाचा है।

कॉन्ग्रेस को ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की जरूरत, खड़गे के नेतृत्व में युवा हुए पार्टी से दूर- 3 साल में मैं खुद राहुल से नहीं मिल पाया: ओडिशा के पूर्व MLA मोहम्मद मोकीम ने सोनिया गाँधी को लिखा पत्र

पूर्व MLA मोहम्मद मोकिम ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर कॉन्ग्रेस की ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग की है। साथ ही कहा है कि वह 3 साल से कोशिशों के बावजूद राहुल गाँधी से नहीं मिल पाए। उन्होंने खड़गे के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पार्टी युवाओं से जुड़ नहीं पा रही है।

दरअसल चुनावों में लगातार हो रहे हार से कॉन्ग्रेस के नेता और कार्यकर्ता हताश हैं। नेतृत्व की नाकामियों पर अब खुलकर बोलने के लिए मजबूर हो गए हैं। राहुल गाँधी की जमीनी कार्यकर्ताओं से ‘दूरी’ पर अब कॉन्ग्रेस के नेता सवाल खड़े कर रहे हैं। साथ ही पार्टी का नेतृत्व बुजुर्ग खरगे के हाथों से लेकर युवा हाथों में देने की माँग कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस को ‘ऑपन हार्ट सर्जरी’ की जरूरत- मोकिम

ओडिशा के पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम ने कहा कि पार्टी को एक ऑपन हार्ट सर्जरी की जरूरत है। हाल ही में पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को उन्होंने एक तीखा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक पतन, नेतृत्व की नाकामियों और तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया है।

मोकिम ने चेतावनी दी है कि पार्टी बाहरी विरोधियों की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर लिए गए फैसलों की वजह से अपनी विरासत खो रही है।

दरअसल कॉन्ग्रेस में खलबली मची हुई है। पार्टी अपने ही जमीनी कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने में नाकाम दिख रही है। पंजाब और कर्नाटक में भूचाल के बाद अब ओडिशा से बवंडर उठने लगा है। बाराबाती कटक के पूर्व एमएलए ने पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिख कर न सिर्फ राहुल गाँधी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को हटाने की माँग भी कर डाली है।

पूर्व एमएलए मोकिम का खत

तीन साल तक राहुल गाँधी से मिलने की कोशिश की- मोकिम

कॉन्ग्रेस नेता मोकिम ने कहा है कि आंतरिक फैसलों से पार्टी को नुकसान पहुँचा है। राहुल गाँधी पर आरोप लगाते हुए कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि अपनी विरासत बाहरी विरोधियों के कारण नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लिए गए फैसलों के कारण कमजोर हुई है।

उन्होंने पत्र में कहा है कि विधायक होने के बावजूद, वह करीब 3 वर्षों तक राहुल गाँधी से मिलने की कोशिश की, लेकिन नहीं मिल पाए। दरअसल राहुल गाँधी से मिलना उनके ‘पहुँच’ से बाहर था। कॉन्ग्रेस नेता के मुताबिक, राहुल से मिलने में नाकामी ये दिखाता है कि केंद्रीय नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच कितनी बड़ी खाई है।

मोकिम ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र पर भी टिप्पणी की और कहा कि पार्टी मौजूदा नेतृत्व में देश के युवाओं से जुड़ने में असमर्थ है। उन्होंने प्रियंका गांधी को नेतृत्व संभालने का ‘जिम्मा’ देने की वकालत की। उन्होंने कहा कि ये स्थिति पहले कभी नहीं रही। पार्टी कार्यकर्ताओं के हौसले टूट रहे हैं इसलिए नई लीडरशिप की जरूरत है। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पहल कर नई लीडरशिप को आगे लाएँ, ताकि पार्टी में नई जान लाई जा सके।

इस पत्र से ओडिशा कॉन्ग्रेस के भीतर चल रहे आपसी खींचतान, कलह और असंतोष को भी उजागर किया गया है। उनका कहना है कि जब कोई नेता अपने ही विधानसभा में विश्वास मत हासिल नहीं कर पाता है, तो कार्यकर्ताओं का स्वाभाविक रूप से भरोसा कम हो जाता है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी कार्यकर्ता भाई-भतीजावाद से परेशान हैं।

पत्र में उन्होंने ओडिशा के अध्यक्ष भक्त चरण दास के खिलाफ हमला बोला है। तीन चुनाव हार चुके भक्तचरण दास को राज्य का नेतृत्व सौंप दिया गया। इतना ही नहीं वे ऐसी विचारधारा से जुड़े थे, जो कॉन्ग्रेस की कभी नहीं रही है।

अध्यक्ष के बेटे ने कोसल राज्य का समर्थन क्यों किया- मोकिम

उन्होंने ओडिशा से अलग कोसल राज्य बनाने की माँग का समर्थन करने पर प्रदेश अध्यक्ष के बेटे विधायक सागर पर भी हमले किए। उन्होंने दावा किया कि इससे पार्टी में अशांति पैदा हुई।

ओडिशा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में भक्त चरण दास की नियुक्ति फरवरी 2025 में हुई है। उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष की रेस में मोकिम भी शामिल थे।

राज्य के लोगों के घटते भरोसे के एक सबूत के तौर पर भक्त चरण दास के संसदीय क्षेत्र का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नुआपाड़ा विधानसभा सीट पर फरवरी में उपचुनाव हुआ था, जिसमें कॉन्ग्रेस की शर्मनाक हार हुई। कॉन्ग्रेस यहाँ 83000 मतों से हारी। ये दिखाता है कि प्रदेश अध्यक्ष के गढ़ में भी जनता उन्हें पसंद नहीं करती है।

पार्टी का किसी मुद्दे पर स्टेंड साफ नहीं है। इससे हजारों जमीनी स्तर के कार्यकर्ता भ्रमित, दिशाहीन और निराश हैं। कई ईमानदार कार्यकर्ता इसकी वजह से पार्टी से किनारा कर चुके हैं।