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छात्र प्रदर्शन के नाम पर चल रहा राजनैतिक एजेंडा: जानिए पंजाब यूनिवर्सिटी में बड़े गुटों ने की कैसे घुसपैठ, ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में सब कुछ

16 नवंबर 2025 को जब ऑपइंडिया की टीम पंजाब विश्वविद्यालय पहुँची तो ग्राउंड पर चल रहा नजारा वैसा नहीं दिख रहा था जैसा कि सोशल मीडिया में चर्चा में है। कैंपस के अंदर कई छात्र शांतिपूर्वक धरना स्थल पर बैठे थे और बार-बार अपनी वही साधारण माँग दोहरा रहे थे- सीनेट चुनावों की तारीख घोषित की जाए।

जिन छात्रों से ऑपइंडिया ने बात की, वे चाहते थे कि चुनाव की तारीख घोषित हो जाएँ तो वे तुरंत कक्षाओं में लौटें और अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करें। उनके चेहरों पर पाठ्यक्रम छूट जाने की चिंता साफ दिखाई दे रही थी। पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र स्पष्टता चाहते थे, अव्यवस्था नहीं।

एक छात्र अवतार सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाएगा, हमारी हड़ताल समाप्त हो जाएगी। उसने बताया कि छात्रों को पता है कि सीनेट चुनाव कराने में 200 दिन से अधिक लगते हैं और वे किसी से रातों-रात चमत्कार की माँग नहीं कर रहे। वे चाहते थे कि प्रक्रिया शुरू हो, जो विश्वविद्यालय ने कुछ दिन पहले ही घोषित कर दी है।

हालाँकि जैसे ही छात्र-समूह के घेरे से बाहर निकल कर देखना शुरू किया तो पाया कि नजारा पूरी तरह बदल जाता है। वहाँ ट्रैक्टर, लंगर वाहन, लाउडस्पीकर (हालाँकि हमारे जाने के समय वे शांत थे), राजनीतिक बैनर, किसान यूनियन के झंडे और ऐसे समूह मौजूद थे जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।

खुद को यूनियन सदस्य, राजनेता और कार्यकर्ता कहने वाले ये लोग उस जगह पर कब्जा किए बैठे थे जो असल में विश्वविद्यालय के पूर्व या वर्तमान छात्रों की होनी चाहिए।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट

कुछ ऐसा ही किसान आंदोलन के दौरान भी हुआ था, जहाँ किसानों की वास्तविक समस्याएँ राजनीतिक अवसरवाद और पहचान-आधारित लामबंदी के शोर में दब गई थीं। पंजाब विश्वविद्यालय में सीनेट चुनावों की शांतिपूर्ण माँग अब राज्य बनाम केंद्र के टकराव में घसीट ली गई है। जाहिर है, इस नए बवंडर में सबसे ऊँची आवाजें छात्रों की नहीं बल्कि उन लोगों की थीं जो छात्रों के आंदोलन के पीछे अपने एजेंडे चला रहे थे।

10 नवंबर को विश्वविद्यालय के गेट तोड़े जाने के साथ ही ये साफ हो गया कि बाहरी लोग अपने एजेंडे के साथ आए थे। FIR में भी यह दर्ज है कि गेट नंबर 1 को जबरन खोलने वाली भीड़ में बड़ी संख्या गैर-छात्र शामिल थे। पुलिस अधिकारियों ने बयान में कहा कि हालाँकि कुछ पीयू छात्र आगे थे, लेकिन बैरिकेड तोड़ने और धक्का-मुक्की करने का काम उन लोगों ने किया जिनका विश्वविद्यालय से कोई लेना-देना नहीं था।

फिर भी इन झड़पों को सीनेट मुद्दे का स्वाभाविक परिणाम बताया जा रहा है। सच्चाई यह है कि ये टकराव अवसरवादी हस्तक्षेप का नतीजा हैं और खुद छात्र भी इसे जानते हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए पंजाव विश्वविद्यालय की कुलपति रेनू विग तक ने ये कहा कि छात्रों ने कहा है कि ये अब सीनेट तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहा, “छात्रों ने ये मुझसे सामने से तो नहीं कहा, लेकिन वार्डेन और कमेटी के जरिए उन्होंने ये बात पहुँचाई है कि वे लाचार महसूस कर रहे हैं।”

छात्र असल में क्या चाहते हैं और कैसे उनके अंदर डर बैठाया जा रहा है

अगर हम स्लोगन, पॉलिटिकल स्पीच, यूनियन का अंदाज और सोशल मीडिया पर चल रहे शोर को देखें तो पता चलेगा कि छात्रों की माँगे काफी स्पष्ट हैं। वे चाहते हैं कि सीनेट चुनावों के जरिए बहाल हो।

वे चाहते हैं कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार एक वैध गवर्निंग बॉडी (शासी निकाय) बने। सलाथ ही वे चाहते हैं कि पिछले एक साल की अनिश्चितता खत्म हो। वे चंडीगढ़ के मालिकाना हक की माँग करने वालों में से नहीं हैं।

वे विश्वविद्यालय पर पहचान-आधारित दावा नहीं कर रहे। वे संघवाद के नारे नहीं लगा रहे। वे केंद्र से यह नहीं कह रहे कि अपना सामान बाँधकर केंद्र शासित प्रदेश को छोड़ दे।

ऑपइंडिया की छात्रों से हुई बातचीत से साफ था कि वे सीनेट पर स्पष्टता चाहते हैं और जैसे ही चुनाव की तारीख घोषित हो, तुरंत कक्षाओं में लौटकर पढ़ाई शुरू कर सकें।

हालाँकि उनका विरोध केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ है जिसमें सीनेट सदस्यता को नामांकन-आधारित बनाने की एक अधिसूचना थी। इसे केंद्र सरकार पहले ही वापस ले चुकी है। ऐसे में वे केंद्र के खिलाफ नहीं हैं। वे बस अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहते हैं।

हमने देखा कि कैंपस के अंदर एक और अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें छात्रों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जा रही है कि जैसे ही केंद्र सीनेट पर ‘कब्जा’ करेगा, वैसे ही विश्वविद्यालय तानाशाह बन जाएगा, फीस बढ़ा दी जाएगी और पंजाब हमेशा के लिए इस संस्थान को खो देगा।

यही बातें हमें उन लोगों ने दोहराईं जो छात्र नहीं थे लेकिन स्थल पर मौजूद थे। यह डर बैठाया जा रहा है। यह स्वाभाविक नहीं है और यह छात्रों के बजाय राजनीतिक समूहों के हितों को कहीं अधिक साधता नजर आता है।

कानाफूसी इस बात की भी है कि केंद्र सरकार की ये अधिसूचना विश्वविद्यालय को राज्य से ‘छीनने’ की कोशिश थी। इस स्थिति को उसी दिन सुलझ जाना चाहिए था जब केंद्र ने अधिसूचना वापस ली, फिर भी ये किसी तरह अस्तित्व के संकट के रूप में बदल गई। असल में ये असमंजस अचानक नहीं है।

यह वही नजारा है जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई समूहों ने डर, पहचान और अविश्वास की समानांतर कहानियाँ चलाईं। किसान आंदोलन ने किसानों और यूनियन के बीच गहरी खाई बना दी थी। मूल मुद्दे दूसरे एजेंडों के शोर में दब गए थे।

यहाँ भी पंजाबियत, केंद्र बनाम राज्य राजनीति, क्षेत्रीय पहचान और धार्मिक पहचान की कहानियाँ छात्रों के विश्वविद्यालय के आंतरिक चुनावों की माँग पर हावी हो गई हैं।

सीनेट और सिंडिकेट क्या हैं?

सीनेट और सिंडिकेट पंजाब विश्वविद्यालय की दो वैधानिक गवर्निंग बॉडी (शासी संस्थाएँ) हैं। सीनेट सर्वोच्च प्राधिकरण है, जिसमें निर्वाचित स्नातक, प्रोफेसर, छात्र प्रतिनिधि और केंद्र-राज्य के नामित सदस्यों समेत सौ से अधिक सदस्य शामिल होते हैं।

सीनेट नीतियाँ बनाती है, बजट को मंजूरी देती है, नियुक्तियों की देखरेख करती है और प्रमुख शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णय लेती है। सिंडिकेट कार्यकारी निकाय के तौर पर काम करती है, जिसमें लगभग पंद्रह से बीस सदस्य होते हैं। जहाँ सीनेट निर्णय लेती है, वहीं सिंडिकेट उन निर्णयों को लागू करती है।

राजनीतिक यूनियन, किसान समूह और मजदूर संगठन प्रदर्शन पर कैसे हावी हो रहे हैं

अगर कोई अब भी ये मानता है कि यह केवल छात्रों द्वारा चलाया गया आंदोलन है तो उसने पिछले कुछ दिनों में पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा स्थल का दौरा नहीं किया। जब ऑपइंडिया कैंपस पहुँचा तो धरना स्थल पर ट्रैक्टर, लंगर स्टॉल, राजनीतिक पोस्टर और छात्रों से परे लोग हर तरफ मौजूद थे।

यह पैटर्न नया नहीं है। हमने इसे किसान आंदोलन के दौरान भी देखा था। कुछ खास समूह किसी वैध शिकायत को पहचानने में माहिर होते हैं, ‘समर्थन’ के नाम पर आंदोलन में प्रवेश करते हैं और फिर धीरे-धीरे आंदोलन की दिशा और आवाज बदल देते हैं। इसके बाद मूल मुद्दा अपनी पहचान खो देता है। यहाँ भी ठीक वही हुआ है।

सीनेट चुनाव की माँग से शुरू हुआ ये प्रदर्शन भी अब इस तरह से बदल रहा है-

  • पंजाब बनाम केंद्र मुद्दा
  • पंजाब बनाम हरियाणा
  • चंडीगढ़ का मालिकाना हक
  • पंजाबियत के नारे
  • टुकड़ों में आ रही राजनीतिक पार्टियाँ

10 नवंबर 2025 को बाहरी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के दौरान, एसएसपी कनवदीप कौर गेट पर चढ़ गईं और भीड़ को समझाने की कोशिश की। अंदर घुसने की कोशिश कर रहे बाहरी लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि पुलिस बिना बल प्रयोग किए उन्हें रोक नहीं सकती थी।

प्रदर्शनकारियों ने गेट तोड़ दिए और लोगों की भारी भीड़ कैंपस में घुस गई। उस दिन ट्रैक्टर, ट्रॉली, यूनियन प्रतिनिधि, राजनीतिक कार्यकर्ता और संगठनों के झंडे लेकर लोग कैंपस में दाखिल हुए जिनका विश्वविद्यालय की आंतरिक व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं था।

असल में तो न पुलिस और बाहरी समूहों, संगठनों और व्यक्तियों को ऐसे आंदोलनों में दखल न देकर बाहर ही रहना चाहिए। लेकिन घटनाएँ वैसी नहीं हुईं जैसी होनी चाहिए थीं।

आम आदमी पार्टी, कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल वहाँ पहुँचे। किसान यूनियन के नेता बलबीर सिंह राजेवाल, हरिंदर लखोवाल और इंदरपाल बैंस अपने कार्यकर्ताओं के साथ आए। यहाँ तक कि जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह के पिता और उग्रवादी नेताओं के परिवारजन भी कैंपस पहुँच गए।

लखा सिधाना जैसे गैंगस्टर से कार्यकर्ता बने लोग, गायक सतिंदर सरताज और कई अन्य लोग कैंपस पहुँचे। असली छात्र नेता, जिन्हें पूरे आंदोलन की आवाज होना चाहिए था, उन्हें किनारे कर दिया गया ताकि ये नेता मंच पर बोल सकें।

प्रदर्शन में इन लोगों की घुसपैठ के साथ एक अलग ही शब्दावली आ गई। इसके तहत ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ और ‘राज करेगा खालसा’ जैसे नारे हवा में गूँजने लगे। इन नारों का सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, न ही इनका पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम और लोकतांत्रिक निकायों की बहाली से कोई संबंध है। इनका पूरा संबंध राजनीतिक स्थिति बनाने, पहचान बताने और यह छवि गढ़ने से है कि विश्वविद्यालय सभी छात्रों और स्टेकहोल्डर्स के बजाय एक विशेष सांस्कृतिक समूह का है।

इस शोर के बीच छात्रों की असल माँगें लगभग खो गई। राजनीतिक खिलाड़ियों की इन प्रदर्शनों की अपेक्षाएँ छात्रों की अपेक्षाओं से बिल्कुल अलग हैं और इन्हीं दो एजेंडों के बीच की खाई ही इस अव्यवस्था का कारण बन रही है।

निहंगों की मौजूदगी और खालिस्तानी विचारधारा का परिचय

उस दिन कैंपस में पहुँचे कई समूहों में निहंग भी शामिल थे। ऑपइंडिया ने आंदोलन के दौरान मौजूद एक निहंग से बातचीत की। सतही तौर पर उन्होंने बार-बार यह कहा कि वे केवल ‘बच्चों’ का समर्थन करने आए हैं।

उन्होंने अपनी मौजूदगी को अभिवावक और सुरक्षात्मक जैसा बताया। लेकिन बातचीत के दौरान उन्होंने एक ऐसी लाइन कही जिसने यह साफ कर दिया कि उनकी सोच अलग है और उसका सीनेट चुनावों से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने लगभग शब्दशः कहा, “जब हिंदू भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो कोई कुछ नहीं कहता। लेकिन जब दूसरे कुछ माँगते हैं तो समस्या बन जाती है।”

उन्होंने ‘खालिस्तान’ शब्द का साफ शब्दों में इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन उन्हें करने की जरूरत भी नहीं थी। जो भी पंजाब को लंबे समय से कवर करता है, वह समझता है कि ‘दूसरे कुछ माँगते हैं’ का मतलब किस संदर्भ में किया जा रहा है। यह एक सांकेतिक भाषा है, जिसका इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो अलगाववादी विचारधारा को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन सीधे कानूनी जाँच के घेरे में नहीं आना चाहते।

यहीं पर आंदोलन चुनावों और कैंपस लोकतंत्र से कहीं आगे एक खतरनाक क्षेत्र में चला जाता है। जब निहंग समूहों के प्रतिनिधि असंबंधित राष्ट्रीय तुलना करने लगते हैं और विश्वविद्यालय आंदोलन के अंदर पहचान-आधारित शिकायतों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं तो इसका मतलब है कि आंदोलन उनके वैचारिक संदेशों का व्यापक जरिया बन गया है।

सीनेट आंदोलन को लीड कर रहे छात्रों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल या यूनियन को आंदोलन में आने के लिए नहीं कहा। लेकिन जैसे ही गेट जबरन खोले गए और बाहरी समूह अंदर आए तो वह जगह छात्रों के नियंत्रण में नहीं रही।

आंदोलन तितर- बितर हो गया और एक बार ऐसा होने पर वे किस्से जो असल मुद्दे से कोई संबंध नहीं रखते, ‘समर्थन’ के नाम पर चुपचाप आंदोलन का हिस्सा बन जाते हैं। जिन छात्रों से हमने बात की, उन्होंने कहा कि ये समूह ‘मौजूद होने चाहिए’ क्योंकि वे उनका समर्थन करते हैं।

हालाँकि कुछ आवाजें ऐसी भी थीं जो उलझन में थीं और यहाँ तक कि छात्रों के आंदोलन के हड़प लिए जाने को नापसंद करती थीं। उदाहरण के तौर पर, हिंदुस्तान स्टूडेंट एसोसिएशन (HSA) के अधिकारियों ने अलगाववादी नारों और विश्वविद्यालय पर पंजाब के दावे का समर्थन करने से साफ इनकार कर दिया।

मोर्चे के अंदर दरारें- पंजाब बनाम हरियाणा नैरेटिव हावी

जैसे-जैसे गेट के बाहर राजनीतिक तमाशा तेज होने लगा, पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा के अंदर पहली असली असहजता देखने को मिली। 12 नवंबर को, पीयू कैंपस स्टूडेंट्स’ काउंसिल के संयुक्त सचिव और पहले के हलफनामे अभियान का प्रमुख चेहरा रहे मोहित मंडेराना ने मोर्चा से इस्तीफा दे दिया। उसका इस्तीफा एक अहम संकेत है क्योंकि यह वह बात सामने रखता है जो कई छात्र व्यक्तिगत तौर पर कानाफूसी करते रहे हैं लेकिन सार्वजनिक रूप से कहने से डरते हैं- आंदोलन अपने मकसद से भटक गया है।

हालाँकि वह ‘बीजेपी और आरएसएस विचारधारा’ के डर को फैलने से रोक नहीं पाए। अपने बयान में उसने कहा, “यह संघर्ष पंजाब विश्वविद्यालय को राजनीतिक हस्तक्षेप, खासकर बीजेपी और आरएसएस विचारधारा से बचाने के लिए था। लेकिन 10 नवंबर का आंदोलन क्षेत्रीय मालिकाना हक के बारे में हो गया, विश्वविद्यालय को बचाने के बारे में नहीं।” ये बयान बताता है कि किस तरह हर तरह से डर फैलाने की कोशिश की जा रही है।

एक वीडियो में उसे कहते हुए देखा गया कि यह ‘पंजाब और हरियाणा’ का निजी मामला है और वे इसे घर पर ही सुलझा लेंगे। उसने कहा, “हमें किसी दिल्ली एजेंट की जरूरत नहीं है।”

दूसरी ओर, कुछ छात्रों ने ऑपइंडिया से नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वे ‘चंडीगढ़ पंजाब दा’ नारों की बाढ़, सीनेट चुनावों से कोई लेना-देना न रखने वाले नेताओं के घुसने और अचानक ऑनलाइन फैल रही उस जानकारी से बेहद असहज थे जिसमें दावा किया जा रहा था कि हरियाणा विश्वविद्यालय को ‘कब्जा’ करना चाहता है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि पंजाब बनाम हरियाणा का यह नैरेटिव नया नहीं है। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। तब से इन राज्यों के बीच यह खींचतान हमेशा रही है, लेकिन यह विश्वविद्यालय कैंपस में पहले कभी इस तरह नहीं घुसी थी।

सीनेट चुनावों को इतिहास में भी कभी भी क्षेत्रीय लड़ाई में नहीं बदला गया। दोनों राज्यों के छात्र दशकों से एक साथ पढ़ते आए हैं। हरियाणा के अपने विश्वविद्यालय हैं और वह पीयू को फंड नहीं करता। हिमाचल के भी अपने संस्थान हैं। असल में यह मुद्दा क्षेत्रीय नहीं बल्कि प्रशासनिक था।

लेकिन जैसे ही राजनीतिक खिलाड़ी मैदान में उतरे, ‘पंजाब का आखिरी प्रतीक खतरे में’ का नैरेटिव आगे बढ़ाना आसान हो गया। सीनेट का मुद्दा जमीन, पहचान और इतिहास के नारों में बदल गया। स्वाभाविक रूप से, हरियाणा आधारित छात्र समूहों ने प्रतिक्रिया दी और आंदोलन कानून की बजाय भावनाओं का युद्धक्षेत्र बन गया।

इसलिए मंडेराना का इस्तीफा सिर्फ असहमति नहीं था। यह आंदोलन पर हावी होने को लेकर पैदा हुई पहली साफ दरार थी। अगर अंदरूनी लोग ही एकमत नहीं हैं, तो यह केवल समय की बात है कि छात्र अपनी जगह वापस हासिल कर पाएँ या आंदोलन अपने ही बोझ तले ढह जाए।

वर्तमान आंदोलन में एबीवीपी की स्थिति

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पंजाब विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पविंद्र सिंह नेगी ने ऑपइंडिया को बताया कि एबीवीपी छात्रों के साथ खड़ी है और सीनेट चुनावों की तारीख घोषित करने की उनकी असल माँग का समर्थन करती है।

हालाँकि संगठन सक्रिय रूप से आंदोलन में भाग नहीं ले रहा क्योंकि इसे बाहरी लोगों ने हड़प लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार पहले ही अधिसूचना वापस ले चुकी है और हाई कोर्ट ने भी छात्रों को कक्षाओं में लौटने को कहा है, ऐसे में आंदोलन जारी रखने का कोई ठोस कारण नहीं बचता।

उनके अनुसार अब बाहरी लोग आंदोलन को पूरी तरह अलग दिशा में ले जा रहे हैं ताकि अपने एजेंडे साध सकें। उन्होंने स्थगित परीक्षाओं पर भी चिंता जताई क्योंकि इससे परिणामों में देरी होगी और प्लेसमेंट में समस्याएँ आएँगी।

उन्होंने कहा, “आज भी छात्र हमसे मिले। वे स्थगित परीक्षाओं को लेकर चिंतित थे। अगर समय पर परिणाम नहीं आए तो वे प्लेसमेंट की तारीख़ों से कैसे मेल खाएँगे?”

छात्रों में डर कैसे पैदा किया जा रहा है और इससे किसे फायदा हो रहा है

राजनीति में डर एक शक्तिशाली हथियार है, खासकर तब जब इसे ऐसे युवा छात्रों के समुदाय में डाला जाए जो पहले से ही शैक्षणिक अनिश्चितता में जी रहा हो। पिछले सप्ताह छात्रों में कुछ अलग ही तरह के डर जानबूझकर फैलाए गए हैं जैसे कि-

  • केंद्र का नियंत्रण आने पर विश्वविद्यालय तानाशाही बन जाएगा
  • फीस अचानक बहुत बढ़ जाएगी
  • चुनाव कभी नहीं होंगे
  • पंजाब विश्वविद्यालय को पंजाब से ‘छीन लिया’ जाएगा
  • चंडीगढ़ स्थायी रूप से बदल दिया जाएगा
  • पंजाब की पहचान पर हमला हो रहा है
  • यह विश्वविद्यालय को बचाने का ‘आखिरी मौका’ है
  • इनमें से हर डर तथ्यों के आधार पर सवालों के घेरे में है लेकिन राजनीतिक रूप से सही है।

ये नैरेटिव हॉस्टल्स या कक्षाओं के अंदर से नहीं निकले। ये बाहर से आए- भावनाओं से ओतप्रोत भाषण देने वाले किसान यूनियन नेताओं से, बार-बार पंजाबियत के नारे दोहराने वाले पहचान-आधारित समूहों से, केंद्र-विरोधी नया मुद्दा तलाशने वाले राजनीतिक नेताओं से और आंदोलन को अपनी गैर-जरूरी शिकायतों के लिए युद्धक्षेत्र मानने वाले वैचारिक तत्वों से ये नैरेटिव देखने को मिले।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर

जब मैंने कानून की अच्छी जानकारी रखने वाले एक ‘समर्थक’ से पूछा कि फीस कैसे बढ़ेगी जबकि अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों का फी स्ट्रक्चर भी बहुत किफायती है तो वह केवल इतना ही कह पाया, “ऐसे ही होता है, नहीं?”

हालाँकि डर तथ्यों से कहीं तेज फैलता है, खासकर तब जब हजारों लोग विश्वविद्यालय के बाहर खड़े होकर यह नारा लगा रहे हों कि ‘पंजाब का आखिरी संस्थान छीना जा रहा है।’

इस बात पर ध्यान देना जरूरी है कि शिक्षा मंत्रालय ने 7 नवंबर को विवादित अधिसूचना वापस ले ली थी। सीनेट संरचना बहाल कर दी गई थी। विश्वविद्यालय ने 9 नवंबर को कार्यक्रम उपराष्ट्रपति कार्यालय को भेज दिया था।

यहाँ तक कि हाई कोर्ट ने भी माना कि कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए और चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए। फिर भी, ऐसे कारणों से जिनका पीयू अधिनियम से कोई लेना-देना नहीं है, कई समूह चाहते हैं कि आंदोलन जारी रहे।

क्यों? क्योंकि अव्यवस्था से उन्हें फायदा मिलता है।

जो हो रहा है वह व्यवस्थित रूप से भड़काया गया भावनात्मक उकसावा है और डर का हर नया दिन उन समूहों की मदद करता है जिनकी सीनेट चुनावों में नहीं, बल्कि आंदोलन को जिंदा रखने में काफी दिलचस्पी है।

हाई कोर्ट का दखल और डर का नैरेटिव का कैसे हुआ पर्दाफाश

14 नवंबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में शायद सबसे तार्किक बात दी। पूर्व सीनेट सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली पीठ ने दो अहम बातें कहीं, जो अगर आंदोलनकारी सच में शांति चाहते तो कैंपस को तुरंत शांत कर सकती थीं।

पहली, कोर्ट ने साफ कहा कि शैक्षणिक गतिविधियाँ तुरंत शुरू होनी चाहिए। जजों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि छात्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए हैं और प्रशासनिक मुद्दों के कारण शिक्षा को रोका नहीं जा सकता।

जब वकील ने कहा कि छात्र सीनेट चुनावों में देरी के कारण आंदोलन कर रहे हैं, तो पीठ ने सीधे कहा, “कृपया अपनी कक्षाओं में वापस जाएँ।”

यह कोई मामूली टिप्पणी नहीं है। एक संवैधानिक अदालत की ओर से छात्रों को पढ़ाई पर लौटने का निर्देश उस पूरे डर को कमजोर करता है, जो फैलाया जा रहा था कि विश्वविद्यालय टूटने या कब्जे के कगार पर है।

दूसरी, कोर्ट ने कहा कि चुनाव शीघ्र कराए जाने चाहिए और विश्वविद्यालय पहले ही कार्यक्रम उपराष्ट्रपति (कुलपति) को भेज चुका है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंजाब विश्वविद्यालय अधिनियम में कार्यक्रम के लिए कुलपति की ‘मंजtरी’ की आवश्यकता नहीं है। इसका मतलब है कि प्रक्रिया पहले से ही आगे बढ़ रही है।

केंद्र का पक्ष रखने वाले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इस बात कि पुष्टि की कि-

विवादित अधिसूचना वापस ले ली गई है
सरकार चाहती है कि चुनाव हों
कार्यक्रम प्रक्रिया में है
यह एक विशाल अभ्यास है, जिसमें लगभग साढ़े तीन लाख पंजीकृत स्नातक मतदाता शामिल हैं

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चुनाव के लिए ‘सौहार्दपूर्ण वातावरण’ जरूरी है। यह एक सामान्य बात है कि इतनी बड़ी प्रक्रिया बैरिकेड तोड़ने, बाहरी भीड़ और राजनीतिक नारों के बीच नहीं हो सकती।

कुल मिलाकर हाई कोर्ट ने छात्रों की चुनाव कराए जाने की असली माँग को आधिकारिक रूप से मान्यता दी और साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन के आसपास का अराजक माहौल बिल्कुल अनावश्यक है। कोर्ट के शब्द सीधे उन डर फैलाने वाले नैरेटिव को काटते हैं जिन्हें यूनियनों और राजनीतिक समूहों ने हवा दी थी।

बाहरी लोग आंदोलन को जारी क्यों रखना चाहते हैं और इसमें कौन-से राजनीतिक लाभ हैं

आंदोलन छात्रों की मूल माँग से कहीं आगे क्यों चला गया, यह समझने के लिए हमें ये देखना होगा कि कैंपस को अशांत बनाए रखने से किसे फायदा हो रहा है। खास बात ये हा कि इनमें से कोई भी लाभार्थी छात्र नहीं हैं।

राजनीतिक दल

आम आदमी पार्टी (AAP), कॉन्ग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसे दलों के लिए पंजाब विश्वविद्यालय एक आसान प्रतीकात्मक युद्धक्षेत्र है। चुनाव नजदीक हैं और नैरेटिव लगातार बदल रहे हैं। ऐसे में पीयू को ‘पंजाब की पहचान का आखिरी किला खतरे में’ के रूप में पेश किया जा रहा है।

कैंपस में मार्च करना, नारे लगाना और केंद्र पर हमला करना उन्हें राजनीतिक लाभ देता है, जिसका सीनेट से कोई लेना-देना नहीं है।

AAP के मंत्री पहुँचे, कॉन्ग्रेस के विधायक भावनाओं से भरा भाषण देने लगे, SAD नेता पंजाब के रक्षक बनकर सामने आए। लेकिन जब पीयू का बजट घटाया गया, हॉस्टलों में कमी आई या शैक्षणिक निर्णय टाले गए, तब ये नेता कहाँ थे? विश्वविद्यालय के प्रति उनका अचानक दिखा ‘प्यार’ समयबद्ध है, सच्चा नहीं।

किसान यूनियन

संयुक्त किसान मोर्चा में विभाजन और 2021 के बाद घटती भीड़ के चलते कई यूनियनें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने को बेताब हैं। छात्र आंदोलनों का समर्थन उन्हें नैतिक अधिकार का आभास देता है, जबकि सीनेट चुनावों का कृषि मुद्दों से कोई संबंध नहीं है।

साभार- ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्टर

इसी वजह से पंजाब में यूनियन नेताओं को पूरे जत्थों के साथ ट्रैक्टर और ट्रॉलियों में आते देखा गया। ‘पंजाब के लिए लड़ते किसान पुत्र’ जैसी तस्वीर वहाँ भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है, लेकिन छात्रों की चिंताओं से रणनीतिक रूप से पूरी तरह अलग है।

मजदूर यूनियन और वैचारिक संगठन

ये समूह आंदोलनों को अपने राजनीतिक नैरेटिव आगे बढ़ाने का अवसर मानते हैं। उनके नारे शायद ही कभी छात्रों की माँगों से मेल खाते हैं। बल्कि वे अपने वही वैचारिक फैलाव दोहराते हैं जो हमने किसान आंदोलन के दौरान देखा था, जहाँ कई संगठन मूल शिकायत से परे जाकर आंदोलन से जुड़ गए थे।

इनमें से कई संगठनों को अराजकता से ही लाभ मिलता है। आंदोलन जितना लंबा चलता है, उन्हें उतना ही अधिक मंच और दिखने का मौका मिलता है।

कट्टरपंथी- अलगाववादी आवाजें

खालिस्तान के समर्थकों के समानांतर निहंग जैसे व्यक्तियों की मौजूदगी भी एक और परत दिखाती है। ये लोग पीयू को एक प्रतीकात्मक स्थल मानते हैं- एक ऐसी जगह जो पंजाब की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। अगर वे छात्र आंदोलन के अंदर इतिहास में हुए विश्वासघात, राज्य दमन या सांस्कृतिक मालिकाना हक के नैरेटिव बो देंगे तो उन्हें कैंपस से कहीं आगे वैचारिक लाभ मिलता है।

विपक्षी दल और केंद्र-विरोधी नैरेटिव

केंद्र की वापस ली गई अधिसूचना को बीजेपी पर हमला करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि वह अधिसूचना अब सक्रिय ही नहीं है। यह ठीक वही रणनीति है जो किसान कानूनों के साथ अपनाई गई थी।

हालाँकि वे 2021 में वापस ले लिए गए थे, फिर भी वे राजनीतिक दलों, यूनियनों और तथाकथित कार्यकर्ताओं के लिए डर फैलाने का साधन बने हुए हैं।

कंटेंट क्रिएटर्स और कार्यकर्ता

हमें नए दौर के आंदोलन लाभार्थियों को नहीं भूलना चाहिए। इन्फ्लुएंसर्स, हाशिये के कार्यकर्ता, स्थानीय आंदोलनकारी और कुछ छात्र नेता खुद अराजकता जारी रहने पर सामाजिक पूँजी हासिल करते हैं।

एक सुलझा हुआ आंदोलन उन्हें कुछ नहीं देता। एक लंबा खिंचता आंदोलन उन्हें अनुयायी, दृश्यता और ‘युवा नेता’ की पहचान देता है, भले ही उनका मूल मुद्दे से बहुत कम संबंध हो।

इन सभी परतों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है। छात्र स्पष्टता चाहते हैं। बाहरी लोग संकट चाहते हैं।

इसका सबसे सरल प्रमाण पीयू छात्र अवतार सिंह से मिला। उन्होंने हमें सीधे बताया कि जैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित होगा, हड़ताल समाप्त हो जाएगी। हालाँकि उन्होंने किसान और मज़दूर यूनियनों की मौजूदगी का समर्थन किया, जो शुरुआत से ही टालना चाहिए था।

छात्र 240 दिन की समयसीमा समझते हैं। वे प्रशासनिक प्रक्रिया समझते हैं। वे केंद्र से नहीं डरते। वे पीयू को बंधक बनाने की कोशिश नहीं कर रहे।

यह बाहरी लोग हैं जो आंदोलन को जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि सीनेट कार्यक्रम उनकी उपयोगिता समाप्त कर देता है।

निष्कर्ष- असली खतरा है आंदोलन का हड़पना, न कि केंद्र

दो सप्ताह के आंदोलन, बैरिकेड्स, एफआईआर और राजनीतिक नाटकों के बाद असली सवाल बहुत सरल है। असल खतरा क्या है? केंद्र ने अपनी अधिसूचना वापस ले ली है। हाई कोर्ट ने सीनेट प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। पीयू अधिनियम स्पष्ट है।

असली खतरा यह है कि छात्रों की चुनाव तिथियों की माँग कितनी आसानी से किसान यूनियनों, मजदूर समूहों, राजनीतिक दलों और पहचान-आधारित संगठनों द्वारा हड़प ली गई।

जो छात्र केवल पढ़ाई करना चाहते हैं, उन्हें डर के नैरेटिव से प्रभावित किया जा रहा है जबकि बाहरी लोग कैंपस का इस्तेमाल अपनी प्रासंगिकता के लिए कर रहे हैं। अदालत चाहती है कि कक्षाएँ फिर से शुरू हों। केवल वे लोग जिनके राजनीतिक मकसद हैं, अराजकता को जारी रखना चाहते हैं।

ये रिपोर्ट मूल रूप से अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।

अमेरिका में भारत-विरोधी नस्लवाद पर CNN का प्रोपेगेंडा लेख, भारत-हिंदू विरोधी कट्टरपंथियों को बनाया ‘विशेषज्ञ’

सीएनएन ने रविवार (16 नवंबर2025 ) को संयुक्त राज्य अमेरिका में बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद पर रिपोर्ट दी। ये रिपोर्ट इस्लाम समर्थकों और भारत-विरोधी कट्टरपंथियों का हवाला देकर प्रकाशित की गई है।

अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी सीएनएन ने भारत-विरोधी प्रचार का इतिहास रहा है। उसने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है ‘नस्लवादी अब खुलेआम भारतीय-अमेरिकियों को निशाना बना रहे हैं।’

सीएनएन ने जानकारी दी है कि कैसे भारतीय मूल के एफबीआई निदेशक काश पटेल, निक्की हेली और विवेक रामास्वामी को दिवाली की शुभकामनाएँ देने पर श्वेत ईसाई राष्ट्रवादियों को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।

लेख में कहा गया है, “कुछ भारतीय-अमेरिकी रूढ़िवादी इस बात से हैरान हैं कि राजनीतिक दक्षिणपंथी धड़ा अब उन पर निशाना साध रहे हैं।”

सीएनएन ने बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद के लिए ‘राजनीतिक दक्षिणपंथ’, हाशिए पर चले गए स्थानीय लोग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वीजा नियमों में की गई सख्ती को जिम्मेदार ठहराया है। लेख में आगे कहा गया है, “MAGA गठबंधन के कुछ सदस्य खुलेआम कह रहे हैं कि केवल श्वेत ईसाई ही अमेरिका में रहने के हकदार हैं।”

यह साफ था कि अमेरिकी समाचार चैनल ने रिपब्लिकनों की आलोचना करने और नस्लवाद-विरोधी मुहिम को मजबूत करने के लिए यह लेख प्रकाशित किया था, लेकिन सीएनएन ने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाजी के लिए मशहूर लोगों के विचार भी इसमें शामिल किया।

रकीब नाइक

  1. सीएनएन ने जिन विशेषज्ञों को शामिल किया है उनमें रकीब नाइक भी एक थे। उन्हें ‘ ऑर्गनाइज हेट स्टडी सेंटर’ का संस्थापक और कार्यकारी निदेशक बताया गया।

अमेरिकी समाचार एजेंसी ने दावा किया है कि रकीब नाइक ने कहा कि उनकी टीम ने अकेले अक्टूबर में भारतीयों और अमेरिकी भारतीयों के खिलाफ नस्लवाद और द्वेष फैलाने वाले लगभग 2,700 पोस्ट रिकॉर्ड किए।

दरअसल नाइक एक इस्लामवादी और एक शातिर फर्जी खबर फैलाने वाला है। वह हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार संगठन ‘हिंदुत्व वॉच’ का संस्थापक है, जिसका ट्विटर अकाउंट भारत में जनवरी 2024 में बंद कर दिया गया था।

यह भारत-विरोधी कट्टरपंथी है। इसने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हिंदू नरसंहार को नकारने की कोशिश की। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं को रातोंरात पलायन के लिए मजबूर किया और जमकर रक्तपात मचाया। नाइक ने काशी की ज्ञानवापी मस्जिद में मिले ‘शिवलिंग’ का मज़ाक भी उड़ाया था। इसके बावजूद, सीएनएन ने नाइक को सोशल मीडिया पर ‘भारत-विरोधी कट्टरता’ पर एक विशेषज्ञ के तौर पर पेश किया।

रोहित चोपड़ा

  1. अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी ने रोहित चोपड़ा नाम के एक व्यक्ति का भी हवाला दिया। अमेरिका के सांता क्लारा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर उनका विचार छापा गया है।

इसमें कहा गया है, ” रोहित चोपड़ा अति-दक्षिणपंथी समुदायों का ऑनलाइन अध्ययन करते हैं और नाइक के साथ ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ के सह-लेखक हैं।”

चोपड़ा ‘इंडियाएक्सप्लेन्ड’ नाम से एक हिंदूफोबिक एक्स हैंडल चलाते हैं, जिसे पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का आह्वान करने के कारण निलंबित कर दिया गया था।

(रोहित चोपड़ा का ट्विटर पोल)

चोपड़ा ने एक सर्वे में शामिल होने के लिए लोगों को आगे आने को कहा। इस सर्वे में पूछा गया था कि क्या भारतीय प्रधानमंत्री की हत्या उनके अपने गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की जाएगी।

(रोहित चोपड़ा का ट्वीट)

एक ट्वीट में, इस घटिया प्रोफेसर ने नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर साझा की और दावा किया, “ऐसे कपड़े पहने हुए हैं जैसे वह किसी भक्त का बलात्कार करने, पत्नी की हत्या करने या दंगा भड़काने जा रहे हों।”

उनके ट्वीट वायरल होने के बाद, प्रमुख वैश्विक थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) ने उन्हें अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। एनडीटीवी के पत्रकार शिव अरूर के अनुसार, इसी ‘प्रोफ़ेसर’ की कई साल पहले बाल पोर्नोग्राफ़ी के आरोप लगे थे और जाँच चल रही थी। भारत ने उनके ट्वीट पर बैन लगा दिया गया।

यही कारण है कि उन्होंने ‘वैश्विक हिंदुत्व को ख़त्म करने’ वाले सम्मेलन का बचाव करने और इस आयोजन के खिलाफ हिन्दुओं के विरोध को कम करके आंका। इसके बावजूद सीएनएन ने उन्हें अमेरिका में भारत-विरोधी नस्लवाद के ‘विशेषज्ञ’ के रूप में पेश करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी के लिए मशहूर चोपड़ा ने अमेरिकी समाचार चैनल से कहा, “यह एक तरह की चेतावनी होनी चाहिए कि अल्पसंख्यकों के प्रति नस्लवाद से आप भी अछूते नहीं हैं।”

सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन

  1. सीएनएन ने एक और विवादास्पद ‘विशेषज्ञ’ सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन का मत लिया है। वह इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग (आईएसडी) में विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।

उन्होंने पहले भी ‘लव जिहाद‘ को एक साजिश बता कर इसके असर को कम आंकने की कोशिश की थी, जबकि इसके हज़ारों मामले दर्ज हैं। ‘लव जिहाद’ गैर-मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने की एक चाल है।

सिद्धार्थ ने WIRED को दिए इंटरव्यू में ऑपइंडिया के ‘लव जिहाद’ को लेकर लिखे लेखों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन लेखों में दिए गए कंटेंट को एक्स और टेलीग्राम जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म पर फैलाया जाता है। उनका कहना है कि “इन लेखों की वजह से कुछ जगहों पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा या मुसलमानों को भगाने के आह्वान किए जाते हैं।”

उनका कहना है कि ऐसे लेख हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवाद के अंतर्गत आते हैं। यह एक राजनीतिक विचारधारा है, जो दावा करती है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है जिसे इस्लाम और ईसाई धर्म जैसे बाहरी प्रभावों से खतरा है। ISD ने अपने लेख में इन बातों को छापा है।

इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग ने न केवल हिंदुत्व के बारे में झूठ फैलाया है, बल्कि 2022 के लीसेस्टर दंगों के लिए ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ (बिना किसी सबूत के) को दोषी ठहराने की कोशिश की है। इस इंस्टीट्यूट में सिद्धार्थ वेंकट रामकृष्णन एक विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बांग्लादेश की अदालत ने शेख हसीना को सुनाई मौत की सजा, जानें किन 5 आरोपों में माना दोषी: फैसले के खिलाफ राष्ट्रपति से लेकर UN तक जाने के हैं अधिकार

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सोमवार (17 नवंबर 2025) को मौत की सजा सुनाई गई है। शेख हसीना को ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने कथित मानवता के खिलाफ अपराध में दोषी माना है। उन्हें साल 2024 में छात्र विद्रोह पर कार्रवाई का आदेश देने का दोषी बनाया गया है। इनमें से 2 मामलों में शेख हसीना को मौत की सजा और बाकी 3 मामलों पर उम्रकैद की सजा दी गई है।

ट्रिब्यूनल का यह फैसला पिछले साल जुलाई में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन के एक साल से भी अधिक समय बाद आया है, जिसके कारण अगस्त 2024 में उनका 15 साल का शासन समाप्त हो गया था। हसीना अपने पद से हटने के बाद से भारत में रह रही हैं और उन पर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया था।

शेख हसीना पर क्या-क्या आरोप हैं?

शेख हसीना के खिलाफ अभियोजन पक्ष ने 01 जून 2025 को ICT को सौंपी चार्जशीट में मानवता के खिलाफ 5 गंभीर आरोप लगाए हैं, जो विशेष रूप से जुलाई और अगस्त 2024 में भड़के छात्र आंदोलन के समय हुई हिंसा से जुड़े हैं। इनमें सबसे पहला आरोप है कि 14 जुलाई 2024 को हसीना ने गनाभाबन (Ganabhaban) में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भड़काऊ भाषण दिया था। उसके बाद ही सरकारी सुरक्षा बलों और आवामी लीग के समर्थकों ने छात्रों और नागरिकों पर हमला शुरू किया, जिसमें हत्या, हत्या की कोशिश, यातना और बाकी अमानवीय कृत्य शामिल हैं।

एक अन्य आरोप यह है कि शेशख हसीना ने प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए हेलीकॉप्टर, ड्रोन और घातक हथियारों के इस्तेमाल का आदेश दिया। ट्रिब्यूनल ने यह कहा कि इसके बाद सुरक्षा बलों ने इन निर्देशों को लागू किया और यह आदेश कमांड ‘जिम्मेदारी’, ‘षडयंत्र’ और ‘सहयोग’ के दायरे में आता है।

शेख हसीना पर यह भी आरोप है कि 16 जुलाई 2024 को बांग्लादेश के रांगपुर में बेगम रोकिया यूनिवर्सिटी के सामने एक छात्र अबू सैयद को सुरक्षा बलों ने बहुत नजदीक से गोली मारकर हत्या कर दी। ICT ने माना कि यह हत्या शेख हसीना की प्रेरणा, निर्देश और षड्यंत्र के तहत की गई थी, यानी उन्होंने न केवल इसकी अनुमति दी बल्कि इसमें सीधे तौर पर सहयोग किया।

चौथा आरोप है कि 05 अगस्त 2024 को ढाका के चनखरपुल इलाके में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई और 6 लोगों की हत्या कर दी गई। इसके अलावा पाँचवा आरोप है कि 05 अगस्त को ही आशुलिया पुलिस स्टेशन के सामने और आसपास के इलाकों में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई। कम से कम 5 लोग मारे गए और उनके शवों को जला दिया गया। एक घायल व्यक्ति को जिंदा छोड़ कर भी जलाने का आरोप है।

शेख हसीना के सहयोगी भी दोषी करार

इन सभी 5 आरोपों में शेख हसीना के अलावा तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जामान खान कमाल और पूर्व पुलिस अधिकारी चौधरी अब्दुल्ला अल-मामुन को दोषी करार दिया है। कोर्ट ने हसीना और असदुज्जामान को मौत की सजा सुनाई है। वहीं अल-मामुन को 5 साल की जेल की सजा दी गई है क्योंकि उन्होंने राज्य के पक्ष में गवाही दी।

मौत की सजा के बाद शेख हसीना के पास क्या विकल्प?

शेख हसीना को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अब जानते हैं कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री के पास इस सजा से बचने के लिए क्या-क्या विकल्प हैं। सबसे पहले शेख हसीना को कानूनी अधिकार है कि वे ICT के फैसले के खिलाफ बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सकती हैं।

ICT ने भी 453 पन्नों के अपने फैसले में यह स्पष्ट कहा है कि दोषियों को 30 दिन के भीतर अपील दर्ज करने का अधिकार है। यानी इस अपील को बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट की अपील विभाग (Appellate Division) में ले जाया जा सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर अपील स्वीकार की जाती है तो वहाँ नए सबूत प्रस्तुत कर या फिर ट्रायल प्रक्रिया में गलती के आधार पर तर्क दिया जा सकता है। इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट चाहे तो वह नई सुनवाई का आदेश दे सकती है या ICT के फैसले को पलट भी सकती है।

राष्ट्रपति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शेख हसीना कर सकती हैं माँग

इसके बाद शेख हसीना के पास रिव्यू पिटीशन (Review Petition) का भी विकल्प है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से यह अनुरोध किया जाता है कि वह अपने ही फैसले पर पुनर्विचार करे। लेकिन यह विकल्प केवल तभी सफल होता है जब नए सबूत सामने आएँ या अदालत में कोई बड़ी कानूनी गलती साबित हो जाए।

इसके अलावा शेख हसीना राष्ट्रपति के पास दया याचिका (Clemency) भी दायर कर सकती हैं। बांग्लादेश के संविधान के तहत राष्ट्रपति को सजा माफ करने, कम करने या बदलने का अधिकार है। यह पूरी तरह राजनीतिक फैसला होता है, इसीलिए यह देखना होगा कि राष्ट्रपति वर्तमान राजनीतिक माहौल और अंतरराष्ट्रीय दबाव को कैसे देखते हैं।

शेख हसीना के पास ‘कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप’ का भी विकल्प है। चूंकि वह फिलहाल बांग्लादेश में नहीं हैं, इसीलिए यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है। अगर वह चाहें तो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिक संगठनों, संयुक्त राष्ट्र (UN) या कूटनीतिक मंचों पर ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठा सकती हैं। हालाँकि, ICT एक घरेलू न्यायालय होने के चलते अंतरराष्ट्रीय कोर्ट का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप सीमित रहता है।

शेख हसीना के समर्थन में बांग्लादेश में प्रदर्शन

उधर, शेख हसीना के समर्थन में बांग्लादेश में व्यापक प्रदर्शन जारी है। देश में शेख हसीना के समर्थक सड़कों पर उतरकर मौजूदा यूनुस सरकार का विरोध कर रहे हैं। पिछले दिनों बांग्लादेश में कई जगहों पर धमाके हुए। यह सब कुछ ICT के फैसले से कुछ दिनों पहले से जारी है, जो शेख हसीना को मौत की सजा के आदेश के बाद तेज हो गया है।

मोहम्मद युनूस सरकार ने देश में शटडाउन का ऐलान कर दिया। इस बीच राजधानी ढाका में 15 हजार पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। प्रदर्शनकारियों पर शूट एट साइट का आदेश जारी किया गया है। पिछले 7 दिनों में 28 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। बांग्लादेश में एक बार फिर गृह युद्ध जैसे हालात हैं।

इससे पहले आवामी लीग ने रविवार (16 नवंबर 2025) की रात को शेख हसीना का एक ऑडियो मैसेज जारी किया था। इसमें शेख हसीना ने अपने समर्थकों को सरकार के बैन के बावजूद डटकर प्रदर्शन जारी रखने के लिए प्रेरित किया था।

गिर सोमनाथ की कच्छी पीर दरगाह में दिल्ली ब्लास्ट के बाद बाद पड़ा छापा, भीतर मिले तलवार-खंजर और चाकू: 1 गिरफ्तार, गुजरात पुलिस जाँच में जुटी

गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के कोडिनार स्थित एक दरगाह से घातक हथियार बरामद होने का खुलासा हुआ है। दिल्ली विस्फोट की घटना के बाद SOG समेत पुलिस की कई टीमों ने गुजरात के तटीय इलाके में तलाशी अभियान चलाया था। इसी सिलसिले में कोडिनार के मुलद्वारका इलाके में भी जाँच चल रही थी।

जाँच के दौरान उस इलाके में स्थित हजरत कच्ची पीर की दरगाह से घातक हथियार बरामद हुए। पुलिस ने इस मामले में मामला दर्ज कर दरगाह की संरक्षक अमिनशा इस्माइलशा कनौजिया को गिरफ्तार कर लिया है और आगे की जाँच जारी है। 

घटना के विवरण के अनुसार, रविवार (16 नवंबर 2025) को गिर सोमनाथ जिला पुलिस ने संवेदनशील तटीय गाँवों और बंदरगाह क्षेत्रों की तलाश शुरू की। यह अभियान एसपी जयदीपसिंह जडेजा की देखरेख में अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा था।

इस अभियान में दो डीएसपी, छह पुलिस निरीक्षक, सात पुलिस उपनिरीक्षक, एसओजी, एलसीबी और बम निरोधक दस्ते सहित 120 से ज्यादा पुलिसकर्मी शामिल थे। कोडिनार, ऊना और वेरावल की एक संयुक्त पुलिस टीम ने मूल द्वारका बंदरगाह पर अचानक जाँच की और आस-पास के गाँवों में रहने वाले लोगों से पूछताछ की। 

दरगाह से मिले हथियार

एसओजी टीम को जाँच के दौरान गिर सोमनाथ के हजरत कच्ची पीर बाबा की दरगाह से तलवार, चाकू और खंजर समेत कई हथियार मिले। इस दौरान दरगाह की केयरटेकर (देखभालकर्ता) अमिनशा इस्माइलशा भी वहाँ मौजूद थीं।

पुलिस ने आयोग की मौजूदगी में उनसे हथियार का लाइसेंस माँगा, लेकिन वह नहीं दे पाईं। जिसके बाद पुलिस ने मौके से हथियार जब्त कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है। फिलहाल, पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि दरगाह में वो हथियार कैसे आए और इसके पीछे का कारण क्या था?

इस मामले में दरगाह के संरक्षक के खिलाफ कोडिनार थाने में मामला भी दर्ज किया गया है। पुलिस ने खुद शिकायतकर्ता बनकर FIR दर्ज की है। एसओजी के हेड कांस्टेबल गोपाल सिंह मोरी ने शिकायत दर्ज कराई थी और उसके बाद मामला भी दर्ज किया गया है। पुलिस ने अमिनशा इस्माइलशा के खिलाफ गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। FIR की एक प्रति ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए, शिकायतकर्ता पुलिसकर्मी ने बताया कि गिर सोमनाथ जिले के कलेक्टर ने हथियारों पर प्रतिबंध संबंधी एक अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद पुलिस समेत कई टीमें मूल द्वारका स्थित कच्छी पीर की दरगाह की तलाशी ले रही थीं और वहाँ से हथियार बरामद हुए। इसके बाद दरगाह के संरक्षक मुंजावर के खिलाफ अधिसूचना का उल्लंघन करने का मामला दर्ज किया गया है। 

पुलिसकर्मी के अनुसार, आरोपित को थाने लाया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ये हथियार दरगाह तक कैसे पहुँचे? ये हथियार किसने दिए और इन्हें रखने का क्या मकसद था।

जिला पुलिस प्रमुख ने ऑपइंडिया को क्या बताया?

गिर सोमनाथ जिले के पुलिस प्रमुख जयदीप सिंह जडेजा ने ऑपइंडिया को बताया कि दिल्ली कार ब्लास्ट की घटना के बाद जिला पुलिस टीम ने संवेदनशील इलाकों में तलाशी ली थी, जिसके दौरान एक धर्मस्थल की जाँच के दौरान भारी मात्रा में हथियार बरामद हुए। चूँकि इनके कोई दस्तावेज नहीं मिले, इसलिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और आगे की जाँच शुरू कर दी गई है।

उन्होंने बताया कि इलाके में जाँच के दौरान कई अन्य मामले भी सामने आए, जिनमें दूसरे राज्यों से आए किराएदार पुलिस को सूचित किए बिना रह रहे थे, जबकि कुछ के खिलाफ अन्य नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई भी की गई है। उन्होंने आगे कहा कि पुलिस आगे भी ऐसी कार्रवाई करती रहेगी।

बता दें कि पिछले हफ्ते गिर सोमनाथ में ही एक जगह पर तोड़फोड़ अभियान के दौरान दरगाह हटाने गई पुलिस और जिला प्रशासन की टीम पर हमले की घटना भी सामने आई है। इस मामले में महिलाओं समेत कुछ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई है।

हाल ही में उसी गिर सोमनाथ से कुछ कश्मीरी लोगों को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की गई थी। लेकिन उनके पास से कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला। हालाँकि एसपी जडेजा का कहना है कि ये सभी अलग-अलग घटनाएँ हैं और अभी तक इनका कोई संबंध नहीं मिला है।

गुजरात ATS द्वारा पकड़े गए आतंकवादियों ने कलोल के कब्रिस्तान में छिपाए थे हथियार

गौरतलब है कि हाल ही में गुजरात एटीएस ने हथियारों की तस्करी करने गुजरात आए तीन आतंकियों को गिरफ्तार किया था। यह भी पता चला था कि इन आतंकियों ने गाँधीनगर के कलोल स्थित एक कब्रिस्तान में हथियार छिपा रखे थे।

इससे पहले उत्तर प्रदेश के दो आतंकी राजस्थान से हथियार लेकर कलोल पहुँचे थे और उन्हें कब्रिस्तान में छोड़ गए थे। बाद में हैदराबाद का सैयद हथियार लेकर आया था। हालाँकि  गुजरात से निकलने से पहले ही ATS की टीम ने उसे पकड़ लिया। फिलहाल इन सभी से पूछताछ की जा रही है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राजगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

दावा- PK की जनसुराज ने महागठबंधन को पहुँचाया नुकसान, हकीकत- NDA की हार का भी बनी कारण: ओवैसी और BSP को भी हुआ फायदा

बिहार चुनाव में जनसुराज पूरी दमखम के साथ चुनावी रण में उतरी। प्रशांत किशोर ने 238 सीटों पर प्रत्याशी उतारे, यह पहली बार चुनाव लड़ रही पार्टी के मुकाबले कहीं अधिक हैं। हालाँकि, यह चुनाव परिणामों में साबित भी हो गया। जनसुराज एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीती। पार्टी के अधिकतर उम्मीदवार तीसरे या तो चौथे स्थान पर लटके रहे। सिर्फ एक उम्मीदवार दूसरे स्थान तक पहुँचा।

जनसुराज की हालत इतनी बुरी रही कि पार्टी को केवल 2 से 3 प्रतिशत ही वोट शेयर हासिल हुआ, जिसका जीतने वाले NDA से तुलना भी नहीं की जा सकती है। यह वोट शेयर कुछ छोटे दलों की तुलना में भी काफी कम है। पार्टी के 68 सीटों पर तो वोट इतने कम थे कि वे NOTA से भी पिछड़ गए।

इसके अलावा सबसे बड़ी मात में जनसुराज के कुल 238 उम्मीदवारों में से 236 की तो जमानत तक जब्त हो गई। यानी लगभग 99.16 प्रतिशत अपनी जमानत बचाने में असफल रहे। इनमें अधिकतर उम्मीदवार तीसरे, चौथे या उससे भी नीचे स्थान पर रहे और कुल मिलाकर पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। लेकिन पूरे प्रदेश में कुल मिलाकर पार्टी को 15 लाख वोट मिले।

वहीं जनसुराज के स्टार उम्मीदवारों की बात करें तो चनपटिया विधानसभा से यूट्यूबर मनीष कश्यप को 37172 वोट मिले। इस सीट पर कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ने 602 वोट से जीत दर्ज की। कुम्हरार सीट से केसी सिन्हा को कुल 15,017 वोट मिले और वे तीसरे नंबर पर रहे। इस सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने 1,48,500 से ज्यादा वोट पाकर बड़ी जीत हासिल की। दरभंगा से पूर्व DGP आर मिश्रा और काराकाट से गायक रितेश पांडे जैसे चर्चित नाम भी चुनाव में उतरे लेकिन ये लोग भी जीत से दूर रहे।

जनसुराज ने महागठबंधन और NDA पर डाला असर?

इससे जाहिर है कि जनसुराज का प्रदर्शन बिहार चुनाव में बेहद खराब रहा। इस बीच कुछ मीडिया संस्थान और सोशल मीडिया पर खबरें तेज हैं कि बिहार चुनाव में जनसुराज ने NDA और महागठबंधन के वोट प्रभावित किए हैं। दावा किया गया कि चुनाव में जनसुराज ने NDA को लाभ और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाया है।

ABP Live के सर्वे और रिपोर्ट में यह बताया गया कि जनसुराज की पकड़ कम होने के बावजूद, महागठबंधन की सीटें कम होने और NDA की बढ़त के पीछे जनसुराज के प्रभाव को एक कारण माना गया। खासकर, उन इलाकों में जहाँ NDA को चुनाव में भारी जीत मिल सकी।

यहाँ चर्चा जनसुराज की उन 35 सीटों की हो रही है, जिनपर उन्हें हार-जीत के अंतर से ज्यादा वोट मिले। इन सीटों में 19 सीटें NDA के खाते में गईं, जबकि 14 सीटें महागठबंधन के खाते में आईं और बाकी एक-एक ओवैसी की पार्टी AIMIM और BSP की झोली में गईं।

जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल

मीडिया में सामने आया जनसुराज का यह सच अधूरा है। आइए आँकड़ों के अनुसार जनसुराज की उन 35 सीटों का हाल जानते हैं, जिनपर NDA को फायदा और महागठबंधन को नुकसान पहुँचाने का विश्लेषण पेश किया जा रहा है।

इनमें जनसुराज के स्टार उम्मीदवार मनीष कश्यप की विधानसभा चनपटिया भी शामिल है। इस सीट पर कॉन्ग्रेस के अभिषेक रंजन ने 602 वोटों से जीत दर्ज की। उधर, मनीष कश्यप को 50,366 वोट प्राप्त कर तीसरा स्थान हासिल हुआ। बीजेपी उम्मीदवार 86,936 वोट से दूसरे स्थान पर रहे।

फोटो साभार: ECI

एक और विधानसभा फोर्ब्सगंज की बात करें तो जनसुराज उम्मीदवार 977 वोट के साथ छठे स्थान पर रहे। वहीं जीतने वाली कॉन्ग्रेस ने बीजेपी को 221 वोट से हराया। सन्देश सीट पर भी तीसरे स्थान पर रहे जनसुराज उम्मीदवार को 6040 वोट मिले। जबकि जीतने वाली NDA के घटक दल JDU उम्मीदवार ने RJD को केवल 27 वोटों से मात दी।

फोटो साभार: ECI

इन्हीं 35 सीटों में एक सीट AIMIM के खाते में भी पहुँची है। इस जोकीहाट विधानसभा के आँकड़ों के अनुसार, जनसुराज को 35,354 वोट मिले हैं। जबकि AIMIM उम्मीदवार की जीत का मार्जिन 28,803 वोट है।

वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) के खाते में पहुँची रामगढ़ विधानसभा सीट में प्रत्याशी सतीश कुमार ने केवल 30 वोटों से जीत हासिल की है। वहीं जनसुराज को 4,426 वोट मिले हैं, जिसका हार-जीत के वोट के अंतर से कोई लेना-देना नहीं है।

फोटो साभार: ECI

इन आँकड़ों से यह तो साफ हो गया कि इन सीटों पर जनसुराज का कोई असर नहीं दिखा है। जहाँ जीतने वाले दलों की जीत का अंतर जनसुराज को मिले वोट से कहीं कम है।

जनसुराज से महागठबंधन को नुकसान और NDA को पहुँचा लाभ?

इसका सीधा-सा मतलब यह है कि जनसुराज की मौजूदगी से केवल NDA विरोधी या महागठबंधन विरोधी होने का पता नहीं चलता है। जिस तरह के आँकड़े सामने आए हैं, वे यह नहीं दिखाते कि जनसुराज की वजह से महागठबंधन को नुकसान पहुँचा है या NDA को फायदा हुआ हो।

बल्कि जनसुराज के प्रभाव से NDA के भी वोट कटे है और अन्य दलों ने भी उसका असर झेला है। इन 35 सीटों के नतीजों को ही देखें तो कहीं भी ऐसा साफ-साफ नहीं दिखता कि जनसुराज की एंट्री से महागठबंधन को एकतरफा नुकसान हुआ हो और NDA को उतना ही बड़ा फायदा मिला हो। कुछ सीटों पर हालात उल्टे भी हुए हैं। कहीं जनसुराज का वोट NDA के हिस्से को काटता दिखता है तो कहीं महागठबंधन का वोट।

यानी राजनीतिक समीकरण सीट-दर-सीट बदलते रहे हैं। इससे पता लगता है कि जनसुराज का प्रभाव एकतरफा नहीं बल्कि मिश्रित है। उसका असर किसे कितना पड़ा, यह हर सीट की स्थानीय राजनीति और वहाँ के उम्मीदवारों की स्थिति पर निर्भर करता है।

दिल्ली ब्लास्ट पर मुँह सिलकर बैठी लिबरल गैंग में लगी आग, ‘प्रियंका’ नाम सुन सनातन पर फूटे: फैला रहे ‘मुस्लिम विक्टिम’ वाला प्रोपेगेंडा, आतंकियों का नाम लिखने में परहेज

दिल्ली कार ब्लास्ट और आतंकी डॉक्टरों के मॉड्यूल की लगातार गिरफ्तारी के बीच एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका शर्मा से पूछताछ के बाद सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने का दौर शुरू हो गया है। हालाँकि प्रियंका शर्मा को अब छोड़ भी दिया गया है। डॉक्टर प्रियंका के परिजनों के मुताबिक, ये पूछताछ जम्मू कश्मीर पुलिस ने सहारनपुर से गिरफ्तार जिहादी डॉक्टर आदिल अहमद के बारे में जानने के लिए की थी।

लालकिला ब्लास्ट और 2900 किलो विस्फोटक जमा करने के मामले में अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉक्टरों के नाम आए। अब तक गिरफ्तार सभी डॉक्टरों के बारे में जो पता चला है, उसके अनुसार ये सभी इस्लामी कट्टरपंथी हैं। ये देश के सरकारी कॉलेजों में पढ़कर, करीब 90 फीसदी सब्सिडी के पैसों से एमबीबीएस और पीजी की डिग्री ली। मानवता की सेवा का प्रण लिया और निकल गए जिहादी बनकर देश को बर्बाद करने के लिए।

इन डॉक्टरों के खिलाफ देशभर में गुस्सा का माहौल है। एक के बाद एक मिल रहे सबूत इन डॉक्टरों के जिहादी होने की कहानी कह रहे हैं। ऐसे में एक हिन्दू डॉक्टर प्रियंका को हिरासत में लेकर की गई पूछताछ के बाद प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई है। दिल्ली ब्लास्ट के बाद आतंकियों से जुड़े इस मामले में पुलिस ने हजारों लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है। जहाँ इन आतंकियों ने काम किया, जहाँ से पढ़ाई की, उन जगहों पर काम करने वाले लोगों से रूटीन पूछताछ की जा रही है। हालाँकि, वे सभी संदिग्ध नहीं माने जा रहे हैं।

वहीं, जब प्रियंका का नाम इसमें आया तो प्रियंका का नाम लेकर सनातन को आतंकवाद से जोड़ कर दिखाने की कोशिश की जा रही है। ये कहा जा रहा है कि सिर्फ मुस्लिम ही आतंकी नहीं होते, हिन्दू भी हो सकते हैं।

एक यूजर ने कहा कि दिल्ली ब्लास्ट में जैसे ही प्रियंका का नाम आया, चैनलों में सन्नाटा पसर गया, हाय रे मुस्लिम एंगल…वही एक दूसरे यूजर ने लिखा कि मुसलमानों से सवाल करते थे,अब क्या करेंगे।

एक यूजर ने लिखा, “शर्मा जी की बेटी प्रियंका शर्मा दिल्ली ब्लास्ट केस में गिरफ्तार”

दरअसल प्रियंका शर्मा से पूछताछ होते ही उसे दोषी साबित करने की कोशिश होने लगी।

डॉक्टर प्रियंका से क्यों हुई पूछताछ?

दरअसल प्रियंका जनरल मेडिसीन में एमडी की पढ़ाई अनंतनाग के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से कर रही हैं। जिहादी डॉक्टर आदिल इसी कॉलेज में उसका सीनियर था और उसने जॉब भी ज्वाइन किया था। इसको लेकर ही पुलिस की टीम ने उससे पूछताछ की। फिलहाल प्रियंका का मोबाइल पुलिस के पास है।

प्रियंका के भाई भारत के मुताबिक, रात करीब 9 बजे प्रियंका के साथ वीडियो कॉल पर बात हो रही थी। 5 मिनट बाद प्रियंका के हॉस्टल में पुलिस की टीम पहुँची और गेट खटखटाया। इसके बाद प्रियंका का फोन कट गया। रात करीब 11 बजे प्रियंका के पति डॉक्टर अनिरुद्ध का फोन आया। उन्होंने बताया कि पुलिस ने प्रियंका को हिरासत में ले लिया है। इसके 1 घंटे बाद प्रियंका का फोन आया कि पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया है। उसका फोन पुलिस जाँच के लिए लैब भेज रही है।

डॉक्टर प्रियंका हरियाणा के रोहतक की रहने वाली हैं। उनके पति भिवानी में सरकारी डॉक्टर हैं। प्रियंका ने एमबीबीएस सोनीपत के खानपुर मेडिकल कॉलेज से किया था। भाई भारत सोनीपत में रोडवेज में क्लर्क है। पिता सतीश शर्मा शुगर मिल की सिक्योरिटी टीम में हैं और माँ हाउस वाइफ हैं।

देवेन्द्र का नाम आने पर भी किए गए थे कमेंट

लालकिला कार विस्फोट में इस्तेमाल की गई i20 कार के मालिक की खोज के दौरान देवेन्द्र सिंह का नाम आया था। दरअसल गुरुग्राम के नंबर HR26 को लेकर जब पुलिस कार मालिक की तलाश कर रही थी और मोहम्मद सलमान से पूछताछ कर रही थी तो उसने कहा था कि डेढ़ साल पहले उसने कार देवेन्द्र सिंह से ली थी। इसके बाद भी सोशल मीडिया पर कोहराम मचा। लेकिन जल्द ही पुलिस ने कार के मालिक अमीर राशिद अली को गिरफ्तार कर लिया।

डॉक्टर प्रियंका को छोड़ दिया गया है। इसको लेकर पुलिस का कोई बयान भी नहीं आया है। जब से इन जिहादी डॉक्टरों के मॉड्यूल का खुलासा हुआ है, यूपी से जम्मू कश्मीर तक धड़पकड़ शुरू हो गई। पूछताछ के बाद एक दूसरे से जुड़े तार का पता चला। लेकिन जैसे ही डॉक्टर प्रियंका से पूछताछ की बात सामने आई, प्रोपेगेंडा फैलाने वालों ने इस्लामी कट्टरपंथ की गंभीरता को कम करने के लिए प्रियंका का नाम लेना शुरू कर दिया। देवेन्द्र सिंह के केस में भी ऐसा ही हुआ था। जब पुलिस ने कार के असल मालिक आमिर अली को गिरफ्तार किया, तब प्रोपेगेंडा फैलाने वाले शांत हुए।

ये लोग तब तक चुप रहे, जब तक डॉक्टर प्रियंका शर्मा, देवेन्द्र सिंह जैसे नाम सामने नहीं आए। इन लोगों ने पहलगाम आतंकी हमले के वक्त भी यही किया था। जब टूरिस्ट आतंकियों के शिकार हुए, तब एक स्थानीय व्यक्ति की मौत होने की खबर भी आई। इसके बाद को प्रोपेगेंडा टीम इस बात को भी झुठलाने में लग गई की पर्यटकों का नाम पूछ-पूछ कर मारा गया। दरअसल सोशल मीडिया पर हो हल्ला मचाने वाले और प्रोपेगेंडा फैलाने वाले लोग अक्सर मरने वालों में एक मुस्लिम नाम ढूंढते हैं और साजिश करने वालों में कोई हिन्दू नाम। ताकि मुस्लिम कट्टरपंथ और आतंकवाद को जोड़ा न जा सके।

जब भी माना खत्म, ‘फीनिक्स’ की तरह उठ खड़े हुए चिराग पासवान: PM मोदी के हनुमान से बिहार के दमदार खिलाड़ी तक, जानें- LJP को कैसे दी संजीवनी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के ‘सबसे दमदार’ खिलाड़ी बने चिराग पासवान का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पिता रामविलास पासवान का साया सिर से उठने के बाद उन्होंने पार्टी में बगावत का दौर देखा। चाचा पशुपतिनाथ पासवान ने जब पार्टी पर कब्जा कर लिया, तो चिराग अकेले पड़ गए। लेकिन उन्होंने पीएम मोदी को कभी नहीं छोड़ा। हमेशा खुद को मोदी का हनुमान बताते रहे।

चिराग पासवान को कभी चुका हुआ माना गया, तो कभी राजनीति पर छा गए। पिछले विधानसभा चुनाव में एक सीट जीते तो इस लोकसभा चुनाव 2024 में सभी 5 सीटें जीत ली। यहाँ तक कि जेडीयू के उतार चढ़ाव में भी उनका अहम किरदार रहा।

2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में हुई थी बड़ी टूट

राम विलास पासवान के भाई और हाजीपुर के पूर्व सांसद पशुपति कुमार पारस ने 2021 में एलजेपी को तोड़ दिया था। दरअसल उन्हें चिराग पासवान का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। ये टूट राम विलास पासवान के निधन के मात्र एक साल के भीतर हुई थी। इसके बाद चिराग पासवान ने एलजेपी रामविलास और पशुपतिनाथ पारस ने राष्ट्रीय लोकजनशक्ति पार्टी के नाम से अलग-अलग दल बना ली।

पशुपतिनाथ पारस को कैबिनेट में मिली थी जगह

एलजेपी पर पशुपतिनाथ पारस के कब्जे के बाद एनडीए ने उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाया था। दरअसल एलजेपी के सभी सांसद उनके साथ थे। उस वक्त भी चिराग पासवान ने अपनी सीमाएँ नहीं लाँघी। उन्होंने पीएम मोदी के प्रति सम्मान जताते हुए कहा था कि ये उनका अधिकार है कि टीम में वो किसे शामिल करेंगे, किसे नहीं। लेकिन पशुपतिनाथ पारस एलजेपी के सदस्य नहीं है, पार्टी तोड़ने के कार्य को देखते हुए उन्हें मंत्री न बनाया जाए, क्योंकि एलजीपी से उनका लेना देना नहीं है।” फिर भी पशुपति पारस मंत्री बने। चिराग पासवान ने इसके बाद भी पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया।

साल 2022 में नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के साथ चले गए और बिहार में नई सरकार बना ली। इसकी वजह चिराग पासवान को बताया गया। ये वक्त राजनीति दृष्टिकोण से चिराग पासवान के लिए सबसे चुनौती भरा था। लेकिन यहीं से उन्होंने वापसी भी शुरू की।

कहा जाता है कि आरजेडी और तेजस्वी यादव ने चिराग पासवान को कई बार अपने पाले में करने की कोशिश की, लेकिन चिराग टस से मस नहीं हुए और खुद को ‘मोदी का हनुमान’ कहते रहे। नीतीश के एनडीए से अलग होकर भी उन्होंने बीजेपी को उपचुनावों में समर्थन किया। जाहिर है इन सीटों पर जीत का सेहरा भी चिराग के सिर चढ़ा। आगे चल कर इसका फायदा भी उन्हें मिला।

2024 में एनडीए से किनारे किए गए पशुपतिनाथ और चिराग छाए

लोकसभा चुनाव 2024 में पशुपतिनाथ पारस की पार्टी राष्ट्र्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एनडीए ने एक भी सीट बिहार में लड़ने के लिए नहीं दिया। यहाँ तक कि हाजीपुर सीट से वे खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन एनडीए को मनाने में विफल रहे। इससे आहत होकर उन्होंने एनडीए छोड़ने का ऐलान किया।

वहीं इस चुनाव में चिराग पासवान की पार्टी को 5 सीटें दी। इनमें हाजीपुर की सीट भी शामिल थी। चिराग की एलजेपी रामविलास ने 100 फीसदी स्ट्राइक रेट के साथ सारी सीटें जीत ली। इससे चिराग पासवान का राजनीतिक कद काफी बढ़ा और केन्द्र में उन्हें मंत्री बनाया गया। इसके साथ ही राम विलास पासवान की विरासत पर चाचा पशुपति पारस के दावे को भी खत्म कर दिया।

चिराग पासवान के जुड़ने और हटने का मतलब

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में चिराग पासवान एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस वक्त उनकी पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया था। एलजेपी (रामविलास) 135 सीटों पर लड़ी, लेकिन सिर्फ 1 सीट ही निकाल पाई। उन्होंने बीजेपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा, लेकिन सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ जमकर हमले किए।

नतीजा ये हुआ कि जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़कर भी मात्र 43 सीटें जीत पाई। यानी इस चुनाव में चिराग पासवान जेडीयू के लिए ‘काल’ साबित हुए। दरअलस चिराग पासवान जब नीतीश कुमार के साथ नहीं थे, तो उन्होंने दिखा दिया कि वो नीतीश को कितना कमजोर कर सकते हैं। इस बार वो साथ थे तो अपनी ताकत भी दिखा दी।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की बात करें तो इस वक्त चिराग पासवान न सिर्फ एनडीए में शामिल थे, बल्कि जेडीयू के साथ भी उनका राजनीतिक समीकरण सही था। चुनाव में इसका असर भी दिखा और जेडीयू 85 सीटें जीत गई।

चिराग पासवान ने भी 29 में से 19 सीटें जीतकर एनडीए को 200 पार पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई। चिराग ने महागठबंधन से 17 सीटें छीन कर अपनी झोली में डाल ली। इससे उनका राजनीतिक कद और ऊँचा हो गया है। बिहार में दलितों के वे एकमात्र नेता हैं, उन्होंने ये एक बार फिर साबित कर दिया है।

इंजीनियरिंग और फिल्मों के बाद राजनीति में आए चिराग

चिराग पासवान की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने झांसी के एक कॉलेज से कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला लिया लेकिन तीसरे सेमेस्टर के बाद कॉलेज छोड़ दिया। इसके बाद फिल्मों की ओर रुख किया। 2011 में ‘मिले न मिले हम’ फिल्म में कंगना रनौत के साथ काम किया। हालाँकि ये फिल्म फ्लॉप हो गई और बॉलीवुड को बाय-बाय करते हुए उन्होंने पिता रामविलास पासवान की छत्रछाया में राजनीति में कदम रख दिया।

राजनीतिक मौसम के वैज्ञानिक कहे जाते थे रामविलास पासवान

चिराग पासवान के पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने 28 नवंबर 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना की थी। पासवान समुदाय का बिहार में उन्हें एकमात्र नेता माना जाता था।बिहार विधानसभा चुनाव 2005 में उन्होंने 29 सीटें जीत ली थी। साथ ही 12 फीसदी वोट पाकर सबको चौंकाया था।

2014 में एनडीए गठबंधन में रामविलास पासवान के शामिल होने के पीछे चिराग को अहम वजह माना जाता है। राम विलास पासवान ने ही स्वीकार किया था कि उन्हें एनडीए में शामिल होने के लिए चिराग पासवान ने ही राजी किया। उससे पहले के चुनाव में भी LJP लगभग खत्म ही हो चुकी थी, लेकिन इस फैसले के बाद लोकसभा चुनाव 2014 में चिराग पासवान जमुई से सांसद चुने गए। 2019 में फिर वे जमुई से ही लड़े और दोबारा सांसद बने।

साल 2024 में उन्होंने अपने पिता के चुनाव क्षेत्र हाजीपुर से चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इस बार मोदी कैबिनेट में भी उन्हें जगह मिली और अब बिहार चुनाव में उन्होंने कहीं से भी खुद की पार्टी को NDA की कमजोर कड़ी साबित नहीं होने दिया, बल्कि कड़ी लड़ाई वाली सीटों पर भी NDA को जीत दिलाई। अब चिराग पासवान ने अपनी राजनीतिक समझदारी से उन सभी को जवाब दे दिया है, जो उन्हें सिर्फ मौसम वैज्ञानिक के बेटे और पार्ट-टाइम नेता समझते थे।

ड्रग्स-गैंगवार-बैड इकोनॉमी, अब मैक्सिको में सड़कों पर उतरा GenZ: सत्ता परिवर्तन या किसी और लक्ष्य के पीछे US के पड़ोसी युवा- जानें सबकुछ

उत्तरी अमेरिका के देश मेक्सिको में शनिवार (15 नवंबर 2025) को भ्रष्टाचार, अपराध और सुरक्षा की कमी के खिलाफ हजारों की संख्या में Gen Z सड़क पर उतरे। ये विरोध प्रदर्शन मेक्सिको सिटी में राष्ट्रपति के आवास ‘नेशनल पैलेस’ के ठीक सामने हुए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने’ नेशनल पैलेस’ की दीवारें कूदकर भीतर घुसने की भी कोशिश की, जिसके बाद पुलिस से हिंसक झड़प हुई।

देखते ही देखते Gen Z का यह प्रदर्शन दंगों में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर, पटाखों, लाठियों और जंजीरों से हमला किया। यहाँ तक की पुलिस की ढाले और बाकी चीजें भी छीन ली गईं। इस हिंसा में 120 से अधिक घायल हुए, जिनमें से करीब 100 पुलिस अधिकारी हैं। ये बिल्कुल वैसा ही नजारा है जैसा सितंबर 2025 में नेपाल में देखा गया था, जहाँ Gen Z प्रदर्शन देश में सरकार बदलने की वजह बना।

कैसे शुरू हुआ मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन ?

नेपाल की होड़ में इन दिनों मेक्सिको की युवा पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है। देश में Gen Z प्रदर्शन विश्वभर में चर्चा में हैं। यहाँ Gen Z ने सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया। प्रदर्शन में Gen Z ने ‘अपराध के आगे कभी नहीं झुकेंगे’, ‘जस्टिस फॉर मंजो’, ‘देश मर रहा है’, ‘सरकार इस्तीफा दो’, ‘नार्को टेस्ट’ जैसे नारों लगाए।

कई प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के इस्तीफे की माँग वाले पोस्टर और बैनर भी लगाए। इस दौरान One Piece कार्टून से प्रेरित समुद्री के खोपड़ी वाला झंडा लहराया गया, जिसे इस आंदोन का वैश्विक प्रतीक माना गया। यह आंदोलन सोशल मीडिया पर आह्वान के बाद अचानक से जोर पकड़ गया और फिर देश के और भी कई बड़े शहरों में फैल गया।

वैसे तो इस आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी युवाओं की रही, खासकर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सक्रिय Gen Z की। लेकिन देश के बाकी नागरिक, बुजुर्ग और विपक्षी दलों के लोगों ने आंदोलन का समर्थन किया।

मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन में क्या हुआ?

प्रदर्शन की शुरुआत शांतिपूर्ण रही पर जैसे-जैसे भीड़ बढ़ी, तो प्रदर्शन उग्र और हिंसक हो गया, जिसमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पे भी शुरू हो गईं। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के आवास राष्ट्रीय महल को घेर लिया और दीवार फांदने की कोशिश की। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने आँसू गैस का इस्तेमाल किया। उधर से जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी और लाठी-डंडों से हमला किया। सामने आई तस्वीरों में कुछ लोगों के हाथ में हथौड़ा भी देखा गया।

इस हिंसा में 120 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें से 100 से ज्यादा पुलिसकर्मी थे। मेक्सिको सिटी के जन सुरक्षा सचिव पाब्लो वाजक्वेज ने बताया कि लगभग 20 नागरिक घायल भी हुए हैं। वहीं करीब 20 प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी भी हुई जबकि 20 अन्य पर प्रशासनिक आरोप लगाए गए हैं।

मेक्सिको में Gen Z प्रदर्शन की वजह?

मेक्सिको के इस Gen Z प्रदर्शन की वजह देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, सार्वजनिक हत्याएँ और न्याय प्रणाली में कमी है, जिसने युवा वर्ग की सहनशक्ति की परीक्षा ली। इस आंदोलन की शुरुआत मिचोआकन (Michoacan) के मेयर कार्लोस मंजो की हत्या के बाद हुई, जो लंबे समय से ड्रग कंट्रोल और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहे थे। उनकी हत्या ने देशभर में गहरा सदमा और Gen Z में गुस्सा भड़का दिया।

Gen Z ने इस घटना को सरकार की असफलता और अपराध के खिलाफ नाकामी का प्रतीक माना और इसके खिलाफ आवाज उठाई। इस आंदोलन में युवाओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सिस्टम की ढिलाई, राजनीतिक जवाबदेही की कमी और अपराधियों को दंड न मिलने को लेकर भारी निराशा जताई। सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े Gen Z ने युवाओं को एकत्र किया और व्यापक समर्थन प्राप्त किया, जिसमें बुजुर्ग और विपक्षी दल भी शामिल हुए। वे सरकार से पारदर्शिता, सुरक्षा और सख्त कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

मेक्सिको Gen Z प्रदर्शन का राजनीतिक एंगल

मेक्सिको का यह प्रदर्शन Gen Z की सरकार के खिलाफ बगावत है। ठीक वैसे ही जैसे नेपाल में Gen Z ने सरकार के काम से नाराज होकर सड़क पर हिंसक प्रदर्शन किया और पूरे देश को घुटने टेकने पड़े। लेकिन मेक्सिको में Gen Z का यह प्रदर्शन कहीं न कहीं राजनीतिक हलखों से जुड़ा लगता है। मेक्सिको में फिलहाल वामपंथी दल मोरेना (Morena) की सत्ता है। प्रदर्शन में भी युवाओं ने ‘Go Morena’ के नारे लगाए।

शनिवार को जिस राष्ट्रपति आवास ‘नेशनल पैलेस’ से यह विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ, इसकी वजह भी साफ थी। दरअसल, प्रदर्शन से कुछ दिन पहले मेक्सिको की राष्ट्रपति शीनबॉम ने दणिणपंथी दलों पर Gen Z आंदोलन में घुसपैठ करने के आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि प्रदर्शन की संख्या बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर बॉट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे कुछ Gen Z सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स ने भी समर्थन वापस ले लिया।

क्या हिंसा को बढ़ावा दे रहा सोशल मीडिया?

मेक्सिको का यह Gen Z प्रदर्शन ठीक उसी दिशा में पहुँच गया जो नेपाल के Gen Z प्रदर्शन में हुआ। इसकी वजह सोशल मीडिया भी है। यूँ तो नेपाल और मेक्सिको में हुए दोनों ही प्रदर्शन की शुरुआत सोशल मीडिया से ही हुई। लेकिन प्रदर्शन को दंगा बनाने का काम भी सोशल मीडिया का ही रहा। सोशल मीडिया ने केवल Gen Z ही नहीं बल्कि आम नागरिकों को भी बढ़ावा दिया।

मेक्सिको में पूर्व राष्ट्रपति विसेंट फॉक्स और अरबपति रिकार्डो सेलिनास प्लीगो ने सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन अपना समर्थन व्यक्ति किया। तभी दक्षिणपंथी दल सक्रिय हो गए और Gen Z प्रदर्शन में शामिल होने लगे। नतीजतन, शांतिपूर्ण Gen Z प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। नेपाल में भी यही हुआ था, जब सोशल मीडिया का आह्वान पर हुए Gen Z प्रदर्शन में उग्रवादियों की घुसपैठ ने देश की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। लेकिन मेक्सिको में समय रहते Gen Z प्रदर्शन पर काबू पा लिया गया।

पहली बार हार से ही शुरू होता है भोजपुरी सितारों का राजनीतिक करियर, मनोज- निरहुआ-पवन से खेसारी तक दिखा यही पैटर्न: जानिए गैर-BJP पार्टियों के टिकट पर क्यों मिलती है मात?

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों की राजनीति में एंट्री अक्सर हार से होती है। चाहे ये किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हों या फिर निर्दलीय ही मैदान में उतरे हों। इस लिस्ट में एक से बढ़कर एक भोजपुरी फिल्मी सितारों का नाम शामिल है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) से लेकर बिहार चुनाव 2025 में हारे खेसारीलाल, रितेश पांडे तक का नाम लिया जा सकता है।

भीड़ को ‘वोटर’ नहीं बना पाते कलाकार

ज्यादातर ये कलाकार बिहार, यूपी और झारखंड के क्षेत्रों में लोकप्रिय होते हैं, क्योंकि यहाँ भोजपुरी जानने और समझने वालों की बड़ी आबादी रहती है। इन क्षेत्रों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र हैं। इनकी फिल्में, डायलॉग और गाने आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते हैं। इसलिए ये सेलिब्रिटीज भीड़ तो जमा कर लेते हैं और उन्हें देख कर उत्साहित भी होते हैं। लेकिन जब भीड़ को वोट में तब्दील करने की बारी आती है, तो पीछे रह जाते हैं।

इसकी वजह रणनीतिक कमजोरी, अनुभव की कमी और स्थानीय मुद्दों पर इनकी कमजोर पकड़ को माना जा सकता है। कुछ उत्साहित जनता तो इन्हें वोट दे देती है, लेकिन आम लोग इन्हें वोट नहीं देते। जनता ये भी सोचती है कि अगर वोट दिया, तो जीतने के बाद फिर शायद दर्शन भी न दे।

लेकिन, हारे हुए ये कलाकार जैसे ही बीजेपी से जुड़ते हैं, इनकी जीत का परचम लहराने लगता है। इसकी वजह है कि जनता सोचती है कि पार्टी उनके बीच रहेगी और कलाकार पार्टी से जुड़ा है, तो उस तक पहुँचना आसान होगा।

मनोज तिवारी- भोजपुरी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और गायक रहे मनोज तिवारी ने अपने राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से की। 2009 लोकसभा चुनाव में वे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन बुरी तरह हार गए।

राजनीति में पहली हार का सामना करने के बाद मनोज तिवारी ने पाला बदला और 2013 में बीजेपी ज्वाइन किया। 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर- पूर्व दिल्ली से चुनाव मैदान में उतारा। इस सीट पर बिहार-यूपी के लोग बड़ी संख्या में हैं। उन्होंने न सिर्फ जीत दर्ज की, बल्कि लगातार तीन बार (2014, 2019, 2024) से जीतते आ रहे हैं। दिल्ली बीजेपी का ये एक प्रमुख चेहरा भी हैं।

रवि किशन- भोजपुरी के बड़े सितारों में रवि किशन का नाम भी आता है। राजनीति में उन्होंने 2014 में एंट्री की और लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव मैदान में उतरे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पर उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस ज्वाइन करना उनकी बड़ी भूल थी।

3 साल बाद 2017 में उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। लोकसभा चुनाव 2019 में उन्हें बीजेपी ने गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और दोबारा 2024 में भी गोरखपुर से ही बीजेपी के सांसद बने।

दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’- भोजपुरी फिल्मों और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ सीरीज से मशहूर हुए दिनेश लाल यादव 2019 में राजनीति में आए। उन्हें बीजेपी ने आजमगढ़ से समाजवादी पार्टी के गढ़ और अखिलेश यादव जैसे दिग्गज के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारा। जाहिर है टक्कर देने के बावजूद निरहुआ चुनाव हार गए।

साल 2022 के उपचुनाव में आजमगढ़ सीट से उन्हें बीजेपी ने फिर मौका दिया। इस बार अखिलेश यादव की अनुपस्थिति में वे चुनाव जीत गए। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के रिश्तेदार धर्मेन्द्र यादव से वे चुनाव हार गए।

पवन सिंह- भोजपुरी ‘पावर स्टार’ पवन सिंह ने 2024 में बीजेपी का दामन थामा। पार्टी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की, लेकिन उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और बिहार के काराकाट सीट से निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे। यहाँ उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

बिहार चुनाव 2025 में भी उनके चुनाव लड़ने की चर्चा थी, लेकिन व्यक्तिगत विवादों की वजह से चुनाव मैदान से उन्होंने दूरी बनाई।

भोजपुरी सुपर स्टार खेसारी लाल यादव– बिहार चुनाव 2025 में राजनीति में एंट्री करते हुए उन्होंने आरजेडी की टिकट पर छपरा से चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने उन्हें हरा दिया। खेसारी लाल काफी लोकप्रिय कलाकार हैं और छपरा जैसे भोजपुरिया इलाके से चुनाव भी लड़ रहे थे, पर जीत नहीं पाए। अब उनका कहना है कि वो राजनीति से दूर रहेंगे।

रितेश पांडे– बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज की टिकट पर करगहर सीट से चुनाव मैदान में उतरने वाले भोजपुरी गायक रितेश पांडे को हार का सामना करना पड़ा। जाहिर है जब पार्टी ही खाता नहीं खोल पाई, तो रितेश कहाँ जीतते? लेकिन उन्हें वोट भी मात्र 7.45 फीसदी ही मिला।

गुंजन सिंह– भोजपुरी एक्टर गुंजन सिंह ने लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार के नवादा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाया। उन्हें यहाँ बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी उम्मीदवार विवेक ठाकुर ने यहाँ से जीत हासिल की। गुंजन सिंह तीसरे नंबर पर रहे । उन्हें मात्र 3.4 फीसदी वोट मिले।

कुणाल सिंह– लोकसभा चुनाव 2014 में भोजपुरी फिल्मों के दिग्गज कलाकार कुणाल सिंह ने राजनीति में आने की सोची। उन्होंने पटना साहिब से कॉन्ग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा से हार गए।

क्यों गैर-बीजेपी पार्टियों से नहीं मिल पाती सफलता?

भोजपुरी सितारे हों या पैराशूट कैंडिडेट, फिर राजनीति से इतर चाहे वो किसी भी बैकग्राउंड के हो। इनकी पॉपुलैरिटी इन्हें बीजेपी से इतर जीत नहीं दिला पाती। इसे समझने के लिए राजनीतिक जड़ को देखना होगा। दरअसल, किसी भी पार्टी में ऊपर से थोपे गए कैंडिडेट-भोजपुरी सितारे रैलियों में तो भीड़ खींच लेते हैं, लेकिन इनके नाम की घोषणा होने के साथ ही पार्टियों में रूठने मनाने का जो दौर शुरू होता है, वो थम नहीं पाता।

बात खेसारी लाल यादव की ही करें, तो सालों से छपरा विधानसभा सीट पर जो आरजेडी नेता मेहनत कर रहा हो, उसकी जगह अचानक से मैदान में खेसारी लाल यादव आ गए। ऐसे में उसका नाराज होना तो बनता ही है। ऐसे में आरजेडी ने सालों से मेहनत किए पार्टी नेता को छोड़ दिया, तो उसमका नुकसान खेसारी को उठाना पड़ा।

दूसरी बात, अगर उस नेता ने बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र के सभी अहम पदों पर लोगों के साथ तालमेल बिठाया, तो ये एक दिन काम नहीं। खेसारी लाल यादव टिकट मिलने के बाद मैदान में आए। अचानक पार्टी के सभी अहम लोग उनसे मिल तक नहीं पाए, संगठन और वोटिंग के दिन की तो बात भी छोड़ दीजिए। इस मामले के अलावा भी खेसारी लाल के खिलाफ उनकी कई बयानबाजियाँ भी गई। फिलहाल, ये मुद्दा यहाँ नहीं है। यहाँ बात भी सिर्फ खेसारी की नहीं हो रही, ये उदाहरण हर उसे पैराशूट कैंडिडेट पर लागू होती है, जबतक कि वो कोई करिश्माई व्यक्ति न हो।

लोकप्रियता के साथ ‘काडर’ जरूरी

चूँकि बीजेपी के अलावा ज्यादातर पार्टियों में हाई-कमान की तानाशाही चलती है, ऐसे में संगठन के जमीनी लोग पैराशूट कैंडिडेट से दूर हो जाते हैं। वहीं, बीजेपी में रूठों को मनाने की परंपरा रही है। एक-एक विधानसभा क्षेत्र में पूरी की पूरी ताकत झोंक देने की परपंरा रही है। प्रमोद महाजन इसे ‘कार्पेट मैनेजमेंट’ कहते थे। ये काम बीजेपी में अब भी होता है। ऐसे में बीजेपी में आकर इन नेताओं-अभिनेताओं को सफलता मिलनी पक्की हो जाती है। एक तरफ उनका खुद का करिश्माई व्यक्तित्व होता है, तो दूसरी तरफ संगठन का जोर, जो मतदाताओं के साथ घर से लेकर पोलिंग बूथ तक जुड़े रहते हैं।

अब बड़े कैनवस पर देखेंगे, तो साफ दिखेगा कि क्यों भोजपुरी स्टार्स की राजनीति में एंट्री होते ही हार मिलती है। साफ है कि उनके स्टारडम के जादू को वोटों में तब्दील कर पाने के लिए संगठन का वो साथ नहीं मिल पाता, जो जरूरी होता है। इसके उलट मैथिली ठाकुर का उदाहरण लें तो तमाम कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए बीजेपी ने उनकी जीत सुनिश्चित की, यहाँ तक कि खुद गृहमंत्री अमित शाह ने उनके लिए रैली को संबोधित किया।

ये पूरा पैटर्न बताता है कि किसी भी स्तर पर चुनाव के लिए सिर्फ स्टारडम काफी नहीं होता, बल्कि इसके लिए चाहिए होते हैं समर्पित कार्यकर्ता। उनके साथ आता है विजन, रणनीति और राजनीतिक सोच, यही बीजेपी की असली ताकत है। इस बात को जो भी नेता-अभिनेता समझ जाते हैं, वो फिर बीजेपी के साथ जुड़ जाते हैं।

इसे इस बात से समझिए कि रविकिशन को गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ाया गया और खुद योगी आदित्यनाथ बतौर मुख्यमंत्री और लोकल गार्जियन उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में रविकिशन को क्यों सफलता नहीं मिलती? वहीं, खेसारी हो या रितेश पांडे, ये अपने-अपने इलाके में सिर्फ क्राउड पुलर ही बन कर रह गए-वोट पुलर नहीं बन पाए।

अधिक वोट पाने से तय नहीं होती ज्यादा सीटों पर जीत: समझिए ‘वोट शेयर’ का सारा खेल, पढ़िए क्यों RJD समर्थकों के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हैं खोखले

बिहार में एनडीए ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की है। गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीती हैं। दूसरी ओर महागठबंधन को केवल 35 सीटें मिलीं। कॉन्ग्रेस की सीटें कम हुईं और राष्ट्रीय जनता दल मात्र 25 सीटें ही जीतने में कामयाब रहा।

दोनों गठबंधनों द्वारा जीती गई सीटों में भारी अंतर होने के बावजूद, वोट शेयर के आँकड़े कुछ और बयाँ करते हैं। नतीजों के मुताबिक, राजद का वोट शेयर सबसे ज़्यादा 23% रहा। उसे 1,15,46,055 वोट मिले। भाजपा का वोट शेयर 20% और उसे 1,00,81,143 वोट मिले, जबकि जदयू को 96,67,118 वोट मिले, जो कुल वोटों का 19.25% है।

राष्ट्रीय जनता दल को सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 25 सीटें ही क्यों मिली? ये सवाल सबके मन में उठ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि यह ‘वोट चोरी’ है, और राजद को वोट शेयर के आधार पर जीतना चाहिए था। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सूरज जी नाइक ने इसे ‘बिहार में शुद्ध #वोटचोरी, जीत नहीं’ कहा और स्पष्टीकरण माँगा।

कई अन्य सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह के पोस्ट किए। कुछ ने इसे चुनाव आयोग द्वारा आँकड़ों में हेरफेर बताया, तो कुछ ने ‘जादू/रहस्य’ को समझाने की कोशिश की।

पहली नजर ये आँकड़ा लोगों को भ्रमित कर सकता है, लेकिन नतीजों में कोई गड़बड़ी नहीं है। संसदीय लोकतंत्र को अपनाने के बाद से भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती आ रही है। सबसे अहम बात ये है कि चुनाव परिणाम अलग-अलग क्षेत्रों में जितने मत मिलते हैं, उन पर निर्भर करता है।

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों के विस्तृत परिणाम उपलब्ध हैं। यहाँ हर निर्वाचन क्षेत्र में हर एक उम्मीदवार को मिले मतों को देखा जा सकता है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में, जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा मत मिले, वह चुनाव जीत गया। जीत का अंतर 1 वोट हो या 1 लाख वोट, इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि जीतता तो केवल एक व्यक्ति ही है।

चूँकि भारत में अधिकांश सीटों पर कई उम्मीदवारों के बीच बहुकोणीय मुकाबला होता है, इसलिए जीतने वाले उम्मीदवार को आम तौर पर लगभग 30-35% वोट ही मिलते हैं। 50% से ज्यादा वोट लाने की हमारे यहाँ अनिवार्यता भी नहीं है, जैसा कि अमेरिका जैसे देशों में होता है।

किसी पार्टी को पूरे राज्य में मिले कुल वोट का चुनाव प्रणाली में कोई महत्व नहीं है। जीतने के लिए जरूरी है किसी खास निर्वाचन क्षेत्र में सबसे ज्यादा मत लाना। यही कारण है कि एक पार्टी (या गठबंधन) अपने प्रतिद्वंद्वी से कम वोट पाकर भी ज्यादा सीटें जीत जाती है। अथवा ज्यादा वोट पाकर भी पार्टियाँ कम सीटें निकाल पाती हैं।

यह केवल भारत में ही नहीं होता, बल्कि यूके, कनाडा जैसे देशों में भी होता है। हालाँकि, बहुदलीय प्रणाली और गठबंधन की वजह से भारत में खासकर विधानसभा चुनाव में ये साफ दिख जाता है। अधिकांश पश्चिमी देशों में ऐसा कम देखने को मिलता है, क्योंकि यहाँ 2-4 प्रमुख पार्टियाँ हैं।

राजद को अधिक वोट मिलने का कारण यह है कि उन्होंने कहीं अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालाँकि वे ज़्यादातर सीटें नहीं जीत पाए, फिर भी उन्हें उन निर्वाचन क्षेत्रों में अच्छा-खासा वोट मिला। इससे पार्टी के कुल वोटों की संख्या में इजाफा हुआ। राजद ने जहाँ 143 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा। यानी, राजद के कुल वोटों में 42 अतिरिक्त सीटों के वोट जुड़ गए। इसलिए कुल वोटों को लेकर बीजेपी या जदयू से उसकी तुलना करना गलत है।

भारतीय चुनावों में वोट शेयर और जीती हुई सीटों के बीच कई अंतर होते हैं। जो पार्टी कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। और उन सीटों पर उनके वोटर ज्यादा हैं, तो औसत वोट उसे ज्यादा मिलेगा, वहीं अगर कोई पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है, यहाँ तक कि उन सीटों पर भी जहाँ वह जीत नहीं सकती, तो भी उसे उन सीटों पर कुछ वोट मिलेंगे। इससे पार्टी को मिले कुल वोटों में तो बढ़ोतरी होगी, लेकिन सीटें जीतना संभव नहीं होगा।

एक और वजह यह है कि विपक्षी दलों में, राजद ने अपने सहयोगियों की तुलना में काफ़ी बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका मतलब है कि हारने वाली सीटों पर भी, वह काफी वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। इससे पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन जीती हुई सीटें नहीं बढ़ीं।

गौरतलब है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अलग-अलग होती है। कहीं ज्यादा मतदाता होते हैं तो कहीं बेहद कम। इसलिए जब कोई पार्टी कम अंतर से ज्यादा आबादी वाली सीट हारती है, तो उसके वोट शेयर में काफी वोट जुड़ जाते हैं। लेकिन नतीजों पर उसका फर्क नहीं पड़ता।

यह भी सच है कि राजद ने भाजपा और जद(यू) से 42 ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसे भाजपा से केवल 14 लाख और जद(यू) से केवल 18 लाख ज़्यादा वोट मिले। चूँकि राजद 42 सीटों पर भी वोट मिले, इसलिए उसके द्वारा लड़ी गई प्रत्येक सीट पर औसत वोट भाजपा और जद(यू) से कम हो गया।

महागठबंधन में ‘फ्रैंडली फाइट’ 12 सीटों पर हुई। इन सीटों पर एनडीए का पूरा वोट एक ही उम्मीदवार को गया, वहीं महागठबंधन के वोट उन्हीं सीटों पर गठबंधन के 2-3 उम्मीदवारों में बँट गए।

इन सब बातों से यह स्पष्ट है कि बिहार में सबसे ज्यादा वोट शेयर हासिल करने के बावजूद राजद को केवल 25 सीटें ही क्यों मिलीं, इसमें कोई रहस्य नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली इसी तरह काम करती है। राजद के उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटें हार गए, और यही बात मायने रखती है, पार्टी को मिले कुल वोट नहीं।

अगर किसी उम्मीदवार या पार्टी को लगता है कि मतगणना प्रक्रिया या परिणामों की घोषणा में कोई गड़बड़ी हुई है, तो वे याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए कोई ठोस वजह बताना पड़ता है। गौरतलब है कि मतगणना सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया उम्मीदवारों और पार्टियों के एजेंटों की मौजूदगी में होती है।

बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के विरोध में राहुल गाँधी और महागठबंधन के नेताओं ने जमकर शोर मचाया, लेकिन कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की। इसी तरह ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रही राजद या कॉन्ग्रेस का कोई भी उम्मीदवार परिणामों को कोर्ट में चुनौती देगा, इसकी संभावना नहीं दिख रही। ये सिर्फ ‘वोट चोरी’ का आरोप हर मंच पर लगाएँगे।

इसलिए सबसे ज्यादा वोट हासिल करने के बावजूद राजद ने इतनी कम सीटें कैसे जीतीं? इसका जवाब मिल गया होगा। यह किसी ‘वोट चोरी’ या किसी गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता। यह संविधान सभा द्वारा अपनाई गई चुनाव प्रणाली के अनुसार है, और यह तब तक लागू रहेगा जब तक संविधान में बदलाव नहीं किया जाता और भारत कोई अलग चुनाव पद्धति नहीं अपना लेता।