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इथियोपिया ही नहीं साल भर में 6 अफ्रीकी देशों में पहुँचे PM मोदी, चीन का प्रभाव कम कर भारत को ग्लोबल साउथ का लीडर बनाने पर फोकस: जानें क्यों हमारे लिए अहम है अफ्रीका महाद्वीप?

यह भारत के लिए बहुत गर्व का पल था जब इथियोपिया के प्रधानमंत्री डॉक्टर अबी अहमद ने वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इथियोपिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया’ से सम्मानित किया। इस सम्मान ने पीएम मोदी की दूरदर्शी नेतृत्व और दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में अहम योगदान को मान्यता दी है।

यह सम्मान भारत के ग्लोबल पावरहाउस के तौर पर उभरने को दिखाता है और ग्लोबल साउथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए पीएम मोदी को मिले भरोसे और पहचान को भी उजागर करता है।

इतना ही नहीं पीएम मोदी के भव्य डिनर का आयोजन किया गया, जिसमें वंदे मातरम् गाकर कलाकारों ने मंत्रमुग्ध कर दिया। पीएम मोदी ने इस दौरान दोनों हाथों को हवा में उठाकर तालियाँ बजाई और कलाकारों की हौसला अफजाई की।

पीएम मोदी का ये पहला इथियोपिया दौरा है। इससे भारत और इथियोपिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ दोनों के गहरे भरोसे और सहयोग को नया आयाम मिलेगा। पीएम मोदी के दौरे में अक्सर अनौपचारिक बातचीत और व्यक्तिगत कैमेस्ट्री सुर्खियाँ बनती हैं। इस दौरे के दौरान भी ये देखा गया। इथियोपिया के पीएम अहमद का प्रोटोकॉल तोड़कर खुद गाड़ी चलाना और खास तरह का कॉफी पिलाना यह दिखाता है कि भारत अब अफ्रीका के लिए सिर्फ एक व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि एक सच्चा दोस्त है।

पीएम मोदी के इस दौरे के दौरान व्यापार, निवेश, एग्रीकल्चर, डिजिटल, स्किल डेवलपमेंट, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा, आतंकवाद विरोधी अभियान और साइबर सुरक्षा पर बातचीत होगी। भारत और इथियोपिया ने अगले 5 साल में द्विपक्षीय संबंधों को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इथियोपिया भारत के लिए एफडीआई का अहम स्रोत है क्योंकि यहाँ 615 से ज्यादा भारतीय कंपनियाँ काम कर रही हैं।

पीएम मोदी ने इथियोपिया के संसद को संबोधित किया

प्रधानमंत्री मोदी ने इथियोपिया की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “भारत और इथियोपिया का जलवायु और भावना, दोनों में गर्मजोशी है। लगभग 2000 साल पहले, हमारे पूर्वजों ने समुद्र पार कर गहरे रिश्ते बनाए थे। हिंद महासागर के पार, व्यापारी मसालों और सोने के साथ यात्रा करते थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ सामान का ही व्यापार नहीं किया, बल्कि उन्होंने विचारों और जीवन शैली का भी आदान-प्रदान किया।”

उन्होंने कहा कि अदीस और धोलेरा जैसे बंदरगाह सिर्फ व्यापार केंद्र नहीं थे, बल्कि सभ्यताओं के बीच पुल थे। आधुनिक समय में हमारे रिश्ते एक नए युग में प्रवेश करते हैं। 1941 में भारतीय सैनिकों ने इथियोपिया की आज़ादी के लिए इथियोपियाई लोगों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी।”

पीएम मोदी ने कहा, “भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और इथियोपिया का राष्ट्रगान, दोनों हमारी ज़मीन को माँ कहते हैं। वे हमें अपनी विरासत, संस्कृति, सुंदरता पर गर्व करने और मातृभूमि की रक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

2025 में पीएम मोदी ने की 5 अफ्रीकी देशों की यात्रा

पिछले 11 सालों में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-अफ्रीका संबंधों को काफी प्रमुखता दी और रणनीतिक साझेदारी को एक नए स्तर पर पहुँचाया। यहाँ तक कि पिछले 1 साल में पीएम मोदी ने 6 अफ्रीकी देशों की यात्रा की। इनमें इथियोपिया के अलावा दक्षिण अफ्रीका (नवंबर 2025), घाना (जुलाई 2025), नामीबिया (जुलाई 2025), मॉरीशस (मार्च 2025) और नाइजीरिया (नवंबर 2024) शामिल हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने मार्च 2015 में पहली बार मॉरीशस और सेशेल्स की यात्रा की। इसके अगले साल यानी जुलाई 2016 में वे मोजाम्बिक, तंजानिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर गए। हालाँकि नवंबर 2025 में उन्होंने दोबारा दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की थी। ठीक दो साल बाद यानी जुलाई 2018 में वे रवांडा, युगांडा की यात्रा की। जुलाई 2025 में नामीबिया, घाना की यात्रा की थी।

उन्होंने अपनी यात्राओं के जरिए अफ्रीका के साथ इस जुड़ाव को और तेज़ किया है। इन यात्राओं ने पूरे अफ्रीका में राजनयिक और विकासात्मक संबंधों को नई जान दी है, जो उनके नेतृत्व में एक रणनीतिक पहुँच को दिखाता है।

2025 की इस पाँचवीँ अफ्रीका यात्रा ने भारत के अफ्रीका प्रथम नीति को स्पष्टता से उभारा है। भारत, अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठा रहा है।

अफ्रीकी संघ का मुख्यालय इथियोपिया में है। पीएम मोदी की ये यात्रा अफ्रीकी संघ को जी-20 में शामिल करने के भारत की कोशिशों और ब्रिक्स देशों में अच्छा तालमेल बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रिक्स का 2026 सम्मेलन की मेजबानी भारत करने वाला है।

G20 का अफ्रीकन यूनियन बना सदस्य

सितंबर 2023 में भारत की G20 समिट की मेज़बानी के दौरान सबसे यादगार पलों में से एक था, प्रधानमंत्री मोदी का अफ्रीकी यूनियन को G20 में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने का न्योता देना। उस वक्त एयू के चेयरपर्सन अजाली असौमानी थे। भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान, 2023 में अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। इससे अफ्रीकी देशों के साथ भारत के गहरे होते संबंधों की एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाता है।

अफ्रीकी यूनियन के फिलहाल 55 सदस्य देश हैं। अब यूरोपीय यूनियन की तरह अफ्रीकी यूनियन का महत्व है। इस कदम ने समावेशी वैश्विक शासन को बढ़ावा देने और दुनिया के मंच पर अफ्रीका की आवाज़ को मज़बूत करने के प्रति भारत के समर्पण को दिखाया था।

चीन का बढ़ता असर और लोन लेने के लिए मजबूर देश

अफ्रीकी देशों के साथ भारत के रिश्ते बहुत पुराने हैं, लेकिन दशकों की डिप्लोमैटिक बयानबाजी के बावजूद, ये रिश्ते अक्सर ठंडे ही रहे। पीएम मोदी की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने भारत-अफ्रीका संबंधों में नई जान फूँकी है, उन्हें प्राथमिकता दी है और कई तरह की पार्टनरशिप को आगे बढ़ाया है। कई लोग इसे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के प्रति भारत की कूटनीति के तौर पर देखते हैं।

अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी AfCFTA भारतीय निवेशकों को अफ्रीका के बड़े बाजार में व्यापक अवसर दे रहा है। दरअसल अफ्रीका भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसके साथ द्विपक्षीय व्यापार करीब 9 हजार करोड़ रुपए का है। यूरोपीय संघ और चीन दो सबसे बड़े व्यापार साझेदार हैं।

अफ्रीका में विकास की गति तेज हुई है। इससे उपभोक्ता बाजार का भी विस्तार हुआ है। निवेशक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं । भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से अफ्रीकी देशों में मानवीय जीवन में सुधार के लिए काफी सहयोग दिया है।

खास कर कोरोना के वक्त भारत ने कम से कम 25 अफ्रीकी देशों को टीके और आवश्यक चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई थी, जिसकी अफ्रीकी देशों के साथ साथ पूरी दुनिया ने सराहना की थी।

अफ्रीका में भारत तकनीक विकास में भी मदद कर रहा है इसलिए आईआईटी कैंपस खोले गए हैं। पैन अफ्रीकी ई नेटवर्क चलाए जा रहे हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अफ्रीका को डिजिटल तौर पर मजबूत बनाने में भारत लगा हुआ है।

अफ्रीका के गरीब देशों के संसाधनों पर चीन की गिद्ध नजर है। इन देशों में निवेश कर और लोन देकर चीन अपने ऋण जाल में उसे फँसा रहा है। ऐसे में भारत को एक तरफ इन देशों की मदद करनी है, दूसरी तरफ चीन के बढ़ते निवेश से प्रतिस्पर्धा भी करनी है। ये बड़ी चुनौती है। कई परियोजनाओं को पूरा करने में देरी हो रही है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

भारत ने नई दिल्ली में 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। इसमें अफ्रीकी देशों की भागीदारी चार गुना से अधिक बढ़ गई, जो गहरे और अधिक व्यापक जुड़ाव की दिशा में एक बदलाव का संकेत है। लेकिन इसके बाद भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की बैठक हर तीन वर्षों में होनी थी, वह 2015 के बाद नहीं हो पा रही है।

आयुर्वेद का अफ्रीका में बड़ी संभावना

केन्या के पूर्व प्रधानमंत्री रायला ओडिंगा ने 2022 में पीएम मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि आयुर्वेद ने उनकी बेटी की आँखों की रोशनी वापस लौटा दी। ओडिंगा ने पीएम मोदी को आयुर्वेद को अफ्रीका में लाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी पौधों का उपयोग चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है और इससे अनगिनत लोगों को लाभ होगा।

पिछले एक दशक में भारत ने अफ्रीका के साथ अपनी विकास साझेदारी को काफी मजबूत किया है। करीब 43 अफ्रीकी देशों के 206 बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में भारत ने 12.37 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है। इसके अलावा अफ्रीकी युवाओं के लिए 50,000 स्कॉलरशिप भी दी हैं, जिनमें से 42,000 से ज्यादा का इस्तेमाल पहले ही किया जा चुका है।
पिछले 10 वर्षों में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 40,000 अफ्रीकियों ने भारत में प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

भारत ने अपनी टेली-शिक्षा और टेलीमेडिसिन परियोजना के दूसरे चरण के तहत 2019 से अब तक 22 अफ्रीकी देशों के 15,000 से अधिक युवाओं को अलग-अलग तकनीकी डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए छात्रवृत्ति दी है।

दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए रंगभेदी निषेध आंदोलन की वजह से लोग आज भी भारत को महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के पुजारी के तौर पर देखते हैं। यहाँ से भारत-अफ्रीका एकजुटता की आध्यात्मिक सोच शुरू होती है। पीएम मोदी ने उस दृष्टिकोण को व्यावहारिक और प्रभावशाली नीतियों में परिवर्तित कर इसे भारत- अफ्रीका के बीच मजबूत आधारशिला में बदल दिया है।

पाकिस्तान की ‘खराब’ दवाएँ, मानवीय संकट से जूझती आधी आबादी और निर्वासितों की मार: जानें- दवाओं को मोहताज अफगानिस्तान का मददगार कैसे बन रहा भारत

तालिबान राज में अफगानिस्तान में आम लोगों के लिए हालात लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद के बीच तालिबान सरकार द्वारा पाकिस्तानी दवाओं के आयात पर पूरी तरह रोक लगाए जाने से देश में बुनियादी दवाओं की भारी किल्लत पैदा हो गई है। लोग बहुत जरूरी दवाओं के लिए भी मारे-मारे घूम रहे हैं।

पाकिस्तान से धोखा खाए अफगानिस्तान को अब भारत का सहारा है। अफगान लोगों के लिए हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले भारत पर भरोसा जताते हुए तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री नूर जलाल जलाली मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को नई दिल्ली पहुँचे हैं।

पाक से दवाओं के आयात पर अफगानिस्तान का बैन

कुछ ही दिन पहले की बात है जब काबुल में तालिबान-शासित सरकार के उप-प्रमुख और आर्थिक मामलों के प्रभारी अब्दुल गनी बरादर ने हाल ही में घोषणा की कि पाकिस्तान से आने वाली सभी दवाओं के आयात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। बरादर ने पाकिस्तानी दवाओं की गुणवत्ता को ‘खराब’ बताते हुए अफगान में आयात करने वालों को निर्देश दिया कि वे 3 महीने के भीतर पाकिस्तानी कंपनियों के साथ अपने सभी बकाया भुगतान निपटाएँ और वैकल्पिक देशों से दवाओं की आपूर्ति की व्यवस्था करें।

हालाँकि जमीनी हकीकत यह है कि नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश अफगानिस्तान के लिए बेहद कठिन साबित हो रही है। तालिबान सरकार में प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नूरुल्लाह नूरी के अनुसार, अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70% से अधिक दवाएँ अब तक पाकिस्तान से ही आयात की जाती रही हैं। ऐसे में अचानक लगाए गए प्रतिबंध का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है जिन्हें अब साधारण दवाएँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

अफगानिस्तान के चरमराए ‘हेल्थ सिस्टम’ पर दोहरा बोझ

पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान अपनी जरूरत की दवाओं का केवल एक बेहद छोटा हिस्सा ही खुद तैयार कर पाता रहा है। देश में दवा निर्माण से जुड़ा बुनियादी ढाँचा कमजोर है, फार्मास्यूटिकल लैब्स की भारी कमी है, क्वालिटी कंट्रोल की प्रभावी व्यवस्था नहीं है और आपूर्ति श्रृंखला भी बार-बार बाधित होती रही है। ऐसी कई कमजोरियों के कारण अफगानिस्तान लंबे समय से दवाओं के आयात पर निर्भर बना हुआ है।

वर्तमान संकट से पहले भी अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब मानी जाती थी। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए। इसके बाद देश ने एक गंभीर मानवीय संकट का सामना किया, जिसे लगातार पड़ रहे सूखे, विनाशकारी बाढ़ और अर्थव्यवस्था के लगभग ठप हो जाने ने और गहरा कर दिया।

ईरान और पाकिस्तान से बीते कुछ महीनों में बड़ी संख्या में निर्वासित किए गए अफगानों के दबाव ने अफगानिस्तान की पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया है। लौटाए गए इन लोगों में सैकड़ों हजार ऐसे हैं जिन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता की जरूरत है लेकिन सीमित संसाधनों के चलते स्वास्थ्य तंत्र उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ दिख रहा है।

आँकड़ों के अनुसार, जनवरी से 13 अगस्त के बीच ईरान से लगभग 18.6 लाख अफगानों को वापस भेजा गया जबकि पाकिस्तान से 3.14 लाख से अधिक लोगों की वापसी हुई। इस तरह सिर्फ आठ महीनों के भीतर ही 20 लाख से ज्यादा अफगान नागरिक अपने देश लौटने को मजबूर हुए हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, देश की कुल 4.6 करोड़ आबादी में से करीब 2.29 करोड़ लोग यानी लगभग आधी आबादी को मानवीय सहायता की जरूरत है। 1.68 करोड़ लोगों को सहायता के लिए चिन्हित किया गया है, जिसके लिए करीब 2.42 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता बताई गई है।

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े (फोटो साभार: UN)

इस बीच अफगानिस्तान में मानवीय सहायता अभियानों को धन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे हालात और ज्यादा चिंताजनक हो गए हैं। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही बेहद कमजोर है और खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच असमान बनी हुई है। सीमित संसाधनों, इन्फ्रा की कमी और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को टूटने कगार पर ला खड़ा किया है।

अफगानिस्तान में संक्रामक बीमारियों का बार-बार फैलना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याएँ, कुपोषण और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मृत्यु और बीमारियों की दर में इजाफा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में कई बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ है। इनमें एक्यूट वॉटर डायरिया, खसरा, पोलियो, क्रीमियन-कांगो हैमरेजिक फीवर (CCHF), डेंगू, कोविड-19, काली खांसी (पर्टुसिस) और मलेरिया जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।

विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य और मानवीय सहायता के लिए तुरंत और पर्याप्त फंडिंग नहीं की गई तो अफगानिस्तान में बीमारियों, मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति और भयावह हो सकती है। कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और लगातार बढ़ती जरूरतें देश को एक लंबे और गहरे मानवीय संकट की ओर धकेल रही हैं।

अफगानिस्तान को ‘स्वस्थ’ रहने के लिए भारत से मदद की जरूरत

अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी, उद्योग-वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी के बाद स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली भारत आए हैं। यह दौरा स्वास्थ्य संकट से जूझते अफगानिस्तान को मदद के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। भारत लगातार अफगानिस्तान के स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की कोशिश में लगा है। इसी महीने की शुरुआत में भारत ने इन्फ्लुएंजा और मेनिन्जाइटिस के टीकों की 63,734 खुराकें अफगानिस्तान भेजी थीं।

इसके अलावा, बीते 28 नवंबर को भारत ने अफगानिस्तान की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक सामग्री भेजी थी। विदेश मंत्रालय ने ‘X’ पर लिखा था, “अफगानिस्तान के स्वास्थ्य सेवा प्रयासों को बढ़ावा देते हुए भारत ने तत्काल चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक पूरक सामग्री काबुल भेजी हैं। अफगान जनता के प्रति भारत का अटूट समर्थन जारी है।”

पिछले अक्टूबर में जब अमीर खान मुत्ताकी भारत आए थे तब भी भारत ने अफगानिस्तान को स्वास्थ्य सेवाओं की मदद देने का एलान किया था। भारत ने काबुल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और मरीजों के लिए एक विशेष केंद्र बनाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही एक आधुनिक जाँच केंद्र (डायग्नोस्टिक सेंटर) बनाने, काबुल के इंदिरा गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में पुराने हीटिंग सिस्टम को बदले जाने की घोषणा की गई थी।

इसके अलावा भारत काबुल के बगरामी इलाके में 30 बेड का एक नया अस्पताल, कैंसर के इलाज के लिए एक ऑन्कोलॉजी सेंटर और गंभीर दुर्घटनाओं के इलाज के लिए एक ट्रॉमा सेंटर भी बनवा रहा है। साथ ही, देश के अलग-अलग इलाकों में माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए पक्तिका, खोस्त और पक्तिया प्रांतों में 5 मैटरनिटी हेल्थ क्लीनिक बनाए जाने की घोषणा भी की है। इस दौरे के समय भारत ने अफगानिस्तान को 20 एंबुलेंस भी भेंट की हैं ताकि मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाया जा सके।

ऐसे समय में जब कई देश अफगानिस्तान को केवल राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि अफगान लोगों की पीड़ा है और इस मुश्किल घड़ी में भारत अफगानिस्तान के साथ खड़ा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को व्यवहार में उतारकर सीमाओं, मतभेदों और वैश्विक राजनीति से ऊपर उठकर भारत अपने सदियों पुराने दोस्त के साथ मजबूती से खड़ा है।

सपा के लिए आतंकी थे ‘मासूम मुस्लिम’, CM योगी बने निर्दोष हिंदुओं का सुरक्षा कवच: कहानी ‘न्याय का शासन’ की

सत्ता का इस्तेमाल कैसे होगा, ये पूरी तरह उस इंसान की सोच पर निर्भर करता है जो कुर्सी पर बैठा है। कानून वही रहता है, सिस्टम वही रहता है लेकिन फैसले बदल जाते हैं। उत्तर प्रदेश में यही फर्क साफ दिखाई देता है। जब MY समीकरण वाली राजनीति हावी होती है तब फैसले तुष्टिकरण की तरफ झुकते हैं। जब वही कुर्सी भगवा पहनने वाले मुख्यमंत्री के हाथ में होती है तो जोर कानून-व्यवस्था और न्याय पर दिखाई देता है।

अब इसे सीधे-सीधे एक उदाहरण से समझिए। साल 2015 में दादरी में अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या हो गई। उस वक्त यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी। क्या हुआ? करीब दो दर्जन हिंदू युवकों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। केस चलता रहा, सालों निकल गए लेकिन आज तक ये साफ नहीं हो पाया कि अखलाक को मारा किसने। बाद में ये भी सामने आया कि उसके घर में गौमांस पकाया गया था। इसके बावजूद जिन युवकों को पकड़ा गया, वे लगातार अदालतों के चक्कर काटते रहे। अब जाकर योगी सरकार ने उसी मामले में 18 हिंदू युवकों पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी है।

अब जरा 2012 की तरफ चलते हैं। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने और समाजवादी पार्टी की असली सोच सामने आने लगी। पार्टी 2012 के चुनावी घोषणा-पत्र में कह चुकी थी कि आतंकवाद के मामलों में पकड़े गए ‘कथित मासूम मुस्लिम युवकों’ को छोड़ा जाएगा। बात सिर्फ छोड़ने तक ही नहीं थी, ऐसे लोगों को मुआवजा देने तक की बात सपा की सरकार ने की। हुआ भी यही, सरकार बनते ही अप्रैल 2012 में 19 मुस्लिम आरोपितों को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

ये कोई छोटे-मोटे टटपुँजिये आतंकी नहीं थे, इनमें वलीउल्लाह जैसे दरिंदे शामिल थे। वही वलीउल्लाह जिसने 2006 में वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में बम धमाका किया था। उस हमले में 7 लोग मारे गए थे और बाकी धमाकों को जोड़ दें तो कुल 18 लोगों की जान गई थी। जाँच एजेंसियों ने बताया कि वह बांग्लादेश के आतंकी संगठन हूजी से जुड़ा था और ट्रेनिंग लेकर भारत आया था। बाद में अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई। लेकिन उससे पहले समाजवादी सरकार उसे भी ‘मासूम’ मानकर छोड़ने की तैयारी में थी।

यही कहानी गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट के आरोपी तारिक कासमी की थी। उसे भी मासूम बताकर रिहा करने की कोशिश हुई। वह जेल में ही मर गया जबकि कोर्ट ने उसे दोषी माना था। फिर नाम आया सितारा बेगम का जिसने पाकिस्तानी जासूस वकास अहमद को छिपने की जगह दी थी। उसे भी छोड़ने की बात चल रही थी। ऊपर से पार्टी नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से तुष्टिकरण के लिए बयान दिए जा रहे थे। कहा जा रहा था कि ‘मुसलमान बेटियाँ ही हमारी बेटियाँ हैं’। ऐसे में सवाल उठना लाजमी था कि सरकार की प्राथमिकता आखिर है क्या? सत्ता, कानून, न्याय या बस तुष्टिकरण।

हालात ऐसे हो गए कि अदालतों तक को अखिलेश सरकार को फटकार लगानी पड़ी। 2012 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ये तय करना सरकार का काम नहीं है कि कौन आतंकी है और कौन मासूम। अदालत ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि आज इन्हें छोड़ रहे हो, कल इन्हें पद्म भूषण भी दे दोगे। इसके बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा।

अब दूसरी तरफ देखिए दादरी केस में फँसे हिंदू युवकों की हालत। किसी ने घर बेच दिया, किसी ने जमीन। परिवार के परिवार टूट गए। इसी केस में रवि नाम का एक युवक जेल में ही मारा गया। उसकी जमीन बिक गई, परिवार सड़क पर आ गया और पत्नी विधवा हो गई। रवि की माँ ने ऑपइंडिया को बताया कि उसके बेटे को जेल में भयानक यातनाएँ दी गईं। यहाँ तक आरोप लगा कि ये सब माफिया आजम खान के कहने पर हुआ। यानी एक तरफ आतंकी वलीउल्लाह को छोड़ने की कोशिश और दूसरी तरफ रवि की जान की कोई कीमत नहीं थी।

अब योगी सरकार ने इस मामले में कदम उठाया है। दस साल पुराने केस में 18 हिंदुओं पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी गई है। 18 दिसंबर को सुनवाई है। अगर अदालत ने अर्जी मान ली, तो ये 18 युवक सालों बाद सामान्य जिंदगी जी पाएँगे। उनके सिर से केस का बोझ हटेगा। फर्क साफ है कि योगी सरकार ने संवैधानिक तरीके से कोर्ट का रास्ता चुनकर हिंदुओं को न्याय दिलाने पर जोर दिया है जबकि अखिलेश यादव के दौर में सत्ता की प्राथमिकता आतंकवाद के मामलों में आरोपियों को ‘मासूम’ बताकर बचाने की दिखाई देती थी।

योगी आदित्यनाथ ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता का मतलब तुष्टिकरण नहीं बल्कि जिम्मेदारी होता है। दशकों तक जिस प्रदेश में सरकारें वोट बैंक के दबाव में फैसले लेती रहीं, वहाँ योगी ने सत्ता की दिशा ही बदल दी। उनके शासन में प्राथमिकता किसी खास वर्ग को खुश करने की नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और न्याय को केंद्र में रखने की दिखाई देती है।

योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने सत्ता को अपराधियों और दबाव समूहों की ढाल बनने से रोका। पहले जहाँ सरकारें संवेदनशील मामलों में कदम उठाने से बचती थीं, वहीं योगी ने बिना झिझक साफ संदेश दिया कि कानून सबके लिए बराबर है। चाहे राजनीतिक दबाव हो या वोट की चिंता, योगी सरकार ने यह दिखाया कि राज्य चलाने के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ सीधी रखनी पड़ती है। ‘माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’ जैसे संदेश उनकी न्याय के प्रति स्पष्ट सोच को दिखाते हैं।

आज योगी आदित्यनाथ का शासन इस बात का उदाहरण बन चुका है कि मजबूत इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीयत हो तो सत्ता का इस्तेमाल सही दिशा में किया जा सकता है। यूपी में बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं है, यह मानसिकता का बदलाव है। जहाँ तुष्टिकरण की जगह न्याय और डर की जगह भरोसा लेने लगा है।

सेवेंथ डे स्कूल में हिंदू स्टूडेंट की हत्या से मिशनरी स्कूल पर सरकार के कंट्रोल तक, ऑपइंडिया ने निभाई अहम भूमिका: पढ़ें- अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल विवाद की पूरी कहानी

अहमदाबाद के खोखरा मणिनगर में स्थित सेवंथ डे एडवेंटिस्ट स्कूल पिछले कुछ महीनों से विवादों में रहा है। यह स्कूल अमेरिका स्थित सेवंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च के ग्लोबल शैक्षिक नेटवर्क का हिस्सा है, लेकिन प्रबंधन स्थानीय ट्रस्ट और संस्थाओं के जिम्मे था। अगस्त 2025 में स्कूल तब सुर्खियों में आया, जब एक मुस्लिम नाबालिग ने एक हिंदू छात्र की हत्या कर दी। इस घटना ने स्कूल प्रशासन की लापरवाही, धर्मांतरण और पुराने विवादों एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

इस पूरे मामले की जाँच के लिए समिति बनाई गई, जिसने अपनी रिपोर्ट DEO को सौंपी। इसके बाद सोमवार (15 दिसंबर 2025) को गुजरात सरकार ने स्कूल का प्नशासन अपने हाथों में ले लिया। अब ये स्कूल सरकार द्वारा संचालित होगा और DEO इसके प्रबंधन के लिए सरकार के प्रतिनिधि के रूप में जिम्मेदार होंगे। इसके साथ कई शर्तें और नियम भी लागू होंगे।

हिंदू छात्र की हत्या से स्कूल विवादों में घिरा

अहमदाबाद के इस स्कूल की क्षेत्र में अच्छी खासी पहचान थी, लेकिन 19 अगस्त 2025 को एक हिंदू छात्र की हत्या के बाद यह राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया। घटना के अनुसार, कक्षा 8 का एक मुस्लिम नाबालिग छात्र कक्षा 10 के हिंदू छात्र पर हमला कर दिया।

इस हमले में थर्मोकोल कटर या किसी धारदार हथियार का इस्तेमाल हुआ। बताया गया कि हमला शुरू में एक मामूली विवाद के कारण हुआ, लेकिन इसमें पहले से चल रही साजिश के भी संकेत मिले।

घटना के बाद, खून से लथपथ घायल छात्र को स्कूल या स्टाफ द्वारा तुरंत अस्पताल नहीं ले जाया गया। बाद में परिवार और दोस्तों ने उसे रिक्शा में बैठाकर अस्पताल पहुँचाया, लेकिन 20 अगस्त को उसकी मौत हो गई।

इस मामले में स्कूल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगे। स्कूल प्रशासन ने तुरंत एम्बुलेंस नहीं बुलवाई और बच्चे को अस्पताल नहीं ले गए। साथ ही, आरोप है कि उन्होंने खून के धब्बे मिटाकर सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की।

आरोपित के इंस्टाग्राम चैट वायरल

घटना के तुरंत बाद, नाबालिग मुस्लिम आरोपित छात्र की इंस्टाग्राम चैट वायरल हो गई। इसमें उसने हत्या कबूल की और न तो कोई पछतावा दिखाया और न ही मौत का डर जताया। चैट में वह कह रहा था, ‘हाँ…तो…’ और ‘अब रुक जाओ…जो हो गया सो हो गया।’ उसके दोस्त ने उसे चैट डिलीट करने की सलाह दी।

पुलिस ने आरोपित को किशोर न्याय अधिनियम के तहत हिरासत में लिया और उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी। यह भी सामने आया कि वह कुख्यात अपराधी पाब्लो एस्कोबार को अपना आदर्श मानता है।

ऑपइंडिया ने मौके पर जाकर घटना की पूरी कवरेज की। मृतक के दादा और सहपाठियों ने बताया कि इससे पहले भी इसी सेवंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों द्वारा बदमाशी, धमकियाँ और भेड़-बकरियों को मांस खिलाने जैसी घटनाएँ हो चुकी थीं, लेकिन स्कूल ने शिकायतों को नजरअंदाज किया और कोई कार्रवाई नहीं की।

व्यापक विरोध प्रदर्शन और प्रारंभिक जाँच

घटना के बाद अभिभावक, सिंधी समुदाय और हिंदू संगठनों ने स्कूल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान तोड़फोड़ और कर्मचारियों पर हमलों की खबरें भी आईं। 23 अगस्त को जन आक्रोश वाली मंडल संघर्ष समिति ने स्कूल के सामने मृतक छात्र को श्रद्धांजलि दी, जिसमें विश्व हिंदू परिषद के हजारों नेता शामिल हुए।

समिति ने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया और अन्य पीड़ितों से शिकायत दर्ज कराने की अपील की। हिंदू संगठनों की माँग पर अहमदाबाद के कई इलाकों में इस घटना के विरोध में बंद भी रखा गया।

इस घटना के बाद स्कूल बंद कर दिया गया और छात्रों ने ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू कीं। अभिभावकों ने स्कूल के विदेशी चर्च से संबंध और धर्मांतरण के आरोपों पर सवाल उठाए। जन आक्रोश वाली मंडल संघर्ष समिति ने स्कूल की मान्यता और पट्टा रद्द करने की माँग करते हुए DEO, महापौर और AMC को याचिका दी। इसी दौरान लगभग 160 छात्रों के अभिभावकों ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट की माँग की।

जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) रोहित चौधरी ने स्कूल के प्रधानाचार्य जी इमैनुअल, प्रशासक मयूरिका पटेल और अन्य कर्मचारियों को गंभीर लापरवाही का दोषी मानते हुए बर्खास्त कर दिया।

DEO ने स्कूल को कई नोटिस जारी किए और भवन उपयोग की अनुमति, अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण पत्र और ट्रस्ट स्पष्टीकरण सहित जरूरी दस्तावेज माँगे। इसके अलावा, RTE के तहत एक जाँच समिति का गठन किया गया और उसे स्कूल की पूरी जाँच का जिम्मा सौंपा गया।

जाँच और कार्यवाही

जाँच अधिकारी ने स्कूल को कई नोटिस जारी किए और प्रिंसिपल जी इमैनुअल और प्रशासनिक प्रमुख मयूरिका पटेल समेत अन्य स्टाफ को निलंबित कर दिया। इसका कारण था कि उन्होंने घायल छात्र को लंबे समय तक बिना मदद के रहने दिया और जाँच में बाधा डाली। स्कूल ने जाँच अधिकारी के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने स्कूल को फटकार लगाई और जाँच में सहयोग करने का आदेश दिया।

RTE अधिनियम के तहत गठित जाँच समिति ने अक्टूबर 2025 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें स्कूल की गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल गलत तरीके से चल रहा था।

कक्षाओं की संख्या बढ़ाने की अनुमति नहीं थी, ट्रस्ट में अस्पष्टता थी (ऐशलॉक ट्रस्ट, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट एजुकेशनल इंस्टीट्यूट और इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन के बीच विसंगति), प्राथमिक अनुभाग के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण पत्र नहीं था और भवन उपयोग की अनुमति अधूरी थी। स्कूल दो शिफ्टों में चल रहा था, जबकि इसकी अनुमति नहीं थी।

इसके अलावा, AMC ने 2003 में स्कूल की जमीन 99 सालों के लिए पट्टे पर दी थी, लेकिन स्कूल का संचालन अलग संस्था द्वारा होने के कारण पट्टे की शर्तें उल्लंघन में थीं। इसी वजह से AMC ने पट्टा रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की और स्कूल को नोटिस जारी किया।

विदेशी संबंध और अतीत के विवाद

ओपइंडिया की जाँच से स्कूल के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सामने आई हैं। सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट हायर सेकेंडरी स्कूल अमेरिका के मैरीलैंड स्थित सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट चर्च द्वारा चलाया जाता है, जो विश्व स्तर पर 7,800 से अधिक स्कूल चलाता है और इसके मूल्य ईसाई धर्म पर आधारित हैं।

अहमदाबाद में स्कूल की शुरुआत 1979 में हुई थी और 2003 में इसे वर्तमान परिसर में स्थानांतरित किया गया। यह CISCE और गुजरात बोर्ड से संबद्ध है। स्कूल का नेतृत्व प्रिंसिपल जी इमैनुअल जैसे ईसाई व्यक्तित्व करते हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर इसका प्रबंधन एशलॉक ट्रस्ट, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस और इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन जैसी संस्थाओं द्वारा होता है, जिनमें कई अनियमितताएँ पाई गई हैं।

स्कूल पर धर्मांतरण के गंभीर आरोप भी लगे थे। अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने बताया कि नैतिक विज्ञान की कक्षाओं में ईसाई धर्म का प्रचार किया जाता था और छात्रों को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। आरोप यह भी था कि अभिभावकों से 2 लाख रुपए लेकर छात्रों को बिना परीक्षा पास किया जा रहा था। यह भी दावा किया गया कि स्कूल की जमीन पहले एक मंदिर की थी।

यह स्कूल पहले भी कई विवादों में रह चुका है। 2016 में, कक्षा 4 के एक छात्र को शिक्षक मूसा अदला ने बुरी तरह पीटा, जिससे बच्चा घायल हो गया और खून बहने लगा। इसके बाद शिक्षक को निलंबित कर दिया गया। 2024 में स्कूल ने DEO से अनुमति लिए बिना छात्रों को वाटर पार्क ले जाकर नियमों का उल्लंघन किया। हाल ही में आरोप लगे थे कि मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों को पनीर बताकर मटन खिलाया, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

स्कूल को सरकार ने अपने नियंत्रण में लिया

अभिभावकों और स्थानीय लोगों की लगातार माँग थी कि स्कूल की विवादास्पद गतिविधियों के कारण सरकार इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले। इन सभी जाँचों और अनियमितताओं को ध्यान में रखते हुए, गुजरात सरकार ने 15 दिसंबर 2025 को स्कूल का मैनेजमेंट अपने हाथ में ले लिया।

अहमदाबाद के DEO को स्कूल का प्रशासक बनाया गया है। नए प्रवेश पर रोक लगा दी गई है, लेकिन 10,000 से अधिक छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्कूल को चलाया जा रहा है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)







संथाल परगना में अब नहीं बसने देंगे ‘जमाई टोला’, डुगडुगी बजाकर जमीन नहीं बेचने का संकल्प ले रहे ST: जानिए बांग्लादेशी घुसपैठ से कैसे बदली डेमोग्राफी

झारखंड का संथाल परगना में जनजातीय समाज अपनी पहचान के लिए जागरूक हो गए हैं। सालों से दबे-दबे स्वर में कही जाने वाली बात अब खुले तौर पर सड़कों, गाँवों और बैठकों में गूँजने लगी है। संथाल परगना के जनजातीय समाज ने साफ शब्दों में यह ऐलान कर दिया है कि वे गैर समाज को अब न तो वे अपनी जमीन देंगे और न ही अपनी बेटियाँ सौंपेगे। जनजातीय समाज का यह संकल्प जमीन से उपजा हुआ जनआंदोलन है, जो साहिबगंज, पाकुड़, राजमहल, गोड्डा, दुमका और आसपास के इलाकों में तेजी से फैल रहा है।

जनजातीय समाज की जागरूकता

साहिबगंज इस पूरे अभियान का केंद्र बनकर उभरा है। ‘एभेन अखाड़ा जागवार बैसी’ संगठन के मुकेश सोरेन की अगुवाई में सकरीगली, छोटी भगियामारी, संताली टोला, मुस्लिम टोला, बिंद टोला महलदार टोला सहित अन्य गाँवों में ढोल-नगाड़े और डुगडुगी बजाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। बैठकों में बुजुर्ग, युवा और महिलाएँ खुलकर अपनी बात रख रहे हैं।

समस्या है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए सालों से उनके इलाकों में बसते जा रहे हैं। इसीलिए कई लोगों ने गैर जनजातीय समाज के हाथ अपनी जमीन नहीं बेचने की बात कही। कई
जनजातीय समाज के लोगों ने तालझारी थाने में आवेदन देकर इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। ग्रामीण उपायुक्त से मिलने की भी तैयारी कर रहे हैं।

जनजातीय समाज का बेटियों को नहीं सौंपने का संकल्प

बांग्लादेशी घुसपैठिए जनजातीय समाज की बेटियों को भी निशाना बनाकर जमीन हड़पने की साजिश रचते हैं। कई मामलों में जनजातीय बेटियों से शादी कर जमीन हड़पी गई और उन्हें मुस्लिम बना दिया गया। इसके विरोध में जनजातीय समाज ने फैसला लिया कि अब गैर समाज में बेटियों को नहीं सौंपा जाएगा यानी अब दूसरे समाज में बेटियों की शादी नहीं होने देंगे।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में जनजातीय समाज का अभियान

आइए जानते हैं कि आखिर जनजातीय समाज को गैर समाज के खिलाफ यह अभियान चलाने की जरूरत क्यों पढ़ी। ग्रामीणों का कहना है कि बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से भारत में घुसकर उनके इलाके में बसते जा रहे हैं। पहले यह प्रक्रिया धीमी थी, लेकिन अब यह इतनी तेज हो चुकी है कि कई गाँवों में जनजातीय अपने ही क्षेत्र में हाशिए पर पहुँचते दिखाई दे रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि ये बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी के सहारे ने सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, बल्कि जनजातीय जमीनों पर कब्जा भी किया हुआ है। मोतीहारना में मुस्लिमों ने जनजातीय की जमीन पर पूरी बस्ती बसा ली है।

डेमोग्राफी ही नहीं खेती भी छिनी, जनजातीयों को गुस्सा

जनजातीय समाज का गुस्सा इसलिए भी फूटा क्योंकि जमीन उनके लिए केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान उनकी संस्कृति और उनकी जीवन पद्धति का आधार है। संथाल परगना में CNT और SPT जैसे कानूनों का उद्देश्य ही यही था कि जनजातीय जमीन किसी गैर-जनजातीय के हाथ में न जाए।

इसके बावजूद जमीनों के ट्रांसफर हुए, नाम बदले गए और धीरे-धीरे पूरे गाँवों का सामाजिक स्वरूप बदलने लगा। जनजातीय समाज अब इसे केवल जमीन हड़पने का मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित डेमोग्राफिक बदलाव के रूप में देख रहा है।

स्थिति की गंभीरता तब और स्पष्ट होती है जब अफीम की खेती जैसे मामलों का खुलासा सामने आता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, संथाल परगना के तमाम इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अफीम की खेती की हुई हैं, जिसकी तस्करी भी होती है।

झारखंड हाई कोर्ट का रुख

इन तमात तथ्यों को देखते हुए साल 2024 में झारखंड हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। अदालत ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दे चुकी है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए और रिपोर्ट पेश की जाए। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद साहिबगंज के डिप्टी कलेक्टर ने जाँच समिति का गठन भी किया।

प्रशासनिक स्तर पर यह कदम महत्वपूर्ण माना गया, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जाँच समितियाँ और आदेश तभी प्रभावी होंगे, जब जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखाई देगी। यह मामला अब तक कोर्ट में लंबित है। यही कारण है कि जनजातीय समाज ने तय किया कि अगर प्रशासन नहीं जाएगा, तो उन्हें खुद खड़ा होना पड़ेगा।

विजय दिवस विशेष: जिनको पाकिस्तानी अत्याचार से मुक्ति दिलाकर भारत ने बनाया बांग्लादेश, वे अब जमात-ए-इस्लामी की कट्टरता के काले साये में

भारत के लिए 16 दिसंबर 2025 का दिन गर्व का दिन होता है। इसी दिन 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर बांग्लादेश को आजादी दिलाई। लाखों भारतीय सैनिकों की बहादुरी और मुक्ति बहिनी के साथ मिलकर 13 दिन की जंग में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का समर्पण कराया। ढाका में जनरल नियाजी ने भारतीय कमांडर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले। यह जीत सिर्फ युद्ध की नहीं, मानवता की थी, जिसमें पाकिस्तानी फौज के अत्याचारों से बंगाली लोगों को मुक्ति मिली।

लेकिन 54 साल बाद अब बांग्लादेश फिर उन कट्टरपंथी ताकतों के चंगुल में फँसता दिख रहा है, जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात-ए-इस्लामी.. जो तब बांग्लादेश के जन्म का विरोध कर रही थी, आज फिर सिर उठा चुकी है। भारत ने जिस देश को आजाद कराया, वहाँ हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले, मंदिर तोड़े जाना और इस्लामी चरमपंथ की वापसी को देखना बेहद दर्दनाक है।

…भारत ने दिलाई थी बंगभाषियों को आजादी

1971 की जंग की जड़ें गहरी थीं। पाकिस्तान में पश्चिमी हिस्से का पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पर दबदबा था। बंगाली भाषा, संस्कृति को दबाया जा रहा था। 1970 के चुनाव में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने भारी जीत हासिल की, लेकिन पाकिस्तान ने सत्ता नहीं सौंपी। 25 मार्च 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू हुआ- पाक फौज ने बंगालियों पर कहर बरपाया। लाखों मारे गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए, करोड़ों शरणार्थी भारत आए।

भारत ने मुक्ति बहिनी को ट्रेनिंग दी, हथियार दिए। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो भारत ने पूरी ताकत से जवाब दिया। नौसेना, वायुसेना और थलसेना ने मिलकर पाक को हराया। 16 दिसंबर को दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े सैन्य समर्पण को अंजाम दिया।

बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में जमात की भूमिका पाकिस्तान परस्त

इस जंग में जमात-ए-इस्लामी की भूमिका काली थी। 1941 में मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित यह संगठन पाकिस्तान का समर्थक था। पूर्वी पाकिस्तान में गुलाम आजम के नेतृत्व में जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया। उन्होंने ‘पीस कमिटी’ बनाई, रजाकार, अल-बदर जैसे मिलिशिया गठित किए, जो पाक फौज के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों, हिंदुओं और बुद्धिजीवियों पर अत्याचार करते थे।

हत्याओं-बलात्कार-लूट में जमात के लोग इसमें शामिल थे। आजादी के बाद जमात बैन हो गई, गुलाम आजम पाकिस्तान भाग गए। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सैन्य शासन में जमात फिर सक्रिय हुई। जिया-उर-रहमान ने उन्हें वापस बुलाया।

शेख हसीना की सरकार ने जमात की सख्ती, बदले में सत्ता से बेदखल

शेख हसीना की सरकार (2009-2024) ने जमात पर सख्ती की। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल बनाया, जहाँ जमात के कई नेताओं को 1971 के अपराधों के लिए सजा हुई। मोतिउर रहमान निजामी को 2016 में फाँसी दी गई। अब्दुल कादिर मुल्ला, दिलावर हुसैन सईदी जैसे नेताओं को मौत की सजा मिली। जमात की रजिस्ट्रेशन 2013 में कैंसल कर दिया गया, क्योंकि जमात का चार्टर धर्म को लोकतंत्र से ऊपर रखता था। 2024 में हसीना ने जमात और उसकी स्टूडेंट विंग छात्र शिबिर को आतंकवादी घोषित कर बैन लगा दिया गया।

हसीना को सत्ता से बेदखल करने में आगे रहे जमात से जुड़े संगठन

लेकिन 2024 जुलाई-अगस्त में स्टूडेंट प्रोटेस्ट से हसीना की सरकार गिरा दी गई। इसमें छात्र शिबिर से जुड़े कथित छात्रों ने जमकर हिंसा की। हसीना की पार्टी के लोगों को निशाना बनाया, हिंदुओं पर अत्याचार किए और पूरे बांग्लादेश को सुलगा दिया।

शेख हसीना भारत भाग गईं। बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी और अगस्त 2024 में ही छात्र शिबिर और जमात पर से बैन हटा दिया गया। यही नहीं, जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जमात का रजिस्ट्रेशन भी बहाल कर दिया और इसी के साथ वो माहौल तैयार हो गया है, जब अगले चुनावों में जमात के लोग सत्ता में भी जाएँ।

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से असली रंग दिखा रहे जमात के लोग

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में अराजकता है। 2024 अगस्त से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। बांग्लादेश में मंदिर तोड़े गए, घर जलाए गए, हिंदू परिवारों पर अत्याचार हो रहे हैं। सड़कों पर जमात के झंडे लहराते दिख रहे हैं, तो हिंसा में छात्र शिबिर के लोग शामिल पाए जा रहे हैं, इसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। उल्टे मोहम्मद यूनुस जैसा कट्टरपंथी इन हमलों का बचाव कर रहा है और कह रहा है कि ये हिंसा और हमले राजनीतिक हैं, सांप्रदायिक नहीं। इनके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है।

इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुका है बांग्लादेश

जमात की वापसी से बांग्लादेश की राजनीति इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुकी है। शेख हसीना ने जिस बांग्लादेश को सेकुलर बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा दी, उस पूरे ढाँचे को ही ढहा दिया गया है। शेख हसीना की पार्टी तक को बैन कर दिया गया है, ताकि जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतें सत्ता हासिल कर सकें और उदारवादी लोगों को खत्म कर सके।

हालाँकि अब जमात खुद को मॉडरेट बताती है, 1971 के लिए माफी माँगने की बात करती है, लेकिन उसकी बातें अस्पष्ट ही रही हैं। 54 साल बाद विजय दिवस पर सवाल उठता है-भारत ने जो आजादी दिलाई, क्या वह सुरक्षित है? कट्टरता की वापसी से अल्पसंख्यक डरे हुए हैं। जमात की रैलियाँ हो रही हैं।

बांग्लादेश निर्माण का एक चक्र हुआ पूरा

बांग्लादेश के हालात को देखते हुए साफ दिखने लगा है कि बांग्लादेश के इतिहास, वर्तमान और भविष्य का एक चक्र पूरा हो चला है। साल 1947 में जिस इस्लाम के लिए बांग्लादेश यानी पूर्वी पाकिस्तान का गठन हुआ था, वहाँ बीच के समय में बांग्ला पहचान से जोर जरूर पकड़ा था, लेकिन फिर से बांग्लादेश उसी इस्लामी कट्टरता की तरफ बढ़ गया है, जिसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर भारत से अलग हुआ था।

भले ही 1971 के बंग मुक्ति के बलिदानियों का सपना धर्मनिरपेक्ष, समावेशी बांग्लादेश था। लेकिन आज कट्टरपंथ सिर उठा रहा है। ये न सिर्फ बंग भाषियों के लिए भविष्य में चुनौतियाँ खड़ा करेगा, बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा जैसे खतरे खड़े करेगा। ऐसे में जरूरत है कि भारत सतर्क रहे। यही नहीं, भारत को उन इस्लामी कट्टरपंथियों के फन भी तुरंत कुचलने के लिए तैयार रहना चाहिए, जो वो सपने में भी भारत पर बुरे नजर डालने का ख्याल न ला पाएँ।

क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराने वाला था मिशनरी गिरोह, मिर्जापुर में 8 महिला-पादरी समेत 11 गिरफ्तार: पढ़ें- कैसे फेल हुआ 2000+ को ईसाई बनाने का खेल

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के देहात इलाके में दो साल से चल रहा एक सीक्रेट गेम का खुलासा हो गया। यहाँ के खरहरा गाँव के छोटे से चर्च में हिंदू परिवारों को ईसाई बनाने का काम चल रहा था। लेकिन स्थानीय युवक की समझदारी के चलते मिशनरी गैंग का पर्दाफाश हो गया।

मिर्जापुर में रविवार (14 दिसंबर 2025) को हुई पुलिस छापेमारी में चर्च के पादरी भोलानाथ पटेल समेत 11 लोग गिरफ्तार हुए हैं। ऑपइंडिया के पास इस पूरे मामले की FIR की कॉपी मौजूद है। जिसमें इस गंदे खेल के बारे में विस्तार से जानकारी दर्ज है।

सूत्रों के मुताबिक, 25 दिसंबर को क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की साजिश रची जा रही थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह सब कैसे शुरू हुआ? दो सालों में सैकड़ों परिवार क्यों फँसते चले गए? इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिशनरी गिरोह के कारनामों को उजागर किया गया है।

किसान की सतर्कता से खुला धर्मांतरण का गंदा खेल

मिर्जापुर के इस इलाके में गंगा की लहरें विंध्याचल की पहाड़ियों से टकराती हैं। इलाके में गरीबी और बेरोजगारी फैली है। छोटे-छोटे गांवों में किसान, मजदूर और दिहाड़ी मजूर दिन-रात गुजारते हैं। यहीं के कुरकुठिया गाँव के रहने वाले आनंद दुबे (35 वर्ष) एक साधारण किसान हैं। उनके दो बच्चे हैं और पत्नी लंबे समय से बीमार है, जिसकी वजह से घर का खर्चा मुश्किल से चलता है।

आनंद ने मिशनरियों के खेल को बताते हुए कहा, “साहब, एक हफ्ते पहले एक आदमी आया था। नाम था भोलानाथ पटेल, खुद को पादरी बताता था। बोला, ‘भाई, तुम्हारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ। पैसे देंगे, बच्चों की फ्री पढ़ाई कराएँगे, बीवी का इलाज मुफ्त में होगा। शादी-ब्याह में भी मदद करेंगे।’ मैंने सोचा, गरीब आदमी हूँ, क्या बिगड़ जाएगा। लेकिन जब रविवार को चर्च बुलाया, तो वहाँ का नजारा देखकर रोंगटे खड़े हो गए।”

2023 से जारी है खरहरा चर्च में धर्मांतरण का खेल

आनंद की यह कहानी कोई पहली नहीं है। दो साल पहले साल 2023 के आखिर से खरहरा चर्च में अनगिनत लोगों का धर्मांतरण कराया जा चुका है। बहुत सारे लोग लल्लू से जोसेफ जैसे नाम वाले हो चुके हैं। दिखने में खरहरा गाँव का चर्च पुराना लगता है, लेकिन अंदर से काफी सजा-धजा है। यहाँ आसपास के गाँवों कुरकुठिया, बढ़ौली, लेढ़ू, जसोहर पहाड़ी से लोग आते रहते हैं। किसी की तबियत ठीक नहीं रहती, तो कोई आर्थिक रूप से टूटा हुआ है और इन सबका फायदा उठाते हैं धर्मांतरण गिरोह, जो लोगों को छल-कपट से ईसाई बनाते हैं।

एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया से कहा, “बहू की तबीयत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा-ऑपरेशन के 50 हजार लगेंगे। पादरी साहब आए, बोले ‘चिंता मत करो, जीसस सब ठीक कर देंगे। बस, प्रार्थना में शामिल हो जाओ।’ हम गए, पानी छिड़क दिया, नाम बदल दिया। पैसा मिला भी लेकिन अब लगता है धोखा हुआ है।” उन्होंने कहा कि बेटे ने बताया कि वो घर वापसी भी नहीं कर सकते, क्योंकि पादरी और उनके लोगों ने ईसाई बनाते समय उनका वीडियो-फोटो लिया हुआ है।

पादरी भोलानाथ पटेल संभालता है धर्मांतरण का खेल

मिर्जापुर के इस छोटे से गाँव में धर्मांतरण का पूरा खेल संभालता है पादरी भोलानाथ पटेल। खुद मूल रूप से गाजीपुर जिले के रेवतीपुर थाना इलाके में आने वाले तिवला गाँव का है। वो रहता भी पहले लखनऊ में था, जहाँ वो सेंट जीसस स्कूल में पढ़ाता था। टीचर थे।

पुलिस ने जब भोलानाथ पटेल और उसकी पत्नी को गिरफ्तार किया, तो उसने खुद के ईसाई बनने की कहानी बताई। भोलानाथ ने बताया, “साल 2008 में मुझे किडनी की गंभीर बीमारी हुई थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन ईसाई प्रार्थना सभा में शामिल होने के बाद वे ‘चमत्कारिक’ तरीके से ठीक हो गए।”

ईसाई धर्मांचरण रैकेट का भंडाफोड़
ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ (फोटो साभार: AI GROK)

भोलानाथ (पुलिस पूछताछ के दौरान) ने बताया, “मैंने जीसस का शुक्रिया अदा किया। उसी ने मुझे नई जिंदगी दी। तब से मैंने फैसला किया, दूसरों को भी यह रास्ता दिखाऊँगा।” इसके बाद भोलानाथ को लखनऊ के मिशनरी कार्यालय से खरहरा चर्च भेजा गया। यहाँ वो अपनी पत्नी माया पटेल के साथ रहने लगा। बीवी माया महिलाओं को धर्मांतरण के जाल में फँसाती, तो खुद भोला पुरुषों को।

सामाजिक बहिष्कार के शिकार हो चुके हैं ईसाई बने लोग

भोलानाथ के मुताबिक, “हम कोई जबरदस्ती नहीं करते। लोग खुद आते हैं। जीसस की कृपा से उनकी जिंदगी बदल जाती है।” लेकिन ग्रामीणों का कहना अलग है। विजय (नाम-परिवर्तित) ने कहा, “मैंने पहले धर्मांतरण किया था। शुरु में ये अच्छा लगता था। पैसे भी मिले, नौकरी भी लगी। लेकिन अब लगता है, हमारी पहचान ही छीन ली गई। गाँव वाले ताने मारते हैं।”

रविवार को हुआ धर्मांतरण गैंग का भंडाफोड़

14 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब 12:45 बजे आनंद दुबे को चर्च बुलाया गया। वहाँ 35-40 ग्रामीण थे, ज्यादातर आर्थिक रूप से कमजोर। पादरी भोलानाथ ने कहा, “आज तुम जीसस भगवान के आश्रय में आओगे। सारी तकलीफें खत्म हो जाएँगी। जो ना मानेगा, उसके साथ बुरा होगा।”

पादरी ने आनंद पर पवित्र पानी छिड़का, नाम बदलकर ‘जोसेफ आनंद’ कर दिया। फिर ‘पवित्र डुबकी’ की रस्म शुरू की, लेकिन आनंद हल्ला मचाकर भाग निकले। सीधे थाने पहुँचे और तहरीर दी।

शिकायत पाने के बाद सक्रिय हुई पुलिस ने तुरंत छापेमारी की और भोलानाथ, माया, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, फूलपत्ती, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी और साधना समेत को 11 को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को मौके से चार बाइबल, 10 कॉपी-किताबें, तीन स्मार्टफोन और एक की-पैड फोन मिले। लोगों के वीडियो और फोटो थे, जो धर्मांतरण की रस्मों के थे। इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश धार्मिक विधि (संशोधन) अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।

ऑपइंडिया के पास उपलब्ध एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, तहरीर में आनंद दुबे ने लिखा,”मेरी पत्नी को पुरानी बीमारी है। एक सप्ताह पूर्व आरोपी भोलानाथ पटेल उर्फ पादरी जीसस चर्च खरहरा आकर मेरे घर पर आया और बोला कि यदि आप ईसाई धर्म अपना लेंगे तो आर्थिक लाभ, बच्चों की फ्री शिक्षा, मेडिकल सुविधा आदि प्रदान की जाएगी। मैंने सहमति जताई। आज (14 दिसंबर 2025) को दोपहर लगभग 12:45 बजे मुझे चर्च बुलाया। वहाँ 35-40 ग्रामीण उपस्थित थे।”

एफआईआर की कॉपी

आनंद ने आगे लिखा है, “आरोपित भोलानाथ पटेल, माया पटेल, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी, साधना और फूलपत्ती मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ, सारी पीड़ाएँ समाप्त हो जाएँगी। ना मानने पर दुर्भाग्य आएगा। उन्होंने मेरे ऊपर पवित्र जल छिड़का, नाम ‘जोसेफ आनंद’ रखा और पवित्र स्नान कराने का प्रयास किया। मैंने विरोध किया और भाग आया। यह अवैध धर्मांतरण है।”

एफआईआर की कॉपी

प्रशासन कर रहा कार्रवाई, पूछताछ जारी

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सोमेन बर्मा ने बताया, “धर्म परिवर्तन के काम में लगे 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपी लोगों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। उनके पास से मजहबी पुस्तकें और मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। खुफिया सूचना थी कि 25 दिसंबर को बड़े स्तर पर धर्मांतरण होने वाला था। जाँच जारी है।”

देहात कोतवाल अमित मिश्रा ने खुलासा किया, “खरहरा चर्च में लगभग दो हजार लोगों का धर्मांतरण कराने की साजिश थी। स्थानीय और आसपास के गाँवों के भोले-भाले लोग निशाना बनाए जा रहे थे। पादरी भोलानाथ लखनऊ से फंडिंग लेता था। हम सख्ती से कार्रवाई करेंगे।”

साल 2023 से धर्मांतरण के 15 केस आ चुके हैं सामने

बीते 2 सालों में मिर्जापुर में ईसाई मिशनरी की सक्रियता ने स्थानीय प्रशासन को हिलाकर रख दिया है। 2023 से अब तक कम से कम 15 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें अवैध धर्मांतरण के आरोप लगे हैं। इनमें से 11 मामले युवतियों को बहला-फुसलाकर भगाने, फिर धर्म परिवर्तन कर शादी कराने के हैं। बाकी चार बड़े रैकेट से जुड़े हैं।

उदाहरण के तौर पर, विंध्याचल थाने में एक केस दर्ज हुआ, जिसमें भुजवा चौकी के विजय एम को गिरफ्तार किया गया। अहरौरा थाने में 30 सितंबर 2025 को देव सहायम डेनियर समेत पाँच गिरफ्तार हुए। लालगंज पुलिस ने जेम्स उर्फ रामदीन उर्फ राजू और उनकी पत्नी सरिता देवी को पकड़ा। इन मामलों में प्रलोभन का पैटर्न एक जैसा रहा- पैसे, नौकरी, शिक्षा।

इन 15 मामलों ने न सिर्फ परिवारों को तोड़ा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। ग्रामीणों में डर का माहौल है। एक सामाजिक कार्यकर्ता, बजरंग दल के शांतनु तिवारी ने कहा, “ये मिशनरी गरीबी का फायदा उठाते हैं। हिंदू समाज जागे, तो ये रुकेंगे।” खरहरा की यह घटना एक चेतावनी है। गरीबों के सपनों पर डाका डालने वाले इस खेल को रोकना होगा, वरना और कितने आनंद दुबे फँसेंगे?

पंजाब में ‘मौत का खेल’ बना कबड्डी, गैंगवार में आए दिन मारे जा रहे खिलाड़ी: कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी AAP सरकार

पंजाब में कबड्डी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान है। गाँवों की चौपालों से लेकर अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों तक, यह खेल पंजाब की मिट्टी की ताकत और परंपरा का प्रतीक रहा है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कबड्डी के खिलाड़ियों के लिए पंजाब की धरती एक डरावने सपने की तरह सामने आ रहा है।

हालाँकि कबड्डी खिलाड़ी अब लगातार गैंगस्टरों के निशाने पर आ रहे हैं। बीते 3 महीनों में कई खिलाड़ियों की गैंगवार के तहत हत्या कर दी गई। सोमवार (15 दिसंबर 2025) को मोहाली के सोहाना इलाके में एक प्राइवेट कबड्डी टूर्नामेंट चल रहा था, तभी मोटरसाइकिल पर आए 2-3 हमलावरों ने खिलाड़ी राणा बलाचौरिया पर गोलियाँ चला दीं।

इससे पहले 4 नवंबर 2025 को समराला ब्लॉक में 23 वर्षीय कबड्डी के नेशनल प्लेयर गुरविंदर सिंह पर रात करीब 9 बजे चार नकाबपोश हमलावरों ने गोलियाँ चलाईं। उन्हें इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जिम्मेदारी ली।

31 अक्टूबर 2025 को लुधियाना के जगराओं में SSP ऑफिस के पास 25 वर्षीय कबड्डी खिलाड़ी तेजपाल सिंह को पहले पीटा गया, फिर गोली मारी गई। पुलिस ने इसे पुरानी रंजिश से जुड़ा मामला बताया।

इसके अलावा 14 मार्च 2022 को जालंधर में कबड्डी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी संदीप नंगल अंबियाँ को ओपन टूर्नामेंट के दौरान कई हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पूरी घटना कैमरे में भी कैद हुई।

विपक्ष ने भी आप सरकार को लिया आड़े हाथ

राणा बलाचौरिया की हत्या की घटना से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में गोलीबारी की आवाजें सुनी जा सकती हैं। यह स्थिति पंजाब सरकार की कानून‑व्यवस्था को तार-तार करने के साथ पंजाब के सामाजिक ढाँचे में गहराई तक घुस चुके अपराध का ताना‑बाना भी दिखाता है।

इस मामले पर नेताओं ने भी AAP सरकार को आड़े हाथों लिया है। भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान और कॉन्ग्रेस नेता परगत सिंह ने भी मामले को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा कर प्रशासन पर सवाल उठाए हैं।

राणा बलाचौरिया की हत्या कर अपराधियों ने ये भी कहा कि ये उनका बदला है। इसमें पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला का नाम भी सामने आया। बंबीहा गैंग ने सोशल मीडिया पर हत्या की जिम्मेदारी ली।

मामले में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस हत्या के लिए सीधे तौर पर ‘आप’ सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि यह पंजाब में कानून और व्यवस्था के पूरी तरह फेल होने का सबूत है। 

पंजाब और गैंगस्टर्स का ‘कनेक्शन’

पंजाब में म्यूजिक इंडस्ट्री और गैंगस्टर नेटवर्क का गहरा कनेक्शन है। ये पंजाब सरकार के लिए न केवल एक चुनौती बल्कि इसके लिए अब तक सरकार की ओर से कोई कदम न उठा पाना एक करारा तमाचा भी है।

पंजाबी गायकों के बड़े शो, इवेंट्स और विदेशों में होने वाले कॉन्सर्ट्स में गैंगों की दखल लंबे समय से रही है। कई गायकों ने धमकियों और वसूली की शिकायतें की हैं। हालाँकि कुछ गानों में गैंगस्टरों के नाम और हिंसा का महिमामंडन भी होता है, जिससे अपराधियों को पॉप‑कल्चर में वैधता मिलती है। इसके कारण खिलाड़ियों और गायकों के लिए जोखिम भी बढ़ता है क्योंकि वे विरोधी गैंगों के लिए ‘हाई‑विजिबिलिटी टारगेट’ बन जाते हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पंजाब सरकार और प्रशासन इस पूरे संकट पर लगभग खामोश दिखाई देते हैं। दिनदहाड़े हत्याएँ, वायरल वीडियो, सोशल मीडिया पर गैंगों की धमकियों के बावजूद सरकार की ओर से कोई बड़ा बयान या ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।

जाँच में पुलिस इंटेलिजेंस की नाकामी साफ दिखती है क्योंकि गैंगस्टर खुलेआम जिम्मेदारी ले रहे हैं और फिर भी गिरफ्तारी या रोकथाम की कोशिशें नाकाफी साबित होती है। इसके अलावा पंजाब में गैंगस्टर नेटवर्क अब लोकल के बजाय अंतररराष्ट्रीय भी अधिक हो गया है। कई गैंग विदेशों से ऑपरेट करते हैं। इसके चलते पुलिस के लिए चुनौती और बढ़ जाती है।

अपराध का ताना‑बाना अब आम लोगों के बीच भी बुना जा रहा है। सोशल मीडिया गैंगों का नया हथियार बन चुका है- धमकी, प्रचार, भर्ती, सब कुछ ऑनलाइन होता है। पंजाब में बेरोजगारी और नशे की समस्या ने युवाओं को और कमजोर बनाया है और गैंगस्टर इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।

पंजाब सरकार को रणनीतिक कदम उठाने की जरूरत

जब खेल के मैदान में गोलियाँ चलें, जब खिलाड़ी सुरक्षा मांगें और जब सरकार चुप रहे तो यह सिर्फ कानून‑व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राज्य की असुरक्षा का संकेत हैं। पंजाब अभी भी संभल सकता है, लेकिन इसके लिए सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति, पुलिस सुधार और सामाजिक जागरूकता की जरूरत है।

कबड्डी और संगीत दोनों में पैसा और पब्लिक इन्फ्लुएंस बहुत है, इसलिए गैंगों की दिलचस्पी भी बढ़ती जा रही है। इस स्थिति से निकलने के लिए पंजाब को एक मजबूत, बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है। स्पेशल एंटी‑गैंगस्टर टास्क फोर्स, इंटरनेशनल कोऑपरेशन, कबड्डी टूर्नामेंटों की सुरक्षा, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और खिलाड़ियों‑गायकों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल जैसे कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए।

मंदिरों को ढहाकर मुस्लिम बिल्डर ने खड़ी की इमारत, मुस्लिमों को बेचे सारे फ्लैट: गुजरात के अहमदाबाद का मामला, CM ने दिए जाँच के आदेश

अहमदाबाद के दानिलिमडा वार्ड में गाँव के कुएँ के सामने स्थित प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। इन प्राचीन मंदिरों की जगह अवैध रूप से इमारत बना दिए जाने के आरोप लगे हैं और उन फ्लैट्स में मुस्लिम परिवार रह रहे हैं। इन फ्लैट्स के सामने मांसाहारी दुकानें भी हैं। स्थानीय हिंदू नागरिकों ने इस मामले की शिकायत अहमदाबाद महानगरपालिका से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक की है। लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह इलाका ‘अशांत धारा’ के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद प्राचीन मंदिर के ऊपर ही मुस्लिमों के लिए फ्लैट बनाने की अनुमति दे दी गई। यहाँ दो प्राचीन मंदिरों को तोड़कर फ्लैट बनाए गए हैं। इलाके में अब भी एक मंदिर मौजूद है और मुस्लिम उसके ऊपर बने फ्लैट पर रह रहे हैं।

हाल ही में विवाद को लेकर गाँधीनगर में शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसके बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मामले पर संज्ञान लेते हुए जाँच के आदेश दिए हैं। स्थानीय हिंदू लोगों को आश्वासन दिया है कि सरकार तत्काल कार्रवाई करेगी और अवैध रूप से निर्मित फ्लैटों को ध्वस्त कर मंदिर मुक्त कराएगी। ऑपइंडिया की टीम भी मौके पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बातचीत की।

यह भी सामने आया है कि साल 2016 में नगरपालिका ने प्राचीन जोगनी माता मंदिर की चोटी पर फ्लैट बनाने की अनुमति दी थी। साकिर अहमद नाम के एक बिल्डर ने इमारत बनाने की योजना नगर निगम को दी थी, जिसे MMC ने भी मंजूरी दे दी थी। इसके बावजूद स्थानीय हिंदुओं ने इसका कड़ा विरोध किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालाँकि, अब सीएम भूपेंद्र पटेल ने मामले की जाँच के आदेश दिए हैं।

मंदिरों पर अवैध फ्लैट बनाने के खिलाफ सालों से लड़ रहे: स्थानीय हिंदू

ऑपइंडिया की टीम मौके पर पहुँची और मामले की जानकारी ली। टीम ने स्थानीय लोगों से भी बात की। अवैध रूप से निर्मित इमारत का नाम ‘कबीर हाइट्स’ है। इस इमारत में बने सभी फ्लैटों में मुस्लिम परिवार रहते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि मुख्यमंत्री का आदेश जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दिया गया है।

उन्होंने आगे बताया कि मंदिर के ऊपर बनी इस अवैध इमारत के खिलाफ वे सालों से संघर्ष कर रहे हैं। वे कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर कई बार शिकायतें और ज्ञापन देने के बावजूद कोई समाधान नहीं निकला।

एक अन्य स्थानीय निवासी ने बताया कि कई साल पहले इस जगह पर एक कुआँ था, इसीलिए इस जगह को गाँवकूवा कहा जाता है। कुएँ पर माताजी का एक मंदिर था, लेकिन समय के साथ-साथ इस मंदिर पर गलत तरीके से निर्माण किया गया। उन्होंने माँग की कि इस निर्माण को पूरी तरह से हटा दिया जाए। दानिलिम्दा के बीजेपी अध्यक्ष ने भी इस विवाद पर ऑपइंडिया से बात की।

बीजेपी अध्यक्ष ने बताया कि इस क्षेत्र में लंबे समय से चर्चा, संघर्ष और याचिकाओं का दौर चल रहा था। स्थानीय लोगों ने भी कई जगहों पर याचिकाएँ दायार की थीं और अब इसे ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने जाँच के आदेश दिए हैं। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद ऐसा लगता है कि स्थानीय हिंदुओं और मंदिर को न्याय जरूर मिलेगा। इस बीच स्थानीय लोगों ने भी भूपेंद्र पटेल सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया है।

गौरतलब है कि पहले मंदिर का शिखर भवन दिखाई देता था, लेकिन अब काफी समय से भवन के बाहर बोर्ड लगा दिए गए हैं। इन बोर्ड के कारण शिखर ढक गया है। इसके अलावा वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि मंदिर की पहचान छिपाने के लिए जाल लगाने का प्रयास किया गया है।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

सड़क से संसद तक रामलला के लिए की लड़ाई, 12 साल की उम्र में छोड़ा घर: जानिए- अयोध्या आंदोलन के योद्धा रामविलास दास वेदांती को, जिन्होंने भव्य मंदिर देखकर ली अंतिम सांस

अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक, पूर्व सांसद और वरिष्ठ संत डॉ रामविलास दास वेदांती का सोमवार (15 दिसंबर 2025) सुबह 77 साल की उम्र में निधन हो गया। मध्य प्रदेश के रीवा में रामकथा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी थी। वेदांती जी का पार्थिव शरीर अयोध्या लाया गया है, जहाँ उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए संतों, नेताओं और श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। डॉ वेदांती का निधन राम जन्मभूमि आंदोलन के एक युग का अंत माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया था और भव्य मंदिर निर्माण देखने के बाद ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा।

बचपन में छोड़ा घर, बने अयोध्या के संत

डॉ रामविलास दास वेदांती जी का जन्म 7 अक्टूबर 1958 को मध्य प्रदेश के रीवा शहर में हुआ था। वह बचपन से ही बहुत धार्मिक थे और भगवान की भक्ति में उनका मन लगता था। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, यानी बहुत छोटे थे, तभी उन्होंने फैसला कर लिया कि वह साधु बनेंगे। उन्होंने अपना घर-परिवार छोड़ दिया और सीधे भगवान राम की नगरी अयोध्या आ गए। एक तरह से, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राम जी के नाम कर दी।

अयोध्या पहुँचकर, वह हनुमानगढ़ी के बहुत मशहूर संत महंत अभिराम दास के शिष्य बन गए और उनके मार्गदर्शन में रहने लगे। वेदांती जी संस्कृत के बहुत बड़े जानकार (प्रकांड विद्वान) थे। अयोध्या में उनका एक अपना आश्रम ‘वशिष्ठ भवन’ था और वह अक्सर सरयू नदी के पास ‘हिंदू धाम’ नाम की जगह पर रहते थे।

राम मंदिर आंदोलन के बने प्रमुख योद्धा

1980 के आस-पास, जब देश में राम मंदिर बनाने का आंदोलन जोर पकड़ रहा था, तब वेदांती जी भी इसमें शामिल हो गए। वह अकेले नहीं थे, बल्कि उन्हें कई बड़े संतों का साथ मिला। इनमें महंत अवैद्यनाथ (जो आगे चलकर योगी आदित्यनाथ के गुरु बने), रामचंद्र परमहंस और अशोक सिंघल जैसे दिग्गज संत थे।

वेदांती जी बहुत जल्द इस आंदोलन का एक मुख्य चेहरा बन गए। वह सिर्फ अयोध्या में नहीं रुके, बल्कि देश के कोने-कोने में गए। उन्होंने लोगों से मिलकर राम मंदिर बनाने की बात की और जनता को जोड़ा। उनकी मेहनत और जोशीले भाषणों के कारण ही उन्हें पूरे देश में एक मजबूत पहचान मिली। वह उन संतों में से थे जिन्होंने राम मंदिर के सपने को सच करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।

डॉ रामविलास दास वेदांती जी राम मंदिर आंदोलन के एक बहुत ही बेबाक और तेज-तर्रार नेता थे। वह अपनी बात खुलकर और जोरदार तरीके से रखते थे। आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका के चलते ही उन्हें राम जन्मभूमि न्यास (ट्रस्ट जो मंदिर का काम देखता है) का सदस्य और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया।

बाबरी ढाँचा विवाद और उनका दावा

साल 1992 में, जब 6 दिसंबर को बाबरी ढाँचा गिराया गया तो इस मामले में जिन बड़े नेताओं पर केस चला, उनमें वेदांती जी का नाम भी शामिल था। उन्होंने कोर्ट में और बाहर भी हमेशा यह कहा कि उन्होंने कोई गलती नहीं की।

उनका दावा था कि हमने किसी मस्जिद को नहीं तोड़ा, बल्कि जहाँ ढाँचा खड़ा था, वहाँ असल में बहुत पहले राजा विक्रमादित्य ने एक मंदिर बनवाया था। समय के साथ वह मंदिर खंडहर बन चुका था। वेदांती जी ने कहा कि उन्होंने और कारसेवकों ने मिलकर केवल उस पुराने खंडहर को हटाया था, ताकि उसकी जगह पर भव्य राम मंदिर बन सके।

वेदांती ने साफ कहा कि उनका मकसद वहाँ सिर्फ नया मंदिर बनाना था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें, लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती जैसे सभी बड़े नेताओं के साथ बरी कर दिया।

वेदांती जी राम मंदिर को लेकर बहुत उत्साहित थे। उनकी इच्छा थी कि अयोध्या में बनने वाला राम मंदिर इतना ऊँचा हो (करीब 1111 फुट) कि वह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों जैसे इस्लामाबाद या कोलंबो से भी दिखाई दे। उनका मानना था कि यह मंदिर दुनिया का सबसे भव्य और बड़ा मंदिर होना चाहिए।

संत से सियासत तक का सफर

राम मंदिर आंदोलन में वेदांती जी की पहचान इतनी मजबूत हो गई थी कि उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें चुनाव लड़ने का मौका दिया।

  • पहली जीत (1996): वह सबसे पहले मछली शहर (जौनपुर और प्रतापगढ़ के हिस्सों वाली सीट) से लोकसभा चुनाव लड़े। राम मंदिर की वजह से लोगों ने उन्हें भरपूर प्यार दिया और वह चुनाव जीतकर सांसद बन गए, यानी दिल्ली में संसद पहुँच गए।
  • दूसरी जीत (1998): इसके बाद, उन्होंने प्रतापगढ़ सीट से चुनाव लड़ा। यह सीट ऐसी थी जहाँ बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के खानदान का दबदबा रहता था, लेकिन वेदांती जी ने कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार रत्ना सिंह को हरा दिया। उनकी यह जीत बहुत बड़ी मानी गई, क्योंकि उन्होंने पुरानी राजाओं वाली राजनीति को चुनौती दी थी। वेदांती जी हमेशा कहते थे कि वह अपनी ये जीतें भगवान राम के नाम पर मिली ‘राम लहर’ के कारण ही जीत पाए।

मंदिर का सपना पूरा होते देखा और फिर ली अंतिम सांस

जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तो डॉ वेदांती जी बहुत खुश थे। उन्होंने कहा था कि यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण ही हो पाया है, जिन्होंने महंत अवैद्यनाथ और रामचंद्र परमहंस जैसे संतों के पुराने सपने को सच कर दिखाया।

वेदांती जी ने अपनी पूरी जिंदगी राम मंदिर के लिए लगा दी थी। यह देश के लिए एक बहुत बड़ी और भावुक बात है कि उन्होंने भव्य राम मंदिर को बनते हुए देख लिया। उनका निधन ऐसे समय में हुआ है, जब राम मंदिर का काम पूरा हो चुका है। इसीलिए, पूरे देश में लोग कह रहे हैं कि ‘वह राम मंदिर देखकर स्वर्ग सिधारे’, यानी उनकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई और वह शांति से दुनिया छोड़कर चले गए।