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रिलायंस ने जामनगर रिफाइनरी के लिए रूसी तेल खरीद रोकी, ये रणनीतिक फैसला: जानें- कैसे व्यापारिक हित में उठा ये कदम अमेरिकी दबाव से है मुक्त

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को घोषणा की कि वह अपने जामनगर स्थित एक्सपोर्ट-फोकस्ड रिफाइनरी में अब तुरंत रूसी कच्चे तेल (Russian crude) का आयात बंद कर देगी।

यह रिफाइनरी 1 दिसंबर 2025 से केवल गैर-रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पाद ही निर्यात करेगी। कंपनी ने साफ कहा कि यह फैसला अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाई जाने वाली उन नई पाबंदियों के कारण लिया गया है, जिनमें रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है।

हालाँकि कुछ आलोचकों का कहना है कि यह कदम अमेरिका के दबाव में लिया गया है, लेकिन यह दावा व्यापारिक सच्चाइयों को नजरअंदाज करता है। रिलायंस भारत में रूसी तेल की सबसे बड़ी खरीदार है और जामनगर रिफाइनरी का SEZ हिस्सा मुख्यतः निर्यात पर आधारित है, जहाँ से बड़ी मात्रा में उत्पाद अमेरिका और EU को भेजे जाते हैं।

ऐसे में यह फैसला किसी दबाव से ज्यादा जोखिम कम करने और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की समझदारी भरा व्यावसायिक कदम लगता है। रिलायंस का निर्यात कारोबार बड़े मुनाफे और वैश्विक मार्केट पर निर्भर है, इसलिए प्रतिबंधों के लागू होने से पहले ही खुद को सुरक्षित करना कंपनी के लिए जरूरी था।

एक्सपोर्ट मार्केट, बैन का रिस्क, और बिजनेस समझदारी

अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और अन्य देशों को किए जाने वाले ईंधन निर्यात, जहाँ प्रीमियम मुनाफा और वैश्विक बाजार में पहचान मिलती है, रिलायंस के कारोबार की मुख्य ताकत है। सिर्फ घरेलू रिफाइनिंग इसका असली आधार नहीं है। बताया जाता है कि भारत से निर्यात किए जाने वाले रूसी कच्चे तेल (Russian crude) पर आधारित उत्पादों में लगभग आधा हिस्सा अकेले जामनगर SEZ रिफाइनरी से आता है।

इस बीच EU ने 21 जनवरी 2026 से रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसी तरह अमेरिका ने भी रूस की बड़ी तेल कंपनियों जैसे लुकोइल और रोसनेफ्ट पर कड़े समय-सीमा वाले प्रतिबंध लागू किए हैं।

ऐसी स्थिति में रिलायंस का फैसला एक सक्रिय जोखिम-प्रबंधन (proactive risk mitigation) जैसा दिखता है। कंपनी पहले से तय की गई शिपमेंट्स को पूरा कर रही है, लेकिन आगे के निर्यातों के लिए वह गैर-रूसी कच्चा तेल इस्तेमाल कर रही है, ताकि पश्चिमी बाजारों तक उसकी पहुँच प्रभावित न हो और सेकेंडरी सैंक्शंस (द्वितीयक प्रतिबंध) का खतरा भी न रहे।

यह कदम किसी विचारधारा या राजनीतिक झुकाव का संकेत नहीं देता, बल्कि यह दिखाता है कि रिलायंस अपने निर्यात कारोबार को वैश्विक प्रतिबंधों से बचाकर व्यावसायिक अनुशासन और स्थिरता बनाए रखना चाहती है।

लॉन्ग टर्म रशियन डील बनाम शॉर्ट टर्म एक्सपोर्ट रियलिटी

रिलायंस ने हाल के सालों में रोसनेफ्ट के साथ प्रतिदिन 5 लाख बैरल तक रूसी कच्चा तेल खरीदने का अरबों डॉलर का लंबे समय का कॉन्ट्रैक्ट किया था, लेकिन किसी भी कॉर्पोरेट समझौते को बदलते अंतरराष्ट्रीय नियमों और प्रतिबंधों को ध्यान में रखना पड़ता है।

कंपनी अपने कॉन्ट्रैक्ट का सम्मान करते हुए अक्टूबर 2022 तक की सभी तय शिपमेंट्स उठा चुकी है और अंतिम कार्गो 12 नवंबर 2025 को लोड किया गया, जो दिखाता है कि वह नियमों का पालन करते हुए धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रही है।

सरकार के दृष्टिकोण से यह कदम किसी दबाव का नहीं, बल्कि व्यावहारिकता का संकेत है, भारत रूस पर अपनी नीति अचानक नहीं बदल रहा, बल्कि उद्योगों को इतना समय दे रहा है कि वे नए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लागू होने से पहले अपने व्यापार मॉडल को एडजस्ट कर सकें।

इसी बीच मोदी सरकार दीर्घकालिक ऊर्जा समझौतों के माध्यम से रूस के साथ रणनीतिक स्थिरता बनाए रखती है, जबकि निजी कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों और वैश्विक दबाव के अनुसार निर्यात-आधारित रणनीतियाँ अपनाने की स्वतंत्रता मिलती है।

भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध लेन-देन से आगे बढ़कर संरचनात्मक स्तर पर जुड़े हुए हैं, जैसे रोसनेफ्ट का नायरा एनर्जी की वडिनार रिफाइनरी में 49% से अधिक हिस्सा, भारतीय PSUs का वैनकोरनेफ्ट, तास-यूर्याख और सखालिन-1 परियोजनाओं में मजबूत निवेश। इसलिए भले ही रिलायंस जैसी कंपनियाँ प्रतिबंधों और बाजार की स्थितियों को देखते हुए अपनी खरीद रणनीति बदलें, भारत–रूस के दीर्घकालिक ऊर्जा रिश्ते मजबूत और स्थिर बने रहते हैं।

एनर्जी सिक्योरिटी, डोमेस्टिक बनाम एक्सपोर्ट स्ट्रैटेजी और भारत सरकार की भूमिका

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रोक केवल रिलायंस की निर्यात-केन्द्रित जामनगर SEZ रिफाइनरी पर लागू होती है, न कि उसकी घरेलू रिफाइनिंग यूनिट्स पर। इसका मतलब है कि कंपनी दोहरी रणनीति अपना रही है।

घरेलू सप्लाई चेन अभी भी अलग-अलग तरह के कच्चे तेल, जिसमें रूसी तेल भी शामिल है (घरेलू टैरिफ नियमों के अनुसार), का उपयोग कर सकती है, जबकि निर्यात के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा तेल अब गैर-रूसी स्रोतों से लिया जाएगा ताकि पश्चिमी देशों के बाजार खुले रहें।

सरकार के नज़रिए से यह रणनीति पूरी तरह समझदारी भरी है, क्योंकि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर कोई जोखिम नहीं आता और साथ ही निजी रिफाइनर सस्ते रूसी तेल का फायदा तब तक उठा सकते हैं, जब तक भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं।

इस दृष्टि से मोदी सरकार की नीति किसी दबाव में झुकने के बजाय भारतीय कंपनियों को जोखिम प्रबंधन की स्वतंत्रता देती हुई दिखाई देती है, ताकि वे देश के आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपनी रणनीतियाँ तय कर सकें।

स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी बनाए रखना: घरेलू सप्लायर, प्राइसिंग और ग्लोबल अलाइनमेंट

जो आलोचक यह कहते हैं कि भारत अमेरिका के दबाव में झुक गया, वे स्थिति को बहुत सरल बनाकर देख रहे हैं। असल में यह प्रतिबंध लागू होने से पहले एक बड़े निजी उद्योग द्वारा किया गया बाजार आधारित फैसला है, न कि भारत सरकार द्वारा रूसी तेल पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा।

मोदी सरकार ने न तो यह वादा किया है कि भारत रूसी तेल का उपयोग बंद कर देगा, न ही सरकारी तेल कंपनियों को ऐसा करने के लिए मजबूर किया है और न ही अपनी स्वतंत्र विदेश नीति में कोई बदलाव किया है।

सरकार रिलायंस को अपनी व्यापारिक रणनीति बदलने की अनुमति देकर उच्च-मूल्य वाले ईंधन बाजारों की सुरक्षा करती है, निर्यातकों को बचाती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखती है।

घरेलू स्तर पर भी सस्ते रूसी तेल का फायदा भारत को मिला है, जिससे रिफाइनरियों की लागत कम हुई, ईंधन की कीमतें स्थिर रहीं और आम उपभोक्ताओं व अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ हुआ। इस संदर्भ में देखें तो मोदी सरकार का कदम दबाव में झुकने के बजाय व्यावसायिक समझदारी और वैश्विक संतुलन दोनों को साधने जैसा है।

बिजनेस की जरूरतें, ग्लोबल मार्केट और भारत की कॉम्पिटिटिव बढ़त

रिलायंस के फैसले को समझते समय वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि जामनगर कॉम्प्लेक्स दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग सुविधा है और उसके निर्यात कारोबार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी प्रतिस्पर्धा रहती है।

अगर वह निर्यात किए जाने वाले ईंधन में रूसी कच्चे तेल का उपयोग जारी रखता, तो पश्चिमी प्रतिबंध उसकी बाजार तक पहुँच को खतरे में डाल सकते थे। कंपनी ने अपने बयान में बताया कि यह बदलाव EU की समय-सीमा से पहले पूरा कर लिया गया, जो बाहरी दबावों के बीच उसकी ऑपरेशनल अनुशासन को दिखाता है।

मोदी सरकार के नज़रिए से इस बदलाव को नियामक स्पष्टता, उद्योग के साथ तालमेल और सावधानीपूर्ण कूटनीति के माध्यम से समर्थन देना किसी अधीनता का नहीं, बल्कि व्यवसाय-हितैषी शासन संस्कृति का संकेत है। भारत आज भी विदेशी निवेश आकर्षित कर रहा है और यह दिखाना कि भारतीय कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के जोखिम को समझदारी से संभाल सकती हैं, देश की वैश्विक साख को और मजबूत बनाता है।

यह कदम भारत-रूस संबंधों को कमजोर क्यों नहीं करता

यह समझना जरूरी है कि रिलायंस का यह बदलाव रूस के साथ किसी रणनीतिक दूरी का संकेत नहीं देता। कंपनी के दीर्घकालिक समझौते अब भी जारी हैं और भारत की कुल रूसी तेल खरीद भी अभी काफी बड़ी मात्रा में बनी हुई है।

मोदी सरकार ऊर्जा, रक्षा और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में रूस के साथ अपने संबंध सामान्य रूप से जारी रखे हुए है। यानी यह कोई विदेश नीति का अचानक बदला हुआ रुख नहीं, बल्कि एक खास निर्यात खंड में उद्योग द्वारा किया गया रणनीतिक समायोजन है।

इस दृष्टि से सरकार की प्रतिक्रिया पूरी तरह तार्किक लगती है, वह निजी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के हिसाब से खुद को ढालने देती है, जबकि रूस के साथ व्यापक रणनीतिक संबंध भी बनाए रखती है। भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति और आर्थिक हित इसी दोहरी रणनीति में फिट बैठते हैं, जहाँ जरूरत हो वहाँ वैश्विक तालमेल और जहाँ संभव हो वहाँ स्वतंत्रता।

बड़ी तस्वीर: घरेलू वैल्यू चेन को सपोर्ट करना, एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई को बचाना

रूसी कच्चे तेल में किए गए इस बदलाव से सिर्फ खरीद प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि भारत की घरेलू वैल्यू चेन को भी फायदा मिलता है। अगर जामनगर रिफाइनरी अपनी निर्यात क्षमता में दुनिया में शीर्ष पर बनी रहती है, तो भारत का डाउनस्ट्रीम सेक्टर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूत रहेगा, विदेशी मुद्रा कमाता रहेगा और उच्च-मूल्य वाली नौकरियों की सुरक्षा भी होगी।

इस निरंतरता की अनुमति देकर मोदी सरकार देश की औद्योगिक रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा दोनों की रक्षा कर रही है। वहीं, निर्यात यूनिट में रूसी कच्चे तेल से दूरी बनाकर रिलायंस उन सेकेंडरी प्रतिबंधों या बाजार से बाहर किए जाने के जोखिम से भी बच जाता है, जो उसके भविष्य के पेट्रोकेमिकल, नवीकरणीय ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय निवेश योजनाओं को नुकसान पहुँचा सकते थे। कुल मिलाकर, यह कदम न सिर्फ रिलायंस जैसे वैश्विक भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गजों को सुरक्षित करता है बल्कि भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूत बनाता है।

निष्कर्ष

आखिर में, रिलायंस की निर्यात-केन्द्रित रिफाइनरी द्वारा रूसी कच्चे तेल का आयात बंद करने का फैसला किसी बाहरी दबाव में लिया गया कदम नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक रणनीति है, जिसे सरकार ने इसलिए संभव बनाया क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, निर्यात बाजारों, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और ऊर्जा सुरक्षा इन सभी के बीच संतुलन को समझती है।

मोदी सरकार ने रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को जारी रखा है, उसने न तो कोई सार्वजनिक तौर पर झुकाव दिखाया और न ही रूसी तेल पर पूरी तरह रोक लगाने जैसी कोई बाध्यता थोप दी।

इसके बजाय सरकार ने भारत की सबसे बड़ी निजी ऊर्जा कंपनी को बदलते वैश्विक माहौल में समझदारी से कदम उठाने की स्वतंत्रता दी, ताकि देश की निर्यात आय, रिफाइनिंग मार्जिन और पूरी  उत्पाद को बेचने की प्रक्रिया  सुरक्षित रहे।

वास्तविक तथ्य यह दिखाते हैं कि यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का परिणाम है, जो आर्थिक वास्तविकताओं और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप काम कर रही है, भले ही कुछ आलोचक इसे कूटनीतिक झुकाव बताने की कोशिश करें। ऐसे अनिश्चित समय में जब सप्लाई चेन बाधित हैं, प्रतिबंध बढ़ रहे हैं और वैश्विक गठबंधन बदल रहे हैं, यही संतुलित और व्यावहारिक रणनीति भारत के लिए सबसे उपयुक्त है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है, उसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

दिल्ली ब्लास्ट के बाद UP सरकार का बड़ा कदम, मदरसों के बाहरी मौलाना-छात्रों का डेटा ATS को देना अनिवार्य: जानें- क्यों विरोध में मुस्लिम संगठन, क्या होंगे फायदे

दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके और इसमें फरीदाबाद की अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन सामने आने के बाद पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड पर हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए मदरसों की निगरानी को और मजबूत करने का फैसला किया है।

अब प्रदेश के सभी मदरसों, चाहे वे मान्यता प्राप्त हों या बिना मान्यता के, उसको अपने कर्मचारियों, मौलानाओं और छात्रों का पूरा विवरण ATS (Anti-Terrorism Squad) को उपलब्ध कराना होगा।

15 नवंबर 2025 को जारी एक पत्र में UP ATS ने प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट और महोबा के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों (DWO) को निर्देश दिए कि वे अपने-अपने जिलों के सभी मदरसों के छात्रों और शिक्षकों का पूरा ब्योरा उपलब्ध कराएँ।

सरकार के अनुसार यह केवल सर्वे या साधारण जानकारी एकत्रित करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा ऑडिट है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे या मजहबी संस्थान में कोई संदिग्ध व्यक्ति छिपकर आतंकी गतिविधियाँ न चला सके।

इस कदम की पृष्ठभूमि में है अल-फलाह यूनिवर्सिटी का मामला, जिसमें विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों को यह दिख चुका है कि एक निजी विश्वविद्यालय कैसे आतंक-संबंधी गतिविधियों के नेटवर्क के केंद्र के रूप में उभर सकता है।

यूपी सरकार ने मदरसों के लिए क्या नया नियम बनाया?

उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश के अनुसार, राज्य के सभी मदरसों, चाहे वो मान्यता प्राप्त हों या मान्यता प्राप्त ना हो, उसे यह सुनिश्चित करना है कि उन संस्थाओं में पढ़ने वाले सभी छात्रों तथा वहाँ कार्यरत मौलानाओं और शिक्षकों की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, मोबाइल नंबर, आधार-संख्या, स्थायी पता आदि की जानकारी UP ATS को समय-बद्ध रूप से उपलब्ध कराई जाए।

इसमें छात्रों के नाम, उनके पिता के नाम, पते और मोबाइल नंबर जैसी जानकारियाँ शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मदरसे का इस्तेमाल असामाजिक या आतंकी गतिविधियों के लिए न हो सके। फिलहाल यह आदेश सिर्फ इन आठ जिलों के लिए लागू किया गया है।

प्रयागराज के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कृष्ण मुरारी ने बताया कि जिले के लगभग 206 मदरसों की जानकारी ATS को भेज दी गई है और अब इन जानकारियों का जमीनी सत्यापन शुरू हो चुका है।

इस आदेश को लेकर यूपी पंचायती राज और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने बताया कि पहले भी प्रदेश के कई मदरसों में अवैध गतिविधियों के मामले सामने आए हैं, इसलिए यह निगरानी जरूरी है।

उन्होंने कहा, “समय-समय पर मदरसों से अलग-अलग मामले सामने आते रहते हैं। जैसे, प्रयागराज में करेंसी छापने के मामले सामने आए, और इसी तरह कुशीनगर में भी। बहराइच में विदेशियों और बाहरी लोगों के मदरसों में रहने का इंतजाम पाया गया। इसी तरह, हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाके में एक डॉक्टर का नाम सामने आया और उसके आधार पर जाँच शुरू हुई।”

इस आदेश में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह सिर्फ डेटा जमा करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि एक सुरक्षा-ऑडिट है, ताकि किसी भी मदरसे में बाहरी राज्यों या देशों से आने वाले छात्रों-मौलानाओं की आवाजाही, संदिग्ध गतिविधियाँ व सुरक्षा-रिस्क पहले-से पकड़ी जा सके।

मदरसों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार की कोशिशें:

इस दिशा में यूपी सरकार का दृष्टिकोण सिर्फ सुरक्षा-निगरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह प्रयास भी करने लगी है कि मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक स्वीकार्यता के साथ जोड़ा जाए।

मदरसों में पढ़ने-वाले छात्रों व वहाँ पढ़ाने-वाले मौलानाओं की जानकारी जुटाना और ATS को उपलब्ध कराना: इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होगा कि मदरसे सिर्फ मजहबी शिक्षा का केंद्र न बनें बल्कि उनकी संरचना, छात्र-छात्राओं की पृष्ठभूमि और भविष्य-संभावनाएँ भी ज्ञात हों।

बाहर-राज्यों या विदेशी छात्रों की आवाजाही पर विशेष ध्यान देना: यह देखा जा रहा है कि कुछ मदरसों में बाहरी राज्यों से आए छात्रों की संख्या काफी अधिक है, जिसे अब खुफिया एजेंसियों ने सन्देह के घेरे में लिया है।

मदरसों को आधुनिक पाठ्यक्रम अपनाने, मान्यता प्राप्त करने, मुख्यधारा की शिक्षा-संस्थाओं से तालमेल बिठाने की दिशा में प्रेरित करना: ताकि मदरसे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से स्वीकार्य बने और उनके छात्र आगे-व्यावसायिक या विश्वविद्यालय-स्तर पर भी सहजता से आगे बढ़ सकें।

अवैध मदरसों पर कार्रवाई और दिल्ली ब्लास्ट के बाद जाँच-तेजी

मदरसों पर निगरानी पहले से चल रही थी, लेकिन हाल के में सामने आई घटनाओं, विशेष रूप से 10 नवंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले के पास हुए ब्लास्ट ने जाँच-प्रक्रिया को और अधिक तीव्र कर दिया है।

इस ब्लास्ट के बाद राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों ने निर्देश दिया कि मजहबी और शैक्षणिक संस्थानों में आने-जाने वालों की पहचान और आवाजाही पर विशेष नजर रखी जाए। इसी सिलसिले में यूपी ATS ने मदरसों से डेटा जमा करने का अभियान शुरू किया है।

इसका मतलब यह है कि अब मदरसों के कार्य-प्रभावों के साथ-साथ, सुरक्षा-विचारों को भी गंभीरता से लिया जा रहा है, ताकि कोई भी संस्थान अनियंत्रित रूप से आतंकी गतिविधियों का माध्यम न बने।

दिल्ली के लालकिले धमाके के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की नजर फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी पर टिकी हुई है। इस यूनिवर्सिटी को संदेह के घेरे में रखा गया है क्योंकि यहाँ कई ऐसे प्रोफेसर और बाहरी लोग सक्रिय पाए गए हैं, जिन पर आतंकियों को पनाह देने और उनके साथ मिलकर खुफिया तौर पर गतिविधियाँ करने का शक है।

मुस्लिम और विपक्ष कर रहा नए नियम का विरोध

मदरसों के लिए बनाए गए इन नियमों का मुस्लिम लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे सरकार उनकी प्रोफाइलिंग करने की कोशिश कर रही है। जबकि एजेंसियाँ पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि यह सब कुछ केवल सुरक्षा की दृष्टि से किया जा रहा है।

वहीं इस कार्रवाई पर विपक्ष ने भी नाराजगी जताई है। कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शहजाद आलम ने कहा कि सरकार सुरक्षा के नाम पर डर पैदा कर रही है और हर मुस्लिम को शक की निगाह से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर ATS इतनी जाँच कर रही है तो उसे अपने मामलों के नतीजों पर भी श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, क्योंकि कई मामलों में कोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अमीक जामेई ने भी कहा कि देश आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह एकजुट है, लेकिन मदरसों को ATS से जाँच के दायरे में लाना अनावश्यक कदम है और इससे भ्रम और माहौल खराब होगा।

इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब एक मकान मालिक किसी नए किराएदार को घर में रहने की अनुमति देता है तो उससे पहले उससे न सिर्फ उसकी जानकारी लेता है बल्कि कुछ जरूरी दस्तावेज भी अपने पास जमा करवाता है। जाहिर सी बात है कि अगर मदरसों में देश के नहीं बल्कि बाहरी छात्रों की संख्या भी अधिक देखने मिल रही है, तो ऐसे में उनकी जानकारी आवश्यक है।

उस पर अल-फलाह जैसे विश्वविद्यालयों से सामने आ रही कश्मीरी छात्रों की संख्या, विश्वविद्यालय के अंदर पढ़ा रहे जिहादी प्रोफेसर इन नियमों को लागू करना और भी आवश्यक बना देते हैं।

क्या इसीलिए UAPA का विरोध करती थी कश्मीर टाइम्स की एडिटर आभा भसीन? SIA की छापेमारी में हथियारों की बरामदगी: अब देश विरोधी गतिविधियों में दर्ज हुआ केस

19 नवंबर को जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने कश्मीर टाइम्स के जम्मू कार्यालय पर छापा मारा। यह कार्रवाई आतंकी फंडिंग, ‘राष्ट्रविरोधी’, जिहादी विचारधारा को बढ़ावा देने और ‘अलगाववादी गतिविधियों’ की जाँच के तहत की गई।

इसके बाद कश्मीर टाइम्स से जुड़े लोगों समेत एग्जीक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन के खिलाफ कठोर गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम- UAPA के तहत FIR दर्ज की है।

अधिकारियों के अनुसार, दर्ज FIR में अनुराधा पर आपराधिक साजिश का आरोप लगाया गया था। ऑफिस की तलाशी के दौरान एक रिवॉल्वर, खाली और भरी हुई AK-सीरीज की गोलियाँ, चली हुई गोलियाँ, संदिग्ध पिस्तौल कारतूस, ग्रेनेड के सेफ्टी लीवर, डिजिटल उपकरण और दस्तावेज बरामद किए गए।

कश्मीर टाइम्स की मैनेजिंग एडिटर अनुराधा भसीन ने इसे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने, बदनाम करने और चुप कराने की कोशिश’ बताया। यह अखबार 1954 में उनके पिता वेद भसीन ने स्थापित किया था। 2021-22 में लगातार निशाना बनाए जाने के बाद इसका प्रिंट संस्करण बंद कर दिया गया।

अनुराधा भसीन और कश्मीर टाइम्स पर आरोप है कि वे ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ के नाम पर एंटी इंडिया प्रोपेगेंडा चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार वेद भसीन द्वारा स्थापित और अब उनकी बेटी अनुराधा भसीन की ओर से चलाया जा रहा यह अखबार पहले भी विवादों में रहा है। 2020 में इसका श्रीनगर कार्यालय सील कर दिया गया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार ने कश्मीर टाइम्स को दो संपत्तियाँ आवंटित की थीं। एक कार्यालय के लिए और दूसरी वेद भसीन के निवास के लिए। 2015 में वेद भसीन की मृत्यु के बाद प्रशासन ने परिवार को आवास खाली करने का नोटिस दिया। अनुराधा भसीन ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अखबार का श्रीनगर कार्यालय ‘गैरकानूनी तरीके से बंद’ कर दिया।

इसके बाद 2023 में इसका डिजिटल संस्करण शुरू किया गया। भसीन और सह-संपादक और अनुसार अनुराधा के पति प्रबोध जम्वाल ने यह आरोप खारिज किया कि अखबार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देता है या अलगाववादी नैरेटिव चलाता है। असल में, यह अखबार कश्मीर के दोनों हिस्सों (LoC से अलग हुए हिस्से) की रिपोर्टिंग करता है और पाकिस्तान-प्रशासित हिस्से पर भी सवाल उठाता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनुराधा इस समय अमेरिका में हैं। SIA ने अनुराधा भसीन और उनके अखबार कश्मीर टाइम्स पर आरोप लगाया है कि वे जम्मू-कश्मीर के आसपास के इलाकों में अलगाव वादी और राष्ट्रविरोधी लोगों के साथ आपराधिक साजिश में शामिल हैं। SIA उनसे पूछताछ कर सकती है।

गौरतलब है कि 10 नवंबर को दिल्ली के लालकिले के पास हुए बड़े कार धमाके की जाँच चल रही है। इस जिहादी आतंकी हमले में 13 लोग मारे गए थे। हमले का मुख्य आरोपी डॉ. उमर-उन-नबी था, जो कट्टरपंथी डॉक्टरों और मौलवियों के ‘व्हाइट कॉलर’ मॉड्यूल का हिस्सा था। इस दौरान कश्मीर टाइम्स पर कार्रवाई हो रही है।

अधिकारियों के अनुसार यह मॉड्यूल बड़े आतंकी हमलों की योजना बना रहा था। जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े कई डॉक्टरों से लगभग 3000 किलो विस्फोटक और हथियार बरामद किए गए। यह मॉड्यूल हमास की शैली में हमला करने की तैयारी कर रहा था। ऐसा ही हमला अक्टूबर 2023 में इजरायल पर हुआ था।

अनुराधा ने पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक समय बिताया है और खुद को ‘स्वतंत्र पत्रकारिता’ की आवाज बताती हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई फेलोशिप हासिल की हैं और कश्मीर संघर्ष पर लिखती रही हैं।

किन विवादों का हिस्सा रहीं अनुराधा भसीन

2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जब केंद्र सरकार ने सुरक्षा कारणों से कम्यूनिकेशन (संचार) बंदी लागू की तो अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ कदम’ माना गया और इससे से भी जाहिर हुआ कि वे अलगाववादियों की भाषा बोल रही हैं।

पहलगाम हमले के बाद भसीन का तर्क दिया कि हर आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानने की घोषणा करके भारत सरकार ने युद्ध की सीमा को कम कर दिया है और पाकिस्तान को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया। भसीन का कहना था कि मोदी सरकार ‘आतंकी हमलों पर फलती-फूलती है’।

17 नवंबर 2025 को अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान-समर्थित और इस्लामी मानसिकता से भरा हुआ एक लेख लिखा। इसका शीर्षक था- ‘Inventing an Enemy Within: ‘White Collar Hate’ to Combat ‘White Collar Terror’’। इस लेख में भसीन ने तर्क दिया कि दिल्ली धमाके के बाद ‘व्हाइट कॉलर टेररिज्म’ के नाम पर सभी मुसलमानों के खिलाफ इस्लामोफोबिया फैलाया जा रहा है।

भसीन ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार दिल्ली हमले के बाद जनता के गुस्से को निकालने के लिए एक खलनायक खड़ा करना चाहती है। इसीलिए मुसलमानों और खास तौर पर पढ़े-लिखे मुसलमानों को भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है।

अनुराधा भसीन ने पाकिस्तान की फौज की बड़ाई करने से नहीं थकतीं। अपने लेख में उन्होंने यह भी कहा कि भारत को पता है कि दुनिया साउथ एशिया में परमाणु टकराव नहीं चाहती। साथ ही पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को भी कम करके नहीं आँका जा सकता।

फरवरी 2024 में अनुराधा भसीन ने कारवां इंडिया का एक प्रोपेगेंडा आर्टिकल साझा किया। इसमें दावा किया गया था कि भारतीय सेना अपने नागरिकों को प्रताड़ित करती है और फिर उनकी हत्या करती है।

कश्मीर टाइम्स पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर को ‘पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू और कश्मीर’ कहता है। अपनी रिपोर्ट्स में अखबार कभी ‘PaJK’ लिखता है या फिर लिखता है, “भारत इसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहता है।”

अनुराधा भसीन अक्सर UAPA के खिलाफ आवाज उठाती हैं। वह इसे असहमति की आवाज को दबाने का हथियार कहती हैं। हालाँकि SIA की जाँच के बाद उन पर UAPA के तहत ही मामला दर्ज किया गया है। इसके बाद वामपंथी समूह अनुराधा भसीन के बचाव में उतर आया है।

US ने ईरानी तेल की तस्करी से जुड़े लोगों-कंपनियों पर लगाया बैन, चपेट में आए भारतीय भी: जानें क्या होता है शैडो फ्लीट, जिसके दम पर अमेरिकी प्रतिबंधों को ठेंगा दिखा रहा इस्लामी मुल्क

अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने हाल ही में ईरान के तेल नेटवर्क के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत उन फ्रंट कंपनियों और शिपिंग नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाए हैं जो ईरानी सशस्त्र बलों को कच्चे तेल की बिक्री से वित्तीय मदद पहुँचाते हैं। इनमें 17 वैश्विक कंपनियों और व्यक्तियों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिनमें भारत की एक शिपिंग कंपनी भी शामिल है।

असल में यह कार्रवाई अमेरिका की ईरान के खिलाफ लगातार बढ़ती दबाव नीति का हिस्सा है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों को रोकना है। सोचने वाली बात ये है कि ईरान के साथ डील अमेरिका के लिए इतनी बड़ी चिंता का विषय क्यों है।

अमेरिका ने पिछले समय में किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए और अमेरिका व पश्चिमी देशों की चिंता क्या है, आइए इसके बारे में सबकुछ विस्तार से जानते हैं।

अमेरिका की नई कार्रवाई के पीछे क्या है विवाद?

इजरायल के साथ हुई 12-दिन की जंग में हार के बाद ईरानी सेना अपने वार्षिक बजट को पूरा करने और कमजोर हो चुकी सेनाओं को फिर से खड़ा करने के लिए कच्चे तेल की बिक्री पर और अधिक निर्भर हो गई है।

इस कारण से अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने ईरान के ‘शैडो ऑयल नेटवर्क’ के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाए हैं। इस नेटवर्क के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में बेचता है और इससे मिलने वाली आय अपने परमाणु कार्यक्रम और सैन्य गतिविधियों के लिए इस्तेमाल करता है।

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस कार्रवाई पर कहा, “ये कार्रवाई अमेरिकी ट्रेजरी के उस अभियान का हिस्सा है जिसका मकसद ईरानी शासन को परमाणु हथियार विकसित करने और आतंकी संगठनों को समर्थन देने के लिए मिलने वाली फंडिंग को रोकना है। ईरानी शासन की आय को बाधित करना उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित करने के लिए बेहद जरूरी है।”

अमेरिका का दावा है कि ईरान के इस तेल नेटवर्क के जरिए उसके सैन्य बजट में भारी इजाफा हो रहा है। इजरायल के साथ जंग में ईरान की सेना को भारी नुकसान हुआ था जिसके लिए वह तेल बिक्री से आने वाले पैसों पर काफी अधिक निर्भर है।

इस नेटवर्क में ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ का अहम योगदान है। यह कंपनी अपने तेल को बेचने के लिए फ्रंट कंपनियों और शैडो फ्लीट यानी छिपे हुए जहाजों का इस्तेमाल करती है।

इन जहाजों के जरिए ईरान अपने तेल को दुनिया भर में भेजता है, जिससे उसकी आय बढ़ती है। अमेरिका ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए अब तक 170 से ज्यादा जहाजों पर प्रतिबंध लगा चुका है।

शैडो फ्लीट क्या है?

शैडो फ्लीट को डार्क फ्लीट भी कहा जाता है। ये ऐसे टैंकरों और सहायक जहाजों का समूह है जो धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीकों पर निर्भर रहते हैं। इनका मकसद होता है प्रतिबंधित या हाई रिस्क (उच्च-जोखिम) वाले माल को इस तरह ले जाना कि उसकी असली उत्पत्ति, मालिकाना हक या पहुँचने वाली जगह का नाम छिपा रहे।

2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह नेटवर्क तेजी से बढ़ा और इसके साथ ही एक नई कैटेगरी ‘ग्रे फ्लीट’ सामने आई। इसमें वे जहाज आते हैं जिनमें रूस से जुड़े जोखिम का पता भी चलता है, लेकिन उन पर अब तक औपचारिक रूप से प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

विंडवार्ड की ग्रे फ्लीट सूची उन जहाजों को बताती है जिनके पैटर्न रूस-संबंधी गतिविधियों से जुड़े होते हैं। इसमें मालिकाना हक में बदलाव, सामान्य से हटकर व्यापारिक मार्ग, या फिर उच्च-जोखिम वाले बंदरगाहों की सूची शामिल हो सकती है।

इन जहाजों को यूँ ही असुरक्षित नहीं माना जाता, बल्कि सूची में शामिल होने का मतलब है कि इनके साथ व्यापार करने से पहले अतिरिक्त जाँच, दस्तावेजों की पुष्टि और सावधानी बरतनी जरूरी है।

ग्रे फ्लीट में शामिल होना एक गतिशील मॉडलिंग प्रक्रिया है जो जहाजों के व्यवहार पर आधारित होती है, न कि किसी कानूनी निर्णय पर। यह समय के साथ बदलती रहती है- जैसे-जैसे जहाजों का मालिकाना हक बदलता है, उनके व्यापारिक पैटर्न में भी बदलाव आता है और नए जोखिम संकेत सामने आते हैं।

शैडो फ्लीट किस तरह काम करता है?

शैडो फ्लीट में काम करने वाले जहाज अक्सर ऑटोमैटिक आईडंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) ट्रांसपोंडर को बंद कर देते हैं (AIS-off), जिससे उनकी लोकेशन और गतिविधि छुप जाती है। इस धोखाधड़ी वाले शिपिंग तरीके के तहत जब AIS बंद होता है तो जहाज ट्रैकिंग या रडार से गायब हो जाते हैं। इससे पोर्ट अथॉरिटी भी उन्हें आसानी से ढूंढ नहीं सकती।​

इसके अलावा अधिकतर शैडो फ्लीट में पुराने, रिटायर्ड या स्क्रैप के लिए नामित टैंकरों को नई-नई शेल कंपनियों के नाम पर खरीद लिया जाता है। इनकी मालिकाना जानकारी बदल दी जाती है या फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। ये अक्सर कमजोर रेगुलेशन वाले देशों जैसे पनामा, कुक आइलैंड्स, लाइबेरिया, आदि के झंडे (फ्लैग ऑफ कन्वीनियंस- flag of convenience) का इस्तेमाल करते हैं। एक ही जहाज बार-बार देश का झंडा बदल देता है, जिससे उसकी पहचान छुप जाती है।​

ये जहाज अफ्रीका, मिडिल ईस्ट या साउथ अमेरिका जैसे देशों के दूर- दराज इलाकों में एक दूसरे जहाज से माल लेते हैं। इसका मकसद होता है कागजों में ‘ऑरिजिन’ छुपाना ताकि माल का पता न चले कि वह ईरान, रूस या किसी और बैन वाले देश से आया है। यह प्रक्रिया भी कई बार AIS बंद करके की जाती है।​

इसके अलावा शैडो फ्लीट के तहत डॉक्यूमेंटेशन और पेपरवर्क में हेरफेर कर के भी माल को गंतव्य तक पहुँचाया जाता है। ऐसा दाखिल- खारिज, फर्जी रूट दिखाना, प्रमाणीकरण में जालसाजी और ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड को बदलकर किया जाता है ताकि इंश्योरर या बैंक को मालूम न हो कि तस्करी हो रही है।​

पहचान छुपाने के अन्य तरीकों में GNSS या GPS लोकेशन को स्पूफ करना, फर्जी IMO नंबर या MMSI नंबर बनाना और ‘जॉम्बी’ जहाजों की पहचान अपनाना यानी पुराने-रिटायर्ड जहाजों की एन्ट्री फिर शुरू करना शामिल होता है।

शैडो फ्लीट में अधिकतर जहाज 20-30 साल पुराने होते हैं, जो आमतौर पर पश्चिमी बेड़े से रिटायर हो चुके होते हैं। इनकी तकनीकी हालत खराब होती है, रखरखाव कम होता है, और पर्यावरणीय खतरे जैसे तेल रिसाव या दुर्घटनाएं बहुत बढ़ जाती हैं।​

ऐसा ज्यादातर इसलिए होता है कि इन जहाजों का कोई भरोसेमंद इंश्योरेंस नहीं होता। पारंपरिक इंश्योरेंस कंपनियां इन्हें कवर ही नहीं करती हैं। अगर हादसा या दुर्घटना हो जाती है तो इंटरनेशनल अथॉरिटीज के लिए नुकसान की भरपाई बहुत मुश्किल हो जाती है।​

इनमें कमजोर टेक्नीकल निगरानी, खराब मेंटेनेंस, और अफसरों की सुरक्षा जोखिम बहुत अधिक होती है।​ इसमें आर्थिक और सुरक्षा खतरे भी हैं। यह पूरी प्रक्रिया न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की अवहेलना है बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कानूनी व व्यापारिक व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा पैदा करती है।​

इसके अलावा ब्याज, इंश्योरेंस और डॉक्युमेंटेशन फर्जी होने की वजह से बैंकों, ट्रेडर्स और देशों को अप्रत्याशित कानूनी और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।​

भारतीय कंपनी पर प्रतिबंध क्यों लगा?

अमेरिका ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को भारत के दो कारोबारियों और उनकी कंपनियों जैर हुसैन और जुल्फिकार हुसैन के साथ उनकी कंपनी ‘RN Ship Management Private Limited’ को भी प्रतिबंधित किया है। यह कंपनी ईरान की सेपेहर एनर्जी जहान के लिए कई जहाजों का ऑपरेशन करती थी, जिनमें से एक जहाज ‘SOBAR’ भी था।

अमेरिका का आरोप है कि यह कंपनी ईरान के तेल नेटवर्क को सपोर्ट कर रही थी, जिससे ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड मिल रहा था। इसलिए अमेरिका ने इस कंपनी और उसके नेताओं पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।

इसके अलावा, यूएई, पनामा, ग्रीस, जर्मनी और बल्गेरिया की कई कंपनियों और व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें Luan Bird Shipping Service L.L.C, Mars Investment L.L.C, Loire Shipping Inc., Altomare S.A., Moon Line Plastics and Raw Materials Trading L.L.C, Alsafeenah Althahabya Ship and Boats Spare Parts and Components Trading L.L.C, BPT Berlin Petroleum Trading GmbH, Shandong Independent Energy Trading DMCC शामिल हैं।

अमेरिका के प्रतिबंधों में कई व्यक्तियों के नाभी शामिल हैं। इनमें Hamidreza Heidari, Mohammad Moloudi, Kaveh Rostami Zahabi, Ahmad Ghaedi, Sayyed Mojtaba Hosseini, और Penka Ivanova Madzharska का नाम लिखा है। ये सभी ईरान के तेल नेटवर्क के लिए फ्रंट कंपनियों, जहाजों और लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के जरिए आय जुटाने में मदद कर रहे थे।

अब तक किन-किन संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए?

अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें कुछ कंपनियाँ इस तरह हैं:

  • ईरान की सेना के तेल बिक्री विंग ‘सेपेहर एनर्जी जहान’ और उसकी फ्रंट कंपनियाँ।
  • ईरान की एयरलाइन ‘महान एयर’ और उसकी सब्सिडियरी ‘याजद इंटरनेशनल एयरवेज कंपनी’। यह एयरलाइन ईरान के आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल की जाती थी।
  • ईरान के तेल नेटवर्क से जुड़ी कई शिपिंग कंपनियाँ और जहाज।
  • ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी कई वैज्ञानिक और तकनीकी कंपनियाँ।

ट्रंप प्रशासन अब तक 170 से अधिक जहाजों को प्रतिबंधित कर चुका है। फरवरी और मई 2025 में भी कई कंपनियों और जहाजों को ब्लैकलिस्ट किया गया था। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।

ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट से अमेरिका और पश्चिमी देशों को चिंता क्यों है?

ईरान अपने परमाणु प्रोजेक्ट को हमेशा से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बताता आया है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ ऊर्जा उत्पादन और मेडिकल रिसर्च के लिए है। ईरान ने कई बार दावा किया है कि वह परमाणु हथियार नहीं बना रहा है और उसका लक्ष्य सिर्फ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है।

हालाँकि, अमेरिका और पश्चिमी देशों को ईरान के परमाणु प्रोजेक्ट पर भरोसा नहीं है। उनका दावा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के जरिए परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है।

अमेरिका और यूरोपीय देशों को चिंता है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकता है। ईरान पहले से ही लेबनान के हिज्बुल्लाह, यमन के हूती विद्रोहियों और सीरिया में असद सरकार को समर्थन देता है। परमाणु हथियार मिलने पर इन समूहों की ताकत और बढ़ सकती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा को बड़ी समस्या का सामना करना होगा।

अमेरिका का मानना है कि अगर ईरान को परमाणु हथियार मिल गए तो वह न केवल अपने पड़ोसी देशों के लिए खतरा बन जाएगा, बल्कि पूरे विश्व के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है।

इसके अलावा, अमेरिका को यह भी चिंता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से मिलने वाली तकनीक और ज्ञान का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों को सपोर्ट करने के लिए कर सकता है। इसलिए अमेरिका और पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगा रहे हैं।

इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके। इसके अलावा, अमेरिका ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश कर रहा है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके।

ट्रंप प्रशासन की रणनीति में ईरान को रोकने के लिए क्या है?

ट्रंप प्रशासन ने ईरान को रोकने के लिए ‘मैक्सिमम प्रेशर’ यानी दवाब नीति अपनाई है। इस नीति के तहत अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लगातार प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से इतना कमजोर करना है कि वह अपने परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को आगे न बढ़ा सके।

अमेरिका ने अपने सहयोगियों से भी ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की अपील की है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अगर दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट हो जाएँ तो ईरान को रोका जा सकता है।

ट्रंप प्रशासन ने ईरान के तेल नेटवर्क को भी तोड़ने की कोशिश की है, ताकि ईरान को परमाणु और सैन्य गतिविधियों के लिए फंड न मिल सके। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिश की है।

इस विवाद का असर केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत जैसी कंपनियाँ भी प्रभावित होती हैं जिन्हें ईरान से जुड़ी गतिविधियों के कारण प्रतिबंध झेलना पड़ता है। तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ती है क्योंकि ईरान दुनिया के बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। इसके अलावा प्रतिबंध से मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है जिससे वैश्विक शांति और सुरक्षा को खतरा होता है।

निष्कर्ष

ईरान के साथ तेल डील करने वाली कंपनियों पर अमेरिका के प्रतिबंध इस बात का संकेत हैं कि अमेरिका ईरान के परमाणु और सैन्य कार्यक्रमों को रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

अमेरिका का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से पूरे विश्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए वह ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए लगातार प्रतिबंध लगा रहा है। ट्रंप प्रशासन का भले ही मानना हो कि दुनिया भर के देश ईरान के खिलाफ एकजुट होकर उसे रोक सकते हैं, लेकिन अभी तक यह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

दुख-दर्द-पीड़ा… माड़वी हिड़मा के एनकाउंटर से The Wire का सब निकला बाहर, लाल आतंकी को वामपंथी पोर्टल बताने में जुटा ‘आदिवासियों का Hero’

भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा को आखिरकार सोमवार (18 नवंबर 2025) को ढेर कर गिया गया। उसे आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले के मारेडुमिल्ली जंगल में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया। उसके साथ उसकी पत्नी मड़कम राजे (राजक्का) और चार अन्य माओवादी भी मारे गए।

हिड़मा पर केंद्र और राज्य सरकारों ने कुल 1 करोड़ रुपए से ज्यादा का इनाम घोषित किया था। वह माओवादी संगठन की सेंट्रल कमिटी का सबसे युवा सदस्य था और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमिटी (DKSZC) का सचिव भी बना दिया गया था। पिछले दो दशकों में उसने 26 बड़े हमलों की कमान संभाली, जिनमें सैकड़ों सुरक्षा बलों के जवान और निर्दोष आदिवासियों की मौतें हुई।

लेकिन वामपंथी प्रोपेगैंडा मशीन के रूप में कुख्यात वेबसाइट ‘द वायर हिंदी’ ने हिड़मा की मौत पर गुरुवार (20 नवंबर 2025) को एक आर्टिकल पब्लिश किया, जिसकी हेडलाइन थी- “मोस्ट वांटेड या आदिवासी नायक? माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा के अंतिम संस्कार के लिए उमड़े लोग”। इस आर्टिकल में हिड़मा को पुलिस दस्तावेजों में ‘मोस्ट वांटेड नक्सली’ बताने के बावजूद उसे ‘आम लोगों के लिए हीरो’ करार दिया गया, जिसने ‘जल-जंगल-जमीन के लिए हथियार उठाया था’।

इस आर्टिकल में ग्रामीणों के वायरल वीडियो, सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान जैसे विवादित एक्टिविस्ट्स के बयान छापकर यह नैरेटिव बनाया गया कि हिड़मा कोई आतंकवादी नहीं, बल्कि आदिवासियों का रक्षक था और उसकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई।

यह लेख न सिर्फ तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है, बल्कि एक खूंखार हत्यारे को महिमामंडित करने की घिनौनी कोशिश है। आइए, द वायर के इस लेख के हर दावे को तथ्यों की कसौटी पर कसते हैं और देखते हैं कि द वायर जैसा वामपंथी संस्थान कैसे लाल आतंक को ग्लैमराइज कर रहा है।

हिड़मा कोई ‘नायक’ नहीं बल्कि एक क्रूर हत्यारा था

द वायर का आर्टिकल हिड़मा को “आदिवासियों का हीरो” बताता है, जो जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ा। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवर्ती गाँव का रहने वाला एक अनपढ़ (केवल सातवीं तक पढ़ा) युवक था, जो 1994-95 में महज 17 साल की उम्र में माओवादी संगठन में शामिल हो गया। वह माओवादियों की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर था। उसकी बटालियन माओवादियों की सबसे क्रूर और हथियारबंद इकाई मानी जाती है।

हिड़मा पर आरोप है कि उसने कम से कम 26 बड़े हमलों की कमान संभाली या उनमें प्रमुख भूमिका निभाई। इसमें से कुछ बड़े हमलों के बारे में जान लीजिए-

दंतेवाड़ा (ताड़मेटला) हमला: माओवादियों ने 6 अप्रैल 2010 को घात लगाकर CRPF की 76 जवानों की जान ले ली। यह भारत में माओवादी हिंसा का सबसे बड़ा हमला था। हिड़मा की बटालियन ने इसे अंजाम दिया था।

झीरम घाटी हमला 2013: कॉन्ग्रेस की परिवर्तन रैली पर लाल आतंकियों ने हमला किया था। उस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, पूर्व मंत्री महेंद्र कर्मा समेत 27 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले से कॉन्ग्रेस का लगभग पूरा राज्य नेतृत्व ही साफ हो गया था। कुख्यात नक्सल आतंकी हिड़मा ही इसका मास्टरमाइंड था।

सुकमा में साल 2017 में 2 हमले: हिड़मा के नेतृत्व में वामपंथी आतंकियों ने अप्रैल 2017 में सीआरपीएफ की टीम पर हमला किया था, जिसमें 25 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई थी। वहीं, मार्च 2017 के हमले में 12 जवानों को वीरगति मिली थी।

सुकमा-बीजापुर हमला 2021: वामपंथी आतंकियों के इस हमले में 22 जवानों को वीरगति प्राप्त हुई।

इनके अलावा दर्जनों छोटे-बड़े हमले, वसूली, आदिवासियों को ‘पुलिस मुखबिर’ बताकर मारना, गाँवों को जलाना… यह सब हिड़मा का ‘कारनामा’ था। वह विरोधी आदिवासियों को क्रूरता से मारता था, महिलाओं का अपहरण करता था और जंगलों में अपना साम्राज्य चलाता था। क्या यही ‘जल-जंगल-जमीन’ की लड़ाई है? यह तो शुद्ध आतंकवाद है, जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ित आदिवासी ही हुए हैं।

हिड़मा की माँ ने कुछ दिन पहले ही उससे सरेंडर करने की अपील की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर अंत तक उसे खत्म करने की डेडलाइन दी थी। लेकिन हिड़मा ने सरेंडर का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उसे हथियारों की ताकत पर ही भरोसा था। ऐसे में वो आँध्र की ओर भाग गया, जहाँ नक्सलियों के अन्य सुरक्षित ठिकाने हैं, लेकिन सुरक्षा बलों ने उसे ढेर कर दिया।

लाल आतंकियों के पक्ष में फेक नैरिटव चला रहा है द वायर

द वायर का लेख पूरी तरह एकतरफा है। इसे इन बातों से समझ सकते हैं-

जिस गाँव में हिड़मा दशकों से नहीं आया, उसे दिखाया शोकग्रस्त: ग्रामीणों के वीडियो दिखाकर कहा गया कि पूरा गाँव शोक मना रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि हिड़मा ने दशकों से गाँव में कदम नहीं रखा था। वह डर के कारण गाँव नहीं आता था, क्योंकि उसके अपने ही इलाके में कई आदिवासी उसके खिलाफ थे। जो वीडियो वायरल हैं, उनमें कुछ महिलाएँ और बच्चे रो रहे हैं। ये दृष्य हर किसी के लिए स्वाभाविक है। जाहिर सी बात है कि जो भी मरा, वो भी किसी का बेटा, किसी का भाई और किसी का पति था ही न… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा बस्तर उसे हीरो मानता है।

बस्तर के आईजी पी. सुंदरराज ने साफ कहा था, “शव के साथ बेसिक इंसानियत बरती जाएगी, लेकिन इसे शहीद समारोह नहीं बनने देंगे।” इसलिए इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात थे, मोबाइल नेटवर्क बंद था। ऐसे में कौन खुलकर बोलता? जो लोग वीडियो में बोल रहे हैं, वे भी डर के मारे या पार्टी के दबाव में बोल रहे हैं। यही माओवादी स्टाइल है, जिसमें डर का राज चलाकर उसे ‘जन समर्थन’ बताया जाता है।

सोनी सोरी और डिग्री प्रसाद चौहान के बयान: सोनी सोरी खुद कई मामलों में आरोपी रही है और माओवादियों से कथित संबंधों के लिए जेल जा चुकी है। वह फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाती है, लेकिन कोई सबूत नहीं। चौहान भी ह्यूमन राइट्स के नाम पर माओवादियों का पक्ष लेते रहे हैं।

फर्जी मुठभेड़ का आरोप: लेख में कहा गया कि हिड़मा के साथ हमेशा सैकड़ों गार्ड रहते थे, तो सिर्फ 6 लोग कैसे मारे गए? सच्चाई यह है कि पिछले सालों में सुरक्षा बलों के लगातार ऑपरेशन से माओवादी संगठन कमजोर हो चुका है। हिड़मा भागते-भागते सिर्फ 5 लोगों के साथ रह गया था। मुठभेड़ में AK-47, डेटोनेटर और हथियार बरामद हुए। आंध्र प्रदेश पुलिस और छत्तीसगढ़ पुलिस ने साफ कहा कि यह असली मुठभेड़ थी।

द वायर ने हिड़मा के अपराधों को सिर्फ अंत में एक पैराग्राफ में डालकर कमतर दिखाया, जबकि पूरा लेख उसे ‘नायक’ बनाने में लगा है। यह स्पष्ट प्रोपेगैंडा है।

दिल्ली बैठकर माओवादियों की वकालत करती है लेखिका संतोषी मरकाम

यह लेख संतोषी मरकाम ने लिखा है। संतोषी द वायर हिंदी की नियमित लेखिका हैं, जो दिल्ली में बैठकर बस्तर, छत्तीसगढ़ और आदिवासी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करती हैं। उनके अधिकतर लेख आदिवासी अधिकारों, बंधुआ मजदूरी, मनरेगा और माओवादी प्रभावित इलाकों पर होते हैं। लेकिन इनमें हमेशा एक पैटर्न दिखता है – सरकार और सुरक्षा बलों को विलेन दिखाना, जबकि माओवादियों या उनके समर्थकों को पीड़ित या ‘संघर्ष करने वाला’ बताना। मुद्दा कोई भी हो, विलेन तो सरकार ही होनी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर इन बिंदुओं को देख सकते हैं-

वह बँधुआ मजदूरी पर लेख लिखती हैं, जहाँ छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को हरियाणा या जम्मू में फँसाया जाता है-यह सही मुद्दा है, लेकिन समाधान में कभी माओवादियों की भूमिका नहीं बताती, जो इन इलाकों में विकास नहीं होने देते।

आदिवासी संस्कृति पर लेख लिखती है, लेकिन मुख्यधारा की शिक्षा को आदिवासी संस्कृति के लिए खतरा बता देती है। जबकि आँकड़े बताते हैं कि जिन क्षेत्रों को नक्सलियों से मुक्त कराया गया, उनका तेजी से विकास हुआ।

माओवादी इलाकों में माइनिंग के खिलाफ लेख, जहाँ कॉर्पोरेट और सरकार को दोषी ठहराती हैं, लेकिन माओवादियों द्वारा माइनिंग रोकने के लिए की जाने वाली हिंसा पर चुप्पी साध लेती है।

संतोषी कभी ग्राउंड पर जाकर दोनों पक्षों की बात नहीं करतीं। वह चुनिंदा एक्टिविस्ट्स (जैसे सोनी सोरी) से बात करके अपनी पूर्वाग्रही राय को ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ का नाम दे देती हैं। यह दिल्ली से बैठकर ‘अर्बन नक्सल’ स्टाइल की पत्रकारिता है, जहाँ तथ्यों को तोड़-मरोड़कर वामपंथी नैरेटिव चलाया जाता है।

यहाँ से वो बैठे कर ये बता देती है कि नक्सलियों के संगठन में क्या चल रहा है और नक्सली अभी हथियार नहीं डाल रहे हैं। संतोषी की पकड़ तो देखिए, वो दिल्ली में बैठकर नक्सलियों की केंद्रीय और क्षेत्रीय कमेटियों के पदाधिकारियों के नाम भी बता रही है और चर्चित नक्सली प्रवक्ता ‘अभय’ के हथियार छोड़ने के प्रस्ताव को खारिज करने वाली रिपोर्ट लिखती है। इसमें रेफरेंस किन लोगों के होंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

अर्बन नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना है द वायर

द वायर शुरू से ही वामपंथी प्रोपेगैंडा का केंद्र रहा है। इसके फाउंडर एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन की पत्नी नंदिनी सुंदर खुद माओवादियों से सहानुभूति रखने के लिए जानी जाती हैं। द वायर के कई लेखक और कॉलमिस्ट खुले तौर पर माओवादियों का बचाव करते हैं, फर्जी मुठभेड़ के आरोप लगाते हैं और सुरक्षा बलों को बदनाम करते हैं।

ऑपइंडिया ने द वायर के प्रोपेगेंडा को कई बार बेनकाब किया है। जैसे-

यह सब जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी फंडिंग से चलने वाले नेटवर्क का हिस्सा है, जो भारत में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं।

लाल आतंक का सफाया जरूरी

हिड़मा की मौत माओवाद के लिए अंतिम कील साबित होगी। मार्च 2026 तक माओवाद खत्म करने का लक्ष्य अब करीब है। लेकिन द वायर जैसे पोर्टल और उनके लेखक अभी भी लाल आतंक को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे प्रोपेगैंडा को पहचानना और उसका मुंहतोड़ जवाब देना हर देशभक्त का कर्तव्य है। चूँकि हिड़मा कोई हीरो नहीं बल्कि वो सैकड़ों मासूमों की जान लेने वाला खूँखार हत्यारा था, जिसने जनआंदोलन की चादर ओढ़ रही थी। ऐसे में उसके खात्मे से बस्तर में शांति की राह खुलेगी।

‘कॉन्ग्रेस का देश विरोधियों से प्यार काहे नहीं खत्म होता है बे’: जिन बैश्लेट ने CAA, मुस्लिमों पर हमले से लेकर J&K तक पर भारत का किया ‘अपमान’, उन्हीं को दिया इंदिरा गाँधी सम्मान

एक कहावत है, ‘चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से न जाए’ यानी बुरी आदतों को कितना ही दबा-छिपा लिया जाए लेकिन वो बार-बार सामने आ ही जाती हैं। कॉन्ग्रेस से जुड़े इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा चिली की पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैश्लेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार’ देने का फैसला इसी कहावत को चरितार्थ करता दिखता है।

कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बुधवार (19 नवंबर 2025) को उन्हें खुद यह पुरस्कार दिया। इस दौरान सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट के ‘विश्व शांति’ के लिए किए गए कामों को भी याद किया है। सोनिया ने उनकी तारीफ में खूब कशीदे पढ़े और देश को नया रूप देने के लिए उनकी जमकर तारीफ भी की। हालाँकि, असल कहानी इससे आगे है।

बैश्लेट को सोनिया बेशक दुनिया की शांति का मसीहा बना रहे हो लेकिन भारत के लिए उनकी सोच हमेशा से विरोधियों वाली ही रही है। चिली के लिए बेशक उन्होंने कुछ भी किया हो लेकिन भारत की छवि को वैश्विक पटल पर खराब करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब पश्चिमी जगत और चीन की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले राहुल गाँधी को हो सकता है कि भारत विरोधी मानसिकता वाली बैश्लेट में ही क्रांति का मसीहा नजर आ रहा हो।

जम्मू-कश्मीर पर विवादित टिप्पणियाँ

बैश्लेट ने जम्मू-कश्मीर के बहाने भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, उन्होंने खूब कोशिश की कि किसी भी तरह भारत को दुनिया के सामने एक तानाशाह देश के रुप में पेश किया जा सके।

सितंबर 2020 में मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए उन्होंने भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा था, “भारत के कब्जे वाले कश्मीर में आम लोगों के खिलाफ मिलिट्री और पुलिस की हिंसा की घटनाएँ जारी हैं, जिसमें पेलेट गन का इस्तेमाल और मिलिटेंसी से जुड़ी घटनाएँ शामिल हैं। पॉलिटिकल बहस और पब्लिक पार्टिसिपेशन की जगह बहुत कम हो गई है।”

जिस भारत अनुच्छेद 370 जैसा बड़ा फैसला लेने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में हिंसा नहीं होने दी, उसे लेकर इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करना जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा था।

सितंबर 2021 में एक बार फिर बैश्लेट ने भारत विरोधी मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा, “जम्मू और कश्मीर में आम सभाओं पर अधिकारियों की रोक और समय-समय पर कम्युनिकेशन ब्लैकआउट जारी हैं जबकि सैकड़ों लोग अपनी बात कहने की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में हैं। पत्रकारों पर दबाव है और UAPA का गलत इस्तेमाल हो रहा है।” भारत ने तब भी बैश्लेट के इस प्रोपेगेंडा की जमकर आलोचना की थी।

बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार के चैंपियन असल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से तड़प रहे थे और चाहते थे कि किसी भी तरह यह साबित किया जा सके कि भारत अपने राज्यों को नहीं संभाल पा रहा है। हालाँकि, उनकी यह मेहनत रंग नहीं लाई और भारत ने पूरी मजबूती के साथ जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से जोड़ने का काम कर दिखाया।

FCRA पर अलापा अपना राग

भारत ने जब देश में एमनेस्टी इंटरनैशनल पर विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की तो बैश्लेट को इसमें भी दिक्कतें नजर आई थीं। उन्होंने FCRA को ही गड़बड़ बता दिया। यानी उन्होंने भारत को ये नसीहत देने की कोशिश की कि उन्हें किस तरह अपने नियम बनाने चाहिए। भारत के आंतरिक मामलों में मानवाधिकार प्रमुख का दखल देना क्या खुद में एक बड़ा सवाल नहीं है?

भारत ने बैश्लेट की बयानबाजी को खारिज कर दिया और बताया कि भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारत ने जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “कानून बनाने का अधिकार हमारा अपना है और मानवाधिकारों के नाम पर कानून के उल्लंघन को माफ नहीं किया जा सकता।”

CAA के खिलाफ कोर्ट में दी थी याचिका

भारत ने पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) लाई लेकिन इसके खिलाफ देशभर में खूब प्रदर्शन हुए। लोगों को झूठ फैलाकर खूब बरगलाया गया कि भारत में मुस्लिमों की नागिरकता इससे छिन जाएगी। लोगों को बरगाने वालों में बैश्लेट जैसे लोग शामिल थे।

मार्च 2020 में बैश्लेट ने अपने अधिकारियों के जरिए CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक डलवा दी थी। यह बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश ही थी। भारत ने तब भी बैश्लेट पर कड़ा पलटवार किया था। भारत ने कहा था, “CAA भारत का आंतरिक मामला है और भारतीय संसद के कानून बनाने के संप्रभु अधिकार से संबंधित है। हमारा विश्वास है कि भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी विदेशी पक्ष का कोई अधिकार नहीं है।”

किसान आंदोलन के दौरान भी आग में डाला घी

बैश्लेट ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान भी आग में घी डालने का काम किया था। आंदोलन को भड़काने की कोशिश के दौरान जब कथित एक्टिविस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई तो बैश्लेट ने भी अपने प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। बैश्लेट ने भारत की कार्रवाई को मानवाधिकार के सिद्धांतों के खिलाफ बताया था।

किसान आंदोलन की आड़ में जब 26 जनवरी पर हिंसा की कोशिश की जा रही थी, किसान आंदोलन की आड़ में कुछ दंगाई देश को हिंसा की आग में झोंकना चाहते थे और भारत ने उस पर कार्रवाई की तो बैश्लेट जैसे लोगों को दर्द शुरू हो गया। भारत ने तब भी उनकी कड़ी आलोचना की थी।

मुस्लिमों पर हमले को लेकर फैलाया अंतर्राष्ट्रीय प्रोपेगेंडा

दुनिया का एक वर्ग में मुस्लिमों का हितेषी बनने और उन्हें भारत में पीड़ित दिखाने की चाह में मुस्लिमों पर कथित आक्रमण का एक झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है। ना केवल मुस्लिमों बल्कि बैश्लेट ने तो एक कदम आगे जाकर दलित और आदिवासियों पर हमलों का भी आरोप भारत में लगाया था।

बैश्लेट के ऐसे इन सबके अलावा भी कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। साफ है कि बैश्लेट का विरोध सराकर या संस्था से आगे बढ़कर भारत को निशाने पर लेने के लिए था। चूँकि यही सब मुद्दे या इनसे जुड़े मुद्दे ही कॉन्ग्रेस को भी भाते हैं तो उन्होंने बैश्लेट में अपना नया दोस्त नजर आया होगा।

कॉन्ग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म?

भारत विरोधी मानसिकता रखने वाली मिशेल बैश्लेट के साथ कॉन्ग्रेस का इस तरह खुलकर खड़ा होना केवल एक संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग जैसा लगता है। कॉन्ग्रेस के लिए बैश्लेट कोई मानवाधिकारों की मसीहा नहीं हैं बल्कि वह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय चेहरा हैं जिनकी भारत-विरोधी टिप्पणियाँ मोदी सरकार को घेरने के लिए बार-बार इस्तेमाल की जाती रही हैं।

बैश्लेट को मंच देने का अर्थ यह भी है कि कॉन्ग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों पर भरोसा करती है जिन्हें भारत विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। कॉन्ग्रेस जिस बैश्लेट को शांति और निरस्त्रीकरण का सम्मान दे रही है, वही बैश्लेट भारत के आंतरिक और संवेदनशील मुद्दों को लेकर हमेशा एकतरफा टिप्पणियाँ करती रही हैं।

दिलचस्प यह है कि उनकी हर टिप्पणी ठीक उसी वक्त आई जब कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दल मोदी सरकार पर हमला कर रहे थे। चाहे अनुच्छेद 370 हटाने की बात हो, CAA का विरोध हो या किसान आंदोलन की आग को भड़काने का दौर, मौके पर बैश्लेट ने वही कहा जो भारत के विपक्षी दल अंतरराष्ट्रीय मंचों से सुनना चाहते थे। जब कॉन्ग्रेस उन्हें सम्मानित करती है, तो उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि मोदी सरकार की नीतियों और भारत पर हमला करने वालों को पुरस्कार देने जैसा लगता है।

यह वही राजनीति है जिसमें देश की छवि से बढ़कर अपना ‘नैरेटिव’ दिखाई देता है। असल बात यह है कि कॉन्ग्रेस को बैश्लेट में वह ‘आवाज’ दिखती है जो उनकी विचारधारा के अनुरूप भारत को कमजोर, विभाजित और हमेशा लड़ता हुआ दिखाने की कोशिश करती है।

बैश्लेट की टिप्पणी, चाहे वे कितनी भी झूठी या आधी-अधूरी क्यों न हों, वो कॉन्ग्रेस के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करती हैं। इसलिए उनका प्यार बैश्लेट जैसे भारत विरोधियों से कभी कम नहीं होता है।

देर से शादी, बच्चे भी नहीं, ‘एग्स फ्रीज’ कर लो… उपासना कोनिडेला जो ज्ञान लड़कियों को दे रहीं, उससे माँ और बच्चे दोनों का भविष्य होता है बर्बाद

अपोलो से जुड़ी और एक्टर राम चरण की पत्नी उपासना कोनिडेला ने महिलाओं को एग्स फ्रिज कर ‘जी लो अपनी जिंदगी’ टाइप-सी सलाह दी है। महिला सशक्तिकरण और आर्थिक आजादी से अलग एक महिला के लिए एक बच्चे को दुनिया में लाना इमोशनल शारीरिक-मानसिक मामला भी है। 45 साल की महिला अगर बच्चे को जन्म देती है, तो बच्चे के शारीरिक मानसिक विकास के साथ-साथ उसके जवान होने पर दुनिया में अकेला पड़ जाने का खतरा भी होता है।

ऐसी सलाह लड़कियों को देना सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचाने जैसा है। परिवार, जिसे बच्चों की पहली पाठशाला कहा जाता है, उसके भी खिलाफ है।

आर्थिक तौर पर बात की जाए तो एग फ्रीज करने और उससे बच्चे पैदा करने की पूरी प्रक्रिया में करोड़ों खर्च आते हैं। ये अभिजात्य वर्ग के चोचले हो सकते हैं, आम महिला इसे वहन नहीं कर सकती। अगर किसी ने हिम्मत भी दिखाई, तो इसकी कोई गारंटी नहीं कि बच्चा पैदा हो ही जाएगा। ऐसे में महिला के डिप्रेशन, एन्जाइटी होने का खतरा पैदा हो जाता है।

इसके अलावा डॉक्टर तो महिलाओं को 30 की उम्र तक बच्चा पैदा कर लेने की सलाह देते हैं। इससे बच्चे के स्वस्थ और सुरक्षित दुनिया में आने की संभावना ज्यादा होती है।

क्या कहा उपासना कोनिडेला ने

उपासना कोनिडेला ने अपने X हैंडल पर शेयर किए एक वीडियो में कहा, “महिलाओं के लिए सबसे बड़ा इंश्योरेंस अपने एग्स फ़्रीज़ करना है। क्योंकि तब आप चुन सकती हैं कि कब शादी करनी है, कब बच्चे पैदा करने हैं, अपनी शर्तों पर, कब आप फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हैं।”

कोनिडेला ने साथ वाली पोस्ट में कहा कि जब उन्होंने IIT हैदराबाद के स्टूडेंट्स से पूछा कि उनमें से कितने शादी करना चाहते हैं, तो महिलाओं से ज्यादा पुरुषों ने हाथ उठाए। उन्होंने लिखा, “महिलाएं ज़्यादा करियर-फोकस्ड लग रही थीं। यह नया—प्रोग्रेसिव इंडिया है।”

उनके इस सलाह पर डॉक्टरों से लेकर इन्फ्लुएंसर समेत कई लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सोशल मीडिया पर कोई उनका समर्थन कर रहा है तो कोई विरोध में खड़ा है। लेकिन इस बहस के हर पहलू पर बात करने से पहले हम जान लेते हैं कि एग फ्रीज करना होता क्या है?

क्या होता है एग्स फ्रीज करना ?

एग फ्रिजिंग एक तरीका है, जिसमें महिलाएँ अपने एग्स को निकालकर उसे अस्पतालों में फ्रीज करवा सकती है और भविष्य में माँ बनने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकती है। जब महिला अपने करियर या दूसरे कारणों से तत्काल माँ बनना नहीं चाहती हैं, लेकिन उन्हें भविष्य में बच्चा भी चाहिए, तो एग फ्रीज करवाती हैं। इसमें काफी खर्च आता है और फ्रीज एग से बच्चे पैदा हो ही जाएँ, इसकी गारंटी नहीं होती। हर महिला का शरीर अलग होता है और उसकी हार्मोनल स्थिति भी अलग होती है।

25-30 साल मानी जाती है एग फ्रीज करने की ‘बेस्ट एज’

एक तो ये प्रक्रिया बहुत शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट देने वाली है। जब एग फ्रीज किया जाता है तो उससे पहले महिला को कई तरह के हॉर्मोन्स एक्टिव करने वाली दवाएँ और इंजेक्शन पड़ते हैं, इसका असर महिला के शरीर पर पड़ता है।

डॉक्टर के मुताबिक, “महिला की फर्टिलिटी बीस की उम्र में सबसे ज़्यादा होती है, तीस की उम्र में कम होती है और 35 के बाद तेजी से गिरती है। एग फ़्रीज़ करना कोई गारंटी नहीं है। यह एक जुआ है जिसमें सक्सेस रेट कम है।”

अगर कोई महिला अपने एग्स फ्रीज भी कर लेती है, तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इससे सफल एम्ब्रियो ट्रांसफर और सफल प्रेग्नेंसी होगी। जैसे-जैसे महिला की उम्र बढ़ती है, कई हेल्थ फैक्टर्स होते हैं जो सफल एम्ब्रियो ट्रांसफर और इम्प्लांटेशन को रोकते हैं।

इसके अलावा ये काफी महँगी प्रक्रिया है। इसके लिए शारीरिक-मानसिक और आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी है। साथ ही ये भी सच है कि ये एक तकनीक है, नेचुरल प्रक्रिया नहीं। एग निकालने के दौरान छोटी सी सर्जरी होती है। हालाँकि अब बड़े-बड़े अस्पतालों में सुरक्षित तरीके से एग फ्रीज कर लिया जाता है। इसके बाद जब आप बच्चा चाहते हैं तो अस्पताल उसे पिघलाता है। और आईवीएफ के लिए उपयोग लायक बनाता है।

एग फ्रीज करने की बेस्ट उम्र 25 से 30 साल मानी जाती है। इसे 10 से 15 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यानी 25-30 साल में आप माँ नहीं बनना चाहती हैं, तो 40-45 साल तक माँ बन सकती हैं। ये तो हुई मेडिकल तकनीक, जिससे आप बच्चे पैदा करने की ख्वाइश पूरी कर सकती हैं। लेकिन एक महिला जो अकेले बच्चे को पैदा करना और संभालना चाहती हैं, वह 40-45 साल में माँ बन गई तो कैसे उसकी परवरिश करेगी। इसके अलावा अधिक उम्र में माँ बनने से कई बीमारियों के होने का खतरा होता है।

40-45 की उम्र में माँ बनना कितना मुश्किल?

40 साल के बाद शारीरिक रूप से महिला कमजोर होने लगती है। उसका गर्भाशय बच्चे को 9 महीने तक संभालने की स्थिति में है या नहीं, ये भी काफी महत्वपूर्ण है। अगर दवाईयों और डॉक्टरों की मदद से उसने बच्चे को जन्म दे भी दिया, फिर उसे फीड करना, उसकी देखभाल करना आसान नहीं होता। 40 साल के बाद महिलाओं का शरीर कमजोर पड़ने लगता है। हड्डियाँ को मजबूत करने के लिए डॉक्टर कैल्शियम और विटामिन की गोलियाँ खाने की सलाह देने लगते हैं। ऐसे में बच्चे के पीछे दौड़ना, उसे गोद में उठाना, उसकी अच्छी तरह देखभाल करना आसान नहीं है।

जब बच्चा स्कूल जाने लगता है तो उसके मन में कई सवाल पैदा होते हैं। वह घर पर खुद को अकेला महसूस करने लगता है। इस वक्त उसे पिता की कमी महसूस होती है। जाहिर है माँ कामकाज के लिए बाहर जाएँगी। ऐसे में बच्चे दोस्तों के साथ वक्त गुजारने की कोशिश करते हैं। बच्चा गलत संगत में भी पड़ सकता है।

बच्चे के लिए जीवन ‘एक मुश्किल सफर’ न बन जाए

बच्चा जब स्कूल से कॉलेज में जाने की उम्र में आता है, तब माँ 60 पार कर चुकी होती हैं। रिटायर होकर घर पर बच्चे के साथ होती हैं। लेकिन इस उम्र में बच्चे को गाइड करने वाले के साथ-साथ ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उसकी पीढ़ी को समझता हो। करियर में सहायक हो और उसकी भविष्य की योजना तैयार करने में मददगार हो। माँ के लिए ये काम आसान नहीं होता। न पिता, न भाई-बहन और न दूसरे रिश्तेदार, बेचारा बच्चा अपने आप में सिमट कर रह जाता है।

जब बच्चा करियर बनाने और शादी की उम्र में आए, तो माँ शायद दुनिया में भी नहीं रहे। क्या दुनियादारी के बीच बच्चे को सामाजिक, मानसिक, आर्थिक हर दृष्टि से अकेला छोड़ देना सही है। ऐसा नौजवान, जिसका दुनिया में कोई नहीं, आखिर वह जाए तो जाए कहाँ। अपने इमोशन को किसके साथ शेयर करे। अगर भविष्य को लेकर कोई फैसला लेना हो, तो किससे पूछे? अगर बच्चे को अपने पिता के बारे में भी पता हो। फिर भी बच्चा हर हाल में अकेला ही रहेगा।

खुद के लिए बच्चे के साथ ‘अन्याय’ न करें

जब कोई महिला ये फैसला लेती है कि उसे शादी नहीं करनी है, तो ठीक है। अगर कोई महिला फैसला लेती है कि उसे शादी करनी है, लेकिन बच्चे पैदा नहीं करना। ये भी चलता है। लेकिन, जानबूझ कर जब महिला अपने जीवन की स्वतंत्रता और आर्थिक सफलता पा जाने के बाद बच्चे पैदा करती है, तो न केवल वह उस बच्चे के साथ अन्याय कर रही है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुँचा रही है।

अपने मन मुताबिक खुद की जिंदगी जीने की आजादी सबकी है। आर्थिक और सशक्तिकरण के लिए पूरी कोशिश करें, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति की ‘कीमत’ पर नहीं, जो कि आपका बच्चा है।

लाखों खर्च करने के बाद भी सफलता की गारंटी नहीं

डॉक्टरों का मानना है कि अगर आप करोड़पति हैं और करोड़ों रुपए खर्च करने की स्थिति में हैं, तो ये रिस्क लिया जा सकता है। उनका मानना है कि एग फ्रीजिंग की सलाह देना आसान है लेकिन उसके खर्च को वहन करना उतना ही मुश्किल।

पिछले 30 सालों से गायनोकॉलोजिस्ट के रूप में काम कर रहे डॉक्टर राजेश पारिख ने कहा, “जब आपके बैंक में करोड़ों रुपए हों, तो एग फ़्रीज़िंग पर सलाह देना बहुत आसान है। IVF में हर साइकिल का खर्च लाखों में आता है। एग फ़्रीज़िंग में लाखों पहले से लगते हैं और सालाना स्टोरेज चार्ज भी। उपासना की सलाह सुनने वाली ज्यादातर जवान औरतें एक कोशिश भी नहीं कर सकतीं।”

गायनेकोलॉजिस्ट के मुताबिक, उन्होंने अपने जीवन में कई ऐसे कपल्स देखे हैं, जिनका आईवीएफ सफल नहीं हो पाया। ये कपल्स लगातार फेल हो रहे आईवीएफ के साइकिल, निराशा और बढ़ते बिलों के कारण रोते हुए मिले।

सोशल मीडिया पर हो रही बहस

उपासना कोनिडेला ने 17 नवंबर 2025 को X पर अपनी पोस्ट शेयर की। 18 नवंबर तक 108,000 से ज्यादा बार देखी गईं। महिला सशक्तिकरण के नाम पर कुछ लोगों ने इसकी तारीफ की, वहीं बायोलॉजिकल और आर्थिक पहलू को लेकर सवाल उठाए गए।

कुछ लोगों ने यहाँ तक आरोप लगाया कि अपोलो हॉस्पिटल्स में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की वाइस चेयरपर्सन उपासना ने अपोलो अस्पताल की नींव रखी थी। सभी जानते हैं कि अपोलो अस्पताल में एग फ्रीज जैसी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में कहा जा रहा है कि उपासना ने जानबूझ कर अस्पताल को फायदा पहुँचाने और बाजार बढ़ाने के लिए ‘एग्स फ्रीज’ जैसे मुद्दों पर बात की। दरअसल उपासना ने खुद का उदाहरण देते हुए बातें कही थी।

कौन हैं उपासना कोनिडेला

उपासना अपोलो हॉस्पिटल्स में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी की वाइस चेयरपर्सन और एक्टर राम चरण की पत्नी हैं। दोनों ने 2012 में शादी की थी। जब उपासना 34 साल की थीं तब 2023 में उनकी बेटी हुई। एक बार फिर राम चरण और उपासना जुड़वाँ बच्चों के स्वागत के लिए तैयार हैं। उपासना ने 23 अक्टूबर को इंस्टाग्राम पर दिवाली पोस्ट करके बताया कि वे प्रेग्नेंट हैं।

उपासना अपोलो जैसी फैमिली हेल्थकेयर एम्पायर का हिस्सा हैं। वह फैमिली हेल्थ प्लान इंश्योरेंस TPA लिमिटेड की मैनेजिंग डायरेक्टर के तौर पर भी काम करती हैं। वह अपोलो लाइफ की वाइस चेयरपर्सन हैं, जो अपोलो ग्रुप की एक वेलनेस-फोकस्ड ब्रांच है।

उन्होंने URLife शुरू किया, जो एक होलिस्टिक वेलनेस प्लेटफॉर्म है जिसका मकसद डिजिटल रिसोर्स के ज़रिए हेल्दी लाइफस्टाइल को बढ़ावा देना है। इसके अलावा उपासना बी पॉजिटिव मैगज़ीन की एडिटर-इन-चीफ भी हैं, जो अपोलो एम्पायर का ही पार्ट है।

‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकते’: SC ने प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सुनाया ऐतिहासिक फैसला, जानें- कोर्ट ने क्या-क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक (Unconstitutional) और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया।

सुप्रीम कोर्ट के ओपिनियन की शुरुआती लाइन (फोटो साभार: SC)

चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें

समय-सीमा तय करना असंवैधानिक: अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है।

डीम्ड असेंट का कॉन्सेप्ट खारिज: कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।

शक्तियों के बँटवारे पर सुप्रीम कोर्ट

राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर: अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक (Non-Justiciable) है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कॉपी

बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती: विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।

अनुचित देरी पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप संभव: यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए, तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए।

राज्यपाल के काम में दखल नहीं, सिर्फ निर्देश

राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प: मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा।

राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं: राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं, लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं।

संवाद और सहयोग जरूरी: संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था, जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर क्यों हुई सुनवाई?

बता दें कि मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे। राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए सवाल-

  1. जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?

राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में चली लंबी सुनवाई, केंद्र सरकार ने भी दी दलील

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें-

  • संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है।
  • राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती।
  • यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता।

तमिलानाडु मामले की वजह से बढ़ा विवाद

साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं।

  1. इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने-
  2. राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी।
  4. इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया

इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था।

अनुच्छेद 200 और 201 क्या कहते हैं?

अनुच्छेद 200: विधानसभा से पारित बिल राज्यपाल के पास जाता है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं- मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। पहली बार रोकने पर विधानसभा दोबारा विचार करके भेज सकती है, तब मंजूरी देनी ही पड़ती है।

कोर्ट के फैसले की कॉपी में अनुच्छेद 200 का रेफरेंस

अनुच्छेद 201: राज्यपाल से राष्ट्रपति को भेजा गया बिल राष्ट्रपति मंजूर कर सकते हैं, रोक सकते हैं या वापस भेज सकते हैं। इसमें समय-सीमा का कोई उल्लेख नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं। जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।

अमेरिका से जैवलिन मिसाइल और आर्टिलरी खरीद रहा भारत, US कॉन्ग्रेस ने मंजूर की $93M की डील: जानें- दुश्मन के टैंक से लेकर ठिकाने तक कैसे होंगे ध्वस्त

अमेरिका ने भारत के लिए 93 मिलियन डॉलर (लगभग 822 करोड़ रुपए) के रक्षा सौदे को मंजूरी दे दी है। इस पैकेज में भारत को 100 FGM-148 जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें, 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स (CLU) और 216 M982A1 एक्सकैलिबर प्रिसिजन-गाइडेड आर्टिलरी राउंड्स मिलेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डिफेंस सिक्योरिटी कोऑपरेशन एजेंसी (DSCA) ने अमेरिकी कॉन्ग्रेस को इसकी सूचना दे दी है। सौदे में ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स, लाइफसाइकल सपोर्ट, सिमुलेशन राउंड्स और तकनीकी सहायता भी शामिल है।

अमेरिका ने क्या कहा?

DSCA का कहना है कि यह सौदा न सिर्फ भारत की सैन्य क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी को भी और गहरा बनाएगा। एजेंसी के मुताबिक, ये हथियार भारत को मौजूदा और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों से निपटने, अपनी सीमाओं की बेहतर रक्षा करने और क्षेत्रीय खतरों को प्रभावी ढंग से रोकने में मदद करेंगे।

अमेरिका ने साफ किया है कि इस बिक्री से क्षेत्रीय सैन्य संतुलन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही, किसी ऑफसेट व्यवस्था की जानकारी नहीं है। ऐसा कोई समझौता भविष्य में भारत और निर्माता कंपनियों के बीच अलग से किया जा सकता है।

जेवलिन मिसाइल सिस्टम, जिसे आरटीएक्स और लॉकहीड मार्टिन संयुक्त रूप से बनाते हैं, पैदल सेना को लंबी दूरी पर बख्तरबंद लक्ष्यों को सटीकता के साथ निशाना बनाने की क्षमता देता है। एक्सकैलिबर आर्टिलरी राउंड्स की कीमत करीब 47 मिलियन डॉलर है, जिसे शामिल करने के बाद पूरी डील का मूल्य लगभग 93 मिलियन डॉलर तक पहुँचता है।

क्या है हथियारों की खासियत

FGM-148 जेवलिन एक आधुनिक, कंधे से दागी जाने वाली थर्ड-जेनेरेशन एंटी-टैंक मिसाइल है, जिसे RTX कॉरपोरेशन और लॉकहीड मार्टिन मिलकर बनाते हैं। यह मिसाइल टॉप-अटैक मोड में ऊपर से वार करती है, जहाँ किसी भी टैंक का कवच सबसे कमजोर होता है। इसके कारण यह दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को आसानी से निशाना बना लेती है।

जेवलिन में सॉफ्ट-लॉन्च तकनीक होती है, जिससे इसे इमारतों, बंकरों या किसी बंद जगह के अंदर से भी सुरक्षित तरीके से दागा जा सकता है। एक जैवलिन सिस्टम में एक डिस्पोजेबल लॉन्च ट्यूब और एक रीयूजेबल कमांड लॉन्च यूनिट (CLU) होती है। यह व्यवस्था सैनिकों को तेजी से मिसाइल तैनात करने और फायर करने में मदद करती है।

यह मिसाइल कई युद्ध क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर चुकी है, सबसे ज्यादा चर्चा यूक्रेन में हुई, जहाँ इसने बड़ी संख्या में रूसी T-72 और T-90 टैंकों को नष्ट किया। आज यह कई देशों की सेनाओं में सक्रिय रूप से इस्तेमाल की जा रही है।

वहीं Excalibur गोले भारतीय तोपखाने को GPS-आधारित बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता देते हैं। इससे पहले ही वार में लक्ष्य भेदने की संभावना बढ़ती है और अनचाहे नुकसान (collateral damage) कम होता है।

DSCA ने बताया है कि इस सौदे में प्राइमर, प्रोपेलेंट चार्ज, Portable Electronic Fire Control Systems (PEFCS), Improved Platform Integration Kit (iPIK), तकनीकी सहायता, डेटा, और मरम्मत सेवाएँ भी शामिल हैं।

जेवलिन मिसाइल: आधुनिक युद्ध की सबसे भरोसेमंद ATGM

जेवलिन को दुनिया की सबसे घातक एंटी-टैंक मिसाइल प्रणाली माना जाता है। इसकी लगभग 4 किमी की रेंज और 90% से अधिक की सफलता दर इसे खास बनाती है। इसका ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ फीचर सैनिक को लॉन्च के बाद तुरंत सुरक्षित स्थान बदलने की सुविधा देता है।

साथ ही इसका टॉप-अटैक मोड टैंकों को ऊपर से निशाना बनाता है, जहाँ उनकी सबसे कमजोर कवच परत होती है। इन खूबियों के कारण भारतीय सेना को दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ महत्वपूर्ण बढ़त मिलती है।

M982 Excalibur: प्रिसिजन आर्टिलरी का गेम-चेंजर

आर्टिलरी सिस्टम की वास्तविक ताकत उसकी मारक दूरी और वारहेड की क्षमता पर निर्भर करती है। Excalibur इन दोनों में बेहतरीन है। GPS-गाइडेंस के कारण यह सामान्य गोले की तरह बिखरकर नहीं गिरता, बल्कि बेहद सटीक बिंदु पर प्रहार करता है।

इसका हाई-एक्सप्लोसिव ब्लास्ट-फ्रेगमेंटेशन वारहेड मजबूत किलाबंदी, भूमिगत बंकर और मोटी कंक्रीट संरचनाओं को भी ध्वस्त कर सकता है। इसके अलावा, इसमें सेंसर-फ्यूज़्ड वारहेड का विकल्प मिलता है जो ऊपर से हमला करके टैंकों को नष्ट करता है।

क्लस्टर-टाइप बमलेट लगाने का विकल्प इसे बड़े क्षेत्र में नुकसान पहुँचाने में सक्षम बनाता है, खासकर दुश्मन की आर्टिलरी, सपोर्ट वाहनों और आगे बढ़ती टुकड़ियों के खिलाफ। सबसे खास बात यह है कि Excalibur छिपी हुई छोटी लेकिन खतरनाक टीमों, जैसे स्नाइपर, मशीन गन पोजिशन या ATGM लॉन्च टीम पर भी बेहद सटीक वार कर सकता है, जो आधुनिक युद्ध में निर्णायक साबित होता है।

राम मंदिर-बाबरी विवाद-बुलडोजर एक्शन, दिल्ली दंगे और भी बहुत कुछ: USCIRF की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’

हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है।

इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है।

इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी।

इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है।

USCIRF ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया

USCIRF रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो।

जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था।

पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा।

2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है।

क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है?

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना

यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके।

आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई।

शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था।

ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं।

बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना

USCIRF का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें।

इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे।

लेकिन USCIRF ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो।

धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार

USCIRF की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं।

इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं।

भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके।

हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है।

वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती।

गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी

यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है।

जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं।

लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं।

यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं

2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर।

यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है।

2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं

2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है।

2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है।

जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है।

वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है।

भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान

2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता।

ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।