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घर में भी घिरे जस्टिन ट्रूडो, कनाडा के पत्रकार ने कहा- भारतीय राजनयिक को हटाना पागलपन: नेटिजन्स ने बताया- आतंकवादी प्रेमी

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर मढ़ा है। इसके बाद से भारत ही नहीं, बल्कि कनाडा में भी ट्रुडो को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया में कनाडा के लोग भारत के साथ संबंध खराब करने का जिम्मेदार अपने प्रधानमंत्री को बता रहे हैं।

कैनेडियन पत्रकार डेनियल बोर्डमैन जस्टिन ट्रुडो के बयान और भारतीय राजनयिक को देश से हटाने के उनके फैसले से हैरान हैं। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि हरदीप सिंह निज्जर की मौत में भारत का हाथ होने को लेकर एक आंतरिक रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट की जाँच चल रही है। लेकिन इस रिपोर्ट के आधार पर भारतीय राजनयिक को हटाना पागलपन जैसा है।

पत्रकार बोर्डमैन ने यह भी लिखा कि ट्रुडो और उनकी टीम का यह व्यवहार पूरी तरह से बकवास है। उन्हें नहीं लगता कि पीएम ट्रुडो के इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रकार का लाभ मिलने वाला है। 

बता दें कि जस्टिन ट्रूडो के पैरोडी अकाउंट से भी पोस्ट शेयर किया गया है। इस पोस्ट में यूजर ने लिखा, “हमारी वोटिंग अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। इसलिए मुझे कनाडाई लोगों का ध्यान भटकाने के लिए एक नई समस्या पैदा करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि मेरी सरकार इस साल की शुरुआत में हुई एक सिख व्यक्ति की हत्या को लेकर भारत के साथ संबंधों के बारे में अचानक ही बड़ी-बड़ी बातें कर रही है। अगर लोग डरे हुए होंगे तो मुझे अधिक समर्थन मिल सकता है।”

पियरे नामक यूजर ने लिखा, “ट्रूडो प्रसिद्ध आतंकवादी प्रेमी है।”

‘ए किड फ्रॉम ब्रुकलिन’ नामक यूजर ने एक्स पर लिखा, “वह सिख वोटों लिए पूरी योजना बना रहे हैं। वे इस बात से चिंतित नहीं हैं कि मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और बदला लेने की बात की जा रही है।”

एक अन्य यूजर ने भारत के खिलाफ बयानबाजी को कनाडा के लिए नुकसानदेह होने का अंदेशा जताया। यूजर ने लिखा, “यह भारत-कनाडा संबंधों के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा। भारत एक उभरती हुई शक्ति है और मुझे नहीं लगता कि सहयोगी देश इन आरोपों पर कनाडा का पक्ष लेंगे।”

कैनेडियन सोशल मीडिया यूजर ने जस्टिन ट्रूडो पर इस तरह की बयानबाजी और राजनयिक को हटाने का फैसला आंतरिक मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए लेने का आरोप लगाया है। जेसन कुचिरका नामक यूजर ने लिखा, “मुझे लगता है कि यह सब ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है। मुझे हैरानी हो रही है।”

मैडी नामक यूजर ने लिखा कि ट्रुडो भारत के खिलाफ बयानबाजी कर कनाडा के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है मामला

दरअसल, खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून, 2023 को दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने भारत को दोषी ठहराते हुए भारतीय राजनयिक को निष्कासित कर दिया था। भारत ने इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कनाडाई राजनयिक को 5 दिन के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया है। चूँकि ट्रुडो के झूठे आरोपों से दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गए हैं। इसलिए कनाडा में ट्रुडो का विरोध हो रहा है।

जस्टिन ट्रूडो मतलब बिना घर-घाट का कुत्ता: खालिस्तानियों को साध रहे, मुस्लिमों से खा रहे गाली, महँगाई पर घर में लगी है आग, विदेशियों को दे रहे ज्ञान

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जून में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर मढ़कर यह दर्शा दिया है कि वह स्थानीय स्तर पर अपनी विफलताओं को अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से ढँकने का प्रयास कर रहे हैं।

ट्रूडो ने कनाडा में अपने विरोध को कम करने का प्रयास इस बात से किया है कि उनके देश में आ रही समस्याएँ अन्य देशों के कारण हैं ना कि उनकी स्वयं की विफलताओं के कारण। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि ट्रूडो वर्तमान में कनाडा में भारी विरोध का सामना कर रहे हैं।

बता दें कि कनाडा वर्तमान में महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत तमाम समस्याओं से जूझ रहा है जिसे सुलझाने में वह विफल हैं। हालाँकि, अपनी खत्म होती लोकप्रियता बचाने के लिए उन्होंने भारत से रिश्ते खराब करने का रास्ता चुना है ताकि उन्हें कनाडा के सिख वोट मिल सकें और साथ ही यह संदेश जाए कि वह कनाडा में अन्य किसी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे। इससे वह कनाडा की जनता के राष्ट्रवादी तबके का विश्वास जीतना चाहते हैं।

कनाडा के 63% नागरिकों को नहीं पसंद हैं ट्रूडो

हालाँकि, इन सब प्रयासों के बावजूद भी उनकी कनाडा में लोकप्रियता खत्म हो रही है। वह वर्ष 2015 से ही कनाडा के प्रधानमंत्री हैं और तबसे उनकी लोकप्रियता में तेज गिरावट आई है। दरअसल, जुलाई 2023 में किए गए एक सर्वे में यह सामने आया है 33% कनाडाई मानते हैं कि ट्रूडो बीते 55 वर्षों में कनाडा के सबसे बेकार प्रधानमंत्री हैं।

वहीं अप्रूवल रेटिंग्स के आधार पर यह भी स्पष्ट हुआ है कि वह अब कनाडाई नागरिकों को पसंद नहीं आ रहे हैं। ट्रूडो रैंकर के अनुसार, सितम्बर 2023 में उनकी डिसअप्रूवल रेटिंग 63% हो गई है। इसका अर्थ है कि वह 100 में से 63 कनाडाई नागरिकों को पसंद नहीं आ रहे।

महँगाई पर काबू पाने में विफल

उनकी लोकप्रियता घटने के कई कारण हैं। इसमें सबसे बड़ा कारण महँगाई है। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान कनाडा में महँगाई लगातार बढ़ी है। कनाडा के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, जुलाई 2018 में कनाडा में महँगाई दर (ऊर्जा कीमतों को छोड़ कर) 2.1% थी जो कि जुलाई 2022 में बढ़ कर 6.3% पहुँच गई।

कनाडा जैसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए यह महँगाई का काफी उच्च स्तर है। विकासशील देशों में जीडीपी को बढ़ाने के लिए सरकारें एक स्तर तक महँगाई को नियंत्रित नहीं करती लेकिन कनाडा विकसित है और यहाँ भाव अधिकांश समय स्थिर रहते हैं। ऐसे में यहाँ महँगाई का बढ़ना ट्रूडो की साख में बट्टा लगा रहा है।

कनाडा के सांख्यिकी विभाग की ही रिपोर्ट बताती है कि कनाडा की आबादी के 25% लोगों का कहना है कि वह मात्र $500 (41,635.50 रुपये) का भी कोई अधिक खर्चा नहीं झेल सकते। इसी सर्वे में यह भी बात सामने आई कि कनाडा की युवा जनसंख्या का आधा हिस्सा अपने महीने के खर्चे पूरे करने में समस्याओं का सामना कर रहा है।

ट्रूडो से मुस्लिम भी हैं गुस्सा

महँगाई के अतिरिक्त, ट्रूडो की वोक विचारधारा भी उनके लिए समस्याएँ खड़ी कर रही हैं। ट्रूडो लगातार अमेरिका की तरह ही कनाडा के स्कूलों में भी LGBT+ को प्रमोट कर रहे हैं। इसको लेकर स्कूलों में लाई गई उनकी नीतियाँ कनाडाई मुस्लिमों में उनकी छवि बिगाड़ रही हैं।

कनाडा में प्रदर्शन करते मुस्लिम अभिभावक (चित्र साभार: द गार्जियन)
कनाडा में प्रदर्शन करते मुस्लिम अभिभावक (चित्र साभार: द गार्जियन)

कनाडा के मुस्लिम अपनी मजहबी विचारधारा को ना बचाने के लिए ट्रूडो को मूर्ख करार दे रहे। मुस्लिम अभिभावक आरोप लगा रहे हैं कि ट्रूडो कनाडा के स्कूलों में बच्चों के ऊपर जबरन गे, लेस्बियन संबंधी पाठ्यक्रम थोप रहे हैं।

मुस्लिम अभिभावक इस बात की शिकायत ट्रूडो से कर चुके हैं लेकिन ट्रूडो ने इसे अमेरिकी दक्षिणपंथियों की साजिश बता दिया था। इस कारण से कनाडाई मुस्लिमों में ट्रूडो के प्रति और भी गुस्सा भरा हुआ है, वह स्कूलों के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं।

कनाडा में घरों की कमी को पूरा नहीं कर पाए हैं ट्रूडो

कनाडा में वह इस बात के लिए भी कड़ा विरोध झेल रहे हैं कि उन्होंने कनाडा में आवासीय समस्या को नहीं सुलझाया है। कनाडा में लम्बे समय से ही घरों की समस्या है। बाहर से आने वाले छात्र और अन्य परिवार भी कनाडा में घर नहीं ढूँढ पा रहे हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा को वर्ष 2030 तक 58 लाख नए घरों की आवश्यकता होगी लेकिन इस दिशा में कुछ ख़ास काम नहीं हो सका है। अनुमान के मुताबिक कनाडा में 2030 तक मात्र 23 लाख घर ही बन पाएँगे, अर्थात इस क्षेत्र में 35 लाख घरों की कमी होगी। अपनी इस विफलता को जस्टिन ट्रूडो ने स्वयं भी एक बातचीत के दौरान स्वीकार किया था।

गौरतलब है कि स्थानीय स्तर पर अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए अब ट्रूडो ने यह रास्ता अख्तियार किया है कि वह भारत की बुराई करके और खालिस्तानियों को संरक्षण देकर अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकें। हालाँकि, इससे ट्रूडो को कितना फायदा मिलेगा यह स्पष्ट नहीं है लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह एक नौसिखिए के रूप में देखे जा रहे हैं।

महिलाओं को 33% आरक्षण वाला बिल लोकसभा में पेश, एक तिहाई सीटें SC/ST के लिए होंगी रिजर्व: जानिए 27 साल तक कैसे लटका रहा

पीएम मोदी की सरकार ने मंगलवार (19 सितंबर, 2023) को गणेश चतुर्थी पर नए संसद भवन में राजनीति में महिलाओं के लिए एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। महिला आरक्षण बिल के मसौदे को पीएम ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के नाम से पेश किया। इससे देश की संसद सहित राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने की तस्वीर और साफ हो गई। लोकसभा में सरकार ने महिला आरक्षण बिल पेश किया।

मौजूदा लोकसभा सीटों के नए सिरे से परिसीमन के बाद महिला आरक्षण लागू होगा। महिला आरक्षण विधेयक, 2023 के मसौदे के मुताबिक, ये विधेयक मौजूदा सीटों के परिसीमन के बाद प्रभावी होगा। इसकी एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक, सोमवार (18 सितंबर, 2023) को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में मोदी कैबिनेट ने महिला आरक्षण बिल (WRB) को मंजूरी दे दी थी। ये बिल बीते 27 साल से अधर में लटका हुआ था। ये फैसला पब्लिक में तो नहीं आया था, लेकिन केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने एक्स हैंडल (पहले ट्विटर) पर इसे लेकर पोस्ट डाली थी। बाद में उन्होंने ये पोस्ट डिलीट कर दी थी।

हालाँकि, अब ये बिल संसद में पेश कर दिया गया है। इस पर चर्चा चालू है। इशारा साफ है कि संसद की पुरानी इमारत में शुरू हुआ और नई इमारत में 5 दिन का ये खास सत्र महिलाओं के लिए खास होने जा रहा है। आखिर ये महिला आरक्षण बिल क्या है और ये अभी तक देश की संसद में क्यों नहीं पास हो पाया, यहाँ हम आपको इसके बारे में हर छोटी- बड़ी बात बताने जा रहे हैं।

क्यों है महिला आरक्षण बिल जरूरी?

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और जल शक्ति राज्य मंत्री प्रह्लाद पटेल ने सोमवार को ‘X’ (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया था, “केवल मोदी सरकार में ही महिला आरक्षण की माँग को पूरा करने का नैतिक साहस था जो कैबिनेट की मंजूरी से साबित हुआ। नरेंद्र मोदी जी को बधाई और मोदी सरकार को बधाई।” बाद में उन्होंने ये पोस्ट डिलीट कर दी थी। अब प्रधानमंत्री ने खुद संसद में इसकी घोषणा की, जिसके बाद इसे टेबल किया गया।

हालाँकि, ये पहली बार नहीं है कि महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया जा रहा है। इससे पहले भी इस बिल को देश की संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन राजनीतिक दलों में आम सहमति न बन पाने की वजह से ये हर बार टलता रहा। पीएम मोदी ने पुराने संसद भवन में अपने आखिरी भाषण में इस बात के संकेत भी दिए थे कि देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी में कमी है।

उन्होंने कहा था कि आज़ादी के बाद से अब तक दोनों सदनों में 7500 से अधिक जन प्रतिनिधियों ने काम किया है। इनमें महिला प्रतिनिधियों की संख्या करीब 600 रही है। इसी से समझा जा सकता है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है।

वर्तमान लोकसभा में, 539 सांसदों में 82 महिला सदस्य चुनी गईं, जो कुल संख्या का महज 15.21 फीसदी है। सरकार द्वारा दिसंबर 2022 में संसद के साथ साझा किए गए आँकड़ों के मुताबिक, राज्यसभा में भी 238 सांसदों में से 31 महिला सांसद हैं जो कुल सांसदों का 13.02 फीसदी है। वैश्विक औसत के हिसाब संसद में महिलाओं की भागीदारी में हम बेहद पीछे है। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन की स्टडी के मुताबिक, वैश्विक औसत 26 फीसदी है।

आँकड़ों से पता चलता है कि कई राज्य विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व 15 फीसदी से कम है। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, ओडिशा, सिक्किम, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा और पुद्दुचेरी सहित कई राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से कम है। मिजोरम और नगालैंड में विधानसभा में महिलाओं का प्रतिशत जीरो है।

दिसंबर 2022 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार, बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 10-12 प्रतिशत महिला विधायक थीं। सबसे अधिक महिला विधायकों के प्रतिनिधित्व वाले पाँच राज्यों में छत्तीसगढ़ में 14.44, पश्चिम बंगाल में 13.7 और झारखंड में 12.35, राजस्थान में 12 और यूपी में 11.66 फीसदी महिला विधायक हैं।

जहाँ जम्मू-कश्मीर 2.30, कर्नाटक में 3.14, पुड्डुचेरी में 3.33 फीसदी हैं। वहीं दिल्ली और उत्तराखंड की विधानसभा में उनकी भागीदारी महज 11.43 फीसदी ही है। पिछले कुछ हफ्तों में, बीजद और बीआरएस सहित कई दलों ने इस विधेयक को पुनर्जीवित करने की माँग की है। वहीं इसे लेकर कांग्रेस ने भी रविवार (17 सितंबर) को अपनी हैदराबाद कॉन्ग्रेस कार्य समिति की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया।

इस विधेयक को लेकर एक खास बात है कि जहाँ राजद, सपा, झामुमो जैसे दल इस महिला आरक्षण के अंदर भी एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण की माँग को लेकर इसका विरोध कर रहे हैं। लेकिन बीजेपी के साथ कॉन्ग्रेस, बीजेडी, बीआरएस, वाईएसआरसीपी इस बिल के समर्थन में है।

इस बिल का विरोध करने वाले सपा के लोकसभा में 4 तो राजद का एक भी सांसद नहीं हैं, ऐसे में इस बिल के पास होने के पूरे आसार हैं। गौरतलब है कि इस विधेयक को अमलीजामा पहनाने की कवायद पाँच बार की गई, लेकिन हर बार वंचित महिलाओं की भागीदारी के सवाल पर दल बंट गए और ये कानून नहीं बन पाया।

क्या है इस बिल का इतिहास?

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के 1975 के कार्यकाल के दौरान ‘टूवर्ड्स इक्वैलिटी’ नाम की एक रिपोर्ट आई थी। इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं के हालात का ब्यौरा दिया गया था। इसके साथ ही आरक्षण की बात भी कही गई थी। हालाँकि, इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली कमेटी के अधिकांश सदस्य आरक्षण के खिलाफ थे।

महिलाएँ भी चाहती थीं कि वो अपने दम पर राजनीति में आएँ, लेकिन आने वाले वर्षों में महिलाओं ने महसूस किया कि राजनीति की उनकी राह आसान नहीं है। तभी से महिलाओं को संसद में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की जरूरत समझी गई। देश के दिवंगत पीएम राजीव गाँधी ने 1980 के दशक में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने के लिए बिल पास करने की कोशिश का तब कई राज्यों की विधानसभाओं ने विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे उनकी शक्तियों में कमी आएगी।

पहली बार 12 सितंबर, 1996 में महिला आरक्षण विधेयक को पीएम एचडी देवेगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने पेश किया था। उस वक्त कॉन्ग्रेस इस गठबंधन को बाहर से समर्थन दे रही थी। उस वक्त समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

तब यह विधेयक 81वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर पेश किया गया था। इसमें संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण के प्रस्ताव के अंदर ही अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए उप-आरक्षण का प्रावधान था, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था।

इस बिल में प्रस्ताव है कि लोकसभा के हर चुनाव के बाद आरक्षित सीटें रोटेट की जानी चाहिए। आरक्षित सीटें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन से दी की जा सकती हैं। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण खत्म हो जाएगा। इसके बाद 1997 में इस विधेयक को पेश करने की फिर से कोशिश की गई थी। तब जनता दल (यूनाइटेड) के शरद यादव ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए आपत्तिजनक कॉमेंट किया था कि इस बिल से केवल ‘पर-कटी औरतों’ का ही फायदा पहुँचेगा। उन्होंने कहा था कि ‘परकटी शहरी महिलाएँ’ हमारी ग्रामीण महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे करेंगी।

इसके बाद 1998 में 12वीं लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में उस वक्त के कानून मंत्री एम थंबीदुरई ने इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की, लेकिन इसमें फिर कामयाबी नहीं मिली।

तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री एम थंबीदुरई विधेयक पेश करने जा रहे थे तब राजद सदस्य सुरेंद्र प्रकाश यादव ने इसे मंत्री के हाथ से छीन लिया। सहकर्मी अजीत कुमार मेहता के साथ वह उन्हें नष्ट करने के कोशिश में और इसकी अधिक प्रतियाँ लेने के लिए अध्यक्ष की मेज पर जा पहुँचे थे।

वाजपेयी सरकार ने दोबारा 13वीं लोकसभा में 1999 में इस विधेयक को पेश करने की कोशिश की। उस दौरान भी राजनीतिक दल इसी माँग को लेकर बँट गए। इसके बाद उन्होंने 2002 और 2003-2004 में भी इस बिल को पास करने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए।

वाजपेयी सरकार इस बिल को कम से कम 6 बार संसद में लेकर आई, लेकिन हर बार कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों ने ही बिल को टाल दिया। याद रखें, वाजपेयी सरकार के पास इसे पारित करने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं था और वह आम सहमति के लिए विपक्ष पर निर्भर थी।

फिर हुआ बिल के लिए 108वाँ संविधान संशोधन

कॉन्ग्रेस की अगुवाई में साल 2004 में यूपीए सरकार के आने पर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। तब 2008 में इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के तौर पर राज्यसभा में पेश किया गया। साल 2008 में इस बिल को क़ानून और न्याय संबंधी स्थायी समिति को भेजा गया था।

समिति के दो सदस्यों में वीरेंद्र भाटिया और शैलेंद्र कुमार समाजवादी पार्टी के थे। इनका कहना था कि वो इसके विरोध में नहीं है, लेकिन बिल के मसौदा उन्हें मंजूर नहीं है। इन्होंने सलाह दी थी कि प्रत्येक राजनीतिक दल अपने 20 फीसदी टिकट महिलाओं के लिए आरक्षित रखे और संसद में महिला आरक्षण 20 फ़ीसदी से ज्यादा न हो।

जब राज्यसभा में पास हुआ महिला आरक्षण बिल

यूपीए सरकार में 9 मार्च, 2010 को आखिरकार राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को एक के मुकाबले 186 मतों के भारी बहुमत से पास किया गया था। जिस दिन यह बिल पास हुआ उस दिन मार्शल्स का इस्तेमाल करना पड़ा था। तब भी बीजेपी, वाम दलों और जेडीयू ने इसका समर्थन किया था। वहीं समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने इसका पुरजोर विरोध किया था।

राज्यसभा अध्यक्ष ने हंगामा करने वाले समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के सात सांसदों को अध्यक्ष ने निलंबित कर दिया था। ये दोनों दल सरकार में यूपीए के साथी थे। सरकार पर गिरने का खतरा मंडराने की वजह से कॉन्ग्रेस ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया।

दरअसल संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत जो विधेयक लोकसभा में विचाराधीन रह जाते हैं, वो उसके भंग होते ही खत्म हो जाते हैं। इस वजह से 2014 में लोकसभा भंग होने के बाद यह महिला आरक्षण बिल अपने आप खत्म हो गया। हालाँकि, राज्यसभा स्थायी सदन होने ये बिल अभी अस्तित्व में है। इसलिए इसे लोकसभा में नए सिरे से पेश किया जाएगा।

साल 2014 में सत्ता में आई बीजेपी नीत मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इसे पेश करने की बात की। पार्टी ने 2014 और 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में 33 फ़ीसदी महिला आरक्षण का वादा किया था। पीएम को 2017 में पत्र लिखकर कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गाँधी ने अपना समर्थन जताया था।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी ने भी 16 जुलाई, 2018 को पीएम को पत्र लिखकर पार्टी के समर्थन की बात दोहराई थी। 2019 में लोकसभा चुनावों के लेकर भी राहुल गाँधी ने तब कहा था कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह महिला आरक्षण विधेयक को प्राथमिकता के आधार पर पास करेंगे।

हालाँकि, इस बिल को लेकर कॉन्ग्रेस का गेम प्लान हमेशा महिला प्रतिनिधित्व के एजेंडे पर दिखावा करना है, जबकि व्यवहार में अपने गठबंधन सहयोगियों और वास्तव में अपने स्वयं के सांसदों के जरिए से वो इसे नाकाम करती रही है।

कॉन्ग्रेस, जिसके पास 2010 में अपेक्षित बहुमत था, केवल भाजपा के समर्थन की वजह से राज्यसभा के जरिए ये विधेयक पारित कर सकी, लेकिन एक बार फिर यहाँ वो इसका दिखावा साबित हुआ। सोनिया गाँधी ने ये स्वीकार किया था कि उनकी अपनी पार्टी ने इसका विरोध किया।

साल 2023 के पाँच दिन के खास सत्र कै दौरान ये बिल पेश हो गया है। अगर ये पास हो जाता है, तो फिर राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद ये कानून बन जाएगा।

क्या बम विस्फोट में हुई मौत हत्या है या गैर इरादतन मानव संहार? : सिविल जज की परीक्षा में पूछे गए सवालों में उलझी उत्तराखंड HC, ऐसे निकाला हल

उत्तराखंड हाईकोर्ट को राज्य न्यायिक सेवा सिविल जज के प्रारंभिक परीक्षा में पूछे गए सवाल पर डाली गई याचिका पर सुनवाई करते वक्त खासी मुश्किल का सामना करना पड़ा। दरअसल, परीक्षा में एक ऐसा सवाल था जिसके जवाब ने विवादास्पद रूप ले लिया था। इसी पर हाई कोर्ट सुनवाई कर रही थी।

न्यायिक सेवा की परीक्षा में पूछा गया था- ‘A’ ने एक मेडिकल स्टोर में बम रखा और बम विस्फोट होने से पहले लोगों को बाहर निकलने के लिए तीन मिनट का वक्त दिया। आर्थराइटिस से पीड़ित एक मरीज ‘B’ वहाँ से निकलने में सफल नहीं हो सका और मारा गया। क्या इसके लिए A के तहत मामला दर्ज किया जाएगा? ये सवाल पूछा गया था। इसके लिए चार विकल्प ए, बी, सी और डी दिए गए थे।

इसके लिए परीक्षा में शामिल हुए अधिकतर आवेदकों ने विकल्प ‘ए’ (आईपीसी की धारा 302 के तहत – हत्या) का चयन किया, लेकिन आयोग के मुताबिक, सही उत्तर ‘डी’ था (आईपीसी की धारा 304 ए – गैर इरादतन हत्या/ मानव संहार)।” ये परीक्षा उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (यूकेपीएससी) ने आयोजित की थी और इसके नतीजे इस साल मई में घोषित किए गए थे।

बता दें कि इस सवाल पर डाली गई याचिका की सुनवाई उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस राकेश थपलियाल की बेंच कर रही थी। बेंच ने इस मामले की सुनवाई 13 सितंबर को की थी, लेकिन इसे लेकर ब्योरा इसी हफ्ते साझा किया गया। इस मामले में आखिरकार कोर्ट ने आयोग को सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

‘गैर इरादतन तो आईपीसी की धारा 302 नहीं’

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, यूकेपीएससी ने कोर्ट में तर्क दिया कि ”हत्या का इरादा न होने से ये मामला आईपीसी की धारा 302 से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह लापरवाही की वजह से मौत से जुड़ा मामला है।” इस मामले पर उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा, “हमारे लिए यह कहना काफी है कि सब्जेक्ट एक्सपर्ट ने मोहम्मद रफीक के मामले में 2021 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया है। अदालत विषय के एक्सपर्ट की राय से इतर कोई भी राय देने से परहेज करती है।”

गौरतलब है कि मोहम्मद रफीक मामले में मध्य प्रदेश में एक पुलिस अधिकारी को एक तेज रफ्तार ट्रक ने कुचल दिया जब उसने इस पर चढ़ने की कोशिश की और ड्राइवर रफीक ने उसे धक्का देकर गिरा दिया। हालाँकि इस बीच इस याचिका ने कानूनी हलकों में इस बात पर बहस छेड़ दी कि क्या किसी आतंकवादी कृत्य को ‘हत्या’ के बजाय ‘लापरवाही की वजह से मौत’ के तौर पर देखा जा सकता है?

हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील, अवतार सिंह रावत से जब उनकी इस मामले में राय के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “यह स्पष्ट रूप से लापरवाही का मामला नहीं है क्योंकि कृत्य ही स्वयं इरादे को दर्शाता है और ‘ए’ अपने काम के नतीजों को जानता था।” उन्होंने कहा, “बिना किसी संदेह के, यह मामला आईपीसी की धारा 302 हत्या के दायरे में आता है।”

तीन अन्य सवालों पर भी थी आपत्ति

याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा में आए तीन अन्य सवालों पर भी आपत्ति जताई है। अदालत ने कहा, “दो सवालों में याचिकाकर्ता ने सही विकल्प चुना था, जबकि विषय के एक्सपर्ट गलत विकल्प पर अड़े थे।” दोनों पक्षों के दिए गए तथ्यों की समीक्षा करने के बाद, अदालत ने कहा, “हमारा विचार है कि एक्सपर्ट ने इसका इस्तेमाल बगैर ध्यान दिए किया है।” कोर्ट ने आयोग को दोनों सवालों पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

तीसरे सवाल के संबंध में, हाई कोर्ट ने कहा, “इसे पूरी तरह से संवेदनहीन तरीके से तैयार किया गया था।” अदालत ने कहा कि हमें यह देखकर दुख होता है कि सवाल को तैयार करने में जल्दबाजी की गई है।

कोर्ट ने परीक्षा में उत्तरदाताओं को ध्यान में रखते हुए इस सवाल को हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर ही चयन की पूरी प्रक्रिया चार हफ्ते के अंदर खत्म की जानी चाहिए। इसके साथ ही एक नई मेरिट लिस्ट तैयार की जानी चाहिए जिसके आधार पर चयन प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।

जिस लड़ाकू विमान को नहीं पकड़ सकते रडार, उसका मलबा मिला: ऑटो पायलट मोड में उड़ते हुए गायब हो गया था अमेरिका का F-35

17 सितंबर 2023 को लापता हुए अमेरिकी फाइटर जेट F-35 का मलबा मिल गया है। रक्षा अधिकारियों ने जानकारी देते हुए कहा है कि इसका मलबा दक्षिण कैरोलिना के विलियम्सबर्ग काउंटी में मिला है। एफ-35 उड़ान के दौरान गायब हो गया था। इसके पायलट ने पैराशूट के जरिए कूदकर अपनी जान बचाई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अधिकारियों का कहना है कि लापता हुए फाइटर जेट F-35 की तलाश अब पूरी हो गई है। विमान क्रैश होने के बाद इसका मलबा मिला है। अधिकारियों का कहना है कि जहाँ पर मलबा मिला है, वहाँ जाँच टीम पहुँच गई है। हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है। स्थानीय लोगों को फाइटर जेट से दूर रहने की सलाह दी गई है। एक रिकवरी टीम इसे सुरक्षित रखने के प्रयास में जुटी हुई है।

अमेरिकी सेना कॉर्प्स ने 18 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि एफ-35 की सभी उड़ानें अगले दो दिनों के लिए रोकी जा रही है। यह फैसला लगातार हो रहे हादसों को देखते हुए लिया गया है। हाल के दिनों में एफ-35 के साथ हुई यह तीसरी दुर्घटना है। बता दें कि फाइटर जेट के लापता होने के बाद अधिकारियों ने आम जनता से इसकी तलाश में मदद करने के लिए अपील की थी।

हादसे का शिकार हुए एफ-35 फाइटर जेट को एफ-35 लाइटिंग-II के नाम से भी जाना जाता है। फाइटर जेट के लापता होने की वजह इसकी सबसे बड़ी खासियत ही थी। दरअसल, यह फाइटर जेट स्टील्थ टेक्नोलॉजी यानी कि रडार की पकड़ में न आने वाली तकनीक से बनाया गया है। ऐसे में लापता होने के बाद रडार भी इसे नहीं ढूँढ़ पा रहा था।

एफ-35 फाइटर जेट की कीमत 150 मिलियन डॉलर यानी 12 अरब 48 करोड़ रुपए से अधिक है। साउथ कैरोलिना राज्य के तटीय इलाके में स्थित चार्लसन ज्वॉइंट बेस से उड़ान भरने के बाद एफ-35 जब आसमान में था, तभी कुछ खराबी आने पर पायलट उसे ऑटो पायलट मोड में डालकर खुद बाहर निकल गया था।

हिंदू युवती से 6 महीने तक रेप, फिर भ्रूण निकलवा कर दबा दिया: कुशवाहा बन सलमान ने फँसाया था, निकाह न करने पर परिवार को खत्म करने की धमकी

मध्य प्रदेश के कटनी जिले से ‘लव जिहाद’ का एक मामला सामने आया है। यहाँ सलमान नाम के एक युवक पर मजहब छिपा कर हिन्दू लड़की से 6 माह तक रेप का आरोप लगा है। बाद में आरोपित द्वारा पीड़िता का गर्भपात करवा दिया गया। लड़की को निकाह न करने पर जान से मार डालने की भी धमकी दी गई है। जानकारी होने पर सोमवार (18 सितंबर, 2023) को लड़की के परिजनों ने आरोपित के खिलाफ केस दर्ज करवाया। पुलिस ने सलमान को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना कटनी के स्लीमनाबाद थाना क्षेत्र की है। यहाँ के गाँव लखनवाड़ा की रहने वाली 20 वर्षीया पीड़िता में 6 माह पूर्व 10 मार्च, 2023 को कुछ काम से गाँव तेवरी गई थी। यही पर लड़की की मुलाकात सलमान से हुई थी। आरोपित ने खुद को ‘सलमान कुशवाहा’ बताया और पीड़िता से दोस्ती कर ली। थोड़े समय में दोनों ने आपस में नंबर साझा कर लिए। बाद में आरोपित और पीड़िता में मेलजोल बढ़ा। इस दौरान सलमान के कई बार पीड़िता से रेप किया। लगभग 5 महीने बाद लड़की गर्भवती हो गई।

इस बीच लड़की को कहीं से सलमान के मुस्लिम होने की जानकारी मिली। पीड़िता ने अपने परिजनों को पूरी बात बता दी। इस बीच सलमान लड़की पर गर्भपात का दबाव बनाने लगा। आरोप है कि सलमान ने एक दिन मौका पा कर पीड़िता का गर्भपात करवा दिया। भ्रूण को उसने एक सुनसान जगह पर दबा दिया। आखिरकार सोमवार को पीड़िता के परिजन शिकायत ले कर पुलिस स्टेशन पहुँचे। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया है कि सलमान ने पीड़िता पर अपने साथ निकाह करने का दबाव भी बनाया। मना करने पर उसे परिवार सहित कत्ल करने की धमकी भी दी।

सोमवार को ही पुलिस ने पीड़िता की तहरीर पर आरोपित 21 वर्षीय सलमान के खिलाफ IPC की धारा 376 सहित अन्य सुसंगत धाराओं में FIR दर्ज कर लिया। सलमान को गिरफ्तार भी कर लिया गया। पीड़िता को मेडिकल परीक्षण के लिए अस्पताल भेजा गया है। थाना प्रभारी अखिलेश दहिया के अनुसार, दफन किए गए भ्रूण को भी निकलवा कर चिकित्सीय परीक्षण करवाए जा रहे हैं।

नई संसद का ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के साथ श्रीगणेश, लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं में भी महिलाओं को आरक्षण: PM मोदी का बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी सांसदों के साथ पुराने संसद भवन, जिसे अब ‘संविधान भवन’ के नाम से जाना जाएगा, वहाँ से नई संसद भवन इमारत की तरफ मार्च किया। इसके बाद उन्होंने लोकसभा को संबोधित किया। उन्होंने इस दौरान कहा कि इस पावन दिवस पर हमारा ये शुभारंभ संकल्प से सिद्धि की ओर एक नए विश्वास के साथ यात्रा आरंभ करने का है। नए संसद भवन में सदन की पहली कार्यवाही शुरू हुई। इस दौरान पीएम मोदी ने ‘महिलाओं के नेतृत्व में विकास’ की सोच को आगे बढ़ते हुए एक प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत करने का ऐलान किया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर देश की विकास यात्रा में ऐसे पत्थर के मील आते हैं, जब वो गर्व से कहता है कि आज के दिन हम सबने नया इतिहास रचा है। उन्होंने कहा कई नए सदन के प्रथम सत्र के प्रथम भाषण में वो बड़े विश्वास और गर्व से कह रहे हैं कि आज का ये पल, आज का ये दिवस इतिहास में नाम दर्ज कराने वाला है। उन्होंने कहा कि सिर्फ महिलाओं के विकास की बात पर्याप्त नहीं है, हमें मानव जाति की विकास यात्रा में नए पड़ाव को अगर प्राप्त करना है, राष्ट्र की विकास यात्रा में नई मंजिलों को अगर पाना है, तो ये आवश्यक है कि ‘Women Led Development’ को हम बल दें।

पीएम मोदी ने बताया कि कैसे महिला सशक्तिकरण की उनकी सरकार ने हर योजना ने महिला नेतृत्व करने की दिशा में बहुत सार्थक कदम उठाए हैं। पीएम मोदी ने कहा कि ईश्वर ने पवित्र कार्य के लिए उन्हें चुना है। उन्होंने कहा, “अनेक वर्षों से महिला आरक्षण पर बहुत चर्चाएँ और वाद-विवाद हुए हैं। 1996 में इससे जुड़ा बिल पहली बार पेश हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कई बार महिला आरक्षण बिल पेश किया गया, लेकिन उसे पास कराने के लिए आँकड़े नहीं जुटा पाए, जिस वजह से वो सपना अधूरा रह गया।”

उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में नारी शक्ति का विस्तार करने का है। प्रधानमंत्री ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को संसद में पेश किए जाने का ऐलान किया। उन्होंने इसके लिए देश की सभी माताओं-बहनों-बेटियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि इस बिल को कानून बनाने के लिए हम संकल्पबद्ध हैं। उन्होंने सभी सांसदों से आग्रह किया कि वो सर्वसम्मति से पारित किया जाए। उन्होंने कहा कि जब ये बिल कानून बनेगा तो सभी महिलाओं को इसका फायदा होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज आधुनिक भारत और हमारे लोकतंत्र के प्रतीक नए संसद भवन का शुभारंभ हुआ है और सुखद संयोग है कि आज गणेश चतुर्थी का शुभ दिन है। उन्होंने बताया कि कैसे भारत की अध्यक्षता में G20 का असाधारण आयोजन, विश्व में इच्छित प्रभाव के अर्थ में अद्वितीय उपलब्धियाँ हासिल करने वाला एक अवसर बना। पीएम मोदी ने कहा कि ये अवसर कई मायनों में अभूतपूर्व है। बकौल पीएम मोदी, आजादी के अमृतकाल का ये ऊषाकाल है और भारत अनेक सिद्धियों के साथ नए संकल्प लेकर, नए भवन में अपना भविष्य तय करने के लिए आगे बढ़ रहा है।

पीएम मोदी ने कहा, “अभी चुनाव दूर हैं, अभी हमारे पास समय बचा है। मैं मानता हूँ कि इस सदन में जो व्यवहार होगा, वो निर्धारित करेगा कि कौन इधर बैठने के लिए व्यवहार करता है और कौन उधर बैठने के लिए व्यवहार करता है। महिलाओं को अधिकार देने और उनकी शक्ति का उपयोग करने के इस पवित्र काम के लिए शायद ईश्वर ने मुझे चुना है। एक बार फिर हमारी सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है।” इसके बाद नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इसका श्रेय लूटने की कोशिश की।

‘नई संसद में होनी चाहिए नमाज के लिए जगह’ : सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने रखी माँग, कहा- नफरत फैला रखा है, क्या देंगे?

“नई संसद में नमाज के लिए भी जगह होनी चाहिए।” – यह माँग कोई और नहीं बल्कि अक्सर अपने विवादित बयानों से चर्चा में बने रहने वाले समाजवादी पार्टी के लोकसभा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने रखी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शफीकुर्रहमान बर्क ने मंगलवार (19 सितम्बर, 2023) को संसद भवन के बाहर प्रेस से बात करते कहा, “देखिए नवाज पढ़ने के लिए तो जगह यहाँ भी नहीं है। नई संसद में भी मुसलमानों के नमाज के लिए भी जगह होनी चाहिए थी। इन लोगों ने नफरत फैला रखा है। क्या जगह देंगे, मुसलमान से नफरत फैला रखी है।”

वहीं जब उनसे जोर देकर दोबारा पूछा गया कि नई संसद में नमाज के लिए जगह होनी चाहिए थी या नहीं? तो बर्क ने सीधे कहा, “होनी चाहिए नमाज के लिए जगह, मुसलमानों के लिए जब नमाज का वक़्त हो जाता है तो उनके लिए भी कोई जगह होनी चाहिए थी लेकिन अभी उन्होंने देखी नहीं है कि है या नहीं है।” उनके बयान का वीडियो भी सामने आया है।

विवादों से है शफीकुर्रहमान बर्क का गहरा नाता

हालाँकि, यह पहली बार नहीं जब उन्होंने इस तरह की बातें की हो। संसद विधायी जगह जब वहाँ भी वह नमाज के लिए जगह की माँग कर सकते हैं तो और क्या कहा जाए। बता दें कि लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद से ही शफीकुर्रहमान बर्क कई बार विवादों में आ चुके हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि वंदे मातरम इस्लाम के खिलाफ और मुस्लिम इसका पालन नहीं कर सकते। 

वहीं अभी हाल ही में एक बार फिर अयोध्या में खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों पर सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा था, “वहाँ मस्जिद थी और हमेशा मस्जिद ही रहेगी।”

बता दें कि शफीकुर्रहमान बर्क दूसरी बार तब विवादों से घिरे, जब उन्होंने अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे का बचाव किया। बता दें कि शफीकुर्रहमान बर्क ने अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा भारत के स्वतंत्रता संग्राम से कर दी थी और इसे सही ठहराया था। वहीं बुर्का से लेकर हलाला तक वह सभी इस्लामिक कुरीतियों का बचाव करते आए हैं। 

कल ही PM मोदी ने किया था बर्क का जिक्र

गौरतलब है कि नए संसद भवन में सरकार के विधायी कामकाज 20 सितंबर से शुरू हो रहे हैं। वहीं संसद के विशेष सत्र के पहले दिन 18 सितम्बर, 2023 को संसद में 75 साल की संसदीय यात्रा पर जब चर्चा हो रही थी। तब चर्चा की शुरूआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण से की।

तब लोकसभा में संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का जिक्र करते हुए कहा, “आजादी के बाद साढ़े सात हजार से ज्यादा सांसदों ने अब तक इस सदन में अपना योगदान दिया है। इनमें एक सांसद ऐसे भी हैं जो 93 साल के हैं और अभी भी लोकसभा के सदस्य हैं।” यह किसी और का नहीं बल्कि शफीकुर्रहमान बर्क का जिक्र कर रहे थे। वहीं आज बर्क ने नमाज के जगह की माँग रखकर फिर से माहौल गर्मा दिया है। 

‘5 दिन में देश छोड़ो’: ट्रूडो के खालिस्तानी तुष्टिकरण के बाद भारत ने कनाडा के राजनयिक को निकाला, विदेश मंत्रालय से मुँह बना कर निकले कनाडाई राजदूत

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा भारत पर खालिस्तानी आतंकवादी की हत्या का आरोप भारत पर मढ़ने और भारतीय राजनयिक को कनाडा से वापस भेजने के बाद अब भारत ने भी कड़े कदम उठाए हैं। भारत ने दिल्ली स्थित कनाडाई दूतावास के एक वरिष्ठ राजनयिक को भारत छोड़ने का आदेश दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बात की जानकारी दी है कि उसने भारत में कनाडा के हाई कमिश्नर कैमरून मैक्के (Cameroon Mackay) को तलब करके उन्हें इस बात की जानकारी दी है। भारत ने कनाडाई राजनयिक को 5 दिनों के भीतर भारत छोड़ने का आदेश दिया है।

बीते एक वर्ष में यह तीसरा ऐसा मौका है जब कनाडा के हाई कमिश्नर को भारतीय विदेश मंत्रालय ने तलब किया है। इससे पहले जुलाई और मार्च महीने में भी उन्हें तलब किया गया था जो कि दर्शाता है कि दोनों देशों के रिश्ते सामान्य नहीं हैं।

विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, “कनाडा के भारत में हाई कमिश्नर को आज तलब किया गया था और उन्हें एक कनाडाई राजनयिक के भारत से निष्कासन के निर्णय की जानकारी दी गई। उक्त राजनयिक को 5 दिनों के भीतर भारत छोड़ने को कहा गया है। यह निर्णय कनाडाई राजनयिकों की भारत विरोधी गतिविधियों में बढती संलिप्तता और उनके भारत के आंतरिक मामले बढ़ते दखल के प्रति भारत की चिंताओं को दर्शाता है।”

इससे पहले कनाडा की विदेश मंत्री ने मेलानी जोली ने कनाडाई संसद में भारतीय राजनयिक के कनाडा से निष्कासन की सूचना दी थी। बीते कुछ वर्षों से कनाडा के खालिस्तानी आतंकवादियों के संरक्षण को लेकर भारत से सम्बन्ध काफी निचले स्तर पर चले गए हैं।

आतंकवादी निज्जर की हत्या का दोषारोपण भारत पर करके कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो अपनी खीझ जाहिर कर रहे हैं। वह कनाडा के खालिस्तानियों का तुष्टिकरण करना चाहते हैं। खालिस्तानियों के दबाव में आए ट्रूडो को हाल ही में G20 में भी कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिली थी।

भारत ने निष्कासित किए जाने वाले कनाडाई राजनयिक का नाम सार्वजनिक नहीं किया है, जबकि कनाडा ने यह जानकारी दी है कि उसने कनाडा में ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW)’ के मुखिया पवन कुमार राय को निष्कासित किया गया है। हालाँकि, अंग्रेजी समाचार वेबसाइट मिंट की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि भारत से निष्काषित होने वाले कनाडाई राजनयिक, कनाडा की ख़ुफ़िया एजेंसी के भारत में मुखिया ओलिवर सिल्विस्टर हैं।

मुस्लिम दोस्त के साथ चेन्नई गया दलित रंजीत, मुस्लिम बनकर लौटा: अब घर वालों पर डाल रहा इस्लाम कबूलने का दबाव, राकिब रजा के नाम से बनवाया आधार

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का एक दलित युवक कमाने के लिए मुस्लिम दोस्त के साथ चेन्नई गया। जब घर लौटा तो वह खुद मुस्लिम बन चुका था। कथित तौर पर अब वह अपने परिजनों पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाल रहा है। पीड़ित परिवार की शिकायत के बाद युवक के दोस्त सलमान को गिरफ्तार किया गया है।

इस मामले में 15 सितंबर 2023 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इसमें पीड़ित परिवार ने बताया है कि रंजीत को बहला-फुसला और पैसों का लालच देकर सलमान खान ने ने राशिद खान बना दिया। इसके बाद से रंजीत और सलमान उनके पूरे परिवार धर्मांतरण का दबाव डाल रहे हैं।

यह मामला चित्रकूट जिले के कर्वी थाना क्षेत्र के सीतापुर कस्बे का है। यहाँ रहने वाली केरनिया नाम की वृद्धा महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने अपने नाती रंजीत के धर्मान्तरण का आरोप अली वकस के बेटे सलमान पर लगाया है। सलमान भी चित्रकूट के खोही क्षेत्र में रहता है। केरनिया ने आरोप लगाया है कि अब सलमान और रंजीत मिल कर पूरे परिवार पर इस्लाम कबूलने का दबाव बना रहे हैं।

पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया है कि धर्म परिवर्तन न करने पर रंजीत और सलमान पूरे परिवार को जान से मार डालने की धमकी दे रहे है। शिकायत में आरोपितों पर कठोर कार्रवाई की माँग की गई है। पुलिस ने इस मामले में सलमान के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत केस दर्ज कर लिया है। मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

न्यूज़ 18 के मुताबिक 22 वर्षीय दलित युवक रंजीत अपने मित्र सलमान के साथ कुछ साल पहले कमाने के लिए चेन्नई गया था। वहाँ से वह फोन पर परिजनों से इस्लाम कबूलने को कहने लगा। इसके बाद उसे घर बुला लिया गया। लेकिन घर लौटने के बाद भी उसे समझाने की सारी कोशिश नाकाम रही। एक बार तो उसने जहर खा कर जान देने की कोशिश भी की।

रिपोर्ट में बताया गया है कि रंजीत के पास से 2 आधार कार्ड मिले हैं। पहला आधार रंजीत के ही नाम पर है। दूसरे आधार पर नाम राकिब रजा और पिता के तौर पर सलमान के अब्बा का नाम लिखा हुआ है। रंजीत का यह भी कहना है कि सलमान बेगुनाह है। उसने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूला है। मजार जाने के दौरान इस्लाम से प्रभावित होने की बात उसने कही है।

सलमान के अनुसार रंजीत की तबियत अक्सर खराब रहती थी। इसके चलते वह मजार जाने लगा। वहाँ उसे फायदा हुआ और वो इस्लाम की तरफ झुक गया। हालाँकि रंजीत के परिजनों ने सलमान को ही धर्मान्तरण का कर्ता-धर्ता बताया है।