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राष्ट्रीय एकता दिवस: सरदार पटेल के अखंड भारतवर्ष की पहली नींव बना महाराजा कृष्ण कुमार सिंह का भावनगर, इसके बाद जुड़ी रियासतों से बना आज का भारत

देश ‘एकता दिवस’ मना रहा है। विभिन्न स्थानों और राज्यों में सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष समारोह, कार्यक्रम और उत्सव शुरू हो चुके हैं। अखंड भारत को एक सूत्र में पिरोकर देश को गौरवशाली स्थान दिलाने वाले सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति और देशभक्ति को आज भी लोग याद कर रहे हैं और इसके साथ ही याद कर रहे हैं भावनगर स्टेट और उनके शासक महाराजा राओल साहब श्री कृष्ण कुमार सिंह जी गोहिल को। इसका एकमात्र कारण यह है कि भावनगर अखंड भारत के स्वप्न की पहली सीढ़ी बना था।

जब सरदार पटेल ने प्रयास शुरू किए, तब भावनगर एकमात्र ऐसी रियासत थी, जिसने स्वयं आगे आकर अखंड भारत में विलय होना स्वीकार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि भावनगर को देखकर अन्य रियासतें भी अखंड भारत में शामिल होती गईं। 1947 की स्वतंत्रता के बाद बिखरे हुए और खंड-खंड भारत को एक सूत्र में बाँधने के सरदार पटेल के अभियान में भावनगर ने पहला और अनूठा कदम उठाया था और वहीं से रियासतों के विलीनीकरण का अभियान शुरू हुआ था।

भावनगर के तत्कालीन शासक महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी गोहिल ने भारतीय संघ में भावनगर का दान देकर एक महान उदाहरण प्रस्तुत किया था। इस लेख में हम महाराजा साहब और सरदार पटेल के बीच हुई बातचीत पर चर्चा करेंगे। सरदार पटेल की जयंती पर उनके भारत को एक करने के अभियान में भावनगर राज्य ने किस तरह सिंहफाल (बड़ा योगदान) दिया था और जिसके परिणामस्वरूप यह अभियान शुरू हुआ, इन सभी मुद्दों पर हम विशेष चर्चा करेंगे।

1939 की प्रजा परिषद और सरदार पटेल से महाराजा की पहली मुलाकात

भावनगर राज्य में भले ही राजशाही थी, लेकिन इसमें प्रजा परिषद, सुनवाई, कोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक तत्व भी शामिल थे। आम लोगों को भी कुछ अधिकार दिए जाते थे, और महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी स्वयं भी एक स्वतंत्र और उदार स्वभाव के व्यक्ति थे। उनका जन्म 19 मई, 1912 को भावनगर में हुआ था। अपने पिता महाराजा भाव सिंह जी द्वितीय के निधन के बाद, केवल सात साल की छोटी उम्र में उन्हें भावनगर की राजगद्दी सौंप दी गई थी। हालाँकि, 1931 तक शासन दीवान के मार्गदर्शन में चलाया गया था।

कृष्ण कुमार सिंह जी के शासनकाल में भावनगर, काठियावाड़ का मुख्य व्यापारिक केंद्र बन गया था, जहाँ समुद्री व्यापार और औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया जाता था। 1938 में उन्हें कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और KCSI का गौरव भी मिला था, फिर भी उनका हृदय हमेशा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था।

महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी और सरदार पटेल की पहली मुलाकात 1939 में हुई थी। महाराजा ने भावनगर में प्रजा परिषद का आयोजन किया था और सरदार पटेल को इसमें आमंत्रित किया था। इस परिषद में, सरदार पटेल ने प्रजातंत्र (लोकतंत्र), राज्य के विकास और राष्ट्रीय एकता पर भाषण दिया था, जिससे महाराजा के मन में उनके प्रति बहुत सम्मान पैदा हुआ। इसी बैठक में, भविष्य में होने वाले राज्यों के एकीकरण की नींव पड़ गई थी।

महाराजा साहब ने बाद में कहा था, “सरदार के शब्दों में एकता की इतनी ऊँची शक्ति थी, जिसने मेरे हृदय को छू लिया।” इसी गहरे विश्वास के कारण ही 1947 में रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया आसान बन पाई थी।

1947 की स्थिति: खंड-खंड भारत को ‘अखंड’ बनाने की बड़ी चुनौती

1947 में देश को आजादी तो मिल गई, लेकिन उस समय भारत में 565 रियासतें थीं, जिनका क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 48% था। इन रियासतों को तीन विकल्प दिए गए थे। पहला भारत में शामिल होना, दूसरा पाकिस्तान में शामिल होना और तीसरा स्वतंत्र बने रहना।

गृह मंत्री के रूप में, सरदार पटेल ने ‘एक्सेशन इंस्ट्रूमेंट’ (विलय पत्र) तैयार करके रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने का बुलावा दिया। इस दस्तावेज के जरिए रियासतों से कहा गया था कि वे रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे विषयों पर भारत संघ को अधिकार दे दें। बदले में, उन्हें अपने आंतरिक शासन और विरासत की सुरक्षा की गारंटी दी गई थी।

स्थिति यह थी कि कई रियासतें स्वतंत्र रहना चाहती थीं, जिसके कारण भारत को एकजुट करना बहुत मुश्किल काम बन गया था। यह सोचा गया था कि यदि कोई एक रियासत भारतीय संघ में शामिल हो जाती है, तो बाकी रियासतें भी उसे देखकर जुड़ सकती हैं।

इस अनिश्चितता के बीच, महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी ने सरदार पटेल के आह्वान को सबसे पहले स्वीकार किया। उन्होंने स्वेच्छा से, एक तुलसी पत्र पर 1,800 गाँवों (पादर) सहित अपना पूरा राज्य देश को सौंप दिया। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन्होंने कहा था कि, “भावनगर की जनता और उसकी विरासत के लिए भारतीय संघ में शामिल होना ही एकमात्र सही विकल्प है।”

गाँधी से मुलाकात और सरदार की कूटनीति

महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी और सरदार पटेल के बीच मुख्य बातचीत दिसंबर 1947 में दिल्ली में हुई थी। उस समय महाराजा की उम्र केवल 35 वर्ष थी। उन्होंने 17 दिसंबर, 1947 को बिड़ला हाउस में महात्मा गाँधी से मुलाकात की और भारत में विलय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। मनुबहन गाँधी ने अपनी पुस्तक ‘दिल्ली में गाँधीजी’ (भाग-1) में महाराजा की गाँधी से मुलाकात का वर्णन किया है।

इस वर्णन के अनुसार, समय निकट जानकर गाँधी जी ने मनुबहन को बाहर कार के पास जाकर महाराजा को सम्मानपूर्वक अंदर लाने के लिए कहा था। महाराजा ने गाँधी से अकेले में मुलाकात कर बातचीत की। उन्होंने गाँधी जी को नम्रतापूर्वक बताया, “मैं अपना राज्य देश के चरणों में सौंपता हूँ। मेरे सालाना पेंशन (सालियाना), निजी संपत्ति आदि के बारे में जो भी फैसला होगा, मैं उसे स्वीकार करूँगा।”

गाँधी जी महाराजा की इस उदार और महान पेशकश से बहुत प्रसन्न हुए। फिर भी उन्होंने पूछा, “क्या आपने अपनी महारानी और भाइयों से पूछा है?” महाराजा का जवाब था, “मेरे इस फैसले में उनका मत भी शामिल है। जब पूरा का पूरा हाथी ही जा रहा है, तो उस पर रखी अंबारी (हौदा) को रखने का कोई अर्थ नहीं है।”

गाँधी जी ने उस समय कहा था, “भावनगर महाराजा का निर्णय भारत की एकता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।” इस दौरान उन्होंने महाराजा को सरदार पटेल से मुलाकात करने और इस दिशा में आगे बढ़ने की सलाह दी। इसके बाद, महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी और सरदार पटेल की एक बैठक हुई और पहली बार किसी रियासत को भारत संघ में जोड़ने पर विस्तार से विचार किया गया।

‘प्रजावत्सल राजवी’ (प्रजा प्रेमी राजा) नाम से कृष्ण कुमार सिंह जी की जीवनी लिखने वाले तथा भावनगर की शामलदास कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ गंभीर सिंह गोहिल ने भी इस घटना का उल्लेख किया है। सरदार पटेल ने महाराजा से व्यक्तिगत रूप से कहा था, “रियासतों का एकीकरण केवल राजनीतिक मामला नहीं है, बल्कि इसमें जनता का कल्याण भी छिपा हुआ है। आप जैसे प्रगतिशील शासकों के सहयोग से ही भारत विश्व की महानतम लोकतंत्र बन सकता है।” महाराजा ने जवाब में भावनगर राज्य के व्यापारियों, जनता और उसकी आर्थिक स्थिरता को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की थी।

इस दौरान सरदार पटेल ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि सभी बातों का ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने कहा था, “भावनगर को वार्षिक पेंशन, आंतरिक शासन की स्वायत्तता (आजादी) और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा दी जाएगी। आपकी पॉलिटेक्निक संस्थानों को मज़बूत बनाने में केंद्र मदद करेगा।” यह बातचीत दबाव पर नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित थी।

इसके बाद, वी पी मेनन के माध्यम से इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया। उस समझौते में भावनगर महाराजा को संबोधित करते हुए धन्यवाद व्यक्त किया गया और कहा गया, “यह विलय भावनगर को और मजबूत बनाएगा और महाराजा साहब का भावनगर की प्रजा के साथ उनका लगाव और भावनाएँ अखंड तथा बरकरार रहेंगी।”

पहला विलय और उसका परिणाम: अनेक रियासतें हुईं तैयार

इस समझौते का तुरंत परिणाम 15 जनवरी, 1948 को सामने आया, जब सरदार पटेल भावनगर पहुँचे। एक विशेष समारोह में, महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी ने सार्वजनिक रूप से भावनगर की जनता को ‘जिम्मेदार लोकतंत्र’ देने की आधिकारिक घोषणा की। इसी दौरान उन्होंने शासन-प्रशासन जनता के प्रतिनिधियों को सौंप दिया था और एक्सेशन इंस्ट्रूमेंट (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

इसके साथ ही, भावनगर भारत की पहली ऐसी रियासत बन गई, जो पूरी तरह से भारतीय संघ में विलीन हो गई। 15 फरवरी, 1948 को भावनगर सौराष्ट्र राज्य में शामिल हो गया, जिससे सौराष्ट्र की अन्य 222 रियासतों को भी प्रेरणा मिली।

इस कदम का असर इतना गहरा था कि इससे जूनागढ़, पोरबंदर और उनके जैसी अन्य रियासतों तथा वहाँ की जनता को यह संदेश मिला कि एकता ही प्रगति का एकमात्र रास्ता है। सरदार पटेल और भावनगर महाराजा के साझा प्रयासों से विलीनीकरण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ने लगी।

गाँधी जी भी अन्य रियासतों को भावनगर का उदाहरण देते थे। मनुबहन की पुस्तक में वर्णन है कि गाँधी जी उन्हें मिलने आए अन्य राजाओं से कहते थे, “आप पूछते थे न कि हमें अब कैसे व्यवहार करना चाहिए? तो आप भावनगर के महाराजा कृष्ण कुमार सिंह जी का उदाहरण लें और उन्होंने जो रास्ता अपनाया, वैसा आप भी अपनाएँ।”

भावनगर राज्य से प्रेरणा लेकर देश की अन्य रियासतें भी भारत में विलय होने के लिए तैयार होने लगीं, और सरदार पटेल ने विलीनीकरण की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया। भावनगर का विलीनीकरण सरदार पटेल की रणनीति का पहला विजयी कदम था। उन्होंने कूटनीति और विश्वास के आधार पर रियासतों को एक किया। सरदार पटेल की जयंती पर यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि एकता केवल विश्वास और समर्पण से ही बनती है।

सरदार पटेल की जयंती पर भावनगर और भावनगर के महाराजा साहब को याद करने का एकमात्र कारण यह है कि उन्होंने भारत के विलीनीकरण के लिए पहला और निर्णायक कदम भरा था और सरदार पटेल के अखंड भारत के स्वप्न रूपी यज्ञ में प्रथम आहुति दी थी।

खुद की ईसाइयत के लिए जिस हिंदू पत्नी को दिया था श्रेय, उसे ईसाई बनते देखना चाहता है US का उपराष्ट्रपति JD वेंस: हिंदू-विरोधी नफरत के बीच ‘गोरे’ कट्टरपंथियों को खुश करने की कोशिश

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपनी हिंदू पत्नी उषा बाला चिलुकुरी को अपनी ईसाई मान्यताओं को अपनाने की इच्छा जाहिर करके बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। जो बात और ज्यादा गुस्सा पैदा कर रही है, वो है उनकी पत्नी को ‘अनिश्चितता-वादी(Agnostic)’ बताना और उनकी ‘हिंदू आस्था’ को मान्यता देने से चौंकाने वाली अनिच्छा, जबकि पहले उन्होंने खुले तौर पर माना था कि उषा और उनके धर्म ने उन्हें जीसस क्राइस्ट के करीब आने में मदद की थी।

इसी तरह उषा ने भी हिंदू धर्म को अपनी शानदार परवरिश से जोड़ा था और बताया था कि इसने उनके माता-पिता को अच्छा इंसान बनाने में भूमिका निभाई थी।

दरअसल, कभी अपनी हिंदू पत्नी के धर्म के बारे में गर्व से मीडिया को बताने वाले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का अब कहना है कि वो चाहते हैं उनकी पत्नी ईसाई धर्म अपना लें। ऐसा क्यों? सिर्फ इसलिए क्योंकि अमेरिका में लगातार कुछ लोग उषा बाला के धर्म को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जबकि कुछ समय पहले उनकी पत्नी मेघन मकैन के इंटरव्यू में भी कहकर आ चुकी हैं कि ईसाई बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वे अपने बच्चों को भारत के बारे में और संस्कृति के बारे में भी पढ़ाती हैं।

उषा के इसी बयान के बाद से लगातार कुछ अमेरिकी उन्हें लगातार निशाने पर ले रहे थे। हिंदू धर्म को गाली दी जा रही थी। देवी-देवताओं पर सवाल उठाए जा रहे थे। अब जेडी वेंस ने इन सब लोगों को जवाब देने की बजाय अपनी प्रतिबद्धता कट्टरपंथी मानसिकता के प्रति दिखाई है।

दिलचस्प बात ये है कि वेंस को उस समय तक अपनी पत्नी के धर्म से समस्या नहीं थी जब इसके जरिए उनका प्रचार हो रहा था। उन्हें परेशानी तब हुई जब ईसाई कट्टरपंथी उन्हें घेरने लगे। उन्होंने अपनी साख बचाने के लिए अपनी पत्नी की पहचान को ही ताक पर रख दिया। वेंस ने अपने अमेरिका में बढ़ते भारत-विरोधी और हिंदू विरोधी एजेंडे को समर्थन दिया जिसे वो चाहते तो थाम सकते थे।

ये जेडी वेंस का बयान है, जहाँ उन्होंने कहा था, “मेरा कभी ईसाई संस्कार (बपतिस्मा) नहीं हुआ। मैं ईसाई धर्म में पला-बढ़ा, लेकिन मेरा बपतिस्मा नहीं हुआ। पहली बार ये ईसाई संस्कार 2018 में हुआ था। उसके बाद जब मैं ईसाई धर्म से जुड़ने लगा तब मेरी पत्नी ने मेरा बहुत साथ दिया। वह सच में ईसाई नहीं है। उसका लालन-पालन भी ईसाई परिवार में नहीं हुआ। लेकिन उसने मेरा बहुत साथ दिया।”

फॉक्स न्यूज के कैमरे पर ऐसा बयान देने वाले जेडी वेंस आज अमेरिका को ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ बनाने के नाम पर ईसाई कट्टरपंथियों को बढ़ावा दे रहे हैं। भारतीयों के खिलाफ हो रही हिंसा पर उनका भले कोई बयान न आया हो लेकिन अपनी ही पत्नी के धर्म को बदलवाने की उनकी इच्छा अब साफ हो रही है। वो जानते हैं उनके कदम से उनके परिवार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

‘भूरा बाल साफ करो’: जिस ‘नारे’ को मारिया शकील बता रही राजनीतिक ‘जरूरत’, उसकी आड़ में लालू-राबड़ी के ‘जंगलराज’ में किया गया सवर्णों का नरसंहार

बिहार की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे पूर्व मंत्री शकील अहमद खान की बेटी मारिया शकील के एक कथित बयान से शुरू हुआ है। आरोप है कि मारिया शकील ने इंडिया टुडे के एक टीवी शो के दौरान, 1990 के दशक के उस कुख्यात नारे ‘भूरा बाल साफ करो’ को उस समय की ‘जरूरत’ (Need of the Hour) या ‘राजनीतिक मजबूरी’ बताया।

मारिया शकील के इस कथित बयान का सीधा मतलब यह है कि 1990 के दशक में लालू यादव की सरकार के दौरान ऊँची जाति के समुदाय (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला/कायस्थ) के खिलाफ जो बड़े बदलाव हो रहे थे, उसमें यह नारा एक जरूरी चाल या उपकरण था। इस तरह, मारिया शकील ने अप्रत्यक्ष रूप से लालू यादव के शासनकाल ‘जंगल राज’ में ऊँची जाति के लोगों पर हुए कथित अत्याचारों, हत्याओं (नरसंहार) और उन्हें सत्ता-संपत्ति से दूर कर दिए जाने को सही ठहराने की कोशिश की है। उनके इस बचाव ने सोशल मीडिया पर लोगों को भड़का दिया है, जो पूछ रहे हैं कि ऐसी हिंसा को कोई कैसे ‘जरूरत’ बता सकता है।

नीचे वीडियो इंडिया टुडे की यूट्यूब की है। इस वीडियो में 19:25 पर मारिया शकील ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को 1990 के दशक के लालू यादव के ‘जंगलराज’ की ‘राजनीतिक जरूरत’ बताती है।

मारिया शकील के बयान पर सोशल मीडिया का गुस्सा: ‘जंगल राज’ को बताया ‘जरूरत’

मारिया शकील के कथित बयान ‘भूरा बाल साफ करो’ नारे को ‘राजनीतिक आवश्यकता’ बताया, पर सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई है। लोगों ने इस बयान को ‘जंगल राज’ और नरसंहार को सही ठहराने जैसा बताया है।

एक यूजर ने सीधे सवाल किया, “वाह! मारिया शकील जी के अनुसार, 90 के दशक में ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसा जातिवादी नारा बिहार की ‘जरूरत’ था। सवर्णों के नरसंहार के लिए दिए जाने वाले इस नारे को कोई पत्रकार कैसे सही ठहरा सकती है?”

एक अन्य यूजर ने गुस्से में कहा, “नेशनल टीवी पर ‘जंगल राज’ के जहर को ‘जरूरत’ बताना… ये बिहार के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। मतलब, ‘जंगलराज’, ‘अपहरण-उद्योग’, ‘पलायन’… ये सब उस समय की माँग थी? और क्या भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला की हत्याएँ भी एक ‘आवश्यकता’ थीं?”

एक यूजर ने मारिया शकील को टैग करते हुए तीखी आलोचना की। यूजर ने लिखा, “अगर आपके लिए ‘भूरा बाल साफ करो’ एक राजनीतिक मजबूरी थी, तो क्या किसी समूह के नरसंहार को सामाजिक न्याय कहा जाएगा? इस तर्क से तो आप कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को भी सही ठहरा देंगी। मैं खुद ब्राह्मण नहीं हूँ, फिर भी इस बयान से बहुत आहत हूँ।”

‘भूरा बाल साफ करो’: बिहार की राजनीति का एक कड़वा नारा

‘भूरा बाल साफ करो’ नारा 1990 के दशक में बिहार की राजनीति में केवल एक नारा नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश का हथियार था, जिसका उद्देश्य समाज को बाँटना था। यह बेहद विवादित और नफरत भरा प्रतीक था, जिसने सीधे-सीधे राज्य की चार सबसे प्रभावशाली ऊँची जातियों को निशाना बनाया। भूरा बाल- ‘भू यानि भूमिहार’, ‘रा यानि राजपूत’, ‘बा यानि ब्राह्मण’, ‘ल यानि लाला (कायस्थ)’।

लालू के जंगलराज का नारा ‘भूरा बाल साफ करो’

इन चारों समुदायों ने लंबे समय तक बिहार की राजनीति और समाज पर अपना दबदबा बनाए रखा था। इस नारे का असली मकसद लालू प्रसाद यादव की ‘सामाजिक न्याय’ की आड़ में नफरत की राजनीति करना था। रणनीति साफ थी कि पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों को एक साथ लाकर एक विशाल वोट बैंक तैयार करना और इस विभाजनकारी गठबंधन की मदद से इन ऊँची जातियों के पुराने राजनीतिक प्रभुत्व को पूरी तरह से ‘साफ’ या खत्म कर देना। यह बिहार के सवर्ण समाज को जातियों में तोड़ने और उनके बीच डर पैदा करने की एक गहरी चाल थी।

जंगल राज और अपर कास्ट पर अत्याचार

लालू प्रसाद यादव के 1990 के दशक के शासनकाल को अक्सर ‘जंगल राज’ कहकर पुकारते हैं। इस दौर में बिहार की कानून-व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी थी। यह समय राज्य में जातीय हिंसा, बड़े पैमाने पर फिरौती के लिए अपहरण और लोगों के बड़े पैमाने पर एक जगह से दूसरी जगह चले जाने (पलायन) के लिए याद किया जाता है।

इस पूरे दौर में जमीन के विवाद और सामाजिक रुतबे की लड़ाई के चलते कई इलाकों में जातीय हिंसा भड़क उठी। गरीब और पिछड़ी जातियों तथा अमीर सवर्ण जमींदारों के बीच हिंसक टकराव हुए। नतीजतन, कई जगहों पर बड़ी संख्या में लोगों की हत्याएँ (नरसंहार) हुईं। इन घटनाओं ने राज्य को हिंसा के गहरे दौर में धकेल दिया।

‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे विभाजनकारी नारों के माहौल में, ऊँची जाति के समुदायों (सवर्णों) ने आरोप लगाया कि लालू यादव की सरकार में उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया। कई सवर्ण परिवारों को इस हिंसा में गंभीर जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा।

उनका यह मानना था कि उन्हें केवल राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं किया गया, बल्कि उनके खिलाफ हुई हिंसा पर भी सरकार ने कोई ख़ास कदम नहीं उठाया। कानून-व्यवस्था इतनी बिगड़ गई थी कि समाज के हर वर्ग में डर का माहौल था, लेकिन ऊँची जातियों के बीच यह डर सबसे ज़्यादा था कि उनकी जान-माल की सुरक्षा खतरे में थी। इसी वजह से राजधानी और राज्य के बाहर पलायन की खबरें आम हो गईं।

मारिया… ‘भूरा बाल साफ करो’ जरूरत नहीं, सिर्फ बिहार के जख्मों पर नमक

मारिया शकील का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि बिहार के अतीत के जख्मों को फिर से कुरेदने जैसा है। अगर कोई पत्रकार या सार्वजनिक बुद्धिजीवी इस हिंसक प्रतीक को ‘जरूरत’ कहे तो यह उस संवेदनशीलता की कमी दिखाता है जो लोकतंत्र की आत्मा है। राजनीति का असली मकसद किसी वर्ग को खत्म करना नहीं, बल्कि सबको बराबरी के साथ खड़ा करना है। ‘भूरा बाल साफ करो’ जैसे नारे बिहार को विभाजित कर गए थे और आज अगर कोई उन्हें सही ठहराता है तो यह संकेत है कि बिहार की राजनीति अभी भी उस अंधेरे दौर से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है।

ऑडिशन के बहाने 17 बच्चों को बनाया बंधक, माँगे ‘काम’ के 2 करोड़: जिस रोहित आर्या की मुंबई पुलिस की गोली से गई जान, उसकी क्या थी मंशा

मुंबई में गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) को एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई, जब 50 वर्षीय रोहित आर्य ने पवई के एक ऑडिशन थिएटर में 17 बच्चों को बंधक बना लिया। कुछ घंटे बाद पुलिस ने अभियान चलाकर सभी बच्चों को सुरक्षित बचा लिया, लेकिन मुठभेड़ में रोहित आर्य की मौत हो गई।

घटना पवई के महावीर क्लासिक बिल्डिंग स्थित आरए स्टूडियो में हुई। पुलिस के मुताबिक, रोहित आर्य ने बच्चों को ‘ऑडिशन’ के बहाने बुलाया था। बच्चे महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से आए थे। जब वे पहुँचे, तो उसने दरवाजा बंद कर सभी को अंदर बंधक बना लिया।

बच्चों को बंधक बनाने के बाद रोहित आर्य ने एक वीडियो बनाया जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वीडियो में उसने कहा कि महाराष्ट्र शिक्षा विभाग पर उसके 2 करोड़ रुपए बकाया हैं और उसे न चुकाने के कारण वह आत्महत्या करने की सोच रहा था। उसने कहा कि उसकी माँगें सरल, नैतिक और न्यायसंगत हैं और वह सिर्फ कुछ अधिकारियों से बात करना चाहता है।

दोपहर में जब यह खबर पुलिस को मिली, तो पवई पुलिस स्टेशन से एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने काफी देर तक रोहित को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह बच्चों को छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। स्थिति गंभीर होने पर पुलिस ने बाथरूम के रास्ते अंदर घुसकर कार्रवाई की।

करीब साढ़े तीन घंटे लंबे रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान रोहित ने पुलिस पर गोली चलाने की कोशिश की, जिसके जवाब में पुलिस ने फायरिंग की। एक गोली उसके सीने के दाईं ओर लगी। उसे तुरंत जेजे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

सभी 17 बच्चे सुरक्षित बचा लिए गए। पुलिस को मौके से एक एयरगन और कुछ रासायनिक पदार्थों के कंटेनर मिले हैं। पुलिस अब इस मामले की जाँच कर रही है कि रोहित आर्य के दावे कितने सही थे और उसके पास मौजूद रसायनों का उद्देश्य क्या था।

कौन था रोहित आर्य और क्या लगाए आरोप?

पुणे के रहने वाले रोहित आर्य का आरोप था कि उसे ‘मुख्यमंत्री माय स्कूल, ब्यूटीफुल स्कूल’ अभियान के तहत चल रहे स्वच्छता मॉनिटर प्रोजेक्ट के काम का भुगतान नहीं किया गया। उसका कहना था कि उसने यह प्रोजेक्ट एक निजी फर्म के जरिए किया था, लेकिन कंपनी ने उसे मेहनताना नहीं दिया।

आर्य का दावा था कि राज्य शिक्षा विभाग ने उनके काम के लिए 2 करोड़ की राशि मंजूर की थी, लेकिन अब तक उसे वह पैसा नहीं मिला। इस मुद्दे पर उसने पुणे, मुंबई और नागपुर में कई बार प्रदर्शन भी किए।

उसने बताया था कि 2024 में वे दो बार भूख हड़ताल पर बैठा थे और उस समय तत्कालीन शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर ने उसे निजी तौर पर आश्वासन दिया था कि उसका बकाया जल्द चुकाया जाएगा। आर्य के मुताबिक, केसरकर ने उसे व्यक्तिगत सहायता के तौर पर 7 लाख और 8 लाख के दो चेक भी दिए थे और बाकी राशि बाद में देने का वादा किया था, लेकिन वह रकम कभी नहीं मिली।

मई 2025 में रोहित आर्य ने फिर से विरोध करते हुए मुंबई के मलबार हिल स्थित एक मंत्री के बंगले के बाहर प्रदर्शन किया था, जिसके बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया था। बताया जाता है कि वह लगातार कई मीडिया चैनलों और पत्रकारों के संपर्क में था और गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) को भी उसने अपना वीडियो कई पत्रकारों को भेजा था।

राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री ने आर्य के आरोपों का किया खंडन

शिवसेना नेता और महाराष्ट्र के पूर्व शिक्षा मंत्री दीपक केसरकर ने गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने रोहित आर्य को उनके कार्यकाल (2022 से 2024) के दौरान ‘स्वच्छता मॉनिटर’ नामक जागरूकता कार्यक्रम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाने को कहा था।

केसरकर ने बताया कि जब आर्य ने शिक्षा विभाग पर बकाया राशि न देने का आरोप लगाया, तो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपनी जेब से उसे कुछ पैसे दिए थे। लेकिन उन्होंने आर्य के 2 करोड़ के दावे पर सवाल उठाया।

उन्होंने कहा, “मैंने उसकी मदद की थी और अपने खाते से उसे चेक दिया था। लेकिन उसका यह दावा कि 2 करोड़ बाकी हैं, सही नहीं लगता। सरकारी भुगतान तभी होते हैं जब सभी औपचारिकताएँ और दस्तावेज पूरे किए जाते हैं।”

केसरकर ने आगे कहा कि आर्य ‘स्वच्छता मॉनिटर’ नाम की योजना चला रहा था और उसने सरकार के अभियान में भाग लिया था। विभाग का कहना था कि उसने कुछ बच्चों से सीधे फीस ली थी, जबकि आर्य ने इसे नकारा था।

केसरकर ने कहा कि उसे विभाग से बात कर मामला सुलझाना चाहिए था, न कि ऐसा गलत कदम (बच्चों को बंधक बनाना) उठाना चाहिए था। उन्होंने जोड़ा, “अगर प्रक्रिया सही ढंग से पूरी की जाती है तो सरकारी भुगतान कभी रोके नहीं जाते।”

वहीं, महाराष्ट्र शिक्षा सचिव रंजीत सिंह देओल ने स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से रोहित आर्य को 2 करोड़ देने का कोई समझौता नहीं हुआ था। उन्होंने कहा, “वह इस परियोजना में स्वयंसेवक के रूप में शामिल थे और उनके काम के लिए उन्हें एक प्रमाणपत्र दिया गया था। बाद में ‘माय शाला, सुंदर शाला’ कार्यक्रम को लागू करने पर चर्चा हुई थी, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाई। महाराष्ट्र सरकार पर उनका कोई बकाया नहीं है।”

महाराष्ट्र शिक्षा विभाग ने जारी किया स्पष्टीकरण

महाराष्ट्र राज्य शिक्षण विभाग ने गुरुवार (30 अक्टूबर 2025) को एक बयान जारी कर रोहित आर्य से जुड़े विवाद पर सफाई दी। विभाग ने बताया कि आर्य की कंपनी अप्सरा मीडिया एंटरटेनमेंट नेटवर्क को साल 2022 में ‘स्वच्छता मॉनिटर’ पहल के तहत 9.90 लाख का भुगतान किया गया था।

इसके बाद, वित्त वर्ष 2023-24 में इसी परियोजना के अगले चरण के लिए, जो ‘माझी शाळा सुंदर शाळा’ (My School, Beautiful School) योजना के तहत चलनी थी, 2 करोड़ की मंजूरी दी गई थी, लेकिन आर्य द्वारा भेजा गया प्रस्ताव विभाग को स्वीकार्य नहीं होने के कारण यह योजना लागू नहीं हो सकी।

विभाग ने बताया कि आर्य ने 2024-25 में फिर से 2 करोड़ से अधिक के बजट के साथ नया प्रस्ताव भेजा, लेकिन उसी दौरान सरकार को पता चला कि उन्होंने स्कूलों से बिना सरकारी अनुमति के ‘रजिस्ट्रेशन फीस’ वसूली है।

इस पर अगस्त 2024 में विभाग ने आर्य को निर्देश दिया कि वे स्कूलों से एकत्र की गई यह रकम सरकारी खाते में जमा करें और इसके बाद सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ विस्तृत बजट दोबारा प्रस्तुत करें। हालाँकि, विभाग के अनुसार, आर्य ने न तो पैसा जमा किया और न ही माँगे गए दस्तावेज जमा किए।

अपनी हिंदू पत्नी को ईसाई बनते देखना चाहता है US का उप राष्ट्रपति जेडी वेंस, धर्म को लेकर लगातार सवाल पूछ रहे थे गोरे अमेरिकी: सामने आ चुके हैं हिंदूफोबिया से जुड़े मामले

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेम्स डेविड (JD Vance) वेंस ने बुधवार (29 अक्टूबर 2025) को कहा वो अपनी हिंदू पत्नी उषा को ईसाई बनते देखना चाहेंगे। वेंस की पत्नी उषा बाला चिलुकुरी तेलुगु मूल के हिंदू परिवार से आती हैं, जो अब भी हिंदू धर्म का पालन करती हैं। वेंस ने कहा कि वो चाहेंगे कि पत्नी (उषा) भविष्य में स्वेच्छा (Free Will) और आपसी सम्मान (Mutual Respect) के साथ ईसाई मजहब अपना लें। उन्होंने यह बयान मिसिसिपी में आयोजित टर्निंग पॉइंट यूएसए (Turning Point USA) के एक कार्यक्रम में दिया।

वेंस ने कहा, “ज्यादातर रविवार को उषा मेरे साथ चर्च जाती हैं। मैंने उनसे हमेशा कहा है और आज भी 10,000 लोगों के सामने दोहरा रहा हूँ कि क्या मैं चाहता हूँ कि एक दिन वे भी चर्च में वही अनुभव करें जो मैंने किया? हाँ, मैं सच में ऐसा चाहता हूँ, क्योंकि मैं ईसाई उपदेशों में विश्वास करता हूँ और आशा करता हूँ कि एक दिन मेरी पत्नी भी इसे उसी दृष्टि से देखें।”

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में एक कार्यक्रम में अपनी पत्नी उषा बाला चिलुकुरी के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में उनकी पत्नी ‘स्वेच्छा से’ ईसाई मजहब अपना सकती हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह उनकी पत्नी की अपनी इच्छा पर निर्भर है, क्योंकि ईश्वर ने हर व्यक्ति को स्वतंत्र इच्छा (free will) दी है।

वेंस ने बताया कि उनके घर में दोनों धर्मों (ईसाई और हिंदू) के बीच एक समझौता और संतुलन है। उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी ईसाई नहीं हैं, वे एक हिंदू परिवार में पली-बढ़ी हैं, लेकिन उनका परिवार बहुत धार्मिक नहीं रहा। हमारे घर में धर्म को लेकर कभी कोई समस्या नहीं होती क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे की मान्यताओं का सम्मान करते हैं।”

वेंस ने बताया कि उन्होंने और उषा ने मिलकर तय किया है कि उनके बच्चों की परवरिश ईसाई मजहब के अनुसार होगी। उन्होंने कहा, “हमारे दो बड़े बच्चे एक ईसाई स्कूल में पढ़ते हैं और हमारा 8 साल का बेटा पिछले साल अपनी पहली कम्यूनियन (First Communion) कर चुका है।”

वेंस ने यह भी मजाक में बताया कि उनकी पत्नी उषा उस पादरी (priest) को उनसे ज्यादा जानती हैं, जिन्होंने उनका बपतिस्मा (baptism) करवाया था।

धर्म और राजनीति के एकीकरण के पक्षधर हैं वेंस

रिपब्लिकन नेता जेडी वेंस ने यह कहते हुए असहमति जताई कि धर्म को राजनीति और सार्वजनिक जीवन से अलग रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “जो कोई भी कहता है कि संविधान ऐसा करने को कहता है, वह झूठ बोल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘कॉन्ग्रेस किसी धर्म की स्थापना से संबंधित कोई कानून नहीं बनाएगी’ वाली बात का गलत अर्थ निकाला और धर्म को सार्वजनिक जीवन से बाहर कर दिया। यह एक बड़ी गलती थी, जिसके नतीजे आज भी हम भुगत रहे हैं।”

वेंस ने आगे कहा, “मुझे इस बात पर कोई शर्म नहीं है कि मैं मानता हूँ कि ईसाई मूल्य (Christian values) इस देश की नींव हैं। जो लोग खुद को ‘तटस्थ’ बताते हैं, वे अक्सर अपने छिपे एजेंडे के साथ आते हैं। मैं कम से कम ईमानदारी से कहता हूँ कि अमेरिका की ईसाई नींव एक अच्छी बात है।”

यह बयान वेंस ने मिसिसिपी में आयोजित एक कार्यक्रम में कॉलेज छात्रों के बीच बातचीत के दौरान दिया। इस मौके पर मौजूद रूढ़िवादी भीड़ ने उनके विचारों पर जोरदार तालियाँ बजाईं। यह कार्यक्रम उनके दिवंगत मित्र और कंजरवेटिव नेता चार्ली किर्क की जगह आयोजित किया गया था, जिनकी पिछले महीने यूटा में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

उषा ने ईसाई धर्म अपनाने में दिखाई अनिच्छा

अमेरिका की दूसरी महिला (Second Lady) उषा वेंस ने कुछ महीने पहले अपने परिवार के धार्मिक जीवन पर बात की थी। उन्होंने बताया कि वे हिंदू हैं, जबकि उनके पति जेडी वेंस कैथोलिक हैं और दोनों अपने बच्चों को एक Interfaith यानी दो धर्मों वाले घर में पाल रहे हैं।

मेगन मैककेन से बातचीत में उषा ने कहा, “कैथोलिक धर्म अपनाने पर कुछ जिम्मेदारियाँ आती हैं, जैसे बच्चों को उसी धर्म में बड़ा करना।” लेकिन उन्होंने साफ किया कि वे खुद कैथोलिक धर्म अपनाने की इच्छा नहीं रखतीं। उन्होंने कहा, “हमें इस पर कई गंभीर बातें करनी पड़ीं कि जब मैं कैथोलिक नहीं हूँ और धर्म परिवर्तन नहीं करना चाहती, तब बच्चों की परवरिश कैसे करें।”

उषा ने बताया कि उन्होंने बच्चों को खुद अपना रास्ता चुनने की आजादी दी है। उनके बच्चे कैथोलिक स्कूल में पढ़ते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें हिंदू परंपराओं की भी जानकारी दी जाती है, जैसे घर पर धार्मिक किताबें, वीडियो, और हाल की भारत यात्रा, जहाँ उन्होंने बच्चों को कई धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभव कराए।

उषा ने कहा, “बच्चों को पता है कि मैं कैथोलिक नहीं हूँ और वे दोनों परंपराओं को समझते हैं। चर्च जाना हमारे लिए परिवार के साथ समय बिताने का एक अनुभव है, न कि किसी धर्म परिवर्तन का हिस्सा।”

जानिए कैसे उषा की हिंदू जड़ों ने वेंस को उनके विश्वासों में दिया समर्थन

जेडी वेंस ने अपनी पत्नी उषा से येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान मुलाकात की थी, जब वे अभी कैथोलिक धर्म में परिवर्तित नहीं हुए थे। वेंस का बचपन एक गैर-ईसाई परिवार में बीता और वे चर्च जाया नहीं करते थे। उन्होंने हाल ही में एक कार्यक्रम में बताया, “जब मैं उषा से मिला था, तब खुद को मैं नास्तिक या अज्ञेयवादी (agnostic) मानता था और वह भी खुद को ऐसा ही मानती थीं।”

दिलचस्प बात यह है कि जिस हिंदू आस्था को वेंस अब चाहते हैं कि उनकी पत्नी ईसाई धर्म से बदल लें, उसी आस्था ने उनके जीवन में कई मुश्किलों को पार करने और उनके कैथोलिक विश्वास को मजबूत करने में मदद की है।

वेंस ने फॉक्स न्यूज को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “मेरा कभी बपतिस्मा नहीं हुआ था। मैं ईसाई परिवार में पला-बढ़ा, लेकिन मेरा बपतिस्मा पहली बार 2018 में हुआ। उषा गैर-ईसाई परिवार में पली-बढ़ी हैं। जब मैंने दोबारा अपने धर्म से जुड़ना शुरू किया, तब उषा ने बहुत साथ दिया।”

उषा ने गर्व से कहा, “मेरे माता-पिता हिंदू हैं और यही उनकी अच्छाई और पालन-पोषण की ताकत का कारण है। मैंने देखा है कि इस आस्था ने हमारे परिवार को कितना मजबूत बनाया। जब जेडी अपनी राह खोज रहे थे, तो यह निर्णय उन्हें सही लगा।”

दिलचस्प है कि वेंस, जो कभी डोनाल्ड ट्रंप के आलोचक रहे थे, उन्होंने पहले यह भी स्वीकार किया था कि अपनी हिंदू पत्नी को हर रविवार चर्च ले जाने पर उन्हें थोड़ा अपराधबोध होता था। हालाँकि उन्होंने बताया कि उषा को इससे कोई आपत्ति नहीं थी, भले ही उन्होंने एक नियमित चर्च जाने वाले व्यक्ति से शादी करने की उम्मीद नहीं की थी।

अमेरिका में बढ़ती हिंदू दुश्मनी और भारत विरोधी बयानबाजी के बीच रुख में आश्चर्यजनक बदलाव

राजनीति में नेताओं का अपने बयान बदलना, वादे तोड़ना या स्वार्थ के लिए गलत तरीकों का सहारा लेना आम बात है। लेकिन वेंस के हालिया बयान ने अमेरिकी समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुकी श्रेष्ठतावादी (Supremacist) सोच को उजागर कर दिया है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब इस तरह की घृणित सोच सामने आई हो। भारत-विरोधी भावना और हिंदुओं के प्रति नफरत कई वर्षों से मौजूद है और इंटरनेट के युग में यह और खुलकर सामने आने लगी है। सोशल मीडिया पर यह नफरत अब केवल शब्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वास्तविक हिंसा और अपराधों में भी बदल गई है, खासकर भारतीय समुदाय के खिलाफ।

पिछले महीने डलास (Dallas) में एक बेहद दर्दनाक घटना हुई। कर्नाटक के रहने वाले होटल मैनेजर चंद्र मौली नागमल्लैया की बेरहमी से हत्या कर दी गई। उन्होंने एक मेहमान को खराब वॉशिंग मशीन इस्तेमाल न करने की सलाह दी थी, जिस पर 37 वर्षीय योर्डानिस कोबोस-मार्टिनेज (Yordanis Cobos-Martinez) नाराज हो गया।

उसने नागमल्लैया का सिर काट दिया, उसे पार्किंग में लात मारकर फेंक दिया और बाद में कूड़ेदान में डाल दिया। यह सब उनके परिवार के सामने हुआ, जिन्होंने रोकने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। एक मामूली बात पर इतना क्रूर अपराध इस बात का सबूत है कि भारतीयों के प्रति फैल रही नफरत कितनी खतरनाक रूप ले चुकी है।

इसी तरह, जनवरी 2023 में आंध्र प्रदेश की 23 वर्षीय छात्रा जाह्नवी कंदुला की मौत सिएटल (Seattle) में एक पुलिस अधिकारी केविन डेव (Kevin Dave) की गाड़ी से टकराने से हुई। बाद में सामने आए बॉडीकैम वीडियो में सिएटल पुलिस यूनियन के नेता डैनियल ऑडरर (Daniel Auderer) को इस घटना का मजाक उड़ाते हुए देखा गया।

वह हँसते हुए कह रहा था, “उसकी उम्र सिर्फ 26 साल थी, उसकी जिंदगी की कोई खास कीमत नहीं” और शहर को बस 11,000 डॉलर का चेक लिख देना चाहिए।

डलास में ही एक और घटना में 23 वर्षीय रिचर्ड फ्लोरेज (Richard Florez) ने हैदराबाद के छात्र चंद्रशेखर पोल (Chandrashekar Pole) को गोली मारकर हत्या कर दी। पोल 2023 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए थे और गैस स्टेशन पर काम कर रहे थे।

इन घटनाओं से साफ है कि अमेरिका में भारतीयों, खासकर हिंदुओं के प्रति बढ़ती नफरत केवल ऑनलाइन नहीं, बल्कि सड़कों पर भी हिंसा का रूप ले रही है। उन्हें ‘कमतर इंसान’ समझा जाने लगा है, जिससे वे नस्लभेदी लोगों और अपराधियों दोनों के लिए आसान निशाना बन गए हैं।

नव-नाजी भारतीयों के प्रति प्रदर्शित करते हैं नरसंहारी घृणा और हिंदू देवताओं का करते हैं उपहास

जब भारतीयों पर हिंसा और हमले बढ़ रहे हैं, तब कुछ नस्लवादी लोग सोशल मीडिया पर सनातन धर्म और उसके देवी-देवताओं का मजाक उड़ाकर नफरत फैलाने में लगे हैं। वे इसे ‘ईसाई देशों’ से खत्म करने की बातें तक कर रहे हैं।

दिवाली के समय तो यह नफरत चरम पर पहुँच गई थी, जब हिंदुओं के उत्सव और खुशी उन्हें बर्दाश्त नहीं हुई और उन्होंने जिहादियों की तरह घृणित हमले शुरू कर दिए।

इनमें से कई लोग हिंदुओं को ‘पैगन’ (असभ्य या मूर्तिपूजक) कहते हैं, देवी-देवताओं को ‘झूठा या शैतानी’ बताते हैं और दूसरों को ‘कर्स विष्णु’ लिखने के लिए उकसाते हैं ताकि वे दिखा सकें कि वे भारतीय नहीं हैं। ऐसा व्यवहार खास तौर पर अमेरिका के Make America Great Again (MAGA) समूह में देखा जा रहा है।

यह प्रवृत्ति केवल कुछ कट्टर समर्थकों तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी राजनीति तक पहुँच गई है।

टेक्सास के रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवार अलेक्जेंडर डंकन ने भगवान हनुमान को ‘झूठा देवता’ कहकर उनका विरोध किया और यह तक कहा कि यह एक ईसाई देश है। उन्होंने अपने बयान को सही ठहराने के लिए बाइबिल की लाइन्स भी उद्धृत किए और बाद में अपने हिंदू-विरोधी पोस्ट का बचाव किया।

यह गिरोह तो यहाँ तक चाहता है कि सभी भारतीयों को अमेरिका से निकाला जाए, यहाँ तक कि ट्रम्प प्रशासन में काम कर चुकी तुलसी गबार्ड जैसी नेता को भी, जो सामोन और गोरी मूल की हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह हिंदू हैं।

इनके अनुसार नागरिकता या राजनीतिक विचारधारा कोई मायने नहीं रखती, जब तक व्यक्ति उनकी नस्लवादी सोच के खिलाफ हो।

ये लोग उपनिवेशवाद और भारतीयों के नरसंहार का महिमामंडन करते हैं, भारत और हिंदुओं के बारे में अपमानजनक बातें करते हैं, झूठे आरोप लगाते हैं और भारतीय उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं ताकि अपने पूर्वजों के खूनी इतिहास को ढका जा सके।

वे खुले तौर पर भारत के खिलाफ ‘सामूहिक नरसंहार’ और ‘नए उपनिवेश’ की धमकियाँ देते हैं।

विडंबना यह है कि इन्हीं गोरे वर्चस्ववादियों ने कभी वर्तामान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के परिवार को भी उनकी पत्नी के कारण निशाना बनाया था, क्योंकि उनकी पत्नी उषा हिंदू हैं। अब वही वेंस अगर खुद हिंदू धर्म पर टिप्पणी कर रहे हैं, तो यह बेहद चिंताजनक है।

अमेरिका, जो खुद को समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का रक्षक बताता है, वहाँ के उपराष्ट्रपति द्वारा ऐसा कहना न केवल विरोधाभास दिखाता है बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि इससे पहले से ही नस्लवाद झेल रहे भारतीय और हिंदू समुदाय पर क्या असर पड़ेगा? क्या इससे ईसाई कट्टरपंथियों और नस्लवादियों को और ताकत नहीं मिलेगी?

इसके अलावा वेंस ने अपनी पत्नी के बारे में पूछे जाने पर ‘हिंदू’ की जगह ‘Agnostic’ जैसा शब्द इस्तेमाल किया, जो उनके निजी पूर्वाग्रहों को भी उजागर करता है। जब किसी हिंदू महिला से विवाह करना आसान था, तो उसके धर्म को स्वीकार करना इतना कठिन क्यों?

धार्मिक स्वतंत्रता पर रिपोर्ट जारी करने वाला वही देश अगर खुद इस दोहरे मापदंड पर चले, तो यह उसकी पाखंडपूर्ण नीतियों और दिखावटी लोकतंत्र का उदाहरण है।

इसके साथ ही, डोनाल्ड ट्रम्प की भारत-विरोधी टिप्पणियाँ, जो उन्होंने मोदी सरकार द्वारा उनकी कुछ माँगें (जैसे कि रूस से तेल न खरीदना, कश्मीर पर उनकी मध्यस्थता मानना  और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करना) न मानने पर दीं, उसने इस नफरत को और भड़काया है।

निष्कर्ष

अमेरिका, जो अक्सर दुनिया, खासकर भारत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता, सहिष्णुता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर भाषण देता है, वास्तव में हमेशा से ईसाई मजहब को अन्य सभी धर्मों से ऊपर रखता आया है। यह देश खुद को ‘आदर्श लोकतंत्र’ या ‘वास्तविक यूटोपिया’ की तरह पेश करता है, जबकि सच्चाई यह है कि यह नस्लवाद और हिन्दू-द्वेष (Hindumisia) का केंद्र है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जब शपथ लेते हैं तो वे संविधान पर नहीं बल्कि बाइबिल पर हाथ रखते हैं, इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका का सर्वोच्च पद भी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष नहीं है। अमेरिकी मीडिया ने भी बरसों से हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रह दिखाया है। 1910 के पुराने अमेरिकी अखबारों में ‘हिंदुओ’ के प्रति नफरत भरे लेख इसका प्रमाण हैं।

डोनाल्ड ट्रंप, जेडी वेंस या फिर आम कट्टर समर्थक, सभी में एक समान सोच दिखती है, वो है हिंदू धर्म का अपमान करना और भारत व भारतीयों को निशाना बनाना। मौजूदा प्रशासन भी यह जानते हुए कि इससे आम भारतीयों और हिंदुओं को नुकसान होता है, फिर भी अपने नस्लवादी वोटबैंक को खुश करने में लगा हुआ है।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने हमेशा अपने हितों और एजेंडे को ही प्राथमिकता दी है। माना जा रहा है कि ट्रंप के कार्यकाल के बाद जेडी वेंस रिपब्लिकन पार्टी (GOP) के संभावित राष्ट्रपति उम्मीदवार होंगे। लेकिन यह भी तय है कि उन्हें गैर-ईसाई पत्नी होने के कारण अपने ही रूढ़िवादी समर्थकों से आलोचना झेलनी पड़ सकती है।

अमेरिका, जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक कहता है, वहाँ अब तक हर राष्ट्रपति ईसाई पुरुष ही रहा है और निकट भविष्य में इसके बदलने की संभावना भी नहीं दिखती। इसलिए यह पूरी तरह संभव है कि वेंस आगामी चुनाव से पहले अपनी पत्नी को ईसाई धर्म अपनाने के लिए राजी करने की कोशिश करें।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

लेफ्ट ने उतारे 100% दागी उम्मीदवार, RJD और कॉन्ग्रेस भी टक्कर देने में पीछे नहीं: बिहारियों को यूँ ही नहीं सता रहा ‘जंगलराज’ का खौफ, 1303 में हर तीसरा दागी

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का पहला चरण जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक पार्टियों के दावे और हकीकत के बीच का फर्क साफ दिखने लगा है। हर पार्टी साफ-सुथरी सरकार, लॉ एंड ऑर्डर और भ्रष्टाचार मुक्त बिहार का वादा कर रही है, लेकिन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट इन दावों पर पानी फेर रही है।

रिपोर्ट बताती है कि चुनाव लड़ रहे कुल 1303 उम्मीदवारों में से 32 फीसदी पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें सबसे ज्यादा दागी उम्मीदवारों को टिकट देने वाली पार्टियाँ हैं- राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कम्युनिस्ट पार्टियाँ (CPI, CPI-M, CPI-ML) और कॉन्ग्रेस। वहीं, जनता दल यूनाइटेड (JDU) इस लिस्ट में सबसे नीचे है, जो दिखाता है कि एनडीए और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू अपराधी छवि वाले उम्मीदवारों से दूर रहने की कोशिश कर रही है। भाजपा भी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।

इस रिपोर्ट ने विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर दिया है, खासकर RJD को जहाँ लालू परिवार के करीबियों पर भारी-भरकम केस हैं। आइए इस रिपोर्ट को विस्तार से समझते हैं और देखते हैं कि कैसे राजनीति में दागियों का बोलबाला है।

बिहार विधानसभा चुनाव में हर तीसरा उम्मीदवार दागी

ADR और बिहार इलेक्शन वॉच ने बिहार चुनाव के पहले फेज के 121 विधानसभा सीटों पर लड़ रहे 1,314 उम्मीदवारों के एफिडेविट्स का विश्लेषण किया। ये एफिडेविट चुनाव आयोग में जमा किए गए हैं, जहाँ उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति, शिक्षा और क्रिमिनल रिकॉर्ड की जानकारी देनी पड़ती है। लेकिन 11 उम्मीदवारों के एफिडेविट स्पष्ट नहीं थे, इसलिए विश्लेषण 1,303 उम्मीदवारों पर आधारित है।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि 423 उम्मीदवारों (32%) ने खुद कबूला है कि उनके ऊपर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें से 354 (27%) पर तो गंभीर अपराधों के केस हैं, जैसे हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार के।

आँकड़ों के मुताबिक…

  • हत्या से जुड़े केस: 33 उम्मीदवारों पर IPC की धारा 302-303 और BNS की धारा 103(1) के तहत केस।
  • हत्या का प्रयास: 86 उम्मीदवारों पर IPC 307 और BNS 109 के केस।
  • महिलाओं पर अत्याचार: 42 उम्मीदवारों पर ऐसे केस, जिसमें 2 पर रेप (IPC 376) के आरोप।

इसके अलावा कई पर भ्रष्टाचार, चुनावी अपराध, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और हत्या-बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के केस हैं।

ये आँकड़े बताते हैं कि बिहार की राजनीति में अपराधीकरण कितना गहरा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, जहाँ पार्टियों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने पर सफाई देनी पड़ती है, पार्टियाँ बेझिझक ऐसे लोगों को मैदान में उतार रही हैं। रिपोर्ट में ये भी जिक्र है कि चुनाव आयोग ने पार्टियों को वेबसाइट पर दागी उम्मीदवारों की जानकारी डालने का आदेश दिया है, लेकिन कई पार्टियाँ इसका पालन नहीं कर रही हैं।

पार्टियों के हिसाब से दागी उम्मीदवारों की जानकारी

पार्टियों के हिसाब से बात करें तो RJD, कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पार्टियों वाला विपक्षी गठबंधन दागी उम्मीदवारों को टिकट देने में सबसे आगे है। वहीं, NDA की पार्टियों (BJP और JDU) ने अपेक्षाकृत कम दागी उम्मीदवार उतारे हैं।

CPI(ML)(L): 14 उम्मीदवारों में से 13 (93%) पर क्रिमिनल केस। इनमें से 9 (64%) पर गंभीर केस। ये वामपंथी पार्टी हमेशा गरीबों और मजदूरों की बात करती है, लेकिन उसके उम्मीदवारों पर हत्या, दंगा और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के केस भरे पड़े हैं।
CPI(M): सीपीआई-एम के 3 में से 3 (100%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस और सभी पर गंभीर केस। पहले चरण में सीपीआई-एम ने सिर्फ 3 उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन 100% रेट के साथ सभी दागी हैं।
CPI: सीपीआई के 5 में से 5 (100%) पर क्रिमिनल केस और 4 (80%) पर गंभीर केस।

पार्टी वाइज दागी प्रत्याशियों की संख्या

RJD: 70 उम्मीदवारों में से 53 (76%) पर क्रिमिनल केस हैं। उनमें भी 42 (60%) पर गंभीर केस हैं। RJD सबसे ज्यादा दागी टिकट देने वाली पार्टी है। खुद चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव की पार्टी को अब भी दागी नेताओं पर भरोसा है।
कॉन्ग्रेस: पार्टी के कुल 23 उम्मीदवारों में से 15 (65%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 15 में से भी 12 (52%) पर गंभीर केस दर्ज हैं।
जन सुराज पार्टी: प्रशांत किशोर की नई पार्टी तो ‘सुराज’ का वादा करती है। लेकिन 114 उम्मीदवारों में से 50 (44%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। उनमें भी 49 (43%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। ये पार्टी भले ही नई है, लेकिन उम्मीदवार पुराने दागी हैं। इसे नई बोतल में पुरानी शराब भी कह सकते हैं।
LJP (राम विलास): चिराग पासवान की पार्टी भी दागी लिस्ट में है। चिरागी पार्टी के 13 में से 7 (54%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं, जिसमें से (38%) पर गंभीर केस हैं।
AAP: अरविंद केजरीवाल की पार्टी बिहार में नई है, लेकिन उसके उम्मीदवारों में भी दागी शामिल हैं। आप के 44 में से 12 (27%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें से 9 (20%) पर गंभीर केस हैं।

BSP: बहुजन समाज पार्टी ने पहले चरण में 89 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं, जिसमें से 18 (20%) पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इन 16 (18%) पर गंभीर केस हैं।
BJP: बीजेपी के 48 में से 31 (65%) पर क्रिमिनल केस हैं, जिसमें 27 (56%) पर गंभीर केस हैं। बीजेपी एनडीए की मुख्य पार्टी है, हालाँकि दागी उम्मीदवारों के मामले में वो मुख्य विपक्षी पार्टियों से पीछे नजर आती है।
JDU: जदयू के 57 में से सिर्फ 22 (39%) उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस हैंष इनमें से 15 (26%) पर गंभीर केस दर्ज हैं। आँकड़ों को देखेंगे तो दागियों के मामले में इंडी गठबंधन की पार्टियों की तुलना में नीतीश कुमार की पार्टी इस लिस्ट में सबसे पीछे है। ये आँकड़े बताते हैं कि JDU अपराधी छवि वालों से दूर रहने की नीति पर चल रही है।

पार्टी के हिसाब से कितने प्रतिशत उम्मीदवारों पर केस, कितने केस गंभीर (फोटो साभार: ADR)

RJD के प्रमुख दागी नेताओं में लालू परिवार और उनके करीबी शामिल

RJD पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उसके 76% उम्मीदवार दागी हैं। लालू प्रसाद यादव खुद चारा घोटाले में सजा काट चुके हैं और उनकी पार्टी अब भी ऐसे लोगों को टिकट दे रही है।

तेजस्वी यादव (रघोपुर से): RJD के स्टार कैंडिडेट और पूर्व डिप्टी CM तेजस्वी यादव के ऊपर IRCTC घोटाले में CBI जाँच चल रही है। इसके अलावा चुनावी हिंसा और संपत्ति से जुड़े कई केस दर्ज हैं। तेजस्वी हमेशा दावे करते हैं कि ये राजनीतिक साजिश है, लेकिन कोर्ट से लेकर तमाम चार्जशीट जो दाखिल हैं, उनमें कहीं बेगुनाही की बात नहीं कही गई है। एडीआर द्वारा जारी आँकड़ों में वही जानकारियाँ हैं, जो उन्होंने अपने शपथ पत्र में दी हैं। तेजस्वी यादव पर कुच 22 केस दर्ज हैं, इसमें आईपीसी के तहत 13 और बीएनएस की तहत 4 धाराओं में केस दर्ज हैं। गंभीर मामलों की संख्या 17 है।

तेजस्वी यादव के ऊपर दर्ज केस, एफिडेविट के आधार पर (स्रोत-ADR)

रवींद्र प्रसाद यादव (महनार से): वैशाली की महनार विधानसभा सीट से उतरे RJD के वरिष्ठ नेता रवींद्र प्रसाद यादव पर 26 धाराओं में केस हैं। उनके ऊपर हत्या का प्रयास (IPC 307) से लेकर महिला विरोधी अपराध तक के केस हैं।

रिपोर्ट कहती है कि RJD के 60% उम्मीदवारों पर गंभीर केस हैं, जो हत्या, बलात्कार और भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। पार्टी के मुखिया लालू हमेशा कहते हैं कि ये केंद्र की साजिश है, लेकिन वोटर अब सोच रहे हैं कि क्या RJD सच में बदलाव ला सकती है? क्योंकि जब ये सरकार यानी एनडीए की सरकार नहीं थी, तब भी तो लालू यादव के खिलाफ केस चल रहे थे।

अब मतदाताओं के पाले में गेंद, जंगलराज या सुशासन: 6 नवंबर को बटन से फैसला

ये रिपोर्ट बिहार चुनाव को नई दिशा दे सकती है। विपक्ष दागी उम्मीदवारों से भरा है, जबकि NDA कम दागी टिकट देकर विश्वास जीत सकता है। बहरहाल, ये तो अब बिहार के मतदाताओं को सोचना है कि क्या दागी नेता उनके जीवन में बदलाव ला पाएँगे या फिर उन्हें चाहिए साफ-सुथरी इमेज वाली सरकार। अब 6 नवंबर को पहले चरण का मतदान होना है, जिसमें बिहार के मतदाता अपनी पसंद-नापसंद ईवीएम के जरिए चुन ही लेंगे। और फिर नतीजे 14 नवंबर 2025 को सामने आ जाएँगे कि बिहार के लोगों ने क्या चुना।

युवा को 1 करोड़ रोजगार, किसान को ₹9000 सालाना सम्मान, मंदिरों में विकास और उद्योगों में निवेश: बिहार के लिए NDA ने लिए ’25 संकल्प’, जानिए सबकी डिटेल

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले NDA ने अपना साझा ‘संकल्प पत्र’ (घोषणा पत्र) जारी कर दिया है। यह घोषणा पटना के होटल मौर्य में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई, जिसे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संबोधित किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा समेत NDA के सभी प्रमुख नेता मौजूद रहे।

‘संकल्प पत्र’ में रोजगार, महिला सशक्तिकरण, किसान कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत ढाँचे के विकास पर खास ध्यान दिया गया है। नीचे NDA के ‘संकल्प पत्र’ में किए गए 25 प्रमुख वादों के मुख्य बिंदु दिए गए हैं:

रोजगार और कौशल विकास:

. 1 करोड़ सरकारी नौकरी और रोजगार देने का वादा।

. कौशल जनगणना कराकर युवाओं को कौशल आधारित रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा।

. हर जिले में मेगा स्किल सेंटर बनाकर बिहार को ग्लोबल स्किलिंग सेंटर बनाया जाएगा।

महिला सशक्तिकरण:

. मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को 2 लाख रुपए तक की सहायता दी जाएगी।

. 1 करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाया जाएगा।

. ‘महिला मिशन करोड़पति’ से उद्यमी महिलाओं को करोड़पति बनाने की दिशा में काम होगा।

किसान कल्याण:

. कर्पूरी ठाकुर किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को सालाना 9,000 रुपए मिलेंगे।

. एग्री-इंफ्रास्ट्रक्चर में 1 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा।

. पंचायत स्तर पर धान, गेहूँ, मक्का, दलहन की एमएसपी पर खरीद होगी।

. मत्स्य-दुग्ध मिशन योजना से प्रत्येक मत्स्य पालक को 9,000 रुपए का लाभ।

. हर प्रखंड में दुग्ध चिलिंग व प्रोसेसिंग सेंटर, 5 मेगा फूड पार्क, और कृषि निर्यात को दोगुना करने का लक्ष्य।

बुनियादी ढाँचा और परिवहन:

. 7 एक्सप्रेसवे, 3600 किमी रेल ट्रैक का आधुनिकीकरण।

. अमृत भारत एक्सप्रेस और नमी रैपिड रेल सेवा का विस्तार।

. 4 शहरों में मेट्रो सेवा शुरू की जाएगी।

. ‘न्यू पटना’ ग्रीनफील्ड शहर और प्रमुख शहरों में सैटेलाइट टाउनशिप बनाई जाएगी।

. पटना के पास अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, साथ ही दरभंगा, पूर्णिया, भागलपुर में नए एयरपोर्ट बनाए जाएँगे।

. 10 शहरों से नई घरेलू उड़ानें शुरू होंगी।

उद्योग और नई अर्थव्यवस्था:

. विकसित बिहार औद्योगिक मिशन के तहत 1 लाख करोड़ रुपए का निवेश।

. हर जिले में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और 10 नए औद्योगिक पार्क।

. बिहार को ‘ग्लोबल वर्कप्लेस’ और ‘वैश्विक बैंकिंग हब’ के रूप में विकसित करने का लक्ष्य।

. न्यू-एज इकोनॉमी में 50 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित किया जाएगा।

शिक्षा:

. केजी से पीजी तक मुफ्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।

. मिड-डे मील के साथ पौष्टिक नाश्ता और स्कूलों में स्किल लैब की सुविधा।

. ‘एजुकेशन सिटी’ और 5000 करोड़ से प्रमुख जिला स्कूलों का कायाकल्प।

. बिहार को AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) हब बनाया जाएगा, इसके लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित होंगे।

गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुरक्षा:

. मुफ्त राशन, 125 यूनिट मुफ्त बिजली और 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज।

. 50 लाख नए पक्के मकान।

. सामाजिक सुरक्षा पेंशन और गरीब छात्रों के लिए मुफ्त शिक्षा।

स्वास्थ्य:

. हर जिले में स्वीकृत मेडिकल कॉलेजों का निर्माण पूरा किया जाएगा।

. बाल चिकित्सा और ऑटिज्म अस्पताल एवं विशेष स्कूल बनाए जाएँगे।

. विश्वस्तरीय मेडिसिटी का निर्माण किया जाएगा।

संस्कृति, पर्यटन और खेल:

. माँ जानकी मंदिर, विष्णुपद और महाबोधि कॉरिडोर का विकास।

. रामायण, जैन, बौद्ध और गंगा सर्किट को मजबूत किया जाएगा।

. फिल्म सिटी और शारदा सिन्हा कला विश्वविद्यालय की स्थापना।

. हर प्रमंडल में खेलों के लिए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ और बिहार स्पोर्ट्स सिटी का निर्माण।

टेक्सटाइल और लोकल उद्योग:

. बिहार को मखाना, मछली और सिल्क का ग्लोबल एक्सपोर्ट सेंटर बनाया जाएगा।

. मिथिला टेक्सटाइल पार्क और अंग सिल्क पार्क से राज्य को दक्षिण एशिया का टेक्सटाइल हब बनाने का लक्ष्य।

. 100 एमएसएमई पार्क और 50,000 कुटीर उद्यमों के जरिए ‘वोकल फॉर लोकल’ को बढ़ावा।

बाढ़ और पर्यावरण प्रबंधन:

. 5 साल में बिहार को बाढ़ मुक्त बनाने का लक्ष्य।

. फ्लड मैनेजमेंट बोर्ड का गठन और ‘फ्लड टू फॉर्च्यून’ मॉडल लागू किया जाएगा।

. नदियों को जोड़ने, तटबंध और नहरों के निर्माण से कृषि और मत्स्य पालन को बढ़ावा दिया जाएगा।

NDA का यह संकल्प पत्र बिहार को रोजगार, शिक्षा, उद्योग और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में अग्रणी बनाने का वादा करता है, साथ ही बुनियादी सुविधाओं और बाढ़ नियंत्रण को लेकर भी ठोस योजनाएँ पेश करता है।

ईसाई मिशनरियाँ अब नहीं बदलवाती नाम, सरकारी योजनाओं-आरक्षण का लाभ लेने के लिए जारी रखते हैं पुरानी पहचान: पूर्वांचल में धर्मांतरण का सीक्रेट ट्रेंड, आशा वर्कर बन रही हथियार

पूर्वांचल के कई जिलों में धर्मांतरण का एक नया ट्रेंड सामने आया है। अब ईसाई मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन कराने वालों से नाम या सरनेम बदलने को नहीं कह रही हैं। लोग अपनी पहचान, जाति और सरकारी दस्तावेज वही रखते हैं लेकिन धर्म बदल चुके होते हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सरकारी योजनाओं, आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ पहले की तरह मिलता रहे और किसी को शक भी न हो।

धर्मांतरण का नया तरीका

जाँच में खुलासा हुआ है कि मिशनरियाँ अब सीधे तौर पर प्रचार नहीं कर रहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच रहकर गुप्त तरीके से धर्मांतरण करवा रही हैं। इसके लिए उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं, स्थानीय महिलाओं और कुछ बिचौलियों को जोड़ रखा है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जौनपुर की एक आशा कार्यकर्ता ने खुद धर्म बदला है और अब दूसरों को भी जोड़ने का काम कर रही है। वह कहती है, “पहचान वही है, बस एक लॉकेट पहन लिया है जो कपड़ों के अंदर रहता है। नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं, बस प्रभु का नाम दिल में रखो।”

आशा कार्यकर्ता ने कहा कि जौनपुर में सख्ती के कारण सब लोग वाराणसी जाते हैं। पिछली बार 10-11 लोग टेंपो से बनारस के भुल्लनपुर क्षेत्र में गए थे। वहाँ 250 से 300 लोग जुटे थे। इस रविवार को फिर जाना है।

इतना ही नहीं अब ‘चंगाई सभा’ (प्रार्थना सभा) का तरीका भी बदल गया है। पुलिस की सख्ती के बाद अब ये सभाएँ ऑनलाइन या मोबाइल के जरिए होती हैं। हर रविवार और शुक्रवार को मुंबई से वीडियो के माध्यम से नए-नए लोगों को जोड़ा जाता है।

पैसे और सहानुभूति से धर्मांतरण

जाँच में पता चला है कि गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों को निशाना बनाया जा रहा है। मिशनरियाँ सीधे परिवारों को नहीं, बल्कि उनके बच्चों के जरिए प्रवेश करती हैं। शिक्षा, शादी या इलाज के नाम पर आर्थिक मदद देकर सहानुभूति हासिल की जाती है।

एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाने पर 25 से 50 हजार रुपए तक का कमीशन तय होता है। धीरे-धीरे परिवार चर्च की सभाओं में शामिल होने लगता है और अंततः धर्मांतरण कर लेता है। जौनपुर के वीरेंद्र विश्वकर्मा ने बताया कि उनसे इलाज और शादी के बहाने धर्म परिवर्तन करवाया गया था।

वह अब अपने मूल धर्म में लौट चुके हैं। उनका कहना है कि हर गुरुवार को सुबह और शाम सभाएँ होती हैं, जहाँ लोगों को ‘यीशु के नाम का पानी’ पिलाया जाता है और नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं।

पुलिस की सख्ती और मिशनरियों की नई रणनीति

जौनपुर पुलिस ने इस साल धर्मांतरण के चार केस दर्ज किए और कई लोगों को गिरफ्तार किया। एसपी डॉ कौस्तुभ का कहना है, “जहाँ भी लोभ-लालच देकर धर्मांतरण के मामले सामने आते हैं, वहाँ छापेमारी कर सख्त कार्रवाई की जाती है।”

हालाँकि पुलिस की सख्ती के बावजूद मिशनरियों ने अब और चालाकी अपनाई है। अब वे सरनेम नहीं बदलवातीं, ताकि सरकारी रिकॉर्ड में व्यक्ति हिंदू ही दिखाई दे और आरक्षण व सरकारी लाभ जारी रहे।

छत्तीसगढ़ में भी खुलासा

ऐसा ही पैटर्न छत्तीसगढ़ के कोरबा और जांजगीर जिलों में भी सामने आया था। वहाँ महिला प्रचारक (लेडी मिशनरी) अपनी असली पहचान छिपाकर चंगाई सभा के नाम पर महिलाओं और बच्चियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही थीं।

वो पहले दोस्ती करतीं, फिर बीमारियों और परेशानियों से जूझ रही महिलाओं को प्रार्थना के जरिए मुक्ति का रास्ता बतातीं। जब महिलाएँ चर्च जाने लगतीं, तो वहाँ आवेदन भरवाकर हर रविवार ‘प्रभु की प्रार्थना’ का वादा लिया जाता। 90% महिलाएँ धीरे-धीरे ईसाई महजब अपनातीं, जबकि 10% तब लौट आतीं जब कोई लाभ नहीं दिखता।

पूर्वांचल से लेकर छत्तीसगढ़ तक, धर्मांतरण का तरीका अब बदल चुका है। अब न नाम बदले जा रहे हैं, न कपड़े या रूप-रंग बस आस्था बदली जा रही है। सरकारी दस्तावेजों में लोग हिंदू दिखते हैं, मगर दिल से किसी और धर्म के अनुयाई बन चुके होते हैं।

शशांकासन का नमाज से नहीं कोई लेना-देना, फिर भी पकड़े जाने पर ‘मजहबी टीचर’ देते हैं एक ही तर्क: जानिए ‘सजदा’ और ‘योग’ की मुद्राओं में कैसे है जमीन-आसमान का अंतर

अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ स्कूलों में मुस्लिम शिक्षकों पर हिंदू छात्रों को योग की कक्षाओं के बहाने नमाज जैसी मुद्राएँ सिखाने के आरोप लगते हैं। अभिभावकों की शिकायत के बाद शिक्षक पकड़े जाते हैं, लेकिन हर बार बचाव में एक ही तर्क दिया जाता है, कि बच्चों से कराया जा रहा आसन तो केवल एक योगासन था।

हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया है। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले के देवहारी गाँव के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक जबूर अहमद पर हिंदू छात्रों को योग और सूर्य नमस्कार के दौरान नमाज के आसन सिखाने का गंभीर आरोप लगा। विवाद बढ़ने पर मुस्लिम टीचर को तुरंत सस्पेंड कर दिया गया और जाँच शुरू हो गई है।

आरोपित शिक्षक जबूर अहमद ने अपनी सफाई में कहा कि वह छात्रों को केवल ‘शशांकासन’ सिखा रहा था। उसका यह तर्क है कि इस आसन की मुद्रा नमाज जैसी दिख सकती है, पर यह शुद्ध रूप से योग है। आइए, जानते हैं कि आखिर नमाज और योग की मुद्राओं में क्या अंतर है और क्यों कुछ कट्टरपंथी लोग जानबूझकर इसी ‘भ्रम’ का सहारा लेते हैं?

शशांकासन और नमाज की मुद्रा में स्पष्ट अंतर

आरोपित शिक्षकों द्वारा बार-बार दिए जाने वाले ‘शशांकासन’ के तर्क की जाँच करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि नमाज की मुद्रा और इस योगासन की मुद्रा में कई बुनियादी अंतर हैं, जो किसी भी भ्रम की गुंजाइश को खत्म कर देते हैं। दोनों की प्रक्रिया और मुद्रा-विन्यास में स्पष्ट भिन्नता है।

नमाज की ‘सजदा’ मुद्रा

नमाज पढ़ने की प्रक्रिया में जो मुद्रा सबसे ज्यादा विवादित होती है, वह ‘सजदा’ है, जहाँ नमाजी अपना माथा जमीन पर टेकता है। इस मुद्रा में शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर जोर पड़ता है और उनका विशिष्ट स्थान निर्धारित होता है। सजदे के दौरान, शरीर का संतुलन मुख्य रूप से पाँच बिंदुओं पर बना होता है। दोनों पैर की उंगलियाँ, दोनों घुटने, दोनों हथेलियाँ और माथा।

नमाज अदा करने की मुद्रा

इस मुद्रा में कोहनियों को जमीन से ऊपर उठा हुआ और शरीर से दूर रखा जाता है, ताकि बाँहों का निचला हिस्सा जमीन से न छू सके। वहीं, पैरों की स्थिति भी निर्धारित होती है। पैर की उँगलियाँ मुड़ी हुई होती हैं और जमीन पर लगी रहती हैं, जबकि टखने मुड़े हुए होते हैं और एड़ियाँ जमीन से ऊपर उठी रहती हैं।

शशांकासन (खरगोश मुद्रा)

शशांकासन एक लाभदायक योगासन है। इसका नाम संस्कृत शब्द ‘शशांक’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘खरगोश’, क्योंकि इस मुद्रा में शरीर खरगोश जैसी आकृति बना लेता है। यह आसन आंतों के लिए बहुत लाभकारी है और कब्ज को दूर करने में मदद करता है। इसके अलावा, यह अस्थमा-मधुमेह-हृदय रोग में भी फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह नस-नाड़ियों को शांत करता है।

शशांकासन (खरगोश मुद्रा) की तस्वीर

इस आसन को करने के लिए सबसे पहले पद्मासन (या वज्रासन) में बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना होता है। फिर दोनों घुटनों को दूर-दूर फैलाया जाता है। इसके बाद, दोनों बाँहें सिर के ऊपर उठाकर, साँस छोड़ते हुए और बाँहें सीधी रखते हुए, कमर से आगे की ओर झुकना होता है। इस मुद्रा में ठोड़ी और बाँहें फर्श पर टिकी होनी चाहिए। कुछ देर रुकने के बाद, साँस लेते हुए धीरे-धीरे वापस शुरुआती अवस्था में आ जाते हैं। इस प्रक्रिया को 3 से 5 बार दोहराया जा सकता है। हाथ और कोहनी की यह स्थिति, नमाज में कोहनी को ऊपर उठाने की आवश्यकता से पूरी तरह अलग है।

पुरानी घटनाएँ भी देती हैं गवाही

यह पहला अवसर नहीं है जब मुस्लिम शिक्षकों या कार्यक्रम आयोजकों पर योग और सूर्य नमस्कार की आड़ में हिंदू छात्रों को नमाज की मुद्राएँ सिखाने के गंभीर आरोप लगे हों। यह पैटर्न बार-बार सामने आया है, जो बताता है कि यह केवल एक स्थानीय भ्रम का मामला नहीं हो सकता।

ऐसी ही एक बड़ी घटना अप्रैल 2025 गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी (GGU) के NSS कैंप में सामने आई थी। वहाँ 155 हिंदू छात्रों ने यूनिवर्सिटी के स्टाफ (7 शिक्षकों और एक छात्र लीडर) पर उन्हें जबरन नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने का गंभीर आरोप लगाया।

छात्रों ने खुलकर दावा किया था कि उन्हें सुबह की ‘योगा क्लास’ में नमाज की मुद्राएँ दोहराने का सीधा आदेश दिया गया था और विरोध करने पर उन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने कठोरता दिखाते हुए 8 लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया था।

योग का बहाना नहीं, फिर भी स्कूलों में हिंदू छात्रों से जबरन नमाज पढ़वाई

कई मामले ऐसे भी हैं, जहाँ मुस्लिम शिक्षकों पर हिंदू छात्रों को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने के आरोप लगे हैं, भले ही इसके लिए सीधे तौर पर योग का बहाना न लिया गया हो। एक मामला यूपी के हाथरस से सामने आया था। इस मामले में आरोप लगे थे कि स्कूल में हिंदू छात्रों को कड़क 40 डिग्री तापमान में खड़ा करके उनसे नमाज अदा करवाई गई और उनसे फातिहा (इस्लामी दुआ) पढ़वाई गई।

इतना ही नहीं, हिंदू बच्चियों को कथित तौर पर बुर्का पहनाया गया और सभी छात्रों से जबरन ‘अल्ला-हु-अकबर’ के नारे भी लगवाए गए। इन गंभीर आरोपों के सामने आने के बाद इलाके में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ था।

इसके अलावा, गुजरात के कर्णावती स्थित केलोरेक्स फ्यूचर स्कूल पर हिंदू अभिभावकों ने अपने बच्चों को नमाज पढ़ाने का आरोप लगाया था। मामला सामने आने पर हड़कंप मच गया और गुजरात सरकार ने तुरंत जाँच के आदेश दिए। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाए कि किसी भी स्कूल में बच्चों पर जबरन कोई धार्मिक गतिविधि न थोपी जाए।

ये मामले बुरहानपुर के ‘शशांकासन’ विवाद से अलग हैं, लेकिन ये सभी इस बात को रेखांकित करते हैं कि स्कूलों में हिंदू छात्रों को इस्लामी तौर-तरीके सिखाने की शिकायतें अब एक पैटर्न बन चुकी हैं, जिस पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है।

‘गलतफहमी’ या बहाना?

शशांकासन और नमाज की मुद्रा की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में बुनियादी शारीरिक और प्रक्रियात्मक अंतर मौजूद हैं। खास तौर पर, शरीर के वजन का वितरण, कोहनी और हाथों की स्थिति में कोई समानता नहीं है। शशांकासन में वजन नितंबों पर होता है, जबकि नमाज में यह कई बिंदुओं (हथेली, घुटना, पैर की उंगलियाँ, माथा) पर बँटा होता है।

यह देखते हुए, आरोपित मुस्लिम शिक्षकों द्वारा बार-बार यह दावा करना कि छात्रों से कराई जा रही मुद्रा केवल एक योग ‘शशांकासन’ थी और यह ‘गलतफहमी’ का नतीजा है, पूरी तरह से संदेह के घेरे में आता है। दोनों मुद्राओं में इतना स्पष्ट अंतर होने के बावजूद, हर बार पकड़े जाने पर एक ही तर्क को दोहराना इस बात की ओर दृढ़ता से इशारा करता है कि यह किसी जानबूझकर दिए गए बहाने से कम नहीं है। यह लगता है कि यह तर्क आरोपों से बचने और अपने कृत्यों को योग जैसे सेक्युलर आवरण में छिपाने के लिए एक तैयार रणनीति का हिस्सा है।

21 साल की उम्र में परमवीर चक्र, बलिदान के बाद भी जिसकी दुश्मन करता है तारीफ: जानें अरुण खेत्रपाल की कहानी, जिसने आमने-सामने की लड़ाई में मार गिराए 10 अमेरिकी पैंटन टैंक

अरुण खेत्रपाल एक भारतीय सेना अधिकारी थे जिन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। उनकी जीवनी पर बनी फिल्म इक्कीस अब सिनेमाघरों में आने के लिए तैयार है। 21 साल में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले महानायक को देश याद कर रहा है।

सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 में पुणे में हुआ था। उनका परिवार सेना से जुड़ा रहा है। वे ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल और श्रीमती माहेश्वरी खेत्रपाल के दो पुत्रों में बड़े थे।

अरुण के परदादा सिख खालसा रेजिमेंट के हिस्से के रूप में अंग्रेजों की सेना में थे। उनके दादा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे। बड़े होते हुए अरुण ने अपने पिता से अपने परिवार की वीरता की कहानियाँ सुनी थी।

अरुण खेत्रपाल का परिवार (फोटो साभार- Honourpoint)

अरुण ने हिमाचल प्रदेश के कसौली की पहाड़ियों में स्थित लॉरेंस स्कूल, सनावर से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। वे पढ़ाई और खेल दोनों में ही तेज थे। उन्होंने स्कूल के आदर्श वाक्य ‘कभी हार न मानो’ को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। बचपन से ही मजबूत इच्छाशक्ति वाले अरुण के व्यक्तित्व की गूँज युद्ध के मैदान में भी दिखाई दी।

अरुण खेत्रपाल के सेना में शामिल होने की कहानी

अरुण ने अपने पिता और दादा-परदादा की तरह सेना में भर्ती होकर अपने बचपन के सपने को साकार किया। जून 1967 में उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी यानी एनडीए ज्वाइन की। जहाँ वे फॉक्सट्रॉट स्क्वाड्रन के 38वें कोर्स में शामिल हुए। इस कोर्स के दौरान उनके नेतृत्व कौशल निखर कर सामने आए और वे उस बैच के स्क्वाड्रन कैडेट कैप्टन बने।

एनडीए से पास होने के बाद उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून ज्वाइन किया।13 जून 1971 को भारतीय सेना में एक अधिकारी के रूप में खेत्रपाल को कमीशन मिला। इस दौरान उनके दोनों कँधों पर एक-एक स्टार लगाया गया। उन्हें बख्तरबंद कोर की 17वीं पूना हॉर्स रेजिमेंट में तैनात किया गया। अरुण अब एक घुड़सवार सेना इकाई में सेकंड लेफ्टिनेंट थे, जो अपने वीरतापूर्ण इतिहास और उपलब्धियों के लिए जानी जाती थी। पूना हॉर्स भारत की सबसे प्रतिष्ठित बख्तरबंद रेजिमेंटों में से एक थी और है।

युवा अधिकारी को कमीशन मिलने के छह महीने के भीतर ही भारतीय उपमहाद्वीप को युद्ध के साये ने घेर लिया। दिसंबर 1971 की शुरुआत में, पाकिस्तान के साथ दुश्मनी युद्ध में बदल गई। उस समय, अरुण अहमदनगर में युवा अधिकारियों के साथ प्रशिक्षण ले रहे थे, वहाँ से उन्हें अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया गया।

वह जिस वक्त रेजिमेंट में शामिल हो गए, उससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपना 21वाँ जन्मदिन मनाया था।

वह अपने गोल्फ क्लब साथ लेकर चलते थे, यह बात उनके लिए मशहूर है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह युद्ध के मैदान में गोल्फ खेलेंगे, तो उन्होंने कहा, “सर, मैं लाहौर में गोल्फ खेलने की योजना बना रहा हूँ। और मुझे यकीन है कि युद्ध जीतने के बाद वहाँ एक डिनर नाइट होगी, इसलिए मुझे ब्लू ड्रेस की भी जरूरत होगी।”

हल्के फुल्के मजाक में उन्होंने ये बात अपने दोस्त से कही थी। उस वक्त वो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। स्टेशन पर उनकी माँ उन्हें विदा करने पहुँची थीं।

पहला युद्ध, अंतिम मोर्चा

जब 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ा तो पश्चिमी क्षेत्र में उनके ब्रिगेड की तैनाती हुई। वे 17 पूना हॉर्स के 47वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड का हिस्सा थे, जिसे ‘ब्लैक एरो’ ब्रिगेड भी कहा जाता है। इसकी तैनाती सियालकोट के पास शकरगढ़ बल्ज में हुई। दिसंबर तक ब्रिगेड ने पाकिस्तानी क्षेत्र में बसंतर नदी पर पुलहेड स्थापित करने में सफल रहा।

अमेरिकी पैटन टैंकों से लैस पाकिस्तान के13वीं लांसर्स रेजिमेंट की बख्तरबंद सेना ने पुल को ध्वस्त करने के मकसद से हमला कर दिया। जरपाल गाँव में भारत ने जो पुल बनाया था, उसके पास धुआँ उठ रहा था। पाकिस्तानियों की कोशिश थी कि इस पुल को नष्ट कर दिया जाए, ताकि भारतीय सेना का आगे बढ़ना रुक जाए।

जरपाल पर कब्जा जमाए पूना हॉर्स स्क्वाड्रन उस वक्त भारी दबाव में था और उसने तत्काल अतिरिक्त सहायता की माँग की। जब लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने रेडियो पर संकट की सूचना सुनी, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के युद्धग्रस्त स्क्वाड्रन को मज़बूत करने के लिए अपने टैंकों की टुकड़ी के साथ आगे बढ़ने की पेशकश की। हालाँकि उस वक्त वे रिज़र्व अधिकारी थे। अरुण ने अपने सेंचुरियन MK7 टैंक से युद्ध का नेतृत्व किया। इस टैंक का नाम रेजिमेंट ने बाद में फामागुस्टा रख दिया।

जैसे ही अरुण की छोटी टुकड़ी युद्ध में कूदी, बसंतर नदी पार करते समय वे दुश्मन की भारी गोलाबारी की चपेट में आ गए। पाकिस्तानी सैनिकों ने एंटी-टैंक गन और मशीन-गन बंकरों के साथ अपनी जगह बना ली थी, जो अभी भी मज़बूती से टिके हुए थे।

अरुण और उनके साथियों के लिए समय बहुत महत्वपूर्ण था। अगर पाकिस्तानी बख्तरबंद हमले को तुरंत नाकाम नहीं किया गया, तो भारतीय पुल का मुख्य द्वार ढह सकता था। अरुण बेहद साहस के साथ आगे बढ़े और दुश्मन के उन मज़बूत ठिकानों पर हमला करने का आदेश दिया, जो उनके रास्ते में बाधा बन रहे थे। उनके टैंक दहाड़ते हुए आगे बढ़े और पाकिस्तानी बंकरों पर धावा बोल दिया।

अरुण की छोटी-सी टुकड़ी ने दुश्मन की सुरक्षा को ध्वस्त कर दिया था। तोपों के ठिकानों को ध्वस्त कर दिया और यहाँ तक कि कुछ दुश्मन सैनिकों को भी पकड़ लिया। इन नज़दीकी मुठभेड़ों के दौरान अरुण के साथी कमांडर बलिदान हो गए। हालाँकि, अरुण ने आगे बढ़ना जारी रखा।

उनकी आक्रामक कार्रवाई और साहसिक नेतृत्व ने दुश्मन की किलेबंदी को बेअसर कर दिया। उन्होंने समय रहते बी स्क्वाड्रन से संपर्क किया, क्योंकि पाकिस्तानी टैंक अपने शुरुआती हमले के बाद संभवतः भारतीय जवाबी कार्रवाई से घबराकर क्षण भर के लिए पीछे हट गए थे।

हालाँकि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी। पाकिस्तानी बख्तरबंद सैनिकों ने एक बार फिर हमला कर दिया। उनका मुकाबला लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल, कैप्टन वी. मल्होत्रा ​​और लेफ्टिनेंट अवतार अहलावत की अगुवाई वाले भारतीय टैंकों के कब्जे वाले क्षेत्र पर था। इसके बाद जो हुआ, वह युद्ध की सबसे भीषण टैंक मुठभेड़ों में एक माना जा सकता है।

भारतीय टैंक और गोला-बारूद कम थे, फिर भी वीर डटे रहे। फटते हुए गोले और जलते हुए ढाँचों के बीच सीमा के नजदीक भयंकर लड़ाई हुई। इस लड़ाई को टैंकों के बीच लड़ी गई सबसे घातक लड़ाई में से एक माना जाता है। खेत्रपाल और उनके साथियों ने एक के बाद एक कई दुश्मन टैंकों को नष्ट कर दिया। इस भीषण युद्ध में 10 पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट कर दिया गया, जिनमें से चार को अकेले लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के नष्ट किया था।

दुश्मन की बढ़ती संख्या का असर साफ़ दिख रहा था। लेफ्टिनेंट अहलावत के टैंक पर सीधा हमला हुआ और वह बर्बाद हो गया। कैप्टन मल्होत्रा ​​के टैंक की मुख्य तोप जाम हो गई, जिससे वह फायर नहीं कर पा रहा था। उस महत्वपूर्ण आधे घंटे तक अरुण खेत्रपाल पाकिस्तानी हमले के रास्ते में अकेले खड़े रहे, अपने क्षेत्र में कार्यरत आखिरी टैंक होने के बावजूद भारी चुनौतियों का सामना करते हुए भी वे अडिग थे।

अत्यंत साहस के साथ 21 वर्षीय अरुण ने अकेले ही लड़ाई जारी रखी। उनका टैंक फामागुस्टा वन-टैंक आर्मी की तरह बन गया, जिसने दुश्मन के बख्तरबंद बेड़े के एक पूरे स्क्वाड्रन से सीधी लड़ाई लड़ी। अरुण का संकल्प अटल था। उनकी निगरानी में एक भी दुश्मन टैंक को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।

इस बीच फामागुस्टा पर दुश्मन का एक गोला गिरा और उसमें आग लग गई। इस हमले में अरुण घायल हो गए। उनके स्क्वाड्रन लीडर ने खतरे को भाँप लिया और उन्हें जलते हुए टैंक को छोड़ने का आदेश दिया। अरुण ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। रेडियो पर उन्होंने एक संदेश भेजा, जो अमर हो गया। उन्होंने कहा, “नहीं महोदय, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूँगा। मेरी मुख्य तोप अभी भी काम कर रही है और मैं इन बा$#%र्स को मार गिराऊँगा।”

फिर उन्होंने आगे दिए जाने वाले आदेशों को न सुनते हुए अपना रेडियो हेडसेट उतार दिया और लड़ाई जारी रखी। अपने शब्दों के अनुसार गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अरुण ने गोलीबारी जारी रखी। उन्होंने बिल्कुल पास से एक और पाकिस्तानी टैंक को नष्ट कर दिया।

तब तक ये लड़ाई एक-दम आमने सामने की हो चुकी थी। पाकिस्तानी सेना के टैंकों से महज 100 मीटर की दूसरी अरुण के टैंक की थी। आखिरी पाकिस्तानी टैंक को उन्होंने इसी दूरी से नष्ट किया था। लेकिन इसके ठीक बाद उनके टैंक पर सीधा हमला हुआ और उनका फामागुस्टा शांत हो गया। इस हमले में लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल गंभीर रूप से घायल हो गए और फिर उन्होंने अपने टैंक पर ही दम तोड़ दिया।

खेत्रपाल की वीरता ने बसंतर में भारत के लिए दिन बचा लिया। जब तक वह शहीद हुए, पाकिस्तानी आक्रमण टूट चुका था। दुश्मन का एक भी टैंक उस स्थिति में नहीं था कि वह पुल पार कर सके। दुश्मन को वह सफलता नहीं मिली, जिसकी उसे बेसब्री से तलाश थी। उनके असाधारण वीरतापूर्ण रुख ने शेष भारतीय सैनिकों को प्रेरित किया, जिन्होंने सभी मोर्चों पर पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए लड़ाई जारी रखी।

बसंतर का युद्ध भारत की निर्णायक जीत के साथ समाप्त हुआ। उसी दिन 16 दिसंबर 1971 क, पाकिस्तान की पूर्वी कमान ने ढाका में औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण कर दिया, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ। लेकिन यह जीत एक भारी कीमत पर मिली। 13 दिनों तक चले इस संघर्ष में भारत ने कई बहादुर सैनिकों को खोया, जिनमें सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल भी शामिल थे। उन्होंने 21 साल में बसंतर के युद्धक्षेत्र में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

एक नायक की विरासत

सेकेंडरी लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को उनके “निडर साहस, दृढ़ संकल्प और सर्वोच्च बलिदान” के लिए मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। आधिकारिक प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि उनके अदम्य साहस ने दिन बचा लिया। दुश्मन के बख्तरबंद हमले को निर्णायक रूप से विफल कर दिया गया और दुश्मन का एक भी टैंक उनके क्षेत्र से होकर नहीं गुजरा पाया।

इस युवा अधिकारी ने कर्तव्य की सीमा से कहीं बढ़कर ‘दुश्मन के सामने नेतृत्व, दृढ़ता और असाधारण साहस’ का प्रदर्शन किया। अरुण खेत्रपाल ने अपना नाम इतिहास में दर्ज करवाया। परमवीर चक्र पाने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के व्यक्ति बन गए और आज भी हैं।

अरुण खेत्रपाल की विरासत कई मायनों में अनोखी है। उस युद्ध के दौरान अपनी क्रूरता और निडरता के सम्मान में उन्हें “शेर-ए-बसंतर” उपनाम मिला, जिसका अर्थ है बसंत का बाघ। सेना के अधिकारी और जवान गोलाबारी के बीच उनकी अदम्य बहादुरी की कहानी से प्रेरणा लेते रहते हैं।

ऐसा माना जाता है कि उस दिन पाकिस्तानी टैंक इकाई के कमांडर, मेजर ख्वाजा नासर ने खेत्रपाल के टैंक पर घातक गोली चलाई थी। यहाँ तक कि वे भी उस शहीद भारतीय नायक का सम्मान करने लगे। दशकों बाद अरुण के पिता ब्रिगेडियर एमएल खेत्रपाल ने उस पाकिस्तानी अधिकारी से मुलाकात की, जो युद्धभूमि में अरुण के सामने था और उसकी गोलीबारी से ही अरुण ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उन्होंने अरुण की वीरता की गाथा उनके पिता को बताई और अपना सम्मान प्रदर्शित किया।

सेंचुरियन टैंक फामागुस्टा (सीनियर नंबर- आईसी 202) बाद में बरामद किया गया। खेत्रपाल के इस ‘प्यार’ की बाद में मरम्मत कराई गई। यह अहमदनगर के आर्मर्ड कॉर्प्स सेंटर एंड स्कूल में उनकी वीरता के गौरवशाली अध्याय के रूप में संरक्षित किया गया।

(फोटो साभार- immortalsacrifice/FB)

सेकेंड लेफ्टिनेंट खेत्रपाल का स्मारक युद्ध के मैदान के बाहर भी मौजूद हैं। 1971 युद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर 2021 में अरुण खेत्रपाल और 1971 के अन्य नायकों के सम्मान में जम्मू के सांबा जिले के वीर भूमि पार्क (बसंतर युद्धक्षेत्र के पास) में एक नए युद्ध स्मारक का अनावरण किया गया।

नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर, भारत के महानतम युद्ध नायकों के बीच परम योद्धा स्थल गैलरी में अरुण खेत्रपाल की एक कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है। एनडीए भी अपने सबसे प्रतिभाशाली और बहादुर पूर्व कैडेटों में से एक के रूप में उन्हें याद करता है।

करीब 54 बरस बीत चुके हैं, लेकिन अरुण की वीरता की गाथा आज भी भारत को प्रेरित करती है। अब उनकी जीवन गाथा आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ के साथ सिनेमा के रूप में दर्शकों तक पहुँचने वाली है। श्रीराम राघवन द्वारा निर्देशित और मैडॉक फिल्म्स द्वारा निर्मित आगामी फिल्म ‘इक्कीस’ (21) में उन वीरता भरे पलों को फिर से जीवंत किया गया है। इस फिल्म में बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन के पोते अगस्त्य नंदा अरुण की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल की भूमिका में हैं। फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो चुका है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)