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नुपूर शर्मा के समय थे लाडले, रोहिंग्या घुसपैठियों की बात आई तो हो गए विलेन: CJI सूर्यकांत के खिलाफ वामपंथियों का ओपन लेटर दोगलई का अप्रतिम नमूना

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने 2 दिसंबर 2025 को रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने रोहिंग्याओं को ‘अवैध घुसपैठिए’ करार देते हुए कहा कि क्या देश में सीमा तोड़कर घुसने वालों को ‘रेड कार्पेट वेलकम’ देना चाहिए?

यह टिप्पणी रोहिंग्या हेबियस कॉर्पस याचिका पर आई, जिसमें 5 रोहिंग्या हिरासत में लापता होने का मामला उठाया गया था और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि सरकार ने उन्हें शरणार्थी घोषित नहीं किया है, तो उन्हें रखने का कोई दायित्व नहीं है और अवैध प्रवेश करने वालों को भोजन, आश्रय या शिक्षा का अधिकार नहीं मिल सकता।​

पूर्व जजों और वकीलों की आपत्ति

पूर्व जजों, वकीलों और कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने 4-5 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत को खुला पत्र लिखा, जिसमें टिप्पणियों को ‘अनकॉन्शिएनेबल’ और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया।

पत्र में कहा गया कि रोहिंग्याओं को ‘टनल खोदकर घुसने वाले घुसपैठिए बताना उनके मानवीय अधिकारों का अपमान है। उन्होंने अनुच्छेद 21 का हवाला दिया जिसके तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सभी को प्रदान करता है, भले ही वे विदेशी हों।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने ये भी कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ न्यायिक पूर्वाग्रह पैदा करती हैं और गरीबी का हवाला देकर शरणार्थियों के अधिकारों को नकारना खतरनाक मिसाल है।​

रोहिंग्याओं के समर्थक

भारत में रोहिंग्याओं के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के साथ कुछ एनजीओ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और कुछ सिविल सोसाइटी संगठन काम करते हैं। ये रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (आरओएचआरइनग्या) जैसे संगठने के तले उन्हें शिक्षा, राहत और कानूनी सहायता देने तक की पैरवी करते हैं।

यूएनएचसीआर, एमनेस्टी इंटरनेशनल और रिफ्यूजी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत में उनके हिरासत और निर्वासन का विरोध करते हैं।

वामपंथी समूह रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानते हैं और भारत की निर्वासन नीति को मोदी सरकार का ‘इस्लामोफोबिक’ रुख बताते हैं, जबकि राष्ट्रवादी इसे अवैध घुसपैठ से जोड़ते हैं। 2018 में गृह मंत्रालय द्वारा रोहिंग्या समर्थकों की सूची में पूर्व राजदूत, वकील, प्रोफेसर और संगठन जैसे वर्किंग ग्रुप ऑन अल्टरनेटिव स्ट्रैटजीज शामिल थे।​

रोहिंग्या संकट का इतिहास और भारत की नीति

रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय म्यांमार के रखाइन राज्य से है, जहाँ 2017 के बाद जातीय सफाए के कारण 40,000 से अधिक भारत पहुँचे, हालाँकि भारत उन्हें अवैध प्रवासी मानता है।

सरकार ने उन्हें निर्वासित करने की योजना बनाई, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई, लेकिन 2018 में कोर्ट ने निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। भारत ने गैर-हस्तक्षेप सिद्धांत अपनाया है, लेकिन बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद रोहिंग्या विरोध बढ़ा।​

क्या है शरणार्थी होने की परिभाषा

भारत की विदेशी नागरिकों के लिए शरणार्थी होने का दावा करने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (2011, संशोधित 2019) अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मानी जाती है। इस प्रक्रिया में शरणार्थी को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है जिसे नस्ल, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता, जातीय पहचान, किसी सामाजिक समूह की सदस्यता या राजनीतिक विचारों के आधार पर उत्पीड़न का सच में डर हो। यह परिभाषा प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत की घरेलू नीतियों के बीच सामंजस्य को दर्शाती है।

पत्र में हस्ताक्षर करने वालों का कहना है कि भारत में लंबे समय से शरणार्थियों को प्रवासी (migrants) से अलग एक विशिष्ट श्रेणी के रूप में मान्यता देने की परंपरा रही है। देश ने पहले भी तिब्बतियों, श्रीलंकाई तमिलों और ऐतिहासिक रूप से 1970-71 में पूर्वी पाकिस्तान से उत्पीड़न के कारण भागकर आए लाखों लोगों को मानवीय संरक्षण प्रदान किया है।

नुपूर शर्मा मामले में वामपंथी प्रोपेगेंडा का दोहरा मापदंड

2022 में नुपूर शर्मा विवाद पर जस्टिस सूर्यकांत ने उन्हें ‘आग लगाने वाली जीभ’ कहा था, जिसे वामपंथी और उदारवादी समूहों ने जमकर सराहा था। लेकिन अब रोहिंग्या टिप्पणी पर वे इसी जस्टिस सूर्यकांत का विरोध कर रहे हैं।

नुपूर मामले में कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों को वामपंथियों ने मोदी सरकार पर हमले के रूप में इस्तेमाल किया। अब वही लोग सीजेआई की रोहिंग्या टिप्पणियों को ‘डीह्यूमनाइजिंग’ बता रहे हैं। यह दोगलापन सोशल मीडिया पर सामने आया, तो लोगों ने इसे हिपोक्रेसी करार दिया।

पानी पर तैरते ‘न्यूक्लियर प्लांट’ बदलेंगे भारत के ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर, जानें कैसे काम करते हैं रूस के ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’?

दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के बाद भारत और रूस ने कुल 19 बड़े समझौते किए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की है। इसमें सहयोग और भारत में फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने का प्रस्ताव शामिल है। रूस ने भारत को न सिर्फ SMR टेक्नोलॉजी देने की पेशकश की है, बल्कि भारत के समुद्री क्षेत्रों में एक तैरता हुआ न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने की भी बात कही है।

कुडनकुलम के बाद भारत अब न्यूक्लियर ऊर्जा के अगले दौर में कदम रखना चाहता है। एक ऐसा दौर जिसमें छोटे, सुरक्षित, मोबाइल और किफायती परमाणु रिएक्टर भारत की बिजली जरूरतें पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। अब हम समझेंगे कि ये स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर क्या होते हैं, कैसे काम करते हैं, फ्लोटिंग प्लांट क्यों खास हैं और भारत को इससे क्या मिलने वाला है।

SMR क्या है: छोटे लेकिन शक्तिशाली परमाणु रिएक्टर

भारत और रूस के बीच इस बार सहयोग का सबसे बड़ा और नया कदम है ‘SMR’ यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर पर साथ काम करना। दुनिया तेजी से ऐसी न्यूक्लियर तकनीक की ओर बढ़ रही है जो आकार में छोटी हो, लेकिन सुरक्षा, लागत और समय तीनों मामलों में बड़ी सुविधाएँ दे। SMR को आप बड़े न्यूक्लियर प्लांट का छोटा, स्मार्ट और अधिक सुरक्षित संस्करण समझ सकते हैं। ये परंपरागत रिएक्टरों से लगभग एक-तिहाई आकार के होते हैं, लेकिन बिजली उतनी ही भरोसेमंद और साफ पैदा करते हैं।

SMR की सबसे खास बात यह है कि इन्हें फैक्ट्री में पहले से तैयार मॉड्यूल के रूप में बनाया जाता है और बाद में साइट पर जोड़ दिया जाता है। इससे इनकी इंस्टॉलेशन में वर्षों का इंतजार नहीं करना पड़ता। इन्हें उन जगहों पर भी लगाया जा सकता है जहाँ बड़े न्यूक्लियर प्लांट बनाना न तो संभव है और न ही आर्थिक रूप से ठीक। छोटे शहरों, दूर-दराज के इलाकों और कम जगह वाले औद्योगिक क्षेत्रों में SMR आसानी से फिट हो सकते हैं।

रूस इस तकनीक में दुनिया का सबसे अनुभवी देश है। उसका बनाया ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट है। एक ऐसा जहाज जो समुद्र में तैरते हुए आर्कटिक इलाके को बिजली और हीटिंग देता है। अब यही मॉडल भारत के लिए भी प्रस्तावित किया गया है।

भारत के लिए SMR इसलिए और भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आने वाले वर्षों में देश के औद्योगिक क्षेत्रों- जैसे रेल प्रोजेक्ट, डेटा सेंटर, खनन क्षेत्र, बड़े पोर्ट, तटीय उद्योग और पहाड़ी राज्यों को स्थानीय, भरोसेमंद और क्लीन बिजली की बड़ी जरूरत पड़ेगी। SMR इस जरूरत को सीधे यहीं पर पूरा कर सकते हैं, बिना किसी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की माँग किए।

सीधे शब्दों में कहें तो SMR भारत को तेज, सुरक्षित, स्थानीय और भविष्य के लिए तैयार ऊर्जा देने वाली तकनीक है और रूस इसके लिए सही साझेदार है।

SMR कैसे काम करते हैं?

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर सामान्य न्यूक्लियर प्लांट की तरह ही परमाणु ईंधन का उपयोग करके गर्मी पैदा करते हैं, लेकिन उनका पूरा ढाँचा सोचा-समझा और कॉम्पैक्ट होता है। यह पारंपरिक VVER या PHWR जैसे बड़े रिएक्टरों की तुलना में छोटे होते हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा और नियंत्रण प्रणाली भी अधिक प्रभावी होती है। इनके अंदर कई पैसिव सेफ्टी फीचर होते हैं, यानि बिना बिजली या इंसानी दखल के भी ये खुद को सुरक्षित तरीके से बंद कर सकते हैं। यह उन्हें ज्यादा भरोसेमंद बनाता है।

भारत ऐसे समय में SMR अपनाना चाहता है जब देश बड़े पैमाने पर अक्षय ऊर्जा (सौर और पवन) जोड़ रहा है। लेकिन इन स्रोतों में एक समस्या है, ये हमेशा एक समान उत्पादन नहीं देते। ऐसे में बैकअप के लिए एक भरोसेमंद ‘बेस लोड’ बिजली चाहिए जो हमेशा स्थिर चले। यही काम SMR कर सकते हैं। भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता का लक्ष्य रखा गया है और अकेले बड़े प्लांट इस लक्ष्य तक पहुँचने में समय ले सकते हैं। SMR कम समय में स्थापित होकर इस रोडमैप को तेज कर सकते हैं।

कई भारतीय संस्थान पहले से ही SMR के उपयोग पर विचार कर रहे हैं- जैसे कि भारतीय रेलवे की परियोजनाएँ, ऊर्जा-भूखे डेटा सेंटर और महाराष्ट्र में मजगांवकों–रॉसएटम परियोजना। भारत का एक लक्ष्य यह भी है कि इन SMR में थोरियम आधारित ईंधन का उपयोग हो सके, जिसके विशाल भंडार भारत के पास हैं। इस दिशा में रूस, भारत के साथ तकनीकी साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है। SMR भारत को ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण बढ़त दे सकते हैं।

फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट: समुद्र में तैरता बिजलीघर कैसे काम करता है?

फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन रूस ने इसे सच में बनाकर चला भी लिया है। ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला ऐसा न्यूक्लियर प्लांट है जो एक बड़ी बार्ज पर बनाया गया है और जिसे जहाज की तरह पानी में खींचकर आर्कटिक तट पर लगा दिया गया। यह वहाँ बिजली भी देता है और कड़ाके की ठंड में हीटिंग भी करता है।

अब रूस यही तकनीक भारत को देने की पेशकश कर रहा है। भारत जैसे बड़े तटीय देश के लिए यह आइडिया काफी उपयोगी हो सकता है, खासकर तब जब जमीन पर नया प्लांट लगाने में दिक्कत आती है। ऐसे तैरते हुए प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सकता है, लगाया जा सकता है और काम पूरा होने पर हटाया भी जा सकता है। यानी यह एक तरह का ‘मोबाइल न्यूक्लियर पावर स्टेशन’ बन जाता है।

यह मॉडल उन इलाकों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है जहाँ बिजली की कमी रहती है, जहाँ उद्योग तेजी से फैल रहे हैं या जहाँ प्राकृतिक कारणों से स्थिर बिजली उपलब्ध कराना मुश्किल होता है। भारत का तटीय क्षेत्र बहुत लंबा और व्यापक है। केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और भविष्य में पोर्ट आधारित उद्योगों के लिए ऐसे फ्लोटिंग प्लांट नई ऊर्जा उपलब्ध कराने का नया रास्ता खोल सकते हैं।

हालाँकि, पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने इस मॉडल को लेकर चिंता भी जताई है। ग्रीनपीस ने तो लोमोनोसोव (Lomonosov) को ‘Chernobyl on Ice’ यानि ‘बर्फ पर चेरनोबिल’ तक कहा। लेकिन रूस का कहना है कि इस प्लांट को बेहद सख्त सुरक्षा मानकों के साथ बनाया गया है और इसे प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के खास इंतजाम किए गए हैं। भारत किसी भी ऐसे प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से पहले इसकी पूरी तकनीकी जाँच और सुरक्षा समीक्षा जरूर करेगा।

भारत–रूस न्यूक्लियर साझेदारी का भविष्य: SMR से VVER-1200 तक

कुडनकुलम प्लांट भारत-रूस न्यूक्लियर साझेदारी की रीढ़ की हड्डी है। दोनों देश कई सालों से मिलकर यहाँ रिएक्टर बना रहे हैं। पहले दो रिएक्टर चल रहे हैं, तीसरे–चौथे पर काम तेज है और अब पाँचवे-छठे यूनिट के लिए भी बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है। इसी के साथ रूस ने भारत को अगली पीढ़ी के VVER-1200 रिएक्टर देने की भी पेशकश की है। ये दुनिया में सबसे सुरक्षित, आधुनिक और ज्यादा बिजली बनाने वाले रिएक्टरों में गिने जाते हैं।

अब साझेदारी सिर्फ रिएक्टर सप्लाई तक सीमित नहीं है। भारत और रूस मिलकर न्यूक्लियर उपकरण बनाने, ईंधन असेंबली तैयार करने और पूरी हाई-टेक सप्लाई चेन को भारत में ही स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में ‘SMR’ यानी छोटे लेकिन ताकतवर मॉड्यूलर रिएक्टर, इस पूरे विजन को गति दे सकते हैं। रूस इस तकनीक को आज की तारीख में सबसे बेहतर तरीके से समझता है, क्योंकि वही दुनिया का पहला देश है जिसने SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट दोनों को वास्तविक रूप से चलाया है और भारत वह बड़ा देश है जिसे आने वाले दशकों में भारी मात्रा में साफ, सस्ती और लगातार मिलने वाली बिजली की जरूरत पड़ेगी। इसलिए यह सहयोग दोनों देशों के लिए बिल्कुल स्वाभाविक, संतुलित और फायदेमंद है।

भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर क्षमता हासिल करने का जो बड़ा लक्ष्य रखा है, उसमें SMR एक तरह से ‘फास्ट ट्रैक रास्ता’ हैं। बड़े रिएक्टरों को बनाने में कई साल लगते हैं, लेकिन SMR को कम समय में इंस्टॉल किया जा सकता है और इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ मान रहे हैं कि SMR और रूस के साथ नया सहयोग भारत-रूस न्यूक्लियर इतिहास का सबसे अहम मोड़ बन सकता है।

भारत का भविष्य: सुरक्षित, स्वच्छ, स्थिर न्यूक्लियर ऊर्जा की ओर

रूस के SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट भारत को एक ऐसी राह दिखाते हैं, जहाँ बिजली न सिर्फ लगातार और किफायती होगी, बल्कि साफ ऊर्जा के मिशन का मजबूत आधार भी बनेगी। भारत की सबसे बड़ी जरूरत ‘सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर उपलब्ध ऊर्जा है। न्यूक्लियर ऊर्जा इसका सबसे टिकाऊ रास्ता मानी जाती है। ऐसे में रूस के साथ यह नई साझेदारी भारत को न सिर्फ नई ऊर्जा तकनीक देगी, बल्कि उसे एक उभरती हुई तकनीकी ताकत के रूप में भी आगे बढ़ाएगी।

भारत अब उस दौर में कदम रख रहा है, जहाँ न्यूक्लियर ऊर्जा सिर्फ बड़े-बड़े प्लांट तक सीमित नहीं रहेगी। छोटे, तेजी से स्थापित होने वाले, स्थानीय जरूरतों के लिए बने SMR आने वाले समय की ऊर्जा व्यवस्था का केंद्र बनने वाले हैं। रूस के साथ हुए नए समझौते इसी बड़े बदलाव की शुरुआत हैं, जो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा ढाँचे को पूरी तरह बदल सकते हैं।

भारत और रूस का यह SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर वाला सहयोग ऐसा है जैसे देश एक ही जगह बने विशाल बिजलीघरों से हटकर छोटे, पोर्टेबल और बेहद सुरक्षित बिजलीघरों की ओर बढ़ रहा हो, जिन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सके। भारत में जिस तेजी से बिजली की माँग बढ़ रही है, SMR उसी जरूरत को समझदारी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की क्षमता रखते हैं। रूस इस तकनीक में सबसे आगे है और भारत इसका उपयोग कर अपनी क्षमता कई गुना बढ़ा सकता है। आने वाले 10-20 वर्षों में भारत की ऊर्जा कहानी का बड़ा हिस्सा इसी नई तकनीक से लिखा जाएगा।

हिंदुओं पर अत्याचार के 1000+ मामलों के साथ UN में एक्टिविस्ट ने खोला बांग्लादेश सरकार का काला चिट्ठा: ऑपइंडिया से कहा- इस्लामी कट्टरपंथी कहर बनकर टूटे- उनके साथ यूनुस प्रशासन, भारत आखिरी उम्मीद

5 अगस्त 2024 वह दिन था जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को बिना किसी औपचारिकता के सत्ता से हटा दिया गया। यही दिन हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और गरिमा के अंत का प्रतीक भी बन गया क्योंकि इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं को चुन‑चुनकर मारने, लूटने और बलात्कार करने के लिए निशाना बनाना शुरू कर दिया। साथ ही उनके मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा‑फोड़ा और अपवित्र किया गया।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) द्वारा आयोजित ‘फोरम ऑन माइनॉरिटी इश्यूज’ के 18वें सत्र में बोलते हुए बांग्लादेशी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता दिपन मित्रा ने इस्लामियों द्वारा बांग्लादेशी हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों की घटनाओं को उजागर किया।

28 नवंबर को आयोजित इस सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान, ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष दिपन मित्रा ने कहा कि 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से ही हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यक समुदाय लगातार राज्य और समाजिक स्तरों पर भेदभाव का सामना करते रहे हैं।

हालाँकि अब स्थिति ने ‘भयावह रूप’ ले लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी समुदायों के ‘जातीय सफाए’ की एक व्यवस्थित प्रक्रिया चल रही है।

हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं का रेप और जबरन धर्मांतरण

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे इस्लामी अपराधों को उजागर करते हुए दिपन मित्रा ने बताया कि पिछले एक वर्ष में 183 से अधिक हिंदुओं की हत्या की गई है। 219 हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है।

हजारों हिंदू घरों और व्यवसायों पर हमले हुए, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया और आग के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा, हिंदू और बौद्ध समुदाय की 78 लड़कियों का जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया।

उन्होंने कहा कि ईशनिंदा के आरोप लगाकर हिंदुओं पर हमले, हिंदू मठों और मंदिरों पर कब्जा और हिंदू व्यापारियों से वसूली बांग्लादेश में रोजमर्रा की घटनाएँ बन चुकी हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब हिंदुओं की संपत्ति जब्त न की जाए, घरों पर हमला न हो, तोड़फोड़ और आगजनी न की जाए।”

अगस्त 2024 में ऑपइंडिया ने कई मामलों पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिनमें मुस्लिम भीड़ ने हिंदू मंदिरों और घरों पर हमले किए थे। उस समय, अल जजीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स और DW जैसे वामपंथी मीडिया संस्थानों ने हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को ‘राजनीतिक बदला’ बताकर कमतर दिखाने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि हिंदू समुदाय ने अवामी लीग का समर्थन किया था।

हालाँकि वास्तविकता यह है कि कुछ घटनाओं में भीड़ ने अवामी लीग के हिंदू नेताओं को निशाना बनाया, लेकिन हमले केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या बदले तक सीमित नहीं थे। हिंदू मंदिरों पर नाटोर, ढाका के धामराई, पाटुआखाली के कलापारा, शरियतपुर और फरीदपुर में हमले हुए।

जेसोर, नोआखाली, मेहरपुर, चांदपुर और खुलना में हिंदू घरों को निशाना बनाया गया। दिनाजपुर में 40 हिंदू दुकानों को तोड़ा‑फोड़ा गया। ये घटनाएँ तब सामने आईं जब 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को भारत भागने पर मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद से जब से मोहम्मद यूनुस ने गैर‑निर्वाचित अंतरिम सरकार के सलाहकार के रूप में पदभार संभाला है, हिंदुओं पर नफरत, उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार और लूट के मामले लगातार बढ़ते गए हैं। इस्लामवादी समूह पहले से कहीं अधिक साहस के साथ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं को जबरन नौकरियों से हटाया जा रहा

सम्मेलन में दिपन मित्रा ने यह भी बताया कि हिंदू अधिकारियों और शिक्षकों को व्यवस्थित रूप से नौकरी से हटाने का अभियान चल रहा है। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग के सचिव अशोक कुमार देबनाथ, प्राथमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक उत्तम कुमार दास, प्रेस काउंसिल के सचिव श्यामल चंद्र कर्मकार, कोलकाता स्थित उप‑राजदूतावास के प्रेस सचिव रंजन सेन और कनाडा स्थित उच्चायोग की काउंसलर अपर्णा रानी पाल को पद से हटा दिया गया है।”

BHRJ अध्यक्ष ने आगे कहा कि पिछले एक वर्ष में 176 हिंदू शिक्षकों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से इस्तीफा देने या हटाए जाने पर मजबूर किया गया। उन्होंने कहा, “इसके अलावा, 100 से अधिक हिंदू पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया गया, जिनमें कृष्णपद रॉय भी शामिल हैं। 2024 में राजशाही सरदा पुलिस अकादमी में चुने गए 252 सब‑इंस्पेक्टरों में से 99 हिंदू, 2 बौद्ध और 1 ईसाई को हटा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि मोहम्मद युनुस की सरकार में गृह मंत्रालय ने पुलिस प्रमुख बहारुल आलम को निर्देश दिया है कि किसी भी हिंदू को पुलिस में नियुक्त न किया जाए। भेदभाव अर्धसैनिक बलों तक भी पहुँच गया है। 2025 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) में 693 लोगों की भर्ती हुई, लेकिन उनमें एक भी अल्पसंख्यक नहीं था।

हिंदू डॉक्टरों को भी अस्पतालों के महत्वपूर्ण पदों से हटाया जा रहा है। यहाँ तक कि प्रसिद्ध डॉक्टर समंतलाल सेन पर झूठा हत्या का मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कहा, “यहाँ तक कि बांग्लादेश के प्रसिद्ध डॉक्टर समंतालाल सेन को भी झूठे मर्डर केस में फँसा दिया गया है।”

पिछले वर्ष ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि इस्लामी समूहों ने हिंदू बुद्धिजीवियों और पेशेवरों को परेशान कर नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया। कई लोगों को सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान के कारण बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। सिर्फ अगस्त 2024 में ही 60 हिंदू शिक्षक, प्रोफेसर और सरकारी अधिकारी इस्तीफा देने पर मजबूर हुए।

समय के साथ स्थिति और भी खराब होती गई। अक्टूबर में हिंदू पत्रकार लिटन कुमार चौधरी पर सिटाकुंडा में भीड़ ने हमला किया। उस पर असद बहिनी के ग्रुप के लोगों ने हमला किया था। मुस्लिम हमलावरों ने लिटन कुमार चौधरी को ‘अवामी लीग एजेंट’ कहकर बदनाम किया और उन पर ‘फेक न्यूज फैलाने’ का आरोप लगाया।

इस वर्ष जुलाई में, बांग्लादेश के चिटगाँग विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती को परेशान किया और उनकी पदोन्नति रोक दी। छात्र पहले से योजना बनाकर कार्यालय भवन के बाहर इकट्ठा हुए और हंगामा शुरू कर दिया।

इनमें से कई छात्र इस्लामी छात्र शिबिर (ICS) के सदस्य थे, जो बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार दबाई जा रही है। नास्तिकों, लेखकों और ब्लॉगर्स की हत्या की जा रही है या उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष ने आगे कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है। संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रोकने के लिए दबाव डाला जा रहा है और सभी प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों को बंद कराया जा रहा है।

नवंबर में यह रिपोर्ट किया गया कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में संगीत और शारीरिक शिक्षा के सहायक शिक्षकों के पदों को खत्म कर दिया। यूनुस शासन का यह फैसला साफ तौर पर मुस्लिमों को खुश करने का प्रयास था, क्योंकि बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन लंबे समय से संगीत शिक्षकों की जगह इस्लामी स्कॉलर्स की भर्ती की माँग कर रहे थे।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के विश्लेषण के अनुसार, 2013 से अब तक बांग्लादेश में कई धर्मनिरपेक्ष नास्तिकों, लेखकों, ब्लॉगर्स और प्रकाशकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या की गई है या वे गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

2023 से अब तक कम से कम 12 स्वतंत्र विचारकों और ब्लॉगर्स की हत्या की गई है। सैकड़ों धर्मनिरपेक्ष नास्तिक, लेखक और ब्लॉगर्स अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर विदेश भागने पर मजबूर हुए हैं।

चिन्मय कृष्णा दास को फर्जी मामले में जेल भेजा गया

UNHCR फोरम में दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास के मामले को विशेष रूप से उठाया। चिन्मय कृष्ण दास एक ISKCON भिक्षु हैं, बांग्लादेश के सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता हैं और चिटगाँग स्थित पुंडरीक धाम के प्रमुख भी हैं।

उन्हें संदिग्ध और मनगढ़ंत ‘राजद्रोह’ के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। जबकि असलियत यह है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू अधिकारों की वकालत कर रहे थे और देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मित्रा ने फोरम का ध्यान हिंदुओं और अन्य गैर‑मुस्लिम समुदायों के धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की ओर भी आकर्षित किया।

उन्होंने कहा, “एक निर्दोष ISKCON भिक्षु, चिन्मय कृष्ण दास प्रभु, को बिना किसी आरोप के एक साल से जेल में रखा गया है। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं और बौद्धों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया। बांग्लादेश में गैर‑मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं बची है। पिछले एक वर्ष में सैकड़ों मठों और धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया है और आग के हवाले किया गया है। 23 जनवरी को वर्ल्ड सूफी ऑर्गनाइजेशन ने नेशनल प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि अगस्त 2024 से अब तक कम से कम 99 धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं।”

दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग की। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रह सकता। दुनिया को आगे आकर बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठानी होगी और उनके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

नवंबर में, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के प्रसिद्ध बाउल गायक अबुल सरकार को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक संगीत प्रस्तुति के दौरान इस्लाम और अल्लाह के खिलाफ ‘ईशनिंदा’ वाले बयान दिए।

यह गिरफ्तारी मुफ़्ती मोहम्मद अब्दुल्ला की शिकायत पर हुई। गिरफ्तारी के बाद, अबुल सरकार को ‘तौहीदी जनता’ और ‘आलिम‑उलमा’ जैसे संगठनों से जुड़े उग्र मुस्लिम भीड़ों ने अदालत परिसर के बाहर घेर लिया। माणिकगंज की सड़कों पर ‘एकটা দুইটা বাউল ধর, ধইরা ধইরা জবাই কর’ (एक‑एक बाउल को पकड़ो और मार डालो) जैसे नारे गूंजते रहे।

एक अन्य घटना बांग्लादेश में बढ़ती इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता को दर्शाती है। कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों ने 19वीं सदी के महान सूफी‑संत और लोककवि फकीर लालन शाह के सम्मानित समाधि‑स्थल को ध्वस्त करने की सार्वजनिक धमकी दी। लालन शाह की समन्वयवादी (syncretic) दर्शनशैली लंबे समय से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक रही है।

बांग्लादेश में बढ़ता ‘आतंकवाद’

बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता और उग्रवाद पर भी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने आगे बात की। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की विभिन्न जेलों से सैकड़ों उग्रवादी और अपराधी फरार हो गए थे। उन्होंने कहा, भागे हुए कैदियों में से 70 आतंकियों के साथ 700 अपराधियों को अब तक गिरफ्तार नहीं किए जा सका है।

पहाड़ी जनजातियों को मिटाने के एजेंडे पर काम कर रहे इस्लामवादी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस्लामी जिहादी और बांग्लादेशी सेना मिलकर आदिवासी समुदायों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं। दिपन मित्रा ने एक विशेष घटना का उल्लेख किया, जिसमें बंगाली मुस्लिम बसने वालों और सेना ने खागड़चारी और रंगामाटी में पहाड़ी जनजातियों पर हिंसक हमला किया।

उन्होंने कहा, “इस बर्बर हमले में 8 आदिवासी लोगों की हत्या कर दी गई और 100 से अधिक घायल हुए। सभी पहाड़ी जनजातियों से थे।” उन्होंने आगे बताया कि दीघिनाला में 175 दुकानें और रंगामाटी में कम से कम 200 छोटे‑बड़े व्यवसाय क्षतिग्रस्त हुए।

इस्लामवादियों ने रंगामाटी स्थित चिटगाँग हिल ट्रैक्ट्स रीजनल काउंसिल के कार्यालय पर भी हमला किया और 9 कारों और 1 मोटरसाइकिल को आग लगा दी। इसके अलावा, इस्लामवादियों ने बौद्ध धार्मिक संस्था मैत्री विहार में तोड़फोड़ और लूटपाट की।

यूनुस जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर बांग्लादेश को इस्लामी देश बनाना चाहते हैं, भारत ही आखिरी उम्मीद”- ऑपइंडिया से बोले BHRJ अध्यक्ष

ऑपइंडिया से बातचीत में दिपन मित्रा ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति दिन‑प्रतिदिन खराब होती जा रही है। उनके अनुसार, यूनुस सरकार के तहत हिंदू ‘सबसे अधिक असुरक्षित’ स्थिति में हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष में एक भी हिंदू को किसी महत्वपूर्ण सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया गया। मित्रा ने कहा कि इस्लामवादी हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बना रहे हैं, जबकि मोहम्मद यूनुस बार‑बार भारत और भारतीय मीडिया को दोष देते हैं और हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘बढ़ा‑चढ़ाकर पेश करने’ की बात कहकर खारिज करते हैं।

उन्होंने कहा, “यूनुस पूरी तरह इस्लामवादी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं को निशाना बना रहा है। मुझे नहीं लगता कि वह अगले साल चुनाव होने देगा और अगर होने भी दिए, तो वह सुनिश्चित करेगा कि जमात‑ए‑इस्लामी और उसके सहयोगी सत्ता में आएँ। उसका लक्ष्य बांग्लादेश को एक इस्लामी देश बनाना है।”

यूनुस के इस्लामी एजेंडे पर आगे कहते हुए मित्रा ने ऑपइंडिया को बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग को अगले चुनावों से प्रतिबंधित करने के बाद, अंतरिम सरकार का सलाहकार अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भी सत्ता की दौड़ से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि यूनुस के कार्यकाल में प्रतिबंधित, भारत‑विरोधी और इस्लामवादी संगठन जमात‑ए‑इस्लामी को फिर से वैध कर दिया गया, इस्लामवादी नेताओं को जेल से रिहा किया गया, जबकि अवामी लीग के नेताओं पर कार्रवाई और तेज कर दी गई।

दिपन मित्रा ने यह भी कहा कि यूनुस ने बीमार पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के बेटे और BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारीक रहमान को अपनी माँ से मिलने के लिए बांग्लादेश आने की अनुमति नहीं दी।

रहमान वर्तमान में ब्रिटेन में रहते हैं। मित्रा के अनुसार, यूनुस शासन केवल दिखावे के लिए उनकी वापसी की बात करता है, लेकिन असल में उनकी वापसी को कभी संभव नहीं होने देता।

मित्रा ने भारतीय सरकार से अपील की कि वह यूनुस शासन पर दबाव बनाए और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बजाय इसके कि वह इस्लामवादियों के साथ खड़ा हो या जवाबदेही से बचता रहे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अब भारत और भारतीय सरकार ही अंतिम आशा हैं।

उन्होंने कहा, “भारत हमारी आखिरी उम्मीद है। भारत चुप नहीं रह सकता। बहुत देर होने से पहले भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। इस्लामवादी या तो सभी हिंदुओं को मारना चाहते हैं या उन्हें धर्मांतरित करना चाहते हैं। अफगानिस्तान कभी हिंदू था, पाकिस्तान में हिंदू आज भी जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब बांग्लादेश भी उसी दिशा में जा रहा है। भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने के लिए पहल करनी ही होगी।”

दिपन मित्रा के बारे में

दिपन मित्रा एक बांग्लादेशी हिंदू हैं जो वर्तमान में फ्रांस में रहते हैं। वे ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस के अध्यक्ष हैं। वे वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन- बांग्लादेश चैप्टर के महासचिव भी रह चुके हैं। इसके अलावा, वे WEF- यूरोपीय संघ चैप्टर के समन्वयक और साउथ एशियन पीपल्स फोरम के कार्यकारी सदस्य भी हैं।

इस खबर को मूल रूप से श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ

Indigo की उड़ानें चौथे दिन भी प्रभावित, दिल्ली-बेंगलुरु में सैकड़ों फ्लाइट रद्द: जानें- क्यों आई ऐसी नौबत कि सरकार को लेना पड़ा एक्शन

भारत की सबसे बड़ी कम लागत वाली एयरलाइन ‘इंडिगो’ पिछले चार दिनों से उड़ान संकट से जूझ रही है। शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को देशभर के कई प्रमुख हवाई अड्डों पर इंडिगो की उड़ानें रद्द होने की घटनाओं ने यात्री और अधिकारी दोनों को हैरान कर दिया।

दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सभी घरेलू उड़ानों को आधी रात तक रद्द कर दिया गया, जबकि बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कम से कम 102 उड़ानें रद्द हुईं। यह स्थिति उस दिन आई, जब इंडिगो ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को बताया कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों को सीमित किया जाएगा ताकि उड़ान हो रही रुकावट को कम किया जा सके।

एयरलाइन ने चेतावनी दी कि अगले दो-तीन दिनों तक विलंब और रद्द होने वाली उड़ानों की स्थिति बनी रहेगी। हालाँकि, एयरलाइन ने यह भी कहा कि फरवरी 10, 2026 तक संचालन पूरी तरह से स्थिर होने की उम्मीद है। इस दौरान, इंडिगो ने नई फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों के तहत रात की उड़ानों में कमी के नियमों से छूट माँगी है। उसने कहा है कि अभी और फ्लाइट्स कैंसिल होंगी और सबकुछ सही होने में करीब 10 दिन का समय लग जाएगा।

वहीं, DGCA ने कहा है कि वो इस छूट पर विचार करेगी, लेकिन इसके लिए एयरलाइन को विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। उसमें पायलट और क्रू की भर्ती, प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन और सुरक्षा योजनाओं का विवरण होगा।

केंद्र सरकार ने इंडिगो की लगातार उड़ान रद्द होने की स्थिति में DGCA के नए FDTL नियमों को तुरंत रोक दिया है और मामले में उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं। जाँच यह पता लगाएगी कि इंडिगो ने नए नियमों की तैयारी क्यों नहीं की और इतनी बड़ी अव्यवस्था कैसे हुई। मंत्रालय ने निर्देश दिए हैं कि उड़ान सेवाएँ जल्द सामान्य हों और जहाँ भी लापरवाही मिले, कार्रवाई की जाएगी।

घटना के बाद सरकार की प्रतिक्रिया

देश भर में इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होने और शेड्यूल बिगड़ने के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने DGCA द्वारा लागू किए गए नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों को तुरंत प्रभाव से रोक दिया है। मंत्रालय का कहना है कि यह फैसला यात्रियों की सुविधा को देखते हुए लिया गया है, ताकि समय पर यात्रा पर निर्भर बुजुर्गों, छात्रों और मरीजों को राहत मिल सके।

सरकार ने साफ कहा है कि FDTL आदेशों को रोका गया है, लेकिन सुरक्षा से जुड़ी किसी भी बात पर कोई समझौता नहीं किया गया है। मंत्रालय ने एयरलाइंस को निर्देश दिए हैं कि वे तुरंत ऐसे कदम उठाएँ, जिससे उड़ानें जल्द से जल्द सामान्य हो सकें और यात्रियों को काम से काम परेशानी हो।

इसी के साथ, इंडिगो में हुई भारी अव्यवस्था पर सरकार ने उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश भी जारी कर दिए हैं। जाँच में यह पता लगाया जाएगा की आखिर इतनी बड़ी संख्या में फ्लाइट कैंसिल क्यों हुईं और इंडिगो ने DGCA के नए नियम लागू होने के बावजूद पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की। आरोप है कि जहाँ बाकी एयरलाइंस ने समय रहते नए क्रू और पायलटों की भर्ती की, वहीं इंडिगो ने भर्ती के बिना अपने ऑपरेशन लगातार बढ़ाए, जिसके कारण यात्रियों को भारी दिक्कतें झेलनी पड़ीं।

जाँच में इंडिगो के आंतरिक प्लानिंग, स्टाफ मैनेजमेंट और DGCA के नियमों को लागू करने की तैयारी की डीटेल से समीक्षा की जाएगी। सरकार ने कहा है कि जहाँ भी लापरवाही या जिम्मेदारी तय होगी, कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो।

मंत्रालय ने 24×7 कंट्रोल रूम भी बनाया है, ताकि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके और यात्रियों की शिकायतों का तुरंत समाधान किया जा सके। सरकार ने उम्मीद जताई है कि अगले एक-दो दिनों में उड़ानें सामान्य होने लगेंगी और तीन दिनों के भीतर स्थिति पूरी तरह ठीक कर दी जाएगी।

क्या है समस्या का कारण ?

इस समस्या के पीछे मुख्य कारण DGCA के नए FDTL नियम हैं, जो पायलटों और उड़ान कर्मचारियों के लिए अधिक आराम करने और थकान को कम करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।

इन नियमों के तहत सात दिनों में पायलटों को 36 से 48 घंटे का आराम देना होगा, जिसके कारण लगातार काम करने वाले घंटे कम किए गए हैं। जुलाई और नवंबर 2025 में दो चरणों में लागू हुए इन नियमों के कारण इंडिगो ने अपनी उड़ान योजनाओं का सही अंदाज नहीं लगा सके।

एयरलाइन ने मान लिया कि उनके पास पर्याप्त पायलट और क्रू नहीं हैं, क्योंकि जिन पायलटों को पहले रोस्टर में ऑन ड्यूटी दिखाया गया था, उन्हें अब उड़ान भरने की अनुमति नहीं थी। इंडिगो सामान्य परिस्थितियों में हर दिन 2,200 से अधिक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करती है, जिनमें कई रात की उड़ानें शामिल हैं।

ऐसे में नए FDTL नियमों के कारण रात की उड़ानों की सीमा और पायलटों के आराम के लिए आवश्यक समय ने पूरे सिस्टम में समस्या पैदा कर दी। जिस वजह से पिछले चार दिनों में लगभग 1,300 उड़ानें रद्द हो चुकी हैं और 8 दिसंबर तक इस स्थिति में सुधार की उम्मीद नहीं है।

एयरलाइन ने यह भी माना कि FDTL नियमों के दूसरे चरण को लागू करते समय उनकी प्लानिंग और गिनती में गलती हो गई। असल में उन्हें जितने पायलट और क्रू की जरूरत थी, वह उनकी उम्मीद से ज़्यादा निकली।

अधिकारिक बयान और एयरलाइन की प्रतिक्रिया

इस पूरे परेशानी के दौरान इंडिगो ने कई बार यात्रियों और अधिकारियों से माफी माँगी है। एयरलाइन ने एक्स पर कहा कि पिछले दो दिनों में उनके नेटवर्क में काफी समस्याएँ देखने को मिला है और उन्होंने प्रभावित सभी यात्रियों से माफी माँगी।

इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स ने कर्मचारियों और यात्रियों से कहा कि सेवाओं और टाइम पर काम करने की व्यवस्था फिर से ठीक करना आसान नहीं होगा, लेकिन उनकी टीम सरकार और DGCA के सहयोग से स्थिति को सामान्य बनाने में पूरी मेहनत कर रही है।

एयरलाइन ने यह भी कहा कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों की संख्या कम कर दी जाएगी ताकि व्यवधान कम हो सके और संचालन को स्थिर किया जा सके। DGCA ने एयरलाइन को निर्देश दिए हैं कि वह क्रू भर्ती और प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन, सुरक्षा उपायों और तत्काल सुधारात्मक योजनाओं का विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करे।

इसके साथ ही एयरलाइन को हर 15 दिन में प्रगति रिपोर्ट देनी होगी। DGCA इस पूरे नेटवर्क पर कड़ी निगरानी रखेगी और यात्रियों की मदद सुनिश्चित करने के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटीज को निर्देशित किया गया है।

DGCA (नागर विमानन महानिदेशालय) ने क्रू मेंबर्स को मिलने वाले साप्ताहिक अवकाश से जुड़ी अपनी पुरानी गाइडलाइन वापस ले ली है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब पायलट और क्रू की भारी कमी की वजह से IndiGo समेत कई एयरलाइनों के संचालन में बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है और हजारों यात्री एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं।

नई अधिसूचना में DGCA ने कहा है कि मौजूदा ऑपरेशनल अव्यवस्था और एयरलाइनों से मिली शिकायतों को देखते हुए यह बदलाव किया गया है। अब पहले वाला नियम, जिसमें कहा गया था कि क्रू के साप्ताहिक आराम की जगह कोई छुट्टी नहीं लगाई जा सकती, तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया है।

इस फैसले का मतलब यह है कि एयरलाइंस अब पायलटों और क्रू की कमी को देखते हुए शेड्यूल को थोड़ी छूट के साथ चला सकेंगी, ताकि उड़ानों का संचालन स्थिर रहे और अव्यवस्था कम हो सके। यह कदम मौजूदा संकट को संभालने के लिए तत्काल राहत देने जैसा माना जा रहा है।

जनता की प्रतिक्रिया और व्यापक असर

इसका असर यात्रियों पर सबसे अधिक हुआ है। दिल्ली में अकेले शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को 220 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं, बेंगलुरु में लगभग 100 और हैदराबाद में लगभग 90 उड़ानें रद्द हुईं।

यात्रियों ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा किए, जिसमें लम्बी प्रतीक्षा, भोजन और पानी की कमी और सही जानकारी न मिलने जैसी समस्याओं का जिक्र था। कई यात्री 12 से अधिक घंटे तक हवाई अड्डों पर फंसे रहे।

इंडिगो ने यात्रियों को सलाह दी है कि वे उड़ान की स्थिति की जाँच करें, समय से पहले हवाई अड्डे पहुँचें और आवश्यक वस्तुएँ जैसे पानी, स्नैक्स और दवाइयाँ साथ रखें। इस दौरान पायलट संघों ने कहा कि एयरलाइन की प्लानिंग ठीक नहीं थी।

उनके हिसाब से यह पूरा सँकट इसलिए हुआ क्योंकि कंपनी ने समय पर लोगों की भर्ती नहीं की और स्टाफ को संभालने की रणनीति भी ठीक नहीं थी। एयरलाइन पायलट संघों का कहना है कि FDTL नियमों की तैयारी के दो साल का समय मिला, लेकिन एयरलाइन ने इसे सही तरीके से लागू नहीं किया। हालाँकि नियम सुरक्षा बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन एयरलाइन के संचालन और बड़ी संख्या में उड़ानों के कारण समस्या इतनी बढ़ गई।

टैंकों और टेक्नोलॉजी की चर्चाओं के बीच PM मोदी ने ‘भगवद्गीता’ को बनाया भारत की सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक विरासत का ग्लोबल प्रतीक

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर हैं। इस दौरे पर अमेरिका से लेकर चीन तक सबकी नजरें हैं। एक और दो पुराने सहयोगियों का यह मिलन कई लोगों की आँखों में खटक रहा है तो दूसरी तरफ भारत में इसे लेकर उत्साह है। पुतिन के दौरे के साथ-साथ उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए गिफ्ट पर भी खूब चर्चा हो रही है।

दरअसल, पीएम मोदी ने पुतिन को रूसी भाषा में लिखी ‘भगवद्गीता’ गिफ्ट की है। दुनिया की सबसे अधिक भाषाओं में अनुवादित ग्रंथों में शामिल ‘भगवद्गीता’ भारतीय सांस्कृतिक विरासत का आधार मानी जाती रही है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युद्धक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया यह दिव्य ज्ञान हजारों वर्षों बाद भी लोगों को जीवन की प्रेरणा देता है।

2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की विदेश नीति को भी सांस्कृतिक मोड़ दिया है और ‘भगवद्गीता’ इसके केंद्र में रही है। यह केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में ही नहीं बल्कि भारत की सभ्यता-परंपरा के प्रतीक के रूप में विदेश नीति का हिस्सा बन गई है। पिछले एक दशक में यह साफ दिखा है कि मोदी सरकार ने गीता को सॉफ्ट-डिप्लोमेसी के जरिए के तौर पर इस्तेमाल किया है।

सितंबर 2014 में पीएम मोदी जापान के दौरे पर गए थे और वहाँ उन्होंने सम्राट अकीहितो को ‘भगवद्गीता’ की एक प्रति भेंट की थी। साथ ही, उन्होंने इसे सबसे शानदार उपहार बताया था और उन्होंने वहीं साफ कर दिया था कि इस पर बेशक बहस होती रहे लेकिन वह आगे भी ‘भगवद्गीता’ भेंट करते रहेंगे। इसके कुछ ही दिनों बाद वह अमेरिकी दौरे पर गए और वहाँ तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी ‘भगवद्गीता’ भेंट की थी और तब से अब तक यह सिलसिला लगातार जारी है।

PM मोदी द्वारा राष्ट्रपति ट्रंप को भेंट की गई ‘भगवद्गीता’

जब मोदी किसी विदेशी नेता को गीता भेंट करते हैं तो वह सिर्फ एक किताब देने भर का काम नहीं करते बल्कि यह संदेश भी देते हैं कि भारत की पहचान उसकी जड़ों, उसकी आध्यात्मिक विरासत से ही आती है। भारत सिर्फ एक राजनीति शक्ति नहीं बल्कि हजारों वर्षों से सभ्यता और संस्कृति का केंद्र रहा है और गीता जैसा ज्ञान-दर्शन ही उसकी जड़े हैं।

PM मोदी यह मानते हैं कि यह पुस्तक किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि जीवन को समझने और सही निर्णय लेने का मार्ग दिखाती है। यही वजह है कि जब वे जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे हों या चीन, अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति किसी भी बड़े नेता को ‘भगवद्गीता’ देते हैं, तो वह भारत की सांस्कृतिक सोच को उस देश या व्यक्ति से जोड़ने का एक तरीका बन जाता है। इसे वे एक तरह का ‘सांस्कृतिक संवाद’ मानते हैं।

इस पूरे दृष्टिकोण को भारत की प्राचीन सभ्यता पर आधारित कूटनीति कहा जा सकता है। भारत की सदियों से योग, आयुर्वेद, अध्यात्म और लोकतांत्रिक मूल्यों की वजह से दुनिया में एक प्रतिष्ठा रही है। जैसे योग आज पूरे विश्व में एक स्वीकार्य प्रतीक बन चुका है, उसी तरह गीता को भी एक वैश्विक नैतिक और दार्शनिक ग्रंथ के रूप में पेश करने का प्रयास पीएम मोदी द्वारा नजर आता है।

इन प्रयासों के नतीजे भी दिखते हैं। अब गीता सिर्फ पूजा में रखी जाने वाली किताब नहीं रह गई बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर का एक सरल और सम्मानित प्रतीक बन गई है। PM मोदी की इस पहले के समर्थकों का तर्क है कि भारत को अपने प्रतीकों और परंपराओं को छिपाकर नहीं रखना चाहिए बल्कि आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखना चाहिए।

कुल मिलाकर पीएम मोदी के दौर में गीता एक धार्मिक ग्रंथ से आगे बढ़कर भारत की विदेश नीति की एक सांस्कृतिक पहचान बन गई। यह बताती है कि भारत अपनी जड़ों और अपनी आधुनिक सोच को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

ऐसी बैठकों में या उनके पहले-बाद में जहाँ डिफेंस से लेकर टेक्नोलॉजी तक की डील होती हैं, 21वीं सदी के विज्ञान पर चर्चा होती है। वहाँ गीता का उपहार देना सिर्फ सांस्कृतिक कदम नहीं है बल्कि इसके पीछे एक राजनीतिक संदेश भी नजर आता है।

पीएम मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि भारत सिर्फ तकनीक, विकास और सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि अपने मूल्यों और दर्शन से भी मजबूत है। यह एक तरह का ब्रांड इंडिया है, जो बताता है कि भारत अपनी आधुनिक उपलब्धियों और प्राचीन ज्ञान, दोनों को साथ लेकर चलता है।

‘कचरा’ बोलने पर भड़के सोमालियाई शरणार्थी, डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे: जानें- सिनेसोटा में अचानक कैसे बढ़ गई इस अफ्रीकी देश के लोगों की आबादी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (2 दिसंबर 2025) को व्हाइट हाउस की कैबिनेट मीटिंग के दौरान सोमाली प्रवासियों को ‘गारबेज’ (कचरा) करार दिया और कहा कि वे अमेरिका में नहीं रहना चाहिए। उन्होंने सोमालिया को ‘मुश्किल से एक देश’ बताते हुए कहा, “हम उन्हें अपने देश में नहीं चाहते, वे वापस जाएँ और अपना देश ठीक करें।”

ट्रंप का ये बयान मिनेसोटा की बड़ी सोमाली आबादी पर केंद्रित था, जहाँ उन्होंने कांग्रेसवुमन इल्हान उमर को भी निशाना बनाया।​ ट्रंप ने कहा कि इल्हान उमर को देश से बाहर फेंक देना चाहिए। 2019 की रैली में भी ट्रंप के भाषण के दौरान भीड़ ने ‘Send her back’ के नारे लगाए थे।

ट्रंप ने सोमाली समुदाय पर धोखाधड़ी और अपराध के आरोप लगाए, खासकर कोविड-19 के दौरान बच्चों के भोजन कार्यक्रम से करोड़ों डॉलर की हेराफेरी का हवाला दिया। उन्होंने टेम्परेरी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) समाप्त करने की घोषणा की, जो सोमाली प्रवासियों को निर्वासन से बचाता है।

डेमोक्रेटिक सांसदों ने ट्रंप की टिप्पणियों को ‘नफरतपूर्ण और अस्वीकार्य’ कहा और सोमाली समुदाय के योगदान पर जोर दिया। ट्रंप प्रशासन में कैबिनेट सदस्यों ने तालियाँ बजाईं, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने मुक्का लहराया। बयान पर रिपब्लिकन नेताओं ने चुप्पी साधे रखी, आलोचकों ने इसे नस्लीय टिप्पणियों का नॉर्मलाइजेशन कहा।

सोमालिया के लोगों पर भड़कने का कारण

ट्रंप का गुस्सा मुख्य रूप से मिनेसोटा के सोमाली समुदाय पर हो रही फेडरल जाँच से आया है, जिसमें कई सोमाली-अमेरिकियों पर सरकारी फंडिंग में धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं। उन्होंने दावा किया कि सोमाली मिनेसोटा पर कब्जा कर रहे हैं और गैंग्स सड़कों पर घूम रहे हैं। इसके अलावा, इल्हान उमर की आलोचना और राज्यपाल टिम वाल्ज पर सोमाली प्रवासियों को स्वीकार करने का आरोप भी कारण बना।​​

कांग्रेसवुमन इल्हान उमर ने ट्रंप के बयानों को ‘नस्लवादी, इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण’ कहा। उन्होंने कहा कि सोमाली-अमेरिकी स्थायी रूप से अमेरिका में बस चुके हैं। ट्रंप अपनी असफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए ये बयान दे रहे हैं। उमर ने ट्रंप पर सोमाली समुदाय को खतरे में डालने का भी आरोप लगाया।

ट्रंप प्रशासन ने सोमालिया समेत 19 गैर-यूरोपीय देशों से ग्रीन कार्ड और नागरिकता आवेदनों पर रोक लगा दी है। असल में ट्रंप का ये कदम नेशनल गार्ड सदस्यों की हत्या जैसी घटनाओं के बाद इमिग्रेशन सुधारों का हिस्सा था। व्हाइट हाउस के पास एक अफगान नागरिक रहमानुल्लाह लाकनवाल ने दो नेशनल गार्ड सैनिकों पर गोली चलाई थी।

बताया जाता है कि वह बाइडेन प्रशासन के एक रीसेटलमेंट प्रोग्राम के तहत अमेरिका आया था। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर भी मिनेसोटा को धोखाधड़ी का केंद्र बताते हुए सोमालियों को ‘वापस भेजने’ की बात कही।​​

ट्रंप के अनुसार, गैर-नागरिकों को अब कोई सरकारी लाभ या सुविधा नहीं मिलेगी, और अगर कोई प्रवासी अमेरिका की शांति को बिगाड़ता है या देश के मूल्यों के खिलाफ जाता है, तो उसकी नागरिकता भी छीनकर उसे डिपोर्ट किया जा सकता है।

ट्रंप बयान के बाद प्रदर्शन

ट्रंप के बयान के तुरंत बाद मिनेसोटा के मिनियापोलिस–सेंट पॉल क्षेत्र में सोमाली-अमेरिकी समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। मोगादिशू से लेकर मिनियापोलिस तक लोग ट्रंप की टिप्पणियों की निंदा कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) की कार्रवाइयों के खिलाफ भी रैलियाँ कीं।

समुदाय के नेताओं ने डर और गुस्सा व्यक्त किया। कुछ रिपब्लिकन समर्थक सोमाली-अमेरिकी भी विरोध में शामिल हुए, जो 2024 में ट्रंप का समर्थन करने के बावजूद निराश हैं। सोमालिया के प्रधानमंत्री ने आधिकारिक प्रतिक्रिया न देने की सलाह दी, लेकिन स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रियाएँ तेज हैं।

प्रदर्शनकारी क्या कह रहे हैं

ट्रंप के बयान पर प्रदर्शनकारियों का कहना है, “हम कचरा नहीं, बल्कि व्यवसाय, स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन में योगदान दे रहे हैं।” समुदाय टीपीएस समाप्ति और निर्वासन के खिलाफ अब एकजुट हो गया है।​​

आइस की ओर से हो रही पासपोर्ट जाँच जैसी घटनाओं का हवाला देते हुए कई सोमाली-अमेरिकी डर और असुरक्षा के साए में जी रहे हैं। वे शांति की अपील कर रहे हैं। हालाँकि स्थानीय सरकार से सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। कुछ ने ट्रंप की कुछ बातों को सही माना, लेकिन अधिकांश निंदा कर रहे हैं।​

सोमालिया से अमेरिका प्रवास का इतिहास

सोमालिया से अमेरिका प्रवास 1991 के गृहयुद्ध के बाद तेज हुआ, जब लाखों लोग शरणार्थी बने। मिनेसोटा पहला बड़ा केंद्र बना क्योंकि वहाँ नौकरियाँ मिल रही थीं और मौसम सोमाली संस्कृति से काफी मेल खाता था। वर्तमान में लगभग 80,000 सोमाली मिनेसोटा में रहते हैं, जो अमेरिका का सबसे बड़ा सोमाली समुदाय है।​

परिवार नेटवर्क, मस्जिदों, हलाल दुकानों और सामुदायिक समर्थन ने बसावट को आसान बनाया। अधिकांश लोग TPS या शरणार्थी स्टेटस के तहत आए। मिनेसोटा की प्रगतिशील संस्कृति और ‘मार्टिसूर’ (अतिथि सत्कार) ने भी उन्हें आकर्षित किया।

सोमाली प्रवासियों की संख्या अधिक क्यों

मिनेसोटा में सोमाली आबादी इसलिए बढ़ी क्योंकि शुरुआती शरणार्थी मांस पैकिंग प्लांट्स में नौकरियाँ पा गए। इसके अलावा सामाजिक नेटवर्क ने आने वाले लोगों के लिए रास्ते आसान किए गए। राज्य की कल्याणकारी नीतियाँ और सांस्कृतिक समानता ने भी उनके रहने के लिए इसे पसंदीदा जगह बनाया।​

संयुक्त राष्ट्र और यूएस प्रोग्राम्स ने केन्या के शरणार्थी कैंपों से रिसेटलमेंट किया। अब सोमाली-अमेरिकी टैक्सी, ट्रकिंग, स्वास्थ्य और शिक्षा में सक्रिय हैं। कुल 2.6 लाख सोमाली मूल के लोग अमेरिका में हैं।​

सोमालिया दशकों से अस्थिर रहा। यहाँ गृहयुद्ध, अल-शबाब आतंकवाद और सूखा ने लाखों को विस्थापित किया। बहुत से लोग 1990 के दशक में सोमालिया के गृहयुद्ध और अल-शबाब आतंकवाद के कारण शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आए थे। ट्रंप ने इसी अराजकता का हवाला देकर प्रवासियों को ‘समस्या’ बताया।​

ओबामा प्रशासन (2008–2016) के दौरान P-3 ‘परिवार पुनर्मिलन’ कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में सोमालियों को प्रवेश मिला। बाद में यह रिपोर्ट भी सामने आई कि कई मामलों में DNA टेस्ट में धोखाधड़ी हुई थी, लेकिन फिर भी उस दौरान लगभग 12,000 सोमाली प्रति वर्ष अमेरिका में आ रहे थे और उनमें से ज्यादातर वहीं रह गए।

मिनेसोटा के सोमाली समुदाय ने रेमिटेंस भेजकर सोमालिया को सहायता दी, लेकिन धोखाधड़ी आरोपों ने विवाद को बढ़ाया। ट्रंप की नीतियों के खिलाफ इसी के चलते प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

नए घोषणापत्र 2017 के ‘मुस्लिम प्रतिबंध’ से किस प्रकार भिन्न है? 

यह घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले वाले रुख का ही विस्तार है, जहाँ उन्होंने ‘उच्च-जोखिम वाले देशों’ से बड़े पैमाने पर यात्रा प्रतिबंध लगाया था। उस समय इस कदम को लेफ्ट मीडिया ने ‘मुस्लिम बैन’ कहा था, हालाँकि इसमें वेनेजुएला जैसे गैर-मुस्लिम देश भी शामिल थे।

जिन देशों को ‘चिंताजनक देश’ की सूची में रखा गया है, वे हैं- अफगानिस्तान, बुरुंडी, चाड, कांगो गणराज्य, क्यूबा, म्यांमार, इक्वेटोरियल गिनी, इरीट्रिया, हैती, ईरान, लाओस, लीबिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, टोगो, तुर्कमेनिस्तान, वेनेज़ुएला और यमन।

हालाँकि इस बार ट्रंप सिर्फ ट्रैवल बैन की बात नहीं कर रहे। अब उनका लक्ष्य थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले हर तरह के इमिग्रेशन को पूरी तरह रोकने का है। इसका मतलब है कि अब वीजा, असाइलम, रिफ्यूजी रीसेटलमेंट, परिवार वाले को बुलाना हर तरह की इमिग्रेशन प्रोसेस अनिश्चित समय के लिए बंद हो सकती है।

ट्रंप ने अपनी Truth पोस्ट में ‘Reverse Migration’ का जिक्र भी किया है। इसका मतलब है कि गैर-नागरिकों की बड़े स्तर पर वापसी (deportation) और जो लोग नागरिकता पाने की प्रक्रिया में हैं, उस प्रक्रिया को रोक देना। हाल ही में ट्रंप ने सोमाली समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा, “सोमालियों ने हमें बहुत परेशानी दी है और वे हमें बहुत महँगे पड़ते हैं। हम सोमालिया को आखिर क्यों पैसा दे रहे हैं?”

ट्रंप के फैसले कैसे बने चिंता का विषय

डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा है कि कुछ प्रवासी समुदाय अमेरिका में अपराध बढ़ा रहे हैं, संसाधनों पर बोझ हैं और कानून व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं। उनके समर्थकों में यह चिंता काफी लोकप्रिय है।

पहले वह H-1B वीजा रोकने की बात भी करते थे, जिससे भारत के पेशेवर प्रभावित हो सकते थे, लेकिन उस पर अब वह नरम हो चुके हैं। अब उनका ध्यान उन देशों से आने वाले अकुशल और उच्च-जोखिम प्रवासियों को रोकने पर है, और इस फैसले को अमेरिका में काफी समर्थन मिल सकता है।

सोमालिया एक ऐसा देश है जहाँ राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, गरीबी और अकाल ने एक पूरी पीढ़ी को तबाह कर दिया है। वहीं अमेरिका में बसे सोमालियों के बढ़ते प्रभाव और संख्या ने अब अमेरिकी राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, खासतौर पर ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों के संदर्भ में।

असम में ‘जिहादी साहित्य’ पर स्ट्राइक, बांग्लादेशी आतंकी संगठनों का डिजिटल कंटेंट भी बैन: जानें- कैसी किताबों के जरिए युवाओं का ब्रेनवॉश करते हैं इस्लामी कट्टरपंथी

असम सरकार ने राज्य की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से बचाने के लिए एक बहुत बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। सरकार ने जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT), अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS और इनसे जुड़े सभी आतंकी संगठनों से संबंधित किसी भी तरह के कट्टरपंथी या ‘जिहादी’ साहित्य, दस्तावेज और डिजिटल सामग्री के प्रकाशन, छपाई, बिक्री, वितरण, प्रदर्शन, रखने और संग्रह करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

यह प्रतिबंध केवल किताबों या पत्रिकाओं पर ही नहीं, बल्कि वेबसाइटों, सोशल मीडिया पेजों, एन्क्रिप्टेड चैनलों और ऑनलाइन ग्रुपों पर भी लागू होगा। सरकार का कहना है कि यह सामग्री भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही थी।

राज्य सरकार ने यह प्रतिबंध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 98 के तहत लगाया है। असम पुलिस की खुफिया रिपोर्ट और हाल की जाँचों में यह साफ हुआ कि ये प्रतिबंधित संगठन अभी भी राज्य में अपनी प्रचार सामग्री फैला रहे थे, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द को बड़ा खतरा था।

अधिसूचना में असम पुलिस, CID और साइबर क्राइम यूनिट को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस आदेश का सख्ती से पालन करवाएँ और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई करें। यह कार्रवाई राज्य में बढ़ते कट्टरपंथी प्रचार पर लगाम कसने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।

प्रतिबंधित जिहादी साहित्य में क्या था? आतंकी कैसे फैला रहे थे विचारधारा?

असम सरकार ने जिन सामग्रियों पर प्रतिबंध लगाया है, वे मुख्यतः हिंसक जिहाद को महिमामंडित करती थीं और सीधे तौर पर युवाओं को कट्टर बनाने की कोशिश करती थीं। सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि इन साहित्य में न सिर्फ आतंकी विचारधारा का प्रशिक्षण दिया जाता था, बल्कि भर्ती और आतंकी ऑपरेशन की ट्रेनिंग से जुड़ी गाइडेंस भी होती थी।

ये सामग्री भारत की संप्रभुता के खिलाफ खुलकर भड़काती थी और युवाओं को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित करती थी। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के संदेश ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आसानी से युवाओं तक पहुँच रहे थे।

कई डिजिटल चैनल, वेबसाइटें और वॉट्सऐप जैसे एन्क्रिप्टेड ग्रुप्स का इस्तेमाल कर ये समूह हिंसक भाषा और उग्र विचारधारा को वैध ठहराने की कोशिश कर रहे थे, जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच अविश्वास और तनाव बढ़ रहा था।

सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधा और तत्काल खतरा माना। यह प्रतिबंध इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इंटेलिजेंस रिपोर्टों में यह बात सामने आई थी कि यह डिजिटल प्रचार राज्य के सौहार्दपूर्ण वातावरण को नुकसान पहुँचा रहा था और युवाओं को गुमराह करने की कोशिशें लगातार जारी थीं।

कौन से आतंकी संगठनों का खुलासा हुआ और क्या था उनका भारत प्लान?

असम में इस प्रतिबंध के जरिए जिन तीन मुख्य आतंकी संगठनों के साहित्य और एजेंडे का खुलासा हुआ है, वे सभी बांग्लादेश में सक्रिय हैं और भारत को निशाना बनाने की फिराक में थे। ये संगठन हैं जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB), अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) और अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS। इन सभी को केंद्र सरकार पहले ही UAPA, 1967 के तहत आतंकी संगठन घोषित कर चुकी है।

JMB का जिहादी साहित्य: क्या था इसमें और कैसे फैलाया जाता था

जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश (JMB) दक्षिण एशिया के सबसे संगठित सुन्नी जिहादी नेटवर्कों में से एक माना जाता है। इसका साहित्य दो हिस्सों में बाँटा जाता है, ‘पहला वैचारिक और दूसरा ऑपरेशनल’। वैचारिक साहित्य में ‘हिंसक जिहाद को मजहबी कर्तव्य’ की तरह पेश किया जाता था। इसमें लोकतंत्र, उदारवाद और सेकुलरिज्म को ‘शैतानी व्यवस्था’ बताकर युवाओं में एक अलग पहचान और हिंसक संघर्ष का भाव पैदा किया जाता था। ऑपरेशनल सामग्री में बम बनाने से लेकर भर्ती करने की रणनीति और गुप्त सेल चलाने तक की तकनीक बताई जाती थी।

ये साहित्य कभी खुले मंचों पर नहीं मिलता था। इन्हें खास एन्क्रिप्टेड ऐप, टेलीग्राम चैनल, व्हाट्सऐप ग्रुप, और विदेशी सर्वरों पर होस्ट किए गए PDF के रूप में साझा किया जाता था। असम पुलिस की जाँच में ऐसे सैकड़ों डिजिटल दस्तावेज मिले जिनमें JMB का प्रचार था, और इन्हें मुख्यत: सीमावर्ती जिलों में फैला हुआ पाया गया।

JMB का इतिहास और भारत में उसका ‘दीर्घकालिक प्लान’

1998 में बने JMB ने खुद को शुरू से बांग्लादेश में इस्लामी शासन स्थापित करने वाले आंदोलन की तरह पेश किया। लेकिन 2005 के 63 जिलों में 459 ब्लास्ट इसकी कट्टरपंथी हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल है। भारत में इसका मुख्य मकसद दो तरह का रहा, ‘पहला, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में जिहादी सेल बनाना और दूसरा रोहिंग्या मुद्दे को भड़का कर भावनात्मक भर्ती करना।’

JMB का योजना स्पष्ट थी। सीमा पार मौजूद असंतोष का फायदा उठाते हुए भारत में ‘वार-प्रेडिक्शन मॉडल’ तैयार करना, यानी धीरे-धीरे गुप्त सेल बनाकर भारत को भविष्य में हमलों का मैदान बनाना। JMB ने असम और पश्चिम बंगाल में कई मॉड्यूल बनाए और इन मॉड्यूलों के पास जो सामग्री मिली, उनमें भारत को ‘इस्लामी संघर्ष का अगला मैदान’ बताने वाली जरूरत से ज्यादा कट्टर और उकसाने वाली बातें शामिल थीं।

युवाओं को कैसे जाल में फँसाया जाता था

JMB अपनी भर्ती का तरीका बहुत सोच-समझकर बनाता था। पहले हल्की मजहबी सामग्री भेजी जाती, फिर धीरे-धीरे कथित ‘अन्याय’ की कहानियाँ और अंत में हिंसक विचारधारा वाले दस्तावेज। असम में पकड़े गए कई युवक इन्हीं चरणों से गुजरकर कट्टर बने थे। उनमें से कई को JMB के डिजिटल हैंडलरों ने भारत के अंदर ‘स्लीपर सेल’ की तरह तैयार किया था।

ABT का साहित्य: अल-कायदा से प्रेरित संगठन का युवाओं के दिमाग पर डिजिटल कब्जा

अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (ABT) बांग्लादेश के उन संगठनों में से है जो सीधे तौर पर अल-कायदा की विचारधारा से प्रभावित हैं। ABT का साहित्य बेहद आक्रामक होता है और इसमें खासकर ‘काफिर’, ‘नास्तिक’ और ‘धर्म-विरोधी’ लोगों को निशाना बनाने की खुली बातें लिखी जाती थीं।

उनकी डिजिटल किताबों में अल-अवलाकी के भाषण, अल-कायदा के वैचारिक संदेश और ऑनलाइन ‘लोन वुल्फ अटैक’ जैसी रणनीतियाँ बताई जाती थीं। ABT की खासियत यह थी कि वह अपने साहित्य को युवाओं के लिए प्रेरणादायक भाषण या ‘आध्यात्मिक ज्ञान’ की तरह प्रस्तुत करता था, जिससे कई अनभिज्ञ युवाओं को लगता था कि यह सिर्फ धार्मिक शिक्षा है, जबकि अंदर छिपा संदेश धीरे-धीरे उन्हें हिंसक कट्टरपंथ की तरफ धकेल देता था।

ABT के भारत में नेटवर्क का खुलासा कैसे हुआ

असम STF द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन प्रघट‘ ने पूरे नेटवर्क की असल तस्वीर उजागर की। जाँच में पता चला कि ABT के कई सदस्य बांग्लादेश से भारत आए और असम, बंगाल, झारखंड और केरल में गुप्त सेल बनाने लगे। इनसे जो डिजिटल दस्तावेज मिले, उनमें अल-कायदा की विचारधारा, स्लीपर सेल तैयार करने की गाइड और भारतीय नेताओं, RSS सदस्यों को निशाना बनाने की योजनाओं का उल्लेख था।

ABT का साहित्य राज्य में इतना फैल चुका था कि कई युवाओं ने इसे बिना समझे डाउनलोड किया और बाद में संपर्क भी स्थापित किया। STF ने 13 से ज्यादा ABT सदस्यों को गिरफ्तार किया, और सभी के पास भारी मात्रा में डिजिटल जिहादी साहित्य मिला।

अंसार-अल-इस्लाम/प्रो-AQIS का साहित्य: आतंकवाद का ‘यूनिवर्सिटी मॉडल’

अंसार-अल-इस्लाम को पहले जुंद-अल-इस्लाम कहा जाता था। यह उन संगठनों में से है जिन्हें सीधे अल-कायदा ने पोषित किया। इसका साहित्य बेहद व्यवस्थित होता है, जिसे कई आतंकवाद विशेषज्ञ ‘टेक्स्टबुक ऑफ जिहाद’ कहते हैं। इसमें वैचारिक, राजनीतिक, सैन्य और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की सामग्री होती है।

इस साहित्य में ओसामा बिन लादेन, जर्कावी और अल-कायदा के अन्य नेताओं की रणनीतियों पर विस्तृत चर्चाएँ होती हैं। असम पुलिस को पता चला कि कई दस्तावेज इस संगठन के ‘प्रशिक्षण मैनुअल’ थे, जिनमें जहर बनाने, विस्फोटक तैयार करने और गुप्त नेटवर्क संभालने जैसी जानकारी थी। यही वजह है कि राज्य ने इसे सबसे खतरनाक माना।

इसका भारत में उद्देश्य क्या था

अंसार-अल-इस्लाम का उद्देश्य सिर्फ हमले करना नहीं बल्कि भारत जैसे बड़े देश में ‘आइडियोलॉजिकल पेनिट्रेशन’ यानी विचारधारा की धीरे-धीरे पैठ जमाना था। संगठन का मानना था कि अगर साहित्य भरोसेमंद हाथों तक पहुँचा दिया जाए, तो नेटवर्क बिना किसी प्रत्यक्ष आदेश के खुद बन सकता है। खुफिया रिपोर्ट में पाया गया कि असम के कुछ युवक इस संगठन के साहित्य पढ़कर खुद को ‘डिजिटल मुजाहिदीन’ कहने लगे थे।

युवाओं का कट्टरपंथ की ओर बढ़ना: असम सरकार क्यों हुई अलर्ट

असम सरकार का कहना है कि यह सिर्फ कुछ पुस्तकों का मामला नहीं बल्कि एक बड़ी डिजिटल लड़ाई है। प्रतिबंधित संगठनों ने इंटरनेट को हथियार की तरह इस्तेमाल किया और आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को अपना लक्ष्य बनाया।

कई गिरफ्तारियों में यह खुलासा हुआ कि छात्र, मजदूर, ड्राइवर, यहाँ तक कि बेरोजगार युवक भी जिहादी समूहों से डिजिटल रूप से जुड़े हुए थे। उनके फोन में जो साहित्य मिला, वह एक पूरी विचारधारा को तैयार कर रहा था। इसमें भारत को ‘दुश्मन राज्य’, पुलिस को ‘जालिम’ और लोकतंत्र को ‘हराम’ बताया गया था।

सरकार को यह भी डर था कि यदि यह सामग्री समय रहते रोकी नहीं गई तो राज्य में स्लीपर सेल बन सकते हैं, सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, और पड़ोसी देशों के आतंकी संगठनों को भारत में जमीन मिल सकती है।

असम सरकार ने बैन क्यों लगाया और आगे क्या होगा

असम सरकार ने यह प्रतिबंध सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बाद नहीं बल्कि जमीन पर देखे गए बदलावों के आधार पर लगाया। सरकार ने साफ कहा कि यह साहित्य ‘भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और आंतरिक शांति’ के खिलाफ है।

अब राज्य में पुलिस, CID और साइबर यूनिट मिलकर दुकानों, लाइब्रेरी, ऑनलाइन ग्रुप और सोशल मीडिया पेजों की निगरानी करेंगे। सरकार का लक्ष्य है कि युवाओं तक ऐसा कोई भी साहित्य न पहुँचे जो उन्हें गलत रास्ते पर ले जाए। यह अभियान लंबे समय तक चलने वाला है और किसी भी उल्लंघन पर तुरंत गिरफ्तारी की जाएगी।

हिडमा को ‘हीरो’ मानता था अक्षय, नक्सल समर्थन के मिले लिंक: इंडिया गेट प्रोटेस्ट में दिल्ली पुलिस ने खोला प्रदर्शनकारियों का कच्चा चिट्ठा, जानें ‘चिली स्प्रे गैंग’ का क्या था असली प्लान?

दिल्ली पुलिस की जाँच में सामने आया है कि इंडिया गेट पर वायु प्रदूषण के खिलाफ किए गए विरोध प्रदर्शन के पीछे नक्सली एजेंडा छिपा था। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों का मुख्य समूह ‘भगत सिंह छात्र एकता मंच’ (BSCEM) था, जिसका मकसद मारे गए नक्सली माडवी हिडमा का समर्थन करना था।

जानकारी के अनुसार, मिर्च स्प्रे से पुलिसकर्मी पर हमला करने वाला अक्षय ईआर इस साजिश का मुख्य आरोपित है, जिसके फोन से नक्सलियों से जुड़े सबूत मिले हैं। पुलिस ने इस मामले में 23 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जो अभी जेल में हैं।

मुख्य आरोपित और उसका नक्सली कनेक्शन

पुलिस दस्तावेजों के मुताबिक, जाँच में सामने आया है कि इस विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों की भूमिकाएँ क्या थीं और उनके क्या कनेक्शन थे।

अक्षय ईआर मिर्च स्प्रे से हमला करने वाला- अक्षय ईआर मुख्य साजिशकर्ता समूह BSCEM का एक एक्टिव मेंबर है। विरोध के दौरान, उसने कांस्टेबल ईशांत की आँखों में मिर्च स्प्रे कर दिया था। वीडियो में वह यह करते हुए साफ दिखा है, और पुलिस ने उसके पास से मिर्च स्प्रे की बोतल भी बरामद की है।

पुलिस ने जब उसका फोन जब्त करके जाँच की, तो उसमें नक्सलियों से संबंधित वीडियो और लिंक मिले। उसके फोन पर BSCEM की अध्यक्ष गुरकीरत का एक मैसेज भी मिला, जिसमें वे नक्सली माडवी हिडमा को हीरो बताकर उसके बारे में बात कर रहे थे। अक्षय वीडियो में हिडमा के समर्थन में नारे लगाता और उससे जुड़ा पोस्टर पकड़े हुए भी दिखा है।

गुरकीरत BSCEM की अध्यक्ष और मुख्य साजिशकर्ता- गुरकीरत भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM) की अध्यक्ष है। पुलिस ने कहा है कि BSCEM ही वह मुख्य समूह था जिसने इस प्रदर्शन को आयोजित किया था। पुलिस का दावा है कि प्रदूषण के नाम पर बुलाए गए इस प्रदर्शन में उनका एजेंडा साफ था कि वे माडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाएँगे।

हिडमा के समर्थन वाले पोस्टरों पर भी ‘BSCEM’ का नाम साफ तौर पर लिखा था। BSCEM के इंस्टाग्राम पेज पर भी हिडमा को महिमामंडित करने वाली पोस्ट मिली हैं। गुरकीरत इस वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन भी है। उसने अपनी बहन रवजोत और आयशा वाफियाथ के साथ हैदराबाद में प्रतिबंधित नक्सली समूह ‘रेडिकल स्टूडेंट यूनियन’ (RSU) के एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था और वहाँ नक्सल समर्थक नारे लगाए थे।

पुलिस का मानना है कि वह इस मामले में मुख्य साजिशकर्ता है और समूह को चला रही है। जब कुछ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया तो वह भी दूसरों के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने पहुँची और पुलिस अधिकारियों को काम करने से रोका।

रवजोत कौर, गुरकीरत की बहन और ग्रुप एडमिन- रवजोत कौर, गुरकीरत की सगी बहन है और BSCEM समूह की मुख्य सदस्य है, जो ग्रुप चलाने में मदद करती है। वह BSCEM वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन भी है। वीडियो में वह हिडमा के समर्थन में नारे लगाती साफ दिख रही है।

रवजोत कौर ने भी गुरकीरत और आयशा के साथ प्रतिबंधित RSU के कार्यक्रम में जाकर नक्सल समर्थक नारे लगाए थे। उसने भी BSCEM के नाम से हिडमा को महिमामंडित करने वाले पोस्टर बनाए थे। वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम पर भी हिडमा के एनकाउंटर की निंदा करने वाली बातचीत मिली है। वह भी मुख्य साजिशकर्ता है, जिसने थाने जाकर पुलिस के काम में बाधा डाली।

आयशा वाफियाथ मिधाथ और श्री इलक्किया- ये दोनों भी BSCEM समूह की एक्टिव मेंबर हैं। आयशा भी BSCEM वॉट्सऐप ग्रुप की सदस्य है और वीडियो में हिडमा के समर्थन में नारे लगाते दिखी है। उसने और श्री इलक्किया ने भी गुरकीरत और रवजोत के साथ प्रतिबंधित RSU के कार्यक्रम में भाग लिया और नक्सल समर्थक नारे लगाए।

इलक्किया को वीडियो में जोर-जोर से यह नारा लगाते देखा गया कि ‘हिडमा अमर रहे, कितने हिडमा मारोगे, हर घर से हिडमा निकलेगा, हिडमा जी को लाल सलाम’। ये दोनों भी मुख्य साजिशकर्ता हैं जिन्होंने थाने जाकर पुलिस के काम में रुकावट पैदा की।

क्रांति उर्फ प्रियांशु सिंह, गुमराह करने का आरोप- क्रांति को भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते देखा गया। उसने ‘हिमखंड ग्रुप’ बनाया और उस वॉट्सऐप ग्रुप की एडमिन है, जहाँ प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाया गया था। वह प्रदर्शन को आयोजित करने वालों में से थी और रवजोत और गुरकीरत के संपर्क में थी। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया है कि वह जाँच को गुमराह कर रही है और उसने अपना मोबाइल फोन नंबर नहीं दिया है।

विष्णु तिवारी, फर्जी जानकारी फैलाने का आरोप- विष्णु तिवारी से मिर्च स्प्रे की एक बोतल मिली है। वीडियो में वह प्रदर्शनकारियों को ट्रैफिक रोकने और सड़क जाम करने के लिए उकसाता हुआ दिखा है। उसके फोन की चैट से पता चला कि वह क्रांति उर्फ प्रियांशु सिंह के संपर्क में था, जिसने नक्सल समर्थक नारे लगाए थे।

विष्णु तिवारी के फोन में एक स्क्रीनशॉट मिला, जिससे पता चला कि ये लोग यह फर्जी खबर फैला रहे थे कि हिडमा को आत्मसमर्पण के बहाने मार दिया गया। उस पर महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता और हमला करने का भी आरोप है।

अन्य साजिशकर्ता

अभिनाश सत्यपाथी को भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते और हिडमा को हीरो बताने वाला पोस्टर पकड़े देखा गया। उसने बैरिकेडिंग को तोड़ने की कोशिश की। प्रकाश कुमार गुप्ता और समीर फायरीस भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाते दिखे, उन्होंने सड़क भी रोकी और उन पर महिला पुलिसकर्मियों के साथ अभद्रता और हमला करने का आरोप है।

आहान अरुण उपाध्याय ने क्रांति और रवजोत को प्रदर्शन के लिए डिजिटल पोस्टर बनाने और सोशल मीडिया पर मैसेज एडिट करने में मदद की। वागीशा अनुदीप भी हिडमा के समर्थन में नारे लगाती दिखी।

इसके अलावा करीना सुंदरानी, प्रीति रानी चंद्रकेत, आत्रेय चौधरी, श्रेष्ठ मुकुंद, सत्यम यादव, मेहुल झुंझुनवाला, सिमरन सिंह, तान्या श्रीवास्तव, काजल कुमारी, बंका आकाश और नोई मेबुंग भी प्रदर्शन में शामिल थे। ये सभी लोग भी उन प्रदर्शनकारियों में शामिल थे जिन्होंने थाने जाकर पुलिस के काम में बाधा डाली।

दिल्ली पुलिस ने इन सभी 23 प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दो अलग-अलग FIR दर्ज की हैं और ये सभी अभी न्यायिक हिरासत में हैं।

कार्तिगई दीपम विवाद पर मद्रास HC ने फटकारा, फिर भी हिंदुओं की खिलाफत से बाज नहीं आई तमिलनाडु की DMK सरकार: जानें- क्यों अदालत ने लिया अवमानना पर एक्शन

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने बुधवार (3 दिसंबर 2025) को डिडीगुल और मदुरै जिला प्रशासन के खिलाफ दो अलग-अलग कंटेम्प्ट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सख्त रुख अपनाया। ये याचिकाएँ हाईकोर्ट के उन आदेशों की अवहेलना के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिनमें हिंदू भक्तों को कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने और दीप जलाने की अनुमति दी गई थी।

पहला मामला डिंडीगुल के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल से जुड़ा है, जहाँ स्थानीय हिंदू समुदाय को उत्सव मनाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जिला प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के नाम पर इसे रोक दिया। दूसरा मामला मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल से संबंधित है, जहाँ हाईकोर्ट ने दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश दिया था, लेकिन प्रशासन ने इसे लागू नहीं किया।

हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में कंटेम्प्ट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अधिकारियों को फटकार लगाई और कहा कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने इन मामलों में सुनवाई की और अपने आदेश में साफ कहा कि जब तक सिंगल बेंच का फैसला डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द या स्थगित नहीं किया जाता, तब तक इसे पूरी तरह लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों की इस हरकत को ‘नियम कानून की अवहेलना’ करार दिया और कहा कि यह संवैधानिक मूल्यों पर हमला है।

आइए, दोनों मामलों में कोर्ट के आदेश की प्रमुख बातों और फैसलों को विस्तार से समझते हैं।

डिंडीगुल के मांडू कोविल (पेरुमल कोविलपट्टी) का मामला और कोर्ट का आदेश

डिंडीगुल जिले के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मंदु कोविल (सर्वे नंबर 780/12) में कार्तिगई दीपम उत्सव मनाने की अनुमति माँगने वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया था। दरअसल, डिंडीगुल जिले के अथूर तालुक के पेरुमल कोविलपट्टी गाँव में स्थित मांडू करुप्पसामी मंदिर (राजस्व रिकॉर्ड में मांडू कोविल के नाम से दर्ज) परिसर में हिंदू समुदाय कार्तिगई दीपम मनाना चाहता था। गाँव में ईसाई बहुसंख्यक हैं और हिंदू अल्पसंख्यक।

2 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32468 of 2025) स्वीकार करते हुए हिंदुओं को बुधवार-गुरुवार (3-4 दिसंबर) को कुछ घंटे के लिए दीपम जलाने और झाड़ियाँ साफ करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने साफ कहा था कि कोई स्थायी निर्माण नहीं होगा और ईसाई समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन अगले ही दिन डिंडीगुल के जिलाधकारी ए. सरवनन (IAS) ने धारा 163 BNSS के तहत आदेश जारी कर गाँव में 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने और बाहरी लोगों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसका सीधा मतलब था कि कोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदू दीपम नहीं जला सकेंगे।

कोर्ट ने इसे ‘खुली अवमानना’ और ‘हिंदुओं के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन’ बताया। जज ने कहा-

“मैंने सिंगल बेंच में आदेश दिया था। जब तक डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट उसे स्थगित या रद्द नहीं करता, उसे अक्षरशः मानना होगा। जिलाधकारी मुझ पर अपीलीय अधिकार नहीं रखते। वह मेरे आदेश को रद्द करने वाला आदेश जारी करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं?”


“कानून-व्यवस्था का बहाना देकर नागरिकों के वैध अधिकारों को कुचलना प्रशासन की लाचारी की स्वीकारोक्ति है। पुलिस अधिकार सुरक्षित रखने के लिए है, उन्हें छीनने के लिए नहीं।”

“पेरुमल कोविलपट्टी के किसी भी हिंदू का पूजा और उत्सव मनाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत मौलिक अधिकार है। जिलाधकारी ने सामान्य धार्मिक उत्सव तक रोक दिया। इससे बड़ा मौलिक अधिकारों का हनन और क्या हो सकता है?”

कोर्ट ने जिलाधकारी सरवनन और पुलिस अधीक्षक प्रतीप (IPS) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सफाई देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि उनकी सफाई के बाद तय होगा कि अवमानना हुई है या नहीं।

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थिरुप्परनकुंद्रम हिल मामले में कोर्ट का फैसला और प्रमुख बातें

मदुरै के थिरुप्परनकुंद्रम हिल पर स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के प्रबंधन को दीपथून स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने का आदेश हाईकोर्ट ने 1 दिसंबर 2025 को दिया था। दरअसल, मदुरै के प्रसिद्ध अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर के पास थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी है। इस पहाड़ी के निचले शिखर पर एक प्राचीन पत्थर का स्तंभ है जिसे ‘दीपथून’ कहते हैं। सदियों से कार्तिगई दीपम के दिन यहाँ विशाल दीप जलाने की परंपरा रही है। ऊपरी शिखर पर कथित तौर पर दरगाह है।

1 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन ने रिट याचिका (WP(MD)No.32317 of 2025) में मंदिर प्रशासन को 3 दिसंबर शाम ठीक 6 बजे दीपथून पर कार्तिगई दीपम जलाने का स्पष्ट आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि यह केवल निचले शिखर पर होगा, इससे दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

लेकिन 3 दिसंबर को शाम 6 बजे तक कोई तैयारी नहीं हुई। मंदिर के कार्यकारी अधिकारी यज्ञ नारायणन फोन नहीं उठा रहे थे। मंदिर प्रशासन ने 2 दिसंबर को ही खामीपूर्ण अपील दाखिल की थी, जिसे रजिस्ट्री ने बताया कि वकील ने कागजात वापस ले लिए। दरगाह की ओर से कोई अपील नहीं की गई। कोर्ट ने इसे ‘आदेश की अवहेलना करने की चाल’ बताया।

जज स्वामीनाथन ने कहा-

“मंदिर को मेरे आदेश से कोई शिकायत कैसे हो सकती है? शिकायत सिर्फ दरगाह को हो सकती थी। अपील खामीयुक्त दाखिल करना और फिर वापस लेना साफ तौर पर आदेश नहीं मानने की तरकीब है।”

“घड़ी पीछे नहीं की जा सकती। अधिकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि वे कोर्ट का आदेश नहीं मानेंगे।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (मई 2025) और केरल हाईकोर्ट (2020) के कड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कोर्ट का आदेश न मानना लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है। कोई अधिकारी, चाहे कितना ऊँचा हो, कानून से ऊपर नहीं है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को खुद दीप जलाने की दी अनुमति

इस मामले में सजा देने के बजाय कोर्ट ने अपने मूल आदेश को तुरंत लागू करवाने का रास्ता चुना। जज ने कहा कि अवमानना का मकसद सिर्फ सजा नहीं, बल्कि कोर्ट के आदेश को बहाल करना भी है। इसलिए-

  • याचिकाकर्ता रामा रविकुमार को खुद पहाड़ी पर चढ़कर दीपथून पर दीप जलाने की अनुमति दी गई।
  • वे 10 अन्य लोगों (अन्य याचिकाकर्ताओं सहित) को साथ ले जा सकते हैं।
  • मद्रास हाईकोर्ट मदुरै बेंच की CISF यूनिट को आदेश दिया गया कि वह सुरक्षा टीम भेजकर याचिकाकर्ताओं की पूरी सुरक्षा करे और दीप जलाने में मदद करे।

कोर्ट ने माना कि यह ‘प्रतीकात्मक कदम’ है, लेकिन प्रतीकात्मकता का बहुत महत्व है। हालाँकि इसके बावजूद डीएमके सरकार ने मूल जगह पर दीपथून की अनुमति नहीं दी

पढ़ें- फैसले की कॉपी

ये फैसले दिखाते हैं कि हाईकोर्ट न्यायपालिका की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कितना सख्त है। जस्टिस स्वामीनाथन ने बार-बार जोर दिया कि कार्यपालिका कोर्ट के आदेश पर फैसला नहीं सुना सकती। कानून-व्यवस्था का बहाना बनाकर धार्मिक अधिकारों को दबाना असंवैधानिक है। मंदु कोविल मामले में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों पर जोर दिया गया, जबकि थिरुप्परनकुंद्रम में प्रतीकात्मक अनुपालन से कोर्ट ने अपनी शक्ति दिखाई।

ये फैसले तमिलनाडु की डीएमके सरकार को चेतावनी हैं कि धार्मिक मामलों में तटस्थ रहें और कोर्ट आदेशों का पालन करें। अगर अधिकारी स्पष्टीकरण नहीं देते, तो सजा हो सकती है। हालाँकि डीएमके सरकार की तानाशाही के सामने हाई कोर्ट भी बेबस दिखी। ऐसे में अब हाई कोर्ट ने दोनों मामलों में अवमानना की याचिकाएँ स्वीकार कर ली है। अब देखना ये है कि हिंदू विरोधी डीएमके सरकार हाई कोर्ट को कब तक अँगूठा दिखाती है, या फिर कानून इन मामलों में कोई अलग रास्ता अपनाएगा, ये भी देखने वाली बात होगी।

अर्थव्यवस्था में तेजी से तरक्की, फिर भी डॉलर के मुकाबले कमजोर पड़ रहा रुपया: इन 3 बिंदुओं से समझिए, क्यों कमजोर पड़ रही भारत की करेंसी

भारतीय रुपया (INR) पहली बार डॉलर के मुकाबले 90 रुपये के निम्नतम स्तर को पार कर गया है। रुपए 3 दिसंबर 2025 को 90.19 रुपये पर बंद होने से पहले 90.30 रुपये के निचले स्तर पर पहुँच गया। यह हाल के दिनों में लगातार तीसरा निम्नतम स्तर है। भारतीय रुपया 2025 में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्राओं में से एक रहा है, जिसमें लगभग 4-5% की गिरावट आई है।

यह गिरावट अचानक नहीं आई है। 2 दिसंबर को 89.9475 रुपए प्रति डॉलर से और 1 दिसंबर को 89.76 रुपए प्रति डॉलर के बाद तीसरे दिन लगातार 90 रुपए प्रति डॉलर का मनोवैज्ञानिक गिरावट दर किया गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए जून और अक्टूबर के बीच लगभग 30 बिलियन डॉलर की USD बिक्री करके स्थिति सुधारने की कोशिश की थी।

रुपए में आई ऐतिहासिक गिरावट के बाद विपक्ष को भी बोलने का मौका मिल गया। विपक्षी पार्टियों और मोदी विरोधियों ने मोदी सरकार पर हमला करने और उस पर बड़े पैमाने पर फाइनेंसियल मिसमैनेजमेंट का आरोप लगाया। मोदी के विरोधी डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को सरकार की नाकामी के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बेरोजगारी, महँगाई बढ़ने और PM मोदी के नेतृत्व में निवेशकों का भरोसा कम होने की आशंका जता रहे हैं।

लेकिन आर्थिक हालात का ऐसा मतलब निकालना बेईमानी है और यह सरकार को टारगेट करने की रणनीति है, न कि इंडियन इकॉनमी और करेंसी को लेकर असली चिंताओं पर बात करने की। क्योंकि ‘बाहरी कारकों’ को समझे बिना हालात को ठीक से समझना मुश्किल है।

दरअसल भारतीय रुपये की कमजोरी पूरी तरह से घरेलू वजहों या पॉलिसी की गलतियों की वजह से नहीं है, बल्कि यह काफी हद तक ग्लोबल मुश्किलों और स्ट्रक्चरल ट्रेड इम्बैलेंस की वजह से है।

यह न भूलें कि भारत का मूलभूत आर्थिक ढाँचा मजबूत बना हुआ है। FY26 की तीसरी तिमाही में, देश की GDP 7.3% के अनुमान से कहीं ज्यादा 8.2% रही। महँगाई भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, और कॉर्पोरेट कमाई भी सुधर रही है।

भारतीय रुपए में गिरावट की तीन बड़ी वजह

ऐसे समय में जब देश US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों के डर से अपनी सॉवरेनिटी और आत्मसम्मान का सौदा कर रहे हैं, भारत अकेला ऐसा देश है जो प्रेशर पॉलिटिक्स के आगे नहीं झुका है और किसी भी एकतरफा सौदे के लिए सहमत नहीं हुआ। आर्थिक और जियोपॉलिटिकल दबाव का सामना करने की एक कीमत चुकानी पड़ती है। ट्रंप ने बेतुके दावे किए कि भारत किसी तरह रूसी वॉर मशीन को ‘फंडिंग’ कर रहा है और न जाने क्या-क्या, ताकि 50% टैरिफ लगाया जा सके।

ट्रंप ने भारत की इकॉनमी को ‘डेड इकॉनमी’ कहा, जबकि इंडियन इकॉनमी मज़बूत, स्थिर और बढ़ रही है, लेकिन सब कुछ ठीक नहीं हो सकता। टैरिफ बढ़ाने की घोषणा के बाद से, भारतीय रुपया USD के मुकाबले 5.5% कम हो गया है।

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में तेजी से आई गिरावट तब और बढ़ गई जब इस साल की शुरुआत में US में ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने इंडियन एक्सपोर्ट पर 50% टैरिफ लगा दिए। इससे अलग-अलग सेक्टर में सालाना लगभग $45 बिलियन के एक्सपोर्ट पर सीधा असर पड़ा।

US दुनिया के सबसे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट में से एक है। इसमें भारी कमी की वजह से भारत का एक्सपोर्ट तेजी से गिरा। अक्टूबर 2025 में मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट साल-दर-साल 11.8% गिरकर $34.4 बिलियन के ग्यारह महीने के सबसे निचले स्तर पर आ गया। इसकी वजह US के बढ़े हुए टैरिफ और खराब बेस थे। यह याद रखना चाहिए कि अक्टूबर 2024 में, एक्सपोर्ट में 16.6% की मजबूत बढ़ोतरी हुई थी।

गौरतलब है कि US एक्सपोर्ट में गिरावट को कम करने के लिए, भारत नए मार्केट की तलाश कर रहा है। जुलाई 2025 में इंडिया-UK FTA इस दिशा में काफी अहम है, जो टैक्स में कटौती और एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन और एक्सपोर्टर्स के लिए क्रेडिट गारंटी जैसे सरकारी सपोर्ट उपायों को लागू करके घरेलू डिमांड को बढ़ा रहा है।

ग्लोबल क्रूड की कीमतों में गिरावट के कारण तेल की कीमतों में 10.5% की गिरावट आई, जो नौ महीने के सबसे निचले स्तर $3.9 बिलियन पर आ गई। नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट में भी यही हाल रहा है, जो 12% घटकर $30.4 बिलियन रह गया, जो ग्यारह महीने का सबसे निचला स्तर है। इलेक्ट्रॉनिक सामान, जिसमें इंजीनियरिंग सामान, जेम्स एंड ज्वेलरी, केमिकल्स और रेडीमेड गारमेंट्स शामिल हैं, को छोड़कर लगभग हर एक्सपोर्ट कैटेगरी में साल-दर-साल गिरावट देखी गई।

एक तरफ एक्सपोर्ट कम हुआ, वहीं दूसरी ओर मर्चेंडाइज और सोने जैसे कुछ सेगमेंट में आयात बढ़ा है। संक्षेप में, एक्सटर्नल सेक्टर पर दबाव बढ़ रहा है। टैरिफ, बड़े मार्केट से डिमांड में कमी, और इंपोर्टेड सामान की लगातार डिमांड ने एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। यह कुछ ऐसा है जिस पर स्टेकहोल्डर्स और सरकार को ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आने वाले समय में ट्रेड डेफिसिट की और बढ़ने से INR डेप्रिसिएशन बढ़ सकता है और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में दिक्कत हो सकती है।

(साभार-रॉयटर्स)

इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो आउटफ्लो ने इस साल अब तक इंडियन इक्विटीज से 16.78 बिलियन रुपये निकाले हैं। इसका मुख्य कारण US और इंडिया के बीच इंटरेस्ट-रेट का अंतर है, जो 2.5% से कम हो गया है। इससे डॉलर की डिमांड तेजी से बढ़ी है। SBI के एनालिसिस के मुताबिक, जुलाई और अक्टूबर के बीच, एक रेयर इम्बैलेंस दर्ज किया गया जब स्पॉट और फॉरवर्ड मर्चेंट मार्केट में कुल एक्स्ट्रा डिमांड $102.5 बिलियन तक पहुँच गई।

INR की कीमत कम होने में NDF की भूमिका के बारे में बात करते हुए, मेकलाई फाइनेंशियल सर्विसेज़ के डिप्टी चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर रितेश भंसाली ने कहा, “NDF मार्केट में, हमने रुपये की बहुत शॉर्टिंग देखी है, जिससे रुपये पर दबाव बन रहा है। अगर आप स्पेक्युलेटिव एक्टिविटीज को शामिल न भी करें, तो डिमांड-सप्लाई के आधार पर, डॉलर की डिमांड सप्लाई के मुकाबले ज्यादा है।”

उन्होंने आगे कहा कि रुपये की कीमत कम होने की वजह से इंपोर्टर्स अपने इंपोर्ट पेमेंट पहले ही कर रहे हैं, जबकि एक्सपोर्टर्स सख्ती से हेजिंग नहीं कर रहे हैं। रेड्डी ने कहा, “घरेलू फंडामेंटल्स अपनी मुश्किलें खुद खड़ी कर रहे हैं, बढ़ता करंट अकाउंट डेफिसिट और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) की नरम स्थिति करेंसी के लिए खराब डिमांड-सप्लाई डायनामिक में योगदान दे रही है।”

X पर बात करते हुए, पुराने बैंकर उदय कोटक ने बताया कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में चल रही गिरावट सीधे विदेशी निवेशकों के व्यवहार से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि INR में गिरावट की वजह विदेशी निवेशकों का पोर्टफोलियो फ्लो और FDI के तहत प्राइवेट इक्विटी से बाहर निकलना है।

कोटक ने लिखा, “₹@90. इसका सबसे बड़ा कारण: FDI के तहत FPI और PE दोनों तरह के भारतीय स्टॉक्स की विदेशी बिक्री। भारतीय निवेशक खरीद रहे हैं। समय बताएगा कि कौन ज़्यादा स्मार्ट है। अभी के लिए, विदेशी ज़्यादा स्मार्ट लग रहे हैं। 1 साल का निफ्टी $ रिटर्न 0 है। लेकिन यह एक लंबा खेल है। भारतीय बिज़नेस के लिए कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलने का समय आ गया है।”

खास तौर पर, फॉरेन पोर्टफोलियो इनफ्लो (FPI) में भारी गिरावट आई है और बाहरी उधार भी कम हुए हैं, जो मुश्किल ग्लोबल फिस्कल हालात का संकेत है। इस साल जनवरी से, FPI ने घरेलू इक्विटी से 1.48 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं। यह बड़ी गिरावट तब आई जब भारत का मैक्रोइकोनॉमिक बैकग्राउंड काफी हद तक स्थिर है।

इस बीच, करूर वैश्य बैंक के ट्रेजरी डिप्टी जनरल मैनेजर राम चंद्र रेड्डी का मानना ​​है कि ग्लोबल कैरी-ट्रेड कैपिटल के पारंपरिक सप्लायर, US और जापान, ‘बढ़ी हुई ब्याज दरों से जूझ रहे हैं, उभरते बाजारों में कम लागत वाली कैपिटल का फ्लो काफी कम हो गया है।’

रेड्डी का कहना है कि इस माहौल ने न केवल भारत में नए कैरी-ट्रेड इनफ्लो को सीमित किया है, बल्कि मौजूदा पोजीशन को खत्म करने का जोखिम भी बढ़ा दिया है, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।

खास तौर पर, इस साल अक्टूबर में, भारत ने $41.68 बिलियन का अपना अब तक का सबसे बड़ा मंथली ट्रेड डेफिसिट दर्ज किया। यह इंपोर्ट में 16.6% की बढ़ोतरी, खासकर क्रूड ऑयल (85% इंपोर्टेड), कमोडिटीज़, और त्योहारों के मौसम में सोने की खरीद में बढ़ोतरी की वजह से हुआ। करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़कर $12.3 बिलियन, या GDP का 1.3% हो गया, जिसकी वजह ट्रेड डेफिसिट का बढ़ना था, जो GDP का 9% तक बढ़ गया। इसकी कई वजहें थीं, जिसमें ग्लोबल कीमतों के बीच सोने के इंपोर्ट में बढ़ोतरी भी शामिल थी। इन वजहों से इंपोर्टर्स की तरफ से लगातार डॉलर की डिमांड बनी रही।

हालाँकि डॉलर इंडेक्स खुद इस साल अब तक 8.5% गिरा है और 3 दिसंबर को 99.22 पर बंद हुआ, लेकिन भारतीय रुपया ज्यादातर एशियाई देशों की तुलना में ज्यादा कमजोर हुआ। इसकी वजह भारत के लिए खास बाहरी झटके और RBI का जानबूझकर किसी खास डेप्रिसिएशन लेवल का सख्ती से बचाव करने के बजाय उतार-चढ़ाव को मैनेज करने की तरफ झुकाव है। RBI ने 2025 में सिर्फ़ लगभग $30 बिलियन बेचे हैं, जबकि अपने फ़ॉरेक्स रिज़र्व को आराम से लगभग $690 बिलियन पर रखा है। एक कमजोर और गिरती हुई अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं कर सकती।

जिस इंडिया-US ट्रेड डील या द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) अब तक नहीं हुई है। इसका भी असर पड़ा है। पिछले कई महीनों से इंडिया और US इस डील को आगे बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहे हैं, लेकिन, एग्रीकल्चर और डेयरी मार्केट खोलने की माँग अमेरिका कर रहा है, भारत इसके लिए तैयार नहीं है। एकतरफा ट्रेड डील पर साइन करने के लिए भारत पर दबाव डालने की ट्रंप की जिद की वजह से समझौते में देरी हो रही है। यह कन्फ्यूजन इन्वेस्टर्स का भरोसा कम कर रहा है। हालाँकि, हाल ही में भारत और अमेरिका की तरफ से जो बयान सामने आए हैं, उससे पता चलता है कि दोनों देश इंडिया-US ट्रेड डील करने के करीब हैं। अगर ये डील हो जाता है तो भारत पर अमेरिकी टैरिफ कम हो जाएगा और व्यापार संबंधों को मजबूती मिलेगी। इससे इंडियन रुपया बाजार में स्थिर होगा।

क्या सिर्फ मजबूत करेंसी ही मजबूत इकॉनमी का सबूत है? अगर ऐसा होता, तो अफ़गानिस्तान एक इकॉनमिक पावरहाउस होता।
जबकि भारत अपने सामने आने वाली मुश्किलों से निपट रहा है, वहीं आम लोग मोदी सरकार पर “अफ़गानिस्तान की करेंसी भी हमारी करेंसी से ज़्यादा मज़बूत है” जैसी बेतुकी बातें कहकर हमला कर रहे हैं। हालाँकि, ये बचकानी बातें हैं जो इकॉनमिक्स कैसे काम करती है, इसकी पूरी तरह से समझ की कमी या जानबूझकर की गई नासमझी से पैदा हुई हैं।

तालिबान के राज वाले अफगानिस्तान की करेंसी, ‘अफगानी’, दुनिया की सबसे मज़बूत और सबसे स्टेबल करेंसी में से एक है। ऐसा इसलिए नहीं है कि देश आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि इसलिए है कि तालिबान ने US डॉलर और पाकिस्तानी रुपये के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इससे विदेशी करेंसी की माँग खत्म हो गई है। अफगानिस्तान में ज्यादातर लेन-देन अफगानी करेंसी में होती है।

लिमिटेड एक्सपोर्ट, थोड़ा विदेशी इन्वेस्टमेंट, और न के बराबर इंटरनेशनल ट्रेड, हालांकि तालिबान इस मामले में थोड़ा खुल रहा है, ये मुख्य वजहें हैं जिनकी वजह से अफ़गानिस्तान की करेंसी बनावटी तौर पर स्टेबल बनी हुई है। हालांकि, यह ‘स्टेबिलिटी’ ज़रूरी तौर पर इकोनॉमिक स्टेबिलिटी में नहीं बदलती। अफ़गानिस्तान की इकोनॉमी के उलट, इंडियन इकोनॉमी न तो छोटी है और न ही अलग-थलग है।

अफगानिस्तान में इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और इन्वेस्टमेंट बहुत कम है। इसके विपरीत इंडिया एक बड़ी इकोनॉमिक ताकत है और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और इन्वेस्टमेंट का हब है। अफगानिस्तान की करेंसी जापान से ज्यादा मजबूत है। हालाँकि इकोनॉमिक ग्रोथ, स्टेबिलिटी, इन्वेस्टमेंट और ग्लोबल मार्केट शेयर के मामले में अफगानिस्तान जापान के आस-पास भी नहीं है।

हालांकि डेप्रिसिएशन चिंता की बात है, लेकिन इंडियन करेंसी वोलाटाइल नहीं है; बल्कि, इस समय, यह ग्लोबल मुश्किलों के खिलाफ एक शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम कर रही है। HSBC समेत कई एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि ‘इंडियन रुपया इकॉनमी के लिए एक शॉक एब्जॉर्बर है, और एक्सटर्नल फाइनेंस के लिए एक ऑटोमैटिक स्टेबलाइजर है।’ डॉलर के मुकाबले रुपए का डेप्रिसिएशन जरूरी नहीं कि पॉलिसी फेलियर का नतीजा हो और इसका मतलब पूरी तरह से इकॉनमिक वीकनेस नहीं है।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)