अफगानिस्तान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंध आज न सिर्फ ऐतिहासिक विरासत का विस्तार हैं बल्कि मौजूदा भू-राजनीतिक समीकरणों, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और पाकिस्तान को बायपास करने की रणनीति के केंद्र में भी हैं।
दोनों देश साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। एयर कार्गो कॉरिडोर, व्यापार अटैशे की नियुक्ति और निवेश सहयोग से यह साझेदारी न केवल आर्थिक पर साथ ही भू-राजनीतिक दृष्टि से भी अहम हो गई है।
भारत और अफगानिस्तान के बीच प्राचीन सिल्क रूट दोनों देशों की ऐतिहासिक विरासत रहा है। यहीं से सूखे मेवे, मसाले, कालीन और घोड़े आदि का आयात निर्यात होता रहा। आज दोनों देशों के रिश्ते सुरक्षा, विकास और कनेक्टिविटी की आधुनिक भाषा में बदल गए हैं, इसका आधार वही पुरानी ऐतिहासिक निकटता और आपसी भरोसा है।
तालिबानी सत्ता की वापसी के बाद राजनीतिक मान्यता को लेकर थोड़ी परेशानी रही, लेकिन भारत ने मानवीय सहायता, बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर ढाँचागत प्रोजेक्ट और व्यापारिक संपर्क को जारी रखकर संबंध टूटने नहीं दिए। इसी कड़ी में नई दिल्ली और काबुल अब इस रिश्ते को मदद से आगे ले जाकर ‘साझेदार व्यापार’ में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
अफगानिस्तान के उद्योग और वाणिज्य मंत्री नूरुद्दीन अजीजी 5 दिवसीय यात्रा के तहत भारत के दौरे पर हैं। इस दौरे का मकसद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के बेहतर करना है। इस दौरे में एयर कार्गो कॉरिडोर की घोषणा हुई। काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्ग पर मालवाहक उड़ानें शुरू होंगी।
India-Afghanistan to strengthen bilateral trade ties
— Sidhant Sibal (@sidhant) November 21, 2025
Key initiatives:
-Establish trade attaché offices in Delhi, Kabul
-Reactivate dormant joint trade working group
-Set up new joint chamber of commerce
-Launch dedicated air cargo corridors soon
Kabul Delhi
Kabul Amritsar pic.twitter.com/TUXXyLGSZB
इसके अलावा दोनों देशों ने व्यापार अटैशे नियुक्त करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य यह है कि व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी, निवेशकों को मार्गदर्शन और नीतिगत समन्वय सीधे तौर पर किया जा सके। इससे व्यापारिक विवादों का समाधान भी तेज़ी से होगा और कारोबारी माहौल को स्थिरता मिलेगी।
अजीजी से पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी अक्टूबर में भारत की सप्ताह भर की यात्रा के लिए आए थे। तब भारत और अफगानिस्तान ने खनिज, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में निवेश के अवसर तलाशने के लिए एक द्विपक्षीय व्यापार कमेटी बनाने की बात कही थी। भारत ने भी कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिहाज से काबुल में अपने तकनीकी मिशन को दूतावास का दर्जा दिया है।
गौरतलब है कि ये यात्रा उस समय हो रही है जब पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के रिश्तों में तनाव चल रहा है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए जमीनी रास्ते बंद कर दिए हैं। इससे अफगानिस्तान का व्यापार प्रभावित हो रहा है।
इसी के चलते अफगानिस्तान ने भारत की ओर अपने कदम तेजी से बढ़ाए हैं। अब एयर कार्गों सेवा जल्द ही शुरू किए जाने की घोषणा से पाकिस्तान पर दोतरफा दबाव बढ़ेगा। भारत- अफगानिस्तान डील में दोनों देशों ने नया संयुक्त वाणिज्य मंडल (Joint Chamber of Commerce) बनाने की घोषणा की है।
ये प्लेटफॉर्म व्यापारिक संगठनों, उद्योगपतियों और निवेशकों को एक साझा मंच देगा, जहाँ वे नए अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा कर सकेंगे। इससे निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी और व्यापारिक रिश्ते सरकारी स्तर से एक कदम आगे बढ़ेंगे।
क्या है भारत-आफगानिस्तान की मौजूदा व्यापारिक इंफ्रास्ट्रक्चर
2024-25 के वित्तीय वर्ष में भारत-अफगानिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार ₹8372 करोड़ (1 अरब डॉलर ) के पार पहुँच चुका है। क्षेत्रीय अस्थिरता के बावजूद ये इजाफा काबिल-ए-तारीफ है।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, कुल व्यापार लगभग 1.0087 अरब डॉलर (₹8372 करोड़) रहा, जिसमें से करीब 689.8 मिलियन डॉलर (₹5722 करोड़) अफगानिस्तान के निर्यात और करीब 319 मिलियन डॉलर (₹2647 करोड़) भारत के निर्यात रहे, यानी व्यापार संतुलन पहली बार काबुल के पक्ष में थोड़ा झुक गया।
अफगानिस्तान से भारत को मुख्य रूप से सूखे मेवे, बीज, केसर, जड़ी-बूटियाँ, किशमिश और अनार जैसे कृषि उत्पाद आते हैं, जो भारतीय बाजार में प्रीमियम श्रेणी के माने जाते हैं।
इसके बदले में भारत अफगानिस्तान को दवाइयाँ, मशीनरी, रेडीमेड कपड़े, खाद्य पदार्थ, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुएँ निर्यात करता है। ये सामान अफगान के शहरी और कस्बाई बाजारों के लिए अहम आपूर्ति शृंखला बन चुके हैं।
पाकिस्तान की समस्या और उसका बायपास
भारत- अफगानिस्तान व्यापार की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) रुकावट पाकिस्तान है। पाकिस्तान अक्सर भारत और अफगानिस्तान के बीच जमीनी ट्रांजिट को रोकने की कोशिश करता है।
वर्तमान में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ा है। सीमा पार हमले और बार बार क्रॉसिंग बंद होने से अफगानिस्तान के ताजे फल और सब्जियों के निर्यात को खासतौर पर भारी नुकसान हुआ। इसके कारण अफगानिस्तान को वैकल्पिक मार्ग खोजने पड़े।
हाल में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए अपनी जमीनी सीमा बंद कर दी। इसके कारण अफगानिस्तान को व्यापार में काफी नुकसान झेलना पड़ा। इसके बाद तालिबान सरकार ने अपने व्यापारियों को दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने तथा वैकल्पिक रूट अपनाने की सलाह जारी की।
इसी के चलते भारत के साथ हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के विस्तार को अफगानिस्तान की ‘पाकिस्तान बायपास’ रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे इस्लामाबाद की सामरिक और आर्थिक चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।
2017 में हुई भारत-अफगान एयर कॉरिडोर की शुरुआत
भारत- अफगानिस्तान के बीच एयर फ्रेट कॉरिडोर की शुरुआत 2017 में हुई, जब काबुल से दिल्ली के लिए पहला कार्गो फ्लाइट 60 टन कार्गो भारत पहुँचा। इसमें मुख्य रूप से ‘हींग’ और अन्य औषधीय पौधों को लाया गया।
असल में यह फैसला 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी की मुलाकात में लिया गया था, ताकि पाकिस्तान की जमीनी रुकावटों को खत्म करके अफगानिस्तान को सीधे भारतीय बाजार से जोड़ा जा सके।
इसके तुरंत बाद कंधार- दिल्ली कार्गो फ्लाइट शुरू हुई, जिससे अनार और ताजे फल आदि भारतीय थोक मंडियों तक आसानी और तेजी से पहुँचे। इससे अफगान किसानों को भी बेहतर दाम मिलने के रास्ते भी खुले।
इस एयर कॉरिडोर ने शुरुआती वर्षों में व्यापार को गति दी, लेकिन सुरक्षा, वित्तीय प्रतिबंधों और तालिबान की वापसी के बाद इसे रोक दिया गया। अब इसे फिर से सक्रिय किया जा रहा है।
दोनों देशों के बीच नई हवाई कार्गो सेवा की डील
अफगानिस्तान के तालिबान व्यापार मंत्री अल हज नूरुद्दीन अजीजी की हालिया यात्रा के दौरान काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्गों पर एयर फ्रेट कॉरिडोर ‘सक्रिय’ कर दिया गया हैं। इन रास्तों पर कार्गो उड़ानें बहुत जल्द शुरू होने वाली हैं।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी आनंद प्रकाश के अनुसार, इन मार्गों पर शीघ्र ही नियमित कार्गो फ्लाइट ऑपरेशन शुरू होंगे, जिससे दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को सीधा बढ़ावा मिलेगा।
इस समय अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव के कारण जमीनी ट्रांजिट लगभग ठप है। इससे अफगान निर्यातकों, विशेषकर फल उत्पादकों, को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब एयर कार्गो कॉरिडोर से ही अफगानिस्तान को उम्मीद है कि ताजा और अधिक मूल्य वाले अफगानी सामान बिना रुकावट भारतीय शहरों तक पहुँचेंगे। कार्गो के जरिए भारत से दवाइयाँ, मशीनरी और कपड़े काबुल और अन्य शहरों में पहुँच सकेंगे।
चाबहार पोर्ट और समुद्री कनेक्टिविटी
हवाई मार्ग के साथ-साथ भारत और अफगानिस्तान ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए समुद्री-स्थलीय कनेक्टिविटी को भी रणनीतिक रूप से मजबूत करने की योजना पर काम कर रहे हैं।
चाबहार पोर्ट में भारत की भारी निवेश और त्रिपक्षीय ट्रांजिट समझौता अफगानिस्तान को अरब सागर तक वैकल्पिक समुद्री रास्ता देता है, जो पाकिस्तान के कराची और ग्वादर बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करता है।
अफगान व्यापार मंत्री ने भारत से चाबहार के जरिए रेगुलर शिपिंग सेवाएं शुरू करने, ईरान के निमरोज प्रांत में ड्राई पोर्ट विकसित करने और भारतीय बंदरगाह न्हावा-शेवा पर अफगान कार्गो की क्लीयरेंस आसान बनाने की माँग भी की है।
हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार की क्षमता अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रही, लेकिन इसे आने वाले समय में ‘गेम चेंजर कॉरिडोर’ माना जा रहा है जो दक्षिण एशिया और मध्य एशिया कनेक्टिविटी की धुरी बन सकता है।
भारत-अफगानिस्तान का व्यापारिक ढाँचा, रियायतें और निवेश अवसर
भारत ने अफगान उत्पादों के लिए अपने बाजार में लगभग शून्य या बहुत कम टैरिफ का प्रावधान रखा है। इसके कारण छोटे अफगान किसानों और उत्पादकों को बेहतर खरीदार और दाम मिल पा रहे हैं। कई विश्लेषकों का ये भी कहना है कि भारतीय बाजार तक आसान पहुँच के चलते अफगान किसानों को अफीम जैसी अवैध खेती के बजाय सूखे मेवे, केसर, जड़ी- बूटियों वाली वैकल्पिक खेली करने का मौका मिल रहा है।
दूसरी ओर, अफगानिस्तान तालिबान शासन के तहत भी भारतीय निवेश को आकर्षित करने के लिए 5 साल तक कृषि-प्रोसेसिंग, खनन और हल्की मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में टैक्स हॉलिडे, कच्चे माल और मशीनरी पर 1% आयात शुल्क जैसे प्रोत्साहन दे रहा है।
इस व्यापारिक संरचना को मूर्त रूप देने के लिए दोनों देशों ने वाणिज्यिक/ट्रेड अटैशे नियुक्त करने, संयुक्त कार्य समूहों को पुनः सक्रिय करने और बैंकिंग- भुगतान सिस्टम को दोबारा स्थापित करने पर आपसी सहमति जताई है।
अफगान बैंकों में भुगतान, बैंकिंग और SWIFT की चुनौती
तालिबान के सत्ता में आने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद अफगान बैंकों की SWIFT प्रणाली से कटौती के कारण भारत–अफगानिस्तान व्यापार में भुगतान और बैंकिंग सबसे बड़ी तकनीकी बाधा बनकर उभरे।
इससे न केवल बड़े कॉर्पोरेट सौदे, बल्कि छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए भी लेन–देन जोखिमपूर्ण और महँगा हो गया। इसके चलते कई भारतीय आयातकों को अपने ऑर्डर घटाने पड़े।
नई साझेदारी में दोनों देश इस स्थिति को हल करने के लिहाज से वैकल्पिक भुगतान सिस्टम, थर्ड-कंट्री बैंकिंग चैनल या लिमिटेड विशेष प्रावधान जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं ताकि वैध व्यापार को प्रतिबंधों से कम से कम नुकसान हो।
हवाई कार्गो और चाबहार मार्ग पर जोर इसलिए भी है कि इन संरचनाओं के साथ समानांतर रूप से सुरक्षित और पारदर्शी भुगतान ढाँचा स्थापित किया जा सके।
मानवीय, सामाजिक और सामरिक आयाम
भारत- अफगानिस्तान व्यापार आर्थिक साझेदारी के साथ मानवीय और सामाजिक आयाम से भी गहराई से जुड़ा है। बड़ी संख्या में अफगान नागरिक इलाज, शिक्षा और रोजगार के लिए भारत आते हैं। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों का भारतीय निर्यात सीधे तौर पर अफगानिस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था को सहारा देता है।
इसके अलावा, व्यापारिक कनेक्टिविटी को क्षेत्रीय स्थिरता की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है, जहाँ अफगानिस्तान को वैकल्पिक वैध आर्थिक अवसर देकर कट्टरपंथ और अवैध अर्थव्यवस्था को कम करने की सोच दिखाई देती है। भारत के लिए यह आर्थिक के साथ सामरिक निवेश भी है। ये मध्य एशिया तक भारत की पहुँच, ऊर्जा मार्गों और ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति को मजबूत करता है।
पाकिस्तान पर क्या पड़ेगा इसका असर
नई हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के सक्रिय होने से पाकिस्तान की पारंपरिक ‘ट्रांजिट लीवरेज’ कमजोर पड़ती है, क्योंकि अब वह अफगानिस्तान-भारत व्यापार को रोककर दोनों पर दबाव नहीं बना पाएगा।
भारतीय और अफगान अधिकारियों के बयानों से ये साफ संदेश दिखता है कि ‘रोडब्लॉक’ को बायपास करके दोनों देसों के बीच की साझेदारी को आगे बढ़ाया जाएगा। इससे पाकिस्तान की नाराजगी और चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
आर्थिक रूप से भी जब अफगानिस्तान अपनी निर्यात रणनीति भारत, ईरान और मध्य एशिया की ओर मोड़ता है तो पाकिस्तान की ट्रांजिट फीस, लॉजिस्टिक बिजनेस और सीमावर्ती व्यापार को नुकसान होता है। ये पहले सालाना अरबों डॉलर का वॉल्यूम रखता था। इस बदलाव से दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन और कनेक्टिविटी मैप पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है, जिसमें भारत-अफगानिस्तान की नजदीकी एक निर्णायक स्थिति के तौर पर बनकर उभर रही है।
दोनों देशों के लिए आगे की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
आने वाले वर्षों में अगर एयर कॉरिडोर वाणिज्यिक तौर पर व्यावहारिक साबित होते हैं तो द्विपक्षीय व्यापार को 1.5- 2 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य पूरा होने की संभावना सच हो सकती है।
हालाँकि राजनीतिक मान्यता, तालिबान शासन की नीतियाँ, वैश्विक प्रतिबंध, आतंकवाद का खतरा और बैंकिंग में आने वाली बाधाएँ अभी भी चुनौतियाँ हैं, जो इस रिश्ते की रफ्तार को सीमित कर सकती हैं।
इसके बावजूद, मौजूदा स्थिति में अफगानिस्तान-भारत द्विपक्षीय व्यापार संबंध दोनों देशों के लिए एक ‘रेयर पॉजिटिव’ के रूप में उभर रहे हैं, जो मानवीय जरूरत, आर्थिक हित और जियोपॉलिटिकल रणनीति को एक साथ साधने की कोशिश है।


