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चीन, हुआवेई, न्यूजक्लिक और कॉन्ग्रेस: भाजपा सांसद जेठमलानी ने जयराम रमेश पर उठाए सवाल, खेल में सामने आया ‘सिंघम’

भाजपा के राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी ने मानसून सत्र के दौरान 8 अगस्त 2023 को कॉन्ग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के रिश्तों पर सवाल उठाया है। उन्होंने पूछा कि क्या सीसीपी का भारत में कॉन्ग्रेस से कोई कोई रिश्ता है?

एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में उन्होंने खुलासा किया कि न्यूज़क्लिक विवाद के केंद्र में जो नेविल रॉय सिंघम हैं, उन्होंने 2001-2008 तक चीनी दूरसंचार दिग्गज हुआवेई के चीफ टेक्निकल ऑफिसर के तौर पर भी काम किया था। चीनी टेलीकॉम दिग्गज हुआवेई को सीसीपी के साथ रिश्तों और सुरक्षा मुद्दों पर दुनिया भर की कई सरकारों ने घेरा था।

चीन की हुआवेई कंपनी को साल 2019 में अमेरिका ने प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसी तरह साल 2020 में सुरक्षा चिंताओं की वजह से हुआवेई को यूके के 5G नेटवर्क से प्रतिबंधित कर दिया गया था। अक्सर इसका जिक्र चीनी सरकार के काबू में रहने वाली कंपनी के तौर पर किया जाता है।

जेठमलानी ने 2006 में कहा था कि कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने एक किताब CHINDIA प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने पहली बार हुआवेई की तारीफ के पुल बाँधे थे।” उन्होंने आगे कहा कि यूपीए 2 शासन में पर्यावरण मंत्री के तौर हुआवेई के फायदों के लिए उसकी पैरवी जारी रही थी।

इसके अलावा, जेठमलानी ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की मौजूदगी में साल 2008 में सीसीपी के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत की थी। जेठमलानी ने कहा, “यह सब हुआवेई के साथ सिंघम के कार्यकाल के दौरान हुआ था।”

उन्होंने ये सवाल भी किया, “क्या उनमें से कोई एक या दोनों, हुआवेई में नौकरी के दौरान या उसके बाद सिंघम से कभी मिले थे? उनके आपसी लिंक क्या थे? क्या एनआईए को जाँच नहीं करना चाहिए?”

क्या है न्यूज़क्लिक विवाद ?

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 5 अगस्त को एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया। इसमें एक अमेरिकी कारोबारी के चीनी सरकार के साथ रिश्तों और न्यूज़क्लिक नामक भारतीय वामपंथी प्रचार आउटलेट को वित्तीय मदद देने का खुलासा किया गया था। अमेरिकी अखबार के मुताबिक, नेविल रॉय सिंघम नाम का करोड़पति चीन के प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने के लिए भारत सहित दुनिया भर में कई समाचार प्रकाशनों को फंडिंग कर रहा है।

लेख में कहा गया है, “जो बात कम पता है और गैर-लाभकारी समूहों एवं शेल कंपनियों की उलझन के बीच छिपी हुई है, वह यह है कि सिंघम चीन की सरकारी मीडिया मशीनरी के साथ मिलकर काम करते हैं और दुनिया भर में इसके प्रोपेगेंडा के लिए फंडिंग करते हैं।”

न्यूयॉर्क टाइम्स ने ये भी बताया कि सिंघम ने भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में ‘प्रगतिशील एडवोकेसी’ के बहाने चीनी सरकार की बातों को सफलतापूर्वक पहुँचाया। नेविल रॉय सिंघम ने न्यूज़क्लिक नामक भारत में मौजूद वामपंथी प्रचार आउटलेट को फंडिग की थी। इसमें कहा गया है कि न्यूज आउटलेट ने अतीत में सीसीपी की बातों को दोहराया है।

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, “नई दिल्ली में कॉर्पोरेट फाइलिंग से खुलासा हुआ है कि सिंघम के नेटवर्क ने एक न्यूज साइट, न्यूज़क्लिक को वित्तपोषित किया।” न्यूयॉर्क टाइम्स ने नोट किया कि इस न्यूज आउटलेट ने अपनी एक वीडियो कवरेज में ‘चीन का इतिहास अभी भी श्रमिक वर्ग को प्रेरणा देता है’ की बात की।

नेविल सिंघम और हुआवेई का गठजोड़

नेविल सिंघम और हुआवेई के गठजोड़ की पोल न्यू लाइन्स मैगजीन की एक रिपोर्ट ने खोली है। न्यू लाइन्स मैगजीन की जनवरी 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंघम ने चीनी रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म बॉस जिपिन के साथ सिंघम ने 2001 से 2008 तक हुआवेई के साथ रणनीतिक तकनीकी सलाहकार के तौर पर काम किया।

फॉर्च्यून मैगजीन के सीनियर एडिटर डेविड किर्कपैट्रिक से बात करते हुए सिंघम ने चीन की जमकर तारीफों के पुल बाँधे थे। उन्होंने कहा, “चीन पश्चिम को सिखा रहा है कि मुक्त-बाज़ार समायोजन और दीर्घकालिक योजना, इस दोहरी प्रणाली के साथ दुनिया बेहतर है।”

थॉटवर्क्स की अक्टूबर 2010 में आयोजित की गई पाँचवी एजाइल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस के दौरान नेवल रॉय सिंघम का शुरुआती भाषण चीन के साथ उनके रिश्तों पर रोशनी डालने के लिए काफी है। इसमें सिंघम ने कहा था कि उन्होंने कैसे एजाइल के जरिए कई चीनी कंपनियों पर अपना असर डाला था।

उस सम्मेलन पर थॉटवर्क्स की एक प्रेस रिलीज में कहा गया है, “सिंघम ने बताया कि चीन में एजाइल के प्रचार का चाइना मोबाइल, हुआवेई, बाइ़ेडयू, अलीबाबा और नोकिया-सीमेंस जैसे उद्यमों और संगठनों के टॉप मैनेजमेंट पर गहरा असर पड़ा।”

उन्होंने कहा कि इन सबने अपने संगठनों के प्रबंधन और संस्कृतियों में एजाइल के विकास को सक्रिय तौर से प्रभावित करने के लिए बारीकी से ध्यान देना शुरू कर दिया है सिंघम ने न केवल हुआवेई, बल्कि अन्य बड़ी चीनी कंपनियों का नाम लिया गया, जो सभी प्लेटफार्मों पर उनकी गहरी पहुँच की तरफ इशारा करता है।

जयराम रमेश की किताब में बाँधे गए हुआवेई की तारीफों के पुल

इससे पहले भी जनवरी 2023 में बीजेपी एमपी महेश जेठमलानी ने जयराम रमेश से चीनी कंपनी हुआवेई के साथ अपने रिश्तों पर सफाई देने का अनुरोध किया था। एक्स पर एक पोस्ट में, जेठमलानी ने कहा, “2005 से जयराम रमेश भारत में चीनी टेलीकॉम कंपनी हुआवेई की गतिविधियों की पैरवी कर रहे हैं। हुआवेई को सुरक्षा खतरे के तौर पर लेते हुए कई देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है। जयराम अब चीन को लेकर भारत सरकार के रुख पर सवाल उठा रहे हैं। यह उनका दायित्व है कि वह अपने हुआवेई संबंधों का खुलासा करे।”

जेठमलानी ने अपने पोस्ट में एक स्क्रीनशॉट शेयर किया था, वह 2005 में रिलीज़ हुई जयराम रमेश की किताब ‘मेकिंग सेंस ऑफ चिंडिया: रिफ्लेक्शन्स ऑन चाइना एंड इंडिया’ से लिया गया था। किताब में जयराम रमेश ने चीन के इतिहास, संस्कृति और अन्य पहलुओं में अपनी रुचि का जिक्र किया है।

उन्होंने इस पुस्तक में बताया है कि कैसे प्रतिस्पर्धा और कई मौकों पर टकराव से भारत और चीन स्वाभाविक दुश्मन नहीं बन जाते और भारत एवं चीन के बीच संबंध कैसे फायदेमंद हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि 130 पन्नों की किताब में हुआवेई का जिक्र चार बार हुआ है।

महेश जेठमलानी ने जयराम की किताब का जब पहला जिक्र किया था और उसे शेयर किया था, वो किताब के चैप्टर “द सी-आई-ए ट्राएंगल” से था। इसमें भारत और अमेरिका बनाम चीन के रिश्तों पर स्पष्टता की बात की गई है। इसमें जयराम ने बताया कि कैसे अमेरिका-भारत सौदे होने के बावजूद, भारत और चीन के बीच व्यापार में उछाल आया।

उन्होंने इस चैप्टर में खास तौर से हुआवेई का जिक्र किया और कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारा विदेश कार्यालय चीन से सावधान है और जनवरी 2003 में जसवन्त सिंह ने कूटनीति को किनारे रख दिया और चीनी आँकड़ों को मूखर्तापूर्ण बताया।”

जेठमलानी ने कहा, “चीनियों को लगता है कि भारत व्यापार वीसा देने और चीनी एफडीआई एवं सार्वजनिक निविदाओं में जीते गए अनुबंधों को मंजूरी देने में गैर-जरूरी बाधा डाल रहा है। चीनी नेटवर्किंग चीफ हुआवेई टेक्नोलॉजीज की बेंगलुरु में बड़ी मौजूदगी है और वह विस्तार करना चाहती है, जिससे भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ काफी असहज हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “बाद में ‘वाजपेयी चीन गए’ टाइटल वाले चैप्टर में जयराम रमेश ने द्विपक्षीय और क्षेत्रीय पहलों के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा पर चर्चा की। उन्होंने चीनी कंपनियों, खासकर हुआवेई को भारत में हतोत्साहित करने के बारे में भी बात की, जबकि कंपनी पहले से ही बेंगलुरु में 500 से अधिक भारतीय इंजीनियरों को रोजगार दे रही है।”

जेठमलानी ने आगे कहा, “चैप्टर ग्रोइंग एम्बिवलेंस में उन्होंने फिर से जिक्र किया कि हुआवेई ने 500 भारतीय इंजीनियरों को रोजगार दिया और निराशा जताई की कि भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने इस कंपनी को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने लिखा कि जब भारत में चीनी निवेश की बात आती है तो हम पुरानी मानसिकता के कैदी जैसे लगते हैं।”

एफडीआई संशोधनवाद (FDI Revisionism) चैप्टर में जयराम रमेश ने अन्य चीनी कंपनियों के साथ फिर हुआवेई का जिक्र किया और इशारा किया कि चीन ने अपनी वैश्विक मौजूदगी का तेजी से विस्तार किया है। उन्होंने आगे कहा कि भारत में विदेशी निवेश के खिलाफ लॉबी की वजह से विदेशी कंपनियाँ चीन की तरफ आकर्षित हुईं।

जयराम रमेश और उनका चीन से इश्क

चीनी कंपनी हुआवेई के लिए जयराम रमेश का प्यार 2010 में सुर्खियों में आया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारत में हुआवेई के निवेश के संबंध में तब उनके एक बयान पर नाराजगी जाहिर की थी।

तत्कालीन पर्यावरण और वन राज्यमंत्री जयराम रमेश ने 8 मई 2010 को अपनी चीन यात्रा के दौरान कहा था कि चीनी कंपनियों और प्रोजेक्ट्स के प्रति भारतीय गृह मंत्रालय की चिंताजनक और व्याकुलतापूर्ण नीतियाँ दोनों देशों के बीच संबंधों के लिए खतरा हैं।

उन्होंने कहा कि ड्रैगन के साथ जलवायु सहयोग पर “संदिग्ध” सुरक्षा और रक्षा प्रतिष्ठान के विरोध का सामना उन्हें करना पड़ा। उन्होंने हुआवेई जैसी चीनी कंपनियों के लिए गृह मंत्रालय की कथित “अत्यधिक रक्षात्मक” नीतियों पर सवाल उठाया, क्योंकि ये कंपनी सुरक्षा कारणों से आयात प्रतिबंध का सामना कर रही थी।

सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का सीसीपी के साथ एमओयू

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने 2008 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए थे। ये घटना पड़ोसी देशों के दो राजनीतिक दलों के निजी विकास पर राष्ट्रीय हितों को परे व्यक्तिगत हितों पर ध्यान केंद्रित करने के आरोपों की वजह रडार पर आई थी। समझौता ज्ञापन (एमओयू) ने दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता, क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक-दूसरे से परामर्श करने के लिए कहा गया था।

दिलचस्प बात यह है कि इस एमओयू पर तत्कालीन कॉन्ग्रेस महासचिव राहुल गाँधी ने दस्तखत किए थे। चीनी पक्ष की ओर से इस पर किसी और ने नहीं, बल्कि खुद चीन क राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने दस्तखत किए थे। जिनपिंग उस वक्त सीपीसी के उपाध्यक्ष एवं पोलित ब्यूरो की स्थायी समिति के सदस्य थे।

एमओयू पर सोनिय गाँधी और राहुल गाँधी, दोनों ने दस्तखत किए थे। दस्तखत करने से पहले, तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी ने आपसी हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए शी जिनपिंग और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ एक लंबी बैठक की थी।

सोनिया गाँधी ने 2008 में ओलंपिक खेलों के उद्घाटन में भाग लेने के लिए राहुल, बेटी प्रियंका, दामाद रॉबर्ट वाड्रा और उनके दो बच्चों के साथ बीजिंग का दौरा किया था। इससे एक साल पहले सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने चीन में कॉन्ग्रेस पार्टी के एक प्रतिनिधिमंडल का भी नेतृत्व किया था।

सीसीपी और कॉन्ग्रेस के बीच 2008 का ये समझौता ज्ञापन उस वक्त हुआ, जब भारत में वामपंथी दलों ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-1 सरकार में विश्वास की कमी जताई थी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि भले ही चीन को भारत के राजनीतिक परिदृश्य के बारे में जानकारी थी, लेकिन तब भी शी जिनपिंग ने आगे बढ़कर कॉन्ग्रेस के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए, क्योंकि सीसीपी कॉन्ग्रेस के साथ, खासकर गाँधी परिवार के साथ गहरे रिश्ते रखना चाहती थी।

झाँसी को क्रांतिकारियों की शरणस्थली बनाने वाले ‘मास्टर’, जो चुका रहे थे ‘रानी सा’ का कर्ज: घर के बाहर पुलिस, फिर भी आज़ाद को दी पनाह

‘झाँसी’ – यह नाम सुनते ही साथ देश-विदेश में बसे भारतीयों के समक्ष एक तस्वीर जो सबसे पहले आती है वो है झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की। झाँसी अपनी अग्नि एवं क्रांतिधर्मी प्रकृति के लिए शुरू से ही विख्यात रही है। 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन की चिंगारी जो हमारी रानी सा ने लगाई थी वो 1947 में जाकर अपनी गति को प्राप्त हुई और भारत को अंग्रेज़ों की पराधीनता से मुक्ति मिली।

यह हम सभी जानते हैं कि प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष में झाँसी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी किंतु 1857 के समर के बाद भी झाँसी की क्रांतिकारी आन्दोलन में सहभागिता कम महत्वपूर्ण नहीं रही। झाँसी में क्रांति दल की स्थापना एवं विकास में उस काल में यदि किसी व्यक्ति ने सर्वाधिक रुचि ली थी तो वह थे मास्टर रूद्र नारायण जी। अट्ठारह सौ सत्तावन की प्रथम स्वतंत्रता सेनानी महारानी लक्ष्मी बाई ने समूचे बुंदेलखंड़ में क्रांति एवं बलिदान के जो बीज अंकुरित किए थे, उनके अंकुरों से ही कालांतर में मास्टर रुद्र नारायण जैसे राष्ट्धर्मी एवं क्रांतिकारी पुष्प पल्लवित हुए।

मास्टर जी जगजाहिर राष्ट्रप्रेमी थे और स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उन्होंने अपने घर के आँगन में ही एक व्यायामशाला बनवा रखी थी जिसमें झाँसी के युवा व्यायाम तथा मल्ल विद्या का अभ्यास करते थे। युवक आते तो थे व्यायाम करने किन्तु जब वहाँ से लौटते थे तो उन युवकों के दिलों के अंदर क्रांति की एक नन्ही सी चिंगारी मास्टर जी द्वारा सुलगाई जा चुकी होती थी। 

सभी युवाओं को मास्टर जी व्यायाम के बहाने क्रांति के अर्थ एवं सिद्धांतों की शिक्षा दिया करते थे। कुछ समय बाद बाहर निकलते ही यह सभी नवयुवक क्रांति दल एवं राष्ट्रीय सेवा में जुट जाते थे। मास्टर जी कुछ समय तक उन सभी नवयुवकों पर अपनी निगाह रखते थे। मास्टर जी जब संतुष्ट हो जाते तो उनके द्वारा परखे झाँसी तथा आसपास के क्षेत्र के रणबाँकुरे राष्ट्र निष्ठा की शपथ लेकर क्रांति दल में शामिल हो जाते थे। मास्टर जी झाँसी में क्रांति दल के संस्थापकों में से एक थे और अगर यदि यह कहा जाए कि मास्टर रूद्र नारायण भारतीय क्रांतिकारी संगठन के प्रथम शिल्पियों में से एक थे तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

संगठन के सभी शीर्ष नेताओं का मानना था कि मास्टर जी के प्रयासों से ही झाँसी में क्रांतिकारी संगठन विस्तार पा सका था। झाँसी में जब सचीन्द्र नाथ बक्शी क्रांति दल की स्थापना के लिए आये तो उसके पहले ही मास्टर जी अपनी व्यायाम शाला के द्वारा झाँसी में क्रांति दल नींव डाल चुके थे। मास्टर जी साहब के प्रयासों से ही झाँसी एक बार फिर क्रांति के नए दौर में प्रविष्ट होने को तैयार थी। झाँसी ने अभी हार नहीं मानी थी। झाँसी को अभी अपनी रानी सा का ऋण चुकाना था। 1857 में रानी सा को जो धोखा मिला था अभी उसका ऋण बाकी था।

झाँसी तैयार थी। मास्टर जी कमर कस चुके थे। झाँसी फिर उठ खड़ी ही हुई थी। कुछ दिन मास्टर जी के साथ रहने के बाद आज़ाद ने मुकरयाने में हाफिज नूर इलाही के घर के नज़दीक एक घर किराए पर ले लिया। काकोरी काण्ड के बाद वाली झाँसी यात्रा आज़ाद की झाँसी के लिए दूसरी यात्रा थी। पहली यात्रा में जब 1924 में मात्र अठारह बरस के आज़ाद सचीन्द्र नाथ बक्शी से मिलने आए तो वो हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक सेना के सेनापति ‘बलराज’ नहीं थे।

उस समय आज़ाद एक आम सदस्य ही थे जहाँ वे उन नए कार्यकर्ताओं से मिलने आए थे जिनको सचीन्द्र नाथ बक्शी झाँसी में रहकर आने वाले समय के लिए तैयार कर रहे थे। झाँसी के ही इस लघु प्रवास में उनकी मुलाकात सदाशिव राव मलकापुरकर जी, भगवान दास माहौर जी और विश्वनाथ गंगाधर वैशम्पायन जी से हुई थी। देश के लिए मर मिटने की भावना और स्वतंत्र भारत में सांस लेने की अभिलाषा ने, झाँसी के क्रांतिकारियों की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले मास्टर रूद्र नारायण और आज़ाद को एक ही माँ के जाये जैसे पुत्र बना दिया था।

आज़ाद ने अपने अज्ञात वास के कई बरस मास्टर जी के घर पर उनके परिवार के साथ ही गुज़ारे थे। आज़ाद को गिरफ्तार कराने के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शक्ति हज़ारों रुपयों का इनाम घोषित कर चुकी थी। सरकार नदियों, गुफ़ाओं, जंगलों और कुओं में आज़ाद को ढूँढ रही थी और वहाँ, ऐसे संकट के समय आज़ाद मास्टर जी के यहाँ पतीले की खिचड़ी चाट रहे थे। काकोरी काण्ड के बाद आज़ाद जब इलाहाबाद से झाँसी आकर मास्टर जी के घर आए तब मास्टर जी को पता था कि आज़ाद को शरण देना अपनी शामत बुलाना है।

उनको यह भी अच्छे से पता था कि उनके पीछे पुलिस के गुप्तचर लगे हुए हैं और आज़ाद का उनके घर पर रहना खतरे से खाली नहीं है। बावजूद इसके उन्होंने आज़ाद को पनाह देने में कोई हीला-हवाली नहीं की। आज़ाद के आने से पहले ही मास्टर जी पुलिस की संदिग्धों की लिस्ट में थे। पुलिस द्वारा उनके दरवाज़े पर चौबीस घंटे का कड़ा पहरा दिया जाता था। पुलिस बराबर गुप्तचरी करवा रही थी किंतु मास्टर जी को ना पहले परवाह थी अपनी और ना अब होने वाली थी।

मास्टर जी जी की दिलेरी का यह हाल था कि वो खाली समय में अपने दरवाज़े पर नियुक्त पुलिस वाले से पंजा लड़ा कर अपना वक्त गुज़ारा करते थे। पुलिस वालों को भी मास्टर जी के बारे में पता था, किन्तु मास्टर जी के व्यवहार के आगे सब निरुत्तर हो जाते थे। किन्तु आज़ाद के झाँसी आने पर अब उनकी चिंता बढ़ गई थी और वो आज़ाद को बराबर संभल कर रहने की हिदायत देते रहते थे। कई बार पुलिस ने मास्टर जी के मकान की तलाशी ली लेकिन आज़ाद वहाँ उनको नहीं मिलते थे।

आज़ाद मास्टर जी के यहाँ इतने खुल्लम-खुल्ला आते-जाते थे की पुलिस को रत्ती भर का शक नहीं होता था कि यह उनके सामने बैठा पहलवान सा शख्स जो उनके साथ हँसी ठिठोली कर रहा है, वही आज़ाद है। मास्टर जी के घर पर ना होने पर अगर आज़ाद कभी आते तो पुलिस वालों को देख कर खुद ही पंजा लड़ाने का न्योता दे देते थे। शायद ‘चिराग तले अँधेरा’ वाली कहावत आज़ाद की इसी कारगुजारी के लिए बनाई गई थी।

मज़ेदार एक बात और भी थी कि मास्टर जी के घर और कोतवाली का रास्ता मुश्किल से आधा किलोमीटर भी नहीं था। पुलिस वालों से से शातिर आज़ाद की कारगुजारी की बातें सुनकर आज़ाद खुद हँस-हँस कर लोटपोट हो जाते थे। ‘बगल में छोरा और नगर में ढिंढोरा’ पीटने का काम झाँसी की पुलिस बखूबी निभा रही थी। बाद में आज़ाद अपने दोस्तों को बताते हुए बड़े खिलखिला कर कहते “साले ब्रिटिश मुझे एक जादूगर समझते हैं और मेरा हौव्वा बना कर रखा हुआ है। लगता है दिमाग नाम की चीज़ ही नहीं होती है इन में।”

(भारत के स्वतंत्रता संग्राम एक ऐसे ही कुछ गुमनाम क्रांतिकारियों की गाथाएँ आप क्रांतिदूत शृंखला में पढ़ सकते हैं जो डॉ. मनीष श्रीवास्तव द्वारा लिखी गई हैं।)

‘एक नेता को 13 बार लॉन्च किया, कलावती के लिए क्या किया?’: बोले अमित शाह – राहुल गाँधी ने बेची जिसकी गरीबी, उसे मोदी सरकार ने दी घर-बिजली

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जवाब में याद दिलाया कि कैसे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिरा दी गई थी और फिर वो पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटे। उन्होंने कहा कि इस देश में 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपए तक का स्वास्थ्य बीमा दिया गया। इसके तहत ऑपरेशन से लेकर सारा इलाज और दवाओं का खर्च भी दिया जाता है। उन्होंने बताया कि कैसे बैंक खातों में गरीबों के 2 लाख करोड़ रुपए जमा हैं।

उन्होंने याद दिलाया कि कैसे खुद कॉन्ग्रेस के ही प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने कहा था कि वो 1 रुपए भेजते थे तो 15 पैसे ही जनता तक पहुँचता था। अमित शाह ने पूछा कि इसमें से 85 पैसे कौन ले जाता था? उन्होंने कहा कि 85 पैसे ले जाने वाले वही लोग हैं, जो जन-धन योजना का विरोध कर रहे हैं। अमित शाह ने बताया कि 25 लाख करोड़ रुपए एक भी पैसे के कमीशन के बिना देश के गरीबों को मिला है।

अमित शाह ने कहा, “जब कोरोना टीकाकरण आया और जब इन्हें लगा कि देश बच जाएगा, तब उन्होंने टीका का विरोध करना शुरू कर दिया। जनता ने वैक्सीन लेना शुरू किया, मोदी सरकार ने चाय मिला कर मुफ्त वैक्सीन दी, पहला डोज दिया, दूसरा डोज दिया और 130 करोड़ लोगों को दोनों डोज दिला कर कोरोना से बचाया। तब लॉकडाउन का भी विरोध किया गया। सबने कहा कि लॉकडाउन में गरीब क्या खाएगा। हमारे सामने एक विकल्प था कि लॉकडाउन न लगाना और हजारों लोगों की मृत्यु हो जाती। लेकिन, हमने लॉकडाउन भी लगाया और गरीबों के घर में अनाज भी पहुँचाया, आज भी उनके घर का चूल्हा जल रहा है।”

अमित शाह ने कहा कि देश के गरीबों को मोदी सरकार में अविश्वास नहीं है। उन्होंने बताया कि 3 करोड़ लोगों को घर और 60 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा मोदी सरकार ने दिया। अमित शाह ने कहा कि इस सदन में एक ऐसे नेता हैं जिन्हें आज तक 13 बार राजनीति में लॉन्च किया गया और हर बार फेल हुए। उन्होंने बताया कि उनकी एक लॉन्चिंग सदन में हुई। बुंदेलखंड की कलावती के घर वो नेता भोजन करने गए और यहाँ बैठ कर गरीबी का द्रवित करने वाला वर्णन किया।

अमित शाह ने कहा कि बाद में उनकी सरकार 6 साल चली, वो पूछना चाहते हैं कि उस दौरान कलावती के लिए क्या किया गया? अमित शाह ने कहा कि कलावती को बिजली, घर, अनाज और स्वास्थ्य देने का काम मोदी सरकार ने किया। अमित शाह ने बताया कि कैसे एक बार दलित और एक बार जनजातीय समाज के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाया गया। उन्होंने बताया कि 9 साल में पीएम मोदी ने देश के अर्थतंत्र को 11वें से 5वें नंबर तक पहुँचाया।

अमित शाह ने कहा कि पहले सरहद के उस पार से आतंकवादी घुस जाते थे और जवानों के सिर काटकर ले जाते थे, कोई जवाब नहीं देता था। दो बार पाकिस्तान ने हिमाकत की, एक बार सर्जिकल स्ट्राइक और दूसरी बार एयर स्ट्राइक करके पाकिस्तान के घर में घुसकर आतंकवादियों को खत्म करने का काम नरेन्द्र मोदी सरकार ने किया। अमित शाह ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक व्हीकल, क्वांटम एनर्जी और ऑर्गनिक फ़ूड से लेकर अंतरिक्ष तक के क्षेत्र में भारत ने प्रगति की, पीएम मोदी ने अच्छा फाउंडेशन डाला।

अमित शाह ने बताया कि कैसे पाकिस्तान से आए पीड़ित हिन्दुओं को नागरिकता नहीं मिलती थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें डोमिसाइल देने का काम किया। शाह ने पूछा कि कश्मीर पर शासन किसने किया? फिर बताया कि मुफ़्ती, अब्दुला और गाँधी परिवार ने कश्मीर पर शासन किया, लेकिन वहाँ पंचायत चुनाव मोदी सरकार ने कराया। जम्मू में मंदिरों को सुरक्षा दी गई, पर्यटन का विकास हुआ और 2022 में 1.70 करोड़ पर्यटक जम्मू कश्मीर गए हैं।

अमित शाह ने बताया कि 33 साल बाद थिएटर, 31 साल बाद नाइट शो कश्मीर में मोदी सरकार में चालू हुआ। मुहर्रम भी 31 साल बाद मोदी सरकार में चालू हुआ। उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बलों और आम नागरिकों की मौत में 72% की कमी आई है। उन्होंने बताया कि इसी सदन में कहा गया था कि अनुच्छेद-370 हटाने पर खून की नदियाँ बहेंगी, जबकि एक कंकड़ चलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई।

उन्होंने वामपंथी आतंकवाद या नक्सलवाद की बात करते हुए कहा कि 2005 से 2014 के मुकाबले अब तक नक्सली वारदातों में 52% की कमी हुई, मौतों में 69% की कमी आई, अब 118 से घट तक 45 जिलों तक नक्सलवाद सीमित हो गए हैं और सिर्फ 176 पुलिस थाने इससे अब प्रभावित हैं। उन्होंने उत्तर-पूर्व में की हुए विकास की भी बात की। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने नॉर्थ-ईस्ट को दिल से जोड़ने का काम किया है।

उन्होंने जानकारी दी कि पीएम मोदी 9 वर्षों में 50 से अधिक बार नॉर्थ-ईस्ट गए। उन्होंने कहा कि इनलोगों ने नॉर्थ-ईस्ट के लिए कुछ नहीं किया। अमित शाह ने इस दौरान पूर्वोत्तर में हुए समझौतों की भी बात की। उन्होंने बताया कि 8000 सशस्त्र उग्रवादियों ने मोदी सरकार में पूर्वोत्तर में आत्मसमर्पण किया। उन्होंने कहा कि यूपीए काल में सभी 8 राज्य आग की लपटों से घिरे हुए थे। सुरक्षा बलों की हत्याओं में 68% की कमी आई है।

नीतीश कुमार का ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ 6 साल में ही बंद: न पढ़ाई शुरू हुई, न ही किसी ने एडमिशन लिया

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) पिछले 18 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं। बीच में कुछ समय के लिए उनके शिष्य जीतनराम मांझी (Jitan Ram Manjhi) मुख्यमंत्री बने, लेकिन शासन उन्हीं के नाम पर चला। चुनावी जीत न मिलने पर भी सत्ता हासिल करने में नीतीश कुमार को महारत हासिल है।

नीतीश कुमार ने साल 2017 में एक सपना देखा था कि वो बिहार में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की तर्ज पर पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स बनाएँगे। देश-दुनिया से छात्र आएँगे, अर्थशास्त्र की पढ़ाई करेंगे और नए-नए ज्ञान दुनिया को सिखाएँगे। ये संस्थान खुल भी गया और अब 6 साल के बाद बंद भी हो गया है।

पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स पर क्यों लगा ताला?

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नीतीश कुमार के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ पर ताला लग गया है। ये वही संस्थान है, जिसकी घोषणा साल 2018 में खुद नीतीश कुमार ने अपने वैचारिक एवं राजनीतिक गुरु लोकनायक जयप्रकाश की जयंती के अवसर पर की थी।

इस दौरान नीतीश कुमार ने कहा था कि इस संस्थान में पढ़ने वाले छात्रों को लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सिलेबल की तरह का सिलेबस मिलेगा। जो यहाँ से पढ़ेगा, वो दुनिया को ज्ञान सिखाएगा। हालाँकि, अब पता चल रहा है कि नीतीश कुमार तो मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनका वैश्विक संस्थान का सपना पटरी से उतर चुका है।

पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की टाइमलाइन

पाँचवें राज्य वित्त आयोग की सिफारिश पर अप्रैल-2017 में स्वायत्त संस्थान के रूप में स्थापना

वैश्विक संस्थान खोलने का सपना, लेकिन एक भी विशेषज्ञ की नियुक्ति नहीं

साल 2020 में डायरेक्टर प्रो. एस.के. भौमिक की नियुक्ति, लेकिन बाकी के पद स्वीकृत नहीं

साल 2021 में स्वायत्त संस्थान का दर्जा समाप्त, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय में विलय

मई 2023 में शिक्षकों एवं कर्मचारियों के पदों की स्वीकृति, लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं

5 अगस्त 2023 को डायरेक्टर के रूप में प्रो. एस. के. भौमिक का कार्यकाल समाप्त

मौजूदा समय में पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में तीन चपरासी तैनात

कंप्यूटर कक्ष एवं अन्य कमरों पर जड़ दिए गए ताले, चाबियाँ ‘सेंटर फॉर रिवर स्टडीज’ के प्रभारी को सौंपी गईं

संस्थान अस्थाई रूप से बंद!

भास्कर से बातचीत में आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के प्रभारी वीसी सुरेंद्र प्रताप सिंह की प्रतिक्रिया छपी है। चूँकि ये संस्थान अब उन्हीं के विश्वविद्यालय में समाहित कर दिया गया है। भले ही उस विश्वविद्यालय में तीन साल से स्थाई कुलपति की नियुक्ति नहीं हो पाई है। वो कहते हैं कि संस्थान पर स्थाई रूप से ताला नहीं लगाया गया है। ये व्यवस्था अस्थाई तौर पर की गई है।

वैसे, पाटलिपुत्र स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की ऊपर बताई गई टाइमलाइन को देखेंगे तो पता चलेगा के चार महीने पहले मई में शिक्षकों और कर्मचारियों की वैकेंसी निकाली गई है। बाकी ये सीटें कब भरेगी, कब इस संस्थान के डायरेक्टर की नियुक्ति होगी, कब सिलेबस बनेगा, कब एडमिशन शुरू होगा, ये सब भविष्य के गर्भ में छिपा है।

ललितपुर के किले में घुसकर तोड़ दी बजरंग बली की मूर्ति, मोहम्मद आसिफ और आमिर गिरफ्तार: UP पुलिस को नासिर की तलाश

उत्तर प्रदेश के ललितपुर (Lalitpur, Uttar Pradesh) में तीन शराबियों ने भगवान की मूर्ति को खंडित कर दिया है। इस मामले में 5 अगस्त 2023 को FIR दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद आसिफ और आमिर को दबोच लिया है, जबकि उसका दोस्त नासिर फरार है। आरोपितों ने बताया कि उन्होंने शराब के नशे में इस काम को अंजाम दिया था।

यह मामला ललितपुर के तालबेहट कस्बे में स्थित महाराजा मर्दन सिंह के किले का है। इस किले की मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। इस घटना को 4 अगस्त 2023 की शाम 7.30 बजे से रात 8.30 के बीच अंजाम दिया गया था। इस घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया था।

आपराधिक प्रवृति का है बदमाश

रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने 8 अगस्त 2023 को इस मामले में दो बदमाशों को पकड़ा है। इनकी पहचान आसिफ और आमिर के तौर पर की गई है। इनका एक और साथी है, जिसका नाम नासिर है और वह फिलहाल फरार है। जानकारी के मुताबिक, ये सभी लोग शराबी हैं।

इलाके में इनकी पहचान बदमाश और आपराधिक प्रवृति के लोगों के तौर पर है। चूँकि किले के आसपास शाम के समय सुनसान हो जाता है, तो ये बदमाश वहीं पर शराब पीया करते थे। इसी दौरान शराब के नशे में उन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया था।

चौकीदार ने दी थी घटना की सूचना

तालबेहट के सीओ कुलदीप कुमार ने आरोपितों की गिरफ्तारी के बारे में मीडिया से बातचीत की। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त 2023 को इस घटना की जानकारी मंदिर के चौकीदार ने पुलिस को दी थी। उसने बताया था कि मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति के चोले को अज्ञात बदमाशों ने क्षतिग्रस्त कर दिया है।

इसके बाद पुलिस इन लोगों की तलाश कर रही थी। पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद दोनों ने अपने नाम आसिफ पुत्र अब्दुल रहीश, निवासी सरफयाना मोहल्ला और आमिर खान पुत्र नवी उल्ला खान बताए। वहीं, भागे साथी का नाम नासिर पुत्र बड्डन, निवासी बड़ा बाजार, तालबेहट है।

सीओ कुलदीप कुमार ने बताया कि आसिफ और आमिर को गिरफ्तार किया गया है, जबकि उसका साथी नासिर फरार हो गया है। नासिर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस दबिश डाल रही है। कुलदीप कुमार ने बताया कि गिरफ्तार बदमाशों में से एक गंभीर आपराधिक प्रवृत्ति का है और वह जेल जा चुका है।

‘ये सत्ता के लिए बहुमत खरीदने वाले लोग, हम सिद्धांतों वाले लोग’: अमित शाह ने बताया कैसे कॉन्ग्रेस ने झामुमो को घूस देकर बचाई थी सरकार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के मॉनसून सत्र में विपक्षी गठबंधन द्वारा पेश किए गए अविश्वास प्रस्ताव का जवाब दिया। बता दें कि ये प्रस्ताव कॉन्ग्रेस नेता गौरव गोगोई लेकर आए हैं। अमित शाह ने कहा कि संविधान के हिसाब से मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जिम्मेदार है, और अविश्वास प्रस्ताव रखने का प्रावधान भी है। उन्होंने जानकारी दी कि आज़ादी से लेकर अब तक 27 अविश्वास प्रस्ताव और 11 विश्वास प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किए जा चुके हैं।

उन्होंने बताया कि सरकारों के बहुमत जाने की स्थिति में या जनांदोलन के समय प्रजा की भावना को देख कर अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, लेकिन ये अविश्वास का प्रस्ताव ऐसा है कि अभी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के प्रति न जनता को अविश्वास है और न सदन को। उन्होंने कहा कि जनता में भ्रान्ति खड़ी करने के लिए लाया गया है। उन्होंने कहा कि चर्चा में कम से कम विपक्षी सांसदों को सरकार के विरोध में कुछ मुद्दे तो रख देने चाहिए थे, लेकिन ये अविश्वास प्रस्ताव प्रजा की इच्छाओं का प्रतिबिंब नहीं है।

उन्होंने कहा कि अब तक जिन्होंने भी अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में बोला है और जो समर्थन दिखाई पड़ा है वो बताता है कि अल्पमत का सवाल नहीं है। उन्होंने कहा कि देश के 60 करोड़ गरीबों में नई आशा का संचार नरेंद्र मोदी की सरकार ने किया है, ऐसे में जनता में भी अविश्वास नहीं है। जनता के साथ संवादों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कहीं भी अविश्वास नहीं दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि जनता को अगर किसी में सबसे ज्यादा विश्वास है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में है।

उन्होंने याद दिलाया कि कैसे 30 साल के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत देने का कार्य देश की जनता ने लगातार 2 बार किया। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं, ये दुनिया भर के कई सर्वेक्षण कहते हैं। उन्होंने बताया कि नरेंद्र मोदी 24 घंटे में से 17 घंटे रोज काम करते हैं और छुट्टी नहीं लेते हैं। उन्होंने कहा कि देश के कई हिस्सों में सबसे ज्यादा दिन प्रवास करने वाले प्रधानमंत्री भी अगर कोई है तो वो नरेंद्र मोदी हैं।

उन्होंने कहा कि 9 वर्षों में मोदी सरकार ने 50 से अधिक फैसले हैं जो ऐतिहासिक हैं। उन्होंने 9 अगस्त की महिमा बताते हुए कहा कि इस दिन ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ो’ का नारा देते हुए ‘क्विट इंडिया’ आंदोलन शुरू किया। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण के नासूर से ग्रसित लोकतंत्र को हटा कर नरेंद्र मोदी ने ‘परफॉर्मेंस की राजनीति’ को तरजीह दी। उन्होंने कहा कि इसीलिए पीएम मोदी ने आज ‘भ्रष्टाचार, क्विट इंडिया’, ‘परिवारवाद, क्विट इंडिया’ और ‘तुष्टिकरण, क्विट इंडिया’ का नारा दिया।

अमित शाह ने कहा, “उद्देश्य चाहे जो भी हो, विपक्ष का अधिकार है अविश्वास प्रस्ताव लेकर आना। मैं इस दौरान 3 अविश्वास प्रस्ताव का जिक्र करना चाहूँगा – 2 यूपीए काल में हम लेकर आए थे, एक एनडीए सरकार के खिलाफ लाया गया था। 1993 के जुलाई में नरसिम्हा राव की कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। कॉन्ग्रेस का मूल सिद्धांत है – किसी तरह सत्ता में बने रहना। नरसिम्हा राव की सरकार अविश्वास प्रस्ताव जीत गई और बाद में कई लोगों को जेल की सज़ा हुई।”

उन्होंने आरोप लगाया कि तब JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) को घूस देकर अविश्वास प्रस्ताव में समर्थन जुटाया गया था। उन्होंने बताया कि 2008 में मनमोहन सिंह विश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे, तब इस सदन ने उस वक्त सदन में कलंकित घटना देखी जब सांसदों को करोड़ों रुपए के घूस दिए गए और पीठ के सामने आकर ये आरोप लगाए गए। उन्होंने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव से बचने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाया गया और सारे नियम-कानून और परंपराओं को त्याग कर सत्ता पर काबिज होने की कोशिश की जाती है।

उन्होंने 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि तब हमने हथकंडों का इस्तेमाल कर के सरकार नहीं बचाई। उन्होंने कहा कि तब भी सरकार कॉन्ग्रेस की तरह बचा सकते थे, लेकिन NDA का ये चरित्र नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि यूपीए का चरित्र भ्रष्टाचार का है, एनडीए का चरित्र सिद्धांतों का है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे तब ओडिशा के सीएम के वोट पर मामला फँसा था और एक वोट से सरकार चली गई।

उन्होंने बताया कि तब एक वोट सर सरकार गई, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी वापस बहुमत में लौटे। उन्होंने कहा कि वो करोड़ों रुपए लेकर बहुमत खरीदने वाले लोग हैं, हम सिद्धांतों के लिए सत्ता छोड़ने वाले लोग हैं। अमित शाह ने कहा कि पीएम मोदी ने बड़े-बड़े वादे नहीं किए, लेकिन उनके जेहन में गरीबी का डंक भी था और दंश भी था। वो गरीब घर से देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुँचे, जबकि कॉन्ग्रेस ने गरीब कल्याण के लिए ढेर सारे वादे किए लेकिन काम नहीं किया।

उन्होंने बताया कि 9.60 करोड़ महिलाओं के घरों में गैस सिलेंडर भेज कर उनके घरों को पीएम मोदी ने धुएँ से मुक्त किया। उन्होंने कहा कि 11 करोड़ परिवारों में शौचालय नहीं था। पीएम मोदी ने 9 साल में 11 करोड़ घरों में शौचालय दिया। उन्होंने बताया कि 12.65 लाख घरों में जल से नल पहुँचाने का काम किया। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे किसानों के कर्जमाफी की बात की जाती है, यूपीए के दौरान मात्र 70,000 करोड़ रुपए का कर्ज माफ़ किया गया।

उन्होंने कहा कि हम किसी का कर्ज माफ़ करने में विश्वास नहीं रखते, जबकि हमारा प्रयत्न रहता है कि कर्ज लेने की नौबत ही न आए। उन्होंने बताया कि मोदी सरकार ने 2.40 लाख करोड़ रुपए सीधे किसानों के बैंक खातों में डाले। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि अब देश के किसान तय करें कि एक ओर 70,000 करोड़ रुपए की कर्जमाफी का लॉलीपॉप देने वाली यूपीए सकरार, दूसरी तरफ सम्मान के साथ 2.40 लाख करोड़ रुपए सीधे बैंक खाते में।

हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में भेजा सूअर, 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: योगी सरकार ने सार्वजनिक की रिपोर्ट, मुस्लिम लीग के नेता थे साजिशकर्ता

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साल 1980 में हुए दंगे में आयोग ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को क्लीन चिट दे दिया है और इसे मुस्लिम लीग की साजिश बताया है। बताते चलें कि यह वही मुस्लिम लीग (Muslim League) है, जिसे कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सेक्युलर बताया था।

लगभग 43 साल पहले ईद की नमाज के बाद भड़के दंगों का असली गुनहगार मुस्लिम लीग का डॉ. शमीम अहमद खान था। चुनावों में लगातार हार मिलने के बाद उसने मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने के लिए दंगे भड़काने की साजिश रची थी। हालाँकि, साल 1989 में वह जनता दल से विधायक बनने में कामयाब हो गया।

मुरादाबाद दंगे की जाँच करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट में दिए सुझाव दिया था कि मुस्लिमों को ‘वोट का खजाना’ समझने वालों को हतोत्साहित करना जरूरी है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान से वीजा लेकर आए लोगों को समय सीमा पूरी होने पर तुरंत वापस भेजा जाए।

जाँच रिपोर्ट में यह सामने आई है कि शमीम अहमद खान ने वाल्मीकि, सिख और पंजाबी समाज को फँसाने के लिए 13 अगस्त 1980 को ईद की नमाज के बीच सुअरों को धकेल दिया गया था। इसके बाद यह अफवाह फैला दी गई कि बच्चे एवं महिलाओं सहित मुस्लिमों की हत्या की जा रही है।

इसके कारण ईदगाह समेत 20 जगहों पर दंगा भड़क गया था। इस दौरान हिंदुओं और पुलिस पर हमले किए गए थे। मुरादाबाद से होते हुए यह हिंसा जल्द ही जिले के ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ संभल, अलीगढ़, बरेली और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) तक फैल गई। कॉन्ग्रेस शासित उत्तर प्रदेश में यह हिंसा 1981 की शुरुआत तक जारी रहीं।

बताते चलें कि इस दंगे की रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 43 साल सार्वजनिक कर दिया है। इस रिपोर्ट को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 8 अगस्त 2023 को विधानसभा में पेश की थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया है।

मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कॉन्ग्रेस की तत्कालीन सरकार ने इसकी जाँच डीएम बीडी अग्रवाल को सौंपा था। बाद में न्यायिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने तीन साल बाद अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। उसके बाद किसी दल की सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोशिश नहीं की।

अलग-अलग सरकारों में इसे 14 बार मंत्रिमंडल के सामने रखकर इसे सदन में पेश करने की मंजूरी माँगी गई थी। हालाँकि, तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस माँग को खारिज कर दिया गया। इस बीच यह रिपोर्ट कुछ वर्षों के लिए गायब भी हो गई। इसे तमाम प्रयास के बाद रिकॉर्ड रूम से खोजा गया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस दंगे में कोई भी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या हिंदू उत्तरदायी नहीं था। इनमें भाजपा या संघ की भी संलिप्तता नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगों में आम मुस्लिम के बजाय शमीम के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग और डॉक्टर हामिद हुसैन उर्फ डॉक्टर अज्जी के समर्थक और भाड़े पर बुलाए गए लोग ही शामिल थे।

आयोग ने दंगों के दौरान पीएसी, पुलिस और जिला प्रशासन पर लगे आरोप भी खारिज कर दिए। जाँच में यह भी पाया गया कि इस दौरान हुईं ज्यादातर मौतें पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि भगदड़ से हुई थीं। बताते चलें कि इस दंगे में 84 लोग मारे गए थे और 112 लोग घायल हुए थे।

जहाँ भगवान राम की तस्वीर, वहाँ मुस्लिम दंगाइयों ने चलाए तलवार… जिस काउंटर पर लिखा है जुबैर का नाम, वहाँ खरोंच भी नहीं: अलवर अस्पताल का सच, जो राजदीप ने छिपाया

हरियाणा के मेवात में दंगे भड़क गए। इस्लामी कट्टरपंथियों ने नल्हड़ स्थित ऐतिहासिक शिव मंदिर को घेर कर गोलीबारी और पत्थरबाजी की। हिन्दुओं के शोभा यात्रा पर हमले के साथ हिंसा की शुरुआत आ रही थी। अब सामने आया है कि न सिर्फ पुलिसकर्मियों, बल्कि अस्पताल पर भी हमला किया गया। वहाँ स्थित अलवर अस्पताल पर हमला किया गया। ऑपइंडिया की टीम ने घटनास्थल पर छानबीन के बाद क्या कुछ पाया, ये हम आपको इस खबर में बताएँगे।

यही वो अस्पताल है, जहाँ हिंसा में घायल पुलिसकर्मियों और होमगार्ड के जवानों का इलाज चल रहा था। एक प्रत्यक्षदर्शी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भीड़ में शामिल दंगाइयों को पहले से पता था कि सुरक्षाकर्मियों के इलाज वहाँ पर चल रहे हैं।

जब हम मौके पर पहुँचे तो हमने पाया कि भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और गुरु नानक की तस्वीर को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। दीवाल पर टँगी तीनों की तस्वीरें बीच से ऐसे फटी हुई थीं जैसे इन पर किसी ने तलवार चलाई हो। अस्पताल का जो प्रेग्नेंसी वार्ड है, जहाँ गर्भवती या बच्चे को जन्म दे चुकी महिलाएँ भर्ती रहती हैं – ऐसा लगता है कि उस तरफ भी हमला किया गया था।

प्रेग्नेंसी वार्ड में तोड़फोड़, बिखरे सामान

प्रेग्नेंसी वार्ड की तरफ जाने वाले रास्ते में तोड़फोड़ की गई थी। साथ ही इसका दरवाजा भी टूटा हुआ मिला। इसका सीधा अर्थ है कि दंगाइयों ने इसे भी निशाना बनाया होगा। उस समय महिलाओं को वहाँ से भागना पड़ा होगा। भीड़ वहाँ भी पहुँची, जहाँ पुलिस और होमगार्ड के जवान इलाज करा रहे थे। यहाँ मरीजों के लिए जो बेड लगे हुए हैं, उसी के पास राम, कृष्ण और नानक की तस्वीरें थीं जिन्हें नुकसान पहुँचाया गया है।

अलवर अस्पताल की एंट्री के दरवाजे टूटे हुए हैं। एंट्री गेट में OPD के पास शीशे भी टूटे-फूटे हुए मिले। अस्पताल की दीवारों पर भी नुकसान पहुँचाए गए हैं। बिजली के तार नोच डाले गए हैं, उन्हें भी देखा जा सकता है। यहाँ तक कि CCTV कैमरों को भी नहीं छोड़ा गया। एंट्री गेट के अंदर 2 बड़े शीशे हैं, जो टूट चुके हैं। ये बताता है कि अगर कोई कहता है कि अलवर अस्पताल को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया, तो साफ़ है कि वो गुमराह कर रहा है।

अस्पताल में भगवान गणेश की तस्वीर भी लगी हुई है। अस्पताल में डॉ जागीर सिंह का एक बोर्ड लगा हुआ है। अस्पताल में जो घड़ियाँ दीवार पर लगी हुई हैं, उनमें भी आप गणपति की तस्वीर देख सकते हैं। प्रेग्नेंसी वार्ड का फ़िलहाल शटर गिरा कर रखा गया है, लेकिन वहाँ भी शीशे टूटे हुए हैं। शीशे के टूटे हुए दरवाजों को रस्सियों से बाँधा गया है। वहाँ मौजूद लोगों ने लाल रंग के निशान दिखाते हुए बताया कि दरवाजे पर भी तलवारें मारी गई थीं।

अस्पताल में जहाँ गंभीर रूप से घायल मरीजों का इलाज होता है, जिसे हम ‘ICU वार्ड’ भी कह सकते हैं, दंगाई वहाँ भी पहुँचे थे। इसके सबूत अब भी देखा जा सकते हैं। उस वार्ड में भी शीशे टूटे हुए हैं और एक दरवाजे में तो पूरा का पूरा शीशा ही गायब है। एंट्री गेट के ठीक बगल में लगाए गए शीशे के एक बड़े हिस्से को टूटा हुआ देखा जा सकता है। उसके ऊपर तलवार से काटे जाने के निशान भी दिखाई दे रहे हैं।

कुल मिला कर अस्पताल के 3 एंट्री गेट हैं और तीनों ही क्षतिग्रस्त हैं। लोहे के शटर वाले गेटों पर धारदार हथियार के निशान हैं, जिससे साफ़ पता चलता है कि यहाँ घुसने वाली भीड़ हथियारबंद थी। जहाँ गंभीर रूप से घायल मरीजों का इलाज चलता है, वहाँ सामान अस्त-व्यस्त बिखरे पड़े हुए हैं। साफ़ है कि न सिर्फ अस्पताल के मरीजों को जान बचा कर भागना पड़ा होगा, बल्कि कर्मचारी भी यहाँ से भागे होंगे।

एक और खास बात नोटिस करने लायक है। अस्पताल के भीतर एक दवा की दुकान है। वहाँ मेडिकल काउंटर पर ‘ज़ुबैर खान’ का नाम लिखा हुआ है। वो फर्मासिस्ट है, जिसके नाम पर दुकान है। ज़ुबैर की दुकान और उसके काउंटर पर किसी प्रकार का कोई खरोंच नहीं है। आसपास पूरे अस्पताल में तोड़फोड़ के निशान हैं, लेकिन ज़ुबैर की इस दुकान में नहीं। ये सिर्फ संयोग नहीं हो सकता। सवाल उठता है कि क्या ‘ज़ुबैर खान’ नाम देख कर दंगाइयों ने उसके मेडिकल काउंटर को नुकसान नहीं पहुँचाया?

नूँह में अस्पताल पर हमले को लेकर राजदीप सरदेसाई का प्रोपेगंडा

इस सच्चाई को बताना इसीलिए भी ज़रूरी है, ताकि मीडिया का एक गिरोह विशेष हिन्दुओं को ही इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराने में लगा हुआ है। राजदीप सरदेसाई ने तो स्पेशल शो कर के हिन्दुओं को ही भला-बुरा कहा और इस्लामी कट्टरपंथियों को बचाने की कोशिश की। उन्होंने इस हिंसा के लिए एकतरफा रूप से मानेसर वाले मोनू यादव को जिम्मेदार ठहरा दिया। राजदीप सरदेसाई ने ये नैरेटिव बनाने की कोशिश की कि अगर मुस्लिमों ने हिंसा की भी तो ये प्रतिक्रिया भर ही थी।

राजदीप सरदेसाई ने अपने ट्वीट में इस्लामी कट्टरपंथियों को दी क्लीन-चिट

अब राजदीप सरदेसाई के ऊपर वाले ट्वीट को देखिए। वो कह रहे हैं कि एक वीडियो के आधार पर दावा किया जा रहा है कि अस्पताल में घुस कर भीड़ ने गर्भवती महिलाओं और शिशुओं पर हमला किया, धर्म के आधार पर निशाना बनाया। उन्होंने हरियाणा पुलिस के हवाले से इस खबर को झूठ बताते हुए कहा कि नूँह में जो हुआ वो दुर्भाग्यपूर्ण था लेकिन इस तरह की खबरों से सांप्रदायिक घृणा को और बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने ऐसे वीडियो को हटाने के लिए भी कहा।

अब जब हमने अपनी छानबीन में पाया है कि अस्पताल की एंट्री के दरवाजों के शीशे टूटे हुए हैं, भीतर वार्ड में सामान अस्त-व्यस्त हैं, दीवारों पर धारदार हथियार के निशान हैं और ज़ुबैर के मेडिकल काउंटर पर खरोंच तक नहीं है, राजदीप सरदेसाई जैसों को पूछना चाहिए कि वहाँ घुसी भीड़ ने जब ये सब किया तो मरीजों की आरती तो नहीं ही उतारी होगी? पुलिस के नकारने का एक कारण ये भी हो सकता है कि अब तक कोई शिकायत न मिली हो। मरीज तब अपनी जान बचाएँगे कि FIR दर्ज करवाने जाएँगे?

शामली के मदरसे में 14 साल की किशोरी से मौलाना ने की हैवानियत, विरोध करने पर जमकर पीटा; बंधक बनाने का भी आरोप

हरियाणा के करनाल की 14 साल की एक किशोरी ने पढ़ने के लिए यूपी के शामली स्थित मदरसे में दाखिला लिया था। नामांकन के बाद 10 दिन तो सब कुछ ठीक रहा, फिर मौलाना की नीयत खराब हो गई। मौलाना रोज उसके साथ छेड़छाड़ करने लगा और मना करने पर उसकी पिटाई करने लगा।

इतना ही नहीं, एक दिन मौलाना ने किशोरी को दबोच लिया और 5 घंटे तक रेप को अंजाम दिया। किशोरी के साथ हो रही बर्बरता की जानकारी करनाल के बाल कल्याण समिति तक पहुँची। काफी मशक्कत के बाद किशोरी को मौलाना के चंगुल से निकाला गया। बताया जा रहा है कि मौलाना किशोरी को मदरसे से बाहर निकलने नहीं देता था।

वायरल वीडियो से पता चली हैवानियत

भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शामली के गढ़ी पुख्ता में यह मदरसा है। पीड़ित किशोरी यहाँ 20 जून 2023 से आई थी। 10 दिन तो सब कुछ ठीक से गुजरे थे, लेकिन इसके बाद मौलाना की नीयत बदल गई और वह उसके साथ छेड़छाड़ करने लगा। मना करने पर मौलाना किशोरी की पिटाई करता था।

एक दिन मौलाना ने किशोरी को अपने कमरे में बुलाया और 5 घंटे तक उसके साथ रेप की। किसी से कुछ भी कहने पर जान से मारने की धमकी दी। इसका एक वीडियो वायरल होने की खबर भी सामने आई, जिसके बाद करनाल की बाल कल्याण समिति सक्रिय हुई और बच्ची को लेकर करनाल वापस आ गई।

करनाल में जीरो एफआईआर, शामली भेजा गया मामला

बाल कल्याण विभाग की सूचना के बाद करनाल पुलिस ने जीरो एफआईआर दर्ज कर ली। महिला थाना प्रभारी ने बताया है कि किशोरी का मेडिकल कराने के बाद एफआईआर दर्ज कर उसे शामली ट्रांसफर कर दिया गया है। इस मामले में ऑपइंडिया की टीम गढ़ी पुख्ता थाना से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया है।

10 साल की कैंसर पीड़ित ने बचपन के प्यार से की शादी, ‘ड्रीम वेडिंग’ के 12 दिन बाद हो गई मौत

अमेरिका के उत्तरी कैरोलाइना में 10 साल की बच्ची एमा एडवर्ड्स हमेशा से ही शादी करने का सपना देखा करती थी। उसने अपने चाइल्डहुड स्वीटहार्ट, डैनियल मार्शल क्रिस्टोफर ‘डीजे’ विलियम्स जूनियर ने अपने प्राइमरी स्कूल में शादी समारोह करने की कोशिश की, लेकिन टीचर्स ने उन्हें कहा कि वे स्कूल में शादी नहीं कर सकते हैं।

एमा चाहती थी कि शादी के बाद वो तीन बच्चों की माँ बने, लेकिन उनकी किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। उसके पेरेंट्स उत्तरी कैरोलिना के रहने वाले वॉलनट कोव के एलीना और आरोन एडवर्ड्स को साल 2022 में अपनी बेटी के लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया नाम के कैंसर का पता चला था। उसके पेरेंट्स एलीना और आरोन एडवर्ड्स को उम्मीद थी कि उनकी बेटी कैंसर को हरा देगी, लेकिन जून 2023 में उन्हें बुरी खबर मिली की कि उनकी बेटी के पास जिंदा रहने के लिए कुछ ही दिन बचे हैं।

एमा के सपने को पूरा करने के लिए उसके पेरेंट्स ने परिवार और दोस्तों की मदद से 29 जून 2023 को उसकी शादी उसकी तीसरी क्लास सहपाठी एवं दो साल पुराने दोस्त डेनियल मार्शल क्रिस्टोफर विलियम्स जूनियर से करवा दी। वेडिंग सेरेमनी उसकी नानी के घर में की गई। इसमें 100 मेहमान सहित डॉक्टर और नर्स भी शामिल हुए। हालाँकि, अपनी शादी के 12 दिन बाद एमा दुनिया को अलविदा कह गई।

जब डॉक्टर्स ने कहा वो एमा के लिए कुछ नहीं कर सकते

न्यूयार्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, एलीना और आरोन एडवर्ड्स को साल 2022 में अपनी बेटी के कैंसर होने का पता चला था। मायो क्लिनिक के मुताबिक, लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया बच्चों में होने वाला आम तरह का कैंसर हैं। इससे ब्लड और बोन मैरो पर असर पड़ता है। इस साल जून में एमा के माता-पिता को खबर मिली कि उसका कैंसर लाइलाज है और उसके पास जीने के लिए केवल कुछ ही दिन बचे हैं।

एमा और डैनियल (साभार: कैनेडी न्यूज)

एमा की 39 साल की माँ एलीना ने कैनेडी न्यूज और मीडिया को बताया, “हम दूसरे तरह के इलाज के लिए जा रहे थे और उन्होंने हमें बताया कि एमा के पास जीने के लिए शायद कुछ दिन या एक हफ्ते हैं।” एलीना ने आगे कहा, “हम ऐसा सुनने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं करते थे। हमने सोचा कि हम दूसरे तरह के इलाज के लिए जाएँगे और यह काम करेगा। आप कल्पना नहीं कर सकते कि उस वक्त हमने क्या महसूस किया, जब डॉक्टरों ने उन्हें कहा कि वे उसके लिए और कुछ नहीं कर सकते।”

एमा और डीजे विलियम्स ने स्कूल में की थी शादी करने की कोशिश

मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, एमा के टीचर्स ने माँ एलीना को बताया कि एमा और डीजे विलियम्स ने स्कूल में रिसेस के दौरान शादी करने की कोशिश की थी। उन्होंने ब्राइड और ग्रूम मेड भी बनाए थे और सभी बच्चे क्लास में टाई लगाए आए थे। ये बहुत क्यूट था, लेकिन क्लास में वेडिंग नहीं हो सकती थी।

एमा की जिंदगी के कुछ दिन बचे होने और क्लास में शादी रचाने की बात पता चलने के बाद एलीना और एमा के दोस्त डीजे विलियम की माँ एक ‘शादी’ का प्लान बनाने लगीं। एमा की माँ शादी की तैयारी के बारे में बताती हैं, “हमें यह सब कुछ बहुत जल्दी करना था। हमने इसे दो दिनों से भी कम वक्त में किया। सब कुछ डोनेट कर दिया गया।”

यह बहुत अनमोल पल थे

एलीना ने कहा, “उसके पिता को उसे उसके जीवनसाथी को सौंपने का मौका मिला। यह बहुत अनमोल पल था और बहुत अच्छी तरह से हुआ। हमारी एक दोस्त ने आधिकारिक तौर पर शादी करवाई। एक दोस्त ने बाइबल से एक वर्स पढ़ा और एमा की सबसे अच्छी दोस्त उसकी मेड ऑफ ऑनर बनी थी।”

एमा की माँ आगे कहती हैं, “जब आपको कैंसर होता है तो आप एकांत में रहते हैं, लेकिन हर किसी को उसे देखने का मौका मिला। एमा एक सोशल बटरफ्लाई थी, इसलिए उसके लिए सभी से दूर रहना मुश्किल था। उसके डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, परिवार, दोस्त हर कोई आया।”

एलीना के पास अपने नए दामाद के लिए अच्छे शब्दों के अलावा कहने को कुछ नहीं था। उन्होंने कहा, “डीजे सबसे प्यारा बच्चा है। उसका दिल सोने जैसा खालिस है और वह वास्तव में एमा से प्यार करता है। ”

एमा और डैनियल (साभार: कैनेडी न्यूज)

एलीना ने बताया, “एमा हमेशा से एक हेल्दी बच्ची थी। पिछले साल तक वे उसे गिरने के बाद अस्पताल ले गए थे, जिस समय डॉक्टरों को उसके पैर की हड्डियों में कैंसर का पता चला था। उन्होंने कहा, “वह पहले कभी बीमार नहीं थी। अचानक, उसे उल्टी होने लगी। एक बार वह गिर गई थी। इसलिए डॉक्टर्स ने उसके पैरों की जाँच की और पता चला कि कैंसर उसकी हड्डियों में छेद कर रहा था और उसे कमजोर बना रहा था।”

उत्तरी कैरोलाइना के पास विंस्टन-सलेम में बोमन ग्रे स्टेडियम में रेस कार चालकों ने जुलाई रेसिंग इवेंट में अपनी कारों पर “एमा आर्मी” स्टिकर लगाए थे। विंस्टन-सलेम जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, एडवर्ड्स परिवार की मदद के लिए धन जुटाने के प्रयास के तहत यह किया गया था। जून में परिवार को मेडिकल मदद करने के लिए एक और फंडिंग कार्यक्रम हुआ, जिसमें कई ड्राइवर शामिल हुए थे।