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शहाबुद्दीन के सीवान में अब भी लोगों को जंगलराज से होती है सिहरन

ऑपइंडिया की बिहार ग्राउंड रिपोर्ट टीम सीवान पहुँची। यहाँ के लोग लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को याद कर आज भी सिहर जाते हैं। उस दौर में लोग घोटाले, जातिवादी झगड़े, लूटमार और सुविधाओं की कमी से परेशान थे। नीतीश कुमार ने सब मुक्ति दिलाई।

आम लोगों ने लालू के बेटे तेजस्वी यादव के तीन करोड़ रोजगार देने के वादे पर जनता ने तीखा तंज कसा। कहा ये तो सिर्फ चुनावी जुमला है, कुछ नहीं होगा। भूरा बाल साफ करो के नारे से लेकर शहाबुद्दीन के मजहबी तुष्टिकरण तक, हर मुद्दे पर लोग बेबाकी से बोले। शहाबुद्दीन के राज में सीवान दहशत में था, अब NDA के राज में शांति है।

सीवान की जनता अब विकास और सुरक्षा चाहती है, पुराने जंगलराज को दोबारा नहीं आने देगी।

क्या है क्लाउड सीडिंग, कैसे होती है ‘आर्टिफिशियल रेन’: क्या इससे स्वच्छ होती है हवा?

दिल्ली में पहली बार बिना इंद्रदेव की मर्जी से बारिश होने जा रही है। इस बार बादल बुलाने के लिए आसमान की ओर नजरें उठाने की नहीं बल्कि विज्ञान की मदद ली जा रही है। इसे ‘आर्टिफिशियल रेन’ नाम दिया गया है। यह बारिश प्रकृति नहीं, तकनीक करवाएगी। मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को राजधानी के उत्तर पश्चिम क्षेत्र और बुराड़ी में ये आर्टिफिियल बारिश कराने की योजना है। यह कदम दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उठाया गया है।

दिल्ली की जहरीली हवा को धोने के लिए अब आसमान में विमान उड़ान भरेंगे, जो बादलों में बारिश करवाने वाला रसायन छोड़ेंगे। वैज्ञानिकों की यह कोशिश न सिर्फ दिल्ली की हवा को साफ करेगी बल्कि यह साबित करेगी कि जब इंसान और विज्ञान मिलें तो इंद्रदेव भी पीछे छूट सकते हैं। तो अब समझते हैं कि आखिर यह ‘आर्टिफिशियल रेन’ होती कैसे है और इसकी पूरी तकनीक क्या है।

क्लाउड सीडिंग से होती है आर्टिफिशियल बारिश

दरअसल आर्टिफिशियल बारिश लाने की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘क्लाउड सीडिंग’ (Cloud Seeding) कहा जाता है। यानी बादलों को इस तरह तैयार करना कि वे बरसने लगें। इसके लिए जरूरी है कि आसमान में पहले से बादल मौजूद हों और उनमें नमी हो। वैज्ञानिक विमान, रॉकेट या अन्य किसी मशीन के जरिए उन बादलों में सिल्वर आयोडाइड, नमक या अन्य रासायनिक कण छोड़ते हैं। ये कण बादलों के भीतर जाकर नमी को आकर्षित करते हैं, जिससे जलकण आपस में मिलकर भारी बूंदों में बदल जाते हैं और बारिश शुरू हो जाती है।

इस प्रक्रिया में बादलों की तापमान स्थिति, हवा की दिशा और नमी की मात्रा का सही होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि गलत परिस्थिति में यह प्रयोग विफल भी हो सकता है। विशेषज्ञों का यहा भी कहना है कि इस आर्टिफिशियल बारिश का पानी सेहत के लिए नुकसानदायक नहीं है। इसे लेकर जाँच और रिसर्च पूरी की जा चुकी हैं।

क्यों होती है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग दो मकसद से कराई जाती है। इसके पहला उद्देश्य है उन इलाकों में बारिश करवाना, जहाँ सूखा या पानी की कमी हो। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है। दिल्ली में इसका उपयोग प्रदूषण को कम कराने के लिए किया जा रहा है। जब आर्टिफिशियल बारिश होती है तो हवा में तैरते सूक्ष्म प्रदूषक कण, धूल और जहरीली गैसें पानी के साथ जमीन पर बैठ जाती हैं। इससे हवा साफ होती है और साँस लेने में थोड़ी राहत मिलती है। यही वजह है कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के चरम स्तर को देखते हुए यह कदम उठाया है।

हालाँकि यह तकनीक नई नहीं है। भारत में क्लाउड सीडिंग की शुरुआत कई दशक पहले हो चुकी थी। 1980 के दशक में तमिलनाडु ने सूखे से राहत पाने के लिए इसका प्रयोग किया था। 2003 में महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी इसे आजमाया गया। तेलंगाना में भी कुछ साल पहले बारिश बढ़ाने के लिए यह प्रयोग हुआ था।

लेकिन दिल्ली का मामला खास है क्योंकि यहाँ इसका इस्तेमाल पहली बार प्रदूषण कम करने के लिए किया जा रहा है, न कि बारिश बढ़ाने के लिए। यानी यह प्रयोग मौसम नहीं बल्कि वातावरण को साफ करने के मकसद से किया जा रहा है।

क्या सच में होगी आर्टिफिशियल बारिश?

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। अगर बादल अनुकूल हों तो बारिश की संभावना 60 से 70 फीसदी तक रहती है। लेकिन अगर नमी या तापमान ठीक न हो तो सारा प्रयास बेकार जा सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक इस प्रक्रिया के लिए सही दिन और सही बादलों का इंतजार करते हैं।

दिल्ली में यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘गंभीर’ स्तर पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को दिल्ली का AQI 319 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है।

आर्टिफिशियल बारिश से खत्म होगा प्रदूषण?

प्रदूषण से निजात पाने लिए जब सभी उपाय नाकाम नजर आए तो अब उम्मीद आसमान से लगाई गई है। लेकिन क्या सच में आर्टिफिशियल बारिश से प्रदूषण खत्म हो जाएगा? देखा जाए तो यह पहल न सिर्फ प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली के लिए राहत बन सकती है बल्कि भविष्य में उन शहरों के लिए भी मिसाल बन सकती है, जहाँ हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है।

हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आर्टिफिशियल बारिश कोई स्थायी समाधान नहीं है। यह अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन जब तक असली कारण जैसे वाहन प्रदूषण, पराली जलाना और औद्योगिक धुआँ नहीं रोका जाता है तब तक या समस्या फिर लौट आएगी।

फिर भी दिल्ली की बीजेपी सरकार ने प्रदूषण से निजात पाने के लिए बेहतरीन कदम उठाने का प्रयास किया है, जो पिछले सरकारें केवल हवा-हवाई वादों में ही प्रदूषण को भगाने का समाधान ढूँढती थी। लेकिन आर्टिफिशियल बारिश कराने के इस कदम से वाकई में दिल्ली में प्रदूषण स्तर ठीक होने की उम्मीद है।

जिनको शहाबुद्दीन ने तेजाब से नहलाया, उनके भाई का इंटरव्यू

ऑपइंडिया की बिहार ग्राउंड रिपोर्ट टीम सिवान पहुँची। यहाँ माफिया शहाबुद्दीन ने चंदा बाबू के दो बेटों पर एसिड डलवाया था। पत्रकार रोहित पांडेय ने चंदा बाबू के चौथे बेटे नीतीश से खास बातचीत की। नीतीश ने पहली बार किसी डिजिटल चैनल को इंटरव्यू दिया। वे मीडिया से दूर रहते हैं, लेकिन अब उन्होंने बताया कि भाइयों की जान बचाने के लिए कितना संघर्ष किया।

शहाबुद्दीन के गुंडाराज में सिवान कैसे दहशत में जीता था। लोग घर से निकलने से डरते थे। नीतीश ने न्याय की लड़ाई और परिवार की तकलीफें साझा कीं। सिवान में अब हालात बदले, लेकिन पुराने जख्म अभी ताजा हैं।

Wikipedia से मुकाबले के लिए एलन मस्क ने लॉन्च किया Grokipedia, जानिए कैसे करता है काम और इसे कैसे बता सकते हैं सुधार

मशहूर उद्योगपति एलन मस्क ने 27 अक्टूबर 2025 को ग्रोकिपीडिया लॉन्च किया। ये विकिपीडिया ( Wikipedia) की पक्षपातपूर्ण रवैये का एक विकल्प है। ग्रोकिपीडिया एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा निर्मित ऑनलाइन रिसर्च इंजन है, जिसे मस्क की कंपनी xAI ने विकसित किया है।

यह प्लेटफॉर्म लेखों को खुद से बनाने, एडिट करने और क्यूरेट करने के लिए ग्रोक AI मॉडल का उपयोग करता है। एलन मस्क के अनुसार, ग्रोकिपीडिया का लक्ष्य विकिपीडिया जैसे पारंपरिक क्राउड-सोर्स्ड प्लेटफॉर्म में देखे जाने वाले राजनीतिक पूर्वाग्रहों को खत्म करना है, ताकि सही जानकारी लोगों तक पहुँच सके।

ग्रोकिपीडिया संस्करण 0.1 में अँग्रेजी में 6.8 मिलियन से अधिक लेख हैं, साथ ही चीनी, स्पेनिश और जर्मन जैसी भाषाओं के लिए लेख भी काफी हैं। अब तक, यूजर्स ने इसकी तथ्यात्मक सटीकता और विकिपीडिया प्रविष्टियों में लंबे समय से चली आ रही त्रुटियों के सुधारों की ओर ध्यान दिलाया है।

उदाहरण के लिए, विकिपीडिया और ग्रोकिपीडिया में जेंडर की परिभाषा में अंतर है। ग्रोकिपीडिया में ‘पुरुष’ और ‘महिला’ दो वर्गों का ही उल्लेख है। जबकि विकिपीडिया में तीसरी श्रेणी भी है।

Source: Wikipedia/Grokipedia

इसके अलावा, विकिपीडिया में जॉर्ज फ्लॉयड पर लिखे गए पेज के शुरुआती पैराग्राफ में उनके आपराधिक रिकॉर्ड का कोई जिक्र नहीं है। इसमें लिखा है, “जॉर्ज फ्लॉयड एक अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति थे, जिनकी 25 मई, 2020 को मिनियापोलिस, मिनेसोटा में एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने हत्या कर दी थी। यह गिरफ्तारी तब हुई जब एक स्टोर क्लर्क ने शक जाहिर किया कि फ्लॉयड ने नकली बीस डॉलर के नोट का इस्तेमाल किया।”

Source: Wikipedia/Grokipedia

दूसरी ओर, ग्रोकिपीडिया उनके बारे में तथ्यात्मक जानकारी देते हुए कहता है, “जॉर्ज पेरी फ्लॉयड जूनियर (14 अक्टूबर, 1973 – 25 मई, 2020) एक अमेरिकी व्यक्ति था, जिसका लंबा आपराधिक रिकॉर्ड था, जिसमें 1997 से 2007 तक टेक्सास में सशस्त्र डकैती, ड्रग कब्जे और चोरी के लिए सजा शामिल थी। 25 मई, 2020 को फ्लॉयड को मिनियापोलिस, मिनेसोटा में गिरफ्तार किया गया था, जब एक स्टोर क्लर्क ने बताया कि उसने सिगरेट खरीदने के लिए नकली 20 डॉलर के नोट का इस्तेमाल किया था।”

Source: Grokipedia

ग्रोकिपीडिया में आगे बताया गया है कि उनकी हत्या कैसे हुई, लेकिन इसे वामपंथी और पक्षपातपूर्ण लहजे में प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे पूरी तरह से पुलिस पर दोष मढ़ा जा सके। यह विकिपीडिया पर दिख रही पूर्वाग्रह के बिल्कुल अलग है। मस्क ने ग्रोकिपीडिया को ‘निष्पक्ष ज्ञान के माध्यम से ब्रह्मांड’ को समझने के xAI के मिशन की दिशा में एक कदम के रूप में स्थापित किया है।

ग्रोकिपीडिया पर जानकारी कैसे खोजें और त्रुटियाँ कैसे सुधारें

ग्रोकिपीडिया पर लेख ढूँढने का तरीका काफी आसान है और विकिपीडिया से काफी मिलती-जुलती है। सबसे पहले, आपको grokipedia.com पर जाना होगा। फिलहाल, यह प्लेटफॉर्म केवल वेब ब्राउजर के माध्यम से ही उपलब्ध है।

Source: Grokipedia

वेबसाइट पर जाने के बाद, आपको होम पेज पर एक सर्च बार दिखाई देगा। उस शब्द को खोजें जिसके बारे में आप पढ़ना चाहते हैं। ग्रोकिपीडिया बातचीत के बजाय विषय-आधारित प्रविष्टियों पर ज्यादा ध्यान देता है, इसलिए किसी विषय के नाम के आगे ‘मुझे इसके बारे में बताएँ’ लिखने पर परिणाम अलग आ सकते हैं। अगर आप कोई विषय खोजना चाहते हैं, तो सिर्फ़ विषय लिखें। उदाहरण के लिए, ‘मुझे भारत के बारे में बताएँ’ न लिख कर सिर्फ ‘भारत’ टाइप करें, और यह आपको शीर्षक में ‘भारत’ वाले विषयों की एक सूची देगा।

Source: Grokipedia

ग्रोक एआई मॉडल आधिकारिक स्रोतों, शोध पत्रों और एक्स पर सत्यापित पोस्टों से रीयल-टाइम डेटा का उपयोग करके तुरंत लेख तैयार करता है। सामग्री पाठ-केंद्रित है, जिसमें संबंधित विषयों के लिए आंतरिक लिंक और सत्यापन के लिए संदर्भ शामिल हैं।

ग्रोकिपीडिया पर गलत जानकारी सुधारना

ग्रोकिपीडिया, अभी तक डायरेक्ट एडिटिंग की अनुमति नहीं देता है। हालाँकि यूजर्स एआई-सहायता प्राप्त रिपोर्टिंग सुविधा के माध्यम से सुधार से संबंधित सुझाव दे सकते हैं। किसी त्रुटि को सुधारने के लिए, लेख खोलें और गलत पाठ का चयन करें। आपको पाठ के ऊपर ‘यह गलत है’ लेबल वाला एक संकेत दिखाई देगा।

इस पर क्लिक करें। इसके बाद एक पॉप-अप विंडो दिखाई देगा, जहाँ आप उपलब्ध स्रोतों के साथ सही जानकारी प्रस्तुत कर सकते हैं। सबमिट करने के बाद, अगर सिस्टम जानकारी की पुष्टि कर लेता है, तो वह लेख को अपडेट कर देगा। हालाँकि, AI को परिवर्तनों को सत्यापित करने और उन्हें दर्शाने में कुछ समय लग सकता है।

सर्वोत्तम परिणामों के लिए, सुनिश्चित करें कि आपका सुधार तथ्यात्मक रूप से समर्थित और संक्षिप्त हो। यदि कुछ समय बाद भी त्रुटि बनी रहती है, तो आप अधिक प्रमाणों के साथ अपनी रिपोर्ट पुनः प्रस्तुत कर सकते हैं। ग्रोकिपीडिया ओपन-सोर्स है और लगातार विकसित हो रहा है, इसलिए यूजर्स एआई की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार करने में मदद कर सकते हैं।

ग्रोकिपीडिया कैसे अलग हैं विकिपीडिया से

ग्रोकिपीडिया और विकिपीडिया ऑनलाइन दो अलग-अलग फिलोसफी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहाँ विकिपीडिया मानवीय सहयोग पर निर्भर करता है, वहीं ग्रोकिपीडिया सूचना को खुद से अपडेट करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करता है, ताकि इसे पूर्वाग्रह-मुक्त बनाया जा सके। उल्लेखनीय रूप से, एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट में स्वीकार किया कि ग्रोकिपीडिया कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता, बल्कि इसे हमेशा अपडेट किया जाएगा।

कंटेंट और एडिटिंग की प्रक्रिया सिस्टम खुद करता है

ग्रोकपीडिया लेख खुद से ग्रोक मॉडल में जेनरेट, एडिट करता है। सिस्टम रियल टाइम डेटा का इस्तेमाल करता है, जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से लेता है। खुद में सुधार करने की क्षमता भी इसमें है।

विकिपीडिया से अलग इसमें कई लोग एडिट नहीं कर सकते, बल्कि एआई लगातार इसके कंटेंट को अपडेट करता रहता है ताकि नई जानकारी जुड़े और प्रासांगिक बना रहे। ग्रोकिपीडिया का मकसद आदर्शवाद और राजनीतिक दखलदांजी को कम कर ‘सच दिखाने’ पर केन्द्रित है। इसका उद्देश्य सही डाटा पर आधारित जानकारी देना है।

(ये लेख मूल रूप से अँग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बिहार के मुजफ्फरपुर में मुस्लिम बच्चे पीएम मोदी को क्यों दे रहे गाली?

ऑपइंडिया की बिहार ग्राउंड रिपोर्ट टीम मुजफ्फरपुर पहुँची। यहाँ कुछ मुस्लिम बच्चे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गालियाँ दे रहे थे, लेकिन वजह नहीं बता सके। उनका पसंदीदा नेता अखिलेश यादव है। बच्चे बस नारे लगा रहे थे। उधर रात दस बजे बाजार में महिलाएँ बिना डर के खरीदारी कर रही थीं। उन्होंने सुरक्षा का श्रेय एनडीए सरकार को दिया

महिलाओं ने ऑपइंडिया से कहा, “पहले रात में निकलना मुश्किल था, अब सब बदल गया।” ये ग्राउंड रिपोर्ट दिखाता है कि बिहार में कानून व्यवस्था सुधरी है, लेकिन कुछ बच्चों में राजनीतिक नफरत भरी जा रही है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की धरती सिमरिया को नीतीश कुमार ने कैसे बदला?

Opindia की Bihar Election Ground Report का काफिला Begusarai में Ganga के किनारे बने Simaria Ghat पहुँचा। यहाँ पर गंगाजी के किनारे नए घाटों का निर्माण करवाया गया है जहाँ श्रद्धालुओं के बैठने और रुकने तक की व्यवस्था की गई है। Simaria का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ये हिंदी के कवि Ramdhari Singh Dinkar की जन्मभूमि भी है। Rohit Pandey लेकर आए हैं Simaria Ghat से विशेष ग्राउंड रिपोर्ट!

नाबालिग बच्चियों को ग्राहकों के सामने परोस देता था लंदन का पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग, सब कुछ जानते हुए भी मेयर सादिक खान छिपाता रहा: 9000 मामलों की फाइल फिर से खुली

यूनाइटेड किंगडम में ग्रूमिंग गैंग एक बार फिर सुर्खियों में हैं। ताजा जाँच में यह खुलासा हुआ है कि कैसे नाबालिग लड़कियाँ लंदन की सड़कों पर इन तत्वों द्वारा जबरन वेश्यावृत्ति में धकेले जाने के लिए मजबूर हैं।

फिर भी, पाकिस्तानी मूल के मेयर सादिक खान न केवल इस गंभीर मुद्दे के प्रति उदासीन हैं, बल्कि कथित तौर पर इंग्लैंड की राजधानी में ऐसे गिरोहों की मौजूदगी को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

द टाइम्स में टॉम विदरो की रिपोर्ट के मुताबिक, सादिक खान ने लंदन विधानसभा में कंजर्वेटिव नेता सुसान हॉल से ही सवाल पूछा है कि लंदन में कितने बलात्कार गिरोह हैं- ये कहने का उनका क्या मतलब है। दरअसल उन्होंने कहा था, “युवाओं को ग्रूम किए जाने के मामले में लंदन की स्थिति देश के अन्य हिस्सों से अलग है। लंदन में युवाओं को ग्रूम किया जा रहा है, ताकि उनसे काउंटीलाइंस ( बच्चों से ड्रग्स, नशीली दवाएँ और दूसरे अपराध) कराई जा सके।

कंजर्वेटिव नेता हॉल ने कहा, “हर बार जब मैंने पूछा, तो मुझे एक ही जवाब मिला कि हमारे यहाँ (ग्रूमिंग गैंग) नहीं हैं। जबकि सच तो ये है कि लंदन में सालों से ग्रूमिंग गैंग सक्रिय है। वे ये सच क्यों नहीं बता सकते।”

सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी जॉन वेजर के अनुसार, ये गिरोह नाबालिग लड़कियों को सेक्स और वेश्यावृत्ति के लिए तैयार कर रहे हैं। इसे पता करने के लिए वह उत्तर-पूर्वी लंदन के टोटेनहैम गए। उन्होंने बताया, “मैंने कई सालों तक मेट पुलिस के वाइस स्क्वॉड में काम किया है, और मैंने एक ही इलाके में इतने सारे गिरोह पहले कभी नहीं देखे।” उन्होंने बताया कि एक 12 साल की सोमालियाई लड़की और 15 और 16 साल की दो अंग्रेज़ लड़कियाँ एक साथ ‘धंधे’ में लगाई गई थीं।

25 साल बाद 2017 में मेट छोड़ने वाले पूर्व अधिकारी ने लंदन में बाल वेश्यावृत्ति के बढ़ते मामले को उजागर करने के लिए आईबीबी मीडिया की एक डॉक्यूमेंट्री बना रही टीम के साथ काम किया। वे अभी भी इस काम में लगे हुए हैं ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। कई कार्यकर्ता, एनजीओ और पूर्व पुलिस अधिकारियों ने मिलकर संगठन बनाया है और लंदन के देह व्यापार का पर्दाफाश करने की कोशिश कर रहा है।

वेजर ने दावा किया कि उनके पास सबूत हैं, जिनमें अपराधियों की कार के नंबर भी हैं। हालाँकि, उन्हें 2006 में लंदन में यौन शोषण और शोषण के शिकार हुए 50 बच्चों के मामलों की जाँच बंद करने का आदेश दिया गया था। उन्होंने कहा, “सादिक खान इन सबका मजाक उड़ाते हैं, जबकि बहस को बेमानी करार देते हैं। जबकि कमजोर परिवार के बच्चे इस गिरोह के टारगेट पर हैं।”

समस्याओं की लीपापोती और यू-टर्न

फरवरी में लंदन विधानसभा के सदस्यों की पूछताछ के जवाब में मेट (मेट्रोपॉलिटन पुलिस) आयुक्त सर मार्क रोली ने आरोपों को खारिज कर दिया। फिर हाल ही में उन्होंने यू-टर्न लेते हुए कहा कि पुलिस ‘एकाध अपराधियों के मामलों’ की ‘लगातार निगरानी’ कर रही है और इस मामले में कई लोगों से पूछताछ की जा रही है।

मेट ने घोषणा की कि वह ब्लैकस्टॉक की बैरोनेस केसी की सिफारिशों के आधार पर 9,000 बाल यौन शोषण के मामलों की जाँच करेगा। केसी को ग्रूमिंग गैंग की जाँच में सहायता के लिए तब बुलाया गया था, जब इस मामले की जाँच कर रहे दो अधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

अधिकारियों ने दावा किया कि कई ऐसे मामले थे जिसकी जाँच की जानी थी। लेकिन इनमें गैंग के क्राइम से जुड़ी पूरी जानकारी लिखी ही नहीं गई थी।

ग्रूमिंग गिरोहों का पर्दाफाश करने में मदद करने वाले कार्यकर्ताओं के अनुसार, लंदन की स्थिति उत्तरी इंग्लैंड के कस्बों और शहरों के अधिकारियों द्वारा क्राइम को ‘कवर अप’ करने जैसी ही है। मैगी ओलिवर मैनचेस्टर की पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, जिन्होंने रोशडेल ग्रूमिंग गिरोहों के बारे में मुखबिर के रूप में काम किया था।

डेली एक्सप्रेस के मुताबिक उन्होंने कहा, “मुझे एहसास हुआ कि शीर्ष पर बैठे सभी लोग 100% जानते थे और इसे छिपाना चाहते थे।” मैगी ओलिवर फाउंडेशन चैरिटी में पीड़ितों की मदद करने के दौरान उन्होंने जो देखा और जाँच के निष्कर्षों में जो निकला, उस आधार पर कहा जा सकता है कि लंदन में दुर्व्यवहार का एक ऐसा ही पैटर्न दिख रहा है। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि वे इसे इतने लंबे समय तक कैसे छिपाए रखने में कामयाब रहे, लेकिन मुझे इससे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।”

लापरवाही, पीड़ित को दोषी ठहराना और अपराधियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना

प्रोफ़ेसर एलेक्सिस जे के बाल दुर्व्यवहार पर प्रसिद्ध निष्कर्षों से कई ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जो ब्रिस्टल, न्यूकैसल, रॉदरहैम, टेलफोर्ड और अन्य स्थानों में इस्तेमाल किए जाने वाले ग्रूमिंग मॉडल से स्पष्ट रूप से मिलते-जुलते हैं।

टाइम्स के अनुसार, एक 15 वर्षीय लड़की ने पुलिस को बताया कि वह ‘अश्लील पार्टियों’ में शामिल हुई थी, जहाँ उसे यौन संबंध बनाने के बदले ड्रग्स और शराब दी जाती थी, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया।

जे ने बताया कि मामला शुरू होने से पाँच हफ्ते पहले तक मेट अधिकारियों ने उस लड़की से संपर्क नहीं किया था। एक ‘मल्टी एजेंसी मीटिंग’ के बाद उसे बताया गया कि वह जिन समारोहों में बड़े आदमियों, शराब और ड्रग्स के साथ गई थी, वे ‘अश्लील पार्टियाँ’ नहीं थीं। इसलिए वह ‘खतरे’ में नहीं थे। हालाँकि, जे ने पाया कि सबूत कुछ और ही इशारा कर रहे थे और मेट की प्रतिक्रिया काफी ‘ठंडी और कमजोर’ थी।

पूर्वी लंदन के टावर हैमलेट्स से एक 13 वर्षीय ‘अक्सर लापता’ रहने वाले बच्चे को 2018 में होटल की सेक्स पार्टियों में लाया गया था। जे ने बताया कि सामाजिक सेवाओं से सिर्फ़ एक बार फ़ोन पर संपर्क करने के बाद, पुलिस ने ‘यह तय कर लिया कि यह बाल यौन शोषण का मामला नहीं है।’ अधिकारियों ने उस लड़के और उसके परिवार से संपर्क नहीं किया।

जे ने बताया कि लड़के को ‘बाल संरक्षण’ में रखा गया था। मेट ने बाद में स्वीकार किया कि उसका ध्यान बाल यौन शोषण के बजाय नशीली दवाओं और आपराधिक शोषण, यानी सादिक खान द्वारा उल्लिखित ‘काउंटी लाइन्स’ पर केंद्रित था।

सार्वजनिक रिकॉर्ड में कई जघन्य मामले दर्ज हैं। जे ने अपनी रिपोर्ट में अधिकारियों पर ‘पीड़ितों को दोषी ठहराने’ का आरोप लगाया था। एक अधिकारी ने 2018 की शुरुआत में अपने नोट्स में कहा, “उसकी वर्तमान जीवनशैली उसे जोखिम में डाल रही है, उसका व्यवहार अच्छा नहीं है।”

सादिक खान ने 2016 से 2025 तक की चार रिपोर्टों पर औपचारिक प्रतिक्रियाएँ दीं, जिनमें से प्रत्येक में छह संभावित पीड़ितों के बारे में जानकारी थी। मैगी ओलिवर का मानना ​​है कि तीन अपराधियों को ग्रूमिंग गिरोह के रूप में पहचाना जा सकता है।

नशीली दवाएँ, वेश्यावृत्ति और बाल यौन शोषण

द टाइम्स के लेख में लेखक और प्रचारक क्रिस वाइल्ड के हवाले से कहा गया है कि लंदन रॉदरहैम से ज्यादा बदतर है। लंदन के हर इलाके में एक समस्या है। वाइल्ड ने कथित तौर पर महामारी के दौरान उत्तरी लंदन के एनफील्ड, टॉटेनहैम और हैरिंगे में छह बाल देखभाल संस्थानों की देखरेख की। उन्होंने बताया, ” यहाँ हर हफ्ते 50 से 75 फीसदी बच्चे वेश्यावृत्ति में धकेले जा रहे थे।”

वाइल्ड ने आगे कहा, “एक (घर) में छह बच्चे थे, और हर हफ्ते पाँच बच्चे वेश्यावृत्ति में धकेल दिए गए। वे अस्त-व्यस्त, नशे में धुत, यौन गिरोहों को बेचे गए और बाल यौन शोषण करने वालों द्वारा बलात्कार किए गए थे और वापस आ रहे थे।”

उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस ने इनसे संपर्क नहीं किया। पुलिस के पास कई बहाने थे। उन्होंने दावा किया कि पुलिस कह सकती है, “ओह, वह बयान नहीं देगी, वह आक्रमक है, वह अनैतिक है।” यानी पुलिस पीड़िता को जानते थे।

“यह पूरे लंदन में हो रहा है (और) देश में कहीं और की तुलना में कहीं ज़्यादा। मैं अग्रिम पंक्ति में हूँ और मेरे जैसे कार्यकर्ताओं के पास ऐसी लड़कियों की कहानियाँ हैं। मैं लंदन में इस बारे में लगातार मुखर हूँ। मेयर कार्यालय से यह कहते हुए रिपोर्ट सुनना कि ‘यहाँ यह कोई समस्या नहीं है’ दिखाता है कि वह व्यक्ति भ्रमित है।

उन्होंने खान से इस गंभीर मुद्दे को स्वीकार करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि आपको खुद से यह सवाल पूछना होगा। वे किसे बचा रहे हैं? वे क्या बचा रहे हैं।”

लंदन के मेयर सादिक खान की आलोचना

क्रिस फिलिप एमपी के मुताबिक, “यह शर्मनाक है कि लंदन के मेयर यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें इस बात की खबर नहीं है कि लंदन में ग्रूमिंग गैंग सक्रिय हैं। जबकि उन्होंने शहर में ग्रूमिंग गैंग द्वारा पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार के सबूतों वाली रिपोर्टों पर व्यक्तिगत रूप से प्रतिक्रिया दी है। यह स्पष्ट है कि सादिक खान इस मामले को छुपाने की कोशिश कर रहे हैं,”


रिफॉर्म यूके सांसद ली एंडरसन के मुताबिक, “इस बात के वास्तविक और विश्वसनीय सबूत हैं कि लंदन में ग्रूमिंग गैंग मौजूद हैं, और मेयर का इस पर आँखें मूँद लेना बेहद शर्मनाक है।”

एक पीड़िता ने सवाल किया, “खान और मेट कमिश्नर का ग्रूमिंग गैंग को नकारना, लंदन के दो सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा किए गए ‘भयानक अपराध’ हैं, उन्हें इसके लिए शर्म आनी चाहिए। यह चौंकाने वाला है कि ये सारे सबूत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं और यह स्वीकार किया जा रहा है कि लंदन में ग्रूमिंग गैंग का मुद्दा मौजूद है। एक मेयर, जो खुद को महिलाओं और लड़कियों का समर्थक बताता है, वह इन महिला पीड़ितों की आवाज को इतनी बेरहमी से क्यों रोक रहा है?”

मेयर और मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने जोर देकर कहा कि शहर में रॉदरहैम या रोशडेल जैसे बलात्कार गिरोहों की ‘कोई रिपोर्ट’ नहीं मिली है, जबकि मेयर ने घोषणा की कि उनके अस्तित्व का ‘कोई संकेत’ नहीं है। हालाँकि, महामहिम के कांस्टेबुलरी और अग्निशमन एवं बचाव सेवाओं के निरीक्षणालय से संबंधित घटनाक्रम ने सच्चाई उजागर कर दी।

राउली ने खान को एक खुला पत्र भी लिखा जिसमें बताया गया कि मेट्रो 6 अप्रैल से दर्ज किए गए 654 बाल आपराधिक शोषण के मामलों और ‘अकेले या कई अपराधियों’ से जुड़े 716 बाल यौन शोषण के मामलों की जाँच कर रही है। राउली के अनुसार, पुलिस को इस दौरान 14,500 से ज़्यादा यौन अपराधों का सबूत मिले। इसके बावजूद ऐसे मामलों को पूरे यूके में हाशिए पर रख दिया गया है।

उनका मानना है कि अक्सर, पीड़ितों पर विश्वास नहीं किया जाता और यहाँ तक कि समय-समय पर उन पर राय भी बनाई जाती है।

खान के कार्यकाल की शुरुआत से लेकर इस साल तक यौन शोषण के मामलों से निपटने के मेट के तरीकों की समीक्षा पर आधारित रिपोर्टों में बताया गया है कि कैसे पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तब जब उन्हें पता था कि ये ग्रूमिंग गिरोह 13 साल की बच्चियों का फायदा उठा रहे थे। इस बीच, खान के प्रवक्ता ने कहा कि ‘सभी सिफारिशों’ पर कार्रवाई करने के लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए।

जाँच में पाया गया कि पूर्वी लंदन बरो में पाँच अलग-अलग युवतियों का यौन शोषण नेटवर्क द्वारा शोषण किया जा रहा था। कार्यवाही के दौरान गवाहों ने बताया कि कैसे 2010 के दशक के अंत में, ‘पुरुषों के ग्रुप’ ने होटल के कमरों में लड़कियों का यौन शोषण किया।

यूनाइटेड किंगडम में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गिरोह हावी

यूनाइटेड किंगडम दशकों से मुख्य रूप से पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुषों द्वारा संचालित ग्रूमिंग गिरोहों से त्रस्त है। अधिकारियों, सरकार और यहाँ तक कि मीडिया पर भी पीड़ितों, उनके परिवारों और प्रचारकों द्वारा इस्लामोफोबिया और नस्लवाद के नाम पर इन जघन्य अपराधों को छिपाने के बार-बार आरोप लगे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने इस मुद्दे से निपटने के लिए एक टीम का गठन किया।

1990 के दशक के अंत में इन गिरोहों ने 11 साल की उम्र तक की छोटी लड़कियों का अपहरण, बलात्कार, दुर्व्यवहार, बिक्री और यहाँ तक कि हत्या भी की। यह पता चला कि ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों ने 16 साल में अकेले रॉदरहैम में 1,400 बच्चों का यौन उत्पीड़न किया था।

बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार पर राष्ट्रीय लेखा परीक्षा अध्ययन से पता चला है कि रॉदरहैम में बाल यौन शोषण के 64% मामले इन्हीं पुरुषों द्वारा किए गए थे। इसके अलावा, ‘ऑपरेशन स्टोववुड’ के तहत बाल यौन शोषण के आरोपों में दोषी पाए गए 42 लोगों में से अधिकांश पाकिस्तानी पुरुष थे।

बलात्कार गिरोह जाँच रिपोर्ट के परिणामों के अनुसार, ग्रेट यारमाउथ के सांसद रूपर्ट लोव ने 26 अगस्त को बताया कि पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोह यूनाइटेड किंगडम के 85 स्थानों पर सक्रिय हैं। इन गिरोहों की लगातार और अनियंत्रित उपस्थिति ने काफी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है।

(ये लेख मूल रूप से अँग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

बिहार चुनाव में ‘वक्फ कानून’ फाड़ने के नाम पर वोट माँग रहे तेजस्वी यादव, RJD नेता दे रहे ‘सुधारने’ की धमकी: मुस्लिम तुष्टिकरण की आड़ में दिखाया जा रहा जंगलराज का डर

बिहार चुनाव का शोर चारों तरफ गूँज रहा है। रैलियाँ, नारे, वादे और बयानबाजी सब कुछ चल रहा है। लेकिन इन सबके बीच एक मुद्दा ऐसा उछला है, जो मुस्लिम वोटों की खातिर राजनीति की सारी हदें पार कर रहा है, वो है वक्फ कानून। आरजेडी के युवा नेता तेजस्वी यादव ने कटिहार और किशनगंज की रैलियों में जो कहा, वो सुनकर कोई भी हैरान रह जाएगा। तेजस्वी यादव मंच से ही बोले, “अगर इंडी गठबंधन की सरकार बनी, तो वक्फ संशोधन कानून 2024 को सीधे कूड़ेदान में फेंक देंगे।”

अरे भाई, ये कानून तो अप्रैल 2025 में संसद ने पास किया था। राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए। ये केंद्र का कानून है। बिहार की राज्य सरकार इसे कैसे फेंक देगी? ये तो वही बात हुई कि कोई कहे, “मैं चाँद पर झंडा गाड़ दूँगा” – सुनने में अच्छा लगता है, करने में नामुमकिन।

वैसे, तेजस्वी को ये बात कहनी थी। क्यों? क्योंकि सीमांचल में मुस्लिम वोटर ज्यादा हैं। कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, अररिया ये इलाके मुस्लिम बहुल हैं। और आरजेडी को पता है, बिना इन वोटों के सत्ता की चाबी नहीं मिलेगी। तो बस वक्फ कानून को मुद्दा बना दिया। तेजस्वी यादव बोले, “ये कानून मुसलमानों के हक पर डाका है।” लेकिन सच क्या है? ये संशोधन कानून तो पारदर्शिता का है। वक्फ बोर्ड में गड़बड़ी बहुत थी। हजारों एकड़ जमीन पर कब्जे, बिना हिसाब-किताब के। सरकार ने कहा, “अब रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा, प्रॉपर्टी का ऑडिट होगा और अन्य लोगों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।” लेकिन विपक्ष की समझ में इतना आया कि ये मुस्लिम वोट खिसकाने की साजिश है। तो बस… शुरु हो गई तुष्टिकरण की राजनीति।

तेजस्वी अकेले नहीं हैं इस खेल में। उनकी पार्टी के एमएलसी कारी शोएब तो और आगे निकल गए। खगड़िया के गोगरी में रैली थी। मंच पर तेजस्वी भी थे। कारी शोएब ने माइक थामा और बोले, “तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनेंगे, तो सारे बिल फाड़कर फेंक देंगे। वक्फ बिल वालों का इलाज करना है।”

इलाज? मतलब क्या? धमकी? ये जंगलराज की भाषा है। और सचमुच तेजस्वी मंच पर बैठे रहे, मुस्कुराते रहे, कोई टोका-टाकी नहीं। मतलब सबकुछ एक प्लान का हिस्सा था। ये बताना कि मुस्लिमों, तुम कुछ भी करो… हम तुम्हारे साथ हैं और तुम्हें कोई छू भी नहीं सकता।

अब जरा सोचिए, ये वक्फ कानून है क्या? ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं। ये संसद का कानून है। राष्ट्रपति की मुहर लगी है। बिहार की सरकार इसे कैसे रद्द करेगी? तेजस्वी कहते हैं, ‘हम फेंक देंगे।’ अरे, फेंकना तो दूर छू भी नहीं सकते। अगर बिहार में इंडी गठबंधन की सरकार बनी भी, तो केंद्र का कानून लागू रहेगा। सुप्रीम कोर्ट है, संविधान है। क्या तेजस्वी राष्ट्रपति को फोन करके कहेंगे, “मैडम, ये कानून वापस ले लो?” या गवर्नर से कहेंगे, “सर, इसे लागू मत करो?” ये सब झूठ है, भ्रम है, वोट के लिए गुमराह करना है।

और मुस्लिम भाइयों को सोचना चाहिए। क्या वक्फ कानून ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मुद्दा है? नहीं ना। असली मुद्दे तो रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा हैं। बिहार में बेरोजगारी सबसे ज्यादा है। युवा नौकरी माँग रहे हैं। मुस्लिम इलाकों में स्कूल-कॉलेज नहीं, अस्पताल नहीं। सीमांचल में बाढ़ आती है, लोग मरते हैं, कोई पूछने वाला नहीं। लेकिन तेजस्वी क्या कहते हैं? “वक्फ कानून फेंक देंगे।” अरे तेजस्वी जी, वक्फ कानून से पेट नहीं भरता। नौकरी नहीं मिलती। बच्चे नहीं पढ़ते।

और सबसे बड़ी बात आरजेडी खुद मुस्लिमों को कितना सम्मान देती है? टिकट बँटवारे में देख लो। बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 18% है। लेकिन आरजेडी ने कितने मुस्लिम कैंडिडेट उतारे? गिनती की उँगलियों पर। पिछले चुनाव में भी यही हुआ। लालू यादव के समय में भी ये मुस्लिम वोट बैंक उनके साथ था, लेकिन टिकट की गिनती हमेशा कम ही रही। इस बार हल्ला था कि महागठबंधन किसी मुस्लिम चेहरे को डिप्टी सीएम बनाएगी, लेकिन घोषणा की तो वीआईपी वाले मुकेश सहनी के नाम की?

पीएम मोदी इसे महाठगबंधन कहते हैं। इसमें कॉन्ग्रेस, लेफ्ट सबको हिस्सा चाहिए सिर्फ मुस्लिम वोटों में, इसकी एवज में सत्ता में भागीदारी देने की बात वो करते नहीं। और अब तेजस्वी कहते हैं, “हम आपके हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।” अरे हक की लड़ाई टिकट देकर, पद देकर, नौकरी देकर लड़ते हैं, ना कि वक्फ कानून को मुद्दा बनाकर।

लालू प्रसाद यादव को याद करो। वो कहते थे, “जब तक मछली भात रहेगा, लालू की सत्ता रहेगी।” लेकिन मुस्लिमों के लिए क्या किया? जंगलराज दिया। अपहरण, हत्या, भ्रष्टाचार। नीतीश कुमार आए, तो कानून-व्यवस्था सुधरी। अब तेजस्वी आ गए। वही लालू वाली पुरानी स्क्रिप्ट लेकर… नीतीश कुमार को गाली दो, बीजेपी को ‘भारत जलाओ पार्टी’ कहो और आरएसएस को नफरत फैलाने वाला। लेकिन खुद? वक्फ कानून पर धमकी, इलाज की बात। ये भाईचारा है या डर की राजनीति?

मुस्लिम समाज को समझना होगा। वक्फ कानून कोई दुश्मन नहीं है। ये सुधार है। गड़बड़ी रोकने का कानून है। अगर कोई वक्फ की जमीन पर गलत कब्जा कर रहा है, तो उसे रोका जाएगा। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मुस्लिमों की मजहबी आजादी छीनी जा रही है। मस्जिदें रहेंगी, मदरसे रहेंगे, कब्रिस्तान रहेंगे। बस हिसाब साफ होगा। और जो लोग कहते हैं, “ये मुसलमानों पर हमला है”, वो खुद मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं।

तेजस्वी कहते हैं, “हम संविधान बचाएँगे।” लेकिन संसद के कानून को कूड़ेदान कहना, क्या ये संविधान का सम्मान है? ये तो साफ तौर पर तुष्टिकरण है। खुली हुई वोट बैंक की राजनीति। और मुस्लिम समाज को इसका शिकार नहीं बनना चाहिए। वोट डालो, लेकिन सोच-समझकर। जो पार्टी आपको इज्जत दे, नौकरी दे, शिक्षा दे, सुरक्षा दे, उसी को वोट दो। वक्फ कानून पर झूठी बहादुरी दिखाने वालों को सबक सिखाओ।

बिहार के लोग समझदार हैं। उन्हें भी पता है कि वक्फ कानून कोई राज्य का मुद्दा नहीं। ये केंद्र का कानून है। इसे कोई राज्य सरकार नहीं फेंक सकती। तेजस्वी जानते हैं, कारी शोएब जानते हैं, लालू जी जानते हैं। फिर भी बयानबाजी। क्यों? क्योंकि चुनाव है। वोट चाहिए और मुस्लिम वोटरों को गुमराह करना आसान लगता है।

लेकिन अब समय बदल गया है। मुस्लिम समाज जाग रहा है। वो समझ रहा है कि असली मुद्दे क्या हैं। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य। वक्फ कानून पर बहस करने से पेट नहीं भरता।

चुनाव में वोट डालते समय सोचना। कौन झूठ बोल रहा है, कौन सच। कौन विकास की बात करता है, कौन सिर्फ वोट बैंक। वक्फ कानून कूड़ेदान में नहीं जाएगा। क्योंकि वो संसद का कानून है। लेकिन जो लोग झूठ बोलकर वोट माँग रहे हैं, उन्हें जरूर सबक सिखाना चाहिए। बिहार को चाहिए विकास, नहीं तो मिलेगा जंगलराज। और जंगलराज में ना मुस्लिम सुरक्षित, ना हिंदू। ये सबके लिए बुरा ही रहेगा।

बिहार में हार देख राहुल गाँधी ने किया सरेंडर? चुनाव से ठीक पहले सीन से गायब हैं कॉन्ग्रेस के ‘पार्ट टाइम’ नेता, RJD ने यात्रा का नहीं होने दिया था मनचाहा समापन

बिहार में चुनावी रंग चढ़ चुका है। 6 नवंबर को पहला फेज वोटिंग होने वाला है और कैंपेनिंग 4 नवंबर तक चलेगी। एक हफ्ता बाकी है, लेकिन महागठबंधन के कैंप में हड़कंप मचा हुआ है। एक तरफ NDA के लिए पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रोज रैलियाँ कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष का चेहरा माने जाने वाले राहुल गाँधी सीन से गायब। दो महीने से बिहार नहीं आए, न रैली की, न सड़क पर उतरे। लास्ट विजिट तो 1 सितंबर को हुई थी, जब ‘वोटर अधिकार यात्रा’ खत्म करने पटना आए थे।

प्रधानमंत्री मोदी तो जैसे बिहार को अपना दूसरा घर बना चुके हैं – हर दूसरे दिन रैली, हर रैली में विपक्ष पर जोरदार हमला। इस दौरान राहुल गाँधी पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। लेकिन वोटर अधिकार यात्रा के दौरान बिहार के कोने-कोने में घूमने वाले राहुल गाँधी नदारद हैं। चुनाव का बिगुल बज चुका है, पहले चरण का नामांकन तक खत्म हो गया, लेकिन राहुल साहब कहीं नजर नहीं आ रहे। ये सवाल अब सिर्फ बीजेपी वाले नहीं पूछ रहे, कॉन्ग्रेस के अपने कार्यकर्ता भी परेशान हैं।

राहुल गाँधी की लंबी अनुपस्थिति: पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स या रणनीतिक चुप्पी?

बिहार चुनाव के ठीक बीच में राहुल गाँधी का गायब होना किसी रहस्य फिल्म जैसा लग रहा है। 1 सितंबर के बाद से दो महीने बीत चुके, लेकिन वो बिहार की सरजमीं पर कदम नहीं रखे। न रैली की, न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न ही वर्चुअल तरीके से समर्थन दिया। जबकि पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव जैसे नेता तो रोज मैदान में हैं।

कॉन्ग्रेस के अंदर भी बेचैनी है। बिहार प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (BPCC) के एक सीनियर पदाधिकारी ने कहा, “राहुल जी ने वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में जान डाली थी, लेकिन अब उनकी अनुपस्थिति महँगी पड़ रही। दिल्ली में इमरती बनाते दिखे, लेकिन बिहार में नहीं।” डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में भी यही चिंता जताई गई – राहुल की गैरमौजूदगी महागठबंधन की संभावनाओं को प्रभावित कर रही। X पर भी डिबेट छिड़ी हुई है।

हालाँकि AICC जनरल सेक्रेटरी KC वेणुगोपाल ने कहा, “राहुल छठ पूजा के बाद आएँगे। 29 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर में तेजस्वी के साथ जॉइंट रैली और प्रियंका 28 को बिहार पहुँचेंगी।” लेकिन ये आखिरी मिनट की बात लगती है। राहुल की अनुपस्थिति पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स जैसी हो या स्मार्ट स्ट्रैटेजी। इसका असर तो बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ समझ में आ ही जाएगा।

वोटर अधिकार यात्रा से जोश जगाने के बाद सन्नाटा क्यों?

अब बात उस ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की, जिसने बिहार में हंगामा मचाया था। सितंबर में शुरू हुई ये यात्रा गाँव-गाँव घूमी, राहुल ने EVM पर सवाल उठाए, वोट चोरी का हाइड्रोजन बम फोड़ने की बात की। 1 सितंबर को पटना में राहुल गाँधी को न तो मनचाहा समापन मिल पाया और न ही किसी जनसभा को संबोधित कर पाए।

लेकिन उसके बाद? कुछ नहीं। यात्रा खत्म, राहुल दिल्ली चले गए और बिहार वाले अकेले रह गए। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता परेशान हैं। यहाँ तकि इंडी गठबंधन के पोस्टरों से उनकी तस्वीर तक गायब कर दी गई।

बिहार प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में नई जान आई, लेकिन राहुल की अनुपस्थिति से वो जोश ठंडा पड़ गया।” ये अनुपस्थिति महागठबंधन को नुकसान पहुँचा रही है। कॉन्ग्रेस के नेता राहुल को बुलाने की माँग कर रहे। अब 29 को रैली से शायद जोश लौटे, लेकिन देर हो चुकी। बिहार के लोग कह रहे, “यात्रा तो चली, लेकिन चुनाव लड़ना भूल गए क्या?”

तेजस्वी पर सहमति के बाद कॉन्ग्रेस पड़ी ढीली

CM चेहरा तय करने में भी देरी। लालू दबाव डालते रहे, तेजस्वी को नाम दो। कॉन्ग्रेस टालती रही, फिर गहलोत भेजे गए। आखिरकार 23 अक्टूबर को घोषणा की गई कि तेजस्वी यादव ही सीएम पद का चेहरा होंगे, लेकिन इसके बाद से कॉन्ग्रेस पूरी तरह ठंडी पड़ गई। अब 29 अक्टूबर को राहुल-तेजस्वी की जॉइंट रैली है, लेकिन इसका सारा क्रेडिट साफ तौर पर आरजेडी ले जाएगी।

कॉन्ग्रेस उम्मीदवार परेशान हैं। एक कैंडिडेट ने बताया (नाम नहीं लूँगा, लेकिन असल बात है) – “हम पोस्टर लगा रहे हैं, घर-घर जाकर वोट माँग रहे हैं। लोग पूछते हैं, राहुल जी कहाँ हैं? उनका भाषण सुनना चाहते हैं। बिना उनके मंच खाली लगता है।” कई सीटों पर तैयारी आधी-अधूरी ही है।

सियासी जानकार कहते हैं – राहुल की स्टाइल है। भारत जोड़ो यात्रा जैसी मेगा इवेंट करते हैं, फिर ब्रेक। लेकिन चुनाव में ये महँगा पड़ता है। 2020 में बिहार चुनाव में भी कॉन्ग्रेस 70 सीटों पर लड़ी, 19 जीती। इस बार भी वही रास्ता। ऐसे में अगर विपक्षी गठबंधन को हार मिलती है, तो फिर से वही ईवीएम का रोना रोया जाएगा।

राहुल की पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स वाली पुरानी बीमारी फिर से जाग गई?

बिहार में कॉन्ग्रेस का जोश ठंडा पड़ चुका है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश जगाने के बजाय कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दिल्ली में इमरती छानते दिखे। कॉन्ग्रेस के अंदर कोहराम मचा हुआ है। उम्मीदवार राज्य के नेताओं पर टिकट के बदले उगाही का आरोप लगा रहे हैं। यहाँ तक कि पप्पू यादव पर भी कई लोगों को टिकट बाँटने का आरोप लग रहा है। ऐसे में राहुल गाँधी हैं कहाँ ? पार्टी को एकजुट करने के लिए वे क्या कर रहे हैं ? ये सवाल बिहारियों के दिमाग में है। 

बता दें कि राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पिछले नौ महीनों में उन्होंने कम से कम छह विदेश यात्राएँ की हैं, जिनमें टेक्सस, इटली, वियतनाम, दुबई, कतर, मलेशिया और साउथ अमेरिका शामिल हैं। विदेश यात्रा के दौरान उनके कई बयान विवादों में रहते हैं।

उदाहरण के लिए, वर्जीनिया में सिखों के बारे में उनकी टिप्पणी और अमेरिका यात्रा पर उनकी टिप्पणियाँ विवादास्पद रही हैं। विपक्षी नेता होने के नाते उनके विदेश यात्राओं के खर्च और प्रोटोकॉल पर भी सवाल उठते हैं। इसके बावजूद वो चुनाव जैसे अहम मौकों पर गायब हो जाते हैं। सोचिए, बीते कुछ दिनों से वो विदेश नहीं भी गए, तब भी वो बिहार चुनाव में बिल्कुल भी सक्रिय नहीं रहे।

हालाँकि कॉन्ग्रेस पार्टी प्रवक्ता लगातार अपनी पार्टी का बचाव करते नजर आए हैं। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि राहुल जी का कार्यक्रम तय हो गया है। बिहार में उनकी रैलियों की योजना बनाई जा रही है। हम भीड़ की राजनीति नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित राजनीति करते हैं।

बीजेपी राहुल गाँधी की अनुपस्थिति को चुनावी मुद्दा बना रही है। बीजेपी प्रवक्ता संजय मयूख ने कहा कि राहुल गाँधी को बिहार के मतदाताओं पर भरोसा नहीं है। इसीलिए वो चुनावी मैदान से गायब हैं। राहुल गाँधी की अनुपस्थिति बिहार में अब चर्चा का विषय बन चुकी है। अब तो कॉन्ग्रेस प्रत्याशी और समर्थक भी राहुल गाँधी के इंतजार में है कि वह कब बिहार आकर चुनाव में बिगुल फूँकते हैं.. बाकी सवाल उनके मन में भी है कि कहीं वाकई इस बार देर तो नहीं हो गई?

क्या है चक्रवात ‘मोंथा’? IMD ने आंध्र प्रदेश-ओडिशा में रेड अलर्ट किया जारी, जानें कैसे रखा जाता है साइक्लोन का नाम

बंगाल की खाड़ी में चक्रवात तूफान का खतरा मंडरा रहा है। इस चक्रवात को मोंथा (Montha) नाम दिया गया। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इसे लेकर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा में रेड अलर्ट जारी किया है। IMD ने चेतावनी दी है कि आंध्र प्रदेश के तट पर 28 अक्टूबर 2025 तक पहुँचने पर ये एक खतरनाक चक्रवात तूफान में बदल सकता है।

IMD ने सोमवार (26 अक्टूबर 2025) तड़के चक्रवात मोंथा की जानकारी देते हुए कहा कि बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पूर्व में बना दबाव का क्षेत्र पश्चिम की ओर बढ़ गया है और इसके गहरे दबाव में तब्दील होने और आगे चलकर इसके चक्रवात तूफान में बदलने के आसार हैं।

मौसम विभाग ने बताया कि 26 अक्टूबर 2025 तक ये चक्रवात तूफान गहरे दबाव में तब्दील होने और 27 अक्टूबर 2025 की सुबह तक दक्षिण-पश्चिम और उससे सटे पश्चिम-मध्य बंगाल की खाड़ी में चक्रवात तूफान में तब्दील होने की संभावना है। यह भी कहा कि इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ते हुए 28 अक्टूबर 2025 की सुबह तक एक प्रचंड चक्रवात तूफान में परिवर्तित हो सकता है।

कहाँ-कहाँ रेड अलर्ट?

मौसम विभाग ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के लिए रेड अलर्ट जारी किया है। जहाँ 28 और 29 अक्टूबर 2025 को भारी बारिश होने की संभावना है। आंध्र प्रदेश के 9 जिलों में रेड अलर्ट है जबकि बाकी हिस्सों जैसे कि तमिलनाडु और ओडिशा में ऑरेंज अलर्ट लागू है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ में भी भारी बारिश का अनुमान है।

इसके अलावा हवा की गति 110 किमी प्रति घंटा तक पहुँच सकती है, जिससे पेड़ उखड़ने और बाढ़ का खतरा है। मौसम विभाग ने मछुआरों को 29 अक्टूबर 2025 तक समुद्र में न जाने की सलाह दी है।

तटीय इलाकों में तूफान की तैयारियाँ

चक्रवात मोंथा तूफान के रेड अलर्ट के बाद राज्यों ने भी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं। आंध्र प्रदेश में काकीनाडा और कोनासिमा के 34 तटीय गाँवों से 6000 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा रहा है, जिसमें 428 गर्भवती महिलाएँ शामिल हैं। विशाखापट्टनम, अनाकापल्ले और वेस्ट गोदावरी में 27 और 28 अक्टूबर 2025 को स्कूल बंद रहेंगे।

ओडिशा के 8 दक्षिणी जिलों मल्कानगिरी, कोरापुट आदि को रेड जोन घोषित किया गया है, जहाँ साइक्लोन शेल्टर बनाए गए हैं। NDRF और SDRF टीमें तैनात हैं। विभाग के लोगों की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई हैं और जलाशयों से पानी छोड़ा जा रहा है।

वहीं एलुरु, कृष्णा औऱ पश्चिम गोदावरी जिलों में मोंथा चक्रवात चेतावनी के बाद सभी समुद्री तटों को बंद कर दिया गया है। यहाँ बोटिंग भी प्रतिबंधित कर दी गई है। पुलिस ने इन क्षेत्रों में पिक्टिंग लगाकर लोगों को समुद्र तटों में प्रवेश करने से रोक दिया है।

चक्रवात ‘मोंथा’ क्या है?

बंगाल की खाड़ी में आए चक्रवात तूफान का नाम ‘मोंथा’ रखने के पीछे भी एक वजह है। मोंथा शब्द थाईलैंड से आया है, जिसका थाई भाषा में अर्थ ‘खुशबूदार फूल’ है। हर चक्रवात तूफान का नामकरण किया जाता है, जिससे मौसम विभाग को रिकॉर्ड रखने में आसानी हो जाती है और लोगों को इसके प्रति आगाह करन में भी सुविधा होती है।

ये नामकरण तब किया जाता है, जब कोई तूफान एक निश्चित तीव्रता तक पहुँच जाते हैं और IMD द्वारा उन्हें ‘चक्रवात तूफान’ घोषित कर दिया जाता है। इन तूफान का नाम विश्व मौसम संगठन (WMO) और ESCAP (Economic and Social Commission for Asia and the Pacific) एक प्रणाली के तहत तय करती है। ये 13 देशों का एक समूह है, जिसमें भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार, थाईलैंड, ईराम, ओमान, कतर, सऊदी, अरब, UAE और यमन।

साल 2004 से पहले तूफानों को केवल तारीख से याद रखा जाता था, जिससे भ्रम की स्थिति बन जाती थी और रिकॉर्ड रखने में भी परेशानी होती थी।