दिवाली का त्योहार करीब आते ही हिमाचल प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने माननीयों को बड़ा तोहफा दे दिया। मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों और यहाँ तक कि पूर्व विधायकों की सैलरी और भत्तों में करीब 25 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी गई। एक तरफ मार्च 2025 में लाया गया सुक्खू सरकार का बिल अब राज्यपाल की मंजूरी के बाद लागू हो गया, तो दूसरी तरफ राज्य का खजाना खाली पड़ा है।
हिमाचल प्रदेश सरकार का कर्ज बढ़ता जा रहा है, सरकारी कर्मचारियों को वेतन-भत्ते समय पर नहीं मिल रहे, विकास के काम रुक गए हैं और रोडवेज की बसें तक कम पड़ रही हैं। जनता बेहाल है, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार माननीयों को दिवाली का तोहफा दे रही है।
CM-मंत्रियों-विधायकों की सैलरी बढ़ी
हिमाचल प्रदेश सरकार ने 28 मार्च 2025 को विधानसभा में तीन बिल पेश किए थे। इनमें विधायकों के वेतन, भत्तों और पूर्व विधायकों की पेंशन से जुड़े बदलाव थे। अब राज्यपाल ने हरी झंडी दे दी और नोटिफिकेशन जारी हो गया। दिवाली से पहले ये बढ़ोतरी लागू हो गई।
सरल शब्दों में कहें तो मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पहले हर महीने 2.65 लाख रुपये मिलते थे, अब ये ₹3.50 लाख हो गए। यानी 85 हजार रुपए का फायदा। विधानसभा स्पीकर को 2.55 लाख से 3.45 लाख, कैबिनेट मंत्री को 2.55 लाख से 3.10 लाख, डिप्टी स्पीकर को 2.50 लाख से 3.40 लाख। विधायकों की तो बात ही अलग है। पहले 2.10 लाख मिलते थे, अब 2.80 लाख। बेसिक सैलरी 55 हजार से बढ़कर 85 हजार हो गई।
पूर्व विधायकों की भी बल्ले-बल्ले
पूर्व विधायकों की पेंशन में भी अच्छा इजाफा किया गया है। बेसिक 36 हजार से 50 हजार, डीए मिलाकर कुल 93 हजार से बढ़कर 1.29 लाख रुपए महीना हो गया है। हालाँकि अधिसूचना में साफ लिखा है कि हर पाँच साल में ऐसी समीक्षा होगी। 9 साल बाद ये बढ़ोतरी हुई है। सरकार का कहना है कि ये विधायकों को बेहतर काम करने के लिए प्रोत्साहन है। लेकिन सवाल ये है कि जब खजाना सूना है, तो ये पैसा कहाँ से आएगा?
कर्ज से कराह रहा हिमाचल प्रदेश, सुक्खू सरकार ने किया बेड़ा गर्क
अब आते हैं असली मुद्दे पर – हिमाचल की आर्थिक तंगी। राज्य सरकार कर्ज के बोझ तले दबी हुई है। अगस्त 2025 में ही सुक्खू सरकार ने ₹1500 करोड़ का नया कर्ज लिया। ये दो हिस्सों में था – ₹1000 करोड़ 15 साल के लिए और 500 करोड़ 10 साल के लिए। जुलाई के आखिर में भी ₹1000 करोड़ लिया गया था। कुल मिलाकर ढाई साल में कॉन्ग्रेस सरकार ने ₹37,739 करोड़ का कर्ज चढ़ा लिया
तुलना करें तो भाजपा की 2017-22 वाली सरकार ने पूरे पाँच साल में ₹30 हजार करोड़ लिया था। अब प्रदेश का कुल कर्ज एक लाख करोड़ पार कर गया। वित्त मंत्रालय की सीमा है कि दिसंबर तक 7 हजार करोड़ और कर्ज लिया जा सकता है, लेकिन अगस्त तक ही ₹6700 करोड़ की लाइन लग चुकी। बाकी ₹300 करोड़ के साथ वित्त वर्ष खत्म हो जाएगा। केंद्र से राहत की उम्मीद है, लेकिन फिलहाल तो हालत पतली है।
जनता और सरकारी कर्मचारियों पर पड़ रहा बोझ
हिमाचल प्रदेश के इस कर्ज का बोझ सीधे जनता और कर्मचारियों पर पड़ रहा है। सरकारी कर्मचारियों को मई में घोषित 3 फीसदी महँगाई भत्ता (डीए) अब जाकर घोषित किया गया है। कब मिलेगा, पता नहीं। विकास कार्य ठप पड़े हैं। सड़कें टूटी हैं, पुल निर्माण लटके हैं। ठेकेदारों के बिल अटके हैं।
जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने तो चेतावनी ही दे दी। एक ठेकेदार शशि ठाकुर की याचिका पर कोर्ट ने कहा कि बकाया न चुकाने पर अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल घोषित कर देंगे। मामला 2022 का है – 13.88 लाख का बिल और 18 फीसदी ब्याज। सरकार ने माना कि पैसा देना है, लेकिन खजाने में कमी का रोना रोया। कोर्ट ने बार-बार समय दिया, लेकिन भुगतान नहीं किया। हिमाचल सरकार ने 2022-23 में 2376 लाख के टेंडर दिए थे, बजट सिर्फ 357 लाख का ही रखा गया था। ठेकेदार परेशान हैं, लेकिन सुक्खू सरकार बहानेबाजी में मस्त है।
कर्मचारियों का हाल तो और बुरा। आउटसोर्स वाले तो तरस रहे हैं। 16 अक्टूबर 2025 की खबर आई कि दिवाली से पहले ठेकेदारों को 10 लाख तक पेमेंट मिलेगा। लेकिन कुल 800 करोड़ का बकाया अभी भी लटका है। ये वो लोग हैं जो स्कूलों, अस्पतालों में काम करते हैं। उनका मानदेय महीनों से अटका है। सरकार कहती है कि कोशिश कर रही, लेकिन कर्ज ही तो सहारा है। ये अलग बात है कि सुक्खू सरकार ने कर्ज लेने में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
रोडवेज का हाल बेहाल, कई रूट बंद
हिमाचल रोडवेज का तो हाल देखिए। 29 अप्रैल 2025 से निगम ने रूट बंद करने की कवायद शुरू कर दी। आर्थिक संकट में बसें कम, घाटा ज्यादा। 31 डिपो, 2684 रूट, 3871 बसें रोज 5.60 लाख किलोमीटर दौड़ती हैं। लेकिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा वाले रूट घाटे में हैं। पहले ही 6 रूट बंद हो चुके – दिल्ली और हरिद्वार के। अब रोडवेज के लोग डाटा जुटा रहे हैं कि कौन से रूट मर्ज हों, कौन बंद। दो साल में 52 नए रूट शुरू हुए हैं, लेकिन 88 बंद भी कर दिए गए। ग्रामीण क्षेत्र इससे बेहद प्रभावित हैं।
मंदिरों के पैसों पर भी सरकार की नजर
और तो और सरकार ने मंदिरों की नजर कर ली। फरवरी 2025 में भाषा एवँ संस्कृति विभाग ने 35 बड़े मंदिरों को पत्र लिखा। सुखाश्रय और सुख शिक्षा योजना के लिए पैसे माँगे-जरूरतमंद बच्चों की मदद के नाम पर। डीसी ने भी पत्र जारी किए। लेकिन अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया। 14 अक्टूबर को जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और राकेश कैंथला की बेंच ने दान की राशि पर सख्त निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने कहा, “धन देवता का है, सरकार का नहीं।”
कोर्ट ने साफ कहा कि दान वेद-योग की शिक्षा, गुरुकुल, पुजारी प्रशिक्षण, अंतर्जातीय विवाह बढ़ावा, नेत्र शिविर, गौशाला, वृद्धाश्रम पर खर्च हो। यज्ञशाला, संस्कार हॉल बनें। लेकिन सड़क-पुल, सरकारी योजनाएँ, होटल-मॉल, वीआईपी गिफ्ट्स पर सख्त पाबंदी लगा दी।
कुल मिलाकर हिमाचल में दोहरी तस्वीर। एक तरफ माननीयों की मौज, दूसरी तरफ जनता का रोना। क्या ये बढ़ोतरी विकास लाएगी या बोझ बढ़ाएगी? आने वाले दिनों में विधानसभा सत्र में ये मुद्दा गरमाएगा। फिलहाल दिवाली के तोहफे में नेताओं को खुशी तो मिल ही रही है। बाकी हिमाचल की जनता सोच रही – सरकार कब सुनेगी हमारी?


