कनाडा के टोरंटो (ओंटारियो) स्थित फेडरल कोर्ट ने शनिवार (6 सितंबर 2025) को भारतीय नागरिक प्रदीप सिंह का शरण का दावा खारिज कर दिया। दरअसल, प्रदीप सिंह नवंबर 2024 में वर्क परमिट खत्म होने के बाद कनाडा में रुकने के लिए शरण दिए जाने का दावा कर रहा था।
कोर्ट के दस्तावेजों के अंश साझा करने वाले पत्रकार OnTheNewsBeat के अनुसार, प्रदीप सिंह फरवरी 2023 में ‘स्पाउस वर्क परमिट’ पर कनाडा पहुँचा था।
वर्क परमिट खत्म होने के बाद प्रदीप ने एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने के बजाय शरण का दावा किया। लेकिन उसका आवेदन ‘इमीग्रेशन एंड रिफ्यूजी प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत खारिज कर दिया गया था।
गौरतलब है कि 2014 से 2019 के बीच वह ऑस्ट्रेलिया में भी शरण लेने की कोशिश कर चुका था। सिंह ने इस बार भी वही चाल चलने की कोशिश की और खालिस्तान कार्ड खेलते हुए दावा किया कि भारत लौटने पर उसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा।
16 नवंबर 2024 को दाखिल किया गया शरण का यह दावा पहले की कोशिशों के आधार पर तुरंत खारिज कर दिया गया। फरवरी 2025 में प्रदीप सिंह को Pre-Removal Risk Assessment (PRRA) के लिए आवेदन करने की सूचना दी गई।
यह प्रक्रिया कनाडा में निर्वासन का सामना कर रहे लोगों को आखिरी अवसर देती है कि वे नए सबूत पेश करें और साबित करें कि अपने देश लौटने पर उन्हें जान का खतरा, यातना या अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ेगा।
प्रदीप सिंह ने PRRA का विकल्प अपनाया लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका आवेदन भी खारिज हो गया। 25 अगस्त को कनाडा बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) ने उसे सूचना दी कि 8 सितंबर 2025 को निर्वासित कर दिया जाएगा।
प्रदीप सिंह ने अदालत में Application for Leave and Judicial Review (ALJR) दाखिल कर निर्वासन टालने की कोशिश की लेकिन 2 सितंबर 2025 को यह भी खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने नोट किया कि प्रदीप सिंह ने अपने पक्ष में हलफनामे और दस्तावेज जमा किए थे। यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने भी संयुक्त हलफनामा दिया। लेकिन अधिकारियों ने पाया कि इसमें किसी भी ठोस घटना, कथित धमकियों या गिरफ्तारी की परिस्थितियों का ब्योरा नहीं था।
इसके बजाय, कनाडाई अधिकारियों ने सोशल मीडिया से जुटाए सबूत पेश किए, जिनसे पता चला कि सिंह भारत में किसान आंदोलन से जुड़ा था और कनाडा में लगातार खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल था। यही कारण रहा कि अदालत ने उसके हलफनामों को महत्व न देकर ऑनलाइन गतिविधियों और सार्वजनिक संबंधों को निर्णायक माना।
पुराना है कथित शरणार्थियों का यह पैटर्न
प्रदीप सिंह के दावे को खारिज किए जाने से एक पुराना और परिचित तरीका फिर सामने आया है। बहुत से पंजाबी युवक, जो स्किल्ड कैटेगरी में कानूनी रूप से विदेश नहीं जा पाते, वे शरण (asylum) का रास्ता चुनते हैं। इसके लिए वे अक्सर तथाकथित खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।
इस रणनीति के दो रूप होते हैं। कुछ लोग खुद को बाहर से खालिस्तान समर्थक दिखाते हैं ताकि यह साबित कर सकें कि भारत में उन्हें धार्मिक और राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कुछ वास्तव में खालिस्तानी विचारधारा के समर्थक होते हैं और उसी आधार पर शरण पाने की कोशिश करते हैं।
इसका तर्क सीधा है वे खुद को खालिस्तान आंदोलन से जुड़े उत्पीड़न का शिकार बताते हैं और पश्चिमी देशों से सहानुभूति की उम्मीद करते हैं, क्योंकि ये देश अक्सर खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक बताते हैं।
कई बार ये दावे सफल भी हो जाते हैं, जैसे कि मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर के मामले में हुआ। लेकिन सिंह का केस यह दिखाता है कि हर कोशिश कामयाब नहीं होती। अगर कोई बार-बार अलग-अलग देशों में दावा करे, सबूत न दे पाए या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियाँ उसके असली इरादों को उजागर कर दें और यह लगे कि वह सिर्फ मौके का फायदा उठाना चाहता है, तो उसकी पूरी कहानी तुरंत कमजोर पड़ जाती है।
‘खालिस्तान कार्ड’ और उसके समर्थक
शरण लेने की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना कोई नई बात नहीं है। पंजाब में तो यह एक तरह की इंडस्ट्री बन चुकी है। यहाँ के एजेंट युवाओं को सिखाते हैं कि किस तरह उत्पीड़न की झूठी कहानी तैयार करनी है, कौन-से शब्द इस्तेमाल करने हैं, विदेशों में किन संगठनों से संपर्क करना है, और कैसे हलफनामे (affidavits) जुटाने हैं।
इसके बाद कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में वकील इन्हें शरण याचिका (asylum petition) में बदल देते हैं और इसके लिए मोटी रकम वसूलते हैं।
यह समस्या दो तरफा है। एक तरफ तो झूठे दावों के जरिए विदेशी धरती पर टिकने का रास्ता बनाया जाता है और दूसरी तरफ खालिस्तान आंदोलन के असली समर्थक जिनमें से ज्यादातर या तो घोषित आतंकवादी हैं या आतंक के हमदर्द भारत की कानून व्यवस्था से बचकर कनाडा जैसे देशों में पनाह पा जाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों को सौंपने (extradition) की संधि होने के बावजूद कनाडा ने भारत की बार-बार की गई माँगों को खालिस्तान समर्थकों के मामले में नजरअंदाज़ किया है।
सोशल मीडिया पर कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई युवा खुलेआम खालिस्तानी आतंकियों की प्रशंसा करते हैं, अलगाववादी प्रोपेगेंडा चलाते हैं और सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे संगठनों की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं, जिसे भारत में आतंकी संगठन घोषित किया गया है। इसके बावजूद, इन देशों की सरकारें अक्सर इन्हें सुरक्षा देती हैं, जबकि यह उनके लिए भी खतरे का कारण बन सकता है।
शरण की व्यवस्था और उसका दुरुपयोग
सिद्धांत के तौर पर देखें तो शरण देने का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना है जिन्हें अपने देश में सचमुच उत्पीड़न, हिंसा, यातना या मौत का खतरा हो। यह अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित एक मानवीय व्यवस्था है। लेकिन जब इस सिस्टम का बार-बार दुरुपयोग किया जाता है, तो यह कमजोर पड़ने लगता है।
झूठे दावों के कारण असली पीड़ितों को सुरक्षा मिलने में देरी होती है। साथ ही, जब शरण लेने की कहानी उग्रवादी विचारधारा पर आधारित हो, तो यह मेजबान देश के लिए भी सुरक्षा का बड़ा खतरा बन जाता है। कनाडा इसका ताजा उदाहरण है।
खालिस्तानी आंदोलन को समर्थन देकर उसने न सिर्फ अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाला है, बल्कि भारत जैसे दोस्ताना देश के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते भी खराब कर लिए हैं। इस तरह के फैसलों का असर सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर परिणाम लेकर आता है।
कनाडा में पंजाबी युवाओं के शरण लेने के दावे
कनाडा को सालों से बड़ी संख्या में पंजाबी युवाओं के शरण से जुड़े दावों का सामना करना पड़ा है। ये दावे अक्सर इस आधार पर किए जाते हैं कि उन्हें खालिस्तान समर्थक होने के शक में भारत में उत्पीड़न झेलना पड़ सकता है। कई मामलों में ये दावे सफल भी हो जाते हैं।
पूर्व संगरूर सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने तो यहाँ तक दावा किया था कि उन्होंने हजारों लोगों को आश्रय के लिए समर्थन पत्र जारी किए। कहा जाता है कि इनमें से कई पत्र पैसे लेकर दिए गए थे। इन पत्रों में आवेदकों को सरकारी दमन का संभावित शिकार दिखाया जाता था, ताकि उनका दावा मजबूत लगे और कागजी सबूत भी तैयार हो जाएँ।
प्रदीप सिंह का मामला एक चेतावनी
प्रदीप सिंह का मामला कोई अनोखा नहीं है, बल्कि वही पुराना पैटर्न दोहराता है, अस्थायी वीजा पर आना, वीजा की अवधि खत्म होने के बाद शरण का दावा करना, खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करना और अंत में दावे का खारिज होना।
हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि फेडरल कोर्ट हमेशा इन दावों को पूरी तरह नकार देती है। कई बार तकनीकी वजहों से कुछ मामले बच भी जाते हैं। हाल ही में टोरंटो फ़ेडरल कोर्ट ने कई केसों में अलग-अलग फैसले दिए हैं, जैसे गुरचरण सिंह के मामले को मौखिक गवाही में खामियों के चलते दोबारा सुनवाई के लिए भेजा गया, इकबाल सिंह ढिल्लोंवाल का केस CBSA की अहम रिपोर्ट नजरअंदाज होने के कारण वापस भेजा गया, जबकि अमनदीप सिंह और कंवलदीप कौर के खालिस्तान-आधारित दावे को झूठा मानते हुए खारिज कर दिया गया।
इन उदाहरणों से साफ है कि खालिस्तान से जुड़े दावों की कहानी अब भी जिंदा है और हर मामले में नतीजा अलग-अलग निकल सकता है। पर्दीप सिंह के मामले में कनाडाई अधिकारियों ने यह भी बताया कि उसने पहले ऑस्ट्रेलिया में भी आश्रय का दावा किया था, जिससे यह साफ हो गया कि उसकी कोशिश कोई एक बार की नहीं थी, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा थी। अब उसके हिस्से में डिपोर्टेशन आया है, लेकिन खालिस्तानी समर्थक उसके मामले को बहाना बनाकर नीतियों में बदलाव के लिए दबाव बनाने की कोशिश जरूर करेंगे।
निष्कर्ष
पर्दीप सिंह का असफल आश्रय दावा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। पिछले दो महीनों में ही इसी तरह के तीन मामलेन सामने आए हैं, जो दिखाते हैं कि आज की प्रवासन (migration) राजनीति में खालिस्तान कार्ड एक रणनीति भी बन गया है और एक बोझ भी। कई लोग अलग-अलग देशों में बार-बार शरण का दावा करते हैं, अलगाववादी कहानियों का सहारा लेते हैं और खुद को उत्पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। यह अब एक जाना-पहचाना पैटर्न बन चुका है।
दिक्कत यह है कि जब ऐसे लोग सिस्टम से खिलवाड़ करते हैं, तो असली पीड़ित, जिन्हें सचमुच जान का खतरा है और जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनकी आवाज दब जाती है और उनका हक पीछे छूट जाता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)