Home Blog Page 198

दाता त्रयनाथ को बनाया अब्दुल रहमान, लक्ष्मी बनी सलमा: UP के देवरिया में ‘छांगुर पीर’ जैसा धर्मांतरण का सिंडिकेट, उस्मान गनी अपने मॉल के कर्मियों को बना रहा था मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में एक बड़े धर्मांतरण सिंडिकेट का खुलासा हुआ है, जिसकी तुलना छांगुर पीर के मामले से की जा रही है। इस सिंडिकेट का मुख्य सरगना उस्मान गनी बताया जा रहा है। वह SS मॉल और EG मार्ट का संचालक है।

SS मॉल का मालिक उस्मान गनी, उसकी बीवी तरन्नुम और साले गौहर अली पर उसी मॉल में काम करने वाली एक युवती ने धर्मांतरण और यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में FIR दर्ज है, लेकिन अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी। वहीं, अब सामने आया है कि रविवार (14 सितंबर 2025) को उस्मान गनी और उसकी बीवी दोनों मॉल में ताला बंद कर फरार हो गए हैं।

फिलहाल पुलिस दोनों आरोपितों को गिरफ्तार करने के लिए जगह-जगह दबिश दे रही है। इसी बीच EG मार्ट का एक नया मामला सामने आया है। यहाँ काम करने वाले दाता त्रयनाथ मद्धेशिया नाम के कर्मचारी ने अपने पूरे परिवार के साथ इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है। अब वह अब्दुल रहमान बन चुका हैं। इस बात की पुष्टि ग्राम प्रधान राम नारायण गुप्ता और एडवोकेट विजय तिवारी ने की है।

एक और खुलासे के तहत यह भी सामने आया है कि खुखुंदू थाना क्षेत्र के रहने वाले उमेश सिंह की बेटी लक्ष्मी सिंह को उस्मान गनी के साले गौहर अली ने बहलाकर निकाह किया और धर्म बदलवाकर उसका नाम सलमा रख दिया। इस मामले में गौहर अली को जेल भेज दिया गया है। लक्ष्मी के पिता का कहना है कि उनकी बेटी को गुमराह किया गया है और अब वह उसी का साथ दे रही है।

आरोप है कि ये लोग युवतियों को लग्जरी लाइफ का लालच देकर व्यापारियों को सप्लाई करते थे। वहीं अब पीड़ित परिवारों को धमकियाँ भी दी जा रही हैं। मामले में सदर विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने कहा है कि जिले में छांगुर पीर जैसे सिंडिकेट को पनपने नहीं दिया जाएगा।

उन्होंने जिला प्रशासन को सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं और SS मॉल और EG मार्ट की जाँच की माँग की जा रही है। पिछले कुछ दिनों से लगातार खुलासों के बाद अब SS मॉल और EG मार्ट पर स्थानीय लोगों द्वारा भी जाँच की माँग उठाई जा रही है। विधायक के अनुसार, उस्मान गनी, उसकी बीवी और साले, सभी इस धर्मांतरण गिरोह में शामिल हैं और सुनियोजित तरीके से काम कर रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों के बाद ईसाई मिशनरियों को खुश करने में जुटी सिद्धारमैया सरकार, धर्मांतरण की साजिशों को दी ‘क्लीन चिट’: कर्नाटक CM ने कहा- हिंदुओं में नहीं समानता

इस्लामी कट्टरपंथियों को लेकर कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार का रुख तो लंबे वक्त से साफ रहा है। आरक्षण से लेकर मुस्लिम कॉलोनियाँ बनाने तक तुष्टिकरण के लिए वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। अब उनका प्रेम ईसाई मिशनरियों पर उमड़ता दिख रहा है।

कुछ दिनों पहले बेंगलुरु में शिवाजी नगर मेट्रो स्टेशन का नाम सेंट मेरी बेसिलिका के नाम पर रखने की घोषणा करने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को अब हिंदू धर्म में सारी खामियाँ नजर आने लगी हैं। हिंदुओं के धर्मांतरण की जो साजिश चल रही है, उसे सिद्धारमैया ने जाति व्यवस्था से जोड़ दिया है। उन्हें हिंदू धर्म में असमानता की बात भी दिखने लगी है।

सिद्धारमैया ने क्या कहा?

सिद्धारमैया ने धर्मांतरण पर अपनी बात रखते हुए बड़ी सफाई से यह बताने की कोशिश की है कि जो लोग धर्मांतरण करते हैं वो असल में व्यवस्थाओं से परेशान हैं। उन्होंने कहा, “भले ही हम कहें कि धर्मांतरण मत करो लेकिन कुछ लोग व्यवस्था के कारण ऐसा करते हैं। हमारे हिंदू समुदाय में, अगर समानता और समान अवसर होते, तो कोई धर्मांतरण क्यों करता?”

उन्होंने आगे कहा कि क्या हिंदू समाज ने छुआ छूत नहीं बनाई। कर्नाटक सीएम ने कहा, “इस्लाम या ईसाई धर्म या किसी अन्य धर्म में भी असमानताएँ हो सकती हैं। हमने या बीजेपी ने किसी को धर्मांतरण करने के लिए नहीं कहा, यह लोगों का अधिकार है और वह अपने मन से ऐसा करते हैं।”

क्या वाकई समानता और समान अवसर ना होने के चलते हो रहा धर्मांतरण?

सिद्धारमैया ने धर्मांतरण पर हिंदुओं को लेकर जो आसानी से कह दिया और जो असमानता की बात उन्होंने कह दी है। उस पर क्या वो किसी और मजहब से सवाल पूछ पाएँगे। जाहिर है, ऐसा नहीं होगा। क्योंकि उनके लिए हिंदुओं पर सवाल उठाना एक आसान टार्गेट है।

अब आते हैं समानता और समान अवसरों से धर्मांतरण पर, क्या ईसाई या मुस्लिम समाज पूरी तरह समानता और अवसरों से भरे हुए हैं? वहाँ भी जातीय, वर्गीय और आर्थिक भेद साफ-साफ दिखते हैं। फिर भी क्या दुनिया में उनका धर्मांतरण उस स्तर पर होता है?

इतिहास गवाह है कि मध्यकालीन आक्रांताओं का दौर रहा हो या ब्रिटिश हुकूमत के दौर में मिशनरियों का अभियान, उस दौरान में जो धर्मांतरण हुए वे राजनीतिक या आर्थिक दबाव के कारण हुए थे। गरीबों और वंचितों को शिक्षा, स्वास्थ्य और पैसे का लालच देकर धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया गया।

वहीं, अगर समान अवसर की बात करें तो यह संवैधानिक तौर पर सरकार का काम है कि वो लोगों को समान अवसर दे। अगर समान अवसर ना मिलने के कारण लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर होना पड़ रहा है तो इसके लिए उनकी खुद की सरकार कितनी जिम्मेदार है?

सिद्धारमैया का बयान ‘मिशनरियों और कट्टरपंथियों को क्लीन चिट’

यह बयान जिस तरह से दिया गया है वह बहुत खतरनाक है। सिद्धारमैया का यह तर्क उन मिशनरियों और कट्टरपंथी संगठनों को खुला लाइसेंस देने जैसा है जो दशकों से गरीबों, दलितों और वंचितों को लालच और झूठे वादों के जरिए हिंदू समाज से तोड़ने में लगे हुए हैं।

क्या यह सच नहीं कि ईसाई मिशनरियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और सहायता के नाम पर गरीबों को पहले निर्भर बनाती हैं और फिर मजबूरी के हालात में धर्मांतरण करवा लेती हैं? क्या यह सच नहीं कि इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों द्वारा ‘लव जिहाद’ और पैसों के लालच से हजारों युवतियों और परिवारों को फँसाया गया है?

समाज के तौर पर अगर कुछ कमियाँ हैं भी तो क्या उन्हें ठीक नहीं करने की कोशिशें हुई हैं? क्या मुस्लिम या ईसाई बनना ही इसका समाधान है? हिंदुओं ने सुधार के लिए जितना काम किया है, उतना किसी अन्य पंथ ने नहीं किया होगा।

आज करोड़ों दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले लोग हिंदू समाज में ही रहते हुए राजनीति, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में ऊँचाइयों तक पहुँचते हैं। देश के शीर्ष पदों पर आसीन लोगों से इसका साफ पता चलता है।

आज जरूरत है कि ऐसे नेताओं की बयानबाजी को बेनकाब किया जाए। अगर हिंदू समाज की कुछ कमियाँ हैं, तो उनका हल समाज-सुधार और शिक्षा है, न कि धर्मांतरण। हर बार हिंदू धर्म को कठघरे में खड़ा करके मिशनरियों को क्लीन चिट देना, असल में राष्ट्र और संस्कृति पर सीधा हमला है।

10% मुस्लिमों के दम पर भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की साजिश, RSS-PM मोदी का जिक्र: जानें महबूब आलम की गिरफ्तारी से चर्चा में आए PFI के ‘इंडिया विजन 2047’ की कहानी

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने शनिवार (14 सितंबर 2025) को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के बिहार राज्य अध्यक्ष महबूब आलम उर्फ महबूब आलम नदवी को गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई 2022 के फुलवारीशरीफ़ आपराधिक साजिश मामले से जुड़ी हुई है।

महबूब आलम, जो बिहार के कटिहार जिले के हसनगंज इलाके के रहने वाले हैं, उनको किशनगंज से पकड़ा गया। वह इस मामले में गिरफ्तार और चार्जशीट किए गए कुल 26 आरोपितों में से 19वें व्यक्ति हैं। यह केस PFI की उन गतिविधियों से जुड़ा है, जिनका मकसद धार्मिक नफरत फैलाकर समाज में डर और आतंक का माहौल बनाना और देश विरोधी साजिशों को अंजाम देना था।

NIA के मुताबिक, यह मामला शांति और सौहार्द बिगाड़ने, लोगों में असंतोष फैलाने और देश के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देने से जुड़ा है। यह मुकदमा सबसे पहले स्थानीय पुलिस ने 26 संदिग्धों के खिलाफ दर्ज किया था। एजेंसी ने बताया कि आरोपित अवैध और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल थे, जिनका लक्ष्य था, धार्मिक उन्माद भड़काना, समाज में अशांति फैलाना और हिंसा को हथियार बनाकर अपने मकसद पूरे करना।

जाँच एजेंसी ने खुलासा किया कि महबूब आलम और दूसरे आरोपित PFI के उस विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे, जिसे 11 जुलाई 2022 को फुलवारीशरीफ़ स्थित अहमद पैलेस से बरामद किया गया था। इसी दस्तावेज में संगठन की गुप्त योजना का जिक्र था।

NIA ने बताया कि महबूब आलम इस साजिश का हिस्सा था और उसने भर्ती, ट्रेनिंग, बैठकों और अन्य देशविरोधी गतिविधियों में भाग लिया। इतना ही नहीं, उसने फंड भी जुटाया और इसे अपने साथियों और PFI कार्यकर्ताओं तक पहुँचाया। एजेंसी ने कहा कि इस मामले की जाँच BNS और UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत जारी है।

जाँच में पता चला कि आलम और उसके साथी एक गुप्त विजन डॉक्यूमेंट पर काम कर रहे थे। इसका नाम इंडिया विजन 2047 था।

क्या है इंडिया विजन 2047

बिहार पुलिस ने जुलाई 2022 में आठ पन्नों का एक दस्तावेज जब्त किया था। जिस दस्तावेज का मकसद साफ था, वे 2047 तक भारत में इस्लामी शासन स्थापित करने की योजना बना रहे थे। इसमें कहा गया कि अगर कुल मुस्लिम आबादी का मात्र 10% भी उनका साथ दे दे तो वे बहुसंख्यक समुदाय को दबाकर अपना वर्चस्व कायम कर लेंगे।

डायरेक्ट रोडमैप में भर्ती और प्रशिक्षण पर जोर था। खासकर एक PE विंग बनाकर उन्हें तलवार, डंडे और अन्य हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि आक्रमक व रक्षात्मक दोनों काम कर सकें। साथ ही सरकारी विभागों, कोर्ट, पुलिस और सेना में विश्वासी मुसलमान घुसाने की रणनीति बताई गई थी। दस्तावेज ने विरोधियों को अलग-थलग करने और जरूरत पड़ी तो हटा देने तक की बात कही थी।

PFI का डॉक्यूमेंट

रणनीति में मीडिया-आउटरीच, हर इलाके में PFI की मौजूदगी और संघ या परिवार के नेताओं के खिलाफ जानकारी इकट्ठा करने जैसे कदम भी बताए गए थे। आखिरी हिस्से में कहा गया कि सीधी लड़ाई की स्थिति में विदेशों, खासकर तुर्की जैसे मित्र इस्लामी देशों से मदद ली जाएगी।

इस दस्तावेज में लिखा था कि 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना है। इस दस्तावेज में पीएम मोदी पर हमले की साजिश का भी जिक्र था। दस्तावेज में साफ लिखा था कि सिर्फ 10% मुस्लिमों की मदद से भी ‘कायर हिंदुओं’ को दबाया जा सकता है।

योजना में विदेशी इस्लामी देशों, खासकर तुर्की से मदद लेकर भारत के खिलाफ हथियारबंद विद्रोह खड़ा करने की बात थी। इसके बाद NIA ने 17 राज्यों में छापेमारी की। इसमें बम बनाने के मैनुअल, ट्रेनिंग मॉड्यूल, विजन 2047 डॉक्यूमेंट और एक सीडी जब्त की गई।

इन सबका मकसद था भारत में दहशत फैलाना और इस्लामी शासन थोपना। इन खुलासों के बाद सितंबर 2022 में केंद्र सरकार ने PFI और उसके सहयोगी संगठनों पर 5 साल का बैन लगा दिया।

सरकार ने साफ कहा कि ये सभी संगठन यूएपीए कानून के तहत अवैध गतिविधियों में शामिल हैं। बैन किए गए संगठनों में ऑल इंडिया इमाम्स काउंसिल, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI), रहाब इंडिया फाउंडेशन, NCHRO, नेशनल वीमेन फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रहाब फाउंडेशन, केरल भी शामिल हैं।

सेलिब्रिटी के लिए अलग नियम नहीं हो सकते: गुजरात HC ने यूसुफ पठान के सरकारी जमीन पर कब्जे को बताया ‘अवैध’, जानें क्या है वडोदरा में TMC सांसद के प्लॉट हड़पने का मामला

गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में पूर्व क्रिकेटर और टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की जमीन विवाद से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस मौना भट्ट की सिंगल बेंच ने पठान को सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारी घोषित किया।

दरअसल, वडोदरा नगर निगम ने यूसुफ पठान को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने के आरोप में नोटिस भेजा था। इसके बाद पठान ने नगर निगम के नोटिस और राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

ऑपइंडिया के पास मौजूद आदेश की कॉपी में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यूसुफ पठान द्वारा सरकारी जमीन पर कब्जा करना अवैध और जबरदस्ती है और इसे किसी भी हालत में वैध नहीं माना जा सकता।

मामले का इतिहास

यह मामला 2012 से शुरू हुआ। यूसुफ पठान ने अपने बंगले के पास 978 वर्ग मीटर का प्लॉट नंबर 90 को 99 साल की लीज पर लेने के लिए वडोदरा नगर निगम में आवेदन दिया। नगर आयुक्त और निगम की स्थायी समिति ने इसे मंजूरी दी। 8 जून 2012 को निगम की आम सभा ने भी प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

चूँकि यह जमीन बिना सार्वजनिक नीलामी के दी जानी थी, इसलिए इसे राज्य सरकार के पास भेजा गया। सरकार ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बावजूद यूसुफ पठान ने जमीन पर कब्जा कर लिया।

वीएमसी ने तुरंत कार्रवाई नहीं की लेकिन 2024 में विवाद फिर चर्चा में आया और निगम ने पठान को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा। इसके बाद यूसुफ पठान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

यूसुफ पठान के क्या हैं तर्क?

पठान के वकील ने कहा कि नगर निगम एक स्वतंत्र निकाय है और अधिनियम 1949 के तहत निगम आयुक्त को जमीन पट्टे पर देने का अधिकार है। राज्य सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। उन्होंने संविधान के 74वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों में राज्य का हस्तक्षेप उचित नहीं है।

यूसुफ पठान ने यह भी कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और सांसद हैं, जमीन का मौजूदा बाजार मूल्य चुकाने को तैयार हैं और निगम ने 12 साल तक कोई आपत्ति नहीं जताई, इसलिए उनका कब्जा वैध मानना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित जमीन उनके बंगले के पास है, इसलिए सुरक्षा का मामला भी है।

सरकार और निगम का तर्क

नगर निगम और सरकार के वकील ने कहा कि किसी को भी सरकारी या निगम की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है। जमीन बिना नीलामी के दी जानी थी, इसलिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी। पठान ने चारदीवारी बनाकर कब्जा कर लिया जबकि कोई औपचारिक आदेश नहीं था।

सरकार ने यह भी कहा कि पठान ने निगम को एक भी रुपया नहीं दिया और सुरक्षा का कोई सबूत भी नहीं पेश किया। निगम ने अदालत से कहा कि अगर पठान सचमुच जमीन चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक नीलामी में हिस्सा लेना चाहिए, जैसा हर नागरिक करता है।

हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस मौना भट्ट ने कहा कि 9 जून 2014 को राज्य सरकार ने जमीन का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसके बाद यूसुफ पठान का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को भी जमीन पर अधिकार नहीं मिल जाता।

कोर्ट ने पठान के बाजार मूल्य चुकाने की दलील भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यूसुफ पठान जैसी हस्तियाँ और सांसद समाज के आदर्श होते हैं और उनसे आम नागरिकों से अधिक कानून का पालन करने की उम्मीद होती है। कानून तोड़ने के बाद भी विशेष सुविधाएँ मिलें, तो समाज को गलत संदेश जाएगा।

अदालत ने यह भी कहा कि निगम की लापरवाही यूसुफ पठान को लाभ नहीं पहुँचा सकती। अंतिम आदेश में याचिका खारिज कर दी गई और कहा गया कि जमीन पर अवैध कब्जा तुरंत हटाना चाहिए। नगर निगम को आदेश दिया गया कि कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। यूसुफ पठान का कब्जा अवैध था और इसे कोई भी विशेष दलील वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रसिद्धि या पद से कानून पर अलग नियम नहीं हो सकते हैं।

UP में किसानों की डिजिटल क्रांति, योगी सरकार सोशल मीडिया से सीधे अन्नदाताओं तक पहुँचाएगी खेती से जुड़ी जानकारी: ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

उत्तर प्रदेश सरकार अब राजस्थान की तरह इंटरनेट मीडिया का उपयोग कर किसानों को तकनीकी जानकारी, मौसम की जानकारी, कृषि सलाह और बाजार की स्थिति जैसे जरूरी अपडेट देने की तैयारी में है।

राजस्थान में वाट्सऐप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग करके कृषि से जुड़ी जानकारी सीधे किसानों तक पहुँचाई जा रही है। वहाँ किसानों के वाट्सएप ग्रुप बनाए गए हैं जिनमें स्थानीय अधिकारी और कृषि विशेषज्ञ भी जुड़े होते हैं। इससे किसानों की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जा रहा है।

वहीं, यूट्यूब चैनल के जरिए किसानों को नई तकनीकें और उपकरणों का लाइव प्रदर्शन दिखाकर जानकारी दी जाती है, जिससे वे आधुनिक खेती के तरीकों को आसानी से सीख सकें।

फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर किसानों को उपभोक्ताओं से सीधे जोड़ने की कोशिश हो रही है। इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है और किसानों को अपनी उपज का सीधा और ज्यादा मुनाफा मिलता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मॉडल की जानकारी देने के लिए हाल ही में राजस्थान के कृषि अधिकारी उत्तर प्रदेश आए थे और उन्होंने कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही को अपनी योजना की प्रस्तुति दी। मंत्री ने इस मॉडल को प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं।

अब यूपी कृषि विभाग राजस्थान के मॉडल का अध्ययन कर उसकी तर्ज पर योजना बना रहा है और जल्द ही इसके लिए एक टीम राजस्थान भेजने की तैयारी कर रहा है।

‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ को भी मिली मंजूरी

दूसरी ओर उत्तर प्रदेश सरकार अब शहरी इलाको में भी खेती को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही है। उद्यान राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने हाल ही में एक बैठक में ‘रूफ टॉप गार्डनिंग योजना’ (छत पर बागवानी) की घोषणा की है। इस योजना के तहत लोग अपने घर की छतों पर सब्जियाँ, फल, मसाले और औषधीय पौधे उगा सकेंगे।

इससे शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ेगी, पर्यावरण को फायदा होगा और लोगों को जैविक फल-सब्जियाँ घर पर ही मिलेंगी। यह तरीका खासतौर पर सीमित जगह वाले घरों के लिए बहुत फायदेमंद है। इस योजना को पहले लखनऊ, वाराणसी और गोरखपुर जैसे शहरों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा।

इसके लिए आईआईवीआर वाराणसी से तकनीकी मदद ली जा रही है और योजना को भारत सरकार से अनुमोदन दिलाने की तैयारी चल रही है। लोगों को फ्री किट और प्रशिक्षण भी दिए जाएँगे ताकि वे आसानी से इस योजना से जुड़ सकें। बैठक में अपर मुख्य सचिव बीएल मीणा और उद्यान निदेशक डॉ बीपी राम सहित कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

झूठी कहानी, उत्पीड़न का रोना और विक्टिम कार्ड: कनाडा में शरणार्थी बनने के लिए खालिस्तानी लगातार कर रहे प्रयास, प्रदीप सिंह के आवेदन को ओंटारियो कोर्ट ने नकारा

कनाडा के टोरंटो (ओंटारियो) स्थित फेडरल कोर्ट ने शनिवार (6 सितंबर 2025) को भारतीय नागरिक प्रदीप सिंह का शरण का दावा खारिज कर दिया। दरअसल, प्रदीप सिंह नवंबर 2024 में वर्क परमिट खत्म होने के बाद कनाडा में रुकने के लिए शरण दिए जाने का दावा कर रहा था।

कोर्ट के दस्तावेजों के अंश साझा करने वाले पत्रकार OnTheNewsBeat के अनुसार, प्रदीप सिंह फरवरी 2023 में ‘स्पाउस वर्क परमिट’ पर कनाडा पहुँचा था।

वर्क परमिट खत्म होने के बाद प्रदीप ने एक्सटेंशन के लिए आवेदन करने के बजाय शरण का दावा किया। लेकिन उसका आवेदन ‘इमीग्रेशन एंड रिफ्यूजी प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत खारिज कर दिया गया था।

गौरतलब है कि 2014 से 2019 के बीच वह ऑस्ट्रेलिया में भी शरण लेने की कोशिश कर चुका था। सिंह ने इस बार भी वही चाल चलने की कोशिश की और खालिस्तान कार्ड खेलते हुए दावा किया कि भारत लौटने पर उसे उत्पीड़न का सामना करना पड़ेगा।

16 नवंबर 2024 को दाखिल किया गया शरण का यह दावा पहले की कोशिशों के आधार पर तुरंत खारिज कर दिया गया। फरवरी 2025 में प्रदीप सिंह को Pre-Removal Risk Assessment (PRRA) के लिए आवेदन करने की सूचना दी गई।

यह प्रक्रिया कनाडा में निर्वासन का सामना कर रहे लोगों को आखिरी अवसर देती है कि वे नए सबूत पेश करें और साबित करें कि अपने देश लौटने पर उन्हें जान का खतरा, यातना या अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ेगा।

प्रदीप सिंह ने PRRA का विकल्प अपनाया लेकिन 15 अगस्त 2025 को उनका आवेदन भी खारिज हो गया। 25 अगस्त को कनाडा बॉर्डर सर्विस एजेंसी (CBSA) ने उसे सूचना दी कि 8 सितंबर 2025 को निर्वासित कर दिया जाएगा।

प्रदीप सिंह ने अदालत में Application for Leave and Judicial Review (ALJR) दाखिल कर निर्वासन टालने की कोशिश की लेकिन 2 सितंबर 2025 को यह भी खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने नोट किया कि प्रदीप सिंह ने अपने पक्ष में हलफनामे और दस्तावेज जमा किए थे। यहाँ तक कि उनके माता-पिता ने भी संयुक्त हलफनामा दिया। लेकिन अधिकारियों ने पाया कि इसमें किसी भी ठोस घटना, कथित धमकियों या गिरफ्तारी की परिस्थितियों का ब्योरा नहीं था।

इसके बजाय, कनाडाई अधिकारियों ने सोशल मीडिया से जुटाए सबूत पेश किए, जिनसे पता चला कि सिंह भारत में किसान आंदोलन से जुड़ा था और कनाडा में लगातार खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल था। यही कारण रहा कि अदालत ने उसके हलफनामों को महत्व न देकर ऑनलाइन गतिविधियों और सार्वजनिक संबंधों को निर्णायक माना।

पुराना है कथित शरणार्थियों का यह पैटर्न

प्रदीप सिंह के दावे को खारिज किए जाने से एक पुराना और परिचित तरीका फिर सामने आया है। बहुत से पंजाबी युवक, जो स्किल्ड कैटेगरी में कानूनी रूप से विदेश नहीं जा पाते, वे शरण (asylum) का रास्ता चुनते हैं। इसके लिए वे अक्सर तथाकथित खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करते हैं।

इस रणनीति के दो रूप होते हैं। कुछ लोग खुद को बाहर से खालिस्तान समर्थक दिखाते हैं ताकि यह साबित कर सकें कि भारत में उन्हें धार्मिक और राजनीतिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, कुछ वास्तव में खालिस्तानी विचारधारा के समर्थक होते हैं और उसी आधार पर शरण पाने की कोशिश करते हैं।

इसका तर्क सीधा है वे खुद को खालिस्तान आंदोलन से जुड़े उत्पीड़न का शिकार बताते हैं और पश्चिमी देशों से सहानुभूति की उम्मीद करते हैं, क्योंकि ये देश अक्सर खुद को अल्पसंख्यकों का रक्षक बताते हैं।

कई बार ये दावे सफल भी हो जाते हैं, जैसे कि मारे गए खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर के मामले में हुआ। लेकिन सिंह का केस यह दिखाता है कि हर कोशिश कामयाब नहीं होती। अगर कोई बार-बार अलग-अलग देशों में दावा करे, सबूत न दे पाए या सोशल मीडिया पर उसकी गतिविधियाँ उसके असली इरादों को उजागर कर दें और यह लगे कि वह सिर्फ मौके का फायदा उठाना चाहता है, तो उसकी पूरी कहानी तुरंत कमजोर पड़ जाती है।

‘खालिस्तान कार्ड’ और उसके समर्थक

शरण लेने की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना कोई नई बात नहीं है। पंजाब में तो यह एक तरह की इंडस्ट्री बन चुकी है। यहाँ के एजेंट युवाओं को सिखाते हैं कि किस तरह उत्पीड़न की झूठी कहानी तैयार करनी है, कौन-से शब्द इस्तेमाल करने हैं, विदेशों में किन संगठनों से संपर्क करना है, और कैसे हलफनामे (affidavits) जुटाने हैं।

इसके बाद कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में वकील इन्हें शरण याचिका (asylum petition) में बदल देते हैं और इसके लिए मोटी रकम वसूलते हैं।

यह समस्या दो तरफा है। एक तरफ तो झूठे दावों के जरिए विदेशी धरती पर टिकने का रास्ता बनाया जाता है और दूसरी तरफ खालिस्तान आंदोलन के असली समर्थक जिनमें से ज्यादातर या तो घोषित आतंकवादी हैं या आतंक के हमदर्द भारत की कानून व्यवस्था से बचकर कनाडा जैसे देशों में पनाह पा जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि अपराधियों को सौंपने (extradition) की संधि होने के बावजूद कनाडा ने भारत की बार-बार की गई माँगों को खालिस्तान समर्थकों के मामले में नजरअंदाज़ किया है।

सोशल मीडिया पर कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले कई युवा खुलेआम खालिस्तानी आतंकियों की प्रशंसा करते हैं, अलगाववादी प्रोपेगेंडा चलाते हैं और सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) जैसे संगठनों की विचारधारा को बढ़ावा देते हैं, जिसे भारत में आतंकी संगठन घोषित किया गया है। इसके बावजूद, इन देशों की सरकारें अक्सर इन्हें सुरक्षा देती हैं, जबकि यह उनके लिए भी खतरे का कारण बन सकता है।

शरण की व्यवस्था और उसका दुरुपयोग

सिद्धांत के तौर पर देखें तो शरण देने का उद्देश्य उन लोगों की रक्षा करना है जिन्हें अपने देश में सचमुच उत्पीड़न, हिंसा, यातना या मौत का खतरा हो। यह अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित एक मानवीय व्यवस्था है। लेकिन जब इस सिस्टम का बार-बार दुरुपयोग किया जाता है, तो यह कमजोर पड़ने लगता है।

झूठे दावों के कारण असली पीड़ितों को सुरक्षा मिलने में देरी होती है। साथ ही, जब शरण लेने की कहानी उग्रवादी विचारधारा पर आधारित हो, तो यह मेजबान देश के लिए भी सुरक्षा का बड़ा खतरा बन जाता है। कनाडा इसका ताजा उदाहरण है।

खालिस्तानी आंदोलन को समर्थन देकर उसने न सिर्फ अपनी सुरक्षा को जोखिम में डाला है, बल्कि भारत जैसे दोस्ताना देश के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते भी खराब कर लिए हैं। इस तरह के फैसलों का असर सिर्फ घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर परिणाम लेकर आता है।

कनाडा में पंजाबी युवाओं के शरण लेने के दावे

कनाडा को सालों से बड़ी संख्या में पंजाबी युवाओं के शरण से जुड़े दावों का सामना करना पड़ा है। ये दावे अक्सर इस आधार पर किए जाते हैं कि उन्हें खालिस्तान समर्थक होने के शक में भारत में उत्पीड़न झेलना पड़ सकता है। कई मामलों में ये दावे सफल भी हो जाते हैं।

पूर्व संगरूर सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने तो यहाँ तक दावा किया था कि उन्होंने हजारों लोगों को आश्रय के लिए समर्थन पत्र जारी किए। कहा जाता है कि इनमें से कई पत्र पैसे लेकर दिए गए थे। इन पत्रों में आवेदकों को सरकारी दमन का संभावित शिकार दिखाया जाता था, ताकि उनका दावा मजबूत लगे और कागजी सबूत भी तैयार हो जाएँ।

प्रदीप सिंह का मामला एक चेतावनी

प्रदीप सिंह का मामला कोई अनोखा नहीं है, बल्कि वही पुराना पैटर्न दोहराता है, अस्थायी वीजा पर आना, वीजा की अवधि खत्म होने के बाद शरण का दावा करना, खालिस्तान कार्ड का इस्तेमाल करना और अंत में दावे का खारिज होना।

हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं कि फेडरल कोर्ट हमेशा इन दावों को पूरी तरह नकार देती है। कई बार तकनीकी वजहों से कुछ मामले बच भी जाते हैं। हाल ही में टोरंटो फ़ेडरल कोर्ट ने कई केसों में अलग-अलग फैसले दिए हैं, जैसे गुरचरण सिंह के मामले को मौखिक गवाही में खामियों के चलते दोबारा सुनवाई के लिए भेजा गया, इकबाल सिंह ढिल्लोंवाल का केस CBSA की अहम रिपोर्ट नजरअंदाज होने के कारण वापस भेजा गया, जबकि अमनदीप सिंह और कंवलदीप कौर के खालिस्तान-आधारित दावे को झूठा मानते हुए खारिज कर दिया गया।

इन उदाहरणों से साफ है कि खालिस्तान से जुड़े दावों की कहानी अब भी जिंदा है और हर मामले में नतीजा अलग-अलग निकल सकता है। पर्दीप सिंह के मामले में कनाडाई अधिकारियों ने यह भी बताया कि उसने पहले ऑस्ट्रेलिया में भी आश्रय का दावा किया था, जिससे यह साफ हो गया कि उसकी कोशिश कोई एक बार की नहीं थी, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा थी। अब उसके हिस्से में डिपोर्टेशन आया है, लेकिन खालिस्तानी समर्थक उसके मामले को बहाना बनाकर नीतियों में बदलाव के लिए दबाव बनाने की कोशिश जरूर करेंगे।

निष्कर्ष

पर्दीप सिंह का असफल आश्रय दावा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। पिछले दो महीनों में ही इसी तरह के तीन मामलेन सामने आए हैं, जो दिखाते हैं कि आज की प्रवासन (migration) राजनीति में  खालिस्तान कार्ड  एक रणनीति भी बन गया है और एक बोझ भी। कई लोग अलग-अलग देशों में बार-बार शरण का दावा करते हैं, अलगाववादी कहानियों का सहारा लेते हैं और खुद को उत्पीड़ित दिखाने की कोशिश करते हैं। यह अब एक जाना-पहचाना पैटर्न बन चुका है।

दिक्कत यह है कि जब ऐसे लोग सिस्टम से खिलवाड़ करते हैं, तो असली पीड़ित, जिन्हें सचमुच जान का खतरा है और जिन्हें सुरक्षा की जरूरत है, उनकी आवाज दब जाती है और उनका हक पीछे छूट जाता है।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

भारतीय की निर्मम हत्या पर US मीडिया को सूंघा साँप, चार्ली किर्क से जोड़कर नेटिजन्स ने उठाए सवाल: अमेरिकी ने धड़ से काटकर कूड़ेदान में फेंका था चंद्र मौली का सिर

अमेरिका के टेक्सास में भारतीय मूल के चंद्र मौली ‘बॉब’ नागमल्लैया की गला काटकर हत्या कर दी गई। वह मूलरूप से कर्नाटक का रहने वाला था और डैलस के डाउनटाउन सूट्स मोटल में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत था। होटल में उनके सहकर्मी योडार्निस कोबोस-मार्टिनेज ने किसी बात को लेकर हुए विवाद के बाद चाकू से हमला कर दिया था। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

भारतीय नागरिक की बेरहमी से हत्या की यह घटना सोशल मीडिया पर छाई हुई है। इसके बावजूद अमेरिकी मीडिया ने घटना को लेकर खास कवरेज नहीं दी, जिससे नेटिजन्स नाराज हैं। इसके अलावा घटना के बाद अमेरिका की अप्रवासन नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं।

परिवार के सामने सिर धड़ से किया अलग

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 53 वर्षीय चंद्र मौली नागमल्लैया पर बुधवार (10 सितंबर 2025) सुबह टूटी हुई वॉशिंग मशीन के इस्तेमाल को लेकर हुए विवाद के बाद हमला किया गया। आरोपित 37 वर्षीय योर्डानिस कोबोस-मार्टिनेज ने एक चाकू निकाला और नागमल्लैया पर कई वार किए, फिर उसकी पत्नी और बेटे के सामने सिर धड़ से अलग कर दिया।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, नागमल्लैया के बेटे ने अपने पिता को बैट दिखाकर बचाने की कोशिश की लेकिन हमलावर को रोक नहीं सका। हमलावर ने बाद में कटे हुए सिर को लात मारकर पार्किंग के कूड़ेदान में डाल दिया। डलास पुलिस ने घटना के तुरंत बाद खून से लथपथ शर्ट पहने कोबोस-मार्टिनेज को गिरफ्तार कर लिया।

अमेरिकी मीडिया की चुप्पी पर उठे सवाल

इस घटना की सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना की गई और कई लोगों ने अमेरिकी मीडिया पर घटना को लेकर चुप्पी साधने के भी आरोप लगाए। ऋचा लखेरा नाम की एक एक्स यूजर ने लिखा, “इरीना जारुत्स्का और चार्ली किर्क की हत्याओं को तो खूब कवरेज मिली लेकिन भारतीय मूल के नागमल्लैया की सार्वजनिक रूप से हुई सबसे निर्मम और अमानवीय हत्या को नजरअंदाज कर दिया गया।”

ऋचा लखेरा के कमेंट का स्क्रीनशॉट

एक अन्य एक्स यूजर, इंडियन ब्रॉन्सन ने सीधे तौर पर कॉन्ग्रेसी रो खन्ना को दोषी ठहराया और उन पर आव्रजन नीतियों के परिणामों को स्वीकार करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

इंडियन ब्रॉन्सन के कमेंट का स्क्रीनशॉट

एक अन्य यूजर प्रेमानंद जॉन ने लिखा, “परिवार को अपूरणीय क्षति… मानसिक पीड़ा जीवन भर रहेगी। यह हत्या एक व्यक्तिगत त्रासदी और राजनीतिक मुद्दा दोनों बन गई है, जिसने अमेरिका में आव्रजन प्रवर्तन, अपराध और मीडिया की खामियों को उजागर किया है।”

भारतीय मूल के ‘पीड़ित’ को नहीं दिया महत्व

कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थान किसी भी अपराध को दिखाने से पहले अपराधी और पीड़ित की नस्ल देखते हैं। शायद उनके लिए भारतीय नागरिक की हत्या कोई बड़ा अपराध नहीं थी, वो भी तब जब अपराधी एक अमेरिकन हो। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि आरोपित का पहले भी अपराधिक रिकॉर्ड रह चुका है। इसके बावजूद मीडिया ने खबर को महत्व नहीं दिया।

ना भौंकते हैं कुत्ते, ना गरजते हैं बादल, ना ही कड़कती है बिजली: जानिए बद्रीनाथ धाम की शांति का रहस्य, भगवान विष्णु के लिए यहाँ प्रकृति भी रहती है मौन

उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित बद्रीनाथ धाम भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह धाम चारधाम यात्रा और हिमालयी छोटे चारधाम का भी हिस्सा है। यह स्थान भगवान विष्णु को समर्पित है, जो यहाँ ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं। इसका सम्मान यहाँ के जीव-जंतु भी रखते हैं। यहीं वजह है कि यहाँ कभी कुत्तों को भी भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ बदरी वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा। बद्रीनाथ मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में बनी हुई है और यह समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जो पद्मासन में और चार भुजाओं के साथ दिखाई देती है।

बद्रीनाथ की अनोखी विशेषताएँ

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कुछ ऐसी अद्भुत और रहस्यमयी बातें हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। पहली ये कि यहाँ कभी कुत्ते भौंकते नहीं हैं। दूसरी ये कि बिजली चमकती है लेकिन कभी कड़कती नहीं और तीसरी ये कि बादल बरसते हैं लेकिन कभी गरजते नहीं।

इन घटनाओं के पीछे कई मान्यताएँ हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु यहाँ ध्यान मुद्रा में हैं और प्रकृति भी उनके ध्यान में बाधा नहीं डालती। न बिजली की कड़क, न बादलों की गर्जना, न ही कुत्तों का भौंकना। सब कुछ शांत है, ताकि भगवान की तपस्या में कोई विघ्न न आए।

मोटिवेशनल स्पीकर और भागवताचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह बातें बिल्कुल सच हैं। बद्रीनाथ में कोई भी कुत्ता भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यताएँ:

एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने कुत्तों को श्राप दिया था कि वे इस पवित्र स्थान पर कभी नहीं भौंकेंगे। वहीं दूसरी मान्यता यह कहती है कि यहाँ के कुत्ते भगवान के सेवक हैं और उन्हें शांति से रहने का आदेश मिला हुआ है।

इसलिए बद्रीनाथ धाम न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी एक अद्वितीय स्थान है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे प्रकृति और वातावरण का पूरा सम्मान करें और इस शांति का हिस्सा बनें। स्पष्ट रूप से कहें तो बद्रीनाथ धाम वास्तव में एक ऐसा स्थान है, जहाँ हर जीव और प्रकृति भी भगवान की तपस्या में सहभागी है।

नेपाल की PM कार्की ने प्रदर्शन में जताई ‘साजिश’ की आशंका, 72 मृतकों को दिया शहीद का दर्जा और ₹10-10 लाख का मुआवजा: हिंसा में 1.5 साल के बजट के बराबर नुकसान

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के बाद अब हालात समान होने लगे हैं। देश में अंतरिम सरकार बन गई है, जिसकी प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को बनाया गया है। कार्यभार संभालने के दूसरे दिन रविवार (14 सितंबर 2025) को प्रधानमंत्री ने हिंसा में जान गवाने वाले 72 लोगों को ‘शहीद’ का दर्जा दिया और उनके परिवार को ₹10 लाख मुआवजे का ऐलान किया है।

अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने कहा, “8 सितंबर 2025 की घटना में मारे गए सभी लोगों को शहीद घोषित किया गया है और उन्हें दस-दस लाख रुपए दिए जाएँगे। घायलों का खर्च सरकार उठाएगी और उन्हें मुआवजा भी दिया जाएगा। शवों को काठमांडू से दूसरे जिलों में भेजने की व्यवस्था सरकार करेगी।”

उन्होंने आगे कहा, “हम आर्थिक संकट में हैं। हमें पुनर्निर्माण पर चर्चा और काम करना चाहिए। निजी संपत्तियाँ भी जला दी गईं। हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। सरकार उन्हें कुछ मुआवजा देने के उपायों पर काम करेगी। यह आसान ऋण या किसी अन्य उपाय के माध्यम से हो सकता है।”

इसके अलावा अंतरिम पीएम ने देश के युवाओं की माँग को ध्यान में रखते हुए भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर भी अपनी सरकार को सजग होकर काम करने के आदेश दिए हैं।

GenZ प्रदर्शन में हुई हिंसा की होगी जाँच

प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने GenZ प्रदर्शन को नेपाल के इतिहास में सबसे दुर्भाग्य घटना बताया। उन्होंने कहा कि इसकी पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है। अंतरिम पीएम ने इस हिंसा के पीछे की साजिश को उजागर करने के लिए जाँच के भी आदेश दिए हैं।

सुशीला कार्की ने कहा, “अगर इसके पीछे नेपाली लोग हैं तो हमें शर्म आनी चाहिए। यह किसी बड़ी साजिश का नतीजा हो सकता है। तोड़फोड़ की घटना में शामिल लोगों की जाँच की जाएगी। मैं और मेरी टीम यहाँ सत्ता का स्वाद चखने नहीं आए हैं। हम छह महीने से ज्यादा नहीं रुकेंगे। हम नई संसद को जिम्मेदारी सौंप देंगे। आपके सहयोग के बिना हम सफल नहीं हो पाएँगे…।”

नेपाली सरकार ने माना हिंसा में हुई 72 मौत

नेपाल की सरकार ने पुष्टि की कि GenZ प्रदर्शन के दौरान 72 लोगों की मौत हुई हैं। मुख्य सचिव एकनारायण आर्यल ने देश की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान यह आँकड़ा पेश किया।

आर्यल ने यह भी कहा कि प्रदर्शन में घायल 191 लोगों का अस्पताल में इलाज चल रहा है।

हिंसा में ₹3 लाख करोड़ का हुआ नुकसान

नेपाल में हुए GenZ प्रदर्शन की हिंसा में देश को ₹3 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। नेपाली अर्थशास्त्री ने बताया कि यह आँकड़ा देश के 1.5 साल के बजट के बराबर है। नेपाल के अर्थशास्त्री चंद्र मणि अधिकार ने कहा, “हमारे मोटे अनुमान के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 1 प्रतिशत से कम रहेगी।”

उन्होंने यह भी कहा कि यह नुकसान नेपाल में हाल ही में पड़े ‘सूखे’ से भी कहीं ज्यादा है। इसके अलावा मार्च 2026 में होने वाले चुनावों समय से दो साल पहले होने जा रहे हैं, इसमें भी ₹3000 करोड़ खर्च होने की उम्मीद है।

UAPA में जमानत पर बाहर ‘पत्रकार’ सिद्दीकी कप्पन पर केरल में FIR, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के खिलाफ पोस्ट करने वाली शीबा के समर्थन में कर रहा था रैली: 10 अन्य लोगों पर भी केस दर्ज

केरल की कोच्चि पुलिस ने पत्रकार सिद्दीकी कप्पन और 10 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इन लोगों पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर विवादित टिप्पणी करने वाली रीजास एम शीबा सिद्दीकी की गिरफ्तारी के खिलाफ बिना अनुमति के प्रदर्शन करने का आरोप है।

यह प्रदर्शन ‘रीजास सॉलिडेरिटी फोरम’ द्वारा आयोजित किया गया था और कप्पन इसमें मुख्य वक्ता था। यह कार्यक्रम हाई कोर्ट जंक्शन के पास आयोजित किया गया था।

पुलिस के अनुसार, इन सभी पर गैरकानूनी सभा, सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालना, शांति भंग करना और पुलिस से झड़प करने के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इस सभा के लिए न तो अनुमति ली गई थी और न ही साउंड सिस्टम के इस्तेमाल की मंजूरी ली गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रदर्शन में लगभग 30 लोग शामिल थे, जिन्होंने रीजास के समर्थन में नारेबाजी की। जब पुलिस ने उन्हें हटने को कहा तो कथित तौर पर झड़प हो गई और पुलिस ने बल प्रयोग करके भीड़ को हटाया। इसमें दो लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि अन्य मौके से फरार हो गए। FIR में जिन लोगों का नाम है, उनमें एडवोकेट प्रमोद पुझनकरा, सीपी राशिद, साजिद खालिद, डॉ हरी, भाबुराज भगवती, अम्बिका, मृदुला भवानी शामिल हैं।

इससे पहले बीजेपी नेताओं ने पुलिस से शिकायत की थी कि सिद्दीकी कप्पन ने अपनी जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है और इस कार्यक्रम को रोका जाना चाहिए। पूर्व DGP और बीजेपी समर्थक टी पी सेनकुमार ने फेसबुक पर लिखा, “जो राजनीतिक पार्टी इस तरह के कार्यक्रमों का विरोध करना चाहिए, वो चुप है क्योंकि कप्पन से करीबी एक व्यक्ति उस पार्टी के मुख्यालय में है। फिर ऐसे उग्रवादियों से हमें सुरक्षा कहाँ से मिलेगी?”

रीजास एम शीबा सिद्दीकी, एक छात्र कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार है, जिसे महाराष्ट्र ATS ने मई 2025 में नागपुर से गिरफ्तार किया था। उस पर ऑपरेशन सिंदूर और ऑपरेशन कगार (जो एक विरोधी-माओवादी अभियान है) के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप है।

सिद्दीकी कप्पन को अक्टूबर 2020 में हाथरस गैंगरेप केस की रिपोर्टिंग के लिए जाते समय यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ UAPA लगाया गया था। वो वर्तमान में जमानत पर बाहर हैं।