महाराष्ट्र के भिवंडी में अमेरिकी नागरिक 58 वर्षीय जेम्स वॉटसन को शुक्रवार (3 अक्टूबर 2025) को गिरफ्तार किया गया। उस पर स्थानीय हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए धर्मांतरण रैकेट चलाने का आरोप है। जिस वक्त उसे गिरफ्तार किया गया, वह महाराष्ट्र के दो लोगों के साथ मिल कर प्रार्थना सभा कर रहा था।
अमेरिकी नागरिक वॉटसन भारत में व्यावसायिक वीजा पर रह रहा था। उसकी गिरफ्तारी ठाणे के हीरानंदानी एस्टेट में एक धार्मिक सभा के दौरान हुई। वह ठाणे और पालघर जिले के जनजातीय किसानों को बहला-फुसला कर एक व्यवस्थित धर्मांतरण रैकेट चला रहा था।
जनजातीय लोगों को लालच देकर स्थानीय निवासियों ‘सैनाथ गणपति सरपे’ और ‘मनोज गोविंद कोल्हा’ के साथ मिलकर वॉटसन ‘चिंबीपाडा गाँव’ में प्रार्थना सभाओं के नाम पर हिंदू धर्म की निंदा करता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए लालच दे रहा था। इन आरोपियों ने झूठे चमत्कारी उपचार का दावा करते हुए गरीब जनजातीय समुदाय का शोषण किया।
Maharashtra Police arrests US national James Watson from Bhiwandi for luring villagers to convert to Christianity. pic.twitter.com/A7GpcMgF61
अमेरिकी नागरिक नहीं, सक्रिय सेना अधिकारी निकला जेम्स वॉटसन
गिरफ्तारी के बाद सामने आए एक बड़े खुलासे में यह बात पक्की हुई है कि जेम्स वॉटसन सिर्फ एक अमेरिकी नागरिक नहीं बल्कि अमेरिकी सेना का अधिकारी है। OpIndia की जाँच में उसके अमेरिकी सेना से कई लिंक मिले हैं, जिनसे उनकी पहचान मेजर के तौर पर हुई है।
कई सूत्रों के मुताबिक, मेजर जेम्स वॉटसन अमेरिकी सेना की 2nd Battalion, 44th Air Defence Artillery (ADA) के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर है, जो फोर्ट कैंपबेल, केंटकी में तैनात है। यह वही यूनिट है जो उसके अपने लेख के अनुसार, ऑपरेशन फ्रीडम्स सेंटिनल (Operation Freedom’s Sentinel) में आगामी तैनाती की तैयारी कर रही थी।
वॉटसन की सक्रिय सैन्य भूमिका के और भी सबूत हैं। उसने साल 2020 में “Owning the Skies, Winning the Fight” शीर्षक से एक लेख लिखा था। इस लेख में उसने अनमैन्ड एरियल सिस्टम्स (UAS) यानी ड्रोन तकनीक से जुड़ी चुनौतियों और खतरों पर विस्तार से चर्चा की थी।
(फोटो साभार- DVIDS)
वॉटसन ने बताया था कि कैसे आधुनिक तकनीक के इस युग में दुश्मन सस्ते कॉमर्शियल ड्रोन में विस्फोटक लगाकर हमले करते हैं। उन्होंने चेताया था कि इस तरह के ‘लो एंड स्लो’ यानी कम ऊँचाई पर उड़ने वाले क्वाडकॉप्टर जैसे ड्रोन आज की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं।
अपने लेख के निष्कर्ष में वॉटसन ने जोर दिया था कि एयर डिफेंस आर्टिलरी (ADA) को ड्रोन से निपटने की रणनीति पर पूरी तरह नियंत्रण रखना चाहिए।
अमेरिका के रक्षा विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सबूत
मेजर जेम्स वॉटसन की सैन्य पृष्ठभूमि का संबंध सिर्फ उसके लिखे गए लेखों तक ही सीमित नहीं है। अमेरिका के रक्षा विभाग की आधिकारिक वेबसाइट Defence Visual Information Distribution Service (DVIDS) पर वॉटसन की कई तस्वीरें और एक वीडियो क्लिप भी मौजूद हैं। इन तस्वीरों में वह अमेरिकी सेना की यूनिफॉर्म पहने दिखाई देता हैं। एक वीडियो में वो साफ-साफ कहता सुनाई देता हैं, “मैं मेजर जेम्स वॉटसन, हरलबर्ट फील्ड, फ्लोरिडा से हूँ। सेना को 246वें स्थापना दिवस की शुभकामनाएँ देता हूँ।”
भारत में अवैध धर्मांतरण गतिविधियों के आरोप में एक सक्रिय अमेरिकी सेना के मेजर की गिरफ्तारी अपने आप में गंभीर मामला है। वो बिजनेस वीजा पर भारत आया था और यह गिरफ्तारी वीजा के दुरुपयोग और अमेरिकी सेना में सेवा के दौरान उनकी गतिविधियों को लेकर भी कई बड़े सवाल खड़े करती है।
यह मामला तब सामने आया जब रवींद्र भुरकुट (27) नामक निवासी ने भिवंडी तालुका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। उसने एक घर के बाहर लगभग 30-35 ग्रामीणों को ईसाई धर्म का प्रचार करते हुए देखा।
कथित तौर पर, जेम्स हिंदू धर्म के बारे में अपमानजनक टिप्पणी कर रहा था, उसे अंधविश्वास पर आधारित धर्म बता रहा था, और कह रहा था कि ईसाई धर्म अपनाकर ही सुख और सफलता प्राप्त की जा सकती है।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
जब एक पुरुष तलाक का सामना करता है, तो उसका आर्थिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 42% पुरुष गुज़ारा भत्ता (alimony) चुकाने के लिए ऋण लेने पर मजबूर हुए हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उन हजारों पुरुषों की सच्चाई बयां करती है, जो कानूनी दायित्व निभाने के लिए अपनी बचत और सम्मान, दोनों खो रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 49% पुरुषों ने तलाक की प्रक्रिया में 5 लाख रुपए से अधिक खर्च किए जबकि कई को अपनी आर्थिक स्थिरता वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। सोचिए, एक आदमी जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी उठाता है, अचानक कर्ज में डूब जाता है। वह न केवल अपनी बचत खोता है बल्कि कई मामलों में अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर
तलाक केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों को तोड़ देता है। कई पुरुष खुद को अकेला महसूस करते हैं, और उनके आत्म-सम्मान में कमी आती है। अध्ययनों से पता चला है कि तलाक के बाद पुरुषों में अवसाद (depression) और चिंता (anxiety) की दर तेज़ी से बढ़ जाती है।
वे अक्सर सोचते हैं कि समाज में उनकी पहचान अब क्या रह गई है। यह अकेलापन और असुरक्षा उन्हें और भी गंभीर मानसिक समस्याओं की ओर धकेल देती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरुष अपनी भावनाएँ साझा नहीं कर पाते क्योंकि समाज उनसे हमेशा मज़बूत बने रहने की उम्मीद करता है।
बच्चों से दूरी: एक पिता का सबसे बड़ा दर्द
बच्चे भी इस प्रक्रिया के शिकार होते हैं। माता-पिता के बीच तनाव उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
एक पिता, जो अपने बच्चों के लिए हर संभव कोशिश करता है, अचानक खुद को उनकी ज़िंदगी से दूर पाता है। कई बार, तलाक के बाद पिता को बच्चों की कस्टडी नहीं मिलती, जिससे उनका भावनात्मक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। बच्चे भी इस स्थिति को समझ नहीं पाते और इससे उन्हें भी गंभीर मानसिक आघात पहुँचता है।
सामाजिक कलंक और पुरुषों की पहचान
तलाक के बाद पुरुषों को समाज में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अक्सर ‘असफल’ या ‘दोषी’ के लेबल के साथ देखा जाता है। यह सामाजिक कलंक उनकी मानसिक स्थिति को और भी बिगाड़ देता है।
कई पुरुषों का मानना है कि तलाक के बाद उनकी पहचान ही खत्म हो गई है, जिससे वे और अधिक अकेलापन महसूस करते हैं। अक्सर उन्हें अपने दोस्तों और परिवार से भी भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता।
अब समय है समान न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने का
तलाक एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है जो केवल महिलाओं को नहीं, बल्कि पुरुषों को भी गहराई से प्रभावित करता है। हमें इस भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए एकजुट होना चाहिए।
गुज़ारा भत्ता और अन्य कानूनी नीतियाँ निष्पक्ष होनी चाहिए ताकि दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जा सके। हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है, जहाँ दोनों पक्षों की समस्याओं को समान रूप से समझा जाए और उन्हें सुलझाने के लिए उचित उपाय किए जाएँ। ताकि तलाक की प्रक्रिया में हर किसी की आवाज़ सुनी जाए और कोई भी व्यक्ति इस कठिनाई में अकेला न महसूस करे।
दुनिया भर में ‘फैक्ट चेक’ का ठेका लेकर दूसरों को ज्ञान बाँटने वाला मोहम्मद जुबैर अब खुद अपने ही झूठ के जाल में फँस गया है। जिसने सालों तक हिंदू संगठनों, पत्रकारों और नेताओं को ‘फेक न्यूज फैलाने वाला’ बताया अब वही जुबैर अपनी ही पूर्व कर्मचारी को लेकर झूठ बोलता पकड़ा गया है। सोशल मीडिया पर लोग उसे आईना दिखा रहे हैं। स्क्रीनशॉट, पुराने ट्वीट और सबूतों के साथ उसका फैक्ट चेक कर रहे हैं।
क्या है सुमैया शेख से जुड़ा विवाद?
इस विवाद की जड़ छिपी है लद्दाख हिंसा में, लद्दाख में 24 सितंबर 2025 को हिंसा हुई। इसका सूत्रधार बताया गया ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को। इसके बाद पुलिस ने वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया और विदेशी फंडिंग मामले में वांगचुक की NGO का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
विदेशी फंडिंग को लेकर बहस के बीच 27 सितंबर को जुबैर ने एक ट्वीट किया। इसमें पत्रकार आदित्य राज कौल के एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट था जिसमें जुुबैर की विदेशी फंडिंग की जाँच करने की बात कही गई थी। इस स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए जुबैर ने लिखा, “विदेशी फंडिंग से याद आया, उन्हें अभी यह साबित करना है।”
जुबैर के इस ट्वीट पर ‘ऑनली फैक्ट इंडिया’ के फाउंडर और खोजी पत्रकार विजय पटेल ने जवाब दिया। विजय ने लिखा, “कट्टरपंथी जुबैर, मैं तुम्हारी विदेशी फंडिंग साबित कर दूँ। तुम्हारे दो पत्रकारों को अमेरिका स्थित ठाकुर परिवार फाउंडेशन से 50 लाख रुपए मिले थे। अब विक्टिम कार्ड खेलने के लिए तैयार हो जाओ!” इसके साथ विजय ने कुछ स्क्रीनशॉट भी शेयर किए थे जिसमें सुमैया शेख और सरफरोज सतनी (Sharfaroz Satani) का नाम था।
Let me prove you foreign funding radical Zubair.
Your two journalists had received Rs.50 Lakh from the USA based Thakur family foundation.
इसके बाद जुबैर ने अपना कुचक्र रचना शुरू किया। पोल खुलने से खफा जुबैर गाली-गलौज पर उतर आया। उसने विजय के पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, “अबे सस्ते देसी भां**, थोड़ा और रिसर्च कर ले। ये लोग ऑल्ट न्यूज के कर्मचारी नहीं बल्कि कॉन्ट्रीब्यूटर थे।”
विजय को जुबैर का जवाब
विजय ने इसके बाद ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “ये तुम्हारी वेबसाइट का स्क्रीनशॉट है। जिसमें सुमैया को एडिटर के तौर पर दिखाया गया है, कॉन्ट्रीब्यूटर नहीं।” इस पर फिर जुबैर ने फिर लिखा कि वह ‘ऑल्ट न्यूज’ की कर्मचारी नहीं थी बल्कि कॉन्ट्रीब्यूटर थी।
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर सुमैया को लेकर क्या लिखा है?
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर मौजूद सुमैया शेख की वेबसाइट में उसे ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ की संस्थापक संपादक (Founding-Editor) बताया गया है। ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर लिखा है, “डॉ. शेख 2017 से 2021 तक ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ की संस्थापक संपादक रहीं। उनकी मुख्य भूमिका एक न्यूरोसाइंटिस्ट के रूप में हिंसक उग्रवाद और मनोरोग विज्ञान पर शोध करना है।”
‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट पर मौजूद सुमैया की प्रोफाइल
जुबैर के इस दावे को लोगों ने झूठा बताकर उसका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। विवाद के बाद हमने सुमैया खान की X प्रोफाइल तलाशी तो उसमें कुछ पुराने पोस्ट मिले जिसमें उसने खुद को ‘ऑल्ट न्यूज साइंस’ का संपादक बताया था। यानी लोगों के दावे हवा-हवाई नहीं थे। मार्च 2019 के इस ट्वीट में सुमैया ने लिखा, “मैं भारत स्थित एक फैक्ट चेकिंग साइंस पोर्टल (ऑल्ट न्यूज साइंस) की संपादक हूँ।”
Except that I do. I am the editor of a fact-checking science portal @AltNews@AltNewsScience based in India and write regularly for Indian publications. Sick? Get well soon? https://t.co/fsMw9ISKvn
जाहिर है कि किसी संस्थान का ‘फाउंडिग एडिटर’ होना और उस संस्था का कर्मचारी ना होना और भी गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा अगर था तो यह केवल मुखौटा था, इससे ज्यादा कुछ नहीं। अगर जुबैर का दावा सही भी है तो इसकी गंभीरता से जाँच किए जाने की जरूरत है। अब फिर सुमैया को मिली फंडिंग पर लौटते हैं।
सुमैया को मिली फंडिंग
असल में विवाद सुमैया को मिली फंडिंग को लेकर था। विजय ने जुबैर के एक ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा, “तो क्या कॉन्ट्रीब्यूटर (योगदानकर्ताओं) को वेबसाइट पर सिर्फ 10 से 15 प्रोपेगेंडा लेख लिखने के लिए ₹50 लाख का विदेशी चंदा मिला? अगर वे वेबसाइट के लिए लेख लिखने के लिए विदेशी चंदा लेती भी हैं, तो यह भी गैरकानूनी है। यह कोई छोटी रकम नहीं है।”
जुबैर ने इस पर लिखा, “वो भारतीय नागरिक नहीं है। उसने ‘ऑल्ट न्यूज’ के लिए योगदान दिया है, कर्मचारी नहीं। उसे अपने शोध के लिए फाउंडेशन से अनुदान मिला है। ऑल्ट न्यूज़ को लिखने के लिए नहीं।” जुबैर ने खुद को कूल दिखाने के लिए अपने ट्वीट में जोकर की इमोजी भी चिपका दी।
Lol. Try harder. She isn't an Indian Citizen. She contributed for Alt News, Not an employee. She got grant from the foundation for her research. Not for writing to Alt News. ?
जब ‘ठाकुर फाउंडेशन’ की वेबसाइट की जाँच करने पर सामने आया कि असल में जुबैर का दावा पूरी तरह झूठ था। वेबसाइट के इम्पैक्ट सेक्शन में संस्था द्वारा जनवरी 2020 में दिए गए धन का जिक्र था। ठाकुर फाउंडेशन ने लिखा है, “हमने न्यूरोसाइंटिस्ट और लेखिका डॉ. सुमैया शेख को साक्ष्य-आधारित चिकित्सा से संबंधित उनके तथ्य-जांच दावों का समर्थन करने के लिए पुरस्कार दिया।”
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट का स्क्रीनशॉट
इस वेबसाइट पर जनवरी 2020 के सेक्शन लिंक में सुमैया शेख के कम-से-कम 14 लेखों का जिक्र था और ये सभी ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट के लिए लिखे गए थे। यानी जो दावा जुबैर ने करने की कोशिश की थी वो धराशायी हो गया।
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट पर सुमैया के ‘ऑल्ट न्यूज’ के लिए लिखे गए लेख
फाउंडेशन की वेबसाइट पर सरफरोज सतनी को भी मार्च 2020 में फंड दिए जाने का जिक्र है। इसमें लिखा है, “हमने वैज्ञानिक और चिकित्सीय गलत सूचनाओं का मुकाबला करने में डॉ. सुमैया शेख के काम में सहायता के लिए शोधकर्ता डॉ. सरफरोज सतनी को एक अवॉर्ड दिया।” इसमें भी 11 लिंक्स का जिक्र किया गया है जिसमें से 10 लिंक्स ‘ऑल्ट न्यूज’ की वेबसाइट की थीं और एक लिंक गूगल शीट का था जो लॉक थी।
ठाकुर फाउंडेशन की वेबसाइट पर सरफरोज के ‘आल्ट न्यूज’ के लिए लिखे गए आर्टिकल
भारत विरोधी कार्यों में संलिप्त ठाकुर फाउंडेशन
जुबैर के लिए लेख लिखने वाले पत्रकारों को जिस ठाकुर फाउंडेशन से पैसा मिला है वो खुद भारत को निशाने बनाने को लेकर सवालों में है। इसका कर्ताधर्ता दिनेश ठाकुर है जो खुद को पब्लिक हेल्थ एक्टिविस्ट बताता है लेकिन उस पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। The DisinfoLab ने दिनेश ठाकुर के काले कारनामों को लेकर एक लंबी चौड़ी रिपोर्ट बनाई है।
‘द प्रोपेगेंड पिल’ नाम से 2024 में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है, “ठाकुर एक ऐसे उद्यम का मुखौटा जो कई स्तरों पर निशाना साध रहा है। पहले स्तर पर, यह रैनबैक्सी जैसी व्यक्तिगत कंपनियों को निशाना बनाता है, जिनका अमेरिकी कंपनियों के साथ विवाद चल रहा है। इसी को आधार बनाकर, अगला स्तर भारतीय जेनेरिक दवाओं को निशाना बनाता है, जो आम तौर पर अमेरिकी बड़ी दवा कंपनियों के लिए एक खतरा हैं।”
इसमें ठाकुर को लेकर लिखा गया, “इस पूरे अभियान का अंतिम लक्ष्य भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुँचाना है। ठाकुर ने ऐसे लोगों और संगठनों को फंड दिया है जो खुले तौर पर भारत-विरोधी एजेंडे पर काम करते हैं, जैसे सुचित्रा विजयन् जिनके प्रोजेक्ट Polis का सोशल मीडिया एक पाकिस्तानी व्यक्ति चलाता है।”
ठाकुर फैमिली फाउंडेशन की फंडिंग (फोटो -The DisinfoLab)
ऑल्ट-न्यूज और ठाकुर फाउंडेशन का नेक्सस
DisinfoLab की रिपोर्ट में ऑल्ट न्यूज और ठाकुर फाउंडेशन के नेक्सस का भी खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में लिखा गया है, “सरफरोज ने 2020 में कोविड-19 की पहली लहर के दौरान करीब 8 लेख लिखे थे। उसके लेखों का विषय मुख्य रूप से कोविड-19 से जुड़े घरेलू नुस्खों और अफवाहों की पड़ताल था। इस काम के लिए सरफरोज को साल 2020-21 के बीच कुल $5907 का भुगतान किया गया।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “सुमैया शेख को भी ठाकुर फैमिली फाउंडेशन ने काम पर रखा था। उन्होंने कुल 10 लेख लिखे, जिनमें से कुछ डॉ. सतानी के साथ मिलकर लिखे गए थे। इन लेखों के बदले सुमैया शेख को TFF से 2021 में $23,740 और 2022 में $35,260 का भुगतान किया गया।” रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि 2020 के बाद से ठाकुर फैमिली ने व्यक्तियों/पत्रकारों/कार्यकर्ताओं को भारत में धन भेजने के लिए वित्तीय सेवा संस्थानों को काम पर रख लिया था।
ठाकुर फाउंडेशन द्वारा भारतीय पत्रकारों को दिया गया धन
कोविड-19 के दौर में ‘फैक्ट चेक’ की जाँच की माँग
पैसे के बदले आर्टिकल लिखने के आरोपों के बाद अब लोग इसकी जाँच किए जाने की माँग कर रहे हैं। ‘द हॉक आई’ नामक एक यूजर ने लिखा, “क्या यह FCRA का उल्लंघन हो सकता है और हितों का टकराव भी हो सकता है? योगदानकर्ता या कर्मचारी, ऑल्ट न्यूज के दो पूर्व पत्रकारों को कोविड के दौरान कुछ तथ्य-जाँच लेखों के लिए बड़ी दवा कंपनी के पैरवीकार ठाकुर फाउंडेशन से ₹50 लाख का अनुदान मिला। इसकी जाँच होनी चाहिए।”
कथित फैक्ट चेकर जुबैर पर पहले भी फंडिंग को लेकर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। अब इन सवालों के बाद नया विवाद शुरू हो गया है। जुबैर बचने की कितनी भी कोशिश करे लेकिन सत्य कभी तो बाहर आ ही जाता है। अगर विदेशी फंडिंग को लेकर लोगों को संदेह है तो जरूरी है कि इनकी जाँच की जाए और स्थितियाँ स्पष्ट कर दी जाएँ।
भारत में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक नाम उभरा है, Zoho कॉर्पोरेशन। इस देसी कंपनी के खिलाफ साजिश रची जा रही है। सोशल मीडिया पर इसे ‘सरकारी एजेंट’ बता कर बहिष्कार की अपील की जा रही है। वही ‘डेटा लीक’ को लेकर शक जताया जा रहा है। यहाँ तक कि इसके ऐप Arattai को भी निशाना बनाया गया है। इसके खिलाफ वामपंथी प्रोपेगेंडा की वजह पीएम मोदी द्वारा इसके इस्तेमाल की अपील भी है।
कंपनी के फाउंडर श्रीधर वेंबू का इंटरव्यू करने वाले पत्रकार अर्नब गोस्वामी को लेकर भी वामपंथी नाराज हैं। वामपंथियों को मिर्ची इसलिए भी लग रही है क्योंकि कई सरकारी और निजी संस्थान zoho को अपना चुके हैं। केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने माइक्रोसॉफ्ट और गुगल जैसे विदेशी प्लेटफॉर्म छोड़कर जोहो को अपनाया। भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता का ये प्रतीक बन गया है।
I will never, ever use Zoho. It’s a government trap to spy on everyone.
If Arnab, Sudhir, Chitra, Devgan, Rubika, or Anjana oppose someone, it means that person is on the right side.
If anyone praises these jokers, it means that person is either mentally retarded or working… pic.twitter.com/wvttfqjvZC
जोहो प्लेटफॉर्म को लेकर कई तरफ की अफवाहें फैलाई जा रही है। मसलन सरकार इसके माध्यम से लोगों पर नजर रखेगी, डेटा को विदेशी सर्वर में सेव किया जा रहा है, जिससे इसके लीक होने का खतरा है। वामपंथियों ने कंपनी का रिश्ता आरएसएस से भी जोड़ दिया है।
कंपनी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। कंपनी का कहना है कि हर देश का डेटा उसी देश में स्टोर हो रहा है। ये पूरी तरह सुरक्षित और सीक्रेट है।
"The hare can win. The tortoise can also win. But not trying never wins."
Our co-founder Kumar Vembu sums up Zoho's journey with this old Tamil saying. Amidst all the love and adoption we’re receiving, he also reflects on the principles that have helped us grow. ?… pic.twitter.com/CQhLyqznzU
ऑफिस सॉफ्टवेयर की दुनिया में गुगल और माइक्रोसॉफ्ट का अब तक दबदबा रहा है। भारत के यूजर्स भी इसे ही इस्तेमाल करते रहे हैं। लेकिन जोहो ने इस एकाधिकार को चुनौती देते हुए न सिर्फ भारत के बाजार में बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह बना ली है। इस देशी सॉफ्टवेयर का जैसे-जैसे विस्तार होगा, भारत मजबूत होगा। इसे अपनाने से विदेशी निर्भरता कम होगी और घरेलू टेक इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगा। कंपनी का टैक्स भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। इससे उन भारतीय टेक कंपनियों को भी नहीं राह मिलेगी, जो विश्व बाजार में उतरने के लिए तैयार हैं।
गुगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसे विदेशी कंपनी पर लगते रहे हैं आरोप
विदेशी टेक कंपनियों पर डेटा प्राइवेसी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इनके सर्वर से ‘डेटा लीक’ होने को लेकर खबरें भी आई हैं। इन कंपनियों का डेटा ज्यादातर अमेरिका में सेव होता है। लेकिन जोहा का भारत के लोगों का डेटा देश में ही स्टोर होता है। इससे डेटा सुरक्षित रहने के ज्यादा चांसेज हैं। ये भारत के ‘डेटा संप्रभुता’ के सिद्धांत को भी मजबूत बनाता है।
क्या है Zoho
Zoho कॉरपोरेशन एक भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनी है, जो बिजनेस सॉफ्टवेयर और वेब आधारित टूल्स बनाती है। कंपनी ऑनलाइन ऑफिस सुइट सेवा देने के लिए लोकप्रिय है। 1996 में कंपनी की शुरुआत श्रीधर वेम्बू और टोनी थॉमस ने की थी। कंपनी का मुख्यालय चेन्नई में है। इसका हेडऑफिस अमेरिका के टेक्सास में है। 9 देशों में कंपनी के ऑफिस हैं।
कंपनी में 2023 तक श्रीधर वेम्बू के भाई शेकर वेम्बू 35.2% और बहन राधा वेम्बू के पास 47.8 % शेयर थे। जबकि श्रीधर वेम्बू के पास 5 फीसदी और सह संस्थापक टोनी थॉमस के पास 8 फीसदी हिस्सेदारी थी। फिलहाल कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने सीईओ पद से इस्तीफा दिया है। वे मुख्य वैज्ञानिक के तौर पर कंपनी से जुड़ गए हैं, ताकि AI और दूसरे शोध पर ध्यान दिया जा सके।
Zoho क्या-क्या दे रही है सुविधाएँ
कंपनी की स्थापना 1996 में अमेरिका के न्यूजर्सी में हुई। कंपनी ने छोटे बिजनेस पर फोकस किया और जापान में 2001 में ऑफिस खोला। 2005 में जोहो सीआरएम और जोहो राइटर लॉन्च किया। 2006 में जोहो प्रोजेक्ट, क्रिएटर, शीट और शो आए। 2007 में कंपनी ने सहयोगी टूल्स लॉन्च किए। इनमें जोहो Docs और जोहो Meeting शामिल हैं। 2008 तक कंपनी ने इनवॉइसिंग और मेल एप्लीकेशन लॉन्च किए। 2009 में कंपनी का नाम Zoho Corporation हो गया।
2017 में Zoho One लॉन्च किया गया। ये 40 से अधिक इंटीग्रेटेड एप्लीकेशंस का सुइट था। 2022 तक कंपनी 160 से ज्यादा देशों में 50,000 से अधिक व्यवसायिक संस्थानों के साथ काम कर रही थी। जनवरी 2020 तक Zoho के पास 5 करोड़ यूजर्स थे, जो जुलाई 2022 में बढ़कर 8 करोड़ हो गया।
Zoho का Arattai ऐप दे रहा WhatsApp को टक्कर
Zoho कॉर्पोरेशन का Arattai ऐप धूम मचा रहा है। इसने WhatsApp को भी पीछे कर दिया है। 2021 में ऐप के लॉन्च होते ही 3 दिनों में ही 100 गुणा ज्यादा साइन अप हो चुके थे। यहाँ तक प्ले स्टोर पर डाउनलोड्स 10 लाख पार कर गए थे। सरकार स्वदेशी को बढ़ावा दे रही है। केन्द्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने Arattai मैसेजिंग ऐप को लेकर एक्स पर पोस्ट किया। बज क्रिएट होते ही इससे जुड़ने वालों की संख्या काफी बढ़ गई।
डेटा को लेकर कंपनी ने पूरी जानकारी दी। कंपनी के फाउंडर श्रीधर वेंबू ने खुद बताया है कि डेटा कहाँ होस्ट होता है, कौन होस्ट करता है। कहाँ बनते हैं कंपनी के प्रोडक्ट्स आदि। इसके बावजूद Arattai को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
So Arattai can actually implement the 'Amit Shah has read it' third tick on the message info.
पूरी तरह देशी जोहो कंपनी का मुख्यालय चेन्नई में है और ये ग्लोबल इनकम का भारत में टैक्स चुकाते हैं। दुनिया के 80 देशों में कंपनी के कर्मचारी हैं और अमेरिका जैसे देशों में इसकी अच्छी मौजूदगी है।
कौन करता है डेटा सेव
भारतीय कस्टमर का डेटा भारत में ही होस्ट किया जाता है। इसमें दिल्ली, मुंबई और चेन्नई अहम हैं। कंपनी किसी भी देश के लोगों का डेटा किसी दूसरे देश में होस्ट नहीं करती है। दुनियाभर में कंपनी के 18 डेटा सेंटर्स हैं , जहाँ इसे होस्ट किया जाता है। कंपनी की सभी सेवाएँ उनकी अपनी हार्डवेयर पर चलती हैं। सभी सेवाएँ उनकी अपनी सॉफ्टवेयर फ्रेमवर्क पर हैं, जो कंपनी ने विकसित किए हैं।
अमेरिका में कंपनी का क्यों है पता
कंपनी के जोहो डेवलपर अकाउंट में ऐप स्टोर और प्ले स्टोर पर अमेरिका के ऑफिस का पता है। इसकी वजह कंपनी ने ये बताया है कि ये अकाउंट उन स्टोर्स के शुरुआती दिनों की है। इसे अमेरिकी कर्मचारी ने टेस्टिंग के लिए रजिस्टर कराया था। कंपनी ने अब तक इसे नहीं बदला है।
कुछ दिन पहले, भारतीय जनता पार्टी (BJP) परिवार ने अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक, विजय कुमार मल्होत्रा को खो दिया। उन्होंने अपने जीवन में बहुत-सी उपलब्धियाँ हासिल कीं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने कठोर परिश्रम, दृढ़ निश्चय और सेवा से भरा जीवन जिया।
उनके जीवन को देखकर समझा जा सकता है कि RSS, जनसंघ और BJP के मूल संस्कार क्या हैं। विपरीत परिस्थितियों में साहस का प्रदर्शन, स्वयं से ऊपर सेवा भावना, साथ ही राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता, यह उनके व्यक्तित्व की बहुत बड़ी पहचान रही।
वीके मल्होत्रा के परिवार ने विभाजन का भयावह दौर झेला। उस आघात और विस्थापन ने उन्हें कड़वा या आत्मकेंद्रित नहीं बनाया। इसके बजाए उन्होंने स्वयं को दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हें RSS और जनसंघ की विचारधारा में राष्ट्रसेवा का रास्ता नजर आया। बँटवारे का वो समय बहुत चुनौतीपूर्ण था।
मल्होत्रा ने सामाजिक कार्यों को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने उन हजारों विस्थापित परिवारों की मदद की, जिन्होंने सब कुछ खो दिया था। उनका जीवन सँवारने और उन्हें फिर से खड़े होने में मदद की। यही जनसंघ की प्रेरणा थी। उन दिनों उनके साथी मदनलाल खुराना और केदारनाथ साहनी भी बढ़-चढ़कर सेवा कार्यों में शामिल होते थे। उन लोगों की निस्वार्थ सेवा को आज भी दिल्ली के लोग याद करते हैं।
1967 के लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनाव तब अपराजेय मानी जाने वाली कॉन्ग्रेस के लिए चौंकाने वाले रहे थे। इसकी बहुत चर्चा होती है लेकिन एक कम चर्चित चुनाव भी हुआ। वो था, दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल का पहला चुनाव।
राष्ट्रीय राजधानी में जनसंघ ने शानदार जीत दर्ज की। आडवाणी काउंसिल के चेयरमैन बने और मल्होत्रा को चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर की जिम्मेदारी दी गई, जो मुख्यमंत्री के लगभग बराबर का पद था। तब उनकी उम्र केवल 36 वर्ष थी। उन्होंने अपने कार्यकाल को दिल्ली की जरूरतों, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों से जुड़े मुद्दों पर फोकस किया।
इस जिम्मेदारी ने मल्होत्रा का दिल्ली से जुड़ाव और मजबूत कर दिया। जनहित से जुड़े हर मुद्दे पर मल्होत्रा सक्रिय रूप से जनता के साथ खड़े होते और उनकी आवाज बुलंद करते। उन्होंने 1960 के दशक में गौ रक्षा आंदोलन में भी हिस्सा लिया, जहाँ उनके साथ पुलिस की ज्यादतियाँ भी खूब हुईं। आपातकाल विरोधी आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।
दिल्ली की सड़कों पर जब सिखों का बेरहमी से कत्लेआम हो रहा था तब वे शांति और सद्भावना की आवाज बनकर सिख समुदाय के साथ पूरी मजबूती से खड़े रहे। उनका मानना था कि राजनीति, चुनावी सफलता के अलावा सिद्धांतों, मूल्यों और लोगों की रक्षा के लिए भी है, जब उन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
1960 के दशक के उत्तरार्ध में वीके मल्होत्रा सार्वजनिक जीवन का एक स्थायी चेहरा बन गए थे। बहुत कम नेता ऐसा दावा कर सकते हैं कि उनके पास लोगों के बीच रहकर काम करने का इतना लंबा और ठोस अनुभव है।
वो एक अथक कार्यकर्ता, उत्कृष्ट संगठनकर्ता और एक संस्था निर्माता थे। उनमें चुनावी राजनीति और संगठनात्मक राजनीति, दोनों में समान रूप से सहजता के साथ काम करने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने जनसंघ और BJP की दिल्ली इकाई को स्थिर नेतृत्व दिया।
अपने लंबे सेवाकाल में मल्होत्रा ने सिविक एडमिनिस्ट्रेशन संभाला, राज्य विधानसभा में भी पहुँचे और देश की संसद में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। 1999 के लोकसभा चुनाव में डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ उनकी शानदार जीत समर्थकों और विरोधियों के बीच आज भी याद की जाती है। ये एक बेहद हाई-प्रोफाइल चुनाव था।
कॉन्ग्रेस की पूरी ताकत उनके दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में उतर आई थी। लेकिन मल्होत्रा ने कभी बहस का स्तर नीचे नहीं किया। उन्होंने पॉजिटिव कैंपेन चलाया। गालियों और हमलों को नजरअंदाज किया और 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों के साथ जीत हासिल की।
ये जीत सिर्फ प्रचार के दम पर नहीं मिली थी। ये जीत मल्होत्रा की जमीन पर मजबूत पकड़ की वजह से मिली थी। कार्यकर्ताओं से आत्मीय संबंध बनाकर रखने और मतदाताओं के मन की थाह लेने में वो माहिर थे।
मल्होत्रा संसद में सटीक तैयारी के साथ अपनी बात रखते थे। वो पूरी रिसर्च करके आते थे और प्रभावी ढंग से अपनी बात रखते थे। UPA-1 के दौरान विपक्ष के उपनेता के रूप में उन्होंने जिस तरीके से काम किया, वो राजनीति में आने वाले युवाओं के लिए एक मूल्यवान सबक की तरह है।
उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार और आतंकवाद को लेकर UPA सरकार का प्रभावी ढंग से विरोध किया। उन दिनों मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था और अक्सर मल्होत्रा से बातचीत होती। वो हमेशा गुजरात की विकास यात्रा के बारे में जानने को उत्सुक रहते थे।
राजनीति, वीके मल्होत्रा के व्यक्तित्व का केवल एक पहलू थी। वो एक उत्कृष्ट शिक्षाविद भी थे। उनके परिवार से मुझे पता चला कि उन्होंने स्कूल में डबल प्रमोशन हासिल किया। उन्होंने मैट्रिक और ग्रेजुएशन निर्धारित समय से पहले पूरी कर ली। उनकी हिंदी पर इतनी अच्छी पकड़ थी कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाषणों का हिंदी अनुवाद प्रायः वही करते थे।
उन्हें नई संस्थाएँ और नई व्यवस्थाएँ बनाने के लिए भी जाना जाता है। वे RSS से जुड़ी कई संस्थाओं के संस्थापक और संरक्षक रहे। उनके प्रयासों से अनेक सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक संस्थाओं का विकास हुआ और मार्गदर्शन मिला।
इन संस्थाओं के माध्यम से कई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर मिला। उनके मार्गदर्शन में बनी संस्थाएँ प्रतिभा और सेवा की पाठशालाएँ बनीं। उन्होंने एक ऐसे समाज का विजन दिया, जो आत्मनिर्भर हो और मूल्यों पर टिका हो।
मल्होत्रा ने राजनीति और अकादमिक जीवन से परे, खेल जगत में भी अमिट छाप छोड़ी। तीरंदाजी उनका गहरा शौक था और वो कई दशकों तक आर्चरी एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में भारतीय तीरंदाजी को ग्लोबल पहचान मिली।
उन्होंने खिलाड़ियों को मंच और अवसर दिलाने के लिए निरंतर अथक प्रयास किए। खेल प्रशासन में भी उन्होंने वही गुण दिखाए जो सार्वजनिक जीवन में थे। यानी समर्पण, संगठन क्षमता और उत्कृष्टता की निरंतर खोज।
वीके मल्होत्रा को आज लोग उनके द्वारा संभाले गए पदों के साथ ही उनकी संवेदनशीलता के लिए भी याद कर रहे हैं। उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्तित्व की रही, जो हमेशा लोगों की मुश्किलों में उनके साथ खड़े रहे। जहाँ भी मदद की जरूरत पड़ी, वहाँ उन्होंने खुद आगे बढ़कर योगदान दिया। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटे। वे आदर्श पार्टी कार्यकर्ता थे, कभी ऐसा कुछ नहीं बोलते थे जिससे हमारे कार्यकर्ताओं या विचारधारा को ठेस पहुँचे।
कुछ दिन पहले मैं दिल्ली BJP के नए मुख्यालय के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुआ था। वहाँ मैंने स्नेहपूर्वक वीके मल्होत्रा को याद किया था। इस वर्ष तीन दशक बाद जब BJP ने दिल्ली में सरकार बनाई तो वो बहुत उत्साहित थे। उनकी अपेक्षाएँ बहुत बड़ी थीं, जिन्हें हम पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आने वाली पीढ़ियाँ उनके जीवन और उपलब्धियों से प्रेरणा पाती रहेंगी।
कुछ महीने पहले, रटगर्स विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, रेस एंड राइट्स (CSRR) ने ‘अमेरिका में हिंदुत्व’ के विषय को लेकर एक रिपोर्ट जारी की और इसी को लेकर एक रोडशो भी निकाला गया था। इस रिपोर्ट ने हिंदुत्व को एक दक्षिणपंथी (फार-राइट) योजना के रूप में पेश किया, प्रवासी भारतीय समूहों को RSS के प्रतिनिधि माना और यह दावा किया कि हिंदुत्व अमेरिकी बहुलतावाद (pluralism) के लिए खतरा है।
1/n ?On October 27th, @RutgersU will platform open Hindu hate on college campus.
This is not an academic exercise. It’s blatant bigotry that calls for a federal investigation against American Hindu organizations and accuses them of being foreign agents.
— CoHNA (Coalition of Hindus of North America) (@CoHNAOfficial) October 4, 2025
17 जून को CSRR के यूट्यूब चैनल पर लॉन्च का वीडियो प्रकाशित किया गया था जिसमें 27 अक्टूबर की इस रिपोर्ट के आधार पर एक चर्चा आयोजित की गई थी। इस पैनल में रटगर्स विश्वविद्यालय की लॉ प्रोफेसर सहार अजीज, डॉक्टोरल छात्रा निकायता मल्होत्रा और हिंदू विरोधी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के शामिल थी।
ट्रुश्के हिंदू धर्म के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए जानी जाती हैं और सोशल मीडिया पर उन्होंने भगवान राम के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की हैं। इस पैनल के जरिए संदेश साफ है कि वे बिना किसी ठोस सबूत के हिंदूओं की वकालत (advocacy) को सुरक्षा समस्या के रूप में पेश करना चाहते हैं।
रिपोर्ट क्या है और इसमें क्या कहा गया है
इस दस्तावेज में दावा किया गया है कि हिंदू संगठनों ने 9/11 के बाद उभरी इस्लामोफोबिया की लहर का फायदा उठाकर अपना ‘जातीय-राष्ट्रवादी’ (ethnonationalist) का एजेंडा स्वीकार्य बनाने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में यह आंदोलन दो काम करता है:- मुसलमानों को संदिग्ध दिखाना और शैक्षणिक स्वतंत्रता (academic freedom) को दबाना।
रिपोर्ट का कहना है कि अधिकारियों और स्थानीय निकायों को उन हिंदू संगठनों से सारे रिश्ते तोड़ लेने चाहिए जो उसे पसंद नहीं हैं। साथ ही केंद्र सरकार से यह माँग की गई है कि जिन संगठनों को रिपोर्ट RSS के ‘प्रॉक्सी’ मानती है, उन पर जबरदस्ती FARA कानून लागू किया जाए। इसके अलावा, जो चैरिटी संस्थाएँ किसी भी रूप में हिंदू राष्ट्रवाद से जुड़ी हैं, उन्हें अपने विदेशी संपर्कों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। रिपोर्ट यह भी चाहती है कि अमेरिकी प्रशासन ऐसे लोगों के वीजा पर रोक लगाए जिन पर भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में मदद करने के आरोप हैं।
साथ ही, विश्वविद्यालयों को ‘हिंदुत्व-प्रेरित भेदभाव’ के मुद्दे पर ट्रेनिंग देने की बात भी कही गई है ताकि वहाँ के प्रोफेसर और छात्र इससे ‘सुरक्षित’ रह सकें। कुल मिलाकर, अगर इन सुझावों को देखा जाए तो यह पूरा अभियान किसी ‘ब्लैकलिस्ट’ की तरह ही लगता है, जहाँ बीमारी ढूँढने से पहले ही इलाज तय कर लिया गया है।
स्रोत: csrr.rutgers.edu
इस रिपोर्ट में हम मुख्य रूप से उस चर्चा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जो इस साल जून में प्रकाशित शुरुआती वीडियो में की गई थी। इसके बाद हम आगे चलकर उस प्रकाशित शोध-पत्र पर भी बात करेंगे।
फ़्रेमिंग समस्या
यह तर्क उस वक्त ही हवा हो गया जब ‘हिंदू’, ‘हिंदुत्व’, ‘RSS’ और ‘BJP’ सबको एक ही खाँचे में रखकर एक जैसा मान लिया। उनका दावा था कि जो भी हिंदू धर्म से जुड़ा है चाहे वह हिंदुत्व हो, आरएसएस हो या भाजपा और यहाँ तक कि कोई आम हिंदू व्यक्ति भी, ये सब नागपुर से निकलने वाली तथाकथित राजनीतिक शाखाओं का हिस्सा हैं, जहाँ RSS का मुख्यालय स्थित है।
RSS, VHP और इनसे जुड़ी अन्य संस्थाएँ, भारत और विदेश दोनों जगह समाजसेवी और सामुदायिक संगठन हैं। ये वैसे ही प्रवासी संगठनों की तरह हैं जैसे दुनिया भर में अन्य समुदाय अपने सांस्कृतिक और सामाजिक हितों के लिए बनाते हैं। लेकिन जब बात हिंदू संगठनों की आती है, तो इन्हीं संस्थाओं को जातिवादी नीतियाँ फैलाने वाले, गैर-हिंदू समुदायों के खिलाफ नफरत भड़काने वाले और हिंसा को बढ़ावा देने वाले संगठनों के रूप में पेश किया गया। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि यह कोई निष्पक्ष विश्लेषण नहीं था बल्कि जानबूझकर की गई एक समान श्रेणी में बाँधने की कोशिश थी।
स्पीकर दीपा सुंदरम ने हिंदू संगठनों और उनकी विचारधारा की तुलना पश्चिमी दुनिया के ‘फार राइट’, ‘फासिस्ट’, ‘व्हाइट नेशनलिस्ट’ और ‘क्रिश्चियन ज़ायनिस्ट’ जैसे विचारों से करके, भारत के ‘राइट विंग’ और पश्चिम के ‘राइट विंग’ के बीच की गहरी वैचारिक रेखा को धुंधला कर दिया।
सावरकर और RSS के बारे में गलत जानकारी
इस चर्चा का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि शुरुआत में ही सुंदरम ने एक बड़ी गलती कर दी। उन्होंने वीर सावरकर को RSS का संस्थापक बता दिया। लेकिन सावरकर RSS के संस्थापक नहीं थे, यह संगठन 1925 में केशव बालिराम हेडगेवार ने स्थापित किया था। अगर वे किसी संगठन के इतिहास पर कोई बड़ी थ्योरी बनाना चाहते हैं, तो कम से कम उसका सही इतिहास जानना आवश्यक है।
‘एंटी-हिंदू संगठन’ वाली धारणा (HAF और CoHNA)
इसके बाद चर्चा में अमेरिका में सक्रिय हिंदू संगठनों, जैसे हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका (CoHNA), पर निशाना साधा गया। सुंदरम ने इन संगठनों को हिंदुत्व के ‘खतरनाक मोर्चे’ के रूप में पेश किया।
वास्तव में, HAF और CoHNA अमेरिका में पंजीकृत और खुले तौर पर काम करने वाले नागरिक अधिकार संगठन हैं। ये हिंदू विरोधी घृणा की घटनाओं पर नजर रखते हैं, कानून निर्माताओं को जानकारी देते हैं, मंदिरों की सुरक्षा का समर्थन करते हैं और अमेरिकी हिंदू समुदाय की आवाज बनते हैं, जो वहाँ अल्पसंख्यक है।
सुंदरम और ट्रुश्के जैसे तथाकथित शिक्षाविदों की इन संगठनों से वैचारिक असहमति हो सकती है, खासकर ट्रुश्के की, जो औरंगजेब की प्रशंसक मानी जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इस असहमति को बदनामी में बदल दें और सच्चे हिंदू संगठनों को भारत के हिंदुओं की किसी साजिश के रूप में पेश करें।
इस्लामोफोबिया का सर्वव्यापी प्रभाव
चर्चा के दौरान ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा बार-बार उठाया गया, जिसमें भारत और अमेरिका दोनों जगह के हिंदुओं पर मुसलमानों से नफरत करने का आरोप लगाया गया। ऐसा क्यों? क्योंकि हिंदू संगठन अक्सर कट्टर इस्लाम, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों या प्रवासी इस्लामी दबाव की आलोचना करते हैं।
कई बार ऐसा हुआ है जब हिंदू खुले तौर पर इस्लामी उग्रवाद का निशाना बने, चाहे वह लव जिहाद के मामले हों, आतंकवाद या अन्य घटनाएँ। इसका ताजा उदाहरण पहलगाम आतंकी हमला है, जिसमें पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकियों ने धार्मिक पहचान पूछकर 26 निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर दी।
खालिस्तानियों को पीड़ित के रूप में पेश करना
अब बात आती है चर्चा के अगले हिस्से की, जहाँ खालिस्तानी आतंकियों को निर्दोष एक्टिविस्ट के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। इसे ट्रांसनेशनल रेप्रेशन यानी विदेशी दमन के नाम पर नया रूप देने का प्रयास किया गया।
उदाहरण के तौर पर, हरदीप सिंह निज्जर का मामला लिया गया। 2023 में कनाडा की राजधानी ओटावा ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने कनाडा में निज्जर की हत्या करवाई। भारत ने इस आरोप को सख्ती से खारिज किया। समस्या सिर्फ कूटनीतिक नहीं थी, असली मुद्दा यह था कि कनाडा ने बिना किसी ठोस सबूत के भारत पर एक खालिस्तानी आतंकी की हत्या का आरोप लगाया। अब तक कनाडा भारतीय एजेंसियों को कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाया है।
निज्जर कोई निर्दोष व्यक्ति नहीं था। वह एक खालिस्तानी आतंकी था, जिसने 1990 के दशक में झूठा हिंदू नाम लेकर भारत से फरार होकर कनाडा में शरण माँगी थी। वीजा और नागरिकता आवेदन कई बार खारिज हुए, लेकिन वह किसी न किसी तरीके से वहाँ रहकर नागरिकता पाने की कोशिश करता रहा। भारत ने कई बार उसके प्रत्यर्पण (extradition) की माँग की, लेकिन कनाडा ने हर बार इनकार किया। उसकी हत्या के बाद ही यह सामने आया कि कनाडा ने उसे नागरिकता दे दी थी। निज्जर पाकिस्तान भी गया था और वहाँ खालिस्तानी आतंकियों से मिला था। वह हथियारों के साथ देखा गया था और कनाडा में एक ट्रेनिंग कैंप भी चला रहा था।
चर्चा में वक्ता जोत सिंह ने एक और नाम लिया, खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नून का, जो सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) नामक प्रतिबंधित संगठन का संस्थापक है। भारत सरकार ने SFJ को 2019 में बैन किया और 2020 में पन्नून को व्यक्तिगत रूप से आतंकी घोषित किया।
पन्नून कोई शांतिप्रिय कार्यकर्ता नहीं है। उसने भारत और विदेशों में सिखों को भारत सरकार के खिलाफ भड़काया है। उसके समर्थक भारतीय झंडे जलाते हैं, भारत विरोधी नारे लगाते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और अन्य भारतीय राजनयिकों को धमकियाँ दे चुके हैं। उसने सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाने, 15 अगस्त को प्रधानमंत्री को झंडा फहराने से रोकने के लिए इनामों की घोषणा की, नकली खालिस्तान के नक्शे जारी किए और कई देशों में रेफरेंडम आयोजित किए।
भारत की आपत्तियों और अनुरोधों के बावजूद, पन्नून अब भी खुद को एक्टिविस्ट बताकर खुलेआम भारत विरोधी अभियान चला रहा है। निज्जर और पन्नून जैसे आतंकियों को एक्टिविस्ट बताना न केवल वक्ताओं की नीयत पर सवाल उठाता है, बल्कि यह दिखाता है कि हिंदुत्व विरोध के बहाने एक गहरा भारत-विरोधी नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
‘हिंदुत्व फासीवाद’ प्रवासी समुदाय के बारे में क्या भूल जाता है?
अमेरिका में हिंदू समुदाय की विविधता को जानबूझकर एक ही रंग में दिखाने की कोशिश की जा रही है। यह कहा जाता है कि हिंदू संगठन ‘व्हाइट नेशनलिज़्म’ और ‘क्रिश्चियन सायोनिज़्म’ से जुड़े हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी भारतीय ने किसी कंजरवेटिव कॉन्फ्रेंस में भाषण दिया था और उसके कुछ मिनट बाद एक अमेरिकी सीनेटर ने अपनी बाइबल का ज़िक्र कर दिया। यह कोई विश्लेषण नहीं, बल्कि बिना आधार की कहानी है जिसे ज़बरदस्ती थ्योरी बनाया जा रहा है।
असलियत यह है कि अमेरिका में हिंदू संगठन इंटरफेथ (धर्मों के बीच संवाद) कार्यक्रम चलाते हैं, बाकी चैरिटी संगठनों की तरह नियमित ऑडिट कराते हैं और एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अपने सामाजिक दायित्व निभाते हैं। जैसे नफरत से जुड़े अपराधों की निगरानी, स्कूलों में हिंदू धर्म की सही जानकारी देना, दिवाली के समय सुरक्षा दिशानिर्देश जारी करना और मंदिरों में तोड़फोड़ जैसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना।
तो क्या ‘हिंदूफोबिया’ मनगढ़ंत है?
अगर आप आँखें बंद कर लें, तभी यह नजर नहीं आएगा। अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में हिंदुओं के खिलाफ नफरत से जुड़ी घटनाएँ हाल के वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी हैं, खासकर जब राजनीतिक माहौल गर्म हुआ।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और अन्य संगठनों को कई सालों तक अधिकारियों से यह मनवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा कि सरकारी भाषा में ‘हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह’ (anti-Hindu bias) को स्वीकार किया जाए।
‘हिंदूफोबिया’ को इसलिए नकार देना क्योंकि आपको यह शब्द पसंद नहीं है, कोई तर्क नहीं बल्कि सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है। हिंदूफोबिया के बारे में और जानने के लिए Hinduphobia Tracker पर जाएँ।
अकादमिक-कार्यकर्ताओं के गुट
‘अमेरिका में हिंदुत्व’ का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाले कई समूह खुद खुले तौर पर एक्टिविस्ट हैं। उदाहरण के तौर पर, Hindus for Human Rights (HfHR) एक हफ्ते में ब्लॉग लिखकर HAF को ‘फार-राइट संगठन’ कहता है, और अगले ही हफ्ते खुद को निष्पक्ष संस्था के रूप में पेश करता है। चर्चा में शामिल एक वक्ता, प्रणय सोमयाजुला, इसी साल जुलाई तक HfHR में काम कर रहे थे।
एक्टिविस्ट होना गलत नहीं है, लेकिन अगर आप खुद किसी पक्ष में हैं, तो राज्य से अपने विरोधियों को ‘ब्लैकलिस्ट’ करने की माँग करते हुए खुद को निष्पक्ष मध्यस्थ बताना उचित नहीं। अगर आपका असली उद्देश्य ‘बहुलतावाद’ (pluralism) है, तो विश्वविद्यालयों, पुलिस और राजनेताओं से हिंदू संगठनों से सारे संबंध तोड़ने की अपील करना इस सोच के बिल्कुल उलट है।
हिंदू विरोधी रिपोर्ट के पीछे और समर्थन करने वाले संगठन
IAMC
चर्चा में ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा सबसे ज़्यादा उठाने वाली वक्ता सफा अहमद थी, जो इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) की मीडिया और कम्युनिकेशन की एसोसिएट डायरेक्टर हैं।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) के अनुसार, IAMC का संबंध प्रतिबंधित इस्लामी आतंकवादी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से रहा है। इसके अलावा, इस संगठन के संस्थापक शेख उबैद के जरिए IAMC के रिश्ते लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से भी जुड़े हैं। IAMC वास्तव में जमात-ए-इस्लामी समर्थित लॉबिस्टसंगठन है, जो खुद को ‘ह्यूमन राइट्स एडवोकेसी ग्रुप’ बताता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, IAMC ने पहले अमेरिका में कई संगठनों के साथ मिलकर और उन्हें पैसा देकर अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) से भारत को ब्लैकलिस्ट करवाने की कोशिश की थी। यह संगठन भारत के खिलाफ फेक न्यूज और भ्रामक जानकारी फैलाने में भी पकड़ा गया है। साल 2021 में IAMC पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
HfHR
जो लोग Hindus for Human Rights (HfHR) संगठन से परिचित नहीं हैं, उन्हें इसका नाम सुनकर लग सकता है कि यह हिंदू समुदाय के हितों के लिए काम करने वाला संगठन है। लेकिन असल में, यह ‘भेड़ की खाल में भेड़िया’ साबित हुआ है।
यह संगठन अमेरिका और ब्रिटेन में हिंदू विरोधी नैरेटिव फैलाने में सबसे आगे रहा है। खुद को ‘मानवाधिकारों का रक्षक’ बताने वाला यह समूह एक छिपे हुए एजेंडे पर काम करता है। इसे Tides Foundation जैसी संस्थाओं से फंडिंग मिलती है जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हमास समर्थक प्रदर्शनों से जुड़ी मानी जाती है। HfHR के कई कदम अलगाववादी और उग्रवादी संगठनों की सोच से मेल खाते हैं, जो हिंदू हितों के खिलाफ हैं।
वास्तव में, HfHR एक खुला हिंदू और भारत विरोधी संगठन है, जो अमेरिका से संचालित होता है। यह हिंदू प्रतीकों और शिक्षाओं का इस्तेमाल कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाता है, जबकि लगातार हिंदू परंपराओं और मान्यताओं की आलोचना करता है। इसके बयानों और गतिविधियों से साफ झलकता है कि इसका असली उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि हिंदू पहचान को कमजोर करना और झूठे आरोपों से उसे बदनाम करना है।
HfHR की स्थापना 2019 में Indian American Muslim Council (IAMC) और Organization for Minorities of India (OFMI) ने मिलकर की थी। इन तीनों ने मिलकर Alliance for Justice and Accountability (AJA) नाम का एक और संगठन बनाया था, जिसने सितंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ह्यूस्टन यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसकी सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने 2019 में भारत में NRC को लेकर मुस्लिम समुदाय में डर और भ्रम फैलाने की कोशिश की थी।
2021में, HfHR ने ‘Dismantling Global Hindutva’ नामक खुले हिंदू विरोधी सम्मेलन का समर्थन किया। 2023 में, प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस संगठन ने उनके खिलाफ प्रचार चलाने के लिए एक ‘स्पेशल टूलकिट‘ जारी किया।
जून 2023 में, राहुल गाँधी को Hudson Institute के एक कार्यक्रम में सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठे देखा गया था। वहीं, अक्टूबर 2023 में, भारत सरकार की कानूनी कार्रवाई के बाद HfHR का X (Twitter) अकाउंट भारत में ब्लॉक कर दिया गया।
निष्कर्ष
इस पूरी बहस का सार बहुत सीधा है, रिपोर्ट में हिंदुत्व को ‘फार-राइट फासीवाद’ बताना, प्रवासी हिंदू संगठनों को ‘आरएसएस की शाखाएँ’ कहना और हिंदू वकालत को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताना, ये सब एकतरफा सोच, गलत तथ्यों और पक्षपात से भरा है
यहाँ समस्या RSS में नहीं है। RSS उन संगठनों में से एक है जो भारत के लोगों के साथ हर विपत्ति में, चाहे वह प्राकृतिक हो या अन्य कोई, बिना किसी जाति, धर्म या नस्ल के भेदभाव के खड़े रहे हैं। RSS, VHP और इनके सहायक संगठन हमेशा जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आए हैं। चाहे वह बाढ़ हो, महामारी हो, भूकंप हो या युद्ध, इन संगठनों के हिंदू सदस्यों ने हर परिस्थिति में सभी की सहायता की है।
सच्ची समस्या उन संगठनों और व्यक्तियों में है जो ‘अकादमिक’ होने का दिखावा करते हुए हिंदू-विरोधी नरेटिव फैलाते हैं। ऑड्रे ट्रुशके, जोत सिंह, दीपा सुंदरम और प्रणय सोमयाजुला जैसे लोग दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहे हैं, जिसे तुरंत चुनौती देने की जरूरत है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते है)
नवरात्रि और दशहरा बीत गया है। एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू आस्था को अपने आतंक से डराने की पूरी कोशिश की। हर बार की तरह वही कहानी फिर दोहराई गई, श्रद्धा और शोभायात्राओं के बीच कट्टरपंथियों ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। कहीं, काँच की बोतलें फेंकी गईं। हर बीतते साल के साथ हिंदू त्योहारों पर कट्टरपंथियों की हिंसा बढ़ती जा रही है।
किसने पत्थर फेंके ये तो हमने देख लिया लेकिन फिर एक सवाल सामने आता है कि पत्थर क्यों फेंके गए? हर बार निशाने पर सिर्फ हिंदू त्योहार ही क्यों आते हैं? क्या कभी किसी ने सुना कि हनुमान चालीसा पढ़ने गए लोगों ने किसी पर पथराव किया हो? नहीं सुना, क्योंकि यह असहिष्णुता एकतरफा है।
नेपाल में भी दुर्गा विसर्जन के दौरान शोभायात्रा पर हमला किया गया। इससे साफ पता चलता है कि यह भारत की समस्या नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता की समस्या है। यह मानसिकता क्या है? यह मानसिकता अपने मजहब को दूसरों की आस्था के ऊपर दिखाने की जिद है। यह मजहबी कट्टरता के साथ-साथ अपनी पहचान को आक्रामकता से दिखाने का सवाल भी है।
पहचान के संकट ने कट्टरपंथियों के अकीदे को हिंसा का हथियार बना दिया है। जब किसी समाज का एक हिस्सा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, तो वह अपनी असुरक्षा को आक्रामकता से ढकने की कोशिश करता है।
त्यौहारों पर झंडे लहराने वाले, पत्थर चलाने वाले और नारे लगाने वाले खुद को बहादुर समझते हैं जबकि असल में वे अपनी पहचान के संकट को चीख-चीखकर जाहिर कर रहे होते हैं।
भारत में यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक नहीं रही, इसे राजनीतिक संरक्षण मिला है, जिससे यह और भी खतरनाक होती जा रही है। यह कट्टरपंथ राजनीति की गोद में पल रहा है। वोट बैंक की लालच में राजनीतिक दलों ने वर्षों से इस असहिष्णुता को ‘संवेदनशीलता’ का नाम दिया है।
देश में लगभग 15-16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और यही संख्या कई राज्यों में जीत-हार तय कर सकती है। यही वजह है कि राहुल गाँधी हों या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी हों या असदुद्दीन ओवैसी ये सब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं कि कौन खुद को बड़ा ‘मुस्लिम हितैषी’ दिखा सके।
बरेली में हाल में जो हुआ, वह इसका ताजा उदाहरण है। I Love Muhammad के नाम पर दंगाइयों ने उपद्रव किया। पुलिस पर गोली चलाई गईं, पत्थराव किया गया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी का दल वहाँ दौड़ पड़ा, वो भी आरोपितों का पक्ष लेने के लिए। इन्हें दंगाई बेगुनाह नजर आते हैं और पुलिस-प्रशासन को ये अत्याचारी बताते हैं।
यह वही राजनीति है जिसने दंगाइयों को यह भरोसा दिला दिया है कि चाहे कुछ भी कर लो, ‘वोट बैंक’ के लिए कुछ दल तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हारे लिए वकील खड़े होंगे, तुम्हें बचाने वाले बयान आएँगे और मीडिया का एक हिस्सा तुम्हें पीड़ित दिखाने में जुट जाएगा।
यह सिलसिला नया नहीं है। दशकों से यही खेल चल रहा है। मजहब की आड़ में एक वर्ग ने आक्रामकता को सामान्य बना दिया है और यही सबसे खतरनाक है। क्योंकि जब समाज का कोई हिस्सा यह मान ले कि कानून से ऊपर उसकी मजहबी भावनाएँ हैं, तो फिर राज्य की सत्ता भी बेबस दिखने लगती है।
अब यह समझना होगा कि हर बार पत्थर चलने के बाद सिर्फ कुछ गिरफ्तारियाँ और बयान काफी नहीं हैं। यह मानसिकता तब तक नहीं बदलेगी जब तक समाज और राज्य मिलकर इसे वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं देंगे। यह कह देना कि ‘हर धर्म में कुछ कट्टर लोग होते हैं’ अब बहाना बन गया है।
क्योंकि यहाँ समस्या ‘कुछ’ की नहीं बल्कि एक मानसिकता की है जो हर उत्सव, हर धार्मिक पर्व पर आतंक का अपना चेहरा दिखाती है।
ऋषभ शेट्टी भारतीय सिनेमा की वह नायाब खोज हैं, जो केवल अभिनेता या निर्देशक भर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कथाशिल्पी हैं। उनके भीतर वह ग्राम्य लय है, जिसकी अनुगूँज किसी देवस्थान की ध्वनि की भाँति दूर तक फैली रहती है। यदि कांतारा मैं बनाता, तो सम्भवतः उन्हें परदे से एक पल भी ओझल न होने देता। किन्तु यह उनके कौशल का वैभव है कि वे ख़ुद को भी कहानी के भीतर एक पात्र की तरह भंग कर देते हैं, और परदे पर देवत्व, लोक और आस्था को केंद्र में स्थापित कर देते हैं।
जहाँ मुख्यधारा का भारतीय सिनेमा नायक को कभी किसी ‘बिल्ला नंबर 786’ के भरोसे बचाता है, जबकि मंदिर में न जाने की सौगंध जब उसने ली तो उसे ‘एंग्री यंग मैन’ का नाम दे दिया गया; मानो समाज से आक्रोशित युवा का यही चेहरा हो सकता है। या हमारा जो सिनेमा नायिका के आँसूओं से नायक के लिए मोक्ष लिख देता है, उस दौर में ऋषभ शेट्टी हमें ऐसे सिनेमा का अनुभव कराते हैं, जहाँ मंदिर की घंटी, पायल की खनक, और देवता की हुँकार ही कथा की रीढ़ है। कांतारा ने हमें याद दिलाया कि असली सुरक्षा तो लोक-देवता की हुंकार और प्रकृति की आभा में निहित है। गुलिगा और पंजुरली की गूँज जब सिनेमा-गृह की दीवारों से टकराती है, तो दर्शक के भीतर आदिम स्मृतियाँ जाग उठती हैं। यह संगीत आपको जकड़ता है, भीतर तक भिगो देता है।
कांतारा-चैप्टर 1 फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण उसका संगीत है। यह संगीत किसी एक भाव को साधता नहीं, बल्कि पूरा लोक रचता है। कभी यह ढोल की थाप है, कभी पायल की झंकार, कभी देवता की हुंकार और इन सबके बीच शून्य का मौन भी। यह वही है, जैसा कि मैंने कांतारा की पहली फिल्म समीक्षा में कहा था कि जिसे कीट्स ने “Full Throated Ease” कहा था; एक सहज, उदात्त, पूर्ण स्वर।
सिनेमेटोग्राफी यहाँ दैव-आभा का आलोक है। लाल माटी से ढँके गाँव, वर्षा में भीगी वन-भूमि, और अंधकार में छिपे दृश्य, ये सब मिलकर दर्शक को स्मरण कराते हैं कि सिनेमा का सबसे बड़ा चमत्कार उसकी दृश्य-भाषा है, न कि केवल उसके संवाद।
कथा का आरम्भ उसी राजा से है, समृद्ध किन्तु अशांत, वह राजा, जिसके पास सब कुछ है, पर शांति नहीं।
जो अपने आँसुओं को एक लोक देवता के चरणों में अर्पित करता है। यह समर्पण ही उसके अहंकार का पराभव है। परन्तु इस बार कथा और गहरी है। आस्था को नष्ट करने के प्रयास भी आस्था के सहारे ही किए जाते हैं। मानो आस्था के भीतर ही आस्था का प्रतिपक्ष छिपा हो।
कहानी बताती है कि जहाँ उजाला है, वहाँ अंधेरा भी होगा। जहाँ श्रद्धा है, वहीं संशय भी जन्म लेगा। फ़िल्म के पहले आधे हिस्से में यह संघर्ष धीरे-धीरे बुना जाता है। इंटरवल के बाद लोककथा का वेग अब अपने चरम पर है, लोककथा का वाद्य अब पूर्ण उग्रता से बज उठा और घटनाओं की गति अचानक तीव्र हो जाती है।
ऋषभ शेट्टी की अदाकारी यहाँ चरमोत्कर्ष पर है। वे अभिनेता से अधिक स्वयं एक प्रतीक हो जाते हैं। उनकी आँखों का विस्मय, उनका भय और उनका समर्पण, सब कुछ दर्शक को अपने वश में कर लेता है।
भारतीय ग्राम्य जीवन, चाहे वह कर्नाटक के तुलु भूभाग में हो या उत्तराखंड की हिमालयी घाटियों में; देवता और प्रकृति का यही सम्मिलित लोक-विश्वास है। हर पत्थर, हर जलधारा, हर वृक्ष सबमें देवत्व का निवास मानना। हर स्वप्न में कोई संदेश सुन लेना। यही हमारी सभ्यता का साझा सांस्कृतिक बोध है।
कांतारा-चैप्टर 1 यही याद दिलाता है कि ग्रामीण अंचलों में आस्था किसी शास्त्रीय पुस्तक से नहीं आती, बल्कि लोक अनुभव से जन्म लेती है। लोक की धमनियों में प्रवाहित कथा, जो शहरी दर्शकों को “लेसर रिलेटेड” लग सकता है, वही ग्रामीण समाज के लिए जीवन का सत्य है। और यही वह सेतु है जो ऋषभ शेट्टी ने सिनेमा और समाज के बीच खड़ा किया है।
तर्क जहाँ थम जाता है, वहीं से आस्था का पथ प्रारम्भ होता है। कांतारा-चैप्टर 1 हमें इसी सीमा-रेखा पर लाकर खड़ा करता है। यह फ़िल्म केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। दर्शक इसके पश्चात उसी तरह नहीं लौटता, जैसा वह गया था।
कहानी: जहाँ तक फ़िल्म की कथा का प्रश्न है, कांतारा वस्तुतः ईश्वर का मधुबन है, एक ऐसा पावन स्थल, जहाँ परम्पराएँ केवल निभायी नहीं जातीं, वरन् श्वास की भाँति जीयी जाती हैं। इस लोकनिवास में रहने वाले जन, जब पड़ोसी राज्य के व्यापारी उपक्रमों से परिचित होते हैं, तो उनके अंतःकरण में भी यह आकांक्षा जाग उठती है कि वे उस व्यापार के सहभागी बनें; क्योंकि अन्ततः उस व्यापार की जड़ें तो इसी मधुबन की धरित्री में प्रतिष्ठित थीं।
परन्तु, इस मधुबन के अंतरालों में अनेक रहस्य, अनेक रहस्यान्तर छिपे पड़े हैं, जो कथा के आगे बढ़ने पर पुराणोक्त गाथाओं की भाँति शनैः शनैः उद्घाटित होते जाते हैं। यहाँ प्रत्येक पीड़ा का, प्रत्येक यातना का एक ही औषध है, और वह हैं ‘दैव’। वही दैव, जिसे कोई रहस्यमयी शक्ति निरंतर दुर्बल करने की चेष्टा में है। इसी दैव के रक्षण और विघटन के मध्य संघर्षरत यह आख्यान बहता है, और ऐसे-ऐसे घटनाक्रमों से टकराता है, जिनकी कल्पना भी सामान्य दर्शक के लिए दुर्लभ है।
कथानक की बुनावट सलीक़े और संयम की पराकाष्ठा है। ऋषभ शेट्टी द्वारा अभिनीत बेड़मे का चरित्र मात्र अभिनय नहीं, अपितु साधना प्रतीत होता है। और दूसरी ओर, नया चेहरा रुक्मिणी वसंत, राजकुमारी कनकवती की भूमिका में ऐसे दीप्त होती हैं मानो प्राचीन शिलालेख पर उत्कीर्ण कोई लुप्त श्लोक पुनः जीवन पा गया हो।
ऋषभ शेट्टी ने हमें वह सिनेमा दिया है, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ देखती रहेंगी। यह भारतीय लोककला और आस्था का जीवित दस्तावेज़ है। जिस समय बॉलीवुड ने दशकों तक यह सिखाया कि “हिंदू होना पटकथा में फिट नहीं बैठता”, उस समय कांतारा ने हमारे समाज को उसकी स्मृतियों और आत्मविश्वास से पुनः जोड़ा। कांतारा हमें वह आत्मविश्वास लौटाती है कि हमारी आस्थाएँ, हमारे देवता और हमारे लोकगीत ही हमारी सबसे बड़ी कथा हैं।
कांतारा यह केवल फ़िल्म नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की प्रतिध्वनि है, यह बार-बार देखी जानी चाहिए। सिनेमा प्रेमियों को ऋषभ शेट्टी का ऋणी रहना होगा। यह हमारी सभ्यता का श्रवण और उसका पुनः स्मरण है।
रूस ने उन खबरों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि पाकिस्तान को JF-17 थंडर ब्लॉक III लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल के लिए रूस RD-93MA इंजन की आपूर्ति कर रहा है। रूस द्वारा इंजन दिए जाने की खबरों पर कॉन्ग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोला था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान JF-17 लड़ाकू विमान का इस्तेमाल पाकिस्तान ने किया था, जिसे भारतीय वायु सेना ने मार गिराया था।
रूस द्वारा विमान का इंजन देने की खबर उस वक्त आई है जब रूस के राष्ट्रपति पुतिन भारत आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर कॉन्ग्रेस पर हमला बोला।
उन्होंने कहा, “रूस ने उन खबरों को खारिज कर दिया है जिनमें कहा गया था कि मॉस्को पाकिस्तान को JF-17 थंडर ब्लॉक III लड़ाकू विमानों में लगाने के लिए RD-93MA इंजन की आपूर्ति कर रहा है। कॉन्ग्रेस के पास कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। कोई विश्वसनीय स्रोत भी नहीं है।”
Russia has dismissed reports of Moscow proceeding with the supply of RD-93MA engines to Pakistan for integration into the JF-17 Thunder Block III fighter jets.
WION ने एक रूसी सूत्र के हवाले से कहा, “इस तरह की किसी भी घटनाक्रम की पुष्टि नहीं हुई है। रूस और भारत के बीच बड़े सौदों की संभावना की तलाश अभी भी जारी है। ऐसे में कोई व्यक्ति जानबूझ कर दोनों देशों के बेहद मजबूत और दीर्घकालिक सहयोग में दरार डालने की कोशिश कर रहा है। उसने कहा कि पाकिस्तान के साथ इस स्तर का सहयोग नहीं हो सकता, जिससे भारत को दिक्कत महसूस हो।”
जेएफ-17 का इंजन बनाता है रूस
IDRW की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रूस ने पाकिस्तान को जेएफ-17 थंडर फाइटर जेट में इस्तेमाल के लिए इंजन देने का फैसला किया है। चीन इस जेट को बनाता है। पाकिस्तान के पास 150 जेएफ 17 लड़ाकू विमान हैं। लेकिन इस विमान में रूस का आरडी-93एमए इंजन लगे हुए हैं। इसलिए विमान के आधुनिकीकरण के लिए रूस का सहयोग जरूरी है।
भरोसेमंद रूस क्यों कर रहा पाकिस्तान की मदद- कॉन्ग्रेस
कॉन्ग्रेस ने रूस द्वारा पाकिस्तान को जेएफ-17 इंजन दिए जाने संबंधी खबरों का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इसे कूटनीतिक विफलता करार देते हुए कहा कि भारत का भरोसेमंद साथी रूस अब पाकिस्तानी सेना का सहयोग क्यों कर रही है? खबरों में कहा गया है कि रूस जेएफ-17 विमानों के लिए आरडी-93एमए इंजन देने पर सहमति जताई है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस के आरोपों को निराधार बताया है।
राष्ट्रपति पुतिन कर रहे भारत दौरे का इंतजार
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर में भारत दौरे पर आने वाले हैं। भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने वाले हैं। पिछले हफ्ते रूसी राष्ट्रपति ने वल्दाई फोरम में कहा कि वे दिसंबर की शुरुआत में अपनी दिल्ली यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और अपने प्रिय मित्र और भरोसेमंद साथी, प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।”
भारत-रूस के बीच शिखर सम्मेलन बारी-बारी से होता है। पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी इस शिखर सम्मेलन के लिए रूस गए थे और इस साल राष्ट्रपति पुतिन भारत आ रहे हैं। इससे पहले भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर रूस की यात्रा पर गए थे। उन्होंने अपने समकक्षों से मुलाकात के अलावा खास तौर पर राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की थी।
पीएम मोदी और पुतिन एससीओ सम्मेलन में मिले थे
प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की। इस दौरान रूसी राष्ट्रपति और पीएम मोदी एक ही कार से द्विपक्षीय वार्ता स्थल पर गए। पूरी दुनिया में ये सुर्खियाँ भी बनी थी। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव शीर्ष नेताओं के बीच दिसंबर में होने वाली बैठक की तैयारियों के तहत वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले दिल्ली आ सकते हैं।
भारत-रूस संबंध काफी मजबूत
भारत-रूस व्यापार 60 अरब डॉलर से अधिक का है। रक्षा, ऊर्जा और व्यापार भारत-रूस संबंधों के केन्द्र में हैं। रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता ह। तकनीक हस्तांतरण से लेकर सह-विकास तक के कई परियोजनाओं में दोनों भागीदार हैं। रूस से खरीदा गया S400 विमान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने में अहम भूमिका निभाई थी।
ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत-रूस संयुक्त उद्यम का एक अहम उदाहरण है। इसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान अपनी क्षमता साबित की और इसे फिलीपींस जैसे देशों को निर्यात भी किया जा रहा है।
भारत पर अमेरिकी टैरिफ को देखते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पिछले हफ़्ते कहा था कि उनका देश भारतीय दवा और कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना चाहेगा। दोनों देश भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ के बीच एक मुक्त व्यापार समझौते के भी इच्छुक हैं।
2025 का अरब सागर में उठा चक्रवात ‘शक्ति’ रौद्ररूप धारण कर चुका है और 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाओं के साथ समुद्र में कोहराम मचा रहा है। यह इस साल अरब सागर में मानसून के बाद का पहला चक्रवाती तूफान है, जिसका नामकरण ‘शक्ति’ श्रीलंका ने किया है।
क्या है चक्रवाती तूफान शक्ति
मानसून के बाद अरब सागर में उठने वाला चक्रवात शक्ति पहला तूफान है। यह भयानक रूप धारण कर चुका है, जिसकी हवाएँ 100 किलोमीटर प्रति घंटा है। तूफान गुजरात के द्वारका से लगभग 420 किलोमीटर दूर है और अरब सागर में आगे बढ़ रहा है। चक्रवात की वर्तमान स्थिति को देखते हुए गुजरात, महाराष्ट्र में चेतावनी जारी कर दी गई है। मछुआरों को इस दौरान समुद्र में जाने से बचने को कहा गया है। कई क्षेत्रों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है।
जमीन से कब टकराएगा चक्रवात ‘शक्ति’
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, शक्ति तूफान के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ने और रविवार तक अरब सागर के उत्तर-पश्चिम और आसपास के मध्य भागों तक पहुँचने की संभावना है। फिर, सोमवार सुबह से, इसके दिशा बदलने और पूर्व, उत्तर-पूर्व की ओर वापस लौटने का अनुमान है। इस दौरान यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा। शनिवार 4 अक्टूबर को इसके ओमान की तरफ बढ़ जाने से भारत में इससे होने वाले नुकसान की आशंका कम हो गई है।
इसके महाराष्ट्र- गुजरात के तट से टकराने की संभावना काफी कम हो गयी है। क्योंकि यह गुजरात और महाराष्ट्र के तटों से दूर पश्चिम की ओर बढ़ रहा है। हालाँकि 7 अक्टूबर 2025 तक महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में तेज हवाएं, भारी बारिश और ऊंची लहरें उठ सकती हैं, इसलिए मछुआरों और तटीय क्षेत्रों के लोगों के लिए अलर्ट जारी किया गया है।
महाराष्ट्र- गुजरात के समुद्री इलाकों में जबरदस्त असर
आईएमडी के मुताबिक सोमवार (6 अक्टूबर 2025) तक 60-100 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से हवाएँ चलने का अनुमान लगाया है। साथ ही गुजरात-महाराष्ट्र तट पर समुद्र की स्थिति खराब से बहुत खराब होने का अनुमान लगाया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को हवा की रफ्तार 45-55 किमी प्रति घंटे से लेकर 65 किमी प्रति घंटे की हो सकती है। मछुआरों को मंगलवार तक उत्तर-पश्चिमी अरब सागर क्षेत्र में न जाने की चेतावनी दी गई है।
भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक शनिवार 4 अक्टूबर 2025 को ही चक्रवात ‘शक्ति’ के जबरदस्त तूफान में तब्दील होने की चेतावनी दी थी। इससे मुंबई और समुद्र से सटे इलाकों में भारी बारिश का अनुमान लगाया गया है। महाराष्ट्र के आंतरिक हिस्सों, विशेषकर मराठवाड़ा और पूर्वी विदर्भ में भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है।
The Maharashtra government has issued an impact warning for Cyclone Shakhti (Oct 3–7), with high to moderate severity. Coastal districts face squally winds (45–65 kmph), rough seas, and heavy rain in Vidarbha, Marathwada, and Konkan. Authorities urged evacuation, disaster… pic.twitter.com/LMdvLgpdYg
पाँच दिनों का पूर्वानुमान जारी करते हुए, आईएमडी ने कहा है कि मुंबई में 8 अक्टूबर तक बारिश होती रहेगी। ठाणे और रायगढ़ ज़िलों में भी बारिश होने की संभावना है। हालाँकि पालघर जिले में 8 अक्टूबर को भारी बारिश की संभावना है।
महाराष्ट्र में की गई तैयारियाँ
महाराष्ट्र सरकार ने चक्रवात ‘शक्ति’ से निपटने के लिए तैयारियाँ कर ली हैं। राज्य सरकार ने पहले ही जिला प्रशासन को अपनी आपदा प्रबंधन सिस्टम को एक्टिव करने के लिए कहा था। तटीय और निचले इलाकों के लोगों को सुरक्षित स्थानों में पहुँचाया जा रहा है। लोगों को समुद्री तूफान से सावधान रहने, समुद्री तटों से दूर रहने, घरों से नहीं निकलने, समुद्री यात्रा नहीं करने की सलाह दी गई है। साथ ही एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को तैनात कर दिया गया है। उत्तरी कोंकण के निचले हिस्से में बाढ़ आने की आशंका जताई गई है।
गुजरात में चक्रवात से निपटने की तैयारियाँ
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने चक्रवात शक्ति के मद्देनजर मछुआरों को समुद्र में न जाने की चेतावनी जारी की है। सौराष्ट्र के तटीय जिलों के कलेक्टर अपने क्षेत्र में लौट आए हैं। ये लोग गाँधीनगर में भूमि प्रशासन और आपदा प्रबंधन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने गए थे। कलेक्टर ऑफिस के कर्मचारियों की रविवार (5 अक्टूबर 2025) की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई है।
गुजरात के समुद्र से सटे सभी जिले स्थिति पर कड़ी नज़र रख रहे हैं, हालाँकि मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के अनुसार, चक्रवात ‘शक्ति’ के गुजरात में आए बिना ही समुद्र में चले जाने की संभावना है।
6 अक्टूबर से धीमा पड़ जाएगा तूफान
उत्तर-पश्चिम अरब सागर के ऊपर मंडरा रहा चक्रवाती तूफान ‘शक्ति’ शनिवार शाम तक 15 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ रहा था और रात 8:30 बजे यह स्थिर हो गया। इसके पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ने और रविवार तक उत्तर-पश्चिम और उससे सटे पश्चिम-मध्य अरब सागर तक पहुँचने की संभावना है। आईएमडी ने कहा कि चक्रवात ‘शक्ति’ इसके बाद पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ेगा और धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा।
शनिवार को चक्रवात द्वारका और पोरबंदर से करीब 420-480 किमी दूर थी। मौसम विभाग ने अगले 12 घंटों में इसके और तीव्र होने की चेतावनी दी थी। रविवार को 100 से 110 किमी प्रति घंटे की तेज हवाएँ चल सकती हैं, जिससे सौराष्ट्र और कच्छ में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। मछुआरों को 6 अक्टूबर तक समुद्र में न जाने की सलाह दी गई है।
चक्रवात ‘शक्ति’ नाम कैसे पड़ा
चक्रवात का नाम ‘शक्ति’ रखने का सुझाव श्रीलंका ने दिया है। विश्व मौसम संगठन (WMO) और एशियाई देशों का संयुक्त पैनल (ESCAP Panel) मिलकर चक्रवातों के नाम तय करते हैं। इसके लिए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के आसपास के 13 देशों ने नाम सुझाए थे। ये 13 देश हैं – भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, थाईलैंड, ईरान, ओमान, कतर, सऊदी अरब, यमन और संयुक्त अरब अमीरात। पहले चक्रवातों के नाम चुनने और याद रखने में काफी दिक्कत होती थी। इसको देखते हुए ये परंपरा शुरू की गई कि आसपास के देश नाम सुझाएँ।