दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे कई हाई-प्रोफाइल आरोपितों के नाम सामने आए हैं। यह मामला पिछले कुछ सालों में सबसे चर्चित मामलों में से एक बन चुका है। इसमें हर वह चीज है जो किसी विवादास्पद केस को सुर्खियों में लाती है, जैसे कि चर्चित आरोपित, जाने-माने वकीलों की दलीलें, न्यायपालिका में पक्षपात के आरोप और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना।
भारत में मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, खासकर 2020 के बाद से, लगातार ऐसी कहानियाँ परोसता आ रहा है जो आरोपितों को निर्दोष साबित करने का प्रयास करती हैं। ऐसा लगता है जैसे मीडिया खुद न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा हो।
हाल ही में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में एस क्यू आर इलियास (सैयद कासिम रसूल इलियास\SQR Ilyas) का एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था, “भारत को यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून) के खिलाफ जन आंदोलन की जरूरत है।” इस लेख में इलियास ने यह धारणा दी कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच बार-बार बदली जाती है, आरोपित बेल पर ही अपनी बेगुनाही साबित कर देते हैं और देरी के लिए हमेशा राज्य (सरकार) को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
इस तरह के तर्क देने वाले व्यक्ति की पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है। इलियास एक समय पर प्रतिबंधित इस्लामी आतंकवादी संगठन सिमी (SIMI) का सदस्य रह चुका है।
उसने 1985 में SIMI छोड़ दिया था। 2019 में उसने पश्चिम बंगाल में वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के टिकट पर मुर्शिदाबाद जिले की मुस्लिम बहुल जंगीपुर सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था । पूर्व SIMI सदस्य अब जमात-ए-इस्लामी हिंद और AIMPLB की केंद्रीय सलाहकार परिषद का सदस्य है।
2016 में जब उमर खालिद को देशद्रोही भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब इलियास ने सवाल उठाया था कि क्या उसके बेटे को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह खुद कभी SIMI से जुड़ा था। उसने कहा था, “मैंने SIMI को 1985 में छोड़ दिया था, जब मेरा बेटा उमर खालिद पैदा भी नहीं हुआ था। उस समय SIMI या उसके किसी सदस्य पर कोई केस नहीं था।”
यह बात ध्यान देने वाली है कि इलियास खुद को और अपने बेटे को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन यह तर्क कमजोर है। कोई भी संगठन एक दिन में आतंकवादी नहीं बनता। SIMI की बुनियाद ही एक कट्टर विचारधारा पर रखी गई थी। सिर्फ इसलिए कि 2001 से पहले उस पर कानूनी प्रतिबंध नहीं लगा था, इसका यह मतलब नहीं कि वह तब तक निर्दोष या समाजसेवी संगठन था।
दूसरी बात, 2012 में जब SIMI पर प्रतिबंध लगे 11 साल हो चुके थे, तब एस क्यू आर इलियास ने इस प्रतिबंध को हटाने की जोरदार माँग की थी। उसने एक कॉन्फ्रेंस बुलाई, जिसमें साफ तौर पर कहा कि सरकार ने SIMI पर बैन लगाकर नाइंसाफी की है। इससे साफ होता है कि इलियास अब भी मानता है कि SIMI कोई आतंकवादी संगठन नहीं था और उसकी गतिविधियाँ जायज थी।
अब जब हमें पता चल चुका है कि एस क्यू आर इलियास कौन है और किस तरह वो खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करता है, तो ये समझना जरूरी हो जाता है कि वे अपने बेटे उमर खालिद को भी कैसे बचाने की कोशिश कर रहा है। उमर खालिद वही शख्स हैं जिसे दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों की साजिश रचने वालों में एक अहम साजिशकर्ता माना गया है।
“ऊपरी तौर पर इलियास का इंडियन एक्सप्रेस में लिखा गया लेख आजादी की माँग जैसा लगता है। लेकिन जरा गहराई से देखें, तो वह एक राजनीतिक प्रचार की तरह सामने आता है, जिसमें तथ्य तोड़े-मरोड़े गए हैं, कानून की गलत व्याख्या की गई है और उसके बेटे के मामले से जुड़ी असुविधाजनक सच्चाइयों को छिपा लिया गया है।”
अगर भारत में यूएपीए कानून पर बहस होनी है, तो वो ईमानदारी से होनी चाहिए। लेकिन इलियास का लेख सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करता है और अंत में एक तरह का प्रोपेगेंडा बन जाता है।
उसका मुख्य दुख ये है कि उमर खालिद और उसके अन्य साथी जैसे शरजील इमाम (जिसने कभी यह कहा था कि पूर्वोत्तर भारत को देश से काट देना चाहिए क्योंकि उस ‘चिकन नेक’ इलाके में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं) को जमानत नहीं मिल रही है और इसका कारण वे तथाकथित देरी को बताता है।
लेकिन यह बात छुपा ली गई है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सह-आरोपित तस्लीम अहमद की जमानत के आदेश में साफ कहा था कि इस मामले में जो देरी हो रही है, उसका बड़ा कारण खुद आरोपित है। कोर्ट ने दर्ज किया कि किस तरह से बार-बार सुनवाई को टाला गया और ये टालमटोल कई बार उन्हीं लोगों ने किया जो पहले से जमानत पर बाहर थे। इसका मकसद एक कृत्रिम देरी पैदा करना था ताकि बाकी आरोपित भी इसी आधार पर जमानत की माँग कर सकें।
इसका मतलब ये है कि देरी कोई सिस्टम की गलती नहीं थी, बल्कि बचाव पक्ष की एक रणनीति थी। और अब उसी देरी को ‘न्याय नहीं मिला’ कहकर पेश करना कोर्ट की बातों को अनदेखा करना और जनता को गुमराह करना है। दरअसल इस लेख में इलियास खुद मानता है कि देरी की वजह उसके बेटे और उसके वकील कपिल सिब्बल की चालबाजियाँ थी।
उसने लिखा है, “सामान्य तौर पर अगर सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई टल जाती है, तो अगली बार वह किसी नए बेंच के सामने आती है। लेकिन खालिद के मामले में ऐसा नहीं हुआ। उसका केस लगातार छह बार एक ही जज के सामने सुना गया। ये देखकर उसके वकीलों ने आखिरकार याचिका वापस ले ली और तय किया कि अब निचली अदालत में किस्मत आजमाएँगे। चूँकि सुप्रीम कोर्ट में बेंच का आवंटन मुख्य जज द्वारा तय किया जाता है, इसलिए एक ही जज के सामने केस बार-बार आना संयोग नहीं कहा जा सकता। अब जब हाई कोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी है, तो एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना ही एकमात्र विकल्प बचा है।”
दरअसल इलियास ने वही बात मानी जो ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी और तत्कालीन मुख्य जज जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी इसकी पुष्टि की थी। उमर खालिद की जमानत याचिका में जितनी देरी हुई, उसका एक बड़ा हिस्सा खुद उसकी ओर से लिया गया था। कुल 14 बार सुनवाई टली, जिसमें से 7 बार खुद उमर खालिद और उसके वकील कपिल सिब्बल ने समय माँगा। ऑपइंडिया की रिपोर्ट और तत्कालीन मुख्य जज (CJI) जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पुष्टि के अनुसार, उमर खालिद की टीम यह नहीं चाहती थी कि यह मामला जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच में सुना जाए। इसलिए बार-बार तारीख टलवाने की कोशिश की गई। इसे ‘बेंच फिक्सिंग’ या ‘फोरम शॉपिंग’ कहा जाता है, यानी अपनी पसंद के जज के सामने केस लाने की कोशिश।
खालिद की टीम ने यहाँ तक कोशिश की कि खुद CJI इस केस की सुनवाई करें। लेकिन जब CJI ने इस कोशिश को नकार दिया और फोरम शॉपिंग पर नाराजगी जताई, तब कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस ले ली।
आज जब कुछ लोग इस देरी के लिए सिस्टम को दोष देते हैं, या कोर्ट पर सवाल उठाते हैं, तो यह जरूरी है कि पूरी तस्वीर सामने रखी जाए। देरी का बड़ा कारण खुद उमर खालिद की ओर से लिया गया समय और कोर्ट की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिशें थीं न कि केवल न्यायपालिका की सुस्ती।
कॉलम में यह कहा गया है कि ‘जमानत हर आरोपित का स्वाभाविक अधिकार’ है। यह बात भावनात्मक रूप से जरूर प्रभावशाली लगती है, लेकिन कानून के अनुसार यह सही नहीं है।
1977 में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने कहा था “जमानत नियम है, जेल अपवाद”। लेकिन यह एक सामान्य सिद्धांत है, कोई हर मामले में लागू होने वाला अधिकार नहीं। कुछ खास कानून जैसे कि यूएपीए, NDPS (नारकोटिक्स कानून) और PMLA (धन शोधन कानून) में जमानत पाना मुश्किल इसलिए किया गया है क्योंकि ये असाधारण और गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, जैसे आतंकवाद, नशीली दवाओं की तस्करी, और आतंक के लिए फंडिंग।
2021 में सुप्रीम कोर्ट ने के ए नजीब केस में कहा था कि अगर ट्रायल बहुत लंबा खिंचता है और इसमें आरोपित की कोई गलती नहीं है, तो कोर्ट जमानत दे सकती है। लेकिन अगर देर खुद बचाव पक्ष (defence) की वजह से हो रही हो, जैसा कि तसलीम अहमद केस में हुआ, तो यह नियम लागू नहीं होता।
यह कहना कि यूएपीए में आरोपित को अपनी ‘बेगुनाही साबित करनी होती है’, पूरी तरह गलत है। यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत अगर अभियोजन (प्रॉसिक्यूशन) का केस पहली नजर में सही दिखता है, तो जमानत नहीं दी जाती।
NIA बनाम वाटाली (2019) केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत के दौरान कोर्ट सिर्फ यह देखती है कि अभियोजन का दिया गया सबूत आरोप को समर्थन देता है या नहीं कोर्ट सबूतों की गहराई से जाँच नहीं करती, न ही आरोपित से कोई सबूत माँगती है। यानी बेगुनाही साबित करना आरोपित का काम नहीं होता।
यूएपीए किसी छोटे-मोटे अपराध के लिए नहीं है। यह कानून आतंकवाद, देश-विरोधी संगठनों और देश की संप्रभुता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों से निपटने के लिए बना है। इन मामलों में लंबी चार्जशीट, हजारों पन्नों की फाइलें और कई दस्तावेज होते हैं, क्योंकि जाँच में डिजिटल डेटा, फाइनेंशियल ट्रेल्स, कई आरोपितों की भूमिका जैसी चीजें आती हैं। इस तरह की चार्जशीट को ‘कागजी सजा’ कहना सच्चाई को नजरअंदाज करना है।
अगर जाँच के दौरान कोई नया सबूत मिलता है, तो कानून के मुताबिक उसे कोर्ट में पेश करना जरूरी होता है। इसे ‘परेशान करने का तरीका’ बताना न्याय प्रक्रिया का अपमान है। क्या हम सिर्फ इसलिए सबूत न दिखाएँ कि आरोपित गरीब या किसी खास धर्म से है?
इलियास के कॉलम में यह दावा किया गया कि TADA और POTA जैसे कानून ‘जन आंदोलनों’ से खत्म हुए लेकिन ये भी सच नहीं है। TADA संसद द्वारा समय पर न बढ़ाए जाने से खत्म हुआ और POTA को अगली सरकार ने राजनीतिक फैसले के तहत हटाया। कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं हुआ था। इतिहास को इस तरह बदलकर पेश करना गलत जानकारी फैलाना है।
कॉलम में लेखक (इलियास) बार-बार यह दावा करता है कि उसके बेटे को सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से फँसाया गया है। वह खुद के SIMI से जुड़े होने को नजरअंदाज करता है। लेकिन SIMI को उसके कट्टर और देश-विरोधी विचारों की वजह से बैन किया गया था। इस इतिहास को मिटाकर खुद को पीड़ित बताना राजनीतिक एजेंडा है, सच्चाई नहीं।
दिल्ली दंगों से जुड़ी चार्जशीट में षड्यंत्र, उकसाने, आतंकवादी गतिविधियों की योजना, झूठे दस्तावेज और संगठित हिंसा के साफ सबूत हैं। इन्हें सिर्फ पुलिस की ‘कल्पना’ कहना गलत और एकतरफा है। अगर आपके ऊपर इतने गंभीर आरोप हैं, तो उसकी जाँच को ‘सिर्फ मुस्लिम नाम’ का मामला कहना अन्याय है न केवल कानून के लिए, बल्कि दंगों के पीड़ितों के लिए भी, खासकर तब, जब उसके अपने बेटे के खिलाफ आरोपों में बड़े पैमाने पर निर्दोष लोगों की हत्या की योजना बनाना और उसे उकसाना शामिल है।
यह बयानबाजी का जामा सबूतों से ध्यान हटाकर पहचान की ओर मोड़ देता है। लेकिन आरोप नामों के नहीं, बल्कि कार्रवाई के होते हैं। दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में कई आरोप-पत्र साजिश, उकसावे और आतंकवाद को दर्शाते हैं।
भारत आतंकवाद, माओवाद और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग से चलने वाले कट्टरपंथी नेटवर्क का सामना कर रहा है। 26/11, बाटला हाउस और कई सीरियल ब्लास्ट जैसे हमलों ने दिखा दिया है कि साधारण कानून इन खतरों से निपटने के लिए काफी नहीं हैं। यूएपीए को संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशों के अनुसार अपडेट किया गया ताकि भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से प्रभावी तरीके से निपट सके।
इलियास का लेख किसी गंभीर और संतुलित बहस का हिस्सा नहीं है, बल्कि एकतरफा और भ्रामक प्रचार है। एक सच्ची बहस में नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बात होती है, पर इलियास इस संतुलन को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है। वो इसे सिर्फ एक नारे में बदल देता है, जो किसी भी तरह से विद्वतापूर्ण या ईमानदार विश्लेषण नहीं कहा जा सकता।
उसका लेख कई तरह की गलत जानकारी फैलाता है, जैसे वो कोर्ट की ऐसी प्रक्रिया का जिक्र करता है, जो असल में होती ही नहीं। वह जमानत से जुड़े कानून को गलत ढंग से पेश करता है।
UAPA कानून की सीमा और असर को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है, आरोपितों की ओर से की गई देरी को छुपा लेता है। ‘जन आंदोलनों’ का एक झूठा इतिहास गढ़ता है और फिर बार-बार SIMI के पुराने मामलों और ‘मुस्लिम नाम’ ब्रांडिंग के थके हुए पीड़ित आख्यान पर वापस आ जाता है।
इस तरह की बातें न तो तथ्यात्मक होती हैं और न ही समाज के लिए फायदेमंद। ये सिर्फ लोगों को गुमराह करने के लिए लिखी जाती हैं।
UAPA को लेकर एक गंभीर बहस होनी चाहिए, इसके दुरुपयोग की संभावना, जमानत की प्रक्रिया और कानूनी सुरक्षा को लेकर। लेकिन यह बहस तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, भावनाओं और पीड़ितता की राजनीति पर नहीं।
यह लेख मूल रुप से अंग्रेजी में नूपुर जे शर्मा ने लिखा है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।


