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अमेरिका ने प्रोफेसर निताशा कौल को बनाया SFJ आतंकी पन्नू हत्याकांड साजिश का एक्सपर्ट विटनेस: एंटी-इंडिया प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात, भारत सरकार रद्द कर चुका है OCI कार्ड

अमेरिका की सरकार ने भारतीय मूल की ब्रिटिश शिक्षाविद निताशा कौल को खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश के लिए चल रहे ट्रायल में एक्सपर्ट विटनेस (विशेषज्ञ गवाह) के तौर पर शामिल किया है।

अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने अपने आधिकारिक अदालती दस्तावेज में कहा है कि प्रोफेसर कौल इस मामले में साक्ष्य देंगी। वह लंदन स्थित वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय में राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंध और आलोचनात्मक बहु-विषयक अध्ययन की प्रोफेसर हैं और वहीं पर लोकतंत्र अध्ययन केंद्र की निदेशक भी हैं।

दस्तावेजों के अनुसार, कौल कई बिंदुओं पर गवाही देंगी। इसमें यह भी शामिल है कि भारत सरकार ने सार्वजनिक रूप से पन्नू और हरदीप सिंह निज्जर की आतंकवादी गतिविधियों की निंदा की थी।

यह जानकारी स्वतंत्र खोजी पत्रकार ‘जर्नलिस्ट V’ ने अपने X (पूर्व ट्विटर) अकाउंट पर साझा की है।

कौल को अमेरिका में एक्सपर्ट विटनेस के तौर पर बुलाने की बात से भारत में विवाद खड़ा हो गया है क्योंकि निताशा ने कई भारत-विरोधी बयान दिए हैं और भारतीय संस्थानों के खिलाफ लंबे समय से सक्रिय रही हैं।

निताशा कौल कौन हैं?

निताशा कौल को उनके वर्षों पुराने बयानों और गतिविधियों के कारण अक्सर ‘भारत-विरोधी प्रचारक’ या ‘एंटी- इंडिया प्रोपेगैंडिस्ट’ कहा जाता है। मई 2024 में उन्होंने सोशल मीडिया पर शिकायत की थी कि भारत सरकार ने उनका ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड रद्द कर दिया है।

उन्होंने अपनी पोस्ट में सरकार पर असहमति की आवाज को दबाने के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय दमन’ और उनके ‘शोध कार्य’ के लिए सजा देने का आरोप लगाया था। उनके अनुसार ये शोध कार्य प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की आलोचना करता है।

उन्होंने लिखा कि उनके साथ अन्याय हुआ है और याद दिलाया कि इससे पहले भी उन्हें भारत में प्रवेश से रोका गया था, जब उन्हें कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर भाषण देने के लिए आमंत्रित किया था।

निताशा के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों को 20,000 शब्दों का विस्तृत जवाब भेजा था, फिर भी सरकार ने उनका OCI कार्ड रद्द कर दिया। उन्होंने दावा किया कि यह भारत की ‘संकीर्ण मानसिकता और असुरक्षा’ का संकेत है, जो असहमति को जगह नहीं देती।

हालाँकि भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि OCI कार्ड कोई अधिकार नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार है। यह विशेष शर्तों के तहत भारतीय मूल के लोगों को दिया जाता है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति भारत की संप्रभुता, संवैधानिक मूल्यों या राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों में शामिल पाया जाता है, तो इसे रद्द किया जा सकता है।

भारत की संप्रभुता-अखंडता को नुकसान पहुँचाने के प्रयास पर सरकार ने रद्द किया OCI कार्ड

निताशा के मामले में उनकी ओर से साझा किए गए दस्तावेजों में लिखा था- “भारत सरकार के संज्ञान में यह बात आई है कि आप भारत-विरोधी गतिविधियों में शामिल पाई गई हैं, जो दुर्भावना से प्रेरित हैं और तथ्यों या इतिहास की पूरी तरह अनदेखी करती हैं। आपने अपने लेखन, भाषणों और पत्रकारिता के माध्यम से भारत और उसकी संस्थाओं की संप्रभुता को बार-बार निशाना बनाया है।”

भारत सरकार ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनकी भारत-विरोधी गतिविधियों के कारण उनका OCI कार्ड रद्द किया गया। निताशा लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव का प्रचार करती रही हैं।

मई 2024 में उन्होंने एक काल्पनिक कहानी साझा की थी। इसमें उन्होंने भारत में EVM मशीनों में वोट न गिनने का सपना देखा था। उन्होंने इस कहानी को कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से EVM को लेकर फैलाई गए विवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया।

उन्होंने कहा, “हाल ही में एक वर्कशॉप लंच में मैं एक ब्रिटिश सहयोगी को बता रही थी कि पिछली रात मैं ठीक से सो नहीं पाई क्योंकि मैंने सपना देखा कि लोग EVM पर वोट डाल रहे हैं लेकिन वोट गिने नहीं जा रहे। तुर्की के एक कलीग ने सुना और कहा कि उसे भी एर्दोगन के चुनावों के दौरान ऐसे सपने आते थे।”

फरवरी 2024 में उन्हें बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पहुँचते ही वापस भेज दिया गया था। यह कार्रवाई उनके खिलाफ जारी एक लुकआउट सर्कुलर नोटिस के आधार पर की गई थी, क्योंकि भारतीय एजेंसियों ने उन्हें ‘अलगाववादी’ बयानों और कश्मीर पर भारत-विरोधी रुख के लिए चिन्हित किया था।

कौल ने कहा कि उन्हें एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अधिकारियों ने रोका और बताया कि ‘दिल्ली से ऑर्डर्स’ हैं कि उन्हें देश में घुसने न दिया जाए। उन्होंने कहा कि उनके पास यात्रा के सभी कागज थे, लेकिन फिर भी उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

उन्होंने दावा किया कि वह ‘लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता’ के लिए आवाज उठाना जारी रखेंगी, चाहे उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े। बेंगलुरु एयरपोर्ट से डिपोर्टेशन के बाद उन्होंने एक्स पर तीखी प्रतिक्रिया दी, ठीक उसी तरह जैसे अब उन्होंने OCI कार्ड रद्द होने के बाद दी है।

उन्होंने पहले भी RSS के बारे में झूठी बातें फैलाई थीं और ‘Stand With Kashmir’ (स्टैंड विथ कश्मीर), ‘Kashmir Solidarity Movement’ और ‘Indian American Muslim Council’ जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया था।

कौल ने व्हार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को रद्द कराने में भी अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CoDS) बिपिन रावत की मृत्यु का भी मजाक उड़ाया था। निताशा कौल ने उनके असमय निधन को सही ठहराते हुए उन्हें ‘कश्मीरियों का दुश्मन’ बताया था।

भारत-विरोधी आवाज का इस्तेमाल करती अमेरिकी सरकार

हैरानी की बात ये है कि अमेरिका सरकार ने एक भारत-विरोधी विचार रखने वाले इंसान को एक्सपर्ट विटनेस के तौर पर चुना है। ये भारत के लिए चिंता का विषय बन गया है। इसे वॉशिंगटन का जानबूझकर भारत-विरोधी आवाज को मंच देने की कोशिश माना जा रहा है।

कौल की गवाही का उपयोग यह साबित करने के लिए किया जा सकता है कि भारत ने विदेशों में खालिस्तानी आतंकवादियों को निशाना बनाया है, लेकिन उनके भारत-विरोधी बयानों का इतिहास उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।

कई लोगों के लिए यह ऐसा लगता है जैसे ये भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किनारा करने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो, खासकर तब जब भारत ने विदेशों में हत्या की साजिशों में शामिल होने के आरोपों को बार-बार खारिज किया है।

गुरपतवंत सिंह पन्नू कौन है?

गुरपतवंत सिंह पन्नू अमेरिका में रहने वाला खालिस्तानी आतंकवादी है। उसके पास अमेरिका और कनाडा दोनों देशों की नागरिकता है। वह अमेरिका में वकील होने की बात कहता है और सिखों के अधिकारों की लड़ाई में अग्रणी होने का दावा करता है।

असल में, वह लगातार खालिस्तानी विचारों का प्रचार करता है और भारत के खिलाफ धमकियाँ देता रहता है। वह कनाडा, अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय राजनयिकों के खिलाफ हिंसा भड़काने का भी काम करता है।

भारत सरकार ने उसे गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकवादी घोषित किया है। उसकी संस्था ‘Sikhs For Justice’ को भी भारत सरकार ने आतंकवादी संगठन घोषित किया है।

क्या है पन्नू मामले की तह

पन्नू की हत्या की साजिश का खुलासा पिछले साल हुआ था जब अमेरिकी न्याय विभाग ने दो भारतीय नागरिकों के खिलाफ आरोप दर्ज किए थे। पहले आरोपी विकास यादव पर भारत में बैठकर साजिश रचने का आरोप है। पहले उसे ‘CC-1’ के नाम से पहचाना गया था, अब उसे आधिकारिक तौर पर आरोपित बनाया गया है।

दूसरा आरोपी निखिल गुप्ता चेक गणराज्य में गिरफ्तार हुआ था और फिलहाल ब्रुकलिन में डिटेंशन में है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यादव पहले भारत के कैबिनेट सचिवालय में कार्यरत था। उसने निखिल गुप्ता को अमेरिका में एक हिटमैन खोजने का काम सौंपा था ताकि पन्नू को खत्म किया जा सके।

मैनहैटन फेडरल कोर्ट में फाइल किए गए एक मामले में अमेरिकी न्याय विभाग ने दावा किया था कि एक अज्ञात भारतीय सरकारी कर्मचारी (CC-1) ने निखिल गुप्ता को पन्नू को मारने के लिए एक हत्यारे की खोज करने को कहा था। गुप्ता को जून 2023 में प्राग में हिरासत में लिया गया और जून 2024 में अमेरिका प्रत्यर्पित किया गया।

अमेरिका की ओर से नवंबर 2023 में खालिस्तानी आतंकवादी पन्नू की हत्या की असफल साजिश के आरोप ऐसे समय में सामने आए जब कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय अधिकारियों की संलिप्तता का आरोप लगाया था। भारत ने इन आरोपों को बार-बार निराधार बताया है।

अब जब अमेरिका इस मामले को आगे बढ़ा रहा है और निताशा कौल जैसे व्यक्तियों को विशेषज्ञ गवाह बना रहा है तो यह मामला भारत और वाशिंगटन के बीच संबंधों में तनाव को एक और पायदान पर लेकर जा सकता है।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

प्रिय आरफा, अगर आपके ‘I Love Muhammad’ में इतना ही भोलापन है तो इसके कारण इस्लामी भीड़ हिंदुओं और पुलिस पर क्यों टूट रही है?

प्रिय आरफा खानम शेरवानी,

यह देखकर अच्छा लगता है कि आप ‘तीन सरल शब्दों – आई लव मोहम्मद’ के सम्मान के लिए इतनी गंभीरता दिखा रही हैं। यह निश्चित रूप से धार्मिक पहचान का एक भाव है। यह बात भी सही है कि हर भारतीय नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है लेकिन जब आप यह कहती हैं कि भारतीय नागरिकों को अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो क्या इसमें हिंदू भी शामिल होते हैं आरफा खानम शेरवानी? और अगर आप मानती हैं कि हिंदुओं को भी अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो फिर आप तब चुप क्यों रहती हैं जब आपके ही समुदाय के लोग हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर निशाना बनाते हैं?

गुजरात के गांधीनगर जिले के दहेगाम तालुका के बहीयाल गाँव में 24 सितंबर 2025 की रात हिंदुओं पर गरबा उत्सव के दौरान हमला हुआ। हिंसा की शुरुआत एक हिंदू युवक की सोशल मीडिया पोस्ट से हुई, जिसमें उसने लिखा था- ‘आई लव महादेव’। आपकी ही कौम के लोगों को यह पोस्ट नागवार गुजरी और वे युवक की दुकान पर पहुँच गए। इसके चलते उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। उसके न होने पर दुकान में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई। CCTV फुटेज में साफ दिखा कि कई मुस्लिम युवक दुकान में घुसकर नुकसान पहुँचा रहे थे।

यह झगड़ा जल्दी ही बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गया। पत्थर फेंके गए, लाठियाँ और रॉड चलाई गईं और गरबा कार्यक्रम में हिंदुओं के वाहन जला दिए गए। 8 से ज्यादा गाड़ियाँ तोड़ी-फोड़ी गईं और एक दुकान पूरी तरह जला दी गई। इसके बाद हालात काबू करने पहुँची पुलिस पर भी हमला किया गया जिसमें दो पुलिस वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। एक वीडियो में साफ दिखा कि मुस्लिम युवक पत्थर बरसा रहे थे और उसी बीच एक हिंदू माँ अपने बेटे को ढूँढते हुए रो रही थी। यह तस्वीर उस भीड़ के खौफ को दिखाने के लिए काफी है।

स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस वक्त बाहर बैठे एक दुकानदार ने बताया कि करीब 5,000 लोगों की भीड़ रात में गाँव पर टूट पड़ी और उसकी दुकान को जानबूझकर निशाना बनाया। उसने बताया कि उसके गाँव में केवल 80 हिंदू परिवार रहते हैं और चारों तरफ मुसलमानों की आबादी है। भीड़ पत्थरों और हथियारों के साथ पहुँची और उसकी दुकान को तहस-नहस कर दिया जबकि मुस्लिम दुकानों को छुआ तक नहीं। उसने यह भी बताया कि हमलावरों में नाबालिग लड़के भी शामिल थे।

यह घटना साफ तौर पर हिंदू समाज को निशाना बनाने के लिए की गई थी। एक हिंदू युवक की भगवान शिव के प्रति आस्था दिखाने की बात ही हिंसा का बहाना बन गई। यह कोई झड़प नहीं थी बल्कि हिंदुओं और उनकी भक्ति से असहिष्णुता को लेकर सांप्रदायिक हमला था।

तो बताइए, शेरवानी, अगर तीन साधारण शब्द कभी भी खतरनाक नहीं माने जाने चाहिए तो फिर हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर हिंसक सजा क्यों दी गई? उस समय आपका आक्रोश कहाँ चला गया था?

जरा सोचिए आरफा खानम शेरवानी जी, अगर वह हिंदू युवक भागा ही नहीं होता तो? क्या आपको लगता है कि आपके ही धर्म के वो लोग, जो उसकी दुकान तोड़ रहे थे और हिंसा कर रहे थे, उस हिंदू लड़के को नुकसान नहीं पहुँचाते? और अगर सच में वे उसे चोट पहुँचा देते, तो क्या आप यह कहतीं कि यह उनका हक है क्योंकि मुसलमानों को इतना आहत महसूस होने का विशेष अधिकार है कि वे गैर-मुसलमानों की स्वतंत्रता छीन लें?

क्या आपको सच में लगता है कि हिंदू सिर्फ अपनी भक्ति जताए तो वह आपके धर्म का अपमान है? क्या सिर्फ हिंदुओं का होना ही आपके समाज के लिए हिंसा करने का कारण बन जाता है? बताइए आरफा, क्या आप मानती हैं कि केवल मुसलमानों को ही अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है जबकि अक्सर यह धार्मिक पहचान दूसरों के धर्म को कुचलने पर आधारित होती है।

आप बहुत परेशान नजर आती हैं जब मुसलमानों को ‘आई लव मोहम्मद’ कहने पर अपराधी बताया जाता है। लेकिन ज़रा देखिए कि यही तीन ‘भोले-भाले’ शब्द आपके ही समुदाय के कुछ लोगों ने देशभर में कैसी तबाही मचाने के लिए इस्तेमाल किए हैं। ये शांति और मोहब्बत के नारे नहीं रहे। इन्हें मजहबी उन्मादियों ने जंग का नारा बना दिया है। हमने कई बार देखा है कि भीड़ इन नारों को ‘सर तन से जुदा’, पत्थरबाजी, आगजनी, तोड़फोड़ और यहाँ तक कि पुलिस पर सीधे हमले के लिए इस्तेमाल करती है।

जरा इस पोस्टर को ही देख लीजिए।

‘I Love Muhammad’ का पोस्टर

मैं 100% सहमत हूँ कि आपका ‘I Love Muhammad’ वाला पोस्टर लगाने का हक है क्योंकि यह आपके धर्म की अभिव्यक्ति है और इसे सम्मान किया जाना चाहिए। पर एक हिंदू होने के नाते, जिसकी कम्युनिटी और उसके लोग परेशानी में हैं, मैं आपसे पूछती हूँ आपकी कम्युनिटी को यह बात जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस होती है कि ‘अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुजदिल भी पहली सफ में खड़े मिलेंगे’?

आरफा, आपकी कम्युनिटी कौन सी जंग लड़ रही है? यह जंग किसके खिलाफ है? आपकी कम्युनिटी जीतकर क्या करेगी? क्या आप जानती हैं कि किसने भी इस काल्पनिक ‘जंग’ की बात की थी? PFI ने। आप जानती हैं उन्होंने क्या लिखा? उन्होंने एक दस्तावेज में बताया कि जो आने वाली जंग होगी, उसके मतलब हिंदुओं का सफाया है जिसमें हिंदुओं की लिस्ट बनाना और उन्हें मार देना शामिल है। भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने की बात की गई, जहाँ गैर-मुसलमानों की खासकर हिंदुओं की कोई जगह न रहे। आरफा, क्या आप PFI और अपने कुछ साथियों से कहेंगी कि ‘अपनी रणनीति बदल लो, अपनी विचारधारा नहीं’ जैसा कि आपने शाहीन बाग के जिहादियों से कहा था, ताकि आप अपना सेक्युलर लबादा ओढ़े दिखें।

उत्तरी प्रदेश, उतराखंड और गुजरात समेत कई राज्यों में हिंसा भड़की है। शहरों में मार्च के दौरान पुलिस पर हमला हुआ और उन पर पत्थर फेंके गए और लोग जोर-जोर से ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगा रहे थे। एक मौलवी ने तो बरेली में एक इंस्पेक्टर को जान से मारने की धमकी भी दी थी।

यह नारा इबादत का ही प्रतीक हो सकता है और मुस्लिम समुदाय को अपने धर्म को खुलकर जताने का अधिकार होना चाहिए। समस्या यह है कि कुछ इस्लामी कट्टरपंथी मजहब को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे इसे अलगाववादी और श्रेष्ठतावादी सोच के लिए प्रयोग करते हैं। इसका नतीजा अक्सर यही होता है कि हिंदुओं पर हमला होता है, उन्हें सताया जाता है, दबाया जाता है और कभी-कभी तो उनका कत्लेआम भी कर दिया जाता है।

हिंदुओं ने कहा- ‘आई लव महादेव’। मुसलमानों ने उसका जवाब पत्थरबाजी, आगजनी और चुन-चुनकर हिंदू दुकानों पर हमले से दिया। मुसलमानों ने कहा- ‘आई लव मोहम्मद’ लेकिन इसके साथ दंगे हुए, सिर काटने की धमकियाँ दी गईं और पुलिस से हिंसक झड़पें की गईं। तो क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय राज्य या हिंदुओं पर सवाल उठाने के बजाय आपको उन लोगों से सवाल करना चाहिए जिन्होंने उसी मजहब का नाम कलंकित कर दिया है जिसे आप बड़े प्यार से मानती हैं?

सितंबर 2024 में आपने ‘लव जिहाद, थूक जिहाद और लैंड जिहाद’ जैसे दर्ज मामलों को ‘फर्जी प्रोपेगेंडा’ कहकर खारिज कर दिया और उन हिंदू पीड़ितों की गवाही जानबूझकर नजरअंदाज कर दी जो इससे पीड़ित थे। फिर जनवरी 2025 में आपने ‘द वायर’ की उस रिपोर्टिंग का बचाव किया जिसमें हमीरपुर में जबरन धर्मांतरण के आरोप में पकड़े गए मुस्लिमों को बचाने की कोशिश की गई थी। आपने पुलिस पर सवाल खड़े किए लेकिन उन हिंदू परिवारों की पीड़ा को नहीं माना जिन्हें जबरदस्ती धर्म बदलने के लिए मजबूर किया या। ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, इस सूची का कोई अंत नहीं है।

असल में आरफा, आप कभी उन मुस्लिमों जैसी नहीं बन पाएँगी जो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे थे। आप कभी अरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों की इज्जत नहीं करेंगी। आप कभी उन मुसलमानों के लिए खड़ी नहीं होंगी जो पहले भारत को रखते हैं और दिल से हिंदुओं को अपना भाई समझते हैं। आरफा आप केवल तब बोलेंगी जब कट्टर इस्लामी भीड़ हिंदुओं पर हमला करेगी। आरफा आप जिहादियों की वैचारिक रीढ़ हैं।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

छेड़छाड़, अश्लीलता, हिंसा और लव जिहाद: गरबा पंडालों में घुसकर इस्लामी कट्टरपंथी करते हैं ये सब काम, 17 घटनाओं से जानें क्यों इनकी एंट्री पर बैन लगना जरूरी

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नवरात्रि से पहले गरबा आयोजनों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई हिंदू संगठनों ने गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है। संगठनों का कहना है कि कट्टरपंथी अपनी पहचान छिपाकर गरबा में घुसते हैं और ‘लव जिहाद’ जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

‘घर वापसी’ की चेतावनी और पोस्टर

भोपाल की श्रीकृष्ण सेवा समिति ने इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने चेतावनी दी है कि अगर कोई गैर-हिंदू गरबा पंडाल में प्रवेश करता है, तो उसकी ‘घर वापसी’ कराई जाएगी। पंडालों के बाहर ऐसे पोस्टर भी लगाए गए हैं, जिन पर साफ लिखा है कि ‘गरबा सिर्फ हिंदुओं’ के लिए है।

बीजेपी नेता आलोक शर्मा ने भी इस मामले पर अपनी चिंता जाहिर की है। आलोक शर्मा ने कहा कि कुछ लोग गरबा पंडालों में ‘कलावा और तिलक’ लगाकर आते हैं और हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनका शोषण करते हैं। आलोक शर्मा का कहना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए इस तरह के फैसले लेना बहुत जरूरी है।

‘लव जिहाद’ की घटनाओं का हवाला

यह माँग इसलिए भी उठ रही है क्योंकि पिछले कुछ सालों में गरबा आयोजनों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं। इन घटनाओं में मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर गरबा में आते थे और हिंदू लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार करते थे। पुलिस ने सबूतों के आधार पर कई ऐसे लोगों को गिरफ्तार भी किया है। कुछ मामलों में तो ऐसे भी उदाहरण मिले हैं, जहाँ मुस्लिम युवक केवल हिंदू लड़कियों की वीडियो बनाने के मकसद से गरबा समारोह में घुसे थे।

नवरात्रि जैसे पवित्र त्योहारों से कट्टरपंथियों की साजिशें शुरू होती है और अंत में ये मासूम लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर न सिर्फ प्रताड़ित करते हैं बल्कि उन पर धर्मांतरण का दबाव भी डालते हैं। ये 17 घटनाएँ साबित करती है कि गैर-हिंदुओं का प्रवेश गरबा पंडालों में वर्जित क्यों जरुरी है।

1- डांडिया नाइट की आड़ में हिंदू लड़कियों को फँसाने की साजिश

महाराष्ट्र के नागपुर में 12 अक्टूबर 2021 को लेजंटा फाइव स्टार होटल में राजिक अंसारी नाम के एक मुस्लिम युवक ने डांडिया नाइट कार्यक्रम का आयोजन किया था। आयोजन की जानकारी मिलने के बाद विश्व हिंदू परिषद सहित कई हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध किया था। हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया था कि इस तरह के आयोजनों के जरिए मुस्लिम युवकों को हिंदू लड़कियों के साथ दोस्ती करने और उन्हें निशाना बनाने का मौका दिया जा रहा था।

2- इंदौर में गरबा पंडाल से चार मुस्लिम युवक गिरफ्तार

मध्य प्रदेश के इंदौर में 10 अक्टूबर 2021 को गाँधी नगर इलाके में एक गरबा कार्यक्रम के दौरान चार मुस्लिम युवक पकड़े गए थे। आरोपितों की पहचान अदनान शाह, मोहम्मद उमर, अब्दुल कादिर और सैयद साकिब के रूप में हुई थी। SDM पराग जैन के निर्देश पर पुलिस ने चारों युवकों को गिरफ्तार किया था।

3- दिल्ली के गरबा कार्यक्रम में ‘2 मिनट की लव स्टोरी’ पर विवाद

दिल्ली में रेडियो मिर्ची गरबा 2022 के दौरान एक कार्यक्रम ‘2 मिनट की लव स्टोरी‘ पर विवाद हुआ था। इस कार्यक्रम में कथित तौर पर एक युवक ने ‘गरबा पंडालों में लव जिहाद’ की साजिश से मिलती-जुलती बात कही। रेडियो मिर्ची के शो में एक युवक अली ने अपने दोस्त को एक इंटरनेट ऐप के बारे में बताया था। अली ने कहा कि वह एक ऐसा ऐप बना रहा है, जिसमें गरबा पंडालों में आने वाली लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी जानकारी डालकर रजिस्टर कर सकेंगी।

अली ने बताया कि ऐप के जरिए लड़के अपनी पसंद की लड़की को मैसेज करके उसे पंडाल के बाहर बुला सकते हैं और उसके साथ गरबा खेल सकते हैं। इस बातचीत में गर्व के साथ यह भी बताया गया कि वे लड़कियों का डेटा इकट्ठा करेंगे और फिर उसी पंडाल में जाएँगे जहाँ उनकी पसंदीदा प्रोफाइल वाली लड़की डांडिया खेलने का विकल्प चुनेगी। इस कार्यक्रम के बाद रेडियो मिर्ची पर गंभीर आरोप लगे थे कि ये ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा दे रहा है।

4- गरबा पंडाल घुसकर की हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़

मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितंबर 2022 को नानाखेड़ा ग्राउंड में गरबा कार्यक्रम के दौरान कुछ मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर अंदर घुसे और वहाँ मौजूद महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने लगे। आयोजकों ने शक होने के बाद पकड़ा। मुस्लिम युवकों ने अपना नाम संदीप-बबलू बताया। सख्ती से पूछताछ के बाद उन्होंने जुर्म कबूल किया।

5- अहमदाबाद गरबा में जबरन घुसे मुस्लिम युवक

गुजरात के अहमदाबाद में 29 सितंबर 2022 को सिंधु भवन रोड पर एक गरबा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें कुछ मुस्लिम युवक चेतावनी के बावजूद पंडाल में घुसे थे। बाद में आयोजकों ने चेकिंग के दौरान उन्हें पकड़ा था।

6- गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू महिलाओं का बना रहे थे वीडियो

मध्य प्रदेश के इंदौर में 30 सितंबर 2022 को कुछ मुस्लिम युवकों को एक गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों के वीडियो बनाते हुए पकड़े गए थे। पंडाल में मौजूद कुछ हिंदू युवकों को इन लोगों पर शक हुआ था। पुलिस को बुलाने पर मुस्लिम युवक मौके से फरार हो गए थे।

7- जयपुर गरबा पंडाल में जबरन घुसने की कोशिश, मुस्लिम युवक भागे

जयपुर में 30 सितंबर 2022 मुरलीपुरा इलाके के नारायण वाटिका मैरिज गार्डन में गरबा कार्यक्रम में कुछ मुस्लिम युवक जबरन पंडाल में घुसे थे। गरबा पंडाल की सुरक्षा में तैनात बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने शक के आधार पर ID चेक की थी। उसके बाद ही मुस्लिम युवकों की पहचान उजागर हुई थी। हालाँकि, आरोपित अंधेरे का फायदा उठाकर मौके से भागने में कामयाब हो गए थे।

8- सूरत गरबा पंडाल में मुस्लिम बाउंसरों का विरोध

गुजरात के सूरत में 5 अक्टूबर 2022 को वेसु इलाके में एक गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम बाउंसरों की तैनाती को लेकर बजरंग दल ने कड़ा विरोध किया था। बजरंग दल ने आरोप लगाया था कि मुस्लिम बाउंसर बिना जाँच के मुस्लिम युवकों को हिंदू नामों के साथ गरबा पंडास में घुसा रहे थे।

9- गरबा में मुस्लिम युवकों ने हिंदू युवक को चाकू मारा

राजस्थान के बीकानेर में 6 अक्टूबर 2022 को कुछ मुस्लिम युवकों ने गरबा पंडाल में घुसकर हिंदू लड़कियों से छेड़खानी की थी। जब एक हिंदू युवक ने इसका विरोध किया तो उसे चाकू मारा गया। पुलिस ने शाहरुख, समीर और जुबैर नाम के तीन मुस्लिम युवकों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था।

10- मुनव्वर फारूकी के गरबा इवेंट में जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने किया विरोध

मुंबई में 10 अक्टूबर 2022 को स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी अपने कुछ मुस्लिम दोस्तों के साथ एक गरबा कार्यक्रम में पहुँचा था, जिसके बाद उसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। वायरल वीडियो में मुनव्वर को हिंदू लड़कियों से घिरा हुआ देखा गया था। हिंदू संगठनों ने इस मामले का कड़ा विरोध किया था। क्योंकि मुनव्वर फारूकी हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुका था और फिर वे हिंदू के त्योहार गरबा पंडाल में शामिल हुआ था। हिंदू संगठनों का आरोप था कि ऐसे मुस्लिम चेहरे गरबा आयोजनों का इस्तेमाल हिंदू लड़कियों को बहकाने और फँसाने की साजिश के तौर पर करते हैं।

11- हिंदू बनकर आया था ‘आमिर’

मध्य प्रदेश के इंदौर में 10 अक्तूबर 2023 को एमआर 10 स्थित वैभव श्री गार्डेन में ‘आरकेई गरबा नाइट’ कार्यक्रम हुआ था। इसमें एक मुस्लिम युवक आमिर पकड़ा गया था। आमिर पर आरोप था कि वो एक हिंदू युवती को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जा रहा था। ‘आमिर‘ अपना नाम ‘अमन‘ बताकर गरबा कार्यक्रम में शामिल हुआ था। लड़की के परिवार वालों ने आरोप लगाया कि आमिर की नीयत ठीक नहीं थी। पुलिस ने जब उसका फोन चेक किया, तो उसमें कई अश्लील चैट्स मिलीं, जिससे यह बात और साफ हो गई कि उसका मकसद गलत था। फिर पुलिस ने आरोपित आमिर को गिरफ्तार किया।

12- गुजरात गरबा पंडाल में ID चेक से खुला राज

गुजरात में 18 अक्टूबर 2023 को नवरात्रि के दौरान ही गरबा कार्यक्रम में मुस्लिम युवक को अपना नाम छिपाकर पंडाल में घुसने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। गरबा आयोजकों ने पंडाल में प्रवेश से पहले सभी लोगों की ID चेक करना शुरू किया। इसी दौरान एक युवक पर शक हुआ था। जब उसकी आईडी की जाँच की गई, तो उसकी असली पहचान सामने आई। पता चला कि वह मुस्लिम था, जो हिंदू नाम का इस्तेमाल कर अंदर घुसने की कोशिश कर रहा था। फिर तुरंत उसे पंडाल से बाहर निकाला गया।

13- उज्जैन गरबा में घुसा था अमन, हिंदू महिलाओं से छेड़छाड़

मध्य प्रदेश के उज्जैन में 20 अक्टूबर 2023 को दशहरा मैदान इलाके में गरबा कार्यक्रम में एक मुस्लिम युवक को पंडाल में घुसकर हिंदू महिलाओं से छेड़छाड़ करते हुए पकड़ा गया था। आरोपित की पहचान ‘अमन खान’ थी। हिंदू संगठनों की चेतावनी के बावजूद अमन गरबा पंडाल में घुस गया था। जब उसने हिंदू महिलाओं के साथ छेड़छाड़ शुरू की, तो हिंदू जागरण मंच के सदस्यों ने उसे रंगे हाथों पकड़ था। सदस्यों ने तुरंत पुलिस को बुलाया और आरोपित को हवाले कर दिया।

14- हिंदू वेशभूषा से गरबा पंडाल में घुसा मुस्लिम, आधार कार्ड से खुली पोल

गुजरात के कर्णावती शहर में 20 अक्टूबर 2023 को YMCA क्लब के गरबा मंडप में एक मुस्लिम युवक को हिंदू वेशभूषा में पंडाल में घुसने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया था। पंडाल के लोगों ने शक के आधार पर मुस्लिम युवक से पूछताछ की थी। मुस्लिम युवक के आधार कार्ड चेक के बाद उसकी पहचान सामने आई थी। इसके बाद आयोजकों ने उसे तुरंत पंडाल से बाहर निकाला था।

15- इंदौर में गरबा पंडाल में घुसे थे अरबाज-तहखान

मध्य प्रदेश के इंदौर में 22 अक्टूबर 2023 को सांवेर रोड स्थित एक कॉलेज में आयोजित गरबा कार्यक्रम में दो मुस्लिम युवक हिंदू नामों के साथ घुसे थे। आरोपितों की पहचान अरबाज पटेल और तह खान थी। असली पहचान उजागर होने के बाद हिंदू समुदाय कड़ा विरोध किया था। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने दोनों मुस्लिम युवकों को हिरासत में ले लिया था।

16- उज्जैन में ‘राहुल’ बनकर आया फिरोज, इंदौर में ‘पंकज’ बनकर घुसा आसीम

उज्जैन में 8 अक्टूबर 2024 को एक मुस्लिम युवक फिरोज ‘राहुल’ बनकर गरबा पंडाल में घुस आया था। जब कुछ हिंदू संगठनों को उस पर शक हुआ, तो पुलिस को शिकायत की गई। जाँच के दौरान उसके फोन से कई हिंदू लड़कियों के साथ अश्लील चैटिंग और उन्हें ब्लैकमेल करने के सबूत मिले। इसके बाद पुलिस ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया।

उसी दिन इंदौर में भी इसी तरह की एक घटना सामने आई। एक मुस्लिम युवक आसीम नागौरी ‘पंकज’ बनकर एक गरबा कार्यक्रम में शामिल हुआ था। जब उसकी पहचान उजागर हुई तो उसके मोबाइल की जाँच की गई। पुलिस को उसके फोन से भी कई हिंदू लड़कियों के साथ आपत्तिजनक चैट और ब्लैकमेलिंग से जुड़ी जानकारी मिली। पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार किया।

17- गुना गरबा पंडाल में 17 मुस्लिम युवक पकड़े, ‘लव जिहाद’ का आरोप

मध्य प्रदेश के गुना जिले में 8 अक्टूबर 2024 को एक गरबा कार्यक्रम में बिना अनुमति के 17 मुस्लिम युवकों को डांडिया खेलते हुए पकड़ा गया था। स्थानीय लोगों और हिंदू जागरण मंच के सदस्यों ने आरोप लगाया था कि ये युवक ‘लव जिहाद’ फैलाने के इरादे से कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने कहा था कि ऐसे मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर गरबा में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने के लिए घुसे थे। फिर पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 3 मुस्लिम युवकों को हिरासत में लिया था।

‘घर वापसी’ करो, फिर गरबा पंडाल में घुसो

इन घटनाओं की पूरी फेहरिस्त देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की माँग केवल धार्मिक भेदभाव का मामला नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा है। यह एक ऐसा कदम है जो हिंदू लड़कियों को ‘लव जिहाद’ और यौन शोषण जैसी साजिशों से बचाने के लिए उठाया जा रहा है।

हिंदू संगठनों का यह कहना है कि अगर इन पवित्र आयोजनों में भाग लेना ही है, तो इसका सबसे आसान तरीका है कि ‘घर वापसी’ कर ली जाए। यह दिखाता है कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा और गरबा जैसे पवित्र त्योहारों की गरिमा और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए जाएँगे।

अमेरिका में हिंदू नाम से ‘खतरनाक ड्रग’ वाली दवाइयाँ बेच रहे थे सादिक- इकबाल, US सरकार के प्रतिबंध के बाद जब्त होंगी संपत्तियाँ: ऑपइंडिया की पड़ताल में सामने आए कंपनी के कई राज

अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (OFAC) ने (24 सितंबर 2025) बुधवार को दो भारतीय नागरिकों, सादिक अब्बास हबीब सैयद और खिजर मोहम्मद इकबाल शेख पर प्रतिबंध लगा दिया। इनलोगों पर फेंटेनाइल और दूसरे प्रतिबंधित और नकली दवाओं की आपूर्ति का आरोप है।

OFAC ने शेख की भारत स्थित ऑनलाइन फार्मेसी, KS इंटरनेशनल ट्रेडर्स पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इसका संचालन KS फार्मेसी के नाम से होती थी। सादिक अब्बास पर आरोप है कि वह राकेश शर्मा नाम का इस्तेमाल कर ये गोरखधंधा कर रहा था।

आतंकवाद और वित्तीय खुफिया मामलों के अधिकारी जॉन के. हर्ले के अनुसार, यह कार्रवाई अमेरिका में परिवारों को फेंटेनाइल संकट से बचाने के अमेरिकी सरकार के प्रयास का हिस्सा है। उन्होंने कहा, “फेंटेनाइल ने बहुत से परिवारों को बर्बाद कर दिया है। इस जहर से फायदा कमाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है।”

वैश्विक नशीली दवाओं के व्यापार में ऑनलाइन फार्मेसियों की भूमिका

प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर कहा गया है कि केएस फार्मेसी जैसी संस्थाएँ अक्सर दवा उत्पादों के वैध विक्रेता होने का दिखावा करती हैं। वास्तव में, ये नकली गोलियों की तस्करी कर रही हैं, जिनमें फेंटेनाइल या मेथामफेटामाइन मिला होता है। इससे पहले, अमेरिकी ड्रग एन्फोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) ने अमेरिकी जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। संस्थान का कहना है कि अमेरिकी नागरिक इसे ऑक्सीकोडोन, एडरॉल या ज़ैनैक्स जैसी दवाएँ मान कर खरीद रहे हैं।

ये प्रतिबंध ऑनलाइन फार्मेसियों, खासकर भारत से संचालित होने वाली फार्मेसियों पर लगा है। ये फॉर्मेसी सिंथेटिक ओपिओइड को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। ये संस्थाएँ अक्सर वैध दवा विक्रेता होने का दिखावा करती हैं, लेकिन अक्सर फेंटेनाइल या मेथैम्फेटामाइन से युक्त नकली गोलियाँ बेचती हैं।

अमेरिकी ड्रग एन्फ़ोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) ने कहा था कि अमेरिका के खरीदारों को विश्वास दिलाकर गुमराह किया जा रहा है कि वे ऑक्सीकोडोन, एडरॉल या ज़ैनैक्स जैसी असली दवाएँ खरीद रहे हैं।

सैयद और शेख के खिलाफ कार्रवाई

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैय्यद और शेख दोनों ने संयुक्त राज्य अमेरिका और डोमिनिकन गणराज्य स्थित तस्करों के साथ मिलकर काम किया। वे नकली गोलियों को रियायती दवाओं के रूप में बेचते थे और लेनदेन के लिए एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते थे। दोनों पर सितंबर 2024 में न्यूयॉर्क में मादक पदार्थों की तस्करी का आरोप भी लगा था।

दस्तावेज में कहा गया है कि केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स के मालिक शेख ने आरोपों के बावजूद अपनी ऑनलाइन फार्मेसी का संचालन जारी रखा।

न्यूयॉर्क में कार्रवाई हुई

सितंबर 2024 में, न्यूयॉर्क में लाखों फेंटेनाइल और मेथामफेटामाइन की गोलियाँ वितरित करने वाली नकली ऑनलाइन फार्मेसी चलाने वाले 18 लोगों का खुलासा किया गया। इनमें भारतीय नागरिक सादिक अब्बास हबीब सैय्यद और खिजर मोहम्मद इक़बाल शेख भी शामिल थे।

आरोप ये भी है कि सैय्यद अपने मूल को छिपाने और अवैध व्यापार में अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए कई उपनामों से काम करता था, जिनमें हिंदू नाम ‘राकेश शर्मा’ और ‘जोनाथन अकोस्टा’ शामिल था। अधिकारियों ने आरोप लगाया कि डोमिनिकन तस्कर फ्रांसिस्को अल्बर्टो लोपेज रेयेस के नेतृत्व में इनलोगों ने नकली गोलियाँ बेचीं। इसके कारण अमेरिका में कई लोगों की ओवरडोज़ से मौत हो गई, जिसमें एक 45 वर्षीय अमेरिकी पूर्व सैनिक भी शामिल है। जाँच में न्यूयॉर्क में उद्योग बन चुके ‘गोली मिलों’ का भी पर्दाफाश हुआ। यहाँ नकली दवाओं को असली जैसा बनाया जाता था।

अमेरिकी प्रतिबंध का मतलब

अमेरिका में प्रतिबंध का अर्थ है कि सैयद, शेख और केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स की संयुक्त राज्य अमेरिका में कारोबार नहीं हो पाएगा और संपत्तियाँ जब्त होंगी। दूसरे वित्तीय संस्थानों और बिजनेसमैन को भी उनके साथ लेन-देन न करने की चेतावनी दी गई है।
केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स की जाँच में ऑपइंडिया को क्या मिला

ऑप इंडिया ने ऑनलाइन उपलब्ध फार्मेसी से संबंधित प्रतिबंधी दस्तावेज़ों और जानकारी की समीक्षा की है। शुरुआती जाँच में पता चला कि कंपनी ने खुद को एक वैध दवा आपूर्तिकर्ता बताते हुए डिजिटल फ़ुटप्रिंट बना रखा है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय निगरानी रिपोर्ट में उसका नाम शामिल है।

दिलचस्प बात यह है कि केएस फार्मेसी नाम से संचालित वेबसाइट का एक स्क्रीनशॉट है जिसे हटा दिया गया है। यह साफ नहीं है कि वेबसाइट पर प्रतिबंध लगने के बाद इसे हटाया गया या पहले। हालाँकि, ऑप इंडिया को archive.org वेबसाइट पर कुछ पेज मिले हैं, जिन्हें आप देख सकते हैं।

आरकाइव पेज पर मिली जानकारी के अनुसार, कंपनी की उत्पाद सूची लंबी थी। वे लॉराज़ेपम, डायज़ेपम, क्लोनाज़ेपम नोज़िम, सिल्डेनाफिल साइट्रेट कोबरा, ज़ैनैक्स अल्प्राज़ोलम, अल्प्राज़ोलम, अल्पकोर और एटिवन लॉराज़ेपम की गोलियाँ बेच रहे थे। इंजेक्शन में इमुपेग, बोल्डारिक्स, फोंडापारिनक्स सोडियम, टेस्टोस्टेरोन एनैन्थेट और टेस्टोस्टेरोन साइपियोनेट शामिल थे। कैप्सूल में फिल्डेना सिल्डेना सॉफ्टजेल, टेराफ़ॉर्म न्यूट्रिशन एंटी एंग्ज़ाइटी एंड स्ट्रेस रिलीफ और ऑर्लिस्टैट शामिल थे।

वेबसाइट डाउन है

हालाँकि वेबसाइट की WhoI जानकारी छिपाई गई थी, फिर भी ये पता चला है कि केएस इंटरनेशनल का सितंबर 2024 में अमेरिकी अदालत में ओपिओइड दवाओं के अवैध कारोबार में शामिल होने का सबूत मिला। हालाँकि, यह वेबसाइट दिसंबर 2024 में पंजीकृत हुई थी, जिससे इस बात की आशंका और पुख्ता हो जाती है कि शेख अपना दवा व्यवसाय जारी रखे हुए था।

स्रोत- WhoIs

जीएसटी नंबर 27AAZFK8713F2ZQ की रिवर्स सर्च करने पर पता चला कि जीएसटी नंबर 27 जून 2024 को जारी किया गया था, जो कंपनी के खिलाफ अमेरिकी अदालत के फैसले से केवल तीन महीने पहले का था।

केएस इंटरनेशनल ट्रेडर्स नामक कंपनी का इंडियामार्ट पेज है, जो लकड़ी के उत्पादों, फर्नीचर आदि का व्यापार करने का दावा करता है। प्रोफ़ाइल के अनुसार, कंपनी 2023 में पंजीकृत हुई थी और मुंबई से संचालित होती है। जीएसटी पार्टनर के नाम सबा असलम मिस्त्री और खिजर मोहम्मद इकबाल शेख बताए गए हैं।

स्रोत: IndiaMart

हालाँकि कंपनी अपने इंडियामार्ट पेज पर फ़र्नीचर बेचने का दावा करती है, लेकिन उत्पादों की समीक्षाएँ दिलचस्प हैं। हालाँकि यह साबित करना मुश्किल है कि समीक्षाएँ वास्तविक ग्राहकों ने पोस्ट की हैं या नहीं। लेकिन एक बात तो तय है कि वे लोग दवा बेच रहे थे।

उदाहरण के लिए, अमेरिका के एक ‘स्टीव’ ने 15 जून 2025 को अल्प्राज़ोलम टैबलेट के लिए एक समीक्षा लिखी और दावा किया कि उत्पाद ‘गुणवत्तापूर्ण’, कंपनी ‘विश्वसनीय’ और डिलीवरी ‘तेज’ है।

स्रोत- : Indiamart

अमेरिका के एक और ग्राहक स्कॉट रॉबर्ट हॉवर्ड ने 11 मई 2025 को कहा “ये लोग सबसे अच्छे हैं। मैं इनकी सिफारिश करता हूँ। मैंने इंडियामार्ट पर 5 लोगों से डील की है, और ये लोग अब तक के सबसे बेहतरीन हैं। ये बार वाकई कमाल के हैं।”

एक दूसरे ग्राहक, ‘रोनाल्ड कोलमैन’ ने डायजेपाम टैबलेट खरीदी। अल डेस्टेफ़ानो नाम के ग्राहक ने ऑक्सीडॉलर खरीदी जबकि डैनियल विल्सन ने क्लोनाज़ेपम खरीदी।

अल्प्राजोलम, डायजेपाम और क्लोनाजेपम

अल्प्राज़ोलम, डायजेपाम और क्लोनाज़ेपम, ये तीनों बेंजोडायजेपाइन टैबलेट हैं जिनका उपयोग चिंता, पैनिक डिसऑर्डर और अवसाद से जुड़ी बीमारियों में किया जाता है। ये दिमाग की न्यूरोट्रांसमीटर को बढ़ाकर काम करती हैं। हालाँकि इसे बार्बिटुरेट्स से ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इसके दुरुपयोग, निर्भरता और ओवरडोज का खतरा बना रहता है। खासकर जब इसे शराब, ओपिओइड या दूसरी दवाओं के साथ लिया जाए। ओवरडोज से श्वसन लेने में तकलीफ या कोमा की स्थिति आ सकती है।

ऑक्सीडॉलर

ऑक्सीडॉलर दवा में ऑक्सीकोडोन पाया जाता है। यह एक दर्द निवारक दवा है, जिसका इस्तेमाल गंभीर या लंबे समय तक दर्द के बाद किया जाता है।अगर दूसरी दर्द निवारक दवाएँ काम नहीं करतीं है, तो इसे लिया जाता है। यह गोलियों, कैप्सूल, तरल, इंजेक्शन और लगातार राहत के लिए धीमी गति से रिलीज़ होने वाले फ़ॉर्मूले के रूप में उपलब्ध है।

प्रभावी होने के बावजूद, इसमें लत, निर्भरता और ओवरडोज़ का ख़तरा होता है। इसके इस्तेमाल से आम तौर पर मतली, कब्ज़ और निंदा आते हैं। ओपिओइड की वजह से होने वाले कब्ज़-एसिडिटी को कम करने के लिए डॉक्टर ऑक्सीकोडोन को नालोक्सोन के साथ मिला सकते हैं।

कंपनी की एक और वेबसाइट ‘www.kttradersandservices.in’ (आरकाइव लिंक) है, जिस पर सिर्फ फ़र्नीचर बिकते हैं। वेबसाइट पर साफ़ तौर पर KS Traders लिखा है और जानकारी उस कंपनी से मेल खाती है जिस पर प्रतिबंध लगाया गया है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में बनी है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लद्दाख के लोगों को बरगलाने में एक का नहीं हाथ, सोनम वांगचुक-कॉन्ग्रेस मिलकर कर रहे काम: जानें कैसे छिपाया सरकार से बातचीत होने का सच, हाथ में दिए जा रहे पत्थर

अगस्त 2019 में जब लद्दाख को UT का दर्जा मिला तो सोनम वांगचुक, प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हाथ जोड़कर’ धन्यवाद कर रहे थे। अब वही वांगचुक ‘हाथ में पत्थर लेने’ के लिए लोगों को उकसा रहे हैं। शांति के लिए मशहूर लद्दाख, हिंसा की चपेट में है, लोग मारे गए हैं और सुनियोजित डिजाइन के तहत हिंसा को उकसाने वाला अपने गाँव भाग गया है। इस बीच एक शख्स की तस्वीर वायरल है जिसे सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेसी बताया जा रहा है। इस व्यक्ति ने मुँह पर मास्क लगा रखा है और हाथों में हथियार है।

जिस लद्दाख में 5 अगस्त 2019 को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की माँग पूरी होने का जश्न मनाया जा रहा थी, वहीं बीते बुधवार को पथराव और आगजनी की गई। लद्दाख में बुधवार (24 सितंबर 2025) को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने समेत कई माँगों को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए।

इन हिंसक प्रदर्शनों में 4 लोग मारे गए हैं और दर्जनों लोग घायल हैं। बीजेपी के दफ्तर और सुरक्षाबल के वाहनों को प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी और कई जगहों पर पथराव किए जाने की भी खबरें हैं।

लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे सोनम वांगचुक

इस हिंसा में केंद्रीय किरदार हैं सोनम वांगुचक, उनकी भूख हड़ताल के बीच ही यह हिंसा हुई है। वांगचुक ही अपने समर्थकों के साथ लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। मौजूदा वक्त में इस हिंसा के लिए लोगों को उकसाने में उनका नाम आ रहा है लेकिन कभी वो लद्दाख को UT बनाए जाने का जश्न मना रहे थे।

5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था। एक बना जम्मू-कश्मीर और दूसरा लद्दाख। सोनम वांगचुक ने उसी दिन केंद्र सरकार को धन्यवाद भी दिया था।

वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 को X पर एक पोस्ट में लिखा, “धन्यवाद प्रधानमंत्री जी, लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा करने के लिए लद्दाख नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देता है। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने वाले सभी लोगों का धन्यवाद! ???”

लद्दाख को UT के दर्ज पर जश्न मनाने वालों में केवल वांगचुक ही शामिल नहीं थे, इसमें अंजुमन मोइन-उल-इस्लाम जैसे संगठन भी शामिल थे। इस संगठन ने 5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार को धन्यवाद देते हुए एक पत्र जारी किया था। खुद सोनम वांगचुक ने यह पत्र अपने X अकाउंट पर शेयर किया था।

जो लेह आज हिंसा की चपेट है, जल रहा है उसी लेह में 5 अगस्त 2019 के बाद लोग लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने पर नाच-गा कर जश्न मना रहे थे।

लंबा है लद्दाख के लिए UT की माँग का इतिहास

लद्दाख के लोग जो अगस्त 2019 में जश्न मनाने के लिए सड़कों पर निकले थे वो यूँ ही नहीं था। दरअसल, मोदी सरकार ने उनकी दशकों से चली आ रही माँग को पूरा कर दिया था। लद्दाख को UT का दर्जा दिए जाने से पहले जून 2019 में बीजेपी के तत्कालीन सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने कहा था, “लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग किए जाने की माँग आज की नहीं है, बल्कि 1948 से ही लद्दाख के लोग अपनी अलग पहचान चाहते थे।”

नामग्याल का यह दावा सही भी है, 1949 में लद्दाख बुद्धिस्ट असोसिएशन (LBA) की विषय समिति के अध्यक्ष चीवांग रिग्जिन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ज्ञापन देकर लद्दाखियों के लिए ‘स्वशासन’ की माँग की थी।

लद्दाख के लिए UT की माँग को लेकर 1964 में एक बड़ा आंदोलन भी हुआ। यह आंदोलन बौद्ध संत और लद्दाख के तत्कालीन प्रमुख लामा कुशोक बकुला रिनपोछे के नेतृत्व में हुआ था। हालाँकि, इस प्रदर्शन में UT का दर्जा दिए जाने की माँग नहीं मानी गई।

1989 में एक बार फिर UT की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू हुआ। LBA ने भारत सरकार को एक ज्ञापन सौंपकर फिर से लद्दाख के लिए ‘स्वायत्तता’ की माँग की। LBA ने इसके लिए एक बड़ी रैली भी निकाली। 1995 में इसी माँग को लेकर LAHDC (Ladakh Autonomous Hill Development Council) की भी स्थापना की गई।

1989 में UT की माँग को लेकर LBA की लेह चलो रैली

इसके बाद कई वर्षों तक UT की माँग को लेकर प्रदर्शन होते रहे। तब केंद्र सरकार का मानना था कि प्रदर्शनकारियों की माँगों को पूरा करने के लिए उन्हें अनुच्छेद 370 में बदलाव करना पड़ेगा जिसके लिए कॉन्ग्रेस सरकार तैयार नहीं थी।

2016 में भी UT की माँग कर रही सर्व धार्मिक संयुक्त कार्रवाई समिति (ARJAC) ने प्रस्ताव पारित कर लद्दाख के लिए अलग UT की माँग थी। लद्दाखियों की इस माँग को अंतत: 2019 में मोदी सरकार ने ही पूरा किया।

कैसे पूर्ण राज्य के दर्जे तक पहुँची माँग

लद्दाख को UT का दर्जा मिल गया और वहाँ केंद्र सरकार ने विकास पहुँचाना भी शुरू कर दिया। मोदी सरकार में लद्दाख को एक विश्वविद्यालय, होटल प्रबंधन संस्थान और पेशेवर कॉलेज की अनुमति दी गई। करोड़ों का विशेष पैकेज दिया गया। सड़कों, पुलों का निर्माण किया गया। यह शांति और विकास कुछ ‘आंदोलनजीवियों’ से पचाया नहीं जा सका।

लोगों के बीच यह धारणा फैलानी शुरू कर दी गई कि यहाँ कंपनियाँ आकर सारी जमीन हड़प लेंगी। यहाँ बाहर के लोग आकर बस जाएँगे, जैसी बातें लोगों के बीच फैलानी शुरू कर दी गईं। 2023 की शुरुआत में सोनम वांगचुक ने ‘लद्दाख के संवैधानिक सुरक्षा उपायों’ की माँग को लेकर खुले आसमान के नीचे सोकर प्रदर्शन शुरू किया। धीरे-धीरे यह प्रदर्शन आगे बढ़ता रहा।

Leh Apex Body (LAB) और कारगिल डेमोक्रैटिक अलायंस (KAD) भी उनके समर्थन में आ गए। मार्च 2024 में सोमन वांगचुक और LAB-KDA से जुड़े लोगों ने लेह में फिर हड़ताल शुरू कर दी। सितंबर 2024 में LAB ने ‘दिल्ली चलो पदयात्रा’ की भी शुरुआत की थी।

छठी अनुसूची-पूर्ण राज्य के लिए जारी बातचीत?

लद्दाख के नेताओं ने 4 माँगों के साथ गृह मंत्रालय से संपर्क किया था, जिसमें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने की माँग, एक अलग लोक सेवा आयोग की स्थापना और दो संसदीय सीटों की माँग शामिल थी। इनमें से आखिरी दो पर गृह मंत्रालय ने सैद्धांतिक सहमति भी दे दी थी।

लद्दाख में प्रदर्शनकारियों इसे संविधान की छठी अनुसूची में भी शामिल करने की माँग कर रहे हैं। मोटे तौर पर इसे समझें तो संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता प्रदान करने का प्रावधान जिसका मकसद आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जमीन और संसाधनों की रक्षा करना है।

यह माँग खुद बीजेपी ने भी अपने घोषणा पत्र में रखी है, तो जाहिर है कि इसे माँग को आगे ले जाने पर पार्टी ने विचार भी किया होगा। प्रदर्शनकारियों की माँगों के लिए केंद्र सरकार से लगातार बातचीत चल रही है।

मार्च 2024 में वांगुचक के प्रदर्शन से पहले लद्दाख के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत की थी। इस बातचीत को लेकर गृह मंत्रालय ने कहा, “अमित शाह ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि पीएम मोदी के नेतृत्व में सरकार केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपाय प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

यह कोई इकलौती बैठक नहीं थी। गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर 2025 को प्रेस नोट में बताया, “भारत सरकार इन्हीं मुद्दों पर Apex Body Leh और Kargil Democratic Alliance के साथ सक्रिय रूप से बातचीत कर रही है। उच्चाधिकार प्राप्त समिति और उप-समितियों के औपचारिक माध्यम से और नेताओं के साथ कई अनौपचारिक बैठकों के माध्यम से उनके साथ कई बैठकें हुईं।”

केंद्र सरकार ने कहा कि लद्दाख के नेताओं के साथ 25 और 26 सितंबर को भी बैठकें आयोजित करने की योजना है। आगामी 6 अक्टूबर को भी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक होनी है लेकिन उससे पहले ही लद्दाख को दंगों की आग में झोंकने की कोशिश की गई है।

वांगचुक ने हिंसा भड़काने के लिए की थी प्लानिंग?

लेह में आगजनी और पत्थरबाजी तो बुधवार को हुई लेकिन इसके बीज पहले से ही बोये जा रहे थे। सोनम वांगचुक ने सितंबर 2024 में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में ही स्थिति विस्फोटक होने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था, “सरकार ने उन्हें (लद्दाख के लोगों) लोकतंत्र न देकर उनके पंख काट दिए हैं और दूसरी ओर, उन्हें रोज़गार न देकर उनके हाथ काट दिए हैं। पाकिस्तान और चीन की सीमा से लगे लद्दाख में स्थिति विस्फोटक हो सकती है।”

अपनी विदेशी फंडिंग को लेकर सवालों में रहने वाले सोनम वांगचुक ने इन प्रदर्शनों में GenZ का रेफ्रेंस दिया। यह शब्द हाल ही में नेपाल में हुए GenZ प्रदर्शनों से चर्चा में आया है जहाँ आगजनी-लूटपाट-पथराव की घटनाएँ हुई। नेपाल में दर्जनों लोग मारे गए, मंत्रियों तक को मारा पीटा गया और सरकार बदल दी गई।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अपने प्रदर्शनों को नेपाल के प्रदर्शन से जोड़कर वांगचुक क्या हिंसा को सही ठहराने और सरकार का तख्ता पल्टने की प्रक्रिया को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं? सिर्फ सोनम ही नहीं इस मामले में कॉन्ग्रेसी नेता पर की भी इस हिंसा को भड़काने में भूमिका होने के आरोप लगाए गए हैं। बीजेपी ने पार्षद वीडियो साझा करते हुए दावा किया कि नजर आ रहा व्यक्ति स्टैनजिंग त्सेपांग हैं।

गृह मंत्रालय ने भी कहा है, “कई नेताओं द्वारा भूख हड़ताल समाप्त करने का आग्रह करने के बावजूद, उन्होंने (वांगचुक) भूख हड़ताल जारी रखी और अरब स्प्रिंग शैली के विरोध प्रदर्शनों और नेपाल में Gen Z के विरोध प्रदर्शनों का भड़काऊ उल्लेख करके लोगों को गुमराह किया।”

जब इस हिंसा को रोकने के लिए प्रयास करने की जरूरत थी तब वांगचुक कहाँ थे? गृह मंत्रालय बताता है, “सोनम वांगचुक ने अपने भड़काऊ बयानों के माध्यम से भीड़ को उकसाया था। संयोगवश, इस हिंसक घटनाक्रम के बीच, उन्होंने अपना उपवास तोड़ दिया और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई गंभीर प्रयास किए बिना एम्बुलेंस से अपने गाँव चले गए।”

जाहिर है कि जिस विषय पर सरकार बातचीत कर रही थी, जिन माँगों को लेकर बैठकें हुई थीं और आगे भी होनी थीं, उसमें इस तरह की हिंसा होना सुनियोजित ही हो सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बातचीत ही रास्ता है और उसी से इसका हल निकला चाहिए था लेकिन जिस तरह अराजकता भड़काने की कोशिश की गई, उससे साफ है कि कुछ लोगों को भारत की शांति नहीं पच रही है। वो कभी GenZ, तो कभी बांग्लादेश-श्रीलंका जैसे उदाहरणों के जरिए देश में अराजकता का माहौल पैदा करना चाहते हैं।

‘नेपाल जैसे लगा दो धामी के घर आग’: UKSSSC पेपर लीक की आड़ में Gen-Z वाली आग से देवभूमि सुलगाने की साजिश, कौन बना रहा है व्हॉट्सएप ग्रुप्स से हिंसक माहौल?

उत्तराखंड के देहरादून में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में बेरोजगार युवा प्रदेश की धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। जहाँ कट्टरता की वही सीमापार हुई जैसे साल 2020 के दौरान दिल्ली दंगो में हुई थी। देहरादून में चल रहे प्रदर्शन में भी वही ‘आजादी’ के नारे लगाए गए। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

पेपर लीक पर सड़कों पर उतरने वाले है तो बेरोजगार युवा और इन युवाओं की माँग मामले में CBI जाँच कराए जाने की है। जबकि धामी सरकार पहले ही पेपर लीक मामले में SIT गठन के आदेश दे चुकी है। इससे साफ है कि प्रदर्शन अब सिर्फ पेपर लीक मामले में जाँच की माँग तक सीमित नहीं है बल्कि हिंदुओं के विरोध और उत्तराखंड में नेपाल और बांग्लादेश जैसी स्थिति बनाने की साजिश है।

नेपाल-बांग्लादेश-श्रीलंका जैसी हिंसा फैलाने की साजिश के सबूत

उत्तराखंड में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन से नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात बनाने के सबूत भी ऑपइंडिया को मिले हैं। प्रदर्शन से संबंधित कुछ कुछ व्हाट्सऐप ग्रुप के चैट्स के स्क्रीनशॉट्स मिले हैं। इन चैट्स में युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काया जा रहा है, ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा हाल ही में नेपाल में हुआ और पिछले साल बांग्लादेश और तीन साल पहले श्रीलंका में हुआ।

नीचे दिखाया गया स्क्रीनशॉट ‘प्रदेश युवा संगठन उत्तराखंड क्रांति दल’ नाम से व्हाट्सऐप ग्रुप का है। जो युवाओं को नेपाल के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए भड़का रहा है। इस व्हाट्सऐप ग्रुप पर चैट्स में लिखा गया, “धामी के घर पर आग लगा दो जैसा नेपाल में हुआ।”

व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन युवाओं से संदेश भेजते हैं, जिसमें लिखा है, “भाई लोगों सभी मिलकर मारते हैं धामी को, नेपाल वाला इतिहास दोहराया जाए।”

व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इस ग्रुप में हो रही बातचीत को देख यही लगता है कि शिक्षा और बेरोजगारी के खिलाफ देहरादून में चल रहा प्रदर्शन अब आम युवाओं का नहीं रह गया। बल्कि कुछ अन्य तत्व इसमें घुसने के प्रयास में है। चैट देख पता चलता है कि उत्तराखंड में युवाओं को नेपाल के Gen Z की तरह ही भड़कने को कहा जा रहा है।

अजीब बात ये है कि ये सब ठीक उस समय हो रहा है जब लेह में भी बरगलाए जाने के लिए युवा सड़कों पर हैं और उनके भड़काने में कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम का नाम आ रहा है। ये सब घटनाएँ देखते हुए ये सवाल उठना जायज है कि उत्तराखंड में Gen Z को भड़काने वाले लोग कौन हैं। क्या इनके लिए मुद्दा सिर्फ पेपर लीक है, या ये पेपर लीक मामले की आड़ में अपनी कोई और राजनीति करना चाहते हैं।

प्रदर्शन में नेपाल की तरह नेताओं को जिंदा जलाने की धमकी

ऐसा ही एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें प्रदर्शन में शामिल युवती हिंदुओं का विरोध के साथ ही भारत में नेपाल जैसे हालात बनने की चेतावनी भी देती है। उसने साफ शब्दों में सीएम पुष्कर धामी के मरने की भी धमकी दे डाली और कहा कि उन्हें बचाने खराब मौसम के चलते हेलीकॉप्टर भी नहीं आएँगे।

इस वीडिया में मीडिया से बातचीत में युवती कहती है, “जिस दिन युवाओं ने नेपाल जैसी हालत कर दी और मौसम खराब रहा तो इन्हें लेने तो हेलीकॉप्टर लेने भी नहीं आएँगे। जैसे बांग्लादेश और नेपाल में हेलीकॉप्टर ने नेताओं को उठाया था। हम दुआ करेंगे कि मौसम इतना खराब रहे कि जिंदा जलाया जाए। युवा जाग चुका है।”

हिंदू धर्म का अपमान करते हुए युवती ने कहा, “सरकार सिर्फ हिंदू धर्म का आगे बढ़ाती है। जैसे बलिदानी सैनिक तिरंगे में लिपटता है वैसे ही इन नेताओं को भगवा में लिपटकर भेजो तब औकात पता चलेगी। युवाओं को जगना होगा, गाँव में भगवा घुसने ही नहीं दिया जाए।”

उत्तराखंड में नकल जिहाद बर्दाश्त नहीं: CM पुष्कर धामी

पेपर लीक मामले ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने भी सख्त रुख अपनाया है। सीएम ने कहा कि उत्तराखंड में नकल जिहाद की कोशिश को कभी कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा, कोचिंग और नकल माफिया एक होकर राज्य में नकल जिहाद छेड़ने और अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। सीएम ने कहा कि जब तक उनकी सरकार सभी नकल माफियाओं को मिट्टी में नहीं मिला देती, तब तक चैन से नहीं बैठेगी।

पेपर लीक करने वाला खालिद हरिद्वार से गिरफ्तार

UKSSSC पेपर लीक का साजिशकर्ता खालिद मलिक को उत्तराखंड पुलिस ने हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस खालिद मलिक को देहरादून लाने की तैयारी कर रही है। जाँच के दौरान पता चला कि आदर्श बाल सदन इंटर कॉलेज बहादरपुर जट परीक्षा केंद्र से पेपर लीक हुआ था।

केंद्र में कुल 18 कमरे थे, लेकिन 3 कमरों में जैमर (रेडियो फ्रीक्वेंसी पर सिग्नल भेजने वाला टूल) नहीं थे और खालिद मलिक उसी 3 कमरों में से किसी एक में बैठकर परीक्षा दे रहा था। खालिद ने एक डिवाइस का इस्तेमाल करते हुए प्रश्न पत्र अपनी बहन साबिया को भेजा, जिसने इसे प्रोफेसर सुमन चौहान तक पहुँचाया। खालिद की दूसरी बहन हीना और प्रोफेसर सुमन चौहान पुलिस हिरासत में हैं।

‘आवरण’ से मुगल इतिहास पर खड़े किए सवाल, ‘पर्व’ में महाभारत के किरदारों को बनाया आम आदमी: जानिए कौन थे कन्नड़ लेखक एसएल भैरप्पा, 94 साल की उम्र में निधन

कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक और पद्म भूषण से सम्मानित एसएल भैरप्पा का बुधवार (24 सितंबर 2025) को 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु के जयदेव मेमोरियल राष्ट्रोत्त्थान अस्पताल और रिसर्च सेंटर में अंतिम साँस ली।

एसएल भैरप्पा का पिछले तीन महीनों से इलाज चल रहा था। मंगलवार (23 सितंबर 2025 ) को दोपहर 2.38 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे कुछ समय से उम्रदराज होने के चलते उससे जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। कुछ महीने पहले सुबह की सैर के दौरान गिर भी गए थे।

भैरप्पा को बेहतर इलाज के लिए मैसूर से बेंगलुरु लाया गया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी तबीयत बिगड़ती गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार 26 सितंबर 2025 को मैसूर में किया जाएगा, वही शहर जहाँ उन्होंने अपने जीवन के कई साल बिताए। 25 सितंबर 2025 को उनका पार्थिव शरीर बेंगलुरु के रविंद्र कलाक्षेत्र में रखा जाएगा ताकि लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें।

लेखक के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर भावनात्मक पोस्ट लिख दुख जताया। पीएम ने लिखा, “श्री एसएल भैरप्पा जी के जाने से हमने एक महान व्यक्तित्व को खो दिया है, जिन्होंने हमारे अंतर्मन को जगाया और भारत की आत्मा को गहराई से छुआ।”

पीएम मोदी ने आगे लिखा, “वे निडर और समय से परे सोचने वाले लेखक थे, जिन्होंने अपनी उत्तेजक रचनाओं से कन्नड़ साहित्य को समृद्ध किया। उनकी लेखनी ने पीढ़ियों को सोचने, सवाल करने और समाज से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।”

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि एसएल भैरप्पा को भारत के इतिहास और संस्कृति में गहरी रुचि थी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने आगे लिखा, “इस दुख की घड़ी में मेरा दिल उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ है। ओम् शांति।”

प्रारंभिक जीवन और करियर

एसएल भैरप्पा का जन्म सन्तेशिवरा लिंगन्नैया भैरप्पा के रूप में हासन जिले के चन्नरायपटना तालुक में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन हासन और मैसूर में बिताया। वे भारत के कई हिस्सों जैसे गुजरात और नई दिल्ली में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे। उन्होंने NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) में भी काम किया और मैसूर के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (RIE) से प्रोफेसर पद से रिटायर हुए।

हालाँकि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में खूब मेहनत की लेकिन उनका असली जुनून उपन्यास लिखना था। उनका साहित्यिक सफर 1958 में ‘भीमकाय’ नाम की उपन्यास से शुरू हुआ, जब वे 27 साल के थे। उनकी किताबों की लोकप्रियता ऐसी है कि उनका पहला उपन्यास आज भी छपता और बिकता है।

अगले साठ वर्षों में उन्होंने कुल 25 उपन्यास लिखे। उनका आखिरी उपन्यास ‘उत्तरकांड’ (2017) था, जो रामायण की कहानी को महिलाओं के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इसके बाद उन्होंने लेखन से संन्यास ले लिया।

भैरप्पा कन्नड़ के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार थे। उनकी किताबें कई बार छप चुकी हैं और शुरुआती रचनाएँ भी लगातार पुनः प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं रही। उनके सभी उपन्यास कई भारतीय भाषाओं, अंग्रेजी और यूरोपियन भाषाओं में भी अनुवाद किए गए हैं।

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में वंशवृक्ष (1965), गृहभंग (1970) और पर्व (1979), जो कि महाभारत की पुनर्कथा है, शामिल हैं। उन्हें मंद्र (2001) उपन्यास के लिए 2010 में सरस्वती सम्मान मिला और 2023 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

आवरण: उनकी उत्कृष्ट कृतियों में से एक

एसएल भैरप्पा का सबसे विवादित उपन्यासों में से एक था आवरण (2007)। उन्होंने इसे कई सालों की गहरी रिसर्च के बाद लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत के मध्यकालीन इतिहास, खासकर मुगल काल को जिस तरह स्कूल की किताबों और सार्वजनिक चर्चाओं में दिखाया गया है, उस पर सवाल उठाए।

भैरप्पा का मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कई कड़वे सचों को दबा दिया गया या लोगों पर थोप दिया गया। इस उपन्यास में उन्होंने इतिहास की बहसों को आज के मुद्दों से जोड़ा- जैसे कि धर्मों के बीच शादी, धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान से जुड़ी चिंताएँ।

हालाँकि कुछ आलोचकों ने एसएल भैरप्पा पर यह आरोप लगाया कि उनका उपन्यास ‘आवरण’ मुस्लिम विरोधी और राजनीतिक सोच से प्रेरित है। लेकिन उनके प्रशंसकों ने इस किताब को एक साहसी कोशिश माना, ऐसी कोशिश जो इतिहास के छिपाए गए पहलुओं को सामने लाती है।

विवादों के बावजूद ‘आवरण’ बहुत लोकप्रिय हुआ, बेस्टसेलर बना और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। यह उपन्यास वर्तमान के भारतीय साहित्य में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली रचनाओं में से एक है।

पर्व: महाभारत की एक अलग तस्वीर

भैरप्पा की सबसे चर्चित रचनाओं में से एक पर्व (1979) भी है, जिसे उनकी उत्कृष्ट कृति माना जाता है। इस उपन्यास में उन्होंने महाभारत की कहानी को एक धार्मिक या चमत्कारी कथा की तरह नहीं बल्कि एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से पेश किया है। इसमें इंसानों के बीच का संघर्ष, मनोवैज्ञानिक उलझनें और सामाजिक हालात को केंद्र में रखा गया है।

इस किताब में भगवानों और चमत्कारों को हटा दिया गया है। इसके पात्र जैसे भीष्म, द्रौपदी, कर्ण और कृष्ण को एक आम इंसान की तरह दिखाया गया है, जो महत्वाकांक्षा, पीड़ा, निजी दुख और नैतिक दुविधाओं से जूझते हैं। इस तरह ‘पर्व’ महाभारत को एक ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट श्रीति सागर ने लिखी है। विस्तार से इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

पूर्ण राज्य की डिमांड पर सुलगा लद्दाख, हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस का बताया जा रहा हाथ: सोनम वांगचुक की ‘भूख हड़ताल’ कैसे आगजनी-पथराव तक पहुँची?

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेह में बुधवार (24 सितंबर 2025) को बंद के दौरान हिंसा भड़क उठी। यह जल्द ही झड़प, आगजनी और अराजकता में बदल गई। इस बंद का आह्वान लेह एपेक्स बॉडी की ओर से किया गया था।

हिंसा के बाद विवादित एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने अपना भूख हड़ताल खत्म कर दिया है। हिंसा के पीछे कॉन्ग्रेस नेताओं का हाथ होने की बात कही जा रही है। बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने कहा है कि लद्दाख के विरोध प्रदर्शन के पीछे जेन-जी का हाथ होने का दिखावा किया जा रहा है। हिंसा भड़काने के पीछे कॉन्ग्रेस है।

उन्होंने कहा कि अपर लेह से कॉन्ग्रेस काउंसलर स्टैनजिंग त्सेपांग मुख्य साजिशकर्ता हैं। कई तस्वीरें सामने आई हैं जिसमें कॉन्ग्रेस काउंसलर और उनके समर्थक हिंसा भड़काते दिख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि हिंसा के दौरान बीजेपी के स्थानीय कार्यालय और पुलिस वैन को फूँक दिया गया। सुरक्षा बलों के साथ प्रदर्शनकारियों की हिंसक झड़प हुई।

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने जैसी माँगों के समर्थन में सोनम वांगचुक की अगुवाई में सितंबर की शुरुआत से आंदोलन चल रहा था। लेकिन हिंसा के बाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 163 लागू करनी पड़ी है। इसके तहत चार से अधिक लोगों के इकट्ठा होने, रैलियाँ निकालने और लाउडस्पीकरों के अनाधिकृत इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

हिंसा कैसे शुरू हुई

मीडिया रिपोर्टों में प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया जा रहा है कि 23 सितंबर की शाम से ही माहौल तनावपूर्ण था। भूख हड़ताल पर बैठे दो बुज़ुर्गों को हालत बिगड़ने के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा था। उनकी हालत बिगड़ने के बाद छात्रों और युवा कार्यकर्ता आक्रोशित हो गए। इनमें से कई बातचीत में देरी को लेकर पहले से ही असंतुष्ट थे।

24 सितंबर की सुबह भूख हड़ताल वाली जगह के पास भीड़ जमा होने लगी। बाद में यही भीड़ लेह के बीजेपी कार्यालय की ओर बढ़ी। इन्हें नियंत्रित रखने के लिए बैरिकेड्स लगाए गए थे। पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई थी। लेकिन जैसी ही प्रदर्शनकारियों ने आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की गई, पथराव शुरू हो गया। हिंसा को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

लेकिन हालात तेजी से बेकाबू होते गए। पुलिस वैन में आग लगा दी गई। बीजेपी कार्यालय पर हमला कर उसे आग के हवाले कर दिया गया। प्रदर्शनकारी सोनम वांगचुक के समर्थन में नारे लगा रहे थे। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार झड़पों में दर्जनों लोग घायल हुए हैं। तीन से 5 लोगों की मौत का भी दावा किया जा रहा है, जिसकी खबर लिखे जाने तक पुष्टि नहीं हुई थी।

वांगचुक ने भूख हड़ताल कर शांति की अपील की

हिंसा के बाद सोनम वांगचुक ने भूख हड़ताल खत्म कर दी है। एक बयान में हिंसा पर अफसोस जताते हुए कहा है कि इससे उद्देश्य को नुकसान पहुँचता है। लेकिन लगे हाथ उन्होंने इसे ‘जेन-जी क्रांति’ और युवाओं की ‘हताशा की उपज’ बताते हुए अपनी नाकामी को छिपाने की भी कोशिश की है। गौरतलब है कि वांगचुक पिछले 5 साल से लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने की माँग को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में सबसे आगे रहे हैं।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और बातचीत का आह्वान

हिंसा के बाद, भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कॉन्ग्रेस काउंसलर पर हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाते हुए X पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने पूछा है कि क्या राहुल गाँधी इसी तरह के उपद्रव की कल्पना कर रहे हैं?

लेकिन सोनम वांगचुक ने कॉन्ग्रेस को क्लीनचिट देने की कोशिश की है। उनका कहना है कि लद्दाख में कॉन्ग्रेस का इतना प्रभाव नहीं है कि वह 5000 युवाओं को सड़कों पर उतार सके। साथ ही दावा किया है कि कॉन्ग्रेस काउंसलर इसलिए गुस्से में अस्पताल पहुँचे थे, क्योंकि उनके गाँव के दो लोगों को घायल होने के बाद भर्ती कराया गया था।

वहीं विपक्षी दल के नेता इसके लिए बातचीत में केंद्र सरकार की ओर से देरी को जिम्मेदार बता रहे हैं। कारगिल डेमोक्रेटिक फ्रंट के सज्जाद कारगिली ने X पर लिखा है, “लेह में जो कुछ भी हो रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। लद्दाख सरकार के असफल प्रयोग के कारण निराशा और असुरक्षा की स्थिति में है। सरकार पर यह ज़िम्मेदारी है कि वह बातचीत फिर से शुरू करे, समझदारी से काम ले और लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की माँग बिना किसी देरी के पूरा करे।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने भी अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से लद्दाख के मामले में केंद्र सरकार के रवैए की आलोचना की है। शेख बशीर अहमद ने कहा है, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारा मानना है कि 5 अगस्त 2019 के फैसले को लेह या जम्मू-कश्मीर के लोगों ने कभी स्वीकार नहीं किया। वे तब से स्वायत्तता और विधायी अधिकारों की माँग कर रहे हैं। केंद्र की उदासीनता के कारण ही लोगों में गुस्सा फूट पड़ा है।”

नेशनल कॉन्फ्रेंस के ही नेता तनवीर सादिक ने कहा है, “यह बेहद दुख की बात है कि हर चीज को गलत तरीके से सँभाला जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में जो हुआ, वह लद्दाख में भी हो रहा है। हम हिंसा की निंदा करते हैं, लेकिन केंद्र सरकार से सार्थक बातचीत के लिए अपने दरवाजे खोलने का आह्वान करते हैं।”

लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की माँग

अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 को समाप्त कर दिया गया था। जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था। एक विधानसभा वाला जम्मू कश्मीर, दूसरा बिना विधायिका के लद्दाख। शुरुआत में मोटे तौर पर लेह लद्दाख के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया। लेकिन सोनम वांगचुक जैसे विवादित एक्टिविस्ट विधायी शक्ति को लेकर मुखर रहे हैं।

गौरतलब है कि लद्दाख की 90% से ज्यादा आबादी अनुसूचित जनजाति है। इस आधार पर इसे छठी अनुसूची में शामिल किए जाने का स्वाभाविक दावेदार बताया जाता है। आशंका जताई जा रही है कि इस दर्जे के बगैर स्थानीय लोगों की जमीन, नौकरी और सांस्कृति पहचान पर खतरा पैदा हो सकता है।

धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का गठबंधन लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) इस आंदोलन में सबसे आगे रहे हैं। 2020 से वे कई बार विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। केंद्र के कई दौर की बातचीत कर चुके हैं। इसी साल 27 मई को हुई बैठक में लद्दाख के लिए एक अधिवास नीति प्रस्तावित की गई थी। लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने को लेकर सहमति नहीं बन पाई है।

केंद्रीय मंत्रालय ने 20 सितंबर को लद्दाखी प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बातचीत शुरू करने की घोषणा की थी। 6 अक्टूबर को नई दिल्ली में बातचीत निर्धारित है। माँगों पर विचार के लिए 2 जनवरी 2023 को एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) का भी गठन किया गया था। लेकिन लद्दाखी प्रतिनिधियों का दावा किया है कि प्रगति धीमी और असंतोषजनक रही है।

केंद्र के साथ बातचीत की सार्थकता को लेकर सोनम वांगचुक शुरुआत से संदेह जताते रहे हैं। केंद्र पर टालमटोल का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि भारत के लोगों का ध्यान लद्दाख की ओर आकर्षित करने के लिए लगातार विरोध प्रदर्शनों और भूख हड़ताल करते रहे हैं। पर 24 सितंबर को भड़की हिंसा के बाद अक्टूबर की प्रस्तावित बातचीत पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है।

केडीए ने 25 सितंबर को बंद का आह्वान किया है। अगले महीने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (एलएएचडीसी) के चुनाव भी होने हैं।

राहुल गाँधी जी, आपने सही कहा कि बिहार को योजना बनाकर उपेक्षित किया गया, लेकिन आपने नहीं बताया कि यह योजना कॉन्ग्रेस और नेहरू की थी

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कहा है कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से उपेक्षित किया गया है। यह बात उन्होंने कॉन्ग्रेस की कार्य समिति की बैठक में कही हैं जो 85 वर्षों बाद पटना में हो रही है। राहुल गाँधी ने शायद सही ही कहा है लेकिन इसके जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरू और उनकी पार्टी ही हैं, यह बात उन्होंने छिपा ली।

कॉन्ग्रेस के दशकों के शासन में ‘योजनाबद्ध’ तरीके से बिहार की बर्बादी की पटकथा लिखी गई। नेहरू के काल में शुरु हुआ ‘रेल भाड़ा सामान्यीकरण कानून‘ इस योजना में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ।

1952 में शुरू हुई इस नीति में आर्थिक विकास सुगम बनाने के लिए लंबी दूरी के माल परिवहन को सब्सिडी दी गई। अब इससे आर्थिक विकास बिहार जैसे राज्यों से दूर होता चला गया। यह नीति कपास जैसे कच्चे माल पर लागू नहीं हुई।

बिहार और झारखंड में मिलने वाले खनिज उपयोगी कच्चे माल थे लेकिन जब केंद्र ने भाड़ा पर सब्सिडी दी, तो उद्योगपतियों को यह सुविधा होती कि वे इन कच्चे मालों को बिहार से दूसरे राज्यों में सस्ते दाम पर भेज लें और वहाँ उद्योग स्थापित करें। इस तरह बिहार में उद्योग विकसित होने के अवसर हाशिए पर चले गए।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया के अजीत झा से बातचीत में इसे लेकर कहा था, “यदि यह कानून अंग्रेजों के जमाने में होता तो टाटा नगर न होता। फिर टाटा बंबई जैसे शहरों में अपना उद्योग खड़ा करते। केंद्र सरकार की इस बेईमानी की वजह से बिहार को कम से कम 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।”

उन्होंने इसके लेकर हुए पलायन को लेकर आगे कहा, “उद्योगों का राज्य में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। न खेती का पंजाब की तरह विकास हुआ। आबादी बढ़ती गई। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे थे। ऐसे में पलायन होना ही था।”

कॉन्ग्रेस शासन के लंबे दौर में यह असमानता और गहरी होती गई जिसके बाद बिहार से लाखों लोग रोजगार की तलाश में पंजाब, दिल्ली और मुंबई जाने पर मजबूर हो गए। राहुल जी, अगर शुरुआती दौर में ही बिहार को उद्योग दिए गए होते, ‘योजनाबद्ध’ तरीके से विकास के काम किए जाते तो आज यह राज्य पिछड़ेपन की पहचान नहीं बनता।

कॉन्ग्रेस ने अपने दौर में तो बिहार को हाशिये पर रखा ही लालू यादव के दौर में भी जब अपराध, जातीय हिंसा और भ्रष्टाचार चरम पर था, तब भी कॉन्ग्रेस ने सत्ता की राजनीति के लिए लालू का साथ दिया। कॉन्ग्रेस ने सत्ता में हिस्सेदारी के लालच में बिहार की जनता को अपराध और अराजकता के हवाले कर दिया।

लालू के जंगलराज पर कॉन्ग्रेस की ‘मौन’ सहमति ‘चीख-चीखकर’ कहती है कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद किया गया था। अपने शासनकाल में ना कॉन्ग्रेस को बिहार में उद्योग की याद आई, ना रोजगार की।

बिहार में कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों ने रोजगार और उद्योग तो कभी नहीं दिए लेकिन अब जब उद्योग लगाने की कोशिश भी की जा रही है तो कॉन्ग्रेस का पूरा इकोसिस्टम इसके खिलाफ है। इसका हालिया उदाहरण गौतम अड़ानी को बिहार में 1 रुपए प्रति एकड़ की लीज पर जमीन दिए जाने के खिलाफ कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम के प्रदर्शन हैं।

यही काम कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में होता है, उनके चुने हुए मुख्यमंत्री करते हैं तब यह राज्य के विकास की पहल होती है लेकिन अब यह कॉन्ग्रेस को उद्योगपति के ही हित की बात नजर आ रही है। तो राहुल जी, जब आप यह कहें कि बिहार को योजनाबद्ध तरीके से बर्बाद किया गया तो यह भी आगे से साथ-साथ ही स्पष्ट कर दें कि यह सब आपकी पार्टी और सहयोगियों का ही किया धरा है।

फुलवारी शरीफ से किशनगंज तक भारत को 2047 तक इस्लामी मुल्क बनाने की वही साजिश, जानिए ‘दरभंगा मॉड्यूल’ वाली जमीन पर कैसे गहरा रहा कट्टरपंथ का खतरा

बिहार में भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने की गहरी साजिशें रची गई है। सीमांचल से लेकर मिथिलांचल तक इसकी जद में हैं। दरभंगा मॉड्यूल, फुलवारी शरीफ मॉड्यूल से लेकर इंडियन मुजाहिदीन तक अपने स्लीपर सेल विकसित कर चुका है।

बिहार के सीमांचल के इलाके किशनगंज से प्रतिबंधित इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन पीएफआई का पूर्व अध्यक्ष महबूब आलम नदवी उर्फ महबूब आलम को गिरफ्तार किया गया है। एनआईए उसे 3 साल बाद गिरफ्तार कर पाई है। उसका सपना 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने का है।

11 सितंबर को किशनगंज से गिरफ्तारी के बाद उससे पूछताछ में कई खुलासे हुए हैं। उसका कनेक्शन फुलवारी शरीफ 2022 आपराधिक मामले से जुड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान इनलोगों ने गड़बड़ी की साजिश रची थी। इस मामले में चार्जशीट दाखिल की गई था। इस आधार पर उसे पकड़ा गया है। वह इस मामले का 19वाँ आरोपित है।

कौन है महबूब आलम

पीएफआई का पूर्व अध्यक्ष महबूब आलम नदवी कटिहार जिले के हसनगंज का रहने वाला है। पीएफआई पर प्रतिबंध लगने के बाद सीमांचल क्षेत्र में पिछले कई सालों से चोरी छिपे रह रहा था। वह किशनगंज के फातिमा गर्ल्स स्कूल में पिछले 6 महीने से पढ़ा रहा था। उसकी स्कूल में नियुक्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि उसके पास न तो जरूरी दस्तावेज थे और न ही उसने अपनी पहचान बताई थी। सिर्फ डेमो क्लास लेकर उसे नियुक्त कर दिया गया था।

पीएफआई को मजबूत करने और भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने के लिए वह मुस्लिम बहुल इलाके में जाकर युवाओं से मदद माँग रहा था। इसके लिए वह पूर्णिया, कटिहार, अररिया जैसे सीमांचल जिलों का कई बार दौरा कर चुका है। वह मुस्लिम युवकों को गुमराह करने के लिए किताबें बाँटता था। किशनगंज में गिरफ्तारी के बाद एनआईए की टीम ने लगातार उससे 3 दिन तक पूछताछ की।

एनआईए के मुताबिक, महबूब आलम का फुलवारी शरीफ टेरर मॉड्यूल से लेकर दरभंगा मॉड्यूल तक में अहम रोल था। उसने पीएफआई से लोगों को जोड़ा था और हथियारों का प्रशिक्षण भी दे रहा था। इस्लामी कट्टरपंथी संगठन के नेटवर्क को फैलाने के लिए वह गुप्त बैठकें आयोजित करता था। संगठन के लिए फंड जुटाता था और उसे कार्यकर्ताओं तक पहुँचाता था।

ऐसा नहीं है कि आतंकवाद को बढ़ाने के लिए इस्लामी कट्टरपंथियों ने हाल के दिनों में अपनी सक्रियता बिहार में बढ़ाई हो, इसकी शुरुआत तो यासीन भटकल ने इंडियन मुजाहिदीन की स्थापना कर और दरभंगा मॉड्यूल विकसित कर बहुत पहले कर चुका था।

फुलवारी शरीफ मॉड्यूल का खुलासा

पीएम मोदी के दौरे से पहले 11 जुलाई 2022 को एनआईए ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था। ये लोग पटना के फुलवारी शरीफ में दौरे से पहले आपराधिक साजिश को अंजाम देने में लगे थे। एनआईए ने 26 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था। ये सभी पीएफआई के सदस्य थे। इनलोगों ने प्रधानमंत्री के बिहार के दौरे के दौरान गड़बड़ी करने की साजिश रची थी। दौरे से कुछ दिनों पहले 11 जुलाई को एनआईए को इसका पता चल गया था। पीएफआई ने 11 आतंकियों को इसके लिए फुलवारी शरीफ भेजा था।

NIA ने बिहार में पटना से लेकर मधुबनी तक छापेमारी कर दूसरे सबूत भी जुटाए। आतंकियों की मदद के लिए इस्तेमाल हो रहा डिजिटल उपकरण मिला था। इस दौरान आतंकी ठिकानों पर आपत्तिजनक किताबें, डायरी भी मिली थी। इससे खुलासा हुआ कि 2023 से इनलोगों ने अपना टारगेट तय किया था कि ये 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क मनाना चाहते हैं।

पुलिस ने पटना में छापेमारी कर पीएफआई और एसडीपीआई यानी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया की आड़ में मार्शल आर्ट सिखाने के बहाने हथियार चलाने वाले ट्रेनिंग कैंप का खुलासा किया था। इसमें दूसरे राज्यों के लोगों को भी बुलाकर ट्रेनिंग दी जा रही थी। पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार भी किया था।

भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना पीएफआई का मकसद

फुलवारी शरीफ मामले की जाँच के दौरान एनआईए को चौकाने वाला दस्तावेज मिला। इस पर लिखा था ‘India 2047:Towards Rule of Islam in India” इसमें भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ाकर कैसे 2047 तक भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना है, इसकी चर्चा की गई थी। इसमें आतंकी गतिविधि को बढ़ाना, युवाओं को शामिल करना और पीएफआई के नेटवर्क को बढ़ाने का पूरा तरीका लिखा गया था।

आतंकियों का ‘गजवा ए हिंद’ का मंसूबा बिहार में 2010 में ही शुरू हो गया था, जब मिथिलांचल में आतंकी यासीन भटकल ने मुस्लिम युवाओं के दिमाग में आतंकवाद का जहर घोला। भारत को इस्लामिक मुल्क बनाने, शरिया कानून लागू करने, गैर मुस्लिमों को खत्म करने और ‘जजिया कर’ लागू करने जैसे पाठ पढ़ाया। अगर कोई इस्लाम कबूल नहीं करेगा, तो उसे मार देने की ट्रेनिंग दी।

दरभंगा मॉड्यूल बनाया था इंडियन मुजाहिदीन संस्थापक ने

दरभंगा में इंडियन मुजाहिदीन का संस्थापक यासीन भटकल रहता था। उसने इंडियन मुजाहिदीन की शुरुआत भी यहीं से की थी। आतंकियों को पैदा करने वाले यासीन भटकल ने नुरुद्दीन जंगी, सनाउल्लाह को भी ट्रेनिंग दी थी, जो फुलवारी शरीफ में आतंकी घटना को अंजाम देने के मंसूबे पाले एक्टिव था। हॉमियोपेथी डॉक्टर यासीन ने बहुत होशियारी से संगठन को दरभंगा में फैलाया। अपनी मीठी दवाइयों के साथ ‘इस्लामी कट्टरपंथ का जहर’ वह लोगों को बाँट रहा था।

उसने दरभंगा, समस्तीपुर जैसे कई इलाकों में इंडियन मुजाहिदीन से युवाओं को जोड़ा। जब देश के कई हिस्सों मसलन बंगलुरु, चेन्नई, वाराणसी में विस्फोट हुए, तो उसके तार दरभंगा से जुड़े। उस वक्त दरभंगा मॉड्यूल सुर्खियों में आया। एनआईए ने यासीन भटकल को नेपाल भागते हुए बॉर्डर से गिरफ्तार किया था।

स्लीपर सेल दरभंगा मॉड्यूल का अहम हिस्सा

आतंकी यासीन भटकल ने दरभंगा और मिथिलांचल के दूसरे क्षेत्रों को आतंकियों का पनाहगार बना दिया। उसने लोगों को स्लीपर सेल के रूप में काम करने की ट्रेनिंग दी। एनआईए ने स्लीपर सेल के रूप में काम करने वाले आतंकियों को जब पकड़ा, तब इसका खुलासा हुआ। आतंकवाद को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए भटकल ने स्लीपर सेल विकसित किया था। इसमें समस्तीपुर का रहने वाला तहसीन अख्तर भी शामिल था, जिसने यासीन के बाद इंडियन मुजाहिदीन की जिम्मेदारी संभाली थी।

पीएफआई पर प्रतिबंध के बाद छिप कर हो रही साजिश

2022 में पीएफआई पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक इस संगठन से जुड़े कई आतंकियों को इसके बाद गिरफ्तार किया गया। प्रतिबंध की वजह से पूर्व पीएफआई अध्यक्ष महबूब आलम पिछले 3 सालों से चोरी-छिपे संगठन को मजबूत करने में लगा हुआ था। महबूब आलम की गिरफ्तारी से पीएफआई की फंडिंग, हथियार और सदस्यों की अहम जानकारी एनआईए को लगेगी।

माना जा रहा है कि आगामी बिहार चुनाव में इस्लामी कट्टरपंथी गड़बड़ी कर सकते हैं। इसलिए तमाम एजेंसियाँ बिहार में खास तौर पर एक्टिव हैं।