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स्टालिन सरकार के निशाने पर हिंदूवादी यूट्यूबर मरीदास, जोसेफ विजय की रैली में भगदड़ पर बनाए गए वीडियो को लेकर किया गिरफ्तार: मंत्री सेंथिल की भूमिका पर उठाए थे सवाल

तमिलनाडु में विरोध को दबाने की सरकार की आदत का एक और उदाहरण देखने को मिला है। मशहूर यूट्यूबर मरीदास को शनिवार (4 अक्टूबर 2025) को DMK सरकार ने गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने करूर में तमिलागा वेत्रि कझागम (TVK) नेता और अभिनेता जोसेफ विजय की रैली में हुई भगदड़ पर अपने वीडियो में सवाल उठाए थे। इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो चुकी है।

यह पहली बार नहीं है जब मरीदास स्टालिन सरकार के निशाने पर आए हों, इससे पहले भी तमिलनाडु सरकार उन्हें 2021 में गिरफ्तार कर चुकी है। शनिवार को मरीदास के अपने गिरफ्तारी को लेकर एक ट्वीट भी किया है।

इस मामले में स्टालिन की पुलिस का दावा है कि मरीदास ने अपने वीडियो में गुमराह करने वाले और झूठे बयान दिए हैं, जिसके चलते उनके खिलाफ आईपीसी और आईटी एक्ट की कई धाराओं के तहत केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।

मौजूदा मामला: करूर भगदड़ और साजिश का आरोप

मरीदास को चेन्नई के नीलंकरई स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले ही उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, “पूरे नाटक को डीएमके गैंग ने अदालत में रचा है, मैं इसे उजागर करने वाला हूँ।” उनका वीडियो वायरल होने के बाद मुख्यमंत्री स्टालिन ने सख्त संदेश जारी करते हुए कहा था कि सोशल मीडिया पर अपमानजनक और भ्रामक टिप्पणी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

अपने यूट्यूब वीडियो में मरीदास ने सीधे तौर पर डीएमके के वरिष्ठ नेता और मंत्री सेंथिल बालाजी पर उंगली उठाई थी। उन्होंने कहा कि करूर बालाजी का गढ़ है और विजय की रैली के दौरान भगदड़ स्वाभाविक नहीं बल्कि जानबूझकर पैदा की गई अफरातफरी का नतीजा हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सेंथिल बालाजी सत्ता परिवार के बेहद करीबी और ऐसे राजनेता हैं जो किसी भी हद तक जा सकते हैं।

मरीदास ने भगदड़ में साजिश की संभावना जताते हुए तीन बिंदुओं का जिक्र किया-

  1. रैली में लगातार घूमती एक एंबुलेंस और उसे लेकर सन टीवी की कवरेज।
  2. एक ऐसा व्यक्ति, जो सेंथिल बालाजी का करीबी बताया जा रहा था, उसकी बाइट का इस्तेमाल।
  3. कार्यक्रम के दौरान अचानक काटी गई बिजली, जिसे जाँच आयोग ने नजरअंदाज कर दिया।

उन्होंने इस हादसे की जाँच के लिए बनाए गए अरुणा जगदीशन आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और इसे सिर्फ दिखावा करार दिया। मरीदास का कहना था कि आयोग असली विफलताओं और संभावित षड्यंत्र को ढकने के लिए बनाया गया है।

2021 में गिरफ्तारी का कारण बना सोशल मीडिया पोस्ट

यह पहली बार नहीं है जब मरीदास को उनकी टिप्पणियों के कारण गिरफ्तार किया गया। दिसंबर 2021 में भी उन्हें साइबर क्राइम पुलिस ने मदुरै से गिरफ्तार किया था। उस समय उन्होंने कुन्नूर में हुए हेलीकॉप्टर हादसे पर सवाल उठाए थे जिसमें तत्कालीन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत और 13 अन्य लोगों की मौत हुई थी।

मरीदास ने ट्वीट कर पूछा था कि क्या ‘तमिलनाडु कश्मीर बनता जा रहा है’ और आरोप लगाया था कि डीएमके की शह पर देशद्रोही ताकतें सक्रिय हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि डीएमके समर्थक सोशल मीडिया पर रावत की मौत पर मजाक उड़ा रहे हैं और यही वजह है कि पार्टी अलगाववादी ताकतों के लिए सबसे अच्छा विकल्प है।

इस ट्वीट को आधार बनाकर मरीदास पर आईपीसी की धारा 153 और 505(2) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में उस समय भाजपा समर्थक बड़ी संख्या में पुलिस थाने पहुँचे थे। यह गिरफ्तारी भी सोशल मीडिया पोस्ट को आधार बनाकर की गई थी, जबकि अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि सिर्फ सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी के लिए गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।

अपनी जड़ों पर है गर्व

डीएमके और उसके समर्थक लंबे समय से मरीदास पर साम्प्रदायिकता फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं। पार्टी का कहना है कि उनके वीडियो हिंदू-मुस्लिमो के बीच शत्रुता भड़काते हैं और समाज में तनाव पैदा करते हैं। मरीदास ने कई मौकों पर डीएमके की राजनीति पर सवाल उठाए हैं।

चाहे वह अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले का विरोध हो या फिर जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पार्टी का रुख। उन्होंने खुले तौर पर कहा था कि डीएमके का विरोध आतंकी संगठनों का समर्थन करने जैसा है और सवाल उठाया था कि क्या पार्टी ने पाकिस्तान या आतंकियों से समझौता किया है। डीएमके ने इसे देश विरोधी बयान करार देते हुए उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

दिलचस्प बात यह है कि मरीदास अपनी हिंदू पहचान को लेकर खुलकर बोलते हैं और इसे अपनी ताकत मानते हैं। उनका कहना है, “हिंदू जड़ों पर गर्व करना सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की बुनियाद है।” यही कारण है कि उनके वीडियो अक्सर विवादों में आ जाते हैं और उन्हें हिंदूवादी यूट्यूबर के रूप में देखा जाता है।

कट्टर राष्ट्रवादी, घोर चीन विरोधी: जानें कौन हैं जापान की पहली महिला PM बनने जा रहीं साने ताकाइची, अपने देश को बनाना चाहती हैं महाशक्ति

जापान की सत्ताधारी पार्टी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) ने शनिवार (4 अक्टूबर 2025) को साने ताकाइची (Sanae Takaichi) को अपना नया नेता चुन लिया है। 64 साल की ताकाइची अब जापान की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने की ओर अग्रसर हैं।

ताकाइची ने पार्टी मुख्यालय में हुए वोटिंग में सेंटरिस्ट उम्मीदवार शिंजिरो कोइजुमी को हराया। जापान की संसद (जिसे डाइट कहा जाता है) में मध्य अक्टूबर में औपचारिक रूप से उन्हें प्रधानमंत्री चुना जाएगा। ताकाइची शिगेरू इशिबा की जगह लेंगी, जिन्होंने सिर्फ एक साल पहले प्रधानमंत्री पद सँभाला था। LDP इस समय संकट में है।

पार्टी संसद के दोनों सदनों में अपना बहुमत खो चुकी है। इशिबा के खिलाफ पार्टी के भीतर से असंतोष था, जिसके चलते उन्होंने इस्तीफा देने की घोषणा की थी। ताकाइची की जीत को पार्टी के दक्षिणपंथी (राइट-विंग) धड़े की जीत के रूप में देखा जा रहा है।

अपनी जीत के बाद ताकाइची ने कहा, “लोग सवाल कर रहे हैं कि LDP आखिर किसके लिए खड़ी है और क्या हमें जनता की मुश्किलें समझ आती हैं। पार्टी की नीतियों में अब कोई दूरदृष्टि नहीं दिख रही है।”

ताकाइची का एजेंडा: राष्ट्रवाद और सैन्य मजबूती

ताकाइची खुद को शिंजो आबे की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी मानती हैं। आबे 2012 से 2020 तक प्रधानमंत्री रहे और 2022 में उनकी हत्या हो गई थी। ताकाइची भी उनकी तरह राष्ट्रवादी, सामाजिक रूप से रूढ़िवादी और आक्रामक आर्थिक नीतियों की समर्थक हैं। वो पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर को अपना आदर्श मानती हैं।

वह जापान की सांविधानिक pacifism (अहिंसा और युद्ध विरोध) नीति को बदलना चाहती हैं, खासकर अनुच्छेद 9 को जो कहता है कि जापान कभी युद्ध नहीं करेगा और न ही सेना रखेगा। ताकाइची चाहती हैं कि जापान की सैन्य ताकत बढ़ाई जाए ताकि वह चीन जैसे देशों से मुकाबला कर सके। वे चीन के खिलाफ सख्त रुख रखने के लिए जानी जाती हैं और ताइवान के साथ ‘अर्ध-सैन्य साझेदारी’ चाहती हैं।

(फोटो साभार: द जापान टाइम्स)

वह यासुकुनी मंदिर जाती हैं, जो जापान के युद्धकालीन सैनिकों को श्रद्धांजलि देता है, जिनमें कुछ युद्ध अपराधी भी शामिल हैं। चीन और कोरिया जैसे पड़ोसी देश इसे जापान की सैन्यवादी मानसिकता की वापसी मानते हैं। ताकाइची मानती हैं कि जापान को अब और युद्ध अपराधों के लिए माफी माँगने की जरूरत नहीं है।

सामाजिक मुद्दों पर रुख: महिलाओं और समलैंगिकों के खिलाफ

ताकाइची महिला अधिकारों और लैंगिक समानता की विरोधी मानी जाती हैं। वे शादीशुदा जोड़ों को अलग-अलग सरनेम रखने की अनुमति देने के खिलाफ हैं। वे महिलाओं को शाही परिवार की उत्तराधिकारी बनने का अधिकार देने के खिलाफ हैं। वे समलैंगिक विवाह की भी विरोधी हैं।

इसी कारण कई महिलाएँ ताकाइची की प्रधानमंत्री बनने की संभावना को महिलाओं की प्रगति के रूप में नहीं देखतीं। क्योटो की प्रोफेसर यायो ओकानो ने कहा, “ताकाइची ने महिलाओं की मुश्किलों या लैंगिक भेदभाव पर कुछ भी नहीं कहा। इससे संकेत मिलता है कि महिलाओं के लिए आने वाला समय और कठिन हो सकता है।”

अर्थव्यवस्था: खर्च बढ़ाने की नीति

आर्थिक मामलों में ताकाइची भी आबे की तरह हैं। वे सरकारी खर्च बढ़ाकर और सस्ते कर्ज के जरिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहती हैं। वे जापान के सेंट्रल बैंक द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की आलोचक रही हैं और मंदी से जूझ रही अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने की बात करती हैं, भले ही इससे घाटा बढ़े या मुद्रास्फीति हो।

हाल ही में उन्होंने उपभोग कर (Consumption Tax) घटाने की बात की थी, लेकिन चुनाव के दौरान उन्होंने इस प्रस्ताव को थोड़ा दबा दिया। अगर विपक्ष के दबाव में वह इसे दोबारा लाती हैं, तो मुद्रास्फीति, महँगाई और कमजोर येन जैसी समस्याएं आ सकती हैं।

विदेश नीति और चुनौतियाँ

ताकाइची को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से भी जल्दी ही निपटना होगा, जो अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत में जापान आने वाले हैं। ट्रंप और इशिबा के बीच हुए व्यापार समझौते पर ताकाइची दोबारा बातचीत कर सकती हैं।

वे आव्रजन (इमिग्रेशन) के खिलाफ भी सख्त रुख रखती हैं। हाल ही में उन्होंने विदेशी पर्यटकों के व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई थी और ‘बुरे व्यवहार वाले विदेशियों’ पर कार्रवाई की बात कही थी। ताकाइची की जीत से LDP को दक्षिणपंथी वोटर्स का समर्थन फिर से मिल सकता है, लेकिन देश की राजनीति में अस्थिरता अभी बनी रह सकती है।

उनके विचार दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका के साथ जापान के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं। पार्टी के पास संसद में बहुमत नहीं है, इसलिए ताकाइची को कई मुद्दों पर समझौता करना होगा, जिससे उनकी आलोचना हो सकती है। दूर-दराज की दक्षिणपंथी पार्टी सान्सेइतो (Sanseito) की लोकप्रियता भी LDP को चुनौती देती रहेगी।

वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है, ताकाइची की आर्थिक नीतियाँ जोखिम भरी हो सकती हैं और जनता का भरोसा जीतने में उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ेगी।

‘80,000 मुस्लिम वोटरों को अंतिम सूची से हटाया गया’: प्रोपेगेंडा मीडिया ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने बिहार SIR पर की झूठी रिपोर्ट, जानिए क्या है पूरा सच

बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल भी तेज होता जा रहा है। बीते दिनों में ‘वोट चोरी’ और विशेष मतदाता पुनरीक्षण अभियान (Special Intensive Revision – SIR) के जरिए मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे झूठे आरोपों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है।

इसी बीच प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने 28 सितंबर 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में लगभग 80,000 मुस्लिम वोटरों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश की गई।

यह रिपोर्ट आयुषी कर और विष्णु नारायण ने लिखी थाी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह योजना पूर्वी चंपारण जिले के ढाका विधानसभा क्षेत्र में चलाई जा रही थी, जहाँ मुस्लिम वोटरों को ‘गैर-नागरिक’ बताकर सूची से हटाने की कोशिश की गई।

हालाँकि इन दावों की पोल तब खुल गई जब अंतिम वोटर लिस्ट 30 सितंबर 2025 को जारी हुई। चुनाव आयोग ने बताया कि पूरे SIR की प्रक्रिया में ढाका विधानसभा के महज 17,631 वोटर्स के नाम ही हटाए गए।

हटाए गए नाम उन लोगों के थे जो या तो मृतक थे, लंबे समय से मौजूद नहीं थे, या फिर दूसरे स्थानों पर चले गए थे। ढाका क्षेत्र में कुल 3,44,000 वोटर थे, जिनमें से 3,27,000 को फॉर्म जारी किए गए थे। यानी, 80,000 मुस्लिम वोटरों को हटाने का दावा पूरी तरह से झूठा और गुमराह करने वाला निकला।

चुनाव आयोग ने किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाया। जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए, वे सभी तय प्रक्रिया के तहत हटाए गए थे। इसके अलावा, बूथ स्तर के एजेंट (Booth Level Agents – BLAs) ने सिर्फ उन्हीं मतदाताओं को हटाने के लिए आवेदन दिए जो योग्य नहीं थे, जैसे कि फर्जी नाम, दोहराव, या जिनके दस्तावेज अधूरे थे।

रिपोर्ट में किए गए विवादित दावे

रिपोर्ट में दावा किया गया कि बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (CEO) और भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जिला अधिकारी यानी निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को आधिकारिक आवेदन दिए गए ताकि मुस्लिम वोटरों को मतदाता सूची से हटाया जा सके।

इसमें आरोप लगाते हुए लिखा गया, “एक आवेदन ढाका से बीजेपी विधायक पवन कुमार जैसवाल के निजी सहायक के नाम से किया गया। दूसरा आवेदन पटना स्थित बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर किया गया। ये हमारे द्वारा देखे गए दस्तावेजों से स्पष्ट होता है।”

रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ‘यह एक सोचा समझा और टार्गेटेड प्रयास था, जिसका उद्देश्य ढाका विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम वोटरों को बड़े पैमाने पर हटाना था।’

रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने उन लोगों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, जो ढाका के लोगों का नाम मतदान सूची से हटाना चाहते थे।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि SIR अभियान के दौरान ECI ने ‘बीच में यह निर्णय लिया कि लोगों को सिर्फ नामांकन फॉर्म भरवाना होगा और दस्तावेजी प्रमाण बाद में दिए जा सकते हैं।’

रिपोर्ट ने आयोग, उसके अधिकारियों, बूथ स्तर के कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को ‘विश्वास न करने लायक’ तक कह डाला। रिपोर्ट में कहा गया, “हमने बीजेपी द्वारा जिला निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को दिए गए सभी आवेदन देखे। जिन सभी नामों को हटाने की माँग की गई, वे मुस्लिम थे।”

रिपोर्ट ने यह आरोप भी लगाया कि पार्टी की ओर से हर आवेदन पर BLA ने हस्ताक्षर किए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि किन कारणों से नाम हटाने की माँग की गई, जबकि यह बताना जरूरी होता है।

रिपोर्ट ने बीजेपी नेता और ढाका विधायक के निजी सहायक धीरज कुमार पर आरोप लगाया कि उन्होंने ढाका सीट से 78,384 मुस्लिम वोटरों को हटाने की माँग की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया, “बीजेपी राज्य मुख्यालय के लेटरहेड पर एक पत्र पटना स्थित मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को भेजा गया। CEO राज्य में आयोग का सबसे वरिष्ठ अधिकारी होता है।” इस पत्र में वही माँग दोहराई गई।

हालाँकि मीडिया पोर्टल द्वारा लगाए गए इन चौंकाने वाले आरोपों के बावजूद ढाका की अंतिम वोटर सूची ने उनके दावों की पोल पूरी तरह से खोल दी। इसके अलावा, यह भी जानना जरूरी है कि किसी भी राजनीतिक दल ने SIR अभियान को लेकर चुनाव आयोग में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई।

इसके उलट उनके नेताओं ने झूठ फैलाया और उनके कार्यकर्ता पूरे अभियान के दौरान आयोग के साथ मिलकर काम करते रहे। इससे उनके प्रचार का गुब्बारा और भी फूट गया।

‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ की स्थापना किसने की?

इस मीडिया संस्थान की स्थापना नितिन सेठी और कुमार संभव श्रीवास्तव ने की थी और यह ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसे ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन और KAS जैसी संस्थाओं से आर्थिक सहायता मिलती है, साथ ही अन्य नेटवर्कों से भी फंड प्राप्त होता है।

जर्मनी की KAS फाउंडेशन CSDS को भी आर्थिक मदद देती है। CSDS तब सुर्खियों में आया जब इसके निदेशक संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनावों को लेकर गलत जानकारी फैलाई। उन्होंने बाद में माफी माँगी, लेकिन तब तक वह झूठ सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल चुका था और कॉन्ग्रेस पार्टी ने इसका इस्तेमाल बीजेपी पर हमला करने के लिए किया।

‘मोटरसाइकल से भारी होती है कार ताकि इंजन बचाए ड्राइवर की जान’: समझ से परे है राहुल गाँधी का तर्क, कोलंबिया में बेतुकी बात कर उड़वा रहे अपनी खिल्ली

अपने कोलंबिया के दौरे में राहुल गाँधी ने एनविगेडो में स्थित एआईए विश्वविद्यालय में एक भाषण दिया। इस भाषण में उन्होंने कार और मोटरसाइकिल पर एक बेतुका दावा किया जिसके बाद भाजपा और नेटीजंस ने उनको आधे हाथों ले लिया।

राहुल ने विकेंद्रीकरण यानी डिसेंट्रलाइजेशन को मोटर इंजीनियरिंग, क्रैश सेफ्टी और इलेक्ट्रिक मोटर के फायदे जैसी बातों से अपने दावे को समझाने की कोशिश की। इसमें उन्होंने कार और मोटरसाइकिलों के बीच तुलना करके अपने बिंदुओं को समझाया।

राहुल गाँधी ने पहले पूछा कि कार 3000 किलोग्राम तक भारी क्यों होती हैं, जबकि एक मोटरसाइकिल का वजन सिर्फ 100 किलोग्राम होता है। राहुल ने कहा, “एक यात्री को ले जाने के लिए आपको 3000 किलोग्राम के कार की जरूरत पड़ती है लेकिन 100 किलोग्राम की मोटरसाइकिल दो यात्रियों को लेकर जा सकती है। तो ऐसे में दो लोगों को ले जा सकने वाली मोटरसाइकिल का वजन सिर्फ 150 किलोग्राम ही क्यों और कार को 3000 किलोग्राम के वजन की जरूरत क्यों पड़ती है?”

इसके बाद उन्होंने खुद ही इस बात का जवाब दिया, यह दावा करते हुए की कार भारी इसलिए होती है ताकि दुर्घटना होने पर इंजन से ड्राइवर को कुचलने से बचाया जा सके। जबकि इस तरह की स्थिति में मोटरसाइकिल का इंजन आराम से वाहन से अपने आप अलग हो जाता है।

उन्होंने कहा, “मोटरसाइकिल में जब कोई दुर्घटना होती है तो इंजन आपसे अलग हो जाता है। ऐसे में इंजन आपको नुकसान नहीं पहुँचाता। कार की दुर्घटना होने के दौरान इंजन कार के अंदर आने लगता है, इसलिए कार इस तरह से डिजाइन की जाती है ताकि इंजन आपको मार ना सके।”

फिर राहुल गाँधी ने सुझाव दिया कि इलेक्ट्रिक कारें इस समस्या का हल देती हैं, क्योंकि उनमें कई मोटर लगाई जा सकती हैं। उन्होंने कहा, “इलेक्ट्रिक मोटर आपको यह सुविधा देती है कि आप एक मोटर यहाँ लगाएँ, एक वहाँ लगाएँ और एक वहाँ भी लगाएँ। यानी इलेक्ट्रिक मोटर शक्ति का विकेंद्रीकरण है। यही इसकी असली ताकत है।”

राहुल गाँधी और उनके समर्थकों को लग सकता है कि यह बहुत तर्कसंगत बात है, लेकिन सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस नेता के ये सारे दावे बेबुनियाद हैं। बीजेपी ने तो इसे ‘गिबरिश’ यानी बकवास तक कह दिया। आइए जानते हैं क्यों।

वाहन के वजन की बात करें तो

पहला, चार पहियों वाली कार और दोपहिया वाहन के वजन में फर्क होना जाहिर है, लेकिन राहुल गाँधी ने इसे बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया। उन्होंने कहा कि एक आम कार को सिर्फ एक यात्री को ले जाने के लिए 3,000 किलो धातु की जरूरत होती है, जबकि मोटरसाइकिल सिर्फ 100 किलो धातु में दो लोगों को ले जाती है।

असल में, आम पैसेंजर कारों का वजन इससे काफी कम होता है, अमूमन 1,000 से 2,000 किलो के बीच। 3,000 किलो का आँकड़ा भारी-भरकम गाड़ियों के लिए होता है, न कि आम कारों के लिए।

उदाहरण के तौर पर, भारतीय बाजार में, प्रसिद्ध मॉडल जैसे मारुति सुजुकी ऑल्टो का वजन करीब 680-800 किलोग्राम होता है। टाटा नैनो, जिसे कभी दुनिया की सबसे सस्ती कार कहा गया था, उसका वजन भी लगभग 600- 800 किलोग्राम था। ये कारें शहरी इलाकों में आसानी से चलती हैं और राहुल गाँधी के बताए वजन के पास भी नहीं पहुँचतीं।

आज के लोकप्रिय मॉडलों जैसे सुजुकी स्विफ्ट, टाटा नेक्सॉन, हुंडई क्रेटा जैसी सभी 1500 किलो से कम वजन की हैं। कुछ बड़े SUV जरूर भारी होते हैं, लेकिन वे भी 2,000 किलो से ज्यादा नहीं होते। सिर्फ कुछ अमेरिकी मसल कारें जैसे हमर ही 3,000 किलोग्राम से अधिक की होती हैं।

इसके अलावा, ज्यादातर मोटरसाइकिलों का वजन 100 किलो से ज्यादा होता है। आम मॉडल का वजन 150-300 किलो के बीच होता है। उदाहरण के लिए, भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली हीरो स्प्लेंडर का वजन लगभग 110-120 किलो होता है और बजाज पल्सर सीरीज का वजन 140-160 किलो तक होता है।

रॉयल एनफील्ड की ज्यादातर मोटरसाइकिलें करीब 200 किलो की होती हैं। यहाँ तक कि स्कूटर भी 100 किलो से ज्यादा वजन के होते हैं।

कारें भारी होती हैं क्योंकि उसका इंजन ड्राइवर को मार सकता है?

राहुल गाँधी ने कार और मोटरसाइकिल के वजन में फर्क को लेकर तर्क दिया कि कारें इसलिए भारी होती हैं ताकि एक्सीडेंट में उनका इंजन ड्राइवर को ‘मार’ न दे, जबकि मोटरसाइकिल का इंजन टक्कर में ‘उड़’ कर अलग हो जाता है। ये तर्क सामान्य समझ और वैज्ञानिक नियमों के बिल्कुल उलट है।

कारण बहुत ही सरल है। जब कोई कार एक्सीडेंट का शिकार होती है, तो इंजन केबिन की तरफ नहीं आता, बल्कि आगे की दिशा में जाने की कोशिश करता है। इसका कारण है न्यूटन का पहला नियम, जिसे जड़त्व का नियम कहते हैं। जब कोई कार चल रही होती है, तो उसमें मौजूद हर चीज उसी गति से चलती है। अगर अचानक ब्रेक लगे या टक्कर हो जाए, तो कार तो रुक जाती है लेकिन अंदर की चीजें अपनी गति बनाए रखने की कोशिश करती हैं। यही कारण है कि एक्सीडेंट में यात्री डैशबोर्ड से टकरा जाते हैं। इंजन भी यही प्रवृत्ति दिखाता है।

दुर्घटना में केवल यात्री और ढीली या कार से न जुड़ी हुई चीजें आगे बढ़ती हैं, लेकिन इंजन जैसे हिस्से वाहन के चेसिस से मजबूती से जुड़े होते हैं। कार का इंजन, गियरबॉक्स और अन्य हिस्सों से जुड़ा होता है और इतनी मजबूती से फिट किया जाता है कि वह टक्कर के बाद भी अपनी जगह से नहीं हिलता। इसलिए राहुल गाँधी का यह दावा कि इंजन अंदर घुसकर ड्राइवर को मार सकता है, पूरी तरह गलत है।

ठीक इसी तरह, मोटरसाइकिल का इंजन भी फ्रेम से मजबूती से जुड़ा होता है। यह कोई सेफ्टी मेकेनिज्म नहीं है कि टक्कर के समय इंजन ‘उड़ जाए’ या अलग हो जाए। आम सड़क दुर्घटनाओं में मोटरसाइकिल का इंजन अपनी जगह पर ही रहता है, चाहे टक्कर कितनी भी जोरदार क्यों न हो।

दोपहिया वाहन चालकों को एक्सीडेंट के बाद इंजन से चोट नहीं लगती क्योंकि टक्कर के समय झटका इतना तेज होता है कि सवार आमतौर पर वाहन से बाहर फेंका जाता है। यह न्यूटन के जड़त्व के नियम के कारण होता है। सिर्फ कुछ खास रेसिंग घटनाओं जैसे MotoGP में कभी-कभी इंजन अलग होता दिखता है, लेकिन आम सड़क दुर्घटनाओं में जो मोटरसाइकिलें चलती हैं, उनका इंजन फ्रेम से जुड़ा ही रहता है।

कार और मोटरसाइकिल दोनों में इंजन चेसिस से मजबूती से जुड़ा होता है ताकि गाड़ी की स्थिरता, प्रदर्शन और सुरक्षा बनी रहे। ये इंजन न तो आमतौर पर ड्राइवर को चोट पहुंचाते हैं और न ही एक्सीडेंट में अलग हो जाते हैं, जैसा कि राहुल गाँधी ने दावा किया।

इसके अलावा, आधुनिक कारों में ऐसी तकनीक होती हैं जैसे क्रम्पल जोन, फायरवॉल और ब्रेकअवे माउंट्स आदि टक्कर के समय इंजन को केबिन से दूर मोड़ देती हैं। ये हिस्से दुर्घटना के समय ऊर्जा को सोखते हैं और इंजन को अंदर घुसने से रोकते हैं।

भारत में अब कई गाड़ियों में ऐसी सुरक्षा तकनीक आ चुकी हैं, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि एक्सीडेंट के समय इंजन नीचे की ओर खिसक जाए और यात्रियों को कोई खतरा न हो।

कारें मोटरसाइकिल से भारी क्यों होती हैं?

यह बात तो बिल्कुल जाहिर है, कारें और मोटरसाइकिल दोनों ही स्टील और अन्य धातुओं से बनी होती हैं, लेकिन कारों का आकार मोटरसाइकिल से कहीं बड़ा होता है। कारों में बड़ा चेसिस होता है, ज्यादा पहिए होते हैं (स्पेयर टायर समेत), ज्यादा सीटें होती हैं और इंजन भी बड़ा और भारी होता है जिसमें आमतौर पर ज्यादा सिलेंडर होते हैं। ट्रांसमिशन सिस्टम भी बड़ा होता है।

कारों में कई ऐसे फीचर्स होते हैं जो मोटरसाइकिल में नहीं होते, जैसे विंडशील्ड, खिड़कियाँ, एयर कंडीशनिंग, म्यूजिक सिस्टम, सुरक्षा उपकरण (जैसे एयरबैग) और कई इलेक्ट्रॉनिक, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल हिस्से। इन सबकी वजह से कार का वजन बढ़ता है। कारों में बैटरी भी मोटरसाइकिल की तुलना में अधिक बड़ी होती है।

भले ही मोटरसाइकिल दो लोगों को ले जा सकती है और कारों का इस्तेमाल कई बार सिर्फ एक व्यक्ति करता है, लेकिन कारें असल में 4 से 5 लोगों और उनके सामान को ले जाने के लिए बनाई जाती हैं। इसलिए कार और मोटरसाइकिल की तुलना करना ही गलत है। यह पूरी तरह से बेमतलब है।

इलेक्ट्रिक मोटर की ताकत ‘शक्ति का विकेंद्रीकरण’ है?

राहुल गाँधी ने अपने भाषण में कहा कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ताकत ‘शक्ति के विकेंद्रीकरण’ में है, यानी मोटर को गाड़ी के अलग-अलग हिस्सों में लगाया जा सकता है जिससे ऊर्जा का बेहतर वितरण होता है।

कुछ इलेक्ट्रिक गाड़ियों में ऐसा होता है कि हर पहिए पर अलग मोटर होती है, जिससे ट्रैक्शन और एफिशिएंसी बेहतर होती है। लेकिन यह कोई सामान्य सेटिंग नहीं है। ऐसी तकनीक सिर्फ कुछ महँगी और हाई-एंड गाड़ियों में मिलती है। ज्यादातर इलेक्ट्रिक गाड़ियों में सिर्फ एक या दो मोटर ही होते हैं।

अगर गाड़ी में ज्यादा मोटर लगाए जाएँ, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है और बिजली की खपत भी ज्यादा होती है। हर ग्राहक को चार मोटर वाली गाड़ी चाहिए, ऐसा भी जरूरी नहीं है।

इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की मजबूती कई दूसरे पहलुओं से भी आती है। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिक मोटर ऊर्जा को बहुत कुशलता से बदलती है (इनकी एफिशिएंसी 80–90% तक होती है, जबकि पेट्रोल या डीजल इंजन की दक्षता सिर्फ लगभग 25% होती है) इसके अलावा, इलेक्ट्रिक मोटर तुरंत टॉर्क देती है, जिससे गाड़ी तेजी से चलती है और ये प्रदूषण भी बहुत कम करती हैं।

हालाँकि यह मान लेना कि EV हल्की होती हैं- सही नहीं है। इनकी बैटरी बहुत भारी होती है, जिससे इनका कुल वजन पेट्रोल गाड़ियों जितना या उससे ज्यादा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर, Tata Nexon का पेट्रोल मॉडल लगभग 1300 किलो वजन का होता है, जबकि Tata Nexon EV का वजन करीब 1400 किलो होता है। EV मोटर भले ही हल्की होती है, लेकिन भारी बैटरी पैक कुल वजन को बढ़ा देता है।

ये खबर मूल रूप से अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है। मूल कॉपी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

क्या है व्यक्तित्व अधिकारों की सुरक्षा? श्री श्री रविशंकर को AI वीडियो तो आशा भोसले को आवाज क्लोनिंग मामले में HC से राहत: डीपफेक वीडियो को लेकर अभिषेक-ऐश्वर्या ने Google पर किया केस

इंटरनेट पर डीपफेक फोटो और वीडियो के प्रसार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के ‘व्यक्तित्व के अधिकारों’ (Personality Rights) की रक्षा की है। इसके अलावा कोर्ट ने ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन की याचिका पर भी सुनवाई की, जिसमें AI जेनरेटेड वीडियो यूट्यूब पर डालने के चलते गूगल से ₹4 करोड़ की माँग की गई है। वही बॉम्बे हाई कोर्ट ने आशा भोसले को उनकी आवाज की क्लोनिंग और तस्वीरों को लेकर सुरक्षा प्रदान की है।

जॉन डो नाम के व्यक्ति पर श्री श्री रविशंकर की डीपफेक बनाने का आरोप

दिल्ली हाईकोर्ट में 26 अगस्त 2025 को श्री श्री रविशंकर ने शिकायत की कि कुछ AI वीडियो प्रसारित हो रहे हैं, जिसमें उनके नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें खासतौर से जॉन डो नाम के व्यक्ति पर आरोप लगाए गए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, रविशंकर की ओर से कोर्ट में बताया गया कि ये वीडियो जुलाई और अगस्त 2025 के बीच सामने आए, जिनमें उन्हें गंभीर बीमारियों के लिए संदिग्ध इलाजों का प्रचार करते हुए दिखाया गया और उनके नाम से झूठे वैज्ञानिक दावे किए गए।

रवि शंकर ने कोर्ट से कहा कि ये वीडियो उनकी शिक्षाओं को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं, जिससे जनता भ्रमित हो सकती है और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उनके नाम, छवि और विशिष्ट शैली पर उनका अधिकार है, जिसे बिना अनुमति डिजिटल रूप से छीना जा रहा है।

कोर्ट ने इस पर आदेश देते हुए कहा कि ऐसे कन्टेंट को फैलाने से नहीं रोका गया तो रवि शंकर को काफी नुकसान पहुँच सकता है। कोर्ट ने आदेश में साफ कहा कि जॉन डो को रविशंकर के व्यक्तित्व अधिकारों और प्रचार अधिकारों का उल्लंघन करने से रोका जाता है।

आशा भोसले की आवाज की क्लोनिंग पर रोक

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मशहूर गायिका आशा भोसले के अधिकारों की रक्षा करते हुए AI प्लेटफॉर्म्स, ई-कॉमर्स वेबसाइट्स और स्वतंत्र विक्रेताओं को उनकी आवाज की नकल करने या उनकी छवि का गलत इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी है।

कोर्ट ने यह आदेश गायिका की याचिका पर दिया है, जिसमें कई लोगों पर उनकी आवाज और तस्वीरों का दुरुपयोग करने के आरोप थे। इनमें AI कंपनी Mayk Inc. पर आवाज की क्लोनिंग करने का आरोप है। Amazon Sellers Services Pvt Ltd और Flipkart Internet Pvt Ltd पर उनकी छवि वाले पोस्टर और मर्चेंडाइज बिना अनुमति बेचने के आरोप हैं।

इसके अलावा एक स्वतंत्र कलाकार पर उनकी तस्वीरों के कपड़े बेचने के आरोप और Google LLC पर यूट्यूबर पर उनकी आवाज की नकल करने वाले AI वीडियो होस्ट करने का आरोप है।

आशा भोसले को अंतरिम सुरक्षा प्रदान करने के साथ ही कोर्ट ने इन सभी प्रतिवादियों को ऐसी सभी कन्टेंट को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने के भी आदेश दिए हैं। इसके अतिरिक्त सभी प्लेटफॉर्म्स को उल्लंघनकारी सामग्री से जुड़ी ग्राहक या विक्रेता की जानकारी, जिसमें नाम, संपर्क जानकारी, IP लॉग और भुगतान विवरण की जानकारी देनी होगी ताकि भोसले आगे कानूनी उपाय अपना सकें।

अभिषेक और ऐश्वर्या बच्चन ने गूगल पर किया केस

बॉलीवुड के मशहूर दंपति अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन ने भी AI जेनरेटेड डीपफेक वीडियो को लेकर गूगल और यूट्यूब पर केस किया है और व्यक्तित्व अधिकारों के सुरक्षा माँगी गई है। साथ ही उनकी छवि को पहुँचे नुकसान के लिए गूगल से ₹4 करोड़ की राशि की भी माँग की गई है।

अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय ने इस संबंध में 06 सितंबर 2025 को 1500 पन्नों की याचिका दायर की थी। इसमें सैंकड़ों लिंक औऱ स्क्रीनशॉट शामिल हैं, जिनमें दावा किया गया है कि यूट्यूब पर कई ऐसे वीडियो हैं जिनमें उनकी तस्वीरों और आवाजों का इस्तेमाल फर्जी, भ्रामक और अपमानजनक तरीकों से किया गया है।

गुरुवार (02 अक्टूबर 2025) को मामले की सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल को नोटिस जारी किया है और लिखित जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 तय की गई है।

अरिजीत सिंह के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा का कोर्ट आदेश

बॉलीवुड के मशहूर सिंगर भी बॉम्बे हाई कोर्ट में कुछ AI प्लेटफॉर्म पर उनके नाम, आवाज और तस्वीर के उपयोग से व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा की माँग कर चुके हैं। इस मामले में कोर्ट ने 26 जुलाई 2024 को ex-parte आदेश पारित कर अंतरिम सुरक्षा प्रदान की, जिसमें कहा गया कि बिना उनकी सहमति किसी को उनके नाम, आवाज, छवि आदि का उपयोग करने की अनुमति नहीं है। इसके साथ इंटरनेट पर उपलब्ध इस प्रकार का कन्टेंट हटाने के भी आदेश दिए थे।

क्या है व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा करना?

व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा इसीलिए की जाती है क्योंकि किसी भी व्यक्ति का नाम, चेहरा, आवाज, फोटो या हावभाव उसकी पहचान और निजी संपत्ति माने जाते हैं। ऐसे में जब AI या तकनीक से नकली वीडियो या वॉइस क्लोनिंग होती है तो यह उसकी छवि को नुकसान पहुँचाने, लोगों को गुमराह करने और उसकी पेशेवर कमाई पर असर डालने का खतरा पैदा करती है।

इसकी सुरक्षा के लिए अदालत बिना अनुमति ऐसी किसी भी तरह की सामग्री का न इस्तेमाल करने का आदेश देती है। ये अधिकार लोगों को, विशेष रूप से सार्वजनिक हस्तियों को उनकी सहमति के बिना विज्ञापन, व्यापारिक वस्तुओं, AI जेनरेटेड सामग्री और अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए उनके व्यक्तित्व के दुरुपयोग से बचाते हैं।

एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना का डीपफेक वीडियो हुआ था वायरल

एक्ट्रेस रश्मिका मंदाना का एक डीपफेक वीडियो दो साल पहले इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ था। इस वीडियो में एक बिकनी मॉडल के चेहरे को मॉर्फ कर रश्मिका मंदाना की तस्वीर लगा दी गई थी। सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस वीडियो की सच्चाई खुद सामने आकर रश्मिका ने बताई थी।

इस वीडियो पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने BNS की धारा 465 (जालसाजी के लिए दंड) और 469 (प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से जालसाजी) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 C और 66E के तहत मामला दर्ज कर संज्ञान लिया। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए वीडियो बनाने वाले मुख्य आरोपित को भी गिरफ्तार कर लिया था।

कहाँ से आया डीपफेक, कैसे करता है काम?

डीपफेक के सम्बन्ध में ‘द गार्जियन‘ के एक लेख में जानकारी दी गई है कि यह सबसे पहले सोशल मीडिया एप रेडिट (Reddit) पर सामने आया था। तब एक Deepfake नाम के यूजर ने टेलर स्विफ्ट, गल गडोट जैसी अभिनेत्रियों के फर्जी पोर्न क्लिप डाल दिए। इसके बाद से ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई।

डीपफेक तकनीक से वीडियो बनाना एक लम्बी प्रक्रिया है। सबसे पहले जिन दो लोगों के चेहरे आपस में बदले जाने हैं उनके हजारों फोटो वीडियो ‘एनकोडर’ नाम के एक AI आधारित प्रोग्राम पर चलाए जाते हैं। यह तकनीक इन दो चेहरों की समानताएँ परखती है। इसके बाद यह तकनीक इन चेहरों को केवल उनकी समानताओं के आधार पर सीमित कर देती है और एक कंप्रेस्ड इमेज बनाती है।

इसके पश्चात एक और AI तकनीक ‘डीकोडर’ से चेहरा तलाशने को कहा जाता है। आसान भाषा में समझे तो इनकोडर को ‘A’ का चेहरा पढ़ने के लिए तैयार किया जाता और डीकोडर को ‘B’ का चेहरा पढ़ने के लिए तैयार किया जाता है। इसके पश्चात दोनों मशीनों से यह चेहरा बनाने को कहा जाता है लेकिन इस स्थिति में इनकोडर को B का और डीकोडर को A का चेहरा बनाने को कहा जाएगा। ऐसे में मान लीजिए कि B उस फोटो में रो रहा है तो नई फोटो में A रोता हुआ दिखेगा।

इसके अलावा एक अन्य तकनीक जिसका नाम ‘जनरेटिव एड्वर्सियल नेटवर्क’ (GAN) है उसके जरिए भी बनाई जाती हैं। इसमें एक गड़बड़ तस्वीर और एक सही तस्वीर डाली जाती है। AI तकनीक इन दोनों के कोड डिकोड करके फोटो को आपस में मिलाती है। इसमें समय लगता है।

MLA बनने के शरजील इमाम के ख्वाब पर मुस्लिम भी खसा रहे बज्जर: समर्थक कह रहे- किशनगंज से ओवैसी दे टिकट, AIMIM ने कहा- मर्द है तो अपने इलाके से लड़े

बिहार के किशनगंज में मुस्लिमों की संख्या पूरे राज्य में सर्वाधिक है, 70% मुस्लिम आबादी वाले इस जिले में चुनाव से पहले मुस्लिम आपस में बँट गए हैं। इसकी वजह बना है जेल में बंद दिल्ली दंगों का आरोपित शरजील इमाम।

शरजील ने किशनगंज जिले के अंतर्गत आने वाली बहादुरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। शरजील का भाई मुजम्मिल इमाम उसके लिए प्रचार कर रहा है। अब यहाँ मुस्लिम इस बात को लेकर आपस में बँट गए हैं कि शरजील इमाम को किस दल से चुनाव लड़ना चाहिए।

स्क्रॉल में बीते अगस्त में शरजील इमाम का एक इंटरव्यू छपा था। इसमें शरजील से पूछा गया कि वह किस पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता है। शरजील ने कहा, “हमारे विकल्प सीमित हैं। मैं उन पार्टियों के साथ जुड़ना नहीं चाहता जो सिर्फ इमोशनल भाषण देती हैं।”

शरजील ने कहा, “हम किसी भी ऐसी पार्टी के साथ काम करने और जुड़ने के लिए तैयार हैं जो हमें बुनियादी व्यवस्थागत मुद्दों को उठाने और अल्पसंख्यकों व हाशिए पर पड़े लोगों के सम्मानजनक जीवन के लिए जरूरी संवैधानिक बदलावों के बारे में संदेश फैलाने में मदद करे।”

शरजील को AIMIM के समर्थन मिलने की माँग

सीमांचल के इस इलाके में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने 2020 के चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने सीमांचल की 24 सीटों में से 20 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें से 5 सीटें जीतीं थी। इस बार भी इस मुस्लिम बहुल इलाके में उनकी पार्टी पूरे दमखम से चुनाव लड़ रही है।

ऐसे में सोशल मीडिया और जमीन पर शरजील के समर्थकों के बीच यह माँग उठने लगी है कि ओवैसी की पार्टी को अपना उम्मीदवार इस सीट पर नहीं खड़ा करना चाहिए, कुछ लोग माँग कर रहे हैं कि ओवैसी की पार्टी को शरजील को टिकट देना चाहिए।

X पर शेख सब्बीर नामक एक यूजर ने लिखा, “शरजील इमाम जैसे होनहार, काबिल, पढ़ा लिखा, संजीदा शख्स को सदन में भेजना चाहिए। इसके लिए AIMIM के जिम्मेदार हजरात मुजम्मिल से बात करें।” सोहेल नामक एक अन्य यूजर ने लिखा, “AIMIM ने शरजील इमाम को टिकट क्यों नहीं दी है।”

वहीं, बहादुरगंज विधानसभा के AIMIM प्रत्याशी तौसीफ आलम ने कह दिया है कि वो किसी शरजील इमाम को नहीं जानते हैं। तौसीफ ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर उसमें मर्दानगी है तो अपने क्षेत्र से वह चुनाव लड़े। इस पर शरजील के भाई मुजम्मिल ने प्रतिक्रिया दी है।

मुजम्मिल ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए वही बात दोहराई जो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। मुजम्मिल ने कहा, “क्या किसी ने ये सवाल AIMIM के आलाकमान से ये सवाल पूछा कि शरजील इमाम को टिकट क्यों नहीं दिया, जब कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में ताहिर हुसैन साहब के घर तक चल कर खुद ओवैसी साहब गए और उनके परिवार से मुलाकात कर टिकट दिया।”

सोशल मीडिया पर जारी इस बहस के बीच यह जानना भी अहम है कि शरजील इमाम के अब्बू अकबर इमाम भी नेता रहे हैं। 2000 में उन्होंने कुर्था से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था और इसके बाद वह नीतीश कुमार की पार्टी JDU से जुड़े रहे। 2005 में उन्होंने JDU के टिकट पर जहाँनाबाद से चुनाव लड़ा था लेकिन वह RJD के उम्मीदवार से चुनाव हार गए थे। 2014 में उनका निधन हो गए था।

मुस्लिमों के ठेकेदार RJD-कॉन्ग्रेस की चुप्पी

शरजील इमाम को टिकट देने के नाम पर RJD और कॉन्ग्रेस दोनों चुप हैं। ये दोनों पार्टियाँ खुद को मुस्लिमों की रहनुमा बताती हैं लेकिन ये दोनों ही ना शरजील को टिकट देने में दिलचस्पी दिखा रही हैं, ना कोई इनसे यह माँग कर रहा है कि ये शरजील को टिकट दें। यानी बिहार में मुस्लिमों की उम्मीद केवल अब AIMIM से रह गई है और उस उम्मीद के चक्कर में किशनगंज के वोटर बँट गए हैं।

RJD और कॉन्ग्रेस दोनों दल AIMIM पर वोट काटने का आरोप लगाते हैं, बीजेपी की ‘B’ टीम बताते हैं लेकिन जब बारी साथ खड़े होने की आती है तो भाग खड़े होते हैं। इस चुनाव से पहले भी खुद औवेसी ने RJD से गठबंधन कर उन्हें महागठबंधन का हिस्सा बनाने की बात कही थी।

RJD ने क्या किया, RJD ने गठबंधन करना तो दूर AIMIM के नेताओं से ठीक तरह से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। ऐसे में शरजील इमाम के बहाने मुस्लिमों के बीच किशनगंज में मची सर-फुटव्वल फिर सामने आ गई है।

कहीं बढ़ा साइबर अपराध तो कहीं 66000 पहुँचे POCSO के मामले: 2023 की NCRB रिपोर्ट से जानिए किस राज्य का क्या है हाल

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार साल 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2022 की तुलना में 2023 में ऐसे मामलों में 9.2% की वृद्धि हुई और कुल 1,77,335 मामले सामने आए, जबकि 2022 में यह संख्या 1,62,449 और 2021 में 1,49,404 थी।

2005 की तुलना में यह आंकड़ा करीब दस गुना ज्यादा है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 22,393 मामले दर्ज हुए, इसके ठीक बाद महाराष्ट्र में 22,390 मामले सामने आए।

उत्तर प्रदेश ने 18,852, राजस्थान ने 10,577 और असम ने 10,174 मामलों की रिपोर्ट की। यह आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं और कुछ राज्यों में स्थिति बेहद चिंताजनक है।

बच्चों के विरुद्ध अधिकतम अपराध वाले राज्यों पर एनसीआरबी डेटा।

साल 2023 में बच्चों के खिलाफ हत्या के प्रयास से जुड़े कुल 290 मामले दर्ज किए गए, जिनमें पीड़ितों की संख्या 337 रही। इस आधार पर अपराध दर 0.1 प्रति लाख आबादी रही।

इसी तरह, उजागर करने और परित्याग (exposure and abandonment) से जुड़े मामलों की संख्या 653 रही, जिनमें 664 बच्चे पीड़ित बने। इन मामलों की भी अपराध दर 0.1 प्रति लाख आबादी दर्ज की गई।

2023 में अपहृत और बलात्कार किए गए बच्चों की संख्या

साल 2023 में बच्चों के अपहरण और किडनैपिंग से जुड़े कुल 79,884 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 82,106 बच्चे पीड़ित बने। इन अपराधों की दर 18.0 प्रति लाख आबादी रही। ये सभी मामले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 363A, 364, 364A, 365, 366, 366A, 367, 368 और 369 के तहत दर्ज हुए।

राज्यवार आँकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र इस सूची में सबसे आगे रहा, जहाँ 12,089 मामले और 12,971 पीड़ित सामने आए। इसके बाद मध्य प्रदेश में 9,833 मामले और 9,900 पीड़ित, ओडिशा में 5,905 मामले और 5,906 पीड़ित, राजस्थान में 4,441 मामले और 4,465 पीड़ित तथा कर्नाटक में 3,228 मामले और 3,292 पीड़ित दर्ज किए गए।

एनसीआरबी के आंकड़े उन राज्यों को दर्शाते हैं जहां बाल अपहरण और व्यपहरण के सर्वाधिक मामले सामने आते हैं।

साल 2023 में बच्चों से जुड़े गंभीर अपराधों के आँकड़े भी सामने आए। बाल तस्करी के कुल 397 मामले दर्ज हुए, जिनमें 1,425 बच्चे पीड़ित थे। वहीं, बच्चों से बलात्कार के 849 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 852 पीड़ित शामिल थे।

अगर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज सभी अपराधों को देखें तो साल 2023 में बच्चों के खिलाफ कुल 98,399 मामले और 1,05,094 पीड़ित दर्ज किए गए।

एनसीआरबी के आंकड़े बाल तस्करी के सर्वाधिक शिकार वाले राज्यों को दर्शाते हैं।

साल 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामले सबसे ज्यादा कुछ चुनिंदा राज्यों में दर्ज हुए। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 15,840 मामले दर्ज हुए और 16,546 बच्चे पीड़ित बने।

इसके बाद महाराष्ट्र में 13,461 मामले और 14,473 पीड़ित, उत्तर प्रदेश में 10,089 मामले और 10,335 पीड़ित, बिहार में 7,018 मामले और 7,397 पीड़ित, जबकि राजस्थान में 6,180 मामले और 6,237 पीड़ित सामने आए। ये आँकड़े बताते हैं कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में सबसे आगे ये पाँच राज्य रहे।

POCSO अधिनियम के तहत 2023 में दर्ज अपराध

साल 2023 में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में, जो POCSO एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत दर्ज हुए, कुल 67,694 मामले और 68,636 पीड़ित सामने आए। इनमें सबसे ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए, जहाँ 8,706 घटनाएँ और 8,966 पीड़ित थे।

इसके बाद महाराष्ट्र में 8,639 मामले और 8,761 पीड़ित, मध्य प्रदेश में 6,517 मामले और 6,559 पीड़ित, तमिलनाडु में 4,581 मामले और 4,728 पीड़ित, जबकि कर्नाटक में 3,878 मामले और 3,992 पीड़ित दर्ज किए गए। ये पाँच राज्य POCSO एक्ट के तहत दर्ज अपराधों में सबसे ऊपर रहे।

पॉक्सो अधिनियम के तहत सर्वाधिक मामले वाले राज्यों पर एनसीआरबी का डेटा।

साल 2023 में POCSO एक्ट की धारा 4 और 6 को IPC की धारा 376 के साथ मिलाकर देखे तो कुल 40,434 मामले दर्ज हुए, जिनमें 40,846 पीड़ित थे। इनमें से ज्यादातर मामले लड़कियों से जुड़े थे। 40,046 मामले और 40,423 पीड़ित। वहीं, लड़कों से जुड़े 388 मामले दर्ज हुए, जिनमें 423 पीड़ित शामिल थे।

इसी तरह, POCSO एक्ट की धारा 8 और 10 को IPC की धारा 354 के साथ मिलाकर देखें तो कुल 22,444 मामले दर्ज हुए, जिनमें 22,868 पीड़ित थे। इनमें से 22,149 मामले लड़कियों से जुड़े थे, जिनमें 22,557 पीड़ित थीं, जबकि 295 मामले लड़कों से जुड़े थे, जिनमें 311 पीड़ित दर्ज किए गए।

साल 2023 में बच्चों से जुड़े कई गंभीर मामले POCSO एक्ट और IPC की धाराओं के तहत दर्ज किए गए। POCSO की धारा 12 और IPC की धारा 509 के तहत कुल 2,826 मामले दर्ज हुए, जिनमें 2,910 पीड़ित थे, जिनमें से 2,778 मामले लड़कियों और 48 मामले लड़कों से जुड़े थे।

वहीं, POCSO की धारा 14 और 15 को IPC की धारा 376, 354 और 509 के साथ मिलाकर देखें तो 722 मामले दर्ज हुए, जिनमें 727 पीड़ित थे, जिनमें से 698 मामले लड़कियों और 24 मामले लड़कों से जुड़े थे।

POCSO एक्ट और IPC की धारा 377 के तहत 734 मामले दर्ज हुए, जिनमें 745 पीड़ित थे, इसमें 48 मामले लड़कियों और 686 मामले लड़कों से जुड़े थे। इसके अलावा, POCSO की धारा 17 से 22 के तहत 534 मामले दर्ज हुए, जिनमें 540 पीड़ित थे, जिनमें से 513 मामले लड़कियों और 21 मामले लड़कों के थे।

साल 2023 में बाल विवाह प्रतिबंध कानून के तहत भी 6,038 मामले दर्ज हुए, जिनमें 6,051 बच्चे पीड़ित बने। ये आंकड़े बच्चों के खिलाफ अपराधों और बाल संरक्षण की गंभीरता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

2023 में बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध

साल 2023 में साइबर अपराध/सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (SSL Law) के तहत बच्चों से जुड़े 1,681 मामले दर्ज हुए, जिनमें 1,736 पीड़ित थे। इसमें 1,499 मामले और 1,536 पीड़ित ऐसे थे जो बच्चों को यौन कृत्यों में दिखाने वाले सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से जुड़े थे।

सभी अपराधों (IPC + SSL) को मिलाकर देखें तो बच्चों के खिलाफ कुल 1,77,335 मामले और 1,86,521 पीड़ित दर्ज किए गए। राज्यों की स्थिति देखें तो मध्य प्रदेश में सबसे अधिक 22,393 मामले और 23,149 पीड़ित, महाराष्ट्र में 22,390 मामले और 23,555 पीड़ित, उत्तर प्रदेश में 18,852 मामले और 19,362 पीड़ित, राजस्थान में 10,577 मामले और 10,684 पीड़ित और असम में 10,174 मामले और 10,404 पीड़ित दर्ज किए गए। ये पाँच राज्य बच्चों के खिलाफ अपराधों में सबसे आगे रहे।

बच्चों के विरुद्ध अपराध के सर्वाधिक मामले दर्ज करने वाले राज्यों पर एनसीआरबी का डेटा।

2023 में ‘बच्चों के खिलाफ अपराध’ से संबंधित मामलों का निपटान

साल 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों के निपटान की स्थिति भी सामने आई। पुलिस द्वारा निपटाए गए मामलों की संख्या साल के अंत तक कुल 1,74,667 रही। इसमें 158 मामले जाँच के दौरान रद्द किए गए, 65 मामले ठहराए गए और 82,930 मामले जाँच के लिए लंबित रहे।

अदालतों द्वारा निपटाए गए मामलों के अनुसार, कुल 57,424 ट्रायल पूरे किए गए, जबकि 63,335 मामले अदालतों द्वारा निपटाए गए और 5,90,755 मामले ट्रायल के लिए लंबित रहे।

अभियुक्तों के निपटान के आंकड़ों के मुताबिक, बच्चों के खिलाफ अपराधों में कुल 19,371 लोग दोषी पाए गए, जिनमें 19,135 पुरुष और 236 महिलाएँ शामिल थीं।

वहीं, 3,290 लोग बरी किए गए (3,227 पुरुष और 63 महिलाएँ) और 47,025 लोग (45,839 पुरुष और 1,186 महिलाएँ) आरोपमुक्त हुए।

पीड़ितों की आयु और अपराधी से उनका संबंध

साल 2023 में POCSO एक्ट के तहत बच्चों के पीड़ितों की उम्र और अपराधियों के संबंध से जुड़े आंकड़े सामने आए। 6 साल से कम उम्र के बच्चों में 28 लड़के और 734 लड़कियाँ शामिल थीं, कुल 762 पीड़ित बने।

6 से 12 साल के बच्चों में 141 लड़के और 3,088 लड़कियाँ, कुल 3,229 पीड़ित थे। 12 से 16 साल के समूह में 157 लड़के और 15,287 लड़कियाँ, कुल 15,444 पीड़ित बने।

16 से 18 साल की उम्र में 97 लड़के और 21,314 लड़कियाँ, कुल 21,411 पीड़ित थीं। सभी उम्र के बच्चों को मिलाकर कुल 423 लड़के और 40,423 लड़कियाँ, यानी 40,846 पीड़ित हुए। पीड़ितों के अपराधियों के संबंध की जानकारी देखें तो 39,076 मामले ऐसे थे जहाँ आरोपित पीड़ित को जानता था।

इसमें 3,224 मामले परिवार के सदस्य, 15,146 मामले परिवार के दोस्त, पड़ोसी, नियोक्ता या अन्य परिचित व्यक्ति और 20,706 मामले दोस्तों, ऑनलाइन दोस्तों या विवाह के बहाने रहने वाले साथी से जुड़े थे। इसके अलावा, 1,358 मामले ऐसे थे जिनमें अपराधी अज्ञात थे या पहचाने नहीं जा पाए। कुल मिलाकर 40,434 मामले दर्ज हुए।

महत्वपूर्ण: : राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) बच्चों और अन्य अपराधों के मामलों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और विशेष तथा स्थानीय कानून (SLL) के तहत वर्गीकृत करता है, ताकि जाँच में मदद मिल सके और नीतियों के निर्माण के लिए जानकारी उपलब्ध हो। भारत का मुख्य आपराधिक कानून भारतीय दंड संहिता (IPC) है, जिसे पिछले साल भारतीय न्याय संहिता (BNS) द्वारा बदल दिया गया। यह कानून अपराधों और उनके जुर्मानों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। वहीं, SLL विशेष कानून हैं, जो भारतीय राज्यों और स्थानीय प्रशासन द्वारा बनाए जाते हैं और विशेष परिस्थितियों या अपराधों को कवर करते हैं।

निष्कर्ष

NCRB 2023 के आँकड़े यह साफ करते हैं कि बच्चों के खिलाफ अपराध भारत में अब भी गहरी और जड़ें जमाई समस्या बनी हुई है। अपहरण से लेकर साइबर शोषण तक सभी श्रेणियों में लगातार वृद्धि यह दर्शाती है कि मजबूत कानूनों के बावजूद बच्चे अब भी बेहद असुरक्षित हैं।

मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य लगातार अपराधों की सूची में शीर्ष पर बने हुए हैं, जो प्रभावी कानून प्रवर्तन और जनता में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को उजागर करता है। नीतियों से आगे, असली चुनौती यह है कि मामलों की त्वरित सुनवाई हो और सबसे छोटे नागरिकों के लिए सार्थक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

आईपीसी और पोक्सो धाराओं में जानकारी

भारतीय दंड संहिता

धारा 354 – किसी महिला की शील भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना।

धारा 363ए – भीख माँगने के उद्देश्य से नाबालिग का अपहरण करना या उसे अपंग बनाना।

धारा 364 – हत्या करने के लिए अपहरण या अपहरण करना।

धारा 364ए – फिरौती के लिए अपहरण आदि।

धारा 365 – किसी व्यक्ति को गुप्त रूप से और गलत तरीके से बंधक बनाने के इरादे से अपहरण करना।

धारा 366 – किसी महिला का अपहरण करना, उसे भगा ले जाना, या विवाह के लिए विवश करना आदि।

धारा 366ए – नाबालिग लड़की को भगाना (18 वर्ष से कम आयु की लड़की को किसी भी स्थान से इस आशय से ले जाना कि उसे अवैध संभोग के लिए मजबूर किया जा सके या बहकाया जा सके)।

धारा 367 – किसी व्यक्ति को गंभीर चोट पहुँचाने, गुलाम बनाने आदि के लिए अपहरण करना।

धारा 368 – अपहृत या अपहृत व्यक्ति को गलत तरीके से छिपाना या कैद में रखना।

धारा 369 – दस वर्ष से कम आयु के बच्चे का अपहरण या अपहरण, उसके शरीर से चोरी करने के इरादे से।

धारा 377 – अप्राकृतिक अपराध (प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध शारीरिक संबंध)।

धारा 509 – किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने के इरादे से कहे गए शब्द, हाव-भाव या कार्य।

पॉक्सो अधिनियम

धारा 4 – प्रवेशात्मक यौन हमले के लिए दंड।

धारा 6 – गंभीर प्रवेशात्मक यौन हमले के लिए दंड।

धारा 8 – यौन हमले के लिए दंड।

धारा 10 – गंभीर यौन हमले के लिए दंड।

धारा 12 – किसी बच्चे के यौन उत्पीड़न के लिए दंड।

धारा 14 – किसी बच्चे का अश्लील उद्देश्यों के लिए उपयोग करने के लिए दंड।

धारा 15 – किसी बच्चे से संबंधित अश्लील सामग्री के भंडारण के लिए दंड।

धारा 17 – किसी अपराध के लिए उकसाने के लिए दंड।

धारा 18 – अपराध करने के प्रयास के लिए दंड।

धारा 19 – अपराध की रिपोर्ट करने का दायित्व।

धारा 20 – मामले की रिपोर्ट या रिकॉर्ड न करने पर दंड।

धारा 21 – झूठी शिकायत या झूठी सूचना के लिए दंड।

धारा 22 – मुकदमे की प्रक्रिया और बच्चे की पहचान की सुरक्षा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

हिंदुत्व और संघ परिवार को घेरने की साजिश, समर्थकों के बहाने निशाने पर PM मोदी: गोडसे के नाम पर ‘द प्रिंट’ के सहारे झूठ-प्रोपेगेंडा फैला रहे वीर सांघवी

2 अक्टूबर को गाँधी जयंती थी, इसी दिन संयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का शताब्दी वर्ष का उत्सव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत तक सबने गाँधी को याद किया। इसके उल्ट हमेशा की तरह कुछ लोगों के लिए यह दिन गाँधी के बहाने हिंदू धर्म और हिंदुत्व को कटघरे में खड़ा करने का बहाना बन गया।

पत्रकार वीर सांघवी ने ‘द प्रिंट’ में एक लेख लिखकर गोडसे के बहाने हिंदुत्व पर सवाल खड़े किए की। सांघवी ने अपने लेख में सीधे-सीधे आरोप लगाने के बजाय वामपंथियों की मूल विचारधारा की तरह संदेह का बीज बोने का तरीका अपनाया है।

द प्रिंट का लेख

सांघवी ने अपने लेख के शीर्षक में ही शब्दों से खेलने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा, “क्यों मोदी के समर्थक ‘गर्वित हिंदू’ एमके गांधी से डरते हैं और उनके हत्यारे गोडसे का सम्मान करते हैं।” यानी जो प्रधानमंत्री गाँधी को अपना आदर्श मानकर चलते आए हैं, उनके विचार को आगे बढ़ाने की बात करते रहे हैं, समर्थकों के नाम पर किसी तरह उनको भी गाँधी के हत्यारे से जोड़ने की कोशिश की गई। जब इस लेख को पढ़ना शुरू करते हैं तो इसमें अगला निशाना ‘हिंदुत्व’ को बनाया गया है।

द प्रिंट’ की रिपोर्ट का एक हिस्सा

सांघवी का तर्क है कि ‘गोडसे की महिमा गाने की कोशिशें इसलिए बढ़ गई हैं क्योंकि देश में हिंदुत्व का असर बढ़ा है’।

सांघवी का यह तर्क बहुत सुविधाजनक तो है ही, साथ ही यह घृणित मानसिकता भी है। जब किसी विचार को तर्क की कसौटी पर ना कसा जा सके तो उसके लिए ‘रेडीमेड विलेन’ हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए, यह एक विचारधारा की पुरानी आदत रही है।

पहली बात तो यह कि गाँधी की आलोचना या सवाल उठाना उनकी विरासत पर हमला कैसे हो सकता है? स्वतंत्रता से पहले ही सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के विचार गाँधी से अलग थे तो क्या वे सुनियोजित हमला कर रहे थे?

अब आते हैं गोडसे पर, नाथूराम गोडसे की तारीफ करने वाले कितने लोग आपको मिलेंगे, ऐसे लोगों की संख्या बमुश्किल सैकड़ों में ही होगी। ऐसे में चंद लोगों को पूरी विचारधारा का प्रतीक बनाकर हिंदुत्व पर सवाल खड़ा कर देना कैसे ठीक हो सकता है?

क्या कभी सांघवी लिख पाएँगे कि दुनियाभर में आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या सांघवी लिख पाएँगे कि भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्से में धर्मांतरण का एक सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है तो इसका जिम्मेदार कौन है? नहीं। क्योंकि हिंदुत्व पर सवाल खड़ा करना आसान है वो भी बिना किसी तर्क के, बिना किसी ठोस सबूत के।

वह खुद अपने लेख में आगे कहते हैं कि ‘यह व्याख्या अपने साथ कई और सवाल खड़े कर देती है, जिनके तार्किक उत्तर मौजूद नहीं हैं‘। फिर भी वो खुलकर हिंदुत्व को इसका जिम्मेदार ठहरा देते हैं। इसमें उन्होंने आगे विभाजन के लिए गाँधी और कॉन्ग्रेस को लगभग क्लीन चिट देते हुए, वीडी सावरकर (वीर सावरकर) को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

अपने लेख में पहले तो सांघवी ने यह साबित करने की कोशिश की है कि विभाजन से असल में ‘हिंदुत्ववादियों’ को फायदा हुआ है। आगे वो टू नेशन थ्योरी को लेकर कहते हैं कि दो-राष्ट्र सिद्धांत गाँधी ने नहीं दिया था बल्कि सावरकर ने इसे पेश किया है।

सांघवी जैसे लोग सावरकर की 1937 में दिए गए भाषण के बहाने उन्हें ‘टू नेशन थ्योरी’ का जनक साबित करने की कोशिश करते हैं लेकिन वो सर सैयद अहमद खान के 1876 के बयानों को भूल जाते हैं।

सैयद अहमद ने 1876 में कहा था, “मुझे अब पूरा यकीन हो गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक राष्ट्र नहीं बन सकते क्योंकि उनका धर्म और जीवन-शैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।” सर मुहम्मद इकबाल 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और पहली बार सार्वजनिक रूप से एक स्वतंत्र, संप्रभु मुस्लिम देश की माँग की थी।

सावरकर के जिस बयान का हवाला दिया जाता है, उसमें भी सावरकर ने भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कही था। हालाँकि, सावरकर पर सवाल उठाना आसान है और सांघवी जैसों को लगता है कि सावरकर के बहाने ही सही, हिंदुत्व को घेरा जा सकता है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

सांघवी ने अपने लेख में कहा है कि संघ परिवार का एक हिस्सा गोडसे को ‘महिमामंडित’ करता है। गोडसे जो खुद RSS की आलोचना करता था, उसके नाम पर संघ परिवार को बदनाम करना का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। संघ को गाँधी बताने की साजिश चलती रही है लेकिन हकीकत इससे अलग है।

गाँधी खुद संघ की शाखा में गए, गाँधी ने संघ के काम को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की। संघ में हर रोज जिस महापुरुषों का स्मरण किया जाता है, उसमें गाँधी भी शामिल हैं। संघ के एकात्मता स्त्रोत में लिखा है, “दादाभाई गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृताः, रमणो मालवीयश्च श्रीसुब्रह्मण्यभारती।”

कितने और संगठन ऐसे हैं जो राजनीति और 2 अक्टूबर के अलावा भी गाँधी को याद करते हैं, गाँधी की जीवनदृष्टि का अनुसरण करने की बात करते हैं। संघ ऐसा संगठन है लेकिन कोशिश की जाती है कि कुछ लोगों के नाम के बहाने संघ के विचार को किसी भी तरह बदनाम कर दिया जाए।

सांघवी ने अपने लेख में आगे कुछ बातें लिखी है, जिनमें बताया है कि कैसे गोडसे ने RSS छोड़ दी थी आदि-आदि। लेकिन फिर भी उसी महीन विचार के जरिए संघ को बदनाम करने की भी कोशिश की है।

लेख को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि सांघवी के पास अपनी बात साबित करने के लिए तर्क नहीं है। फिर भी उन्होंने हिंदुत्व को निशाना बनाया, संघ परिवार को निशाना बनाया और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम घसीटने की कोशिश की। यह उसी सोच का प्रतीक है कि लोगों के मन में किसी विचार को लेकर संदेह पैदा कर दिया जाए और धीरे-धीरे इसे पनपने दिया जाए ताकि यह संदेह का बीज ही आगे चलकर वटवृक्ष बन सके।

महिला वर्ल्ड कप में पाकिस्तानी कमेंटेटर सना मीर ने POK को बोला ‘आजाद कश्मीर’: विवाद भड़का, लोगों ने BCCI से की एक्शन लेने की माँग

भारत और श्रीलंका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित महिला क्रिकेट विश्व कप 2025, जिसे महिलाओं के खेल का उत्सव होना चाहिए था, वह अब एक राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया है। पाकिस्तान की पूर्व कप्तान और कमेंटेटर सना मीर ने कमेंट्री के दौरान एक बयान दे डाला।

बांग्लादेश के खिलाफ पाकिस्तान के मैच के दौरान सना ने एक टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने खिलाड़ी नतालिया परवेज को ‘आजाद कश्मीर से आने वाली’ बताया।

इस टिप्पणीको लेकर भारत काफी निंदा कर रहा है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के नियमों के अनुसार खेल में राजनीति का कोई स्थान नहीं है। जिस हिस्से को मीर ने ‘आजाद कश्मीर’ कहा, वह असल में भारत का वह हिस्सा है जिसपर पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा किया है। वर्तमान में उस क्षेत्र में पाकिस्ती फौज के अत्याचारों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी चल रहे हैं।

हजारों भारतीय प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर ICC और BCCI को टैग करते हुए सना मीर को कमेंट्री पैनल से हटाने की माँग की। उनका आरोप है कि मीर ने क्रिकेट में भू-राजनीति को घसीट कर पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश की है।

पाकिस्तान की वैचारिक दिवालियापन आया सामने

असल में ये पाकिस्तान की दशकों की कट्टरता से पैदा हुई घटिया सोच से का इशारा करता है। स्कूल और मस्जिद से लेकर टीवी स्टूडियो और खएल के मैदान तक पीढ़ियों को यह सिखाया गया है कि भारत के लिए दुश्मनी रखना असल में सम्मान है और जिहादी हिंसा ‘शहीदों का प्रतिरोध’।

इस विकृत सोच के जरिए हार को जीत बताया जाता है, झूठ को सच की जगह दी जाती है और यहाँ तक कि प्रसिद्ध खिलाड़ी भी प्रोपेगेंडा की बातों को दोहराते रहते हैं।

हरिस रऊफ की फाइटर-जेट नकल और फरहान की बंदूक सलामी कोई एक दम से हुए भावनात्मक विस्फोट नहीं थे, बल्कि ये उस सैन्यीकृत मानसिकता की ओर इशारा था जो हिंसा और इनकार को आगे बढ़ाने का काम करता है। पाकिस्तान के लिए स्कोरबोर्ड से ज्यादा मायने उस ‘सर्वोच्चता के भ्रम’ का है।

एशिया कप की ‘ट्रॉफी चोरी’

ये प्रोपेगेंडा महज मैदान तक ही सीमित नहीं रहा,बल्कि प्रशासन का भी हिस्सा बन गया। एशिया कप फाइनल उस समय विवादों में घिर गया जब पीसीबी प्रमुख और एसीसी अध्यक्ष मोहसिन नकवी ट्रॉफी लेकर चले गए। इसे वैश्विक स्तर पर ‘ट्रॉफी चोरी’ कहा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, नकवी ट्रॉफी और मेडल्स को अपने दुबई होटल रूम तक ले गए।

बीसीसीआई के नेताओं राजीव शुक्ला और आशीष शेलार ने एसीसी की बैठक में नकवी का कड़ा विरोध किया और कहा कि ट्रॉफी भारत की है। नकवी ने माफी माँगने से इनकार कर दिया और बीसीसीआई ने चेतावनी दी कि यह मुद्दा नवंबर की आईसीसी बैठक में उठाया जाएगा। यह विवाद एशियाई क्रिकेट की साख पर गंभीर सवाल खड़े करता है, खासकर जब 2026 का टी20 विश्व कप नजदीक है।

पहलगाम की छाया और ऑपरेशन सिंदूर

इन खेल विवादों के पीछे आतंकवाद की भयावह सच्चाई है। अप्रैल 2025 में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पहलगाम में 26 से अधिक हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी, पुरुषों से उनकी धार्मिक पहचान पूछने के बाद पैंट उतार कर पुष्टि भी की गई और फिर उन्हें निशाना बनाया गया। इस बर्बरता ने भारत में बड़े स्तर पर आक्रोश पैदा किया और भारतीय टीम ने नकवी से एशिया कप ट्रॉफी लेने से इनकार कर दिया।

भारत की जवाबी प्रतिक्रिया निर्णायक और विध्वंसक थी। ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारतीय सेनाओं ने जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। संघर्ष बढ़ने पर भारत ने कम से कम 11 पाकिस्तानी एयरबेस भी तबाह कर दिए। इन हमलों ने पाकिस्तान को युद्धविराम की गुहार लगाने पर मजबूर कर दिया, जो दशकों में उसकी सबसे शर्मनाक सैन्य हारों में से एक थी।

इसके बावजूद पाकिस्तान की सेना और प्रोपेगेंडा मशीन ने इस हार को जीत में बदलने की कोशिश की। हरिस रऊफ का 6-0 इशारा निजी बहादुरी नहीं था, बल्कि रावलपिंडी की दुष्प्रचार रणनीति का प्रतीक था, जिसका उद्देश्य युद्धक्षेत्र की हार से ध्यान भटकाना और आकर्षक नारों से भ्रम फैलाना था।

BCCI सुनिश्चित करे कि सना मीर अगली उड़ान से इस्लामाबाद लौटें

महिला विश्व कप विवाद, हरिस रऊफ की हरकतें, नकवी की ट्रॉफी चोरी, और पहलगाम नरसंहार अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये एक ही पहेली के टुकड़े हैं: एक ऐसा देश जो श्रेष्ठ होने का भ्रम लिए बैठा है, जहाँ क्रिकेटर, मौलवी, कमेंटेटर और जनरल एक ही प्रोपेगेंडा की बोली बोलते हैं।

ICC के लिए चुनौती कड़ी है: सना मीर को जवाबदेह ठहराना और यह सुनिश्चित करना कि क्रिकेट को जियोपॉलिटिक्स के मंच बनाने के लिए हाइजैक न किया जाए। अगर इसे अनदेखा किया गया, तो यह दूसरों को क्रिकेट के वैश्विक मंच का दुरुपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

भारत और BCCI के लिए सबक और भी साफ है। पाकिस्तान के साथ जुड़ाव चाहे वह कूटनीति के लिए हो या क्रिकेट के मैदान पर, परिणाम हमेशा एक ही है- प्रोपेगेंडा, झूठ और नफरत की प्रतिस्पर्धा का पैकेज बना कर पेश करना। भारत और श्रीलंका की ओर से सह-आयोजित टूर्नामेंट में मीर को कमेंट्री बॉक्स में बैठने देना और ‘आजाद कश्मीर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने देना, ये सब असल में BCCI की ओर से पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैधता देने और भारत का अपमान करने की मंजूरी देने जैसा होगा।

इसका जवाब सिर्फ एक जरिया नहीं हो सकता। BCCI को तय करना चाहिए कि मीर अगली फ्लाइट से इस्लामाबाद लौटें और यह साफ तौर पर बताया दिया जाए कि कोई भी पाकिस्तानी कमेंटेटर क्रिकेट मंच का दुरुपयोग अपने प्रोपेगेंडा को फैलाने के लिए नहीं कर सकता।

यह केवल सना मीर के बारे में नहीं है। यह PCB, पाकिस्तान के खेल संस्थानों और उस प्रोपेगेंडा मशीनरी के लिए एक लाल रेखा खींचने के बारे में है जो हर अंतरराष्ट्रीय मंच में घुसपैठ करती है।

BCCI दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है। कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि आर्थिक संकट से जूझ रहे PCB और पाकिस्तानियों को यह सिखाए कि बॉस कौन है और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का हिस्सा बने रहने के लिए उन्हें किस अनुशासन का पालन करना होगा। इसे अपनी वित्तीय ताकत का इस्तेमाल करके ICC को मजबूर करना चाहिए कि मीर को पाकिस्तान वापस भेजा जाए।

उन्हें घर भेजना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है; यह एक आवश्यक संदेश है कि भारत क्रिकेट के मैदान पर या कमेंट्री बॉक्स में पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को ऑक्सीजन नहीं देगा।

ये खबर मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

विदेश में राहुल गाँधी का भारत विरोधी अभियान जारी, अब कोलंबिया में देश के लोकतंत्र को बताया खतरा: अमेरिका से बहरीन तक फैला चुके हैं प्रोपेगेंडा

विदेशी धरती से नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर देश को शर्मसार किया है। उन्होंने देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए हैं और ‘भारत विरोधी’ बातें की हैं। अमेरिका, यूके, बहरीन, मलेशिया जहाँ-जहाँ राहुल गाँधी गए, वहीँ से मोदी सरकार के खिलाफ बोलते-बोलते ‘देश विरोधी’ बयान भी दे दिया।

देश में परिवारवाद का पर्याय बने राहुल गाँधी जब लोकतंत्र की बात करते हैं, तो जनता को नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सत्ता के पीछे सत्तासीन सोनिया गाँधी और अब प्रियंका गाँधी का चेहरा भी याद आता है। आपातकाल का वो दौर भी याद आता है, जब लोकतंत्र को कुचला गया था।

दिलचस्प बात ये है कि लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में कभी लोकतंत्र अपनी मजबूत जड़ें जमा ही नहीं पाया। यहां कभी स्थिर सरकार नहीं रही। दुनिया भर में ड्रग्स सप्लाई का केन्द्र रहा ये देश, वहाँ से लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है।

राहुल के बयान पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। भाजपा ने कहा कि राहुल विदेश में बैठकर भारत को बदनाम कर रहे हैं, उनका रिमोट कंट्रोल विदेशियों के हाथों में है। वे मोदी-भाजपा का विरोध करते-करते भारत और यहाँ की संस्थाओं के विरोध में उतर आए हैं।

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, “राहुल गाँधी कह रहे हैं कि लोकतांत्रिक संरचना पर हमला हो रहा है। हमला कौन कर रहा है। परिवारतंत्र ही तो संविधान तंत्र पर हमला करता आ रहा है। 50 साल पहले इंदिरा गाँधी और अब पोता राहुल गाँधी संविधान को परिवार से नीचे रख रहे हैं।”

क्या कहा राहुल गाँधी ने कोलंबिया में

कोलंबिया के ईआईए विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि ‘लोकतंत्र पर हमला’ भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ा खतरा भारत में हो रहे लोकतंत्र पर हमले का है। भारत वास्तव में अपने सभी लोगों के बीच संवाद का एक केंद्र है… विभिन्न परंपराओं, धर्मों, विचारों को जगह की ज़रूरत होती है। और उस जगह को बनाने का सबसे अच्छा तरीका लोकतांत्रिक व्यवस्था है। वर्तमान में, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर व्यापक हमला हो रहा है। इसलिए यह एक खतरा है।”

उन्होंने भाजपा पर भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करने का आरोप लगाया। गुरुवार (2 अक्टूबर 2025) को एक संवाद कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि वह भारत की सांस्कृतिक विविधता, तकनीकी मजबूती और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के कारण ‘भारत को लेकर बहुत आशावादी’ हैं। लेकिन देश ‘गंभीर खतरों’ का सामना कर रहा है।

चीन के साथ भी उन्होंने भारत की तुलना की और कहा, “हम चीन जैसा नहीं कर सकते, जो लोगों का दमन करता है और एक सत्तावादी व्यवस्था चलाता है। हमारी व्यवस्था इसे स्वीकार नहीं करेगी।”

नेता विपक्ष ने 2016 के नोटबंदी से लेकर 2025 तक के सरकार की तमाम योजनाओं को विफल करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने नोटबंदी लागू की इस सोच के साथ की नकदी खत्म हो जाएगी, लेकिन एक नीति के तौर पर ये विफल रही। सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा, “भारत में अब बहुत ही केंद्रीकृत स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। तीन-चार कंपनियां पूरी अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर रही हैं, जिनका प्रधानमंत्री से सीधा संबंध है। भारत में (अब) भ्रष्टाचार व्याप्त है।”

राहुल गाँधी ने कब-कब बताया ‘खतरे में है लोकतंत्र’

यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेता ने विदेशी धरती से पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर हमला किया हो। 2014 के बाद जब भी मौका मिलता है, राहुल गाँधी भारत के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं। बार-बार विदेशी मंचों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं।

2024 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में, राहुल गाँधी ने कहा था कि भारत में ‘लोकतंत्र पर हमले’ हो रहे हैं। लगातार तीन लोकसभा चुनाव में धूल चाटने के बाद राहुल गाँधी को कभी ‘वोट चोरी’ नजर आती है तो कभी ‘लोकतंत्र पर हमला’ नजर आता है। देश के बाहर झूठे आरोप लगाकर देश को बदनाम करने की कोशिश का वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।

लंदन में एक कार्यक्रम में मई 2022 में उन्होंने दावा किया था कि ‘भारत की आत्मा पर हमला हो रहा है’। सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। भारत की तुलना पाकिस्तान से करते हुए कहा कि ‘डीप स्टेट’ भारत को धीरे- धीरे खा रहा है।

यूके और जर्मनी की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने 2018 में, पीएम मोदी की तुलना तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से की थी। राहुल ने कहा कि देश में व्याप्त ‘बेरोजगारी’ पर लोगों के गुस्सा था, इसका राजनीतिक फायदा उठाया गया। उन्होंने पीए मोदी को ‘देशद्रोही’ तक कह डाला।

2018 में ही मलेशिया के दौरे के दौरान नोटबंदी की प्रक्रिया का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि अगर वह प्रधानमंत्री होते, तो इसे ‘कूड़ेदान में फेंक देते’। सिंगापुर में उन्होंने ‘डराने-धमकाने’ के साथ-साथ मोदी सरकार पर ‘विभाजनकारी राजनीति’ करने का आरोप लगाया।

कॉन्ग्रेसअध्यक्ष बनने के बाद 2018 में बहरीन पहुँचे राहुल गाँधी ने एनआरआई को संबोधित करते हुए मोदी सरकार पर ‘समुदायों के बीच भय और घृणा’ फैलाने का आरोप लगाया।

2017 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक समारोह में राहुल गाँधी ने ‘अहिंसा के विचार पर हमला’ होने की बात कही थी। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर केवल देश की शीर्ष 100 कंपनियों पर ध्यान देने का आरोप लगाया।

अमेरिका से लेकर लंदन तक और कोलंबिया से लेकर मलेशिया तक जब भी राहुल गाँधी को मौका मिला उन्होंने भारत पर आरोप लगाए। देश में संविधान की प्रति हाथ में लेकर रैली करने वाले राहुल गाँधी संवैधानिक संस्थानों पर आरोप लगाने से नहीं चूकते। कोलंबिया में भी उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए सत्ता के विकेन्द्रीकरण को भ्रष्टाचार की वजह बता दिया।

भारत के लोकतंत्र की मिसाल पूरी दुनिया देती है, लेकिन राहुल गाँधी को भारत का लोकतंत्र खतरे में नजर आता है। संविधान के अंतर्गत उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उनकी सुरक्षा से लेकर गाड़ी- बंगले हर चीज लोकतांत्रिक ढाँचे के तहत मिले अधिकार की वजह से हैंं। सरकार इन पर करोड़ों रुपए खर्च करती है, लेकिन उन्हें लोकतंत्र खतरे में नजर आता है।

राहुल गाँधी की भाषा पाकिस्तान को पसंद आती है। वहाँ की मीडिया की राहुल गाँधी चहेते चेहरे हैं और उनके बयान ‘भारत विरोध’ को दिखाने के काम आते हैं। विदेश जाकर भारत विरोधी बयान देकर भारत के लोकतांत्रिक ताने- बाने को वे कमजोर कर रहे हैं, सरकार नहीं।