कुछ महीने पहले, रटगर्स विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, रेस एंड राइट्स (CSRR) ने ‘अमेरिका में हिंदुत्व’ के विषय को लेकर एक रिपोर्ट जारी की और इसी को लेकर एक रोडशो भी निकाला गया था। इस रिपोर्ट ने हिंदुत्व को एक दक्षिणपंथी (फार-राइट) योजना के रूप में पेश किया, प्रवासी भारतीय समूहों को RSS के प्रतिनिधि माना और यह दावा किया कि हिंदुत्व अमेरिकी बहुलतावाद (pluralism) के लिए खतरा है।
1/n ?On October 27th, @RutgersU will platform open Hindu hate on college campus.
— CoHNA (Coalition of Hindus of North America) (@CoHNAOfficial) October 4, 2025
This is not an academic exercise. It’s blatant bigotry that calls for a federal investigation against American Hindu organizations and accuses them of being foreign agents.
It will paint a… pic.twitter.com/UsVR3EA1u9
17 जून को CSRR के यूट्यूब चैनल पर लॉन्च का वीडियो प्रकाशित किया गया था जिसमें 27 अक्टूबर की इस रिपोर्ट के आधार पर एक चर्चा आयोजित की गई थी। इस पैनल में रटगर्स विश्वविद्यालय की लॉ प्रोफेसर सहार अजीज, डॉक्टोरल छात्रा निकायता मल्होत्रा और हिंदू विरोधी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के शामिल थी।
ट्रुश्के हिंदू धर्म के तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के लिए जानी जाती हैं और सोशल मीडिया पर उन्होंने भगवान राम के खिलाफ भी आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की हैं। इस पैनल के जरिए संदेश साफ है कि वे बिना किसी ठोस सबूत के हिंदूओं की वकालत (advocacy) को सुरक्षा समस्या के रूप में पेश करना चाहते हैं।
रिपोर्ट क्या है और इसमें क्या कहा गया है
इस दस्तावेज में दावा किया गया है कि हिंदू संगठनों ने 9/11 के बाद उभरी इस्लामोफोबिया की लहर का फायदा उठाकर अपना ‘जातीय-राष्ट्रवादी’ (ethnonationalist) का एजेंडा स्वीकार्य बनाने की कोशिश की। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में यह आंदोलन दो काम करता है:- मुसलमानों को संदिग्ध दिखाना और शैक्षणिक स्वतंत्रता (academic freedom) को दबाना।
रिपोर्ट का कहना है कि अधिकारियों और स्थानीय निकायों को उन हिंदू संगठनों से सारे रिश्ते तोड़ लेने चाहिए जो उसे पसंद नहीं हैं। साथ ही केंद्र सरकार से यह माँग की गई है कि जिन संगठनों को रिपोर्ट RSS के ‘प्रॉक्सी’ मानती है, उन पर जबरदस्ती FARA कानून लागू किया जाए। इसके अलावा, जो चैरिटी संस्थाएँ किसी भी रूप में हिंदू राष्ट्रवाद से जुड़ी हैं, उन्हें अपने विदेशी संपर्कों की पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। रिपोर्ट यह भी चाहती है कि अमेरिकी प्रशासन ऐसे लोगों के वीजा पर रोक लगाए जिन पर भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में मदद करने के आरोप हैं।
साथ ही, विश्वविद्यालयों को ‘हिंदुत्व-प्रेरित भेदभाव’ के मुद्दे पर ट्रेनिंग देने की बात भी कही गई है ताकि वहाँ के प्रोफेसर और छात्र इससे ‘सुरक्षित’ रह सकें। कुल मिलाकर, अगर इन सुझावों को देखा जाए तो यह पूरा अभियान किसी ‘ब्लैकलिस्ट’ की तरह ही लगता है, जहाँ बीमारी ढूँढने से पहले ही इलाज तय कर लिया गया है।

इस रिपोर्ट में हम मुख्य रूप से उस चर्चा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जो इस साल जून में प्रकाशित शुरुआती वीडियो में की गई थी। इसके बाद हम आगे चलकर उस प्रकाशित शोध-पत्र पर भी बात करेंगे।
फ़्रेमिंग समस्या
यह तर्क उस वक्त ही हवा हो गया जब ‘हिंदू’, ‘हिंदुत्व’, ‘RSS’ और ‘BJP’ सबको एक ही खाँचे में रखकर एक जैसा मान लिया। उनका दावा था कि जो भी हिंदू धर्म से जुड़ा है चाहे वह हिंदुत्व हो, आरएसएस हो या भाजपा और यहाँ तक कि कोई आम हिंदू व्यक्ति भी, ये सब नागपुर से निकलने वाली तथाकथित राजनीतिक शाखाओं का हिस्सा हैं, जहाँ RSS का मुख्यालय स्थित है।
RSS, VHP और इनसे जुड़ी अन्य संस्थाएँ, भारत और विदेश दोनों जगह समाजसेवी और सामुदायिक संगठन हैं। ये वैसे ही प्रवासी संगठनों की तरह हैं जैसे दुनिया भर में अन्य समुदाय अपने सांस्कृतिक और सामाजिक हितों के लिए बनाते हैं। लेकिन जब बात हिंदू संगठनों की आती है, तो इन्हीं संस्थाओं को जातिवादी नीतियाँ फैलाने वाले, गैर-हिंदू समुदायों के खिलाफ नफरत भड़काने वाले और हिंसा को बढ़ावा देने वाले संगठनों के रूप में पेश किया गया। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि यह कोई निष्पक्ष विश्लेषण नहीं था बल्कि जानबूझकर की गई एक समान श्रेणी में बाँधने की कोशिश थी।
स्पीकर दीपा सुंदरम ने हिंदू संगठनों और उनकी विचारधारा की तुलना पश्चिमी दुनिया के ‘फार राइट’, ‘फासिस्ट’, ‘व्हाइट नेशनलिस्ट’ और ‘क्रिश्चियन ज़ायनिस्ट’ जैसे विचारों से करके, भारत के ‘राइट विंग’ और पश्चिम के ‘राइट विंग’ के बीच की गहरी वैचारिक रेखा को धुंधला कर दिया।
सावरकर और RSS के बारे में गलत जानकारी
इस चर्चा का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि शुरुआत में ही सुंदरम ने एक बड़ी गलती कर दी। उन्होंने वीर सावरकर को RSS का संस्थापक बता दिया। लेकिन सावरकर RSS के संस्थापक नहीं थे, यह संगठन 1925 में केशव बालिराम हेडगेवार ने स्थापित किया था। अगर वे किसी संगठन के इतिहास पर कोई बड़ी थ्योरी बनाना चाहते हैं, तो कम से कम उसका सही इतिहास जानना आवश्यक है।
‘एंटी-हिंदू संगठन’ वाली धारणा (HAF और CoHNA)
इसके बाद चर्चा में अमेरिका में सक्रिय हिंदू संगठनों, जैसे हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और कोएलिशन ऑफ हिंदूज ऑफ नॉर्थ अमेरिका (CoHNA), पर निशाना साधा गया। सुंदरम ने इन संगठनों को हिंदुत्व के ‘खतरनाक मोर्चे’ के रूप में पेश किया।
वास्तव में, HAF और CoHNA अमेरिका में पंजीकृत और खुले तौर पर काम करने वाले नागरिक अधिकार संगठन हैं। ये हिंदू विरोधी घृणा की घटनाओं पर नजर रखते हैं, कानून निर्माताओं को जानकारी देते हैं, मंदिरों की सुरक्षा का समर्थन करते हैं और अमेरिकी हिंदू समुदाय की आवाज बनते हैं, जो वहाँ अल्पसंख्यक है।
सुंदरम और ट्रुश्के जैसे तथाकथित शिक्षाविदों की इन संगठनों से वैचारिक असहमति हो सकती है, खासकर ट्रुश्के की, जो औरंगजेब की प्रशंसक मानी जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इस असहमति को बदनामी में बदल दें और सच्चे हिंदू संगठनों को भारत के हिंदुओं की किसी साजिश के रूप में पेश करें।
इस्लामोफोबिया का सर्वव्यापी प्रभाव
चर्चा के दौरान ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा बार-बार उठाया गया, जिसमें भारत और अमेरिका दोनों जगह के हिंदुओं पर मुसलमानों से नफरत करने का आरोप लगाया गया। ऐसा क्यों? क्योंकि हिंदू संगठन अक्सर कट्टर इस्लाम, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी समूहों या प्रवासी इस्लामी दबाव की आलोचना करते हैं।
कई बार ऐसा हुआ है जब हिंदू खुले तौर पर इस्लामी उग्रवाद का निशाना बने, चाहे वह लव जिहाद के मामले हों, आतंकवाद या अन्य घटनाएँ। इसका ताजा उदाहरण पहलगाम आतंकी हमला है, जिसमें पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकियों ने धार्मिक पहचान पूछकर 26 निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर दी।
खालिस्तानियों को पीड़ित के रूप में पेश करना
अब बात आती है चर्चा के अगले हिस्से की, जहाँ खालिस्तानी आतंकियों को निर्दोष एक्टिविस्ट के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। इसे ट्रांसनेशनल रेप्रेशन यानी विदेशी दमन के नाम पर नया रूप देने का प्रयास किया गया।
उदाहरण के तौर पर, हरदीप सिंह निज्जर का मामला लिया गया। 2023 में कनाडा की राजधानी ओटावा ने भारत पर आरोप लगाया कि उसने कनाडा में निज्जर की हत्या करवाई। भारत ने इस आरोप को सख्ती से खारिज किया। समस्या सिर्फ कूटनीतिक नहीं थी, असली मुद्दा यह था कि कनाडा ने बिना किसी ठोस सबूत के भारत पर एक खालिस्तानी आतंकी की हत्या का आरोप लगाया। अब तक कनाडा भारतीय एजेंसियों को कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाया है।
निज्जर कोई निर्दोष व्यक्ति नहीं था। वह एक खालिस्तानी आतंकी था, जिसने 1990 के दशक में झूठा हिंदू नाम लेकर भारत से फरार होकर कनाडा में शरण माँगी थी। वीजा और नागरिकता आवेदन कई बार खारिज हुए, लेकिन वह किसी न किसी तरीके से वहाँ रहकर नागरिकता पाने की कोशिश करता रहा। भारत ने कई बार उसके प्रत्यर्पण (extradition) की माँग की, लेकिन कनाडा ने हर बार इनकार किया। उसकी हत्या के बाद ही यह सामने आया कि कनाडा ने उसे नागरिकता दे दी थी। निज्जर पाकिस्तान भी गया था और वहाँ खालिस्तानी आतंकियों से मिला था। वह हथियारों के साथ देखा गया था और कनाडा में एक ट्रेनिंग कैंप भी चला रहा था।
चर्चा में वक्ता जोत सिंह ने एक और नाम लिया, खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नून का, जो सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) नामक प्रतिबंधित संगठन का संस्थापक है। भारत सरकार ने SFJ को 2019 में बैन किया और 2020 में पन्नून को व्यक्तिगत रूप से आतंकी घोषित किया।
पन्नून कोई शांतिप्रिय कार्यकर्ता नहीं है। उसने भारत और विदेशों में सिखों को भारत सरकार के खिलाफ भड़काया है। उसके समर्थक भारतीय झंडे जलाते हैं, भारत विरोधी नारे लगाते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और अन्य भारतीय राजनयिकों को धमकियाँ दे चुके हैं। उसने सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाने, 15 अगस्त को प्रधानमंत्री को झंडा फहराने से रोकने के लिए इनामों की घोषणा की, नकली खालिस्तान के नक्शे जारी किए और कई देशों में रेफरेंडम आयोजित किए।
भारत की आपत्तियों और अनुरोधों के बावजूद, पन्नून अब भी खुद को एक्टिविस्ट बताकर खुलेआम भारत विरोधी अभियान चला रहा है। निज्जर और पन्नून जैसे आतंकियों को एक्टिविस्ट बताना न केवल वक्ताओं की नीयत पर सवाल उठाता है, बल्कि यह दिखाता है कि हिंदुत्व विरोध के बहाने एक गहरा भारत-विरोधी नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।
‘हिंदुत्व फासीवाद’ प्रवासी समुदाय के बारे में क्या भूल जाता है?
अमेरिका में हिंदू समुदाय की विविधता को जानबूझकर एक ही रंग में दिखाने की कोशिश की जा रही है। यह कहा जाता है कि हिंदू संगठन ‘व्हाइट नेशनलिज़्म’ और ‘क्रिश्चियन सायोनिज़्म’ से जुड़े हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी भारतीय ने किसी कंजरवेटिव कॉन्फ्रेंस में भाषण दिया था और उसके कुछ मिनट बाद एक अमेरिकी सीनेटर ने अपनी बाइबल का ज़िक्र कर दिया। यह कोई विश्लेषण नहीं, बल्कि बिना आधार की कहानी है जिसे ज़बरदस्ती थ्योरी बनाया जा रहा है।
असलियत यह है कि अमेरिका में हिंदू संगठन इंटरफेथ (धर्मों के बीच संवाद) कार्यक्रम चलाते हैं, बाकी चैरिटी संगठनों की तरह नियमित ऑडिट कराते हैं और एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में अपने सामाजिक दायित्व निभाते हैं। जैसे नफरत से जुड़े अपराधों की निगरानी, स्कूलों में हिंदू धर्म की सही जानकारी देना, दिवाली के समय सुरक्षा दिशानिर्देश जारी करना और मंदिरों में तोड़फोड़ जैसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना।
तो क्या ‘हिंदूफोबिया’ मनगढ़ंत है?
अगर आप आँखें बंद कर लें, तभी यह नजर नहीं आएगा। अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में हिंदुओं के खिलाफ नफरत से जुड़ी घटनाएँ हाल के वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी हैं, खासकर जब राजनीतिक माहौल गर्म हुआ।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और अन्य संगठनों को कई सालों तक अधिकारियों से यह मनवाने के लिए संघर्ष करना पड़ा कि सरकारी भाषा में ‘हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह’ (anti-Hindu bias) को स्वीकार किया जाए।
‘हिंदूफोबिया’ को इसलिए नकार देना क्योंकि आपको यह शब्द पसंद नहीं है, कोई तर्क नहीं बल्कि सच्चाई से आंखें मूंदने जैसा है। हिंदूफोबिया के बारे में और जानने के लिए Hinduphobia Tracker पर जाएँ।
अकादमिक-कार्यकर्ताओं के गुट
‘अमेरिका में हिंदुत्व’ का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाले कई समूह खुद खुले तौर पर एक्टिविस्ट हैं। उदाहरण के तौर पर, Hindus for Human Rights (HfHR) एक हफ्ते में ब्लॉग लिखकर HAF को ‘फार-राइट संगठन’ कहता है, और अगले ही हफ्ते खुद को निष्पक्ष संस्था के रूप में पेश करता है। चर्चा में शामिल एक वक्ता, प्रणय सोमयाजुला, इसी साल जुलाई तक HfHR में काम कर रहे थे।
एक्टिविस्ट होना गलत नहीं है, लेकिन अगर आप खुद किसी पक्ष में हैं, तो राज्य से अपने विरोधियों को ‘ब्लैकलिस्ट’ करने की माँग करते हुए खुद को निष्पक्ष मध्यस्थ बताना उचित नहीं। अगर आपका असली उद्देश्य ‘बहुलतावाद’ (pluralism) है, तो विश्वविद्यालयों, पुलिस और राजनेताओं से हिंदू संगठनों से सारे संबंध तोड़ने की अपील करना इस सोच के बिल्कुल उलट है।
हिंदू विरोधी रिपोर्ट के पीछे और समर्थन करने वाले संगठन
IAMC
चर्चा में ‘इस्लामोफोबिया’ का मुद्दा सबसे ज़्यादा उठाने वाली वक्ता सफा अहमद थी, जो इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) की मीडिया और कम्युनिकेशन की एसोसिएट डायरेक्टर हैं।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) के अनुसार, IAMC का संबंध प्रतिबंधित इस्लामी आतंकवादी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से रहा है। इसके अलावा, इस संगठन के संस्थापक शेख उबैद के जरिए IAMC के रिश्ते लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से भी जुड़े हैं। IAMC वास्तव में जमात-ए-इस्लामी समर्थित लॉबिस्ट संगठन है, जो खुद को ‘ह्यूमन राइट्स एडवोकेसी ग्रुप’ बताता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, IAMC ने पहले अमेरिका में कई संगठनों के साथ मिलकर और उन्हें पैसा देकर अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) से भारत को ब्लैकलिस्ट करवाने की कोशिश की थी। यह संगठन भारत के खिलाफ फेक न्यूज और भ्रामक जानकारी फैलाने में भी पकड़ा गया है। साल 2021 में IAMC पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधि निवारण अधिनियम) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
HfHR
जो लोग Hindus for Human Rights (HfHR) संगठन से परिचित नहीं हैं, उन्हें इसका नाम सुनकर लग सकता है कि यह हिंदू समुदाय के हितों के लिए काम करने वाला संगठन है। लेकिन असल में, यह ‘भेड़ की खाल में भेड़िया’ साबित हुआ है।
यह संगठन अमेरिका और ब्रिटेन में हिंदू विरोधी नैरेटिव फैलाने में सबसे आगे रहा है। खुद को ‘मानवाधिकारों का रक्षक’ बताने वाला यह समूह एक छिपे हुए एजेंडे पर काम करता है। इसे Tides Foundation जैसी संस्थाओं से फंडिंग मिलती है जो अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हमास समर्थक प्रदर्शनों से जुड़ी मानी जाती है। HfHR के कई कदम अलगाववादी और उग्रवादी संगठनों की सोच से मेल खाते हैं, जो हिंदू हितों के खिलाफ हैं।
वास्तव में, HfHR एक खुला हिंदू और भारत विरोधी संगठन है, जो अमेरिका से संचालित होता है। यह हिंदू प्रतीकों और शिक्षाओं का इस्तेमाल कर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाता है, जबकि लगातार हिंदू परंपराओं और मान्यताओं की आलोचना करता है। इसके बयानों और गतिविधियों से साफ झलकता है कि इसका असली उद्देश्य मानवाधिकारों की रक्षा नहीं, बल्कि हिंदू पहचान को कमजोर करना और झूठे आरोपों से उसे बदनाम करना है।
HfHR की स्थापना 2019 में Indian American Muslim Council (IAMC) और Organization for Minorities of India (OFMI) ने मिलकर की थी। इन तीनों ने मिलकर Alliance for Justice and Accountability (AJA) नाम का एक और संगठन बनाया था, जिसने सितंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ह्यूस्टन यात्रा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसकी सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने 2019 में भारत में NRC को लेकर मुस्लिम समुदाय में डर और भ्रम फैलाने की कोशिश की थी।
2021 में, HfHR ने ‘Dismantling Global Hindutva’ नामक खुले हिंदू विरोधी सम्मेलन का समर्थन किया। 2023 में, प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान इस संगठन ने उनके खिलाफ प्रचार चलाने के लिए एक ‘स्पेशल टूलकिट‘ जारी किया।
जून 2023 में, राहुल गाँधी को Hudson Institute के एक कार्यक्रम में सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठे देखा गया था। वहीं, अक्टूबर 2023 में, भारत सरकार की कानूनी कार्रवाई के बाद HfHR का X (Twitter) अकाउंट भारत में ब्लॉक कर दिया गया।
निष्कर्ष
इस पूरी बहस का सार बहुत सीधा है, रिपोर्ट में हिंदुत्व को ‘फार-राइट फासीवाद’ बताना, प्रवासी हिंदू संगठनों को ‘आरएसएस की शाखाएँ’ कहना और हिंदू वकालत को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताना, ये सब एकतरफा सोच, गलत तथ्यों और पक्षपात से भरा है
यहाँ समस्या RSS में नहीं है। RSS उन संगठनों में से एक है जो भारत के लोगों के साथ हर विपत्ति में, चाहे वह प्राकृतिक हो या अन्य कोई, बिना किसी जाति, धर्म या नस्ल के भेदभाव के खड़े रहे हैं। RSS, VHP और इनके सहायक संगठन हमेशा जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आए हैं। चाहे वह बाढ़ हो, महामारी हो, भूकंप हो या युद्ध, इन संगठनों के हिंदू सदस्यों ने हर परिस्थिति में सभी की सहायता की है।
सच्ची समस्या उन संगठनों और व्यक्तियों में है जो ‘अकादमिक’ होने का दिखावा करते हुए हिंदू-विरोधी नरेटिव फैलाते हैं। ऑड्रे ट्रुशके, जोत सिंह, दीपा सुंदरम और प्रणय सोमयाजुला जैसे लोग दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ नफरत का माहौल बना रहे हैं, जिसे तुरंत चुनौती देने की जरूरत है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते है)


