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कोटा: 13 घंटे में मर गए 5 और बच्चे, राजस्थान के हेल्थ मिनिस्टर ने मौतों को CAA के विरोध से जोड़ा

25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5। यानी 7 दिनों में 22 मौतें। यह आँकड़ा है राजस्थान के कोटा के जेके लोन अस्पताल में दम तोड़ने वाले मासूमों का। यहॉं दिसंबर महीने में कुल 99 बच्चों की मौत हुई। हालत इतनी बदतर है कि 28 दिसंबर की रात चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव की समीक्षा बैठक 5 घंटे चली और इस दौरान 4 बच्चे मर गए। 31 दिसंबर को ही 13 घंटे के भीतर 5 मौतें हुईं।

इन मौतों को लेकर राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार की असंवेदनशीलता एक बार फिर से उजागर हो गई है। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने इन मौतों को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध से जोड़ दिया है। उनका कहना है कि पीएमओ के निर्देश पर भाजपा कोटा में हुई मौतों पर राजनीति कर रही है। इसकी आड़ में वह CAA विरोधी प्रदर्शनों को छिपाना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि 2015,2016 और 2017 में जब मौतें हुई तो भाजपा सत्ता में थी। हॉस्पिटल अथॉरिटी ने फंड की मॉंग की थी, लेकिन जारी नहीं किया गया।

इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि राज्य के हर अस्पताल में रोजाना 3-4 मौतें होती हैं। यह कोई नई बात नहीं है। लगे हाथ उन्होंने यह भी दावा किया था कि इस साल केवल 900 मौतें हुई हैं जो बीते 6 साल में सबसे कम है। उन्होंने अपनी सरकार की नाकामी छिपाते हुए कहा था कि बीते सालों में 1500, 1300 मौतें भी हो चुकी हैं।

राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण में 1 जनवरी 2020 को प्रकाशित खबर

कोटा के इस अस्पताल को लेकर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) की एक रिपोर्ट भी सामने आई है। इसके मुताबिक अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को लेकर बरती जा रही लापरवाही बच्चों की मौत का एक अहम कारण है। रिपोर्ट में NCPCR ने बताया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, जिस कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते रहते हैं।

गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कोटा से ही सांसद हैं। मौतों का सिलसिला शुरू होने के बाद पहले उन्होंने इस ओर राज्य सरकार का ध्यान दिलाया। हालात नहीं सुधरने पर उन्होंने मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन व विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सरकार को संवेदनशील होकर कार्य करने की नसीहत दी थी। साथ ही कहा था कि उनका मंत्रालय लगातार निगरानी कर रहा है।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार अस्पताल का रिकॉर्ड बताता है कि इस साल 962 बच्चों की मौत हुई है। इनमें से 101 बच्चों की मौत नवंबर और 99 की दिसंबर में हुई। बीते साल 1,005 और और 2014 में 1,198 बच्चों की मौत हुई थी।

मर गए 14 और बच्चे: कोटा के जेके लोन अस्पताल में टूटे हुए हैं ख़िड़की-दरवाजे, घूमते हैं सुअर

‘अगस्त में बच्चे मरते ही हैं’ और ‘बच्चों की मौत कोई नई बात नहीं’ के बीच मीडिया की नंगी सच्चाई

कोटा में 1 सप्ताह में 22 बच्चों की मौत, CM गहलोत ने कहा- हमारे यहाँ इलाज और दवाइयाँ फ्री

महिला ने छुआ हाथ तो पोप फ्रांसिस गुस्से से हुए लाल, बच्चों के सामने ही कर दिया… देखें video

पोप फ्रांसिस मंगलवार को उस वक्त बेहद नाराज हो गए जब एक महिला ने उनका हाथ पकड़ लिया। इससे पोप इतने नाराज हुए कि न केवल महिला का हाथ झटक दिया, बल्कि हाथ पर थप्पड़ भी जड़ दिए। सोशल मीडिया में इस घटना को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई है। कुछ लोगों का कहना है कि पोप इस घटना से ज्यादा बेहतर तरीके से निपट सकते थे। कुछ लोग महिला के साथ सहानुभूति जताते हुए उम्मीद कर रहे हैं कि इस घटना से उसकी आस्था नहीं डिगेगी।

यह घटना मंगलवार (दिसंबर 31, 2019) की शाम उस वक्त हुई जब नए साल की पूर्व संध्या पर श्रद्धालु पोप का अभिवादन करने और ब्लेसिंग्स लेने के लिए सेंट पीटर स्क्वॉयर में जुटे थे। इनमें छोटे-छोटे बच्चों की तादाद भी काफी थी। इस समय का एक वीडियो सामने आया है जिसमें बच्चे और अन्य लोग पोप फ्रांसिस का अभिवादन करते दिखाई पद रहे हैं।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि पोप लोगों की तरफ हाथ बढ़ाते हैं और उसे छू कर वहाँ मौजूद लोगों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। इसी दौरान एक महिला पोप का हाथ पकड़ लेती है। पोप न केवल झटके से अपना हाथ छुड़ाते हैं, बल्कि महिला के हाथ पर थप्पड़ भी जड़ देते हैं। इसे देख वहाँ मौजूद सभी लोग हक्का-बक्का रह जाते हैं।

महिला की इस हरकत से पोप काफी नाराज दिखते हैं। गुस्से में फौरन महिला का हाथ झटक देते हैं। उसके हाथ पर जोर से थप्पड़ मारते हैं और उसे डाँटकर वहाँ से आगे चले जाते हैं।

हालाँकि, 30 सेकेंड के इस वीडियो को देखने पर पहली नजर में महिला की गलती नजर आती है। लेकिन, लोगों की प्रतिक्रिया बताती है कि पोप का व्यवहार वांछित नहीं था। असल में ऐसे मौकों पर पोप का हाथ छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा रही है।

सोशल मीडिया पर भी लोगों ने पोप की काफी आलोचना की। लोगों ने कहा कि ये कोई अच्छा बर्ताव नहीं है। पोप चाहते तो उसे समझा सकते थे और मामले को हल्के में ले सकते थे। वहीं कुछ लोगों ने कहा कि वे प्रार्थना करते हैं कि इस घटना के बाद महिला का विश्वास को ठेस न पहुँचे।

गौरतलब है कि नए साल की शाम से पहले क्रिसमस के अवसर पर पोप फ्रांसिस ने दुनिया के कई कई अशांत क्षेत्रों से शांति की अपील की थी। उन्होंने पश्चिम एशिया वेनेजुएला और लेबनान सहित कई अफ्रीकी देशों में चल रहे सशस्त्र संघर्ष को समाप्त करने की अपील की थी।

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ISRO 2020: चंद्रयान-3 को ग्रीन सिग्नल, आपके मोबाइल में जल्द होगा स्वदेशी ‘GPS’

नए साल 2020 के शुरू होने पर पर इसरो प्रमुख के. सिवन ने पिछले वर्ष 2019 की उपलब्धियों को गिनाया। साथ ही उन्होंने इसरो के 2020 के लक्ष्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि तमिलनाडु के थुथुकुडी में नया स्पेस पोर्ट बनेगा। इसरो चीफ ने जानकारी दी कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर बहुत अच्छा काम कर रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये कि यह अभी अगले 7 वर्षों तक काम करता रहेगा। दुनिया में जीपीएस सिस्टम को मान्यता देने वाली संस्था 3-जीपीपीपी ने भारत के नाविक पोजिशनिंग सिस्टम को मान्यता दे दी है।

इसरो प्रमुख ने बताया कि वो दिन दूर नहीं जब देश के सभी मोबाइल फोन में हमारा अपना स्वदेशी पोजिशनिंग सिस्टम होगा। इसरो चीफ के. सिवन ने देश को बड़ी सूचना देते हुए कहा कि चंद्रयान-3 को सरकार ने मंजूरी दे दी है। उन्होने बताया कि चंद्रयान-3 भी चंद्रयान-2 के जैसा ही होगा। इस बार इसमें सिर्फ लैंडर-रोवर और प्रोपल्शन मॉडल होगा। ऑर्बिटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से इसमें मदद ली जाएगी।

इसरो चीफ ने जानकारी दी कि 2019 में गगनयान प्रोजेक्ट पर काफी काम हुआ है। गगनयान के लिए चुने गए चार एस्ट्रोनॉट्स की ट्रेनिंग में पूरे 1 साल लग सकते हैं, जिसे 2020 में पूरा कर लिए जाने की उम्मीद है। चुने गए एस्ट्रोनॉट्स की ट्रेनिंग रूस में होगी। इसरो प्रमुख ने आगे बताया:

“चंद्रयान-2 का लैंडर बहुत तेज गति होने की वजह से सही तरीके से नेवीगेट (दिशा और रास्ता) करने में अक्षम रहा और इसी कारण उसकी हार्ड लैंडिंग हुई। ये ग़लत अफवाह फैलाई जा रही है कि चंद्रयान-2 की असफलता की वजह से अन्य सैटेलाइट्स की लॉन्चिंग में देरी हुई है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सैटेलाइट्स लॉन्च करने के लिए रॉकेट्स बनाने होते हैं। जैसे ही हमारे पास रॉकेट बनाने का काम पूरा होता है, हम लॉन्चिंग में जुट जाते हैं। इस वर्ष मार्च तक हम वो सारे सैटेलाइट्स लॉन्च कर देंगे जो 2019 के अंत तक तय किए गए थे।”

इसरो प्रमुख ने महत्वाकांक्षी गगनयान प्रोजेक्ट के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शुरुआती पड़ाव के तहत अनमैन्ड (मानवरहित) मिशन इस साल करने की योजना बनाई गई है। अगर काम पूरा होगा तो इसे लॉन्च किया जाएगा, नहीं तो इसे अगले साल के लिए टाला जा सकता है। सिवन ने बताया कि ऐसे मिशन काफ़ी मुश्किल होते हैं और इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारियाँ करनी होती हैं। उन्होने बताया कि इसमें जरा सी भी चूक की गुंजाइश नहीं है। इसलिए, इसरो इस दिशा में फूँक-फूँक कर क़दम रख रहा है।

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भगोड़े विजय माल्या की जब्त संपत्ति बेचकर बैंक करेंगे वसूली, PMLA कोर्ट ने दी मंजूरी

नया साल शुरु होते ही भगौड़े विजय माल्या को प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के स्पेशल कोर्ट ने एक बड़ा झटका दिया है। दरअसल, ताजा जानकारी के मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA) की विशेष अदालत ने आज भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और कई अन्य बैंकों को भगौड़े विजय माल्या की जब्त संपत्ति को बेचकर कर्ज वसूली करने की इजाजत दी है।

लेकिन, विजय माल्या के वकीलों ने मुंबई में हो रही इस मामले की सुनवाई के दौरान आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा था कि यह केवल डेट रिकवरी ट्राइब्यूनल ही तय कर सकता है। जिसके मद्देनजर स्पेशल कोर्ट ने इस निर्णय पर 18 जनवरी तक स्टे लगाया है, ताकि माल्या इस आदेश के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील कर सकें।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले पिछले साल फरवरी के महीने में ईडी पीएमएलए कोर्ट को बोल चुकी है कि उसे इसमें कोई आपत्ति नहीं है, अगर माल्या की संपत्ति से वसूली की जाए।

बैंकों के करीब नौ हजार करोड़ रुपए के लोन ना चुकाने, बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में  ब्रिटेन में माल्या को मुकदमें का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा भारत में भी उसपर कार्रवाई जारी है।

इस हालिया कार्रवाई से पहले बता दें दिसंबर महीने में विजय माल्या मामले में लंदन कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। जिसके बाद कयास लगाए गए थे कि कोर्ट जनवरी में विजय माल्या पर फैसला सुना सकता है। वहीं, कहा जा रहा है कि विजय माल्या पर दायर दिवालिया घोषित होने की याचिका खारिज या रद्द हो सकती है।

बता दें कि विजय माल्या 2 मार्च, 2016 को देश छोड़कर लंदन भाग गया था। माल्या को कड़ा झटका देते हुए मुंबई की धनशोधन निरोधक क़ानून (पीएमएलए) की विशेष अदालत ने उसे भगोड़ा ‘आर्थिक अपराधी’ घोषित कर दिया था। लंदन की एक अदालत ने 10 दिसंबर, 2018 को उनके प्रत्यर्पण का आदेश दिया था। ब्रिटेन के गृहमंत्री साजिद जावीद ने चार फ़रवरी 2019 को माल्या को करारा झटका देते हुए उसे भारत प्रत्यर्पित करने के आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। माल्या को वहाँ के हाईकोर्ट में अपील करने के लिए 14 दिनों का समय दिया गया था।

एक नकली विरोध के लिए 20 दिन की बच्ची का इस्तेमाल! अंधविरोध और भावुकता का कॉकटेल

वामपंथी और मोदी-विरोधी किसी भी हद तक जाने से नहीं घबराते। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर चल रहा विरोध-प्रदर्शन भी इसकी नए सिरे से पुष्टि करता है। उनकी योजना होती है कि कुछ भी भावुक सा बोल कर, प्रतीकात्मक रूप में दिखा कर, गलत बात को जेनरलाइज करके ऐसे दिखाना, जैसे भारत जल रहा है। वो असलियत से दूर होते हैं। इसके लिए वे 20 दिन की बच्ची का भी इस्तेमाल कर लेते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि वही बीस दिन की बच्ची बड़ी हो कर पूछेगी कि अम्मी थोड़ा पढ़ लेती तो कानून के बारे में क्लेरिटी आ जाती कि इसमें तो उनके मजहब के लिए कुछ गलत है ही नहीं।

हम बात कर रहे हैं 20 दिन की उस बच्ची के बारे में, जिसे सीएए के विरोध प्रदर्शन का सबसे छोटा चेहरा बना कर पेश किया जा रहा है। बीस दिन की बच्ची के हवाले से लिखा गया है कि वो जब बड़ी हो कर अम्मी से पूछेगी, “जब हम पर जुल्म हो रहा था तो आप क्या कर रही थीं।” जबकि अगर वो बच्ची ठीक से पढ़-लिख ले तो उसका सवाल ये होगा, “इतनी ठंड में बिना कानून पढ़े मेरी जान को खतरे में डाल कर, किसके उकसाने पर गई थी?”

उस बच्ची का नाम उम्मी हबीबा है। बताया गया कि वो महज 20 दिन की है। उसकी माँ के कुल 5 बच्चे हैं और वो मीडिया अटेंशन का कारण इसीलिए बन रही है, क्योंकि वह अपने बच्चों को सीएए विरोधी प्रदर्शन में लेकर आती है। क्या 20 दिन की बच्ची से उसकी मर्जी पूछी जा सकती है? क्या उसे पता भी है कि वो कहाँ है और उसका इस्तेमाल किसलिए किया जा रहा है? उसकी अम्मी संविधान बचाने की बात करते हुए धरने पर बैठी हुई है। संविधान को किस से क्या ख़तरा है, इसका उत्तर ख़ुद वामपंथियों के पास भी नहीं है।

वैसे ये पहला मौक़ा नहीं है, जब इस तरह की करतूत की जा रही हो। जेएनयू में सरकार विरोधी प्रदर्शन के दौरान विकलांग छात्रों को आगे कर दिया गया था। बाद में उनका इस्तेमाल कर छात्रों ने पुलिस पर बर्बरता के आरोप लगाए थे। ऐसे ही जामिया हिंसा के दौरान महिला छात्रों को आगे कर दिखाया गया था कि पुलिस ‘मासूम चाहतों पर जुल्म’ कर रही है। शाहीन बाग़ में सीएए का विरोध प्रदर्शन करने बैठी उम्मी की अम्मी भी यही कर रही है। उम्मी को तो पता भी नहीं है कि उसके साथ क्या हो रहा है?

दरअसल, किसी भी विवादित हिंसक प्रदर्शन को छिपाने के लिए, अंतररराष्ट्रीय मीडिया का अटेंशन पाने के लिए ऐसी तरकीबें आजमाई जाती रहती है। लेकिन, ये भी सोचा जाना चाहिए कि अगर उम्मी की तबियत खराब होती है, या फिर उसे ठण्ड लग जाती है तो क्या यही प्रदर्शनकारी इसका इल्जाम सरकार पर नहीं थोपेंगे? सरकार पर एक मासूम बच्ची के साथ बेरहमी करने का झूठा आरोप लगाया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसे ‘क्रन्तिकारी’ बता कर शेयर भी किया जा रहा है।

जामिया का पुलिस को CCTV फुटेज देने से इनकार, उपद्रवी छात्रों का गुनाह छिपाने की कोशिश?

जामिया हिंसा: अयोध्या फैसले के बाद संविधान को ‘जलाने’ वाले ही आज CAA के विरोध में उसे बचाने उतरे

सहारनपुर में जश्न मना रहे युवकों को मुस्लिम समुदाय ने रोका: पत्थरबाजी से बढ़ा सांप्रदायिक तनाव, 3 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के थाना गागलहेड़ी के एक गाँव कुतुबपुर कुसानी से सांप्रदायिक तनाव की खबर आई है। बताया जा रहा है मामला बैंडबाजे पर नाचते हुए युवकों को दूसरे संप्रदाय के युवकों द्वारा रोकने के बाद शुरु हुआ। जहाँ देखते ही देखते पहले दोनों के बीच झगड़ा हुआ और फिर पथराव शुरू हो गया। सूचना मिलने पर मौके पर पहुँची कई थानों की पुलिस ने स्थिति को संभाला और आरोपितों को गिरफ्तार किया।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार की शाम गाँव कुतुबपुर कुसानी में रहने वाले धर्मपाल सिंह इंटर कालेज से सेवानिवृत्त हुए थे। जिसके चलते उनके संस्थान में उनके लिए एक छोटा सा विदाई समारोह आयोजित हुआ। जहाँ शामिल होने के बाद वह अपने रिश्तेदारों के साथ नाचते-गाते घर आ रहे थे। इस जश्न में उनके साथ गाँव के कई युवा भी शामिल थे। लेकिन, इसी बीच जब वह रास्ते से गुजरते हुए शाहिद उर्फ राजिक और तौफीक के घर के सामने पहुँचे, तो इन लोगों ने उन्हें डांस व शोर-शराबा करने से मना कर दिया। इसके बाद सारी कहासुनी शुरू हुई।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर

देखते-ही-देखते बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ही संप्रदाय के लोग आमने-सामने आ गए और एक-दूसरे पर पथराव करने लगे। घटना की सूचना पर कई थानों की फोर्स मौके पर पहुँची। पुलिस ने सड़क पर लाठी फटकार कर भीड़ को तितर-बितर कर दिया। पथराव में सचिन, बृजेश, विपिन व कुनाल जख्मी हो गए, जिन्हें जिला अस्पताल भिजवाया गया।

हालाँकि, रिपोर्ट के अनुसार अब स्थिति सामान्य है। लेकिन गाँव वाले फ्लैगमार्च निकालकर अपना विरोध दिखा रहे हैं। मामले के संबंध में 3 युवकों को गिरफ्तार किया गया है। मगर रिपोर्ट अभी किसी के ख़िलाफ़ दर्ज नहीं हुई हैं।

बता दें, गागलखेड़ी में हुई इस घटना के अलावा सहारनपुर के एक गाँव पजौरा में भी सांप्रदायिक टकराव देखने को मिला। जिसमें 2 महिलाओं के जख्मी होने की खबर हैं। जहाँ शराब के नशे में धुत सागर का झगड़ा शादाब नाम के युवक से हुआ और जब बात दोनों के घर पर पहुँची, तो दोनो पक्ष बिन कुछ-सोचे समझे आमने-सामने आ गए। जब तक बाकी लोग कुछ समझ पाते और मौके पर पहुँची पुलिस कुछ कर पाती, इन लोगों ने पुलिस के सामने ही पथराव शुरु कर दिया।

काफी मशक्कत के बाद पुलिस ने मामला शांत कराया। लेकिन तब तक 2 महिलाएँ घायल हो गईं थीं। इस मामले के संबंध में पुलिस ने आधी रात तक दबिश डाल कर मौ. शादाब, मौ. शहजाद तथा नदीम व दूसरे पक्ष के सागर, योगेश व पारुल को पकड़ लिया।

UP पुलिस को गुमराह कर रहे समुदाय के लोग, दंगाइयों को सुपुर्द करने का वादा भी नहीं किया पूरा

उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हिंसा करने वालों को बचाने में समुदाय विशेष के लोग जुट गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार समाज के लोगों ने दंगाइयों को खुद पकड़कर पुलिस के हवाले करने का वादा किया था। लेकिन, इस पूरा नहीं किया। इतना ही नहीं बवालियों तक पुलिस पहुॅंच नहीं पाए इसलिए उसे गुमराह करने की कोशिश भी हो रही।

इसे देखते हुए मेरठ में मंगलवार (दिसंबर 31, 2019) को पुलिस ने चार थानों की टीमें बनाकर उपद्रवियों की पहचान शुरू कर दी। सूचना के अनुसार, फोटो और सीसीटीवी वीडियो के आधार पर बवालियों की पहचान की जा रही है। दिक्कत ये है कि एक ही चेहरे के अलग-अलग नाम बताकर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की जा रही। मसलन, एक चेहरे को किसी ने इस्लाम नगर का कबीर बताया तो दूसरे ने श्याम नगर का रशीद बता दिया।

ज्ञात हो कि दंगाइयों ने मेरठ शहर में एक साथ लगभग डेढ़ दर्जन स्थानों पर पथराव, फायरिंग और आगजनी की थी। हिंसा में छह बवालियों की मौत हुई थी, जबकि तीन पुलिसकर्मी गोली से घायल हो गए थे। मामले के 250 वीडियो फुटेज के आधार पर 132 दंगाइयों को चिह्नित करने का काम किया गया है। स्थानीय खत्ता रोड पर काली पट्टी बाँध कर फायरिंग करने वाले फैसल समेत तीन आरोपितों पर पुलिस द्वारा 20-20 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है।

पुलिस ने स्वीकार किया है कि दंगा होने का एक कारण ये भी रहा कि कुछ इलाकों में पब्लिक के साथ रिलेशन नहीं बन पाना भी है। जैसे सीओ कोतवाली दिनेश शुक्ला को ही ले लीजिए। उनकी तैनाती को दो साल हो चुके हैं। बावजूद उन्हें उपद्रवियों को लेकर कोई सुराग तक नहीं मिल पाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका अर्थ ये है कि अधिकारी अपने सर्किल एरिया में इतना पब्लिक रिलेशन नहीं बना पाए कि हिंसा या आगजनी के दौरान आमजन पुलिस के साथ सहयोग करें।

दैनिक जागरण के मेरठ संस्करण में प्रकाशित खबर

पब्लिक रिलेशन नहीं बनाने पर वरिष्ठ अधिकारियों ने सभी थाना प्रभारियों और सर्किल ऑफिसर को फटकार लगाई है। हालाँकि, 27 दिसंबर को जुमे की नमाज पर शहर के गणमान्य लोग मौजूद रहे। समुदाय विशेष के मोहल्लों में लोग पुलिस को गुमराह करते हुए आरोपितों का ग़लत नाम-पता बता रहे हैं।

आरोप है कि मुस्लिम समाज के लोग बवालियों को बचाने के लिए पुलिस को इधर-उधर भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि किसी निर्दोष को जेल नहीं भेजा जाएगा। साथ ही कहा है कि दोषियों को भी नहीं बख्शा जाएगा।

NDTV का नया कारनामा: दंगाइयों को बताया ‘प्रदर्शनकारी’, रिपोर्ट में बदला CM योगी का बयान

यूपी पुलिस ने चौराहे पर टाँगी दंगाइयों की तस्वीर, कहा- बवालियों की पहचान कर फ़ौरन खबर करें

जाँँच से पहले कार्रवाई क्यों? CAA हिंसा पर ‘दंगाइयों’ के समर्थन में आईं प्रियंका गांधी

J&K: 5 माह बाद शुरु हुई सरकारी अस्पतालों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा, नौशेरा में 2 जवान हुए वीरगति को प्राप्त

जम्मू-कश्मीर में 5 अगस्त 2019 से आर्टिकल 370 निष्क्रिय हो जाने के बाद सुरक्षा लिहाज से बंद की गई ब्रॉडबैंड सेवा और एसएमएस सेवा को कल (दिसंबर 31, 2019) शाम सरकारी अस्पतालों में बहाल कर दिया गया

मंगलवार आधी रात से कश्मीर के सभी इलाकों में एसएमएस सुविधा शुरु हुई और साथ ही स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों में इंटरनेट सेवा को भी शुरू कर दिया गया। कश्मीर वासियों के लिए सरकार का यह कदम नए साल पर तोहफे जैसा है। 

इस संबंध में जानकारी देते हुए जम्मू-कश्मीर के प्रधान सचिव रोहित कंसल ने मीडिया को बताया, “सभी सरकारी अस्पतालों में 31 दिसंबर मध्यरात्रि से इंटरनेट सेवा और सभी मोबाइल फोन पर पूरी तरह से एसएमएस सेवा बहाल करने का निर्णय लिया गया है।”

प्रधान सचिव के मुताबिक, “अभी यह फैसला नहीं लिया गया है कि इंटरनेट सेवाएं कब शुरू की जाएँगी। यह मुद्दा सरकार के संज्ञान में है। स्थिति सुधरने के साथ जल्द ही इंटरनेट सेवा भी शुरू कर दी जाएगी।”

बता दें इससे पहले प्रशासन कश्मीर के कई इलाकों में मोबाइल इंटरनेट के अलावा लैंडलाइन जैसी सेवाएँ शुरु कर चुका है। लेकिन प्रीपेड की सुविधा अभी भी कश्मीर में शुरु होना बाकी है।

10 दिसंबर को प्रधान सचिव ने बताया था कि इससे पूर्व कश्मीर में मोबाइल फोन पर बहाल की गई एसएमएस सेवाएँ, छात्रों, छात्रवृत्ति के इच्छुक छात्रों, व्यापारियों और अन्य लोगों की मदद के लिए थी। साथ ही यह चरण पूर्ण संदेश सेवाओं की बहाली प्रक्रिया का हिस्सा था।

नौशेरा में दो जवान शहीद

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ राज्य में स्थिति सुधरने के कारण इंटरनेट सेवा बहाली की खबर आई हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर के नौशेरा सेक्टर में सर्च ऑपरेशन के दौरान दो भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। बताया जा रहा है कि आतंकियों ने घात लगाकर जवानों पर हमला बोला। पूरे इलाके की घेराबंदी कर ली गई है। सर्च ऑपरेशन अभी भी जारी है और आतंकियों को ढूंढा जा रहा है।

5 अगस्त के बाद राज्य में दिखा फर्क़

बता दें, आर्टिल 370 समाप्त हो जाने के बाद कई लोग सरकार के इस कदम पर सवाल उठा रहे थे, लेकिन मंगलवार को पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिलबाग सिंह ने बताया कि आखिर इस कदम के बाद वहाँ पर क्या फर्क़ आया है।

उन्होंने बताया, “2019 में 160 आतंकवादी मारे गए और 102 को गिरफ्तार किया गया जबकि आतंकवादी संगठनों में शामिल होने वाले स्थानीय युवाओं की संख्या में कमी आई है।” मीडिया से बातचीत में डीजीपी दिलबाग सिंह ने कहा, “2018 में इस तरह के 218 (स्थानीय) युवक आतंकवादी संगठनों में शामिल हुए थे लेकिन 2019 में केवल 139 शामिल हुए।

कोटा में 1 सप्ताह में 22 बच्चों की मौत, CM गहलोत ने कहा- हमारे यहाँ इलाज और दवाइयाँ फ्री

राजस्थान के कोटा में दिसंबर 2019 ने मासूमों की मौत का आँकड़ा 99 पहुँच गया। जहाँ पूरा देश नववर्ष के उल्लास में मग्न होकर खुशियाँ मना रहा है, कोटा में स्थिति एकदम उलट है। जब मंगलवार (दिसंबर 28, 2019) को राज्य के स्वास्थ्य सचिव स्थिति का अवलोकन कर रहे थे और बैठक कर रहे थे, तभी 5 घंटे के अंदर 4 बच्चों की मौत हो गई। जेके लोन हॉस्पिटल में 25 दिसंबर से लेकर 31 दिसंबर तक 22 बच्चों की मौत की खबर है। अस्पताल प्रशासन ने बताया है कि ज़्यादातर भर्ती किए गए बच्चे रेफरल हैं। बाराँ और कोटा ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों में अधिकतर नवजात हैं।

डॉक्टरों ने बताया है कि नवजात बच्चों में अधिकतर ऐसे हैं, जिन्हें जन्म से ही साँस लेने में तकलीफ है और जब उनकी साँस सही हुई तो उनके दिमाग पर इसका गहरा असर हो गया। डॉक्टर फ़िलहाल इसे ही बच्चों की मौत का कारण मान रहे हैं। बच्चों की मौत को लेकर लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला भी चिंतित हैं। उन्होंने मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन व विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ बैठक की। लोक सभाध्यक्ष ने बच्चों के मौत के बढ़ते आँकड़ों को चिंताजनक करार दिया। अस्पताल में न तो उचित संख्या में नर्सिंग स्टाफ हैं और न ही संसाधन हैं।

लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला कोटा से ही सांसद हैं। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को निर्देश दिया कि वो राज्य सरकार के साथ सामंजस्य बैठा कर काम करें और सुनिश्चित करे कि ज़रूरी उपकरण और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने राज्य सरकार को संवेदनशील होकर कार्य करने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि उनका मंत्रालय लगातार निगरानी कर रहा है।

जयपुर से स्वास्थ्य मंत्रालय की 4 सदस्यीय टीम पहुँची। उधर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा कि राजस्थान में दवाइयाँ फ्री मिलती हैं और लोग बाहर से इलाज के लिए यहाँ आते हैं। गहलोत ने टेस्ट और इलाज फ्री होने की बात करते हुए याद दिलाया कि उनकी सरकार ने ‘निरोगी राजस्थान’ का नारा दिया है।

अस्पताल में रोज़ाना नेताओं की मंडली तो पहुँच रही है लेकिन व्यवस्था जस की तस है। मंगलवार को 5 बच्चों की मौत स्थिति की गवाही देते हैं। नेताओं, राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और मीडिया के लोगों की भीड़ लगातार अस्पताल में बनी हुई है। भीड़ के संक्रमण से बचने के लिए उचित व्यवस्था नहीं है। डॉक्टर इलाज छोड़ कर नेताओं के आवभगत में जुटे हैं। बीमारी से कराहते बच्चों के माता-पिता परेशान हैं। ‘राजस्थान पत्रिका’ के कोटा संस्करण के अनुसार, अस्पताल में कई कर्मचारी और स्टाफ वर्षों से जमे हुए हैं, जिन्हें बदला जाना आवश्यक दिख रहा है।

भाजपा ने भी स्थिति के अवलोकन के लिए तीन महिला सांसदों की एक टीम कोटा भेजी। भाजपा ने कहा कि उसके विधायकों ने 50 लाख रुपए की सहायता राशि दी है लेकिन कॉन्ग्रेस की तरफ़ से कोई देखने तक नहीं आया है। भाजपा सांसदों ने आरोप लगाया कि जब बच्चों की मौत हो रही थी, तब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत झारखण्ड में जश्न मनाने गए हुए थे।

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ़्तर में मचाई तोड़फोड़, उद्धव ठाकरे से नाराज़गी है वजह

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मंत्रिमंडल का विस्तार क्या हुआ, तीनों दलों के कई विधायक अपनी ही पार्टियों से नाराज़ नज़र आ रहे हैं। जहाँ एक तरफ बीड जिले में एनसीपी के विधायक प्रकाश सोलंकी ने अपनी ही पार्टी से इस्तीफा दे दिया, पुणे में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने ही दफ्तर में जम कर तोड़फोड़ मचाई। ताज़ा मामला पुणे की भोर सीट से विधायक संग्राम थोपते को मंत्रिपद न मिलने का है। वो वयोवृद्ध कॉन्ग्रेस नेता अनंतराव थोपते के बेटे हैं। उनके समर्थकों ने पुणे में कॉन्ग्रेस कार्यालय में भारी तोड़फोड़ मचाई

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अपने मंत्रिमंडल में 36 नए मंत्रियों को शामिल किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री को मिला कर महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में कुल 43 सदस्य हो गए हैं। उद्धव के बेटे आदित्य, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और अमित देशमुख नए मंत्रियों में प्रमुख नाम हैं। पुणे पुलिस ने बताया कि थोपते के नाराज़ समर्थकों ने कॉन्ग्रेस कार्यालय पर हमला बोल दिया और वहाँ मौजूद कुर्सियों व गद्दों को फेंक डाला।

पुणे में पार्टी के दफ्तर ‘कॉन्ग्रेस भवन’ में कॉन्ग्रेस के ही कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाया। शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में परिवारवादी नेताओं को बढ़ावा दिए जाने का आरोप लग रहा है, जिसके बाद बगावत के सुर उठने लगे हैं। मजालगाँव से 4 बार चुनाव जीतने वाले विधायक प्रकाश सोलंकी ने भी अप्रत्यक्ष रूप से यही आरोप लगा कर इस्तीफा दिया है। एनसीपी नेता सोलंकी ने घोषणा की है कि वो अब राजनीति से ही दूरी बना कर रखेंगे। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि उनके इस्तीफे का मंत्रिमंडल विस्तार से कुछ लेना-देना नहीं है।

पूर्व मुख्यमंत्री सुशिल कुमार शिंदे की बेटी और कॉन्ग्रेस नेता प्रणीति सोलापुर से विधायक चुनी गई हैं। उन्हें भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, जिसके बाद वोभी नाराज़ बताई जा रही हैं। उनके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली।