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पश्चिम बंगाल में अपराधियों को नहीं कानून का खौफ, एक्स बॉयफ्रेंड ने पूर्व प्रेमिका के घर में घुसकर मारी 2 गोलियाँ: पुलिस की गिरफ्त से बाहर है हत्यारा, उठ रहे ममता सरकार के काम पर सवाल

पश्चिम बंगाल में अपराधिक घटनाए बढ़ती जा रही हैं। हाल ही में नदिया जिले से हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ जिले के कृष्णानगर शहर में छात्रा की घर में घुसकर गोली मारकर हत्या कर दी गई। मृतका की पहचान 12वीं की छात्रा ईशिता मलिक के रूप में हुई है। पुलिस 23 वर्षीय आरोपित देबराज सिंह की तलाश में जुटी हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना सोमवार (25 अगस्त 2025) दोपहर करीब 2.30 बजे की है। जब छात्रा घर पर अकेली थी। इसका फायदा उठाकर आरोपित ने घर में घुसकर छात्रा को गोली मारी और फरार हो गया। गोली लगने से छात्रा ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। सूचना पर पुलिस ने पहुँचकर शव का पोस्टमार्टम करवाने के लिए भेज दिया है।

मामले में कृष्णानगर के एसपी के अमरनाथ ने बताया, “कृष्णानगर महिला कॉलेज की छात्रा ईशा को उसकी माँ ने ड्रॉइंग रूमें में खून से लथपथ पाया। देबराज को हाथ में देसी रिवॉल्वर लेकर भागते देखा गया। छात्रा के शरीर पर दो गोलियों के निशान मिले हैं।”

NEET की तैयारी कर रही थी छात्रा

19 साल की छात्रा इशिता मलिक काफी समय से उत्तर 24 परगना जिले में रहकर पढ़ाई कर रही थी। कुछ समय पहले ही अपने घर कृष्णानगर लौटी थी। यहाँ साल 2023 विक्टोरिया कॉलेज में छात्रा का दाखिला हुआ था लेकिन NEET की तैयारी के चलते कॉलेज ज्वाइन नहीं किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्रा का देबराज सिंह नाम के युवक से रिलेशनशिप था लेकिन वह इसे खत्म कर चुकी थी। बावजूद इसके देबराज छात्रा से बात करने का दबाव बनाने लगा। पुलिस की शुरुआती जाँच में भी हत्या का कारण प्रेम-प्रसंग ही सामने आया है।

नजदीक से मारी गई गोली

हत्या के सामने आए वीडियो के मुताबिक छात्रा को काफी नजदीक से गोली मारी गई है। पुलिस ने भी बताया कि छात्रा को आरोपित ने बेहद पास से (प्वाइंट ब्लैक रेंज) से गोली मारी है। फिलहाल छात्रा के शव को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भेजा है।

वहीं घटना के बाद से आरोपित देबराज सिंह फरार है। पुलिस ने हत्या के मामले में मुकदमा दर्ज कर आरोपित की तलाश शुरु कर दी है।

बंगाल में अपराध पर नहीं कोई लगाम

पश्चिम बंगाल में आए दिन अपराधिक घटनाएँ सामने आ रही हैं। प्रदेश की ममता सरकार अपराध पर लगाम लगाने के लिए कोई एक्शन नहीं ले रही है। राज्य में हिंदुओं के साथ अत्याचार किया जा रहा है। पिछले कुछ दिनों रेप और हत्या के काफी मामले सामने आए हैं और ममता सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सरकार को अपराध पर नकेल कसने की जरूरत है।

‘गुजरात की धरती 2 मोहन की, एक सुदर्शन-चक्रधारी और दूसरे चरखाधारी, इनके दिखाए रास्ते पर चल रहा भारत’: Make In India की अपील कर बोले PM मोदी- जो देश में बना, वही उपहार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (25 अगस्त 2025) को दो दिन के दौरे पर गुजरात पहुँचे। यहाँ अहमदाबाद के खोडलधाम मैदान में ₹5400 करोड़ की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। इस दौरान जनता को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा कि गुजरात दो मोहनों की धरती है, एक है सुदर्शन चक्रधारी मोहन और दूसरे चरखाधारी मोहन।

पीएम ने कहा, “गुजरात की यह धरती दो मोहनों की धरती है। एक हैं सुदर्शन चक्रधारी मोहन, हमारे द्वारकाधीश श्री कृष्ण और दूसरे हैं चरखाधारी मोहन, साबरमती के संत पूज्य बापू (महात्मा गांधी)। इन दोनों के दिखाए मार्ग पर चलकर भारत निरंतर सशक्त हो रहा है।”

प्रधानमंत्री आगे कहते हैं, “सुदर्शन चक्रधारी मोहन ने हमें देश और समाज की रक्षा करना सिखाया है। उन्होंने सुदर्शन चक्र को न्याय और सुरक्षा का कवच बनाया, जो दुश्मन को ढूँढकर उसे दंड देता है। आज देश, भारत के निर्णयों में उसी भावना का अनुभव कर रहा है। देश ही नहीं, दुनिया इसे अनुभव कर रही है…”

PM की त्योहारों पर देशवासियों से ‘स्वदेशी’ अपनाने की अपील

पीएम ने पूरे देश ‘मेक इन इंडिया’ की अपील की और व्यापारियों से स्वदेशी माल बनाने और बेचने पर जोर देने का आग्रह किया। पीएम मोदी ने कहा, “2047 तक देश 100 वर्ष पूरा करेगा और विकसित भारत बन जाएगा। इसके लिए स्वदेशी अपनाना होगा। अब नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली… आदि त्योहार आ रहे हैं। ये आत्मनिर्भर के त्योहार हैं।”

PM ने कहा, “देशवासियों से अपील है कि जीवन में मंत्र बनाओ की जो भी खरीदेंगे मेड इन इंडिया होगा। चाहे वो घर की सज्जा के लिए सामान हो, दोस्त के लिए उपहार हो….। उपहार वही जो भारत में बना हो।”

देशभर के व्यापारियों और दुकानदारों से पीएम ने कहा कि वे देश को आगे बढ़ाने के लिए बहुत बड़ा योगदान कर सकते हैं। पीएम ने अपील की, “व्यापारी और दुकानदार विदेशी सामान न बेचे। साथ ही दुकान पर बोर्ड लगाइए कि हमारे यहाँ स्वदेशी सामान बिकता है। जो मैन्युफैक्चरिंग और प्रोडक्शन करते हैं उन लोगों से आग्रह है कि गुणवत्ता सुधारे और कीमत कम करें। मैं यकीन से कहता हूँ कि हर भारतीय आपसे सामान खरीदेगा।”

पीएम ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कॉन्ग्रेस पर भी जमकर निशाना साधा। पीएम ने कहा, “चरखाधारी मोहन, हमारे पूज्य बापू ने स्वदेशी के माध्यम से भारत की समृद्धि का मार्ग दिखाया था। यहाँ हमारा साबरमती आश्रम है, ये आश्रम इस बात का साक्षी है कि जिस पार्टी (कॉन्ग्रेस) ने उनके नाम पर दशकों तक सत्ता का आनंद लिया, उसने बापू की आत्मा को कुचल दिया।”

स्वदेशी पर बोलते हुए पीएम ने कहा, “उन्होंने (कॉन्ग्रेस) बापू के स्वदेशी के मंत्र के साथ क्या किया?… जो लोग दिन-रात गाँधी के नाम पर अपनी गाड़ी चलाते हैं, आपने उनके मुंह से एक बार भी स्वच्छता या स्वदेशी शब्द नहीं सुना होगा। यह देश समझ नहीं पा रहा है कि उनकी समझ को क्या हो गया है…।”

सरकार GST रिफॉर्म कर रही है: PM मोदी

दीपावली से पहले व्यापारियों को खुशखबरी देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सरकार GST रिफॉर्म कर रही है। सरकार के इस कदम से व्यापारियों को बहुत सी चीजों पर टैक्स कम हो जाएगा।

GST रिफॉर्म पर बोलते हुए पीएम ने कहा, “हमारी सरकार GST रिफॉर्म कर रही है और दीवाली से पहले आपको बड़ी भेंट मिलेगी। GST रिफॉर्म के कारण हमारे लघु उद्योगों को बहुत मदद मिलेगी और बहुत सी चीज़ों पर टैक्स कम हो जाएगा। इस दिवाली, चाहे वह व्यापारिक वर्ग हो या हमारे परिवार के बाकी सदस्य, सभी को खुशियों का दोहरा बोनस मिलने वाला है।”

आतंकवादियों के आकाओं को नहीं छोड़ेंगे: PM मोदी

गुजरात की धरती से भी पीएम मोदी ने पाकिस्तान को धमकी दी। पीएम ने कहा, “आज हम आतंकवादियों और उनके आकाओं को नहीं छोड़ेंगे, चाहे वे कहीं भी छिपे हों। दुनिया ने देखा है कि भारत ने पहलगाम का बदला कैसे लिया। भारत ने उन्हें सिर्फ़ 22 मिनट में मिटा दिया। हम सैकड़ों किलोमीटर अंदर गए और आतंकवाद के केंद्र पर हमला किया।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “ऑपरेशन सिंदूर हमारी सेना के पराक्रम और सुदर्शन चक्रधारी मोहन (महात्मा गाँधी) की भारत की इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गया है।

पीएम ने ₹1400 करोड़ की कई रेलवे परियोजनाओं की दी सौगात

गुजरात से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को ₹1400 करोड़ की कई रेलवे परियोजनाओं की सौगात दी। इनमें ₹530 करोड़ की लागत से बनी 65 किलोमीटर लंबी महेसाणा-पालनपुर रेलवे लाइन का दोहरीकरण, ₹860 करोड़ से बनी 37 किलोमीटर लंबी कलोल-कदी-कटोसन रोड रेल लाइन का परिवर्तन और 40 किलोमीटर बेचराजी-रानुज रेल लाइन शामिल है।

वामपंथ के ‘जहर’ और ममता के मुस्लिम ‘तुष्टिकरण’ ने पश्चिम बंगाल को डुबोया, अब बीजेपी का ‘मॉडल’ ही है आखिरी उम्मीद

पश्चिम बंगाल पहले भारत का एक चमकता हुआ राज्य था। यहाँ की कला, सोच और उद्योग देश में सबसे आगे थी। कोलकाता को भारत की बुद्धि और ज्ञान की राजधानी कहा जाता था। बंगाल के कारखानों में लाखों लोगों को काम मिलता था। यहाँ कई महान राष्ट्रवाद लोग पैदा हुए, जिन्होंने देश को नई दिशा दी थी। इनमें बंकिमचंद्र, स्वामी विवेकानंद, अरविंदो, सुभाष चंद्र बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे। इन्हीं राष्ट्रवादी लोगों ने भारत को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने का सपना दिखाया था।

लेकिन आज की तस्वीर बहुत अलग है। जो जमीन कभी तरक्की की मिसाल थी, वह अब पीछे रह गई है। बंगाल के युवा अब काम की तलाश में बाहर चले जाते हैं। गाँव सुनसान हो गए हैं क्योंकि काम करने वाले लोग घर छोड़ चुके हैं। राज्य के उद्योग बंद हो गए हैं। जो लोग व्यापार करना चाहते हैं, वे भ्रष्टाचार में फँस जाते हैं। यहाँ की राजनीति अब इस्लामी तुष्टिकरण की ओर झुक गई है। इससे यहाँ रहने वाले आम हिंदू लोगों की परेशानी और बढ़ गई है।

यह बर्बादी किस्मत का खेल नहीं है, बल्कि यह एक धोखा है। पहला धोखा कम्युनिस्टों ने दिया। उन्होंने बंगाल पर 34 साल राज किया और सब कुछ बर्बाद कर दिया। फिर ममता बनर्जी आईं। उन्होंने कम्युनिज़्म की जगह मुस्लिम तुष्टिकरण को अपनाया। इन दोनों ने मिलकर बंगाल की अर्थव्यवस्था और सम्मान को मिटा दिया। अब जो बचा है, वह बंगाल नहीं, जैसा पहले था। यह राज्य अब ‘माँ-माटी-मानुष’ से नहीं चलता। यह अब ‘माइग्रेंट, मिसरूल और ममता’ से चल रहा है। यानि पलायन, बदहाली और गलत नेतृत्व से।

वामपंथी अभिशाप: राष्ट्र से ऊपर वर्ग-युद्ध

34 साल तक लेफ्ट फ्रंट ने बंगाल पर राज किया। उन्होंने मार्क्सवादी सोच से लोगों का दिमाग भरा और उद्योगों को शोषण कहा। कारोबार को दुश्मन की तरह देखा। जो भी बंगाल में कारखाना लगाना चाहता था, उसे डराया गया। टाटा और बिड़ला जैसे बड़े उद्योगपति भी राज्य छोड़कर चले गए। हज़ारों फैक्ट्री बंद हो गईं। लाखों लोग बेरोज़गार हो गए। धीरे-धीरे गरीबी ने जड़ पकड़ ली और बंगाल की तरक्की रुक गई।

मार्क्सवादी सिर्फ उद्योगों के खिलाफ नहीं थे। वो देशभक्ति के भी विरोधी थे। उन्होंने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया। संस्कृति को भी नीचा दिखाया। उन्होंने दुर्गा पूजा को सिर्फ एक ‘लोक उत्सव’ कहा। लेकिन वो खुद लेनिन की पूजा करते रहे। उन्होंने लोगों के दिल से देश का गर्व निकाल दिया। देश में अवैध घुसपैठियों के लिए रास्ता खोल दिया।

2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं। तब तक बंगाल बहुत बुरी हालत में था। मानो, जैसे कोई मरीज आखिरी साँसें गिन रहा हो। लेकिन ममता बनर्जी ने उसे संभालने की वजह हालात और बिगाड़ दिए। जो राज्य पहले से ही बीमार था, ममता की नीतियों ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया।

ममता का मुस्लिम तुष्टिकरण राज

ममता बनर्जी खुद को बंगाल की ‘दीदी’ कहती हैं। लेकिन सवाल ये है कि वो किसकी दीदी हैं? क्या वो उस बंगाली हिंदू मजदूर की दीदी हैं, जो केरल की ईंट भट्टियों में काम कर रहा है?क्या वो मालदा के उस बेरोजगार नौजवान की दीदी हैं, जो रोज़ काम की तलाश में भटकता है? या फिर वो बांग्लादेश से आए घुसपैठिए की दीदी हैं, जिसे राशन कार्ड, आधार और राजनीति का पूरा सहारा मिला है?

सच बहुत साफ़ है। ममता बनर्जी ने बंगाल को तुष्टिकरण का राज्य बना दिया है। त्योहारों पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। यह पैसा संस्कृति के लिए नहीं, बल्कि वोट खरीदने के लिए दिया जाता है। जो लोग बांग्लादेश से गैरकानूनी तरीके से आए हैं, उन्हें आम नागरिकों से भी ज़्यादा सुविधाएँ मिलती हैं। मदरसों को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन नौजवानों को काम सिखाने वाली ट्रेनिंग पर ध्यान नहीं है। पुलिस का काम सुरक्षा देना है। लेकिन यहाँ पुलिस हिंदुओं को नहीं बचाती, बल्कि हमला करने वालों को बचाती है।

ममता बनर्जी की पार्टी की सांसद सुष्मिता देव ने एक अजीब बात कही। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का बंगाल से बाहर काम कर रहे मजदूरों की जानकारी लेना ‘नस्लीय भेदभाव’ है। क्या सच में? जब लाखों बंगाली लोग बेरोजगारी के कारण घर छोड़कर बिहार जैसे राज्यों में मजदूरी कर रहे हैं, तब यह सरकार घुसपैठियों का बचाव कर रही है। अपने ही लोगों की मदद नहीं कर रही। इसे सरकार चलाना नहीं कहते। इसे धोखा कहते हैं।

जनसांख्यिकीय टाइम बम

बॉर्डर से जुड़े ज़िले जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर अब बदल चुके हैं। इन जगहों पर अब हिंदू लोग अल्पसंख्यक बन गए हैं। यानि अपनी ही धरती पर वे अब कम संख्या में हैं। यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं है। यह सब सरकार की योजना का हिस्सा है। यह वोट-बैंक बनाने के लिए किया गया है। घुसपैठियों को बसाकर वोट जुटाए जा रहे हैं और हिंदुओं पर हमला करवाकर उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। जिससे बंगाल की सत्ता ममता बनर्जी के इशारों पर ही चल सके।

हर हिंदू बच्चा जो नौकरी की तलाश में बंगाल छोड़ता है, उसकी जगह एक घुसपैठिया आ जाता है। हर बार जब बंगाली हिंदू पलायन करता है तो उसकी भरपाई बांग्लादेश से आए लोगों से होती है। इसका नतीजा साफ है। बंगाल के अंदर ही धीरे-धीरे एक नया बँटवारा हो रहा है। यह वही चेतावनी है जो आरएसएस ने बहुत पहले दी थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1947 में कहा था कि अगर तुष्टिकरण नहीं रोका गया तो हिंदू अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे। आज ममता के बंगाल में वही बात सच होती दिख रही है। हिंदू पीछे हट रहे हैं और घुसपैठिए बढ़ते जा रहे हैं।

पलायन की त्रासदी

किसी भी बिल्डिंग साइट को देखिए- चाहे वो बेंगलुरु हो, हैदराबाद या गुरुग्राम। वहाँ आपको बंगाली भाषा सुनाई देगी। ये युवक मुर्शिदाबाद, मालदा, बीरभूम और जलपाईगुड़ी से आए होते हैं। इन्हें मजबूरी में अपना घर छोड़ना पड़ा है। उनकी जमीन उन्हें पेट भरने लायक काम नहीं दे पाती। ये लोग शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी से प्रवासी बने हैं।

बंगाल की हालत बहुत दुखद है। पहले बंगाल को ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। अब बंगाल सामान नहीं, बल्कि मजदूर बाहर भेजता है। यहाँ के पढ़े-लिखे युवा दिल्ली में ओला कैब चलाते हैं। जबकि बंगाल में घुसपैठिये सरकारी मदद पा रहे हैं। यह प्रवासन नहीं, अपमान है। ऐसे में ममता बनर्जी केंद्र सरकार को दोष देती हैं। बीजेपी को भी जिम्मेदार ठहराती हैं। ‘बाहरी लोगों’ को भी दोष देती हैं। इस बीच, पूजा के लिए करोड़ों रुपए खर्च करती हैं। अल्पसंख्यकों को खुश करने में भी पैसा लगाती हैं। यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं है। यह संस्कृति के साथ धोखा है।

सिंडिकेट राज: सरकार नहीं, माफिया

अगर बंगाल में कुछ भी अच्छा होने की थोड़ी भी उम्मीद थी, तो TMC ने उसे ‘सिंडिकेट राज’ से खत्म कर दिया। यहाँ कोई भी निर्माण कार्य, व्यापार, या छोटा-मोटा कारोबार तब तक नहीं हो सकता, जब तक TMC के सिंडिकेट को पैसा न दिया जाए। कोयला हो या रेत, स्कूल में नौकरी हो या स्वास्थ्य सेवा, सब कुछ एक माफिया की तरह यहाँ चलाया जाता है।

यहाँ तक कि नौकरियाँ भी बेची जाती हैं। SSC घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, और कोयला घोटाला- हर घोटाले से एक बात साफ होती है कि बंगाल को चलाया नहीं जा रहा, बल्कि उसे लूटा जा रहा है। व्यापारी भाग जाते हैं, क्योंकि कोई भी व्यापारी ऐसे नेताओं के साथ काम नहीं करना चाहता। जो नेता जैसे दिखते हैं, लेकिन असल में वह गुंडे हैं।

2011 से 2024 के बीच, 6600 से ज्यादा कंपनियाँ बंगाल छोड़ गईं। यह सिर्फ लोगों का जाना नहीं है, बल्कि एक तरह का पलायन है। बंगाल सिर्फ अपने लोगों को नहीं खो रहा, बल्कि अपनी उम्मीदें भी खो रहा है।

बीजेपी का रास्ता: गौरव और प्रगति साथ-साथ

अब बंगाल को BJP शासित राज्यों से तुलना करके देखते हैं। गुजरात में मोदी ने बड़े बदलाव किए। वहां बंदरगाह, सड़कें, बिजली के प्लांट और फैक्ट्रियाँ बनीं। इससे गुजरात भारत की आर्थिक ताकत बना। योगी के उत्तर प्रदेश को ही देख लीजिए, पहले ये एक बीमार राज्य था, लेकिन आज निवेश का केंद्र बन चुका है। यहाँ ग्लोबस समिट हो रहे हैं और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। असम में हिमंता सरकार ने गैरकानूनी घुसपैठ और बाल विवाह पर रोक लगाई। साथ ही, असम में आईटी पार्क, मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय बनाए गए। यह BJP का डबल इंजन वाला मॉडल है। यहाँ देशभक्ति और विकास साथ-साथ चलते हैं। संस्कृति में गर्व और अर्थव्यवस्था में समृद्धि। यह RSS की ‘समग्र मानवतावाद’ की सोच को साकार करता है।

यह वहीं प्रगति, विकास है जिसकी जरुरत बंगाल को है। बंगाल को अब मजदूर भेजने की बजाय सामान बेचना चाहिए। घुसपैठियों को खुश करने के बजाय, उसे अपने ही युवाओं को मजबूत बनाना चाहिए। त्यौहारों पर पैसा लुटाने के बजाय, बंगाल को कारखानों, नौकरियों और सम्मान की जरूरत है।

बंगाल की नियति: ममता का मुस्लिम तुष्टिकरण या बीजेपी का प्रगति

आज बंगाल एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ममता का रास्ता है, जहाँ सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ, पलायन और अपमान है। दूसरी तरफ बीजेपी का रास्ता है, जो विकास, राष्ट्रवाद, सम्मान और गौरव का वादा करता है। सवाल बहुत स्पष्ट है कि क्या बंगाल घुसपैठियों की कॉलोनी बनकर रहेगा या फिर से ज्ञान और प्रगति का केंद्र बनेगा। बंगाल ने भारत को बंकिम, विवेकानंद, सुभाष और श्यामा प्रसाद जैसे महान लोग दिए हैं।

क्या अब यह घुसपैठियों और माफियाओं के सामने हार मान लेगा या फिर एक राष्ट्रवादी सरकार के साथ मिलकर, गौरव और प्रगति के लिए फिर से खड़ा होगा। लोगों का पलायन किस्मत नहीं है, यह ममता के धोखे का नतीजा है। बंगाल का विकास न तो वामपंथ में है और न ही ममता में, बल्कि यह मोदी, योगी, हिमंता और RSS के ‘विकसित भारत’ के सपने में छिपा है। जब तक ऐसा नहीं होता, बंगाल अपनी दुखी हालत में फँसा रहेगा। यह ‘माँ-माटी-मानुष’ नहीं, बल्कि प्रवासी, कुशासन और ममता के भरोसे चलेगा।

डॉ प्रोसेनजित नाथ का यह लेख मूल रूप से ऑपइंडिया अंग्रेजी पर प्रकाशित है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

शेख हसीना की सरकार गिराने के बाद से बांग्लादेश में महिलाओं-बच्चियों के खिलाफ बढ़ा अपराध, 7 माह में 75% बढ़े रेप केस: 2 सालों में गरीबी हुई दोगुनी, आँकड़ों में खुली यूनुस सरकार की पोल

बांग्लादेश इस समय दोहरी त्रासदी से जूझ रहा है। एक ओर मासूम बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में भयानक वृद्धि हुई और दूसरी ओर तेजी से बढ़ती गरीबी। साल 2025 के पहले सात महीनों में देश में बच्चियों के साथ रेप के मामलों में लगभग 75% की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं गरीबी की दर भी 28% के करीब पहुँच गई है, जो महज दो वर्षों में दोगुनी हो चुकी है। यह सब तब हो रहा है जब देश की बागडोर मुहम्मद यूनुस के हाथ में है, जो एक ‘लोकतांत्रिक और पारदर्शी सरकार’ के वादे के साथ सत्ता में आए थे।

रेप के बढ़ते आँकड़े – एक राष्ट्रीय शर्म

बांग्लादेश में बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले में चौंकाने वाली वृद्धि हुई है। मानवाधिकार संगठन आईन ओ सालिश केंद्र (ASK) के आँकड़ों के अनुसार, 2025 के पहले सात महीनों (जनवरी-जुलाई) में 306 लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ, जबकि 2024 में इसी अवधि में यह संख्या 175 थी। इसका मतलब है कि केवल सात महीनों में ही बलात्कार के मामलों में लगभग 75% की बढ़ोतरी हुई है।

यह संख्या 2024 के पूरे साल के कुल 234 मामलों को भी पार कर गई है। इनमें से 49 पीड़ित बच्चियाँ 0-6 साल की थीं, 94 बच्चियाँ 7-12 साल की थीं और 103 किशोरियाँ थीं। 30 लड़कों के साथ बलात्कार हुआ, जिनमें से अधिकांश 12 साल से कम उम्र के थे। इनमें मात्र 20 मामलों में केस दर्ज हो सके। बलात्कार के प्रयास के भी 129 मामले सामने आए। कानूनी कार्रवाई की बात करें तो, 306 में से केवल 251 मामलों में ही केस दर्ज हो पाया, यानि 55 बच्चियों को अब तक न्याय नहीं मिल सका। इस भयावह वृद्धि का कारण कमजोर कानून-व्यवस्था और अपराधियों में जवाबदेही की कमी है।

बांग्लादेश में बढ़ती गरीबी

जहाँ एक तरफ अपराध बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ती जा रही है। पावर एंड पार्टिसिपेशन रिसर्च सेंटर (PPRC) के अनुसार, बांग्लादेश में गरीबी दर 2022 के 18.7% से बढ़कर अब 27.93% हो गई है। इसी तरह, अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों का अनुपात भी 5.6% से बढ़कर 9.35% हो गया है। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2025 में लगभग 30 लाख और लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं।

जब शेख हसीना सत्ता में थीं, तब बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था जीडीपी वृद्धि के मामले में मजबूत दिख रही थी। वर्तमान में, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार काम कर रही है, जहाँ गरीबी और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। मुहम्मद यूनुस के कार्यकाल के पहले नौ महीनों में 21 लाख से ज्यादा नौकरियाँ खत्म हो गईं, जिनमें से अधिकांश महिलाओं की थीं।

बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर हमले और अत्याचार की घटनाएँ लगातार हो रही हैं। लूटपाट, मंदिरों पर हमले और धार्मिक मूर्तियों को निशाना बनाना आम बात हो गई है। यूनुस के शासन में, भारत के साथ संबंधों में तनाव भी बढ़ा है, जिससे हिंदुओं की स्थिति और भी नाजुक हो गई है। कुल मिलाकर, बांग्लादेश में यूनुस सरकार के आने के बाद से अपराध और आर्थिक चुनौतियों में कोई खास कमी नहीं आई है, जिससे वहाँ की जनता, खासकर बच्चों और अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

लाखों का रेप, करोड़ों का कत्लेआम… 1971 में पाकिस्तान ने खून तो बहाया, लेकिन करतूतों को लिए नहीं माँग रहा माफी: बांग्लादेश माँग रहा ₹3.75 लाख करोड़ का मुआवजा, मंत्री बोला – मामला पहले ही सुलझ चुका

पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के बांग्लादेश दौरे के बीच ‘संबंध सुधारने की कोशिश’ को धक्का लगा है। ढाका ने पाकिस्तान से आग्रह किया है कि वह 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुए अत्याचारों के लिए माफी माँगे। उस वक्त पाकिस्तानी सेना ने लाखों बांग्ला भाषी नागरिकों की हत्या कर दी थी और अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। लेकिन पाकिस्तान ने माफी माँगने से साफ इनकार कर दिया है।

1971 के युद्ध के मुद्दे पर पाकिस्तान बोला

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शनिवार (23 अगस्त 2025) को ढाका दौरे पर आए डार ने कहा, “1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान पहले ही हो चुका है। 1974 में और फिर 2002 में।” उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच पिछले समझौतों और प्रयासों से इस मुद्दे को सुलझा लिया गया है।

ढाका ने माँगा 3.75 लाख करोड़ की क्षतिपूर्ति

यूनुस की अंतरिम सरकार में विदेश मंत्री तौहीद हुसैन ने डार के बयान को खारिज कर दिया। ढाका ने पाकिस्तान से अनुरोध किया कि वह 1971 के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हुए अत्याचार के लिए माफी माँगे।आपको बता दें कि बांग्लादेश की आजादी के वक्त युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने सामूहिक नरसंहार किया था और हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया था। यूनुस सरकार ने पाकिस्तान से ‘अविभाजित पाकिस्तान’ की 1971 से पहले की संपत्ति में से बांग्लादेश को उसका हिस्सा यानी3.75 लाख करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति की माँग की।

बांग्लादेश में 1971 का दर्द आज भी गहरा है। पाकिस्तानी सेना ने रक्तपात मचाया था जिसमें लाखों लोग मारे गए और अनगिनत महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। आधिकारिक माफी की माँग ढाका की विदेश नीति में शामिल है। हर बार जब दोनों देशों के बड़े नेता मिलते हैं तो ये माँग की जाती है। इस बार पाकिस्तानी विदेश मंत्री डार ने इस मुद्दे को ‘ऐतिहासिक रूप से सुलझा लेने’ की बात कही है। जबकि बांग्लादेश के विदेश मंत्री हुसैन इससे सहमत नहीं दिख रहे हैं।

तनाव के बावजूद समझौतों पर हस्ताक्षर

इन मतभेदों के बावजूद, दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने के लिए कई समझौते किए। इनमें आधिकारिक और राजनयिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा आवश्यकता से छूट, व्यापार समझौता, विदेश सेवा संस्थानों के बीच सहयोग, राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों के बीच सहयोग और थिंक टैंकों के बीच सहयोग शामिल हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम पर भी सहमति बनी।

दूसरे विश्व युद्ध में जापान को हराने को लेकर भिड़े चीन के राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट, ताइवान और CCP ने किए अपनी जीत के दावे: जानें क्या है इतिहास

दूसरे विश्व युद्ध के खत्म हुए 80 साल हो गए हैं लेकिन चीन और ताइवान अभी भी इस युद्ध में ‘किसने क्या किया’ को लेकर बयानबाजी कर रहे हैं। बीजिंग में होने वाली विक्ट्री डे परेड से पहले चीन और ताइवान के बीच यह बयानबाजी और तेज हो गई है।

ताइवान की राजधानी ताइपे में एक कार्यक्रम में, 99 वर्षीय अनुभवी पान चेंग-फा ने कहा कि उन्होंने जापान के खिलाफ दूसरे विश्व युद्ध में चीन के लिए लड़ाई लड़ी थी। जब उनसे यह पूछा गया कि उस समय रिपब्लिकन सरकार के साथ जुड़े कम्युनिस्टों की भूमिका क्या थी, तो उन्होंने कहा, “हमने उन्हें हथियार और उपकरण दिए, हम उन्हें मजबूत बनाते रहे।”

चीन-ताइवान विवाद की पृष्ठभूमि

यह सब 1895 से शुरू हुआ। पहले चीन-जापान युद्ध में चीन का चिंग (Qing) वंश हार गया और शिमोनोसेकी संधि के तहत ताइवान पर जापान का कब्जा हो गया। 1911 में चीन में क्रांति हुई और चिंग वंश का अंत हो गया। अगले ही साल ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना हो गई।

चीन में 1927 में गृहयुद्ध शुरू हुआ जब कम्युनिस्ट पार्टी ने रिपब्लिकन सरकार के खिलाफ विद्रोह किया। 1931 में जापान ने चीन के उत्तर-पूर्वी हिस्से मंचूरिया पर कब्जा कर लिया।

रिपब्लिक ऑफ चाइना के नेता च्यांग काई शेक को 1936 में उनके ही दो जनरलों ने अगवा कर लिया ताकि उन्हें माओत्से तुंग के नेतृत्व वाले कम्युनिस्टों के साथ मिलकर जापान से लड़ने के लिए मजबूर किया जा सके।

जापान ने पूरे चीन में 1937 में हमला तेज कर दिया। लेकिन हालात जापान के खिलाफ गए। 1943 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और चीन के रिपब्लिकन नेता च्यांग काई शेक ने ‘काहिरा घोषणा’ पर हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया कि ताइवान को ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को वापस किया जाएगा।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के साथ दूसरा चीन-जापान युद्ध भी खत्म हुआ। जापान की हार कई कारणों से हुई, चीनी सेना की थकाऊ रणनीति, जापानी गलतियाँ और अंत में अमेरिका व अन्य मित्र राष्ट्रों का युद्ध में उतरना। 1945 की पॉट्सडैम घोषणा ने जापान के बिना शर्त आत्मसमर्पण और काहिरा घोषणा की पुष्टि की।

जापान के आत्मसमर्पण के बाद ताइवान रिपब्लिक ऑफ चाइना को सौंपा गया लेकिन 1946 में कम्युनिस्ट और रिपब्लिकन फिर से भिड़ गए और गृहयुद्ध शुरू हो गया। 1947 में ताइवान की जनता ने रिपब्लिक ऑफ चाइना के खिलाफ विद्रोह किया, जिसे कठोरता से दबा दिया गया।

जब माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट जीत गए और 1949 में ‘पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की स्थापना हुई, तब च्यांग काई शेक ताइवान भाग गए और माओ ने ताइवान को मुक्त कराने की कसम खाई। आज ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को ही ताइवान कहा जाता है।

ताइवान एक विवादित क्षेत्र क्यों बना हुआ है?

1951 में जापान ने सैन फ्रांसिस्को शांति संधि पर हस्ताक्षर किए और ताइवान पर अपना दावा छोड़ दिया। लेकिन ताइवान की संप्रभुता का सवाल अब तक अनसुलझा है। चूंकि इस संधि में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) शामिल नहीं थी, इसलिए वह इसे गैरकानूनी और अमान्य मानती है।

1952 में रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) और जापान ने शांति संधि पर हस्ताक्षर किए। इसमें जापान ने ताइवान पर अपने दावे से दोबारा हाथ खींच लिया। ताइवान की सरकार का कहना है कि इस समझौते से साफ होता है कि पिछली संधि के तहत ताइवान की संप्रभुता रिपब्लिक ऑफ चाइना (यानी उस समय की रिपब्लिकन सरकार) को मिली थी, न कि कम्युनिस्टों को। आज तक चीन और ताइवान की सरकारें एक-दूसरे को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं देतीं।

स्रोत: एबीसी न्यूज

चीनी रिपब्लिकन जापान के खिलाफ लड़े; कम्युनिस्टों ने श्रेय ले लिया: ताइवान ने CCP पर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया

दूसरे विश्व युद्ध के बाद की स्थिति पर बोलते हुए 99 साल के पान चेंग-फा ने कहा, “जापान को हराने के बाद कम्युनिस्टों का अगला निशाना रिपब्लिक ऑफ चाइना था।”

आज भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) यह प्रचार करती है कि जापान को हराने में उसकी मुख्य भूमिका थी। लेकिन हकीकत यह है कि च्यांग काई-शेक के नेतृत्व वाली रिपब्लिकन सरकार ने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई थी।

काहिरा घोषणा (1943) और पॉट्सडैम घोषणा (1945), जिनमें ताइवान को चीन का हिस्सा बताया गया, च्यांग ने ही साइन की थीं। उस समय पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) का अस्तित्व भी नहीं था, क्योंकि वह 1949 में बना।

15 अगस्त को जापान के आत्मसमर्पण दिवस पर ताइवान के शीर्ष अधिकारी चिउ चुई-चेंग ने कहा  “रिपब्लिक ऑफ चाइना ने जापान के खिलाफ युद्ध लड़ा था, उस समय पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना अस्तित्व में भी नहीं था। लेकिन हाल के वर्षों में CCP लगातार झूठ फैलाती रही है कि उसने ही जापान को हराया।”

चिउ ने दावा किया कि उस समय कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति ‘70% खुद को मजबूत करने, 20% रिपब्लिकन सरकार से लड़ने और सिर्फ 10% जापान का विरोध करने’ पर आधारित थी। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने भी कहा, “इतिहास गवाह है कि जापान के खिलाफ युद्ध रिपब्लिक ऑफ चाइना ने जीता था।”

ताइपे में रक्षा मंत्रालय के कार्यक्रम में कलाकारों ने रिपब्लिकन सैनिकों की वेशभूषा में प्रस्तुति दी और अमेरिकी पायलट फ्लाइंग टाइगर्स की तस्वीरें भी दिखाई गईं। यह बात CCP को नागवार गुजरी।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ताइवान पर आरोप लगाया कि वह द्वितीय चीन-जापान युद्ध में CCP की भूमिका को गलत तरीके से पेश कर रहा है। CCP के अखबार पीपुल्स डेली ने लिखा कि इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि CCP की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं थी।

CCP का दावा है कि जापान पर जीत सबकी साझा थी और 1945 के समझौते से ताइवान चीन को लौटा। लेकिन ताइवान कहता है कि यह समझौता रिपब्लिक ऑफ चाइना और च्यांग काई-शेक ने साइन किया था, न कि माओ या CCP ने। CCP का कहना है कि वह रिपब्लिक ऑफ चाइना की वैध उत्तराधिकारी है और ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है।

चीन और ताइवान लंबे समय से इतिहास को लेकर जुबानी जंग लड़ रहे हैं, लेकिन मौजूदा समय में यह टकराव और तेज हो गया है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति दिखा रहा है और ताइवान को परोक्ष रूप से धमका रहा है, जबकि ताइवान कह रहा है कि वह CCP की आक्रामकता का जवाब देगा।

मौजूदा हालात बताते हैं कि भविष्य में चीन और ताइवान के बीच सैन्य संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फर्क बस इतना होगा कि इस बार अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा होगा, न कि CCP के साथ।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।)

गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है… जब बच्ची के चुटकुला सुनाने पर फायर हुआ AIR का पूरा स्टाफ: राहुल गाँधी याद करें 37 साल पुरानी घटना, आज बच्चों से ‘वोट चोर’ बुलवाकर हो रहे चौड़े

साल 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला कैंपेन फेल होने के बाद राहुल गाँधी ने अब केंद्र सरकार पर नए इल्ज़ाम लगाने शुरू किए हैं। वो चाहते हैं कि किसी भी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी छिन जाए और वो सत्ता पर काबिज हो जाए। इसके लिए वो लगातार ऊल-जलूल आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर भी रहे हैं, मगर अफसोस, हर बार वो मुँह के बल गिरते दिखते हैं।

सत्ता पाने की बौखलाहट में राहुल गाँधी न सिर्फ बिहार एसआईआर को लेकर फर्जी दावे करते दिखे और बल्कि उन्होंने फर्जी आँकड़ों के साथ प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी कर डाली। हालाँकि जब आँकड़ों की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई, तो उनका मुँह नहीं खुला, और न ही माफी माँगी.. बल्कि उस शर्मिंदगी को पीछे छोड़ने की कोशिश में एक और हरकत कर डाली। कभी ‘चौकीदार…’ वाले नारे पर मुँह की खाने के बाद अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वो लोगों को भड़का रहे हैं।

इसी कड़ी मेंकॉन्ग्रेस की अगुवाई वाला पूरा विपक्ष अब ‘वोट चोरी’ वाला कैंपेन चला रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग, मोदी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है और बीजेपी के फायदे के लिए आम लोगों के वोटिंग के हक को छीनने की साजिश रच रहा है।

महागठबंधन भी बिहार में होने वाले चुनावों से पहले चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) मुहिम से नाराज़ है। इस मुहिम में 65 लाख फर्जी वोटरों को हटाया गया, जिससे वोटिंग की प्रक्रिया साफ-सुथरी होगी। लेकिन विपक्ष का गुस्सा इस बात पर है कि ये फर्जी वोटर उनके I.N.D.I. गठबंधन के समर्थक थे।

खास बात ये है कि चुनाव आयोग ने राहुल गाँधी से कहा कि वो अपने इल्ज़ामों के सबूत के साथ हलफनामा दें या फिर सार्वजनिक माफी माँगें। लेकिन राहुल ने कहा, “मैं एक नेता हूँ, जो मैं लोगों से कहता हूँ, वही मेरा वचन है। मैंने ये बात सबके सामने कही, इसे कसम मान लो। खास बात ये है कि उन्होंने मेरी बात का खंडन नहीं किया।” ये विपक्ष की वही पुरानी चाल है, जिसमें वो इल्ज़ाम लगाकर भाग जाते हैं।

बच्चों को अपनी राजनीति में घसीट रहे हैं राहुल गाँधी

उम्मीदों के मुताबिक, इस बार भी रायबरेली के सांसद राहुल गाँधी का बनाया हुआ राजनीतिक ड्रामा हकीकत से कोसों दूर है। अब वो कह रहे हैं कि बच्चे भी उन्हें ‘वोट चोरी’ की बात बता रहे हैं।

24 अगस्त को बिहार के अररिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने कहा, “एक बहुत ही मजेदार बात सामने आ रही है, जो मेरी पिछली दो यात्राओं में नहीं थी। बच्चे मेरे पास आ रहे हैं। ये बहुत अजीब बात है। वो कह रहे हैं, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’। ये बड़े लोग नहीं हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं। अब छह साल का एक बच्चा ये बात समझ गया, और सिर्फ एक नहीं, हज़ारों बच्चे। अब चुनाव आयोग को इन बच्चों से जाकर बात करनी चाहिए। उन्हें सब पता चल जाएगा।”

राहुल ने आगे कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार ने पहले सरकारी कंपनियों को प्राइवेट किया, अब वो चुनाव आयोग की मदद से गरीबों के वोट चुराना चाहती है।” उन्होंने दावा किया कि विपक्ष बिहार में ऐसा नहीं होने देगा। उन्होंने कहा, “संविधान हर नागरिक को बराबर हक देता है। ये एसआईआर संविधान के खिलाफ है। बिहार के लोग विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों को करारा जवाब देंगे।”

जब एक बच्ची ने सचमुच राजीव गाँधी को कहा था चोर

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेताओं ने बच्चों के नाम पर अपनी झूठी कहानियाँ और गलत मकसद फैलाए हों। 1988 में एक बड़ी घटना हुई थी, जब एक बच्ची ने ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को चोर कहा था।

राहुल गाँधी शायद भूल गए हों कि एक बच्ची ने उनके पिता के लिए कहा था, “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है।” ये बात एक लाइव शो में कही गई थी। मजेदार बात ये है कि ‘फासिस्ट’ कहलाने वाली बीजेपी सरकार ऐसी बातों पर कोई कार्रवाई नहीं करती, लेकिन ‘उदार और लोकतांत्रिक’ राजीव गाँधी और उनकी पार्टी ने उस वक्त इसका जवाब बहुत सख्ती से दिया था।

साल 1988 में “गली-गली में शोर है, राजीव गाँधी चोर है” का नारा राजीव सरकार के खिलाफ बहुत मशहूर हो गया था। ये बोफोर्स घोटाले के खुलासे के बाद हुआ था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन पर एक प्रोग्राम हुआ, जिसमें एक छोटी बच्ची से मजाक सुनाने को कहा गया। उसने जवाब में यही नारा बोल दिया। iChowk.in के मुताबिक, इस प्रोग्राम को आयोजित करने वाली ऑल इंडिया रेडियो की टीम को इसकी सजा भुगतनी पड़ी। लेकिन और भी बुरा होना बाकी था।

इस घटना के बाद सागर यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग के प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया – “कौन सा ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन ‘राजीव गाँधी चोर है’ वाक्य प्रसारित करने के लिए जाना गया?” ये सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड, प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय के लिए बहुत भारी पड़ा। कॉन्ग्रेस ने उन्हें जमकर निशाना बनाया।

यूथ कॉन्ग्रेस के लोग पत्रकारिता विभाग में घुस गए और प्रोफेसर को पीटा। उनका मुँह काला किया गया और पूरे कैंपस में घुमाया गया। सागर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रायग दास हजेला ने इस घटना के विरोध में इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं है। देश में राजनीति में गुंडागर्दी को जोड़ने की कोशिश हो रही है।”

यूनिवर्सिटी ने एकजुट होकर हड़ताल शुरू की और सभी फैकल्टी मेंबर्स ने क्लास का बहिष्कार किया, जब तक कि प्रोफेसर के अपमान के जिम्मेदार लोगों को पकड़ा नहीं गया। पुलिस ने 10 लोगों को हिरासत में लिया, लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, यूनिवर्सिटी प्रशासन ने प्रोफेसर के खिलाफ जाँच शुरू कर दी। उन्हें जवाब देने के लिए बुलाया गया, लेकिन पुलिस ने उन्हें और परेशान किया।

प्रोफेसर कृष्णात्रेय को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और 504 के तहत गिरफ्तार किया गया। उन पर अशोभनीय व्यवहार, अपमान और शांति भंग करने के इल्ज़ाम लगाए गए। इस कार्रवाई की हर तरफ निंदा हुई। 8 अगस्त को प्रोफेसर ने अपनी सफाई में कहा, “मुझे इस सवाल से जुड़ी समस्याओं की जानकारी नहीं थी। मेरा कोई गलत इरादा नहीं था। मैंने ये सवाल इसलिए पूछा क्योंकि ये एक बड़ी घटना थी, और मैं उम्मीदवार की सतर्कता और याददाश्त जाँचना चाहता था।”

लेकिन 8 अगस्त की सुबह, जिला यूथ कॉन्ग्रेस के प्रमुख राकेश शर्मा की अगुवाई में एक भीड़ वाइस चांसलर के दफ्तर पहुँची और हजेला पर चिल्लाने लगी। वो तुरंत कृष्णात्रेय को हटाने की माँग कर रहे थे। हजेला ने मना कर दिया और कहा, “उनके खिलाफ कोई कार्रवाई जाँच पूरी होने और 17 अगस्त 2025 को यूनिवर्सिटी की कार्यकारी परिषद में रिपोर्ट पेश होने के बाद ही होगी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकता क्योंकि कुछ नेता चाहते हैं।”

इस बीच, शर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के गलत काम को खारिज किया और कहा कि प्रोफेसर ने खुद ऐसा किया और तस्वीरें भी खिंचवाईं। दूसरी तरफ कृष्णात्रेय अपने चेहरे पर काला पेंट लिए बिना ही इलाज के बाद घर लौटे। उसी शाम वो टीचर्स यूनियन की मीटिंग में भी उसी हालत में गए। एक और प्रोफेसर ने उनके समर्थन में अपना चेहरा काला किया।

अगले दिन से टीचर्स ने हफ्ते भर तक क्लास का बहिष्कार करने का फैसला किया, जब तक कि जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया जाता। लेकिन गवर्नर ने यूनिवर्सिटी की कार्यकारी और शैक्षणिक परिषद को भंग कर दिया और सारी ताकत नए वाइस चांसलर एमएल जैन को दे दी। इसके बाद कैंपस में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।

कॉन्ग्रेस जोसेफ गोएबल्स की प्रचार नीति से प्रेरणा ले रही है और बीजेपी पर वही इल्ज़ाम लगा रही है, जो उसकी अपनी भ्रष्टाचार भरी हुकूमत में उस पर लगे थे। बच्चों के नाम पर पीएम मोदी पर हाल का हमला भी उसी का हिस्सा है।

टेलर मोहम्मद सलीम ने गला घोंटकर हिंदू युवती को उतारा मौत के घाट, शव नाले में फेंक भागा: दिल्ली में 2 दिन बाद सड़ी-गली मिली लाश, हाथ के टैटू से हुई पहचान

पश्चिमी दिल्ली के डाबड़ी इलाके में टेलर मोहम्मद सलीम ने 22 साल की हिंदू युवती की गला घोंटकर हत्या कर दी। हत्या के दो दिन बाद युवती का बोरे में सड़ा गला शव नाले में पड़ा मिला। हाथ में बने टैटू से शव की पहचान की गई। मामले की जाँच के बाद पुलिस ने आरोपित को हरदोई से गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला 23 अगस्त 2025 को सामने आया। जब दोपहर करीब 2.54 बजे दिल्ली पुलिस को PCR कॉल के जरिए एक युवती का बोरे में शव मिलने की सूचना मिली। सूचना पर पुलिस डाबड़ी थाना क्षेत्र में मिले शव की लोकेशन पर पहुँची। पुलिस ने बोरे में मिले युवती के शव की जाँच शुरू की। पुलिस की शुरुआती जाँच में युवती की पहचान लापता के रूप में हुई।

पुलिस ने बताया युवती की माँ ने 21 अगस्त 2025 को गुमशुदगी का मामला दर्ज करवाया था। युवती के हाथ पर बने टैटू के आधार पर शव की शिनाख्त की गई। शव की पहचान 22 वर्षीय रूपा नाम से हुई, वह मेड का काम करती है। रूपा 21 अगस्त 205 को सुबह 10.30 बजे अपने घर से निकली थी और वापस नहीं लौटी। पुलिस के अनुसार घर से निकलने के दौरान वह अपने फोन पर किसी से बात कर रही थी।

पुलिस ने हत्या मामले में जाँच शुरू की। आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाले। कैमरे में रूपा को आखिरी बार महावीर एन्क्लेव में आरोपित 35 वर्षीय सलीम के साथ एक बिल्डिंग में घुसते देखा गया। कुछ देर बाद उसी बिल्डिंग से सलीम बाहर निकला, उसके हाथ में रूपा का छिपा हुआ शव भी दिखा।

पुलिस ने बताया कि सलीम युवती के शव को बाइक पर रखकर ठिकाने लगाने जा रहा था लेकिन रास्ते में शव बाइक से फिसल गया। सलीम हड़बड़ी में शव को नाले में फेंककर फरार हो गया। पुलिस ने सलीम को हरदोई से गिरफ्तार कर लिया है।

पैसे के लेनदेन में की हत्या

पुलिस ने आरोपित सलीम को गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी है। शुरुआती जाँच में हत्या का कारण पैसे का लेनदेन सामने आया है। पुलिस ने बताया कि सलीम काफी समय से युवती को जानता था। सलीम के पास युवती के पैसे बकाया था, जिसे युवती वापस माँग रही थी।

इसी बात पर दोनों की बहस भी हुई थी। गुस्से में आकर सलीम ने युवती का गला घोंट दिया। इसके बाद युवती की लाश को बाइक पर ले जाकर नाले में फेंक दिया। इसके बाद पकड़े जाने के डर से हरदोई फरार हो गया।

पुलिस ने आरोपित सलीम पर हत्या में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस आरोपित से पूछताछ कर रही है और यह जानने की कोशिश में है क्या हत्या में कोई और भी शामिल था। उधर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर आगे की जाँच भी शुरू कर दी है।

फिजी में हिंदू मंदिरों पर बढ़े हमले, 1 दिन में चोरी हुई हनुमान जी की 9 मूर्तियाँ: वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन ने PM मोदी से लगाई मदद की गुहार तो खुली सरकार की नींद, डिप्टी पीएम बोले- हमलावरों को देंगे सजा

फिजी में हाल के दिनों में हिंदू मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आई हैं। इन हमलों को लेकर न सिर्फ फिजी के हिंदू समुदाय में गुस्सा है, बल्कि अब वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन (Pacific) ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी हस्तक्षेप की माँग की है। इस बीच, फिजी के उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने सख्त बयान देते हुए कहा कि ऐसे कृत्य अब बर्दाश्त नहीं किए जाएँगे।

जानकारी के अनुसार, 22 अगस्त 2025 को नाडी और कोरोसिरी इलाकों में कुल 9 मूर्तियाँ चोरी हुईं, जिनमें सभी भगवान हनुमान की मूर्तियाँ थीं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ तीन अलग-अलग घरों से चुराई गईं और कुछ मामलों में मंदिरों को भी निशाना बनाया गया। पुलिस ने इन घटनाओं की पुष्टि की है और बताया कि एक टीम संदिग्धों की पहचान करने के लिए दिन-रात जाँच में जुटी है।

कार्यवाहक प्रधानमंत्री का सख्त रुख

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिजी के उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने एक हिंदू एकता सभा में बोलते हुए, देश भर में धार्मिक स्थलों की बेअदबी की कड़ी निंदा की। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा, “यदि आप इन कृत्यों में विश्वास करते हैं, तो फिजी आपके लिए सही जगह नहीं है।” उन्होंने हिंदू समुदाय को भरोसा दिलाया कि सरकार सभी नागरिकों को एकजुट करने और उनके पूजा करने के अधिकार की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत करेगी।

उप-प्रधानमंत्री मनोआ कामिकामिका ने प्रधानमंत्री सिटिवेनी राबुका की ओर से भी संदेश दिया, जो इस समय भारत की यात्रा पर हैं। कामिकामिका ने कहा कि सरकार धार्मिक स्थलों पर हमलों के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ यानि जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएगी। उन्होंने इस सभा को सामाजिक विश्वास और मेल-मिलाप को बढ़ावा देने वाली ‘राष्ट्र निर्माण की पहल’ बताया।

भारत से मदद की अपील

जानकारी के अनुसार, वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन (पैसिफिक) ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि वे इस मामले को फिजी के प्रधानमंत्री सिटिवेनी राबुका के सामने उठाएँ। फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ सुनील कुमार ने हमलों पर ‘गहरी चिंता’ व्यक्त करते हुए कहा कि मंदिरों और घरों से पवित्र शिवलिंग और मूर्तियों की चोरी और हिंदू समुदाय के खिलाफ बर्बरता की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।

डॉ सुनील कुमार ने फिजी की सरकार पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि बार-बार निंदा के बावजूद इस तरह के अपराध ‘चिंताजनक आवृत्ति’ के साथ जारी हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री राबुका से यह स्पष्ट करने को कहा है कि उनकी सरकार हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगी। फेडरेशन ने फिजी सरकार से सभी धार्मिक समूहों की सुरक्षा के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है ताकि शांति, आपसी सम्मान और बहु-नस्लीयता के मूल्यों को बनाए रखा जा सके।

पाकिस्तान में एक साल में 1000 हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण, जबरन इस्लाम कबूल कर करवाया जा रहा निकाह; ईशनिंदा कानून के बाद हिंदुओं पर बढ़े अत्याचार

पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण किया जाता है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि इन लड़कियों की उम्र करीब 12 से 25 साल के बीच होती है। स्थिति ये है कि पुलिस ऐसा मामलों में कार्रवाई नहीं करती।

एक दूसरे मानवाधिकार संस्था जुबली कैंपेन और ओपन डोर्स ने दावा किया है कि अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। 2024 में 10 साल और उससे ऊपर की कई लड़कियाँ का अपहरण किया गया था। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक कई लड़कियाँ ऐसी त्रासदी झेलने के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो गईं। जबकि आरोपित खुले में घूम रहा होता है। कोर्ट अक्सर ऐसे मामले में आरोपित की ये दलीलें मान लेती है कि लड़की ने अपनी मर्जी से धर्मपरिवर्तन कर निकाह किया था।

ईशनिंदा कानून का अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहा इस्तेमाल

इस इस्लामिक मुल्क में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहद खराब है। द वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने इस पर गंभीर चिंता भी जताई है। संगठन का कहना है कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून लागू होने के बाद, इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को धमकाने और हिंसा भड़काने के लिए किया जा रहा है। ‘डर की गलियाँ: 2024-25 में धर्म या आस्था की स्वतंत्रता’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी कर संगठन ने कहा है कि हिन्दुओं, ईसाईयों, अहमदियों के लिए ये ‘बेहद चिंताजनक साल’ रहा। इनके खिलाफ हिंसा में जबरदस्त बढोतरी हुई। इनके पूजा स्थलों को तोड़ा गया और टारगेट कर हत्याएँ की गई।

बच्चों के बचाव के लिए बने कानूनों का कोई मतलब नहीं

संगठन ने कहा है कि अल्पसंख्यकों का जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में निकाह जारी है। बाल विवाह निरोधक कानूनों का कोई मतलब यहाँ नहीं है। ईशनिंदा कानून आने के बाद अल्पसंख्यकों की स्थिति और दयनीय हो गई है। इस्लामी भीड़ किसी को भी इसका शिकार बना देते हैं। कोर्ट में बार एसोसिएशन भी इनका पक्ष लेता है। कट्टरपंथी सोच के खिलाफ कोई नहीं बोलता। रिपोर्ट में इस स्थिति को ‘बेहद खतरनाक’ कहा गया है। रिपोर्ट में पाकिस्तान सरकार से एक ऐसे आयोग बनाने की सिफारिश की गई है, जो अल्पसंख्यकों को फँसाने वाले मामलों की जाँच करे। रिपोर्ट में मदरसों पर भी नजर रखने पर जोर दिया गया है। ये नाबालिग लड़कियों के धर्मांतरण में शामिल हैं।

वहीं अमेरिका के ‘ सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ के अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, ईसाई, अहमदिया और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों का सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है।

2023 में नाबालिग मुस्कान बनी थी शिकार

घटना का जिक्र करते हुए कहा गया है कि मई 2023 में 14 साल की मुस्कान का मोहम्मद अदनान और उसके पिता ने अपहरण कर लिया। उसका जबरन धर्मांतरण करवा कर निकाह करवा दिया गया।2 साल बाद किसी तरह भाग गई मुस्कान ने बताया कि उसे लोहे के छड़ से पीटा जाता था। उसका एक बार गर्भपात भी इसकी वजह से हुआ। ईसाइयों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।

4 भाई-बहनों का धर्मांतरण करवाया गया

19 जून 2025 को सिंध के शाहदादपुर से 4 हिन्दू भाई-बहनों का अपहरण किया गया। इनमें सबसे बड़ी जिया 22 साल की, दूसरी दीया (20), दिशा ( 16) और गणेश कुमार (14) था। अपहरण के दो दिन बाद इनका वीडियो सामने आया। इसमें चारो नए नामों के साथ नमाज पढ़ रहे थे। परिवार का इसके बाद बुरा हाल है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि बच्चों से कैसे मिल पाएँगे?