समाजवादी पार्टी के सांसद तूफानी सरोज ने 30 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में एक ऐसा बयान दिया जिसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य हिंदू इतिहास और हिंदू धर्म को कलंकित करना है।
तूफानी सरोज ने कहा, “टीपू सुल्तान ने महिलाओं को स्तन ढंकने का अधिकार दिया था। स्तन न ढकने के लिए कानून था। ये आज से नहीं आदिकाल से है। आप देख लीजिए।”
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— India Voice UP (@IndiaVUP) April 30, 2026
सपा सांसद का यह बयान ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी तो करता ही है, पर साथ ही उस सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसमें हिंदू राजाओं और हिंदू समाज को गलत ठहराकर मुस्लिम शासकों को ‘नायक’ के रूप में जनता के सामने परोसा जा रहा है।
झूठ को चीखकर सच बताने की कोशिश
तूफानी सरोज का यह दावा आधा-अधूरा सच है जिसे इस तरह परोसा गया है कि वह पूरी तरह झूठ बन जाता है। हाँ, टीपू सुल्तान ने केरल में महिलाओं के सार्वजनिक रूप से स्तन ढंकने का आदेश दिया था। लेकिन इसे ‘अधिकार देना’ कहना ऐतिहासिक बेईमानी है। यह एक शरिया कानून से ओतप्रोत एक फरमान था, न कि कोई सामाजिक सुधार की कोशिश।
उस दौर में केरल की जलवायु और सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार, जाति-निर्विशेष महिलाएं ऊपरी वस्त्र नहीं पहनती थीं। यहाँ तक कि 17वीं सदी के डच यात्री विलियम वैन नीयूहॉफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि त्रावणकोर की स्वयं रानी उमयम्मा रानी भी केवल कमर के नीचे वस्त्र पहनती थीं, ऊपरी भाग खुला हुआ था।
यह उस क्षेत्र की स्वाभाविक और स्वीकृत सांस्कृतिक परंपरा थी। टीपू सुल्तान ने इस परंपरा को तोड़ने के लिए इस्लामी शरिया की दृष्टि से एक फरमान जारी किया। उसका मकसद कोई महिला सशक्तिकरण करना नहीं था, बल्कि उस नीति का हिस्सा था।
इस नीति के तहत वो मलाबार और कोडागु में अपने इस्लामी मूल्यों को थोपना चाहता था। तूफानी सरोज ने इस फरमान को ‘अधिकार देना’ बताकर लोगों को भ्रमित किया।
ब्रेस्ट टैक्स जैसे ‘मिथक’ को बनाया गया राजनीतिक हथियार
तूफानी सरोज और सपा के इस बयान के पीछे ‘ब्रेस्ट टैक्स‘ या ‘मुलक्करम’ का वह विवादित इतिहास है जिसे त्रावणकोर राजवंश के खिलाफ बार-बार हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। आइए इस ‘टैक्स’ की असलियत समझते हैं।
मुलक्करम का शाब्दिक अर्थ है ‘स्तन कर’, लेकिन इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग इस नाम को भ्रामक मानता है। प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक मनु पिल्लई के अनुसार, यह टैक्स महिलाओं के स्तनों से नहीं, बल्कि लिंग-आधारित जनगणना कर से जुड़ा था।
पुरुषों के कर को ‘तलक्करम’ (सिर-कर) कहा जाता था और महिलाओं के कर को ‘मुलक्करम’ (स्तन-कर) कहा जाता था। यह केवल नामकरण की परंपरा थी, टैक्स का स्तनों से कोई सीधा संबंध नहीं था। यह एक जाति-आधारित ‘पोल टैक्स’ था जो नादार, एझवा जैसे अन्य अवर्ण (निम्न जाति) के समुदायों से लिया जाता था।
इस टैक्स को लेकर नंगेली की कहानी सबसे चर्चित है। हालाँकि उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता आज भी शक के दायरे में है। कई शोधकर्ताओं ने यह स्थापित किया है कि नंगेली की कहानी का कोई समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस कहानी के सारे संदर्भ विशेषकर पिछले दो दशकों में सामने आए हैं।
विकिपीडिया के नंगेली लेख के सभी स्रोत हालिया हैं और कोई भी समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। इस कहानी को लोकप्रिय बनाने वाले एक मलयाली चित्रकार ‘चित्रकारन’ टी. मुरली हैं। उनके ब्लॉग पर हिंदू देवताओं व हिंदू संस्कृति के प्रति बेहद खराब विचार देखने को मिल सकते हैं।
यह जानना काफी जरूरी है कि ऊपरी वस्त्र पहनने का अधिकार देना और मुलक्करम लागू करना दो अलग-अलग मुद्दे थे। इन्हें प्रोपेगेंडा मीडिया चैनल और राजनेताओं ने एक नया ‘नैरेटिव’ बना दिया।
‘चन्नार विद्रोह’ (1813-1859) नादार महिलाओं के ऊपरी वस्त्र धारण करने के अधिकार के लिए था और इस संघर्ष में ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश सरकार की भूमिका थी। यह एक असल सामाजिक संघर्ष था।
इसे ‘ब्रेस्ट टैक्स’ की कहानी से जोड़कर त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक बताना इतिहास नहीं, समाजवादी पार्टी के तूफानी सरोज सरीखे नेताओं की राजनीति है।
एक और तथ्य जो इस पूरे ‘नैरेटिव’ को जड़ से उखाड़ फेंकता है वह ये कि अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप की अनेक जनजातियों में आज भी महिलाएँ ऊपरी वस्त्र धारण नहीं करतीं। यह उनकी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, न कि किसी तरह के ‘उत्पीड़न’ का प्रमाण कहा जाएगा।
केरल की 18वीं-19वीं सदी की सांस्कृतिक परंपरा भी इसी श्रेणी में थी। समाजवादी पार्टी के नेता इस तथ्य को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं क्योंकि उनका लक्ष्य तथ्य नहीं, हिंदू विरोधी प्रचार है।
सपा का ‘नायक’ टीपू सुल्तान असल में दक्षिण भारत का ‘विलेन’
अब बात करते हैं उस टीपू सुल्तान की जिसे समाजवादी पार्टी और उनके जैसे दल ‘महान सेनानी’ बताते हैं। पूरे दक्षिण भारत में खास तौर पर कर्नाटक, केरल और कोडागु की बात करें तो एक बड़ा समुदाय वहाँ आज भी टीपू सुल्तान को एक क्रूर, धार्मिक कट्टरपंथी शासक के तौर पर याद करता है।
कोडागु (कूर्ग) में टीपू सुल्तान ने कोडावा जनजाति के साथ जो अत्याचार किए, वे इतिहास में दर्ज हैं। 1788 में टीपू ने कोडागु पर आक्रमण किया और पूरे गाँव जला दिए।
उनके अपने दरबारी-जीवनीकार मीर हुसैन किरमानी के अनुसार, कुशलनगर, तलकावेरी, मदिकेरी सहित अनेक स्थानों को जलाया गया। टीपू ने स्वयं कुर्नूल के नवाब रनमस्त खान को लिखे पत्र में लिखा कि उन्होंने 40,000 कोडावा लोगों को बंदी बनाया और उन्हें इस्लाम में उठाया।
जबरन धर्मांतरित किए गए कोडावा मुसलमान आज ‘कोडव माप्ला’ कहलाते हैं और उनके कुलनाम आज भी हिंदू हैं। यही उनके धर्मांतरण की जबरन प्रकृति का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसके अलावा मालाबार में टीपू की सेना ने नायर समुदाय पर व्यापक अत्याचार किए। टीपू ने अपनी सेना को आदेश दिया था कि जिले के हर व्यक्ति को जला दिया जाए और सभी को जबरन इस्लाम में लाया जाए।
नायरों के मंदिर जलाए गए, ब्राह्मण बच्चियों को उठाया गया, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। 30,000 नायर बंदियों में से केवल कुछ सौ ही जीवित वापस आ सके।
इसके बाद बात करें कर्नाटक की तो वहाँ के मेलकोट (मेलुकोट) का इतिहास टीपू की क्रूरता का सबसे मर्मस्पर्शी प्रमाण है। दीपावली के दिन टीपू की सेना ने मंड्यम अयंगर ब्राह्मण समुदाय के 700 से 800 परिवारों को घेर लिया।
जब ये लोग मंदिर में दीपावली की पूजा के लिए एकत्र हुए थे, तब टीपू के सैनिकों ने उनका नरसंहार कर दिया। इसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। मेलकोट एक रात में उजड़ गया और भुतहा नगर बन गया। आज 200 वर्षों बाद भी मंड्यम अयंगर समुदाय दीपावली नहीं मनाता। यह उस नरसंहार का शोक है जो आज भी जीवित है।
टीपू सुल्तान सिर्फ हिंदुओं पर अत्याचार तक नहीं रुका रहा था। मंगलुरु के कैथोलिक ईसाइयों को भी उसके कहर का सामना करना पड़ा। उन दिनों केरल में ही रहने वाले फादर पॉलिनस ने अपनी किताब में लिखा कि टीपू की सेना ने हिंदुओं और ईसाइयों को हाथियों के पैरों से बाँधकर घसीटा, महिलाओं को जबरन मुसलमानों से विवाह करवाया गया और जो इस्लाम स्वीकार करने से मना किया उसे तुरंत फाँसी दी गई।
सवालों में समाजवादी पार्टी का एजेंडा
सपा सांसद तूफानी सरोज यह भूल गए कि टीपू सुल्तान ने अपने राज्य में शरिया कानून लागू किया था। उनकी सरकार का नाम ही ‘सरकार-ए-खुदादाद’ था। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है- क्या समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में भी ऐसे ही शासन की वकालत करती है?
अखिलेश यादव की पार्टी जिस टीपू सुल्तान को ‘नायक’ बता रही है, उन्होंने हिंदुओं पर शरिया थोपा, जबरन धर्मांतरण कराए, मंदिर तुड़वाए, तो क्या यही ‘समाजवाद’ है, जिसका सपना अखिलेश यादव देख रहे हैं?
यह सपा की उस परंपरा का हिस्सा है जो इतिहास के हर विवादित मुद्दे को हिंदू-विरोध की दिशा में मोड़ देती है। मुलायम सिंह यादव ने कई मौकों पर खुलकर कहा था कि उन्होंने अयोध्या में राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं और उन्हें इस बात पर गर्व है। यह वही विरासत है जिसे उनके पुत्र अखिलेश यादव और तूफानी सरोज जैसे नेता आगे ले जा रहे हैं।
वामपंथियों के दोगले तथ्यों को सामने ला रही योगी सरकार
योगी सरकार ने उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने दशकों तक दबाया। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदू सांस्कृतिक विरासत की पुनर्प्रतिष्ठा तक, यह सरकार उस इतिहास को सम्मान दे रही है जिसे सपा जैसी पार्टियाँ मिटाना चाहती हैं।
जब कोई नेता टीपू सुल्तान को ‘महिला उद्धारक’ बताता है और उसी साँस में त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को अत्याचारी सिद्ध करने की कोशिश करता है। ऐसे में ये केवल अज्ञानता नहीं, यह एक सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है। योगी सरकार इस षड्यंत्र का जवाब तथ्यों से देती है।
बंद हो झूठे नायकों की राजनीति
समाजवादी पार्टी का यह चरित्र कोई नया नहीं है। जब भी कोई मुद्दा उठता है, उनके नेता उसे हिंदू धर्म और हिंदू इतिहास के विरोध में मोड़ देते हैं। अखिलेश यादव की ‘समाजवादी’ राजनीति में बस यही बात शामिल है कि ब्रेस्ट टैक्स का विवादित और असत्यापित मिथक उठाओ, टीपू सुल्तान को उद्धारक बताओ, त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक साबित करो।
समाजवादी पार्टी के नेता पढ़े-लिखे हों या न हों लेकिन जब वे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने परोसते हैं, तो असर समाज का कई वर्गों पर पड़ता है। ऐसे में इसका सही जवाब देना जरूरी हो जाता है। उत्तर प्रदेश की जनता जागरूक है और वह इस झूठे नैरेटिव को पहचानती है।
योगी सरकार के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश उस रास्ते पर है जहाँ इतिहास का सम्मान होता है, झूठे नायकों की नहीं और यही वह फर्क है जो सपा और भाजपा के बीच की असली खाई है।















