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महिलाओं की अस्मिता पर करनी थी बात, सपा सांसद का उमड़ आया टीपू सुल्तान के लिए प्यार: छवि चमकाने के लिए ‘स्तन-कर’ पर झूठ फैलाया, जानें सच

समाजवादी पार्टी के सांसद तूफानी सरोज ने 30 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में एक ऐसा बयान दिया जिसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य हिंदू इतिहास और हिंदू धर्म को कलंकित करना है।

तूफानी सरोज ने कहा, “टीपू सुल्तान ने महिलाओं को स्तन ढंकने का अधिकार दिया था। स्तन न ढकने के लिए कानून था। ये आज से नहीं आदिकाल से है। आप देख लीजिए।”

सपा सांसद का यह बयान ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी तो करता ही है, पर साथ ही उस सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसमें हिंदू राजाओं और हिंदू समाज को गलत ठहराकर मुस्लिम शासकों को ‘नायक’ के रूप में जनता के सामने परोसा जा रहा है।

झूठ को चीखकर सच बताने की कोशिश

तूफानी सरोज का यह दावा आधा-अधूरा सच है जिसे इस तरह परोसा गया है कि वह पूरी तरह झूठ बन जाता है। हाँ, टीपू सुल्तान ने केरल में महिलाओं के सार्वजनिक रूप से स्तन ढंकने का आदेश दिया था। लेकिन इसे ‘अधिकार देना’ कहना ऐतिहासिक बेईमानी है। यह एक शरिया कानून से ओतप्रोत एक फरमान था, न कि कोई सामाजिक सुधार की कोशिश।

उस दौर में केरल की जलवायु और सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार, जाति-निर्विशेष महिलाएं ऊपरी वस्त्र नहीं पहनती थीं। यहाँ तक कि 17वीं सदी के डच यात्री विलियम वैन नीयूहॉफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि त्रावणकोर की स्वयं रानी उमयम्मा रानी भी केवल कमर के नीचे वस्त्र पहनती थीं, ऊपरी भाग खुला हुआ था।

यह उस क्षेत्र की स्वाभाविक और स्वीकृत सांस्कृतिक परंपरा थी। टीपू सुल्तान ने इस परंपरा को तोड़ने के लिए इस्लामी शरिया की दृष्टि से एक फरमान जारी किया। उसका मकसद कोई महिला सशक्तिकरण करना नहीं था, बल्कि उस नीति का हिस्सा था।

इस नीति के तहत वो मलाबार और कोडागु में अपने इस्लामी मूल्यों को थोपना चाहता था। तूफानी सरोज ने इस फरमान को ‘अधिकार देना’ बताकर लोगों को भ्रमित किया।

ब्रेस्ट टैक्स जैसे ‘मिथक’ को बनाया गया राजनीतिक हथियार

तूफानी सरोज और सपा के इस बयान के पीछे ‘ब्रेस्ट टैक्स‘ या ‘मुलक्करम’ का वह विवादित इतिहास है जिसे त्रावणकोर राजवंश के खिलाफ बार-बार हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। आइए इस ‘टैक्स’ की असलियत समझते हैं।

मुलक्करम का शाब्दिक अर्थ है ‘स्तन कर’, लेकिन इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग इस नाम को भ्रामक मानता है। प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक मनु पिल्लई के अनुसार, यह टैक्स महिलाओं के स्तनों से नहीं, बल्कि लिंग-आधारित जनगणना कर से जुड़ा था।

पुरुषों के कर को ‘तलक्करम’ (सिर-कर) कहा जाता था और महिलाओं के कर को ‘मुलक्करम’ (स्तन-कर) कहा जाता था। यह केवल नामकरण की परंपरा थी, टैक्स का स्तनों से कोई सीधा संबंध नहीं था। यह एक जाति-आधारित ‘पोल टैक्स’ था जो नादार, एझवा जैसे अन्य अवर्ण (निम्न जाति) के समुदायों से लिया जाता था।

इस टैक्स को लेकर नंगेली की कहानी सबसे चर्चित है। हालाँकि उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता आज भी शक के दायरे में है। कई शोधकर्ताओं ने यह स्थापित किया है कि नंगेली की कहानी का कोई समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस कहानी के सारे संदर्भ विशेषकर पिछले दो दशकों में सामने आए हैं।

विकिपीडिया के नंगेली लेख के सभी स्रोत हालिया हैं और कोई भी समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। इस कहानी को लोकप्रिय बनाने वाले एक मलयाली चित्रकार ‘चित्रकारन’ टी. मुरली हैं। उनके ब्लॉग पर हिंदू देवताओं व हिंदू संस्कृति के प्रति बेहद खराब विचार देखने को मिल सकते हैं।

यह जानना काफी जरूरी है कि ऊपरी वस्त्र पहनने का अधिकार देना और मुलक्करम लागू करना दो अलग-अलग मुद्दे थे। इन्हें प्रोपेगेंडा मीडिया चैनल और राजनेताओं ने एक नया ‘नैरेटिव’ बना दिया।

‘चन्नार विद्रोह’ (1813-1859) नादार महिलाओं के ऊपरी वस्त्र धारण करने के अधिकार के लिए था और इस संघर्ष में ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश सरकार की भूमिका थी। यह एक असल सामाजिक संघर्ष था।

इसे ‘ब्रेस्ट टैक्स’ की कहानी से जोड़कर त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक बताना इतिहास नहीं, समाजवादी पार्टी के तूफानी सरोज सरीखे नेताओं की राजनीति है।

एक और तथ्य जो इस पूरे ‘नैरेटिव’ को जड़ से उखाड़ फेंकता है वह ये कि अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप की अनेक जनजातियों में आज भी महिलाएँ ऊपरी वस्त्र धारण नहीं करतीं। यह उनकी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, न कि किसी तरह के ‘उत्पीड़न’ का प्रमाण कहा जाएगा।

केरल की 18वीं-19वीं सदी की सांस्कृतिक परंपरा भी इसी श्रेणी में थी। समाजवादी पार्टी के नेता इस तथ्य को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं क्योंकि उनका लक्ष्य तथ्य नहीं, हिंदू विरोधी प्रचार है।

सपा का ‘नायक’ टीपू सुल्तान असल में दक्षिण भारत का ‘विलेन’

अब बात करते हैं उस टीपू सुल्तान की जिसे समाजवादी पार्टी और उनके जैसे दल ‘महान सेनानी’ बताते हैं। पूरे दक्षिण भारत में खास तौर पर कर्नाटक, केरल और कोडागु की बात करें तो एक बड़ा समुदाय वहाँ आज भी टीपू सुल्तान को एक क्रूर, धार्मिक कट्टरपंथी शासक के तौर पर याद करता है।

कोडागु (कूर्ग) में टीपू सुल्तान ने कोडावा जनजाति के साथ जो अत्याचार किए, वे इतिहास में दर्ज हैं। 1788 में टीपू ने कोडागु पर आक्रमण किया और पूरे गाँव जला दिए।

उनके अपने दरबारी-जीवनीकार मीर हुसैन किरमानी के अनुसार, कुशलनगर, तलकावेरी, मदिकेरी सहित अनेक स्थानों को जलाया गया। टीपू ने स्वयं कुर्नूल के नवाब रनमस्त खान को लिखे पत्र में लिखा कि उन्होंने 40,000 कोडावा लोगों को बंदी बनाया और उन्हें इस्लाम में उठाया।

जबरन धर्मांतरित किए गए कोडावा मुसलमान आज ‘कोडव माप्ला’ कहलाते हैं और उनके कुलनाम आज भी हिंदू हैं। यही उनके धर्मांतरण की जबरन प्रकृति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

इसके अलावा मालाबार में टीपू की सेना ने नायर समुदाय पर व्यापक अत्याचार किए। टीपू ने अपनी सेना को आदेश दिया था कि जिले के हर व्यक्ति को जला दिया जाए और सभी को जबरन इस्लाम में लाया जाए।

नायरों के मंदिर जलाए गए, ब्राह्मण बच्चियों को उठाया गया, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। 30,000 नायर बंदियों में से केवल कुछ सौ ही जीवित वापस आ सके।

इसके बाद बात करें कर्नाटक की तो वहाँ के मेलकोट (मेलुकोट) का इतिहास टीपू की क्रूरता का सबसे मर्मस्पर्शी प्रमाण है। दीपावली के दिन टीपू की सेना ने मंड्यम अयंगर ब्राह्मण समुदाय के 700 से 800 परिवारों को घेर लिया।

जब ये लोग मंदिर में दीपावली की पूजा के लिए एकत्र हुए थे, तब टीपू के सैनिकों ने उनका नरसंहार कर दिया। इसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। मेलकोट एक रात में उजड़ गया और भुतहा नगर बन गया। आज 200 वर्षों बाद भी मंड्यम अयंगर समुदाय दीपावली नहीं मनाता। यह उस नरसंहार का शोक है जो आज भी जीवित है।

टीपू सुल्तान सिर्फ हिंदुओं पर अत्याचार तक नहीं रुका रहा था। मंगलुरु के कैथोलिक ईसाइयों को भी उसके कहर का सामना करना पड़ा। उन दिनों केरल में ही रहने वाले फादर पॉलिनस ने अपनी किताब में लिखा कि टीपू की सेना ने हिंदुओं और ईसाइयों को हाथियों के पैरों से बाँधकर घसीटा, महिलाओं को जबरन मुसलमानों से विवाह करवाया गया और जो इस्लाम स्वीकार करने से मना किया उसे तुरंत फाँसी दी गई।

सवालों में समाजवादी पार्टी का एजेंडा

सपा सांसद तूफानी सरोज यह भूल गए कि टीपू सुल्तान ने अपने राज्य में शरिया कानून लागू किया था। उनकी सरकार का नाम ही ‘सरकार-ए-खुदादाद’ था। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है- क्या समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में भी ऐसे ही शासन की वकालत करती है?

अखिलेश यादव की पार्टी जिस टीपू सुल्तान को ‘नायक’ बता रही है, उन्होंने हिंदुओं पर शरिया थोपा, जबरन धर्मांतरण कराए, मंदिर तुड़वाए, तो क्या यही ‘समाजवाद’ है, जिसका सपना अखिलेश यादव देख रहे हैं?

यह सपा की उस परंपरा का हिस्सा है जो इतिहास के हर विवादित मुद्दे को हिंदू-विरोध की दिशा में मोड़ देती है। मुलायम सिंह यादव ने कई मौकों पर खुलकर कहा था कि उन्होंने अयोध्या में राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं और उन्हें इस बात पर गर्व है। यह वही विरासत है जिसे उनके पुत्र अखिलेश यादव और तूफानी सरोज जैसे नेता आगे ले जा रहे हैं।

वामपंथियों के दोगले तथ्यों को सामने ला रही योगी सरकार

योगी सरकार ने उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने दशकों तक दबाया। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदू सांस्कृतिक विरासत की पुनर्प्रतिष्ठा तक, यह सरकार उस इतिहास को सम्मान दे रही है जिसे सपा जैसी पार्टियाँ मिटाना चाहती हैं।

जब कोई नेता टीपू सुल्तान को ‘महिला उद्धारक’ बताता है और उसी साँस में त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को अत्याचारी सिद्ध करने की कोशिश करता है। ऐसे में ये केवल अज्ञानता नहीं, यह एक सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है। योगी सरकार इस षड्यंत्र का जवाब तथ्यों से देती है।

बंद हो झूठे नायकों की राजनीति

समाजवादी पार्टी का यह चरित्र कोई नया नहीं है। जब भी कोई मुद्दा उठता है, उनके नेता उसे हिंदू धर्म और हिंदू इतिहास के विरोध में मोड़ देते हैं। अखिलेश यादव की ‘समाजवादी’ राजनीति में बस यही बात शामिल है कि ब्रेस्ट टैक्स का विवादित और असत्यापित मिथक उठाओ, टीपू सुल्तान को उद्धारक बताओ, त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक साबित करो।

समाजवादी पार्टी के नेता पढ़े-लिखे हों या न हों लेकिन जब वे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने परोसते हैं, तो असर समाज का कई वर्गों पर पड़ता है। ऐसे में इसका सही जवाब देना जरूरी हो जाता है। उत्तर प्रदेश की जनता जागरूक है और वह इस झूठे नैरेटिव को पहचानती है।

योगी सरकार के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश उस रास्ते पर है जहाँ इतिहास का सम्मान होता है, झूठे नायकों की नहीं और यही वह फर्क है जो सपा और भाजपा के बीच की असली खाई है।

बीवियों का ड्रग देकर करो रेप, लाइव स्ट्रीम करके पैसे कमाओ और सीखो पुलिस से कैसे बचना है : जानिए ‘ऑनलाइन रेप अकादमी’ नेटवर्क का काला सच, कैसे घर में ही नोची जा रही महिलाएँ?

हाल ही में अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट में इंटरनेट की एक बेहद डरावनी सच्चाई को उजागर किया गया है। कुछ गुप्त ऑनलाइन ग्रुप्स और मैसेजिंग ऐप्स पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा का एक गंदा खेल चल रहा है। यहाँ महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों को न केवल रिकॉर्ड किया जाता है, बल्कि उन्हें दूसरों के साथ शेयर भी किया जाता है और ऐसे दिखाया जाता है जैसे ये कोई सामान्य चीज हो।

यह नेटवर्क इंटरनेट पर ऐसे छिपकर चलाया जाता है, जहाँ आम यूजर की पहुँच नहीं होती। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई मामलों में ये अपराध किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि महिलाओं के अपने ही पति, पार्टनर या परिचित लोगों द्वारा किए जा रहे हैं। यानी खतरा अब घर और रिश्तों के भीतर तक पहुँच चुका है।

इन गतिविधियों को ‘स्लीप कंटेंट’, ‘गुमनाम अब्यूज नेटवर्क’ या ‘ऑनलाइन रेप कम्युनिटी’ जैसे नाम दिए गए हैं। इनका पैटर्न लगभग एक जैसा है: महिलाओं को उनकी सहमति के बिना बेहोशी या नशे की हालत में प्रताड़ित करना और उसका वीडियो बनाना।

जाँच बताती है कि इन सारे ग्रुप्स को ‘रेप अकादमी’ के अंतर्गत चिह्नित किया जाता है। जहाँ ये सब आपस में जुड़कर एक दूसरे को अपराध करने का तरीका सिखाते हैं और ये भी ट्रेनिंग देते हैं कि अपराध करने के बाद कैसे बचा जाए।

गुमनामी और तकनीक का फायदा उठाकर यह नेटवर्क अब एक वैश्विक डिजिटल अपराध तंत्र बन चुका है, जो समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।

पेलिकोट केस से नेटवर्क का खुलासा

CNN रिपोर्ट के अनुसार इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब फ्रांस के डोमिनिक पेलिकोट केस सामने आया। यह मामला सिर्फ एक व्यक्तिगत अपराध नहीं था, बल्कि उस डिजिटल नेटवर्क की ओर इशारा करता है, जहाँ अपराध को प्लानिंग के साथ अंजाम दिया जा रहा था।

डोमिनिक पेलिकोट पर आरोप था कि उसने अपनी पत्नी को लंबे समय तक नशे की हालत में रखकर उसके साथ यौन हिंसा को अंजाम दिया और इसके लिए उसने अन्य पुरुषों को भी शामिल किया। वह ऑनलाइन चैट ग्रुप्स का इस्तेमाल करता था, जिनमें वह अन्य लोगों से संपर्क कर इस अपराध की योजना बनाता था।

उसकी जानकारी के बिना नाम के एक चैट ग्रुप का जिक्र इस केस में बार-बार सामने आया, जहाँ इसी तरह की गतिविधियों पर चर्चा होती थी। जाँच में यह भी सामने आया कि पीड़िता गिज़ेल पेलिकोट को 200 से अधिक बार ऐसे अपराधों का सामना करना पड़ा।

यह मामला सामने आने के बाद दुनिया भर में यह बहस तेज हो गई कि आखिर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी गतिविधियाँ इतने लंबे समय तक बिना रोकथाम के कैसे चलती रहीं।

ऑनलाइन रेप नेटवर्क क्या होता है?

ऑनलाइन रेप नेटवर्क किसी सामान्य सोशल मीडिया ग्रुप या चैट कम्युनिटी जैसा नहीं होता। यह एक प्रकार का छुपा हुआ डिजिटल नेटवर्क होता है, जहाँ अपराधी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और अपने अनुभव, तरीके और योजनाएँ एक दूसरे से शेयर करते हैं।

इन ग्रुप्स में अक्सर इस तरह की गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं, जिसमें किसी को बेहोश करने के तरीके, दवाओं या नशे के इस्तेमाल की चर्चा, वीडियो रिकॉर्ड करने के तरीके और यहाँ तक कि अपराध के बाद सबूत मिटाने की रणनीतियाँ भी बताई जाती है।

सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह नेटवर्क नए लोगों को भी आकर्षित करता है और धीरे-धीरे उन्हें इसी तरह की सोच और व्यवहार की ओर धकेल देता है। यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि एक तरह की क्रिमिनल सोशल ट्रेनिंग जैसा वातावरण बन जाता है।

स्लीप कंटेंट क्या है और कैसे फैलता है?

स्लीप कंटेंट इंटरनेट का एक खतरनाक ट्रेंड है, जिसमें सोती हुई, बेहोश या नशे में मौजूद महिलाओं के वीडियो बनाकर ऑनलाइन शेयर किए जाते हैं। बाहर से ये वीडियो सामान्य लग सकते हैं, लेकिन असल में इनमें से कई बिना सहमति के रिकॉर्ड किए जाते हैं, जो एक गंभीर अपराध है।

इन वीडियो को छुपाने के लिए ‘नींद’, ‘बेहोश’, ‘आई चेक’ जैसे साधारण टैग्स इस्तेमाल किए जाते हैं, ताकि लोग और प्लेटफॉर्म तुरंत इसकी सच्चाई न समझ सकें। यह एक तरह की डिजिटल चाल है, जिससे गलत कंटेंट आसानी से फैलाया जाता है।

सबसे हैरानी वाली बात ये है कि इन वीडियो में महिलाएँ पूरी तरह असहाय होती हैं और उन्हें पता भी नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। इसलिए यह सिर्फ प्राइवेसी का मामला नहीं, बल्कि यौन शोषण का गंभीर रूप है।

जाँच में सामने आया है कि ऐसे हजारों वीडियो ऑनलाइन मौजूद हैं, जिन्हें लाखों बार देखा जाता है। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म और सीक्रेट ग्रुप्स के जरिए यह कंटेंट तेजी से फैलता है। धीरे-धीरे यह ट्रेंड सामान्य जैसा दिखने लगता है, जो समाज और कानून दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

ड्रग-फैसिलिटेटेड सेक्सुअल असॉल्ट (DFSA)

DFSA इस पूरे नेटवर्क का सबसे खतरनाक और छुपा हुआ रूप है। इसमें अपराधी जानबूझकर पीड़ित को ऐसी दवाएँ या नशीले पदार्थ देते हैं, जिनका मकसद उसे बेहोश या असहाय बना देना होता है। इसके बाद व्यक्ति ऐसी स्थिति में चला जाता है जहाँ उसे अपने आसपास क्या हो रहा है, इसकी कोई जानकारी नहीं होती।

इन दवाइयों का असर बहुत तेज होता है और कुछ ही मिनटों में व्यक्ति होश खो देता है। सबसे गंभीर बात यह है कि कई मामलों में पीड़िता को घटना के बाद कुछ भी याद नहीं रहता। यह मेमोरी गैप इस अपराध को और खतरनाक बना देता है, क्योंकि पीड़ित खुद भी नहीं समझ पाता कि उसके साथ क्या हुआ।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, अब अपराधी ऐसे उन्नत ड्रग्स का इस्तेमाल कर रहे हैं जो शरीर में जल्दी घुल जाते हैं और कुछ समय बाद पहचान में नहीं आते। इससे मेडिकल जाँच में सबूत मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है।

इसी वजह से DFSA मामलों में जाँच और कानूनी  कार्रवाई मुश्किल हो जाती है। कई बार सच्चाई तब सामने आती है जब कोई वीडियो या डिजिटल सबूत मिलता है, जिससे यह अपराध और भी गंभीर रूप ले लेता है।

पीड़ित महिलाओं की कहानियाँ

इस पूरे ऑनलाइन रेप नेटवर्क और ड्रग-फैसिलिटेटेड यौन अपराधों का सबसे दर्दनाक पहलू उन महिलाओं की कहानियों में छिपा है, जो इस तरह की घटनाओं की शिकार बनी वो भी उनसे जिन पर उन्हे सबसे ज्यादा भरोसा था।

ये सिर्फ आँकड़ों या केस फाइलों की बात नहीं है, बल्कि ऐसे जीवन की कहानी है जो अचानक टूट गया और कई बार पीड़ितों को सालों तक यह भी पता नहीं चला कि उनके साथ क्या हुआ था।

  • फ्रांस के गिजेल पेलिकोट केस ने इस पूरे मुद्दे को वैश्विक चर्चा में ला दिया। गिज़ेल के मामले में सामने आया कि उनके पति डोमिनिक पेलिकोट ने उन्हें लंबे समय तक नशे की हालत में रखा और अन्य पुरुषों के साथ मिलकर उनके साथ यौन हिंसा को अंजाम दिया। अदालत में गिज़ेल ने बेहद साहस के साथ अपनी बात रखी और कहा, “शर्म अपराधी के हिस्से आनी चाहिए, पीड़िता के हिस्से नहीं।” उनकी यह बात बाद में एक अंतरराष्ट्रीय प्रतीक बन गई, जो यह दिखाती है कि पीड़ितों को चुप रहने के बजाय सामने आना कितना जरूरी होता है।
  • एक और पीड़ित महिला ज़ो वाट्स (Zoe Watts) का मामला सामने आया, जो इंग्लैंड की रहने वाली हैं। उन्हें अपने पति की करतूत के बारे में लंबे समय तक कुछ भी पता नहीं चला। बाद में पति ने खुद स्वीकार किया कि वह कई सालों से उन्हें नशीला पदार्थ देकर बेहोश करता था और उनके साथ यौन हिंसा करता था, जबकि वह इस बात से पूरी तरह अनजान थीं।

    ज़ो ने बताया कि इस खुलासे के बाद उनका पूरा जीवन बिखर गया। उन्होंने कहा कि सबसे मुश्किल बात यह थी कि उन्हें यह समझने में समय लगा कि जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने अपना जीवन बिताया, वही उनके साथ इस तरह की हरकत कर रहा था। इस अनुभव ने उनके मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित किया और उन्हें लंबे समय तक ट्रॉमा और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ा।
  • ब्रिटेन की अमांडा स्टैनहोप ने भी अपने अनुभव को सार्वजनिक किया। उन्होंने बताया कि उनके साथ उनके पार्टनर ने कई सालों तक ऐसा व्यवहार किया, जिसमें उन्हें बार-बार बेहोश या आधी-बेहोशी की स्थिति में शोषण का सामना करना पड़ा। अमांडा ने कहा कि कई बार उन्हें सुबह उठने पर अपने शरीर पर चोट के निशान मिलते थे, लेकिन उन्हें समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों हुआ। बाद में जब सच्चाई सामने आई, तो उन्हें यह स्वीकार करने में बेहद कठिनाई हुई कि यह सब उनके अपने रिश्ते के भीतर हुआ। उन्होंने कहा कि इस अनुभव के बाद उन्हें हर व्यक्ति पर भरोसा करना मुश्किल लगने लगा और उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
  • इटली की एक पीड़िता, जिन्हें रिपोर्ट में वैलेंटिना के नाम से पहचाना गया। उन्होंने भी अपने अनुभव को बताया। उन्होंने बताया कि उनके पति ने उनके साथ लंबे समय तक ऐसी हरकतें कीं जिनका उन्हें कोई स्मरण नहीं था। बाद में उन्हें वीडियो फुटेज के जरिए सच्चाई का पता चला। वैलेंटिना ने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा झटका इस बात से लगा कि उनके शरीर पर कोई स्पष्ट निशान नहीं था, इसलिए उन्हें खुद भी पहले कुछ गलत होने का एहसास नहीं हुआ। उन्होंने इस अनुभव को ‘मानसिक रूप से जीवनभर का दाग’ बताया, जो कभी पूरी तरह मिटता नहीं है।

इन सभी कहानियों में एक बात कॉमन नजर आती है, पीड़ितों को अक्सर अपराध के समय कोई स्पष्ट जानकारी नहीं होती। कई बार उन्हें केवल बाद में डिजिटल सबूत, वीडियो या आरोपित के कन्फेशन के जरिए सच्चाई का पता चलता है। यह प्रक्रिया अपने आप में बेहद दर्दनाक होती है क्योंकि इसमें सिर्फ अपराध का नहीं, बल्कि विश्वास टूटने का भी सामना करना पड़ता है।

इन महिलाओं ने यह भी बताया कि इस अनुभव के बाद उनका मानसिक जीवन पूरी तरह बदल गया। चिंता, डर, अविश्वास और लगातार असुरक्षा की भावना उनके जीवन का हिस्सा बन गई। कई पीड़ितों ने कहा कि वे अब सामान्य सामाजिक स्थितियों में भी सहज महसूस नहीं कर पातीं और हर रिश्ते को संदेह की नजर से देखने लगी हैं।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका, कानूनी सीमाएँ और Coco जैसे नेटवर्क का विवाद

ऑनलाइन रेप नेटवर्क और डिजिटल यौन अपराधों के बढ़ने से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में है। कई बड़ी वेबसाइट्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स खुद को यूजर जनरेटेड कंटेंट का माध्यम बताकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन असल समस्या यही है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर बेनाम अकाउंट्स बनाना बेहद आसान है, जिससे अपराधी अपनी पहचान छुपाकर सक्रिय रहते हैं और बिना डर के ऐसे कंटेंट को फैलाते हैं।

अक्सर अवैध या आपत्तिजनक वीडियो अपलोड होने के बाद उन्हें तुरंत हटाना संभव नहीं होता, क्योंकि वे पहले ही अलग-अलग ग्रुप्स, चैनलों और लिंक के जरिए फैल चुके होते हैं। इससे एक ऐसा डिजिटल माहौल बनता है, जहाँ अपराधियों को सुरक्षा का एहसास होता है और सिस्टम कमजोर दिखाई देता है।

इस समस्या का सीधा संबंध कानून और जाँच एजेंसियों की सीमाओं से भी है। कई देशों में अभी तक DFSA जैसे जटिल अपराधों के लिए मजबूत और स्पष्ट कानूनी ढाँचा पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है। इसके अलावा पीड़ित भी अक्सर डर, शर्म और सामाजिक दबाव के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते, जिससे कई मामले सामने ही नहीं आ पाते।

जाँच प्रक्रिया भी आसान नहीं होती। DFSA में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स जल्दी शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जिससे मेडिकल और फॉरेंसिक जाँच में ठोस सबूत मिलना मुश्किल हो जाता है। नतीजतन, कई केस कमजोर पड़ जाते हैं और कोर्ट तक पहुँचने से पहले ही खत्म हो जाते हैं या लंबे समय तक लंबित रहते हैं।

फ्रांस की Coco वेबसाइट इस पूरे मामले का एक बड़ा उदाहरण है। इस प्लेटफॉर्म पर गंभीर आपराधिक गतिविधियों के आरोप लगे और इसे 2024 में बंद किया गया, लेकिन बाद में यह ‘Cocoland’ नाम से फिर सामने आ गई।

इससे यह साफ हो गया कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह खत्म करना कितना मुश्किल है, क्योंकि वे नए नाम और रूप में फिर उभर आते हैं। इस प्लेटफॉर्म का संबंध पेलिकोट जैसे बड़े मामलों से भी जोड़ा गया है।

यह स्थिति बताती है कि यह समस्या सिर्फ कुछ वेबसाइट्स तक सीमित नहीं, बल्कि एक बड़े वैश्विक डिजिटल नेटवर्क का हिस्सा है। तकनीक, गुमनामी और कमजोर निगरानी मिलकर ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहाँ अपराध को कंटेंट और हिंसा को कम्युनिटी में बदला जा रहा है।

यही इस समस्या का सबसे खतरनाक पहलू है। जो समाज, कानून और डिजिटल सिस्टम तीनों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। जहाँ हिंसा को कंटेंट और अपराध को कम्युनिटी में बदल दिया जाता है। ये आधुनिकता का सबसे खतरनाक मोड़ है।

लद्दाख में 2 नहीं अब होंगे 7 जिले, लेकिन बेकार में डर फैला रहे ओवैसी: समझिए कैसे आसान होगा लोगों का जीवन

लद्दाख के कामकाज के तरीके में एक बहुत बड़ा और अच्छा बदलाव हुआ है। यहाँ के उपराज्यपाल (LG) वीके सक्सेना ने 5 नए जिले बनाने का फैसला किया है। पहले लद्दाख में सिर्फ दो ही जिले थे ‘लेह और कारगिल’, लेकिन अब कुल 7 जिले हो जाएँगे। नए बनने वाले जिलों के नाम नुब्रा, शाम, चांगथांग, जांस्कर और द्रास हैं। ऊँचे पहाड़ों और मुश्किल रास्तों के बीच रहने वाले लोगों के लिए यह खबर किसी बड़े तोहफे से कम नहीं है।

कामकाज में आसानी और तरक्की की रफ्तार

लद्दाख जमीन के हिसाब से भारत का सबसे बड़ा इलाका है। यह करीब 87 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इतने बड़े और पहाड़ों वाले कठिन क्षेत्र को सिर्फ दो जिलों (लेह और कारगिल) के भरोसे चलाना बहुत मुश्किल काम था। अब नए जिले बनने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सरकार की पहुँच सीधे गाँवों तक हो जाएगी। सरकारी सुविधाएँ अब दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक आसानी से पहुँच सकेंगी।

अब लोगों को अपने छोटे-मोटे सरकारी कामों के लिए 300 किलोमीटर दूर लेह या कारगिल के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सरकारी दफ्तर अब उनके घर के पास होंगे, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बचेगा। साथ ही, जब नए जिलों के हेड ऑफिस बनेंगे, तो वहाँ सड़कें, स्कूल और अस्पताल भी जल्दी-जल्दी बनेंगे। यही नहीं, नए दफ्तर खुलने से स्थानीय युवाओं को सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने के नए मौके भी मिलेंगे।

पहाड़ी इलाकों और बॉर्डर के लिए क्यों है जरूरी?

लद्दाख की सीमाएँ चीन और पाकिस्तान से लगी हुई हैं, इसलिए यहाँ की सुरक्षा और मजबूती बहुत जरूरी है। नुब्रा और द्रास जैसे इलाके सेना के लिए बहुत खास हैं। द्रास के नया जिला बनने से वहाँ सेना की मदद करना आसान होगा और बिजली-पानी जैसी सुविधाएँ तेजी से बनेंगी। वहीं, चांगथांग जैसे बॉर्डर वाले इलाकों में पुरानी जनजातियों को बचाने और विकास के काम को प्राथमिकता मिलेगी।

पहाड़ों में रहना आसान नहीं होता। जब भारी बर्फबारी होती है, तो कई गाँवों का संपर्क लेह या कारगिल से टूट जाता है। ऐसे में अगर जिले का दफ्तर पास होगा, तो मुसीबत के समय मदद और बचाव का काम जल्दी हो पाएगा। जांस्कर और शाम जैसे नए जिले बनने से वहाँ की देखरेख बेहतर होगी। इससे पर्यटन (टूरिज्म) को बढ़ावा मिलेगा, नए होटल और घूमने की जगहें बनेंगी, जिससे स्थानीय लोगों की कमाई बढ़ेगी।

ओवैसी का ‘रोना’ और डर फैलाने की कोशिश

इस विकासकारी कदम पर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पुरानी राजनीति शुरू कर दी है। ओवैसी इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर डर फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार बौद्धों और मुसलमानों की एकता को तोड़ना चाहती है। उन्होंने इसे पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य में ‘गेरीमंदारिंग’ (चुनावी लाभ के लिए सीमा बदलना) करार दिया है।

ओवैसी 2011 की जनगणना के आँकड़ों का रोना रो रहे हैं। उनके अनुसार लद्दाख में 46.40% मुस्लिम और 39.65% बौद्ध आबादी है। उनका तर्क है कि 7 में से 5 जिले बौद्ध बहुल हैं और सिर्फ 2 मुस्लिम बहुल। ओवैसी का कहना है कि 46% आबादी के लिए सिर्फ 2 जिले रखना भेदभाव है। हालाँकि, सरकार का कहना है कि यह फैसला आबादी के आधार पर नहीं, बल्कि कठिन भूगोल और विकास को ध्यान में रखकर लिया गया है।

सोनम वांगचुक का डर और लोगों की माँग

सोनम वांगचुक ने भी इस पर अपनी बात रखी है। वैसे तो यहाँ के लोग काफी समय से नए जिले चाह रहे थे, लेकिन वांगचुक को एक डर सता रहा है। उन्हें लगता है कि सरकार ने नए जिले शायद इसलिए बनाए हैं ताकि लोग ‘छठी अनुसूची’ (विशेष सुरक्षा वाली माँग) की बात भूल जाएँ। उन्हें चिंता है कि अगर लद्दाख को खास सुरक्षा नहीं मिली, तो बाहर के लोग यहाँ आकर बस सकते हैं, जिससे स्थानीय लोगों की जमीन और उनकी नौकरियाँ छिन सकती हैं।

अभी लद्दाख की दो बड़ी संस्थाएँ (LAB और KDA) पिछले कई सालों से राज्य का दर्जा और नौकरियों में सुरक्षा की माँग कर रही हैं। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का कहना है कि यह फैसला लद्दाख को मजबूत बनाने के लिए लिया गया है ताकि हर इलाके का विकास हो सके। 4 मई को आने वाले चुनावी नतीजों से ठीक पहले सरकार के इस कदम को बहुत बड़ा माना जा रहा है।

DRDO तैयार, बस एक मंजूरी का इंतजार… अग्नि-6 मिसाइल का लॉन्च करीब, जानें- कैसे दुश्मन का काल बनेगी यह ICBM और क्या होंगी इसकी खासियत

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष, रूस-यूक्रेन युद्ध और तेजी से बदलती वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ टैंक और लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं रह गया है। लंबी दूरी की मिसाइलें, हाइपरसोनिक हथियार और ड्रोन अब किसी भी देश की सैन्य ताकत का सबसे अहम हिस्सा बन चुके हैं।

इसी बदलते माहौल में भारत भी अपनी सामरिक क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है। इसी कड़ी में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख डॉ समीर वी कामत ने बड़ा संकेत देते हुए कहा है कि भारत की अगली पीढ़ी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (Intercontinental Ballistic Missile) अग्नि-6 के विकास के लिए संगठन पूरी तरह तैयार है।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब केवल केंद्र सरकार की मंजूरी का इंतजार है और अनुमति मिलते ही इस परियोजना पर काम शुरू कर दिया जाएगा। डॉ कामत ने यह भी बताया कि भारत केवल अग्नि-6 ही नहीं बल्कि हाइपरसोनिक ग्लाइड और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइलों पर भी तेजी से काम कर रहा है।

उनके अनुसार, भारत की नई मिसाइल रणनीति में छोटी, मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों का संतुलित मिश्रण होगा ताकि हर तरह की सामरिक जरूरत को पूरा किया जा सके।

अग्नि-6 आखिर क्यों है इतनी खास?

अग्नि-6 को भारत की अब तक की सबसे उन्नत और सबसे लंबी दूरी तक हमला करने वाली बैलिस्टिक मिसाइल माना जा रहा है। फिलहाल भारत के पास अग्नि-5 मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 5000 किलोमीटर से अधिक है लेकिन अग्नि-6 उससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली होगी।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसकी रेंज 10,000 से 12,000 किलोमीटर तक हो सकती है जबकि हल्के पेलोड के साथ यह 14 से 16 हजार किलोमीटर तक भी पहुँच सकती है। इसका मतलब यह है कि भारत की सामरिक पहुँच एशिया से आगे यूरोप, अफ्रीका और कई अन्य हिस्सों तक आसानी से पहुँच जाएगी।

यह क्षमता भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला सकती है जिनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल यानी ICBM क्षमता मौजूद है। अग्नि-6 केवल लंबी दूरी की मिसाइल नहीं होगी बल्कि इसमें आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा जिससे इसे रोकना बेहद मुश्किल हो सकता है।

माना जा रहा है कि इसमें MIRV यानी मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल तकनीक होगी। इसका मतलब यह है कि एक ही मिसाइल कई अलग-अलग लक्ष्यों पर एक साथ हमला कर सकेगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, ये मिसाइल एक साथ कई परमाणु वारहेड ले जाने में सक्षम हो सकती है। हर वारहेड अलग दिशा में जाकर अलग लक्ष्य को निशाना बना सकेगा।

अग्नि-5 से कितनी अलग होगी नई मिसाइल?

भारत ने हाल के वर्षों में अग्नि-5 का सफल MIRV परीक्षण किया है। इससे साफ है कि देश अब उन्नत परमाणु प्रतिरोध क्षमता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन अग्नि-6 को अग्नि-5 से भी ज्यादा आधुनिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें नई पीढ़ी की गाइडेंस प्रणाली, बेहतर नेविगेशन तकनीक और लक्ष्य भेदने की अधिक सटीक क्षमता होगी।

इसके अलावा इसमें मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV तकनीक का उपयोग भी किया जा सकता है। यह तकनीक मिसाइल को वातावरण में दोबारा प्रवेश करने के बाद दिशा बदलने की क्षमता देती है। इससे दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोकना और भी कठिन हो जाता है।

बताया जा रहा है कि अग्नि-6 में रडार से बचने वाली विशेष कोटिंग और डिकॉय सिस्टम भी लगाए जा सकते हैं। डिकॉय यानी नकली लक्ष्य ऐसे उपकरण होते हैं जो दुश्मन के रडार को भ्रमित करते हैं। इससे वास्तविक वारहेड को रोकना मुश्किल हो जाता है। मिसाइल की गति भी बेहद खतरनाक मानी जा रही है।

अनुमान है कि यह लगभग 30 हजार किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार हासिल कर सकती है। इतनी तेज गति के कारण लक्ष्य को बचाव का बहुत कम समय मिलेगा।

भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल योजना कितनी आगे पहुँची?

DRDO प्रमुख समीर कामत ने केवल अग्नि-6 की ही चर्चा नहीं की, बल्कि भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल परियोजनाओं को लेकर भी अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत इस समय हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल और हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल दो प्रकार की हाइपरसोनिक प्रणालियों पर काम कर रहा है।

कामत के अनुसार, फिलहाल ग्लाइड मिसाइल कार्यक्रम ज्यादा उन्नत स्थिति में है और इसका परीक्षण जल्द हो सकता है। यह मिसाइल शुरुआत में एक बूस्टर की मदद से अत्यधिक गति प्राप्त करती है और फिर बिना इंजन के हवा में ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुँचती है।

दूसरी तरफ हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल स्क्रैमजेट इंजन की मदद से पूरी उड़ान के दौरान शक्ति प्राप्त करती रहती है। दोनों प्रणालियाँ ध्वनि की गति से कई गुना तेज रफ्तार से उड़ान भर सकती हैं। भारत का LR-AShM यानी लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

यह मिसाइल विशेष रूप से नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। इसकी संभावित गति मैक-10 तक हो सकती है, यानी ध्वनि की गति से लगभग 10 गुना तेज। इसकी रफ्तार लगभग 12 हजार किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुँच सकती है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम ऊँचाई पर उड़ान भरते हुए रास्ते में दिशा बदल सकती है। इससे दुश्मन के रडार सिस्टम के लिए इसे पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है।

कैसी होगी भारत की नई मिसाइल फोर्स?

भारत अब केवल परमाणु प्रतिरोध तक सीमित नहीं रहना चाहता बल्कि पारंपरिक मिसाइल ताकत को भी नई दिशा देने की तैयारी में है। DRDO प्रमुख ने संकेत दिया कि भविष्य में भारत की ‘कन्वेंशनल मिसाइल फोर्स’ में अलग-अलग दूरी और भूमिकाओं के लिए कई प्रकार की मिसाइलें शामिल होंगी।

इसमें कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, मध्यम दूरी की मिसाइलें, लंबी दूरी की प्रणालियाँ, क्रूज मिसाइलें और हाइपरसोनिक हथियार शामिल किए जा सकते हैं। प्रलय जैसी शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें अब अंतिम परीक्षण चरण में हैं और जल्द सेना में शामिल हो सकती हैं।

इसके अलावा कुछ मौजूदा रणनीतिक मिसाइलों को सामरिक उपयोग के लिए भी बदला जा सकता है। भारत की यह रणनीति एक मल्टी-लेयर्ड यानी बहुस्तरीय मिसाइल नेटवर्क तैयार करने की है, जिसमें हर परिस्थिति के लिए अलग विकल्प मौजूद हों। इससे किसी भी संभावित संघर्ष की स्थिति में भारत की जवाबी क्षमता और अधिक मजबूत होगी।

भारत की सामरिक ताकत को मिलेगा नया आयाम

अग्नि-6 केवल एक नई मिसाइल परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती सामरिक सोच का प्रतीक भी है। दुनिया तेजी से ऐसी सैन्य प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है जहाँ लंबी दूरी तक तेज और सटीक हमला करने की क्षमता सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।

अगर केंद्र सरकार इस परियोजना को मंजूरी देती है तो भारत की सामरिक क्षमता में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अग्नि-6, हाइपरसोनिक हथियारों और नई मिसाइल फोर्स के साथ भारत उन देशों की कतार में और मजबूती से खड़ा होगा जिनकी सैन्य तकनीक वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालती है।

द टिमोथी इनिशिएटिव: ‘बुरी आत्माओं और हिंदू देवी-देवताओं से सुरक्षा की प्रार्थना’, जानें- हिंदू गाँवों में प्रवेश और विरोध से बचने की TTI की रणनीति

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नाम के एक संगठन से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, सिर्फ 6 महीनों में TTI ने विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए अलग-अलग राज्यों से करीब 95 करोड़ रुपए निकाले। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए नक्सल प्रभावित रहे झारखंड से निकाले गए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान TTI ने FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को दरकिनार किया। खास बात यह है कि यह संगठन FCRA के तहत रजिस्टर्ड भी नहीं है।

ऑपइंडिया खबरों की एक सीरीज कर रहा है कि TTI कैसे काम करता है। अपनी रिसर्च के दौरान ऑपइंडिया को पता चला कि TTI ने 10 किताबें प्रकाशित की हैं जिन्हें उसके सदस्य हिंदुओं और अन्य समुदायों के लोगों का धर्म परिवर्तन कराने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इनमें से 9 किताबों में किसी धर्म का सीधा जिक्र नहीं है लेकिन 10वीं किताब में ‘चर्च प्लांटिंग लीडर्स’ (यानी नए चर्च स्थापित करने वाले नेताओं) के लिए एक ट्रेनिंग गाइड दी गई है। इसमें बताया गया है कि हिंदुओं के पास कैसे पहुँचना है, हिंदू बहुल गाँवों में कैसे प्रवेश करना है और लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए कैसे तैयार करना है।

इस किताब के तीसरे अध्याय का शीर्षक ‘वर्ल्ड रिलिजन्स एंड कल्ट्स’ है। इसमें चर्च से जुड़े लोगों को कहा गया है कि वे अलग-अलग धर्मों को ‘स्क्रिप्चर्स’ (धार्मिक ग्रंथों) के आधार पर परखें। किताब में ऐसे सुझाव भी दिए गए हैं कि कैसे बातचीत के जरिए हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर लाया जाए। यह समझना जरूरी है कि इस किताब में हिंदू धर्म को खास तौर पर मुख्य लक्ष्य के रूप में पेश किया गया है। इसमें हिंदू धर्म के बारे में जानकारी किसी अकादमिक या निष्पक्ष तुलना के रूप में नहीं दी गई है बल्कि इसे एक व्यावहारिक गाइड की तरह लिखा गया है। इसका मकसद हिंदुओं के बीच जाकर मिशनरी काम को आगे बढ़ाना है।

हिंदू गाँवों को धर्मांतरण के लिए कैसे टारगेट करता है TTI

यह किताब हिंदुओं की मूल आस्थाओं को निशाना बनाने की योजना बताती है जिसमें अनेक देवी-देवताओं के अस्तित्व पर भी निशाना साधा गया है। यह किताब यह विचार फैलाती है कि हिंदुओं के सामने ईसा मसीह को एक अवतार के रूप में पेश किया जाए क्योंकि इससे हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए राजी करना आसान हो जाता है। इसके अलावा, किताब में यह भी कहा गया है कि पाप को नैतिक विद्रोह नहीं बल्कि अज्ञान बताया जाए और कर्म व पुनर्जन्म के सिद्धांतों को इस तरह से समझाया जाए कि हिंदू धीरे-धीरे अपनी खुद की मान्यताओं से दूर होने लगें।

किताब यह भी स्पष्ट रूप से बताती है कि ‘एक हिंदू का अंतिम लक्ष्य’ कर्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति पाना है। साथ ही यह हिंदू धर्मग्रंथों को एक लंबी परंपरा के रूप में प्रस्तुत करती है जिसका केंद्र वेद, उपनिषद और भगवद्गीता हैं। लेकिन यह विवरण केवल शुरुआती हिस्सा है। इसके तुरंत बाद किताब में एक अलग भाग शुरू होता है जिसका शीर्षक है- ‘माफी संबंधी जवाब और धर्म प्रचार के सुझाव’ (Apologetic Responses and Witnessing Suggestions)। इससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि किताब का मकसद केवल हिंदू धर्म को समझाना नहीं बल्कि उसमें दखल देना है।

फोटो साभार: TTI

इस किताब की बनावट भी बहुत अहम है यह सिर्फ यह नहीं बताती कि हिंदू क्या मानते हैं, बल्कि यह भी बताती है कि मिशनरियों को उनके विश्वासों का जवाब कैसे देना चाहिए। सीधे शब्दों में कहें तो हिंदू समुदायों को मिशन की जमीन माना गया है और हिंदू आस्था को एक ऐसा क्षेत्र, जिस पर तर्क, समझाने-बुझाने और सोची-समझी रणनीति से काम किया जाए। यह केवल धर्मशास्त्र नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन कराने की एक रणनीतिक गाइड है।

‘प्रवेश से पहले प्रार्थना करो’- हिंदू देवी-देवताओं और स्थानीय मान्यताओं को राक्षसी रूप देना

इस किताब का सबसे आपत्तिजनक हिस्सा वह है जहाँ यह हिंदू आस्थाओं और देवी-देवताओं को दानवी या शैतानी बताती है। किताब में लिखा है, “यह समझो कि अधिकतर हिंदू गाँव बुरी आत्माओं के कब्जे में हैं या किसी हिंदू भगवान की निगरानी में हैं।” इसके बाद किताब यह भी जोड़ती है, “मिशन से जुड़े लोग इसे ‘टेरिटोरियल स्पिरिट’ यानी क्षेत्रीय आत्मा कहते हैं, एक ऐसी शक्ति जिसका असर केवल उसी खास गाँव तक सीमित होता है।” इसके बाद किताब में सीधा निर्देश दिया गया है, “जब भी गाँव में जाओ तो प्रार्थना करो कि पवित्र आत्मा (Holy Spirit) तुम्हें सुरक्षा और शक्ति दे ताकि बुरी आत्माएँ जो भी बाधा डालने की कोशिश करें, उन्हें दूर किया जा सके।”

यह सिर्फ शब्दों का सामान्य इस्तेमाल नहीं है। इस तरह की भाषा से हिंदू गांवों को सिर्फ अलग सोच वाले लोगों की जगह नहीं बल्कि एक ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ नकारात्मक या अँधेरी शक्तियों का प्रभाव है। खास बात यह है कि ‘बुरी आत्माओं’ और ‘हिंदू भगवानओं’ को एक ही तरह से दिखाया गया है जिसका साफ मतलब है कि उनके लिए हिंदू देवी-देवता ‘राक्षसी शक्तियाँ’ हैं। गाँव को ऐसे स्थान के रूप में दिखाया गया है, जहाँ किसी अलौकिक ताकत का नियंत्रण है और मिशनरी को वहाँ काम शुरू करने से पहले उससे निपटना होगा।

यह सिर्फ इस किताब या TTI तक सीमित नहीं है। कई कट्टर ईसाई और धर्म प्रचारक भी हिंदू देवी-देवताओं को ‘दानव’ बताते हैं। खासकर माँ काली और भगवान शिव के मामले में। यही रवैया कुछ तथाकथित नास्तिकों, पूर्व मुसलमानों और इस्लामवादियों में भी देखने को मिलता है। सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्टें आम हैं जिनमें ईसाई माँ काली को ‘डेमन’ बताते हैं। ये पोस्ट अक्सर प्लेटफॉर्म से हटाए भी नहीं जाते जबकि इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं।

माँ काली को निशाना बनाने वाली अक्टूबर 2025 की एक सोशल मीडिया पोस्ट (साभार: X)

गाँवों में बिना शक पैदा किए घुसने की स्टेप-बाय-स्टेप रणनीति

किताब में साफ लिखा है कि हिंदू बहुल गाँवों में मिशनरियों को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है और उन पर जबरन धर्मांतरण के आरोप लगते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि ‘कई बार जिन लोगों तक आप पहुँचते हैं, वे पढ़-लिख नहीं पाते’। इसके बाद किताब चेतावनी देती है, “कई जगहों पर बाइबिल साथ रखना या ‘जीसस फिल्म’ दिखाना शक पैदा कर सकता है या परेशानी खड़ी कर सकता है’।”

इससे साफ होता है कि TTI से जुड़े लोग यह समझते हैं कि खुले तौर पर ईसाई प्रचार (proselytisation) हर जगह स्वीकार नहीं किया जाता और अगर वे अपने मिशन से जुड़े साधनों को खुले में इस्तेमाल करेंगे तो लोगों में शक या विरोध पैदा हो सकता है।

इस शक को देखते हुए अपने तरीके पर पुनर्विचार करने के बजाय किताब एक दूसरी रणनीति बताती है। इसमें मिशनरियों से कहा गया है कि वे ‘धार्मिक शास्त्रों को याद करें ताकि वे ईश्वर के वचन में मजबूत हो सकें’ और सीधे किताब या फिल्म दिखाने के बजाय बातों के जरिए आगे बढ़ें। सीधे शब्दों में कहें तो, यहाँ सवाल यह नहीं है कि विरोध वाले माहौल में जाना सही है या नहीं बल्कि यह है कि वहाँ कैसे इस तरह काम किया जाए कि कम से कम शक पैदा हो और कम सवाल उठें।

सीधे प्रचार की बजाय सुविधाजनक तरीके: गीत, संबंध बनाना और धीरे-धीरे संदेश देना

किताब में मिशनरियों को यह सलाह दी गई है कि वे ‘अपने दिल और दिमाग में ईश्वर के वचन के साथ प्रचार करें, बाइबल की कहानियाँ सुनाएँ, धर्मग्रंथ के वाक्य बोलें, गाने गाएँ और उनके साथ प्रार्थना करें’। यह साफ तौर पर एक ऐसे तरीके की ओर इशारा करता है जिसमें धार्मिक संदेश को सीधे और खुलकर न रखकर नरम और अप्रत्यक्ष तरीकों से पहुँचाया जाता है। यानी बाइबिल हाथ में लेकर प्रचार करने या फिल्म दिखाने के बजाय कहानियों, गीतों, प्रार्थना और याद किए गए धार्मिक अंशों के जरिए लोगों से जुड़ने की बात कही गई है।

किताब में दिए गए निर्देश दिखाते हैं कि यह रणनीति बहुत सोच-समझकर बनाई गई है। गीत और कहानियाँ सिर्फ इसलिए नहीं सुझाई गई हैं कि वे सांस्कृतिक रूप से सहज या भावनात्मक रूप से जुड़ाव बनाने वाली होती हैं बल्कि इसलिए भी कि सीधे ईसाई सामग्री ले जाना शक पैदा कर सकता है। इस वजह से यह तरीका एक रणनीतिक बदलाव बन जाता है। असल में यह किताब मिशनरियों को यह सिखा रही है कि जब सीधा प्रचार विरोध का सामना करे, तो धीरे-धीरे संदेश देने और लोगों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने का रास्ता अपनाओ।

हिंदू मान्यताओं का खंडन: कर्म, पुनर्जन्म और मूल दर्शन पर निशाना

यह मैनुअल इस मामले में भी बिल्कुल स्पष्ट है कि मिशनरियों को हिंदुओं की आस्था को किस तरह चुनौती देनी है। इसमें कर्म (karma) को एक ऐसे सिस्टम के रूप में समझाया गया है जिसमें कर्म का फल कई जन्मों तक मिलता हैं। इसके बाद इसमें यह तीखी टिप्पणी जोड़ी गई है कि ‘कर्म में माफी की कोई गुंजाइश नहीं है’। कर्म की यही व्याख्या मिशनरियों के लिए संदेश बन जाती है। पुस्तक में कहा गया है कि ईसाई धर्म के अनुसार ईसा मसीह लोगों को ‘शर्म, अपराधबोध और कर्म के कर्ज’ से मुक्त करते हैं।

साभार: TTI

इसके बाद मिशनरियों को निर्देश दिया गया है कि वे इसके विपरीत तर्क दें यानी यह समझाएँ कि पाप ‘निजी’ होता है और यह सिर्फ अज्ञानता नहीं बल्कि ‘आज्ञा का उल्लंघन’ है। इंसान की असली समस्या ‘ईश्वर के साथ टूटा हुआ रिश्ता’ है। इसके बाद अगला कदम बताया गया है कि ईसा मसीह के माध्यम से स्वीकारोक्ति और क्षमा को ही एकमात्र समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यह केवल धर्मों की सामान्य तुलना नहीं है। बल्कि इसमें साफ तौर पर यह दिखता है कि उद्देश्य हिंदू दर्शन की मूल अवधारणाओं को चुनौती देकर उन्हें बदलना है और उनकी जगह ईसाई विचारधारा को स्थापित करना है।

धार्मिक शिक्षा से लेकर धर्मांतरण के संगठित खेल तक

सीधे शब्दों में कहें तो यह किताब और इसमें भी खास तौर पर हिंदू धर्म से जुड़े इसके हिस्से एक ऐसी सोची-समझी योजना की ओर इशारा करते हैं जिसे केवल ईसाई धर्म का प्रचार भर नहीं कहा जा सकता। जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को तैयार किया गया है, उससे साफ पता चलता है कि ‘TTI’ का मकसद अपना काम इस तरह करना है कि वे कानून की नजर में न आएँ और न ही पुलिस के हत्थे चढ़ें।

इन बातों के नतीजे काफी गंभीर हो सकते हैं। यह सिर्फ निजी आस्था का मामला नहीं है बल्कि TTI ने बाकायदा एक ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार किया है जिसमें हिंदू समुदायों को धर्मांतरण के ‘मैदान’ की तरह देखा जाता है। वे हिंदुओं के पवित्र स्थानों और आस्थाओं को आध्यात्मिक रूप से ‘अशुद्ध’ बताते हैं। यह किताब मिशनरियों को सिखाती है कि कैसे लोगों के बीच घुलना-मिलना है, उन्हें अपनी बातों में फँसाना है और किसी को शक न होने पाए, इसका ध्यान कैसे रखना है।

TTI की शुरुआत साल 2007 में हुई थी। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स पहली बार 1992 के आसपास भारत आए थे और तब से वे कई बार यहाँ आ चुके हैं। अब उनका बेटा जैरेड नेल्म्स इस संस्था का अध्यक्ष है और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत में चर्च बनाने और ज्यादा से ज्यादा हिंदुओं का ईसाई धर्म में धर्मांतरण कराने के मिशन में जुटा है।

इस सीरीज के आने वाले हिस्सों में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि यह संस्था कैसे काम करती है और हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के लिए यह अलग-अलग राज्यों में दूसरे मिशनरी कार्यक्रमों के साथ कैसे जुड़ती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

एलियंस और इलुमिनाटी में विश्वास करने वाले ‘अहमदी रिलिजन’ की कहानी, जिसके HQ पर इंग्लैंड में पड़ा छापा: दास बनाने और यौन अपराधों को लेकर 9 गिरफ्तार

इंग्लैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बुधवार (29 अप्रैल 2026) की सुबह बड़ी पुलिस कार्रवाई हुई जिसमें 500 से अधिक पुलिस अफसरों ने ‘अहमदी रिलिजन ऑफ पीस एंड लाइट’ (AROPL) नामक मजहबी संगठन के ठिकानों पर एकसाथ छापेमारी की। पुलिस ने तीन अलग-अलग जगहों पर वारंट के तहत तलाशी ली जिसमें चेशायर के क्रू शहर स्थित संगठन का मुख्यालय भी शामिल था।

यह मुख्यालय ‘वेब हाउस’ नाम की एक पुरानी अनाथालय की इमारत में है जो ग्रेड-II सूचीबद्ध ऐतिहासिक इमारत है। छापेमारी के दौरान कम से कम सात वैन और दर्जनों अफसर मौके पर मौजूद थे। गंभीरत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इस दौरान ऊपर से पुलिस का हेलीकॉप्टर भी मंडरा रहा था। इस बीच संगठन के सदस्य काली बीनी टोपियाँ पहने बाहर सड़क पर खड़े नजर आए।

किसे और क्यों गिरफ्तार किया गया?

इस पूरी कार्रवाई में 6 पुरुष और 3 महिलाओं समेत कुल नौ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार लोगों में दो अमेरिकी पुरुष और एक अमेरिकी महिला, दो मैक्सिकन पुरुष, एक इतालवी महिला, एक स्पेनिश पुरुष, एक स्वीडिश महिला और एक मिस्री पुरुष शामिल हैं। यानी यह संगठन पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप का है।

चेशायर पुलिस के अनुसार, इन सभी गिरफ्तारियों की वजह एक महिला की शिकायत है जो कभी इस संगठन की सदस्य थी। उस महिला ने मार्च 2026 में पुलिस से संपर्क करके बताया कि साल 2023 में उसके साथ गंभीर यौन अपराध, जबरन विवाह और आधुनिक दासता जैसे अपराध किए गए। पुलिस ने बताया कि यह सभी गिरफ्तारियाँ उसी महिला की शिकायत से जुड़ी हैं।

पुलिस का बयान और संगठन की प्रतिक्रिया

चेशायर कांस्टेबुलरी के मुख्य अधीक्षक गैरेथ रिगले ने कहा कि यह कार्रवाई एक विस्तृत और ठोस जाँच के बाद की गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह किसी मजहब की जाँच नहीं है बल्कि उन गंभीर आरोपों की जाँच है जो पुलिस को बताए गए हैं।

उन्होंने आम नागरिकों को भरोसा दिलाया कि इस मामले से व्यापक समुदाय को कोई खतरा नहीं है और स्थानीय लोगों को आश्वस्त करने के लिए गश्त बढ़ा दी गई है। दूसरी तरफ AROPL संगठन ने मीडिया के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। हालाँकि, संगठन के वकीलों ने ‘द गार्जियन’ अखबार को बताया कि उनका मुवक्किल किसी भी गलत काम से पूरी तरह इनकार करता है।

कौन है यह संगठन और इसका इतिहास

अहमदी मजहब: शांति और प्रकाश (AROPL) एक नया मजहबी आंदोलन है जिसकी जड़ें शिया इस्लाम (खास तौर पर बारह इमामों को मानने वाले) से जुड़ी हैं। इस संगठन के लोग भी शिया मुसलमानों की तरह मानते हैं कि बारहवें इमाम (मुहम्मद अल-महदी) की मृत्यु नहीं हुई है। उनका विश्वास है कि वे ‘ओकल्टेशन’ यानी छुपी हुई अवस्था में हैं और आखिरी समय यानी कयामत के दौर में वापस आएँगे।

Religion Media Centre के मुताबिक, AROPL की मान्यता इससे आगे जाती है। इनके अनुसार, अब वही आखिरी समय आ चुका है और बारहवें इमाम पहले ही वापस आ चुके हैं। इस आंदोलन की किताबों में कहा गया है कि यही वह नया मजहब है जिसके बारे में पैगंबर मुहम्मद के परिवार ने पहले से भविष्यवाणी की थी। AROPL खुद को एकमात्र सच्चा और पूरी दुनिया के लिए बना धर्म मानता है और इसके अनुयायी खुद को ईश्वर द्वारा चुना हुआ मानते हैं।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि AROPL का पाकिस्तान में मौजूद अहमदिया मुस्लिम कम्युनिटी या भारत के अहमदियों से कोई संबंध नहीं है। दोनों पूरी तरह अलग संगठन हैं। इस संगठन की शुरुआत इराक में हुई थी और अब यह करीब 40 देशों में सक्रिय है। अनुमान है कि लगभग 7,000 लोग इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं या इसके संपर्क में आ चुके हैं। 2018 में इसका मुख्यालय स्वीडन में था लेकिन 2021 से इसे इंग्लैंड में स्थानांतरित कर दिया गया।

कैसे शुरू हुआ यह आंदोलन?

AROPL की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में बसरा (इराक) से हुई। सन् 1999 में इसके संस्थापक अहमद अल-हसन ने यह दावा किया कि उनकी मुलाकात बारहवें इमाम मुहम्मद अल-महदी से हुई है और इमाम ने उन्हें एक विशेष मजहबी मिशन सौंपा है। इसी के बाद से इस आंदोलन की नींव पड़ी और धीरे-धीरे लोग उनके आसपास जुड़ने लगे।

अहमद अल-हसन को उनके अनुयायियों ने ‘यमानी’ मानना शुरू कर दिया। शिया मान्यता के अनुसार ‘यमानी’ वह व्यक्ति होता है जो महदी के आने से पहले लोगों को तैयार करता है और उन्हें एकजुट करता है ताकि वे महदी का स्वागत कर सकें। सन् 2002 आते-आते अहमद अल-हसन ने दूसरी शिया संस्थाओं पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्होंने ईरान और इराक के शिया संस्थानों को भ्रष्ट बताया। इसके बाद वे अचानक सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। आखिरी बार उन्हें 2007 में इराक में देखा गया था और उसके बाद से उनका कोई स्पष्ट सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है।

उनके गायब होने के बाद उनके अनुयायी एकजुट नहीं रह सके और कई अलग-अलग गुटों में बँट गए। समय के साथ 2015 के बाद AROPL सबसे बड़ा गुट बनकर सामने आया जिसे ‘ब्लैक बैनर्स ऑफ द ईस्ट’ भी कहा जाता है। एक दूसरा गुट ‘व्हाइट बैनर्स’ या ‘नजफ का दफ्तर’ के नाम से जाना जाता है। इन दोनों गुटों के बीच गहरे मतभेद हैं, जहाँ AROPL का आरोप है कि दूसरा गुट इराकी सरकार के प्रभाव में है जबकि ‘व्हाइट बैनर्स’ AROPL को ही मजहब से बाहर मानते हैं।

इन सब के बीच AROPL का नेतृत्व अब अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक के हाथ में है। हाशम का जन्म अमेरिका में 1983 में हुआ था। उन्होंने 2015 में यह दावा किया कि अहमद अल-हसन ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी है कि वे दुनिया को बताएँ कि महदी के प्रकट होने का समय आ चुका है। AROPL में उन्हें ‘काइम’ कहा जाता है। ‘काइम’ का मतलब होता है वह व्यक्ति जो ईश्वर के आदेश पर खड़ा होता है और उसे आगे बढ़ाता है। हाशम का दावा है कि वे चाँद को गायब कर सकते हैं और घातक बीमारियाँ ठीक कर सकते हैं। हाशम पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार थे जो UFO आधारित धर्म ‘रायलिज्म’ पर काम कर चुके थे।

यह आंदोलन अपने दावों के समर्थन में एक दस्तावेज का भी हवाला देता है जिसे पैगंबर मुहम्मद की ‘वसीयत’ कहा जाता है। इस दस्तावेज के अस्तित्व को सुन्नी मुसलमान स्वीकार नहीं करते लेकिन AROPL के अनुसार इसमें 12 इमामों और 12 महदियों के नाम लिखे हुए हैं। उनके मुताबिक, पहले दो महदियों के नाम ‘अहमद’ और ‘अब्दुल्लाह’ हैं जिन्हें वे अहमद अल-हसन और अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक से जोड़ते हैं।

अहमद अल-हसन (फोटो साभार: The Ahmadi Religion)

एलियंस और इलुमिनाटी जैसी मान्यताएँ

AROPL के सदस्य अपनी मान्यताओं का आधार ‘The Goal of the Wise: The Gospel of the Riser of the Family of Mohammed’ नामक किताब को मानते हैं। यह किताब 2022 में प्रकाशित हुई थी और इसमें अब्दुल्लाह हाशम अबा अल-सादिक की शिक्षाएँ और उनके ‘रहस्योद्घाटन’ (revelations) लिखे हैं। उनके अनुसार, इनमें से कई बातें उन्हें अहमद अल-हसन ने सिखाईं हैं।

इस आंदोलन की एक बड़ी मान्यता “सात वाचाओं” की है। इनके अनुसार ईश्वर ने समय-समय पर सात अलग-अलग लोगों के साथ समझौते (वाचा) किए- आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा, मुहम्मद और अहमद अल-हसन। उनका कहना है कि हर नई वाचा पिछली से बेहतर होती गई क्योंकि इंसानों ने पुरानी वाचाओं को तोड़ा जिसके बाद सजा मिली और फिर नई वाचा आई।

इस आंदोलन में कुछ रहस्यमय मान्यताएँ भी हैं। इसमें सपनों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उनके अनुसार सपनों के जरिए भविष्य की झलक, ईश्वर के संदेश या चेतावनियाँ मिल सकती हैं। सपनों की सही व्याख्या करना वे ईश्वर के दूत की पहचान मानते हैं।

इसके अलावा, AROPL के सदस्य पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। वे मानते हैं कि शिया विचार ‘रजआ’ (जिसमें महदी के आने के बाद कुछ मृत लोग वापस जीवित होते हैं) और पुनर्जन्म असल में एक ही बात है। उनका यह भी मानना है कि कई लोग असल में पुराने पैगंबरों के आध्यात्मिक रूप में दोबारा जन्म लेते हैं।

कुछ मान्यताएँ ऐसी भी हैं जिन्हें आम तौर पर षड्यंत्र सिद्धांत माना जाता है। AROPL के अनुसार, इंसान की शुरुआत आदम से हुई और विकासवाद का सिद्धांत इबलीस ने फैलाया। वे यह भी मानते हैं कि धरती पर ऐसे प्राणी मौजूद हैं जो इंसान और एलियन का मिश्रण हैं और अपना रूप बदल सकते हैं। इसी तरह ‘हयतान’ नाम की एक वानर जैसी प्रजाति के होने का भी दावा किया जाता है।

उनकी एक और मान्यता यह है कि जॉर्ज वॉशिंगटन असल में एडम वाइशाउप्ट थे जिन्हें इलुमिनाटी का संस्थापक माना जाता है और आज भी अमेरिकी सरकार पर उसी गुप्त संगठन का नियंत्रण है। वे कहते हैं कि अमेरिकी नोट और विज्ञापनों में दिखने वाली ‘एक आँख’ इसी का प्रतीक है। आर्थिक व्यवस्था को लेकर भी उनका अलग नजरिया है। AROPL के अनुसार, आज की मुद्रा प्रणाली एक धोखा है और जब उनका ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा तो पैसे की जरूरत खत्म हो जाएगी। उस व्यवस्था में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा और अपनी जरूरत के अनुसार चीजें पाएगा।

भविष्य के राज की कल्पना

AROPL के अनुसार, अब सातवीं वाचा के बाद एक ‘दिव्य न्यायपूर्ण राज्य’ बनेगा और यही इस आंदोलन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। उनका मानना है कि इस राज्य में दुनिया के सभी धर्म एक हो जाएँगे और वहाँ एक ईश्वर द्वारा चुना गया राजा शासन करेगा, न कि लोकतंत्र। हालाँकि, वे लोकतंत्र को सही व्यवस्था नहीं मानते फिर भी चुनी हुई सरकारों का सम्मान करते हैं और उन्हें गिराने की कोशिश नहीं करते।

इस राज्य की कल्पना प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक The Republic में बताए गए आदर्श राज्य जैसी बताई जाती है, जहाँ ‘दार्शनिक राजा’ शासन करता है। AROPL के अनुसार, यह भूमिका मुहम्मद अल-महदी निभाएँगे। उनका यह भी मानना है कि यह राज्य पहले दुनिया के किसी एक हिस्से में बनेगा और धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल जाएगा। इसके लिए इराक, मिस्र, तुर्की, जर्मनी और स्वीडन को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस राज्य की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी बताई जाती है क्योंकि इसे वे सबसे आसान भाषा मानते हैं। ब्रिटेन में रहने वाले उनके अनुयायी इसी आने वाले राज्य की तैयारी के रूप में जीवन जीते हैं।

मुख्य इस्लाम से कैसे अलग हैं परंपराएँ

AROPL खुद को बाकी इस्लामी परंपराओं से काफी अलग मानता है। उनका दावा है कि लगभग हर मजहब यहाँ तक कि इस्लाम भी 99% तक गलत हो चुका है। वे खुद को ‘सच्चा इस्लाम’ और एक सार्वभौमिक मजहब बताते हैं।

इसी वजह से वे यह भी कहते हैं कि कुरान समय के साथ बदल (भ्रष्ट) हो गई है जो कि मुख्यधारा मुस्लिम मान्यताओं से बिल्कुल अलग बात है। AROPL की एक और अलग मान्यता काबा को लेकर है। जहाँ पूरी मुस्लिम दुनिया काबा (मक्का, सऊदी अरब) को सबसे पवित्र स्थल मानती है तो वहीं AROPL का मानना है कि असली काबा पेट्रा (जॉर्डन) में है।

उनकी धार्मिक प्रथाएँ भी अलग हैं। जहाँ इस्लाम में दिन में पाँच वक्त की नमाज अनिवार्य मानी जाती है तो AROPL के अनुसार प्रार्थना एक लगातार चलने वाली अवस्था है जिसमें इंसान हर समय दिल से ईश्वर से जुड़ा रह सकता है। इसी तरह रमजान को वे पारंपरिक इस्लामी कैलेंडर के बजाय दिसंबर में मनाते हैं। कुछ मान्यताएँ और भी ज्यादा विवादित हैं। उदाहरण के तौर पर, उनका कहना है कि जन्नत में जो पेड़ था वह दरअसल फातिमा का पिछला जन्म था। कई देशों, खासकर तुर्की में इस तरह की बात को ईशनिंदा (ब्लासफेमी) माना जाता है।

सामाजिक मुद्दों पर भी उनका नजरिया अलग है। AROPL में महिलाओं के लिए हिजाब या दुपट्टा अनिवार्य नहीं है। समलैंगिकता को वे बढ़ावा नहीं देते लेकिन LGBTQI+ लोगों को स्वीकार करते हैं और उनके अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन भी कर चुके हैं। शराब को लेकर भी उनका रवैया पारंपरिक इस्लाम की तुलना में ज्यादा उदार माना जाता है।

इन्हीं अलग मान्यताओं और प्रथाओं की वजह से AROPL को कई मुस्लिम-बहुल देशों में विवादास्पद माना जाता है। कई जगह उनके अनुयायियों को विरोध और उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ा है क्योंकि उनकी बातें मुख्यधारा इस्लामी विश्वासों से काफी अलग और टकराव वाली मानी जाती हैं।

बॉम्बे HC ने नरेंद्र दाभोलकर हत्या मामले में शरद कालस्कर को दी जमानत, मुख्य गवाहों के बयानों पर जताई गंभीर चिंता: CBI को भी पड़ी फटकार, पढ़ें डिटेल्स

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (29 अप्रैल 2026) को 29 वर्षीय शरद कलास्कर को नास्तिक, तर्कवादी और अंधविश्वास-विरोधी ‘एक्टिविस्ट’ डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के मामले में जमानत दे दी। गौरतलब है कि कोर्ट ने कलास्कर की लंबी कैद और हमलावरों में से एक के रूप में उनकी पहचान को लेकर प्रथम दृष्टया संदेह जताते हुए यह कदम उठाया है।

कलास्कर को 50,000 रुपए का जमानत बांड जमा करने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस रणजीतसिंह भोंसले की डिवीजन बेंच ने सुनाया। CBI ने इस फैसले पर 4 हफ्ते की रोक लगाने की माँग की लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

जस्टिस गडकरी ने कहा, “चूँकि हमने पहले ही कालस्कर की हमलावर के रूप में पहचान पर संदेह जताया है, इसलिए इस आदेश पर रोक लगाने का कोई प्रश्न नहीं उठता।”

जाँच में खामियों की ओर कोर्ट का इशारा

कोर्ट ने अभियोजन के एक प्रमुख गवाह किरण कांबले की गवाही का उल्लेख किया, जिन्होंने बताया था कि उन्हें पटाखों जैसी आवाज सुनाई दी थी लेकिन जिरह के दौरान गोलियों के बीच के अंतराल को लेकर अनिश्चितता व्यक्त की। ट्रायल कोर्ट ने भी दर्ज किया कि वह ‘सेकंड और मिनट’ के बीच स्पष्ट नहीं थे।

खंडपीठ ने बताया, “एक बात रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की गई है, जैसे कि ‘उसने पुलिस को बताया था कि पटाखों जैसी आवाज सुनकर उसका ध्यान उस ओर गया। मैंने यह भी बताया था कि दोनों लड़कों में से एक लंबा था और दूसरा थोड़ा छोटा।’ गोलियों के बीच का समय अंतराल एक से दो मिनट या एक से दो सेकंड था।”

अदालत ने कहा कि पुलिस ने कांबले को सिर्फ वही स्केच नहीं दिखाया था जो उसके बताए हुलिए के आधार पर बनाया गया था बल्कि कुछ और लोगों के स्केच भी दिखाए थे। कांबले ने यह भी माना कि उसे याद नहीं है कि 2 सितंबर 2013 को उसे वह स्केच दिखाया गया था या नहीं। सबसे अहम बात यह रही कि उसे एक और स्केच भी दिखाया गया लेकिन उसने कहा कि वह स्केच उसके बताए गए हुलिए से बने स्केच जैसा नहीं था।

उनका बयान ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास के समक्ष 12 अप्रैल 2019 को दर्ज किया गया। इसके बाद उन्हें पुणे के पुलिस आयुक्त कार्यालय में घटना के संबंध में जानकारी देने के लिए बुलाया गया। कोर्ट ने उल्लेख करते हुए कहा, “उस समय उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्होंने उक्त घटना के बारे में कुछ नहीं देखा था।”

साफ खामियों ने खींचा कोर्ट का ध्यान

दूसरे प्रमुख गवाह विनय केलकर को खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कई तस्वीरें दिखाई गईं। उन्होंने 10 से 12 तस्वीरों के समूह में से 2 तस्वीरें चुनीं, जिन्हें उन्होंने घटना के समय देखे गए व्यक्तियों की तस्वीरें बताया। उन्होंने आश्वासन दिया कि तस्वीरों में चेहरे 80 से 85% तक मेल खाते हैं।

जिरह के दौरान उन्होंने बताया कि घटना के दिन ही पुलिस ने उनके सहयोग से व्यक्तियों के स्केच बनाए थे। हालाँकि केलकर को यह याद नहीं था कि 30 जनवरी 2015 को उनके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर दूसरा स्केच बनाया गया था या नहीं। लगभग एक वर्ष बाद उन्हें मीनानाथ नामक व्यक्ति के साथ खड़की स्थित CBI कार्यालय में बुलाया गया, जहाँ उन्हें कुछ स्केच दिखाए गए।

उनके हस्ताक्षर कागजों के पीछे लिए गए और केलकर ने कहा कि समानता 70 से 80% के बीच थी। फिर भी, उन्होंने खुलासा किया कि स्केच उनके द्वारा दिए गए विवरण को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता था। 20 अगस्त 2013 को उनके द्वारा वाहन चला रहे व्यक्ति के विवरण के आधार पर एक चित्र बनाया गया था।

कोर्ट ने कहा, “इस गवाह ने यह स्वीकार किया है कि CBI अधिकारी द्वारा पूछताछ के दौरान ऐसा नहीं हुआ कि उसने बताया हो कि स्केच में दिखाया गया व्यक्ति वाहन चला रहा था और वह उसके घर के सामने से गुजरा था।”

4 सितंबर 2016 को जाँच एजेंसी को दिए गए बयान को पढ़कर सुनाया गया और उन्होंने जवाब दिया कि वह गलत था। इसके अलावा वह 2015-2016 से पढ़ने के लिए चश्मा उपयोग कर रहे हैं और घटना के लगभग 20 से 25 मिनट बाद स्नान करने के बाद घटनास्थल पर गए। वह अपने घर के पास स्थित कार्यालय जाने की योजना बना रहे थे।

कोर्ट ने कहा, “उन्होंने यह देखने के लिए इंतजार नहीं किया कि कोई घायल की मदद कर रहा है या नहीं। उन्होंने तुरंत घर में किसी को घटना के बारे में नहीं बताया। इस गवाह ने स्वीकार किया कि स्नान करने के बाद वह कार्यालय जाने की तैयारी में घर से बाहर आए थे।”

केलकर बालकनी में उसी स्थिति में थे जब हमलावर उनकी ओर आए और दोपहिया वाहन स्टार्ट किया। बेंच ने घटना के बाद तुरंत प्रतिक्रिया न देने को अनुचित बताया। यह दोहराया गया कि उन्होंने घटना को अपनी बालकनी से लगभग 500 मीटर की दूरी से देखा।

कोर्ट ने 27 दिसंबर 2018 को दिए गए उनके बयान का हवाला देते हुए बताया कि उन्होंने कहा था, “मैं, विनय केलकर, यह घोषित करता हूँ कि हत्या की घटना 5 वर्ष पहले हुई थी और वह स्थान मुझसे काफी दूर था। मैं घोषित करता हूँ कि संदिग्धों के चेहरे अपराधियों से मिलते-जुलते हैं, हालाँकि मैं उन्हें पूरी तरह पहचान नहीं सकता।”

कोर्ट ने CBI को लगाई फटकार और आवेदक के पक्ष में दिया फैसला

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने हमलावर के रूप में उसकी पहचान स्थापित करने के लिए मुख्य रूप से दो प्रत्यक्षदर्शियों पर भरोसा किया, जो आवेदन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनकी गवाही और जिरह की सावधानीपूर्वक समीक्षा करने के बाद उन्हें ऐसे ‘संयोगवश गवाह’ बताया गया जिनका कथित रूप से घटना देखने के बाद का व्यवहार सामान्य मानवीय व्यवहार से मेल नहीं खाता।

बेंच ने कहा, “हालाँकि उन्होंने मृतक दाभोलकर पर हुए भयानक हमले को देखा, फिर भी दोनों गवाहों ने पहले अपने दैनिक कार्यों को प्राथमिकता दी और उसके बाद आराम से पुलिस के पास जानकारी देने गए। हमारे अनुसार इन दोनों गवाहों का व्यवहार सामान्य समझ वाले व्यक्ति का नहीं है और यह कोर्ट के मन में इस बात पर संदेह उत्पन्न करता है कि क्या उन्होंने वास्तव में घटना देखी थी।”

यह बताया गया कि हत्या 20 अगस्त 2013 को हुई थी, जबकि कालस्कर को 3 सितंबर 2018 को गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने CBI के उस प्रयास की भी आलोचना की जिसमें पहचान स्थापित करने के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के बजाय फोटो पहचान का उपयोग किया गया।

कोर्ट ने कहा, “हालाँकि जाँच एजेंसी के पास कालस्कर की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड कराने का पूरा अवसर था लेकिन जाँच अधिकारी ने उसकी पहचान स्थापित करने के लिए उसके फोटो गवाहों को दिखाए, जबकि वह पहले से ही हिरासत में था।” कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसी पहचान अपनी विश्वसनीयता खो देती है।

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा, “पहचान परेड अनिवार्य नहीं है, न ही आरोपित इसे अपने अधिकार के रूप में माँग सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जाँच सही दिशा में चल रही है और बाद में कोर्ट में दी जाने वाली गवाही को समर्थन प्रदान करना है। यदि आरोपित गवाह या पीड़ित के लिए पूरी तरह अजनबी है, तो पहचान परेड वांछनीय होती है, जब तक कि गवाह ने उसे कुछ समय तक देखा न हो।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कालस्कर 3 सितंबर 2018 से जेल में है और उसने प्री-ट्रायल और पोस्ट-कन्विक्शन दोनों चरणों में 7.5 वर्ष से अधिक का कारावास झेला है। साथ ही अपीलों के चलते उसके मामले की अंतिम सुनवाई जल्द होने की संभावना कम है।

बेंच ने कहा, “आवेदन के समग्र दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, हमारा मत है कि अपील लंबित रहने के दौरान उस पर लगाई गई वास्तविक सजा को निलंबित किया जा सकता है और आवेदक को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।”

मामले की पृष्ठभूमि

67 वर्षीय डॉ नरेंद्र दाभोलकर, जो महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति चलाते थे, को पुणे में सुबह की सैर के दौरान दो बाइक सवार लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। CBI ने सचिन अंदुरे और शरद कालस्कर को आरोपित बताया। 2014 में बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद यह मामला CBI को सौंपा गया था, इससे पहले इसकी जाँच पुणे पुलिस कर रही थी।

10 मई 2024 को पुणे सत्र कोर्ट ने दोनों को आजीवन कारावास और 5 लाख जुर्माने की सजा सुनाई। हालाँकि डॉ वीरेंद्रसिंह तावड़े, विक्रम भावे और संजीव पुनालेकर को घटना से जोड़ने के लिए पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया गया।

इसके बाद कालस्कर ने 2024 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर फैसले को चुनौती दी और अंतिम सुनवाई तक जमानत की माँग की। यह उल्लेखनीय है कि पूरे मामले पर लगातार मीडिया ट्रायल हावी रहा, जिसमें आशीष खेतान द्वारा किया गया स्टिंग ऑपरेशन और दाभोलकर की आत्मा से संपर्क करने के उद्देश्य से प्लांचेट सत्र जैसी बातें भी शामिल थीं।

सनातन संस्था मीडिया ट्रायल का मुख्य केंद्र बन गया क्योंकि उसने 2003 के उस अंधविश्वास विरोधी विधेयक का विरोध किया था, जिसका उद्देश्य काला जादू, बलि और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के रूप में वर्गीकृत कार्यों को अपराध घोषित करना था।

इस बीच जाँच के दौरान कई त्रुटियाँ सामने आईं, जैसे साक्ष्यों का गलत प्रबंधन और एजेंसी द्वारा अपने मैनुअल के अनुसार आवश्यक पहचान परेड न कराना। इसी तरह कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गए क्योंकि जाँचकर्ताओं ने कई सुरागों और साक्ष्यों को गलत तरीके से संभाला या नजरअंदाज किया।

मामले में पहली दो गिरफ्तारियाँ विकास खंडेलवाल और मनीष नागोरी की थीं, जिन्हें बैलिस्टिक साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जो कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल हथियार से जुड़े थे। हालाँकि बाद में यह विकास निर्णायक नहीं माना गया और घटनास्थल पर मौजूद गवाह उन्हें पहचानने में असफल रहे, जिसके कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।

इसी तरह घटनास्थल पर विदेशी सामग्री की रहस्यमयी मौजूदगी और हत्या में इस्तेमाल हथियार के अंतिम निपटान को लेकर भी कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल सका। जाँच में महत्वपूर्ण खामियाँ थीं, जो संकेत देती हैं कि या तो अयोग्यता थी या जानबूझकर बाधा डाली गई।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

EU में बदलने जा रही रेप की परिभाषा, जानें- क्या है ‘Yes Means Yes’ मॉडल, जिससे पीड़िताओं के लिए बढ़ेगी न्याय की उम्मीद

यूरोपियन यूनियन यानी EU दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक समूहों में से एक है। 27 देशों का यह समूह साथ मिलकर व्यापार, कानून, मानवाधिकार और कई बड़े फैसलों पर एक साथ काम करते हैं। लेकिन इन दिनों यह रेप के कानून को लेकर चर्चा में है।

हाल ही में यूरोपियन पार्लियामेंट ने एक अहम प्रस्ताव पास किया है, जिसमें ‘Yes Means Yes’ (‘हाँ का मतलब हाँ’) यानी स्पष्ट सहमति को रेप की परिभाषा का आधार बनाने की बात कही गई है। आसान भाषा में समझें तो अब सवाल यह नहीं होगा कि पीड़िता ने ना कहा था या नहीं बल्कि यह होगा कि क्या उसने साफ तौर पर हाँ कहा था। अगर स्पष्ट सहमति नहीं है, तो उस स्थिति को अपराध माना जाएगा।

यह बदलाव इसलिए ऐतिहासिक कहा जा रहा है क्योंकि यह कानून के नजरिए को पूरी तरह बदल देता है। पहले जहाँ जोर इस बात पर होता था कि क्या जबरदस्ती हुई, अब फोकस इस पर है कि क्या दोनों पक्षों की सहमति साफ और स्पष्ट थी।

EU का ऐतिहासिक फैसला

‘हाँ का मतलब हाँ’ यानी ‘Yes Means Yes’ मॉडल पहली नजर में बहुत सीधी बात लगती है लेकिन असल में यह कानून के नजरिए में एक बड़ा और बुनियादी बदलाव है।

इस मॉडल का मतलब यह है कि किसी भी तरह के शारीरिक संबंध के लिए दोनों लोगों की साफ, स्पष्ट और अपनी मर्जी से दी गई सहमति होना जरूरी है। यहाँ सहमति का मतलब सिर्फ चुप्पी या विरोध न करना नहीं है बल्कि सामने वाले व्यक्ति का सक्रिय रूप से हाँ कहना या ऐसा व्यवहार दिखाना है जिससे उसकी मर्जी साफ समझ आए।

पहले कई देशों में कानून इस बात पर ज्यादा निर्भर करता था कि क्या पीड़िता ने ना कहा था, क्या उसने विरोध किया था या क्या उस पर शारीरिक जबरदस्ती की गई थी। लेकिन व्यवहारिक रूप से देखा जाए तो हर स्थिति में कोई व्यक्ति विरोध नहीं कर पाता। कई बार डर, सदमे या स्थिति की गंभीरता के कारण व्यक्ति प्रतिक्रिया ही नहीं दे पाता। ऐसे में पुराने कानूनों में कई मामले कमजोर पड़ जाते थे, क्योंकि वहाँ फोर्स या विरोध को साबित करना जरूरी होता था।

नया ‘Yes Means Yes’ मॉडल इसी सोच को बदलता है। यह कहता है कि अगर साफ और स्पष्ट हाँ नहीं है, तो उसे सहमति नहीं माना जाएगा। यानी अब फोकस इस बात से हटकर कि ना कहा गया था या नहीं, इस बात पर आ जाता है कि क्या स्पष्ट रूप से हाँ दी गई थी या नहीं। इससे कानून यह मानकर चलता है कि सहमति एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसे हर कदम पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

इस बदलाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह जिम्मेदारी को भी नए तरीके से तय करता है। अब यह अपेक्षा की जाती है कि कोई भी व्यक्ति यह सुनिश्चित करे कि सामने वाला व्यक्ति पूरी तरह से सहज और सहमत है।

पुराने कानून vs नया स्टैंडर्ड

अब तक कई यूरोपीय देशों में ‘नो मीन्स नो’ या फोर्स बेस्ड कानून लागू थे। यानी अगर किसी केस में यह साबित नहीं हो पाता था कि पीड़िता ने विरोध किया या उसके साथ जबरदस्ती हुई, तो केस कमजोर हो जाता था। कई बार अदालत में यह सवाल उठता था कि पीड़िता ने आवाज क्यों नहीं उठाई या उसने प्रतिरोध क्यों नहीं किया।

यहीं पर Yes Means Yes मॉडल पूरी तस्वीर बदल देता है। अब यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि पीड़िता ने कितना विरोध किया। बल्कि यह देखा जाएगा कि क्या स्पष्ट सहमति थी। इस बदलाव से न्याय प्रणाली का नजरिया ही बदल जाता है, अब ध्यान इस पर है कि क्या संबंध दोनों की सहमति से बनाया गया था, न कि इस पर कि विरोध कितना हुआ।

इस नए दृष्टिकोण का सबसे बड़ा असर पीड़ितों पर पड़ेगा। पहले उन्हें अदालत में यह साबित करना पड़ता था कि उनके साथ जबरदस्ती हुई, जो कि मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद मुश्किल होता था। कई बार ट्रॉमा की वजह से पीड़िता विरोध नहीं कर पाती, लेकिन कानून इसे समझने में पीछे रह जाता था।

अब नए मॉडल में यह दबाव कम हो सकता है। पीड़िता को यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि उसने कितना संघर्ष किया। बल्कि सवाल यह होगा कि क्या उसने सहमति दी थी। इससे न्याय पाने की प्रक्रिया कुछ हद तक आसान और संवेदनशील बन सकती है।

हाई-प्रोफाइल केस का असर

इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए फ्रांस के चर्चित पेलिकोट केस को थोड़ा विस्तार से समझना जरूरी है। इस मामले में आरोप था कि पीड़िता को पहले नशीला पदार्थ दिया गया, जिससे वह अपनी स्थिति को समझने या विरोध करने की हालत में नहीं रही।

इसके बाद उसके साथ कई लोगों ने रेप किया। यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं था बल्कि इसने लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति होश में ही नहीं है, तो उसकी ना या हाँ का सवाल ही कैसे उठ सकता है।

जब यह मामला सामने आया, तो पूरे यूरोप में लोगों के बीच गुस्सा और चिंता दोनों देखने को मिले। लोगों ने सवाल उठाना शुरू किया कि क्या मौजूदा कानून ऐसे मामलों को सही तरीके से कवर करते हैं, जहाँ जबरदस्ती सीधे तौर पर दिखाई नहीं देती, लेकिन सहमति पूरी तरह गायब होती है।

इस केस ने यह दिखाया कि कई बार अपराधी शारीरिक हिंसा के बजाय ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं, जहाँ पीड़ित विरोध ही नहीं कर पाता। इसी के बाद फ्रांस में फ्रेंच रेप लॉ रिफॉर्म 2025 की दिशा में बदलाव शुरू हुआ, जहाँ सहमति को ज्यादा स्पष्ट तरीके से कानून का आधार बनाने की कोशिश की गई।

महिला अधिकार समूहों का दबाव

इन घटनाओं के बाद महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने जोरदार आवाज उठाई। उनका कहना है कि यह अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं। अगर कानून नहीं बदला गया, तो ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल होगा।

NGOs लगातार EU स्तर पर एक समान कानून की माँग कर रही हैं, ताकि सभी सदस्य देशों में एक जैसी कानूनी परिभाषा लागू हो सके। उनका मानना है कि जब तक कॉन्सेंट को केंद्र में नहीं रखा जाएगा, तब तक न्याय अधूरा रहेगा।

इस पूरे मुद्दे की गंभीरता हम आकड़ों से समझ सकते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक EU में हर 6 में से 1 महिला ने किसी न किसी रूप में सेक्शुअल वाइअलन्स का सामना किया है। वहीं हर 10 में से 1 महिला अपने जीवन में रेप का शिकार होती है।

ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं बल्कि एक बड़ी सामाजिक सच्चाई को दिखाते हैं। इसका मतलब है कि यह समस्या बहुत व्यापक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समाज, कानून और सिस्टम तीनों के लिए एक चेतावनी है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल जो प्रस्ताव पास हुआ है, वह एक रेजोल्यूशन है, यानी यह अभी कानून नहीं बना है। इसे लागू करने के लिए EU के सभी सदस्य देशों को इसे अपने-अपने राष्ट्रीय कानून में शामिल करना होगा। अगर यह बदलाव लागू होता है, तो यह पूरे यूरोप में रेप लाॅ की दिशा बदल सकता है।

भारत में सहमति का कानून: वर्तमान स्थिति क्या कहती है?

भारतीय न्याय संहिता (BNS) में रेप को धारा 63 में परिभाषित किया गया है जबकि इसके लिए सजा धारा 64 में दी गई है। यह पहले की IPC धारा 375 और 376 के समान है। इस धारा के अनुसार, यदि किसी महिला की इच्छा के खिलाफ या उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाया जाता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आता है।

कानून में कन्सेंट को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जिसमें कहा गया है कि सहमति स्वतंत्र और स्वेच्छा से दी गई होनी चाहिए। यदि सहमति डर, दबाव, धोखे या नशे की हालत में ली गई हो, तो उसे वैध नहीं माना जाता।

साल 2013 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 के जरिए कानून में बड़े बदलाव किए गए। यह संशोधन निर्भया केस के बाद लाया गया था। इसके तहत रेप की परिभाषा को विस्तृत किया गया और कॉन्सेंट को लेकर कानूनी भाषा को अधिक स्पष्ट बनाया गया। साथ ही यह भी जोड़ा गया कि ना का मतलब ना ही होता है।

भारतीय कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि महिला बेहोशी, नशे या मानसिक रूप से असमर्थ स्थिति में है, तो उस स्थिति में दी गई सहमति मान्य नहीं होगी। अदालतों में मामलों की सुनवाई के दौरान सहमति का सवाल प्रमुख होता है और साक्ष्यों, परिस्थितियों और गवाही के आधार पर निर्णय लिया जाता है।

आग लगी है बस्ती में, अंजुम डूबे कैमरे की मस्ती में… संकट के बीच भी नहीं छूटा ‘फ्रेम का मोह’, आपदा बनी प्रचार का ‘शो’

आग लगे चाहे बस्ती में, अजीत जी तो डूबे कैमरे की मस्ती में…। तो ऐसा परिचय देने के पीछे वजह यह है कि गाजियाबाद के गौर ग्रीन एवेन्यू अपार्टमेंट में भयानक आग लगी और इसकी चपेट में 8 फ्लोर आ गए। जिन फ्लैटों में आग लगी, उनके ठीक सामने वाले टावर मे प्रोपेगेंडा पत्रकार और यूट्यूबर अजीत अंजुम का भी फ्लैट है। तो अजीत अंजुम भी लग गए इस आपदा को ‘अवसर’ बनाने। ‘अवसर’ बनाना तो था पड़ोसी की मदद करने का, लेकिन उन्होंने इस आपदा को प्रचार का ‘शो’ बना लिया।

तभी तो अजीत अंजुम को राहत और बचाव के बीच भी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि फ्रेम सही आ रहा है या नहीं। पड़ोसी मुसीबत में थे, लोग घबराए हुए थे, लेकिन अजीत जी का ध्यान था- ‘कैमरामैन, जल्दी फोकस करो।’ अब इसी लाइन पर उनके वीडियो एडिट कर मीमर मजे ले रहे हैं। अजीत जी, ये पत्रकारिता थी, राहत कार्य था या फिर ‘कंटेंट क्रिएशन’ का नया एपिसोड?

वैसे अजीत जी ने अपनी खिल्ली भी खुद ही उड़वाई है। क्यों आग बुझाते वीडियो के बीच कैमरा अड़ाया? क्यों पाइप को सिर पर टाँगकर पानी डालने का दिखावा किया? और जब कैमरे का फोकस खुद पर से हटा तो क्यों उनको इतनी मिर्ची लगी? क्योंकि ये तो वही अजीत जी हैं न, जो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कैमरे पर वीडियोज बनाते थे। क्यों है न, अजीत जी? खुल गई न पोल।

‘पीएम मोदी अपने और कैमरे के बीच में किसी को आने नहीं देते‘,’कैमरा में अकेले दिखने का ऐसा शौक मोदी को ही क्यों है?’, ‘पीएम मोदी अपने और कैमरे के बीच में किसी को आने नहीं देते‘ आदि आदि..। ये अजीत अंजुम के कुछ वीडियो के टाइटल हैं, जिनमें पीएम मोदी और उनका कैमरे से लगाव पर तंज कसा गया है। लेकिन अब ये मत बोलना- मोदी जैसा पोज क्यों देने लगा मैं।

जब आदत ही हर जगह फेम खाने की हो, तो कोई कैसे खुद को रोक सकता है। सामने आग लगी हो, लोग अफरा-तफरी में हो, लेकिन अजीत अंजुम जैसे लोग कैमरे में एंट्री मिस नहीं कर सकते। ये तो वही मीम हो गया, कैमरा ऑन होते ही गरीब को रोटी दी, कैमरे बंद होते ही वो भी छीन ली। क्योंकि हमें क्या पता आपने कैमरे के पीछे कितनी मदद की? क्योंकि हमने जो देखा वो आपका और कैमरे का प्रेम था।

क्या पता कैमरा बंद होते ही पाइप भी नीचे, और खुद भी नीचे, अरे नीचे यानी फ्लैट से नीचे उतरकर भीड़ में खड़े हो गए। ये मैं नहीं कह रही, ये वो लोग सोच रहे हैं जिन्होंने आपदा के बीच में आपका और कैमरे के बीच का प्रेम देखा।

एक बार को अजीत अंजुम के ‘कैमरा-प्रेम’ पर लिखने से मैं खुद को रोक भी लेती। लेकिन जैसे ही प्रोपेगेंडाबाज और यूट्यूब रवीश कुमार ने अजीत जी को ट्रोल करने पर उनकी साइड ली। तब मैं समझ गई। बोलना तो पड़ेगा। वरना रवीश कुमार तो लंबा-चौड़ा निबंध लिखकर इसे भी मोदी की ही गलती करार देंगे। कहीं उनकी अगली यूट्यूब वीडियो का टाइटल भी यही न हो- पीएम मोदी और उनके कैमरे के रिश्ते ने अजीत अंजुम को बनाया कैमरा-प्रेमी।

दरअसल, राजनीति और पत्रकारिता में एक पुरानी कहावत है- जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदता है, कभी-कभी उसी में कैमरा लेकर खुद उतर जाता है। अजीत अंजुम के साथ भी ऐसा ही हुआ। पीएम मोदी के कैमरे पर सवाल करते-करते खुद कैमरा लेकर उतर गए। अब झेलिए मीम की बारिश, खुद पर। क्योंकि मीम बनाने वालों को छाता तो आपने ही दिया है न? इस पूरी कंट्रोवर्सी से अजीत जी को एक सीख तो मिली होगी कि पड़ोसी के घर में आग लगने पर जो लोग कैमरा लेकर खड़े होते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि अगर हवा बदल गई तो उनके अपने घर भी नहीं बचेंगे।

जब हिरण्यकश्यप का वध कर भी शांत नहीं हुआ भगवान नरसिंह का क्रोध, महादेव को लेना पड़ा ‘शरभ अवतार’: पढ़ें- दोनों रूप से जुड़ीं अनसुनी कथा और मान्यताएँ

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली नरसिंह (नृसिंह) जयंती हिंदू धर्म में आस्था, शक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार के रूप में नरसिंह स्वरूप धारण किया था।

यह अवतार जितना अद्भुत है, उतना ही गूढ़ और रहस्यमय भी है, क्योंकि इसमें भगवान न तो पूर्ण रूप से मनुष्य थे और न ही पूर्ण रूप से पशु बल्कि आधे सिंह और आधे मानव के रूप में प्रकट हुए। यह रूप किसी संयोग का परिणाम नहीं था बल्कि एक अत्यंत विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिया गया था।

नरसिंह अवतार की पूरी कथा केवल एक दैत्य-वध की कहानी नहीं, बल्कि भक्ति, अहंकार, शक्ति-संतुलन और दिव्य लीला का विस्तृत दर्शन कराती है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नरसिंह अवतार के साथ ही भगवान शिव ने भी एक अवतार लिया था। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा और मान्यताएँ।

हिरण्यकश्यप का वरदान और नरसिंह अवतार

इस कथा की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं जब असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे ऐसा वरदान दिया, जिससे वह लगभग अमर हो गया।

वह न मनुष्य से मारा जा सकता था, न पशु से, न दिन में उसकी मृत्यु हो सकती थी, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से, न धरती पर और न आकाश में।

इस वरदान ने उसके भीतर अहंकार को जन्म दिया और उसने स्वयं को भगवान मानना शुरू कर दिया। उसने देवताओं को पराजित कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में अत्याचार फैलाने लगा। लेकिन उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था।

हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई बार मारने की कोशिश की लेकिन हर बार वह भगवान विष्णु की कृपा से बच गया। जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है और स्तंभ पर प्रहार किया, तब उसी स्तंभ से भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने संध्या समय, महल की दहलीज पर, अपनी गोद में बैठाकर और नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। इस प्रकार उन्होंने वरदान की हर शर्त को तोड़ते हुए धर्म की स्थापना की।

AI द्वारा प्रतीकात्मक चित्र

नरसिंह का अनियंत्रित क्रोध और शिव का शरभ अवतार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका उग्र रूप इतना भयानक हो गया कि देवता, ऋषि और समस्त लोक भयभीत हो उठे। यहाँ तक कि प्रह्लाद, जिनके लिए भगवान प्रकट हुए थे, वे भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाए।

इस स्थिति में सभी देवता पहले ब्रह्मा के पास गए लेकिन समाधान नहीं मिला। अंततः सभी भगवान शिव के पास पहुँचे। भगवान शिव, जिन्हें संहार और संतुलन का देवता माना जाता है, उन्होंने पहले अपने गण वीरभद्र को भेजा लेकिन वे भी नरसिंह को शांत करने में असफल रहे।

इसके बाद भगवान शिव ने एक अत्यंत अद्भुत और शक्तिशाली रूप धारण किया, जिसे शरभ अवतार कहा जाता है। इस रूप में वे सिंह, पक्षी और मनुष्य के मिश्रण के रूप में थे और अत्यंत बलशाली थे। शरभ और नरसिंह के बीच भयंकर संघर्ष हुआ, जिसकी कथाएँ विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूप में मिलती हैं।

कुछ परंपराओं में कहा गया है कि शरभ ने नरसिंह को अपनी शक्ति से नियंत्रित कर उनका क्रोध शांत किया। वहीं वैष्णव परंपरा में यह मान्यता है कि नरसिंह ने एक और शक्तिशाली रूप धारण कर इस चुनौती का सामना किया। अंततः जब नरसिंह को यह आभास हुआ कि उनका उद्देश्य पूर्ण हो चुका है, तब उनका क्रोध शांत हुआ।

श्रीलंका के मुन्नेस्वरम मंदिर में शरभ के रूप में भगवान शिव (फोटो साभार: wikimedia commons)

यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखने के लिए देव शक्तियों के बीच भी जटिल और गूढ़ लीलाएँ होती हैं।

नरसिंह का अद्भुत स्वरूप और उनके अनेक रूप

शास्त्रों में भगवान नरसिंह को भगवान के छहों ऐश्वर्यों- शक्ति, धन, वैराग्य, तेज, ऊर्जा और ज्ञान से पूर्ण रूप से युक्त बताया गया है। पद्म पुराण में कहा गया है कि नरसिंह, राम और कृष्ण इन तीनों अवतारों में भगवान के सभी गुण पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। भगवान कृष्ण या नारायण को सभी दिव्य रूपों का मूल माना जाता है।

नारायण से वासुदेव प्रकट होते हैं और वासुदेव से संकर्षण का प्रादुर्भाव होता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान नरसिंह, संकर्षण के अंश रूप हैं। जिस प्रकार संकर्षण सृष्टि का संहार करते हैं, उसी प्रकार भगवान नरसिंह अज्ञान और शरीर, मन तथा वाणी से उत्पन्न सभी पापों का नाश करते हैं।

भगवान नरसिंह के अनेक स्वरूपों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। पाञ्चरात्र आगम के विहगेन्द्र संहिता में नरसिंह के सत्तर से भी अधिक रूपों का उल्लेख है। इन रूपों में अंतर उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र, उनकी मुद्रा, आसन और अन्य सूक्ष्म भेदों के आधार पर होता है।

इन अनेक रूपों में से नौ रूप विशेष रूप से प्रसिद्ध माने जाते हैं, जिन्हें नव-नृसिंह कहा जाता है। ये हैं- उग्र नरसिंह, क्रुद्ध नरसिंह, वीर नरसिंह, विलंब नरसिंह, कोप नरसिंह, योग नरसिंह, अघोर नरसिंह, सुदर्शन नरसिंह और लक्ष्मी नरसिंह। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र में भी भगवान नरसिंह के नौ प्रमुख स्वरूपों की पूजा होती है।

इनमें छत्रवत नरसिंह, योगानंद नरसिंह, करंज नरसिंह, उह नरसिंह, उग्र नरसिंह, क्रोड नरसिंह, मलोल नरसिंह, ज्वाला नरसिंह और पावन नरसिंह शामिल हैं। इन सभी रूपों का अपना अलग महत्व और कथा है, जैसे मलोल नरसिंह में देवी लक्ष्मी उनके साथ विराजमान होती हैं, जबकि ज्वाला नरसिंह अत्यंत उग्र रूप में स्तंभ से प्रकट होते हैं।

इसके अलावा भगवान नरसिंह के कई अन्य रूपों का भी वर्णन मिलता है, जैसे स्तंभ नरसिंह जो स्तंभ से प्रकट होते हैं, स्वयं नरसिंह जो स्वयं प्रकट होते हैं, ग्रहण नरसिंह जो राक्षस को पकड़ते हैं, विदारण नरसिंह जो उसका पेट फाड़ते हैं और संहार नरसिंह जो उसका वध करते हैं।

उनके उग्र स्वरूपों में घोर नरसिंह, उग्र नृसिंह, चंड नरसिंह और ज्वाला नरसिंह का उल्लेख किया गया है। वहीं लक्ष्मी नरसिंह रूप में देवी लक्ष्मी उन्हें शांत करती हैं और प्रसाद या प्रह्लाद-वरद नरसिंह रूप में वे भक्त प्रह्लाद को आशीर्वाद देते हैं। छत्र नरसिंह रूप में वे पाँच फनों वाले सर्प की छाया में बैठे होते हैं, जबकि योग नरसिंह ध्यान मुद्रा में होते हैं।

आवेश नरसिंह अत्यंत उन्मत्त रूप को दर्शाते हैं और अट्टहास नरसिंह वह रूप है जिसमें वे भयानक गर्जना करते हुए अधर्म का नाश करते हैं। चक्र नरसिंह रूप में उनके हाथ में केवल सुदर्शन चक्र होता है। कुछ रूपों में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों से जोड़ा गया है, जबकि कुछ रूप पंचतत्वों, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि और अमृत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

पुष्टि नरसिंह की पूजा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए की जाती है। भगवान नरसिंह के असंख्य रूप उनकी अनंत शक्ति, विविधता और दिव्यता को दर्शाते हैं। यह सभी रूप इस बात का प्रमाण हैं कि उनका अवतार केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक आध्यात्मिक सत्य है, जो अज्ञान के नाश और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट हुआ।

नरसिंह से जुड़ी रहस्यमयी मान्यताएँ और लोककथाएँ

नरसिंह अवतार से जुड़ी अनेक ऐसी मान्यताएँ हैं, जो इसे और भी रहस्यमय बनाती हैं। आंध्र प्रदेश का अहोबिलम क्षेत्र वह स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान स्तंभ से प्रकट हुए थे। वहाँ एक विशेष चट्टान को उसी स्तंभ का प्रतीक माना जाता है, जिसे उग्र स्तंभ कहा जाता है।

कुछ मंदिरों में भगवान को गुड़ से बना पेय अर्पित किया जाता है, जिसे पानकम कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान उसका कुछ भाग स्वयं स्वीकार करते हैं, जो उनके क्रोध को शांत करने का प्रतीक माना जाता है। आदि शंकराचार्य से जुड़ी कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें संकट के समय उन्होंने नरसिंह का स्मरण किया और उन्हें दिव्य सहायता प्राप्त हुई।

इसके अलावा भारत के विभिन्न हिस्सों में ऐसे स्थानों की मान्यता है, जहाँ भगवान के प्रकट होने या उनसे जुड़ी घटनाओं के प्रमाण माने जाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी इस अवतार से जुड़ी लोककथाएँ प्रचलित हैं, जो इस कथा को और व्यापक बनाती हैं।

सिंहाचलम मंदिर और नरसिंह भक्ति की परंपरा

आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम के पास स्थित सिंहाचलम मंदिर नरसिंह भगवान के प्रमुख तीर्थों में से एक है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी वास्तुकला द्रविड़ शैली की है। यहाँ भगवान के वराह और नरसिंह के संयुक्त रूप की पूजा की जाती है।

सिम्हाचलम मंदिर, विशाखापत्तनम (फोटो साभार: vizagtourism.org)

इस मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि भगवान की प्रतिमा को साल भर चंदन के लेप से ढका जाता है और केवल अक्षय तृतीया के दिन ही उसका वास्तविक स्वरूप दर्शन के लिए खोला जाता है। इस अवसर को चंदनोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

वैसे तो भगवान नरसिंह के कई मंदिर भारत में हैं। लेकिन इस मंदिर को उनका निवास स्थान माना जाता है और यह कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं प्रह्लाद ने करवाया था। मंदिर का इतिहास भी काफी प्राचीन है और विभिन्न राजाओं द्वारा इसके जीर्णोद्धार की कथाएँ जुड़ी हुई हैं।

यह स्थान केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नरसिंह अवतार की कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष, भक्ति की शक्ति और ईश्वर की लीला का गहरा संदेश देती है।

यह अवतार यह दर्शाता है कि जब अन्याय और अत्याचार अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तब ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करते हैं। इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण और रोचक पहलू यह है कि भगवान शिव को भी हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने अपने शरभ अवतार के माध्यम से नरसिंह के क्रोध को शांत किया।

यह घटना दर्शाती है कि सृष्टि के संचालन में सभी दिव्य शक्तियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। नरसिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह विश्वास का प्रतीक है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर हर युग में उपस्थित रहते हैं और अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं।