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यूक्रेन में आए दिन मर रहे लोग, रूस में खड़ा हो गया तेल का संकट और खूब बरस रहीं मिसाइलें-बम: मिडिल ईस्ट संकट के बीच यूरोप में 5 साल से जारी इस युद्ध में अब क्या चल रहा?

रूस-यूक्रेन युद्ध को 1600 दिनों से अधिक हो चुके हैं और हाल के दिनों में रूस ने मिसाइलों और ड्रोन से हमले तेज कर दिए हैं। शनिवार (11 जुलाई 2026) को रूस ने यूक्रेन के कई शहरों को निशाना बनाया, जिसमें कम से कम 10 लोगों की मौत और 80 से अधिक लोग घायल हुए।

यूक्रेन का कहना है कि रूस लगातार रिहायशी इलाकों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे पर हमले कर रहा है, जबकि रूस का दावा है कि उसने सैन्य ठिकानों और रक्षा क्षेत्रों को टारगेट किया है। नाटो देशों से मदद माँग रहे यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने यह कह कर सबको चौंका दिया है कि रूस ने चीन की चेतावनी की वजह से अब तक परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं किया है। इससे पहले उन्होंने रूस को समझाने की चीन से अपील की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सीजफायर के लिए जेलेंस्की और पुतिन से अलग-अलग बातचीत की, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।

24 फरवरी 2022 में पहली बार रूस ने यूक्रेन के नाटो गुट में शामिल होने की जिद के बाद हमला किया था। इन 5 से ज्यादा बीते सालों में लाखों लोगों के मौत का अनुमान है, जबकि 10 लाख से अधिक रूसी सैनिक और 2.5 से 3 लाख से ज्यादा यूक्रेनी सैनिकों के मारे जाने या घायल होने का अनुमान जताया गया है।

युद्ध की शुरुआत से लेकर अब तक 60 लाख से अधिक यूक्रेनी नागरिकों को अपना देश छोड़कर पोलैंड, जर्मनी, रोमानिया और दूसरे यूरोपीय देशों में शरण लेनी पड़ी है। यूक्रेन के भीतर ही करीब 35 लाख से अधिक लोग अपने घरों को छोड़कर देश के सुरक्षित हिस्सों (जैसे पश्चिमी यूक्रेन) में रहने को मजबूर हैं।ऊर्जा संकट से विस्थापन: रूसी हमलों में यूक्रेन की लगभग दो-तिहाई बिजली उत्पादन क्षमता नष्ट हो जाने के कारण, कड़ाके की ठंड और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लाखों लोग पलायन करने को मजबूर हुए हैं।

चीन ने रूस को चेताया- जेलेंस्की

अब तक चीन को रूस को समझाने की सलाह देने वाले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा है कि चीन ने राष्ट्रपति पुतिन को चेतावनी दी है कि वे यूक्रेन में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न करें।

जेलेंस्की ने गुरुवार (9 जुलाई 2026) को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि आपने रूसी मीडिया की ऐसी बातें सुनी होंगी, जिसमें कहा गया है कि यूक्रेन के हमलों का जवाब देने के लिए रूस ने चीन से पूछा कि क्या हम परमाणु हमला करें, तो चीन ने अल्टीमेटम देने के अंदाज में जवाब दिया कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। जेलेंस्की ने कहा कि ये पहला मौका है जब चीन ने रूस को सख्त हिदायत दी।

इससे पहले जेलेंस्की कहते रहे हैं कि चीन वास्तव में शांति चाहता है तो उसे रूस पर अपने असर का इस्तेमाल करना चाहिए। चीन रूस के साथ अपने आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के कारण दबाव डाल सकता है, लेकिन अब तक उसने ऐसा नहीं किया है। यूक्रेन लगातार यह भी कहता रहा है कि रूस को तकनीकी और औद्योगिक आपूर्ति मिलने से उसकी युद्ध क्षमता बनी हुई है।

जेलेंस्की के मुताबिक, यूक्रेन की सेना ने 9 जुलाई 2026 को अजोव सागर में रूस के एक दर्जन और टैंकरों पर हमला किया। उसने रूसी सेना को ईंधन की सप्लाई रोकने और रूसी क्रीमिया को अलग-थलग करने की कोशिशें तेज कर दी है।

यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि 5 जुलाई से 9 जुलाई तक यूक्रेन ने अजोव सागर और काला सागर में रूस के कम से कम 36 जहाजों पर हमला किया और उनमें आग लगा दी।

इनमें रूस के तथाकथित गुप्त बेडे के 32 टैंकर और दो ड्राई कार्गो जहाज शामिल थे। वे सभी क्रीमिया तक ईंधन पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे।

रूस ने यूक्रेन पर तेज किए हमले

जुलाई 2026 में ही यूक्रेन के एक रिहायशी इलाके में रूसी हमले में छोटे से शहर विशनेवे के हथियारों के गोदाम में धमाका हुआ। इसके बाद एक के बाद एक कई धमाके हुए। सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त हो गए। इसको लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति ने हथियारों के जखीरा रखने की इजाजत देने को लेकर जिम्मेदार अधिकारी पर एक्शन लेने की बात कही। दरअसल एक के बाद एक धमाके उन हथियारो की वजह से हुए थे।

जेलेंस्की ने दावा किया कि शनिवार (11 जुलाई 2026) को यूक्रेन में रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों में एक बच्चे समेत 8 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों लोग घायल हो गए। उत्तरी शहर सुमी के भीड़-भाड़ वाले इलाके में दो ग्लाइड बम गिरे, जिससे 5 लोगों की मौत हो गई और 30 लोग घायल हो गए। सुमी क्षेत्र रूस से सटा इलाका है, जिसे रूस बफर जोन बनाना चाहता है। इस इलाके में एक व्यक्ति की मौत विस्फोटक उपकरण पर पैर पड़ने से हो गई। दक्षिण-पूर्वी शहर जापोरिज्जिया में भी ग्लाइड बमों से 10 लोग घायल हो गए। दिन में इससे पहले दक्षिणी बंदरगाह शहर ओडेसा पर मिसाइल हमले में 2 लोगों की मौत हो गई और एक अन्य घायल हो गया।

जेलेंस्की ने कहा कि रूस ने शनिवार देर रात 120 से ज्यादा ड्रोन और 12 मिसाइलें दागीं, जिनमें से आधी बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। उन्होंने कहा, “एयर रेड अलर्ट जारी होने से पहले ही नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया।” उन्होंने इमारतों के मलबे और धुएँ के बीच काम कर रही इमरजेंसी टीमों के वीडियो पोस्ट किए।

जेलेंस्की ने कहा कि एयर डिफेंस सिस्टम ‘ज्यादातर टारगेट को गिराने में कामयाब रहे’, लेकिन बैलिस्टिक मिसाइलों को नहीं रोक पाए। उन्होंने अपने सहयोगी देशों से ज्यादा सैन्य सहायता देने की माँग की ताकि रूसी हमले का सामने कर सकें। हालाँकि ये युद्ध पिछले 5 सालों में चल रहा है। लेकिन रूस ने एक बार फिर यूक्रेन पर हमले तेज कर दिए हैं। जुलाई 2026 में अब तक राजधानी कीव और उसके आस-पास के इलाकों में हुए हमलों में 60 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।

शनिवार को कीव पर हुआ हमला एक हफ़्ते से भी कम समय में दूसरी बार था जब एयर अलर्ट जारी होने से पहले ही मिसाइलें गिरीं। यूक्रेन के रक्षा मंत्री के सलाहकार सर्गी स्टर्नेंको ने कहा कि यह हमला तब हुआ जब सायरन से रूस की S-400 एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों के आने का संकेत भी नहीं मिल पाया था।

यूक्रेन के हमले से रूस में ईधन संकट का दावा

यूक्रेन ने दावा किया है कि उसके लगातार और लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन हमलों की वजह से पूरे रूस में ईंधन की भारी कमी हो गई है। इसके चलते कई इलाकों में कीमतें बढ़ने और पेट्रोल स्टेशनों पर लंबी लाइनें लगने की बात कही जा रही है। रूस में पेट्रोल और डीजल का भारी संकट पैदा हो गया है। यूक्रेन के मुताबिक, उसने रणनीति बदलते हुए रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों को निशाना बनाना शुरू किया। उसके हमलों से कई प्रमुख रूसी तेल रिफाइनरियाँ क्षतिग्रस्त हो गई और रूस का ईंधन उत्पादन क्षमता करीब 20% तक गिर गया है।

रॉयटर्स ने दावा किया है कि रूस ने अस्थायी रूप से डॉन-अजोव चैनल से आवाजाही रोक दी है। यह चैनल डॉन नदी को अजोव सागर से जोड़ने वाला एक जलमार्ग है।

यह कदम अजोव सागर में 10 टैंकरों सहित रूस के 13 जहाजों पर यूक्रेन के हमले के बाद उठाया गया। जानकारों का मानना है कि दुनिया में अनाज के सबसे बड़े निर्यातक रूस से होने वाले गेहूँ के एक्सपोर्ट का एक-चौथाई हिस्सा अजोव सागर से होकर जाता है। इसमें दावा किया गया है कि शिपिंग कंपनियों को रूस ने इसकी जानकारी दे दी है और शुक्रवार 10 जुलाई 2026 की शाम 6.10 बजे से किसी भी जहाज को यहाँ से गुजरने की अनुमति नहीं दी गई।

रूसी अधिकारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद इन हमलों के कारण उत्पन्न हुई ईंधन की कमी को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है। इस किल्लत से निपटने के लिए रूस को मजबूरन भारत जैसे मित्र देशों से गैसोलीन (पेट्रोल) का आयात करना पड़ रहा है। यहाँ तक कि ईंधन की गुणवत्ता के मानकों Euro-5 को घटाकर Euro-3 कर दिया गया है। साइबेरिया जैसे बड़े औद्योगिक हब में लोगों से वर्क फ्रॉम होम करने और गाड़ियों का इस्तेमाल कम करने की अपील की गई है। राजधानी मॉस्को सहित कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।

यूक्रेन को NATO का सदस्य देश बनाने की माँग दोहराई

हाल में रूसी हमलों के बाद नाटो की 7-8 जुलाई 2026 को तुर्किए की राजधानी अंकारा में हुई बैठक में यूक्रेन को करीब €70 अरब यानी करीब 7.6 लाख करोड़ रुपए की सैन्य सहायता देने का वादा किया। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने नाटो देशों से कहा कि केवल बयान देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि तत्काल एयर डिफेंस सिस्टम और हथियारों की जरूरत है।

जेलेंस्की ने अमेरिका से पेट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलों की तत्काल आपूर्ति करने को कहा। साथ ही ये भी कहा कि अगर मिसाइलें नहीं दे पा रहे, तो यूक्रेन को इनके निर्माण के लिए लाइसेंस दी जाए।

जेलेंस्की ने ये भी माँग की है कि NATO यूक्रेन को अपना सदस्यता बनाए और स्पष्ट रोडमैप दे। इससे पूरे यूरोप की सुरक्षा मजबूत होगी।

सैन्य अभियान को हासिल किए बिना पीछे नहीं हटेगा रूस- पुतिन

रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने एक बार फिर दोहराया है कि रूस अपने टारगेट पूरा किए बगैर यूक्रेन पर सैन्य कार्रवाई को नहीं रोकेगा। रूस का कहना है कि उसके हमले यूक्रेन के सैन्य और रक्षा क्षेत्रों पर किए जा रहे हैं। वही रूस ने यह भी आरोप लगाया है कि यूक्रेन लगातार रूस के अंदर ड्रोन हमले कर रहा है, इसलिए जवाबी कार्रवाई की जा रही है। साथ ही रूस ने अपनी शर्तों पर कुछ मौकों पर बातचीत की इच्छा जताई है।

युद्ध शुरू होने के बाद रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका, यूरोपीय संघ और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस पर इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध लगाए। रूस के प्रमुख बैंकों को वैश्विक वित्तीय मैसेजिंग सिस्टम SWIFT से बाहर कर दिया गया। रूस के केंद्रीय बैंक की विदेशों में जमा करीब 300 अरब डॉलर की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया गया साथ ही रूसी कच्चे तेल और गैस के आयात पर प्रतिबंध या ‘प्राइस कैप’ लगाई गई।

रूस को अत्याधुनिक तकनीक, सैन्य उपकरण, और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा कर अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की कोशिश की गई। इसके बावजूद रूस टस से मस नहीं हुआ और यूक्रेन को टारगेट करता रहा।

ट्रंप ने युद्ध रोकने का वादा किया था

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध को जल्द समाप्त कराने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि दोनों पक्षों से बातचीत कर युद्ध रोकने का रास्ता निकाला जा सकता है। अमेरिका ने रूस और यूक्रेन दोनों से कई दौर की बातचीत की। इस दौरान ट्रंप और जेलेंस्की के संबंध तनावपूर्ण भी हुए और धीरे धीरे अब बेहतर हुए हैं।

यही वजह है कि नाटो के तुर्किए में हुई बैठक में यूक्रेन की एयर डिफेंस सिस्टम को मजबूत करने के लिए अमेरिका तैयार है। यूक्रेन को पेट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों के उत्पादन के लिए लाइसेंस देने की दिशा में पहल की गई। ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उसका उद्देश्य युद्ध को बातचीत के जरिए समाप्त करना है, लेकिन जमीन पर लड़ाई अभी भी जारी है।

दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध खत्म करने के लिए कूटनीतिक कोशिशें अभी भी जारी हैं। लेकिन सीजफायर और शांति समझौते को लेकर कोई खास सफलता नहीं मिली है। रूस अभी भी अपने सैन्य टारगेट से पीछे हटने को तैयार नहीं है। वह कभी नहीं चाहेगा कि यूक्रेन को नाटो का सदस्य देश बनाया जाए। युद्ध की बड़ी वजह भी यही था। वहीं जेलेंस्की नाटो की सदस्यता की माँग कई बार कर चुके हैं। दूसरी बात यह है कि यूक्रेन अपने कब्जे वाले क्षेत्रों को छोड़े बिना समझौता नहीं करना चाहता। इसलिए दोनों देशों के बीच सीजफायर को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। यही वजह है कि रूस और यूक्रेन एक दूसरे पर ड्रोन और मिसाइल से हमले किए जा रहे हैं और ये युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।

‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, गुलाम’ बोलने वाले ईसाई संगठन के 11 लोगों को राहत नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने केस रद्द करने की अर्जी खारिज की, कहा- अभिव्यक्ति की आजादी का दावा ट्रायल में देखेंगे

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सार्वजनिक तौर पर ‘हिन्दू एक गाली, इसका मतलब चोर, डाकू, लुटेरा और गुलाम’ कहने वाले ईसाई संगठन से जुड़े 11 सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसे सवाल शामिल हैं, जिनका फैसला केवल पूरे ट्रायल के दौरान सबूतों की जाँच के बाद ही किया जा सकता है। शुरुआती चरण में इन्हें तय नहीं किया जा सकता, इसलिए FIR को खारिज नहीं किया जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 11 आरोपितों, सुनील कुमार जाल्क्सो, संजय सक्सेना, रेमिश टोप्पो, श्याम सुंदर मरावी, अरविंद कच्छप, पॉलुस कुजूर, हर्ष कुजूर, धर्मू एक्का, दिनेश भगत, मीरा तिर्की और ब्लैसियस टिग्गा की याचिका खारिज कर दी।

इन सभी ने अपने खिलाफ दर्ज FIR, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की माँग की थी। यह मामला फरवरी 2024 का है, जब छत्तीसगढ़ के जेशपुर की एक सार्वजनिक सभा में हिन्दू धर्म के खिलाफ विवादास्पद और आपत्तिजनक बयान दिए गए थे। इसका आयोजन भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा ने किया था।

क्या है मामला?

यह मामला 28 फरवरी 2024 को शुरू हुआ, जब विश्व हिंदू परिषद, जशपुर के जिला अध्यक्ष कर्नैल सिंह ने कुनकुरी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उन्होंने कहा, “वक्ताओं ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया है, इसलिए उन्हें सजा मिलनी चाहिए। पूरे हिंदू और ब्राह्मण समाज का भी अपमान किया गया। इससे समुदाय में भारी आक्रोश है और लोग आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।”

अभियोजन के अनुसार, 27 फरवरी 2024 को कुनकुरी के सलियाटोली मिनी स्टेडियम में भारत मुक्ति मोर्चा और राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा की ओर से आयोजित एक सार्वजनिक सभा में ये सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे।

इस कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि ‘हिंदू’ शब्द का मतलब ‘चोर, डकैत, लुटेरा और गुलाम’ होता है और हिंदू कोई धर्म नहीं बल्कि एक गाली है। इसके अलावा धार्मिक कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के खिलाफ भी टिप्पणियाँ की गईं।

सभा में लोगों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) तोड़ने और ईवीएम के जरिए होने वाले चुनावों का विरोध करने की भी अपील की गई। शिकायत में कहा गया कि ये भाषण अलग-अलग समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने, राष्ट्रीय एकता को प्रभावित करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।

शिकायत के बाद पुलिस ने 4 मार्च 2024 को 12 लोगों के खिलाफ हेट क्राइम का मामला दर्ज किया। जाँच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 153B, 295A, 505(2), 294 और 34 के तहत आरोप तय किए।

बाद में सेशन कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद आरोपित सामाजिक कार्यकर्ता हाई कोर्ट पहुँचे। अभियोजन पक्ष ने कहा कि ऐसे बयानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना जरूरी है कि ये बातें किस तरह के लोगों के सामने कही गईं और उनका सांप्रदायिक सौहार्द तथा कानून-व्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता था।

गौरतलब है कि FIR में कुल 12 लोगों के नाम थे, लेकिन उनमें से रूपनारायण एक्का ने कार्यवाही रद्द कराने वाली इस याचिका में हिस्सा नहीं लिया।

कार्यकर्ताओं ने अभिव्यक्ति की आजादी का दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए काम करते हैं और उनके बयान सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा का हिस्सा थे।

उन्होंने कहा कि उनके बयान संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से संरक्षित हैं और वैज्ञानिक सोच तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 51A(h) के अनुरूप हैं।

उनका यह भी कहना था कि उनका किसी की धार्मिक भावनाएं आहत करने या समुदायों के बीच दुश्मनी फैलाने का कोई जानबूझकर इरादा नहीं था।

कोर्ट ने कहा- ट्रायल जरूरी है

हाईकोर्ट ने यह दलील खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के तर्कों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका में विचार नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के बराबर था।

खंडपीठ ने कहा, “जाँच के दौरान जुटाई गई सामग्री से प्रथम दृष्टया यह सामने आता है कि बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी वाली एक सार्वजनिक सभा में, जिसमें अलग-अलग समुदायों के लोग भी शामिल थे, हिंदू धर्म, धार्मिक व्यक्तित्वों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ कथित बयान दिए गए थे।”

कोर्ट ने आगे कहा, “यह तय करना कि संबंधित बयान वैध आलोचना की सीमा में आते हैं या फिर अभियोजन द्वारा लगाई गई दंडात्मक धाराओं के तहत दंडनीय अपराध की सीमा पार करते हैं, शुरुआती चरण में कार्यवाही रद्द करने वाली याचिका में उचित तरीके से नहीं किया जा सकता।”

बचाव पक्ष की इस दलील पर कि याचिकाकर्ता सामाजिक कार्यकर्ता, तर्कवादी या वैज्ञानिक सोच के समर्थक हैं और उनके बयान केवल सामाजिक सुधार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिए गए थे, कोर्ट ने कहा कि केवल इसी आधार पर इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि इन बयानों के बाद कोई वास्तविक सांप्रदायिक हिंसा या कानून-व्यवस्था की समस्या सामने नहीं आई, यह मुकदमा खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि जाँच में गवाहों के बयान, कार्यक्रम के पर्चे, कार्यक्रम की वीडियोग्राफी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रमाणपत्र भी शामिल हैं।

इससे स्पष्ट है कि मामला केवल अनुमान पर आधारित नहीं है, बल्कि उसके समर्थन में पर्याप्त सामग्री मौजूद है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर फैसला देने तक सीमित हैं और ट्रायल के दौरान मामले के गुण-दोष पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।

फैसले में कहा गया, “FIR, चार्जशीट, 19 सितंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कुनकुरी द्वारा आरोप तय करने के आदेश, 24 जनवरी 2026 को प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कुनकुरी द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश तथा उनसे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए यह याचिका निराधार है और इसे खारिज किया जाता है।”

हाईकोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल कार्यवाही रद्द करने की याचिका तक सीमित हैं और मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं हैं। कोर्ट ने कहा, “ट्रायल कोर्ट इस मामले की सुनवाई स्वतंत्र रूप से करेगा और कानून के अनुसार तथा ट्रायल के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही फैसला सुनाएगा।”

बेटा UP पुलिस में SI, बाप लोगों को बनाता है ईसाई: मीडिया रिपोर्ट, शिकायत के बाद प्रेमपाल गिरफ्तार, जानिए- बरेली SP ने क्या बताया, कौन-सी मजहबी किताबें हुई बरामद

उत्तर प्रदेश के बरेली में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। पुलिस ने ईसाई मिशनरी के एक आरोपित को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, 09 जुलाई 2026 को गाँव में एक प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को ईसाई बनने के लिए लालच दिया जा रहा था। इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया और अगले ही दिन आरोपित प्रेमपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव का रहने वाला है। उसके पास से बाइबल समेत 6 ईसाइयत की किताबें, एक हाथ से लिखी नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ है। यह भी सामने आया कि प्रेमपाल यादव वर्षों पहले खुद धर्मांतरण कर चुका है और अब हिंदुओं को धर्मांतरण करवाने वाले नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

सैजना गाँव में प्रार्थना सभा से FIR तक, जानिए कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

बरेली के मीरगंज थाना क्षेत्र के सैजना गाँव में धर्मांतरण का मामला 09 जुलाई 2026 को सामने आया। थाना मीरगंज में दर्ज FIR के मुताबिक, गाँव के रहने वाले अंकित पुत्र खूबकरन ने पुलिस को शिकायत देकर आरोप लगाया कि शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव निवासी 51 वर्षीय प्रेमपाल ने गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर एक प्रार्थना सभा आयोजित की थी।

शिकायत में कहा गया कि इस प्रार्थना सभा के दौरान हिंदुओं को ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। बताया गया कि वहाँ मौजूद लोगों को ईसाइयत से जुड़ी प्रचार सामग्री दी गई, नौकरी और पैसों का लालच दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि सभा के दौरान हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की गईं।

इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज पुलिस ने प्रेमपाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 62 और 299 के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध संपरिवर्तन अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी।

भागने की फिराक में प्रेमपाल को पुलिस ने धरा, ईसाइयत की किताबें बरामद

प्रेमपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना मीरगंज पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। पुलिस के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपित प्रेमपाल इलाके से निकलने की फिराक में है। इसके बाद पुलिस टीम ने नगरिया सादात फाटक के सामने अंडरपास के नीचे घेराबंदी कर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित की पहचान प्रेमपाल पुत्र पातीराम, निवासी ग्राम भुडासी, थाना शीशगढ़, जनपद बरेली के रूप में हुई। तलाशी के दौरान उसके पास से एक बाइबल, ‘शास्त्र भजनसंहिता और नीतिवचन’, ‘नया नियम’, ‘मुक्तिदाता कौन’, ‘बेदारी के गीत’ नाम से 6 ईसाइयत की किताबें, एक हस्तलिखित नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया। पुलिस ने इन सभी सामानों को कब्जे में लेकर उन्हें जाँच का हिस्सा बनाया है।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, गिरफ्तारी की कार्रवाई उपनिरीक्षक नितिन शिरीष, उपनिरीक्षक राजवीर सिंह, हेड कांस्टेबल मोहम्मद उमर और कॉन्स्टेबल अमित कुमार की टीम ने की। पुलिस का कहना है कि आरोपित के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई पूरी करते हुए उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।

पुलिस हिरासत में माफी माँगने लगा आरोपित प्रेमपाल

मामले में पुलिस की ओर से जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल ने खुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताया है। पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि 09 जुलाई 2026 को सैजना गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर ईसाइयत के प्रचार और धर्म परिवर्तन के संबंध में एक सभा आयोजित की गई थी।

पुलिस के मुताबिक, आरोपित ने पूछताछ में बताया कि उस सभा में अमित, रोहित, धर्मेंद्र और तीरथराम समेत कई लोग मौजूद थे। उसका यह भी कहना था कि काफी प्रयास करने के बावजूद वहाँ मौजूद ये लोग ईसाई नहीं बने। पुलिस को आरोपित ने यह भी बताया कि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिलने के बाद वह वहाँ से भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताते हुए कहा कि उससे गलती हो गई।

ईसाई धर्मांतरण करवाने वाले प्रेमपाल का बेटा सब-इंस्पेक्टर: रिपोर्ट्स

धर्मांतरण का मामले सामने आने के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में कई दावे भी किए गए हैं, जिनका उल्लेख पुलिस की FIR या आधिकारिक प्रेस नोट में नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गिरफ्तार प्रेमपाल वर्षों पहले ईसाई में परिवर्तित हुआ था। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि उसका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि प्रेमपाल लंबे समय से ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ था और गाँवों में प्रार्थना सभाएँ आयोजित करता था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे धर्म परिवर्तन के नेटवर्क पर प्रशासन की बड़ी कार्रवाई बताया गया है। हालाँकि, पुलिस ने इसको लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिलहाल पुलिस केवल आरोपों और जाँच के आधार पर आगे बढ़ रही है।

80+ देशों में Make In India हथियार, ब्रह्मोस के साथ अस्त्र, तेजस और पिनाका की तेजी से बढ़ी माँग: समझें मोदी सरकार के किन कदमों से भारत बना हथियारों का प्रमुख निर्यातक

आज की दुनिया में कोई भी देश कितना शक्तिशाली है, यह इस बात से तय होता है कि वह हथियारों के मामले में दूसरों पर कितना निर्भर है। कुछ साल पहले तक भारत को दुनिया के उन देशों में गिना जाता था जो बाहर से सबसे ज्यादा हथियार खरीदते थे। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका है।

‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं के कारण आज भारत खुद अपने देश में आधुनिक हथियार बना रहा है। यही वजह है कि आज भारत दुनिया के करीब 80 से ज्यादा देशों को अपने सैन्य उत्पाद, हथियारों के कलपुर्जे और मिसाइलें बेच रहा है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 के आँकड़े बताते हैं कि भारत का रक्षा निर्यात (Defence Export) 38,424 करोड़ रुपए (लगभग 4 बिलियन डॉलर) को पार कर चुका है, जो अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। इस कामयाबी के बीच इंडोनेशिया के साथ हुआ ‘ब्रह्मोस’ और ‘अस्त्र’ मिसाइल का नया सौदा भारत के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक जीत है।

इस ऐतिहासिक डील के बाद अब पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि भारत बहुत जल्द डिफेंस सेक्टर में दुनिया का नया ‘सम्राट’ बनने की राह पर है।

वैश्विक रक्षा बाजार में भारतीय हथियारों की बढ़ती माँग और इसकी बड़ी वजहें

आज के समय में दुनिया के तमाम देश अपनी सुरक्षा के लिए भारतीय हथियारों और मिसाइलों पर भरोसा जता रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत की मिसाइल तकनीक अत्यधिक आधुनिक होने के साथ-साथ दुनिया के अन्य बड़े देशों के मुकाबले कई गुना ज्यादा किफायती है।

कम रक्षा बजट वाले छोटे देशों के लिए पश्चिमी देशों या अमेरिका से इस स्तर की मारक क्षमता वाले हथियार खरीदना उनके बजट से बाहर होता है। दूसरा सबसे बड़ा कारण भारत की रणनीतिक छवि है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को एक ऐसे व्यावहारिक प्रदाता के रूप में देखा जाता है जो किसी भी महाशक्ति के गुट का हिस्सा नहीं है और न ही वह इन देशों की संप्रभुता के लिए कोई राजनीतिक दबाव या सुरक्षा खतरा पैदा करता है।

यही वजह है कि ये देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए पूरी तरह अमेरिका या पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहते, क्योंकि उनके हथियारों के साथ कई तरह के कड़े राजनीतिक प्रतिबंध और शर्तें जुड़ी होती हैं। रणनीतिक स्वायत्तता की इसी चाहत ने आज भारतीय हथियारों को दुनिया की एक बड़ी जरूरत बना दिया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक: कहाँ-कहाँ सफल रही स्वदेशी मिसाइलें

किसी भी हथियार प्रणाली की साख तब तक पूरी तरह स्थापित नहीं होती जब तक कि वह वास्तविक युद्ध या किसी बड़े और जटिल सैन्य ऑपरेशन में अपनी उपयोगिता और अचूकता साबित न कर दे। भारतीय मिसाइल तकनीक के संदर्भ में यह अटूट साख ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पूरी तरह सिद्ध हुई थी।

इस बड़े और संवेदनशील सैन्य अभियान के दौरान भारत की इन दोनों स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों ने पाकिस्तान के बारह सैन्य एयरबेस को पूरी तरह से तबाह करने और दुश्मन की हवाई तथा जवाबी ताकत को पंगु बनाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसी वास्तविक युद्ध-परीक्षित सफलता के कारण आज वैश्विक स्तर पर इन दोनों मिसाइलों को लेकर कौतूहल और अंतरराष्ट्रीय माँग दोनों में भारी इजाफा हुआ है। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन तथा रूस के संयुक्त उपक्रम द्वारा तैयार की गई ब्रह्मोस मिसाइल 300 किलोमीटर की दूरी तक अत्यंत सटीक मार करने में पूरी तरह सक्षम है।

इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी सुपरसोनिक गति, अत्यधिक संहारक क्षमता और बहुमुखी प्रतिभा है, जिसके कारण इसे थल सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों के द्वारा भूमि, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमानों से समान रूप से संचालित किया जा सकता है।

दूसरी तरफ रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित की गई अस्त्र मिसाइल हवा से हवा में मार करने वाली एक बेहद घातक प्रणाली है, जो सौ किलोमीटर की दूरी तक दुश्मन के विमानों को आसानी से निशाना बना सकती है।

यह मिसाइल हवा की सामान्य गति से साढ़े चार गुना तेज रफ्तार से चलती है और 20 किलोमीटर की अत्यधिक ऊँचाई तक जाकर दुश्मन के आधुनिक लड़ाकू विमानों को ध्वस्त करने की क्षमता रखती है।

इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता: भारतीय रक्षा निर्यात का एक नया मील का पत्थर

भारत की इसी बढ़ती साख का ताजा उदाहरण इंडोनेशिया के साथ हुआ हालिया रक्षा समझौता है, जिसे इस दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र मिसाइल की खरीद को लेकर दो अलग-अलग समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए।

यह भारत के रक्षा इतिहास में पहला मौका है जब किसी देश के साथ एक ही समय में एक साथ दो बड़े रक्षा सौदे किए गए हैं। हालाँकि रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इंडोनेशिया को कुल कितनी संख्या में ये मिसाइलें दी जाएँगी और इसकी अंतिम व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह तय होना बाकी है, जिस पर आने वाले दिनों में दोनों देशों की टीमें बैठकर चर्चा करेंगी।

इंडोनेशिया के पास भी वही रूसी सुखोई लड़ाकू विमान हैं जिनका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना करती है। चूँकि भारत अपनी वायुसेना के सुखोई विमानों में अस्त्र मिसाइल को पहले ही सफलतापूर्वक फिट और संचालित कर चुका है, इसलिए इंडोनेशियाई वायुसेना के लिए भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए यह मिसाइल तकनीकी रूप से आसान विकल्प बनकर उभरी है।

फिलीपींस से लेकर वियतनाम तक: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ बनता नया समीकरण

इंडोनेशिया से पहले हिंद-प्रशांत और दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई अन्य देश भी भारत की मिसाइल तकनीक को अपना चुके हैं। फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया तीसरा ऐसा देश है जिसने भारत से ब्रह्मोस मिसाइलों की खरीद की है। फिलीपींस ने साल 2022 में लगभग 375 मिलियन डॉलर का बड़ा अनुबंध करके भारतीय मिसाइल को अपनी नौसेना का हिस्सा बनाया था, जबकि इस साल वियतनाम ने भी इसके लिए समझौता किया है।

इन समझौतों के पीछे सबसे बड़ी वजह दक्षिण चीन सागर में चीन का बढ़ता आक्रामक व्यवहार और सैन्य विस्तारवाद है, जिसने इस क्षेत्र के छोटे देशों को अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित कर दिया है। हालाँकि इंडोनेशिया सीधे तौर पर चीन को अपना प्राथमिक सुरक्षा खतरा नहीं मानता, लेकिन उत्तरी नटूना सागर में समुद्री दावों को लेकर बीजिंग के साथ उसके मतभेद साफ हैं।

हाल ही में चीन द्वारा प्रशांत महासागर में किए गए बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण ने इन देशों को अपनी रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने के लिए और प्रेरित किया है। ऐसे में भारत इन देशों के लिए एक गैर-आक्रामक और भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में सामने आया है, जो इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद कर रहा है।

खाड़ी देशों से लेकर लैटिन अमेरिका तक: ब्रह्मोस को खरीदने की कतार में लगे 11 अन्य देश

भारतीय मिसाइलों का जादू सिर्फ दक्षिण-पूर्वी एशिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य क्षेत्रों में भी इसकी भारी माँग देखी जा रही है। वर्तमान में दुनिया के 11 अन्य प्रमुख देश जिनमें थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, चिली, अर्जेंटीना तथा वेनेजुएला शामिल हैं, ब्रह्मोस मिसाइल को खरीदने में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा चुके हैं।

भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से बनाई जा रही ब्रह्मोस की तटीय और तटीय सुरक्षा क्षमताओं, विशेष रूप से इसके एंटी-शिप वर्जन ने इन देशों को बहुत प्रभावित किया है। संयुक्त अरब अमीरात जैसी खाड़ी शक्तियों के साथ भी ब्रह्मोस मिसाइल और आकाशतीर एयर-डिफेंस कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम को लेकर बातचीत चल रही है, जो भारत के रक्षा निर्यात को पश्चिम एशिया के बाजारों में एक बहुत बड़ा विस्तार दे सकती है।

इसके अलावा एक बेहद दिलचस्प बात यह भी सामने आ रही है कि खुद रूस, जो इस मिसाइल के सह-विकास में भारत का साझेदार रहा है, वह भी अपनी सशस्त्र सेनाओं में ब्रह्मोस प्रणाली को शामिल करने पर विचार कर रहा है, जो इस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय साख को और ज्यादा मजबूत बनाता है।

पिनाका और तेजस: मिसाइलों से आगे बढ़कर दुनिया में धूम मचाते अन्य स्वदेशी हथियार

भारत की यह रक्षा सफलता केवल ब्रह्मोस या अस्त्र मिसाइल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के कई अन्य अत्याधुनिक और स्वदेशी सैन्य उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में धूम मचा रहे हैं। इसमें सबसे पहला नाम रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित की गई पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर प्रणाली का है।

यह घातक लॉन्चर बेहद खराब मौसम में भी महज 44 सेकेंड के भीतर 72 रॉकेट दागकर सत्तर किलोमीटर की दूरी पर स्थित दुश्मन के ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है। आर्मेनिया ने भारत के साथ इस स्वदेशी प्रणाली और गोला-बारूद को खरीदने के लिए एक बड़ा समझौता किया है।

इसी तरह भारत का स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान ‘तेजस’ भी कई देशों की पहली पसंद बना हुआ है। मलेशिया के साथ तेजस का रक्षा सौदा इस समय बिल्कुल अंतिम चरण में है।

इसके अलावा अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, अमेरिका, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे छह बड़े देशों ने भी तेजस फाइटर जेट को अपने बेड़े में शामिल करने के लिए उन्नत स्तर की रुचि दिखाई है, जो दिखाता है कि भारत अब विमानन क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपना लोहा मनवा रहा है।

सम्राट बनने की राह में मौजूद बड़ी चुनौतियाँ और भविष्य का रोडमैप

भले ही भारत का रक्षा निर्यात पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा है और भारत की साख एक निर्यातक के रूप में मजबूत हुई है, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्षा उद्योग का असली और ‘सम्राट’ बनने की राह में भारत के सामने अभी कई बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं और एक लंबा सफर तय करना बाकी है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SPRI की वैश्विक रिपोर्टों और रक्षा आँकड़ों के अनुसार, भारत अभी भी दुनिया के शीर्ष 25 हथियार निर्यातक देशों की मुख्य सूची में अपनी स्थायी जगह बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। वैश्विक रक्षा बाजार के कुल हथियार कारोबार में भारत की हिस्सेदारी वर्तमान में एक प्रतिशत के आसपास ही सिमटी हुई है।

इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका 331 बिलियन डॉलर के भारी-भरकम कारोबार के साथ दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

इसके साथ ही भारतीय रक्षा परिदृश्य की एक बड़ी हकीकत यह भी है कि वह आज भी दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक यानी खरीदार देश बना हुआ है, जो अपनी कुल आधुनिक रक्षा जरूरतों का आठ प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाहर से मंगाता है।

रक्षा विश्लेषकों और सामरिक विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत की दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि वह कितनी मिसाइलें या लड़ाकू विमान बेचता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह खरीदार देशों को कितनी बेहतर ट्रेनिंग, निरंतर स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति, समय पर तकनीकी मरम्मत और पूरे जीवनकाल के लिए तकनीकी सहायता यानी लाइफसाइकिल सपोर्ट प्रदान कर पाता है, जैसा कि दुनिया के स्थापित और पुराने रक्षा आपूर्तिकर्ता देश करते आए हैं।

भारत सरकार ने आने वाले समय में रक्षा उत्पादन को 1 लाख 75 हजार करोड़ रुपए तक पहुँचाने और दुनिया के शीर्ष पाँच रक्षा निर्यातक देशों में गरिमापूर्ण स्थान हासिल करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इंडोनेशिया के साथ हुआ दोहरा समझौता निश्चित रूप से भारत को इस लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाने का काम करेगा।

हालाँकि वैश्विक बाजार पर पूरी तरह हावी होने और अपनी बादशाहत कायम करने के लिए भारत को अपने घरेलू निजी क्षेत्र और सरकारी रक्षा विनिर्माण उद्यमों को और अधिक व्यापक, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत तथा त्वरित निर्णय लेने में सक्षम बनाना होगा।

भविष्य की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भरता का नया अध्याय

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का 80 से अधिक देशों में हथियार बेचना और ब्रह्मोस तथा अस्त्र जैसी मिसाइलों का सफल अंतरराष्ट्रीय सौदा करना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल दूसरों की तकनीक पर निर्भर रहने वाला देश नहीं रहा। भारत ने रक्षा के क्षेत्र में अपनी स्वदेशी अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया है।

जर्मनी में चीनी ड्रग-रेप और टेलीग्राम गैंग का भंडाफोड़, लेकिन DW ने घुसाया एंटी-इंडिया प्रोपेगेंडा: समझें- पाकिस्तानी ग्रूमिंग जिहादियों को छोड़ क्यों घसीटा कुंभ का नाम

जर्मनी की राजधानी बर्लिन सहित कई शहरों में चीनी मूल के नागरिकों द्वारा संचालित ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ नामक टेलीग्राम गैंग का भंडाफोड़ हुआ है। यह गैंग चीनी छात्राओं को नशीला पदार्थ देकर उनका यौन शोषण करता था और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करता था। अदालत ने मुख्य आरोपित टोंग जेड को 5 साल 9 महीने और एडमिन दापेंग जेड को 14 साल की सजा सुनाई है

इस चीनी गैंग के अलावा जर्मनी में सीरियाई और पाकिस्तानी प्रवासियों के खतरनाक ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय हैं, जो नाबालिग लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। यह बिल्कुल ब्रिटेन के उस कुख्यात पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग जैसा है जिसने दशकों तक हजारों गैर-मुस्लिम बच्चियों का बर्बर उत्पीड़न किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जर्मनी से लड़कियों के सुनियोजित यौन शोषण, ड्रग्स देने और उनके वीडियो बनाकर शेयर करने वाले खतरनाक गैंग्स के मामले सामने आए हैं। जिसमें एक चीनी टेलीग्राम गैंग ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ का भी भंडाफोड़ हुआ है। इस गैंग ने ड्रग्स और बलात्कार के जरिए आतंक मचा रखा था। लेकिन जर्मन सरकारी ब्रॉडकास्टर डॉयचे वेले (DW) का ध्यान इन गंभीर और वीभत्स मामलों से हटकर भारत को बदनाम करने पर केंद्रित है।

DW हिंदी की वीडियो रिपोर्ट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। DW ने अपनी इस रिपोर्ट में यूके के पाकिस्तानी अपराधियों का नाम तक नहीं लिया और नैरेटिव को भटकाने के लिए जबरन भारत का नाम घसीटकर एंटी-हिंदू प्रोपेगेंडा चलाया। पश्चिमी मीडिया का यह रवैया उसकी स्थापित ‘व्हाटअबाउटरी’ और टूलकिट का हिस्सा है।

जर्मनी का चीनी ‘ड्रग रेप’ टेलीग्राम गैंग, जो दिन में ‘गॉड’ और रात में ‘डेविल’ बन जाते

जर्मनी की राजधानी बर्लिन और अन्य शहरों को दहला देने वाले एक मामले में ‘जर्मन ड्राइविंग स्कूल’ नाम के एक टेलीग्राम ग्रुप का पर्दाफाश हुआ है। इस ग्रुप में चीनी मूल के पुरुष शामिल थे, जो जर्मनी में पढ़ रहे थे या काम कर रहे थे। इस गैंग का मुख्य तौर-तरीका अपनी ही पहचान की चीनी और एशियाई मूल की छात्राओं और महिलाओं को निशाना बनाना, उन्हें नशीला पदार्थ (ड्रग्स) देना और फिर बेहोशी की हालत में उनका बलात्कार कर वीडियो बनाना था।

अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इस गैंग के एक मुख्य अपराधी 26 वर्षीय टोंग जेड (Tong Z) को बर्लिन की अदालत ने गंभीर बलात्कार, खतरनाक शारीरिक नुकसान और व्यक्तिगत गोपनीयता के उल्लंघन के लिए 5 साल और 9 महीने की जेल की सजा सुनाई है। टोंग जेड टेलीग्राम पर “God by day, devil by night” (दिन में भगवान, रात में शैतान) नाम से सक्रिय था।

टोंद जेड बाहर से तो बेहद सभ्य, मददगार और अच्छा खाना पकाने वाला लड़का दिखता था, लेकिन पीठ पीछे वह एक दरिंदा था। उसने 2019 से 2024 के बीच जर्मनी, पोलैंड, डेनमार्क और चीन की यात्राओं के दौरान कम से कम 11 महिलाओं का यौन शोषण किया। उसने अपनी एक पड़ोसी के बाथरूम में मास्टर की (स्पेयर चाबी) से घुसकर हिडन कैमरा तक लगा दिया था।

टोंग जेड ने 2024 में एक ऐसी महिला के साथ बलात्कार किया और उसका वीडियो बनाया जो शारीरिक और मानसिक रूप से आंशिक रूप से अपंग थी। उसने महिला को भारी मात्रा में नशीला पेय पिलाया था। जब पुलिस ने टोंग जेड के ठिकाने पर छापा मारा, तो वहाँ से कंडोम, महिलाओं के अंतर्वस्त्र, सीरिंज, नशीली दवाएँ और 2 टेराबाइट (2TB) से अधिक डेटा वाले हार्ड ड्राइव मिले, जिनमें हर पीड़ित महिला के नाम का एक अलग फोल्डर बना हुआ था। वह इन वीडियो के जरिए महिलाओं को ब्लैकमेल करता था और कोर्ट में स्वीकार किया कि महिलाओं का रोना और भीख माँगना उसे और अधिक उत्तेजित करता था।

इस गैंग का एडमिन 44 वर्षीय आईटी इंजीनियर दापेंग जेड (Dapeng Z) था, जिसे जर्मन अदालत ने गंभीर बलात्कार और हत्या के प्रयास के लिए 14 साल की जेल की सजा सुनाई है। वहीं, एक अन्य चीनी छात्र झोंगयी जे (Zhongyi J) को 11 साल से अधिक की सजा मिली है। कोर्ट ने माना कि इन लोगों ने पीड़ितों को जानलेवा मात्रा में ड्रग्स दिए थे। टेलीग्राम ग्रुप पर ये अपराधी कोडवर्ड का इस्तेमाल करते थे, जिसमे नशीली दवाओं और एनेस्थेटिक्स के लिए ‘फ्यूल’ (ईंधन) और अपने टारगेट (शिकार) के लिए ‘कार’ नाम का कोडवर्ड।

यह मामला ब्रिटेन में 2025 में पकड़े गए चीनी सीरियल रेपिस्ट झेनहाओ जोउ (Zhenhao Zou) जैसा ही था, जिसने ब्रिटेन और चीन में 10 महिलाओं को ड्रग देकर बलात्कार किया था और उसे उम्रकैद की सजा मिली थी।

जर्मनी में सीरियाई और पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय

चीनी गैंग के अलावा जर्मनी में यूके की तर्ज पर ही पाकिस्तानी और सीरियाई मूल के प्रवासियों के ग्रूमिंग गैंग भी सक्रिय हैं। जर्मनी के विभिन्न शहरों में नाबालिग लड़कियों को निशाना बनाने, उन्हें ड्रग्स की लत लगाने और फिर उनका यौन शोषण करने के आरोप में 6 सीरियाई और पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है।

ये गैंग्स वहाँ की सामाजिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन चुके हैं, जो ठीक उसी ढर्रे पर काम कर रहे हैं जो ब्रिटेन के मैनचेस्टर, रोदरहैम और टेलफोर्ड में देखा गया था।

ब्रिटेन के पाकिस्तानी ग्रूमिंग जिहाद गैंग ने पार कर दी थी टॉर्चर और बर्बरता की हर लकीर

अगर जर्मनी के चीनी गैंग के कारनामे घिनौने हैं, तो ब्रिटेन में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स का इतिहास रोंगटे खड़े करने वाला है। ब्रिटेन के विभिन्न शहरों जैसे टेलफोर्ड, रोदरहैम, रोशडेल और वेस्ट लंदन में पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम पुरुषों ने दशकों तक श्वेत और सिख लड़कियों को निशाना बनाया।

एक पीड़ित लड़की ने जीबी न्यूज (GB News) की डॉक्यूमेंट्री में खुलासा किया कि टेलफोर्ड में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग ने उसका 1000 से अधिक बार बलात्कार किया।

ब्रिटिश सांसद रूपर्ट लोव ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर इन मुस्लिम ग्रूमिंग गैंग्स की बर्बरता को याद करते हुए बताया कि ये अपराधी पीड़ितों के निजी अंगों में काँच की बोतलें डाल देते थे, उनके चेहरों पर जलती हुई सिगरेट बुझाते थे और ईसाई लड़कियों को प्रताड़ित करने के लिए उनके सामने क्रॉस (क्रिश्चियन प्रतीक) का अपमान करते थे।

ब्रिटेन की एक 219 पन्नों की डिटेल्ड इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 149 शहरों में फैले इस नेटवर्क के कारण 2.5 लाख से अधिक लड़कियाँ और बच्चे बलात्कार और यौन शोषण का शिकार हुए।

चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें 87 प्रतिशत से अधिक आरोपित मुस्लिम (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के) थे। वेस्ट लंदन में एक 14 वर्षीय सिख लड़की के गैंगरेप के बाद सिख समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया था।

इसके बावजूद लंदन के मेयर सादिक खान और मेट्रोपॉलिटन पुलिस पर राजनीतिक शुद्धता (Political Correctness) और ‘इस्लामोफोबिया’ के डर से इस पूरे स्कैंडल को दबाने और छिपाने के आरोप लगे।

ब्रिटिश मीडिया और प्रशासन इन अपराधियों को ‘पाकिस्तानी’ कहने के बजाय ‘एशियन’ कहकर सच्चाई पर पर्दा डालते रहे, ताकि मुस्लिम तुष्टिकरण बना रहे।

जबकि एलन मस्क तक ने रोदरहैम सेक्स स्कैंडल पर ट्वीट कर इस भयावहता की ओर दुनिया का ध्यान खींचा था, जहाँ प्रशासन की लापरवाही के कारण हजारों लड़कियों का जीवन बर्बाद हो गया।

DW ने अपने वीडियो में भारत को जबरन खींच कर घुसेड़ा एंटी हिंदू प्रोपेगेंडा

अब आते हैं डॉयचे वेले (DW) हिंदी की उस रिपोर्ट पर, जिसने जर्मनी और यूरोप में प्रवासियों और चीनी गैंग्स द्वारा किए जा रहे इन जघन्य अपराधों पर पर्दा डालने के लिए भारत विरोधी एजेंडा चलाया। DW की रीतिका द्वारा एंकर किए गए वीडियो में रेफरेंस के तौर पर दो मामलों का जिक्र किया गया है।

पहला मामला भारत के कुंभ मेले का बताया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ असामाजिक तत्वों (जिन्हें रिपोर्ट में मुस्लिम जिहादी बताने के बजाय सामान्यीकृत किया गया) ने हिंदू महिलाओं और लड़कियों के नहाने और कपड़े बदलने के वीडियो ग्रुप में शेयर किए। दूसरा मामला दक्षिण कोरिया की स्कूली लड़कियों को टेलीग्राम के जरिए डीपफेक या वीडियो में टारगेट करने का था।

सोचने वाली बात यह है कि जर्मनी के भीतर हो रहे ड्रग रैकेट, गैंग रेप, बेहोश करके वीडियो बनाने और ब्लैकमेल करने जैसे जघन्य अंतरराष्ट्रीय अपराधों की तुलना भारत के कुंभ मेले के एक स्थानीय मामले से क्यों की गई? खास बात ये है कि इस मामले में भी जिहादी एंगल सामने आया था, जिसमें कामरान नाम का कथित पत्रकार गिरफ्तार हुआ था। लेकिन यहाँ ड्रग्स देकर रेप और रेप का वीडियो बनाने जैसा कोई मामला था क्या?

कुंभ मेले या दक्षिण कोरिया के मामले निश्चित रूप से कानूनी और नैतिक रूप से गलत हैं, लेकिन वे उस अंतरराष्ट्रीय ‘ड्रग एंड रेप’ सिंडिकेट, सिस्टेमिक ग्रूमिंग जिहाद और टॉर्चर से कहीं हल्के हैं जो जर्मनी और यूके में चल रहा है।

DW ने चालाकी से यूके के पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स का नाम तक नहीं लिया, जिसके कारण ब्रिटेन की राजनीति में भूचाल आ गया, कई जाँच बैठानी पड़ीं और सादिक खान जैसे नेताओं पर उंगलियाँ उठीं। DW का पूरा फोकस जर्मनी के अपराधियों के नेटवर्क को उजागर करने के बजाय नैरेटिव को डायवर्ट करके भारत का नाम जोड़ने पर था।

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट में पहले ही खुलासा कर चुका है कि कैसे डॉयचे वेले (DW) जर्मन सरकार के इशारे पर एक प्रोपेगेंडा मशीन की तरह काम करता है। यह चैनल ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर्स और विभिन्न वामपंथी एनजीओ (NGOs) और कार्यकर्ताओं के माध्यम से भारत के खिलाफ एक वैचारिक युद्ध (Ideological War) चलाता है। राहुल गाँधी की हर्टी स्कूल (Hertie School) की यात्रा और जर्मनी के विभिन्न थिंक-टैंकों की भारत में सक्रियता इसी टूलकिट का हिस्सा है।

वेस्टर्न मीडिया का भारत-विरोधी टूलकिट क्यों हर मामले में ढूँढता है भारत का नाम?

डॉयचे वेले (DW) का यह रवैया कोई अपवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी वेस्टर्न मीडिया (पश्चिमी मीडिया) की उस स्थापित कार्यप्रणाली का हिस्सा है, जो भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा चलाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती। भले ही किसी वैश्विक या स्थानीय अपराध का भारत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना न हो, पश्चिमी पत्रकार और संस्थान किसी न किसी तरह भारत का नाम उसमें घसीट ही लाते हैं। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती छवि, उसकी सांस्कृतिक पहचान और उसकी संप्रभुता को धूमिल करना है।

जब पश्चिमी देशों में नस्लवाद, प्रवासियों द्वारा किए जा रहे अपराध या आंतरिक कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है, तो वहाँ की सरकारें और उनके पोषित मीडिया संस्थान अपने नागरिकों का ध्यान भटकाने के लिए भारत जैसे विकासशील और मजबूत होते देश को सॉफ्ट टारगेट बनाते हैं। जर्मनी में चीनी गैंग्स और सीरियाई-पाकिस्तानी अपराधियों द्वारा फैलाई जा रही असुरक्षा को छिपाने के लिए DW ने कुंभ मेले का उदाहरण दिया, ताकि पश्चिमी दर्शकों को यह संदेश दिया जा सके कि “देखिए, यह समस्या केवल हमारे यहाँ नहीं है, भारत में भी ऐसा ही होता है।” यह ‘व्हाटअबाउटरी’ (Whataboutism) का सबसे घटिया रूप है।

इसके अतिरिक्त इस प्रोपेगेंडा के पीछे एक गहरी हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी मानसिकता काम करती है। कुंभ मेला हिंदुओं का सबसे पवित्र और बड़ा सांस्कृतिक समागम है। उस समागम का नाम एक अंतरराष्ट्रीय बलात्कार और ड्रग्स नेटवर्क की रिपोर्ट में जोड़कर वेस्टर्न मीडिया सीधे तौर पर भारत की सांस्कृतिक धरोहर और बहुसंख्यक समाज की छवि को वैश्विक स्तर पर विकृत (Dehumanize) करने का प्रयास करता है। वे यूके के ‘पाकिस्तानी’ गैंग को ‘एशियन’ कहकर छुपाते हैं, लेकिन भारत के किसी भी मामले में देश और संस्कृति की पहचान को उछालने में एक सेकंड की भी देरी नहीं करते।

यहाँ आपका ये समझना जरूरी है कि यह पूरी कवायद वैश्विक नैरेटिव कंट्रोल (Global Narrative Control) की जंग है। पश्चिमी देश और उनका मीडिया यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं कि भारत आज अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, मजबूत आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के साथ आगे बढ़ रहा है।

यही कारण है कि न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी से लेकर डॉयचे वेले या फिर विकीपीडिया सभी एक ही टूलकिट पर काम करते हैं। जर्मनी के खुद के घर में आग लगी है, उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन उनकी सरकारी मीडिया मशीनरी भारत में कमियाँ ढूँढने का एजेंडा चला रही है। समय आ गया है कि इस डबल स्टैंडर्ड वाले घटिया प्रोपेगेंडा मशीनरी को पूरी तरह से बेनकाब किया जाए, ताकि आम लोग इनकी हकीकत को जान सकें और इनके झाँसे में न आए।

बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी

केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।

FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।

इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।

हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।

Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।

इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।

केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।

FIFA World Cup: मिकेल मेरीनो का गोल, नैनीताल की बारिश और फुटबॉल का उत्सव

एक-एक कर हम स्कूली ट्रक से उतरे; नीली कमीज, काली निकर और चेहरों पर उतना ही आत्मविश्वास, जितना किसी छोटे कस्बे के लड़के पहली बार किसी बड़े युद्धक्षेत्र में लेकर आते हैं। सामने फैला था पत्थरों से अटा विशाल मैदान, जहाँ कुछ ही देर में हमारा सामना सेंट जौसेफ की टीम से होना था।

मैदान की चारदीवारी के इर्द-गिर्द उनका पूरा कुनबा जमा था, घुटनों तक स्कर्ट पहने अंग्रेजीदां तरुणियाँ और ऐसे लड़के, जिनके चेहरे बता रहे थे कि वे हमें हराने से पहले हमारा मजाक उड़ाने आए हैं। उनकी आवाजें लगातार अंग्रेजी में गूँज रही थीं। वे अपनी टीम के लिए नारे लगा रहे थे या हमारा उपहास कर रहे थे, इसका फैसला हम नहीं कर सकते थे; अंग्रेजी हमारे लिए तब तक बस एक ऐसी भाषा थी, जिसमें डाँट भी कविता जैसी लगती थी। एक पल को तो सचमुच लगा कि शायद हमारे स्वागत में कोई सामूहिक गीत गाया जा रहा है।

मैच शुरू होने में अब बस कुछ ही मिनट बाकी थे। उधर कोच साहब पूरी गंभीरता से रणनीति समझा रहे थे; किसे कहाँ दौड़ना है, किसे किसे मार्क करना है। मगर हमारी निगाहें फुटबॉल पर कम और स्टैंड्स में बैठे उस अनजान संसार पर ज्यादा थीं, जहाँ अंग्रेजी बोलना भी किसी अलग ही खेल का हिस्सा लगता था।

पथरीले मैदान के ठीक सामने एक बेहद खूबसूरत झील थी जिसने बादलों की नर्म ऊनी मफलर ओढ़ रखी थी। उस झील के एक तरफ थी मॉल रोड और दूसरी ओर, ठंडी सड़क की तरफ, नैना मंदिर से लगकर था भूटिया बाजार; जहाँ के गर्म थुक्पा-मोमो की खुश्बू हमें अपनी ओर बुला रही थी। झील में रंगबिरंगी पालों वाली कई नन्हीं नावें दिख रही थीं। परसों ही यहाँ खूब बर्फबारी हुई थी। झील के दोनों ओर किसी बुजुर्ग की भांति झील का हाथ थामे खड़े पहाड़ों पर थोड़ी बहुत बर्फ अब भी दिख रही थी।

टिफिन टॉप की दिशा से आती सूरज की मद्धम किरणों से सारी मॉल रोड जगमगाने लगी थी। यह सारा दृश्य किसी फिल्म का सीन सा लग रहा था। एकाएक लगा कि नीली कमीज व काली शॉर्ट्स पहने हम पंद्रह बच्चे किसी फिल्मी सेट पर पहुँच गए हैं। सब इतना खूबसूरत था कि आज भी शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।

खैर, हमारा मैच बस शुरू ही होने को था। एकाएक बारिश होने लगी थी। घनघोर बारिश के बावजूद तमाम भूटिया व कुमाऊंनी समाज के लोग मूंगफली लिए झील किनारे स्थित मैदान में होने जा रहे हमारे मैच को देखने पहुँच चुके थे। मैदान के चारों ओर से वह अपनी पसंदीदा टीम के नारे लगा रहे थे। अथाह शोर के मध्य मैच शुरू हो जाता है।

यहाँ थकने पर भी तुम रुक नहीं सकते थे। क्यूंकि बाहर खड़े तुम्हारे समर्थकों द्वारा तुम्हें ऐसे ऐसे अपशब्द सुनने पड़ते की हालत पतली हो जाती। मगर यही भीड़, अपने नायक पर, अपार स्नेह भी लुटाती थी। जैसे ही कोई नन्हां खिलाड़ी इनकी पसंदीदा टीम के लिए गोल दागता या अहम बचाव करता, यह भीड़ उस खिलाड़ी को कंधों पर उठा लेती। जीतने वाली टीम को कोई मोमोज खिला रहा होता तो कोई थुक्पा परोस रहा होता। हारने वाली टीम को भी लोग पूरा सम्मान दिया करते। फुटबॉल, सदैव, यहाँ किसी उत्सव सा रहा है। जिसे लोग पूरी जिंदादिली से मनाते हैं।

यह नैनीताल से हमारा पहला राब्ता था। तब कहाँ मालूम था कि यह जादूई शहर जिंदगी भर के लिए हमारी खुशियों का खजाना बन जाएगा। आज फिर नैनीताल में बारिश हो रही है। जुलाई की इन सुबहों में नैनीताल और वहाँ होने वाले फुटबॉल टूर्नामेंट बड़े याद आते हैं।

खैर, अब बात करते हैं फीफा विश्व कप के क्वार्टर फाइनल मुकाबलों की।

बीती रात बेहतरीन फॉर्म में चल रही बेल्जियम की टीम की टक्कर 2010 विश्व कप की विजेता स्पेन से थी। इस मुकाबले का विजेता पिछले संस्करण की उपविजेता व इस विश्व कप में अबतक सबसे घातक लग रही फ्रांस की टीम के खिलाफ सेमीफाइनल में जगह पक्की कर लेता।

लॉस एंजेलिस स्टेडियम में होने जा रहे इस मैच में एक ओर बेल्जियम थी जो, धीमी शुरुआत के बाद, अपने पिछले तीन मैचों में बारह गोल दाग चुकी थी। चार्ल्स डि किटिलीरी, कप्तान यूरी टीलमान्स व लियान्द्रो ट्रोसार्ड अबतक दो दो गोल दाग चुके थे। वहीं, लुकाकू बेंच से आने के बावजूद अबतक तीन गोल स्कोर कर चुके थे। चार्ल्स डि किटिलीरी खासकर एक युवा खिलाड़ी हैं जिन्होंने इस टूर्नामेंट में बेल्जियम के लिए अबतक काफी बेहतर खेल दिखाया है।

वहीं, दूसरी ओर थी स्पेन की टीम जिन्होंने अबतक इस विश्व कप के अपने पांच मैचों में विरोधी टीमों को अपने खिलाफ एक भी गोल नहीं दागने दिया है। स्पेन के कोच लुई डे ला फुएन्ते के लिए चिंता का विषय यह होने जा रहा था कि उनकी फॉरवर्ड लाइन के खिलाड़ी टीम के लिए गोल स्कोर करने में असमर्थ रहे हैं। वहीं, रेड डेविल्स की खासियत यह है कि उनके बेंच पर बैठे खिलाड़ी भी मैदान पर आकर गोल दागने की काबिलियत रखते हैं।

आज एक बेहतरीन डिफेंस का सामना एक घातक अटैकिंग टीम से होने वाला था। यह निश्चित रूप से एक बेहतरीन मैच होने जा रहा था।

दोनों ही टीमें 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के संग मैदान पर उतरती हैं। मैच की शुरुआत होती है। स्पेन के लिए आज पेड्री को बेंच पर बैठाया गया था। उनकी जगह फाबियान रुइज़ मैदान पर उतारे गए थे।

स्पेन मैच के शुरू होते ही गजब अंदाज में खेलती नजर आती है। गेंद ज्यादातर समय उनके खिलाड़ियों के ही पास रहती दिख रही थी। बेल्जियम को गेंद पाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा था। खासकर अटैकिंग मिडफील्डर दानी ओल्मो लगातार बेल्जियम के लिए खतरे पैदा करते जा रहे थे। युवा सनसनी लामीन यमाल को सदैव दो से तीन बेल्जियम के खिलाड़ी घेरे हुए थे। फिर भी वो मौका मिलते ही दाईं छोर से अटैक किए जा रहे थे।

शुरुआती बीस मिनट में ही स्पेनिश टीम विपक्षी गोलपोस्ट पर कई हमले कर चुकी थी। मगर फिलहाल गोल स्कोर करने में उन्हें सफलता नहीं मिल सकी थी। स्कोर था 0-0।

पहला हाइड्रेशन ब्रेक होता है। उसके पश्चात खेल फिर आगे बढ़ता है। मैच के तीसवें मिनट में स्पेन बांई छोर से अटैक करती है। एक बेहतरीन क्रॉस बेल्जियम के बॉक्स में डाला जाता है। शानदार खेल दिखा रहे दानी ओल्मो अपने लिए खाली स्थान बनाते हुए जोर से गोलपोस्ट की ओर शॉट लगाते हैं। गेंद गोलकीपर थिब्वा कुर्त्वा से छिटक जाती है। स्पेनिश मिडफील्डर फाबियान रुइज़ तुरंत वहां पहुंच कर गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। स्पेन इस गोल के साथ मैच में अहम बढ़त ले लेता है।

विशालकाय लॉस एंजेलिस स्टेडियम में आज साढ़े चौहत्तर हजार दर्शक मौजूद थे। इनमें ज्यादातर दर्शकों का समर्थन स्पेन को प्राप्त था। फाबियान रुइज़ के इस गोल ने अपने इन तमाम समर्थकों को खुशी से झूमने का मौका दे दिया था।

मगर, उनकी यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। राइट बैक टिमोथी कास्ताग्ने स्पेनिश बॉक्स के बाहर से, मैदान की दाईं ओर से, एक सटीक क्रॉस अंदर डालते हैं। चार्ल्स डि किटिलीरी उन्हें मार्क कर रहे डिफेंडर को चकमा देकर एक शानदार हेडर लगाते हैं। गेंद स्पेनिश गोलकीपर ऊनाई सिमॉन को पीछे छोड़ गोलपोस्ट के भीतर जा चुकी थी। मात्र ग्यारह मिनट के भीतर ही बेल्जियम मैच में वापसी कर लेती है। स्कोर 1-1 से बराबर हो चुका था।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। स्पेन फिर लगातार आक्रमण का सिलसिला जारी रखती है। बेल्जियम भी जानती थी कि अगर वो कैसे भी एक गोल दाग दे तो स्पेन को दबाव में ला सकती है। दोनों ही टीमें प्रयास करती रहती हैं कि एक गोल दाग कर अहम बढ़त हासिल कर ली जाए। मगर कोई भी टीम इस मकसद में सफल नहीं हो पा रही थी।

मैच के इकहत्तरवें मिनट में बेल्जियम की टीम को तब सदमा लगता है जब उनके स्टार गोलकीपर थिब्वा कुर्त्वा हैमस्ट्रिंग में खिंचाव महसूस करते हैं। यूं चोटिल होने के चलते नम आंखों के साथ उन्हें मैदान छोड़ना पड़ता है। मैनचेस्टर यूनाइटेड के लिए खेलने वाले युवा गोलकीपर लामेन्स मैदान में थिब्वा कुर्त्वा का स्थान लेते हैं। खेल आगे बढ़ता है।

पिचहतर मिनट का खेल हो चुका था। दोनों ही टीमें कई आक्रामक परिवर्तन करती हैं। खेल जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था, लग रहा था शायद मैच का फैसला एक्स्ट्रा टाइम में होगा। दर्शकों को भी इंतजार था एक गोल का। दोनों ही टीमों के समर्थकों ने अपनी अपनी टीम की हौसला-अफजाई में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दोनों ही टीमें एक गोल मारने के लिए प्रयासरत रहती हैं मगर दोनों ही तरफ से अच्छा रक्षण भी देखने को मिलता है। स्पेनिश गोलकीपर ऊनाई सिमॉन आज कई बेजा गलतियां करते दिखे। कई दफा अपनी ग़लती के चलते वह बेल्जियम की अटैकिंग लाइन को गोल मारने का मौका प्रदान कर दे रहे थे। भला हो उनकी रक्षापंक्ति का जिसने दो बार गोल लाइन क्लियरैंस कर के, स्पेन को मैच में बनाए रखा था।

छियासीवें मिनट में स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते अपना सबसे घातक हथियार निकालते हैं। वह मिडफील्ड में बेहद शानदार प्रदर्शन कर रहे दानी ओल्मो के स्थान पर मिकेल मेरीनो को मैदान में भेजते हैं। यह फैसला इसलिए भी लिया गया क्योंकि कोच जानते थे कि अगर यह मैच एक्स्ट्रा-टाइम में जाता है तो मैच काफी कश्मकश भरा रहेगा और लगातार काफी तनाव भी बना रहेगा।

मिकेल राउंड ऑफ 16 में पुर्तगाल के खिलाफ अंतिम क्षणों में गोल दागते हुए स्पेन को टूर्नामेंट में जिंदा रखे हुए थे। यह उनका ही गोल था जिसके चलते इकतालीस वर्षीय क्रिस्टियानो रोनाल्डो बिना विश्व कप का खिताब जीते घर लौटने के लिए मजबूर हो गए थे।

अठ्ठासीवें मिनट में गोलपोस्ट से यही कोई 35 मीटर की दूरी से मौका मिलते ही उन्नीस वर्षीय स्टार स्पेनिश डिफेंडर पाउ कुबार्सी गोल की दिशा में, अपने दाएं पांव से, भीषण टंकार करते हुए एक बेहद जोरदार किक लगाते हैं। गोलकीपर लामेन्स गेंद को अपने कब्जे में लेने के लिए आगे बढ़ते हैं। पाउ कुबार्सी का प्रहार इतना तीव्र था कि गेंद गोलकीपर लामेन्स से छिटक जाती है। हमेशा की भांति एक बार फिर सही वक्त पर सही जगह पर मिकेल मेरीनो आ धमकते हैं। मिकेल गेंद को बिना कोई ग़लती किए बेहतरीन तरीके से जाल के भीतर पहुंचा देते हैं। एक बार फिर, मिकेल मेरीनो के गोल के चलते, स्पेन बिल्कुल अंतिम क्षणों में मैच में बढ़त बना चुकी थी।

अंतिम क्षणों में स्पेन उनके इस गोल के दम पर करो या मरो वाले इस मैच में बेल्जियम की मजबूत टीम के विरुद्ध अहम बढ़त ले लेती है। नब्बे मिनट का खेल पूर्ण होने पर सात मिनट का इंजरी टाइम मिलता है। बेल्जियम गोल करने हेतु जद्दोजहद करती रहती है परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती।

कुछ ही पलों में मैच समाप्त हो जाता है। स्पेन 2-1 से यह मुकाबला जीत कर सेमीफाइनल में जगह बना लेती है। केविन डि ब्रुएना का विश्व कप जीतने का ख्वाब टूट जाता है। पूरा स्टेडियम लाल रंग के लहराते झंडों से पट जाता है। एस्पाना-एस्पाना के नारे लगाते स्पेनिश समर्थकों की खुशी में सारा लॉस एंजेलिस स्टेडियम डूब गया था। मिकेल मेरीनो द्वारा अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल एकदफा फिर उन्हें स्पेन का संकटमोचक साबित कर चुका था।

एक मिडफील्डर होने के बावजूद मिकेल मेरीनो ने यूरो कप व यूएफा नेशन्स लीग के सेमीफाइनल मुकाबलों में भी स्पेन के लिए गोल स्कोर किए थे। और, आज तो उनके इस खास गोल के चलते ही ला रोजा बेल्जियम को घर की राह दिखा कर सेमीफाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुकी थी। वह हमेशा ही एक बेहद क्लच खिलाड़ी रहे हैं जो बेंच से आकर भी स्पेन के लिए मैच बदल देते हैं।

सेमीफाइनल में स्पेन का सामना गत उपविजेता व टूर्नामेंट में सभी की फेवरेट फ्रेंच टीम से होना है। कोच लुई डे ला फुएन्ते ने मैच पश्चात साक्षात्कार में कहा कि यह दो जाएंट्स की क्लैश होने जा रही है। स्पेनिश रक्षापंक्ति ने अबतक के अपने सफर में मात्र एक गोल खाया है। वहीं, दूसरी ओर फ्रांस होगी, जो किसी बवंडर के भांति तबाही करती नजर आती है।

खैर, अब, आगे, देर रात ढाई बजे, टूर्नामेंट के तीसरे क्वार्टर फाइनल मुकाबले में, नॉर्वे के वाइकिंग्स इंग्लैंड की टीम के विरुद्ध मैदान में उतरेंगे। अर्लिंग हालांड के नेतृत्व में नॉर्वे एक बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरेगी। वहीं, कप्तान हैरी केन व साथी खिलाड़ियों के शानदार फॉर्म के दम पर इंग्लैंड इस मैच को जीत कर विश्व कप जीतने के ख्वाब को सच करने की दिशा में बड़ा कदम लेना चाहेंगे।

थ्री लाएंस, जो कि मेक्सिको के खिलाफ हुए एक हाई वोल्टेज मुकाबले में जीत दर्ज कर चुकी है, इस मैच में कोई भी कोताही नहीं बरतना चाहेगी। वहीं, नॉर्वे हर जीत के साथ अपने देश के लिए नया इतिहास लिखते जा रहे हैं। वह ब्राजील के खिलाफ किए शानदार प्रदर्शन को दुबारा दोहराना चाहेंगे।

इसके पश्चात, कल सुबह साढ़े छह बजे, कन्सास सिटी स्टेडियम में कतर विश्व कप के विजेता, अर्जेंटीना, के समक्ष स्विट्जरलैंड के लड़ाके खड़े होंगे। अर्जेंटीना ने पिछले मैच में अंतिम बारह मिनटों में करिश्माई खेल दिखाते हुए, मैच में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद, 3-2 से मिस्र के खिलाफ अपना मैच जीता था। वहीं, स्विट्जरलैंड की टीम अपना पिछला मैच जीतने के बाद से ही इस मुकाबले के लिए जोरदार तैयारी में लगी हुई है।

खबरें हैं कि गोलकीपर कोबेल नित्य गोलकीपिंग कोच के साथ दो-तीन घंटे पेनाल्टी सेव्स की तैयारी कर रहे हैं व संपूर्ण टीम नौ/आठ खिलाड़ी बनाम ग्यारह खिलाड़ी की ट्रेनिंग ड्रिल्स कर रही है। चौंकिएगा नहीं अगर वह कल सुबह कुछ बड़ा कर दिखाएँ।

हालाँकि, जब तक 39 लियोनेल मेस्सी एक बीस वर्षीय मेस्सी के जज्बे के साथ खेलते रहेंगे, अर्जेंटीना को हराना एक टेढ़ी खीर होगा। अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

दोनों ही मैचों में नॉर्वे व स्विट्जरलैंड के रूप में एक-एक अंडरडॉग है जो बड़े शिकार के लिए लालायित है। दोनों ही मुकाबले मजेदार रहने वाले हैं। आप को यह मैच जरूर देखने चाहिए।

फुटबॉल की खबरें जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

बांग्लादेशी डिप्लोमैट ने J&K को पाकिस्तान में दिखाया, पूजा झा ने प्रेजेंटेशन रोक वहीं कर दी फजीहत: जानिए- कौन हैं भारत की बेबाक युवा राजनयिक

भारत अपनी संप्रभुता और अखंडता के साथ कभी समझौता नहीं करता, यह बात एक बार फिर साबित हुई है। पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित एक हाई-प्रोफाइल विदेश नीति सेमिनार के दौरान उस समय तीखी बहस और खलबली देखने को मिली। जब नक्शे में भारत के अभिन्न हिस्से जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का भाग दिखा दिया गया। इसे वहाँ मौजूद भारतीय उच्चायोग की एक युवा राजनयिक ने तुरंत पकड़ लिया।

जैसे ही यह गलत नक्शा स्क्रीन पर फ्लैश हुआ, ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग की सेकंड सेक्रेटरी पूजा कुमारी झा ने बिना एक पल की देरी किए कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया और पूरी मुखरता के साथ इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने साफ और कड़े शब्दों में दुनिया के सामने संदेश दिया कि पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है।

सेमिनार का विषय और विवाद की शुरुआत

यह पूरा वाकया ढाका में ‘बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज’ (BIISS) द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का है। इस सेमिनार का विषय बेहद महत्वपूर्ण था “विश्वास बहाल करना और क्षेत्रीय एकता को नया रूप देना: SAARC को फिर से जीवित करने के रास्ते।”

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में कई देशों के राजनयिक, बड़े-बड़े प्रोफेसर, शिक्षाविद और विदेशी मामलों के जानकार मौजूद थे। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद भी मंच पर मौजूद थीं।

इसी दौरान भारत में बांग्लादेश के पूर्व उच्चायुक्त और वरिष्ठ राजनयिक अहमद तारिक करीम मंच पर अपना प्रेजेंटेशन दे रहे थे। जैसे ही उनकी प्रेजेंटेशन की एक स्लाइड में दक्षिण एशिया का नक्शा सामने आया, उसमें जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखा दिया गया था।

बीच प्रेजेंटेशन में टोका: भारतीय राजनयिक और पूर्व राजदूत के बीच तीखी बहस

इस पर भारतीय राजनयिक पूजा कुमारी झा सीधे ही आयोजकों पर भड़क गईं। उन्होंने अहमद तारिक को टोकते हुए कहा कि यह तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है।

पूजा कुमारी झा ने कहा “सर, यहाँ दिखाया गया भारत का नक्शा गलत है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और मुझे लगता है कि यहाँ दिखाया गया नक्शा सही नहीं है। यह भारत की संप्रभुता के खिलाफ है।”

भारतीय राजनयिक के इस कड़े और स्पष्ट तेवर को देखकर सेमिनार के आयोजकों में खलबली मच गई। अपनी स्थिति को संभालते हुए और स्पष्टीकरण देते हुए पूर्व राजदूत तारिक ए करीम ने मंच से सफाई दी।

उन्होंने कहा कि इस नक्शे का इस्तेमाल केवल ‘सांकेतिक और प्रतीकात्मक उद्देश्यों’ के लिए किया गया था और इसका इरादा किसी देश की वास्तविक सीमाओं या राजनीतिक दावों को दर्शाना या ठेस पहुँचाना नहीं था।

हालाँकि, भारतीय राजनयिक इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुईं और अपने रुख पर पूरी अडिग रहीं। पूजा झा ने दोबारा जवाब दिया “मैं आपकी बात समझती हूँ सर, लेकिन जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यहाँ इसे गलत तरीके से दिखाया गया है। इसलिए मैं बस इस बात की ओर ध्यान दिलाना चाहती थी और अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहती थी।”

इसके बाद राजदूत करीम ने उनसे पूछा कि क्या वह भारत से हैं? इसके जवाब में उन्होंने अपना पूरा परिचय दिया और बताया कि वह भारतीय उच्चायोग की अधिकारी हैं। इसके बाद तारिक करीम भी उनकी बात से सहमत दिखे और कहा, “आपकी बात नोट कर ली गई है” और इसके बाद उन्होंने अपना प्रेजेंटेशन आगे जारी रखा।

कौन हैं पूजा कुमारी झा?

इस घटना के बाद हर कोई यह जानना चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतनी बेबाकी से भारत का पक्ष रखने वाली यह युवा अधिकारी कौन हैं। पूजा कुमारी झा साल 2022 बैच की भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी हैं।

वह मात्र 25 साल की उम्र में इस प्रतिष्ठित सेवा का हिस्सा बनीं। वर्तमान में वह बांग्लादेश के ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग में सेकंड सेक्रेटरी (पॉलिटिकल और इन्फॉर्मेशन) के तौर पर तैनात हैं।

ढाका में उनकी पहली पोस्टिंग होने से पहले, उनकी राजनयिक ट्रेनिंग ताइवान में हुई थी। पूजा झा मूल रूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुरनहिया गाँव की रहने वाली हैं। हालाँकि उनका परिवार दिल्ली में रहता है।

उन्होंने साल 2021 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया रैंक (AIR) 82 हासिल की थी, जिसके बाद उन्हें देश सेवा के लिए भारतीय विदेश सेवा (IFS) का विकल्प मिला।

पिता ने कहा था – बड़े सपने मत देखो

एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली पूजा का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। जब उन्होंने UPSC पास की, तो एक इंटरव्यू में अपने संघर्षों को साझा करते हुए बताया था, “मैं जिस जगह और समाज से आती हूँ, वहाँ इस प्रतिष्ठित परीक्षा को पास करने का सपना देखना भी बहुत बड़ी बात मानी जाती है।”

उनके पिता पिछले लगभग 40 सालों से गुरुग्राम की एक प्राइवेट कंपनी में एक मामूली ‘ऑफिस हेल्पर’ के तौर पर काम कर रहे हैं और उनकी माँ गृहिणी हैं। पूजा ने बताया कि बड़े सपने देखने पर उनके पिता अक्सर उनसे मजाकिया या डरे हुए लहजे में कहते थे, “तुम बॉलीवुड एक्टर, एस्ट्रोनॉमर और IAS ऑफिसर के अलावा कुछ भी बन सकती हो।”

क्योंकि उन्हें लगता था कि इतने बड़े पदों तक पहुँचना उनके जैसे गरीब परिवार के लिए नामुमकिन है। पूजा अपने भाई-बहनों में दूसरी सबसे छोटी और अपने माता-पिता की पाँचवीं बेटी हैं। उनके बाद उनका एक छोटा भाई है।

पूजा ने बताया, “मेरे परिवार की बेटे की चाहत छोटे भाई के जन्म के साथ पूरी हो गई। मैं जिस समुदाय से आती हूँ, वहाँ बेटे के जन्म को बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती है। लड़की के जन्म पर कोई जश्न नहीं होता, जबकि लड़के के जन्म पर धूमधाम होती है। यह सोच इतनी गहरी थी कि इससे लड़ने और लोगों की मानसिकता बदलने में मुझे कई साल लग गए।”

इस सामाजिक असमानता के माहौल ने पूजा और उनकी बहनों को आपस में बहुत मजबूती से जोड़ दिया। वे बहनें आपस में इस भेदभाव पर लंबी बातचीत करती थीं और इसी ने पूजा के भीतर समाज में बदलाव लाने और अपनी एक अलग पहचान बनाने का संकल्प पैदा किया।

हक पाने के लिए की पढ़ाई

पूजा ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन सभी भाई-बहनों को प्राइवेट स्कूलों से निकालकर सरकारी और दिल्ली नगर निगम (MCD) के स्कूलों में डाल दिया गया था। सीमित संसाधनों के बावजूद उनसे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जाती थी।

पूजा के लिए पढ़ाई ही समाज और घर में सम्मान पाने का जरिया बनी। उन्होंने बताया, “जब भी मैं स्कूल या परीक्षाओं में अच्छा स्कोर करती थी, तो मेरे माता-पिता बहुत खुश होते थे। वे दिन ऐसे होते थे जब मुझे मेरे भाई से भी ज्यादा प्यार और तवज्जो मिलती थी। मैं बस माता-पिता के उस प्यार और खुशी के पलों को पाने के लिए और बेहतर करने की जिद में जुट जाती थी।” आज उसी जिद और संघर्ष की बदौलत वह एक फाइटर बनकर उभरी हैं।

बांग्लादेशी मंत्री ने की गहरे क्षेत्रीय सहयोग की वकालत

इस विवाद के बीच, सेमिनार को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि और बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबेद ने दक्षिण एशिया में गहरे क्षेत्रीय सहयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सार्क (SAARC) संगठन की मौजूदा स्थिति पर बात करते हुए कहा कि हमें इसकी क्षमता और वास्तविक प्रदर्शन के बीच के अंतर को पाटने की जरूरत है।

संगठन को फिर से जीवित करने के कदमों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “सार्क संगठन को बेहतर ढंग से काम करने की क्षमता, ज्यादा आर्थिक मजबूती, ज्यादा असरदार व्यावहारिक तरीकों और काम को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत फॉलो-अप कल्चर की जरूरत है।”

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि बांग्लादेश आने वाले महीनों में सार्क देशों के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने पर विचार कर रहा है, जिसमें ढाका में मौजूद सार्क देशों के राजदूतों से बातचीत और काठमांडू स्थित सार्क सचिवालय से संपर्क साधना शामिल हो सकता है।

संप्रभुता पर भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट

यह कोई पहला मौका नहीं है जब भारतीय राजनयिकों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के खिलाफ गलत प्रस्तुतियों या विवादित नक्शों को तुरंत चुनौती दी हो। भारत सरकार का इस मामले पर हमेशा से बिल्कुल साफ और कड़ा रुख रहा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अटूट और अविभाज्य हिस्सा है।

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की वार्षिक रिपोर्ट पर बहस के दौरान भी जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया था, तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने ‘राइट टू रिप्लाई’ (जवाब देने के अधिकार) का इस्तेमाल करते हुए पाकिस्तान को करारा जवाब दिया था।

पाकिस्तानी फौज ने लगाई आग, हफ्ते भर जलता रहा भगवान जगन्नाथ का रथ: पढ़े- 500 साल पुरानी धमराई की ऐतिहासिक यात्रा की कहानी, बांग्लादेश में अब भी जीवित है परंपरा

आगामी 16 जुलाई से देशभर में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध भव्य रथ यात्रा शुरू होने जा रही है। पुरी, अहमदाबाद और देश के कई शहरों में लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए तैयारियों में जुटे हैं।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज के बांग्लादेश में भी कभी ऐसी ही एक भव्य रथ यात्रा निकाली जाती थी, जिसका रथ पुरी के रथ से भी बड़ा और ऊँचा माना जाता था। यह थी धमराई की ऐतिहासिक रथ यात्रा।

इस रथ यात्रा की पहचान केवल उसकी भव्यता नहीं थी, बल्कि यह पूर्वी बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी थी। लेकिन 1971 में पाकिस्तान फौज के ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ के दौरान इस परंपरा पर ऐसा हमला हुआ कि सालों पुरानी भव्यता हमेशा के लिए टूट गई। रथ को आग के हवाले कर दिया गया और वो करीब एक सप्ताह तक जलता रहा।

500 साल पुरानी परंपरा, जहाँ महीनों पहले शुरू हो जाती थीं तैयारियाँ

धमराई जो आज बांग्लादेश की राजधानी ढाका से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित है, वहाँ भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, 17वीं शताब्दी तक इस रथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है और 1672 के आसपास भी इसके आयोजन के प्रमाण दर्ज हैं।

यह केवल एक दिन का धार्मिक आयोजन नहीं था। पूरे क्षेत्र में लगभग एक महीने तक मेले, धार्मिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और भजन-कीर्तन चलते थे। बंगाल, ओडिशा, असम और नेपाल तक से श्रद्धालु यहाँ पहुँचते थे। उस समय धमराई की रथ यात्रा को पूर्वी भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिना जाता था।

पुरी के रथ से भी ऊँचा था धमराई का रथ

19वीं शताब्दी में स्थानीय जमींदारों ने एक नया और पहले से अधिक विशाल रथ बनवाने का निर्णय लिया। आसपास के इलाकों से कारीगर बुलाए गए और लगभग एक साल की मेहनत के बाद तैयार हुआ यह रथ अपनी भव्यता के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।

बताया जाता है कि इस रथ की ऊँचाई लगभग 60 फीट थी, जबकि वर्तमान में पुरी की रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ लगभग 44-45 फीट ऊँचा होता है। धमराई का रथ 45×45 फीट के विशाल आधार पर बनाया गया था और इसमें 32 बड़े पहिए लगे थे।

रथ के आगे लकड़ी के घोड़े लगाए जाते थे और करीब एक हजार किलोग्राम वजनी मोटी रस्सियों से हजारों श्रद्धालु इसे खींचते थे। यात्रा जसोमाधव मंदिर से शुरू होकर करीब आधा किलोमीटर दूर गोपीनगर मंदिर तक पहुँचती थी। रास्ते भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती थी।

विभाजन के बाद भी बची रही परंपरा, लेकिन बदल गया पूरा माहौल

1947 में भारत के विभाजन के बाद यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। 1950 में जमींदारी व्यवस्था खत्म होने के बाद इस रथ यात्रा के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया।

इसी समय उद्योगपति और समाजसेवी राय बहादुर रणदा प्रसाद साहा आगे आए। उन्होंने न केवल रथ के रखरखाव की जिम्मेदारी संभाली बल्कि हर साल आषाढ़ मास में होने वाली इस ऐतिहासिक रथ यात्रा के आयोजन का पूरा खर्च भी उठाया।

रणदा प्रसाद साहा शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा के क्षेत्र में भी बड़े योगदान के लिए जाने जाते थे और उन्होंने पूर्वी बंगाल में कई संस्थानों की स्थापना की थी।

ऑपरेशन सर्चलाइट क्या था?

25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी फौज ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में ‘ऑपरेशन सर्चलाइट‘ शुरू किया था। इस अभियान का उद्देश्य बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाना बताया गया था, लेकिन इस दौरान बड़े पैमाने पर आम नागरिकों पर कार्रवाई हुई।

1971 के युद्ध में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। बांग्लादेश सरकार लगभग 30 लाख लोगों के मारे जाने का दावा करती है, लेकिन अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों, शोधों और मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार इस अभियान में बड़े पैमाने पर नागरिकों की हत्या हुई और विशेष रूप से बंगाली हिंदुओं को निशाना बनाया गया।

इसी दौर में रणदा प्रसाद साहा और उनके बेटे भवानी प्रसाद साहा को पाकिस्तानी फौज ने हिरासत में लिया। उन्हें एक बार छोड़ा गया, लेकिन अगले ही दिन दोबारा उठा लिया गया। इसके बाद दोनों कभी वापस नहीं लौटे। आज तक उनके साथ क्या हुआ, इसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिल सका।

इन घटनाओं ने आखिरकार बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को तेज किया और दिसंबर 1971 में पाकिस्तानी फौज के आत्मसमर्पण के साथ बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना।

रथ यात्रा से पहले भगवान के रथ को लगा दी गई आग

रणदा प्रसाद साहा के लापता होने के कुछ समय बाद धमराई की सबसे बड़ी पहचान रहे विशाल रथ को भी पाकिस्तानी फौज ने आग के हवाले कर दिया। स्थानीय इतिहास और मंदिर से जुड़े विवरणों के अनुसार, यह घटना जून 1971 में हुई।

उस समय रथ यात्रा में केवल कुछ दिन बाकी थे। लकड़ी से बने विशाल रथ में लगी आग इतनी भीषण थी कि उसे पूरी तरह राख होने में लगभग एक सप्ताह का समय लग गया। जिस रथ को बनाने में एक साल का समय लगा था।

जिसे हजारों श्रद्धालु भगवान का वाहन मानते थे और जो पूर्वी बंगाल की धार्मिक पहचान बन चुका था, वह कुछ ही दिनों में राख का ढेर बन गया। उसी साल रथ यात्रा नहीं हो सकी और अगले साल भी यह परंपरा पूरी भव्यता के साथ वापस नहीं लौट सकी।

दो साल बाद लौटी यात्रा, लेकिन खो गई पुरानी पहचान

1973 में दो सालों के अंतराल के बाद धमराई में फिर से रथ यात्रा निकाली गई। हालाँकि, तब तक पुराना विशाल रथ पूरी तरह नष्ट हो चुका था। बाद में नया रथ बनाया गया लेकिन उसकी भव्यता पहले जैसी नहीं रही।

साल 2009 में भारत सरकार की सहायता से जसोमाधव मंदिर समिति और भारतीय उच्चायोग के सहयोग से एक नए रथ के निर्माण का कार्य शुरू हुआ। 2010 में नया तीन मंजिला रथ तैयार हुआ जिसकी ऊँचाई करीब 40 फीट और 16 पहिए हैं।

आज धमराई की रथ यात्रा इसी रथ के साथ आयोजित होती है लेकिन पुराने समय जैसा महीनों तक चलने वाला विशाल आयोजन अब देखने को नहीं मिलता।

आज भी निकलती है रथ यात्रा, लेकिन इतिहास की पीड़ा चलती है साथ

यूँ तो आज भी धमराई में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। श्रद्धालु भी जुटते हैं और धार्मिक परंपरा भी जीवित है, लेकिन इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय को वहाँ के लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं।

जिस रथ को कभी पूर्वी बंगाल की सबसे बड़ी धार्मिक धरोहर माना जाता था, वह अब इतिहास का हिस्सा बन चुका है। पाकिस्तानी फौज की कार्रवाई ने केवल एक विशाल रथ को नहीं जलाया बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी भारी नुकसान पहुँचाया।

मिडिल ईस्ट फिर बना वॉर जोन, क्या इस बार तैयार हैं हम?: जानें- भारत के सामने खड़ी हैं कैसी चुनौतियाँ, अग्निपरीक्षा की इस घड़ी में देश को आर्थिक मार से कैसे बचाएगी मोदी सरकार

ईरान पर अमेरिकी हमले और अमेरिका के साथ उसके सहयोगियों पर ईरान के हमलों के बाद से पश्चिम एशिया का इलाका एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठ गया है। ईरान और उसके विरोधियों के बीच छिड़ी इस नई जंग ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। ऐसे में हर भारतीय के मन में यही सवाल उठ रहा है कि ईरान फिर से बना वॉर जोन, क्या हिंदुस्तान है तैयार? भारत के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं और कितनी तैयार है मोदी सरकार?

यह सवाल इसलिए भी बेहद गंभीर है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक खाड़ी देशों पर निर्भर है। जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो उसकी सीधी आँच भारतीय रसोई से लेकर देश के राजकोष तक पहुँचती है। मोदी सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती देश की आर्थिक रफ्तार को थामे रखने और घरेलू बाजार में तेल-गैस की कीमतों को नियंत्रण में रखने की है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार का संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल है क्योंकि यह सीधे तौर पर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग को प्रभावित कर रहा है।

भारत के लिए यह परीक्षा की घड़ी इसलिए भी है क्योंकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बदल रही हैं। जब मार्च के शुरुआती हफ्ते में तनाव बढ़ा, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें देखते ही देखते 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं। अभी ये दाम कर हैं, लेकिन हॉर्मुज के बंद होने के बाद कीमते फिर से तेजी से बढ़ रही हैं। हालाँकि मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा नीति में जो रणनीतिक बदलाव किए हैं, उनकी वजह से भारत इस झटके को झेलने में काफी हद तक सफल रहा है। सरकार ने न केवल तेल के आयात स्रोतों को बदला है, बल्कि देश के भीतर भी आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए मजबूत इंतजाम किए हैं।

फिर भी चुनौती छोटी नहीं है क्योंकि कच्चे तेल के साथ-साथ एलएनजी और एलपीजी की आपूर्ति को बनाए रखना एक बेहद मुश्किल काम बन गया है। इस पूरे संकट के बीच भारतीय कूटनीति और आर्थिक प्रबंधन की असली परीक्षा होनी बाकी है।

स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की नाकाबंदी और भारत का क्रूड-एलएनजी संकट

इस पूरे युद्ध का सबसे खतरनाक पहलू स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज यानी हॉर्मुज जलडमरूमध्य का आंशिक या पूर्ण रूप से बंद होना रहा है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरती है। भारत की बात करें तो हम अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करते हैं और इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी करीब आधा भाग इसी रास्ते से होकर हमारे देश पहुँचता है।

इससे भी बड़ी चिंता एलपीजी को लेकर है, जिसका 60 से 65 प्रतिशत आयात इसी हॉर्मुज के रास्ते होता है। जैसे ही ईरान ने इस मार्ग पर प्रतिबंध लगाए या युद्ध के कारण यहाँ जहाजों की आवाजाही बाधित हुई, वैसे ही भारत के सामने ऊर्जा का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। कतर जैसे बड़े गैस उत्पादक देश ने भारत को होने वाली अपनी आपूर्ति पर अस्थाई रोक लगा दी, जिससे हमारी गैस पाइपलाइनों में दबाव कम होने का खतरा पैदा हो गया।

इस अप्रत्याशित संकट के बीच भारत को अपनी रणनीति में बहुत तेजी से बदलाव करना पड़ा।

एनर्जी डेटा पर नजर रखने वाली संस्था केपलर के रिसर्च गेट में छपे लेख के आँकड़ों के अनुसार, मार्च से मई के बीच जहाँ कतर से भारत का एलएनजी आयात घटकर महज शून्य दशमलव एक मिलियन टन रह गया, वहीं भारत ने अमेरिकी बाजार की तरफ रुख किया। इसी अवधि में अमेरिका भारत को एलएनजी सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश बनकर उभरा और उसने करीब डेढ़ मिलियन टन गैस की आपूर्ति की।

इसके अलावा भारत ने ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से भी अतिरिक्त गैस के सौदे किए। कच्चे तेल के मोर्चे पर भी रूस से आने वाले तेल ने भारत के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच का काम किया। रूस से मिलने वाले डिस्काउंटेड तेल की वजह से भारतीय रिफाइनरियों को लगातार कच्चा तेल मिलता रहा, जिससे देश के भीतर पेट्रोल और डीजल की भारी किल्लत होने से बच गई। हालाँकि ये बात सर्वविदित है कि यह केवल तात्कालिक राहत है और अगर यह नाकाबंदी लंबे समय तक खिंचती है, तो वैकल्पिक रास्तों से माल मँगाने का खर्च भारत के व्यापार घाटे को बहुत ज्यादा बढ़ा सकता है।

मोदी सरकार की संकट प्रबंधन रणनीति और आवश्यक वस्तु अधिनियम

अंतरराष्ट्रीय बाजार में मचे इस हाहाकार का सीधा असर भारत के आम नागरिकों पर न पड़े, इसके लिए मोदी सरकार ने घरेलू मोर्चे पर बेहद कड़े और अनुशासनबद्ध कदम उठाए हैं। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार ने तुरंत हरकत में आते हुए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को लागू कर दिया।

इस कानून के तहत सरकार ने देश के भीतर उपलब्ध एलपीजी और प्राकृतिक गैस के वितरण को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया। सरकार की पहली प्राथमिकता देश के करोड़ों घरों की रसोइयों को बचाना था। इसलिए रणनीतिक तौर पर यह तय किया गया कि गैस की पहली आपूर्ति घरेलू एलपीजी सिलेंडरों और घरों में आने वाली पाइप्ड नेचुरल गैस यानी पीएनजी को की जाएगी।

सके बाद बची हुई गैस को सीएनजी यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सबसे महत्वपूर्ण रूप से देश के खाद कारखानों को दिया गया ताकि किसानों को यूरिया और अन्य खादों की कमी का सामना न करना पड़े। हालाँकि मौजूदा समय में भारत सरकार ने आंतरिक तौर पर लागू पाबंदियों को हटा लिया है, लेकिन युद्ध के फिर से छिड़ने से एक बार फिर ये समस्या खड़ी हो सकती है।

इस सख्त कदम का असर यह हुआ कि बड़े उद्योगों और निजी रिफाइनरियों के लिए गैस की आपूर्ति में थोड़ी कटौती जरूर हुई, लेकिन आम जनता को ईंधन के लिए लाइनों में नहीं लगना पड़ा। हालाँकि इस संकट के कारण घरेलू बाजार में एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसने आम मध्यमवर्गीय परिवारों के बजट पर थोड़ा दबाव जरूर डाला, लेकिन स्थिति को नियंत्रण से बाहर नहीं जाने दिया गया।

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस वैश्विक तूफान के बावजूद भारत का घरेलू बाजार काफी मजबूत बना हुआ है। जून के महीने में देश के भीतर गाड़ियों की बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई, जो यह दर्शाती है कि आम जनता का भारतीय अर्थव्यवस्था और अपनी आय पर भरोसा डिगा नहीं है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं यानी फ्रिज, एसी जैसी चीजों की माँग भी घरेलू बाजार में बहुत तेज रही, जिसने वैश्विक मंदी के असर को भारत के भीतर हावी नहीं होने दिया।

रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार और ओएनजीसी का बड़ा कदम

किसी भी देश के लिए युद्ध जैसी स्थिति में सबसे बड़ा सहारा उसका अपना जमा किया हुआ तेल भंडार होता है, जिसे स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व कहा जाता है। भारत के पास इस समय लगभग 74 दिनों की खपत के बराबर कच्चे तेल और एलपीजी का आपातकालीन भंडार मौजूद है। लेकिन इस संकट ने यह साबित कर दिया कि भारत जैसे विशाल देश के लिए यह भंडार आने वाले समय में नाकाफी साबित हो सकता है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने देश के भीतर तेल भंडारण की क्षमता को युद्धस्तर पर बढ़ाने का फैसला किया है। अभी 9 जुलाई 2026 को देश की दिग्गज सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी ने घोषणा की कि वह मंगलुरु में भारत के मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में एक दशमलव 7.5 मिलियन टन यानी करीब पौने दो करोड़ बैरल अतिरिक्त तेल भंडारण की क्षमता जोड़ने जा रही है। वहीं, ओएनजीसी लगातार भारतीय जल क्षेत्र में ड्रिंलिंग कर कच्चे तेल की खोज कर रही है, जिसमें उसे सफलता भी मिल रही है। अंडमान के इलाके में भारत को बड़ी सफलताएँ भी इसी मुश्किल दौर में मिली हैं।

यह कदम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद मील का पत्थर साबित होने वाला है क्योंकि अभी तक इस तरह के भूमिगत गुफाओं वाले भंडारों का निर्माण केवल सरकार सीधे तौर पर करती थी, लेकिन अब ओएनजीसी जैसी कंपनियाँ इसमें अपनी पूँजी लगा रही हैं।

इसके साथ ही संयुक्त अरब अमीरात की सरकारी तेल कंपनी एडनॉक भी भारत में अपनी भंडारण क्षमता को दोगुना करके चार मिलियन टन करने की योजना पर काम कर रही है।

सरकार की कोशिश है कि भारत के पास कम से कम इतने दिनों का तेल और गैस रिजर्व होना चाहिए कि अगर खाड़ी देशों में दो-तीन महीने तक पूरी तरह से कामकाज ठप भी रहे, तो भी भारत के उद्योग और गाड़ियाँ बिना रुके चलती रहें। बुनियादी ढाँचे में किए जा रहे ये सुधार ही भविष्य में भारत को किसी भी वैश्विक भू-राजनीतिक झटके से पूरी तरह सुरक्षित बना पाएँगे।

क्या अमेरिका-ईरान की यह जंग सिर्फ 60 दिनों का दबाव बनाने का खेल है?

इस युद्ध के पीछे की कूटनीति को समझने वाले अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का एक धड़ा यह भी मान रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह सीमित जंग दरअसल कोई पूर्ण युद्ध नहीं, बल्कि एक-दूसरे पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति है। इस कूटनीतिक खेल का मकसद दोनों पक्षों को एक ऐसी स्थिति में लाना है जहां वे आगामी 60 दिनों के भीतर किसी बड़े और नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो जाएँ।

इतिहास गवाह है कि जब भी दो देश किसी समझौते की मेज पर बैठना चाहते हैं, तो उससे ठीक पहले वे अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करके अपनी शर्तों को मनवाने का प्रयास करते हैं। ईरान ने हॉर्मुज को आंशिक रूप से बंद करके यह दिखा दिया कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की नस दबा सकता है, वहीं अमेरिका ने प्रतिबंधों और सैन्य तैनाती से ईरान की आर्थिक रीढ़ को निशाना बनाया है।

साउथ-ईस्ट एशिया पर बड़ा प्रभाव, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी मंदी का साया

ईरान के इस वॉर जोन में बदलने का खामियाजा सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया और खासकर एशियाई देशों को भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस साल की वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाकर तीन प्रतिशत कर दिया है और इसके पीछे मुख्य वजह इसी युद्ध के कारण लगा ऊर्जा का बड़ा झटका है।

खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया के चार बड़े देशों चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में आता है। इसलिए इस मार्ग में होने वाली किसी भी रुकावट का सबसे पहला और सबसे बुरा असर दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी एशियाई देशों पर पड़ता है। वियतनाम, थाईलैंड, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देश, जो अपनी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री के लिए पूरी तरह से आयातित ईंधन पर निर्भर हैं, वहाँ कारखानों की लागत बहुत तेजी से बढ़ी है।

इन देशों की सरकारों के सामने संकट यह है कि वे अपने नागरिकों को महँगी दरों पर ईंधन नहीं दे सकते क्योंकि इससे घरेलू विद्रोह का खतरा बढ़ जाता है, और अगर वे सब्सिडी देते हैं तो उनका खजाना खाली होने लगता है। चीन ने हालाँकि अपने विशाल रणनीतिक भंडार (जो करीब चौदह सौ मिलियन बैरल का है) के दम पर खुद को इस संकट से कुछ हद तक बचा लिया है, लेकिन उसने भी अपने देश से रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी है ताकि उसके अपने घरेलू बाजार में कोई किल्लत न हो।

चीन के इस कदम से दक्षिण-पूर्वी एशिया के उन छोटे देशों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं जो चीनी रिफाइनरियों से पेट्रोल-डीजल खरीदते थे। इन परिस्थितियों ने पूरे क्षेत्र में एक ऐसी आर्थिक अनिश्चितता पैदा कर दी है जिससे बाहर निकलने में इन विकासशील देशों को लंबा समय लग सकता है।

पाकिस्तान की खोखली कूटनीति और आर्थिक बर्बादी का नया अध्याय

इस पूरे संकट में अगर किसी देश की हालत सबसे ज्यादा दयनीय और हास्यास्पद बनी हुई है, तो वह है हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान। कुछ समय पहले तक पाकिस्तान के हुक्मरान और राजनयिक अपनी पीठ थपथपा रहे थे कि उन्होंने अमेरिका की सरपरस्ती हासिल कर ली है और वे अमेरिकी प्रभाव का इस्तेमाल करके अपने लिए सस्ता तेल और वित्तीय मदद का रास्ता साफ कर चुके हैं।

पाकिस्तान में इस बात का ढिंढोरा पीटा जा रहा था कि उनकी ‘अमेरिकी चटाई’ वाली डिप्लोमेसी देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन जैसे ही ईरान युद्ध की आग भड़की, पाकिस्तान के कूटनीतिक दावों की हवा निकल गई। पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भारत या चीन की तरह उसके पास कोई रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार नहीं है जो संकट के दिनों में देश का पहिया चला सके।

वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है। जो तेल उन्हें कुछ राहत दे रहा था, उसकी आपूर्ति बाधित होते ही वहाँ पेट्रोल-डीजल की भयंकर राशनिंग शुरू हो गई है। पाकिस्तान के भीतर महँगाई की दर आसमान छू रही है और बिजली ग्रिड पूरी तरह चरमरा गए हैं क्योंकि उनके पास बिजली बनाने के लिए तेल या गैस खरीदने के पैसे नहीं बचे हैं।

अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान इस समय बेहद डरा हुआ है क्योंकि ईरान के साथ उसकी एक लंबी जमीनी सीमा लगती है। अगर यह युद्ध और भड़कता है, तो पाकिस्तान के भीतर न सिर्फ आर्थिक बल्कि सुरक्षा का भी एक ऐसा संकट पैदा हो जाएगा जिसे संभालना उसके बस की बात नहीं होगी। उनकी तथाकथित अमेरिकी डिप्लोमेसी इस समय उनके किसी काम नहीं आ रही है क्योंकि अमेरिका खुद इस युद्ध में सीधे तौर पर उलझा हुआ है।

कूटनीतिक स्वायत्तता और हरित ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़े कदमों से संभल रहा भारत

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की विशेषज्ञ विभूति गर्ग और पूर्वा जैन के अनुसार, इस पूरे संकट ने भारत को एक बहुत बड़ा सबक दिया है। भारत ने अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता के दम पर रूस और अमेरिका दोनों से अपने संबंध संतुलित रखते हुए तात्कालिक तौर पर खुद को बचा जरूर लिया है, लेकिन यह संकट इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता देश की संप्रभुता के लिए कभी भी खतरा बन सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मोदी सरकार को इस संकट को एक अवसर या उत्प्रेरक के रूप में देखना चाहिए और देश के भीतर स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण यानी क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की रफ्तार को दोगुना कर देना चाहिए।

भारत को सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बैटरी स्टोरेज तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के घरेलू विनिर्माण को इतनी तेजी से बढ़ाना होगा कि खाड़ी देशों में होने वाले किसी भी धमाके की गूंज भारत के बाजारों में सुनाई न दे। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए भी हैं और देश के भीतर रिन्यूएबल एनर्जी की क्षमता लगातार बढ़ रही है।

बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो ईरानी इलाके का फिर से वॉर जोन बनना भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है कि दुनिया कभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहने वाली है। मोदी सरकार ने इस संकट के दौरान जो प्रशासनिक दृढ़ता, रणनीतिक दूरदर्शिता और त्वरित आर्थिक प्रबंधन दिखाया है, उसने देश को एक बड़ी आपदा से तो निकाल लिया है, लेकिन आत्मनिर्भरता की असली मंजिल अभी थोड़ी दूर है।