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जब हिरण्यकश्यप का वध कर भी शांत नहीं हुआ भगवान नरसिंह का क्रोध, महादेव को लेना पड़ा ‘शरभ अवतार’: पढ़ें- दोनों रूप से जुड़ीं अनसुनी कथा और मान्यताएँ

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली नरसिंह (नृसिंह) जयंती हिंदू धर्म में आस्था, शक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार के रूप में नरसिंह स्वरूप धारण किया था।

यह अवतार जितना अद्भुत है, उतना ही गूढ़ और रहस्यमय भी है, क्योंकि इसमें भगवान न तो पूर्ण रूप से मनुष्य थे और न ही पूर्ण रूप से पशु बल्कि आधे सिंह और आधे मानव के रूप में प्रकट हुए। यह रूप किसी संयोग का परिणाम नहीं था बल्कि एक अत्यंत विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिया गया था।

नरसिंह अवतार की पूरी कथा केवल एक दैत्य-वध की कहानी नहीं, बल्कि भक्ति, अहंकार, शक्ति-संतुलन और दिव्य लीला का विस्तृत दर्शन कराती है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नरसिंह अवतार के साथ ही भगवान शिव ने भी एक अवतार लिया था। आइए जानते हैं इससे जुड़ी पौराणिक कथा और मान्यताएँ।

हिरण्यकश्यप का वरदान और नरसिंह अवतार

इस कथा की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं जब असुर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे ऐसा वरदान दिया, जिससे वह लगभग अमर हो गया।

वह न मनुष्य से मारा जा सकता था, न पशु से, न दिन में उसकी मृत्यु हो सकती थी, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से, न धरती पर और न आकाश में।

इस वरदान ने उसके भीतर अहंकार को जन्म दिया और उसने स्वयं को भगवान मानना शुरू कर दिया। उसने देवताओं को पराजित कर दिया और पूरे ब्रह्मांड में अत्याचार फैलाने लगा। लेकिन उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था।

हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को कई बार मारने की कोशिश की लेकिन हर बार वह भगवान विष्णु की कृपा से बच गया। जब हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है और स्तंभ पर प्रहार किया, तब उसी स्तंभ से भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए।

उन्होंने संध्या समय, महल की दहलीज पर, अपनी गोद में बैठाकर और नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया। इस प्रकार उन्होंने वरदान की हर शर्त को तोड़ते हुए धर्म की स्थापना की।

AI द्वारा प्रतीकात्मक चित्र

नरसिंह का अनियंत्रित क्रोध और शिव का शरभ अवतार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका उग्र रूप इतना भयानक हो गया कि देवता, ऋषि और समस्त लोक भयभीत हो उठे। यहाँ तक कि प्रह्लाद, जिनके लिए भगवान प्रकट हुए थे, वे भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर पाए।

इस स्थिति में सभी देवता पहले ब्रह्मा के पास गए लेकिन समाधान नहीं मिला। अंततः सभी भगवान शिव के पास पहुँचे। भगवान शिव, जिन्हें संहार और संतुलन का देवता माना जाता है, उन्होंने पहले अपने गण वीरभद्र को भेजा लेकिन वे भी नरसिंह को शांत करने में असफल रहे।

इसके बाद भगवान शिव ने एक अत्यंत अद्भुत और शक्तिशाली रूप धारण किया, जिसे शरभ अवतार कहा जाता है। इस रूप में वे सिंह, पक्षी और मनुष्य के मिश्रण के रूप में थे और अत्यंत बलशाली थे। शरभ और नरसिंह के बीच भयंकर संघर्ष हुआ, जिसकी कथाएँ विभिन्न पुराणों में अलग-अलग रूप में मिलती हैं।

कुछ परंपराओं में कहा गया है कि शरभ ने नरसिंह को अपनी शक्ति से नियंत्रित कर उनका क्रोध शांत किया। वहीं वैष्णव परंपरा में यह मान्यता है कि नरसिंह ने एक और शक्तिशाली रूप धारण कर इस चुनौती का सामना किया। अंततः जब नरसिंह को यह आभास हुआ कि उनका उद्देश्य पूर्ण हो चुका है, तब उनका क्रोध शांत हुआ।

श्रीलंका के मुन्नेस्वरम मंदिर में शरभ के रूप में भगवान शिव (फोटो साभार: wikimedia commons)

यह प्रसंग इस बात का प्रतीक है कि ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखने के लिए देव शक्तियों के बीच भी जटिल और गूढ़ लीलाएँ होती हैं।

नरसिंह का अद्भुत स्वरूप और उनके अनेक रूप

शास्त्रों में भगवान नरसिंह को भगवान के छहों ऐश्वर्यों- शक्ति, धन, वैराग्य, तेज, ऊर्जा और ज्ञान से पूर्ण रूप से युक्त बताया गया है। पद्म पुराण में कहा गया है कि नरसिंह, राम और कृष्ण इन तीनों अवतारों में भगवान के सभी गुण पूर्ण रूप से प्रकट होते हैं। भगवान कृष्ण या नारायण को सभी दिव्य रूपों का मूल माना जाता है।

नारायण से वासुदेव प्रकट होते हैं और वासुदेव से संकर्षण का प्रादुर्भाव होता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान नरसिंह, संकर्षण के अंश रूप हैं। जिस प्रकार संकर्षण सृष्टि का संहार करते हैं, उसी प्रकार भगवान नरसिंह अज्ञान और शरीर, मन तथा वाणी से उत्पन्न सभी पापों का नाश करते हैं।

भगवान नरसिंह के अनेक स्वरूपों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। पाञ्चरात्र आगम के विहगेन्द्र संहिता में नरसिंह के सत्तर से भी अधिक रूपों का उल्लेख है। इन रूपों में अंतर उनके हाथों में धारण किए गए अस्त्र-शस्त्र, उनकी मुद्रा, आसन और अन्य सूक्ष्म भेदों के आधार पर होता है।

इन अनेक रूपों में से नौ रूप विशेष रूप से प्रसिद्ध माने जाते हैं, जिन्हें नव-नृसिंह कहा जाता है। ये हैं- उग्र नरसिंह, क्रुद्ध नरसिंह, वीर नरसिंह, विलंब नरसिंह, कोप नरसिंह, योग नरसिंह, अघोर नरसिंह, सुदर्शन नरसिंह और लक्ष्मी नरसिंह। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम क्षेत्र में भी भगवान नरसिंह के नौ प्रमुख स्वरूपों की पूजा होती है।

इनमें छत्रवत नरसिंह, योगानंद नरसिंह, करंज नरसिंह, उह नरसिंह, उग्र नरसिंह, क्रोड नरसिंह, मलोल नरसिंह, ज्वाला नरसिंह और पावन नरसिंह शामिल हैं। इन सभी रूपों का अपना अलग महत्व और कथा है, जैसे मलोल नरसिंह में देवी लक्ष्मी उनके साथ विराजमान होती हैं, जबकि ज्वाला नरसिंह अत्यंत उग्र रूप में स्तंभ से प्रकट होते हैं।

इसके अलावा भगवान नरसिंह के कई अन्य रूपों का भी वर्णन मिलता है, जैसे स्तंभ नरसिंह जो स्तंभ से प्रकट होते हैं, स्वयं नरसिंह जो स्वयं प्रकट होते हैं, ग्रहण नरसिंह जो राक्षस को पकड़ते हैं, विदारण नरसिंह जो उसका पेट फाड़ते हैं और संहार नरसिंह जो उसका वध करते हैं।

उनके उग्र स्वरूपों में घोर नरसिंह, उग्र नृसिंह, चंड नरसिंह और ज्वाला नरसिंह का उल्लेख किया गया है। वहीं लक्ष्मी नरसिंह रूप में देवी लक्ष्मी उन्हें शांत करती हैं और प्रसाद या प्रह्लाद-वरद नरसिंह रूप में वे भक्त प्रह्लाद को आशीर्वाद देते हैं। छत्र नरसिंह रूप में वे पाँच फनों वाले सर्प की छाया में बैठे होते हैं, जबकि योग नरसिंह ध्यान मुद्रा में होते हैं।

आवेश नरसिंह अत्यंत उन्मत्त रूप को दर्शाते हैं और अट्टहास नरसिंह वह रूप है जिसमें वे भयानक गर्जना करते हुए अधर्म का नाश करते हैं। चक्र नरसिंह रूप में उनके हाथ में केवल सुदर्शन चक्र होता है। कुछ रूपों में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों से जोड़ा गया है, जबकि कुछ रूप पंचतत्वों, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि और अमृत का प्रतिनिधित्व करते हैं।

पुष्टि नरसिंह की पूजा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए की जाती है। भगवान नरसिंह के असंख्य रूप उनकी अनंत शक्ति, विविधता और दिव्यता को दर्शाते हैं। यह सभी रूप इस बात का प्रमाण हैं कि उनका अवतार केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक व्यापक आध्यात्मिक सत्य है, जो अज्ञान के नाश और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट हुआ।

नरसिंह से जुड़ी रहस्यमयी मान्यताएँ और लोककथाएँ

नरसिंह अवतार से जुड़ी अनेक ऐसी मान्यताएँ हैं, जो इसे और भी रहस्यमय बनाती हैं। आंध्र प्रदेश का अहोबिलम क्षेत्र वह स्थान माना जाता है, जहाँ भगवान स्तंभ से प्रकट हुए थे। वहाँ एक विशेष चट्टान को उसी स्तंभ का प्रतीक माना जाता है, जिसे उग्र स्तंभ कहा जाता है।

कुछ मंदिरों में भगवान को गुड़ से बना पेय अर्पित किया जाता है, जिसे पानकम कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान उसका कुछ भाग स्वयं स्वीकार करते हैं, जो उनके क्रोध को शांत करने का प्रतीक माना जाता है। आदि शंकराचार्य से जुड़ी कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसमें संकट के समय उन्होंने नरसिंह का स्मरण किया और उन्हें दिव्य सहायता प्राप्त हुई।

इसके अलावा भारत के विभिन्न हिस्सों में ऐसे स्थानों की मान्यता है, जहाँ भगवान के प्रकट होने या उनसे जुड़ी घटनाओं के प्रमाण माने जाते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भी इस अवतार से जुड़ी लोककथाएँ प्रचलित हैं, जो इस कथा को और व्यापक बनाती हैं।

सिंहाचलम मंदिर और नरसिंह भक्ति की परंपरा

आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम के पास स्थित सिंहाचलम मंदिर नरसिंह भगवान के प्रमुख तीर्थों में से एक है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी वास्तुकला द्रविड़ शैली की है। यहाँ भगवान के वराह और नरसिंह के संयुक्त रूप की पूजा की जाती है।

सिम्हाचलम मंदिर, विशाखापत्तनम (फोटो साभार: vizagtourism.org)

इस मंदिर की सबसे विशेष बात यह है कि भगवान की प्रतिमा को साल भर चंदन के लेप से ढका जाता है और केवल अक्षय तृतीया के दिन ही उसका वास्तविक स्वरूप दर्शन के लिए खोला जाता है। इस अवसर को चंदनोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

वैसे तो भगवान नरसिंह के कई मंदिर भारत में हैं। लेकिन इस मंदिर को उनका निवास स्थान माना जाता है और यह कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं प्रह्लाद ने करवाया था। मंदिर का इतिहास भी काफी प्राचीन है और विभिन्न राजाओं द्वारा इसके जीर्णोद्धार की कथाएँ जुड़ी हुई हैं।

यह स्थान केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नरसिंह अवतार की कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष, भक्ति की शक्ति और ईश्वर की लीला का गहरा संदेश देती है।

यह अवतार यह दर्शाता है कि जब अन्याय और अत्याचार अपनी सीमा पार कर जाते हैं, तब ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर संतुलन स्थापित करते हैं। इस कथा का सबसे महत्वपूर्ण और रोचक पहलू यह है कि भगवान शिव को भी हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्होंने अपने शरभ अवतार के माध्यम से नरसिंह के क्रोध को शांत किया।

यह घटना दर्शाती है कि सृष्टि के संचालन में सभी दिव्य शक्तियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। नरसिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह विश्वास का प्रतीक है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर हर युग में उपस्थित रहते हैं और अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं।

J&K को दिखाया पाकिस्तान का हिस्सा, नॉर्थ ईस्ट को चीन में घुसाया: गलत मैप शेयर करने पर नेपाल एयरलाइंस पर भड़के नेटिजन्स, गाली पड़ी तो बोले- SORRY, गलती हो गई; पढ़ें पूरा मामला

नेपाल में बालेन शाह की सरकार बनने के बाद एक और भारत-विरोधी कारनामे सामने आ रहे हैं। अब नेपाल एयरलाइंस ने नक्शा (मैप) जारी किया, जिसमें पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का और पूरे नॉर्थ ईस्ट को चीन का हिस्सा दिखाया गया है। भारत के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने एयरलाइन से जवाबदेही माँगी, तब जाकर एयरलाइन ने ऐसा भ्रामक नक्शा दिखाने के लिए माफी माँगी है।

दरअसल, नेपाल की ‘नेपाल एयरलाइंस’ ने 29 अप्रैल 2026 ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ अकाउंट पर अपने फ्लाइट नेटवर्क को दिखाते हुए पूरी दुनिया का एक नक्शा पोस्ट किया। इस नक्शे में सबसे आपत्तिजनक बात थी कि इसमें भारत के अधिकतर हिस्सों को चीन और पाकिस्तान के नक्शे में दिखाया गया।

नक्शे में खासकर पूरे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया, जिस पर भारत के नेटिजन्स भड़क गए। इतना ही नहीं भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे सिक्किम, दार्जीलिंग समेत पूरे नॉर्थ ईस्ट को भी चीन के हिस्से में दिखाया गया। यह देखकर भारत के नेटिजंस और ज्यादा गुस्सा गए।

नेपाल एयरलाइंस पर भारत के नेटिजन्स का फूटा गुस्सा

इस हरकत के बाद नेपाल एयरलाइंस भारत के नेटिजन्स के निशाने पर आ गया। लोगों ने नेपाल एयरलाइंस से जवाबदेही माँगी। ‘एक्स’ पर #NepalAirlines और #JammuKashmir से जुड़े हैशटैग के साथ पोस्ट वायरल होने लगे, जिसमें यूजर्स ने इसे भारत-विरोधी और जानबूझकर किया गया गलत काम बताया।

दिव्या गंडोत्रा ​​टंडन नाम की यूजर ने लिखा, “भारत ने दशकों से नेपाल की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। खुली सीमा से लेकर लाखों नेपाली नागरिकों को रोजगार देने तक, व्यापार के लिए भारत के बंदरगाह उपलब्ध कराने से लेकर ईंधन पाइपलाइन, बिजली परियोजनाएँ, आपदा के समय मदद, बुनियादी ढाँचे का निर्माण, स्कॉलरशिप और सैन्य सहयोग तक, भारत हमेशा नेपाल के साथ खड़ा रहा है।”

उन्होंने आगे लिखा, “लेकिन ऐसे में नेपाल एयरलाइंस की ओर से जारी एक फ्लाइट नेटवर्क मैप ने हैरान कर दिया। इस मैप में जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को पाकिस्तान के साथ दिखाया गया। यह कोई साधारण डिजाइन की गलती नहीं लगती, बल्कि एक गंभीर और संवेदनशील मामला है। जब भारत आज भी नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साझेदार है, तब एक राष्ट्रीय एयरलाइन से ऐसी लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। यह केवल एक नक्शा नहीं, बल्कि एक ऐसा संदेश है, जो कई सवाल खड़े करता है।”

असम के वोकेशनल टीचर्स एसोसिएशन के आधिकारिक हैंडल ने भी आपत्ति जताते हुए लिखा, “भारत कई दशकों से नेपाल का सबसे बड़ा और भरोसेमंद साथी रहा है। ऐसे में नेपाल एयरलाइंस द्वारा अपने फ्लाइट मैप में जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाना बेहद गैर-जिम्मेदाराना है। यह एक गंभीर गलती है, जिसे सुधारा जाना चाहिए।”

ऐसे ही भोजपुरी स्टार और RJD नेता खेसारी लाल यादव ने भी लिखा, “कोई बता पाएगा की क्या सोच के नेपाल एयरलाइंस भारत के नक्शे में ऐसा छेड़ छाढ़ किया है और वो भी जम्मू कश्मीर को लेकर? ये मामूली बात नहीं है, जानबूझकर किया हुआ काम लगता हैं। इसको चिढ़ाना बोलते हैं।”

‘द दार्जीलिंग क्रोनिकल’ नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “नेपाल एयरलाइंस की नजर में दुनिया कुछ अलग ही है। उनके नक्शे को देखें तो ऐसा लगता है कि भारत का पूरा उत्तर-पश्चिम, पूरा उत्तर-पूर्व, दार्जिलिंग, सिक्किम और यहाँ तक कि म्यांमार का हिस्सा भी चीन में शामिल कर दिया गया है। काठमांडू में आजकल लोग क्या फूँक रहे हैं?”

नेपाल एयरलाइंस ने माँगी माफी

भारत के यूजर्स की कड़ी आलोचना के बाद नेपाल एयरलाइंस ने आखिरकार सार्वजनिक तौर पर माफी माँगी। एयरलाइन ने कहा कि वे अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर हाल ही में साझा किए गए फ्लाइट नेटवर्क मैप में हुई गलती के लिए दिल से माफी माँगते हैं।

यह भी कहा कि इस नक्शे में अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर गंभीर त्रुटियाँ थीं, जो नेपाल सरकार या नेपाल एयरलाइंस की आधिकारिक स्थिति को बिल्कुल भी नहीं दर्शाती है।

नेपाल का भारत-विरोधी रुख और बालेन शाह सरकार में उथल-पुथल

बता दें कि नेपाल में नई बालेन शाह सरकार बनने के बाद से ही नेपाल का भारत-विरोधी रुख सामने आता जा रहा है। हाल ही में बालेन शाह सरकार नई भंसार नीति लाई थी, जिसके तहत भारत से लाए जाने वाले 100 से अधिक नेपाली रुपये (लगभग ₹63) के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी, जिसके बाद भी बालेन शाह सरकार का विरोध हुआ था।

और यह भी किसी से नहीं छिपा कि बालेन शाह सरकार अपने ही फैसलों से गतिरोध का सामना कर रही है, उनके बड़े-बड़े मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे जिसके बाद उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ा। कुल मिलाकर नई बालेन शाह सरकार देश को चलाने में असमर्थ साबित हो रही है।

बिहार से हैं, सुनते ही पहले बकीं गालियाँ, फिर मार दी गोली: दिल्ली में पांडव कुमार की हत्या की आँखों-देखी, पढ़ें- ऑपइंडिया से क्या बोला पीड़ित परिवार

दिल्ली के जाफरपुर कलाँ में रविवार (26 अप्रैल 2026) को एक बिहार के खगड़िया के रहने वाले युवक की हत्या के बाद अब पीड़ित परिवार घर के बाहर धरने पर बैठ गया है और प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रहा है। इस बीच अब इस मामले को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और भाजपा सरकार पर निशाना साधा।

इस बीच ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के उत्तम नगर के उस प्रजापति कॉलोनी पहुँची, जहाँ मृतक मजदूर पांडव कुमार का परिवार रहता है। हमने देखा कि कॉलोनी में जगह-जगह उठ रहे धुएँ से घुटन के बीच मटके बनाने में लगे हुए हैं। इस बीच रास्ते को रोककर ट्रांसफार्मर के पास जमीन पर मेट बिछा हुआ है। ऊपर धूप से बचने के लिए सफेद चाँदनी लगी थी और उसके नीचे पीड़ित परिजन शोक में बैठे थे। जहाँ पहले से परिवारजनों, रिश्तेदारों, स्थानीय नेताओं और कुछ मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लगा हुआ है।

यहाँ ट्रांसफार्मर के तीन ओर लगी जाली पर मृतक पांडव कुमार के फोटो के साथ कुछ फ्लेक्स लगे थे, जिस पर लिखा था…’क्या बिहारी होना गुनाह है?’ ‘बिहार नाम सुनते ही पुलिस वाले नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में गोली मारी’, ‘पांडव तेरे कातिल जिंदा हैं। हम सब शर्मिंदा हैं’। एक दूसरे फ्लेक्स में सबसे ऊपर लिखा था… ‘रक्षक बना भक्षक’।

पांडव के घर के बाहर लगा बैनर (फोटो साभार: ऑपइंडिया)

फर्श पर महिलाओं से घिरी मृतक पांडव की माँ बेसुध बैठी थी जिसे कुछ महिलाएँ संभालने की कोशिश कर रही थीं। हमने उनसे बात करने की कोशिश की। उन्होंने हमें बताया कि घटना के अगले दिन यानी 27 तारीख की सुबह 7:00 बजे मुझे पता चला कि बेटा इस दुनिया में नहीं रहा। माँ बताती हैं, “वह मुझसे कहकर गया था कि मम्मी मैं बर्थडे पार्टी में जा रहा हूँ, मेरे लिए खाना मत बनाना, मैं देर रात को आऊँगा। लेकिन सामने एक मकान में रहने वाले पुलिस वाले पिस्तौल निकालकर मेरे बेटे को गोली मार दी।”

पांडव की माँ ने कहा, “मेरे बेटे के सीने में गोली लगी और पार निकल गई । पीछे बैठे दूसरे लड़के के पेट में गोली लगी वह अस्पताल में भर्ती है।” बेटे की बातों को याद कर माँ फिर से बिलखने लगती है और कहती है, “मुझे बस न्याय चाहिए। मेरा बेटा घर में अकेला कमाने वाला था। अब मेरा कोई सहारा नहीं रहा।”

मृतक पांडव के घर के बाहर बैठे लोग (फोटो साभार: ऑपइंडिया)

पास में बैठी दूसरी महिला ने कहा कि हमें बिहार से होने के कारण बहुत अपमान झेलना पड़ता है। वो कहती हैं, “लोग कहते हैं कि यह बिहारी हैं और बिहार से आकर यहाँ गंदगी फैलाते हैं। हम दो दिन से यहाँ भूखे-प्यासे बैठे हैं लेकिन हमें न्याय नहीं मिल रहा है।” पांडव कुमार की चाची कहती हैं कि हम उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे लेकिन शादी होने से पहले ही उसको मार दिया हम चाहते हैं कि पुलिस वाले को फाँसी हो।  

चश्मदीद चचेरे भाई ने क्या बताया?

पांडव कुमार के छोटे भाई दीपक ने बताया कि मुझे रात में नहीं पता चला था लेकिन जब पता चला तो मुझे यकीन नहीं हुआ। पांडव कुमार की बाइक पर बैठे तीसरे युवक यानी चचेरे भाई दीपक ने हमें बताया कि हम करीब 9:30 बजे प्रजापति कॉलोनी से 6 लोग मित्र रुपेश के बेटे की बर्थडे पार्टी में शामिल होने के लिए गए थे लेकिन केक काटने के बाद खाना खाने में टाइम लग गया था और करीब 2:00 बजे हम वहाँ से निकले। कुछ लोग कैब से निकल गए।

दीपक बताते हैं, “हम बाइक से निकल ही रहे थे कि अचानक नशे में घुत एक व्यक्ति हमारे पास आया। हमें गालियाँ देते हुए उसने पूछा कि कहाँ से हो? हमने जब बिहार से होना बताया तो उसने बिहार नाम सुनते ही हमें गालियाँ देना शुरू कर दिया।” वो बताते हैं, “हमने वहाँ से निकलने की भी कोशिश की लेकिन उसने हमारे रास्ता रोककर पिस्तौल तान दी और फिर बातों ही बातों में उसने गोली चला दी। इसके बाद उसने कहा कि एक तो मर गया है दूसरा भी मर जाएगा जाओ ले जाओ इसे बचा लो और फिर वह वहाँ से गाड़ी लेकर फरार हो गया।”

दीपक बताते हैं कि कुछ देर बात तक तो भाई तड़पता रहा लेकिन फिर मेरे हाथों में ही उसने दम तोड़ दिया और मैं कुछ नहीं कर सका। चचेरा भाई दीपक आगे कहता है कि हम दिल्ली में कमाने के लिए आए हैं मुझे यहाँ आए 20 साल हो गए लेकिन हमें आए दिन लोग बिहार के नाम पर गाली देते हैं हमारा अपमान करते हैं।

घटना के समय मौजूद छोटू नाम का युवक कहता है क्या बिहारी होना अब गुनाह हो गया है? या हमें दिल्ली में रहने का अधिकार नहीं है? हम चाहते हैं कि उसे (आरोपित) फाँसी होनी चाहिए।

न्याय नहीं मिला तो करूँगा दिल्ली की सड़कें जाम

पांडव कुमार के दादा कमलेश सिंह बताते हैं कि करीब 15 साल पहले हम यहाँ आए थे और वह यहाँ मजदूरी करते हैं। वो कहते हैं, “पांडव लड़का बहुत अच्छा था आज उसका पोस्टर देखकर हमारा कलेजा फट रहा है। मेरी सरकार से माँग है कि हमारे परिवार को आर्थिक मदद दी जाए और 3 महीने के अंदर आरोपी को फाँसी देकर हमें न्याय दिया जाए।”

वो कहते हैं, “अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं खुद सड़कों पर उतर कर रोड को जाम करूँगा।पांडव के दादा अंत में कहते हैं कि बिहारी को मुर्दा ना समझा जाए उसे जिंदा समझा जाए। आज एक पांडव मरा है लेकिन यहाँ हजारों पांडव खड़े हैं।”

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दी 8 लाख की आर्थिक मदद

पांडव कुमार की हत्या पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही सम्राट चौधरी ने परिवार को 8 लाख की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। साथ ही केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी घटना पर दु:ख जताया है। वहीं, मंगलवार को पीड़ित परिवार से मुलाकात के लिए पूर्णिया सांसद पप्पू यादव पहुंचे और उन्होंने परिवार को 50 हजार रुपए की आर्थिक मदद की।

साथ ही, सपा नेता खेसारी लाल निरहुआ, तेजस्वी यादव ने भी इस घटना के बहाने भाजपा सरकार पर निशाना साधा। वहीं देर शाम को खगड़िया लोकसभा सांसद राजेश वर्मा ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का भरोसा दिया और उन्हें 1 लाख की आर्थिक भी दी।  

आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात हरियाणा निवासी हवलदार नीरज बल्हारा ने नशे की हालत में बिहार के युवकों को गाली देते हुए गोली चला दी थी, जिसमें दो युवकों को गोली लगी थी। पांडव ने सीने में गोली लगने से मौके पर ही दम तोड़ दिया था और पीछे बैठे कृष्णा के पेट में गोली लगी थी जो अभी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई करते हुए आरोपित नीरज बल्हारा को गिरफ्तार कर लिया है, जिसे कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है।

द टिमोथी इनिशिएटिव: हिंदुओं के धर्मांतरण पर खर्च कर रहा ₹1 करोड़/माह, नक्सल प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ के इलाकों पर नजर; पढ़ें- ईसाई MLM मॉडल की A To Z जानकारी

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 18 और 19 अप्रैल को ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ The Timothy Initiative (TTI) नाम की एक संस्था से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की। ED ने बताया कि वह इस बात की जाँच कर रहा है कि TTI ने कैसे करीब 95 करोड़ रुपए भारत में विदेशी बैंकों के डेबिट कार्ड के जरिए भेजे जबकि FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के नियमों को पूरी तरह दरकिनार किया गया है।

गौर करने वाली बात यह है कि TTI FCRA के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इसका मतलब है कि भारत में इस संस्था के किसी भी कार्यक्रम को विदेशी फंडिंग नहीं मिल सकती। इसके बावजूद ED ने बताया कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच विदेशी बैंक डेबिट कार्ड के जरिए करोड़ों रुपए नकद निकाले गए।

ED के मुताबिक, TTI ने एक खास तरीका अपनाया था। अमेरिका के Truist Bank से जुड़े विदेशी डेबिट कार्ड भारत लाए गए और इनका इस्तेमाल कई राज्यों के एटीएम से बार-बार पैसे निकालने के लिए किया गया। बाद में इस पैसे का उपयोग TTI के भारत में चल रहे धर्मांतरण से जुड़े कामों के खर्च के लिए किया गया। इस मामले में ED ने कई राज्यों में कुल 6 जगहों पर छापेमारी की। जाँच एजेंसी के अनुसार, इन छापों में 25 विदेशी बैंक डेबिट कार्ड, 40 लाख रुपए नकद और कई अहम डिजिटल सबूत, डिवाइस और दस्तावेज जब्त किए गए।

इसके अलावा, माइका मार्क (Micah Mark) नाम के एक व्यक्ति के पास 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले। उसे ED द्वारा जारी लुकआउट सर्कुलर के आधार पर बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन ब्यूरो ने रोका था, जब वह ये कार्ड भारत लेकर आ रहा था। ED ने यह भी बताया कि इन कार्ड्स से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों जैसे धमतरी और बस्तर में संदिग्ध तरीके से भारी मात्रा में नकदी निकाली गई। पिछले कुछ सालों में इन इलाकों से करीब 6.5 करोड़ रुपए निकाले जाने की जानकारी सामने आई है।

एजेंसी के अनुसार, इन कार्ड्स का इस्तेमाल एक सुनियोजित तरीके से बड़ी रकम निकालने के लिए किया जा रहा था, जिससे संगठित नेटवर्क की आशंका जताई जा रही है। ED ने यह भी कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में इस तरह की समानांतर नकद अर्थव्यवस्था का बनना देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है क्योंकि इससे अवैध गतिविधियों के लिए पैसों की आवाजाही आसान हो सकती है।

इसके अलावा, TTI एक ऑनलाइन बिलिंग और अकाउंटिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रही थी जिसमें एटीएम से निकाले गए पैसे और उनके इस्तेमाल का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता था। ED के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म को विदेशी संस्थाओं द्वारा नियंत्रित किया जा रहा था जिससे यह संकेत मिलता है कि यह पूरी प्रक्रिया किसी एक जगह की नहीं बल्कि संगठित और योजनाबद्ध तरीके से चलाई जा रही थी।

क्या है ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’?

भारत में जियो-ब्लॉक The Timothy Initiative (TTI) की वेबसाइट के अनुसार यह एक वैश्विक ईसाई आंदोलन है जिसका उद्देश्य नए अनुयायी बनाना, चर्च स्थापित करना और धार्मिक नेतृत्व तैयार करना है। ऑपइंडिया द्वारा एक्सेस किए गए इसके दस्तावेजों में कहा गया है कि यह संगठन हर गाँव में एक चर्च स्थापित करने के लक्ष्य के साथ काम कर रहा है। TTI की प्रकाशित सामग्री, उसकी ‘हिस्ट्री’ पेज और प्रचार सामग्री से यह साफ होता है कि चर्च स्थापित करना इसका मुख्य उद्देश्य है।

इसके Kingdom Impact नामक दस्तावेज के अनुसार, साल 2007 से अब तक इस संगठन ने 50 देशों जिसमें भारत भी शामिल है में 2,68,750 से ज्यादा चर्च स्थापित किए हैं। साथ ही, संगठन का दावा है कि 23,92,427 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया है जिनमें 2,01,954 विधवाएँ और अनाथ भी शामिल हैं। इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

फोटो साभार: TTI

TTI का कहना है कि अनुयायियों की संख्या एक अनुमान है जो हर नए बनाए गए चर्च में जुड़ने वाले लोगों के पुराने औसत के आधार पर निकाली गई है। यानी असल संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है।

TTI का पूरा मॉडल बाइबिल की एक पंक्ति ‘2 Timothy 2:2’ पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि जो सीख मिली है, उसे भरोसेमंद लोगों को सिखाओ, ताकि वे आगे और लोगों को सिखा सकें। आसान भाषा में समझें तो यह एक ‘चेन सिस्टम’ की तरह है जिसमें एक व्यक्ति कुछ लोगों को तैयार करता है, वे आगे और लोगों को तैयार करते हैं और इस तरह नेटवर्क लगातार बढ़ता जाता है।

इसे एक तरह से मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) मॉडल जैसा भी समझा जा सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें लोग कोई प्रोडक्ट नहीं खरीदते बल्कि ईसाई धर्म में परिवर्तन के जरिए इस नेटवर्क का हिस्सा बनते हैं।

फोटो साभार: TTI

TTI ने अपने एक प्रचार वीडियो में कहा है कि उसका हर काम सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया भर में चर्च बनाने के लिए होता है। यानी प्रशासनिक, लॉजिस्टिक या कल्याण से जुड़े खर्च भी अंततः चर्च स्थापना और धर्म परिवर्तन के लक्ष्य से जुड़े हैं। खास बात यह है कि उसके एक प्रमुख वीडियो में ज्यादातर दृश्य भारत के हैं।

TTI के एक वीडियो में भारत पर केंद्रित विजुअल का स्क्रीनशॉट (साभार: TTI)

TTI के अनुसार उसके काम में 5 स्तर की लीडरशिप होती है- Titus, Timothy, Pauls, master trainers और movement leaders और इनमें से हर स्तर के लिए अलग-अलग फंडिंग की जरूरत होती है। यह मॉडल काफी हद तक MLM जैसा है, जहाँ नीचे लोगों की संख्या के आधार पर ‘स्तर’ तय होते हैं।

Titus स्तर के लोगों को 2 किताबों से ट्रेनिंग दी जाती है जबकि Timothy स्तर के लिए 12 किताबें और हजारों पन्नों की सामग्री होती है। Pauls को मास्टर ट्रेनर मैनुअल, लगातार ट्रेनिंग और यात्रा भत्ता मिलता है।

संगठन के मुताबिक, Master Trainers और Movement Leaders को ट्रेनिंग के दौरान खाने, यात्रा और रहने का खर्च दिया जाता है। साथ ही उन्हें हर महीने एक छोटा स्टाइपेंड भी मिलता है। यानी यह सिर्फ स्वैच्छिक प्रचार नहीं बल्कि इसमें लीडर्स और ट्रेनर्स को आर्थिक सहयोग भी दिया जाता है।

प्रमोशनल सामग्री में यह भी बताया गया है कि डोनर का पैसा ‘विजन कास्टिंग’ जैसे कार्यक्रमों में खर्च होता है, जिनका मकसद नए लोगों को जोड़ना होता है। साथ ही TTI के लोग फील्ड में जाकर यह भी जाँच करते हैं कि चर्च और समूह वास्तव में मौजूद हैं या नहीं यानि ट्रेनिंग के साथ निगरानी और रिपोर्टिंग सिस्टम भी है।

इसके अलावा, फंड का इस्तेमाल नए देशों में विस्तार, ऑफिस खोलने, यात्रा और नई भाषाओं में सामग्री तैयार करने में होता है। संगठन के खर्चों में गाँवों की मैपिंग सॉफ्टवेयर, ट्रेनिंग लॉन्च, रिपोर्टिंग, लीडरशिप डेवलपमेंट, मेंटरिंग, ऑफिस, प्रिंटिंग, नई सामग्री, वीडियो, ऑडियो बाइबल, किताबें, स्टाफ सैलरी, मीटिंग्स और अन्य कई तरह के ऑपरेशनल खर्च शामिल हैं।

संगठन के अनुसार, 2010 में उसने 10 किताबों का एक मुख्य ट्रेनिंग मॉडल बनाया जिसमें लक्ष्य था कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च स्थापित करे। 2013 में ‘Disciples Making Disciples (DMD)’ नाम का मल्टीप्लिकेशन मॉडल लागू किया गया। 2020 तक यह 7 लाख गाँवों की मैपिंग की बात कर रहा था और 2021 में ‘Coalition of the Willing’ के जरिए 50 लाख गाँवों की मैपिंग का लक्ष्य बताया गया।

TTI भले ही व्यावसायिक MLM न हो लेकिन इसका चर्च बनाने का सिस्टम मल्टी-लेवल विस्तार मॉडल जैसा है। इसमें अलग-अलग स्तर की लीडरशिप बनाई जाती है, लोगों को तय ट्रेनिंग दी जाती है, लीडर्स और ट्रेनर्स को फंड दिया जाता है, विस्तार को ट्रैक किया जाता है, जमीनी स्तर पर काम की जाँच होती है और सफलता को चर्च और अनुयायियों की बढ़ती संख्या से मापा जाता है।

विदेशी चर्च, भारत पर फोकस और हिंदू बहुल क्षेत्र

TTI से जुड़े पार्टनर्स की सामग्री से संकेत मिलता है कि भारत में इसकी गतिविधियाँ सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स के अनुसार, राजस्थान और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भी TTI से जुड़ी गतिविधियाँ सामने आई हैं।

एक पोस्ट में बताया गया कि TTI राजस्थान में पादरियों और लीडर्स को ट्रेनिंग देने के मिशन के तहत सक्रिय था। इसमें योजनाबद्ध ट्रेनिंग, अनुयायी तैयार करना और सहयोग देना शामिल था। साथ ही यह भी कहा गया कि यह पहल फैकल्टी बैटिस्टा पियोनेरा और बैपटिस्ट चर्च ऑफ न्यू इंग्लैंड मल्टीप्लिकेशन सेंटर के बीच साझेदारी के माध्यम से संभव हो पाई है। इससे संकेत मिलता है कि राजस्थान में चल रही ट्रेनिंग गतिविधियों से विदेशी चर्च नेटवर्क भी जुड़े हुए थे।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम

केंसिंग्टन चर्च की एक अन्य पोस्ट में TTI को एक वैश्विक आंदोलन बताया, जो अनुयायियों, चर्चों और लीडर्स की संख्या बढ़ाने पर काम करता है। पोस्ट के अनुसार, TTI के साथ साझेदारी के जरिए उत्तर भारत, जिसे हिंदू बहुल क्षेत्र बताया गया, में 3000 से ज्यादा हाउस चर्च शुरू किए गए। इसमें यह भी कहा गया कि केंसिंग्टन सहित आठ चर्चों के समूह ने इस क्षेत्र में यीशु का संदेश फैलाने के लिए 10 लाख डॉलर जुटाने का संकल्प लिया।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम

ED ने छत्तीसगढ़ के धमतरी और बस्तर जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में संदिग्ध कैश निकासी का जिक्र किया है। जबकि TTI से जुड़े नेटवर्क का दायरा खासकर हिंदू बहुल क्षेत्रों में राजस्थान और उत्तर भारत तक फैला बताया जा रहा है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़, बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों में हालात और गंभीर बताए गए हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं और ईसाई बहुसंख्यक बन चुके हैं। कई जगह ऐसे गाँव हैं जहाँ एक भी मंदिर नहीं है लेकिन 3-4 चर्च मौजूद हैं। साथ ही, पारंपरिक दाह संस्कार की जगह कई स्थानों पर कब्र और क्रॉस के साथ दफनाने की परंपरा बढ़ने का भी जिक्र है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गरीब, बीमार और सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है, जहाँ 2-3 पादरी कई गाँवों में सक्रिय हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में 146 NGO FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं, जिनमें 50 मिशनरी संगठन शामिल हैं। इनमें से 30 जशपुर, अंबिकापुर, रायगढ़ और बस्तर जैसे उन्हीं जिलों में काम कर रहे हैं, जहां धर्मांतरण के मामले सबसे ज्यादा बताए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी NGO छत्तीसगढ़ फर्म एंड सोसाइटी में भी रजिस्टर्ड हैं लेकिन इनका सरकारी ऑडिट नहीं होता बल्कि ये खुद ही अपनी ऑडिट रिपोर्ट जमा करते हैं। साथ ही, राज्य सरकार के पास इनके विदेशी फंडिंग को लेकर ठोस जानकारी नहीं होने की बात भी कही गई है।

TTI की टाइमलाइन: कैसे चर्च स्थापना बनी अभियान

TTI की टाइमलाइन के अनुसार, इसकी शुरुआत 2007 में हुई जब इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स एशिया के दौरे पर आए। संगठन के मुताबिक, उन्होंने वहां बहुत सारे मंदिर और मस्जिदें देखीं और पूछा- “चर्च कहाँ हैं?’ इस पर जवाब मिला- “कोई नहीं।” TTI इसी घटना को अपने आंदोलन की “आध्यात्मिक शुरुआत” बताता है जिसका उद्देश्य भारत में हिंदुओं को लक्ष्य बनाकर चर्च स्थापित करना था।

फोटो साभार: TTI

2008 में TTI का कहना है कि डेविड नेल्म्स और स्थानीय लीडर्स जोशुआ विजयकुमार और हर्षा कुमार ने एक चर्च स्थापना प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया। संगठन का यह भी कहना है कि इसी के साथ TTI के पहले 3,075 चर्च संस्थापकों की शुरुआत हुई। इससे पता चलता है कि संगठन का प्रारंभिक मॉडल केवल व्यक्तिगत प्रचार या छोटे पैमाने पर संगति कार्य नहीं था बल्कि चर्च संस्थापकों का सुनियोजित प्रशिक्षण था।

2010 में TTI ने 10 किताबों का कोर ट्रेनिंग सिस्टम तैयार किया। इसमें साफ लक्ष्य रखा गया कि हर प्रशिक्षित व्यक्ति ट्रेनिंग के अंत तक एक चर्च बनाए। यानी यहाँ सिर्फ सीखना नहीं बल्कि सीधे चर्च बनाना ही मुख्य उद्देश्य था- ट्रेनिंग और चर्च निर्माण आपस में सीधे जुड़े हुए हैं।

2013 में TTI के अनुसार उसने ‘अनुयायी से अनुयायी बनाने’ (Disciples Making Disciples या DMD) वाला एक नया प्रशिक्षण मॉडल लागू किया। इसी समय यह भी कहा गया कि संगठन 30 देशों में सक्रिय हो गया। इस मॉडल का मतलब साफ है कि एक व्यक्ति सिर्फ अनुयायी बनकर नहीं रहता बल्कि आगे और नए अनुयायी तैयार करता है। यहीं से यह पूरी व्यवस्था एक चेन की तरह काम करने लगती है, जहाँ हर प्रशिक्षित व्यक्ति आगे विस्तार का नया केंद्र बन जाता है।

फोटो साभार: TTI

2014 में TTI ने दावा किया कि उसने 25,000 से ज्यादा चर्च स्थापित कर लिए हैं। यानी कुछ ही सालों में संगठन ने चर्च की संख्या को अपनी उपलब्धि का पैमाना बनाना शुरू कर दिया। इससे साफ होता है कि उसका काम सिर्फ सेवा या कल्याण तक सीमित नहीं बल्कि चर्चों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित है।

2016 में TTI ने ‘अनरीच्ड पीपल ग्रुप्स’ पर ध्यान देना शुरू किया यानि ऐसे समुदाय जहाँ ईसाई मौजूदगी बहुत कम या नहीं के बराबर है। इससे यह दिखता है कि संगठन खास तौर पर तय किए गए लक्षित समूहों तक पहुँचने पर काम कर रहा था।

2020 में TTI ने ‘हर गाँव में एक चर्च’ के लक्ष्य के साथ एक नया अभियान शुरू किया। संगठन के अनुसार, एशिया के दो देशों में 7 लाख गाँवों का सर्वे और मैपिंग शुरू की गई ताकि हर गाँव में चर्च बनाया जा सके। साथ ही यह दावा भी किया गया कि हर 40 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था। इस चरण को इसलिए अधिक अहम माना गया है क्योंकि इसमें गाँव स्तर पर पहचान, सर्वे और टारगेटिंग के जरिए विस्तार की योजना साफ दिखती है।

फोटो साभार: TTI

2021 में TTI ने अपने अगले चरण ‘पर्स्यूट’ की शुरुआत बताई। इसके अनुसार, ‘हर गाँव में चर्च’ के लक्ष्य को पाने के लिए साझेदारी जरूरी थी। इसी से ‘कोएलिशन ऑफ द विलिंग’ बना। संगठन का कहना है कि अलग-अलग समूहों ने मिलकर 50 लाख गाँवों की मैपिंग की। इस दौरान यह दावा भी किया गया कि हर 20 मिनट में एक नया चर्च स्थापित हो रहा था।

अपने ‘आज’ (Today) वाले चरण को TTI ‘तेजी’ का दौर बताता है। इसके अनुसार, 2.6 लाख से ज्यादा चर्च स्थापित हो चुके हैं, 23 लाख नए अनुयायी जुड़े हैं और यह 50 देशों तक फैल रहा है। साथ ही यह दावा भी किया गया कि अब हर 11 मिनट में एक नया चर्च बनाया जा रहा है।

मौजूदा नेतृत्व और डॉ. जेरेड नेल्म्स की भूमिका

TTI की वेबसाइट के अनुसार, डॉ. जेरेड नेल्म्स इसके प्रेसिडेंट और सीईओ हैं। उनके प्रोफाइल में कहा गया है कि उनका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के स्थानीय नेताओं को तैयार करना, उनके साथ काम करना और हर जगह तक धार्मिक संदेश पहुँचाना है।

फोटो साभार: TTI

निष्कर्ष

ED की जाँच ने भले ही छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में TTI की गतिविधियों पर ध्यान खींचा है लेकिन संगठन की गतिविधियां सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत तक फैली हुई हैं। इसका मल्टी-लेवल जैसा काम करने का तरीका और सक्रिय सदस्य, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर चर्च स्थापित करने और धर्म परिवर्तन से जुड़े काम कर रहे हैं, एक गंभीर मुद्दा है जिस पर गहराई से जाँच किए जाने की जरूरत है।

(यह खबर मूल रुप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

बंगाल चुनाव में दंगाइयों पर चला सुरक्षाकर्मियों का हंटर, TMC के गुंडों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा: पढ़ें- कैसे दोनों चरणों में केद्रीय बलों ने काबू की चुनावी हिंसा

पश्चिम बंगाल में चुनाव और हिंसा जैसे एक ही कहानी के दो हिस्से माने जाते थे। 2021 के विधानसभा चुनावों में हिंसा की तस्वीर आज भी लोगों के जहन में ताजा है, जब TMC ने खुलेआम सड़कों पर उतरकर हिंसा फैलाई थी। लेकिन 2026 का ये चुनाव इस बार उसी पुराने डर को तोड़ता हुआ नजर आ रहा है। चुनाव आयोग ने पहले से ही एहतियात बरतते हुए देशभर से केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती की, ताकि मतदान प्रक्रिया को हर हाल में शांतिपूर्ण रखा जा सके।

इसका असर जमीन पर साफ दिख भी रहा है। दो चरणों के मतदान में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जहाँ TMC के गुंडों और दबंगों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन केंद्रीय बलों खासतौर पर CRPF ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। कहीं बूथ कैप्चरिंग की कोशिश नाकाम की गई, तो कहीं वोटरों को डराने-धमकाने वालों को मौके पर ही घसीटा गया।

इसके बावजूद बंगाल की मुख्यमंत्री और भवानीपुर सीट से उम्मीदवार ममता बनर्जी CRPF को ‘अत्याचारी‘ कह रही हैं। उनका आरोप है कि मतदान केंद्रों पर राज्य पुलिस नजर नहीं आ रही और केंद्रीय बलों ने पूरे चुनाव पर कब्जा कर लिया है, यहाँ तक कि वे एक खास राजनीतिक दल के पक्ष में काम कर रहे हैं।

जबकि जमीनी हकीकत है कि हिंसा को काबू में किया जा रहा है। कई वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें सुरक्षाबल सख्ती से हालात को काबू में करते दिख रहे हैं और यही वजह है कि इस बार बंगाल के चुनाव में हिंसा पर नियंत्रण की एक नई तस्वीर सामने आ रही है।

बंगाल चुनाव में मोर्चा संभालते केंद्रीय बल के वायरल वीडियो

मतदान के दूसरे चरण में सबसे बड़ी घटना दक्षिण 24 परगना जिले के फाल्टा विधानसभा सीट से सामने आई, जहाँ से TMC उम्मीदवार जहाँगीर खान चुनाव लड़ रहा है। इस विधानसभा के बूथ संख्या 144 पर EVM पर BJP के बटन पर टेप लगाया गया। इसका वीडियो सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने दोबारा मतदान करवाया। इस स्थिति का जायजा खुद चुनाव में पुलिस पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए उत्तर प्रदेश के IPS अफसर अजय पाल शर्मा ने लिया।

बता दें कि IPS अफसर अजय पाल पहले भी जहाँगीर खान के समर्थकों को मतदाताओं को डराने-धमकाने के लिए हड़का चुके हैं, जिसके बाद TMC उनके विरोध में उतर गई थी।

एक वीडियो सामने आया, जिसमें CRPF के जवान एक व्यक्ति को लटकाकर ले जा रहे हैं, दावा किया जा रहा है कि यह व्यक्ति मतदान में बाधा डाल रहा था और मतदाताओं को परेशान कर रहा था। वीडियो में दिख रहा यह व्यक्ति TMC समर्थक बताया गया। सुरक्षाबल और पुलिस इस व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।

अन्य वीडियो में CRPF के जवान मतदान में भंग पैदा करने की कोशिश करने वाले एक व्यक्ति को लाठी-डंडों से पीट रहे हैं।

ऐसे ही बंगाल के भंगर में मतदान केंद्र पर ISF उम्मीदवार नौशाद सिद्दीकी के सामने उनके समर्थकों और TMC समर्थकों के बीच झड़प हो गई। इस झड़प में CRPF ने दखल दिया औऱ दोनों तरफ के गुंडों पर लाठीचार्ज कर खदेड़ दिया।

एक औऱ वीडियो में हिंसा कर रही भीड़ को CRPF के सुरक्षाबल संभालते नजर आ रहे हैं। मौजूदा भीड़ को सुरक्षाबलों ने खदेड़ दिया।

CRPF इस तरीके से चुनाव संभाल रही है कि लोगों को ममता बनर्जी की बंगाल पुलिस से ज्यादा सुरक्षाबलों पर भरोसा हो रहा है। BJP नेता सुवेंदु अधिकारी तक भवानीपुर में मतदान केंद्र पर स्थिति बिगड़ने की शिकायत CRPF से करते हैं, उनका कहना है कि पुलिस पर भरोसा नहीं है।

ये वीडियो पहले चरण के मतदान के दौरान का है। जब दार्जीलिंग के एक बूथ के पास कुछ गुंडे मतदान में बाधा डालने के लिए इकट्ठा हुए, तब CRPF के जवानों ने भीड़ को तुरंत खदेड़ दिया और शांतिपूर्ण मतदान कराया।

यह वीडियो बीरभूम का है, जहाँ पहले चरण में EVM में खऱाबी को लेकर इस्लामी भीड़ ने पुलिस और CRPF पर हमला किया। इस हमले में केंद्रीय बलों के कई जवान घायल हुए, कुछ लोग भी घायल हुए, जिन्हें CRPF के जवान कंधे पर उठाकर सहायता देते नजर आ रहे हैं।

दूसरे चरण में हिंसा की कोशिशें, लेकिन CRPF की सख्ती से हालात काबू में

इन वीडियो के अलावा भी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को दूसरे चरण के मतदान के दौरान 7 जिलों की 142 विधानसभा सीटों पर मतदान के बीच कई जगहों से तनाव और हिंसा की खबरें सामने आईं। नदिया जिले में BJP के एक पोलिंग एजेंट पर TMC के गुंडों ने हमला किया। वहीं आरजी कर रेप और मर्डर केस की पीड़िता की माँ, जो इस चुनाव में BJP उम्मीदवार हैं, उन्होंने भी आरोप लगाया कि TMC समर्थकों ने उनके साथ दुर्व्यवहार और हमला करने की कोशिश की। कई जगहों पर BJP के वाहनों को निशाना बनाने और वोटरों को डराने-धमकाने की घटनाएँ भी सामने आईं।

केंद्रीय सुरक्षाबलों ने बंगाल चुनाव की बदली तस्वीर

आखिर में तस्वीर साफ नजर आती है कि एक तरफ TMC लगातार केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती पर सवाल उठा रही है, उन्हें पक्षपाती बताने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ जमीन पर वही सुरक्षाबल चुनाव को हिंसा से बचाने में जुटे हुए हैं। बयानबाजी अपनी जगह है, लेकिन जिन इलाकों में पहले चुनाव के नाम पर डर और दबाव का माहौल बनता था, वहाँ इस बार सुरक्षाबलों की मौजूदगी ने हालात को काफी हद तक बदल दिया है।

सच्चाई यही है कि पूरे चुनाव के दौरान TMC के गुंडों की हिंसा को जिस तरह से कंट्रोल किया गया, उसने एक अलग ही तस्वीर पेश की है। हर कोशिश को समय रहते रोका गया, वोटरों को सुरक्षित माहौल देने की कोशिश हुई और चुनाव प्रक्रिया को पटरी से उतरने नहीं दिया गया। ऐसे में विरोध और आरोपों के बीच यह सवाल और गहरा हो जाता है कि अगर सख्ती न होती, तो क्या बंगाल एक बार फिर उसी पुराने हिंसक दौर में लौट जाता?

NSA अजित डोभाल से मीटिंग के 2 दिन बाद UAE ने छोड़ा OPEC, मन ही मन मुस्कुरा रहे होंगे PM मोदी: जानिए- फैसले की वजह और इससे भारत को होने वाले फायदे

मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।

इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।

ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।

ओपेक क्या है और क्यों बना था?

ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।

उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।

कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?

UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।

ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?

UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।

सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।

UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।

ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।

इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।

UAE क्या हासिल करना चाहता है?

UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।

इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।

ओपेक पर इसका क्या असर पड़ेगा?

UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।

दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।

इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?

इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।

हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।

क्या भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।

UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।

इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।

कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।

UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।

इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।

साहित्य अकादमी या वामपंथियों का वैचारिक अखाड़ा? ममता कालिया को ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए मिले पुरस्कार से छिड़ी बहस

साहित्य अकादमी पुरस्कार 2025 की घोषणा पिछले दिनों हुई, जिसमें हिंदी में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को उनके संस्मरण ‘जीते जी इलाहाबाद’ के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्रयागराज (पूर्व इलाहाबाद) के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश को याद करते हुए आया लेकिन इससे जुड़े विमर्श ने फिर से साहित्य अकादमी में वैचारिक प्रभाव और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी सरकार के 11 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई लोग मानते हैं कि अकादमी में वामपंथी-प्रगतिशील प्रभाव का दबदबा अब भी कायम है।

वरिष्ठ पत्रकार तरुण विजय ने इस पुरस्कार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी ने वामपंथियों के यशोगान से पूर्ण एक पुस्तक अभी छापी है जबकि मोदी धरोहर की रक्षा और उनके योगदान पर केंद्रित पुस्तक को सांस्कृतिक सचिव को लौटा दिया गया। यह घटना अकादमी के भीतर वैचारिक असंतुलन को उजागर करती है।

स्वायत्तता या पुरानी लॉबी का चक्रव्यूह?

साहित्य अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था है लेकिन इसका संविधान 1952 के सरकारी प्रस्ताव पर आधारित है, न कि संसदीय कानून पर। सर्वोच्च जनरल काउंसिल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सरकार के पाँच नामित सदस्य, राज्य प्रतिनिधि और भाषा विशेषज्ञ शामिल होते हैं। पुरस्कार चयन बहु-स्तरीय है-भाषा-विशेष जूरी, एक्जीक्यूटिव बोर्ड की मंजूरी और अंतिम घोषणा।

आउटगोइंग काउंसिल ही इनकमिंग सदस्यों का चयन करती है, जिससे निरंतरता तो बनी रहती है लेकिन गुटबंदी और लॉबिंग की गुंजाइश भी बढ़ जाती है।

प्रधानमंत्री या संस्कृति मंत्रालय सीधे जूरी में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हाल ही में पुरस्कार घोषणा में तीन महीने का विलंब हुआ क्योंकि संस्कृति मंत्रालय ने ‘रिवार्ड स्ट्रक्चरिंग’ के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी थी। वामपंथी लॉबी ने इसे स्वायत्तता पर हमला बताया लेकिन विलंब के बाद घोषणा हुई और ममता कालिया जैसे नाम सामने आए।

यह घटनाक्रम साबित करता है कि सरकार एक झटके में पूरी प्रक्रिया नहीं बदल सकती। संविधान संशोधन के लिए व्यापक विमर्श, कानूनी प्रक्रिया और संसदीय सहमति जरूरी है। बिना इसके नई निर्वाचन प्रक्रिया-जैसे रोटेशन सिस्टम, अधिक पारदर्शी नामांकन और युवा/महिला प्रतिनिधित्व-नहीं लाई जा सकती।

ममता कालिया का मामला: पुरस्कार और वैचारिक असहजता

‘जीते जी इलाहाबाद’ संस्मरण में विभाजन काल के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों पर टिप्पणियाँ, ईद की कुर्बानी और ताजा गोश्त का भावुक वर्णन, कुंभ मेले में स्वच्छता अभियान पर आक्षेप जैसी बातें हैं। उनके परिवार का इलाहाबाद के मुस्लिम बहुल मुहल्ले रानी मंडी से 6 दिसंबर 1992 को भागना भी दर्ज है। 

अपने संस्मरण के 159वें पृष्ठ पर कालिया एक प्रसंग दर्ज करती हैं। जिसमें बताती हैं कि जैदी साहब के घर पाँच किस्म का गोश्त बना था। जैदी, इंदिरा और नेहरू के प्रशंसक थे। उनका ही कोई किस्सा छेड़ बैठे थे। 

अब आती है सेकुलर किस्म की पंक्ति:- अचानक मेरे जेहन में घंटी बजी। आज कौन वार है? मंगलवार। हे भगवान यह कैसी इम्तहान की घड़ी आ गई। 

मैं सोम मंगल का कोई उपवास व्रत नहीं रखती थी। पर न जाने कब से एक रूढ़ि मन में बैठी थी कि आज मंगलवार को मांसाहार नहीं करते। मैने धीरे से रवि से कहा: मेरी प्लेट तुम ले लो। आज मंगल है। 

रवि इसमें कहते हैं, बुधवार को खा ले और मंगल को बचे। उसे जबरदस्ती खिलाना चाहिए।

ममता कालिया की पी​ढ़ी के ‘साहित्यकारों’ के लिए मंगलवार जैसे प्रसंग अपनी कहानी, नाटक, संस्मरण में डालना अनिवार्य होता है। ‘हिन्दू’ साहित्यकार ऐसा लिखकर ही प्रगतिशील हो सकता है। मुसलमानों को पाँच वक्त के नमाज पर सवाल नहीं उठाना पड़ता। प्रगतिशील खेमे में सारी परीक्षा हिन्दुओं को देनी है। 

भारत में प्रगतिशील मुसलमान लेखकों ने नासिख-मंसूख (Abrogation) के सिद्धांत पर चुप्पी साधी। पत्नी को पीटने की अनुमति, महिलाओं की गवाही आधी, बाल विवाह या आयशा की उम्र से जुड़े प्रश्नों पर प्रगतिशील ‘स्त्रीवादियों’ ने कुछ कहा ही नहीं। क्या मजबूरी थी? 

इस्लाम के अंदर मौजूद दंड व्यवस्था, वहाँ मौजूद जिहाद और काफिरों से संबंधित आयतों पर प्रगतिशीलों का कुछ ना लिखना, क्या साबित नहीं करता कि वे कथित धर्मनिरपेक्ष सरकारों के संरक्षण में कट्टरपंथी मुसलमानों को प्रोत्साहित कर रहे थे। खलीफा उस्मान बिन अफ्फान ने कुरान के पाठ में भिन्नता के कारण पैदा हुए विवादों को रोकने और पाठ की प्रामाणिकता को बनाए रखने के लिए कुरैश की बोली में एक मानक प्रति (उस्मानी मुस्हफ) तैयार करवाई। इसके बाद, उन्होंने अन्य सभी व्यक्तिगत या कथित गैर-मानक प्रतियों को नष्ट कर दिया, जिससे एकता बनी रहे और पाठ में कोई हेरफेर न हो। 

क्या कभी किसी प्रगतिशील लेखक ने यह कहने का साहस जुटाया कि एके रामानुजन, थ्री हंडरेड रामायणा (1987) इसलिए लिख पाए क्योंकि इस देश में संवाद और विमर्श की परंपरा रही है। यहाँ वाल्मिकी रामायण के बाद श्रीराम के नाम पर काल्पनिक और षडयंत्र के हद तक लिखी गई झूठी कथाओं को भी जलाया नहीं गया। वह सब भी संरक्षित रहा। भारतीय परंपरा के इस शुक्ल पक्ष का उल्लेख जलेस और प्रलेस की किसी बैठक की मिनट्स में मिलता है क्या? नहीं मिलेगा? 

जलाई गई तो उन लोगों के हाथों ‘मनु स्मृति’ जो चौक चौराहों पर ऊँची आवाज में गा रहे थे, बोल की लब आजाद हैं तेरे। बोल जबाँ अब तक तेरी है। तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा। बोल कि जाँ अब तक तेरी है।

प्रगतिशील लेखक समझते हैं कि उनकी ये टिप्पणियां देश की बहुसंख्यक आबादी को असहज करती हैं, फिर भी ऐसी रचनाओं को चुन चुन कर पुरस्कार दिया जाता है। ममता कालिया के नाम का चयन करने वाली जूरी में अरुण कमल, अनामिका और डॉ. अरविंदाक्षन जैसे सदस्य थे। 

अकादमियों में अशोक वाजपेयी के ‘गुरुकुल’ से जुड़े नाम बार-बार दिखते हैं। ये दर्शाते हैं कि निर्णायक मंडल में पुरानी कांग्रेस-वाम मानसिकता का वर्चस्व बरकरार है। आज भी भारत सरकार के तमाम सांस्कृतिक केन्द्रो पर अशोक वाजपेयी एक महत्वपूर्ण नियामक बने हुए हैं। उनकी टीम के लोग सिस्टम में अपना काम करा लेने का हुनर जानते हैं।

राष्ट्रीय विचार को मजबूत बनाने के रास्ते

राष्ट्रीय विचार परिवार को अब विलाप नहीं, ठोस रणनीति चाहिए:

  1. व्यापक विमर्श – अकादमी संविधान की खामियां (आउटगोइंग काउंसिल का स्व-चयन) सार्वजनिक बहस का विषय बनें। लेख, गोष्ठियाँ, सोशल मीडिया से दबाव बने।
  2. अपने लोगों की उपस्थिति – निष्ठावान विद्वानों को राज्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संगठनों में स्थापित करना। वे नामांकन प्रभावित करेंगे।
  3. नई पीढ़ी का निर्माण – युवा लेखकों को प्रोत्साहन, प्रकाशन और मंच। आत्ममुग्धता छोड़नी होगी।
  4. वैकल्पिक संस्थाएँ – राष्ट्रीय विचार आधारित नई पुरस्कार योजनाएँ, साहित्यिक मंच शुरू करें। पुरानी व्यवस्था पर निर्भरता कम करें।
  5. तत्व-निष्ठा – ‘सर्टिफिकेशन’ की लालसा छोड़कर विचार से समझौता न करने वाले नेतृत्व को आगे लाएं।

नैतिक दबाव का हथियार

जहाँ वामपंथियों का ही वर्चस्व है और अकादमी में गैर-वामपंथी विचार के 8-10 सदस्य ही हैं और वे रहकर कुछ नहीं कर पा रहे। यदि वे अकादमी की इस गंदी राजनीति का हिस्सा बनने से इंकार कर दें, तो फर्क पड़ेगा।

वामपंथियों ने दशकों में नैरेटिव बनाया है कि श्रेष्ठ लेखक वही, जो बीजेपी और आरएसएस से घृणा करे। उनके समूह में अल्पसंख्यक बनकर गलत होते देखते रहें, या सामूहिक त्यागपत्र देकर मनमानी उजागर करें। यदि आप पुरस्कार देने वालों से खुद को अलग नहीं करेंगे, तो शामिल माने जाएंगे। ऐसे में 100 में 8 लोगों का त्यागपत्र भी दबाव का औजार बन सकता है। ‘मूंदहों आँखी कतहूँ कुछ नाहीं’ वाली मानसिकता छोड़नी होगी।

भारत में 2015 का पुरस्कार वापसी अभियान ने दबाव बनाया था, भले एक भी सम्मान न लौटा हो। 

अमेरिका के नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर के पूर्व निदेशक जोसेफ कैंट ने ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति पर इस्तीफा देकर वैश्विक बहस खड़ी की। उन्होंने लिखा- “मैं आर्मी वेटरन हूं, मेरी पत्नी इजरायल की जंग में शहीद हुई, लेकिन यह युद्ध अमेरिका के हित में नहीं।” जोसेफ कैंट भी सोच सकते थे कि एक इस्तीफे से क्या होगा?

विलाप से संघर्ष की ओर

ममता कालिया का पुरस्कार उदाहरण भर है। पूरे 24 भाषाओं में देखें तो स्थिति स्पष्ट है। साहित्य अकादमी में राष्ट्रीय विचार को शिखर पर पहुँचाने के लिए अब ‘काम खत्म’ वाला फरमान नहीं, निरंतर संघर्ष चाहिए। सरकार एक झटके में प्रक्रिया नहीं बदल सकती, लेकिन विमर्श और दबाव से नई निर्वाचन प्रक्रिया ला सकती है।

राष्ट्रीय विचार के साधकों को एकजुट होकर हर जगह उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। त्यागपत्र, विमर्श, नई संस्थाएँ-ये हथियार हैं। यदि हम ‘बाकी सब ठीक, बस चल रहा है’ वाली लाइन रटते रहे, तो विमर्श की लड़ाई में हार तय है।

समय है कि हम विलाप, प्रलाप और अपलाप से ऊपर उठें। साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएँ राष्ट्र की आत्मा हैं। इन्हें वामपंथी कब्जे से मुक्त कर राष्ट्रीय विचार का सच्चा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना हमारा दायित्व है। ‘सबते भले हैं मूढ जिन्हि न व्यापत जगत गति’– यह मानसिकता अब छोड़नी होगी।

सिर्फ सड़क नहीं, ₹36000 करोड़ की वो आर्थिक रीढ़ जो UP के विकास को देगी नई दिशा: पढ़ें- ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ की सारी जानकारी, जिसका PM मोदी 29 अप्रैल को करेंगे उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (29 अप्रैल 2026) को उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले से राज्य के सबसे बड़े एक्सप्रेस-वे ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ का उद्घाटन करेंगे। ‘गंगा एक्सप्रेस-वे’ सिर्फ दूरी कम करने का काम नहीं करेगा बल्कि पूरे राज्य की आर्थिक और तकनीकी तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।

मेरठ से प्रयागराज तक फैला यह विशाल कॉरिडोर एक साथ सड़क, डिजिटल नेटवर्क, ऊर्जा सप्लाई, सुरक्षा सिस्टम और औद्योगिक विकास का आधार बनने जा रहा है। यही वजह है कि इसे एक ‘नेक्स्ट जेनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ कहा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के विकास की रफ्तार को भी तय करेगा।

परियोजना का आकार, लागत और डिजाइन

गंगा एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 594 किलोमीटर है। इसे छह लेन के एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे के रूप में तैयार किया गया है जिसे भविष्य में आठ लेन तक बढ़ाया जा सकता है। इस पूरी परियोजना पर करीब 36,230 करोड़ रुपए की लागत आई है। इसकी डिजाइन स्पीड 120 किमी प्रति घंटा रखी गई है और अधिकांश संरचनाओं को पहले से ही आठ लेन के हिसाब से बनाया गया है ताकि भविष्य में विस्तार आसान हो।

किन जिलों को जोड़ता है यह एक्सप्रेसवे

यह एक्सप्रेस-वे मेरठ के बिजौली गाँव से शुरू होकर प्रयागराज बाईपास तक जाता है। इसके रास्ते में मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूँ, शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज कुल मिलाकर 12 जिले आते हैं। यह कॉरिडोर पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश को एक ही हाई-स्पीड मार्ग से जोड़ता है जिससे क्षेत्रीय संतुलन और कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

यात्रा समय और कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव

इस एक्सप्रेसवे के शुरू होने के बाद मेरठ से प्रयागराज तक का सफर जो पहले 10 से 12 घंटे का होता था वो अब घटकर लगभग 6 से 7 घंटे रह जाएगा। इससे न केवल आम यात्रियों को राहत मिलेगी बल्कि माल ढुलाई और औद्योगिक परिवहन भी तेज होगा। यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे और अन्य प्रमुख सड़कों से कई इंटरचेंज के जरिए जुड़ा है जिससे अलग-अलग शहरों तक सीधी पहुँच आसान होगी।

निर्माण मॉडल और इंजीनियरिंग की खासियत

गंगा एक्सप्रेसवे को 12 पैकेज में बाँटकर बनाया गया है जिनमें से बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र, खासकर अदाणी ग्रुप द्वारा तैयार किया गया है। करीब 464 किलोमीटर हिस्से का निर्माण DBFOT (Design, Build, Finance, Operate and Transfer) मॉडल पर किया गया है, जिसमें निर्माण, फाइनेंस और संचालन की जिम्मेदारी निजी कंपनी के पास रहती है। निर्माण के दौरान बड़े पुल, अंडरपास, फ्लाईओवर, रेल ओवरब्रिज और कई इंटरचेंज बनाए गए हैं। गंगा और रामगंगा जैसी नदियों को पार करने के लिए लंबे पुल भी तैयार किए गए हैं।

पर्यावरण और संसाधनों का संतुलन

इस परियोजना के निर्माण में लाखों टन कचरे का उपयोग किया गया है। इससे निर्माण में रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिला है। इसके साथ ही करीब 18 लाख पेड़ लगाए गए हैं जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। यह दिखाता है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर बनाए जा सकते हैं।

डिजिटल हाईवे और यूटिलिटी कॉरिडोर

गंगा एक्सप्रेसवे के साथ 2 मीटर चौड़ा यूटिलिटी कॉरिडोर बनाया गया है, जो इसे डिजिटल हाईवे बनाता है। इसके भीतर ऑप्टिकल फाइबर, बिजली की लाइनें और गैस पाइपलाइन बिछाई जा सकती हैं। इस व्यवस्था के कारण सड़क को खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही नेटवर्क 519 गाँवों तक ब्रॉडबैंड और 5G कनेक्टिविटी पहुँचाने में मदद करेगा और भविष्य में डेटा सेंटर जैसी सुविधाओं के लिए आधार बनेगा।

ऊर्जा कॉरिडोर और गैस सप्लाई

इस एक्सप्रेसवे के साथ ऊर्जा गंगा परियोजना के तहत गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना भी है। इससे रास्ते में आने वाले गाँवों और उद्योगों को PNG और CNG जैसी सस्ती ईंधन सुविधाएँ मिल सकेंगी। इससे न केवल ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक विकास को भी गति मिलेगी।

स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम और सुरक्षा तकनीक

एक्सप्रेसवे पर स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम लगाया गया है जो AI और सेंसर तकनीक पर काम करता है। हर 2-3 किलोमीटर पर लगे कैमरे और सेंसर कंट्रोल रूम से जुड़े हैं। अगर कोई वाहन रुकता है, गलत दिशा में चलता है या कोई हादसा होता है, तो तुरंत अलर्ट भेजा जाता है। इससे एंबुलेंस और पेट्रोलिंग टीम तेजी से मौके पर पहुँच सकती है और हादसों में जान बचाने की संभावना बढ़ती है।

इसके अलावा गंगा एक्सप्रेसवे में रिकॉर्ड 24 घंटे के भीतर 10.3 किलोमीटर लंबा कंक्रीट क्रैश बैरियर बिछाया गया है। इसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। ये हादसे के वक्त वाहनों की टक्कर को रोकने में सक्षम होते हैं।

3.5 किलोमीटर लंबी एयरस्ट्रिप

शाहजहाँपुर जिले में गंगा एक्सप्रेसवे पर 3.5 किलोमीटर लंबी आपातकालीन लैंडिंग सुविधा (एयरस्ट्रिप) का निर्माण किया गया है। इसे खास तौर पर इस तरह डिजाइन किया गया है कि जरूरत पड़ने पर यहाँ वायुसेना के विमान लैंडिंग और टेक-ऑफ कर सकें। इस एयरस्ट्रिप की उपयोगिता को परखने के लिए भारतीय वायुसेना द्वारा यहां ट्रायल लैंडिंग भी की जा चुकी है।

परियोजना से जुड़े विवरण के अनुसार, इस एयरस्ट्रिप का निर्माण एक्सप्रेसवे के उसी ढाँचे के भीतर किया गया है, लेकिन इसकी सतह को सामान्य सड़क की तुलना में ज्यादा मजबूत बनाया गया है। इसके साथ ही इस एयरस्ट्रिप पर करीब 250 कैमरे लगाए गए हैं, जिससे इसकी निगरानी लगातार की जा सके और इसे एक्सप्रेसवे के समग्र सुरक्षा सिस्टम से जोड़ा जा सके।

टोल सिस्टम और आर्थिक असर

गंगा एक्सप्रेसवे की एक बड़ी खासियत इसकी टोलिंग और ट्रैफिक फ्लो सिस्टम में छिपी है। इसमें ‘क्लोज्ड टोलिंग सिस्टम’ लागू किया गया है यानी वाहन चालक को सिर्फ एंट्री और एग्जिट पर ही रुकना होगा और दूरी के हिसाब से भुगतान करना होगा।

इससे बार-बार ब्रेक लगाने और गति बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे ईंधन की बचत होगी और सफर ज्यादा स्मूथ बनेगा। इस पूरे कॉरिडोर में 2 मुख्य टोल प्लाजा मेरठ और प्रयागराज में बनाए गए हैं जबकि 19 रैम्प टोल प्लाजा अलग-अलग एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स पर होंगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कार के लिए संभावित टोल दर लगभग 2.55 रुपए प्रति किलोमीटर हो सकती है जिससे पूरे एक्सप्रेसवे का सफर करीब 1500 रुपए में पूरा हो सकता है। हालाँकि, अंतिम दर सरकार तय करेगी। इसके अलावा 18 एक्सेस नोड्स बनाए गए हैं, जहाँ यह एक्सप्रेसवे नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे और प्रमुख जिला सड़कों से जुड़ता है जिससे कनेक्टिविटी का जाल और मजबूत होता है।

इसके अलावा रास्ते में कई लॉजिस्टिक और औद्योगिक कॉरिडोर विकसित किए जाएँगे जिससे रोजगार, निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। किसानों को भी सीधे बाजार तक पहुँच मिलने से बेहतर कीमत मिल सकेगी।

धर्म पूछकर चाकू मारना था ISIS से जुड़ने का पहला टेस्ट, ATS ने खोली जुबैर के कट्टरपंथी मंसूबों की पोल: जानें- क्या है ‘लोन वुल्फ’ अटैक, जिसे जिहादी ने मुंबई में दिया अंजाम

मुंबई के मीरा रोड इलाके में धर्म पूछकर जैब जुबैर अंसारी ने दो सिक्योरिटी गार्डों सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा पर चाकू से हमला कर दिया। जुबैर ने दोनों गार्डों को ‘कलमा’ सुनाने को भी कहा और ऐसा न करने पर उसने जान से मारने की कोशिश की। आरोपित जुबैर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। जाँच एजेंसियाँ इसे ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के तौर पर देख रही हैं।

पूरा मामला 27 अप्रैल 2026 को मीरा रोड के नया नगर इलाके स्थित निर्माणाधीन इमारत ‘अस्मिता ग्रांड मैन्सन’ का है, जहाँ सुरक्षा में दो सिक्योरिटी गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा तैनात थे। पुलिस के मुताबिक, तड़के सुबह 3 बजे आरोपित जुबैर अंसारी ने पहले गार्ड सुब्रतो सेन से मस्जिद का रास्ता पूछा। एक घंटे बाद वापस आया और धर्म पूछने लगा। पुलिस का कहना है कि आरोपित जुबैर ने दूसरे गार्ड राजकुमार मिश्रा से कलमा भी पड़वाया और जब वह कलमा नहीं पढ़ पाए तो चाकू से हमला कर दिया।

हमले में दोनो गार्ड सुब्रतो सेन और राजकुमार मिश्रा गंभीर रूप से घायल हुए है, जिनका इलाज जारी है। डॉक्टर्स के अनुसार, सुब्रतो सेन खतरे से बाहर हैं जबकि राजकुमार मिश्रा की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं पुलिस ने 31 साल के आरोपित जैब जुबैर अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है।

पीड़ित गार्ड का बयान

इलाज के बाद खतरे से बाहर गार्ड सुब्रतो सेन ने पुलिस को बयान दिया है। सेन ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि घटना लगभग सुबह 3 बजे की है, जब वह ड्यूटी पर थे। जुबैर अंसारी उनके पास आया और पूछा कि यहाँ कोई मस्जिद है क्या? इस पर सेन ने जवाब दिया कि दाएँ हाथ पर एक मस्जिद है, लेकिन उन्हें नाम नहीं मालूम। जुबैर ने गार्ड सेन से आगे पूछा, “क्या तुम हिंदू हो?” सेन ने हामी भरी। इसके बाद जुबैर वहाँ से चला गया। लेकिन सेन ने बताया कि वह आसपास सड़क पर घूमता रहा।

सेन ने आगे बताया, ” मैं लगभग 4 बजे मैं राजज सिनेमा के पास एक ईरानी चाय की दुकान पर चाय पीने गया। तब वहाँ मुझे वही आदमी (जुबैर अंसारी) दिखा। चाय पीने के बाद मैं 4.30 बजे अपनी ड्यूटी वाली जगह पर वापस आ गया। वही आदमी मेरे पास आया और कहने लगा- तुम हिंदू हो, है न? उसने फिर मेरे दाएँ हाथ को पकड़ा और चाकू से हमला कर दिया। मैंने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसने चाकू मेरी पींठ पर घोंप दिया।”

(फोटो साभार: IANS)

सेन ने आगे बताया, “मैं जैसे-तैसे उसके हमले से बचकर सुपरवाइजर के केबिन में पहुँचा और सारा मामला बताने लगा। तभी जुबैर अंसारी वहाँ पहुँच गया औऱ सुपरवाइजर से भी वही पूछा- तुम भी हिंदू हो, है न? अगर नहीं हो तो कलमा पढ़कर सुनाओ। जब मिश्रा कलमा नहीं पढ़ सके, तो जुबैर ने उनको चाकू से गोद डाला। डर के मारे मैं वहाँ से भाग गया और इमारत के पीछे जाकर छिप गया। 5-7 मिनट बाद जब मुझे कोई हलचल सुनाई नहीं दी, तब मैंने मिश्रा सर को फोन किया। उस समय मिश्रा सर रो रहे थे और उन्होंने मुझसे कहा- मैं मर जाऊँगा। मैं केबिन में पहुँचा तो दो और गार्ड मौके पर मौजूद थे। वे मिश्रा सर और मुझे अस्पताल ले गए।”

90 मिनट के जुबैर गिरफ्तार, फोन में मिला कट्टरपंथी कंटेन्ट

सूचना मिलते ही महाराष्ट्र पुलिस की एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने CCTV की मदद से आरोपित जुबैर अंसारी की पहचान की और 90 मिनट के भीतर उसके मीरा रोड ईस्ट के नया नगर इलाके स्थित घर से उसे गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद गार्ड सुब्रतो सेन की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई।

पुलिस ने बताया कि आरोपित जुबैर अंसारी मूलरूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला था। वह साइंस से ग्रेजुएट है और 2010 से 2019 तक अमेरिका में भी रह चुका है। नौकरी नहीं मिली तो वह वापस भारत लौट आया और मीरा रोड में अकेले रहने लगा। यह भी बताया गया कि वह केमिस्ट्री की ऑनलाइन कोचिंग पढ़ाता था।

महाराष्ट्र ATS ने जुबैर के घर की छापेमारी

मामला गंभीर होने के चलते अब इसकी जाँच महाराष्ट्र ATS को सौंपी गई है। जाँच एजेंसियाँ इस हमले को संभावित ‘लोन वोल्फ’ आतंकी हमले के रूप में देख रही हैं। ATS ने आरोपित जुबैर अंसारी के किराए घर पर छापेमारी की। छापेमारी में जुबैर के घर से हाथ से लिखे गए कुछ नोट्स बरामद हुए। जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोट्स में ISIS में भर्ती होने की इच्छा जताई गई थी और गार्ड पर हमले को इस ओर अपना पहला कदम बताया गया था।

जाँच एजेंसियों मान रही हैं कि कि वह एकांतवास में रहता था इसीलिए इंटरनेट कट्टरपंथी विचारधारा का कंटेन्ट देखता था, जिससे प्रभावित होकर उसने यह हमला किया। फिलहाल उसके मोबाइल फोन और लैपटॉप की फोरिंसिक जाँच की जा रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि वह किसी विदेशी आतंकी नेटवर्क या हैंडलर के संपर्क में था या नहीं।

क्या है ‘लोन वुल्फ’ हमला?

मुंबई में हिंदू गार्ड पर धर्म पूछकर और कलमा न सुनाने पर चाकू से किए गए इस हमले को जाँच एजेंसियाँ ‘लोन वुल्फ‘ आंतकी हमले के रूप में देख रही हैं। यानी वो आतंकी हमला, जिसमें कोई अकेला व्यक्ति किसी बड़े आतंकी संगठन के सीधे आदेश या मदद के बिना अकेले ही हमला करता है। ऐसा हमलावर अक्सर इंटरनेट, सोशल मीडिया या कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होकर खुद ही योजना बनाता है और उसे अंजाम देता है।

चूँकि इसमें कोई बड़ा नेटवर्क या कोई बड़ा संगठन शामिल नहीं होता, इसलिए सुरक्षा एजेंसियों के लिए ऐसे हमलों का पहले से पता लगाना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि ‘लोन वुल्फ’ आज दुनिया भर में सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। मुंबई में गार्ड पर हमला भी इसी तरह प्लान किया गया था, यहाँ आरोपित इंटरनेट से कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित था और वह हिंदुओं से नफरत करने लगा इसीलिए उसने पीड़ितों से धर्म पूछकर उनपर हमला किया।

अपर्णा यादव के बहाने सपा में संग्राम: जानिए- क्यों ‘परिवार’ बनाम ‘कंट्रोल’ की लड़ाई में फिर भिड़े अखिलेश-शिवपाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपर्णा यादव को लेकर उठा ताजा विवाद महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के भीतर वर्षों से सुलग रहे सत्ता संघर्ष की एक और खुली परत है। मामला तब भड़का जब भाजपा के विरोध प्रदर्शन के दौरान अपर्णा यादव भी सड़कों पर उतरीं और सपा-कॉन्ग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाते हुए उनके झंडे जलाए गए।

यही वह बिंदु था जिसने सपा कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के भीतर आक्रोश पैदा किया और अपर्णा के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया शुरू हुई। लेकिन यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है – क्योंकि इस विरोध के बीच शिवपाल यादव ने इसे ‘परिवार’ का मामला बताते हुए सार्वजनिक प्रतिक्रिया से बचने की सलाह दी जबकि अखिलेश यादव ने इस लाइन को खारिज कर दिया।

यहीं से साफ हो गया कि यह टकराव अपर्णा के विरोध से ज्यादा उस नियंत्रण की लड़ाई है, जो सपा की राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुकी है।

अपर्णा के बहाने फिर उठा पुराना सवाल

अपर्णा यादव का विरोध किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं बल्कि उनके राजनीतिक रुख से उपजा। भाजपा के प्रदर्शन में शामिल होकर सपा और कॉन्ग्रेस के खिलाफ नारेबाजी करना और झंडे जलाने जैसी घटनाओं ने सपा के भीतर स्वाभाविक आक्रोश पैदा किया।

यह सिर्फ एक राजनीतिक असहमति नहीं थी बल्कि इसे सपा के खिलाफ ‘खुले मोर्चे’ के रूप में देखा गया। ऐसे में पार्टी के भीतर प्रतिक्रिया आना तय था। लेकिन यहीं पर शिवपाल यादव का ‘परिवार’ वाला तर्क और अखिलेश यादव का ‘पार्टी लाइन’ वाला रुख आमने-सामने आ गया।

यह वही बिंदु है जहाँ सपा के भीतर वर्षों पुराना सवाल फिर खड़ा हो गया है- क्या पार्टी में फैसले रिश्तों के आधार पर होंगे या एक केंद्रीकृत नेतृत्व के हिसाब से?

2012 में सत्ता के साथ बदला संतुलन

अखिलेश और शिवपाल में टकराव काफी पहले से रहा है। 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तब यह सिर्फ एक राजनीतिक बदलाव नहीं था बल्कि सपा के भीतर शक्ति संतुलन के बदलने की शुरुआत भी थी।

एक ओर युवा चेहरा था, जिसे आगे बढ़ाया गया, वहीं दूसरी ओर संगठन और जमीन पर पकड़ रखने वाले शिवपाल यादव थे। शुरुआत में यह द्वंद्व दबा रहा लेकिन जैसे-जैसे फैसलों पर नियंत्रण का सवाल उठा, यह टकराव खुलने लगा। टिकट वितरण, प्रशासनिक हस्तक्षेप और संगठनात्मक निर्णयों में बढ़ती खींचतान ने दोनों खेमों को अलग-अलग ध्रुवों में बदल दिया।

2016 का विस्फोट: जब चाचा-भतीजे आमने-सामने आ गए

2016 में कौमी एकता दल के विलय को लेकर विवाद ने इस संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया। अखिलेश यादव ने इस विलय को सिरे से खारिज किया जबकि शिवपाल यादव इसके समर्थन में थे। इसके बाद घटनाएँ तेजी से बढ़ीं- मंत्रालय छीने गए, पद बदले गए और अंततः बर्खास्तगी तक की नौबत आ गई।

यह टकराव इतना गहरा था कि पार्टी दो हिस्सों में बँटती नजर आई और मामला चुनाव आयोग तक पहुँच गया। 2017 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, जिससे साफ हो गया कि अब सपा में अंतिम निर्णय का केंद्र बदल चुका है।

परिवार में दखल का नैरेटिव: प्रतीक-अपर्णा प्रकरण की चर्चा

सपा की राजनीति में यह नैरेटिव भी लंबे समय से चलता रहा है कि प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के निजी संबंधों में आई खटास तक में राजनीतिक प्रभाव की भूमिका रही। यह आरोप और चर्चाएँ भले ही आधिकारिक रूप से स्थापित न हों लेकिन यह धारणा जरूर बनी कि सत्ता के समीकरणों का असर परिवार के निजी दायरे तक पहुँच गया था।

यहाँ यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब शिवपाल यादव ‘परिवार’ की मर्यादा की बात करते हैं, तो वह सिर्फ एक रिश्ते की रक्षा नहीं बल्कि उस पूरे ढाँचे की बात कर रहे होते हैं जिसे धीरे-धीरे राजनीतिक नियंत्रण के आगे कमजोर किया गया।

शिवपाल का असंतोष और मुलायम का कड़ा आकलन

शिवपाल यादव का असंतोष कई बार सार्वजनिक रूप से सामने आ चुका है और समय-समय पर उनके बयानों में यह झलकता भी रहा है कि उन्हें पार्टी के भीतर अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिल रही।लेकिन करहल में दिया गया वह चर्चित बयान, जिसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाना एक गलती थी, पूरे विवाद को एक अलग ही गंभीरता देता है।

यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं बल्कि उस पीढ़ीगत और नेतृत्वगत टकराव का संकेत माना गया, जो वर्षों से सपा के भीतर पनपता रहा है। आज जब शिवपाल खुद को ‘मामूली सिपाही’ बताते हैं, तो यह उसी लंबे असंतोष और हाशिए पर चले जाने की भावना का विस्तार प्रतीत होता है।

‘औरंगजेब’ से तुलना और सत्ता का चरित्र

उल्लेखनीय है कि अमर सिंह ने एक समय दावा किया था कि मुलायम सिंह यादव ने खुद उनसे कहा था कि अखिलेश यादव का व्यवहार औरंगजेब जैसा है। यह आरोप भले ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहा ह, लेकिन इसने उस धारणा को मजबूत किया कि सपा में सत्ता संघर्ष ने रिश्तों की सीमाओं को कई बार पीछे छोड़ दिया। सार्वजनिक मंचों पर टकराव, माइक को लेकर धक्का-मुक्की जैसी घटनाएँ भी इसी तनाव की झलक देती रही हैं।

मजबूरी की सुलह, मगर दरार कायम: 2022 के बाद अब तक की स्थिति

मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव ने एक बार फिर परिवार को साथ खड़ा किया लेकिन यह एक भावनात्मक और राजनीतिक मजबूरी ज्यादा लगी। शिवपाल यादव ने समर्थन दिया और सपा में वापसी भी हुई लेकिन घटनाओं की हालिया कड़ी यह दिखाती है कि अंदरूनी दरार खत्म नहीं हुई। अपर्णा यादव के मुद्दे पर सामने आया ताजा टकराव इसी बात की पुष्टि करता है।

चुनावी असर: क्या फिर दोहराएगा इतिहास?

चुनाव नजदीक हैं और ऐसे समय में इस तरह का टकराव सपा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती है, कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा होता है और विपक्ष को हमला करने का मौका मिलता है।

सबसे अहम यह कि जनता के बीच यह संदेश जाता है कि पार्टी अपने ही भीतर संतुलन नहीं बना पा रही।ऐसे में, पूरे घटनाक्रम को अगर एक रेखा में समझा जाए तो स्पष्ट होता है कि अपर्णा यादव इस कहानी का कारण नहीं, बल्कि एक ट्रिगर हैं।

असली कहानी वही पुरानी है- सत्ता, नियंत्रण और वर्चस्व की। एक तरफ शिवपाल यादव हैं, जो परिवार और परंपरा की बात करते हैं, दूसरी तरफ अखिलेश यादव हैं, जो केंद्रीकृत नियंत्रण के साथ पार्टी को चलाना चाहते हैं।

जब तक यह टकराव बना रहेगा, तब तक हर नया विवाद, चाहे वह अपर्णा का हो या किसी और का, सपा के भीतर इस संघर्ष को फिर से सतह पर लाता रहेगा। यही इस पूरी कहानी का सार है, और यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है।