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मेरठ में दलित छात्रा की हत्या के नाम पर क्यों खराब किया गया माहौल? SSP अविनाश पांडे के नेतृत्व में कैसे UP पुलिस ने अपराधियों का किया पर्दाफाश: समझें- ललिता हत्याकांड की आड़ में हो रही कैसी राजनीति

उत्तर प्रदेश में मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडेय का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में अविनाश पांडेय सड़क पर इकट्ठा हुए दलितों को डाँटकर हटा रहे हैं और फिर पुलिस वैन में बंद एक दलित शख्स पर थप्पड़ बरसा रहे हैं। बताया गया कि ये लोग प्रदर्शनकारी थे, जो मई 2026 में ललिता गौतम की हत्या के विरोध में सड़क पर जमा हुए थे।

इस वीडियो को हथियार की तरह इस्तेमाल कर समाजवादी पार्टी (सपा), कॉन्ग्रेस जैसे विरोधी दलों से लेकर ‘एक्स’ पर समाज का उद्धार करने का ढोंग करने वाले वामपंथियों और लिबरलों ने भी उत्तर प्रदेश की पुलिस और सरकार को जमकर घेरा। हवा उड़ाई गई कि उत्तर प्रदेश में दलितों की आवाज दबाई जा रही है, ऐसे में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ जैसे दलित नेता भी खुलकर विरोध में उतर गए।

लेकिन इस वीडियो के पीछे की कहानी क्या है? या SSP ने ऐसा बर्ताव क्यों किया? यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की है। उल्टा लोगों ने इसे सिर्फ ‘ब्राह्मण SSP का दलितों पर अत्याचार’ की तरह पेश किया। पर हम आपको हकीकत बताएँगे। बताएँगे कि SSP के इस रिएक्शन की वजह क्या रही और यह भी कि आखिर इन लोगों की माँगे क्या थीं और कैसे यह ‘प्रदर्शन’ एक सोची-समझी साजिश थी।

अखिलेश यादव से लेकर चंद्रशेखर आजाद ने की राजनीति, एक्स का समाज-सुधारक गैंग हुआ एक्टिव

इससे पहले वीडियो पर विपक्ष की राजनीति और वामपंथियों की ‘चिंता’ पर नजर डाल लेते हैं।

सबसे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मेरठ SSP की कार्रवाई को निंदनीय बता दिया। इसी के साथ उन्होंने इस घटना के संदर्भ में सीधे सीएम योगी ने निशाना बनाते हुए कहा, “जब प्रदेश-प्रमुख ही सरेआम एक मृतक की माँ के साथ असंवेदनशील होने का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो उनकी पुलिस से कोई उम्मीद करना बेमानी है। घोर निंदनीय।”

कॉन्ग्रेस ने भी इस वीडियो को शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस ने बीजेपी की डबल इंजन सरकार में सुरक्षा पर सवाल उठाते हुए कहा, “मेरठ की दलित छात्रा ललिता गौतम की निर्मम हत्या ने फिर से भाजपा की डबल इंजन सरकार के महिला और दलित सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है, लेकिन सरकार इंसाफ देने के बजाय आवाज उठाने वालों पर ही लाठी-थप्पड़ बरसा रही है।”

और जहाँ दलित के नाम पर सरकार को घेरने की बात हो तो आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद का नाम तो सामने आना अनिवार्य है ही। चाहे चंद्रशेखर ने दलित युवती की हत्या के बाद परिजनों को संवेदनाएँ न दी हों, लेकिन जब दलित युवती के नाम पर सरकार और प्रशासन के खिलाफ बोलने की आई तो चंद्रशेखर आजाद आगे आ गए।

अब चंद्रशेखर को अपने ‘भाइयों’ की याद आ गई है और वीडियो रिलीज कर बीजेपी सरकार को धमकी दे रहे हैं- “मेरे लोग इसका जवाब वोट से देंगे और इतने धीरे से देंगे की ऐसी चोट लगेगी आपको कि चोट के निशान भी बहुत दूर से लगेंगे।” यही नहीं अब मामला तूल पकड़ने के बाद चंद्रशेखर आजाद मेरठ में ललिता गौतम के परिवार से मिलने भी रवाना हो चुके हैं।

लेकिन रास्ते में जब पुलिस अधिकारियों ने उनकी गाड़ी को रोका, तब जो धमकी चंद्रशेखर ने पुलिस को दी उसे लेकर कोई आपत्ति नहीं उठा रहा है। बल्कि चंद्रशेखर के फेसबुक पर पिछले घंटों में शेयर किए गए एक वीडियो में थ्री स्टार पुलिस अधिकारी हाथ जोड़ते दिख रहा है और चंद्रशेखर सीधा उनका नाम लेकर उन्हें उंगली दिखाकर धमका रहे हैं। इस वीडियो को चंद्रशेखर के समर्थक छाती चौड़ी कर शेयर कर रहे हैं और पुलिस को ‘कमजोर’ के रूप में पेश कर रहे हैं।

उधर, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने कहा कि पीड़ित और न्याय माँगने वाले दोनों ही दलित समाज से हैं इसीलिए प्रशासन ने अन्याय किया। भारती ने कहा, “जब तक दलित, पिछड़े और आदिवासियों को उनकी आबादी के हिसाब से भागीदारी नहीं होगी, उनका प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक ऐसे SSP आते रहेंगे और वंचित दोहरे अन्याय का शिकार होते रहेंगे!”

मेरठ SSP की कार्रवाई पर सिर्फ राजनीति ही नहीं हुई, बल्कि ‘एक्स’ का समाज-सुधारक गैंग भी एक्टिव हो गया। एक ओर यह गैंग खुलेआम जातिवाद फैलाने लगा कि ब्राह्मण को दलित पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था, वहीं कुछ लोगों ने ललिता गौतम केस को बिना जाने पुलिस के दमनकारी रवैये और लोकतंत्र में आवाज उठाने पर रोक को लेकर रोना रोया।

इसमें कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी टिप्पणी की और वीडियो का विश्लेषण करते हुए मेरठ SSP अविनाश पांडेय को ‘पागल’ बता डाला और उन्हें सस्पेंड करने की माँग की। सौरव ने कहा, “जैसा कि इस वीडियो से साफ है, IPS अफसर अविनाश पांडेय मानसिक रूप से बीमार हैं। उन्हें मदद की जरूरत है। इलाज चलने तक उन्हें सस्पेंड कर देना चाहिए। वरना, वे समाज और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बने रहेंगे।”

वहीं एक्स पर ‘समाजवादी’ लक्ष्मण यादव लिखते हैं, “वर्दी जनता की सुरक्षा और न्याय के लिए मिली है, उसकी आवाज़ कुचलने के लिए नहीं। योगी सरकार बताए – न्याय माँगने वालों पर डंडा क्यों?”

आखिर इतना हौआ बन क्यों रहा है? क्या SSP को सुरक्षा व्यवस्था संभालने की इजाजत नहीं है या उनके गुस्से भरे अंदाज से लोगों को परेशानी है? और जातिवाद की राजनीति करने वाले भी पीछे नहीं हटे। इसे जानने के लिए सबसे जरूरी है पूरा मामला जानना और उससे भी जरूरी है दूसरा पक्ष यानी पुलिस का पक्ष सुनना।

क्या है ललिता गौतम की हत्या का पूरा मामला?

सबसे पहले जानते हैं कि आखिर जिस मामले को लेकर इतना हौआ बन रहा है, वह आखिर है क्या? तो बता दें कि यह मामला दो महीने पुराना है। जब 15 मई 2026 को मेरठ के टीपी नगर थाना क्षेत्र के गंगा एन्क्लेव की रहने वाली बीए फाइनल ईयर की छात्रा ललिता गौतम कॉलेज में परीक्षा देने के लिए घर से निकली थी, लेकिन देर शाम तक वापस नहीं लौटी।

परिजनों ने अपने स्तर पर खोजबीन करने के बाद अगले दिन 16 मई 2026 को टीपी नगर थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने तलाश की तो मेरठ के ही रोहटा थाना क्षेत्र के उपसिया गाँव के पास एक गन्ने के खेत में ललिता का शव अर्धनग्न और क्षत-विक्षत हालत में बरामद हुआ।

अब पुलिस ने हत्या के पीछे की वजह और आरोपितों की खोज के लिए इलाके के सीसीटीवी खंगाले, जिसें ललिता को आखिरी बार अंकुश नाम के युवक के साथ बाइक पर जाते देखा गया। पुलिस ने अंकुश को हिरासत में लेकर पूछताछ की, जिसके बाद पुलिस ने केस का खुलासा कर दिया।

पुलिस ने पुख्ता सबूतों और पूछताछ के आधार पर बताया कि अंकुश और ललिता के बीच पिछले 3 साल से प्रेम संबंध थे। पुलिस के मुताबिक, घटना वाले दिन भी दोनों साथ ही थे। हत्या के पीछे की वजह बताते हुए पुलिस ने कहा कि अंकुश ने ललिता के मोबाइल में दूसरे लड़के के साथ चैट और फोटो देखे थे, जिसके बाद दोनों के बीच खूब झगड़ा भी हुआ था। इसी लड़ाई पर अंकुश ने गुस्से में आकर ललिता की गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को खेत में फेंक दिया।

पुलिस ने अंकुश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके अलावा सबूत मिटाने में मदद करने के आरोप में निशांत और अंकित नाम के दो और युवकों को गिरफ्तार किया गया। यहाँ तक मामले में पुलिस की कार्रवाई से ललिता गौतम का परिवार संतुष्ट था।

परिवार को भड़काने और प्रदर्शन की साजिश

लेकिन पुलिस का कहना है कि कुछ ‘अराजक तत्वों’, जिनमें अमरोहा के दिग्विजय सिंह और रवि गौतम, ने मृतका के परिजनों को भड़काया। इसके बाद परिवार माँग करने लगा कि ललिता गौतम की हत्या की दूसरे पहलुओं से भी जाँच होनी चाहिए। मृतका के पिता ने तर्क दिया कि कोई भी अकेला व्यक्ति इतनी बड़ी वारदात को अंजाम नहीं दे सकता, इसमें कोई और लोग शामिल हैं जिन्हें पुलिस बचा रही है।

अब इन्हीं आरोपों को लेकर 08 जुलाई 2026 को मृतका के परिजनों और भारी संख्या में भीड़ कलेक्ट्रेट के बाहर सड़क पर जमा हो गई। पुलिस ने कहा कि मृतका के परिजनों को ज्ञापन सौंपने के बहाने भीड़ जुटाई गई थी और उस भीड़ ने सड़क को जाम कर दिया। पुलिस और प्रशासन के समझाने के बावजूद प्रदर्शनकारी हटने को राजी नहीं हुए और उल्टा अराजकता फैलानी शुरू कर दी। इस पर SSP अविनाश पांडेय पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँचे और भीड़ को खदेड़ दिया।

पुलिस के इसी लाठीचार्ज की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुईं और सुरक्षा व्यवस्था संभालने की इस कार्रवाई को ‘अत्याचार’ का नाम दिया गया। बाद में SSP अविनाश पांडेय ने इस पूरे प्रदर्शन की जाँच कर खुलासा किया कि इस हंगामे के पीछे न्याय की माँग नहीं थी, बल्कि माहौल बिगाड़ने की साजिश थी। पुलिस ने साजिशकर्ताओं के नामों का भी खुलासा कर दिया है।

पुलिस वैन में मेरठ SSP ने शख्स पर क्यों बरसाए थप्पड़ और वह कौन था?

अब प्रदर्शन में पुलिस के लाठीचार्ज की वीडियो तो पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और प्रोपेगेंडा गढ़ने वाले लोगों ने इससे अपना कंटेन्ट भी बना लिया। इन्हीं वायरल वीडियो में एक वीडियो मेरठ SSP अविनाश पांडेय की पुलिस वैन में घुसकर एक शख्स पर थप्पड़ बरसाने की भी थी। इस वीडियो की भी खूब आलोचना की गई। लेकिन उस वीडियो पर किसी ने बात नहीं की जिसमें वही शख्स पुलिस वैन में फाँसी का फंदा बनाकर पुलिस को आत्महत्या करने की धमकी दे रहा है।

वीडियो में दिख रहा शख्स रवि गौतम है। वह पुलिसवालों को धमकी दे रहा है, “मैं वकील हूँ। मैं मरूँगा।” इसी धमकी के बाद पुलिसवालों ने बल प्रयोग का इस्तेमाल किया था। SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि पुलिस वैन में रवि गौतम के फंदा लगाने के बाद स्थिति को संभालने के लिए बल प्रयोग किया गया। तभी उन्होंने तीखे तेवर में प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि सड़क किसी के पिताजी की नहीं है और विरोध का तरीका बिल्कुल गलत है।

बात करें रवि गौतम की, तो यह नोएडा का रहने वाला है, जो अपनी राजनीति चमकाने मेरठ तक पहुँच गया। यह ‘युवा शक्ति दल’ नाम के संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष है। यह भी बताया जा रहा है कि रवि गौतम पहले आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद का साथी हुआ करता था, लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए। अब दोनों अलग-अलग पार्टी बनाकर दलितों के नाम पर राजनीति करते हैं। यही वजह है कि हंगामा होने के बाद मेरठ पहुँचे चंद्रशेखर आजाद ने मृतका के परिवार से मिलने की तो इच्छा जताई लेकिन रवि गौतम की गिरफ्तारी पर कुछ नहीं बोले।

वहीं SSP अविनाश पांडेय ने भी रवि गौतम की आपराधिक कुंडली सबके सामने लाकर रख दी है। उन्होंने बताया कि रवि गौतम के खिलाफ गाजियाबाद में तीन और गौतमबुद्ध नगर में कुल चार मुकदमे दर्ज हैं।

मेरठ पुलिस ने प्रदर्शन में हंगामे को बताया ‘सोची-समझी साजिश’

08 जुलाई 2026 को कलेक्ट्रेट पर हुए हंगामे में मेरठ पुलिस ने रवि गौतम समेत 7 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें गढ़मुक्तेश्वर का अंकित कुमार, नोएडा का अरविंद कुमार, मेरठ का ऋतिक कुमार, मुरादाबाद का नवनीत कुमार, मेरठ का हिमांशु सिद्धार्थ और परीक्षितगढ़ का लवि उर्फ शवि शामिल हैं।

इसी के साथ पुलिस ने 13 नामजद समेत 50 लोगों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया था। नामजद आरोपितों में रवि गौतम, सुशील गौतम, हिमांशु सिसोदिया, सागर लिसाड़ी, लवी प्रधान, बिजेंद्र गौतम, रितिक जाटव, मोहित जाटव, हेमंत प्रधान, संजय, विजेंद्र सूद, दिग्विजय भाटी और अजय कुमार शामिल हैं।

वहीं SSP अविनाश पांडेय ने हंगामे की पुलिस, LIU और अन्य एजेंसियों से विस्तृत जाँच भी करवाई। जाँच में मिले ऑडियो, वीडियो, सीसीटवी फुटेज और सोशल मीडिया क्लिप के आधार पर पुलिस के हाथ कई सुराग लगे। पुलिस ने बताया कि कुछ अराजक तत्व भीड़ को लगातार उकसाने और प्रदर्शन को उग्र बनाने की रणनीति पर काम कर रहे थे।

पुलिस ने साजिशकर्ताओं में रवि गौतम और दिग्विजय भाटी का नाम लिया। दिग्विजय भाटी अमरोहा का रहने वाला है, जिसके खिलाफ SC/ST एक्ट समेत 9 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि दिग्विजय भाटी अमरोहा से जिला बदर है।

मेरठ SSP अविनाश पांडेय की आलोचना नहीं, तारीफ होनी चाहिए

तो अब समझ आ गया होगा कि मेरठ SSP अविनाश पांडेय ने प्रदर्शनकारियों पर तीखे तेवर क्यों अपनाए और पुलिस वैन में घुसकर थप्पड़ क्यों बरसाए। रवि गौतम ने खुदकुशी करने का ढोंग कर प्रदर्शन को उग्र बनाने की कोशिश की, लेकिन मेरठ पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उसे रोक दिया। अगर ऐसा नहीं होता, तो इस प्रदर्शन का अंजाम बहुत बुरा हो सकता था। ठीक वैसा ही, जैसा इसकी साजिश रची गई थी। लेकिन मेरठ पुलिस की सजगता और सक्रियता ने मेरठ की कानून-व्यवस्था को संभाले रखा।

सोशल मीडिया पर मेरठ SSP अविनाश पांडेय को कोसते और उनके गुस्से की आलोचना करते हुए आपको कई लोग मिल जाएँगे, लेकिन उनकी अगुवाई में मेरठ की सुरक्षा व्यवस्था की तारीफ करते आपको शायद ही कोई मिलेगा। उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ अपना काम किया, प्रदर्शन के पीछे छिपे अराजक तत्वों की पहचान की और उन्हें उनकी सही जगह, यानी जेल, भेज दिया। ऐसे में अविनाश पांडेय की तारीफ होनी भी चाहिए।

कुल मिलाकर, यह पूरा प्रकरण प्रदर्शन के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेताओं का उदाहरण था और उदाहरण उत्तर प्रदेश की सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था का भी। प्रदर्शन का उद्देश्य अपनी माँगें रखना होता है, न कि लोगों को भड़काकर सड़कें जाम करना और न ही खुदकुशी करने का ढोंग कर पुलिस पर दबाव बनाना। ये सभी चीजें किसी भी प्रदर्शन को हिंसा में तब्दील कर सकती हैं। मेरठ पुलिस ने समय रहते इसे रोक दिया, क्योंकि पहले भी देखा गया है कि दिल्ली दंगे हों या किसान आंदोलन, हर जगह इसी तरह के पैतरों का इस्तेमाल कर हिंसा भड़काने की कोशिश की गई थी।

‘बस नाम रहेगा अल्लाह का…’ CJP के प्रोटेस्ट में वामपंथन नंदिता नारायण ने गाई फैज की ‘हम देखेंगे’, क्रांति को रोमांटिसाइज करने वाली इस नज्म का असल मकसद ‘गजवा-ए-हिंद’

NEET के पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जमीन घेरने वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन अब असली रंग दिखाने लगा है। हाल में वहाँ डीयू की नंदिता नारायण ने माइक लेकर मंच से पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को गाया और ये समझाते हुए दिखीं कि दक्षिणपंथियों ने कैसे ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ को गलत समझ लिया है जबकि हकीकत तो ये है अल्लाह हम सब में है।

ये तर्क बिलकुल वही था जो वामपंथी, हिंदुओं का ब्रेनवाश करने से पहले उन्हें देते हैं। नंदिता नारायण ने मंच से खड़े होकर इस नज्म को गाने ने साफ कर दिया कि CJP का छात्र कल्याण वाला मुखौटा उतर चुका है और मकसद अब ‘गजवा-ए-हिंद’ का सपना देखने वालों को मुख्यधारा में लाने का है। इस बात को सामान्य बनाने का है कि अल्लाह ही है जो हम सब के अंदर है और बुत उठवाना सामान्य बात है।

फैज अहमद फैज की नज्म ‘हम देखेंगे’ को भारत में अक्सर ‘क्रांति’, ‘प्रतिरोध’ और ‘लोकतंत्र बचाने’ की भाषा में पेश किया जाता है। लेकिन इस नज्म को लेकर विवाद सिर्फ इतना नहीं है कि यह सत्ता-विरोधी कविता है। सवाल यह है कि जब किसी भी राजनीतिक प्रदर्शन, छात्र आंदोलन या नागरिकता कानून विरोध तक में बात बार-बार ‘हम देखेंगे’ तक पहुँचा दी जाती है तो उसके पीछे सिर्फ कला और कविता है या एक खास वैचारिक एजेंडा भी काम करता है।

यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि इस नज्म की सबसे विवादित पंक्तियाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सामान्य लोकतांत्रिक विरोध की भाषा नहीं लगतीं बल्कि इस्लामी प्रतीकों और गजवा-ए-हिंद की कल्पना से भरी हुई हैं। Rekhta पर उपलब्ध नज्म में साफ लिखा है ‘जब अर्द-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे’ और आगे ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ आता है।

फोटो साभार: Rekhta

भारत जैसे देश में जहाँ हिंदू परंपरा में मूर्ति-पूजा आस्था का केंद्र है, वहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ को केवल लोकतांत्रिक विरोध की भाषा बताना असल में भोला बनने वाली बात है। ऐसा लगता है कि इसे गाने वाला हर शख्स एक खास प्रोपेगेंडा के साथ काम कर रहा है। इस्लामी, वामपंथी-लिबरल मंच इस्लामी प्रतीकों वाली इस नज्म को बार-बार विरोध का प्रतीक बनाकर एक खास मानसिक जमीन तैयार करते हैं।

‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’: सैन्य शासन के खिलाफ नहीं, इस्लामी क्रांति से प्रेरित

इस नज्म की पृष्ठभूमि भी विवाद को और गहरा करती है। आम तौर पर कहा जाता है कि फैज ने इसे पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के खिलाफ लिखा था लेकिन पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ में रऊफ पारेख ने लिखा कि यह आम धारणा गलत है।

उनके मुताबिक, फैज जिया के विरोधी जरूर थे और नज्म जिया के दौर में लिखी गई लेकिन यह मूल रूप से ईरानी क्रांति से प्रेरित थी और फैज ने इसमें उस जनता को सलाम किया था जिसने व्यवस्था को पलट दिया था। डॉन में यह भी लिखा है कि नज्म का वास्तविक शीर्षक ‘हम देखेंगे’ नहीं बल्कि कुरान की सूरह रहमान की आयत से लिया गया ‘व-यब्का-वज्ह-ओ-रब्बिक’ है।

यही बात इस पूरी बहस को और गंभीर बना देती है। अगर यह नज्म ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरित थी तो फिर इसे भारत में हर विरोध-प्रदर्शन का मासूम लोकतांत्रिक गीत बताना साफ तौर पर आधा सच परोसना है।

ईरान की क्रांति कोई सामान्य जनांदोलन नहीं थी। उसके बाद वहाँ लोकतंत्र नहीं बल्कि इस्लामी शासन व्यवस्था कायम हुई। इसलिए जब उसी पृष्ठभूमि से निकली पंक्तियाँ भारत के विश्वविद्यालयों, सड़कों और प्रदर्शन स्थलों पर नारे की तरह गूँजती हैं तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि इसका मकसद क्या है? तब यह केवल अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं नजर आती बल्कि गजवा-ए-हिंद स्थापित करने का एक प्लान लगती है।

CAA से लेकर शरजील इमाम तक: फैज की ‘इस्लामिक क्रांति’ की गूँज

CAA विरोध प्रदर्शनों में इस नज्म को सबसे ज्यादा राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया गया। 2019-20 में जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे, तब ‘हम देखेंगे’ को मंचों, नारों, पोस्टरों और गीतों में बदला गया। जामिया मिल्लिया इस्लामिया से लेकर शाहीन बाग तक, JNU से लेकर IIT कानपुर तक इस नज्म को बार-बार गाया गया। इसे आंदोलन की आवाज बताया गया जबकि इसके शब्दों में साफ-साफ दिखता है कि यह इस्लामी सत्ता के लिए राह बनाने की कोशिश है। जिस आंदोलन को नागरिकता और संविधान की भाषा में बेचा जा रहा था, उसके केंद्र में एक ऐसी नज्म रखी गई जो ‘गजवा-ए-हिंद’ के विचार से भरी हुई है।

इन कार्यक्रमों में फैज की इस नज्म को गाने वाले लोग यह मनगढ़ंत दावा करते हैं कि भई फैज तो वामपंथी थे, वो तो अल्लाह में नहीं मानते थे तो यह इस्लामी शासन की प्रतीक कैसे हो सकती है? वामपंथियों के पोस्ट बॉय शरजील इमाम से जब फैज को समझने की कोशिश करते हैं तो यह साफ नजर आता है कि उसने फैज को केवल वामपंथी या सेक्युलर कवि मानने से इनकार किया था। उसने साफ लिखा था कि फैज की कविता इस्लामी प्रतीकों और मुस्लिम क्रांतिकारी विचार से भरी हुई है।

2017 में Sabrang India पर शरजील इमाम और साकिब सलीम ने ‘Faiz Ahmad Faiz and the de-Islamisation of a Muslim revolutionary’ शीर्षक से लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने कहा कि वामपंथी हलकों ने फैज को कम्युनिस्ट कवि के रूप में पेश किया और उनकी इस्लामी पहचान को या तो अप्रासंगिक या संयोग बताया। शरजील और सलीम ने ‘हम देखेंगे’ की पंक्तियों को कुरानिक प्रतीकों से जोड़ते हुए लिखा कि ‘लौह-ए-अजल’, कयामत, काबा, बुतों का हटना और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे प्रतीक इस्लामी विचार से आते हैं।

इसी लेख में शरजील-सलीम लिखते हैं कि फैज ने खुद को मुस्लिम कवि घोषित किया था। इस लेख में लिखा गया है, “फैज के साथी मेजर इशाक बताते हैं कि जब वे दोनों एक साथ जेल में थे, तो फैज ने हैदराबाद जेल में कैदियों को कुरान और हदीस पढ़ाया था। फैज खुद बताते हैं कि एक कर्नल ने उनसे स्पष्ट रूप से पूछा था कि जब वे नास्तिक हैं तो कुरान क्यों पढ़ा रहे हैं। जब फैज ने स्पष्ट किया कि वे मुसलमान हैं।” यानी फैज के सेक्युलर होने की जो घुट्टी पिलाई जाती है, वो बस आँखों में धूल झोंकने की एक कोशिश है।

सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं, इस्लामिक प्रभुत्व की घोषणा है ‘हम देखेंगे’

लेफ्ट-लिबरल जमात का यही खेल है। वे सीधे इस्लामी राजनीतिक नारे नहीं लगाते बल्कि उन्हें कविता, कला, प्रतिरोध और संस्कृति की भाषा में पैक कर देते हैं। ‘हम देखेंगे’ इसी पैकेजिंग का सफल उदाहरण है। यह नज्म मंच पर क्रांति लगती है, पोस्टर पर कला लगती है, विश्वविद्यालय में प्रतिरोध लगती है लेकिन इसकी जड़ में इस्लामी गजवा-ए-हिंद की कल्पना है, जो हर तरफ बस इस्लामी शासन चाहती है।

यह इस्लामी सत्ता की कल्पना या यूँ कहें कि चाहत से भरी नज्म है। इसका बार-बार भारतीय विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल इस्लामी प्रतीकों को सामान्य बनाने की कोशिश है। ‘सिर्फ नाम रहेगा अल्लाह का’ किसी सेक्युलर क्रांति का नारा नहीं हो सकता। यह इस्लामी प्रभुत्व की घोषणा है। इसका राजनीतिक इस्तेमाल साफ बताता है कि ‘हम देखेंगे’ भारत में सांस्कृतिक प्रतिरोध नहीं बल्कि इस्लामी राजनीतिक जमीन तैयार करने वाला वैचारिक हथियार बन चुकी है।

कौन हैं CJP के प्रदर्शन में ‘हम देखेंगे’ पढ़ने वाली नंदिता नारायण?

इस सब उदाहरणों से स्पष्ट है ना कि तो फैज कोई बहुत सेकुलर आदमी हैं और ना ही यह नज्म कोई सत्ता विरोधी क्रांति का प्रतीक है फिर भी नंदिता नारायण जैसे लोग इसे अपने मन से क्रांति का प्रतीक बनाकर पेश करते हैं। नंदिता ने CJP के प्रोटेस्ट में ना केवल यह नज्म पढ़ी बल्कि इस बात के लिए भी दक्षिणपंथी लोगों को जिम्मेदार बताया कि वे इससे दुखी हो जाते हैं।

नंदिता नारायण CJP के प्रोटेस्ट में जब यह नज्म गा रही थीं तो अल्लाह को अपनी तरह से परिभाषा कर रही थीं। ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाते हुए उन्होंने कहा कि इससे ही दक्षिणपंथी लोगों को दिक्कत होती है और इससे भी एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने कहा, “अल्लाह सर्वोच्च ‘वेदांत’ है, अल्लाह का मतलब वो शक्ति जो हम सबमें है।”

नंदिता नारायण दिल्ली विश्वविद्यालय की उन चर्चित शिक्षक-कार्यकर्ताओं में रही हैं जिनके लिए कक्षा से अधिक महत्वपूर्ण अक्सर आंदोलन, धरना, प्रशासन-विरोध और वामपंथी राजनीति दिखाई दी। सेंट स्टीफेंस कॉलेज में 42 वर्षों तक गणित पढ़ाने वाली नंदिता नारायण ने अपने लंबे अकादमिक करियर के समानांतर दिल्ली विश्वविद्यालय की शिक्षक राजनीति में खुद को एक मजबूत वामपंथी चेहरे के तौर पर तैयार किया है। DUTA, FEDCUTA और Democratic Teachers Front जैसे संगठनों से जुड़कर उन्होंने खुद को शिक्षक नेता से अधिक एक वैचारिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया।

नंदिता नारायण का वैचारिक झुकाव कभी छिपा हुआ नहीं रहा। लोकतंत्र, सेकुलरिज्म, सार्वजनिक शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे आकर्षक शब्दों की आड़ में उनकी राजनीति लगातार वामपंथी संगठनों और सरकार-विरोधी मंचों के साथ खड़ी रही है। फीस वृद्धि, स्वायत्तता, नई शिक्षा नीति, प्रवेश परीक्षा और प्रशासनिक बदलाव हर मुद्दे को नियो-लिबरल हमला बताकर आंदोलन खड़ा करना उनकी सक्रियता का स्थायी तरीका रहा।

नंदिता नारायण की सक्रियता लंबे समय तक विवादों से घिरी रही। दिल्ली विश्वविद्यालय और सेंट स्टीफेंस कॉलेज प्रशासन की ओर से उनके आचरण, अन्य कॉलेजों के मामलों में दखल, कथित अपमानजनक टिप्पणियों और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक अभियान को लेकर शिकायतें सामने आईं। उनके खिलाफ तथ्य-जाँच समितियाँ गठित की गईं और कई मामलों में विवाद अदालत तक पहुँचा। नंदिता नारायण और उनके समर्थकों ने इसे प्रताड़ना और असहमति दबाने की कोशिश बताते रहे हैं।

रिटायरमेंट के बाद भी उनका राजनीतिक अभियान समाप्त नहीं हुआ। वे भारत के धर्मनिरपेक्ष बदलाव के लिए लोकतांत्रिक जन-संपर्क (Democratic Outreach for Secular Transformation of India) और शिक्षा आंदोलन के लिए संयुक्त मंच (Joint Forum for Movement on Education) जैसी पहलों से जुड़ी रहीं। वर्ष 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी के जंतर-मंतर प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी ने साफ कर दिया कि उनका उद्देश्य केवल शिक्षक अधिकारों तक सीमित नहीं है।

BSNL ने लॉन्च किया ₹1.34 लाख का सैटेलाइट फोन, बिना मोबाइल नेटवर्क के भी होगी कॉल: जानें- क्या हैं इसकी खूबियाँ और क्या इसे हर कोई खरीद सकता है?

कल्पना कीजिए कि आप किसी ऊँचे पहाड़, घने जंगल, समुद्र के बीच या ऐसी जगह पर हैं, जहाँ मोबाइल नेटवर्क का नामोनिशान तक नहीं है। ऐसे में अगर किसी से संपर्क करना हो या अचानक कोई आपात स्थिति आ जाए तो क्या होगा? इसी समस्या का समाधान लेकर सरकारी टेलीकॉम कंपनी BSNL ने भारत में अपना नया सैटेलाइट फोन लॉन्च किया है।

यह फोन सामान्य स्मार्टफोन की तरह मोबाइल टावर पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि सीधे सैटेलाइट के जरिए काम करता है। इसकी कीमत 1,34,166 रुपए (टैक्स सहित) रखी गई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कोई भी व्यक्ति सीधे खरीदकर इस्तेमाल नहीं कर सकता। बल्कि इसके लिए भी कुछ शर्तें हैं।

क्या है BSNL का नया सैटेलाइट फोन?

BSNL का यह नया फोन खास तौर पर उन लोगों और संस्थाओं के लिए तैयार किया गया है, जिन्हें ऐसे इलाकों में काम करना पड़ता है जहाँ मोबाइल नेटवर्क नहीं होता। यह डिवाइस ग्लोबल सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनी इनमारसैट की मदद से बनाया गया है।

जब कोई यूजर इस फोन से कॉल करता है तो सिग्नल पहले सीधे सैटेलाइट तक पहुँचता है। इसके बाद सैटेलाइट उस सिग्नल को ग्राउंड स्टेशन के जरिए टेलीकॉम नेटवर्क तक भेजता है। यही वजह है कि यह फोन बिना मोबाइल टावर के भी काम करता है।

आखिर यह फोन किन लोगों के लिए है?

BSNL का यह सैटेलाइट फोन आम स्मार्टफोन यूजर्स के लिए नहीं बनाया गया है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में किया जाएगा, जहाँ सामान्य मोबाइल नेटवर्क मौजूद नहीं होता।

यह फोन रक्षा सेवाओं, समुद्री क्षेत्र में काम करने वालों, आपदा राहत टीमों, खनन परियोजनाओं, दूर-दराज के इलाकों में काम करने वाली कंपनियों, तीर्थयात्रियों और एडवेंचर ट्रैवल करने वालों के लिए काफी उपयोगी माना जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप या चक्रवात के दौरान जब मोबाइल टावर बंद हो जाते हैं, तब भी यह फोन संपर्क बनाए रखने में मदद कर सकता है।

खरीदने से पहले जान लें सबसे जरूरी नियम

अगर आप सोच रहे हैं कि इसे किसी मोबाइल शॉप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से खरीद सकते हैं, तो ऐसा संभव नहीं है। भारत में सैटेलाइट फोन को लेकर सुरक्षा कारणों से कड़े नियम बनाए गए हैं।

कोई भी व्यक्ति या संस्था इस फोन को तभी खरीद या इस्तेमाल कर सकती है, जब उसे दूरसंचार विभाग (DoT) से अनुमति या ऑथराइजेशन मिल जाए। बिना सरकारी मंजूरी के सैटेलाइट फोन रखना या उसका इस्तेमाल करना कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है। यही वजह है कि यह डिवाइस आम स्मार्टफोन की तरह खुले बाजार में नहीं मिलता है।

फोन की खासियतें क्या हैं?

BSNL ने इस सैटेलाइट फोन को कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया है। इसमें मजबूत और टिकाऊ बॉडी दी गई है, जिससे यह धूल, पानी और खराब मौसम में भी बेहतर तरीके से काम कर सके।

फोन में लंबी बैटरी दी गई है, जिससे ऐसे इलाकों में भी लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है, जहाँ बिजली की सुविधा नहीं होती। इसके अलावा इसमें SOS यानी इमरजेंसी अलर्ट फीचर भी दिया गया है, जिससे संकट की स्थिति में तुरंत मदद के लिए सिग्नल भेजा जा सकता है। साफ आवाज में वॉयस कॉलिंग भी इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।

कीमत कितनी है और कौन-कौन से प्लान मिलेंगे?

BSNL ने इस सैटेलाइट फोन की कीमत 1,34,166 रुपए (टैक्स के साथ) तय की है। कंपनी के मुताबिक अधिक जानकारी के लिए ग्राहक अपने नजदीकी BSNL कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं या दिए गए हेल्पलाइन नंबर (+91 94651 01323) पर जानकारी मिल सकती हैं।

फोन के साथ सरकारी और कमर्शियल दोनों तरह के यूजर्स के लिए अलग-अलग पोस्टपेड और प्रीपेड प्लान भी उपलब्ध हैं। पोस्टपेड प्लान 3500 रुपए प्रति माह से शुरू होते हैं, जबकि कमर्शियल प्लान की शुरुआती कीमत 5835 रुपए और उससे अधिक है।

फ्री मिनट या SMS खत्म होने के बाद अलग से प्रति मिनट और प्रति SMS शुल्क देना होगा। प्रीपेड ग्राहकों के लिए टॉप-अप रिचार्ज की सुविधा भी उपलब्ध रहेगी।

क्या यह स्मार्टफोन की जगह ले सकता है?

इस सवाल का जवाब है, नहीं। BSNL का सैटेलाइट फोन सामान्य स्मार्टफोन का विकल्प नहीं है। इसका उद्देश्य सोशल मीडिया चलाना या रोजमर्रा की मोबाइल जरूरतों को पूरा करना नहीं बल्कि उन परिस्थितियों में भरोसेमंद संचार उपलब्ध कराना है जहाँ मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह नाकाम हो जाता है।

यही वजह है कि यह डिवाइस मिशन-क्रिटिकल कम्युनिकेशन के लिए तैयार किया गया है। रक्षा सेवाएँ, राहत एवं बचाव अभियान, समुद्री ऑपरेशन और दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाली एजेंसियाँ इसका सबसे अधिक लाभ उठा सकती हैं। आम लोगों के लिए यह फोन न तो आसानी से उपलब्ध होगा और न ही बिना सरकारी अनुमति इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।

भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच ऐतिहासिक यूरेनियम डील, शांतिपूर्ण कार्यों के लिए होगी ईंधन की आपूर्ति: जानिए साल 2047 तक कैसे पूरा होगा 100 गीगावाट न्यूक्लियर एनर्जी का टारगेट

वैश्विक मंच पर ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। इस दिशा में भारत ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम आगे बढ़ाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच गुरुवार (09 जुलाई 2026) को यूरेनियम आपूर्ति से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता संपन्न हुआ है।

यह समझौता न केवल भारत की भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, बल्कि यह दोनों देशों के बीच मजबूत होते रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों का भी प्रतीक है।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए इस समझौते ने उन कानूनी और राजनीतिक बाधाओं को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है, जो दशकों से दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग में रोड़ा बनी हुई थीं।

यह डील भारत को एक ऐसा विश्वसनीय ईंधन स्रोत प्रदान करेगी, जो उसकी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन क्षमता को बढ़ाने और पर्यावरण अनुकूल लक्ष्यों को प्राप्त करने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।

भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील: दशकों पुराना गतिरोध कैसे खत्म हुआ?

भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध हमेशा से इतने सहज और मजबूत नहीं रहे हैं, जितने आज दिखाई देते हैं। यदि इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 1974 में जब भारत ने ‘पोखरण-1’ के माध्यम से अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, तब ऑस्ट्रेलिया सहित कई पश्चिमी देशों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी।

इसके बाद साल 1998 में किए गए दूसरे परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कड़े अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए गए और यूरेनियम व्यापार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने एक बेहद सख्त नीति अपनाई थी, जिसके तहत वह केवल उन्हीं देशों को यूरेनियम का निर्यात कर सकता था जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए हों।

चूँकि भारत इस संधि को भेदभावपूर्ण मानता आया है, इसलिए उसने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया ने लंबे समय तक भारत को यूरेनियम देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया था। इस गतिरोध में पहला महत्वपूर्ण मोड़ साल 2007 में आया, जब तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दी।

हालाँकि उसी वर्ष के अंत में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता परिवर्तन हो गया और केविन रड के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी की सरकार ने इस फैसले को पलटते हुए फिर से NPT की शर्त सामने रख दी।

ऑस्ट्रेलिया को हमेशा यह डर सताता था कि भारत इस यूरेनियम का उपयोग बिजली बनाने के बजाय परमाणु हथियार विकसित करने में कर सकता है। लेकिन साल 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद वैश्विक परिदृश्य बदला। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) ने भारत को यूरेनियम खरीदने की छूट दे दी।

भारत के बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड और ‘पहले परमाणु हमला न करने’ की नीति को देखते हुए साल 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नीति बदली और 2012 में प्रतिबंध को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया। इसके बाद 2014 में तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टोनी एबॉट की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौता हुआ।

इसने यूरेनियम आपूर्ति की कानूनी राह खोली। वर्तमान में सुरक्षा गारंटियों और परमाणु दायित्व कानून जैसी तमाम तकनीकी और प्रशासनिक बारीकियों को अंतिम रूप देकर इस व्यवस्था को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है।

IAEA की निगरानी में केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा ईंधन का उपयोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज के बीच हुए इस हालिया समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को दीर्घकालिक यूरेनियम निर्यात का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस ईंधन का उपयोग सिर्फ और सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्त बयान में स्पष्ट किया गया है कि यूरेनियम का यह पूरा निर्यात अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े सुरक्षा प्रावधानों और निगरानी मानकों के दायरे में होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आपूर्ति किए गए यूरेनियम की हर मात्रा का हिसाब रखा जाएगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसका उपयोग केवल नागरिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ही हो रहा है।

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इस व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि यह निर्यात भारत को अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता को तेजी से बढ़ाने में सक्षम बनाएगा। दिलचस्प बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का लगभग 28 से 32 प्रतिशत यूरेनियम का विशाल भंडार है, लेकिन वह खुद अपने देश में परमाणु ऊर्जा का उपयोग नहीं करता और न ही परमाणु हथियार बनाता है।

वह अपने पूरे यूरेनियम को निर्यात कर देता है। ऑस्ट्रेलिया अब तक चीन, जापान, ताइवान और अमेरिका जैसे देशों को यूरेनियम की आपूर्ति करता रहा था, लेकिन अब इस सूची में भारत का शामिल होना एक बड़ी रणनीतिक जीत है। दोनों देशों ने इस बात की पुष्टि की है कि ‘ऑस्ट्रेलिया-भारत परमाणु सहयोग समझौते (2015)’ के तहत सभी आवश्यक प्रशासनिक प्रबंध पूरे कर लिए गए हैं।

भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर एनर्जी का रखा है महत्वाकांक्षी लक्ष्य

भारत की आबादी और उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को देखते हुए देश में बिजली की माँग लगातार बढ़ रही है। विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला के अनुसार, वर्तमान समय में भारत की कुल परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता लगभग 8 गीगा वाट (या वर्तमान में सक्रिय रिएक्टरों के आधार पर करीब 8.78 गीगा वाट) है, जो देश के कुल बिजली उत्पादन का महज 3 प्रतिशत ही है।

परमाणु ऊर्जा की इस कम हिस्सेदारी का सबसे बड़ा कारण देश में यूरेनियम ईंधन की भारी कमी रहा है। यद्यपि भारत घरेलू स्तर पर झारखंड और आंध्र प्रदेश की खदानों से यूरेनियम का उत्खनन करता है, लेकिन यह घरेलू उत्पादन प्रति वर्ष केवल 400 से 500 टन ही है, जो देश की कुल जरूरतों का मुश्किल से 20% से 25% ही पूरा कर पाता है।

शेष आवश्यकता के लिए भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर है। संसद में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2008-09 से 2024-25 तक भारत ने IAEA की निगरानी वाले रिएक्टरों के लिए कुल 18,842.60 मीट्रिक टन यूरेनियम का आयात किया है, जिसमें यूरेनियम अयस्क, प्राकृतिक यूरेनियम डाईऑक्साइड, पेलेट्स और समृद्ध पेलेट्स शामिल हैं।

भारत सरकार ने साल 2047 तक देश की परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगा वाट करने का एक बेहद महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, ताकि लगभग 6 करोड़ भारतीय घरों को निर्बाध बिजली प्रदान की जा सके। इस विशाल लक्ष्य को प्राप्त करने के चरणबद्ध तरीके भी तय किए गए हैं।

इसके तहत वर्तमान क्षमता को साल 2031-32 तक बढ़ाकर लगभग 22 गीगा वाट किया जाएगा और इसके बाद 2032 से 2047 के बीच NPCIL द्वारा 32 गीगा वाट की अतिरिक्त क्षमता स्थापित की जाएगी। जानकारों का कहना है कि वर्तमान में रिएक्टरों को सालाना करीब 2,000 टन यूरेनियम की जरूरत होती है।

हालाँकि जब भारत 100 गीगा वाट के लक्ष्य तक पहुँचेगा, तब यह सालाना जरूरत बढ़कर 23,000 टन तक पहुँच सकती है। चूँकि भारत के पास परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अपना यूरेनियम मौजूद है, इसलिए उसे बाहरी देशों से यूरेनियम की आवश्यकता केवल और केवल असैन्य ऊर्जा प्रोग्राम को चलाने के लिए है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया का उच्च गुणवत्ता वाला यूरेनियम बेहद मददगार साबित होगा।

SHANTI विधेयक और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी

भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा उत्पादन प्रणाली में आमूलचूल बदलाव लाने और 2047 के 100 गीगा वाट के लक्ष्य को समय पर हासिल करने के लिए विधायी स्तर पर भी बड़े कदम उठाए हैं। इसी क्रम में भारतीय संसद द्वारा दिसंबर 2025 में एक ऐतिहासिक कानून पास किया गया, जिसका नाम ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांस्फ़ॉर्मिंग इंडिया’ यानी ‘शांति’ (SHANTI) विधेयक है।

यह नया कानून भारत के परमाणु क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करता है, क्योंकि यह देश के परमाणु ऊर्जा इतिहास में पहली बार निजी कंपनियों को बड़े स्तर पर भागीदारी की अनुमति देता है।

इस विधेयक के प्रावधानों के तहत अब देश की निजी कंपनियों को भी परमाणु बिजलीघर या परमाणु रिएक्टर बनाने, उनका मालिकाना हक रखने, उन्हें संचालित करने और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बंद करने (डीकमिशन करने) के लाइसेंस दिए जा सकेंगे।

इतना ही नहीं यह कानून निजी कंपनियों को परमाणु ईंधन बनाने की भी अनुमति प्रदान करता है, जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, उसका शोधन और एक निर्धारित सुरक्षित सीमा तक उसका संवर्धन (एनरिचमेंट) शामिल है।

इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले अन्य परमाणु पदार्थों का उत्पादन, उपयोग, प्रसंस्करण और उनका सुरक्षित निपटान भी अब निजी क्षेत्र की कंपनियाँ कर सकेंगी। सरकार का मानना है कि इस कानून के जरिए निजी पूंजी और उन्नत तकनीकों का समावेश होगा, जिससे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण में तेजी आएगी और देश ईंधन के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा।

यूरेनियम का विज्ञान: प्रकृति और ऊर्जा क्षमता

यूरेनियम क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है, इसे समझने के लिए इसके वैज्ञानिक और प्राकृतिक पहलुओं को जानना आवश्यक है। यूरेनियम एक बेहद भारी और उच्च घनत्व वाली धातु है, जिसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) 1132 डिग्री सेल्सियस होता है।

इसका उपयोग पिछले 60 से अधिक वर्षों से ऊर्जा के एक अत्यंत सघन और शक्तिशाली स्रोत के रूप में किया जा रहा है। वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के आँकड़ों के अनुसार, यूरेनियम पृथ्वी की ऊपरी परत में पाया जाने वाला एक सामान्य तत्व है, जो टिन, टंगस्टन और मोलिब्डेनम जितना ही आम है।

यह ज्यादातर चट्टानों में 2 से 4 पार्ट्स प्रति मिलियन (यानी 20 से 40 लाखवें हिस्से) की सूक्ष्म मात्रा में मौजूद होता है। इसके अलावा, यूरेनियम समुद्री पानी में भी घुली हुई अवस्था में प्रचुर मात्रा में मौजूद है, जहाँ से इसे उन्नत तकनीकों के जरिए निकाला जा सकता है।

ऐतिहासिक रूप से, यूरेनियम की खोज साल 1789 में जर्मन रसायन वैज्ञानिक मार्टिन क्लापरोथ ने ‘पिचब्लेंड’ नामक एक खनिज में की थी। उन्होंने इसका नाम उस समय से आठ साल पहले खोजे गए सौर मंडल के ‘यूरेनस’ ग्रह के नाम पर रखा था।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम का निर्माण आज से लगभग 6.6 अरब साल पहले अंतरिक्ष में हुए भीषण सुपरनोवा विस्फोटों के दौरान हुआ था। यद्यपि यह पूरे सौर मंडल में बहुत अधिक मात्रा में उपलब्ध नहीं है, लेकिन पृथ्वी के भीतर इसका धीमा रेडियोधर्मी क्षय (रेडियोएक्टिव डिके) आज भी हमारे ग्रह के आंतरिक हिस्से में गर्मी का मुख्य स्रोत है।

इसी आंतरिक ऊष्मा के कारण ही पृथ्वी के भीतर महाद्वीपों का खिसकना, जिसे ‘कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट’ कहा जाता है, संभव हो पाता है। अपने अत्यधिक घनत्व के कारण, परमाणु ऊर्जा के अलावा इसका उपयोग विमानों के नियंत्रण तंत्र (कंट्रोल सिस्टम) में और खतरनाक रेडिएशन से सुरक्षा के लिए शील्डिंग सामग्री के रूप में भी बड़े पैमाने पर किया जाता है।

वैश्विक साझेदारी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरण

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुआ यह ऊर्जा समझौता केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे भू-राजनीतिक और रणनीतिक कारण भी छिपे हैं। दोनों देश ‘व्यापक रणनीतिक साझेदार’ (कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रेटेजिक पार्टनर्स) हैं और एक स्वतंत्र, खुले, सुरक्षित और समृद्ध हिंद-प्रशांत (इंडो-पैसिफिक) क्षेत्र का साझा दृष्टिकोण रखते हैं।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में जो अभूतपूर्व करीबी आई है, उसकी एक बड़ी वजह चीन की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर नजर बनाए रखना और वैश्विक व्यापार को किसी एक देश पर निर्भर रहने से बचाकर नए मजबूत साझेदार विकसित करना भी है।

दोनों देशों ने ऊर्जा सुरक्षा पर एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर वैश्विक स्तर पर चल रहे व्यवधानों, विशेषकर मध्य पूर्व की स्थिति और उसके कारण ऊर्जा, संसाधनों तथा अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं और कीमतों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर गहरी चिंता जताई है।

इस व्यवधान के बीच दोनों देशों ने खुले बाजारों और नियम-आधारित व्यापार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, जो उनकी आर्थिक सुरक्षा का मूल आधार है। भारत ने इसके पूर्व फ्रांस, रूस और कजाकिस्तान जैसे देशों से भी परमाणु ईंधन आयात के समझौते कर रखे हैं और अब ऑस्ट्रेलिया इस कड़ी में एक सबसे मजबूत और दीर्घकालिक स्तंभ बनकर उभरा है।

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच आपसी कूटनीतिक गर्मजोशी भी साफ देखी गई, जहाँ दोनों नेताओं ने एक खुशनुमा सेल्फी ली। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की भी खुलकर सराहना की।

इस मजबूत रिश्ते का एक सामाजिक आधार ऑस्ट्रेलिया में तेजी से बढ़ता भारतीय प्रवासी समुदाय भी है। वर्ष 2026 के आँकड़ों के अनुसार, इतिहास में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में विदेश में जन्मे प्रवासियों का सबसे बड़ा समूह भारत में जन्मे लोगों का हो गया है, जिसने लंबे समय से चले आ रहे ब्रिटिश मूल के समुदाय को भी पीछे छोड़ दिया है।

इस रणनीतिक साझेदारी को और विस्तार देते हुए दोनों देशों ने हिंद महासागर में स्थित ऑस्ट्रेलिया के कोकोस (कीलिंग) द्वीपसमूह पर एक ‘अस्थायी अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल’ स्थापित करने पर भी सहमति जताई है, जो भारत के भविष्य के अंतरिक्ष उड़ान प्रोजेक्ट्स को महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगा।

इसके अलावा, दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) की सप्लाई चेन को मजबूत करने, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), कोयला, डीजल और कम कार्बन वाले ईंधनों के द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया ने भारत की ‘ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस’ (GBA) पहल का भी स्वागत किया है।

यह समग्र साझेदारी भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता और वैश्विक पटल पर उसके बढ़ते प्रभाव को एक नई और सुरक्षित दिशा प्रदान करती है।

गुजरात में चाँदीपुरा वायरस से 3 बच्चों की मौत, स्वास्थ्य विभाग हाई अलर्ट पर: जानिए कहाँ आई है ये खतरनाक बीमारी और कैसे कर सकते हैं बचाव

गुजरात के उत्तर और मध्य जिलों में चाँदीपुरा वायरस की दस्तक से राज्य का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह अलर्ट हो गया है। स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल्ल पानसेरिया ने बताया है कि इस वायरस की वजह से अब तक 3 बच्चों की जान जा चुकी है। जिन बच्चों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी, उनमें से 2 वडोदरा और गोधरा के रहने वाले थे, जबकि एक बच्चा राजस्थान का था।

राजस्थान के इस बच्चे को इलाज के लिए हिम्मतनगर के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। राहत की बात यह है कि सरकार और डॉक्टरों की टीमें जमीन पर उतरकर स्थिति को संभालने में जुटी हैं। प्रभावित इलाकों में संदिग्ध मरीजों की लगातार जाँच की जा रही है। स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएँ नहीं बल्कि थोड़ी सावधानी बरतें।

क्या है यह चाँदीपुरा वायरस

चाँदीपुरा एक बहुत ही तेजी से फैलने वाला संक्रामक वायरस है। यह वायरस मुख्य रूप से ‘रैब्डोवायरस’ परिवार से ताल्लुक रखता है। जब यह वायरस किसी के शरीर में जाता है, तो यह खून के रास्ते सीधे दिमाग पर हमला करता है। दिमाग पर असर होने के कारण यह वहाँ सूजन पैदा कर देता है।

डॉक्टरों की भाषा में इस गंभीर स्थिति को ‘एन्सेफलाइटिस’ या ‘एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम’ कहा जाता है। यह बीमारी इतनी खतरनाक है कि इसमें लक्षण बहुत तेजी से उभरते हैं। कई बार तो मरीज की हालत महज 24 से 48 घंटे के भीतर ही बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती है।

आखिर कैसे फैलता है यह संक्रमण

चाँदीपुरा वायरस मुख्य रूप से ‘सैंड फ्लाई’ यानी रेतीली मक्खी के काटने से इंसानों में फैलता है। यह बहुत ही छोटी और खून चूसने वाली मक्खी होती है। कुछ जाँचों में यह भी सामने आया है कि टिक्स और मच्छरों के जरिए भी यह आगे बढ़ सकता है। राहत की बात यह है कि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं फैलता है।

यानी अगर कोई मरीज खाँसता या छींकता है, तो पास बैठे दूसरे व्यक्ति को इससे कोई खतरा नहीं होता है। चूंकि यह मक्खियों और मच्छरों के काटने से होता है, इसलिए मानसून के मौसम में जब नमी बढ़ती है, तब इसका खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है।

सबसे पहले कहाँ मिला था और कैसे पड़ा चाँदीपुरा नाम

यह कोई बिल्कुल नया वायरस नहीं है। भारत में सबसे पहले साल 1965 में इस वायरस की पहचान की गई थी। महाराष्ट्र में एक जगह है जिसका नाम चाँदीपुरा है। सबसे पहली बार इसके मरीज इसी चाँदीपुरा गाँव में मिले थे। इसी वजह से डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने इस जगह के नाम पर ही इस वायरस का नाम ‘चाँदीपुरा वायरस’ रख दिया था। तब से लेकर अब तक देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं। इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर देखने को मिलता है।

इस बीमारी के मुख्य लक्षण क्या हैं

चाँदीपुरा वायरस के लक्षण अचानक और बहुत तेजी से दिखाई देते हैं। इसमें बच्चे को बहुत तेज बुखार आता है, जो 102 डिग्री से भी ऊपर जा सकता है। इसके साथ ही तेज सिर दर्द, लगातार उल्टी होना, बहुत ज्यादा कमजोरी और सुस्ती आना इसके शुरुआती लक्षण हैं।

जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है, बच्चे को दौरे पड़ने लगते हैं, शरीर में अकड़न आ जाती है और वह बेहोश भी हो सकता है। कुछ मामलों में बच्चों को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगती है। अगर बच्चे में ऐसा कोई भी लक्षण दिखे, तो बिना देर किए उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

क्या है इसका इलाज और बचाव के तरीके

आपको बता दें कि चाँदीपुरा वायरस के लिए अभी तक दुनिया में कोई विशेष टीका या पक्की दवा नहीं बनी है। अस्पताल में डॉक्टर मरीज के लक्षणों को देखकर ही उसका इलाज करते हैं। बुखार कम करने की दवा दी जाती है और दौरे को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जाते हैं।

शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए ग्लूकोज चढ़ाया जाता है और जरूरत पड़ने पर ऑक्सीजन भी दी जाती है। इससे बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम अपने आसपास सफाई रखें। बच्चों को पूरी आस्तीन के कपड़े पहनाएँ, सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल करें और घर के आसपास पानी या कचरा जमा न होने दें।

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“कहो काफ्का, कैसे हो? चहा पिला दूँ एक?”

सारा नैनीताल उसे काफ्का कांडपाल के नाम से जानने वाला हुआ। काफ्का कांडपाल जान ठैरा नैनीताल के लिटरेचर प्रेमियों की। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के तमाम युवा लड़के जिनके हार्मोन्स ने विश्वविद्यालय की विश्वविख्यात युवतियों को देख देख कर उछाल मारना सीखा ही था, उससे प्रेम पत्र लिखाने आया करते। वो उन प्रेम पत्रों में संपूर्ण जग का प्रेम निचोड़ कर भर देता।

काफ्का कांडपाल का लिखा खत हो और लड़की ने हाँ न की हो, ऐसा कोई वाकया अबतक नैनीताल की पहाड़ियों ने नहीं देखा था। जिस जिस की बात विश्वविद्यालय को जाती कच्ची सड़क से मॉल रोड पर प्रेमिका संग टहलने तक पहुँच जाती वह काफ्का कांडपाल को महँगी शराब पिलाता। और भला क्या ही चाहिए ठैरा काफ्का कांडपाल को फिर। बताते तो यहाँ तक हैं कि पंचानबे के नेट जेआरएफ, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के भौतिकी के कड़क प्रोफेसर पांडे ने भी गणित की मैडम को काफ्का कांडपाल के लिखें खतों द्वारा ही कैपिटल सिनेमा में साथ फिल्म देखने के लिए राजी किया था।

शहर के छात्र नेता उससे छुप कर मिला करते। वो उससे चुनाव के लिए भाषण लिखवाते। नैनीताल के खपे पुराने कम्युनिस्ट नेता हों या बीजेपी-कॉन्ग्रेस के छात्र काडर के युवा नेता, सभी पार्टियों वाले उससे अकेले में मिल भाषण लिखवा कर मंच पर बोलने की कला सीखा करते। मंच पर चढ़कर काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण पढ़ता छात्र नेता किसी नैपोलियन सा ही प्रतीत होता। काफ्का कांडपाल का लिखा भाषण लहरों को मोड़ देने का दमखम रखता था।

काफ्का कांडपाल अच्छी खासी कमेंट्री भी कर लेने वाला ठैरा। उसकी आवाज में अलग ही जादू जो हुआ। उसके पास शब्दों का अनमोल भंडार होने वाला ठैरा। नैनीताल की ठंडी हवाओं में हॉकी और फुटबॉल को लेकर अलग ही पागलपन बहने वाला ठैरा। लोग पागल ठैरे इन खेलों के लिए। जब भी सैनिक स्कूल या सेंट जोसेफ की स्कूल टूर्नामेंट में उतरती, हाड कंपाने वाली ठंड हों या बरसात, हजारों की संख्या में लोग बच्चों का मैच देखने पहुँचते।

जब भी नैनीताल की झील से लगे बड़े मैदान में क्रिकेट या फुटबॉल के मैच खेले जाने वाले हुए, काफ्का कांडपाल ही कमेंट्री के लिए सबकी पहली पसंद होने वाला हुआ। मैच शुरू होते ही काफ्का कांडपाल अपनी अंग्रेजी की रानीखेत एक्स्प्रेस दौड़ा देता। क्या जो शब्द, क्या जो आवाज का उतार चढ़ाव होने वाला हुआ ठैरा; अहा!

काफ्का कांडपाल अब बूढ़ा हो गया है। काफ्का कांडपाल अब चीज़ें भूलने लगा है। पिछले शनिवार वो लौटते वक्त टम्टा जी के घर को अपना घर समझ,वहाँ जाकर चारपाई पर लेट गया था। फिर टम्टा जी का बड़ा लड़का उन्हें घर छोड़ कर आया। बूढ़ा हो जाने पर लोग आपको भूलने लग जाते हैं। नैनीताल अब काफ्का कांडपाल को भुलाने लगा है। नैनीताल की नई पौध अपने हीरे को नहीं पहचानती। मगर, पुराने लोग इस हीरे का मोल बखूबी जानते हैं।

काफ्का कांडपाल रोज सुबौ उठ के घर से झील का रास्ता पकड़ कर तल्लीताल को आता है। वहाँ आकर वो बस अड्डे के पास चाह की गुमटी पर जाकर चाह और एक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार लेकर झील किनारे धूप के टुकड़े इकट्ठा करने बैठ जाता है।

झील किनारे तफरीह करने वाले उम्रदराज लोग उसको घेर लेते हैं। वो सभी जानते हैं बूढ़ा होता जा रहा काफ्का कांडपाल एक रोज सब भूल जाएगा, मगर वो अपने पसंदीदा लेखकों का लिखा साहित्य कभी नहीं भूलेगा। वह फुटबॉल का मोह आज भी नहीं छोड़ सका है। लोगों को

काफ्का कांडपाल, उनके जिद करने पर, उन्हें बार्सिलोना, रियाल मैड्रिड, मैनचेस्टर यूनाइटेड आदि क्लबों के मैचों के किस्से सुनाया करता है।। फिर इधर उधर की बातें चलती हैं। बस अड्डे पर चाय बेचने वाले नेगी की चांदी हो जाती है। यह बुड्ढे ही रोज पांच सौ की चाय उससे पी जाते हैं। यूँ ही, झील किनारे, एक और दिन फुटबॉल की बातों के साथ ढल जाता है।

खैर, नैनीताल और उसके फुटबॉल प्रेम की बात फिर कभी। आज अब आगे बात कर लेते हैं फीफा विश्व कप के क्वार्टर फाइनल दौर के मुकाबलों की।

बीती रात बोस्टन स्टेडियम में पहला क्वार्टर फाइनल मुकाबला खेला गया जहाँ शानदार फॉर्म में चल रही मोरक्को का सामना था पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस से। तमाम फुटबॉल पंडितों को उम्मीदें थी कि मोरक्को अंत तक हार न मानने का जज़्बा लिए मैदान में उतरेगी और फ्रांस को कठोर टक्कर देगी। दोनों ही टीमें पिछले विश्व कप में भी दोनों ही टीमें सेमीफाइनल में आमने-सामने थीं।

फ्रेंच कोच दीदीएर देशाँ ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। अटैकिंग लाइन में थे घातक फॉर्म में चल रहे एमबाप्पे, डेंबेले व युवा सनसनी देसिरे दोउ। मिडफील्ड का जिम्मा संभाला था माइकल ओलीस़ संग आद्रियन राबियो और मानू कोने ने। रक्षापंक्ति में सलिबा संग उपामेकानो, जूल्स कूंदे व लुका डीने मौजूद थे। मोरक्को भी इस ही फॉर्मेशन के साथ मैदान पर उतरी थी। पिछले मैचों में बेहद जुझारू फुटबॉल खेली थी इस टीम ने। अचरफ हाकीमी के नेतृत्व में मोरक्को का हर खिलाड़ी मैदान में अपना सबकुछ झोंक देता है। प्रमुख रेफरी फाकुन्दो टेल्लो से इशारा मिलते ही पहले क्वार्टर फाइनल मुकाबले की शुरुआत हो जाती है।

लेस ब्ल्यूज़ शुरुआत से ही लगातार हमले करने लगती है। देसिरे दोउ गोल की दिशा में एक जोरदार शॉट लगाते हैं। ऐसे ही लगातार फ्रेंच टीम बारम्बार गोल मारने के प्रयास कर रही थी। जल्द ही इन प्रयासों का फायदा मिलता भी दिखता है।

एक फाउल के चलते मैच के पच्चीसवें मिनट में फ्रांस को पेनाल्टी दे दी जाती है। शांत चित्त से कीलिएन एमबाप्पे पेनाल्टी स्पॉट की दिशा में बढ़ते हैं। वह पेनाल्टी लेने के लिए तैयार थे। सामने गोलपोस्ट पर अनुभवी गोलकीपर यासीन बोनू खड़े थे। रेफरी व्हिस्ल बजाते हैं। एमबाप्पे किक लेने के लिए दौड़ लगाते हैं। वह गोलपोस्ट की बांई ओर जोरदार किक लगाते हैं। लेकिन मोरक्को के सजग प्रहरी यासीन बोनू इस किक को गोलपोस्ट के भीतर जाने से रोका लेते हैं। आश्चर्यजनक तरीके से एमबाप्पे पेनाल्टी मिस कर चुके थे। खैर खेल आगे बढ़ता है। जूल्स कूंदे व माइकल ओलीस़ फिर फ्रांस को बढ़त दिलाने के लिए कोशिश करते हैं परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 0-0 ही था।

दूसरे हाफ में भी फ्रेंच तूफान जारी रहता है। नतीजतन साठवें मिनट में स्टार खिलाड़ी कीलिएन एमबाप्पे एक बेहद खूबसूरत गोल लगा देते हैं। देसिरे दोउ से गेंद मिलते ही वह खूबसूरत अंदाज में गोलपोस्ट की टॉप-लेफ्ट दिशा में एक किक जड़ते हैं। अब की दफा गोलकीपर यासीन बोनू के पास एमबाप्पे की किक का कोई जवाब नहीं था।

छह मिनट पश्चात डेंबेले अकेले ही गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं व बॉक्स के बाहर से ही गोलपोस्ट की बाँई ओर शॉट लगाते हैं। यासीन बोनू एक दफा फिर अपने बाँई ओर गोल का चुके थे। छह मिनटों में दागे गए दो गोलों के चलते स्कोर 2-0 हो गया था।

फ्रांस ने इस मैच में यासीन बोनू के गोलपोस्ट की दिशा में बाइस दफा शॉट लगाए जिसमें से नौ शॉट निशाने पर रहे। पिछले विश्व कप की ही भांति एक बार फिर फ्रांस ने मोरक्को को 2-0 से पटखनी दे दी थी। फ्रांस इस जीत के साथ सेमीफाइनल में जगह बना चुका था। लेस ब्ल्यूज़ का विजय रथ रोकने वाला हर प्रयास अबतक बेअसर ही साबित हुआ है।

अब आज देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे बेहतरीन फॉर्म में चल रही बेल्जियम की टीम 2010 विश्व कप की विजेता स्पेन के सामने खड़े होगी। दांव पर होगी पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस के खिलाफ सेमीफाइनल की एक सीट।

लॉस एंजेलिस स्टेडियम में होने जा रहे इस मैच में एक ओर बेल्जियम है जो धीमी शुरुआत के बाद अब अपने पिछले तीन मैचों में बारह गोल दाग चुकी है। चार्ल्स डि किटिलीरी, कप्तान यूरी टीलमान्स व लियान्द्रो ट्रोसार्ड अबतक दो दो गोल दाग चुके हैं। वहीं लुकाकू बेंच से आने के बावजूद अबतक तीन गोल स्कोर कर चुके हैं।

वहीं दूसरी ओर है स्पेन की टीम जिन्होंने अबतक इस विश्व कप के अपने पाँच मैचों में विरोधी टीमों को अपने खिलाफ एक भी गोल नहीं दागने दिया है। स्पेन के कोच लुई डे ला फुएन्ते के लिए चिंता का विषय यह होगा कि फॉरवर्ड लाइन के खिलाड़ी टीम के लिए गोल स्कोर करने में असमर्थ रहे हैं। वहीं रेड डेविल्स की खासियत यह है कि उनके बेंच पर बैठे खिलाड़ी भी मैदान पर आकर गोल दागने की काबिलियत रखते हैं।

आज एक बेहतरीन डिफेंस का सामना एक घातक अटैकिंग टीम से होगा। यह निश्चित रूप से एक बेहतरीन मैच होगा। जुनून अपने चरम पर होगा। तैयार रहिए एक अच्छी फुटबॉल प्रतियोगिता देखने के लिए।

अब माँ बगलामुखी शक्तिपीठ में चढ़ावा चोरी, 3 साल तक फर्जी समिति लेती रही चंदा: जानें क्या है पूरा विवाद और इस मंदिर की मान्यताएँ?

मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के नलखेड़ा में स्थित प्रसिद्ध माँ बगलामुखी मंदिर में दान संग्रह को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद सामने आया है। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर चल रहे विवाद के बीच इस सिद्धपीठ में भी दान और चढ़ावे के कथित गबन का आरोप लगा है।

आरोप है कि मंदिर के नाम पर एक अशासकीय यानी फर्जी प्राइवेट समिति बनाकर श्रद्धालुओं से नकद राशि और सोने-चाँदी के आभूषण दान के रूप में लूटे गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए आगर-मालवा की जिला कलेक्टर प्रीति यादव ने 7 जुलाई 2026 को तीन सदस्यीय जाँच समिति का गठन कर दिया है।

यह समिति 7 दिन के भीतर पूरे मामले की जाँच कर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर कार्यालय में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, मंदिर परिसर में शासकीय प्रबंधन समिति से अलग एक गैर-सरकारी समिति काम कर रही थी।

यह समिति मंदिर परिसर में ही श्रद्धालुओं से नकद, सोना और चाँदी दान के रूप में एकत्रित कर रही थी। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह सामने आई कि चढ़ावे की इस राशि को सरकारी खजाने में जमा करने के बजाय निजी बैंक अकाउंट में भेजा जा रहा था। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वित्तीय रिकॉर्ड में भारी हेराफेरी की गई। श्रद्धालुओं को गुमराह करने के लिए फर्जी रसीदें भी बांटी जा रही थीं।

अफसरों की मिलीभगत से साल 2024 में बनी प्राइवेट समिति

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, माँ बगलामुखी मंदिर प्रबंध समिति के नाम से पहले से ही एक आधिकारिक सरकारी समिति मौजूद है। चूंकि यह मंदिर पूरी तरह सरकारी प्रबंधन के अधीन है, इसलिए इसके पदेन अध्यक्ष इलाके के SDM यानी डिप्टी कलेक्टर होते हैं और इसके सचिव तहसीलदार होते हैं। मंदिर के रोजमर्रा के कामों का संचालन आउटसोर्स कर्मचारियों के माध्यम से किया जाता है।

प्रशासनिक अधिकारी समय-समय पर इसका निरीक्षण भी करते हैं। इसके बावजूद साल 2024 में कथित तौर पर अफसरों की मिलीभगत से नियम विरुद्ध जाकर ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ नाम की एक प्राइवेट समिति बना दी गई। इस फर्जी समिति के प्रमुख पाँच सदस्य पूरी तरह से प्राइवेट लोग हैं। यह फर्जी समिति करीब तीन साल से अफसरों के सामने ही लोगों से खुलेआम दान ले रही थी।

मंदिर परिसर में सात शिलालेख लगे हुए हैं। इन शिलालेखों पर 170 उन लोगों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने चाँदी दान की थी। इसके बाद कितने लोगों ने चढ़ावा दिया, इसका कोई भी रिकॉर्ड न तो मंदिर में मौजूद है और न ही जिला प्रशासन को सौंपा गया है। इस फर्जी समिति के निर्माण के समय डिप्टी कलेक्टर मिलिंद ढोके वहाँ के SDM थे। उन्हीं के सामने यह समिति बनी और काम करती रही, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।

दिलचस्प बात यह है कि ढोके ने खुद भी 1 किलो चाँदी दान की थी, जिसका जिक्र मंदिर के शिलालेख पर है। शिलालेख में दूसरे और तीसरे नंबर पर तत्कालीन SDM और तहसीलदार के दान देने की बात साफ लिखी है। उनके बाद आए 2 अन्य SDM सर्वेश यादव और कमल मंडलोई ने भी इस अवैध वसूली पर कोई एक्शन नहीं लिया। इस समिति का आज तक कोई ऑडिट भी नहीं हुआ है। हालाँकि समिति के सदस्यों का दावा है कि तत्कालीन SDM की देखरेख में ही समिति का बाकायदा रजिस्ट्रेशन कराया गया था।

रजत सौंदर्यीकरण के नाम पर संगठित वसूली

पड़ताल के दौरान इस प्राइवेट समिति की रसीद भी हाथ लगी है। इस रसीद पर समिति का नाम और उसका उद्देश्य ‘रजत सौंदर्यीकरण करना’ लिखा हुआ है। इसी बहाने से मंदिर के गर्भगृह का चाँदी से सौंदर्यीकरण किया जा रहा है और बाहर भी चाँदी की सीटें लगाई जा रही हैं।

जिला प्रशासन के एक अधिकारी ने बताया कि यह मामला काफी बड़ा हो सकता है क्योंकि यह पूरी तरह संगठित तरीके से चल रहा था। नकली रसीदें और अलग काउंटर बनाकर श्रद्धालुओं से नकद और गहनों के रूप में दान लिया जा रहा था। वर्तमान में इस कथित दान घोटाले में कुल कितनी रकम की हेराफेरी हुई है, इसका पूरा हिसाब लगाया जाना बाकी है।

सरकार ने दिए सख्त कार्रवाई के निर्देश

मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि उन्हें 7 जुलाई 2026 को इस मामले की जानकारी मिली थी। इसके तुरंत बाद उनके कार्यालय ने जिला कलेक्टर को कड़ी जाँच के निर्देश जारी किए। मंत्री ने साफ कहा कि कुछ लोग, जिनका मंदिर प्रशासन से कोई सीधा संबंध नहीं था, वे मंदिर के नाम पर रसीदें छपवाकर श्रद्धालुओं से अवैध तरीके से पैसे वसूल रहे थे।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस मामले में शामिल किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा और सरकार दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करेगी। कलेक्टर प्रीति यादव द्वारा बनाई गई 3 सदस्यीय जाँच समिति की अध्यक्षता जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी CEO बीएस सोलंकी कर रहे हैं।

इस समिति में जिला कोषालय अधिकारी मनीष सोलंकी और नलखेड़ा नगर परिषद की मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिनी अग्रवाल को सदस्य बनाया गया है। यह टीम फिलहाल मंदिर पहुँचकर सारे दस्तावेज खंगाल रही है और मुख्य रूप से चार बिंदुओं पर जाँच कर रही है।

मंदिर में कुल कितना चढ़ावा आया और उसे सरकारी खजाने में क्यों नहीं जमा कराया गया? गर्भगृह की सजावट में वास्तव में कितनी चांदी का इस्तेमाल हुआ? समिति ने अब तक कितने लोगों से चढ़ावा लिया और उसका लिखित रिकॉर्ड कहाँ है? मंदिर सरकारी होने और उसकी अपनी समिति होने के बाद भी प्राइवेट लोगों की समिति बनाना कितना सही है?

मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था और दान पेटियाँ

शासकीय प्रबंध समिति की ओर से मंदिर में कुल 27 दान पेटियाँ रखी गई हैं। इसके अलावा ऑनलाइन तरीके से भी श्रद्धालुओं से दान राशि जमा कराने की व्यवस्था की गई है, जहाँ पॉइंट ऑफ सेल यानी POS मशीन से पक्की रसीद दी जाती है। इसी वजह से इस फर्जी समिति के गठन और उसमें शामिल अधिकारियों की भूमिका पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से मंदिर परिसर में कुल 28 CCTV कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें से 4 कैमरे फिलहाल खराब पड़े हैं।

मंदिर में सुरक्षा गार्ड और सफाईकर्मी मिलाकर कुल 20 कर्मचारी प्रतिदिन तैनात रहते हैं। ये सभी दैनिक वेतनभोगी हैं, जिन्हें आधिकारिक मंदिर समिति वेतन देती है। इस विवाद के सामने आने के बाद ‘नलखेड़ा सुदर्शन सेवा समिति’ के अध्यक्ष मनोहरलाल पंडा या कोई भी सदस्य कुछ भी बोलने से इनकार कर रहे हैं। मनोहरलाल पंडा ने मोबाइल पर चर्चा के दौरान नलखेड़ा में होने से साफ मना कर दिया और वे मीडिया के सामने भी नहीं आ रहे हैं।

मंदिर में पिछले 9 साल से पूजा कर रहे पुजारी विशाल तिवारी ने कहा कि जिला प्रशासन को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच करनी चाहिए। अगर यह शिकायत गलत भी साबित होती है, तो भी संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो क्योंकि इस पूरे विवाद से विश्व प्रसिद्ध मंदिर की छवि धूमिल हो रही है।

प्रतिदिन दर्शन करने आने वाले भक्त कैलाश मकवाना का कहना है कि समिति में जो लोग हैं, वे सक्षम हैं और ऐसा नहीं कर सकते। मामले की जाँच चल रही है और जल्द ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। मैया सबको देख रही हैं और जो भी बेईमानी करेगा उसे सजा मिलकर रहेगी।

जानिए माँ बगलामुखी मंदिर का गौरवशाली इतिहास

नलखेड़ा में लखुंदर नदी के तट पर स्थित मां बगलामुखी मंदिर देश के प्रमुख और सबसे जाग्रत शक्तिपीठों में माना जाता है। यह पवित्र स्थल तंत्र साधना और अदालती मामलों में सफलता की कामना के लिए देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर धार्मिक एवं तांत्रिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। मंदिर में स्थित माँ बगलामुखी की मूर्ति पांडव कालीन मानी जाती है, जिसका स्पष्ट प्रमाण कालिका पुराण में मिलता है।

यह मंदिर 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में अज्ञातवास के समय पांडवों के वैभव खो जाने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें माँ बगलामुखी की साधना करने का निर्देश दिया था। पांडवों ने लखुंदर नदी के तट के समीप अपनी यात्रा को विश्राम दिया और माँ की घोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर माँ ने उन्हें दर्शन दिए और महाभारत युद्ध में विजयी होने का वरदान दिया।

इस मंदिर का वर्णन राजा विक्रमादित्य के काल में भी मिलता है। माँ बगलामुखी की यह अलौकिक मूर्ति किसी मानव द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह स्वयंभू यानी स्वतः प्रकट हुई मूर्ति है। मंदिर के पीछे बहने वाली लखुंदर नदी का पानी वर्ष भर रहता है, जो इसके प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाता है। नदी के किनारे कई संतों की समाधियाँ स्थित हैं, जिससे प्राचीन काल में यहाँ बड़ी संख्या में संतों के रहने का प्रमाण मिलता है।

मंदिर के चारों दिशाओं में श्मशान यानी मुक्तिधाम स्थित है, जो इसके एक सिद्ध तंत्र स्थल होने का पक्का सबूत है। मंदिर परिसर में 16 खंभों वाला एक सुंदर सभा मंडप बना हुआ है। इसका निर्माण संवत 1815 यानी 276 ईस्वी पूर्व पंडित ईबूजी दक्षिणी और कारीगर श्री तुलाराम ने करवाया था। इसी सभा मंडप में माँ की ओर मुख किए हुए एक कछुआ स्थापित है, जो यह दर्शाता है कि पुराने समय में यहाँ माँ को बलि चढ़ाई जाती थी।

मंदिर के ठीक सामने 32 फीट ऊँची दीपमाला स्थित है, जिसका निर्माण महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था। मंदिर प्रांगण में ही एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर, उत्तर मुखी राधा-कृष्ण मंदिर और पूर्व मुखी भैरव जी का मंदिर स्थित है। इस मंदिर का सिंहमुखी द्वार श्रद्धालुओं के बीच बेहद प्रसिद्ध है।

10 महाविद्याओं में से एक हैं माँ बगलामुखी

हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में 10 महाविद्याओं का विशेष स्थान है, जो दिव्य स्त्री शक्ति के विभिन्न रूपों को दर्शाती हैं। माँ बगलामुखी इन दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या हैं। सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा जी देवताओं और दानवों के आपसी बैर से बहुत व्यथित रहते थे। दानव अधिक शक्तिशाली और क्रूर थे, जिससे देवताओं की संख्या घटने लगी। देवताओं की रक्षा के लिए समुद्र मंथन से अमृत निकाला गया और भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर उसे देवताओं में बांट दिया।

इसके बाद भी दानव अपने योगबल से देवगणों पर विजय पाते रहे। तब ब्रह्मा जी भगवान शंकर के पास गए, जो माता पार्वती के साथ पर्वत पर विराजमान थे। ब्रह्मा जी ने कहा कि दानव शक्ति के आगे देव शक्तियाँ निर्बल बनी हुई हैं। इस पर भगवान शंकर के मुख से क्रोध के कारण एक महान तेज उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण लोकों में कंपन शुरू हो गया। इसके बाद वह तेज एक स्त्री के रूप में बदल गया। शिव की उग्र स्वरूपा होने के कारण इस देवी के शीश पर चंद्र जटित मुकुट और ललाट पर तीसरा नेत्र था।

देवी ने शरीर पर पीले वस्त्र धारण कर रखे थे और उनके एक हाथ में शत्रु की जिह्वा तथा दूसरे हाथ में प्रलयंकर गदा थी। यही शक्ति स्वरूप पूरे विश्व में माँ बगलामुखी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इन्हें वाणी, वाकपटुता और शत्रुओं को स्तंभित करने वाली देवी माना जाता है।

ये हैं 10 महाविद्याएँ और उनके मुख्य पहलू

काली: समय, परिवर्तन और विनाश की उग्र देवी जो दुख के चक्र से मुक्ति देती हैं। तारा: करुणा और सुरक्षा की देवी जो संकट के समय मार्गदर्शन करती हैं। त्रिपुर सुंदरी: सुंदरता और सर्वोच्च वास्तविकता का प्रतीक जो इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। भुवनेश्वरी: भौतिक ब्रह्मांड को बनाए रखने वाली और समृद्धि देने वाली माँ। छिन्नमस्ता: आत्म-बलिदान, अहंकार के विनाश और मानसिक नियंत्रण की देवी।

धूमावती: शून्यता और संकटों से आने वाले ज्ञान और बुद्धि की वृद्ध देवी। बगलामुखी: ज्ञान, अलौकिक शक्ति और शत्रुओं की वाणी पर नियंत्रण की देवी। मातंगी: कला, संगीत, रचनात्मकता और पारंपरिक सीमाओं से परे ज्ञान की देवी। षोडशी: पूर्णता, आंतरिक शांति और उच्च चेतना की दिव्य प्रतिमूर्ति। कमलात्मिका: धन, समृद्धि, उर्वरता और वित्तीय सफलता देने वाली माँ लक्ष्मी का रूप।

इस पवित्र मंदिर के गर्भगृह में माता तीन स्वरूपों में विराजती हैं। इसमें दाईं ओर महालक्ष्मी, बाईं ओर माँ सरस्वती और मध्य में माँ बगलामुखी के दर्शन होते हैं। मंदिर का गर्भगृह 3 करोड़ रुपए से अधिक मूल्य के स्वर्ण, करीब 65 लाख रुपए की चाँदी और बहुमूल्य आभूषणों से सुसज्जित है।

‘तुम्हारी गौमाता का मीट खा रहा हूँ… ग@#D में दम हो तो रोककर दिखाओ’: इंस्टा पर वायरल होने के लिए हैदर अली के घटिया कंटेंट का काला चिट्ठा, हर वीडियो में हिंदुओं को देता है चुनौती

हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करना अब कुछ लोगों के लिए सोशल मीडिया पर वायरल होने की ट्रिक बन गई है। केरल में रहकर मजदूरी करने वाला ‘हैदर अली’ नामक एक मुस्लिम क्रिएटर का मामला इसका ताजा और सटीक उदाहरण है, जिसने हिंदू समुदाय की आस्था की प्रतीक ‘गौमाता’ को लेकर न केवल घृणा का प्रदर्शन किया, बल्कि सुनियोजित तरीके से हिंदुओं को भड़काने के लिए एक के बाद एक कई वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए।

हैदर अली, एक ही महीने के भीतर ऐसी 13-14 से अधिक वीडियो डाल चुका है। इन वीडियोज में इसने क्या दिखाया आइए सिलसिलेवार ढंग से बताएँ…

इंस्टा पर akhaidar__ यूजर आईडी से मौजूद हैदर अली के पेज पर वर्तमान में 23.5K फॉलोअर्स हैं।

हैदर अली के इंस्टा पेज का स्क्रीनशॉट

गौमांस पर हिंदुओं को चिढ़ाने वाली वीडियोज उसने 16 मई से डालनी शुरू की थी। पहली वीडियो में उसने केवल गौमांस पकते हुए दिखाया और कैप्शन में ‘गाय का मीट’ लिखा।

इस वीडियो पर रीच मिलने के बाद उसने उसी दिन एक और वीडियो अपलोड की, जिसमें वह अपनी बीवी वाहिदा खातून (बताया जा रहा नाम) से पूछता है कि वह क्या कर रही है? इस पर उसकी बीवी कहती है कि वह गौमाता का मीट पका रही है।

इसके बाद दोनों हँसते हैं और हैदर बताता है – हम केरल में हैं और बीफ खाते हैं। इस वीडियो को 5 लाख से ज्यादा व्यूज और करीब 24.4K लाइक्स मिले।

16 मई (अन्य वीडियो): एक अन्य वीडियो में वह अपनी बीवी से पूछता है, “क्या गौमाता का मीट खत्म हो गया है?” उसकी बीवी हँसते हुए कहती है, “जितना लाए थे सब खत्म हो गया है।”

हैदर वीडियो में बताता है कि उन्होंने एक वीडियो डाली थी 5 लाख के व्यूज आए हैं, अब दोबारा ये देखो पार्ट 2।

16 मई (तीसरी वीडियो): गौमांस और चावल दिखाते हुए हैदर बंगाल की शुभेंदु सरकार को चुनौती देता है और कहता है- “अंधभक्तों मैं केरल में रहकर गौमाता का मीट खा रहा हूँ, अगर G@%d में दम हो तो इसे बंद करके दिखाओ।”

17 मई: इस दिन डाली गई वीडियो में वह ढिठाई दिखाते हुए कहता है, “हमारी गौमाता का मीट खाते हुए वीडियो वायरल हुई थी। अंधभक्तों ने हमें गाली दी। पहले हमारा मछली खाने का मन था लेकिन अब हम गौमाता को ही खाएँगे, इसलिए दोबारा लेकर आए हैं। देखों कैसे कटता है ये।”

इस वीडियो पर 5.5 लाख से ज्यादा व्यूज और 30 हजार लाइक्स आए।

17 मई (दूसरी वीडियो): अपनी बीवी को बीफ काटते और पकाते दिखाते हुए वह पूछता है कि क्या बना रही हो? बीवी हँसते हुए कहती है-गौमाता का मीट।

आगे हैदर कहता है, “अंधभक्तों देख लो, अब मैं वीडियो रोज बनाऊँगा। दम है तो केरल में गौमाता का मीट बंद करके दिखा। हम केरल में है। मैं रोज वीडियो डालूँगा। तुम्हारी G@$ड जलाने को।”

18 मई: इस वीडियो में हैदर कहता है, “मैं अभी तक आपको गाय पकाते हुए दिखाता था लेकिन अब मैं गौमांस खाते हुए दिखा रहा हूँ। मुझे फॉलो कर लो क्योंकि आपको ऐसे ही कंटेंट देखने को मिलेगा।”

20 मई: गौमांस से जुड़ी वीडियोज पर आए हिंदुओं के कमेंट्स देख वह कहता है- “अंधभक्तों आज तो मैं सुबह-सुबह ही जाकर बीफ ले आया। तुम मेरे कमेंट में आकर गाली-गलौच करते हो। तुम में दम हो तो केरल में इसे बैन करके दिखाओ।”

इस वीडियो पर उसे 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिले।

21 मई: इस दिन डाली गई वीडियो का कैप्शन था “मैं गौमांस के साथ रोटी खा रहा हूँ। अल्लाहू अकबर।”

इसमें वह कहता है- “अंधभक्तों देखो तुम्हारी गौमाता का मीट। बहुत टेस्टी है। किसे खाना है बताओ मैं लोकेशन बताऊँगा तुम आकर खाना।”

23 मई: कसाईखाने की वीडियो डालते हुए वह कहता है, “बहुत दिन से मछली खा खाकर थक गया था इसलिए अब गाय का मीट लेने आया हूँ। वीडियो जरूर शेयर होनी चाहिए क्योंकि इसे ही तो देखकर अंधभक्त जलेंगे।”

इसका कैप्शन था- “कसाई खाना पर गया था गाय का मीट लेने के लिए। अल्लाहू अकबर।”

23 मई (अन्य वीडियो): इसमें वह गौमांस खाने के लिए केरल की राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति को जस्टिफाई करता है। वह लिखता है- “केरल पर बीजेपी का सरकार नहीं है। इसीलिए केरल का मुसलमान भाई लोग गाय का मीट खा सकता। अगर केरल पर बीजेपी का सरकार होता तो केरल पर गाय का मीट मुसलमान भाई लोग का नहीं सकता था क्योंकि सरकार ने बंद करके रख दिया होता।”

वह आगे कहता है, “अगर गाय राष्ट्रीय पशु होता तो मुसलमान भाई लोग गाय का मीट नहीं खाता।”

24 मई: चूल्हे पर बीफ पकता हुआ दिखाते हुए वह कहता है- “अंधभक्तों देखो आज संडे और हम तुम्हारी गाय माता का मीट पका रहे हैं।”

24 मई (दूसरी वीडियो): असम और बंगाल के नियमों का जिक्र करते हुए वह कहता है- “असम और बंगाल में तो इस बार गौमाता की कुर्बानी देने के नाम पर रोक लगा दी गई है। अभी मैं केरल में हूँ तो बढ़िया गाय माता का मीट खा रहा हूँ। यहाँ कुर्बानी देने की भी बहुत बढ़िया व्यवसथा हुई है।”

28 मई: थाली में बीफ और रोटी खाते हुए वह कहता है- “ये देखो अंधभक्तों मैं तुम्हारी गौ माता का मीट रोटी के साथ खा रहा हूँ। आज हमारी ईद है और मैं तो तुम्हारी गौ माता का मीट जरूर खाऊँगा।”

29 मई: कसाईखाने में लटके हुए गाय के पैर और कटते हुए मीट को दिखाते हुए उसने कहा- “सुबह-सुबह मीट की दुकान पर मीट लेने गया था। आप लोग इस वीडियो को देखिए और मजे लीजिए ताकि अंधभक्त इसे देख सकें।”

31 मई: इस वीडियो में हैदर कहता है, “अंधभक्तों क्या हाल है, देखो तुम्हारी गाय माता का मीट बिक रहा है दुकान पर। मेरी छुट्टी थी तो मैं कसाई खाने आकर 2 किलो मीट ले लिया हूँ और वीडियो भी बना लिया हूँ ताकि तुम्हें दिखा सकूँ।”

कट्टरपंथी हैदर अली में कैसे आई ये हिम्मत?

गौरतलब है कि ये सिर्फ कुछ वीडियोज हैं। हैदर का इंस्टा पेज हिंदूघृणा वाले कंटेंट से भरा हुआ है। लोग इस इस्लामी कट्टरपंथी पर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक क्या एक्शन हुआ है इसका पता नहीं चला है। आखिरी वीडियो हैदर के चैनल पर 12 जून को डाली गई थी। उससे पहले तक वह लगातार हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अपमान करके सस्ती लोकप्रियता बटोरने में जुटा था।

वीडियो से साफ पता चलता है कि उसका मकसद खान-पान की आदतों को शेयर करना नहीं है, बल्कि हिंदुओं के लिए ‘अंधभक्त’ जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल करना और जानबूझकर ‘तुम्हारी गौमाता” कहकर चिढ़ाना है, जो साफ करता है कि यह एक सोची-समझी हिंदुओं के प्रति घृणा है।

उसके चैनल को देख साफ पता चलता है कि गौमांस पर बनाई पहली वीडियो जब पर व्यूज और लाइक्स की संख्या लाखों पार की तो हैदर के भीतर का कट्टरपंथी अपनी हकीकत सोशल मीडिया पर दिखाने से झिझका नहीं। हिंदुओं के आलोचना करने पर वह उन्हें ‘अंधभक्त’ कह कहकर घृणा दिखाने लगा। उसे लगा कि इसी से वह वायरल होगा। उसने ‘गौ माता का मीट’ लाइन को उसने अपनी वीडियोज की रीच बढ़ाने का कीवर्ड समझ लिया।

हैरानी इस बात की है कि मेटा ने लगातार कम्युनिटी गाइडलाइंस की धज्जियाँ उड़ने पर भी इस अकॉउंट पर संज्ञान नहीं लिया। खबर लिखने तक उसका हैंडल पब्लिक है। वह लगातार हिंदुओं को चुनौती दे रहा है कि बीफ को बैन कराकर कोई दिखाए, अगर नहीं कर सकते तो वो ऐसे ही खाकर वीडियो बनाता रहेगा।

गुजरात के जावेद की टेढ़ी हड्डियाँ, ₹4 करोड़ का सालाना खर्च और PAK के ‘रैट चिल्ड्रन’: करीबी रिश्तों में निकाह से पैदा होता स्वास्थ्य संकट, जानें- क्या है जेनेटिक बीमारी MPS

मुस्लिम समाज में आपसी रिश्तदारों में निकाह आम है। ऐसे दंपति के बच्चों में आनुवांशिक बीमारियाँ ज्यादा होती हैं, क्योंकि दोषपूर्ण जीन होने की संभावना बढ़ जाती है। गुजरात का जावेद भी ऐसे ही आनुवांशिक बीमारी से जुझ रहा है। उसके अब्बू मोहम्मद आजी ने अपनी खाला की बेटी से निकाह किया था। नतीजतन जावेद को MPS IV नाम की आनुवांशिक बीमारी हो गई। 18 साल से वह हर दिन मौत की दुआ माँगते हुए जीता है। उसकी बहन भी ऐसी ही बीमारी से ग्रसित है। लेकिन वह चल फिर पाती है।

पाकिस्तान में माना जाता है कि करीब 80 फीसदी निकाह फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में होता है। इसलिए यहाँ आनुवांशिक बीमारियों के मरीज भी ज्यादा हैं। हालात तो ये है कि माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को ‘रैट चिल्ड्रन’ कह कर उनका शोषण भी किया जाता है।

दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है जावेद

गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले 26 साल के जावेद को म्यूकोपोलीसेकेरिडोसिस टाइप IV बीमारी है। जन्मजात होने वाली इस बीमारी का पता बच्चे में तुरंत नहीं चलता। कई बार 2-4 साल में उसके लक्षण दिखते हैं। लेकिन कई बार 7-8 साल तक इसका पता चलता है। 8 साल की उम्र में जावेद को इसका पता तब चला जब वह क्रिकेट खेलते-खेलते गिर गया और दर्द से कराहने लगा। जब उठाने की कोशिश की गई लेकिन उसे उठाया नहीं जा पा रहा था।

टीचर को उसने रोते हुए कहा कि उसके घुटने और पैरों में काफी दर्द है। टीचर ने उसके अम्मी अब्बू को फोन किया। उनके पहुँचने पर जावेद को अस्पताल ले जाया गया। उसे दवा देकर भेज दिया गया। डॉक्टरों को लगा कि गिरने से उसकी मासपेशियाँ खिंच गई होंगी। लेकिन घर पहुँचने पर उसकी स्थिति ठीक होने के बजाय बिगड़ गई। जब वह उठ नहीं पाया तो मौलवी के पास भी उसके अब्बू दौड़े और उसे 10 हजार रुपए का तेल दिया लेकिन वह भी बेकार गया। 18 साल से इसी तरह वह बेड़ पर पड़ा है।

दरअसल उसे काफी रेयर बीमारी म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 (Mucopolysaccharidosis Type 4 या MPS IV) हो गई है। यह जेनेटिक बीमारी होती है और करीबी रिश्ते में जब शादियाँ होती हैं, तो उनके बच्चों में ये बीमारी होने की आशंका होती है। यही वजह है कि जावेद की बहन भी इसी बीमारी की शिकार है। उसके ज्वाइंट पर दर्द रहते हैं, घुटने-केहुनियाँ में सूजन आती है। उसकी हालत जावेद से बेहतर है, लेकिन उसका निकाह नहीं हो पा रहा है।

राँची की डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, MPS कई तरह की होती है। कई MPS के मरीजों को हड्डियों के टेढ़े-मेड़े होने, सिर बढ़ा होने, पैर में कमजोरी, कम उम्र में बूढ़ा होना, आँखों, ह्रदय, साँस लेने में तकलीफ, गर्दन छोटी होना, पसलियों का टेढ़ा होना, दाँतों में खराबी समेत दूसरी दिक्कतों के साथ-साथ मानसिक बीमारी भी हो जाती है। लेकिन MPS 4 में सारी दिक्कत शारीरिक होती है। ऐसे मरीज की उम्र भी ज्यादा नहीं होती।

क्या होता है मॉर्कियो सिंड्रोम

म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप 4 या मॉर्कियो सिंड्रोम (Morquio syndrome) एक दुर्लभ आनुवंशिक और जन्मजात बीमारी है। यह किसी संक्रमण या खान-पान से नहीं होती, बल्कि माता-पिता के दोषपूर्ण जीन के कारण होती है। आपसी रिश्तों, जैसे चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में जब शादियाँ होती हैं, तो इसकी संभावना काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि मुस्लिम देशों में ऐसे बीमारियों के मरीज ज्यादा मिलते हैं।
दरअसल यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव (Autosomal Recessive) बीमारी है यानी माता-पिता जब आपसी रिश्तेवाले होते हैं तो दोनों में ऐसे जीन कैरी करने की संभावना होती है। ऐसे में उनके होने वाले बच्चों को ये बीमारी ज्यादा होती है।

लाइलाज है बीमारी

इस बीमारी को एंजाइम थेरेपी से थोड़ा ठीक किया जा सकता है लेकिन इसका खर्च काफी है। करीब 4 करोड़ रुपए सालाना खर्च आता है। इसलिए जावेद का इलाज नहीं हो पा रहा। इस बीमारी में शरीर में कुछ विशेष एंजाइम नहीं बनते। इसके कारण ग्लाइकोसामिनोग्लाइकैन (GAGs) नामक पदार्थ शरीर में जमा होने लगता है। धीरे-धीरे यह हड्डियों, जोड़ों, हृदय, आँखों और दूसरे अँगों को नुकसान पहुँचाता है, इसलिए जावेद 26 साल में 90 साल का हो गया है यानी उसकी हड्डियाँ उतनी कमजोर है कि तेजी से उठने बैठने पर भी टूट जाती है।

वह दर्द से तड़पता है। टेडी मेड़ी हड्डियाँ शरीर के ऊपर से दिखती हैं। बिस्तर से उठना मुश्किल होता है। उठते ही लुढ़क जाता है। जन्मजात बीमारी है। दो महीने का होने पर शरीर सूखने लगा था। शरीर बदन के मुकाबले काफी बड़ा दिखता है। चलते फिरते गिर जाता है। पैर काफी कमजोर। स्कूल छुड़ाना पड़ा क्योंकि दूर भेजना मुश्किल था। एक दिन ट्यूशन गया तो रास्ते में गिर गया। केहूनी घुटने में चोट लगी। इसके बाद वह भी छूट गया। 26 साल की हालत में हड्डियों की हालत 90 साल वाली हो गई है।

डॉक्टर श्वेता शेखर के मुताबिक, ये बीमारी लाइलाज है यानी इसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन मरीज को तड़पने से बचाने के लिए एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी कराई जा सकती है। इसके अलावा ऑर्थोपेडिक सर्जरी, फिजियोथेरेपी, हार्ट और दूसरे अँगों का समय समय पर चेकअप कराना, सांस लेने में अगर दिक्कत आए तो उसे डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। यहाँ तक कि कई बार स्पाइनल सर्जरी की भी जरूरत महसूस की जा सकती है।

कई बीमारियों को न्योता देता है करीबी रिश्तों में होने वाली शादियाँ

करीबी रिश्तेदारों में विवाह से किसी एक बीमारी का नहीं, बल्कि कई ऑटोसोमल रिसेसिव रोगों का जोखिम बढ़ जाता है। यही वजह है कि दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय दूसरी जैनेटिक बीमारियों से भी परेशान हैं। इनमें MPS के अलग-अलग प्रकारों मसलन MPS 1, MPS IV, MPS IVA, MPS IVB के अलावा बेटा थैलिसीमिया, सिकल सेल डिजीज यानी एससीडी, सिस्टिक फाइब्रोसिस, स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी, फेनिलकेटोनुरिया, टे-सैक्स रोग समेत कई दुर्लभ मेटाबॉलिक बीमारियाँ शामिल हैं।

पाकिस्तान का बुरा हाल

पाकिस्तान की करीब 80 फीसदी जनसंख्या मुस्लिम है। यहाँ चचेरे-ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों (फर्स्ट कजन) के बीच निकाह आम है। माना जाता है कि करीब 60% से 65% निकाह आपसी रिश्तों में होते हैं। कहा जाता है कि इससे ‘बेटियाँ घरों में रह जाएँगी’। रिश्तेदारों में निकाह का खामियाजा अगली पीढ़ी भुगतती है, जब बच्चा जेनेटिक बीमार से ग्रस्त पैदा होता है।

पाकिस्तान में ऐसे मरीजों का कोई राष्ट्रीय डेटा मौजूद नहीं है लेकिन कराची के आगा खान यूनिवर्सिटी अस्पताल, लाहौर के चिल्ड्रन अस्पताल , इस्लामाबाद के जिला केन्द्र पर ऐसे मरीज ज्यादा आते हैं। दरअसल जागरूकता और इलाज छोटे-छोटे शहरों में मौजूद ही नहीं है। ऐसे में बड़े शहरों के कुछ केन्द्रों पर ही मरीज के लिए आना मजबूरी है।

कराची के एक अध्ययन के मुताबिक, सिंध प्रांत में आनुवांशिक बीमारियों में MPS से पीड़ित 90 रोगियों में मोरक्वियो सिंड्रोम MPS IV के मरीज थे। इसके अलावा पंजाब, बलूचिस्तान जैसे प्रांत में एमपीएस के अलावा दूसरे मरीजों की संख्या ज्यादा थी।

पाकिस्तान के डॉक्टर आपसी रिश्तों में होने वाले निकाह के खिलाफ हैं। इनका मानना है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जहाँ फर्स्ट कजिन और सेकेंड कजिन में निकाह सबसे ज्यादा होता है। ऐसे में आनुवांशिक बीमारियों के होने का खतरा भी यहाँ ज्यादा है। इसको लेकर देश में जागरूकता बढ़ाने की बात भी डॉक्टर कहते हैं।

पाकिस्तान के ‘रैट चिल्ड्रन’ शोषण के शिकार

पाकिस्तान सिर्फ आनुवांशिक बच्चों को पैदा ही नहीं करता बल्कि उनका शोषण करने में भी अव्वल है। यहाँ आनुवांशिक बीमारी माइक्रोसेलफी से पीड़ित बच्चों को रैट चिल्ड्रन के नाम से शोषण होता है। ऐसे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे बच्चों को ‘शाह डोला के चूहे’ माना जाता है। इनको दरगाह से जुड़े लोग और आसपास के गैंग भिखारी बनाते हैं और देश भर में भीख मँगवाते हैं।

इतना ही नहीं, ठीक बच्चों को रैट चिल्ड्रन बनाकर देश भर में भीख मँगवाया जाता है। दरअसल अंधविश्वास और रूढिवादिता से ग्रसित निसंतान दंपति शाह दौला की दरगाह पर मन्नत माँगने आते हैं। उनके लिए बच्चा पैदा होने पर पहले बच्चे को दरगाह को सौंपना अनिवार्य होता है। बताया जाता है कि अगर ऐसा नहीं किया तो आने वाले बच्चे विकृति वाले होंगे। इसके बाद जब दंपति अपने बच्चों को दरगाह को सौंप देते हैं तो उन्हें फिर जिंदगी में मिलना का मौका नहीं दिया जाता। बच्चा मिलने के बाद उन्हें ‘कृत्रिम माइक्रोसेफली’ का शिकार बनाया जाता है, जिसमें खोपड़ी के सामान्य विकास को रोकने के लिए उनके सिर पर लोहे की पट्टी बाँध दी जाती है।

इन अभागे बच्चों को हरे रंग के वस्त्र पहना कर दरगाह के आसपास भीख माँगने के लिए मजबूर किया जाता है। तीर्थयात्री यह सोचकर चिंतित रहते हैं कि अगर उनकी उपेक्षा की जाए तो उनका बुरा हाल हो सकता है, इसलिए वे बच्चों के भीख के कटोरे में नकद और सिक्के भर देते हैं। माता-पिता के संरक्षण से वंचित ये अशिक्षित बच्चे दरगाह प्रशासन की दया पर निर्भर रहते हैं। बच्चों को ‘नकली चूहे’ बना कर भीख मँगवाया जाता है।

‘सतलुज’ ने उतार दिया मुखौटा: दिलजीत दोसांझ की ‘ग्लोबल सुपरस्टार’ वाली छवि के पीछे छिपी राजनीति बेनकाब, ऑपइंडिया ने पहले ही दी थी चेतावनी

वर्षों से दिलजीत दोसांझ को एक सीधे-सादे, ग्लोबल पंजाबी स्टार के रूप में पेश किया जाता रहा है। एक गायक, एक अभिनेता और एक सॉफ्ट स्पोकन हस्ती जिन्हें लाखों लोग प्यार करते हैं।

एक ऐसा व्यक्ति जो पंजाब के बारे में गाता है और प्यार, किसानों तथा पहचान की बात करता है। लेकिन हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘सतलुज’ ने उस सच को सामने ला दिया है जिसे सालों के इमेज मैनेजमेंट ने पर्दे के पीछे छिपा रखा था।

‘सतलुज’: एक प्रोपेगैंडा फिल्म

‘सतलुज’ सिर्फ पंजाब के उग्रवाद के दौर की बात करने वाली फिल्म नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य बहुत गहरा है। यह फिल्म सालों तक अटकी रही क्योंकि इसमें छिपी राजनीतिक को लेकर तरह-तरह के सवाल थे।

शुरुआत में इस फिल्म का नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार) रखा गया था। यह नाम और इसके कुछ दृश्य केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को रास नहीं आए। इसके बाद नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया और आखिरकार बनने के तीन साल बाद यह रिलीज हो सकी।

इस फिल्म को 3 जुलाई को Zee5 OTT प्लेटफॉर्म पर बिना किसी शोर-शराबे के ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। लेकिन 6 जुलाई को बिना किसी सटीक कारण बताए इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह फिल्म केवल भारतीय दर्शकों के लिए गायब हुई है, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए नहीं, Zee5 का अंतरराष्ट्रीय पोर्टल इसे अब भी दिखा रहा है। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने इस मामले की जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।

समस्या यह नहीं है कि फिल्म पंजाब में पुलिस की ज्यादतियों की बात करती है, किसी भी ईमानदार समाज में ऐसे मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए। समस्या ‘सतलुज’ में पंजाब के उग्रवाद के दौर को पेश करने के तरीके से है।

फिल्म में खालिस्तानी आतंकवादियों और सिख चरमपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाया गया है जबकि भारतीय राज्य (सरकार/प्रशासन) को इकलौते विलेन के रूप में दिखाया गया है।

जब फिल्म में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या को दिखाया गया, तो उसे ‘बदले’ के रूप में दिखाया किया गया। जो लोग पंजाब उग्रवाद के इतिहास को नहीं समझते, वे इसका पूरा संदर्भ गलत समझ लेंगे। इस संदर्भ को अगर फिल्म की नजर से देखे तो उसको ऐसे दिखने की कोशिश की गई है कि वो कार ब्लास्ट सही था और वो बदला भी।

इसके अलावा जसवंत सिंह खालरा द्वारा इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने के फैसले ने उस समय के भारतीय अधिकारियों को बेहद खराब रोशनी में दिखाया। KPS गिल, जिन्होंने पंजाब में उग्रवाद को सचमुच खत्म कर दिया, उन्हें ‘IPS बिट्टा’ नामक एक बुरे पुलिस वाले के रूप में दिखाया गया।

फिल्म में हिंदुओं की हत्याओं को कोई जगह नहीं मिली, यहाँ तक कि एक साधारण संदर्भ भी नहीं दिया गया। सख्त पुलिस कार्रवाई के पीछे की वजह कभी नहीं समझाई गई और न ही यह संकेत दिया गया कि कैसे खालिस्तानी आतंकवादी हिंदुओं, उग्रवाद का विरोध करने वाले सिखों, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर रहे थे।

ऑपइंडिया ने वर्षों पहले इस पैटर्न को किया था चिन्हित

इस मोड़ पर दिलजीत की राजनीतिक विचारधारा प्रासंगिक हो जाती है। ऑपइंडिया वर्षों से कह रहा है कि उनकी सार्वजनिक छवि और उनका राजनीतिक संदेश आपस में मेल नहीं खाते।

2020 में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान यह साफ था कि आंदोलन को खालिस्तानी तत्वों ने हाईजैक कर लिया था। दिलजीत उनके पक्ष में सबसे मुखर सेलिब्रिटी आवाजों में से एक बनकर उभरे।

उन्होंने विरोध प्रोटेस्ट इकोसिस्टम पर सवाल उठाने वालों पर खुलकर हमला किया। इस अभिनेता-गायक को हमेशा की तरह लेफ्ट-लिबरल भीड़ द्वारा एक बहादुर पंजाबी ‘आइकन’ के रूप में सराहा गया।

जून 2020 में कॉन्ग्रेस के तत्कालीन लुधियाना सांसद रवनीत सिंह बिट्टू (जो बेअंत सिंह के पोते भी हैं) ने खालिस्तानी आतंकवादी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के गुरपतवंत सिंह पन्नू का समर्थन करने के लिए दिलजीत दोसांझ और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग की थी।

बिट्टू ने भारत-चीन आमने-सामने के दौरान SFJ के भारत-विरोधी रुख और सिख सैनिकों को लुभाने के उसके प्रयास की ओर इशारा किया था। ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी कि कैसे दिलजीत प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक अलगाववादी संगठन के समर्थन को लेकर निशाने पर आए थे।

ऑपरेशन ब्लूस्टार से लेकर जगतार सिंह जोहल तक

दिलजीत का विवादों से पुराना नाता रहा है। फिल्म ‘पंजाब 1984’ के लिए उनके द्वारा गाए गए गाने ‘रंगरुत’ के बोलों के बाद भी उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें खुलकर बंदूकें उठाने और (1984 का) बदला लेने की बात कही गई थी।

गाने के बोल हैं ‘सोधा जालमा नु लाउना एके-47इया ने’ जिसका अनुवाद है ‘AK-47 अत्याचारियों से हिसाब चुकता करेगी’। कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू ने तब उन पर ऑपरेशन ब्लूस्टार के 36 साल बाद शांति भंग करने का आरोप लगाया था।

इसके बाद खालिस्तानी आतंकवादी जगतार सिंह जोहल के लिए उनका समर्थन आया, जिसका नाम हिंदू और RSS नेताओं की हत्या के मामलों में NIA की चार्जशीट में है। जोहल को ब्रिगेडियर जगदीश कुमार गगनेजा, रविंदर गोसाईं, अमित शर्मा और अन्य की हत्या के मामले में आरोपित बनाया गया है।

दिलजीत ने जोहल के लिए प्रताड़ना के दावों और निष्पक्ष सुनवाई की बात की थी। हालाँकि निष्पक्ष सुनवाई हर किसी का कानूनी अधिकार है, लेकिन दिलजीत के समर्थन में यह चुनिंदा जल्दबाजी साफ दिखाई दे रही थी। जब पंजाब में हिंदू नेताओं की हत्या की जा रही थी, तब इस सेलिब्रिटी की अंतरात्मा कहाँ थी?

खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार

अभिनेत्री से सांसद बनीं कंगना रनौत के साथ ऑनलाइन बहस के दौरान यह पैटर्न और साफ हो गया। किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने उनसे बार-बार सिर्फ यह कहने को कहा कि वे खालिस्तान का समर्थन नहीं करते और खालिस्तानी तत्वों की निंदा करते हैं।

दिलजीत इस माँग से बचते रहे और ट्रोल सेनाओं ने सोशल मीडिया पर कंगना पर हमला कर दिया। दिलजीत ने कभी भी साफ तौर पर खालिस्तानियों की निंदा नहीं की।

पुराने विवाद अब एक पैटर्न की तरह दिखते हैं

ये उदाहरण बताते हैं कि वास्तव में एक पैटर्न है। विरोध पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन करना जब खालिस्तानी तत्व दिखाई दे रहे थे, सीधे पूछे जाने पर खालिस्तान की स्पष्ट निंदा करने से इनकार करना, हिंदू नेताओं की लक्षित हत्याओं के आरोपितों के प्रति सहानुभूति रखना और अब ‘सतलुज’।

‘सतलुज’ पर आई प्रतिक्रिया ने इस पूरे इकोसिस्टम को और अधिक बेनकाब कर दिया है। Zee5 से फिल्म हटाए जाने के बाद, जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ने पूरे पंजाब में इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित करना शुरू कर दिया।

गाँवों में प्रोजेक्टर और बड़ी स्क्रीन के जरिए डाउनलोड की गई कॉपियाँ दिखाई गईं। पार्टी नेता रशपाल सिंह सोसन ने इन स्क्रीनिंग को बढ़ावा दिया और अमृतपाल सिंह का एक पुराना वीडियो भी साझा किया जिसमें वह जसवंत सिंह खालरा की तारीफ कर रहा था।

यह कोई छोटी बात नहीं है। अगर जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी द्वारा किसी फिल्म को अपनाया और प्रसारित किया जा रहा है, तो इससे पता चलता है कि फिल्म की राजनीतिक उपयोगिता है।

उनकी पार्टी ‘सतलुज’ को सिनेमा के रूप में नहीं दिखा रही है, वो इसका इस्तेमाल राजनीतिक सामग्री के रूप में कर रही है। पंजाब पीड़ित भावना और अलगाववादी भावना के इर्द-गिर्द एक नैरेटिव को पुनर्जीवित करने के लिए दिलजीत के चेहरे और खालरा की कहानी का इस्तेमाल कर रही है।

इस तरह आतंक को ‘प्रतिरोध’ के रूप में रीपैकेज किया जाता है

‘सतलुज’ महज एक फिल्म नहीं है। यह खालिस्तानी उग्रवाद को नैतिक प्रतिरोध के रूप में रीपैकेज करने के लंबे समय से चल रहे प्रयास का नया अध्याय है। यह एक पुराना हथकंडा है जो सबसे पहले आतंकवाद के पीड़ितों को गायब करता है, फिर चरमपंथी का मानवीकरण करता है, फिर अकेले राज्य को खलनायक बनाता है और आखिर में दुष्प्रचार पर सवाल उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को सिख-विरोधी कह देता है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि खालिस्तानी दुष्प्रचार पर सवाल उठाना सिख-विरोधी नहीं बल्कि भारत-समर्थक है। यह पंजाब-समर्थक भी है। इस राज्य ने खालिस्तानी आतंकवाद के कारण बहुत कुछ झेला है।

हिंदू उग्रवाद का विरोध करने वाले सिख और पुलिसकर्मी मारे गए। परिवार तबाह हो गए। सरकार से गलतियाँ हुईं और ज्यादतियाँ भी हुईं, लेकिन वह अलगाववादियों और आतंकवादियों का महिमामंडन करने का बहाना नहीं बन सकती।

सुपरस्टार की छवि बरकरार, लेकिन राजनीति बेनकाब

दिलजीत दोसांझ के पास स्थिति साफ करने के लिए सालों का समय था। उनके पास बिना किसी चालाकी भरे शब्दों के यह कहने के लिए सालों थे कि खालिस्तान अस्वीकार्य है और पंजाब में आतंकवाद का महिमामंडन नहीं किया जा सकता। इसके बजाय हर नए विवाद ने सुई को उसी दिशा में धकेला है।

‘सतलुज’ के साथ मुखौटा उतर गया है। सुपरस्टार की छवि बनी हुई है। वैश्विक संगीत कार्यक्रम बने हुए हैं। पॉलिश की हुई PR टीम बनी हुई है। लेकिन इसके पीछे वही राजनीति और विचारधारा खड़ी है जिसके बारे में ऑपइंडिया ने सालों पहले चेतावनी दी थी।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)