वैश्विक ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। केंद्र सरकार के ‘मिशन समुद्र मंथन’ (राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन) के तहत ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ने अंडमान सागर में ‘श्री विजयपुरम-3’ खोजी कुएँ में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार की खोज की है। यह कुआँ तट से 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे पानी में स्थित है, जहाँ 1,900 मीटर से अधिक की गहराई पर इओसीन फॉर्मेशन में लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई है।
वैसे वर्तमान समय में पूरी दुनिया एक अभूतपूर्व ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में जारी अशांति, लाल सागर का संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों ने दुनिया भर के देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा की समीक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत भी इस वैश्विक संकट से अछूता नहीं है, क्योंकि देश को अपनी तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा यानी 85% हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। हर साल अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ पेट्रोल, डीजल और एलपीजी खरीदने में खर्च हो जाता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की हर छोटी-बड़ी हलचल का सीधा असर पड़ता है।
इसी वैश्विक संकट के बीच भारत के पूर्वी समुद्र तट और पश्चिमी रेगिस्तान से ऐसी सुखद और ऐतिहासिक खबरें आई हैं, जो आने वाले समय में देश की पूरी ऊर्जा कहानी को बदलकर रख देंगी। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए ‘मिशन समुद्र मंथन‘ यानी ‘राष्ट्रीय गहरे जल अन्वेषण मिशन’ के तहत भारत ने गहरे और अति-गहरे समुद्र में छिपे हाइड्रोकार्बन के विशाल भंडार को खंगालना शुरू कर दिया है।
अंडमान सागर में एक के बाद एक मिली सफलताओं और देश के पूर्वी तट पर शुरू हुए डेढ़ लाख करोड़ रुपए के मेगा प्लान ने भारत के ऊर्जा स्वतंत्रता मिशन को एक नई और अचूक दिशा दे दी है। इस महा-मिशन का उद्देश्य देश के भीतर ही इतने ऊर्जा स्रोत विकसित करना है कि भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का असर देश के आम नागरिकों की जेब पर न पड़े।
अंडमान सागर से आई दूसरी बड़ी खुशखबरी
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का क्षेत्र सामरिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है, भूगर्भीय रूप से यह ऊर्जा का उतना ही बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि अंडमान सागर में एक और नए स्थान पर प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार का पता चला है।
यह ऐतिहासिक खोज सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित श्री विजयपुरम-3 नामक एक एक्सप्लोरेटरी यानी खोजी कुएँ में की गई है। यह कुआँ लगभग 355 मीटर गहरे समुद्री क्षेत्र में खोदा गया था, जो अपनी भौगोलिक बनावट के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
इस खोज की तकनीकी गहराइयों को समझें तो समुद्र के तल से नीचे करीब 1900 से अधिक की गहराई तक जाकर इस कुएँ की टेस्टिंग की गई है। यह खोज इओसीन फॉर्मेशन नाम की भूगर्भीय परत में हुई है, जो अपनी विशेष चट्टानी संरचना के लिए जानी जाती है।
परीक्षणों के दौरान इस कुएँ से लगातार गैस फ्लेयरिंग देखी गई, जो बेहद उच्च दबाव और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की निरंतर उपस्थिति को प्रमाणित करती है। पेट्रोलियम मंत्री ने देश को बधाई देते हुए साफ किया कि यह भारत के समुद्री तेल और गैस अन्वेषण कार्यक्रम के लिए एक मील का पत्थर है और इससे आने वाले दिनों में देश की गैस उत्पादन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेंगे।
अंडमान बेसिन की असली भूगर्भीय क्षमता से अभी दुनिया अनजान
यह खोज इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि ऑयल इंडिया लिमिटेड ने मौजूदा अन्वेषण अभियान के तहत अंडमान बेसिन में कुल तीन खोजी कुएं खोदे थे, जिनमें से दो में हाइड्रोकार्बन यानी तेल और गैस की सफल मौजूदगी दर्ज की जा चुकी है। इससे पहले, वर्ष 2025 में इसी क्षेत्र के पास श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी प्राकृतिक गैस मिलने की पुष्टि हुई थी।
उस समय निकाली गई गैस के नमूनों की जाँच में पाया गया था कि उसमें लगभग सतासी प्रतिशत शुद्ध मीथेन गैस मौजूद है, जो व्यावसायिक उपयोग के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। पहली सफलता के तत्काल बाद सरकार ने बिना समय गँवाए इस क्षेत्र में अन्वेषण गतिविधियों को और तेज कर दिया, जिसका परिणाम अब श्री विजयपुरम-3 के रूप में सबके सामने है।
भूवैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान बेसिन की अंडरवाटर संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन समुद्री क्षेत्रों से बिल्कुल मिलती-जुलती है, जहाँ पिछले कई दशकों से बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस और तेल का व्यावसायिक उत्पादन किया जा रही है। अब तक तकनीक की कमी और अत्यधिक गहराई के कारण अंडमान का यह क्षेत्र पूरी तरह अनछुआ रहा था, लेकिन अब यह साबित हो चुका है कि भारत के इस समुद्री क्षेत्र के नीचे गैस का एक विशाल खजाना दबा हुआ है।
फिलहाल ऑयल इंडिया लिमिटेड इस गैस भंडार का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कर रही है ताकि इसके नमूनों को एकत्र कर इसकी गुणवत्ता, संरचना और ऊर्जा क्षमता का सटीक परीक्षण किया जा सके। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो साल 2030 तक इस क्षेत्र से व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया जा सकता है।
पूर्वी तट पर भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा अभियान
अंडमान की इस बड़ी सफलता ने भारत सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है और यही कारण है कि देश की सबसे बड़ी तेल और गैस उत्पादक कंपनी ओएनजीसी यानी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने भारतीय समुद्रों में गहरे पानी से तेल निकालने के लिए अपने इतिहास के सबसे बड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे दी है।
ओएनजीसी ने गहरे और अति-गहरे पानी में तेल और गैस की खोज और ड्रिलिंग के लिए अठारह से बीस अरब डॉलर यानी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपए से अधिक के भारी-भरकम निवेश की योजना तैयार की है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर जारी कर दिए गए हैं और मार्च के महीने में मुंबई में हुई प्री-बिड मीटिंग में दुनिया भर की एक दर्जन दिग्गज ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया है।
इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत दुनिया की सबसे अत्याधुनिक ड्रिलशिप और सेमी-सबमर्सिबल रिग्स को भारतीय समुद्रों में तैनात किया जा रहा है। भारत इस महा-मिशन में किसी भी तरह की तकनीकी कसर नहीं छोड़ना चाहता, इसलिए ओएनजीसी ने गहरे समुद्र की ड्रिलिंग में महारत रखने वाली दुनिया की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों जैसे ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल के साथ रणनीतिक और तकनीकी सहयोग किया है।
यह प्रोजेक्ट केवल तेल खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी आर्थिक और रणनीतिक सोच काम कर रही है, जो भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी।
एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल
इस बार भारत सरकार और उसकी तेल कंपनियाँ केवल पुराने और पारंपरिक तरीकों पर निर्भर नहीं हैं। मिशन समुद्र मंथन के तहत पूर्वी तट पर भारत का अब तक का सबसे आधुनिक और हाई-टेक सिस्मिक सर्वे शुरू किया जा रहा है, जिसके लिए वैश्विक जियोफिजिकल कंपनियों से निविदाएँ माँगी गई हैं। यह मिशन करीब छतीस महीने तक चलेगा, जिसके तहत समुद्र के नीचे की चट्टानों और उनकी जटिल संरचनाओं का एक हाई-टेक डिजिटल नक्शा तैयार किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से उन क्षेत्रों की भी पहचान की जा सके की जिन्हें पहले तकनीकी सीमाओं के कारण पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था।
इस हाई-टेक सर्वे में ब्रॉडबैंड थ्री-डी सिस्मिक इमेजिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र के पानी में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं। ये उपकरण समुद्र के नीचे शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजते हैं, जो समुद्र की तलहटी और उसके नीचे स्थित विभिन्न चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं।
जहाजों पर लगे अत्यधिक संवेदनशील सेंसर इन तरंगों की गूँज को रिकॉर्ड कर लेते हैं, जिसके बाद वैज्ञानिक इस विशाल डेटा को सुपरकंप्यूटरों के जरिए प्रोसेस करके समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई तक की एक स्पष्ट त्रिविमीय तस्वीर तैयार करते हैं। इससे यह साफ पता चल जाता है कि किस जगह की चट्टानी संरचना के बीच तेल या गैस फंसी हुई है और यही तकनीक दुनिया के सबसे बड़े ऑफशोर तेल क्षेत्रों की खोज में इस्तेमाल की जाती है।
नदी बेसिनों में छिपी ऊर्जा की असीम संभावनाएँ
इस आधुनिक तकनीक के निशाने पर मुख्य रूप से देश के चार सबसे बड़े नदी बेसिन हैं, जिनमें सबसे बड़ा दाँव कृष्णा-गोदावरी यानी केजी बेसिन पर माना जा रहा है। यह क्षेत्र पहले से ही भारत का प्रमुख गैस उत्पादन केंद्र है, लेकिन सरकार का मानना है कि नई तकनीक के जरिए इस बेसिन के और अधिक गहरे हिस्सों में छिपे जटिल पेट्रोलियम सिस्टम और गैस हाइड्रेट्स का पता लगाया जा सकता है।
इसी तरह ओडिशा के तट के पास स्थित महानदी बेसिन को भारत के सबसे संभावित और समृद्ध डीप-वॉटर क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहाँ वैज्ञानिकों को करीब आठ किलोमीटर से अधिक की गहराई तक तेल और गैस होने के प्रबल संकेत मिले हैं।
इसके अलावा बंगाल-पुर्णिया बेसिन को भूवैज्ञानिक एक बड़ा अवसर मान रहे हैं, क्योंकि यहाँ समुद्र के नीचे लगभग दस किलोमीटर तक मोटी अवसादी परतें मौजूद हैं। शुरुआती अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यहाँ मियोसीन युग के प्राचीन और विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार छिपे हो सकते हैं, जो सफल होने पर पूरे पूर्वी भारत की ऊर्जा तस्वीर को बदल देंगे।
तमिलनाडु से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैला कावेरी बेसिन भी इस योजना का एक अहम हिस्सा है, जिसके ऑफशोर कार्बोनेट सिस्टम और जुरासिक सिं-रिफ्ट प्ले की जाँच की जाएगी। यहाँ आठ किलोमीटर की गहराई में और बड़े तेल भंडारों की उम्मीद जताई जा रही है, जिसके लिए भविष्य में बड़े स्तर पर ड्रिलिंग की जाएगी।
मल्टी-क्लाइंट मॉडल से बदलेगा पूरा खेल
इस विशाल और खर्चीले मिशन को तेजी से पूरा करने और सरकारी खजाने पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए सरकार ने एक बेहद चालाकी भरी रणनीति अपनाई है, जिसे मल्टी-क्लाइंट मॉडल कहा जाता है। पारंपरिक तरीकों में सिस्मिक डेटा जुटाने का पूरा खर्च और उसका जोखिम सरकार या सरकारी तेल कंपनियों को उठाना पड़ता था, जिससे बजट की कमी के कारण काम काफी धीमा हो जाता था। लेकिन इस नए मॉडल के तहत अंतरराष्ट्रीय जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर समुद्र के नीचे का डेटा जुटाएंगी।
इसके बाद ये कंपनियाँ इस प्रामाणिक डेटा को दुनिया भर की विभिन्न ऊर्जा और तेल उत्पादक कंपनियों को बेच सकेंगी, जिससे उनका मुनाफा भी सुरक्षित रहेगा और सरकार पर शुरुआती वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा।
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश रातों-रात बढ़ जाएगा, जिससे भारत के समुद्रों में तेल की खोज का काम कई गुना तेजी से आगे बढ़ सकेगा। जब दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ इस डेटा को खरीदेंगी, तो वे भारत में निवेश करने के लिए खुद-ब-खुद आकर्षित होंगी, जिससे देश में विदेशी निवेश भी बढ़ेगा।
पश्चिमी सीमा पर भी मिली बड़ी कामयाबी
एक तरफ जहाँ देश के पूर्वी समुद्री हिस्से में मिशन समुद्र मंथन इतिहास रच रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के पश्चिमी छोर से भी भारत के लिए एक और बड़ी खुशखबरी आई है। राजस्थान के जैसलमेर बेसिन में सरकारी तेल कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड को एक और बड़ी कामयाबी हाथ लगी है, जिसने मरुभूमि में ऊर्जा की एक नई किरण जगाई है।
कंपनी ने जैसलमेर के प्रसिद्ध डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ खोजा है, जिसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से प्राकृतिक गैस निकलनी शुरू हुई है।
यह कुआँ केवल 950 मीटर की गहराई तक ही ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षणों में ही यहाँ से लगभग 25000 स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन गैस का प्रवाह दर्ज किया गया है। तकनीकी विश्लेषण और भूगर्भीय जाँच के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस विशिष्ट क्षेत्र में करीब 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का कुल संसाधन मौजूद हो सकता है।
डांडेवाला फील्ड हालाँकि पहले से ही पारंपरिक गैस उत्पादन के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन सानू फॉर्मेशन में गैस का मिलना एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जिसने इस पूरे रेगिस्तानी इलाके में भविष्य के लिए ड्रिलिंग की नई संभावनाएँ खोल दी हैं।
भारत की ऊर्जा जरूरतें और आयात का भारी बोझ
भारत की वर्तमान ऊर्जा स्थिति और उसकी जरूरतों को समझे बिना इस पूरे मिशन के महत्व को नहीं जाना जा सकता। भारत आज की तारीख में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश बन चुका है, जहां तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण के कारण ईंधन की माँग आसमान छू रही है।
आँकड़ों के अनुसार, भारत में इस समय प्राकृतिक गैस की दैनिक खपत लगभग एक सौ सतासी मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रति दिन तक पहुँच चुकी है। उद्योगों के संचालन, बड़े कारखानों, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के लिए सीएनजी और घरों की रसोई के लिए पीएनजी की माँग हर गुजरते दिन के साथ बढ़ रही है।
इस भारी माँग को पूरा करने के लिए भारत को अपनी कुल जरूरत का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी एलएनजी के रूप में आयात करना पड़ता है। कच्चे तेल के मामले में आत्मनिर्भरता की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि भारत को अपनी दैनिक जरूरतों का लगभग पचासी प्रतिशत हिस्सा विदेशों से ही खरीदना पड़ता है।
देश में कच्चे तेल का आयात बिल हर साल लाखों करोड़ रुपए तक पहुँच जाता है, जिससे देश का एक बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ ईंधन खरीदने में ही स्वाहा हो जाता है। ऐसे माहौल में देश के भीतर ही नए गैस और तेल के भंडार मिलना सरकार के लिए बहुत बड़ी राहत की खबर है, जो देश को आर्थिक रूप से और मजबूत बनाएगी।
कच्चे तेल का दैनिक गणित और भारत का उत्पादन
भारत की तेल की दैनिक खपत और उसके घरेलू उत्पादन के बीच का गणित बेहद दिलचस्प है और यह दिखाता है कि देश को आत्मनिर्भर बनने के लिए कितने बड़े स्तर पर काम करने की जरूरत है।
भारत में रोजाना लगभग 55 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जो देश की विशाल आबादी और उसके परिवहन तंत्र की रीढ़ है। इस 55 लाख बैरल में से भारत अपने तमाम घरेलू स्रोतों जैसे मुंबई हाई, असम के तेल क्षेत्रों और कृष्णा-गोदावरी बेसिन को मिलाकर रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का खुद उत्पादन कर पाता है।
यह घरेलू उत्पादन देश की कुल जरूरत के मुकाबले काफी कम है, जिसके कारण भारत को रोजाना लगभग 45 लाख बैरल कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदना पड़ता है। यही वजह है कि जब भी खाड़ी देशों में या वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर का भी उछाल आता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका अरबों रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
सरकार का पूरा ध्यान अब इसी अंतर को पाटने पर है ताकि घरेलू उत्पादन को 9 लाख बैरल से बढ़ाकर उस स्तर पर ले जाया जा सके जहाँ विदेशों पर निर्भरता न्यूनतम हो जाए।
भारत Vs पाकिस्तान: तेल और गैस उत्पादन का सच
जब भी भारत की सीमाओं के पास कोई भूगर्भीय खोज होती है, तो दोनों देशों की तुलना और उनके दावों की हकीकत जानना बेहद जरूरी हो जाता है। हाल ही में पाकिस्तान की सरकारी तेल कंपनी ओजीडीसीएल यानी ऑयल एंड गैस डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड ने भारत की सीमा से सटे अपने सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में बॉबी डीप-1 नामक कुएँ में तेल और गैस मिलने की बड़ी घोषणा की है।
इस खबर के आते ही पाकिस्तान में जश्न का माहौल बन गया और वहाँ के लोगों को लगा कि उनकी किस्मत बदलने वाली है, लेकिन जब हम आँकड़ों की कसौटी पर दोनों देशों की तुलना करते हैं, तो पाकिस्तान की यह खोज भारत के सामने बहुत छोटी और नीचे दिखाई देती है।
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान का सिंध प्रांत और भारत का राजस्थान राज्य आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों तरफ थार का एक ही रेगिस्तान फैला हुआ है, जिसके कारण रेत के नीचे की चट्टानें पुरानी और तेल-गैस को जमा करने वाली हैं।
पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके सांघड़ जिले के इस नए कुएँ से शुरुआती टेस्टिंग के दौरान रोजाना 2000 बैरल कच्चा तेल और 11 लाख क्यूबिक फीट गैस निकल रही है। पाकिस्तान जैसी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के लिए यह एक राहत की खबर जरूर हो सकती है, लेकिन जब हम भारत के राजस्थान में पहले से चल रहे काम को देखते हैं, तो पाकिस्तान का यह दावा पूरी तरह फीका पड़ जाता है।
थार के रेगिस्तान में भारत की बादशाहत
भारत को राजस्थान के रेगिस्तान में बहुत पहले ही तेल का विशाल भंडार मिल चुका है और हमारी कंपनियाँ पिछले कई सालों से वहाँ से सफलतापूर्वक रिकॉर्ड उत्पादन कर रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर में स्थित प्रसिद्ध मंगला ऑयलफील्ड से भारत अकेले रोजाना लगभग 80000 बैरल कच्चे तेल का उत्पादन कर रहा है। इसके अलावा बाड़मेर और जैसलमेर के अन्य छोटे-बड़े तेल कुओं को मिला दिया जाए तो भारत केवल राजस्थान के इस अकेले इलाके से ही रोजाना करीब 2 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन सफलतापूर्वक कर रहा है।
इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि पाकिस्तान को अपने जिस सिंध प्रांत के सांघड़ जिले में तेल मिलने पर इतना नाज है, भारत उससे 100 गुना ज्यादा तेल राजस्थान के रेगिस्तान से पहले ही रोजाना निकाल रहा है। पाकिस्तान को सांघड़ से सिर्फ दो हजार बैरल तेल मिलने की उम्मीद है, जबकि भारत वहाँ 2 लाख बैरल रोज निकाल रहा है।
आगे चलकर पाकिस्तान वहाँ और कुएँ खोदे तो बात अलग है, लेकिन फिलहाल जो घोषणा की गई है, उसकी असलियत भारत के मुकाबले कुछ भी नहीं है। भारत की कंपनियाँ पहले से ही इस पूरे बॉर्डर इलाके में अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए हैं और लगातार नए कुओं की ड्रिलिंग कर रही हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की क्षमता का विशाल अंतर
अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों की कुल तेल खपत और उनके घरेलू उत्पादन की तुलना करें, तो यह अंतर और भी ज्यादा हैरान करने वाला है। पाकिस्तान को अपनी पूरी राष्ट्रीय व्यवस्था चलाने और अपनी जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना लगभग 5 लाख बैरल कच्चे तेल की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले जैसा कि हम जानते हैं, भारत अपने घरेलू कुओं से रोजाना लगभग 9 से 10 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन खुद कर लेता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि भारत रोजाना जितना कच्चा तेल अपने देश की जमीन और समुद्र से निकालता है, वह मात्रा पाकिस्तान की कुल राष्ट्रीय जरूरत से लगभग दोगुनी है। पाकिस्तान को कुल पाँच लाख बैरल चाहिए और भारत 10 लाख बैरल रोज खुद पैदा करता है, भले ही भारत की अपनी जरूरत 55 लाख बैरल की है।
इस लिहाज से देखा जाए तो पाकिस्तान की सांघड़ की यह खोज भारत के राजस्थान और अंडमान के हाइड्रोकार्बन साम्राज्य के सामने कहीं नहीं ठहरती और बेहद नीचे नजर आती है। असली कहानी और ऊर्जा सुरक्षा की वास्तविक बाजी पूरी तरह से भारत के हाथ में है, जो समुद्र और जमीन दोनों मोर्चों पर पाकिस्तान से कई गुना आगे चल रहा है।
ऊर्जा स्वतंत्रता और आर्थिक संप्रभुता का भविष्य
मिशन समुद्र मंथन के तहत देश के भीतर मिल रहे तेल और गैस के ये नए भंडार आने वाले समय में भारत की पूरी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को बदलने की ताकत रखते हैं। जब देश के भीतर ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगा, तो आयात बिल में होने वाली भारी कटौती से देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा कोष सुरक्षित रहेगा।
इस बचे हुए पैसे का उपयोग देश के आंतरिक विकास, आधुनिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और तकनीकी अनुसंधान पर किया जा सकेगा, जो अंततः देश के नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारेगा।
इसके साथ ही भारत वैश्विक तेल बाजार के उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट के तनावों से भी काफी हद तक सुरक्षित हो जाएगा, जिससे देश में ईंधन की कीमतों में स्थिरता आएगी।
प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया यह मिशन अब धरातल और समंदर की गहराइयों में पूरी तरह से रंग लाने लगा है, जो भारत को आने वाले दशकों के लिए न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा बल्कि उसकी आर्थिक संप्रभुता को भी अक्षुण्ण रखेगा। वैश्विक मंच पर भारत का यह ऊर्जा सुरक्षा मॉडल और आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम आज दुनिया के तमाम विकासशील देशों के लिए एक महान प्रेरणा बन चुके हैं।