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‘चरित्रहीन’ वाली सयोनी घोष को दूसरी ममता बनाने चला था लिबरल गैंग, ‘काबा-मदीना’ से TMC की ही खोद दी कब्र: CM योगी ने हनुमान चालीसा पाठ को कर दिया था मजबूर

बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्रचंड जीत हासिल कर ली है। और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को जबरदस्त पछाड़ मिली है। नतीजों ने साफ कर दिया है कि बंगाल की जनता ने ‘पोरिबर्तन’ कर दिखाया है, वे 15 साल से बंगाल में सत्ता में रही TMC से तंग आ चुके हैं। और TMC को ढहाने के पीछे भी उनके ही नेताओं का हाथ है। इनमें से ही एक हैं सयोनी घोष। एक्ट्रेस से पॉलिटिशियन बनीं सयोनी घोष ने इन चुनावों में खुद को TMC की फायर ब्रांड नेता के तौर पर पेश किया, लेकिन निकली वो ‘पनौती’। वे जिन-जिन क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करने पहुँची थी, उनमें से ज्यादातर सीटों पर TMC को करारी हार मिली।

चाहे वो TMC का गढ़ कहे जाने वाला दक्षिण 24 परगना जिला हो, या हो मदारीहाट, पुरुलिया और या जलपाईगुड़ी की राजगंज सीट। हर सीट पर BJP ने TMC को धोबी पछाड़ दिया है। इन्हीं इलाकों में घूम-घूमकर सयोनी घोष ने कविता और गाने गाकर खुद को ‘सेकुलर’ नेता के रूप में पेश किया। सयोनी का बंगाली भाषा में गुनगुनाया गया वो गीत खूब बिका, जिसके हिंदी बोल हैं- ‘मेरे दिल में है काबा, आँखों में मदीना।’ इसी गाने पर लिबरल गैंग ने सयोनी घोष के कसीदे पढ़े।

इतना ही नहीं चुनाव में उनको ममता बनर्जी की परछाई की तरह देखा जाने लगा। जो साधी सफेद साड़ी और हाथ में माइक पकड़कर BJP के बड़े-बड़े नेताओं पर सीधे हमले बोलने लगीं। मीडिया ने भी सयोनी घोष के प्रचार को खूब हवा दी। जब कुछ यूट्यूब चैनल ने उनका इंटरव्यू किया और ‘सेकुलर’ राजनीति पर सवाल पूछे। लेकिन किसी ने उनकी हिंदू घृणा की पोल नहीं खोली।

लेकिन असलियत यह है कि मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली TMC और उसकी नेता सयोनी घोष को CM योगी ने हिंदुत्व का पाठ पढ़ाया था। जब एक रैली में CM योगी ने सयोनी घोष का नाम लिए बिना उन्हें सीख दी कि बंगाल की पहचान काबा नहीं, बल्कि माँ काली है। इसके बाद सयोनी घोष हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए मजबूर हुईं और चुनाव में उनकी पहचान ‘सेकुलर’ नेता के रूप में होने लगी।

अब चुनावों के नतीजे के बाद सयोनी घोष की सोशल मीडिया पर खूब आलोचना हो रही है। जहाँ यूजर्स उनकी पुरानी फिल्मों को लेकर सयोनी घोष की ‘सेकुलर’ राजनीति और साधे कपड़े वाली पहचान की हकीकत बता रहे हैं। लोग बता रहे हैं कि ये वही सयोनी घोष हैं, जिन्होंने ‘चरित्रहीन’ जैसी एडल्ट फिल्मों में काम किया और अब चुनाव में सीधी-साधी महिला की पहचान ओड़े खूब बयानबाजी की।

इतना ही नहीं सयोनी घोष की हकीकत यह भी है कि उन्होंने शिवलिंग पर कंडोम की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की। जब लोगों ने सवाल पूछे, तो कहने लगी कि ‘एक्स’ अकाउंट हैक हो गया था। लेकिन हैकर ने मुस्लिम-विरोधी पोस्ट शेयर नहीं किए। यानी सयोनी घोष खुले में सिर्फ हिंदू घृणा दिखाती हैं और काबा-मदीना पर गाने गाती हैं। और फिर इसी बैकग्राउंड के साथ जनता के बीच अपनी ‘सेकुलर’ राजनीति चमकाती हैं।

लेकिन बंगाल के नतीजों में साफ दिख गया है कि यहाँ पिछले 15 सालों से TMC के ‘जंगलराज’ से परेशान लोगों ने जनादेश दे दिया है। अब लोगों ने ‘पोरिबर्तन’ कर दिया है। आने वाले समय में बंगाल में काबा-मदीना के गाने नहीं, बल्कि राज्य को अपनी बंगाली पहचान से नवाजा जाएगा।

आखिर में सयानी घोष ने जो लकीर खींची है, उम्मीद है कि उसकी तस्वीर हमें वैसी ही देखने को मिले जैसा वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल कहते हैं, “दिल में काबा, आँखों में मदीना! पश्चिम बंगाल का ये चुनाव इस गाने के कारण भी याद रखा जाएगा। जैसे शाह बानो मैटर के बाद केंद्र में कभी कॉन्ग्रेस को बहुमत नहीं मिला, वैसा ही हाल अब तृणमूल का हो सकता है। सांप्रदायिक अतिवाद भारत के स्वभाव के विपरीत है। चोलबे ना।”

जहाँ जन्मे मुखर्जी, अब वो बंगाल भी भगवा है… मोदी-शाह ने पूर्ण किया श्यामा प्रसाद का स्वप्न

बंगाल में 4 मई की सुबह जब सूरज उगा, तो हवाओं में बदलाव की महक थी। टीवी और रेडियो पर जैसे ही गिनती शुरू हुई, आँकड़ों ने सबको चौंका दिया। बंगाल की खाड़ी से उठी ‘भगवा लहर’ ने ममता दीदी के उस किले को ढहा दिया, जिसे कभी कोई हिला नहीं पाया था।

अभी के रुझान बता रहे हैं कि बीजेपी 199 से ज्यादा सीटों पर जीत रही है, जो बहुमत से कहीं ऊपर है। वहीं, पिछले 15 सालों से राज कर रही TMC 90 सीटों के आसपास सिमट गई है। यह महज एक चुनावी जीत नहीं है बल्कि एक ऐसी वैचारिक यात्रा का पड़ाव है जिसकी नींव डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दशकों पहले रखी थी।

पुरानी यादें और BJP का बड़ा मकसद

BJP के लिए बंगाल में जीतना सिर्फ कुर्सी पाने जैसा नहीं है। यह उनके लिए भावनाओं से जुड़ा मामला है। दरअसल, BJP जिस ‘भारतीय जनसंघ’ से निकलकर बनी है, उसकी शुरुआत करने वाले डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल के ही रहने वाले थे। BJP उन्हें अपना सबसे बड़ा आदर्श मानती है और हमेशा से मानती आई है कि बंगाल उनकी असली जन्मभूमि है। इसलिए, बंगाल में सरकार बनाना उनके लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के दौरान लोगों को एक पुरानी कहानी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दो बड़े सपने थे। पहला- कश्मीर से ‘अनुच्छेद 370’ हटाना, जिसे सरकार ने कुछ साल पहले पूरा कर दिया। और दूसरा- बंगाल को फिर से सोने की चिड़िया यानी ‘सोनार बांग्ला’ बनाना। उन्होंने जनता से वादा किया कि कश्मीर के बाद अब बंगाल का सपना पूरा करने की बारी है।

नेताओं की यह बात बंगाल के मध्यमवर्गीय परिवारों के दिल को छू गई। लोगों को लगा कि BJP सिर्फ राजनीति नहीं कर रही, बल्कि बंगाल की पुरानी पहचान, भाषा और संस्कृति को बचाने की बात कर रही है। इस संदेश ने लोगों के मन में यह भरोसा जगा दिया कि अगर अपनी विरासत और मान-सम्मान को सुरक्षित रखना है, तो BJP ही उनकी सबसे बड़ी ढाल बन सकती है। इसी भरोसे ने वोटर्स को कमल के निशान तक पहुँचा दिया।

2016 से 2026 तक का सफर: शून्य से शिखर तक

अगर हम 10 साल पीछे जाकर देखें, तो बंगाल में BJP की स्थिति बहुत कमजोर थी। साल 2016 के चुनावों में पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पाने के लिए भी बहुत कम था। उस समय BJP को पूरी 294 सीटों में से केवल 3 सीटें मिली थीं। जनता के बीच भी पार्टी की पकड़ कम थी और उसे सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों का साथ मिला था। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यह पार्टी कभी बंगाल की सत्ता तक पहुँच पाएगी।

बंगाल विधानसभा चुनाव 2016 नतीजें

2021: जब बीजेपी ने सबको चौंका दिया

5 साल बाद यानी 2021 में कहानी पूरी तरह बदल गई। BJP ने बंगाल की राजनीति में ऐसी छलाँग लगाई कि बड़े-बड़े दिग्गज हैरान रह गए। पार्टी की सीटें 3 से बढ़कर सीधे 77 पर पहुँच गईं। लोगों का भरोसा भी बढ़ा और BJP को करीब 38 प्रतिशत वोट मिले। भले ही पार्टी तब सरकार नहीं बना पाई, लेकिन उसने यह साफ कर दिया कि वह बंगाल में TMC को टक्कर देने वाली इकलौती और सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है।

2026: शिखर पर पहुँचने की ऐतिहासिक जीत

अब 2026 के नतीजों ने तो इतिहास ही रच दिया है। BJP ने अपनी पिछली सीटों का आँकड़ा दोगुना करते हुए बहुमत हासिल कर लिया है। पार्टी न केवल सीटों के मामले में आगे निकली, बल्कि उसे मिलने वाले वोटों का प्रतिशत भी TMC से ज्यादा हो गया है। यह सफर दिखाता है कि बंगाल के लोगों ने पिछले 10 सालों में धीरे-धीरे अपना मन बदला और एक नई राजनीति को मौका देने का फैसला किया। आज BJP शून्य से शुरू होकर बंगाल के शिखर पर पहुँच गई है।

कमल मेला और फुटबॉल: BJP की ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ रणनीति

इस बार BJP ने सिर्फ बड़ी-बड़ी रैलियाँ और भाषण ही नहीं दिए, बल्कि बंगाल के लोगों के बीच पहुँचने के लिए ‘कमल मेलों’ का आयोजन किया। ये मेले सिर्फ राजनीति के लिए नहीं थे, बल्कि इनमें बंगाल की संस्कृति, खान-पान और संगीत की झलक देखने को मिली। पार्टी ने स्थानीय कलाकारों और गायकों को अपनी कला दिखाने का मौका दिया। इससे लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि BJP कोई ‘बाहरी’ पार्टी नहीं है, बल्कि वह बंगाल की मिट्टी और यहाँ की परंपराओं का पूरा सम्मान करती है।

बंगाल के लोगों के लिए फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि एक जुनून है। BJP ने इस जुनून को समझा और पूरे राज्य में फुटबॉल टूर्नामेंट्स करवा दिए। इन मैचों के जरिए पार्टी के नेता सीधे लाखों युवाओं से मिले। खेल-खेल में ही युवाओं को BJP की विचारधारा से जोड़ा गया। इस अनोखी तरकीब ने नौजवानों के बीच यह संदेश भेजा कि BJP सिर्फ चुनाव की बात करने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि वह उनकी पसंद और नापसंद का भी ख्याल रखती है।

इन नए प्रयोगों का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि BJP ने खुद को जनता का हिस्सा बना लिया। रैलियों में अक्सर नेता दूर मंच पर खड़े होकर भाषण देते हैं, लेकिन मेलों और खेल के मैदानों में वे लोगों के बिल्कुल करीब आ गए। इससे जनता को लगा कि पार्टी उनकी भावनाओं को समझती है। इसी जमीनी जुड़ाव ने BJP को बंगाल के हर घर और हर दिल तक पहुँचने में मदद की, जिसका सीधा फायदा उन्हें चुनावी नतीजों में देखने को मिल रहा है।

आंगन बैठक और माइक्रो-मैनेजमेंट का कमाल

बीजेपी की जीत की सबसे बड़ी इनसाइड स्टोरी उनके ‘आंगन बैठक’ मॉडल में छिपी है। जब परीक्षाओं के कारण लाउडस्पीकर पर रोक लगी तो सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव की टीम ने इसे अवसर में बदल दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं ने एक ही महीने में 1 लाख 65 हजार से ज्यादा छोटी-छोटी बैठकें लोगों के घरों और आंगनों में कीं।

इन बैठकों में 10 से 15 लोगों के समूह होते थे जिनसे सीधी बातचीत की गई और उनके मन की शंकाओं को दूर किया गया। इस ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ ने चुनाव को बड़ी-बड़ी रैलियों के शोर से निकालकर लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुँचा दिया। हर बैठक के बाद व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए जिससे पार्टी का संदेश सीधे मतदाता की जेब तक पहुँच गया।

साख और स्थानीय चेहरे: बाहरी बनाम भीतरी का अंत

2021 के चुनाव में ममता बनर्जी बीजेपी को ‘बाहरी’ पार्टी बताकर वोट बटोरने में सफल रही थीं। लेकिन 2026 तक आते-आते BJP ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। पार्टी ने सुवेंदु अधिकारी जैसे कद्दावर स्थानीय नेताओं को पूरी कमान दी और उम्मीदवारों के चयन में भारी बदलाव किया।

इस बार BJP ने केवल दलबदलुओं पर भरोसा नहीं किया बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रतिष्ठित डॉक्टरों, वकीलों, खिलाड़ियों और कलाकारों को टिकट दिया। इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि BJP के पास बंगाल को चलाने के लिए अपने खुद के काबिल चेहरे हैं। इस रणनीति ने ‘बाहरी’ होने के नैरेटिव को पूरी तरह कुंद कर दिया।

RG कर और संदेशखाली का प्रभाव

बंगाल के चुनाव में करीब 70 फीसदी ‘स्विंग वोटर्स’ होते हैं जो आखिरी समय में अपना मन बदलते हैं। इस बार दो बड़ी घटनाओं ने इन मतदाताओं को हिलाकर रख दिया। RG कर मेडिकल कॉलेज की घटना ने शहरी मध्यम वर्ग और विशेष रूप से महिलाओं को ममता सरकार के खिलाफ कर दिया।

वहीं संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए अत्याचार ने ग्रामीण इलाकों में TMC के ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा पैदा किया। जो महिलाएँ पहले ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी सरकारी योजनाओं के कारण TMC की समर्थक थीं, वे सुरक्षा के मुद्दे पर BJP की ओर झुक गईं। इस ‘मूक क्रांति’ ने वोटिंग के दिन TMC के सारे गणित बिगाड़ दिए।

भ्रष्टाचार पर किया सीधा प्रहार: सिंडिकेट राज का खात्मा

मोदी-शाह की जोड़ी ने इस बार भ्रष्टाचार को केवल चुनावी मुद्दा नहीं बनाया बल्कि इसे एक भावनात्मक मुद्दा बना दिया। रैलियों में शिक्षक भर्ती घोटाले और राशन घोटाले का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर बंगाल के युवाओं से पूछा कि क्या उन्हें उनका हक मिल रहा है?

ED और CBI की कार्रवाई में मिले नोटों के पहाड़ों की तस्वीरों ने जनता के मन में यह बात बैठा दी कि उनका पैसा TMC के नेताओं की तिजोरियों में जा रहा है। BJP का वादा कि वह एक विशेष टास्क फोर्स बनाकर भ्रष्ट नेताओं की संपत्ति कुर्क करेगी और गरीबों में बाँटेगी, बेहद असरदार रहा।

घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा: ध्रुवीकरण का नया मॉडल

BJP ने सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को इस बार राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों से जोड़कर पेश किया। पार्टी ने यह नैरेटिव सेट किया कि घुसपैठिए बंगाल के युवाओं की नौकरियाँ और राशन छीन रहे हैं। सीएए (CAA) के लागू होने से मतुआ समुदाय जैसे शरणार्थी समूहों ने BJP को एकतरफा वोट दिया।

अमित शाह का यह बयान कि ‘बीजेपी सरकार आने पर परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा‘ ने सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले उन लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया जो तस्करी और अपराध से परेशान थे। इस ध्रुवीकरण ने बीजेपी के कोर वोट बैंक को एकजुट कर दिया।

अमित शाह का ‘बंगाल प्रवास’ और मोदी की 15 गारंटी

गृह मंत्री अमित शाह का चुनाव के दौरान 15 दिनों तक बंगाल में ही रुक जाना BJP की गंभीरता को दर्शाता है। उन्होंने कोलकाता को अपना कंट्रोल रूम बनाया और हर जिले की पल-पल की रिपोर्ट ली। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के लिए ’15 गारंटी’ का ऐलान किया जिसने TMC की योजनाओं की हवा निकाल दी।

3000 रुपए की आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण के वादे ने महिलाओं के बीच एक मजबूत विकल्प पेश किया। PM मोदी के प्रति लोगों का अटूट भरोसा और शाह की संगठन क्षमता ने मिलकर बंगाल में ‘डबल इंजन’ की रफ्तार पकड़ ली।

असम के नतीजों से धुआँ-धुआँ हुआ लिबरल गैंग, आरफा से लेकर ऋचा चड्ढा का दुख नहीं हुआ खत्म: राहत के लिए वीर दास ने भेजा Burnol

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के शुरुआती रुझान सामने आ गए हैं, कई सीटों पर 5 से 6 राउंड की काउंटिंग के बाद BJP की भारी बहुमत हासिल हो रही है। चुनाव आयोग के आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बंगाल में BJP 195 सीटों पर बढ़त बना रही है, जबकि TMC केवल 92 सीटों पर आगे चल रही है। उधर असम में BJP बहुमत के साथ सरकार बना रही है।

इन रुझानों के बाद हर कोई BJP को बधाई दे रहा है। वहीं देश का लिबरल-वामपंथी गैंग रोना रो रहा है। इनमें अव्वल नंबर पर हैं आरफा खानुम शेरवानी, जिन्होंने बंगाल में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर यह बताने की कोशिश की कैसे मतदाता BJP की सरकार बनना नहीं देना चाहते हैं और शुरुआती रुझानों के अनुसार उनकी यह रिपोर्टिंग फेल साबित हो रही है।

अब BJP को बढ़त मिलते देख वह कह रही हैं, “चलिए BJP के कसीदे पढ़ने शुरू करते हैं। क्या जबरदस्त पार्टी है, BJP जैसा चुनाव लड़ने का माद्दा विपक्ष की किसी पार्टी में नहीं हैं, जितनी मेहनत मोदी जी करते है, उसका आधा भी अगर ममता बैनर्जी करतीं तो जीत जातीं… शानदार, जानदार, ईमानदार, होशियार… तालियाँ, तालियाँ, तालियाँ..।”

ऐसे ही एक और वीडियो में आरफा खानुम BJP की जीत पर रोना रोते हुए कह रही हैं, “ये बहुत ही झटके और धक्के वाली बात है। खासकर उन लोगों के लिए जो अभी भी निष्पक्ष चुनाव पर यकीन करते हैं।”

उधर, गलवान घाटी में बलिदान हुए सैनिकों का मजाक उड़ाने वाली लिबरल गैंग की ऋचा चड्डा ने कहा, “कायर लोग कभी भी ईमानदारी से नहीं खेलते।”

लिबरल गैंग के ही कॉमेडियन कुणाल कामरा ने कहा, “संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ स्पष्ट जनादेश”

ऐसे ही कुछ लिबरल ‘एक्स’ अकाउंट्स ने भी BJP की बढ़त पर रोना रोया है। इनमें ‘नेहर हू’ नाम से एक्स हैंडल ने लिखा, “बंगाल को अब शुभकामनाएँ! और भी नफरत भरे अपराधों के लिए तैयार हो जाइए! महिलाओं की सुरक्षा मजाक बन जाएगी! सांप्रदायिकता अपने चरम पर पहुँच जाएगी! कम खर्च वाली जीवनशैली खत्म हो जाएगी! क्रिसमस पर बजरंग दल आपसे मिलेगा! अगले 5 साल के लिए RIP।”

डॉ. अरात्रिका गांगुली नाम की ‘एक्स’ यूजर लिखती हैं, “वह दिन आ गया है जब BJP सुबह 10 बजे जश्न मनाएगी, दोपहर 2 बजे घबराएगी और शाम 4 बजे बंगाल की जनता को दोषी ठहराएगी!”

वहीं लिबरल गैंग के इस रोने पर कॉमेडियन वीर दास ने तंज कसा है। वीर दास ने लिखा कि चुनाव में कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टी जीत रही है, लेकिन ‘बर्नोल’ की फ्री मार्केटिंग होती ही है।

देश का लिबरल गैंग को बंगाल और असम के नतीजों के बाद दुख हो रहा है। ये वही लोग हैं, जो खुद को किसी भी सरकार का हितैषी नहीं मानते हैं। लेकिन इनका एकतरफा झुकाव BJP के खिलाफ ही रहता है। ये वही लोग हैं जिन्होंने TMC की सरकार में हिंसा पर कभी बात नहीं की। अब बंगाल में BJP की जीत के बाद भी इन्होंने रोना रोया है। किसी को संविधान की चिंता हो रही है, तो कोई बंगाल में BJP की सरकार बनने के बाद हिंसा की बात कर रहा है। इनके रोने पर क्या अब ‘बर्नोल’ काम आएगी? अब जहाँ BJP बंगाल में विकास यात्रा की प्लानिंग बनाएगी, वहीं ये लिबरल गैंग उनमें खामियाँ निकालकर कसीदे पढ़ेंगे।

बंगाल विधानसभा चुनाव: वो 5 ‘M फैक्टर्स’ जिनके सहारे सत्ता के शिखर की ओर बढ़ रही BJP

15 साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के दिन अब लद गए हैं। बीजेपी ने जबरदस्त पटखनी देते हुए न सिर्फ टीएमसी को हराने जा रही है, बल्कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों की लुटिया डुबो दी है। ममता से पहले 34 साल तक सीपीएम के नेतृत्व में वामपंथी दलों का शासन यहाँ रहा है। उससे पहले कॉन्ग्रेस का शासन था। बीजेपी पहली बार बंगाल में इतिहास रचने जा रही है।

पीएम मोदी के चेहरे पर जनता को भरोसा

बीजेपी के जबरदस्त सफलता का श्रेय पीएम मोदी और अमित शाह की मजबूत रणनीति को जाता है। उन्होंने राज्य की कमान सीधे संभाल कर चुनावी फिजा बदल दी । राज्य बनाम केन्द्र की पॉलिटिक्स करने वाली ममता बनर्जी को मात दी और जनता को बताने में सफल रहे कि केन्द्रीय योजनाओं को ममता बनर्जी सरकार ने लागू नहीं कर राज्य की जनता का नुकसान किया। पीएम मोदी का मजबूत चेहरा आगे कर बीजेपी ने जमीन पर जमकर पसीना बहाया।

संगठन को मजबूत कर एक-एक बूथ पर अलग रणनीति बनाई गई। बूथ मैनेजमेंट से लेकर वॉर रूम तक पर गृहमंत्री अमित शाह की नजर रही। पार्टी के कैडर तक को यह विश्वास दिलाया कि ममता बनर्जी की सरकार को बदला जा सकता है। ममता के खौफ का यह आलम था कि जनता उनके खिलाफ बोलने से कतराती थी। उस जनता ने इस बार टीएमसी के गुंडों को हराने का निश्चय किया और ममता की पार्टी के खिलाफ वोट डाला। हालाँकि टीएमसी का जमीन पर नेटवर्क हमेशा मजबूत रहा है। इसलिए चुनाव में टक्कर देखने लायक रही।

हर बार जनता को डराया धमकाया जाता था। इस बार चुनावों में बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती, सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। चुनाव को अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक और निर्भय मतदान का संकल्प चुनाव आयोग ने पूरा किया।

SIR के माध्यम से वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण को लेकर माइग्रेंट यानी प्रवासी बड़ी संख्या में बंगाल पहुँचे। लाखों प्रवासी बंगालियों ने वोट डाला। दिल्ली-एनसीआर ही नहीं कई शहरों से प्रवासी बंगाली नागरिक वापस लौटे। इसकी वजह से कई राज्यों में मजदूरों और घरेलू काम करने वाली महिलाओं की कमी देखी गई।

दो चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले ने टीएमसी के फर्जीवाड़े को रोकने में काफी हद तक सफलता पाई। फर्जी नामों के हटने का असर चुनाव के परिणाम पर पड़ा। इसके अलावा पहले के चुनावों में टीएमसी के कैडर एक क्षेत्र से चुनाव होने के बाद दूसरे क्षेत्र में जाकर लोगों को डराते-धमकाते थे और खून खराबा करते थे, लेकिन इस बार यह मौका नहीं मिला।

महिलाओं ने बीजेपी को चुना

बीजेपी की जीत में महिला वोटरों का अहम रोल रहा है। महिला सुरक्षा बंगाल में अहम मुद्दा रहा। बीजेपी ने संदेशखाली और आरजीकर जैसी घटनाओं को टीएमसी के खिलाफ चुनाव में हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। महिला सम्मान की बात की।

इसके अलावा केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने और बीजेपी द्वारा 3000 रुपए हर महीना महिलाओं को देने का वादा रंग लाया। हालाँकि ममता बनर्जी ने लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के माध्यम से 1500 रुपए हर महीना महिलाओं को दे रही है। लेकिन, महिला सम्मान और सुरक्षा के साथ-साथ महिला आरक्षण को लेकर टीएमसी का मुखर विरोध महिलाओ को बीजेपी के पक्ष में खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। कुल मिलाकर महिलाओं का आशीर्वाद बीजेपी को मिला।

‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ से त्रस्त थी जनता

मुस्लिम तुष्टिकरण की टीएमसी की राजनीति ने इस बार हिन्दुओं को जोड़ा। बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। परंपरागत रूप से ये टीएमसी के वोटर हैं। लेकिन इस बार कई नए दावेदार मैदान में उतरे थे। एआईएमआईएम और हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट तो पहले से मौजूद ही थी।

चुनाव में हिन्दू वोटरों को एकजुट करने में बीजेपी काफी हद तक सफल रही और आक्रामक रणनीति बना कर नए समीकरण पैदा किए। राज्य में करीब 68 फीसदी हिन्दू आबादी है। पिछले 15 साल से टीएमसी के राज में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

बांग्लादेशी घुसपैठियों को एसआईआर के माध्यम से वोट डालने से रोका गया। इनमें कई वापस बांग्लादेश गए। वहीं राज्य के बाहर रहने वाले बंगाल के नागरिकों ने आकर वोट डाला। इसका फायदा बीजेपी को मिला।

15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की सरकार को जनता बदलना चाहती थी। यही वजह है कि ‘परिवर्तन’ चाहने वाली बड़ी आबादी ने बाहर आकर चुपचाप बीजेपी को वोट डाला। खराब कानून व्यवस्था, बेरोजगारी से परेशान लोगों ने विकास को चुना।

माछ और मतुआ फैक्टर

ममता के खिलाफ कौन। जाहिर है बंगाल चुनाव में इस बार न तो कॉन्ग्रेस और न ही लेफ्ट विकल्प देने की स्थिति में थी। इसलिए जानकार मान रहे हैं कि ममता राज को उखाड़ फेंकने के लिए कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के समर्थकों ने भी बीजेपी को वोट किया।

24 परगना और उसके आसपास के क्षेत्रों में मतुआ फैक्टर काफी कारगर रहा। सीएए को लेकर इस समुदाय को बीजेपी से काफी उम्मीदें हैं। ये लोग बीजेपी के वोटर हैं और इनलोगों ने अपने इलाके में बीजेपी के पक्ष में हवा बनाने में अहम भूमिका निभाई। स्थानीय मुद्दों के साथ साथ पीएम मोदी के चेहरे पर भरोसे का असर इस बार दिखा।

बंगाल में माछ यानी मछली सबसे अहम खाया जाता है। ममता बनर्जी ने बीजेपी को माछ विरोधी बताने की नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इसको लेकर बीजेपी के नेताओं ने चुनाव में मछली खाकर जनता को बताया कि बीजेपी ‘माछ विरोधी’ नहीं है।
हर चुनाव में बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा कर बीजेपी को बाहरी साबित करने की कोशिश करती रही है। इस बार विधानसभा चुनाव ने बीजेपी ने स्थानीय नेताओं को मीडिया में आने और जनता से जुड़ने की रणनीति बनाई। इसका फायदा चुनाव में मिला।

ग्रेट निकोबार परियोजना पर हर सवाल का जवाब: जानिए कैसे यह प्रोजेक्ट रक्षा, व्यापार और पर्यावरणीय संतुलन को जोड़कर भारत को बनाने जा रहा है महाशक्ति

ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार इसे भारत की समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती और वैश्विक व्यापार में बड़ी भूमिका के लिए जरूरी बता रही है जबकि कॉन्ग्रेस इसका लगातार विरोध कर रही है। सोनिया गाँधी ने पहले एक लेख लिखा था और फिर अब राहुल गाँधी ने अंडमान का दौरा किया है। लोगों में फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए सरकार ने परियोजना से जुड़े विस्तृत FAQ जारी किए हैं। पढ़ें- सरकार ने इस परियोजना को लेकर क्या बताया है?

सवाल 1 :- क्या ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना एक स्पष्ट रणनीतिक और राष्ट्रीय उद्देश्य की पूर्ति करती है?

जवाब :- ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना रणनीतिक, रक्षा और राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है, जिसे गहन जाँच और विचार-विमर्श के बाद शुरू किया गया है। यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है। परियोजना अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की मौजूदगी को मजबूत करेगी, समुद्री और रक्षा क्षमताओं को विकसित करेगी तथा द्वीप को वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के साथ जोड़ेगी। यह एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल भी स्थापित करेगी, जिसे बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के प्रतिस्पर्धी बंदरगाहों की तुलना में विशिष्ट लाभ प्राप्त होगा, जो भारत को एक प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करेगा।

सवाल 2 :- क्या परियोजना में विकास उद्देश्यों के साथ-साथ मजबूत पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय शामिल हैं?

जवाब :- परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक रूप से पहचान कर मूल्यांकन किया गया है और एक मजबूत ‘पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन’ (EIA) प्रक्रिया और एक विस्तृत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ (EMP) के माध्यम से उन्हें प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा रहा है।

यह मूल्यांकन EIA अधिसूचना, 2006 और ICRZ अधिसूचना, 2019 के अनुसार किया गया है। NGT के 3 अप्रैल, 2023 के आदेश, जिसमें NGT ने यह माना है कि इस परियोजना का महत्व न केवल द्वीप और उसके आस-पास के रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों के आर्थिक विकास से है बल्कि यह रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बहुत मायने रखता है। यहाँ तक कि अपीलकर्ताओं ने भी इन पहलुओं पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। हालाँकि ट्रिब्यूनल का विचार-विमर्श केवल रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री तक ही सीमित है, फिर भी हमने (बिना किसी टिप्पणी के) मीडिया रिपोर्टों पर भी गौर किया है, जिनमें यह बताया गया है कि यह क्षेत्र चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के अंतर्गत आता है, जिसका मुकाबला भारतीय अधिकारी भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईआईटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल रहे। इस दौरान वैज्ञानिक रूप से कठोर और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया गया। हिंद महासागर, भारत और चीन के रणनीतिक हितों के एक प्रमुख मिलन-बिंदु के रूप में उभरा है। इसके अलावा म्यांमार के शिकारियों द्वारा अंडमान के पर्यावरणीय समुद्री संसाधनों के बड़े पैमाने पर शिकार किया जा रहा है जिसके लिए कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। अवैध शिकार की इन गतिविधियों में मूँगों को नष्ट करना, शार्क मछलियों को मारना और कीमती मछलियों को पकड़कर ले जाना शामिल है। यह परियोजना द्वीप में बुनियादी ढाँचे की कमी को दूर करने में मदद करेगी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देगी, जिससे ट्रांसशिपमेंट कार्गो (माल के हस्तांतरण) पर होने वाली भारी राशि की बचत होगी।

ग्रेट निकोबार में मजबूत और स्थायी रक्षा उपस्थिति की उपलब्धता भारत को समुद्री मार्गों की प्रभावी निगरानी और सुरक्षा सुनिश्चित करने में सक्षम बनाती है तथा हिंद महासागर में विदेशी शक्तियों की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने में मदद करती है।

उपरोक्त विवरण से पता चलता है कि ग्रेट निकोबार परियोजना अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व की है। यह आर्थिक विकास, अवसंरचना निर्माण और रोजगार सृजन के उद्देश्यों को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के साथ जोड़ती है। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक और विकासात्मक हितों को मजबूती मिलती है।

सवाल 3 :- क्या इस परियोजना में द्वीप के वनों और वृक्षों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

जवाब :- इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की पूरी तरह से पहचान की गई है। एक मजबूत ‘पर्यावरणीय प्रभाव आकलन’ (ईआईए) प्रक्रिया तथा एक विस्तृत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ (ईएमपी) के जरिए उनका प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा रहा है। यह मूल्यांकन ईआईए अधिसूचना, 2006 और आईसीआरजेड अधिसूचना,2019 के अनुसार किया गया था। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), और सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थानों के साथ-साथ आईटीटी, एनआईओटी, एनसीसीआर और एनआईओ जैसे प्रमुख तकनीकी निकाय शामिल थे। इसने वैज्ञानिक रूप से सख्त और बहु-विषयक मूल्यांकन सुनिश्चित किया।

उनके निष्कर्षों के आधार पर, पर्यावरणीय मंजूरी में कड़े शमन और संरक्षण उपायों को शामिल किया गया है। इनमें जैव विविधता संरक्षण योजनाएं, कोरल संरक्षण और स्थानांतरण, वन्यजीव प्रबंधन रणनीतियां तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी शामिल हैं। पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) को पर्याप्त वित्तीय आवंटन और संस्थागत निगरानी का समर्थन प्राप्त है। यह निर्माण और संचालन दोनों चरणों के दौरान शमन उपायों के निरंतर क्रियान्वयन का प्रावधान करती है, जिससे पारिस्थितिक प्रभावों को न्यूनतम, निगरानी में और प्रभावी ढंग से जवाबदेह तरीके से प्रबंधित किया जा सके।

सवाल 4 :- क्या द्वीप के जंगलों और पेड़ों के आवरण को पर्याप्त रूप से संरक्षित और क्षतिपूर्ति दी जाएगी?

जवाब :- विकास के लिए केवल 166.1 वर्ग किमी क्षेत्र प्रस्तावित है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुल क्षेत्रफल का लगभग 2% है। इसके अतिरिक्त, परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किमी वन क्षेत्र को डायवर्ट करने का प्रस्ताव है, जो कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82% है।

डायवर्ट की जाने वाली 130.75 वर्ग किमी वन भूमि में पेड़ों की कुल अनुमानित संख्या 18.65 लाख है। इनमें से, 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में अधिकतम 7.11 लाख पेड़ों को काटे जाने का अनुमान है। पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से की जाएगी: चरण I (2025–2035) में 2.79 लाख पेड़, चरण II (2036–2041) में 3.41 लाख पेड़ और चरण III (2042–2047) में 0.91 लाख पेड़ काटे जाएंगे। इसके अलावा, ईसी (ईसी) और एफसी (एफसी) की शर्त के अनुसार, 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को बिना किसी पेड़ की कटाई के हरित क्षेत्र के रूप में रखा जाएगा।

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत 22.05.2019 के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 75% से अधिक वन आवरण वाले राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) के लिए गैर-वन भूमि प्रदान करने से छूट दी गई है और ऐसा प्रतिपूरक वनीकरण इसके बजाय उपलब्ध लैंड बैंक वाले अन्य राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में किया जा सकता है।

चूँकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 75% से अधिक वन आवरण है, इसलिए प्रतिपूरक वनीकरण (सीए) केंद्र शासित प्रदेश के बाहर प्रस्तावित है। 130.75 वर्ग किमी वन भूमि के डायवर्जन की भरपाई एक व्यापक क्षतिपूरक वनीकरण योजना के माध्यम से की गई है। कुल 24,750.93 हेक्टेयर भूमि वनीकरण के लिए चिन्हित की गई है, जिसमें 1,414.95 हेक्टेयर गैर-वन भूमि (डायवर्ट किए गए क्षेत्र के बराबर) और उससे दोगुना से अधिक क्षेत्र क्षतिग्रस्त वन भूमि शामिल है। इसमें लगभग 17,000 हेक्टेयर हरियाणा में और 6,320.10 हेक्टेयर मध्य प्रदेश में है, जिससे पर्याप्त पारिस्थितिक प्रतिपूरण सुनिश्चित होता है।

हरियाणा में प्रतिपूरक वनीकरण के के लिए जिस जमीन का चिह्नीकरण किया गया है उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा नष्ट हो चुके वन क्षेत्रों से बना है, जिसमें पीएलपीए भूमि भी शामिल है, जो काफी हद तक अरावली क्षेत्र के भीतर स्थित हैं। इन क्षेत्रों को प्रचलित दिशा-निर्देशों के अनुसार पारिस्थितिक बहाली के लिए निर्धारित किया गया है।

सवाल 5 :- क्या जनजातीय समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, ताकि उनकी संस्कृति और अधिकारों की निरंतरता बनी रहे?

जवाब :- ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में जनजातीय समुदायों के संरक्षण के लिए सभी वैधानिक प्रक्रियाओं और नीतिगत सुरक्षा उपायों का विधिवत पालन किया गया है। आवश्यक परामर्श सक्षम प्राधिकरणों और क्षेत्र विशेषज्ञों, जैसे कि भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण, जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा अन्य हितधारकों के साथ, जारवा नीति 2004 और शॉम्पेन नीति 2015 के अनुरूप किया गया है। वरिष्ठ अधिकारियों और प्रतिष्ठित मानवविज्ञानियों से गठित सशक्त समिति ने स्पष्ट रूप से सुनिश्चित किया है कि विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (पीवीटीजीएस), खासकर शॉम्पेन समुदाय के हितों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। जनजातीय आबादी के किसी भी विस्थापन की अनुमति नहीं दी जाएगी। परियोजना को वन अधिकार अधिनियम, 2006 का पालन करते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी प्राप्त कर लिया है।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप में 751.070 वर्ग किमी भूमि को आधिकारिक रूप से जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। प्रस्तावित 166.10 वर्ग किमी विकास क्षेत्र में से 84.10 वर्ग किमी जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के साथ ओवरलैप करता है। इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी भूमि 1972 से राजस्व भूमि के रूप में पहले से ही उपयोग में है। शेष 73.07 वर्ग किमी क्षेत्र को परियोजना उद्देश्यों के लिए अधिसूचना से मुक्त किया जा रहा है। इसके प्रतिपूरण के लिए 76.98 वर्ग किमी क्षेत्र को पुनः जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया जा रहा है, जिससे कुल मिलाकर 3.912 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि होती है। चरण-I में केवल 40.01 वर्ग किमी जनजातीय क्षेत्र शामिल है, जिसमें से 11.032 वर्ग किमी 1972 से राजस्व उपयोग में है।

सवाल 6 :- क्या यह परियोजना प्राकृतिक विरासत की रक्षा और राष्ट्रीय विकास को आगे बढ़ाने के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है?

इस परियोजना का व्यापक वैज्ञानिक और नियामक मूल्यांकन किया गया है, जिसमें द्वीप की जैव विविधता की विशिष्टता को ध्यान में रखा गया है। परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है, जिसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस मूल्यांकन के आधार पर, किसी भी संभावित प्रभाव से बचने, उसे कम करने और नियंत्रित करने के लिए सख्त और प्रवर्तनीय शर्तों के साथ एक मजबूत ‘पर्यावरण प्रबंधन योजना’ निर्धारित की गई है।

परियोजना को एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ तैयार किया गया है, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को रणनीतिक और राष्ट्रीय विकास के उद्देश्यों के साथ जोड़ा गया है। जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक शमन उपाय, निरंतर निगरानी तंत्र और संस्थागत पर्यवेक्षण की व्यवस्था की गई है। इस प्रकार, यह परियोजना एक सुविचारित पहल है, जिसमें पर्यावरणीय चिंताओं का समाधान करते हुए राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।

सवाल 7 :- क्या यह परियोजना सुव्यवस्थित रूप से नियोजित, व्यवहार्य और दीर्घकालिक प्रभाव को ध्यान में रखकर तैयार की गई है?

जवाब :- परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत और बहु-स्तरीय आकलन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप किया गया है। इसमें द्वीप की पारिस्थितिक संवेदनशीलता और जैव विविधता के महत्व को उचित महत्व दिया गया है। इस आकलन के आधार पर संभावित प्रभावों से बचने, उन्हें कम करने और नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तथा सख्त और लागू करने योग्य शर्तें निर्धारित की गई हैं।

सवाल 8 :- क्या पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया पूरी तरह से हुई है और क्या इसकी स्वतंत्र न्यायिक जाँच हुई है?

जवाब :- परियोजना का मूल्यांकन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना, 2019 के अनुरूप व्यापक रूप से किया गया है। सभी संबंधित पर्यावरणीय पहलुओं की विशेषज्ञ संस्थाओं द्वारा गहन जाँच की गई। पर्यावरणीय मंजूरी में विस्तृत और लागू करने योग्य शर्तें शामिल हैं, जिन्हें एक मजबूत पर्यावरण प्रबंधन योजना और निरंतर निगरानी तंत्र का समर्थन प्राप्त है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सभी पहचानी गई पर्यावरणीय चिंताओं का उचित समाधान किया गया है।

इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया जाता है कि इस परियोजना ने पर्यावरणीय मामलों के निपटारे के लिए स्थापित विशेष वैधानिक निकाय, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष न्यायिक जाँच का सामना किया है। माननीय अधिकरण ने याचिकाओं, अभिलेखों और विशेषज्ञों के सुझावों पर विचार करने के बाद निर्णय प्रक्रिया को बरकरार रखा। इससे यह पुष्टि होती है कि पर्यावरणीय चिंताओं की कानून के अनुसार विधिवत जांच की गई है और समाधान किया गया है।

देश के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट के अपग्रेडेशन को मोदी सरकार ने दी मंजूरी: जानिए ‘कुडनकुलम परियोजना’ से ऊर्जा क्षेत्र में कैसे आत्मनिर्भर होगा भारत

ईरान और इजरायल के बीच चल रहे तनाव ने एक तरफ जहाँ पश्चिम एशिया की स्थिति को अस्थिर किया है, वहीं इसका सीधा असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ रहा है।

खासकर होर्मुज स्ट्रेट, जो वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का सबसे अहम समुद्री रास्ता माना जाता है, वहाँ जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई में कमी आई है और कई देशों में ऊर्जा संकट जैसे हालात बनने लगे हैं। इसी वजह से पेट्रोल, डीजल और LPG की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिससे आम लोगों पर महँगाई का दबाव और बढ़ गया है।

ऐसे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच दुनिया भर के देश अब ऊर्जा के वैकल्पिक और स्थायी स्रोतों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। इसी दिशा में भारत भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए परमाणु ऊर्जा (न्यूक्लियर पावर) पर खास जोर दे रहा है।

इसी कड़ी में देश के सबसे बड़े न्यूक्लियर प्रोजेक्ट कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट (KKNPP) की यूनिट 5 और 6 को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है। इस प्रोजेक्ट को परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने मंजूरी दे दी है। यह बोर्ड परमाणु ऊर्जा के उपयोग से होने वाले जोखिमों को नियंत्रित करता है। इस मंजूरी का मतलब है कि अब न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड प्लांट के बड़े-बड़े उपकरण लगा सकती है।

कुडनकुलम यूनिट 5 और 6 को मिली अहम मंजूरी

परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) ने तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट की यूनिट 5 और 6 में प्रमुख उपकरणों की स्थापना के लिए मंजूरी दे दी है। यह अनुमति 30 अप्रैल 2026 को जारी की गई है। इस मंजूरी के बाद अब न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) इन दोनों यूनिट्स में महत्वपूर्ण उपकरणों की इंस्टॉलेशन का काम शुरू कर सकेगा।

इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर प्लांट के निर्माण का एक बेहद महत्वपूर्ण चरण माना जाता है, क्योंकि इसके बाद ही रिएक्टर के मुख्य सिस्टम को स्थापित किया जाता है। इस मंजूरी के तहत रिएक्टर प्रेशर वेसल, स्टीम जनरेटर और कूलेंट पंप जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण उपकरण लगाए जाएँगे, जो किसी भी न्यूक्लियर रिएक्टर के सुरक्षित और स्थिर संचालन के लिए जरूरी होते हैं।

AERB ने यह अनुमति विस्तृत और मल्टी-लेवल सुरक्षा समीक्षा के बाद दी है, जिसमें रिएक्टर डिजाइन, निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की गहन जाँच की गई।

तमिलनाडु में भारत का सबसे बड़ा न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट

कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित 6000 मेगावाट का बनने वाला ये परमाणु ऊर्जा केंद्र भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट है। केंद्र है। इस परियोजना में कुल 6 प्रेसराइज्ड वॉटर रिएक्टर (VVER डिजाइन) बनाए जा रहे हैं, जिनमें हर रिएक्टर की क्षमता 1000 मेगावाट है।

अब तक की स्थिति के अनुसार

  • यूनिट 1 और 2: पहले से चालू (2013 और 2015 से)
  • यूनिट 3 और 4: निर्माण के उन्नत चरण में
  • यूनिट 5 और 6: अब उपकरण इंस्टॉलेशन की मंजूरी मिली

यह पूरा प्रोजेक्ट भारत और रूस के तकनीकी सहयोग से बनाया जा रहा है। इसमें VVER तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। रूस भारत का एक प्रमुख साझेदार है और इस परियोजना को दोनों देशों की मजबूत परमाणु साझेदारी का उदाहरण माना जाता है।

NPCIL के अनुसार, कुडनकुलम की यूनिट 1 और 2 अब तक 121 बिलियन यूनिट बिजली पैदा कर चुकी हैं। इसके साथ ही लगभग 104 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका गया है। यह दिखाता है कि परमाणु ऊर्जा न सिर्फ बिजली उत्पादन में मदद करती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाती है।

भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए लगातार नए प्रोजेक्ट्स और मौजूदा संयंत्रों का विस्तार किया जा रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी कहा है कि रूस भारत का सबसे भरोसेमंद साझेदार है और कुडनकुलम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

जनसंख्या संकट या अमर होने की चाह?: रूस में लोगों की उम्र बढ़ाने के लिए चल रहा ₹2.5 लाख करोड़ का सीक्रेट हेल्थ मिशन, जानिए कैसे काम करेगी ‘एंटी-एजिंग वैक्सीन’

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इस बार वजह युद्ध, राजनीति या परमाणु शक्ति नहीं बल्कि ‘बुढ़ापे को रोकने’ की महत्वाकांक्षी योजना है। रूस ने आधिकारिक तौर पर ऐसे प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है जिसे वहाँ के अधिकारी ‘एंटी-एजिंग वैक्सीन’ (Anti-Aging Vaccine) या ‘बुढ़ापे के खिलाफ जीन थेरेपी’ बता रहे हैं।

दावा किया जा रहा है कि यह तकनीक इंसानी कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है। रूस सरकार ने इसके लिए 2 ट्रिलियन रूबल यानी करीब 26 अरब डॉलर (करीब ₹2.5 लाख करोड़) से ज्यादा का बजट तय किया है। यह सिर्फ कोई वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि रूस की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बन चुका है।

तेजी से घटती आबादी, कम होती औसत आयु और सत्ता के शीर्ष पर बैठे बुजुर्ग नेतृत्व के बीच रूस अब लंबी और स्वस्थ जिंदगी को राष्ट्रीय मिशन की तरह पेश कर रहा है। लेकिन इस पूरे प्रोजेक्ट के केंद्र में व्लादिमीर पुतिन का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है।

आखिर क्या है रूस की एंटी-एजिंग वैक्सीन?

रूस के विज्ञान एवं उच्च शिक्षा मंत्रालय के उपमंत्री डेनिस सेकीरिंस्की ने खुलासा किया कि वैज्ञानिक ‘RAGE’ नाम के एक रिसेप्टर पर काम कर रहे हैं। RAGE यानी ‘Receptor for Advanced Glycation Endproducts’ शरीर की कोशिकाओं में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से जुड़ा माना जाता है।

रूसी वैज्ञानिकों का दावा है कि जब यह रिसेप्टर सक्रिय होता है तो कोशिकाएँ बूढ़ी होने लगती हैं। अगर इसे ब्लॉक कर दिया जाए, तो कोशिकाओं की ‘युवावस्था’ लंबे समय तक बरकरार रखी जा सकती है। रूस इसे पारंपरिक वैक्सीन की तरह नहीं बल्कि ‘जीन थेरेपी ड्रग’ बता रहा है।

मतलब यह शरीर के भीतर जाकर कोशिकाओं के व्यवहार को प्रभावित करने की कोशिश करेगी। रूसी अधिकारियों का कहना है कि उनका लक्ष्य दुनिया की पहली ऐसी जीन थेरेपी तैयार करना है जो सीधे बुढ़ापे की जैविक प्रक्रिया को निशाना बनाए। हालाँकि अभी तक इस तकनीक का परीक्षण केवल लैब और जानवरों पर हुआ है।

इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू नहीं हुए हैं। रूस की उप प्रधानमंत्री तात्याना गोलिकोवा ने कहा है कि 2028 से 2030 के बीच इस एंटी-एजिंग दवा का उत्पादन शुरू हो सकता है।

क्यों बुढ़ापे से लड़ना चाहता है रूस?

रूस इस समय गंभीर जनसंख्या संकट से गुजर रहा है। वहाँ पुरुषों की औसत आयु करीब 67 साल मानी जाती है, जो अमेरिका और कई यूरोपीय देशों से काफी कम है। लगातार युद्ध, शराबखोरी, स्वास्थ्य समस्याएँ और घटती जन्मदर रूस के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी हैं।

ऐसे में क्रेमलिन ‘स्वस्थ दीर्घायु’ को राष्ट्रीय रणनीति के रूप में देख रहा है। रूस का नया राष्ट्रीय प्रोजेक्ट ‘New Technologies for Health Preservation’ इसी सोच के तहत शुरू किया गया। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य सिर्फ बीमारियों का इलाज नहीं बल्कि उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना है।

रूस का दावा है कि इससे लाखों लोगों की जिंदगी लंबी और स्वस्थ हो सकती है। इस प्रोजेक्ट के तहत सिर्फ एंटी-एजिंग दवा ही नहीं, बल्कि जैविक उम्र मापने वाली टेस्ट सिस्टम, उम्र से जुड़ी बीमारियों की शुरुआती पहचान और दिमागी क्षमताओं को सुधारने वाले उपकरणों पर भी काम हो रहा है। रूसी सरकार इसे भविष्य की चिकित्सा क्रांति की तरह पेश कर रही है।

पुतिन और उनका ‘अमरता’ का जुनून

व्लादिमीर पुतिन की छवि हमेशा से एक मजबूत, ऊर्जावान और बेहद फिट नेता की रही है। घोड़े पर बिना शर्ट के बैठना, बर्फीले पानी में तैरना, जूडो खेलना, आइस हॉकी खेलना, जंगलों में लंबी सैर करना, रूसी प्रचार मशीन ने सालों से पुतिन को ‘अल्फा मेल’ की तरह पेश किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुतिन अपने स्वास्थ्य और लंबी उम्र को लेकर बेहद सजग हैं। वह कम शुगर वाला हाई-प्रोटीन डाइट लेते हैं, मछली और ताजी सब्जियाँ खाते हैं, रोजाना वर्कआउट करते हैं और नियमित तैराकी करते हैं। रूस और पश्चिमी मीडिया में कई बार यह भी दावा किया गया कि पुतिन ‘एंटलर बाथ’ लेते हैं।

इसमें हिरण के युवा सींगों से निकाले गए अर्क वाले गर्म पानी में स्नान कराया जाता है। समर्थक दावा करते हैं कि इससे त्वचा और शरीर को ‘युवा’ बनाए रखने में मदद मिलती है, हालाँकि वैज्ञानिक रूप से यह पूरी तरह प्रमाणित नहीं है। इस प्रक्रिया को लेकर पशु क्रूरता के आरोप भी लगते रहे हैं।

रूसी मीडिया में यह भी चर्चा रही कि पुतिन लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की सोच रखते हैं। 2020 में रूस के संविधान में बदलाव के बाद उनके लिए 2036 तक राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता खुल गया। उस समय उनकी उम्र 83 साल होगी।

पुतिन और शी जिनपिंग की ‘अमरता’ वाली बातचीत

इस मुद्दे ने तब और सुर्खियाँ बटोरीं जब चीन में एक सैन्य परेड के दौरान पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत ‘हॉट माइक’ में रिकॉर्ड हो गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत में पुतिन ने कहा कि बायोटेक्नोलॉजी के विकास के साथ इंसानों के अंग लगातार बदले जा सकेंगे और लोग और ज्यादा युवा होते जाएँगे, यहाँ तक कि अमरता भी संभव हो सकती है।

जवाब में शी जिनपिंग की तरफ से कहा गया कि इस सदी के अंत तक इंसान 150 साल तक जी सकता है। यह बातचीत सिर्फ सामान्य चर्चा नहीं मानी गई, क्योंकि दोनों नेता लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की महत्वाकांक्षा से जुड़े रहे हैं। चीन और रूस दोनों में नेतृत्व तेजी से केंद्रीकृत हुआ है और दोनों देशों में लंबी उम्र को लेकर शीर्ष स्तर पर रुचि दिखाई देती रही है।

इस प्रोजेक्ट के पीछे कौन लोग हैं?

रूस की खोजी मीडिया संस्था Meduza की रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे एंटी-एजिंग प्रोजेक्ट के पीछे पुतिन के करीबी और कुरचातोव इंस्टीट्यूट के प्रमुख मिखाइल कोवालचुक की बड़ी भूमिका बताई जाती है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि कोवालचुक ‘अनंत जीवन’ और ‘रूसी जीनोम’ जैसी अवधारणाओं को लेकर बेहद उत्साहित रहते हैं।

इसी नेटवर्क में पुतिन की कथित बड़ी बेटी मारिया वोरोन्त्सोवा का नाम भी आता है, जो एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हैं और रूस के जेनेटिक्स व लंबी उम्र से जुड़े रिसर्च प्रोग्राम से जुड़ी बताई जाती हैं। रूस में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया और जीन आधारित चिकित्सा पर कई सरकारी प्रोजेक्ट चल रहे हैं।

पुतिन के करीबी माने जाने वाले वैज्ञानिक व्लादिमीर खाविन्सन भी लंबे समय तक ‘एंटी-एजिंग’ शोध से जुड़े रहे। उन्होंने पेप्टाइड आधारित कई दवाओं और सप्लीमेंट्स पर काम किया था।

भारतीय मीडिया की एक शैली यह भी- हर अपराध में गढ़ो ‘सवर्ण विलेन’

हेडलाइन 1: कार में बंधक बुजुर्ग, दबंग और दरिंदगी… बोतल में भरकर पेशाब पिलाई, रायसेन कांड की पूरी कहानी
हेडलाइन 2: दलित दूल्हे को मंदिर जाने से रोका, विरोध के बाद हुक्का-पानी बंद
हेडलाइन 3: अजमेर में शादी के दौरान दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने का विरोध, पुलिस के साये में निकली बारात

आए दिन आप समाचार पत्रों और न्यूज वेबसाइट्स पर इस तरह की हेडलाइन पढ़ते होंगे। इस मामले में हिंदी-अंग्रेजी का विभेद नहीं है। हर भाषा में इस तरह के हेडलाइंस मिलते हैं।

इनको पढ़ते ही आपके मस्तिष्क में पहली छवि क्या उभरती है? आपको लगता है कि आरोपित कथित ऊँची जातियों से होंगे।

सामान्य वर्ग से आप करें घृणा, इसलिए हेडलाइन से नैरेटिव गढ़ रही भारतीय मीडिया

आगे बढ़ने से पहले इन तीनों हेडलाइन की सच्चाई संक्षेप में जान लेते हैं।

हेडलाइन 1 की सच्चाई

यह मामला मध्य प्रदेश के रायसेन का है। एक युवक गाँव की नाबालिग लड़की को भगा ले गया, उसके बाद यह घटना हुई। पीड़ित और आरोपित दोनों ST समुदाय से हैं।

हेडलाइन 2 की सच्चाई

दलित जोड़े ने मंदिर में प्रवेश करने से रोकने का आरोप जिन पर लगाया, वे ओबीसी हैं। पंचायत कर उनका हुक्का-पानी बंद करने वाले लोगों में दलित परिवार भी शामिल हैं। दलित दूल्हे द्वारा अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के बाद यह पंचायत हुई। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि दलित जोड़ा जब मंदिर आया तो दरवाजे बंद थे, इसलिए उन्हें अनुमति नहीं दी गई।

हेडलाइन 3 की सच्चाई

अजमेर के जिस लवेरा गाँव का यह मामला है, वह गुर्जर बहुल है। गुर्जर ओबीसी समुदाय में आते हैं। दलित दूल्हे के घोड़ी पर बैठने का विरोध गाँव के ऊँची जाति के किसी व्यक्ति ने नहीं किया था। न गुर्जरों ने। इस पूरे मामले का जाति से कोई लेना-देना ही नहीं था। गाँव में 20 साल पहले हुई एक घटना के कारण एहतियातन पुलिस की तैनाती की गई थी।

एससी बनाम एससी, एसटी बनाम एसटी, दलित बनाम ओबीसी जैसे ऐसे हर एक मामले को भारतीय मीडिया दशकों से इसी तरह परोसती है, क्योंकि वे इस वामपंथी प्रोपेगेंडा को स्थापित करना चाहते हैं कि जब भी एससी, एसटी, ओबीसी पीड़ित दिखे तो आपको लगे कि आरोपित कथित ऊँची जातियों के ही होंगे। आज जो सामान्य वर्ग के लोगों के प्रति नफरत, ब्राह्णवाद हो बर्बाद जैसे नारे हमें सुनाई पड़ते हैं, वह दशकों से भारतीय मीडिया के इसी एजेंडे की उपज हैं।

ये ठीक उसी तरह है जैसे कोई मौलाना, कोई आलिम, कोई पादरी भी कोई अपराध करे तो शीर्षक में ‘पुजारी-प्रीस्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर आपके मस्तिष्क के साथ खिलवाड़ किया जाता है। ऐसी खबरों में प्रतीकात्मक चित्र भी इस तरह के इस्तेमाल किए जाते हैं कि आपको लगे कि आरोपित हिंदू पुजारी या संत ही हैं।

जब खबरों में जातीय पहचान स्पष्ट नहीं होती, तब भी मीडिया हेडलाइन को इसी तरह स्पिन करती है ताकि पाठक स्वतः मान ले कि आरोपित तथाकथित ‘ऊँची जाति’ से ही होंगे। यह सिर्फ भाषा का मसला नहीं है। यह नैरेटिव निर्माण की भारतीय मीडिया की एक स्थापित शैली है। जब खबर के इनपुट नैरेटिव के अनुसार हो तो जाति खुलकर बताओ और जब न हो या छिपानी हो तो ‘दबंग’, ‘युवक’, ‘मनचले’, ‘भीड़’, ‘विशेष समुदाय’ जैसे शब्द काम में लाओ।

आपने गौर किया होगा कि जब आरोपित ब्राह्मण, ठाकुर या किसी अन्य सवर्ण समुदाय से होते हैं, तो कई मीडिया संस्थान बिना झिझक हेडलाइन में लिखते हैं;

  • दलित युवक की ठाकुरों ने की पिटाई
  • ब्राह्मण परिवार ने दलित महिला को प्रताड़ित किया
  • उच्च जाति के लोगों ने मंदिर में प्रवेश से रोका

हम यह नहीं कहते कि ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग नहीं होनी चाहिए। न हम यह कह रहे हैं कि ऐसे मामलों में तथ्य छिपाने चाहिए। लेकिन जब इस तरह की अन्य घटनाओं में इसी मापदंड को लागू नहीं किया जाता है तो यह समस्या बन जाती है।

रोज हम ऐसी खबरों को देखते हैं जिसमें आरोपित के OBC, SC/ST या राजनीतिक रूप से संवेदनशील किसी समुदाय से होने पर, मीडिया हेडलाइन से उसकी जातीय पहचान गायब कर देती है। चाहे ऑनर किलिंग से जुड़े मामले हो या चुनावी हिंसा या मजहबी समूह के उपद्रव।

ऐसे मामलों को ‘दबंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर ऊँची जातियों से जोड़ने का प्रयास किया जाता है या फिर भीड़, विशेष समुदाय, दोस्त, स्थानीय लोग जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर उनकी पहचान छिपा दी जाती है। इसके ठीक उलट जब मामला मुस्लिमों से जुड़े सामान्य विवाद का भी हो और आरोपित हिंदू हो तो मीडिया तुरंत उसकी धार्मिक पहचान को उजागर कर देती है।

वैसे भी ‘दबंग’ कोई ऐसा शब्द नहीं है जो किसी खास समूह की पहचान हो। या फिर यह कोई कानूनी शब्द भी नहीं है जिससे अपराध की व्याख्या होती हो। असल में यह ऐसा शब्द है जो अक्सर तथ्यों की जगह पूर्वाग्रह से उपजा होता है।

‘दबंग’ के जरिए पाठक के मन में एक खास सामाजिक छवि को उभारने का प्रयास किया जाता है। पाठक को लगे की आरोपित गाँव का कोई प्रभावशाली व्यक्ति होगा। ​ऊँची जाति से होगा। उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होगा। लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं होती। ऊपर के उदाहरणों से यह पहले ही स्पष्ट है।

अब सवाल है कि भारतीय मीडिया ऐसा क्यों करती है? इसका सबसे बड़ा कारण है भारत की मुख्यधारा की मीडिया पर वामपंथी-लिबरल गैंग का कब्जा। इनके पूर्व निर्धारित वैचारिक फ्रेम हैं। जिसमें हर घटना को उत्पीड़क बनाम पीड़ित के तय प्रोपेगेंडा में फिट कर परोसा जाता है। कुछ समुदायों का नाम लेने से यह बचते हैं। जमीन की सामाजिक जटिलताओं की समझ का अभाव भी शहरों के वातानुकूलित न्यूजरूम में बैठे पत्रकारों के पास है। इसके अलावा क्लिकबेट पत्रकारिता भी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने में योगदान दे रही है, क्योंकि सनसनीखेज शब्द ज्यादा बिकते हैं।

इसके कारण पाठकों को घटनाओं की अधूरी जानकारी मिलती है। सामाजिक अविश्वास बढ़ता है। जमीनी समस्याओं की न तो सही से पहचान हो पाती है और न ही उनका समाधान निकलता है। साथ ही पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी गिरती है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि ऐसे हर मामले में जाति/समुदाय की पहचान केवल तभी बताई जाए, जब वह घटना के संदर्भ में प्रासंगिक हो। मसलन पानी के पाइप के लिए दो पड़ोसियों के बीच विवाद होने पर पीड़ित को ‘दलित-मुस्लिम’ बताना और आरोपित को ‘दबंग-हिंदू’ बताना, क्योंकि यह विवाद जाति या मजहब के कारण नहीं हुई है। या फिर मीडिया को यह तय करना चाहिए कि जाति-धर्म के चयनात्मक खुलासे की जगह वह हर मामले में आरोपित की जाति-मजहब का स्पष्ट रूप से उल्लेख करेगी।

वैसे भी पत्रकारिता का काम तथ्य बताना है। सोशल इंजीनियरिंग गढ़ना या तुष्टिकरण करना नहीं। इसके ठेकेदार राजनीतिक दल देश में पहले से भरे पड़े हैं। पत्रकारिता को उनका औजार नहीं बनना चाहिए।

सार्वजनिक जगहों पर नहीं पढ़ सकते नमाज: इलाहाबाद हाई कोर्ट, जानिए प्राइवेट प्रॉपर्टी पर होने वाली मजहबी गतिविधियों के लिए अदालत ने क्या कहा

उत्तर प्रदेश के संभल में सार्वजनिक जमीन पर नमाज पढ़ने की अनुमति से जुड़े मामले में दाखिल याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शुक्रवार (1 मई 2026) को खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सार्वजनिक उपयोग की जमीन पर किसी एक समुदाय या पक्ष का विशेष अधिकार नहीं हो सकता और ऐसी जगह का इस्तेमाल नियमित मजहबी गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मजहबी स्वतंत्रता पूर्ण रूप से निरंकुश अधिकार नहीं है, बल्कि यह दूसरे लोगों के अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और शांति से जुड़ी संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। कोर्ट के मुताबिक यदि कोई पक्ष पहले से चली आ रही परंपरा से अलग कोई नई व्यवस्था लागू करने की कोशिश करता है, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।

निजी संपत्ति पर नियमित ऐसे आयोजन भी नियंत्रण के दायरे में

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि निजी संपत्ति पर सीमित और व्यक्तिगत मजहबी गतिविधियाँ संविधान के तहत संरक्षित हो सकती हैं, लेकिन जब वही गतिविधि नियमित, संगठित और बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी वाली सभा का रूप ले लेती है, तब उसका असर सार्वजनिक जीवन पर पड़ने लगता है।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधियों से आवाजाही, ट्रैफिक, सुरक्षा व्यवस्था, शोर और सामाजिक संतुलन जैसे मुद्दे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में प्रशासन को यह अधिकार है कि वह कानून और स्थानीय नियमों के तहत आवश्यक नियंत्रण लागू करे।

कोर्ट ने साफ किया कि किसी निजी परिसर को बिना नियमन के सार्वजनिक मजहबी स्थल में बदलने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने पुराने फैसलों की भी दी स्पष्ट व्याख्या

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उन पुराने आदेशों का भी उल्लेख किया जिनमें निजी संपत्ति पर प्रार्थना सभा के लिए अनुमति की आवश्यकता न होने की बात कही गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन फैसलों का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि निजी जमीन पर होने वाली हर प्रकार की सामूहिक धार्मिक गतिविधि प्रशासनिक नियंत्रण से पूरी तरह बाहर है।

कोर्ट ने कहा कि पहले दिए गए निर्णय केवल सीमित, निजी और गैर-विघटनकारी धार्मिक गतिविधियों तक ही लागू माने जाएँगे। यदि किसी गतिविधि का दायरा बढ़कर सार्वजनिक प्रभाव पैदा करने लगे, तो उस पर कानून लागू होगा। कोर्ट ने कहा कि संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है, इसलिए राज्य का दायित्व है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था और समान पहुँच सुनिश्चित करे।

क्या था संभल का मामला?

यह पूरा मामला संभल जिले के इकौना गाँव से जुड़ा है। याचिकाकर्ता असीन ने दावा किया था कि उन्हें वर्ष 2023 में 82.80 वर्गमीटर जमीन उपहार के रूप में मिली थी और उसी आधार पर वहाँ नमाज अदा करने की अनुमति माँगी गई थी।

हालाँकि राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों में सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज है और वहाँ नियमित रूप से केवल ईद के मौके पर नमाज होती रही है। सरकार ने यह भी कहा कि अब नियमित और बड़े स्तर पर सामूहिक नमाज शुरू करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें गाँव के बाहर से लोगों को भी बुलाया जा रहा है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक जमीन पर किसी भी व्यक्ति का विशेष दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि भले ही जमीन को निजी मान लिया जाए, तब भी नियमित सामूहिक धार्मिक आयोजन प्रशासनिक और कानूनी नियंत्रण से बाहर नहीं हो सकते।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य को किसी संभावित विवाद या अव्यवस्था के वास्तविक रूप लेने का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी गतिविधि से सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका हो, तो प्रशासन पहले से एहतियाती कदम उठा सकता है।

महिलाओं की अस्मिता पर करनी थी बात, सपा सांसद का उमड़ आया टीपू सुल्तान के लिए प्यार: छवि चमकाने के लिए ‘स्तन-कर’ पर झूठ फैलाया, जानें सच

समाजवादी पार्टी के सांसद तूफानी सरोज ने 30 अप्रैल 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में एक ऐसा बयान दिया जिसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य हिंदू इतिहास और हिंदू धर्म को कलंकित करना है।

तूफानी सरोज ने कहा, “टीपू सुल्तान ने महिलाओं को स्तन ढंकने का अधिकार दिया था। स्तन न ढकने के लिए कानून था। ये आज से नहीं आदिकाल से है। आप देख लीजिए।”

सपा सांसद का यह बयान ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी तो करता ही है, पर साथ ही उस सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है जिसमें हिंदू राजाओं और हिंदू समाज को गलत ठहराकर मुस्लिम शासकों को ‘नायक’ के रूप में जनता के सामने परोसा जा रहा है।

झूठ को चीखकर सच बताने की कोशिश

तूफानी सरोज का यह दावा आधा-अधूरा सच है जिसे इस तरह परोसा गया है कि वह पूरी तरह झूठ बन जाता है। हाँ, टीपू सुल्तान ने केरल में महिलाओं के सार्वजनिक रूप से स्तन ढंकने का आदेश दिया था। लेकिन इसे ‘अधिकार देना’ कहना ऐतिहासिक बेईमानी है। यह एक शरिया कानून से ओतप्रोत एक फरमान था, न कि कोई सामाजिक सुधार की कोशिश।

उस दौर में केरल की जलवायु और सांस्कृतिक परंपरा के अनुसार, जाति-निर्विशेष महिलाएं ऊपरी वस्त्र नहीं पहनती थीं। यहाँ तक कि 17वीं सदी के डच यात्री विलियम वैन नीयूहॉफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि त्रावणकोर की स्वयं रानी उमयम्मा रानी भी केवल कमर के नीचे वस्त्र पहनती थीं, ऊपरी भाग खुला हुआ था।

यह उस क्षेत्र की स्वाभाविक और स्वीकृत सांस्कृतिक परंपरा थी। टीपू सुल्तान ने इस परंपरा को तोड़ने के लिए इस्लामी शरिया की दृष्टि से एक फरमान जारी किया। उसका मकसद कोई महिला सशक्तिकरण करना नहीं था, बल्कि उस नीति का हिस्सा था।

इस नीति के तहत वो मलाबार और कोडागु में अपने इस्लामी मूल्यों को थोपना चाहता था। तूफानी सरोज ने इस फरमान को ‘अधिकार देना’ बताकर लोगों को भ्रमित किया।

ब्रेस्ट टैक्स जैसे ‘मिथक’ को बनाया गया राजनीतिक हथियार

तूफानी सरोज और सपा के इस बयान के पीछे ‘ब्रेस्ट टैक्स‘ या ‘मुलक्करम’ का वह विवादित इतिहास है जिसे त्रावणकोर राजवंश के खिलाफ बार-बार हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। आइए इस ‘टैक्स’ की असलियत समझते हैं।

मुलक्करम का शाब्दिक अर्थ है ‘स्तन कर’, लेकिन इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग इस नाम को भ्रामक मानता है। प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक मनु पिल्लई के अनुसार, यह टैक्स महिलाओं के स्तनों से नहीं, बल्कि लिंग-आधारित जनगणना कर से जुड़ा था।

पुरुषों के कर को ‘तलक्करम’ (सिर-कर) कहा जाता था और महिलाओं के कर को ‘मुलक्करम’ (स्तन-कर) कहा जाता था। यह केवल नामकरण की परंपरा थी, टैक्स का स्तनों से कोई सीधा संबंध नहीं था। यह एक जाति-आधारित ‘पोल टैक्स’ था जो नादार, एझवा जैसे अन्य अवर्ण (निम्न जाति) के समुदायों से लिया जाता था।

इस टैक्स को लेकर नंगेली की कहानी सबसे चर्चित है। हालाँकि उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता आज भी शक के दायरे में है। कई शोधकर्ताओं ने यह स्थापित किया है कि नंगेली की कहानी का कोई समकालीन ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस कहानी के सारे संदर्भ विशेषकर पिछले दो दशकों में सामने आए हैं।

विकिपीडिया के नंगेली लेख के सभी स्रोत हालिया हैं और कोई भी समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख नहीं है। इस कहानी को लोकप्रिय बनाने वाले एक मलयाली चित्रकार ‘चित्रकारन’ टी. मुरली हैं। उनके ब्लॉग पर हिंदू देवताओं व हिंदू संस्कृति के प्रति बेहद खराब विचार देखने को मिल सकते हैं।

यह जानना काफी जरूरी है कि ऊपरी वस्त्र पहनने का अधिकार देना और मुलक्करम लागू करना दो अलग-अलग मुद्दे थे। इन्हें प्रोपेगेंडा मीडिया चैनल और राजनेताओं ने एक नया ‘नैरेटिव’ बना दिया।

‘चन्नार विद्रोह’ (1813-1859) नादार महिलाओं के ऊपरी वस्त्र धारण करने के अधिकार के लिए था और इस संघर्ष में ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश सरकार की भूमिका थी। यह एक असल सामाजिक संघर्ष था।

इसे ‘ब्रेस्ट टैक्स’ की कहानी से जोड़कर त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक बताना इतिहास नहीं, समाजवादी पार्टी के तूफानी सरोज सरीखे नेताओं की राजनीति है।

एक और तथ्य जो इस पूरे ‘नैरेटिव’ को जड़ से उखाड़ फेंकता है वह ये कि अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप की अनेक जनजातियों में आज भी महिलाएँ ऊपरी वस्त्र धारण नहीं करतीं। यह उनकी अपनी सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, न कि किसी तरह के ‘उत्पीड़न’ का प्रमाण कहा जाएगा।

केरल की 18वीं-19वीं सदी की सांस्कृतिक परंपरा भी इसी श्रेणी में थी। समाजवादी पार्टी के नेता इस तथ्य को जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं क्योंकि उनका लक्ष्य तथ्य नहीं, हिंदू विरोधी प्रचार है।

सपा का ‘नायक’ टीपू सुल्तान असल में दक्षिण भारत का ‘विलेन’

अब बात करते हैं उस टीपू सुल्तान की जिसे समाजवादी पार्टी और उनके जैसे दल ‘महान सेनानी’ बताते हैं। पूरे दक्षिण भारत में खास तौर पर कर्नाटक, केरल और कोडागु की बात करें तो एक बड़ा समुदाय वहाँ आज भी टीपू सुल्तान को एक क्रूर, धार्मिक कट्टरपंथी शासक के तौर पर याद करता है।

कोडागु (कूर्ग) में टीपू सुल्तान ने कोडावा जनजाति के साथ जो अत्याचार किए, वे इतिहास में दर्ज हैं। 1788 में टीपू ने कोडागु पर आक्रमण किया और पूरे गाँव जला दिए।

उनके अपने दरबारी-जीवनीकार मीर हुसैन किरमानी के अनुसार, कुशलनगर, तलकावेरी, मदिकेरी सहित अनेक स्थानों को जलाया गया। टीपू ने स्वयं कुर्नूल के नवाब रनमस्त खान को लिखे पत्र में लिखा कि उन्होंने 40,000 कोडावा लोगों को बंदी बनाया और उन्हें इस्लाम में उठाया।

जबरन धर्मांतरित किए गए कोडावा मुसलमान आज ‘कोडव माप्ला’ कहलाते हैं और उनके कुलनाम आज भी हिंदू हैं। यही उनके धर्मांतरण की जबरन प्रकृति का सबसे बड़ा प्रमाण है।

इसके अलावा मालाबार में टीपू की सेना ने नायर समुदाय पर व्यापक अत्याचार किए। टीपू ने अपनी सेना को आदेश दिया था कि जिले के हर व्यक्ति को जला दिया जाए और सभी को जबरन इस्लाम में लाया जाए।

नायरों के मंदिर जलाए गए, ब्राह्मण बच्चियों को उठाया गया, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया। 30,000 नायर बंदियों में से केवल कुछ सौ ही जीवित वापस आ सके।

इसके बाद बात करें कर्नाटक की तो वहाँ के मेलकोट (मेलुकोट) का इतिहास टीपू की क्रूरता का सबसे मर्मस्पर्शी प्रमाण है। दीपावली के दिन टीपू की सेना ने मंड्यम अयंगर ब्राह्मण समुदाय के 700 से 800 परिवारों को घेर लिया।

जब ये लोग मंदिर में दीपावली की पूजा के लिए एकत्र हुए थे, तब टीपू के सैनिकों ने उनका नरसंहार कर दिया। इसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। मेलकोट एक रात में उजड़ गया और भुतहा नगर बन गया। आज 200 वर्षों बाद भी मंड्यम अयंगर समुदाय दीपावली नहीं मनाता। यह उस नरसंहार का शोक है जो आज भी जीवित है।

टीपू सुल्तान सिर्फ हिंदुओं पर अत्याचार तक नहीं रुका रहा था। मंगलुरु के कैथोलिक ईसाइयों को भी उसके कहर का सामना करना पड़ा। उन दिनों केरल में ही रहने वाले फादर पॉलिनस ने अपनी किताब में लिखा कि टीपू की सेना ने हिंदुओं और ईसाइयों को हाथियों के पैरों से बाँधकर घसीटा, महिलाओं को जबरन मुसलमानों से विवाह करवाया गया और जो इस्लाम स्वीकार करने से मना किया उसे तुरंत फाँसी दी गई।

सवालों में समाजवादी पार्टी का एजेंडा

सपा सांसद तूफानी सरोज यह भूल गए कि टीपू सुल्तान ने अपने राज्य में शरिया कानून लागू किया था। उनकी सरकार का नाम ही ‘सरकार-ए-खुदादाद’ था। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है- क्या समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में भी ऐसे ही शासन की वकालत करती है?

अखिलेश यादव की पार्टी जिस टीपू सुल्तान को ‘नायक’ बता रही है, उन्होंने हिंदुओं पर शरिया थोपा, जबरन धर्मांतरण कराए, मंदिर तुड़वाए, तो क्या यही ‘समाजवाद’ है, जिसका सपना अखिलेश यादव देख रहे हैं?

यह सपा की उस परंपरा का हिस्सा है जो इतिहास के हर विवादित मुद्दे को हिंदू-विरोध की दिशा में मोड़ देती है। मुलायम सिंह यादव ने कई मौकों पर खुलकर कहा था कि उन्होंने अयोध्या में राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाईं और उन्हें इस बात पर गर्व है। यह वही विरासत है जिसे उनके पुत्र अखिलेश यादव और तूफानी सरोज जैसे नेता आगे ले जा रहे हैं।

वामपंथियों के दोगले तथ्यों को सामने ला रही योगी सरकार

योगी सरकार ने उन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया है जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने दशकों तक दबाया। राम मंदिर आंदोलन से लेकर हिंदू सांस्कृतिक विरासत की पुनर्प्रतिष्ठा तक, यह सरकार उस इतिहास को सम्मान दे रही है जिसे सपा जैसी पार्टियाँ मिटाना चाहती हैं।

जब कोई नेता टीपू सुल्तान को ‘महिला उद्धारक’ बताता है और उसी साँस में त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को अत्याचारी सिद्ध करने की कोशिश करता है। ऐसे में ये केवल अज्ञानता नहीं, यह एक सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है। योगी सरकार इस षड्यंत्र का जवाब तथ्यों से देती है।

बंद हो झूठे नायकों की राजनीति

समाजवादी पार्टी का यह चरित्र कोई नया नहीं है। जब भी कोई मुद्दा उठता है, उनके नेता उसे हिंदू धर्म और हिंदू इतिहास के विरोध में मोड़ देते हैं। अखिलेश यादव की ‘समाजवादी’ राजनीति में बस यही बात शामिल है कि ब्रेस्ट टैक्स का विवादित और असत्यापित मिथक उठाओ, टीपू सुल्तान को उद्धारक बताओ, त्रावणकोर के हिंदू राजाओं को खलनायक साबित करो।

समाजवादी पार्टी के नेता पढ़े-लिखे हों या न हों लेकिन जब वे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर जनता के सामने परोसते हैं, तो असर समाज का कई वर्गों पर पड़ता है। ऐसे में इसका सही जवाब देना जरूरी हो जाता है। उत्तर प्रदेश की जनता जागरूक है और वह इस झूठे नैरेटिव को पहचानती है।

योगी सरकार के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश उस रास्ते पर है जहाँ इतिहास का सम्मान होता है, झूठे नायकों की नहीं और यही वह फर्क है जो सपा और भाजपा के बीच की असली खाई है।