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महाराष्ट्र सरकार की लाडकी बहिन योजना से 92 लाख लाभार्थी बाहर, eKYC फेल और आय सीमा बनी मुख्य वजह: जानिए हर साल कैसे होगी ₹16500 करोड़ की बचत

महाराष्ट्र सरकार ने अपनी प्रमुख मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना के तहत अब तक का सबसे बड़ा लाभार्थी सत्यापन अभियान चलाया है। इस अभियान के बाद सरकार ने योजना से 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटा दिए हैं, जिससे योजना के कुल लाभार्थियों की संख्या में लगभग 38 प्रतिशत की कमी आ गई है।

यह बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई राज्यभर में चलाए गए सत्यापन अभियान के बाद हुई। जाँच में पता चला कि लाखों लाभार्थियों ने योजना के लिए जरूरी eKYC और अन्य अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं की, जबकि कई लोग योजना के तय पात्रता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इस पूरी प्रक्रिया का राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी बड़ा असर पड़ने वाला है।

इसी बीच भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में वर्ष 2024-25 के दौरान इस योजना में 3,541 करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च और वित्तीय प्रबंधन में कई कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। वहीं अब 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने के बाद सरकार पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी काफी कम होने की उम्मीद है।

अगर हटाए गए सभी लाभार्थियों को हर महीने मिलने वाली 1,500 रुपए की सहायता राशि आगे भी जारी रहती, तो सरकार को हर साल भारी खर्च उठाना पड़ता। लेकिन अब इन लाभार्थियों के हटने से राज्य सरकार की वार्षिक वित्तीय देनदारी में 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की कमी आने का अनुमान है।

आइए अब विस्तार से समझते हैं कि यह फैसला क्यों लिया गया, किन कारणों से इतने बड़े पैमाने पर लाभार्थियों के नाम हटाए गए और इसका महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है लाडकी बहिन योजना

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले जून 2024 में मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना को मंजूरी दी गई थी। महायुति सरकार ने इस योजना को महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से अपनी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं में शामिल किया था।

इस योजना के तहत ऐसे परिवारों की 21 से 65 वर्ष की पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से दी जाती है, जिनकी परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपए से कम है। हालाँकि सरकारी कर्मचारी, आयकरदाता और कुछ अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जाता।

योजना शुरू होने के बाद इसमें तेजी से लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और इसके लिए बजट तथा अनुपूरक प्रावधानों के जरिए 60,000 करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया। एक समय इस योजना का लाभ करीब 2.43 करोड़ महिलाओं को मिल रहा था। लेकिन हाल ही में हुए सत्यापन अभियान के बाद लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.5 करोड़ रह गई है।

महाराष्ट्र ने 92 लाख से ज्यादा लाभार्थियों को क्यों हटाया?

यह सत्यापन अभियान सितंबर 2025 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य अपात्र लाभार्थियों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना था कि योजना का लाभ केवल वास्तविक पात्र महिलाओं को ही मिलता रहे। जाँच में सामने आया कि सबसे ज्यादा नाम किसी धोखाधड़ी के कारण नहीं हटाए गए, बल्कि इसलिए हटाए गए क्योंकि लाभार्थियों ने सरकार द्वारा अनिवार्य की गई इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर (eKYC) प्रक्रिया पूरी नहीं की थी।

आँकड़ों के अनुसार, करीब 62 लाख लाभार्थियों, यानी कुल हटाए गए लोगों में लगभग 67 प्रतिशत, के नाम केवल eKYC पूरा न करने की वजह से सूची से हटा दिए गए।
इसके अलावा कई अन्य लाभार्थी योजना के नियमों के अनुसार अपात्र पाए गए।

करीब 16 लाख महिलाओं के परिवारों की वार्षिक आय योजना में तय 2.5 लाख रुपए की सीमा से अधिक निकली। वहीं सत्यापन के दौरान 4.42 लाख लाभार्थियों ने बताया कि वे स्वयं या उनके परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी है, जिसके कारण वे योजना के लिए पात्र नहीं थे।

जाँच में यह भी पता चला कि करीब 3.6 लाख महिलाएँ पहले से ही संजय गाँधी निराधार योजना का लाभ ले रही थीं। वहीं लगभग 2.5 लाख मामलों में एक ही परिवार के दो से अधिक सदस्य योजना का लाभ ले रहे थे, जो योजना के नियमों के खिलाफ है।

इसके अलावा करीब 1.8 लाख लाभार्थियों की उम्र 65 वर्ष से अधिक पाई गई, जबकि 1.7 लाख मामलों को जिला स्तर पर किए गए सत्यापन के दौरान संदिग्ध मानते हुए हटाया गया। जाँच में यह भी सामने आया कि करीब 29 हजार पुरुष और लगभग 8 हजार सरकारी कर्मचारी भी गलत तरीके से इस योजना का लाभ ले रहे थे, जबकि वे इसके लिए पात्र नहीं थे।

eKYC की प्रक्रिया इतनी देर से क्यों हुई?

इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि योजना शुरू होने के तुरंत बाद सरकार eKYC प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकी, क्योंकि इसके कुछ ही समय बाद राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई थी और आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी।

अदिति तटकरे के अनुसार, योजना जून 2024 में शुरू की गई थी, जबकि इसकी पहली दो किस्तें अगस्त 2024 में एक साथ जारी की गई थीं। लेकिन अनिवार्य सत्यापन शुरू होने से पहले ही राज्य चुनावी प्रक्रिया में चला गया, जिसके कारण eKYC लागू करने में देरी हुई। नई सरकार के गठन के बाद अगस्त 2025 में सरकार ने राज्यभर में eKYC सत्यापन अभियान शुरू किया।

उन्होंने कहा कि लाभार्थियों को कई बार बताया गया था कि यदि वे eKYC पूरा नहीं करेंगे तो उनकी सहायता राशि बंद कर दी जाएगी। सरकार ने उन्हें प्रक्रिया पूरी करने के लिए कई अवसर दिए और इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 तक कर दी थी। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने किसी भी लाभार्थी का नाम मनमाने तरीके से नहीं हटाया।

उनके अनुसार, जिन लोगों ने योजना में पंजीकरण कराया था और जो पात्र थे, उन्हें अनिवार्य सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने तक लगातार योजना का लाभ मिलता रहा।

सरकारी आँकड़ों का उपयोग करके AI से बनाया गया चार्ट

हटाए गए लाभार्थियों को पहले कितना भुगतान हुआ था?

सत्यापन अभियान से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, जिन लाभार्थियों के नाम बाद में योजना से हटाए गए, उन्हें भुगतान बंद होने से पहले कुल मिलाकर लगभग 14,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी जा चुकी थी। अधिकारियों का अनुमान है कि जिन लाभार्थियों का भुगतान रोका गया, उन्हें औसतन करीब 10 महीने तक योजना का लाभ मिला।

हालाँकि सभी के लिए भुगतान बंद करने की कोई एक तय तारीख नहीं थी। सत्यापन के दौरान अलग-अलग चरणों में लाभार्थियों की जाँच हुई और उनकी पात्रता का पुनर्मूल्यांकन किया गया। इसी वजह से कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में अधिक समय तक योजना का लाभ मिलता रहा, जबकि बाद में उन्हें अपात्र पाए जाने पर उनका भुगतान रोक दिया गया।

CAG रिपोर्ट में असल में क्या कहा गया था?

इसी दौरान जब लाभार्थियों का सत्यापन अभियान चल रहा था, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने भी लाडकी बहिन योजना के वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। वित्त वर्ष 2024-25 की राज्य वित्त ऑडिट रिपोर्ट में CAG ने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग ने 29,693.09 करोड़ रुपए के स्वीकृत बजट के मुकाबले 33,237.24 करोड़ रुपए खर्च किए।

इस तरह विभाग ने 3,541.16 करोड़ रुपए का अतिरिक्त व्यय किया। ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि इस अतिरिक्त खर्च के लिए कोई स्पष्ट या ठोस कारण नहीं बताया गया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जनवरी से मार्च 2025 के बीच 15,586 करोड़ रुपए को वर्चुअल पर्सनल डिपॉजिट अकाउंट (VPDA) में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि उस समय इन पैसों की तत्काल आवश्यकता नहीं थी।

CAG ने इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता बताते हुए कहा कि बिना वास्तविक खर्च की जरूरत के सरकारी खजाने से धन निकालकर VPDA में जमा करना उचित वित्तीय प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। कुल मिलाकर CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान बजट का अनुमान लगाने, खर्च पर नियंत्रण रखने और वित्तीय प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण कमियाँ रहीं।

ऑडिट रिपोर्ट में सरकार को सलाह दी गई कि भविष्य में इस तरह की बड़ी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं के लिए बजट बनाते समय संभावित लाभार्थियों की संख्या का अधिक वास्तविक और सटीक आँकलन किया जाए।

लाभार्थियों के नाम हटाने का मामला CAG की जाँच-पड़ताल से कैसे जुड़ा है?

लाभार्थियों के सत्यापन अभियान और CAG की ऑडिट रिपोर्ट का अक्सर एक साथ जिक्र किया जा रहा है, लेकिन दोनों अलग-अलग मुद्दों से जुड़े हैं। CAG द्वारा बताई गई 3,541 करोड़ रुपए की राशि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान स्वीकृत बजट से अधिक किए गए खर्च को दर्शाती है।

यह निष्कर्ष योजना के वित्तीय प्रबंधन और बजट के उपयोग से जुड़ा है, न कि इस बात से कि व्यक्तिगत लाभार्थी पात्र थे या नहीं। वहीं 92 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम हटाए जाने का असर सरकार के भविष्य के खर्च पर पड़ेगा। योजना के तहत प्रत्येक लाभार्थी को हर महीने 1,500 रुपए दिए जाते हैं।

ऐसे में 92 लाख लाभार्थियों के हटने से सरकार की सालाना भुगतान देनदारी में लगभग 16,560 करोड़ रुपए की कमी आएगी। सरल शब्दों में कहें तो यदि लाभार्थियों की संख्या आगे भी इसी स्तर पर बनी रहती है, तो इस सत्यापन अभियान के कारण सरकार को हर साल 16,500 करोड़ रुपए से अधिक की बचत हो सकती है।

यही वजह है कि 3,541 करोड़ रुपए और 16,560 करोड़ रुपए के आँकड़ों की सीधे तुलना नहीं की जा सकती। 3,541 करोड़ रुपए वह अतिरिक्त खर्च है, जो पहले ही किया जा चुका था और बाद में लाभार्थियों के नाम हटाने से उसे वापस नहीं पाया जा सकता। दूसरी ओर 16,560 करोड़ रुपए सरकार की संभावित वार्षिक बचत का अनुमान है, क्योंकि अब हटाए गए लाभार्थियों को हर महीने सहायता राशि नहीं देनी पड़ेगी।

हालाँकि लाभार्थियों के इस सत्यापन अभियान से CAG की उस प्रमुख चिंता का कुछ हद तक समाधान जरूर होता है, जिसमें कहा गया था कि भविष्य में ऐसी योजनाओं का बजट वास्तविक पात्र लाभार्थियों की संख्या के आधार पर तैयार किया जाना चाहिए, न कि बढ़ा-चढ़ाकर दर्ज की गई लाभार्थी संख्या के आधार पर।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

UP को मिला विकास का एक और हाईवे, लखनऊ-कानपुर के बीच 3D एलिवेटेड तकनीकसे लैस अवध एक्सप्रेस-वे हुआ ऑपरेशनल: जानें लंबाई, स्पीड लिमिट से लेकर सब कुछ

यूपी को एक और सौगात मिल गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह,केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलकर लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के रूप में यह सौगात दी है। इसके साथ ही 3 घंटे का सफर अब मात्र 35-40 मिनट में पूरा किया जा सकता है। इस पर अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ियाँ दौड़ सकती हैं। 63 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस वे ₹4200 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है।

उद्घाटन के बाद तीनों नेता खुद पहले इस एक्सप्रेस-वे का लुत्फ उठाने के लिए सफर कर लखनऊ पहुँचे। मंगलवार (14 जुलाई 2026) से इसे आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा।

एक्सप्रेस वे के हैं कई नाम

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे को NE6, अवध एक्सप्रेस वे और डिफेंस कॉरिडोर के नाम से जाना जाता है। इस कॉरिडोर को भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एनएचएआई के साथ मिलकर बनाया है इसलिए इस मार्ग को NE-6 कहा जाता है।

लखनऊ-कानपुर तक का पूरा इलाका अवध के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा के अंतर्गत आता है। इसलिए सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए इसे अवध एक्सप्रेस वे कहा जाता है।

यूपी डिफेंस कॉरिडोर के प्रमुख केन्द्र लखनऊ और कानपुर हैं। इनसे रक्षा उत्पादन, लॉजिस्टिक्स और भारी वाहनों को बगैर किसी रुकावट के आवाजाही हो सकेगी, इसलिए इसे डिफेंस कॉरिडोर भी कहा जाता है। इस एक्सप्रेस वे से रक्षा उद्योग के विकास को नई रफ्तार मिलेगी क्योंकि यह रक्षा सेंटर बन रहे लखनऊ और कानपुर को जोड़ता है।

इतना ही नहीं 63 किलोमीटर के इस आधुनिक ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन तकनीक से बना ये एक्सप्रेस वे पर्यावरण के भी अनुकूल है।

(साभार-x@nitingadkari)

दो पहिया वाहन को गुजरने की अनुमति नहीं

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे से कोई दुपहिया वाहन नहीं गुजर सकता। इससे सिर्फ कार, वैन और दूसरे चारपहिया वाहन ही गुजर सकते हैं। सुरक्षा के लिए यहाँ 63 हाई रिजॉल्युशन सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिससे 500 मीटर तक छोटी से छोटी चीजें भी साफ दिखाई देती हैं। इनमें से 21 कैमरे वाहनों की गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं।

अगर इंटरचेंज करते वक्त नियमों की अनदेखी की गई तो ऑनलाइन चालान कटेगा और बगैर रोके गाड़ियों की नंबर प्लेट देखकर टोल टैक्स ले लिया जाएगा। एक्सप्रेस वे पर 24 घंटे निगरानी करने के लिए दो आधुनिक कंट्रोल रूम 27वें और 35वें किलोमीटर के दौरान बनाए गए हैं। यहाँ पर आपातकालीन सेवाएँ भी उपलब्ध हैं और ट्रैफिक मैनेजमेंट भी यहीं से होता है।

इस मार्ग पर 6 इंटरचेंज दिए गए हैं ताकि अलग अलग जगहों पर गाड़ियाँ प्रवेश कर सके और निकासी हो सके। इस दौरान पूरे 38 अंडरपास, 6 फ्लाई ओवर, 3 बड़े पुल और 28 छोटे-छोटे पुल बनाए गए हैं।

एक्सप्रेस वे पर एआई आधारित निगरानी सिस्टम लगाई गई है जिससे किसी तरह की दुर्घटना या हादसा, असामान्य गतिविधि की सूचना तुरंत कंट्रोल रूम को मिल सकेगी। इससे एम्बुलैंस तुरंत पहुँच जाएगी और बचाव-राहत कार्य आसान होगा।

कितना और कैसे कटेगा टोल टैक्स

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे के उद्घाटन के बाद 14 जुलाई 2026 से यहाँ टोल टैक्स लगना शुरू हो रहा है। यहाँ कार जीप और एसयूवी के एक तरफ का टोल ₹275 रुपए जबकि 24 घंटे में वापसी पर ₹415 रुपए देने हैं। बड़ी और कमर्शियल गाड़ियों, बसों और ट्रकों को एक तरफ में 935 रुपए देना होगा। छोटे ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों को 445 रुपए एक तरफ का टोल टैक्स देना होगा। दोपहिया वाहन तो इस पर जा ही नहीं सकते। टोल टैक्स पूरी तरह डिजिटल तरीके से देना है।

पूरे एक्सप्रेस वे पर कोई टोल प्लाजा वाला सिस्टम नहीं है, जहाँ बेरियर लगे होते हैं और एक-एक गाड़ी को टोल देकर उससे गुजरना पड़ता है, बल्कि इस एक्सप्रेस-वे पर बैरियर फ्री टोल सिस्टम है यानी कहीं रुकने की जरूरत नहीं है खुद-ब-खुद ऑटोमैटिक नंबर प्लेट एएनपीआर कैमरे से फास्टटैग के जरिए टोल कट जा रहे हैं। इससे लंबे कतारों में खड़े होने से मुक्ति मिली है। इंधन और समय की भी बचत हो रही है।

3 डी एलिवेटेड तकनीक वाला कॉरिडोर

63 किलोमीटर एक्सप्रेस वे का 18 किलोमीटर यानी करीब 30 फीसदी हिस्सा एलिवेटेड है। देश में ऐसा पहली बार प्रयोग किया गया है, जिसमें इतना लंबा हिस्सा 6 लेन एलिवेटेड बनाया गया है, यानी ये पूरा हिस्सा सिर्फ एक पिलर पर टिका हुआ है। इससे भीड़भाड़ वाले इलाकों के ट्रैफिक जाम से निजात मिलेगी। अमौसी, एनएच-27 और सरोजिनीनगर जैसे इलाके अक्सर जाम रहते हैं। यह एक्सप्रेस वे इन इलाकों में एलिवेटेड है। इससे बिना सिग्नल और रुकावट के वाहन यहाँ से निकल जाएँगे। इससे रोजाना ऑफिस आने जाने वालों को काफी फायदा होगा।

बगैर ट्रेनों को बाधा पहुँचाए बना खास बोस्टिंग गर्डर

लखनऊ कानपुर एक्सप्रेस वे को आधुनिक इंजीनियरिंग की मिसाल कहा जा रहा है। इसका सिस्टम 3डी ऑटोमेट मशीन गाइडेंस टेक्नोलॉजी पर आधारित है। भारत में इसका इस्तेमाल बृहत पैमाने पर पहली बार किया गया है। इस तकनीक में ग्रेडर और कंक्रीट बिछाने वाली मशीनों को जीपीएस और 3डी डिजिटल मॉडल से जुड़ा होता है। इससे किसी तरह के चूक की आशंका काफी कम हो जाती है। इसकी वजह से सड़क की फिनिशिंग इतनी शानदार और स्मूथ होती है कि गाड़ी में ग्लास में रखा हुआ पानी भी न छलके, हाई स्पीड से झटका लगना तो दूर की बात है।

उन्नाव के पास रेलवे लाइनों को पार करने के लिए एक्सप्रेस वे पर खास बोस्टिंग गर्डर का इस्तेमाल किया गया है। रेलवे ओवरब्रिज ज्यादातर कंक्रीट के पिलर पर बनते हैं, लेकिन यहाँ बेहद कम वक्त पर भारी स्टील गर्डर्स को हवा में असेंबल कर इस ब्रिज को तैयार किया गया है, ये आधुनिक आर्किटेक्चर का बेहतरीन उदाहरण है। इस निर्माणकार्य के दौरान रेलवे यातायात को किसी भी वक्त बाधा नहीं पहुँचाया गया।

लखनऊ आउटर रिंग रोड से कनेक्टिविटी

एक्सप्रेस वे को लखनऊ आउटर रिंग रोड से जोड़ा गया है जिससे कानपुर में बगैर घुसे ही लोग सीधे रायबरेली, सीतापुर, सुल्तानपुर,हरदोई जैसे इलाके तक जा सकेंगे। इससे लखनऊ में भी ट्रैफिक का दबाव कम होगा। इस इलाके में सर्विस रोड भी बनाई गई है ताकि स्थानीय स्तर पर ट्रैफिक जाम न हो।

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे केवल एक सड़क परियोजना नहीं है, बल्कि ये यूपी के आर्थिक विकास और देश की मजबूती का उदाहरण है। इससे व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को बढ़ावा मिलेगा। इस क्षेत्र में आने वाले इलाकों के लोगों की बाजार तक पहुँच बनेगी। रोजगार के अवसर मिलेंगे और तरक्की होगी। आने वाले वर्षों में लखनऊ -कानपुर एक्सप्रेस वे यूपी के इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश को नई दिशा देने वाला है।

राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेश दौरे पर राजनीतिक घमासान, BJP ने पूछा- कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?: ‘छात्रों की गूँज’ कई शहरों में रद्द, अब देहरादून में होंगे ‘प्रकट’

राहुल गाँधी एक बार फिर से राजनीतिक हंगामा मचाने सार्वजनिक तौर पर सामने आने वाले हैं। कथित तौर पर वो बीते 20 दिनों से विदेश दौरे पर थे, जिसे सीक्रेट रखा गया था। सीक्रेट इसलिए क्योंकि उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं-नेताओं को ये जानकारी नहीं है कि राहुल गाँधी आखिर हैं कहाँ? बताया जा रहा है कि वो 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम में सार्वजनिक उपस्थिति देंगे। आखिरी बार उन्हें इसी ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के दौरान राजस्थान के कोटा में देखा गया था।

अब कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐलान किया है कि राहुल गाँधी 17 जुलाई 2026 को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज‘ कार्यक्रम में शामिल होंगे, जिसकी तैयारी में पूरी पार्टी जुटी हुई है। चूँकि कोटा-प्रयागराज-पटना-दिल्ली की तरह ही देहरादून को भी शैक्षणिक हब माना जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी की टारगेट ऑडियंस छात्रों के ही होने की उम्मीद है।

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा जारी किया गया पोस्टर

राहुल गाँधी की गैरमौजूदगी में रद्द हो चुके हैं कई शहरों के कार्यक्रम

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो राहुल गाँधी के ‘सीक्रेट’ विदेशी दौरे की वजह से ‘छात्रों की गूँज’ कार्यक्रम के कई हिस्सों को रद्द कर दिया गया। पहले की रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कोटा की तर्ज पर ही प्रयागराज, पटना, दिल्ली में कार्यक्रमों का आयोजन करेगी, इसके बाद ही राहुल गाँधी देहरादून जाएँगे। लेकिन राहुल गाँधी के सीक्रेट विदेश दौरे की वजह से पहले तो प्रयागराज का कार्यक्रम बिना किसी हो हल्ले के रद्द हो गया, फिर पटना और दिल्ली का भी।

देश के अलग-अलग शहरों में कार्यक्रमों का आयोजन, लेकिन नहीं मिल रही चर्चा

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से कार्यक्रमों की लिस्ट जारी की गई थी, जिसमें 10 जुलाई को प्रयागराज (इलाहाबाद), 11 जुलाई को पटना (ये तारीख कई बार बदली, 11 से लेकर 15 तक) और 14 जुलाई को दिल्ली में रैलियाँ होनी थीं। इन सभी के रद्द होने की वजह राहुल गाँधी की अनुपलब्धता बताई गई।

हालाँकि कॉन्ग्रेस पार्टी देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में इस तरह के आयोजन कर रही है, लेकिन राहुल गाँधी की गैर-मौजूदगी की वजह से इन कार्यक्रमों का कोई खास असर पड़ता नहीं दिख रहा है। इसी कड़ी में राँची में मैराथन दौड़ का आयोजन तक किया गया था, लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं में ये आयोजन कोई खास जगह नहीं बना पाया।

14 जुलाई का कार्यक्रम 9 अगस्त को खिसका?

कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया कि राहुल गाँधी की जो रैली 14 जुलाई 2026 को होनी थी, वो अब 9 अगस्त 2026 को हो सकती है। इसके लिए कॉन्ग्रेस पार्टी ने 6 जुलाई 2026 को एक बैठक भी बुलाई थी। इस बैठक को मीडिया में भी जगह मिली।

BJP का सवाल, कहाँ हैं कॉन्ग्रेस के युवराज?

इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर जोरदार हमला बोला है। बीजेपी IT सेट के इन्चार्ज अमिल मालवीय ने भी यही सवाल पूछा है। उन्होंने एक्स पर लिखा, “राहुल गाँधी की 22 जून से 13 जुलाई के बीच की विदेश यात्रा पर रहस्य बरकरार है। वो कहाँ गए हैं? वो किससे मिल रहे हैं? उनकी यात्रा और अन्य खर्चों का वहन कौन कर रहा है? देश के विपक्ष के नेता को इस सवाल का जवाब देना चाहिए।”

बताया जा रहा है कि राहुल गाँधी लंदन, जर्मनी या फिनलैंड में हो सकते हैं। ऐसा दावा इंडिया टीवी की रिपोर्ट में किया गया है।

बता दें कि राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं पर पहले भी विवाद होते रहे हैं। वो आत्यधिक व्यस्त चुनावी समय में भी पार्टी और देश को छोड़कर विदेश जाते रहे हैं। वो साल 2025 में बिहार चुनाव के समय भी पार्टी को मँझधार में छोड़ विदेश यात्रा पर निकल गए थे।

रेलवे के सैलून कोच में रुद्राभिषेक पर विवाद: ट्रेन बुकिंग की अधूूरी जानकारी ने छेड़ी बहस; पंडित और शास्त्रों से समझिए क्या है ‘मानस पूजा’, जिसमें नहीं होती ‘अग्नि’ की जरूरत

सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है जो भारतीय रेलवे के एक सैलून कोच यानी प्राइवेट कोच का है, जिसमें कुछ लोग पंडित की मौजूदगी में पूजा (रुद्राभिषेक) करते हुए नजर आ रहे हैं। जैसे ही यह वीडियो सामने आया इस्लामी कट्टरपंथियों ने नियमों की दुहाई देनी शुरू कर दी। उनका कहना था कि उनके नमाज पढ़ने पर शोर होने लगता है तो पूजा पे शांति क्यों है?

कुछ लोगों ने इसे रेलवे के नियमों का खुला उल्लंघन बताना शुरू कर दिया, तो कुछ लोगों ने इस पर फायर हैजार्ड यानी चलती ट्रेन में आग लगने के खतरे का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। देखते ही देखते इंटरनेट पर लोग इस बात को लेकर तरह-तरह के दावे करने लगे और सार्वजनिक कोचों में नमाज पढ़ने से इसकी तुलना की होने लगी।

लेकिन जब इस पूरे मामले की गहराई से पड़ताल की गई और रेलवे से लेकर इस पूजा को कराने वाले पंडित जी तक के पक्ष को समझा गया, तो सच इस पूरे हंगामे और दावों से बिल्कुल अलग निकला। आइए समझते हैं कि ये कौन सी पूजा थी, जिसमें आग का कोई खतरा नहीं हो सकता था और कैसे सार्वजनिक नमाज से इसकी तुलना पूरी तरह गलत साबित होती है।

रेलवे ने दी आधिकारिक सफाई और खारिज किए दावे

ऑल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने सवाल किया कि क्या चलती ट्रेन के अंदर रुद्राभिषेक करने की इजाजत है। पश्चिम रेलवे ने इस पर जवाब देते हुए आधिकारिक तौर पर बताया कि जिस कोच को लेकर इतना बड़ा विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह असल में कोई सरकारी विभाग, दफ्तर या किसी अथॉरिटी को अलॉट किया गया सरकारी या VIP सैलून नहीं था।

रेलवे ने स्पष्ट किया कि यह पूरी तरह से एक प्राइवेट कमर्शियल बुकिंग थी। इस सैलून कार को IRCTC के जरिए एक निजी संस्था यानी एक प्राइवेट पार्टी ने 8 जुलाई 2026 को बुक किया था। इस बुकिंग को पूरी तरह कानूनी और नियमों के तहत करने के लिए उस प्राइवेट पार्टी ने कमर्शियल बुकिंग के तौर पर 3 लाख 8 हजार 580 रुपए का एडवांस पेमेंट किया था।

रेलवे ने बताया कि इस सैलून कार को 10 जुलाई 2026 को नई दिल्ली से मुंबई के बीच चलने वाली ट्रेन संख्या 12926 पश्चिम एक्सप्रेस में एकतरफा यात्रा के लिए जोड़ा जाना तय हुआ था। उत्तर रेलवे ने ऑपरेशनल संभावनाओं और व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए ही 10 जुलाई 2026 को इस सैलून के कमर्शियल रन का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया था।

रेलवे ने अपने बयान में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया कि यात्रियों की समय-पाबंदी, उनकी सुरक्षा, संरक्षा और सुविधा सुनिश्चित करने की मुख्य जिम्मेदारी बिना किसी समझौते के हमेशा रेलवे की ही होती है और इस पूरी घटना के दौरान रेलवे के किसी भी सुरक्षा मानक का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।

रेलवे ने साफ किया कि इस पूरी यात्रा में कोई भी व्यक्ति घायल नहीं हुआ और न ही किसी को कोई असुविधा हुई। जो पुजारी वीडियो में दिखाई दे रहे हैं, वह उसी सैलून कार में अभिषेक कर रहे हैं जिसे पूरी तरह से नियमों के तहत पैसे देकर बुक किया गया था। इसलिए सोशल मीडिया पर किए जा रहे सभी दावों को रेलवे ने सिरे से खारिज कर दिया।

सैलून कोच के नियम

IRCTC के नियमों के अनुसार, रेलवे नियमों के पालन के आधार पर कोई भी आम नागरिक या निजी संस्था IRCTC के जरिए कमर्शियल तौर पर सैलून कार को किराए पर ले सकती है। एक बार जब रेलवे की तरफ से बुकिंग मंजूर हो जाती है, तो किराए पर लेने वाले व्यक्ति को कानूनी कामों के लिए उस सैलून कार का इस्तेमाल करने की पूरी इजाजत होती है।

शर्त यह होती है कि यात्रा के दौरान सभी सुरक्षा जरूरतों, ऑपरेशनल निर्देशों और लागू रेलवे नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। अगर आपने FTR यानी फुल टैरिफ रेट सेवा के तहत पूरा सैलून कोच अपने निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो आप वहाँ अपनी आस्था और मर्जी के अनुसार कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या पाठ कर सकते हैं।

बस इसमें एक ही मुख्य शर्त होती है कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसका मतलब यह है कि आपके किसी भी अनुष्ठान या काम के कारण ट्रेन की यात्रा में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए, आपके साथ चलने वाले सह-यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा नहीं होनी चाहिए।

रेलवे के सुरक्षा मानकों जैसे कि आग का खतरा पैदा करने वाली या किसी भी तरह की ज्वलनशील सामग्री के इस्तेमाल से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। इसके अलावा बुकिंग के समय किसी भी संभावित नुकसान या पेनल्टी की भरपाई करने के लिए यात्री को एक रिफंडेबल सिक्योरिटी डिपॉजिट और रजिस्ट्रेशन चार्ज भी देना जरूरी होता है, ताकि अगर कोच को कोई नुकसान पहुँचे तो उसकी भरपाई की जा सके।

चलती-फिरती रसोई और सैलून कोच में मिलने वाली घर जैसी सुविधाएँ

IRCTC के मुताबिक यह सैलून कोच सामान्य ट्रेन के डिब्बों जैसा बिल्कुल नहीं होता है। यह लगभग एक चलते-फिरते 1BHK फ्लैट या एक प्राइवेट घर की तरह होता है। इस सैलून कोच के भीतर बकायदा आलीशान बेडरूम होते हैं और साथ में आने वाले अतिरिक्त लोगों को ठहराने के लिए चार से छह एक्स्ट्रा बर्थ या बेड की व्यवस्था होती है।

यात्रियों की यात्रा को पूरी तरह से आरामदायक और सुरक्षित बनाने के लिए रेलवे की तरफ से एक एसी अटेंडेंट और एक जनरल अटेंडेंट भी हमेशा उपलब्ध कराए जाते हैं। इस पूरे प्राइवेट कोच की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसके भीतर यात्रा के दौरान ताजा खाना पकाने के लिए एक पूरी रसोईघर यानी किचन की सुविधा दी जाती है।

इस रसोईघर में खाना बनाने और उसे सुरक्षित रखने के लिए जरूरी बर्तन, गर्म पानी का सिंक, रेफ्रिजरेटर और आरओ का शुद्ध पानी जैसी तमाम आधुनिक सुविधाएँ मौजूद होती हैं।हालाँकि इस कोच में किचन होता है, लेकिन सुरक्षा के कड़े नियमों के कारण आम यात्रियों को खुद वहाँ खाना पकाने या आग जलाने की इजाजत नहीं होती है।

IRCTC आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त शुल्क लेकर खुद अपना रसोइया और खाना पकाने की सामग्री उपलब्ध कराती है, ताकि रेलवे के ट्रेन स्टाफ को अच्छी तरह से पता हो कि चलती ट्रेन में सुरक्षित तरीके से रसोई का संचालन कैसे करना है। इस पूरी व्यवस्था से यह बात साफ हो जाती है कि सैलून कोच कोई पब्लिक स्पेस यानी सार्वजनिक जगह नहीं है।

यह पूरी तरह से प्राइवेट स्पेस है जिसे एक तय समय के लिए यात्री अपना अस्थाई घर बना लेते हैं। ऐसे में जो काम कोई भी व्यक्ति अपने निजी घर के भीतर करने के लिए स्वतंत्र है, वही काम वह नियमों के दायरे में रहकर इस सैलून कोच के भीतर भी कर सकता है।

क्या वाकई था आग का खतरा? पंडित जी ने खुद खोली दावों की पोल

इस पूरे विवाद में जो सबसे बड़ा और मुख्य सवाल लोगों द्वारा उठाया गया, वह था फायर हैजार्ड यानी आग लगने के खतरे का तर्क। लोगों ने यह मान लिया कि चूँकि वीडियो में पूजा होते दिख रही है, तो निश्चित रूप से वहाँ हवन किया गया होगा या फिर दीए जलाए गए होंगे, जिससे चलती ट्रेन में आग लगने का एक बहुत बड़ा खतरा पैदा हो सकता था।

इस पूरे भ्रम को उन पंडित के बयान ने पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिन्होंने खुद इस सैलून कोच में पूजा को संपन्न कराया था। पंडित जी ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने खुद यह पूजा (रुद्राभिषेक) कराई है और लोगों की यह सोच पूरी तरह से गलत है कि इसमें आग की कोई जरूरत होती है।

पंडित जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मानस (मानसिक) पूजा थी और पूरी प्रक्रिया में अग्नि यानी आग की मौजूदगी बिल्कुल भी अनिवार्य या आवश्यक नहीं होती है। इस पूजा को करने के लिए किसी भी तरह के हवन की आवश्यकता नहीं होती है और यहाँ तक कि इसके लिए एक छोटा सा दीया जलाना भी जरूरी नहीं होता है।

पंडित जी के पक्ष से यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि उस सैलून कोच के भीतर न तो कोई माचिस जलाई गई, न कोई दीया जलाया गया और न ही किसी प्रकार का कोई हवन कुंड तैयार किया गया। वहाँ केवल भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग पर जल, दूध और अन्य पवित्र सामग्रियों से अभिषेक किया जा रहा था और साथ में मंत्रों का पाठ किया जा रहा था।

जब पूजा में किसी भी स्तर पर आग या किसी ज्वलनशील वस्तु का इस्तेमाल ही नहीं हुआ, तो फिर वहाँ किसी भी प्रकार के फायर हैजार्ड या सुरक्षा नियमों के उल्लंघन का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यह पूरी तरह से एक सुरक्षित, शांत और जल आधारित धार्मिक अनुष्ठान था जिसे बिना किसी खतरे के संपन्न किया गया।

शास्त्रों में वर्णित पूजा के प्रकार और ‘मानस पूजा’ का गहरा विज्ञान: जहाँ सामग्री नहीं, सिर्फ मन की श्रद्धा ही काफी

सनातन धर्म और हिंदू शास्त्रों में पूजा-पाठ को लेकर बहुत ही गहरा विज्ञान बताया गया है। शास्त्रों में मुख्य रूप से आराधना और उपासना की तीन श्रेणियाँ या प्रकार बताए गए हैं, जिनमें से सबसे उत्तम और प्रभावशाली विधि को मानस पूजा का नाम दिया गया है।

मानस पूजा का सीधा और सरल अर्थ है- मन के द्वारा की जाने वाली पूजा। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संसार की किसी भी भौतिक वस्तु (जैसे फूल, फल, दीपक, जल या धन) की आवश्यकता नहीं होती। आमतौर पर जब हम पूजा करते हैं, तो हमें कई तरह की सामग्रियों को जुटाना पड़ता है। लेकिन मानस पूजा पूरी तरह से आंतरिक होती है।

इसमें भक्त अपने मन की एकाग्रता और कल्पना शक्ति से भगवान को स्वर्ण सिंहासन पर बैठाता है, मन से ही उन्हें गंगाजल से स्नान कराता है, मन से ही छप्पन भोग लगाता है और मन से ही आरती उतारता है। शास्त्रों के अनुसार, ईश्वर को भौतिक वस्तुओं की भूख नहीं होती, वे केवल भक्त के ‘भाव’ के भूखे होते हैं।

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानसोपचार पूजा स्रोत के पहले ही श्लोक में वे कहते हैं, “रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं…” इसका अर्थ है, “हे प्रभु! मैंने अपने मन में ही आपके लिए रत्नों का सिंहासन, हिमालय के शीतल जल से स्नान और दिव्य वस्त्रों की कल्पना कर आपको अर्पित किए हैं।”

इस श्लोक में वे बात को पूरी तरह स्पष्ट कर देते हैं, “आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं… यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्।”

इसका अर्थ है, “हे शंभो! मेरी आत्मा आप हैं, मेरी बुद्धि माता पार्वती हैं, मेरे प्राण आपके गण हैं, और मेरा यह शरीर ही आपका मंदिर है। अब मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी ही पूजा है। यानी यहाँ भक्त का पूरा अस्तित्व ही पूजा बन जाता है, किसी बाहरी सामग्री की कोई जगह नहीं बचती।

श्रीमद्भागवत पुराण के 11वें स्कंध के 27वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण स्वयं उद्धव जी को पूजा के भेदों के बारे में बताते हैं। वहाँ वे स्पष्ट करते हैं कि जो भक्त बाहरी सामग्री जुटाने में असमर्थ हैं, या जो संन्यासी व विरक्त हैं, वे केवल मन के द्वारा मेरी उत्तम आराधना कर सकते हैं।

भगवान के अनुसार, मानसिक रूप से अर्पित की गई सेवा को वे सबसे पहले और सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि उसमें दिखावा शून्य होता है। मानस पूजा यह साबित करती है कि भक्ति किसी धन, साधन या परिस्थिति की मोहताज नहीं है। आप जहाँ हैं, जिस अवस्था में हैं, वहीं आंखें बंद करके अपने आराध्य को मन से याद कर सकते हैं।

इसमें न तो कोई खर्च है और न ही कोई शुद्धता-अशुद्धता का बाहरी बंधन, इसमें बस ‘आप’ होते हैं और आपका ‘ईश्वर’। ट्रेन के उस प्राइवेट सैलून कोच में भी इसी तरह बिना किसी भौतिक आग को जलाए, बिना किसी सुरक्षा को खतरे में डाले और बिना किसी सह-यात्री को परेशान किए, बेहद सादगी और शुद्ध भावना के साथ इस अनुष्ठान को पूरा किया गया था।

नमाज से इस पूजा की तुलना क्यों है पूरी तरह गलत?

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा इसकी तुलना सामान्य डिब्बों के गलियारों या कूपे में नमाज पढ़ने की घटनाओं से की जाने लगी।

लेकिन अगर हम रेलवे के नियमों और व्यवस्था को समझें, तो यह तुलना पूरी तरह से गलत है। इसका सबसे पहला और बड़ा कारण पब्लिक और प्राइवेट स्पेस का बुनियादी अंतर है।

जब कोई यात्री ट्रेन के सामान्य डिब्बों जैसे कि स्लीपर या एसी कोच के गैलरी, कॉरिडोर या रास्ते में नमाज पढ़ता है या कोई अन्य गतिविधि करता है, तो वह एक सार्वजनिक स्थान होता है जहाँ से लगातार दूसरे यात्रियों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसी स्थिति में वहाँ से गुजरने वाले सह-यात्रियों का रास्ता रुक जाता है, उन्हें आने-जाने में भारी असुविधा होती है।

इसके बिल्कुल विपरीत, सैलून कोच एक पूरी तरह से बंद, सुरक्षित और निजी तौर पर बुक की गई जगह होती है। उसके भीतर कोई भी बाहरी सह-यात्री मौजूद नहीं होता है और न ही वहाँ किसी आम जनता का आना-जाना होता है। इसलिए सैलून कोच के भीतर की जाने वाली किसी भी गतिविधि से बाहरी यात्री को रत्ती भर भी असुविधा होने का कोई चांस ही नहीं रहता।

दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंतर सुरक्षा नियमों के सख्त पालन का है। रेलवे के नियम यह साफ कहते हैं कि अगर किसी नागरिक ने पूरा सैलून कोच निजी इस्तेमाल के लिए बुक किया है, तो वह वहाँ अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार कोई भी अनुष्ठान करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, बशर्ते वह रेलवे के किसी सुरक्षा कानून को न तोड़े।

चूँकि इस पूरी पूजा के दौरान पंडित जी की देखरेख में किसी भी तरह की आग, दीए या ज्वलनशील पदार्थ का उपयोग किया ही नहीं गया, इसलिए वहाँ सुरक्षा का कोई उल्लंघन हुआ ही नहीं। जब किसी सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान नहीं पहुँचा, किसी यात्री को कोई तकलीफ नहीं हुई तो फिर इस पूरी घटना को किसी भी अन्य नियम-विरुद्ध गतिविधि के बराबर खड़ा करना पूरी तरह से गलत है। इंटरनेट पर होने वाला यह पूरा बवाल असल में आधे-अधूरे तथ्यों, अधूरी धार्मिक समझ और रेलवे के नियमों की अज्ञानता का ही नतीजा है।

कौन थे ‘फादर अमीर’ जिन्होंने कतर को दुनिया की आर्थिक शक्ति बनाया: भारत में उनके निधन पर झुका तिरंगा, जानिए किन परिस्थितियों में होता है ऐसा

भारत ने कतर के ‘फादर अमीर’ हिज हाइनेस शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया है। 13 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा। तिरंगा उन सभी इमारतों पर एक दिन तक आधा झुका रहेगा, जहाँ राष्ट्रीय झंडा नियमित फहराया जाता है।

इस दिन कोई आधिकारिक मनोरंजन वाले कार्यक्रम भी नहीं आयोजित होंगे। संसदीय मामलों और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू जल्द ही कतर जाएँगे और भारत सरकार की ओर से कतर को शोक संदेश देंगे और संवेदना जताएँगे।

पीएम मोदी ने फादर अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल-थानी के निधन पर शोक व्यक्त किया है और कहा है कि वह भारत के सच्चे दोस्त थे। उन्होंने कहा कि वे दूरदर्शी व्यक्ति थे, जिन्होंने कतर को विकास और खुशहाली को नई ऊँचाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए कतर के फादर अमीर को श्रद्धांजलि दी और कतर के नेतृत्व, शाही परिवार और वहाँ की जनता के प्रति अपनी संवेदना जताई।

अपने पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, हम उन्हें एक सच्चे दोस्त के रूप में याद करते हैं। पीएम ने फरवरी 2024 की अपनी कतर यात्रा को याद किया और ‘फादर अमीर’ के प्रति संवेदना जताते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

2024 की प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारत-कतर के आपसी रिश्तों में और मजबूती आई। कतर भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाला अहम देश है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान द्विपक्षीय व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अहम समझौते हुए । कतर की जनसंख्या में अप्रवासी भारतीयों का बड़ा भाग है, जो कतर के विकास में अहम योगदान दे रहे हैं। इससे दोनों देश की नजदीकियाँ भी बढ़ी हैं।

कौन थे शेख हमद बिन खलीफा अल थानी

1995 से 2013 तक कतर के अमीर के रूप में अपनी सेवा देने वाले शेख हमद बिन खरीलाफ अल थानी को आधुनिक कतर का निर्माता कहा जाता है। कतर को आर्थिक राजनयिक और वैश्विक स्तर पर उन्होंने पहचान दिलाई। उनके शासनकाल में कतर ने अपने नेचुरल गैस के व्यापक भंडार के दम पर तेजी से प्रगति की और वैश्विक स्तर पर संपन्न देश के रूप में अपनी पहचान बना। उन्होंने इसके बाद अपनी सत्ता बेटे शेख तमीन बिन हमद अल थानी को सौंप दी। 12 जुलाई 2026 को 74 वर्ष में उनका निधन हो गया।

शेख हमद बिन खलीफा अल थानी को कतर में ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। दरअसल ये कोई पारिवारिक संबोधन नहीं, बल्कि कतर में दिया जाने वाला एक सम्मानजनक आधिकारिक खिताब है। जब कोई शासक या अमीर अपनी सत्ता स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंप देता है, तब उसे ‘फादर अमीर’ कहा जाता है। शेख हमद बिन खलीफा अल थानी ने 2013 में स्वेच्छा से अपने बेटे शेख तमीम बिन हमद अल-थानी को सत्ता सौंप दी थी। इसलिए उन्हें कतर में सम्मान से ‘फादर अमीर’ कहते हैं। खाड़ी देशों में इस तरह का स्वैच्छिक सत्ता हस्तांतरण बहुत कम देखने को मिलता है।

उनका जन्म 1952 में हुआ था। उनके अब्बू का नाम शेख खलीफा बिन हमद अल-थानी था जो कतर के शासक थे। उनकी अम्मी शेखा आयशा बिंत हमद अल अत्तिया था। कतर पर अली थानी राजवंश की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य से है। जब कतर को 1971 में ब्रिटेन से आजादी मिली, तो उसके कुछ ही महीनों बाद 1972 में शेख हमद के पिता शेख खलीफा कतर के अमीर बन गए थे। इसलिए फादर अमीर को बचपन से ही सत्ता का उत्तराधिकारी माना जाता था।

यूके के प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री एकेडमी सैंडहर्स्ट से 1971 में ग्रेजुशन करने के बाद वह कतर आकर सेना में शामिल हो गए। धीरे-धीरे वह सेना के कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँचे। 1977 में उन्हें कतर का ‘क्राउन प्रिंस’ आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया। जून 1995 में कतर में उन्होंने रक्तहीन सत्तापलट किया। हुआ यूँ कि उनके पिता शेख खलीफा जब स्विटजरलैंड की यात्रा पर थे तो उन्होंने सेना के समर्थन से तख्तापलट किया और खुद को ‘अमीर’ घोषित कर दिया। इसकी वजह से दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। लंबे समय तक अब्बा फ्रांस में निर्वासित रहे, लेकिन आपसी सुलह के बाद 2004 में वे कतर लौटे, जहाँ 2016 में उनका निधन हुआ।

दरअसल फादर अमीर का मानना था कि उनके पिता प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर रहे और पुराने तरीके से शासन चला रहे हैं।

आधुनिक कतर के निर्माता

उन्होंने कतर को अपने शासनकाल में पूरी तरह बदल दिया।कतर के प्राकृतिक संसाधनों खासकर गैस भंडार का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। उनके नेतृत्व में कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल हो गया। इसका असर ये हुआ कि देश में समृद्धि आई और प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अव्वल श्रेणी में पहुँच गई। उन्होंने कतर के सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिए दुनिया भर में बड़े निवेश कराए। इससे कतर की आर्थिक और रणनीतिक पहुँच कई देशों तक बढ़ी। उनके शासन में अल जजीरा न्यूज नेटवर्क की स्थापना हुई, जिसने कतर को वैश्विक मीडिया शक्ति के रूप में पहचान दिलाई।

उनके नेतृत्व में कतर ने 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अधिकार हासिल किया। इसके लिए देश में मेट्रो, स्टेडियम, सड़कें और दूसरे बुनियादी ढाँचे का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने कतर को मध्य-पूर्व की कूटनीति में महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया। हालाँकि कुछ क्षेत्रीय नीतियों और इस्लामी संगठनों के साथ संबंधों को लेकर उनकी सरकार विवादों में भी रही।

भारत और कतर के बीच ऊर्जा, व्यापार, तकनीक के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते हैं। प्रवासी भारतीयों की बड़ी संख्या यहाँ रहती है जिससे दोनों देशों के संबंध और गहरे हो गए हैं। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और कतर के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। खासकर शेख हमद के शासनकाल के दौरान दोनों देशों के संबंध बेहद मजबूत हुए थे। यही वजह है कि भारत सरकार ने उनके निधन पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है।

तिरंगा कब आधा झुकाया जाता है?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को राष्ट्रीय शोक के वक्त आधा झुकाया जाता है। यह शोक के साथ-साथ उनके प्रति सम्मान का प्रतीक है।

आम तौर पर देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश और दूसरे उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के निधन पर झंडा आधा झुकाया जाता है।

भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार ऐसा किया जाता है। वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों के निधन पर गृह मंत्रालय विशेष निर्देश जारी करता है, तब झंडा झुकाया जाता है।

किसी राज्य के राज्यपाल या मुख्यमंत्री के निधन पर उस राज्य में झंडा आधा झुकाया जाता है। किसी राष्ट्रीय त्रासदी पर या असाधारण घटना पर जब केन्द्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है तो झंडा आधा झुका रहता है।

इसके अलावा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष, सरकार के मुखिया या महत्वपूर्ण वैश्विक नेता के निधन पर यदि भारत सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती है, तो उस दिन सभी सरकारी इमारतों पर तिरंगा आधा झुका रहता है। इस दिन सरकारी कामकाज तो सामान्य रूप से होते हैं लेकिन कोई मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होता है। हालाँकि राष्ट्रीय अवकाश भी नहीं होता है।

न्यूक्लियर पॉवर से रोशन होगा बांग्लादेश, भारत-रूस दे रहे तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग: समझें कैसे फुलप्रूफ सिक्योरिटी के साथ ये प्लांट लगातार देगा बिजली

भारत के बिल्कुल बगल में पश्चिम बंगाल से होकर बहने वाली पद्मा नदी के किनारे एक बहुत बड़ा बदलाव आकार ले रहा है। बांग्लादेश अपने पहले न्यूक्लियर पॉवर प्लांट यानी रूपपुर परमाणु ऊर्जा परियोजना का निर्माण कर रहा है। वहाँ खड़े विशालकाय, हाथीदांत के रंग जैसे कूलिंग टावर्स को देखने के लिए स्थानीय लोग आते हैं और तस्वीरें लेते हैं।

एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और रूस द्वारा उसे दी जा रही मदद को लेकर चिंतित है, वहीं भारत के ठीक पड़ोस में एक और पड़ोसी देश परमाणु शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। हालाँकि बांग्लादेश का यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक ऊर्जा के लिए है। ऐसे में इस प्रोजेक्ट को भारत का भी पूरा सहयोग मिल रहा है।

रूपपुर प्रोजेक्ट में तकनीकी तौर पर मिल रहा रूस का साथ

ब्लूमबर्ग की ताजी रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2028 में पूरी तरह से चलने जा रहा रूपपुर में बांग्लादेश का यह पहला परमाणु बिजली घर रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम की मदद से बनाया जा रहा है। यह कुल 2.4 गीगावाट का प्रोजेक्ट है, जिसमें बारह-बारह सौ मेगावाट के दो आधुनिक रशियन-डिजाइन रिएक्टर लगाए जा रहे हैं।

वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक, रोसाटॉम के साथ हुए मुख्य समझौते के तहत इस प्लांट की शुरुआती लागत करीब 12.65 बिलियन डॉलर आँकी गई थी, जिसमें शुरुआती कुछ सालों का परमाणु ईंधन भी शामिल है।

रूपपुर परमाणु प्लांट की प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

पहले इस प्लांट की पहली यूनिट को साल 2023 तक शुरू होना था, लेकिन कोविड महामारी, यूक्रेन पर रूस के हमले और मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संकटों के चलते यह प्रोजेक्ट लेट हो गया। अब उम्मीद है कि पहला रिएक्टर साल 2027 की शुरुआत में और दूसरा उसके एक साल बाद यानी 2028 तक पूरी तरह चालू हो पाएगा। इस परियोजना को प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार आगे बढ़ा रही है, जो साल 2024 में शेख हसीना सरकार की तख्तापलट के कुछ समय बाद सत्ता में आई है।

प्रोजेक्ट में देरी से बढ़ गई लागत, परेशान है बांग्लादेश

इस देरी की वजह से बांग्लादेश को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले बांग्लादेशी मुद्रा ‘टका’ काफी कमजोर हो गई है। स्थानीय मुद्रा के हिसाब से देखें तो पिछले 10 साल में इस प्रोजेक्ट की लागत लगभग एक-चौथाई बढ़ चुकी है। ब्लूमबर्ग को दिए बयान में ढाका यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद शफीकुल इस्लाम का कहना है कि अगर यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो जाता, तो न केवल लागत बढ़ने से बचती, बल्कि बांग्लादेश को महँगे जीवाश्म ईंधन के आयात से भी राहत मिल जाती।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

इसके बावजूद प्लांट के ऑपरेटरों का दावा है कि लंबे समय की सुरक्षा और बिजली की निश्चित आपूर्ति के लिहाज से यह सौदा देश के लिए पूरी तरह फायदेमंद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी साबित होगा।

दुर्घटना होने पर किसकी होगी जिम्मेदारी?

अब आते हैं सबसे बड़े और सबसे डरावने सवाल पर कि अगर रूपपुर में कोई परमाणु दुर्घटना या तबाही होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि रूपपुर प्लांट भारतीय सीमा के बेहद करीब है। परमाणु रेडिएशन सीमाओं को नहीं मानता और हवा-पानी के जरिए यह कुछ ही घंटों में भारत के एक बड़े हिस्से विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्वी राज्यों को अपनी चपेट में ले सकता है। अंतरराष्ट्रीय नियमों और न्यूक्लियर लायबिलिटी के सिद्धांतों के तहत इस स्थिति को समझना जरूरी है।

ऑपरेटर की प्राथमिक जिम्मेदारी (The Operator’s Liability): अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और ‘वियना कन्वेंशन ऑन सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज‘ के मुताबिक, किसी भी परमाणु दुर्घटना की स्थिति में सबसे पहली और सीधी जिम्मेदारी उस देश की एजेंसी की होती है जो प्लांट को चला रही है। रूपपुर के मामले में यह जिम्मेदारी ‘न्यूक्लियर पॉवर प्लांट कंपनी बांग्लादेश लिमिटेड’ (NPCBL) और बांग्लादेश सरकार की होगी। फुकुशिमा आपदा के समय भी पूरी जिम्मेदारी जापानी कंपनी टेपको (TEPCO) और जापान सरकार पर आई थी।

सप्लायर (रूस/रोसाटॉम) की भूमिका: सप्लायर देशों की भूमिका की बात करें तो रूस जैसे बड़े परमाणु निर्यातक अपने समझौतों में एक सुरक्षा कवच शामिल करवाते हैं। इसके तहत तकनीकी खराबी साबित होने पर भी वित्तीय मुआवजे का एक बड़ा हिस्सा ऑपरेटर देश को ही भुगतना पड़ता है। हालाँकि आधुनिक रशियन रिएक्टरों में सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम होते हैं जो पिघले हुए परमाणु ईंधन को बाहर फैलने से रोकते हैं, लेकिन किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में रूस पर सीधी कानूनी जिम्मेदारी डालना अंतरराष्ट्रीय अदालतों में बहुत पेचीदा काम होता है।

परमाणु ऊर्जा की तरफ क्यों बढ़ रहा है बांग्लादेश

सुरक्षा के इतने बड़े जोखिमों और भारी-भरकम खर्च के बावजूद बांग्लादेश आखिर परमाणु बिजली के पीछे क्यों भाग रहा है। इसका जवाब उसके मौजूदा बिजली संकट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में छिपा है। वर्तमान में बांग्लादेश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस, कोयले और फर्नेस ऑयल जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है। देश में 42% बिजली प्राकृतिक गैस से, 23% कोयले से और करीब 19% फीसदी फर्नेस ऑयल से आती है। इसके अलावा एक बड़ा हिस्सा भारत से खरीदी जाने वाली बिजली का है।

बांग्लादेश पॉवर डेवलपमेंट बोर्ड के आँकड़ों के आधार पर बना चार्ट (फोटो साभार: AI ChatGPT)

बीते कुछ सालों में यूक्रेन युद्ध और ईरान के तनाव की वजह से जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें लग गईं, गाँवों में कई-कई घंटों के पावर कट होने लगे और फैक्ट्रियों का उत्पादन ठप हो गया। इस बाहरी झटके ने बांग्लादेश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर देश को तरक्की की राह पर ले जाना है, तो ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा।

रूपपुर प्लांट जब 2028 में पूरी तरह चालू हो जाएगा, तो यह अकेले देश की 15% बिजली की जरूरत को पूरा करेगा। एनर्जी एनालिस्ट शफीकुल आलम के मुताबिक, इससे बांग्लादेश को अगले 5 से 7 साल तक कोई नया कोयला या गैस प्लांट लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे वह पर्यावरण के अनुकूल रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) पर ध्यान दे सकेगा।

एशिया में तेजी से बढ़ रही परमाणु उर्जा, रूस-चीन और भारत का दबदबा

दुनियाभर में बन रहे लगभग 80 परमाणु रिएक्टरों में से ज्यादातर एशिया में हैं और इन पर रूस व चीन का दबदबा है। ये दोनों देश विकासशील देशों को सस्ती दरों पर या लंबे समय के कर्ज (20 से 25 साल की आसान किश्तों) पर अपनी परमाणु तकनीक बेच रहे हैं। इसके जरिए वे इन देशों को अपने ऊपर दशकों के लिए निर्भर बना लेते हैं। बांग्लादेश को रूस द्वारा दिया गया भारी कर्ज उसे लंबे समय के लिए मॉस्को के रणनीतिक प्रभाव में ले आता है।

दक्षिण एशिया में परमाणु होड़ पहले से ही तेज है। भारत 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को 11 गुना बढ़ाकर 100 गीगावाट करने की योजना पर काम कर रहा है (जिसमें रूस खुद तमिलनाडु के कुडनकुलम में रिएक्टर बना रहा है)। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीन ने 6 परमाणु रिएक्टर सप्लाई किए हैं जिनकी क्षमता 3.3 गीगावाट है।

परमाणु नीति के विशेषज्ञ टोबी डाल्टन (कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस) एक जरूरी चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि किसी भी विकासशील देश को परमाणु ऊर्जा के ‘हाइप’ (चकाचौंध) में आकर जल्दबाजी में फैसले नहीं लेने चाहिए। न्यूक्लियर प्लांट चलाने के लिए केवल रिएक्टर बना लेना काफी नहीं है, इसके लिए एक बेहद कुशल कार्यबल, एक पूरी तरह स्वतंत्र रेगुलेटरी बॉडी (नियामक संस्था) और सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल हो चुके परमाणु कचरे (Spent Fuel) को सुरक्षित ठिकाने लगाने की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

ईस्ट-पाकिस्तान के दौर से जुड़ी है परमाणु जिद

वैसे, यहाँ ये जानना भी जरूरी है कि बांग्लादेश की यह परमाणु महत्वाकांक्षा कोई नई या अचानक पैदा हुई कहानी नहीं है। इसकी जड़ें 1960 के दशक से जुड़ी हैं, जब बांग्लादेश जैसी कोई जगह दुनिया के नक्शे पर नहीं थी और यह इलाका पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। साल 1961 में जब अविभाजित पाकिस्तान ने अपने परमाणु कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की, तब पूर्वी पाकिस्तान के पबना जिले के रूपपुर में एक परमाणु संयंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा गया था।

उस समय जमीन भी अधिग्रहित कर ली गई थी, लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान के शासकों ने जानबूझकर इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया और सारा ध्यान अपने इलाके (पश्चिमी पाकिस्तान) पर केंद्रित रखा। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के मन में यह बात हमेशा एक कसक की तरह चुभती रही कि उनके साथ भेदभाव किया गया।

साल 1971 में एक खूनी संघर्ष के बाद भारत ने जब बांग्लादेश को आजाद कराया, तो देश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने इस सपने को फिर से जिंदा करने की कोशिश की, लेकिन देश की आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह योजना दशकों तक फाइलों में दबी रही। अब जब भारत और पाकिस्तान दोनों के पास बड़ी परमाणु क्षमताएँ हैं, तो बांग्लादेश के भीतर एक तरह का राष्ट्रीय गौरव जागा है। वहाँ के आम लोगों और वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भारत और पाकिस्तान ऐसा कर सकते हैं, तो बांग्लादेश को भी यह क्षमता हासिल करनी चाहिए।

भारत दे रहा है तकनीकी सहयोग और ट्रेनिंग, रूस-बांग्लादेश के साथ त्रिपक्षीय समझौता

भारत-बांग्लादेश और रूस के बीच 1 मार्च 2018 को एक बड़ा समझौता हुआ था। इस त्रिपक्षीय समझौते में रूसी कंपनी जहाँ परमाणु संयत्र लगा रही है, तो वहीं भारत की तरफ से इस प्रोजेक्ट को पूरा तकनीकी सहयोग दिया जा रहा है। खास बात ये है कि भारत बांग्लादेशी परमाणु वैज्ञानिकों को बाकायदा ट्रेनिंग भी दे रहा है।

भारत-रूस-बांग्लादेश असैन्य परमाणु समझौते का शुरुआती स्क्रीनग्रैब

ये समझौता इस परमाणु प्रोजेक्ट के पूरी तरह से शुरू होने तक लागू रहेगा। इस पूरे प्रोजेक्ट में भारत सरकार धन से नहीं बल्कि अपने ज्ञान का मदद कर रही है, इसके लिए भारत के वैज्ञानिकों का पूरा खर्च भी बांग्लादेश ही उठा रहा है।

यहाँ ये बताना भी अहम है कि बांग्लादेश में आज परमाणु उर्जा संयत्र काम करने जा रहा है, तो उसमें भारत और रूस का पूरा सहयोग है। ये प्रोजेक्ट भी शेख हसीना सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का नमूना है, जिसे मोदी सरकार का भरपूर सहयोग मिला। आगे भी भारत इस प्रोजेक्ट को सहयोग करता रहेगा, ताकी पड़ोसी देश ऊर्जा के मामले में आँशिक आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ सके।

फीफा विश्व कप 2026 में रोमांचक जीत से सेमी में पहुँचे अर्जेंटीना और इंग्लैंड, अब फाइनल के लिए होगी जंग: पढ़ें कैसे डिफेंडिंग चैंपियन ने आखिरी पलों में स्विस टीम को दी मात

इंग्लिश क्लब आर्सेनल के लीजेंड, मशहूर खिलाड़ी व, डेनिस बर्जकेंप ने कभी कहा था – When you start supporting a football club, you don’t support it because of the trophies, or a player, or history, you support it because you found yourself somewhere there; found a place where you belong.

कहते हैं एकबार आप किसी फुटबॉल टीम से मोहब्बत कर बैठते हैं तो अपनी अंतिम सांसों तक भी उसका मोह, उसका दामन नहीं छोड़ पाते। यही तो है फुटबॉल का जादू।

खैर, बात करते हैं फीफा विश्व कप के बारे में।

बीती, देर रात ढाई बजे, टूर्नामेंट के तीसरे क्वार्टर फाइनल मुकाबले में, नॉर्वे के खिलाड़ी इंग्लैंड की टीम के विरुद्ध मैदान में उतरे। अर्लिंग हालांड के नेतृत्व में नॉर्वे एक बड़ा उलटफेर करने के इरादे से मैदान में उतरी थी। वहीं, कप्तान हैरी केन व साथी खिलाड़ियों के शानदार फॉर्म के दम पर इंग्लैंड इस मैच को जीत कर विश्व कप के सेमीफाइनल की ओर कदम बढ़ाना चाहती थी। नॉर्वे की कोशिश थी कि वह ब्राजील के खिलाफ किए शानदार प्रदर्शन को दुबारा दोहराते हुए एक बड़ा उलटफेर कर दे।

मियामी के स्टेडियम में मैच का आगाज़ होता है। नॉर्वे ने थ्री लाएंस को तब चौंका दिया था जब मैच के छत्तीसवें मिनट में युवा खिलाड़ी आंद्रेस सैल्देरुप एक जबरदस्त गोल दाग कर तीसरे क्वार्टर फाइनल मैच में इंग्लैंड के विरुद्ध अपनी टीम को बढ़त दिला देते हैं। सारा स्टेडियम वाइकिंग क्लैप्स से गूंज उठता है। इंग्लिश टीम थोड़ा परेशानियों में नजर आने लगती है।

मगर पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम में ज्यूड बेलिंघम एक गोल दागते हुए चिंता के बादलों को कहीं दूर भेज देते हैं। मैच के 45+2 मिनट पर बांई फ्लैंक से एंथोनी गोर्डन नॉर्वे के चार खिलाड़ियों के बीच से एक सटीक पास अपने साथी खिलाड़ी के लिए बढ़ाते हैं। ज्यूड बेलिंघम कोई ग़लती नहीं करते और स्कोर को 1-1 कर देते हैं।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने की कोशिशें करती रहती हैं। मगर, ना नॉर्वे कोई गोल कर सकी थी ना ही इंग्लैंड। विरोधी बॉक्स के करीब आकर अक्सर नॉर्वे के खिलाड़ी अपने स्टार स्ट्राइकर अर्लिंग हालांड को नजरअंदाज करते दिखे। कई दफा अर्लिंग हालांड खुद को बेहतरीन पोजीशन में लेकर जा रहे थे पर गेंद उनकी ओर नहीं बढ़ाई जा रही थी। इंग्लिश टीम भी तमाम प्रयासों के बावजूद गोल स्कोर नहीं कर पा रही थी। एक बार फिर ओर्हान नायलांड गोल पर नॉर्वे के लिए बेहतरीन रक्षण करते नजर आए। नब्बे मिनट तक स्कोर बराबरी पर रहने के चलते मैच एक्स्ट्रा टाइम में चला जाता है।

यहाँ 90+3 मिनट में एक बार फिर ज्यूड बेलिंघम ही एक संकटमोचक की भांति इंग्लैंड के लिए एक शानदार गोल स्कोर कर देते हैं। अंतिम समय पर बेलिंघम के इस गोल के चलते इंग्लैंड इस क्वार्टर फाइनल मुकाबले में 2-1 से बेहद अहम बढ़त ले लेता है।

नॉर्वे वापसी के कई प्रयास करता है परन्तु वापसी करने की उसकी तमाम कोशिशें निर्रथक ही रह जाती हैं। मैच समाप्ति पर स्कोर 2-1 ही रहता है। इंग्लैंड सेमीफाइनल में अपनी जगह सुनिश्चित कर लेती है।

मेक्सिको के ख़िलाफ़ दो गोल मारने के पाँच दिन बाद ही बीती रात ज्यूड बेलिंघम ने फिर दो बेहद अहम गोल दाग आज खेल का रुख इंग्लैंड की ओर मोड़ दिया। तेईस वर्षीय ज्यूड बेलिंघम कप्तान हैरी केन की भांति अबतक इस विश्व कप में कुल छह गोल दाग चुके हैं। इंग्लिश टीम अपने इतिहास में चौथी दफा विश्व कप के सेमीफाइनल में जगह बना चुकी है।

इसके बाद सुबह साढ़े छह बजे, कन्सास सिटी स्टेडियम में कतर विश्व कप के विजेता, अर्जेंटीना, के समक्ष स्विट्जरलैंड की टीम थी। अर्जेंटीना ने पिछले मैच में अंतिम बारह मिनटों में करिश्माई खेल दिखाते हुए, मैच में 2-0 से पिछड़ने के बावजूद, 3-2 से मिस्र के खिलाफ अपना मैच जीता था। वहीं, स्विट्जरलैंड की टीम अपना पिछला मैच जीतने के बाद से ही इस मुकाबले के लिए जोरदार तैयारी में लगी हुई थी। ग्रानित झ़ाका के नेतृत्व में आज सुबह स्विस खिलाड़ी कुछ बड़ा करना चाहते थे। हालाँकि जब तक उनतालीस वर्षीय लियोनेल मेस्सी एक बीस वर्षीय मेस्सी के जज्बे के साथ खेलते रहेंगे, अर्जेंटीना को हराना कोई आसान काम नहीं होने वाला था।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी जरूर काफी चिंताओं से घिरे हुए हैं। उनकी परेशानी का कारण है कि वह अपने अनुभवी खिलाड़ियों के साथ आगे बढ़ें या फिर बेंच पर मौजूद खुद को साबित करने के लिए भूखे युवा खिलाड़ियों जैसे वैलेंटीन बार्को, नीको पाज़ व सीमिओनी को मैदान पर उतारें।

दोनों ही टीमें मैदान पर आती हैं। अर्जेंटीना अपनी पारंपरिक अल्बीसेलेस्त ( हल्की नीली व सफेद धारियां) जर्सी पहने मैदान में उतरती है। सामने थी बेहद प्यारी लाल रंग की अपनी जर्सी में स्विट्जरलैंड की टीम, जिसके पास आज खोने को कुछ भी न था। दोनों ही टीमों के समर्थकों का हुजूम स्टेडियम में उमड़ा हुआ था। लोगों में खुशी का माहौल था।

निर्धारित समय पर रेफरी होआओ पेड्रो पिन्हियेरो से इशारा मिलते ही टूर्नामेंट के आखिरी क्वार्टर फाइनल की शुरुआत होती है। स्विट्जरलैंड की टीम बेहद शानदार अंदाज में मैच की शुरुआत करते हैं। लेकिन मैच के दसवें मिनट में वह अर्जेंटीनी टीम को कॉर्नर प्रदान कर देते हैं। लियोनेल मेस्सी कॉर्नर लेने आगे आते हैं। वो एक बेहतरीन गेंद स्विस बॉक्स में भेजते हैं। वहां लीवरपूल के लिए क्लब फुटबॉल खेलने वाले एलिक्सिस मैक एलिस्टर मौका मिलते ही जोरदार हेडर से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना इस गोल के साथ मैच में बढ़त ले लेती है। दर्शक दीर्घा में बैठे हजारों अर्जेंटीनी समर्थक उन्माद से पगलाए नजर आने लगते हैं।

खैर, मैच आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 ही रहता है। अगर अंत तक यही स्कोर रहे तो आज स्विट्जरलैंड की वापसी तय थी। वह लगातार अटैकिंग मूव्स बनाते रहते हैं। स्विस फॉरवर्ड लाइन बारम्बार अर्जेंटीनी रक्षापंक्ति को भेदने की कोशिशें करती रहती है। लेकिन लिसांद्रो मार्टिनेज़ आज बेहद शानदार रक्षण कर रहे थे। वह कई जरूरी टैकल्स करते जा रहे थे।

मगर सड़सठवें मिनट में दान न्दोऐ बांई छोर से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। वह गेंद साथी खिलाड़ी की ओर सरका कर अपने लिए रिक्त स्थान बनाते हैं और तुरंत गेंद वापस पा कर गोलपोस्ट की दिशा में तीव्र शॉट लगाते हैं। गोलकीपर एमिलियानो मार्तिनेज़ का दुर्ग भेदा जा चुका था। स्कोर बराबर हो चुका था। इस बार खुशियां मनाने की बारी स्विस समर्थकों की थी।

लेकिन पाँच मिनट पश्चात ही खेल में एक मोड़ आता है जब पहले ही एक येलो कार्ड पाए ब्रील एम्बोलो को फाउल करने के चलते रेफरी द्वारा रेड कार्ड दिखा दिया जाता है। इतने बड़े मौके पर यह एक बेहद बचकानी गलती थी, जो आगे चलकर टीम के लिए बहुत महँगी भी साबित हो सकती थी।

स्विट्जरलैंड की टीम अब दस खिलाड़ियों के संग खेलने के लिए अभिशप्त हो गई थी। खेल आगे बढ़ता है। अर्जेंटीना बढ़त लेने की फिराक में कई हमले करती है। मगर उनके यह मंसूबे सफल नहीं रहते। दस खिलाड़ियों के साथ भी स्विस टीम का रक्षण काबिले-तारीफ था। मैच अब धीरे-धीरे एक्स्ट्रा-टाइम की दिशा में सरकता दिख रहा था।

नब्बे मिनट की समाप्ति तक स्विट्जरलैंड विपक्षी टीम को बढ़त लेने से वंचित रखते हैं। मैच अब एक्स्ट्रा-टाइम में जा चुका था। स्विस टीम अब तक काफी थक चुकी थी। दोनों ही टीमें कुछ जरूरी परिवर्तन भी करती हैं। मैच के 112 मिनट में होसे़ मैनुएल लोपेज़ तीन स्विस डिफेंडरों को अपनी ओर खींचते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी हूलियन अल्वारेज़ की ओर बढ़ाते हैं। हूलियन अल्वारेज़ बॉक्स के बाहर से ही एक बेहतरीन कर्लिंग शॉट कोबेल के पोस्ट की और लगाते हैं। गोलकीपर कोबेल इस जादुई शॉट के आगे बेबस नजर आते हैं। अल्वारेज़ एक ऐसे समय में, जब मैच पेनाल्टी शूटआउट की ओर बढ़ रहा था, यह गोल दाग कर अर्जेंटीना को मैच में आगे कर देते हैं।

आठ मिनट पश्चात अर्जेंटीना फिर एकबार मौका पाते ही तेज काउंटर अटैक करती है। अल्माडा स्विस गोलपोस्ट पर निशाना साधते हैं। गेंद गोलकीपर से छिटक जाती है। लाउतारो मार्टिनेज तुरंत आगे बढ़ कर गेंद को जाल के भीतर भेज देते हैं। अर्जेंटीना 3-1 से यह मैच जीत जाता है।

तीन नॉकआउट मैचों में तीन-तीन गोल दागते हुए तीनों दफा पिछड़ने के बावजूद वापसी करते हुए गत विजेता सेमीफाइनल में पहुंच चुके हैं। अब अपने इतिहास का छठा सेमीफाइनल खेलने जा रही अर्जेंटीना का सामना होगा शानदार फुटबॉल खेल रही थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम से।

सेमीफाइनल मुकाबलों की बिसात सज चुकी है। अब पहले तो पंद्रह जुलाई को जबरदस्त अटैकिंग फुटबॉल खेल रही, इस टूर्नामेंट की सबसे संतुलित टीम फ्रांस का सामना होगा उनके हालिया वर्षों के चिर प्रतिद्वंद्वी स्पेन से। स्पेन की रक्षापंक्ति ने पूरे टूर्नामेंट में अबतक मात्र एक गोल खाया है। लेकिन वो गोल दागने के लिए भी संघर्षरत नजर आए हैं। डलास स्टेडियम में मजबूत अटैकिंग फोर्स एक बेहद मजबूत रक्षापंक्ति की परिक्षा लेती दिखेगी। कई पुराने हिसाब भी चुकता किए जाने हैं। यह बेहद शानदार मैच रहने वाला है।

फिर सोलह जुलाई को अटलांटा स्टेडियम में गत विजेता का सामना होगा शानदार फार्म में चल रही इंग्लिश टीम से। दोनों ही टीमें कैसे भी यह मैच जीत फाइनल में जगह बनाने का प्रयास करेंगी। अर्जेंटीनी टीम अबतक चंद खिलाड़ियों के व्यक्तिगत प्रदर्शन के चलते तीन नॉकआउट मुकाबलों में किसी तरह अपेक्षाकृत छोटी टीमों के खिलाफ जूझते हुए अंतिम क्षणों में बढ़त लेकर यहाँ तक पहुँची है। उनके पास बेंच पर नीको पाज, सिमियोनी व वैलेंटीन बार्को सरीखे तेजतर्रार युवा खिलाड़ी मौजूद हैं।

मगर कोच लियोनेल स्कालोनी ने अभी तक उम्रदराज खिलाड़ियों के अनुभव पर ही दाँव खेला है। अब सेमीफाइनल के बड़े मौके पर वह कुछ अलग करने का जोखिम शायद ही उठाएँ। इंग्लैंड की टीम के पास युवा व अनुभवी खिलाड़ियों की बेहतरीन फौज है जो अंत तक हार नहीं मानती। उनके पास अच्छा अटैक और शानदार डिफेंस है। इंग्लिश टीम के खिलाफ अर्जेंटीना के लिए मुकाबला बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। यह एक और जबरदस्त टक्कर होगी।

फुटबॉल की खबरें जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

वीवा ला फुटबॉल।

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से दूरी बना रही Gen Z? न्यूयॉर्क में ‘समर ऑफ लड’ फेस्टिवल की धूम: जानिए डिजिटल गुलामी के खिलाफ युवाओं ने क्यों छेड़ी जंग

न्यूयॉर्क की सड़कों पर इन दिनों बड़ी संख्या में Gen Z युवा जुट रहे हैं। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि वे किसी प्रदर्शन या नए ट्रेंड का हिस्सा हैं, लेकिन इसकी वजह चौंकाने वाली है।

यही वह पीढ़ी है, जिसने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को अपनी दुनिया बना लिया था, लेकिन अब वही युवा कुछ समय के लिए मोबाइल से दूरी बनाने की अपील कर रहे हैं। वे लोगों से कह रहे हैं कि स्क्रीन छोड़िए, सामने बैठे इंसानों से बात कीजिए।

दरअसल न्यूयॉर्क में आयोजित हो रहा ‘समर ऑफ लड’ (Summer of Ludd) फेस्टिवल तकनीक के विरोध का नहीं, बल्कि डिजिटल जिंदगी और वास्तविक दुनिया के बीच खोते संतुलन को फिर से पाने की कोशिश बनकर उभर रहा है।

आखिर क्या है समर ऑफ लड?

न्यूयॉर्क के ईस्ट विलेज और टॉम्पकिन्स स्क्वायर पार्क में आयोजित होने वाला समर ऑफ लड आठ दिन तक चलने वाला ऑफलाइन फेस्टिवल है। इस साल यह फेस्टिवल 28 जून से 5 जुलाई तक चला। इसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ आने वाले लोगों से पूरे कार्यक्रम के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने की अपील की जाती है। किसी भी कार्यक्रम में फोटो खींचने, वीडियो बनाने या रिकॉर्डिंग करने की अनुमति नहीं होती।

आज जब किसी भी कार्यक्रम का प्रचार सोशल मीडिया पर होता है, तब इस फेस्टिवल ने बिल्कुल अलग रास्ता चुना है। इसके पोस्टर और कार्यक्रम की जानकारी इंटरनेट पर नहीं, बल्कि इलाके में लगाए गए पोस्टरों, पर्चों और छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के जरिए लोगों तक पहुँचाई जाती है।

आयोजकों का मानना है कि अगर उद्देश्य लोगों को स्क्रीन से बाहर निकालना है, तो शुरुआत भी ऑफलाइन तरीके से ही होनी चाहिए। फेस्टिवल में कई तरह की गतिविधियाँ आयोजित होती हैं।

इनमें नाटक, ऑफलाइन डेटिंग सेशन, कपड़ों की मरम्मत सीखने की कार्यशालाएँ, जीन (Zines) बनाना, शॉर्टवेव रेडियो सीखना, सामुदायिक चर्चाएँ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और निगरानी तकनीकों (Surveillance) पर खुली बहस शामिल है।

इन गतिविधियों का मकसद लोगों को यह एहसास कराना है कि मनोरंजन, सीखने और रिश्ते बनाने के लिए सिर्फ इंटरनेट ही एकमात्र रास्ता नहीं है।

Gen Z क्यों बन रही है इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत?

इस फेस्टिवल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें सबसे ज्यादा भागीदारी Gen Z की है। यह वही पीढ़ी है जिसने बचपन से स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच अपनी जिंदगी बिताई है।

कुछ साल पहले तक यही माना जाता था कि युवा पीढ़ी तकनीक के बिना रह ही नहीं सकती। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। कई युवा खुलकर कह रहे हैं कि लगातार मोबाइल पर बने रहने से उनकी एकाग्रता कम हुई है, मानसिक थकान बढ़ी है और वास्तविक रिश्तों पर असर पड़ा है।

अमेरिका में हुए एक सर्वे के अनुसार, लगभग आधे किशोर मानते हैं कि सोशल मीडिया उनकी उम्र के लोगों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। यह आंकड़ा पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी बढ़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि युवा अब डिजिटल दुनिया के फायदों के साथ-साथ उसके नुकसान को भी समझने लगे हैं।

यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा अब कुछ समय के लिए डिजिटल दुनिया से दूरी बनाकर वास्तविक दुनिया में लोगों से मिलने, बातचीत करने और नई चीजें सीखने की कोशिश कर रहे हैं।

यह तकनीक विरोध नहीं, संतुलित तकनीक की माँग है

कई लोगों को लग सकता है कि यह आंदोलन तकनीक के खिलाफ है, लेकिन आयोजक इस धारणा को गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्मार्टफोन, इंटरनेट या AI ने लोगों की जिंदगी आसान बनाई है और वे इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका असली सवाल यह है कि क्या इंसान अब अपनी तकनीक का मालिक है या धीरे-धीरे उसका गुलाम बनता जा रहा है।

आज सोशल मीडिया के एल्गोरिदम तय करते हैं कि हम क्या देखें, किस तरह की खबरें पढ़ें और किस तरह के वीडियो हमारे सामने आएँ। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हमारे व्यवहार, पसंद और आदतों का लगातार डेटा इकट्ठा करते हैं। ऐसे में आयोजकों का कहना है कि जरूरत तकनीक को खत्म करने की नहीं, बल्कि उस पर इंसानों का नियंत्रण बनाए रखने की है।

उनके मुताबिक, तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाए, लेकिन हमारे फैसले, समय और रिश्तों पर पूरी तरह हावी न हो।

युवाओं को आखिर किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है?

फेस्टिवल में शामिल होने वाले कई लोगों ने अपनी चिंताओं को खुलकर साझा किया। किसी ने कहा कि घंटों तक बिना वजह सोशल मीडिया स्क्रॉल करना अब आदत बन चुका है। किसी ने माना कि हर समय ऑनलाइन रहने की वजह से मानसिक दबाव बढ़ गया है। कुछ लोगों ने अकेलेपन, तनाव और लगातार तुलना करने की संस्कृति को भी बड़ी समस्या बताया।

इसके अलावा AI और निगरानी तकनीकों को लेकर भी युवाओं में चिंता दिखाई देती है। उनका मानना है कि आज इंटरनेट पर की गई लगभग हर गतिविधि रिकॉर्ड होती है। कंपनियाँ लोगों की पसंद और व्यवहार का डेटा इकट्ठा करती हैं और उसी के आधार पर उन्हें विज्ञापन और कंटेंट दिखाया जाता है।

युवाओं का कहना है कि सुविधा के नाम पर निजी जिंदगी धीरे-धीरे सार्वजनिक होती जा रही है। यही वजह है कि वे अब डिजिटल दुनिया और निजी जीवन के बीच संतुलन चाहते हैं।

‘Ludd’ नाम के पीछे क्या है कहानी?

इस फेस्टिवल का नाम 19वीं सदी के Luddites आंदोलन से लिया गया है। औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड में जब नई मशीनें फैक्ट्रियों में आने लगीं, तब कई कारीगरों और मजदूरों को डर था कि मशीनें उनके रोजगार छीन लेंगी। इसी वजह से उन्होंने उन मशीनों का विरोध किया। इतिहास में उन्हें Luddites के नाम से जाना गया।

हालाँकि आज का समर ऑफ लड आंदोलन उस दौर से काफी अलग है। यहाँ कोई मशीन तोड़ने या तकनीक खत्म करने की बात नहीं हो रही है। आयोजकों का कहना है कि वे सिर्फ लोगों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि तकनीक का उद्देश्य इंसानों की मदद करना है, उन पर हावी होना नहीं। यानी पुराने आंदोलन में सवाल रोजगार का था, जबकि आज का सवाल इंसानी समय, ध्यान और स्वतंत्रता का है।

विशेषज्ञ इस आंदोलन को कैसे देखते हैं?

तकनीक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की पहल लोगों को अपनी डिजिटल आदतों पर दोबारा सोचने का मौका देती है। हालाँकि वे यह भी कहते हैं कि आज की दुनिया में स्मार्टफोन और इंटरनेट से पूरी तरह दूरी बनाना लगभग असंभव है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, नौकरी, यात्रा, सरकारी सुविधाएँ और रोजमर्रा के कई जरूरी काम अब डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौती तकनीक छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके संतुलित इस्तेमाल की है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अधिकांश लोग मोबाइल और सोशल मीडिया के नुकसान को समझते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका सामाजिक और पेशेवर जीवन इन्हीं प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो चुका है।

यानी बदलाव आसान नहीं होगा, लेकिन इस तरह के आंदोलन कम से कम लोगों को सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं।

क्या यह डिजिटल डिटॉक्स का नया ट्रेंड बन सकता है?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के कई देशों में डिजिटल डिटॉक्स यानी कुछ समय के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है।

कई लोग अब छुट्टियों में मोबाइल बंद रखते हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया से कुछ दिनों का ब्रेक लेते हैं। कुछ लोग स्मार्टफोन की जगह साधारण फीचर फोन का इस्तेमाल शुरू कर रहे हैं। ऑफलाइन बुक क्लब, रनिंग क्लब, सामुदायिक कार्यक्रम और बिना मोबाइल वाले मिलन समारोह भी लोकप्रिय हो रहे हैं।

ऐसे में समर ऑफ लड को केवल एक स्थानीय फेस्टिवल नहीं, बल्कि इसी बदलती सोच का हिस्सा माना जा रहा है। यह बताता है कि अब लोग तकनीक को पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहते, बल्कि उसके साथ एक स्वस्थ रिश्ता बनाना चाहते हैं।

क्या यह आंदोलन सफल होगा?

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि न्यूयॉर्क का यह छोटा-सा फेस्टिवल आगे चलकर दुनिया भर में बड़ा सामाजिक आंदोलन बनेगा या नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिससे आज लगभग हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता जुड़ा हुआ है।

क्या लगातार स्क्रीन पर बिताया गया समय हमारी मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है? क्या सोशल मीडिया हमारे रिश्तों को बदल रहा है? क्या AI और एल्गोरिदम हमारे फैसलों पर असर डाल रहे हैं? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इंसान अब भी अपनी डिजिटल जिंदगी का मालिक है?

इन सवालों के जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं, लेकिन यह फेस्टिवल लोगों को कम से कम इतना सोचने पर मजबूर जरूर करता है कि तकनीक हमारी जिंदगी का हिस्सा रहे, लेकिन हमारी पूरी जिंदगी न बन जाए।

ब्रह्मपुत्र पर दुनिया का सबसे बड़ा बाँध नहीं Time Bomb प्लांट कर रहा China? चीनी सरकारी रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता: जानें- एक्टिव फॉल्ट लाइन पर बन रहा ये डैम क्यों है बेहद खतरनाक

चीन तिब्बत के पठार पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना (Hydropower Project) का निर्माण कर रहा है। यह महा-बाँध तिब्बत में यारलुंग सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र) नदी पर बनाया जा रहा है। इस परियोजना को लेकर भारत और बांग्लादेश जैसे निचले तटीय देश लंबे समय से पर्यावरण और सुरक्षा कारणों से चिंता जताते रहे हैं। लेकिन दिन पहले आई एक नई जियोलॉजिकल रिपोर्ट में हुए खुलासे ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है।

इस बार चेतावनी किसी बाहरी देश या स्वतंत्र संस्था ने नहीं, बल्कि खुद चीन के सरकारी वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों (Geologists) ने दी है। चीनी वैज्ञानिकों की एक आधिकारिक रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि जहाँ यह बाँध बनाया जा रहा है, उसके ठीक नीचे एक बेहद खतरनाक और ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ (Active Fault Line) मौजूद है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप आता है, तो यह बाँध एक बहुत बड़े ‘टाइम बम’ की तरह फट सकता है, जिससे न केवल चीन बल्कि भारत और बांग्लादेश में अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।

क्या है एक्टिव फॉल्ट लाइन और यह ‘पैझेन फॉल्ट’ कितनी खतरनाक है?

इस पूरे विवाद और खतरे को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ यानी सक्रिय भ्रंश रेखा क्या होती है। हमारी धरती के भीतर कई विशाल टेक्टोनिक प्लेट्स होती हैं, जो लगातार बहुत धीमी गति से हिलती-डुलती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं या एक-दूसरे से रगड़ खाती हैं, तो चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं।

इन्हीं दरारों को भूविज्ञान (Geology) की भाषा में फॉल्ट (Fault) या भ्रंश कहा जाता है। ‘एक्टिव फॉल्ट लाइन’ उस दरार को कहते हैं जहाँ हाल के भूगर्भीय इतिहास में हलचल हुई हो और भविष्य में भी कभी भी बड़ा भूकंप आने की पूरी संभावना हो। चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में जिस दरार का जिक्र किया है, उसका नाम ‘पैझेन फॉल्ट’ (Paizhen Fault) है।

यह फॉल्ट लाइन उस पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, जहाँ भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेट के बीच भीषण और निरंतर टकराव हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पैझेन फॉल्ट प्लीस्टोसिन युग (Pleistocene Epoch यानी हिमयुग) से ही अत्यधिक सक्रिय रही है।

आधुनिक वैज्ञानिक जाँच और प्राचीन झील के तलछटों (Lake Sediments) की डेटिंग से पता चला है कि यह फॉल्ट लाइन लगभग 9,500 साल पहले भी सक्रिय थी और वर्तमान होलोसिन (Holocene) युग में भी इसमें लगातार मजबूत हलचल देखी जा रही है।

साल 2017 में तिब्बत के मिलिन क्षेत्र में आया 6.9 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप इसी पैझेन फॉल्ट लाइन के उत्तरी छोर पर आया था, जो इस बात का जीता-जागता सबूत है कि यह क्षेत्र कभी भी बड़े भूकंप से दहल सकता है।

चीनी सरकारी शोधकर्ताओं ने रिपोर्ट में क्या-क्या खुलासे किए हैं?

चीन के इस महा-बाँध को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह किसी साधारण संस्था की नहीं है। इसे चीन के सरकारी महकमे ‘चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण’ (China Geological Survey) की देखरेख में तैयार किया गया है और पिछले महीने ही इसे चीनी भाषा के प्रतिष्ठित जर्नल ‘सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है।

इस अध्ययन को चेंगदू यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, चीन भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के नागरिक-सैन्य एकीकरण केंद्र और मध्य यारलुंग जांगबो नदी प्राकृतिक संसाधन अवलोकन और अनुसंधान स्टेशन के भूवैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से अंजाम दिया है।

इस सरकारी रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बेहद कड़े शब्दों में चेताया है कि एक्टिव पैझेन फॉल्ट सीधे तौर पर इस मेगा-डैम के बुनियादी ढाँचे की अखंडता को खतरे में डाल रही है। वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में बताया है कि इस एक्टिव फॉल्ट लाइन के कारण आसपास की चट्टानें पूरी तरह टूट चुकी हैं और उनके आंतरिक यांत्रिक गुण (Mechanical Properties) बदल चुके हैं।

इसके कारण जमीन के भीतर की संरचना बेहद कमजोर हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की जमीनी बनावट बेहद ढीली है और चट्टानों के बीच का आपसी जुड़ाव या सामंजस्य (Cohesion) बहुत कमजोर है। चीनी शोधकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि जब इस बाँध के विशाल जलाशय (Reservoir) को पानी से भरा जाएगा, तो लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण यहाँ की मिट्टी और चट्टानें पानी सोखकर और कमजोर हो जाएँगी।

ऐसी स्थिति में फॉल्ट लाइन की मामूली हलचल या किसी भी भूकंप के झटके से बाँध के दोनों तरफ की पहाड़ियों पर बेहद आसानी से भयंकर भूस्खलन (Landslides) और चट्टानें खिसकने की घटनाएँ शुरू हो सकती हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति निर्माण कार्य में लगे कर्मियों और भविष्य में बाँध के पूरे ढाँचे के लिए एक बड़ा सुरक्षा संकट खड़ी कर सकती है।

कहाँ बन रहा है यह दुनिया का सबसे बड़ा बाँध और क्या है इसका पैमाना?

चीन इस विशालकाय परियोजना को तिब्बत के मेडोग (Metog) काउंटी में बना रहा है, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘मेडोग हाइड्रोपावर स्टेशन’ (Medog Hydropower Station) नाम दिया गया है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह यारलुंग सांगपो नदी के ‘ग्रेट बेंड’ (Great Bend) के पास स्थित है।

यहाँ नदी अचानक एक बेहद तीखा मोड़ लेती है और करीब 2,000 मीटर गहरी खाई में गिरती है। चीन इसी प्राकृतिक ढलान और पानी के प्रचंड वेग का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए करना चाहता है। यह बाँध स्थल भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश की सीमा से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

इस बाँध के आकार और क्षमता की बात करें तो यह वास्तव में एक विशाल ढाँचा है। यह एक 60,000 मेगावाट की ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ पनबिजली परियोजना है। चीन के सरकारी दावों के अनुसार, इस बाँध से हर साल लगभग 300 बिलियन (30,000 करोड़) किलोवाट-घंटा बिजली पैदा होगी।

यह क्षमता चीन में ही पहले से मौजूद दुनिया के सबसे बड़े बाँध ‘थ्री गॉर्जेस डैम’ (Three Gorges Dam) की कुल वार्षिक बिजली उत्पादन क्षमता से तीन गुना अधिक है। इस महा-परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन (यानी लगभग 137 से 167 बिलियन अमेरिकी डॉलर) आँकी गई है।

चीनी सरकार ने दिसंबर 2024 में इस परियोजना को मंजूरी दी थी, जुलाई 2025 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और इसे साल 2033 तक पूरी तरह से चालू करने का एक बेहद कड़ा और तेज समयबद्ध लक्ष्य तय किया गया है।

इतने बड़े खतरों के बावजूद इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ा है चीन?

अब यहाँ एक बड़ा और स्वाभाविक सवाल यह उठता है कि जब चीन के अपने ही सरकारी वैज्ञानिकों ने इस जगह को एक ‘जियोलॉजिकल टाइम बम’ बता दिया है, तो फिर चीन की सरकार इतने बड़े खतरों को नजरअंदाज करके इस प्रोजेक्ट को पूरा करने पर क्यों अड़ी है? आखिर चीन के लिए इस परियोजना का क्या मतलब है और उसके पीछे उसकी क्या मंशा है? इसके पीछे चीन के कई गहरे रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण छिपे हैं।

सबसे पहला कारण चीन की विशाल ऊर्जा भूख और उसकी वैश्विक कार्बन-तटस्थता (Carbon Neutrality) की घोषणा है। चीन ने दुनिया के सामने वादा किया है कि वह आने वाले दशकों में अपनी कार्बन निर्भरता को कम करेगा और इसके लिए उसे भारी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत है।

यह अकेला बाँध चीन को इतनी बिजली दे सकता है जो उसके कई बड़े शहरों को रोशन कर सके और कोयले पर उसकी निर्भरता को बेहद कम कर दे। दूसरा बड़ा कारण चीन का अति-राष्ट्रवादी इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया के सामने अपनी तकनीकी और इंजीनियरिंग ताकत का लोहा मनवाना चाहती है।

‘थ्री गॉर्जेस डैम’ से तीन गुना बड़ा बाँध बनाना चीन के वैश्विक दबदबे और उसकी आंतरिक राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा प्रतीक है। तीसरा और सबसे खतरनाक कारण है भू-राजनीतिक हथियार (Geo-political Weapon)। तिब्बत का यह इलाका भारत की सीमा के बेहद करीब है।

इस नदी पर इतना बड़ा बाँध बनाकर चीन पानी के नियंत्रण की चाबी अपने हाथ में लेना चाहता है। भविष्य में भारत या अन्य पश्चिमी देशों के साथ किसी भी टकराव या युद्ध की स्थिति में, चीन इसके जरिए पानी को रोककर या अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़कर निचले इलाकों में कृत्रिम बाढ़ ला सकता है। हालाँकि ऐसा मुश्किल ही है, क्योंकि इससे उसे भी खतरा है।

यही वजह है कि चीनी वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में इस प्रोजेक्ट को बंद करने या रद्द करने की सिफारिश नहीं की है क्योंकि वे जानते हैं कि बीजिंग के राजनीतिक आकाओं के सामने ऐसी बात कहना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। वैज्ञानिकों ने केवल इसके ढलानों को मजबूत करने और कंक्रीट की सुरक्षा दीवारें बनाने जैसी तकनीकी सलाह दी है, ताकि परियोजना को किसी भी तरह जारी रखा जा सके।

भारत और बांग्लादेश के लिए इस बाँध से किस तरह का सीधा खतरा है?

यारलुंग सांगपो नदी कोई स्थानीय नदी नहीं है।  यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। यह तिब्बत के पश्चिमी हिस्से में आंग्सी ग्लेशियर से निकलती है और तिब्बत में 1,625 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहाँ इसे ‘सियांग’ और बाद में असम में ‘ब्रह्मपुत्र’ कहा जाता है।

इसके बाद यह नदी बांग्लादेश में ‘जमुना’ के नाम से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसलिए सीमा से महज 50 किलोमीटर दूर चीन का यह निर्माण सीधे तौर पर भारत और बांग्लादेश की सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। भारत के लिए सबसे बड़ा तात्कालिक खतरा भूगर्भीय विफलता (Geological Failure) का है।

यदि चीनी वैज्ञानिकों की आशंका सच साबित होती है और पैझेन फॉल्ट पर आए किसी भूकंप के कारण यह विशाल बाँध टूट जाता है, तो इसके जलाशय में जमा अरबों क्यूसेक पानी एक साथ किसी महाप्रलय की तरह नीचे की ओर बहेगा।

यह पानी अरुणाचल प्रदेश और असम के पूरे मैदानी इलाकों को कुछ ही घंटों में जलमग्न कर देगा, जिससे लाखों लोगों की जान जा सकती है और अभूतपूर्व तबाही मच सकती है।

हालाँकि कुछ जलविज्ञानी और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन पूरी तरह से ब्रह्मपुत्र का पानी नहीं मोड़ सकता, क्योंकि ब्रह्मपुत्र नदी को अपना 85 से 90 प्रतिशत पानी भारत में प्रवेश करने के बाद उसकी सहायक नदियों और मानसूनी बारिश से मिलता है।

भारत सरकार का इस पूरे मामले पर क्या रुख रहा है?

भारत सरकार चीन की इस खतरनाक गतिविधि पर बहुत बारीक नजर रख रही है। सीमा के इतने करीब दुनिया के सबसे बड़े बाँध का निर्माण भारत के लिए एक गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। भारत सरकार ने इस विषय को कई बार चीन के सामने राजनयिक स्तर पर उठाया है।

साल 2025 की शुरुआत में जनवरी के महीने में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों के समक्ष इस बाँध के निचले तटीय इलाकों (Downstream) पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भारत की गंभीर चिंताओं से अवगत कराया था।

इसके बाद फरवरी 2025 में भी भारत ने चीनी प्रशासन को अपनी आपत्तियाँ भेजी थीं। अगस्त 2025 में भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने देश को आश्वस्त किया था कि भारत सरकार तिब्बत में हो रहे इन सभी घटनाक्रमों और निर्माण कार्यों को लेकर पूरी तरह सतर्क है।

उन्होंने बताया था कि सरकार विभिन्न स्थापित तंत्रों और सैटेलाइट मॉनिटरिंग (Satellite Monitoring) के माध्यम से इस बाँध स्थल की हर गतिविधि पर लगातार नजर रख रही है।

भारत लगातार चीन पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि वह एक जिम्मेदार ऊपरी तटीय देश (Upper Riparian State) की तरह व्यवहार करे और नदी के जल स्तर तथा भूगर्भीय अध्ययनों से जुड़े आँकड़ों को भारत के साथ साझा करे, ताकि किसी भी संभावित प्राकृतिक आपदा या बाँध टूटने जैसी आपातकालीन स्थिति से समय रहते निपटा जा सके। लेकिन चीनी वैज्ञानिकों की इस नई रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि यह मुद्दा अब सिर्फ कूटनीति का नहीं, बल्कि पूरी मानवता और पर्यावरण की रक्षा का बन चुका है।

धोलावीरा: हजारों साल से खुद को पढ़े जाने का इंतजार करते वो 10 चिह्न, कहानी दुनिया के ‘सबसे प्राचीन’ साइनबोर्ड की

हममें से अधिकतर लोगों से अगर पूछा जाए कि पढ़ाई में सबसे ज्यादा बोरियत किस विषय से होती है तो जवाब अक्सर इतिहास ही होगा। उसकी उबाऊ तारीखें, नाम और घटनाएँ हमें थका देती हैं। लेकिन इसी इतिहास का एक दूसरा चेहरा भी है। वही इतिहास जब किसी कहानी की तरह सामने आता है तो लगता है कि हम भी उस वक्त में, उस दौर में वहाँ जी रहे होते।

कहीं वह किसी घने जंगल में छिपा मिलता है, कहीं पहाड़ों के बीच, कहीं किसी मंदिर की दीवार पर और कहीं जमीन की कई परतों के नीचे दबा हुआ। मिट्टी हटती है, कोई पुरानी चीज सामने आती है और अचानक ऐसा लगता है कि हजारों साल पुरानी दुनिया हमारे सामने फिर साँस ले रही है।

इतिहास के ऐसे किस्से हमें केवल यह नहीं बताते कि हमारे पूर्वज कैसे रहते थे। वे हमें यह भी दिखाते हैं कि प्राचीन सभ्याएँ कैसे बनीं, कैसे बड़ी हुईं, कितनी समझदार और व्यवस्थित थीं और फिर एक दिन समय की धूल में खो गईं। इन कहानियों में शहर हैं, लोग हैं, रहस्य है और ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज भी पूरी तरह नहीं मिला।

आज हम ऐसे ही एक किस्से की बात करेंगे। यह कहानी गुजरात के कच्छ के रण में बसे धोलावीरा की है। यहाँ करीब 4500 साल पहले एक समृद्ध शहर खड़ा था। इसी शहर के भव्य उत्तरी दरवाजे पर लगा था दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात साइनबोर्ड… सफेद जिप्सम से बने दस बड़े चिन्हों वाला एक ऐसा बोर्ड, जो वो सभ्यता खत्म होने के हजारों साल बाद तक मिट्टी में दबा रहा और फिर एक दिन इतिहास बनकर हमारे सामने आया। हालाँकि, इस पर क्या लिखा है यह अभी तक कोई नहीं पढ़ पाया है।

उत्तरी दरवाजे के कमरे में मिली असाधारण खोज

धोलावीरा का यह प्रसिद्ध साइनबोर्ड शहर के किले जैसे ऊँचे हिस्से के उत्तरी प्रवेश द्वार से मिला था। धोलावीरा की खुदाई का नेतृत्व करने वाले पुरातत्वविद् आरएस बिष्ट की रिपोर्ट के अनुसार, दस बड़े चिह्न उत्तरी दरवाजे के पश्चिमी कक्ष में गिरे हुए मिले थे। जिस स्थिति में वे पाए गए, उससे पुरातत्वविदों ने अनुमान लगाया कि वे पहले एक लकड़ी के बोर्ड में जड़े हुए थे।

यह बोर्ड संभवतः उत्तरी दरवाजे के बीच से गुजरने वाले मुख्य रास्ते के ऊपर लगाया गया था। यानी यह किसी बंद कमरे में रखा गया धार्मिक या निजी लेख नहीं था। इसकी जगह ऐसी थी जहाँ से शहर में आने-जाने वाले लोग इसे देख सकते थे। इसी सार्वजनिक स्थिति और चिन्हों के विशाल आकार के कारण इसे ‘धोलावीरा साइनबोर्ड’ कहा जाता है।

उत्तरी दरवाजे का मुख्य रास्ता करीब 3.5 मीटर चौड़ा था। खुदाई में मिले चिह्नों और लकड़ी के फ्रेम की छाप की लंबाई भी लगभग इतनी ही थी। इससे इस संभावना को बल मिला कि बोर्ड उसी दरवाजे के ऊपर उसकी चौड़ाई के अनुरूप लगाया गया था। बिष्ट ने लिखा कि यह बोर्ड दरवाजे के सामने वाले हिस्से पर इतनी ऊँचाई पर रहा होगा कि उसके सफेद चमकीले अक्षर दूर से दिखाई देते हों।

पत्थर के नहीं, जिप्सम के टुकड़ों से बनाए गए थे चिह्न

इस खोज को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि चिह्न किसी सपाट पत्थर पर लिखे या खोदे नहीं गए थे। उन्हें सफेद जिप्सम के अलग-अलग आकार वाले टुकड़ों को जोड़कर तैयार किया गया था। इन छोटे टुकड़ों को मोजेक की तरह सजाकर दस विशाल चिह्न बनाए गए और फिर लकड़ी के एक लंबे तख्ते में जड़ा गया था।

जिप्सम का सफेद रंग गहरे रंग की लकड़ी के ऊपर बहुत स्पष्ट दिखाई देता होगा। धोलावीरा का उत्तरी दरवाजा शहर की सबसे प्रभावशाली संरचनाओं में से एक था और ऊँची जगह पर बना हुआ था। इसलिए यहाँ लगाया गया चमकीला बोर्ड केवल सजावट नहीं बल्कि जानबूझकर दूर से पढ़े या पहचाने जाने के लिए बनाया गया सार्वजनिक प्रदर्शन हो सकता है।

बोर्ड पर हड़प्पा लिपि के दस चिन्ह थे। अलग-अलग अध्ययनों और पुरातात्विक विवरणों में प्रत्येक चिह्न की ऊँचाई लगभग 36 से 37 सेंटीमीटर बताई गई है। पूरा बोर्ड लगभग तीन से साढ़े तीन मीटर तक लंबा रहा होगा। इसके एक चिह्न को चार बार दोहराया गया है। इतने बड़े आकार में मिले हड़प्पाई अक्षरों का यह सबसे असाधारण उदाहरण माना जाता है।

धोलावीरा में मिले चिह्नों की ड्राइंग

लकड़ी गायब हुई, लेकिन चिह्न बचे रहे

संभवतः किसी समय यह बोर्ड दरवाजे से टूटकर नीचे गिरा और उसका सामने वाला हिस्सा जमीन की ओर हो गया। लकड़ी धीरे-धीरे नष्ट हो गई, लेकिन जिप्सम के भारी टुकड़े उसी क्रम में मिट्टी में दबे रह गए। इसलिए पुरातत्वविदों को लकड़ी का पूरा बोर्ड नहीं मिला, बल्कि उसके चिन्ह, उनका क्रम और फ्रेम की छाप मिली।

यही कारण है कि आज दिखाई देने वाला ‘साइनबोर्ड’ वास्तव में हजारों साल पुरानी वस्तु का पुरातात्विक पुनर्निर्माण है। पुरातत्वविदों ने चिन्हों की स्थिति, फ्रेम के निशान, दरवाजे की चौड़ाई और उस स्थान की वास्तुकला को देखकर यह समझने की कोशिश की कि मूल बोर्ड कैसा रहा होगा और कहाँ लगा था।

यूनेस्को के लिए तैयार धोलावीरा के नामांकन दस्तावेज में भी दस बड़े जिप्सम चिन्हों वाले साइनबोर्ड को स्थल की महत्वपूर्ण पुरावस्तुओं में शामिल किया गया है। धोलावीरा से इसके अतिरिक्त सैकड़ों मुहरें और मुहरों की छाप, हजारों मनके, पत्थर के वास्तुशिल्प भाग, धातु की वस्तुएँ और बड़ी संख्या में मानकीकृत बाट भी मिले हैं।

सिंधु लिपि: जिसे आज तक कोई पढ़ नहीं सका

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि धोलावीरा के इस साइनबोर्ड पर आखिर लिखा क्या था। इसका साफ जवाब है कि आज तक किसी को ठीक-ठीक पता नहीं चल सका। जिस लिपि में ये चिह्न लिखे गए हैं, उसे सिंधु लिपि कहा जाता है और इसे अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।

इस लिपि में करीब 400 मूल चिह्न माने जाते हैं। इनके कई अलग-अलग रूप भी मिले हैं। आम तौर पर इसे दाएँ से बाएँ लिखा जाता था। सिंधु लिपि के चिह्न सैकड़ों मुहरों, मिट्टी के बर्तनों और तांबे की पट्टिकाओं पर मिले हैं। लेकिन धोलावीरा का साइनबोर्ड इसलिए खास है क्योंकि इसके चिह्न बहुत बड़े हैं और यह इस लिपि के सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक लेखों में गिना जाता है।

दुनिया भर के शोधकर्ताओं ने इसे समझने की कई कोशिशें की हैं। कुछ का मानना है कि इस पर किसी शासक, संस्था या शहर का नाम लिखा होगा, जैसे आज किसी इमारत या शहर के प्रवेश द्वार पर नाम लिखा होता है। कुछ विद्वान इसे धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञ से जुड़ा सूचना-पट्ट मानते हैं जबकि कुछ इसे कारीगरों, धातु के काम या व्यापार से जुड़ी घोषणा बताते हैं।

लेकिन इनमें से कोई भी बात पूरी तरह साबित नहीं हो सकी है। इसलिए धोलावीरा का यह साइनबोर्ड आज भी उतना ही रहस्यमय है, जितना खुदाई के समय था। हम उसके चिह्न देख सकते हैं लेकिन उनका असली मतलब अब भी इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक बना हुआ है।

आज कहाँ है यह ऐतिहासिक धरोहर?

आज धोलावीरा साइनबोर्ड नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum) के संग्रह में सुरक्षित रखा गया है। हालांकि संरक्षण संबंधी चिंताओं के चलते इसे फिलहाल सार्वजनिक प्रदर्शनी में नहीं रखा गया है। यह अब भी शोध का विषय बना हुआ है क्योंकि सिंधु या हड़प्पा लिपि में मिले अब तक के सबसे लंबे चिह्न-समूहों में से एक होने के कारण यह भाषाविदों और पुरातत्वविदों के लिए बेहद कीमती है।

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस सिंधु-सरस्वती अभिलेख से जुड़ी तस्वीरें साझा करते हुए धोलावीरा साइनबोर्ड को हड़प्पा सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय खोजों में गिनाया और इसे दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात सार्वजनिक साइनबोर्ड बताया है।

धोलावीरा सिर्फ साइनबोर्ड तक सीमित नहीं

यह जानना भी जरूरी है कि धोलावीरा की पहचान सिर्फ इस साइनबोर्ड तक सीमित नहीं है। गुजरात पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह शहर अपनी अत्यंत उन्नत जल-प्रबंधन प्रणाली के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ पत्थर काटकर बनाए गए बड़े जलाशय, वर्षा जल संचयन प्रणाली और चट्टान काटकर बनाए गए कुएं मिले हैं, जो उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता को दर्शाते हैं।

शहर तीन हिस्सों में बंँटा था- किला (citadel), मध्य नगर और निचला नगर और यहाँ छह अलग-अलग प्रकार की समाधियाँ भी मिली हैं, जो हड़प्पा सभ्यता में मृत्यु को लेकर एक अनोखी सोच दर्शाती हैं।

धोलावीरा है कहाँ और क्यों है खास?

धोलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में, कच्छ के महान रण (Great Rann of Kutch) के भीतर स्थित खादिर द्वीप पर बसा एक हड़प्पाकालीन नगर है। यूनेस्को के अनुसार, यह हड़प्पा सभ्यता का दक्षिणी केंद्र था और करीब 3000 से 1500 ईसा पूर्व के बीच बसा हुआ था। यह दक्षिण एशिया के सबसे बेहतर तरीके से संरक्षित शहरी बसावटों में से एक है, जिसमें एक किलेबंद नगर और एक कब्रिस्तान दोनों शामिल हैं।

27 जुलाई 2021 को यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया था। यह भारत का 40वाँ और गुजरात का चौथा यूनेस्को स्थल बना, साथ ही यह सिंधु घाटी सभ्यता का भारत में स्थित पहला यूनेस्को स्थल भी है।

यहाँ 2 मौसमी नदियों मानसर और मनहर से पानी मिलता था, जो इस सूखे इलाके में बेहद दुर्लभ संसाधन था। धोलावीरा की खोज का श्रेय ASI के पुरातत्वविद् जे.पी. जोशी को जाता है, जिन्होंने 1967-68 में इस स्थल का पता लगाया था। हालाँकि, व्यवस्थित खुदाई 1990 के बाद ही शुरू हो सकी।