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‘सभी 75 जिलों में होगी FREE डायलिसिस की सुविधा’: 76वें स्वतंत्रता दिवस पर CM योगी का ऐलान, कुम्भ-काशी-अयोध्या पर भी बोले

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 76वें स्वतंत्रता दिवस पर विधान भवन पर ध्वजारोहण करने के बाद राज्य को सम्बोधित करते हुए न सिर्फ अपनी सरकार की सफलताओं को गिनाया, बल्कि अगले कई वर्षों का खाका भी जनता के समक्ष पेश किया। उन्होंने कहा कि आज का अवसर हम सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरा देश आजादी के 75 वर्ष की यात्रा का साक्षी बन रहा है। उन्होंने कहा कि आजादी के इन 75 वर्षों के आत्मावलोकन करने का सौभाग्य हम सभी को प्राप्त हो रहा है।

सीएम योगी ने कहा कई इन 75 वर्षों में इस देश ने एक लंबी यात्रा तय की है। उन्होंने महात्मा गाँधी को देश की आजादी की अगुवाई करने वाला और राष्ट्रपिता बताते हुए उन्हें शत-शत नमन किया। सीएम योगी ने वीर सैनिकों का स्मरण करते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम को आमजन से जोड़कर एक राष्ट्रीय उत्सव बनाया है और विगत 5 दिनों में इस राष्ट्रीय दिवस से जुड़ने का अवसर हम सभी को प्राप्त हुआ है।

बकौल सीएम योगी, जब सामूहिक रूप से हम टीम भावना के साथ कार्य करते हैं तो उसके बेहतर परिणाम भी देखने को मिलते हैं। कोरोना प्रबंधन में उत्तर प्रदेश के मॉडल को उन्होंने इसका सशक्त प्रमाण करार दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश सर्वाधिक टेस्ट, सर्वाधिक टीकाकरण व सर्वाधिक लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाला राज्य है। सबसे बड़ी आबादी का राज्य होने के बावजूद हर जनपद में कोरोना टेस्ट की सुविधा को उपलब्ध कराने वाला राज्य भी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, “प्रधानमंत्री ने ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबके प्रयास’ का मंत्र दिया। इसको अंगीकार करते हुए हमने प्रदेश में सर्वसमावेशी, सर्वस्पर्शी और समग्र विकास के लिए जिस कार्ययोजना को मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है आज उसके परिणाम भी हमारे सामने हैं। आज उत्तर प्रदेश, देश व दुनिया में निवेश के ड्रीम डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है। ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में प्रदेश अग्रणी राज्यों में है। 2015-16 में यह 14वें स्थान पर था आज दूसरे स्थान पर है।”

सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है, इसीलिए विगत 5 वर्ष में अन्नदाता किसानों के हितों के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए। उन्होंने जानकारी दी कि साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये डीबीटी के माध्यम से अन्नदाता किसानों के खातों में भेजे गए। उत्तर प्रदेश सरकार ने विभिन्न देशों के दूतावासों के साथ-साथ कई पेट्रोल पंपों के पास भी ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट) सेंटर खोलने का निर्णय लिया है, ताकि राज्य के हस्तशिल्प कारीगरों को एक बड़ा बाजार मिले।

सीएम योगी ने कहा, “दिव्य और भव्य कुम्भ 2019 दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बना था। काशी विश्वनाथ धाम की दिव्यता और भव्यता हम सभी के सामने हैं। इसी क्रम में अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन धाम को विकसित करने की वृहद कार्ययोजना को आगे बढ़ाया गया है। ‘एक जनपद एक मेडिकल कॉलेज’ की दिशा में हम तेजी के साथ आगे बढ़े हैं। आने वाले समय में प्रदेश के सभी 75 जनपदों में निःशुल्क डायलिसिस सुविधा केंद्र यूपी सरकार प्रदान करने जा रही है। राज्य कर्मचारियों और उनके आश्रितों को कैशलेस चिकित्सा की सुविधा प्रदान की गई है।”

कॉन्ग्रेसी राज में पॉटी पोछने वाला एक पेपर 4000 रुपए में खरीदने का होता था ‘खेल’… इसलिए PM मोदी ने कहा – भ्रष्टाचार से करो लड़ाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के 76वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से बोलते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई का आह्वान किया है। पीएम मोदी ने भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर फोकस करते हुए कहा कि यदि इन दोनों विकृतियों का समय रहते समाधान नहीं किया गया तो यह विकराल रूप ले सकती हैं।

देश के प्रधानमंत्री को लाल किले से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की हुंकार भरनी आखिर क्यों पड़ी? देशवासियों से क्यों आग्रह करना पड़ा उनको भ्रष्टाचार के खात्मे का? वजह है अपने ही देश में हुए ऐसे-ऐसे भ्रष्टाचार, जिनके आँकड़े सामने आते ही हैरान कर देते हैं।

हम बात कर रहे हैं साल 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स (Commonwealth Games) और उसमें हुए घोटाले की। वास्तव में यह आयोजन, भारत द्वारा किसी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के आयोजन की मेजबानी के लिए देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला होना चाहिए था। लेकिन, करोड़ों रुपए के घोटालों के कारण यह पूरा आयोजन हँसी का पात्र बन गया।

कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में हुए इतने बड़े स्तर के घोटाले की खबरों ने सार्वजनिक आक्रोश पैदा किया था। इसी आक्रोश ने साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस पार्टी को सत्ता के गलियारों से बाहर निकालने का मार्ग प्रशस्त किया।

कॉमनवेल्थ घोटाले की जाँच हाई लेवल कमिटी को

इस विश्वस्तरीय आयोजन के लिए किए गए गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों, कुर्सियों, टॉयलेट पेपर्स जैसी वस्तुओं की खरीद में हुई अनियमितताओं ने लोगों को आक्रोश से भर दिया था। कॉमनवेल्थ गेम्स की समाप्ति के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार पर दबाव पड़ा और जाँच करवाने पर उन्हें मजबूर होना पड़ा।

इस मामले की जाँच के लिए पूर्व महालेखा परीक्षक वीके शुंगलू की अध्यक्षता में एक हाई लेवल कमिटी की नियुक्ति की गई थी। इस कमिटी को राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के सभी पहलुओं की जाँच करने और तीन महीने के भीतर प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया था।

कॉमनवेल्थ घोटाले में मुख्य भूमिका में थे कॉन्ग्रेस के नेता

केंद्र ने उच्च स्तरीय समिति के अलावा केंद्रीय सतर्कता समिति (सीवीसी), आईटी विभाग, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भी स्वतंत्र जाँच करने का आदेश दिया था। इस जाँच के दौरान यह पाया गया कि कॉन्ग्रेस नेता सुरेश कलमाड़ी (Suresh Kalmadi) ने पूरे आयोजन में बड़ी वित्तीय अनियमितता की थी। इस आयोजन समिति के सदस्य कलमाड़ी पर मुख्य रूप से स्विस टाइमिंग कंपनी को बढ़े हुए दामों पर समय, स्कोर और परिणाम दिखाने का सिस्टम सेट करने का ठेका देने का आरोप है।

इस पूरे घोटाले की जाँच में यह पता चला कि कलमाड़ी ने टीआरएस सिस्टम खरीदने के लिए स्विस टाइमिंग कम्पनी को 141 ​​करोड़ रुपए का भुगतान किया था। जबकि नीलामी में शामिल हुई एक अन्य कम्पनी एमएसएल स्पेन ने 95 करोड़ रुपए कम की बोली लगाई थी। 

कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले से जुड़ी दिलचस्प बात यह है कि इस आयोजन के लिए बोली 4 नवंबर 2009 को आयोजित की गई थी। लेकिन इसके पहले ही 12 अक्टूबर 2009 को स्विस टाइमिंग कम्पनी को कॉन्ट्रेक्ट दे दिया गया था।

सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी, जाना पड़ा जेल

कॉन्ग्रेस सरकार में हुए इस घोटाले की जाँच के दौरान किए गए खुलासे के बाद, सुरेश कलमाड़ी को सीबीआई ने 25 अप्रैल 2011 को टाइमिंग-स्कोरिंग-रिजल्ट (टीएसआर) मामले में उनकी भूमिका के लिए गिरफ्तार किया था। इसके बाद 20 मई 2011 को आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट, महानिदेशक वीके वर्मा सहित आठ अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश, दस्तावेजों में बदलाव करने और उन्हें असली के रूप में दिखाने के आरोप लगाए गए थे।

इन सभी आरोपियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120B, धारा 420, 467, 468, और 471 के तहत आरोप दर्ज किए गए थे। इस आरोप में आरोपित 10 महीने की जेल की हवा भी खा चुके हैं और फिलहाल जमानत पर हैं।

मनमाने ढंग से की गई खरीदारी और खर्च

घोटाले की जाँच कर रही जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन समिति ने तैयारी और सामानों की खरीद के लिए बाजार मूल्य से कहीं अधिक राशि का भुगतान किया है। इस घोटाले की सबसे बड़ी बात यह थी कि भारत में इस आयोजन के लिए प्रारंभिक अनुमान 296 करोड़ रुपए था। लेकिन सभी भुगतान होने के बाद अंतरिम रूप से यह राशि 28054 करोड़ रुपए तक पहुँच गई थी। यह मूल अनुमान से लगभग 100 गुना अधिक थी।

इसके अलावा, इस आयोजन में सड़कों की सजावट के लिए 100 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए थे जबकि इसमें खर्च करीब 70 करोड़ रुपए का ही था। यही नहीं, ऐसी कई वस्तुएँ थीं, जिन्हें मनमाने दाम में खरीदा गया था। उदाहरण के लिए, फर्स्ट ऐड किट 3934 रुपए से 4741 रुपए के बीच खरीदी गई थी। टिशू पेपर 1580 रुपए प्रति पैक की कीमत पर खरीदे गए थे। पानी निकालने की एक मशीन की कीमत 11852 रुपए बताई गई थी। 

घोटाले में हुई अन्य खरीद पर नजर डालें तो किताब रखने के लिए खरीदी गई अलमारी 7655 रुपए की बताई गई थी जबकि इसकी कीमत 2840 रुपए थी। स्टैकेबल कुर्सियों को 1542 रुपए प्रति पीस में खरीदा गया था जबकि वास्तविक कीमत 720 रुपए थी। दिलचस्प बात यह है कि टॉयलेट पेपर रोल 4000 रुपए प्रति पीस की दर से खरीदे गए थे। टॉयलेट पेपर्स के लिए 4000 रुपए एक ऐसी कीमत है, जिस पर ऐसे टॉयलेट पेपर्स खरीदे जा सकते हैं जिन पर चांदी का कवर हो।

आप में से बहुत लोगों को यह याद होगा कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी जब अंतिम चरण में चल रही थी, उसी दौरान एक फुटओवर ब्रिज टूट कर गिर गया था। इस घटना के बाद मीडिया में काफी हो-हल्ला मचा था। फुटओवर ब्रिज हालाँकि बाद में बन गया था लेकिन इसके लिए सेना से सहायता लेनी पड़ी थी।

अभी भी लंबित हैं 50 से अधिक मामले, आरटीआई में हुआ खुलासा

साल 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स को अब 12 साल से अधिक का समय हो रहा है। हालाँकि, इसके बाद भी इससे जुड़े कई मामले अब भी अदालत में लंबित हैं। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा साल 2020 में दायर की गई एक आरटीआई में यह खुलासा हुआ था कि कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए घोटालों में 50 से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं।

आरटीआई में भारत सरकार ने बताया था कि 31 मार्च 2020 तक मध्यस्थों को लगभग 6.92 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है। इस मामले में सूत्रों का हवाला देते हुए इंडियन एक्सप्रेस ने बताया था कि लगभग 700 करोड़ रुपए के कॉन्ट्रेक्ट विवादों का निपटारा होना अब भी बाकी है।

इसके अलावा, आरटीआई में यह भी कहा गया है कि 50 मामलों में 33 विक्रेता, अधिकारी और व्यक्ति शामिल थे। कुछ फर्मों में स्विस टाइमिंग (135.27 करोड़ रुपए के अनुबंध), नुस्ली इंडिया (140 करोड़ रुपए) और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (346 करोड़ रुपए) भी शामिल हैं।

‘भारत माता का मुकुट उतारा, हिजाब जैसा कपड़ा पहना पढ़वाया नमाज’: UP पुलिस ने बताया वायरल वीडियो का सच, कहा- अफवाह फैलाने वालों पर लेंगे एक्शन

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐशबाग स्थित एक स्कूल में ‘भारत माता’ बनी छात्रा का मुकुट उतरवा कर नमाज पढ़वाने का वीडियो वायरल हुआ है। पूरा देश फ़िलहाल ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहा है और 76वें स्वतंत्रता दिवस पर सोमवार (15 अगस्त, 2022) को देश में हर जगह रंगारंग कार्यक्रम हुए। ऐसे ही एक कार्यक्रम का वीडियो वायरल हुआ है। इसमें देखा जा सकता है कि कैसे ‘भारत माता’ बनी छात्रा के मुकुट को हटा कर हिजाबनुमा कपड़ा पहनाया जा रहा है।

उक्त छात्रा के साथ इस्लामी टोपी में दो अन्य छात्र भी होते हैं। साथ ही वीडियो में हिजाब पहनी दो अन्य लड़कियाँ भी दिख रही हैं। मुकुट हटाने के बाद मंच पर ही वो सभी नमाज पढ़ते हैं। इस कार्यक्रम में कई छोटे बच्चे भी उपस्थित दिखाई दे रहे हैं। साथ ही कई लोग कार्यक्रम को भी देख रहे हैं। सभी के सामने मंच पर स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में नमाज पढ़ी जा रही है। ये वीडियो ऐशबाग के मालवीय नगर स्थित ‘शिशु भारतीय विद्यालय’ का है।

लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट ने इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “सोशल मीडिया के माध्यम से एक वीडियो प्राप्त हुआ है, जिसमें एक लड़की के सिर से ‘भारत माता’ का मुकुट हटा कर नमाज पढ़ना बताया गया है। इस वीडियो की जाँच करने पर पाया गया कि ये बाजार खाला थाना क्षेत्र स्थित मालवीय नगर के ‘शिशु भारतीय विद्यालय’ का है। इस सम्बन्ध में स्कूल प्रबंधन से वार्ता कर संपूर्ण वीडियो देखा गया तो यह तथ्य पाया गया कि पुलिस द्वारा एक नाटक का मंचन किया गया था।”

पुलिस ने आगे बताया कि इस नाटक में बच्चों द्वारा धर्म के नाम पर झगड़ा-फसाद ना करने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने का सन्देश दिया गया है। पुलिस ने जानकारी दी कि ट्वीटकरता द्वारा आधे-अधूरे हिस्से को ट्वीट कर के भ्रम फैलाने का कार्य किया गया है। पुलिस ने बताया कि ऐसा करने वालों के खिलाफ अग्रिम विधिक कार्यवाही की जा रही है। हालाँकि, लोग इस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार से कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।

योगी मॉडल बनेगी नई मिसाल, 2047 तक बना रहेगा भाजपा का दबदबाः ‘न्यू BJP’ वाले नलिन मेहता का लेख, बताया- कॉन्ग्रेस से अच्छे दिन बहुत दूर

प्रोफेसर नलिन मेहता का एक लेख टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) में प्रकाशित हुआ है। इसमें उन्होंने कहा है कि भारतीय राजनीति में बीजेपी की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि 2047 तक उसका वर्चस्व बना रह सकता है। मेहता स्कूल ऑफ मॉडर्न मीडिया, UPES के डीन हैं। ‘द न्यू बीजेपी’ नाम से किताब भी लिख चुके हैं।

लेख में उन्होंने रजनी कोठारी के एक लेख का जिक्र करते हुए यह भी कहा है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में कभी जो प्रभुत्व कॉन्ग्रेस का था, उस जगह पर अब बीजेपी आसीन है। कोठारी ने ‘भारत में कॉन्ग्रेस सिस्टम’ नाम से यह लेख 1964 में जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के कुछ महीने बाद लिखा था। 

इस लेख में कहा गया था कि बहुदलवादी लोकतंत्र होने के बावजूद भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक पार्टी का दबदबा है। कॉन्ग्रेस के दबदबे के कारण दूसरी पार्टियाँ मजबूत नहीं हो पाईं हैं। लेकिन मेहता के अनुसार देश की स्वतंत्रता के 50वाँ वर्ष आते-आते यह धारणा काफी हद तक ध्वस्त हो गई। 

अब जब हम स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में हैं तो बीजेपी उसी जगह पर जड़ें जमा चुकी है। 2014 में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय पटल उभार के बाद बीजेपी जिस तरीके से आगे बढ़ी है, उससे 2047 तक उसका प्रभुत्व कायम रह सकता है। वह हारे या जीते चुनाव उसके इर्द-गिर्द ही सिमटे रहेंगे। कुछ-कुछ वैसा ही जैसे कभी चुनाव कॉन्ग्रेस के लिए या कॉन्ग्रेस के खिलाफ हुआ करते थे। 

टीओआई में प्रकाशित नलिन मेहता का पूरा लेख आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं। 

इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे समय के साथ भाजपा का वोट शेयर देश में बढ़ रहा है। साल 2009 में भाजपा का वोट शेयर नॉर्थ ईस्ट भारत में 12.8% था, लेकिन 2019 में उसका वोट शेयर वहाँ 33.7% हो गया है। पूर्वी भारत में ये 9.3% से 39.7 % बढ़ा है। इसी तरह पश्चिमी भारत में ये वोट शेयर 27.6% से 39.8% हो गया है और दक्षिण भारत में यह 11.9% से 17.9% हो गया है।

उन्होंने 2047 तक भारत में हिंदुत्व के प्रभाव की चर्चा करते हुए अनुमान लगाया कि संभवत: तब तक तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और हो सकता है कि तमिलनाडु में भी भाजपा का कोई न कोई मुख्यमंत्री बन जाए। उन्होंने कहा कि किसी जमाने में जब कॉन्ग्रेस का दबदबा था जब ये हिंदुत्व भाजपा के विस्तार में रोड़ा था, लेकिन आज ये उनका ब्रांड हो गया है।

मेहता कहते हैं कि ऐसी उम्मीद है कि भाजपा अगले दो दशक में हिंदुत्व के साथ आगे बढ़ेगी और इस तरह योगी मॉडल कई महत्वकांक्षी भाजपा नेताओं के लिए एक मिसाल होगा।

लेख में आगे उन्होंने भाजपा-आरएसएस के संबंधों पर बात की। ये भी बताया कि कैसे 2014-2019 के बीच में भाजपा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से भी बड़ी पार्टी बनी है। आज इसके 174 मिलियन सदस्य हैं। लेख में कहा गया कि भाजपा ने नई महिला वोटरों को सशक्त और ग्रामीण भारत को एडवांस बनाया। उन्होंने भारत के दो तिहाई जिलों में 522 ऑफिस कार्यालय खोले।

लेख में कॉन्ग्रेस की कमी पर बात करते हुए मेहता ने कहा कि कोई राष्ट्रीय विपक्ष न होने के कारण भाजपा को आगे बढ़ने में मदद मिल रही है। अगर अभी कोई विपक्ष है तो वो क्षेत्रीय स्तर पर है। मोदी के बाद शायद एक राष्ट्रीय स्तर पर कोई विपक्ष उभरे। उनके अनुसार आम आदमी पार्टी हो सकता है कि कॉन्ग्रेस को हटाकर अपनी जगह बनाए।

38 साल बाद घर पहुँचेगा बलिदानी चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर, बर्फ में दबकर हो गए थे लापता, सियाचिन ग्लेशियर के पुराने बंकर में मिला शव

देश की सुरक्षा में लगे हुए सैनिक अपनी जान की परवाह किए बिना सीमा पर चौबीसों घंटे पहरा देते हैं। इस दौरान, हर साल सैंकड़ों सैनिक कभी दुश्मन की गोली से तो कभी आतंकियों से मुठभेड़ में बलिदान हो जाते हैं। यही नहीं, कई बार सैनिकों का सामना प्रकृति से भी होता है। जहाँ सैनिक कभी भारी बर्फबारी तो कभी ग्लेशियर से खिसकने से बर्फ में दबकर बलिदान हो जाते हैं। कई बार तो बलिदानी परिवार के परिजनों को पार्थिव शरीर भी नहीं मिल पाता है।

ऐसा ही हुआ था, उत्तराखंड के हल्द्वानी में रह रहे एक परिवार के साथ जिन्हें बलिदानी लांस नायक चंद्रशेखर हर्बोला के पार्थिव शरीर का इंतजार बीते 38 वर्षों से था, वह अपने पीछे पत्नी शांति देवी और दो मासूम बेटियों को छोड़ गए थे। चन्द्रशेखर जब बलिदान हुए तब उनकी उम्र सिर्फ 28 साल थी। पति के बलिदान के बाद शांति देवी ने माँ और पिता दोनों की भूमिका निभाते हुए दोनों बेटियों का पालन पोषण किया।

चन्द्रशेखर हर्बोला भारतीय सेना के सबसे सफल ऑपरेशन में से एक ऑपरेशन मेघदूत (Operation Meghdoot) के सदस्य थे। दरअसल, साल 1984 में सियाचिन ग्लेशियर को हासिल करने के उद्देश्य से भारतीय सेना ने ऑपरेशन मेघदूत लांच किया था। ऑपरेशन मेघदूत की शुरुआत की वजह पाकिस्तान की नापाक हरकतें थीं।

दरअसल, भारत और पाकिस्तान के बीच साल 1972 में शिमला समझौता (Simla Agreement) हुआ था जिसके अनुसार दोनों देशों की सेनाएँ वापस लौट जाएँगी। लेकिन, पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा करना चाहता था। इस दौरान भारत और पाकिस्तान की सेना आमने-सामने थीं। 19 कुमाऊँ रेजिमेंट के लांस नायक चंद्रशेखर और उनकी टीम को पॉइंट 5965 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस टीम ने पॉइंट 5965 पर कब्जा तो कर लिया लेकिन भारतीय सेना ने अपने 18 वीर जवान खो दिए थे।

सेना के जवानों की इस बलिदान को लेकर अधिकारी ने बताया कि सेना रात को रुकते समय हिमस्खलन की चपेट में आ गई थी। जिसमें एक अधिकारी सेकंड लेफ्टिनेंट पीएस पुंडीर सहित भारतीय सेना के 18 जवान बलिदान हो गए थे। इस दुर्घटना में 14 सैनिकों के शव मिले थे जबकि 5 अन्य लापता थे।

सेना के नंबर वाली इस डिस्क ने लांस नायक चंद्रशेखर की पहचान में की मदद (फोटो साभार: इंडिया टुडे)

हालाँकि, अब उन 5 लापता सैनिकों में से एक बलिदानी चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर 13 अगस्त को सियाचिन में 16,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर एक पुराने बंकर के अंदर मिला है। उनके शव के साथ सेना के नंबर वाली एक डिस्क भी मिली जिससे शव की पहचान हो सकी है।

परिजनों ने कहा है कि अभी तक उन्हें जो जानकारी मिली है उसके अनुसार लांस नायक चन्द्रशेखर हर्बोला की पार्थिव देह अब भी सुरक्षित अवस्था में है। सियाचिन में बर्फ में दबे होने के कारण पार्थिव देह को अधिक नुकसान नहीं हुआ है। 

बलिदानी चन्द्रशेखर की पत्नी शांति देवी ने मीडिया को बताया है कि बीते 38 साल में हर रोज उन्हें ऐसा लगता था कि कभी न भी उनके पति को लेकर खबर जरूर आएगी और आखिकार अब उन्हें खबर मिल ही गई है। फिलहाल बलिदानी चंद्रशेखर का पार्थिव शरीर हल्द्वानी लाया जाएगा। इसके बाद पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

‘जेहाद से मिलती है जन्नत’: भारत को इस्लामी मुल्क बनाना चाहता था 19 साल का सैफुल्लाह, रिपोर्ट में दावा- ATS पूछताछ में किए खुलासे

उत्तर प्रदेश के कानपुर से 14 अगस्त 2022 को गिरफ्तार जैश आतंकी हबीबुल इस्लाम उर्फ सैफुल्लाह ने पूछताछ में कई खुलासे किए है। सैफुल्ला भारत में इस्लाम का राज लाना चाहता था। इसके लिए उसने जिहाद की राह चुनी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 19 साल के सैफुल्लाह ने ATS को बताया है कि वह भारत में इस्लामी शासन कायम करने की जंग लड़ रहा है। पूर्व में गिरफ्तार आतंकी नदीम की तरह वह भी टेलीग्राम पर पाकिस्तान सहित कई अन्य देशों में कट्टरपंथियों से जुड़ा हुआ था। वहाँ से उसे जिहाद के लिए उकसाने वाले वीडियो भेजे जाते थे। पाकिस्तानी हैंडलरों को वह ऑडियो और वीडियो कॉल भी किया करता था।

तालिबान जिस क्रूरता से अपने दुश्मनों का कत्ल करता है, वह सैफुल्लाह को बेहद पसंद है। उसके मुताबिक एक न एक दिन सभी को मुस्लिम बनना होगा, क्योंकि इस्लाम ही अकेला मजहब है। उसका मानना है कि जो मुस्लिम बनने से इनकार करेगा, उसे तालिबानी तरीके सजा दी जाएगी। हबीबुल और नदीम आपस में दोस्त भी हैं। दोनों एक ही टेलीग्राम ग्रुप में जुड़े हुए थे जहाँ इनकी आपस में अक्सर बातें भी हुआ करती थीं। दोनों नूपुर शर्मा की हत्या के मिशन पर एक साथ काम कर रहे थे।

सैफुल्लाह फतेहपुर के मुस्लिम इंटर कॉलेज के परिसर में रहा करता था। उसके अब्बा जफरुल इस्लाम मदरसे में पढ़ाते हैं। ATS की टीम इस बात की तह तक जाने का प्रयास कर रही है कि उसके नेटवर्क में देश में अभी कौन-कौन ऐसे लोग शामिल हैं जो पकड़ से बाहर हैं। दावा किया जा रहा है कि ATS ने कुछ नामों का पता भी लगा लिया है।

राणा अयूब ने डिलीट किया सलमान रुशदी की ‘सलामती’ वाला ट्वीट: कट्टरपंथी बिरादर दे रहे थे गाली, बता रहे थे हुजूर की शान में गुस्ताखी की ‘सजा’

करोड़ों के घोटाले की आरोपित और वाशिंगटन पोस्ट की स्तंभकार राणा अयूब (Rana Ayyub) ने 12 अगस्त को लेखक सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगते हुए जो ट्वीट किया था, उसे उन्होंने डिलीट कर दिया है। हादी मतार (Hadi Matar) पर रुश्दी की हत्या के प्रयास का आरोप लगाया गया है।

ऐसा माना जा रहा है कि रुश्दी पर यह हमला कथित रूप से ईशनिंदा के कारण हुआ, क्योंकि उनकी किताब ‘द सैटेनिक वर्सेज’ (The Satanic Verse) को कट्टरपंथी लोग, पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) के जीवन पर किया गया एक व्यंग्य मानते हैं। रुश्दी पर हमले के बाद राणा अयूब ने ट्वीट किया कि वह उनके ठीक होने के लिए प्रार्थना कर रही हैं।

राणा अयूब ने सलमान रुश्दी को लेकर किया ट्वीट

हालाँकि, ट्विटर पर मुस्लिम समुदाय द्वारा उनकी निंदा किए जाने के बाद उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। कई इस्लामवादी ट्विटर पर अयूब के इस पोस्ट को देखकर आगबबूला हो गए। उन्होंने राणा की क्लास लगाते हुए कहा, “वे किसी ऐसे शख्स को फ़ॉलो नहीं कर सकते हैं, जिसने पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने वाले का समर्थन किया हो और उसकी सलामती की दुआ माँगी हो।” इसके बाद उन्होंने अयूब को अनफॉलो कर दिया।

इस्लामवादी कह रहा है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को फ़ॉलो नहीं कर सकता, जो पैगंबर की निंदा करने वाले का भला चाहता हो

कई अन्य इस्लामवादियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उनके मुताबिक, अयूब वही बोल रही हैं, जो पश्चिम के लोग सुनना चाहते हैं। अयूब अब पश्चिमी अभिजात वर्ग के उदारवादियों की पहली पसंद बन चुकी हैं, क्योंकि वह पीएम मोदी और उनके नीतियों का शुरू से विरोध करती आ रही हैं। वह अल्पसंख्यकों और मुस्लिमों का दिल जीतने के लिए मुद्दों को भुनाने में जुटी रहती हैं।

सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगने पर मुस्लिम ट्विटर यूजर्स राणा अयूब से बेहद खफा नजर आ रहे हैं

एक मुस्लिम ट्विटर यूजर ने कहा कि वह इंस्टाग्राम पर राणा अयूब की तस्वीरें और उनके द्वारा मुस्लिम मुद्दों पर आवाज उठाने के बाद उनके फैन हो गए थे। हालाँकि, अब उन्होंने ऐसा महसूस किया कि वह सिर्फ अपने करियर को आगे ले जाने के लिए ये सब कर रही थीं।

अयूब की इंस्टाग्राम तस्वीरों से मुस्लिम ट्विटर यूजर हुए निराश

राणा ने एक अन्य लेखक सुकेतु मेहता के एक ट्वीट को भी ‘लाइक’ किया था, जिसमें रुश्दी को ‘बॉम्बे का शेर’ (Lion of Bombay) कहा गया था, लेकिन मुस्लिम ट्विटर यूजर के निशाने पर आने के बाद राणा ने इसे ‘अनलाइक’ कर दिया था। यानी अब वह इस बात से सहमत नहीं थी।

राणा ने पहले ऊपर दिए गए ट्वीट को लाइक किया, फिर बाद में अनलाइक किया

मुस्लिम ट्विटर यूजर्स ने कथित रूप से ‘ईशनिंदा’ करने वाले लेखक सलमान रुश्दी की सलामती की दुआ माँगने वाले ट्वीट को डिलीट करने के बाद उनकी सराहना की और खुशी जताई कि अब वह सही रास्ते पर आ गई हैं।

यही नहीं कई मुस्लिम ट्विटर यूजर्स ने राणा को ‘खुद को सही’ करने पर उनकी जमकर तारीफ की।

मुस्लिम ट्विटर यूजर्स राणा द्वारा अपने ट्वीट्स डिलीट करने उनकी तारीफ कर रहे हैं

राणा ने केवल अपना ‘नो वर्ड्स’ वाला ट्वीट रखा हुआ है, जो इस्लामवादी द्वारा सलमान रुश्दी को छुरा घोंपने से संदर्भित है।

समुदाय विशेष और इस्लामवादी भाइयों को खुश करने के लिए उन्होंने रुश्दी पर हमले की निंदा करने के लिए गैर-इस्लामवादियों का मजाक उड़ाते हुए एक और ट्वीट किया।

पहले भी राणा कर चुकी हैं कई ट्वीट डिलीट

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है, जब राणा ने उम्माह के साथ खड़े होने के लिए अपने ट्वीट डिलीट किए हों। जुलाई 2020 में जब तुर्की द्वारा हागिया सोफिया म्यूजियम, जो कभी एक चर्च था उसे मस्जिद में बदलने की कई देशों ने आलोचना की थी, उस वक्त राणा ने ट्वीट कर तुर्की के इस कदम को सराहा था।

राणा अयूब का डिलीट किया ट्वीट

राणा का ट्वीट राम जन्मभूमि मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में था, जिसमें शीर्ष अदालत ने राम लला के पक्ष में फैसला सुनाया था और मस्जिद के लिए अलग जमीन का आदेश दिया था। यही नहीं नीरज चोपड़ा ने जब टोक्यो 2020 एथलेटिक्स में भारत का पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता था। उस वक्त नीरज चोपड़ा की सराहना करते हुए राणा ने उनकी एक तस्वीर पोस्ट की थी, जिसे उन्होंने कुछ देर बाद ही हटा दिया था।

नीरज चोपड़ा पर राणा का ट्वीट

नेटिज़न्स ने पहले ही नीरज चोपड़ा की तारीफ करते हुए उनके ट्वीट का स्क्रीनशॉट ले लिया था। दरअसल, चोपड़ा ने अपने ट्वीट में भारत सरकार और पीएम मोदी को धन्यवाद दिया था, जो राणा को पसंद नहीं आया। हालाँकि, उन्होंने कुछ घंटों बाद फिर उनकी फोटो को शेयर किया था।

नीरज चोपड़ा पर अयूब का ट्वीट

हो सकता है, तब वह काफी उत्साहित थीं, जब खेल भावना के मद्देनजर नीरज ने कथित तौर पर कहा था कि पाकिस्तानी एथलीट नदीम अरशद का पोडियम पर होना एशिया के लिए अच्छा और गर्व का क्षण है।

नदीम पर राना

नीरज ने उस समय केंद्र सरकार को धन्यवाद देने के साथ-साथ एक साथी एथलीट की भी सराहना की थी। यह उनके बड़प्पन को दिखाता है। वहीं, राणा का नीरज चोपड़ा को लेकर किया गया ट्वीट हटाना उनकी निम्न मानसिकता को दर्शाता है। उनका सलमान रुश्दी की सलामती को लेकर पहले ट्वीट करना फिर डिलीट कर देना सिर्फ यह दिखाता है कि उन्होंने इस्लामवादियों की नजरों में ऊपर उठने के लिए ये सब किया है।

खालिस्तानी आतंकी पन्नू के गाँव में भी युवाओं ने लहराया तिरंगा, कहा- कुछ लोग विदेश में बैठ हमारी सिख कौम को बदनाम कर रहे

पंजाब के युवकों को खालिस्तानी झंडा फहराने के लिए उकसाने वाले सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू (Gurpatwant Singh Pannu) के घर के बाद अब उसके गाँव में भी तिरंगा फहराया गया है। आज स्वतंत्रता दिवस के अमृत महोत्सव पर उसके ही गाँव के स्थानीय निवासियों ने भारत के समर्थन में जम कर नारेबाजी भी की है। पन्नू का गाँव खानकोट अमृतसर जिले में अमृतसर-जालंधर रोड पर पड़ता है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पन्नू के गाँव खानपुर में युवाओं का पूरा समूह तिरंगा ले कर निकला। उसमें शामिल युवाओं ने पन्नू पर निशाना साधते हुए कहा, “कुछ लोग विदेश में बैठ कर अपने खुद के फायदों के लिए हमारी सिख कौम को बदनाम कर रहे हैं। सिखों ने विदेशी हमलावरों से हमेशा लोहा लिया है और देश को आज़ाद करवाने में बड़ी भूमिका निभाई है। फिर भी कुछ लोग बाहर से पंजाब के युवकों को उकसा रहे हैं। हम देश की अखंडता और सम्प्रभुता को बनाए रखेंगे।”

गौरतलब है कि 2 दिन पहले पन्नू के चंडीगढ़ स्थित आवास पर तिरंगा फहरा दिया गया था। यह झंडा कॉन्ग्रेस के एक नेता ने फहराया था। अभी कुछ दिन पहले पन्नू ने एक वीडियो जारी कर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान (Punjab CM Bhagwant Mann) को धमकाया था। इसके साथ ही उसने खालिस्तानी झंडा फहराने वालों को इनाम की घोषणा भी की थी। पिछले साल स्वतंत्रता दिवस से पहले एक वीडियो जारी कर पन्नू ने हिमाचल प्रदेश के सीएम जयराम ठाकुर को धमकी दी थी कि वह उन्हें 15 अगस्त को तिरंगा नहीं फहराने देगा।

कौन है गुरपतवंत सिंह पन्नू

पन्नू का पुश्तैनी घर अमृतसर के खानकोट गाँव में है। इसी गाँव में पन्नू का जन्म हुआ था। बाद में वह विदेश चला गया। पन्नू के पिता महिंदर सिंह विभाजन के समय पाकिस्तान से खानकोट आए थे। महिंदर सिंह मार्कफैड में नौकरी करते थे। पन्नू अपने भाई मंगवंत सिंह के साथ विदेश जाकर बस गया। बाद में वह अमेरिका पहुँचा और वहाँ उसने उसने सिख फॉर जस्टिस नाम से अमेरिका में अलगाववादी खालिस्तानी संगठन बनाया है। इसके जरिए वह देश भर के युवाओं को खालिस्तान के लिए बरगलाने का काम करने लगा।

पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के सहयोग से पन्नू खालिस्तानी अलगाववाद को फिर से जिंदा करने की कोशिश करने में लगा हुआ है। उसकी देश विरोधी गतिविधियों को देखते हुए साल 2019 में भारत सरकार ने संगठन को बैन कर दिया। पन्नू भी भारत में वांछित आतंकी है। खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के पिता की मौत बहुत पहले हो गई थी। भारत में रहने वाली अपनी माँ को उसने बताया था कि वह कनाडा में बहुत बड़ा वकील है। कुछ वर्ष पहले उसकी माँ की भी मौत हो गई। अब भारत में उसके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहता।

‘दलाल गिरोह’ याद कर रहा 1997, क्योंकि 2014 में लालू यादव की कृपा वाला PM नहीं: सोते गुजराल को जगा कर कहा था – गाड़ी भेज रहा हूँ, अब आप प्रधानमंत्री

भारत की आज़ादी के 75 वर्ष पूरे होने पर कुछ लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि 1997 का भारत बेहतर था, जब देश ने स्वतंत्रता के 50 साल पूरे किए थे। ‘2014 से पहले के भारत’ की तारीफ़ के बाद ये एक नया नैरेटिव है। जहाँ मोदी सरकार ‘आज़ादी का अमृत काल’ मनाते हुए विकास और उत्थान के नए लक्ष्य तय कर रही है, ये लोग इंद्र कुमार गुजराल के समय को याद कर रहे हैं। लोगों की आँखों में धूल झोंकना आसान है, क्योंकि युवा पीढ़ी में से अधिकतर को 1997 में होश ही नहीं रहा होगा।

जो लोग 40-45 वर्ष के हो चुके हैं, वो उस दौरान छात्र जीवन में रहे होंगे और अगर देश की राजनीति में उनकी दिलचस्पी नहीं रही होगी तो उन्हें भी उस समय के भारत को लेकर ज्यादा कुछ याद नहीं होगा। इस तरह एक बड़े वर्ग को ये बताना आसान है कि 1997 का भारत स्वर्ग था। कारण ये है कि नरेंद्र मोदी के 2 बार प्रधानमंत्री बनने और भाजपा को लगातार 2 बार पूर्ण बहुमत मिलने के बाद जिस दलाल समूह पर मार पड़ी है, वो कुछ भी कर के झूठ को सच साबित करने में लगा है।

कहते हैं, ‘यथा राजा तथा प्रजाः’, अर्थात राजा के आचरण का ही प्रजा अनुसरण करती है। तो सबसे पहले तुलना कर लेते हैं कि उस समय देश के मुखिया कौन थे और अब कौन हैं। 2014 से देश में एक स्थिर सरकार है, पूर्ण बहुमत वाली पार्टी सत्ता में है, गठबंधन पार्टियाँ मोलभाव नहीं कर सकती हैं और एक सर्वमान्य नेता प्रधानमंत्री है। 2014 के बाद से देश में विकास और सामाजिक उत्थान ने रफ़्तार पकड़ी है। भाजपा ने पहले रामनाथ कोविंद के रूप में एक दलित और फिर द्रौपदी मुर्मू के रूप में एक जनजातीय महिला को राष्ट्रपति का पद दिया।

अब 1997 की भी जरा बात कर लें। 1989 से लेकर 1999 तक, इन 10 वर्षों में देश ने 8 बार प्रधानमंत्री के पद का शपथग्रहण देखा और 6 चेहरों को इस पद पर आसीन देखा। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बीच 3 बार शपथ ली थी। अंततः 1999-2004 तक उनकी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। उनके अलावा 1991-96 तक कॉन्ग्रेस के नरसिम्हा राव कार्यकाल पूरा करने वाले प्रधानमंत्री थे। राजीव गाँधी के निधन के बाद इस उथल-पुथल वाले दशक में भारत कंगाली के स्तर तक पहुँच गया था।

तब देश की अर्थव्यवस्था खस्ता हालत में पहुँच गई थी। 90 का दशक जब शुरू हुआ था, तब भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार कंगाल हो गया था। 2 सप्ताह के लिए ही आयात का खर्च चलाने लायक पैसे बचे थे। विदेशी कर्ज काफी ज्यादा था और राजस्व घाटा बढ़ता ही जा रहा था। नरसिम्हा राव की सरकार ने कुछ कदम उठाए, जिस कारण जैसे-तैसे देश चलता रहा। देश की हालत ऐसी थी कि राव से पहले प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर सिंह सोलंकी की सरकार 400 टन सोना बेच चुकी थी।

वो इंद्र कुमार गुजराल ही थे, जिन्होंने आज़ादी के 50 वर्ष पूरा होने पर झंडोत्तोलन किया था। उनका जन्म पंजाब के उस हिस्से में हुआ था, जो पाकिस्तान में पड़ता है। उनके शिक्षकों में फैज अहमद फैज नाम का एक इस्लामी कट्टरपंथी भी था, जो अपनी कविताओं के जरिए मुस्लिमों में भारत विरोध और देश विभाजन की नींव डाल रहा था। इंद्र कुमार गुजराल का साथी हुआ करता था वामपंथी पत्रकार मज़हर अली खान, जो एक पत्रकार के रूप में भारत को बाँटने की साजिश में लगा हुआ था।

आपातकाल के दौरान वो इंदिरा गाँधी मंत्रिमंडल में शामिल रहे थे और संजय गाँधी से विवाद के बाद उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से हटा कर दूसरा मंत्रालय दे दिया गया था, लेकिन वो सरकार में बने थे। आपातकाल के पक्ष-विपक्ष में बयान न देकर बड़ी चालाकी से उन्होंने सत्ता का पान किया। छात्र जीवन में वामपंथी रहे इंद्र कुमार गुजराल लेफ्ट पार्टियों के भी करीब थे। वो उर्दू के प्रेमी थे। उनका प्रधानमंत्री बनना भी एक संयोग ही था।

उस समय क्षेत्रीय पार्टियों ने मिल कर ‘संयुक्त मोर्चा’ बनाया हुआ था, जिसने कर्नाटक के HD देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री चुना था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने कुछ ही महीनों बाद उनसे समर्थन वापस लेने की धमकी देनी शुरू कर दी। इसके बाद चर्चा शुरू हो गई कि अगला पीएम किसे बनाया जाए। सीताराम केसरी की अध्यक्षता वाली कॉन्ग्रेस ने देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उसी दौर में लालू यादव का चारा घोटाला भी खुल चुका था और CBI जाँच के दायरे में थे। उनसे ताबड़तोड़ पूछताछ हो रही थी।

लालू यादव ने इसके लिए कई बार तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा से लड़ाई भी कर ली, लेकिन वो इसे अदालत का मामला बता कर निकल जाते थे। अतः, देवेगौड़ा के बाद लालू यादव ने खुद को प्रधानमंत्री बनाने की सारी जतन फिर से की, लेकिन वामपंथी नेता ज्योति बसु इसके सख्त खिलाफ थे। लालू यादव ने प्रधानमंत्री पद के एक अन्य आकांक्षी मुलायम सिंह यादव का रास्ता भी रोक रखा था। लालू यादव ने ही तब इंद्र कुमार गुजराल के नाम का प्रस्ताव रखा।

उस समय इंद्र कुमार गुजराल सो रहे थे। नेताओं की बैठक में वो भी शामिल थे, लेकिन फिर उन्हें झपकी लग गई थी और सोने के लिए निकल गए थे। तभी उन्हें लालू का फोन आया, “गाड़ी भेज रहा हूँ। आ जाइए, आपको प्रधानमंत्री बनना है।” वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर लिखते हैं कि ऐसा नहीं था कि इंद्र कुमार गुजराल के नाम पर सब सहमत थे, लेकिन उनके नाम से असहमति काफी कम थी। वो लिखते हैं कि लालू यादव ने इंद्र कुमार गुजराल का नाम इसीलिए लिया, क्योंकि वो उनके ही विधायकों के वोटों पर पटना के एक फर्जी पते से राज्यसभा सांसद बनाए गए थे।

लालू यादव के सबसे घनिष्ठ मित्र और तब ‘आवामी सहकारी बैंक’ के अध्यक्ष अनवर अहमद के पटना के सब्जबाग स्थित इलाके के घर पर इंद्र कुमार गुजराल के नाम का नेमप्लेट टाँग कर ये दिखाया गया कि वो बिहार के निवासी हैं और यहाँ से राज्यसभा भेजे जाने के योग्य हैं। इंद्र कुमार गुजराल ने शुरू में लालू यादव की खूब मदद की, लेकिन CBI द्वारा चार्जशीट दायर किए जाने के बाद लालू यादव उनसे भी भड़क गए और सभी नेता इस पक्ष में थे कि लालू यादव को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

अंततः 5 जुलाई, 1997 को लालू यादव ने ‘जनता दल’ का विभाजन कर के ‘राष्ट्रीय जनता दल’ बना डाला। इसके बावजूद उनकी पार्टी के दो करीबी गुजराल मंत्रिमंडल में बनाए रखे गए। गुजराल ने लालू यादव को खुश करने के लिए CBI के निदेशक जोगिंदर सिंह को भी हटा दिया था। ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक राम बहादुर राय बताते हैं कि इंद्र कुमार गुजराल ने चुन-चुन कर अपने लोगों को एक दर्जन से अधिक पदों पर बिठाया था। उन्होंने भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं की और अपना निजी एजेंडा सेट करते रहे।

हो सकता है कि लिबरल गिरोह ये सब मिस कर रहा हो, क्योंकि न तो अब एक चुने हुए छोटे से गिरोह में से सभी को पद देने वाला प्रधानमंत्री है और न ही किसी भ्रष्टाचारी नेता से मोलभाव कर के उसे बचाया जा रहा है। 1997 का भारत वही था, जब प्रधानमंत्री पर प्रधानमंत्री बदल रहे थे और अस्थिर सरकारें चल रही थीं। अब का भारत अर्थव्यवस्था के मामले में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और एक स्थिर सरकार है। हाँ, दलालों को अब उनका हिस्सा नहीं मिलता। इसीलिए उन्हें आज़ादी के 75 साल पूरे होने पर भारत अच्छा नहीं लग रहा।

जिसके स्पर्म से पैदा हुए 48 बच्चे, 10 और जन्म लेने वाले; उससे शादी को तैयार नहीं कोई लड़की: 31 साल के ‘विकी डोनर’ का अलग ही दुखड़ा

48 बच्चों का एक पिता इन दिनों अपनी लव लाइफ को लेकर चर्चा में है। जल्द ही इस शख्स की 10 और संतानें इस दुनिया में आने वाली हैं। दरअसल, ‘विकी डोनर’ जैसे सीरियल स्पर्म डोनर (Serial Sperm Donor) के नाम से मशहूर इस शख्स का नाम काइल गोर्डी (Kyle Gordy) है।

31 वर्षीय काइल अमेरिका के लॉस एंजेलिस में रहते हैं। सोशल मीडिया के जरिए गोर्डी अपनी फ्री सर्विस के बारे में लोगों को बताते हैं कि वह स्पर्म बैंक में ना जाकर सीधे महिलाओं को अपना स्पर्म देते हैं। वह सिंगल मदर, लेस्बियन कपल और उन कपल्स को अपना स्पर्म डोनेट करते हैं, जो स्वस्थ स्पर्म ना मिलने के कारण बच्चा पैदा नहीं कर पा रहे हैं।

काइल के मुताबिक, कुछ लोग स्पर्म बैंक का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते हैं, क्योंकि इनमें स्पर्म डोनेट करने वाले अज्ञात लोग होते हैं। इससे नए पैरेंट्स को अपने बच्चे के ‘असली पिता’ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती है। काइल की वजह से पिछले 8 सालों में 4 दर्जन से अधिक महिलाएँ माँ बन चुकी हैं।

हालाँकि, उनके स्पर्म डोनेशन (Sperm Donation) की वजह से उनकी डेटिंग लाइफ पर बुरा असर पड़ा है और उनका कोई लंबा रिलेशनशिप नहीं रह पाया। अपनी लव लाइफ के बारे में बात करते हुए काइल कहते हैं, “मैंने 10 साल से किसी भी लड़की को डेट नहीं किया है। जब मैं उन लड़कियों को अपने स्पर्म डोनर होने के बारे में बताता हूँ, तो इसके बाद वो मुझमें इंटरेस्ट नहीं दिखाती हैं।”

उन्होंने बताया, “लड़कियाँ मुझसे कहती हैं कि वह इस बात को अच्छे से समझती हैं कि मैं महिलाओं की मदद करता हूँ। लेकिन वे किसी ऐसे पुरुष के साथ नहीं रहना चाहती हैं, जिसके दूसरे महिलाओं के बच्चे हों।”

काइल के शब्दों में, “मैंने 8 साल पहले स्पर्म डोनेट करना शुरू किया था, जब एक समलैंगिक जोड़े ने मेरे पास आकर कहा कि वे भी अपना परिवार शुरू करना चाहते हैं, लेकिन वह स्पर्म बैंक से स्पर्म नहीं लेना चाहते हैं, क्योंकि वे बच्चे के असली पिता के बारे में नहीं जानते थे।”

काइल की वजह से भले ही कई महिलाओं को माँ बनने का सुख मिला है, लेकिन इसके लिए स्पर्म डोनर को अन्य लोगों से काफी कुछ सुनना पड़ा है। वह आगे कहते हैं, “मुझे हर समय बहुत सारी घृणास्पद टिप्पणियाँ मेरे ईमेल पर मिलती रहती हैं। लोग कहते हैं कि तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम्हारी शादी हो जानी चाहिए। तुम्हें इस तरह से बच्चे नहीं करने चाहिए।”