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नाइजीरिया के मर्द (देखें फोटो) ने 300+ भारतीय महिलाओं को शादी के नाम पर ठगा, NRI दूल्हा बन ‘कमाए’ करोड़ों रुपए

उत्तर प्रदेश पुलिस (Uttar Pradesh Police) ने शादी के नाम पर सैकड़ों महिलाओं से करोड़ों रुपए ठगने वाले एक नाइजीरियाई को दिल्ली के किशनगढ़ से गिरफ्तार किया है। यह नाइजीरियाई अवैध रूप से दिल्ली में रह रहा था और वैवाहिक वेबसाइटों (Matrimonial Websites) पर खुद को विदेश में रहने वाला एक भारतीय (NRI) बताता था। बाद में इन महिलाओं को झाँसे में लेकर उनसे पैसों की माँग कर अपने परिवार को भेजता था।

मूल रूप से नाइजीरिया के लागोस का रहने वाला 38 वर्षीय गरुबा गलुमजे (Garuba Galumje) फरवरी 2019 में व्यवसाय संबंधी 6 महीने का वीजा लेकर भारत आया था। उसने बाल संबंधी और कपड़ों के व्यवसाय की बात कही थी। उसके बाद वह मेडिकल वीजा पर मार्च में भारत आया। इसके बाद वह जगह बदलता रहा और महिलाओं से ठगी अंजाम देता रहा।

दरअसल, यूपी पुलिस ने यह कार्रवाई मेरठ की एक महिला की शिकायत पर की। महिला ने शादी के लिए जीवनसाथी वेबसाइट पर अपना अपना प्रोफाइल बनाया था। इसके बाद आरोपित ने खुद को कनाडा में रहने वाले भारतीय NRI संजय सिंह बताकर महिला से संपर्क किया और उसे विश्वास में ले लिया। उसके बाद भावनात्मक शोषण करते हुए उससे पैसे ऐंठने लगा।

नोएडा साइबर क्राइम पुलिस की प्रभारी रीता यादव ने बताया कि महिला ने शिकायत में बताया कि आरोपित ने उससे धीरे-धीरे करके 60 लाख रुपए ले लिए। इसके बाद महिला को ठगी का आभास हुआ और उसने थाने में शिकायत दर्ज कराई।

पूछताछ के दौरान आरोपित ने बनाया कि मेरठ की इस महिला की तरह उसने 300 से अधिक महिलाओं के साथ करोड़ों रुपए की ठगी की है। वह मैट्रिमोनियल और सोशल मीडिया साइटों पर अपना प्रोफाइल बनाता था और उसमें स्मार्ट दिखने वाले एक भारतीय व्यक्ति की तस्वीर लगाता था। इसके बाद वह महिलाओं से संपर्क कर उन्हें अपने झाँसे में लेता था।

इसके बाद महिलाओं से भावनात्मक अपील करके पैसे माँगता था और उसे अपने परिवार को भेजता था। उसके पास से कई फर्जी दस्तावेज बरामद हुए हैं। इनमें थाईलैंड बैंक, दुबई बैंक, इंटरपोल और FBI के दस्तावेज शामिल हैं। उसके पासपोर्ट पर भी किसी भारतीय अधिकारी का मोहर या हस्ताक्षर नहीं है और ना ही वीजा संबंधित दस्तावेज हैं। पुलिस ने उसके पास से लैपटॉप और 7 मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं।

मदरसे में जंजीर से बाँध कर पिटाई: 2 छात्रों ने सुनाई आपबीती, अब्बा ने मास्टरों को दी क्लीन चिट, अपनी ही औलाद में बताया खोट

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक मदरसे में छात्रों के पैरों में बेड़ियाँ डाल कर रखने की खबर है। यह आरोप मदरसे से भाग कर अपने गाँव पहुँचे 2 छात्रों ने लगाया है। उनके मुताबिक छात्रों की बेतों से पिटाई भी होती है।

लखनऊ पुलिस ने इस मामले का संज्ञान लेकर कार्रवाई करने के लिए कहा है। रिपोर्ट के अनुसार हालाँकि बताया जा रहा है कि पीड़ित छात्रों के परिजनों ने मदरसे में पढ़ाने वालों के खिलाफ कोई लिखित शिकायत देने से मना कर दिया है।

घटना शुक्रवार (27 मई 2022) की बताई जा रही है। इस घटना के वायरल वीडियो में नाबालिग दिख रहे एक छात्र के दोनों पैरों में बेड़ियाँ हैं। वो जमीन पर बजरी के ऊपर बैठा है। बेड़ियों को तालों से बाँध कर रखा गया है। आस-पास कई लोग भी जमा हैं। यह मामला गोसाईंगंज थानाक्षेत्र के शिवलर इलाके में आने वाले सुफ्फामदीनतुल उलमा मदरसे का है। बताया जा रहा है कि बच्चे लगभग ढाई साल से उस मदरसे में पढ़ाई कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बाराबंकी के जरमामऊ का राजू और लखनऊ के रनियामऊ का शाहबाज़ सुफ्फामदीनतुल उलमा मदरसे में पढ़ते हैं। मौका पाकर ये दोनों मदरसे से भाग निकले। दोनों पास के गाँव में जाकर रो रहे थे, जिससे गाँव वाले वहाँ जमा हो गए। दोनों ने ग्रामीणों से अपने साथ मदरसे में होने वाले अत्याचार को बताया। उनके शरीर पर बेंत से पिटाई के निशान भी थे। उन्होंने गाँव वालों से वो पिटाई मदरसे के शिक्षकों द्वारा करना बताया। इस बीच मामला पुलिस के संज्ञान में आया।

SHO गोसाईंगंज शैलेन्द्र गिरी ने छात्रों के परिजनों से सम्पर्क किया। दोनों छात्रों के परिवार वालों ने मदरसा टीचरों के खिलाफ कोई भी लिखित शिकायत देने से मना कर दिया। शाहबाज़ के अब्बा शेरा ने तो यहाँ तक कह दिया कि उन्होंने ही मदरसे के टीचरों से अपने बेटे पर सख्ती बरतने के लिए कहा था क्योंकि वह पहले भी 2 बार मदरसे से भाग चुका है। शेरा के मुताबिक उसके बेटे का मन पढ़ाई में नहीं लगता और वो मदरसे में अपनी मर्जी के खिलाफ रह रहा है। इंस्पेक्टर शैलेन्द्र गिरी का कहना है कि तहरीर मिलने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

कॉन्ग्रेसी नेताओं में कपड़ा-फाड़ मारपीट, राजस्थान में मीटिंग के बीच नाक-मुँह से बहा खून: महिला नेता से गाली-गलौज और अभद्रता

राजस्थान कॉन्ग्रेस (Rajasthan Congress) में घमासान थमने का नाम ले रहा है। कभी सरकार पर नौकरशाही के हावी होने का आरोप लगाकर मंत्री-विधायक जलालत की बात कहते इस्तीफे की पेशकर करते हैं, तो कभी आपस में मारपीट की नौबत आ जाती है। शुक्रवार (27 मई 2022) को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) के खेमे के नेता पुष्पेन्द्र भारद्वाज ने सचिन पायलट गुट के विनय भोपर (Vinay Bhopar) को को पीट दिया।

दरअसल, राजधानी जयपुर में सांगानेर ब्लॉक कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष और संगठन चुनाव को लेकर बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में दोनों गुट के नेता शामिल थे। इसी दौरान सांगानेर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी पुष्पेन्द्र भारद्वाज (Pushpendra Bhardwaj) ने अपने भाई अभिषेक भारद्वाज एवं अन्य साथियों के साथ मिलकर विजय भोपर को पीट दिया। उनके कपड़े फाड़ डाले गए। पिटाई के कारण भोपर के नाक से खून निकलने लगा। उनके कपड़े लहूलुहान हो गए। इसके बाद भोपर ने भारद्वाज के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराया है।

भोपर ने कहा, “मैं पीसीसी (राज्य कॉन्ग्रेस कमिटी) के चीफ गोविंद सिंह डोटासरा से माँग करता हूँ कि ऐसे आदमी को कॉन्ग्रेस से हटाया जाए। अगर मैं मर जाता तो मेरे परिवार का क्या होता?” उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को मार कर राजनीति की जा रही है। वहीं, कॉन्ग्रेस की एक महिला कार्यकर्ता रश्मि शर्मा ने भोपर के खिलाफ गाली-गलौज करने की शिकायत कराते हुए क्रॉस FIR दर्ज कराई है।

निगम पार्षद का चुनाव लड़ चुके भोपर ने कहा, “मुझे राजस्थान प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी ने डूंगरपुर के सीमलवाड़ा में BRO लगाया है। मैं सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से तैयारी कर रहा हूँ। कॉन्ग्रेस नेता बुद्धि प्रकाश बैरवा ने कहा कि मेहनत करने वालों को पार्टी में पद दिया जाना चाहिए। तभी कुछ लोगों ने उन्हें बोलने से टोका तो मैंने कहा उन्हें बोलने दो। इसी बात पर पुष्पेन्द्र भारद्वाज ने अपने भाई और समर्थकों के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसमें कुछ पार्षद भी उनमें शामिल थे।”

वहीं, भारद्वाज ने कहा कि सांगानेर ब्लॉक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुनाव की बैठक में मानसरोवर ब्लॉक के कार्यकर्ता भोपर और उनके साथियों ने सांगानेर के निवर्तमान ब्लॉक अध्यक्ष दिनेश व्यास के मना करने के बावजूद जबरदस्ती एंट्री की। भोपर ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की। भोपर सांगानेर ब्लॉक की मीटिंग के लिए ऑथराइज्ड नहीं हैं।

सांगानेर थाना इंचार्ज हरि सिंह ने बताया कि भोपर ने मारपीट की शिकायत दर्ज करवाई है। वहीं, भोपर के खिलाफ रश्मि शर्मा ने गाली-गलौज और अभद्रता का आरोप लगाकर मामला दर्ज कराया है। दोनों मामलों को रजिस्टर्ड जाँच की जा रही है।

शादी को 8 साल… फिर भी न सेक्स, न छुआ-छुई: सांसद हीरो-हिरोइन का मामला हाईकोर्ट में, वीडियो में पूछा – पति कितने दिन इंतजार करे?

उड़िया अभिनेत्री बर्षा प्रियदर्शिनी और उनके पति BJD सांसद अनुभव मोहंती के केस में नया मोड़ आया है। ओडिशा हाईकोर्ट ने एक्टर से नेता बने अनुभव मोहंती को अपनी पत्नी के खिलाफ कोई भी वीडियो बनाने या बयानबाजी करने से मना किया है।

ओडिशा हाईकोर्ट की ओर से यह मनाही मीडिया और सोशल मीडिया दोनों के लिए तब तक लागू है, जब तक तलाक की प्रक्रिया खत्म नहीं हो जाती। यह आदेश बर्षा प्रियदर्शिनी के लिए भी है। इस केस की सुनवाई 27 मई 2022 (शुक्रवार) को हुई है।

केस की सुनवाई जस्टिस बिभु प्रसाद और जस्टिस मृगांका सेखर साहू की बेंच ने की थी। एक दिन पहले 26 मई 2022 (गुरुवार) को अभिनेत्री बर्षा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके अपने पति अनुभव द्वारा अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर किए जा रहे दुष्प्रचार पर रोक लगाने की माँग की थी।

अनुभव मोहंती पहले अभिनेता थे। फिलहाल वो ओडिशा के केंद्रपारा से बीजू जनता दल (BJD) के सांसद हैं। बर्षा प्रियदर्शिनी ने इस मामले में उड़ीसा सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को भी पार्टी बनाया है।

आरोप है कि अनुभव मोहंती ने अपनी पत्नी बर्षा के खिलाफ यूट्यूब पर वीडियो पोस्ट किया था। इस वीडियो में उन्होंने अपनी शादीशुदा जिंदगी के पीछे का सच बताने का दावा किया था। इस वीडियो के खिलाफ बर्षा की शिकायत पर अनुभव के खिलाफ IPC की धारा 509 के तहत केस भी दर्ज हुआ था।

बर्षा के द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद उनके पति ने उन पर फर्जी सोशल मीडिया एकाउंट बनाने और उससे लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया था। तब उन्होंने लोगों से अभिनेत्री बर्षा प्रियदर्शिनी की बातों में न आने की अपील भी की थी।

अभिनेत्री वर्षा अपने पति के खिलाफ 2 शिकायतें दर्ज करवा चुकी हैं। इसमें पहली शिकायत 22 मई को अपने खिलाफ सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड करने का आरोप लगाते हुए पुरीघाट थाने में और दूसरी शिकायत 25 मई को कटक के साइबर पुलिस थाने में दर्ज हुई थी। अनुभव ने अपने द्वारा बनाए गए 4 वीडियो में अपनी पत्नी से हुए विवाद और तलाक दाखिल करने की वजह भी बताई थी।

अनुभव ने अपने दूसरे वीडियो को ‘अनटोल्ड स्टोरी’ नाम से 21 मई 2022 को शेयर किया था। इस वीडियो में अनुभव ने बताया:

“हमारी शादी को कई साल बीत गए लेकिन हमारे बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं है। ऐसा बर्षा की वजह से है। मुझे पिछले 6 वर्षों से मेरे दाम्पत्य अधिकारों से वंचित रखा गया। अब लोग तय करें कि कोई पति कितने दिन इंतज़ार कर सकता है।”

सांसद अनुभव मोहंती ने लोगों से उनके हालात का मज़ाक न उड़ाने की अपील भी की थी। उन्होंने बताया था कि उन्होंने तलाक से पहले रिश्तों को सुधारने की हर संभव कोशिश की थी।

गौरतलब है कि अनुभव मोहंती ने अपनी पत्नी द्वारा अपने ऊपर दर्ज करवाए गए घरेलू हिंसा के केस के बाद सितंबर 2020 में दिल्ली में तलाक का केस दाखिल किया था। तलाक की याचिका में अनुभव ने कहा है कि उनकी पत्नी सेक्स के दौरान दर्द से डरने की बात करते हुए पिछले 8 साल से शारीरिक संबंध बनाने से मना कर रही हैं।

अनुभव मोहंती के मुताबिक उनकी पत्नी ने सिर्फ सेक्स ही नहीं बल्कि हर प्रकार के शारीरिक स्पर्श से उन्हें मना किया है। सांसद मोहंती ने इसी के साथ अन्य शिकायतों में खुद को मानसिक प्रताड़ना देना, गाली देना, परिवार से रिश्ता न रखना आदि बताया है।

गौरतलब है कि अभिनेता और सांसद अनुभव मोहंती सलमान खान के फैन हैं। साल 2020 में उनकी पत्नी बर्षा ने उन्हें SDJM कोर्ट में थप्पड़ भी मारा था। बर्षा का आरोप है कि उनका पति अक्सर शराब के नशे में रहता है।

बर्षा में मुताबिक, “अनुभव के दोस्त भी शराब पीने घर पर ही आते हैं। जब मैं मना करती थी, तब मेरी पिटाई होती थी और मानसिक उत्पीड़न भी होता था। अनुभव का कई अन्य महिलाओं से भी रिश्ता है। अनुभव के द्वारा मुझे घर से निकालने का भी प्रयास हुआ था।” सांसद अनुभव मोहंती के बारे में आपको बता दें कि अनुभव कुछ समय पहले ओडिशा TV को धमका भी चुके हैं।

हिजाब पहन कर आने पर क्लास नहीं, मैंगलोर यूनिवर्सिटी का फैसला: दूसरी जगह एडमिशन चाहिए तो मिलेगी मदद

कर्नाटक में जारी हिजाब-बुर्का विवाद (Karnataka Hijab-Burqa Controversy) के बीच मैंगलोर विश्वविद्यालय कॉलेज ने मुस्लिम छात्राओं को हिजाब में कक्षा में आने की अनुमति देने के फैसले को वापस ले लिया है। हालाँकि, कॉलेज प्रशासन ने हिजाब पहनने की जिद पर अड़ी छात्राओं को अन्य संस्थानों, जहाँ यूनिफॉर्म नहीं है या जहाँ हिजाब की अनुमित है, उसमें प्रवेश दिलाने में मदद की बात कही है। बता दें कि क्लासरूम में हिजाब पहनने की अनुमति देने के कॉलेज प्रशासन का छात्रों ने कड़ा विरोध किया था।

कॉलेज प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ छात्रों ने परिसर में धरने पर बैठकर विरोध प्रदर्शन किया था। छात्रों का कहना था कि मुस्लिम छात्राओं को कक्षा में हिजाब पहनने की अनुमति देखकर कॉलेज प्रशासन कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर रहा है।

भारी विरोध को देखते हुए कॉलेज प्रशासन ने फैसले को वापस ले लिया और कहा कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में हिजाब प्रतिबंध को बरकरार रखने का आदेश डिग्री कॉलेजों पर भी लागू होगा और इसलिए धार्मिक पोशाक को कक्षाओं के अंदर अनुमति नहीं दी जाएगी।

कॉलेज के VC प्रोफेसर सुब्रह्मण्य यदपादित्या ने कहा, “हमारा कॉलेज शुरू में लड़कियों को यूनिफॉर्म की रंग से मेल खाते हेडस्कार्फ़ को पहनने की अनुमति दी थी, लेकिन कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के मद्देनजर CDC (कॉलेज विकास परिषद) के अध्यक्ष और मैंगलोर दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र के विधायक वेदव्यास कामथ और सिंडिकेट के सदस्यों के साथ बैठक के बाद निर्णय लिया गया है कि कक्षाओं के अंदर धार्मिक पोशाक की अनुमति नहीं होगी।”

उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय का आदेश डिग्री कॉलेजों पर लागू होगा या नहीं, इसको लेकर असमंजस की स्थिति थी। राज्य सरकार की एडवाइजरी, उच्च शिक्षा परिषद और कोर्ट के आदेश के मुताबिक सभी कॉलेजों को यूनिफॉर्म का पालन करना होगा। इसके बाद आदेश को वापस ले लिया गया। VC ने कहा कि छात्राएँ कैंपस में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन कक्षा में नहीं।

VC यदपादित्य ने हिजाब पहनने की जिद पर अड़ी मुस्लिम छात्राओं की काउंसलिंग को लेकर कहा, “हमें पता चला है कि लगभग 15 मुस्लिम लड़कियाँ क्लास में हिजाब पहनने को लेकर अड़ी हुई हैं। हम इन लड़कियों को कर्नाटक उच्च न्यायालय के आदेश के संबंध परामर्श देने के तैयार हैं। इसके बाद बाद भी वे नहीं मानती हैं तो उन्हें उन शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश दिलाने में हम मदद करेंगे, जहाँ हिजाब की अनुमति है या जहाँ कोई यूनिफॉर्म नहीं है।”

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए CM धामी ने बनाई कमिटी: सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई होंगी कमिटी की अध्यक्ष

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Uttarakhand CM Pushkar Singh Dhami) ने अपने चुनावी वादे के अनुसार राज्य में समान नागरिक संहिता (Common Civil Code) लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसके लिए मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में ड्राफ्टिंग कमिटी का गठन कर दिया है।

बता दें कि इस साल हुए विधानसभा चुनावों के दौरान मुख्यमंत्री धामी ने घोषणा की थी कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार दोबारा सत्ता में आती है तो समान नागरिक संहिता लागू किया जाएगा। इसके बाद राज्य में इतिहास रचते हुए पहली सत्ताधारी पार्टी सत्ता में लौटी थी। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान भी उन्होंने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई थी।

मुख्यमंत्री धामी ने शनिवार (28 मई 2022) को ट्वीट किया, “विकल्प रहित संकल्प’, देवभूमि उत्तराखंड के नागरिकों के लिए कानून में समरूपता लाने एवं लोकहित के दृष्टिगत समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन के लिए उच्च स्तरीय कमिटी का गठन कर दिया गया है।”

इसके पहले शुक्रवार (27 मई 2022) की शाम को ट्वीट कर मुख्यमंत्री धामी ने कहा था, “देवभूमि की संस्कृति को संरक्षित करते हुए सभी धार्मिक समुदायों को एकरूपता प्रदान करने के लिए मा. न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई जी की अध्यक्षता में समान नागरिक संहिता (UCC) के क्रियान्वयन हेतु विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है।”

अगर उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू हो जाता है तो यह गोवा के बाद दूसरा राज्य बन जाएगा, जहाँ समान नागरिक संहिता लागू होगी। अपने फेसबुक पोस्ट में मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि चुनाव के समय संकल्प पत्र में किए गए वादे के अनुरूप देवभूमि की संस्कृति को संरक्षित करते हुए सभी धार्मिक समुदायों को एकरूपता प्रदान करने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है।

क्या है समान नागरिक संहिता और क्यों मुस्लिम करते हैं विरोध

समान नागरिक संहिता को सरल अर्थों में समझा जाए तो यह एक ऐसा कानून है, जो देश के हर समुदाय पर समुदाय लागू होता है। व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, जाति का हो या समुदाय का हो, उसके लिए एक ही कानून होगा। अंग्रेजों ने आपराधिक और राजस्व से जुड़े कानूनों को भारतीय दंड संहिता 1860 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, विशिष्ट राहत अधिनियम 1877 आदि के माध्यम से सब पर लागू किया, लेकिन शादी, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति आदि से जुड़े मसलों को सभी धार्मिक समूहों के लिए उनकी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया।

इन्हीं सिविल कानूनों को में से हिंदुओं वाले पर्सनल कानूनों को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खत्म किया और मुस्लिमों को इससे अलग रखा। हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं के तहत जारी कानूनों को निरस्त कर हिंदू कोड बिल के जरिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू नाबालिग एवं अभिभावक अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 लागू कर दिया गया। वहीं, मुस्लिमों के लिए उनके पर्सनल लॉ को बना रखा, जिसको लेकर विवाद जारी है। इसकी वजह से न्यायालयों में मुस्लिम आरोपितों या अभियोजकों के मामले में कुरान और इस्लामिक रीति-रिवाजों का हवाला सुनवाई के दौरान देना पड़ता है।

इन्हीं कानूनों को सभी धर्मों के लिए एक समान बनाने की जब माँग होती है तो मुस्लिम इसका विरोध करते हैं। मुस्लिमों का कहना है कि उनका कानून कुरान और हदीसों पर आधारित है, इसलिए वे इसकी को मानेंगे और उसमें किसी तरह के बदलाव का विरोध करेंगे। इन कानूनों में मुस्लिमों द्वारा चार शादियाँ करने की छूट सबसे बड़ा विवाद की वजह है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी समान नागरिक संहिता का खुलकर विरोध करता रहा है।

गोवा में लागू है UCC

देश भर में समान नागरिक संहिता को लागू करने की माँग दशकों से हो रही है, लेकिन देश में गोवा अकेला ऐसा राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है। गोवा में वर्ष 1962 में यह कानून लागू किया गया था। साल 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भारतीय संसद ने गोवा में ‘पुर्तगाल सिविल कोड 1867’ को लागू करने का प्रावधान किया था। इसके तहत गोवा में समान नागरिक संहिता लागू हो गई और तब से राज्य में यह कानून लागू है।

पिछले दिनों गोवा में लागू यूनिफॉर्म सिविल कोड की तारीफ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एस ए बोबड़े ने भी की थी। सीजेआई ने कहा था कि गोवा के पास पहले से ही वह है, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने पूरे देश के लिए की थी।

PM मोदी की कूटनीति में ‘बुद्धनीति’: एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश, चीन को मात और एशियाई देशों का साथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संकट के जुझ रहे श्रीलंका को हर तरह की मदद के साथ-साथ बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अनुदान दिया है। भारतीय उच्चायोग ने शुक्रवार (27 मई 2022) को इसकी जानकारी साझा की। इससे पहले अपनी जापान यात्रा के दौरान राजधानी टोक्यो में 23 मई 2022 को कहा कि भारत और जापान संबंध बुद्ध का संबंध है, ज्ञान का संबंध और ध्यान का संबंध है। भगवान बुद्ध जयंती पर 16 मई को नेपाल में लुंबिनी की यात्रा में पीएम मोदी ने कहा कि भारत और नेपाल के रिश्ते सभ्यतागत और दोनों तरफ के लोगों के विश्वास पर टिका है। यह हिमालय की तरह अडिग है। इसे कोई हिला नहीं सकता।

दरअसल, नरेंद्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अपनी विदेश नीति में बुद्ध को एक मजबूत स्तंभ और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में आक्रामक तरीके से प्रयोग करते हुए संबंधों को प्रगाढ़ करने की दिशा में काम किया। खासकर एशिया और यूरोप के 15 ऐसे देश हैं, जो बौद्ध धर्म के कारण भारत से खुद और आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और बंधुत्व के नाते जुड़ा महसूस करते हैं। प्राय: कुछ विशेष कालखंड को छोड़ दें तो इन देशों का भारत के साथ संबंध बहुत बेहतर रहे हैं।

हालाँकि, जवाहलाल नेहरू और मनमोहन सिंह की सरकार में भी बुद्ध को सांस्कृतिक टूल के रूप में इस्तेमाल किया गया। कॉन्ग्रेस सरकार ने इसे केंद्र में रखकर भारत के साथ पड़ोसी देशों की रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश नहीं की और ना ही सांस्कृतिक संबंधों को विकसित करने पर ध्यान दिया।

साल 2012 में संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार हनन को लेकर श्रीलंका के खिलाफ मतदान करने के बाद उसे खुश करने के लिए यूपीए सरकार ने कपिलवस्तु में स्थित भगवान बुद्ध के अवशेष उनकी हड्डियों के टुकड़े) को वहाँ भेज दिया था। हालाँकि, इस मामले में मोदी सरकार की नीति तुष्टिकरण वाली नहीं है। वे भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म को पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों की बुनावट में एक खाँचे के रूप में इस्तेमाल रहे हैं।

नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, तिब्बत (अब चीन का हिस्सा), वियतनाम, सिंगापुर, थाइलैंड, कंबोडिया, लाओस, जापान, ताइवान, चीन, दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया ऐसे देश हैं, जहाँ बौद्ध धर्म मुख्य धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रभुत्व वाले देशों में रुस (जहाँ के के पाँच प्रांतों में इसकी बड़ी आबादी है), इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि प्रमुख हैं। इनमें से अधिकांश देश भारत के पड़ोसी हैं, जो किसी न किसी रूप में भारत को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।

भगवान गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ था, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति भारत के बोध गया में हुई। भारत में ही उन्होंने जगह-जगह जाकर अपने बुद्धत्व का प्रचार-प्रसार किया। सम्राट अशोक जैसे राजा बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए और इसे यूरेशिया (एशिया और यूरोप का कुछ हिस्सा) तक फैलाया। दुनिया का बौद्ध अनुयायियों अपने जीवन में एक बार चार बौद्ध तीर्थस्थलों बोध गया, सारनाथ, लुम्बनी और कुशीनगर दर्शन-पूजन जरूर करना चाहता है।  

इन देशों के साथ भारत के प्राचीन काल से ही बेहतर संबंध रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दशकों से विदेश नीति में अस्पष्टता और दूरदर्शिता में कमी के कारण भारत इन पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंध नहीं रहे। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी ने इन देशों के साथ भारत के बंधन के डोर बुद्ध को अपनाया और एक पड़ोसी और सांस्कृतिक तौर पर जुड़े राष्ट्र की तरह खड़ा रहा।

भारत की कूटनीति में बुद्धनीति

प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले एक बौद्ध भूटान की यात्रा की थी। उनकी यह यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण थी। उन्होंने पड़ोसी देशों को बताने की कोशिश की थी कि भारत अपने बौद्ध विरासत को भूला नहीं है और ना ही उससे अलग हुआ है। भारत को बुद्ध से जोड़ना एशिया के अधिकांश देशों के साथ स्वत: जुड़ाव है। इसके लिए विशेष कूटनीतिक अभियान की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि यह जुड़ाव हितों पर आधारित न होकर सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से है।

गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने बौद्ध विरासतों को संजोने का काम बड़े पैमाने पर किया और गुजरात को अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाकर एक समृद्ध राज्य के रूप में खड़ा किया। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने इस सांस्कृतिक तार को जोड़ते हुए जापान सहित कई देशों से राज्य में निवेश का आमंत्रित किया।

आज उसी बुद्ध को भारत श्रीलंका, जापान, नेपाल के साथ संबंधों को अटूट बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कूटनीति का भाषा में इसके लिए ‘बुद्ध नीति’ या ‘बुद्ध पॉलिसी’ कहा जा रहा है। इसी पॉलिसी के अंतर्गत पीएम मोदी ने नेशनल म्यूजियम में बुद्ध गैलरी खोलने का निर्णय लिया। इसमें भगवान बुद्ध के जीवन दर्शन और यात्रा वृतांत का विवरण रहेगा।

पीएम मोदी की बुद्धनीति के कारण पड़ोसी बौद्ध देशों की जनता अपने आपको भारत से जुड़ा महसूस करती है। इससे भारत विरोधी तत्वों को वहाँ से दूर रखने में भारत को मदद मिलती है। वहाँ की जनता में भारत के प्रति एक अपनापन सा महसूस होता है, जिससे वहाँ की सरकार चाहकर भी जनभावनाओं की अनदेखी नहीं कर पाती। नेपाल और श्रीलंका इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। नेपाल में वामपंथी सरकार और श्रीलंका की महिंदा राजपक्षे की चीन की तरफ झुकाव रहा, लेकिन जनता ही वहाँ सरकार ही बदल दी। इन देशों के नई सरकारों में भारत के प्रति अलग नजरिया है।

कोविड महामारी के दौरान पिछले साल पीएम मोदी ने कहा था, “आज भगवान बुद्ध और भी प्रासंगिक हो गए हैं। भारत ने दिखाया है कि कैसे हम उनके रास्ते पर चलकर बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकते हैं। देश एक-दूसरे से हाथ मिला रहे हैं और बुद्ध के मूल्यों को लेकर एक-दूसरे की ताकत बन रहे हैं।” दरअसल, इस महामारी के दौरान पीएम मोदी ने देशों से एक दूसरे का सहयोग करने का आह्वान किया था। इस दौरान भारत ने अपने पड़ोसी देशों को टीका से लेकर हर तरह से मदद की थी।

सांस्कृतिक विकास और संबंधों के जुड़ाव के साथ-साथ यह व्यापार और उद्योग को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण कारक है। भारत में कई बौद्ध स्थल हैं, जहाँ पड़ोसी देशों के साथ-साथ दुनिया भर से लाखों बौद्ध भारत आते हैं। इससे ना सिर्फ सांस्कृतिक विरासत का फैलाव होता है, बल्कि पर्यटन का भी विकास होता है। इन स्थानों पर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने की कोशिश की जाती है। इससे पड़ोसी देशों के साथ नए तरह के व्यापारिक संबंध विकसित होते हैं।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री मंत्री ने विकास को सांस्कृतिक विकास से जोड़ते हुए बुद्धनीति का अनुसरण किया और दक्षिण एशिया के साथ-साथ अन्य बौद्ध देशों के साथ अपने संबंधों को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाने का प्रयास किया। पीएम मोदी का यह प्रयास लगातार जारी है। इन देशों के साथ भारत के संबंधों को शाश्वत बनाने के लिए सम्राट अशोक के बाद प्रधानमंत्री पीएम ने एक बड़ी पहल की है।

नेपाल से सभ्यतागत संबंध

भारत से थोड़ा दूर होकर चीन से नजदीकी बढ़ाते नेपाल में बुद्ध पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध के जन्मस्थान लुंबिनी में पीएम मोदी ने लगभग एक अरब रुपए की लागत से एक साल में बनकर तैयार होने वाले भारतीय बौद्ध केंद्र का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने नेपाल को एक तरह से संदेश देने की कोशिश की कि भारत-नेपाल के रिश्ते सिर्फ व्यापारिक और राजनीतिक नहीं, ये सदियों पुराने आपसी विश्वास पर टिके हैं। इससे पीएम मोदी ने एक संदेश देने की कोशिश की कि भगवान बुद्ध के जन्मस्थान को लेकर भारत और नेपाल के बीच अब कोई विवाद नहीं रहा। नेपाल का हमेशा से दावा रहा है कि बुद्ध का जन्म नेपाल में हुआ है, जबकि भारत अपना यहाँ दावा करता रहा है।

शायद इस कूटनीति का प्रभाव भी बेहतर रहा और भारत ने कई परियोजनाओं को लेकर द्विपक्षीय समझौते किए। इनमें अरुण 4 परियोजना के विकास और कार्यान्वयन के लिए SJVN लिमिटेड और नेपाल विद्युत प्राधिकरण (NEA), काठमांडू विश्वविद्यालय (केयू) और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-मद्रास (IIT-M) के बीच संयुक्त स्तर पर मास्टर डिग्री कार्यक्रम के लिए समझौते शामिल हैं। इसके साथ बौद्ध अध्ययन के लिए समझौता, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की कठमांडू में चेयर की स्थापना आदि का समझौता किया गया है। इस तरह दोनों देश एक बार फिर नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं।

इतना ही नहीं, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ पीएम मोदी इसे सामरिक टूल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। नेपाल यात्रा के दौरान भव्य स्वागत और वहाँ के लोगों का दिल जीतने के बाद पीएम मोदी स्वदेश लौट आए। उसके अगले ही दिन विदेश मंत्रालय में अपर सचिव नवीन श्रीवास्तव को नेपाल का उच्चायुक्त नियुक्त कर काठमांडू भेज दिया गया। श्रीवास्तव में लद्दाख में चीन सेना के गतिरोध के दौरान बातचीत करने वाली टीम के हिस्सा थे और इन्हें चीन के मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है।

श्रीलंका में बौद्ध विरासत के संरक्षण के लिए सहयोग

आर्थिक संकट से जुझ रहे भारत के दक्षिण में हिंद महासागर में स्थित द्वीपीय देश श्रीलंका को भी भारत ने कई तरह से राहत देने की कोशिश की है। भारत ने श्रीलंका में ना सिर्फ खाद्यान्न, दवा और आपतकालीन वस्तुओं भेजीं, बल्कि कई पैकेज की देकर उसे वित्तीय संकट से उबारने की कोशिश की। भारत की मदद पर श्रीलंका और सरकार एवं जनता भारत का बार-बार आभार व्यक्त कर चुकी है।

इसी पिछले साल सितंबर में पीएम मोदी ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए $15 मिलियन (लगभग 117 करोड़ रुपए) की अनुदान की घोषणा की थी। इसके एक हिस्से का उपयोग वहाँ बौद्ध मठों के निर्माण और नवीनीकरण में किया जाएगा। कुछ हिस्से का उपयोग बौद्ध विद्वानों और भिक्षुओं की शिक्षा में किया जाएगा। वहीं, अनुदान का एक हिस्सा बौद्ध विरासत, संग्रहालयों और पुरातात्विक सहयोग के विकास और ‘बुद्ध के अवशेषों के पारस्परिक प्रदर्शनी’ पर भी इस्तेमाल किया जाएगा।

पिछले साल भगवान बुद्ध का धातु अवशेष 141 साल बाद श्रीलंका से भारत आया था। इसे श्रीलंकन एयरलाइंस विमान में अलग सीट पर रखकर लाया गया था। इससे पहले यह अवशेष वर्ष 1880 में भारत से ही श्रीलंका गया था। मूर्ति पूजा से पहले इसी की पूजा की जाती है।

बौद्ध देशों का भारत के साथ संबंधों को लेकर श्रीलंका के एक प्रसिद्ध बौद्ध नेता दामेंदा पोरागे ने कहना है, “यह सिर्फ दोस्ती नहीं है, हम खून का रिश्ता साझा करते हैं। बौद्ध धर्म सेतु है। श्रीलंका 25 सदियों से बौद्ध देश रहा है।”

बुद्ध के विरासत पर चीन के दावे का काट

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर करने की भारत की ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ (पूर्व की ओर देखो नीति) को पीएम मोदी ने बुद्धनीति से बदल दिया है। दरअसल, चीन ने पड़ोसी देशों पर प्रभाव स्थापित करने और खुद को बौद्ध धर्म के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में दिखाने की कोशिश शुरू की थी। बुद्ध की विरासत को वह हथियाने की कोशिश करता रहा है। इसके पीछे सामरिक, राजनीतिक, व्यापारिक और धार्मिक कारण थे।

पहली बात तो बौद्ध तिब्बत पर चीन के जबरन कब्जे के बाद पड़ोसी बौद्ध देश चीन को लेकर सशंकित हो उठे थे। तिब्बत से जब दलाई लामा ने 1950 के दशक में भागकर भारत में शरण ली तो बौद्ध देशों को भारत पर अधिक भरोसा जमा। इस भरोसे को कम करने और पड़ोसी देशों के व्यापार और रिश्तों को बढ़ाने के लिए चीन ने भगवान बुद्ध को एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया।

इसमें बर्मा, नेपाल, पाकिस्तान, भूटान आदि को शामिल करते हुए चीन ने वन बेल्ट वन रोड (OBOR) जैसी अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की। हालाँकि, जब भूटान के साथ चीन का सीमा विवाद हुआ और भूटान के पक्ष में चीन के खिलाफ भारत मजबूती से खड़ा हुआ तो इस OBOR परियोजना को लेकर सशंकित होने लगे। नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में सहयोग के नाम पर कर्ज के जाल में फँसाकर वहाँ आर्थिक संकट उत्पन्न करने में चीन का हाथ है और ये देश अब महसूस करने लगे हैं।

दरअसल, बौद्ध धर्म को राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हुए अपने OBOR के लिए प्लेटफॉर्म बनाना चीन ने 2006 में ही शुरू कर दिया था। इस साल उसने अपने प्रांत होंगजाउ में पहले विश्व बौद्ध सम्मेलन का आयोजन कर सभी बौद्ध देशों को आमंत्रित कर उनके साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी। हालाँकि, 2011 और 2012 में भारत ने इसी तरह के सम्मेलन किए, लेकिन उसमें स्पष्टता की कमी थी।

पीएम मोदी ने दक्षिण एशिया की कूटनीति का महामंत्र बुद्ध को अच्छी तरह समझा और विश्व के हर मंच का बहुत सलीके से इस्तेमाल किया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से लेकर आतंकवाद के निपटारे में बुद्ध के सिद्धांतों की बात की। हर विदेशी राजनेता के साथ बुद्ध से जुड़ी विरासत को साझा किया और बौद्ध भारत के विश्वगुरु होने की ओर इंगित किया।

रणनीतिकारों का मानना है कि पीएम मोदी का बुद्धनीति चीन को जवाब देने का ही तरीका है, ताकि दक्षिण एशिया में चीन के दबदबे को कम किया जा सके। इसके साथ ही भारत को आध्यात्मिक तौर पर राष्ट्र के रूप में स्थापित कर मानवता के कल्याण में उसके योगदान को सहर्ष स्वीकार कराया जा सके।

पीएम मोदी जानते हैं कि जो बौद्ध धर्म को कंट्रोल करेगा, वही एशिया सहित विश्व को कंट्रोल करेगा। यही कारण है कि पीएम मोदी नेपाल, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, जापान या मंगोलिया की यात्रा हो, हर जगह वे बौद्ध मंदिरों में गए वहाँ भगवान बुद्ध के दर्शन किए और भारत के साथ उनके जुड़ाव को कूटनीतिक रूप में साधा।

बीजेपी प्रवक्ता नुपुर शर्मा को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने दी गला काटने की धमकी, ऑल्ट न्यूज वाले मोहम्मद जुबेर ने उकसाया

दिल्ली बीजेपी की नेता और पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता नुपुर शर्मा को सोशल मीडिया पर इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हत्या की धमकी देने का मामला प्रकाश में आय़ा है। आरोप है कि फैक्ट चेक के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने वाले ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने बीजेपी नेता का एक ट्विस्टेड स्पीच ट्वीट कर ट्रोल्स को उकसाया था। इसके बाद कई कट्टरपंथियों ने उन्हें धमकियाँ दी तो कुछ ने सिर काटने की बात भी कही।

नूपुर शर्मा ने इन धमकियों के स्क्रीनशॉट को ट्विटर पर शेयर किया है। उन्होंने ट्वीट किया, “@DelhiPolice@CPDelhi मुझे अपने परिवार और खुद के खिलाफ लगातार हत्या और सिर काटने की धमकी मिल रही है, जो कि सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने और एक फेक नैरेटिव गढ़ कर माहौल को खराब करने के अपने प्रयासों के तहत @zoo_bear ने उकसाया है। कुछ तस्वीरें अटैच कर रही हूँ। कृपया ध्यान दें।” यहाँ उल्लेखनीय है कि @zoo_bear ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर का ट्रोल अकाउंट है।

नुपुर शर्मा ने भले ही केवल चार ट्वीट्स को शेयर कर उनकी जान को खतरा होने का दावा किया है, लेकिन वास्तविकता ये है कि जुबैर द्वारा भड़काए जाने के बाद इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ इस तरह के कई ट्वीट किए।

टाइम्स नाउ पर विवादित ज्ञानवापी ढाँचे पर बहस के दौरान नुपुर शर्मा ने तर्क दिया कि चूँकि लोग बार-बार हिंदू आस्था का मजाक उड़ा रहे हैं, तो वे इस्लामी मान्यताओं का जिक्र करते हुए अन्य धर्मों का भी मजाक उड़ा सकती हैं। उनके इस तर्क वाले वीडियो की कटिंग को जुबैर ने इसे अपने 464,000 ट्विटर फॉलोअर्स के साथ साझा किया, जिसमें उसने नुपुर को अतिवादी, सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाली और दंगे भड़काने वाली घोषित कर दिया।

जुबेर के उकसावे का असर ये हुआ कि नुपुर शर्मा की टाइमलाइन पर ट्रोल अकाउंट्स ने उन्हें हर तरह की धमकियाँ दीं, जिसमें उन्हें सिर काटने की धमकी भी शामिल थी। कमलेश तिवारी और किशन भरवाड़ जैसी कई ऐसी ही घटनाओं को देखते हुए पुलिस को इन धमकियों को गंभीरता से लेना चाहिए।

बार-बार टैग किए जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने आखिरकार जवाब दिया और कहा कि मामला संबंधित अधिकारियों को भेज दिया गया है और वे जल्द ही पीड़ित पक्ष नुपुर शर्मा से संपर्क करेंगे।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापकों द्वारा उकसाए जाने के बाद किसी को धमकियाँ मिली हों। इससे पहले, एक नाबालिग लड़के को ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा द्वारा परेशान किए जाने के बाद भी धमकी दी गई थी। जुबैर से इस महीने की शुरुआत में दिल्ली पुलिस ने एक नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म करने के आरोप में पूछताछ की थी।

मंदिर-मस्जिद विवाद में कूदा PFI: मुस्लिमों को विवादित ढाँचे के खिलाफ कार्रवाई का विरोध करने को उकसाया, पोस्टर जारी कर धमकी

देश भर में जिस तरीके से मस्जिदों के अंदर से एक-एक कर के हिन्दू मंदिरों और सनातन संस्कृतियों के सबूत मिल रहे हैं, उससे इस्लामिक कट्टरपंथियों में खलबली मच गई है। इसी क्रम में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ने देशभर के मुस्लिमों को भड़काते हुए उनसे विवादित मस्जिदों के ढाँचों के खिलाफ कार्रवाई का विरोध करने को कहा है।

कर्नाटक के पुत्थनथानी में 23 और 24 मई 2022 को पीएफआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। इस दौरान कट्टरपंथी संगठन ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें देशभर के मुस्लिमों से मस्जिदों के खिलाफ हो रही कार्रवाईयों का विरोध करने के लिए कहा गया। बैठक के दौरान मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद और वाराणसी में ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को लेकर हिन्दुओं द्वारा दायर की गई याचिकाओं को वर्शिप एक्ट-1991 का उल्लंघन करार दिया गया।

पीएफआई के चेयरमैन ओएमए सलाम ने भड़काऊ भाषण देते हुए कहा है कि जिस तरीके से मस्जिदों पर दावे किए जा रहे हैं, इससे कभी न खत्म होने वाली सांप्रदायिक दुश्मनी शुरू होगी। पीएफआई का आरोप है कि जितने भी बीजेपी शासित राज्य हैं, वहाँ मुस्लिमों पर अत्याचार किया जा रहा है। इसमें मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम का जिक्र किया गया है। इसके साथ ही कट्टरपंथी संगठन ने ज्ञानवापी मामले में कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए वजूखाने पर लगाई गई रोक का विरोध किया। इसको लेकर बकायदा एक पत्र भी जारी किया गया है।

साभार: पीएफआई

पीएफआई पर आतंकियों से गठजोड़ के आरोप

गौरतलब है कि हाल ही में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को बैन करने की माँग करते हुए सूफी इस्लामिक बोर्ड ने इस पर आतंकियों से मिले होने का आरोप लगाया था। सूफी बोर्ड ने दावा किया था कि पीएफआई आतंकवादी संगठन अलकायदा से मिला हुआ है और उसी से मिले निर्देशों के आधार पर काम करता है। इसके अलावा कर्नाटक में हिजाब विवाद के पीछे भी पीएफआई की साजिश सामने आ चुकी है।

केंद्र सरकार ने भी इसी साल 28 अप्रैल 2022 सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि पीएफआई के तार प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन सिमी से जुड़े हुए हैं, इसलिए अब इस पर बैन की तैयारी का जा रही है।

BJP को वोट देने से मुस्लिम समाज में बहिष्कार: परिवार ने कट्टरपंथियों पर लगाया नमाज पढ़ने से रोकने का आरोप, UP पुलिस ने नकारा

मुस्लिम कट्टरपंथियों में बीजेपी (BJP) के खिलाफ किस तरह से जहर भरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बाराबंकी (Barabanki) में बीजेपी को वोट देने पर एक मुस्लिम परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया। पीड़ित परिवार का कहना है कि इस साल के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के अच्छे कार्यों के चलते जब से उन्होंने उसे वोट दिया है, तभी से उसी के समुदाय ने उससे दूरियाँ बनानी शुरू कर दी। अब तो उसे मस्जिद में नमाज पढ़ने से भी रोक दिया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ये घटना बारबंकी जिले के फतेहपुर कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रेरिया गाँव की है। यहीं पर मोहम्मद आरिफ का परिवार भी रहता है। घर के मुखिया आरिफ ही हैं। उनका कहना है कि भाजपा के अच्छे कामों को देखते हुए उन्होंने उसे वोट दिया है। वो ये बड़ी ही शिद्दत से मानते हैं कि मोदी और योगी दोनों का ही काम बहुत अच्छा है। इसी कारण से उन्होंने अपने घर में पीएम मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ की तस्वीर भी लगा रखी है।

वहीं आरिफ ने यह भी कहा कि एक जमीन उन्होंने खरीदी थी, जिसको लेकर उनका मुस्लिम समुदाय दबाव बना रहा है कि वो उसे मस्जिद बनाने के लिए छोड़ दें।

नमाज पढ़ने से रोका

पीड़ित व्यक्ति आरिफ का आरोप है कि उनके गाँव का पूर्व प्रधान है मुबारक अली। उसका समर्थन कर रहे गाँव के 50 मुस्लिम परिवारों ने उन्हें गाँव की मस्जिद में नमाज अदा करने पर रोक लगा दी है। इतना ही नहीं 31 मई को आरिफ के बेटे मोहम्मद तालिब का निकाह है, जिसको भी कट्टरपंथियों ने गाँव के लोगों को चेतावनी दी है कि अगर कोई इस निकाह में शामिल हुआ तो, उस पर 20,000 रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।

इतना ही नहीं खाना बनाने और टेंट लगाने वालों को भी आरिफ के घर में काम करने से रोक दिया गया है। उन्हें भी जुर्माने की धमकी दी गई है। हालाँकि, आरिफ कहते हैं कि वो इन धमकियों से नहीं डरते। इस बीच एसओ अनिल कुमार पांडेय ने कहा है कि दोनों पक्षों को थाने बुलाया गया है, ताकि इसका हल निकाला जा सके।

अपडेट: ऊपर की खबर पुलिस की जाँच से पहले और मीडिया रिपोर्ट के आधार पर लिखी गई है। नीचे इस पूरे मामले पर पुलिस की जाँच को पढ़ सकते हैं।

उत्तर प्रदेश की बाराबंकी पुलिस ने इस मामले को लेकर जाँच की है। जाँच से संबंधित बातों को पुलिस ने ट्विटर पर रखा है। पुलिस के अनुसार आवेदक (मोहम्मद आरिफ) ने अपने गाँव के मदरसे की जमीन पर कब्जा करना चाहा था। इसके लिए उसने गाँव के ही विपक्षी लोगों पर बम से हमला भी किया था। इस मामले में आवेदक (मोहम्मद आरिफ) जेल भी जा चुका है। मदरसे की जमीन पर कब्जा करने को लेकर गाँव के लोगों ने साल 2006 से ही मोहम्मद आरिफ के साथ खान-पान बंद कर दिया था।

बाराबंकी पुलिस के अनुसार आवेदक (मोहम्मद आरिफ) के घर में शादी है। इस शादी को लेकर मोहम्मद आरिफ यह चाहता था कि गाँव के लोग इसके शादी-परिवार में शामिल हों लेकिन मदरसे की जमीन पर कब्जा करने की बात याद करके लोगों ने इसकी इच्छा से इनकार कर दिया। इसी कारण से इस प्रकरण को सनसनीखेज बनाने के लिए इसने खास राजनीतिक दल का समर्थक होने, वोट देने का बहाना बनाकर अपने बहिष्कार की बात मीडिया के सामने रखी। बाराबंकी पुलिस के अनुसार मोहम्मद आरिफ का यह आरोप पूरी तरह से गलत है। पुलिस ने यह भी बताया कि बहिष्कार जैसी कोई भी बात आवेदक (मोहम्मद आरिफ) ने पुलिस को सूचित भी नहीं किया है।