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संसद के बगल वाली मस्जिद में अखिलेश यादव की पार्टी मीटिंग, इमाम है समाजवादी पार्टी का सांसद: भाजपा ने बताया ‘नमाजवादी’, मुस्लिम नेता बोला- ये हमारी भावनाओं से खिलवाड़

दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट में मौजूद एक मस्जिद में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने बैठक की। इसके बाद अखिलेश यादव की आलोचना हो रही है। उन पर राजनीतिक फायदे के लिए मस्जिद के इस्तेमाल के आरोप लग रहे हैं।

बीजेपी नेता और उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने कहा है कि समाजवादी पार्टी हमेशा संविधान का उल्लंघन करती है। हमारा संविधान किसी धार्मिक स्थल का राजनीतिक इस्तेमाल की इजाजत नहीं देता है। उन्होंने कहा, “अखिलेश यादव राजनीतिक मकसद साधने के लिए एक मस्जिद का इस्तेमाल किया है। वह एक समाजवादी नहीं बल्कि नमाजवादी हैं। ” उन्होंने कहा कि वह हमेशा नमाजवादी बने रहना चाहते हैं।

मस्जिद को राजनीतिक मंच बनाए जाने पर बीजेपी का कहना है कि इससे अल्पसंख्यकों की भावना भी आहत हुई हैं साथ ही सियासी मर्यादाएँ टूटी हैं। बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी ने कहा कि एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव और सांसद डिंपल यादव ने मस्जिद को राजनीतिक गतिविधि के लिए इस्तेमाल कर मुस्लिम समाज की भावनाओं से खिलवाड़ किया है।

उन्होंने डिंपल यादव के बैठने के तरीके की भी आलोचना की और इसे परंपरा के खिलाफ बताया। साथ ही मस्जिद के इमाम मोहिबुल्लाह नदवी को समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता करार दिया। जमाल सिद्दीकी ने अखिलेश यादव और डिंपल यादव पर बैठक को लेकर एफआईआर दर्ज करने की बात कही। उन्होंने एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी के अब तक चुप रहने पर भी सवाल खड़े किए।

उन्होंने कहा कि संसद मार्ग स्थित उसी मस्जिद में नमाज के बाद 25 जुलाई को बैठक करेंगे, जिसकी शुरुआत राष्ट्रीय गीत से समापन राष्ट्रीय गान से होगी। जमाल सिद्दीकी ने सोशल मीडिया पर अखिलेश यादव की बैठक का फोटो शेयर करते हुए ये बातें कही हैं।

दरअसल 22 जुलाई को अखिलेश यादव ने मस्जिद में समाजवादी पार्टी की बैठक बुलाई थी। राजनीति को धर्म को जोड़ने का जवाब तो अखिलेश यादव नहीं दे रहे हैं, बल्कि उल्टे बीजेपी पर ही धर्म को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगा रहे हैं।

बीजेपी पर आरोप लगाकर अखिलेश यादव अपने मुस्लिमपरस्त राजनीति को सही साबित करने की कोशिश करते रहे हैं।

‘सरकारी बंगला में जीवन भर नहीं रह सकते’: विधायकी जाने के बाद भी 2 साल तक बिहार के नेता ने जमाए रखा कब्जा, सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाते हुए जुर्माने को सही ठहराया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति हमेशा के लिए सरकारी बंगला पर कब्ज़ा करके नहीं रख सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ तय समयसीमा से ज्यादा रहने पर किराया वसूलने को भी सही ठहराया। यह टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक नेता की याचिका ख़ारिज करते हुए की।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (22 जुलाई 2025) को बिहार के पूर्व विधायक अवनीश कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई की। अवनीश कुमार सिंह ने सरकारी बंगले में रहने के ₹20 लाख वसूले जाने का विरोध किया था और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से राहत की माँग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट में CJI बी आर गवई, जस्टिस K विनोद चंद्रन और जस्टिस एन वी अंजारिया वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई की है। बेंच ने कहा कि विधायक पद से इस्तीफे के बाद अवनीश कुमार सिंह को अपना बंगला खाली कर देना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह का कब्जा न केवल अवैध है, बल्कि यह एक गलत परंपरा को बढ़ावा देता है।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी को भी तय समय से अधिक समय तक जबरन कब्जा करके सरकारी आवास में रहने की अनुमति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व विधायक को कोई भी राहत देने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी।

क्या था मामला?

यह मामला पूर्व विधायक अवनीश कुमार सिंह से संबंधित था। अवनीश कुमार सिंह को पटना स्थित बंगले में निर्धारित समय से दो वर्ष अधिक रहने पर ₹21 लाख रुपए भरने का आदेश दिया गया था। अवनीश कुमार सिंह ने अपने बचाव में यह तर्क दिया था कि उन्हें एक सरकारी पद पर नियुक्त किए जाने के कारण वे सरकारी आवास के हकदार थे।

अवनीश कुमार सिंह ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें 2009 में ‘राज्य विधानमंडल अनुसंधान और प्रशिक्षण ब्यूरो’ में नामित किया गया था, ऐसे में वह सरकारी बंगला पाने के हकदार थे। कोर्ट ने उनकी यह दलीलें अस्वीकार कर दी।

ढाका निर्वाचन क्षेत्र से पाँच बार विधायक रहे अवनीश कुमार सिंह ने मार्च 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा दिया था, लेकिन वह चुनाव हार गए थे। इसके बाद उन्हें ‘राज्य विधानमंडल अनुसंधान और प्रशिक्षण ब्यूरो’ में नामित किया गया। इसके बावजूद उन्होंने पटना के टेलर रोड स्थित सरकारी बंगले को मई 2016 तक नहीं खाली किया।

बंगले में दो साल अधिक समय तक रहने पर बिहार सरकार ने अवनीश कुमार सिंह से 21 लाख रुपये का किराया माँगा। उन्होंने इसके बाद हाई कोर्ट में याचिका लगाई। उनकी याचिका पटना हाईकोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दी कि 2009 की अधिसूचना उन्हें पुराने आवंटित बंगले में रहने का अधिकार नहीं देती।

हाईकोर्ट ने उन्हें यह राशि 6% वार्षिक ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया। अवनीश कुमार सिंह ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की लेकिन यहाँ भी उन्हें राहत नहीं मिली।

फारुक अहमद के गैंग ने ₹3 करोड़ का चुराया सोना, लेकिन ₹30 का पावभाजी खाना पड़ा महँगा: ऑनलाइन पेमेंट से कर्नाटक पुलिस ने खोज निकाला, 3 गिरफ्तार-2 फरार

कर्नाटक के कलबुर्गी में पुलिस ने 3 करोड़ रुपए के सोने की लूट का पर्दाफाश कर दिया है। मामले में तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस 30 रुपए की पावभाजी के ऑनलाइन पेमेंट से मामले की तह तक पहुँची।

जानकारी के अनुसार, पुलिस ने बताया कि 11 जुलाई 2025 को चार नकाबपोश चोरों ने मारथुला मलिक की सोने की दुकान में चोरी की थी। चोरों ने उनके हाथ-पैर बाँध दिए थे और फिर लॉकर खोलकर 3 किलो सोने के गहने और नकदी लेकर फरार हो गए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस लूट के मास्टरमाइंड फारुक ने डिजिटल वॉलेट के जरिए पावभाजी का पेमेंट किया था। इससे ही आरोपितों को गिरफ्तार करने में मदद मिली। पुलिस ने आरोपितों की खोज के लिए पाँच टीमें बनाई थी। सीसीटीवी की सहायता से पुलिस उस जगह पहुँची, जहाँ चोरी करने से पहले वे मिले थे।

चोरी करने से पहले फारूक ने 30 रुपये की पाव भाजी खरीदी थी। यहाँ उसने फोन पे से भुगतान किया था। वह दूर से ही साथियों की चोरी पर नजर रख रहा था। चोरी के बाद सभी फारूक के साथ भाग गए। सीसीटीवी मिलने के बाद पुलिस ने पावभाजी वाले के पास जाकर पेमेंट चेक की। जहाँ उन्हें फारुक का नंबर मिल गया।

हालाँकि सभी ने अपने मोबाइल फोन बंद कर दिए थे। इसके बाद पुलिस की टीम आरोपितों के गाँव पहुँची। पुलिस ने बताया कि आरोपित सोने के गहनों को पिघलाकर बेचने की कोशिश कर रहे थे। वे कुछ सोना बेच कर गाँव पहुँचे थे, इसी दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस कमिश्नर एस डी शरणप्पा ने जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस ने आरोपितों के पास से 2.865 किलो सोना और 4.80 लाख रुपए नकद बरामद किए हैं। आरोपितों की पहचान फारूक अहमद मलिक, अयोध्या प्रसाद चौहान और सोहेल शेख उर्फ बादशाह के रूप में हुई है। वहीं दो अन्य आरोपित अरबाज और साजिद की तलाश की जा रही है।

मुख्य आरोपित फारूक पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के दादपुर का रहने वाला है। पिछले कुछ सालों से कलबुर्गी में रहकर वह सुनार का काम कर रहा था। कर्नाटक आने से पहले वह दुबई में एक ज्वेलरी के शोरूम में काम करता था।

जो हिंदू लड़की इस्लाम नहीं कबूलती, उसका दिल्ली के शाहीनबाग में होता था रेप: दलित पीड़िता ने बयाँ की आगरा ‘मुस्लिम गैंग’ की बर्बरता, मुस्लिम बना जुनैद से करवा दिया था निकाह

आगरा मामले से जिस धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफ़ाश हुआ है, वह इस्लाम ना कबूलने पर लड़कियों का रेप करता था। यह गैंग दिल्ली में इन लड़कियों को कैद रखता था। धर्मांतरण करा चुकी लड़कियों को ‘सेफ जोन’ में रखा जाता था। यह सारी जानकारी एक पीड़िता ने ही दी है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस गैंग के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी के चंगुल से हरियाणा की एक लड़की आजाद करवाई गई है। उस लड़की को दिल्ली के शाहीन बाग़ के हॉस्टल में कैद करके अब्दुल रहमान ने रखा था। बाद में अब्दुल लड़की को अपने घर ले गया, जहाँ उसका धर्मांतरण करवा दिया।

अप्रैल 2025 में लड़की का धर्मांतरण गिरोह के सदस्य जुनैद से निकाह कराया गया। अब लड़की को कोलकाता भेजने की तैयारी थी। हरियाणा की लड़की अब पुलिस के पास सुरक्षित है। लड़की ने पुलिस को धर्मांतरण गिरोह से संबंधित अहम जानकारियाँ दी है।

लड़की ने जुनैद के बारे में भी बताया, जो धर्मांतरण गिरोह का सदस्य है। वह वर्तमान में पुलिस से बचने को भागा हुआ है। पुलिस उसे पकड़ने की कोशिश में लगी हुई है।

धर्मांतरण करवा बना दिया था ‘शिफा’

हरियाणा की लड़की ने बताया कि 2019 में फेसबुक पर जुनैद से उसकी दोस्ती हुई थी। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ने लगी और वह घर की परेशानियाँ भी साझा करने लगी। लड़की के पिता फैक्ट्री में काम करते हैं और काफी मुश्किलों से घर का खर्चा चलाते हैं। लड़की की आर्थिक स्थिति का फायदा जुनैद ने आसानी से उठा लिया।

जब 25 नवबंर 2024 को लड़की की शादी तय हुई, तभी जुनैद ने लड़की को बरगलाना शुरू कर दिया। कहने लगा कि शादी करके लड़की की जिंदगी खराब हो जाएगी। जुनैद ने लड़की से कहा, “अल्लाह के लिए तुम सब छोड़कर मेरे पास आ जाओ।” जुनैद की बातों में आकर लड़की ने शादी से 12 दिन पहले अपना घर छोड़ दिया और दिल्ली आ गई।

जुनैद ने ही हरियाणा की लड़की को शाहीन बाग के एक हॉस्टल में ठहराया था। लड़की ने बताया कि वहाँ एक मौलाना आता था और इस्लाम के बारे में ब्रेनवॉश करता था। साथ ही हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काता था। इस दौरान इस्लाम से प्रभावित होने के लिए कुछ वीडियो भी दिखाए गए।

लड़की ने पुलिस को बताया कि धर्मांतरण अब्दुल रहमान के घर पर हुआ था। लड़की का नाम इसके बाद शिफा रख दिया गया। रहमान ही लड़की का सारा खर्चा उठाता था। रहमान ने ही जुनैद से लड़की का निकाह कराया। फिर निकाह के बाद दोनों को दूर रहने सलाह दी। रहमान कहता था कि जुनैद के पास अभी बड़ी जिम्मेदारी है।

कुछ समय बाद लड़की को पता लगा कि जुनैद तो शादीशुदा है। रहमान ने ही लड़की को यह बात बताई थी। रहमान कहता था कि उनके मजहब में सब जायज़ है। कहता कि प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं होता है।

लड़की वापस परिवार के पास जाएगी

पुलिस की पूछताछ के बाद अब हरियाणा की लड़की को वापस परिजन को सौंपा जाएगा। वह 12 नवंबर 2024 से घर से लापता थी। परिजन ने हरियाणा के सांपला थाने में गुमशुदगी का दर्ज करवाया था। पुलिस तब से ही तलाश में जुटी हुई थी।

वहीं, गैंग के सरगना अब्दुल रहमान को 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया है। इससे पहले पुलिस की टीम उसे आगरा ले गई थी, जहाँ मामले से जुड़ी कई जानकारियाँ दी।

जानें पूरा मामला

हाल ही में आगरा में धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया।

जाँच में 7 लोगों के खिलाफ सबूत मिले। उनके खिलाफ वारंट जारी हुए। फिर पुलिस ने 11 टीमें छह राज्यों में भेजीं। आगरा पुलिस ने यूपी, गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान में छापे मारे। आखिर में कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से बहनों को रेस्क्यू किया गया। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

21 जुलाई 2025 को पुलिस ने गैंग के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली के मुस्तफाबाद से गिरफ्तार किया। पुलिस को उसके घर से ब्रेनवॉश संबंधित कई किताबें भी मिली। उसके चंगुल से हरियाणा की लड़की को भी छुड़ाया गया, जिसका अब्दुल ने जबरन धर्मांतरण करा दिया था।

काँवड़ रूट में खाने-पीने की दुकानों पर दिखाना ही पड़ेगा लाइसेंस-रजिस्ट्रेशन, सुप्रीम कोर्ट ने ग्राहक को बताया ‘राजा’: वामपंथियों की ‘मुस्लिम विक्टिम’ याचिका पर फुल स्टॉप

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और उत्तराखंड सरकार के रेस्टोरेंट में क्यूआर कोड दिखाने और उसको स्कैन करवाने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि काँवड़ यात्रा पूरी होने वाली है इसलिए अभी इसकी वैधता पर विचार नहीं किया जाएगा।

टॉप कोर्ट ने कहा है कि रेस्टोरेंट में नॉन वेज पहले बनता था या नहीं ये जानने का अधिकार भी ग्राहकों को है

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने रेस्टोरेंट के क्यूआर कोड लगाने के यूपी सरकार के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने होटल और रेस्टोरेंट को औदेश दिया है कि नियम के मुताबिक अपना नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर दिखाने के आदेश का पालन करें। कोर्ट ने कहा कि ग्राहकों को ये जानने का अधिकार है कि रेस्टोरेंट सिर्फ वेज खाना परोसता है या वेज- नॉन वेज दोनों परोसता है।

अगर रेस्टोरेंट में पहले नॉन वेज परोसा जाता था तो ये जानकारी भी ग्राहकों को दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ये ग्राहकों के पसंद का सवाल है।

यूपी सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “इस देश में ऐसे लोग हैं जो अपने भाई के घर में मांसाहारी खाना बनने पर खाना नहीं खाते। भक्तों की भावनाएँ भी जुड़ी हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रेस्टोरेंट में पूरे साल शाकाहारी खाना परोसा जाता है और वहाँ नॉन वेज भी बेचा जाने लगा है तो ग्राहक को ये जानकारी होना चाहिए क्योंकि ग्राहक राजा होता है। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग लहसुन-प्याज भी नहीं खाते हैं और कुछ वेजिटेरियन रेस्टोरेंट में खाना भी खाना पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में ग्राहकों की पसंद का ख्याल रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि लाइसेंस से ये पता होता है कि ये वेज रेस्टोरेंट है या नॉन वेज रेस्टोरेंट है या दोनों। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि दुकानदार कौन है? बल्कि ग्राहक को ये पता होना चाहिए कि यहाँ क्या-क्या बनता है।

दरअसल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकार ने काँवड़ यात्रा को देखते हुए यात्रा मार्ग पर लगे रेस्टोरेंट और खाने-पीने के सभी दुकानों पर नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर लिखना तय कर दिया है। दुकान पर क्यूआर कोड लगाने और स्कैन की सुविधा भी अनिवार्य किया गया था।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के आदेश को वामपंथी प्रोफेसर अपूर्वानंद झा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और हुजैफा अहमदी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील हैं।

‘ब्रिटेन नरक बन गया है, यह मुझे नॉर्वे की याद दिला रहा है’: जानिए क्यों ₹2900 करोड़ का घर बेचकर देश छोड़ रहे अरबपति जॉन फ्रेडरिकसन, 300 साल पुराना है ‘द ओल्ड रेक्टोरी’

जॉन फ्रेडरिकसन ने लंदन स्थित अपना आलीशान घर ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ बेचने का फैसला किया है। वे ब्रिटेन के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक हैं। उनका कहना है कि ब्रिटेन अब ‘नरक’ बन गया है। उनके घर की कीमत लगभग 2900 करोड़ रुपए बताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार, जॉन फ्रेडरिक्स का 300 साल पुराना घर ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ ब्रिटेन के सबसे महँगे घरों में से एक माना जाता है। फ्रेडरिकसन जहाजों के एक बड़े कारोबारी और ब्रिटेन के नौवें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। वह ब्रिटेन को नरक बताकर अब दुबई चले गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ घर की कीमत लगभग 33.7 करोड़ डॉलर (करीब 2900 करोड़ रुपए) है। यह घर 30,000 वर्ग फीट में बना हुआ है। इसमें कुल 10 बेडरूम हैं। इसके अंदर बड़ा बगीचा भी है, जो करीब दो एकड़ में बना हुआ है।

यह बकिंघम पैलेस के बाद ब्रिटेन का तीसरा सबसे बड़ा निजी घर है। 81 साल के फ्रेडरिकसन ने 2001 में यह प्रॉपर्टी खरीदी थी। तब से वह यही रहते थे। हालाँकि अब उन्होंने घर को बेचने की घोषणा करते हुए यूएई में शिफ्ट होने का फैसला किया है।

फ्रेडरिकसन ने कहा, “ब्रिटेन नरक बन गया है। यह मुझे नॉर्वे की याद दिला रहा है। मैं नॉर्वे से जितना हो सके, बचने की कोशिश करता हूँ।” बता दें कि फ्रेडरिकसन का जन्म नार्वे में हुआ था। इससे पहले फ्रेडरिक्सन ने इस साल की शुरुआत में अपनी शिपिंग फर्म, सीटैंकर्स मैनेजमेंट का लंदन स्थित मुख्यालय भी बंद कर दिया था।

Henley & Partners की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में करीब 16,500 करोड़पति यूके छोड़ने वाले हैं। यह संख्या किसी भी अन्य अमीर देश की तुलना में काफी ज्यादा है। यूके भले ही अभी भी दुनिया में पाँचवाँ सबसे बड़ा करोड़पतियों का गढ़ है, लेकिन बीते दस सालों में ये टॉप 10 अमीर देशों में अकेला ऐसा देश है जहाँ अमीर लोगों की संख्या घट रही है।

इसका बड़ा कारण है टैक्स नीतियों में हुए हालिया बदलाव, जिसके तहत अब अपनी संपत्ति पर ज्यादा टैक्स देना होगा। इसके तहत प्राइवेट स्कूल की फीस पर 15% VAT भी लगने वाला है। इन सब कारणों से यूके के कई करोड़पति अब दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं, क्योंकि ब्रिटेन की अपेक्षा किसी अन्य देश में उन्हें टैक्स का बोझ कम और फायदे ज्यादा नजर आ रहे हैं।

आयरलैंड में झूठे आरोप लगा किया नंगा, पीट-पीटकर कर दिया लहूलुहान… ‘नस्ली हमले’ को ‘असॉल्ट’ बता रहा था आयरिश मीडिया, भारतीय राजदूत ने लताड़ा

आयरलैंड में एक भारतीय नागरिक को जम कर पीटा गया है और उसके कपड़े फाड़े गए, पतलून उतरवा लिए गए। घटना को आयरिश पुलिस और नेताओं ने भी नस्ली हिंसा करार दिया है। इसके बावजूद आरटीई न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थान ने इस पर पर्दा डालने की कोशिश की।

भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने घटना के साथ साथ मीडिया के रवैये को भी आलोचना की है। उन्होंने ट्वीट किया है कि एक ‘कथित’ हमले से इतनी भयानक चोट और खून कैसे निकल सकता है? आरटीई न्यूज़ की असंवेदनशीलता और अस्पष्टता देखकर स्तब्ध हूँ।

आयरलैंड में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा का ट्वीट

द आयरिश टाइम्स के मुताबिक हमलावरों ने उसके कपड़े फाड दिए और जम कर पीटा। आसपास के लोगों ने जब तक उसे बचाया, उसके नाम, हाथ और पैरों से खून निकल रहा था। उसे टैलाघ्ट यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। भारतीय नागरिक को 20 जुलाई को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।

पीड़ित पर बच्चों के नजदीक जाकर गलत व्यवहार करने का आरोप लगाया गया था। पीड़ित पर झूठा आरोप आप्रवासी-विरोधी ऑनलाइन अकाउंट से लगाया गया है।अधिकारी इस घटना को नस्लीय हेट क्राइम के रूप में देख रहे हैं।

एक प्रत्यक्षदर्शी महिला के मुताबिक नस्लवादी गिरोह ने पीड़ित के बैंक कार्ड, फोन, जूते और पतलून चुरा लिए।

उसने कहा, “मैं अपनी सास के पास जा रही थी, तभी मैंने देखा कि एक महिला समेत 13 किशोर उस व्यक्ति को घेर रहे थे। मैंने देखा कि वह व्यक्ति सिर से पैर तक खून से लथपथ था। वह काफी सदमे में था। “

उसने बताया, “उसकी पतलून नीचे खींची गई थी। उसे मारा गया था।”

महिला ने दावा किया, “पिछले चार दिनों में इन युवकों ने चार भारतीयों के चेहरे पर चाकू मारा है। आप में से कितने लोगों को यह बात पता है?”

बिजनेस वीजा पर 3 हफ्तों के लिए गया था शख्स

वहीं टैलाघ्ट साउथ के पार्षद बेबी पेरेप्पाडन ने घटना पर अफसोस जताया है। उन्होंने पीड़ित से अस्पताल में मुलाकात की। पीड़ित फिलहाल गहरे सदमे में हैं और किसी से बात नहीं कर रहा। वह 3 हफ्तों के लिए बिजनेस वीजा पर आया था। यहाँ तक कि डर और सदमे की वजह से किसी से मिलना भी नहीं चाहता है। पार्षद के मुताबिक टेलाघ्ट में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस बल बढ़ाया जाना चाहिए।

पार्षद के मुताबिक लोगों को ये समझना पड़ेगा कि आयरलैंड आने वाले भारतीय वर्क परमिट पर आए हैं और अवैध घुसपैठिए नहीं हैं। आयरलैंड के हेल्थ सेक्टर और आईटी सेक्टर में बड़ी संख्या में भारतीय हैं, साथ ही ये लोग पढ़ाई करने भी यहाँ आते हैं।

आयरलैंड के मंत्री ने नस्लीय हमले की आलोचना की

विदेशी नागरिकों पर झूठे आरोप लगाकर किये जा रहे नस्लीय हमलों पर कानून मंत्री जिम ओ कैलाघन ने अफसोस जताया है। उनका कहना है कि स्थानीय लोग देश में बढ़ रहे क्राइम के लिए आप्रवासियों को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन जेलों में जब अपराधियों की संख्या देखी जाए, तो आप्रवासियों की आबादी की तुलना में अपराध में लिप्त आप्रवासी काफी कम हैं इसलिए इनपर आरोप लगाना गलत है।

आयरलैंड की प्रमुख पार्टी सिन फेन टीडी ने भारत के नागरिक पर हुए हमले को ‘हिंसक और नस्लवादी’ करार दिया है। पार्टी का कहना है कि ऐसे हमले पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और नफरती हमले से लोगों में डर का माहौल है। चाहे वे आयरलैंड के लोग हों या आप्रवासी।

‘हिंदू कोई धर्म नहीं, जो ईसाई नहीं बने उन्हें तब तक मारो जब तक खून न निकल जाए’: जहर उगलने वाले पादरी के नाम पर DMK सरकार ने कर दी तमिलनाडु की सड़क, भारत को बताता था ‘ईसाई मुल्क’

चेन्नई के किलपौक इलाके की वाडेल्स रोड का नाम ‘आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड’ रखा गया है। यह नाम तमिलनाडु सरकार द्वारा दिवंगत ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम के सम्मान में रखा गया है।

इसका औपचारिक उद्घाटन एक समारोह में किया गया, जिसमें डीएमके मंत्री के एन नेहरू, हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्ट (HR&CE) मंत्री शेखरबाबू, चेन्नई मेयर आर प्रिया और डीएमके विधायक इनिगो इरुधयराज मौजूद थे।

नाम बदलने के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर डीएमके सरकार की काफी आलोचना हो रही है। कई लोगों ने एज्रा सरगुनम के हिंदू विरोधी बयानों को लेकर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि एज्रा ने हमेशा हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी की।

तमिलनाडु में बीजेपी के राज्य अध्यक्ष और विधायक नैनार नागेंद्रन ने DMK के इस फैसले पर आक्रोश जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने एज्रा के वीडियो के क्लिप लगाए हैं। इनमें साफ तौर पर एज्रा को हिंदू धर्म के प्रति नफरत फैलाते और लोगों को भड़काते हुए सुना जा सकता है।

नैनार नागेंद्रन ने अपनी पोस्ट में लिखा, “ये शर्म की बात है कि DMK ने चेन्नई के वाडेल्स रोड का नाम उस एज्रा सरगुनम के नाम पर रखा है जो हिंदुओं के प्रति नफरत फैलाता था। मेरी पोस्ट में लगी वीडियो इस बात का प्रमाण है कि उसके मन में हिंदुओं के लिए कितना जहर था। उसने खुले तौर पर हिंदुओं के साथ हिंसा करने के लिए लोगों को उकसाया।”

नैनार नागेंद्रन ने आगे लिखा, “क्या डीएमके के पास अब अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण की राजनीति की कोई सीमा नहीं रह गई है? तमिलनाडु के लोग इसे देख रहे हैं। मैं तमिलनाडु सरकार से गुजारिश करता हूँ कि वाडेल्स रोड का नाम एज्रा सरगुनम के नाम से बदलने के फैसले को निरस्त किया जाए।”

नैनार नागेंद्रन ने जिस वीडियो को अपने पोस्ट में लगाया है उसमें एज्रा को कहते हुए सुना जा सकता है जो लोग आज हिंदू कहे जा रहे हैं, इतिहास में उनका कोई नाम ही नहीं रहेगा। हिंदू धर्म पूरी तरह से एक कृत्रिम धर्म है। इस तरह का कोई धर्म होता ही नहीं है। कोई बोले कि वो हिंदू है तो उसे बोलो कि वो लोगों को धर्म के नाम पर धोखा दे रहा है। अगर कोई हिंदू ईसाई धर्म को स्वीकार न करे, तो उसको दो बार मारो। तबत मारो जब तक उसका खून न निकल आए। भगवान माफ कर देगा। “

इसके अलावा वीडियो में एज्रा को ये भी कहते सुना जा सकता है, “ये एक क्रिश्चियन देश है। 200 साल पहले इस देश में हिंदू नाम का कोई धर्म ही नहीं था। मुझे नहीं पता कि मुस्लिम कैसे इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। हो सकता है उन्हें ये अब तक समझ न आया हो या उनके लिए अभी समय नहीं है।”

कौन था एज्रा सरगुनम?

ईसाई प्रचारक और ईवेंजेलिकल चर्च ऑफ इंडिया (ECI) के पूर्व प्रमुख एज्रा सरगुनम का कुछ दिनों पहले ही 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह एक कट्टर ईसाई प्रचारक और डीएमके का करीबी माने जाते था। उसके नेतृत्व में चर्च स्थापना का एक बड़ा मिशन चलाया गया था, जिसके तहत 2005 तक देशभर में दो हजार से अधिक चर्च बनाए गए थे। ECI ने उसके समय में 2056 तक भारत में एक लाख चर्च स्थापित करने का लक्ष्य रखा था।

उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भड़काऊ बयानों और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का खुला आह्वान भी किया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने धर्म का पालन करते हैं। डीएमके नेताओं की मौजूदगी सार्वजनिक मंचों पर अक्सर न केवल हिंदू धर्म के अस्तित्व को नकारा, बल्कि असहमत लोगों के खिलाफ हिंसा भड़काने तक की बात कही। उसका कहना था कि हिंदू धर्म केवल राजनीतिक फायदे के लिए बनाया गया है।

साल 2018 के एक भाषण में एज्रा सरगुनम ने कट्टर इस्लामी संगठन SDPI को खुलकर हिंदुओं के खिलाफ खड़े होने के लिए उकसाया था। सरगुनम का ये बयान उस समय आया था, जब जबरन धर्मांतरण का विरोध करने वाले पीएमके कार्यकर्ता रामलिंगम की हत्या हुई थी।

वह अपने समर्थकों को निर्देश देता था कि अगर कोई हिंदू धर्म को असली धर्म मानता है तो उसे चुप कराना आवश्यक है और इसके लिए हिंसा करना भी गलत नहीं माना जाएगा। सरगुनम जानबूझकर सामाजिक और सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए ऐसे बयान देता था।

सरगुनम ने सिर्फ हिंदुओं पर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी अपमानजनक शब्द कहे थे। अपने एक भाषण में उसने न सिर्फ पीएम मोदी के चरित्र पर सवाल उठाए थे बल्कि उनके निजी जीवन का भी मजाक उड़ाया था।

अपने भाषण में सरगुनम ने कहा था मोदी न तो भगवान से डरते हैं और न ही जनता से। उसने कहा था कि मोदी ने कभी पारिवारिक जीवन की मुश्किलें नहीं झेली हैं, इसलिए वो प्रधानमंत्री बनकर शासक करने के योग्य नहीं हैं।

एज्रा सरगुनम का उद्देश्य किसी भी तरीके से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना था। एक इंटरव्यू में उसने कहा था उसने हरिद्वार में हुए कुंभ मेले जैसे पवित्र हिंदू आयोजन में हिंदू तीर्थयात्रियों को ईसाई साहित्य बाँटा था। उसने बताया कि इस वजह से उसे वहाँ से भगाया गया था। उसने इसे हिंदुओं के खिलाफ अपने मिशन को और मजबूत करने का कारण बताया।

क्या है नेशनल स्पोर्ट्स बिल जो ला रही है मोदी सरकार, क्या क्रिकेट को हाँकने वाली BCCI भी होगी इसका हिस्सा: 25 वर्षों बाद खेल संघों में आएँगे बड़े बदलाव, महिलाओं की बढ़ेगी भागीदारी

मानसून सत्र के दौरान बुधवार (23 जुलाई 2025) को संसद में ‘नेशनल स्पोर्ट्स बिल-2025’ पेश किया जा रहा है। इस बिल के तहत बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया यानी बीसीसीआई भी विधेयक का हिस्सा बन जाएगा। वर्तमान में बीसीसीआई भले ही सरकार के आर्थिक मदद पर निर्भर न हो लेकिन इस बिल में शामिल होने के बाद उसे राष्ट्रीय खेल बोर्ड से मान्यता लेनी पड़ेगी।

युवा मामलों और खेल मंत्रालय की ओर से मंगलवार (22 जुलाई 2025) को ड्राफ्ट स्पोर्ट्स बिल पेश किया जा चुका है। इस बिल का उद्देश्य भारत में विभिन्न खेलों की व्यवस्था को बेहतर स्तर पर लेकर आना है। विश्लेषकों का मानना है कि इसके बाद भारतीय खेलों की दुनिया हमेशा के लिए बदल जाएगी।

खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने इससे पहले भी दो बार कैबिनेट और एक बार संसद में इस बिल को लाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। ड्राफ्ट पेश करने के दौरान खेल और युवा मामलों की राज्य मंत्री रक्षा खड़से ने इस बिल को लेकर कहा, “लगभग 25 वर्षों के बाद भारत में खेल को लेकर नई नीति आ रही है। इसे ‘खेलो भारत नीति’ के नाम से जाना जाएगा। इसमें काफी अच्छी सुविधाओं के साथ अच्छी नीतियाँ शामिल की गई हैं।”

रक्षा ने कहा, “इसमें कई अच्छी नीतियाँ हैं जो स्पोर्ट्स सेक्टर और भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देंगे। साथ ही 2036 के ओलंपिक खेलों में भारत के विजन और खेल को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे। हर राज्य, हर प्राइवेट सेक्टर को साथ में लेकर खेल को आगे पहुँचाने का हम प्रयास कर रहे हैं।”

क्यों आ रहा नया बिल

नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल-2025 का उद्देश्य भारत में खेल प्रशासन को पारदर्शी जवाबदेही और खिलाड़ियों पर केंद्रित रखना है। इसके तहत राष्ट्रीय खेल महासंघ को एक राष्ट्रीय खेल बोर्ड के अधीन लाया जाएगा ताकि खेल संघ में समय पर चुनाव हो सकें। उनकी प्रशासनिक जवाबदेही बन सके और वित्तीय पारदर्शिता को भी सुनिश्चित किया जा सके।

इस बिल के तहत खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए खेल ट्रिब्यूनल की स्थापना भी की जाएगी। इस लिहाज से बीसीसीआई को भी अन्य खेल संघो की तरह पारदर्शिता और एक बेहतर खेल संघ के सिद्धांतों का पालन करना होगा

क्या-क्या खासियतें हैं शामिल

राष्ट्रीय खेल बोर्ड या नेशनल स्पोर्ट्स बोर्ड (NSB) के बनने पर उसके अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को केंद्र सरकार की ओर से नियुक्ति दी जाएगी। उसकी चयन समिति में कैबिनेट सचिव या खेल सचिव के साथ भारतीय खेल प्राधिकरण के महानिदेशक, अर्जुन या खेल रत्न पुरस्कार विजेता एक खिलाड़ी और दो अनुभवी खेल प्रशासक शामिल होंगे।

इस नए बिल में प्रशासकों की आयु सीमा को भी 70 वर्ष से 75 वर्ष तक बढ़ा दिया गया है यानी 75 वर्ष की आयु के लोग भी चुनाव लड़ सकते हैं। हालाँकि इसमें अंतरराष्ट्रीय संघ के कानून को प्राथमिकता मिलेगी।

इसी के साथ ही खेल ट्रिब्यूनल स्थापित किया जाएगा जिसका मुख्य उद्देश्य खेल संघ और खिलाड़ियों के बीच हो रहे विवाद या किसी तरह के प्रशासनिक मामलों में निर्णय लेना होगा। साथ ही चुनावी अनियमिताओं पर भी ट्रिब्यूनल नजर रखेगा। ‌

बीसीसीआई पर कैसे पड़ेगा इस बिल का असर

बीसीसीआई के इस बिल में शामिल होने के बाद उसे सूचना के अधिकार (RTI) के तहत लाया जाएगा। इसके जरिए एक आम इंसान भी बीसीसीआई के फैसले के साथ आर्थिक लेनदेनसमेत अन्य जानकारियों के बारे में पूछताछ कर सकता है।

बिल के तहत बनने वाले खेल बोर्ड में इस बात की सुनिश्चितता तय की जाएगी कि बीसीसीआई में भी चुनाव समय पर हों और उसके संचालन में कोई गड़बड़ी न हो। इसके अलावा क्रिकेटरों के चयन के साथ अनुशासनात्मक मामलों में भी बीसीसीआई को खेल ट्रिब्यूनल के निर्णय मानने पड़ेंगे। एक तरह से कहा जाए तो इस बिल में शामिल होने के बाद बीसीसीआई की बादशाहत कम हो जाएगी।

अगर यह बिल कानून बनता है तो भारतीय खेल जगत में यह एक ऐतिहासिक बदलाव होगा जिसमें खिलाड़ियों की भलाई, पारदर्शिता और उनके साथ हुए किसी भी तरह के अन्याय के लिए खेल संघों की जवाबदेही सबसे पहली प्राथमिकता होगी।

असल में क्रिकेट के T20 सीरीज को 2018 में लॉस एंजेलिस में होने वाले ओलंपिक खेलों में भी शामिल किया गया है। इस लिहाज से बीसीसीआई को गवर्नेंस बिल में शामिल करना एक बेहतर निर्णय भी हो सकता है।

इस बिल के आने से पहले खेल मंत्री मनसुख मांडवीया ने कहा था कि इस बिल का मसौदा तैयार करते समय अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से भी परामर्श किया गया है। इससे 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी में भारत की बोली के लिए IOC के साथ बेहतर संबंध स्गेथापित किए जा सकेंगे।

हालांकि इस बिल का मसौदा तैयार करने के दौरान आईओए ने इस खेल बोर्ड का विरोध किया था और इसे सरकारी हस्तक्षेप कहा था। आईओए का कहना है कि इसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की ओर से प्रतिबंध लग सकते हैं।

महिलाओं की बढ़ेगी भागीदारी

इस बिल के कानून बनने के बाद कई नए और बेहतर बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अगर ये कानून बन जाता है तो इसका एक असर खेल में महिलाओं की भागीदारी के तौर पर भी नजर आएगा। इसके तहत बीसीसीआई समेत अन्य खेल संघों की गवर्निंग बॉडी में महिलाओं की भागीदारी अधिक होगी।

राष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी (IOC) महिला और पुरुष के बराबर भागीदारी को लेकर काम करता है तो इस लिहाज से नए बिल के लागू होने पर खेल संघ में महिला प्रशासकों की संख्या बढ़ने वाली है।

इसके अलावा राष्ट्रीय खेल बोर्ड की नियुक्ति पर भी सीधे असर पड़ेगा। वर्तमान में यह एक तरीके का नियंत्रित मेकैनिज्म नजर आता है। नए स्पोर्ट्स बिल में खेल बोर्ड की नियुक्ति पूरी तरह से केंद्र सरकार की ओर से की जाएगी। खेल बोर्ड के पास विभिन्न खेल संघों की मान्यता देने और छीनने का भी अधिकार होगा।

असल में राष्ट्रीय खेल बोर्ड वित्तीय अनियमितताओं के साथ चुनाव में हो रही गड़बड़ियों समेत खेल संघ के हर छोटे बड़े मामलों में दखल देने और फैसले लेने के अधिकार रखेगा। उसके तहत एक अध्यक्ष होगा और उसकी में सदस्यों की नियुक्ति केंद्र से की जाएगी।

‘रिश्तों के भी रूप बदलते हैं…’ सत्ता में इंडिया आउट’ का नारा लगाकर आए मोहम्मद मुइज्जू, पर बेपटरी हुई मालदीव की इकोनॉमी तो भारत ने ही दी ‘संजीवनी बूटी’: जानिए PM मोदी की यात्रा के मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय मालदीव दौरे पर जा रहे हैं। ये दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद पहली बार पीएम मोदी मालदीव जा रहे हैं। हालाँकि ये उनकी तीसरी मालदीव यात्रा है।

इससे पहले पीएम मोदी दो दिनों तक 23 जुलाई और 24 जुलाई को यूके के दौरे पर होंगे। यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के आमंत्रण पर पीएम मोदी वहाँ जा रहे हैं। इस दौरान भारत-यूके के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी जिसमें व्यापार, शिक्षा, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन जैसे विषय शामिल हैं। यूके के किंग चार्ल्स तृतीय ने भी पीएम मोदी को आमंत्रित किया है।

लेकिन इस दौरे के दौरान दुनिया की नजर 25 जुलाई और 26 जुलाई पर होगी, जब पीएम मोदी मालदीव के दौरे पर होंगे क्योंकि हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।

एक साल के तनाव के बाद यात्रा

पीएम मोदी की आधिकारिक मालदीव यात्रा रणनीतिक तौर पर भी काफी अहम है। उन्हें 26 जुलाई, 2025 को मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘मुख्य अतिथि’ के तौर पर आमंत्रित किया गया है।

मुइज्जू ने नवंबर 2023 में चुनाव जीतकर मालदीव की सत्ता संभाली। उनके ‘इंडिया आउट’ नीति की वजह से दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई। यहाँ तक कि भारतीय सैनिक जो मालदीव में थे, उन्हें बाहर निकालने के लिए भारत पर दबाव बनाया गया।

लक्षद्वीप को पर्यटन केंद्र के रूप में प्रमोट करने को लेकर भी भारत और मालदीव के बीच तनातनी देखने को मिली। तब प्रधानमंत्री मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के कारण मालदीव के दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। पीएम मोदी पर की गई टिप्पणी भारतीयों को नागवार गुजरी और सोशल मीडिया पर ‘मालदीव बहिष्कार’ अभियान शुरू हुआ। इसका असर मालदीव की अर्थव्यवस्था पर देखा गया क्योंकि भारतीय पर्यटकों का मालदीव के राजस्व में अहम योगदान है।

दोनों देशों ने तनाव कम करने की कोशिश भी की। भारत ने विमान संचालन के मैनेजमेंट के लिए अपने सैन्य कर्मियों की जगह आम इंजीनियरों को नियुक्त करने की पेशकश की। नई दिल्ली ने मुद्रा विनिमय सुविधा (currency swap facility) भी दी। बजट 2025 में मालदीव को दी जाने वाली वित्तीय सहायता ₹600 करोड़ कर दिए गए जो 2024-25 में दिए गए ₹470 करोड़ से ₹130 करोड़ ज्यादा है।

मुइज्जू कर रहे संबंधों को सुधारने की कोशिश

मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू अब भारत के साथ संबंधों को सुधारने के लिए आगे बढ़े हैं। मुइज्जू के सितंबर 2024 में आधिकारिक यात्रा से पहले दोनों भारत विरोधी टिप्पणी करने वाले दोनों मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। हालाँकि आधिकारिक तौर पर इस्तीफे की वजह ‘व्यक्तिगत कारण’ बताया गया। लेकिन इस्तीफे की टाइमिंग ऐसी थी कि लोग चौंक गए।

9 जून 2024 को मुइज्जू भारत के दौरे पर आए। तब मालदीव में रूपे कार्ड लॉन्च किए गए थे। पिछले कुछ वर्षों में मालदीव को चीन के करीबी के रूप में देखा गया। लेकिन अब मालदीव ये महसूस करने लगा है कि भारत को नजरअंदाज कर वह आगे नहीं बढ़ सकता है।

भारत और मालदीव अपने राजनयिक संबंधों के 60 वर्ष पूरे कर रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक नई शुरुआत का प्रतीक बन गई है।

चीन की दखलंदाजी से भारत की कूटनीति तक

सत्ता संभालने के बाद मुइज्जू का झुकाव चीन की तरफ देखा गया। उनकी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा जनवरी 2024 में चीन की ही थी। उन्होंने बीजिंग के साथ 20 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें सैन्य और वित्तीय सहयोग से जुड़ा समझौता शामिल था। मुइज्जू से पहले मालदीव के राष्ट्रपति का पहला दौरा भारत का हुआ करता था। मुइज्जू ने इस परंपरा को तोड़ा था।

चीन के महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत मालदीव के साथ संबंध सुधारना शुरू किया। 2014 में BRI में शामिल होने के बाद से मालदीव ने चीनी बैंकों से लगभग 1.4 बिलियन डॉलर लिए हैं, जो उसके कुल सार्वजनिक ऋण का लगभग 20% है।

भारत ने मालदीव की अर्थव्यवस्था को बचाया

मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर अत्यधिक निर्भर है और उस पर विदेशी कर्ज का बोझ भी भारी है। विदेशी मुद्रा भंडार गंभीर रूप से कम हो गया था और क्रेडिट डाउनग्रेड (ऋण रेटिंग में गिरावट) की आशंका भी गहरा गई थी।

हालाँकि भारत के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने मई 2024 में मालदीव सरकार द्वारा जारी ट्रेज़री बिलों में 50 मिलियन डॉलर का निवेश किया। लेकिन संकट टला नहीं था। जब यह निवेश सितंबर 2024 में परिपक्व होने वाला था, तब मालदीव सरकार के अनुरोध पर इस निवेश को पुनः बढ़ाया गया। मालदीव ने इस सहायता के लिए भारत का आभार व्यक्त किया और इसे आर्थिक स्थिरता और वित्तीय सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और महासागर विजन

मालदीव भारत का एक प्रमुख समुद्री सहयोगी है। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए भारत द्वारा दिए गए विशेष कोटा के साथ-साथ ट्रेज़री बिल में निवेश और उसके बाद की मुद्रा अदला-बदली (Currency Swap) यह दर्शाते हैं कि भारत मालदीव के नागरिकों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है।

मालदीव की विदेशी मुद्रा भंडार अगस्त 2024 तक घटकर 443.9 मिलियन डॉलर रह गया था, जो पिछले वर्ष इसी समय 694.2 मिलियन डॉलर था। लेकिन RBI की स्वैप सहायता के चलते मई 2025 में यह बढ़कर 816 मिलियन डॉलर हो गया — जिसका प्रमुख श्रेय भारत द्वारा दी गई $400 मिलियन की राशि को जाता है।

भारत ने क्रेडिट रेटिंग गिरने से बचाया

अगस्त 2024 में फिटेक ने मालदीव के बॉन्ड्स की रेटिंग CCC+ से घटाकर CC कर दी थी और चेतावनी दी थी कि देश डिफॉल्ट के खतरे में है। सितंबर में मूडीज ने भी मालदीव की रेटिंग Caa1 से घटाकर Caa2 कर दी। यदि भारत का हस्तक्षेप न होता, तो ये रेटिंग और गिर सकती थीं।

RBI के स्वैप समझौते और उसके प्रभाव ने इन एजेंसियों को यह संदेश दिया कि मालदीव को भारत का वित्तीय समर्थन हासिल है। इससे मालदीव के लिए अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेना महँगा नहीं हुआ और उसकी संप्रभुता और साख बची रही।

मालदीव हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्थिति में स्थित है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका निभा रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत का यह वित्तीय हस्तक्षेप न केवल आर्थिक सहारा था, बल्कि रणनीतिक जवाब भी था।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने फरवरी 2025 में हिन्द महासागर सम्मेलन में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे भारत ने श्रीलंका को 4 अरब डॉलर की सहायता देकर वहाँ की अर्थव्यवस्था को भी स्थिर किया था। मालदीव के लिए की गई यह सहायता उसी नीति का विस्तार है।

भारत-मालदीव की ऐतिहासिक पार्टनरशिप

भारत हमेशा से अपने पड़ोसियों की मदद के लिए आगे रहा है। भारत और मालदीव के बीच 1965 से लगातार अच्छा रिश्ता रहा है। ब्रिटेन से मालदीव की आजादी के बाद जब भी मालदीव पर मुसीबत आई, भारत संकट मोचक की तरह सामने आया। चाहे वह 1988 का ‘ऑपरेशन कैक्टस’ हो, 2004 की सुनामी हो या फिर कोविड-19 महामारी, भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आया है।

रक्षा संबंधों के अलावा, भारत ने द्वीपसमूह में विभिन्न बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और शिक्षा परियोजनाओं को आर्थिक मदद दी। 18 मई 2025 को भारत ने ₹100 करोड़ की मदद दी। इसके लिए 13 समझौतों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला खलील ने उस समय कहा था कि भारत की सहायता हमेशा उद्देश्यपूर्ण, सार्थक और मालदीव के लोगों के अनुरूप रहे हैं।

ऐसे में पीएम मोदी की मालदीव यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक बार फिर मजबूती लाएगी।