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70% मुस्लिम आबादी वाले किशनगंज में घटे 145000 वोटर, SIR से 11.8% नाम लिस्ट से कटे: पुनरीक्षण चालू होते ही 5x बढ़े थे डोमिसाइल के आवेदन, जिले में जनसंख्या के मुकाबले 126% हैं आधार

बिहार में चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद संशोधित वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट जारी कर दिया है। नए ड्राफ्ट में लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। वह वोटर हटाए गए हैं जिनकी या तो मौत हो चुकी या फिर वह दिए गए पते पर मिले नहीं।

इस SIR प्रक्रिया में बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज में 1.45 लाख मतदाता के नामों को नई सूची से हटा दिया गया है। यह आँकड़ा जिले के कुल मतदाताओं की संख्या का करीब 11.8% है। विधानसभा चुनावों में जहाँ 4-5% वोटों की संख्या पर हार-जीत तय हो जाती है, वहाँ इस आँकड़े के महत्व को समझना कोई बड़ी बात नहीं है।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में किशनगंज में मुस्लिमों की आबादी करीब 70% है और यहाँ अवैध घुसपैठ बड़ी समस्या है। यह जिला पश्चिम बंगाल से सीमा भी साझा करता है। यह तेजी से डेमोग्राफी बदलाव की बात भी पहले सामने आ चुकी है।

किशनगंज में बचे कितने वोटर?

पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इस जिले में 4 विधानसभा क्षेत्र हैं। चुनाव आयोग के आँकड़ों से पता चलता है कि SIR की प्रक्रिया किए जाने से पहले 24 जून 2025 को जिले में मतदाताओं की संख्या 12,31,910 थी। इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग को 10,86,242 गणना प्रपत्र ही प्राप्त हुए। यानी अब जो नया ड्राफ्ट चुनाव आयोग ने जारी किया है उसमें 1,45,668 मतदाताओं के नाम कट गए हैं। यानी वोटर लिस्ट से 11% से अधिक वोटर कम हो गए हैं।

SIR से पहले ही शुरू हुआ फर्जी वोटर बनाने का खेल?

चुनाव आयोग द्वारा SIR की प्रक्रिया शुरू किए जाने से पहले ही किशनगंज में नए निवास प्रमाण पत्र बनवाने वालों लोगों की कई गुना तक बढ़ गई थी। इस अप्रत्याशित बढ़ोतरी को वोटर लिस्ट में गड़बड़ी किए जाने की आशंका से भी जोड़कर देखा जा रहा था।

बिहार के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कुछ हफ्तों पहले दावा किया था कि किशनगंज में 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से 28 हजार तक आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए आ रहे थे लेकिन जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन आ गए।

सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पैन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में समय और प्रमाण लगते हैं जबकि निवास प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा था।

किशनगंज में 100 की आबादी पर 126 आधार कार्ड

किशनगंज में फर्जी वोटर बनाए जाने से जुड़ा शक केवल निवास प्रमाण पत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि कुछ दिनों पहले सामने आए आधार कार्ड सैचुरेशन के आँकड़ों से भी ऐसे कई सवाल खड़े हुए थे।

बिहार के कई मुस्लिम बहुल ज़िलों में आधार कार्ड सैचुरेशन 100% से भी ज्यादा था और किशनगंज में यह आँकड़ा 126% था। यानी यहाँ 100 लोगों की आबादी पर 126 आधार कार्ड जारी किए गए हैं।

आधिकारिक आंकड़ों के हिसाब से देखें तो किशनगंज की आबादी 20,26,541 है लेकिन वहाँ 21,31,172 आधार कार्ड बनाए जा चुके हैं। मतलब यहां आबादी से 1 लाख से भी ज्यादा आधार कार्ड बनाए गए।

जाहिर है कि ये आँकड़े बताते हैं कि या तो फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं या अवैध घुसपैठियों को आधार कार्ड जारी किए गए हैं। किशनगंज की सीमा नेपाल से लगी हुई है और जिस सीमांचल क्षेत्र में यह स्थित है उसमें लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या रही है।

किशनगंज में बड़ी समस्या है अवैध घुसपैठ

पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा किशनगंज देश की आजादी के वक्त हिंदू बहुल जिला हुआ करता था लेकिन आजादी के बाद के दशकों में यहां की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, किशनगंज में मौजूदा वक्त में मुस्लिम की आबाद करीब 70% है।

सम्राट चौधरी तक यह दावा कर चुके हैं कि किशनगंज जैसे जिलों में अवैध घुसपैठियों की संख्या बहुत अधिक है।

किशनगंज से बांग्लादेश की दूरी भी बहुत ज्यादा नहीं है और मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि जब से बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाया गया है, तब से अवैध घुसपैठ में तेज़ी आ गई है।

जुलाई महीने में ही किशनगंज में अलग-अलग जगहों पर 4 बांग्लादेशियों को पकड़ा गया है। ये लोग अवैध घुसपैठ कर यहां पहुँचे और लोगों के घरों में काम कर यहीं स्थाई तौर पर बसने का प्लान बना रहे थे। यहाँ बसने के लिए बांग्लादेशी अपना नाम तक बदल लेते हैं और फर्जी कागजात बनवाते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, SIR की प्रक्रिया के दौरान भी किशनगंज में ऐसे बहुत लोग मिले जो नेपाल, बांग्लादेश या म्यांमार से यहाँ आए थे और अब इन लोगों ने यहीं पर आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं।

शिवम बन ले गया हुक्का बार, फिर गन्दी वीडियो बनाई … अरबाज ने हिन्दू लड़की पर बनाया इस्लाम कबूलने का दबाव: भाई को दे रहा जान से मारने की धमकी, UP के बदायूँ का मामला

उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान ने शिवम बनकर हिंदू युवती से रेप किया। अश्लील वीडियो बनाकर युवती को धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया। युवती को जबरन इस्लामी किताबें और नमाज पढ़ने को मजबूर करता था। ऐसा ना करने पर अरबाज ने युवती के भाई को जान से मारने की भी धमकी दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीड़िता ने आरोपित अरबाज के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। पीड़िता ने बताया कि जुलाई 2022 में वह अपने सहेली के साथ नई सराय पुलिस चौकी के पास स्थित हुक्काबार गई थी। यहाँ माथे पर तिलक लगाए अरबाज मिला, जिसने अपना असली नाम शिवम उर्फ बॉबी बताया।

अरबाज ने पीड़िता को जबरन हुक्का पिलाया और बेहोशी हालत में पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो बनाए। इसके बाद पीड़िता की सहेली आए दिन हु्क्काबार ले जाने लगी, जिससे पीड़िता को नशे की आदत लग गई। हर बार अरबाज मिलता और पीड़िता की बेहोशी हालत का फायदा उठाकर वीडियो बनाया करता था।

इन्हीं वीडियो के सहारे ब्लैकमेल कर अरबाज 14 सितंबर 2022 को पीड़िता को दिल्ली ले गया। दिल्ली में पीड़िता का रेप किया और अपनी असली पहचान उजागर की। अरबाज ने बताया कि वह हाईकोर्ट के जज का ड्राइवर है। पीड़िता ने जब चंगुल से भागना चाहा तो अरबाज ने पीड़िता के इकलौते भाई को जान से मारने की धमकी दी।

पीड़िता ने बताया कि अरबाज बदायूं में इस्लामी स्थलों पर ले जाता था, यहाँ इस्लाम से जुड़ी किताबें पड़ने का दबाव डालता था। अरबाज ने पीड़िता से धर्मांतरण कर निकाह करने का भी दबाव डाला। इसके बाद फरवरी 2025 में पीड़िता ने अरबाज से दूरी बना ली, लेकिन अब अरबाज फिर उसे ब्लैकमेल करने लगा।

पीड़िता ने शनिवार (02 अगस्त 2025) को अरबाज और उसके साथी फैज खान, रियान पठान, अदनान के खिलाफ तहरीर दी है। कोतवाल प्रवीण सिंह ने बताया कि अरबाज अली खान के खिलाफ हिंदू लड़की से दुष्कर्म, धर्मांतरण और ब्लैकमेल का केस दर्ज किया गया है। पुलिस आरोपित की तलाश में जुटी हुई है।

लड़कियों को ड्रग्स देकर अश्लील वीडियो के आरोप में पहले भी जा चुका जेल

साल 2022 में भी बदायूं के हुक्काबार संचालक अरबाज अली खान जेल जा चुका है। अरबाज और उसके भाइयों पर नाबालिग लड़कियों को नशा देकर छेड़छाड़ का वीडियो वायरल करने का केस दर्ज किया गया था। इसमें कई वीडियो पुलिस के हाथ लगी थीं, जिनमें अरबाज हुक्का पीते और बार में लड़कियों के साथ डांस करते हुए दिखा। कुछ वीडियो में अरबाज तमंचों के साथ भी नजर आया था।

GDP में रिकॉर्ड लो, बेरोजगारी चरम पर… कपड़े की फैक्ट्रियाँ बंद: बांग्लादेश इकॉनमी की मोहम्मद यूनुस ने लगाई ‘माचिस’, हसीना के दौर में ‘एशियन टाइगर’ बनने की राह पर था

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुए एक वर्ष पूरा होने को है। हसीना की जगह पर मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज हैं। वह ‘अंतरिम सरकार’ के ‘मुख्य सलाहकार’ हैं। इस एक वर्ष में बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ा है। हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों का भी जीना मुहाल हो गया है। लेकिन इन सबसे इतर बांग्लादेश एक और फ्रंट पर भी फेल हो रहा है। यह फ्रंट है अर्थव्यवस्था का। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को बीते एक वर्ष में अराजकता के चलते बड़े नुकसान झेलने पड़े हैं।

तख्तापलट आंदोलन ने किया अरबों का नुकसान

शेख हसीना और आवामी लीग को बांग्लादेश की सत्ता से बेदखल करने के लिए जून-जुलाई से हिंसा चालू हो गई था। इस दौरान बांग्लादेश भर में पहले बंद बुलाए गए। फैक्ट्रियों पर ताले डलवाए गए। पूरे देश में हिंसा हुई और पुलिस को तक निशाना बनाया गया। इस दौरान वह फैक्ट्रियाँ भी निशाने पर रहीं, जिनके मालिक आवामी लीग से जुड़े हुए थे। इस दौरान बांग्लादेश अर्थव्यवस्था के केंद्र ढाका और चटगाँव आदि पूरी तरह बंद रखे गए और यहाँ भी खूब बवाल हुआ।

2 महीने से ज्यादा चले इस बवाल के चलते बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था को 10 बिलियन डॉलर (₹85 हजार करोड़) का नुकसान हुआ। यह बांग्लादेश की कुल अर्थव्यवस्था का लगभग 2%-2.5% तक था। बांग्लादेश में इस हँगामे के दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, इससे हजारों लोग बेरोजगार हुए। एक रिपोर्ट कहती है कि इस दौरान बांग्लादेश में लगभग 1.3 लाख कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वालों को अपनी नौकरी खोनी पड़ी। इसके अलावा इस दौरान कपड़ा फैक्ट्रियाँ बंद होने के चलते बांग्लादेश के निर्यात भी गोता लगा गए।

एक और रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त तक के इस हंगामे के चलते 800 मिलियन डॉलर (₹7000 करोड़) के आयातों का नुकसान हुआ। इसी दौरान ₹32 हजार करोड़ के से भी अधिक विदेशी आर्डर बांग्लादेशी कपड़ा निर्माताओं के हाथ से निकल गए। यह ऑर्डर उन देशों में गए जहाँ स्थिरता थी। बड़ी मात्रा में कपड़ो के ऑर्डर भारत और विएतनाम जैसे देशों में गए। इससे बांग्लादेश में बेरोजगारी तो हुई ही, उसको विदेशी मुद्रा का नुकसान भी हुआ।

आंदोलन के बाद भी हालात सही नहीं

आंदोलन के दौरान जहाँ बांग्लादेश को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ तो वहीं आंदोलन के बाद भी कोई हालात नहीं बदले। एक साल के भीतर बांग्लादेश की इकॉनमी संघर्ष कर रही है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वर्तमान में काफी धीमे बढ़ रही है। बांग्लादेश में GDP वृद्धि डर 2024-25 में 4% से भी नीचे आ गई जबकि इससे पहले के सालों में यह औसतन 6.5% रही थी। बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर सफल देश माना जाने लगा था।

बांग्लादेश की सबसे तेज आर्थिक वृद्धि प्रधानमंत्री शेख हसीना के दौर में ही हुई। 2010-24 के बीच बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई। जहाँ 2010 में यह (लगभग) 1300 डॉलर (₹1.12 लाख) से 2600 डॉलर (₹2.25 लाख) के पास पहुँच गई थी। बांग्लादेश को नए एशियन टाइगर का ख़िताब दिया जाने लगा था। लेकिन यह आर्थिक वृद्धि का सिलसिला 2024 में आकर रुक गया। बांग्लादेश की आर्थिक प्रगति को इस्लामी हिंसा और कट्टरपंथ की नजर लग गई।

मई, 2025 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश में वर्तमान में बेरोजगारी ऐतिहासिक ऊँचे स्तर पर है। यह अक्टूबर-दिसम्बर 2024 की तिमाही में 4.63% के स्तर पर पहुँच गए। इस दौरान बांग्लादेश में 27 लाख से अधिक लोग बेरोजगार थे। इसके पीछे का सीधा कारण बांग्लादेश में हुई हिंसा और उसके बाद आई अस्थिरता समझ आता है। बांग्लादेश में सरकारी नौकरियाँ भी यूनुस सरकार ने नहीं निकाली हैं। इससे बड़ी संख्या में फैक्ट्रियाँ बंद हुईं तो लोग बेरोजगार हुए।

इसके अलावा बांग्लादेश में अंतरिम सरकार होने के चलते कई गतिविधियाँ रुकी हुई हैं। यह स्थिति आगे और गंभीर हो सकती है। बेरोजगारी का यह आँकड़ा 5% तक पहुँच सकता है, यह आंशका जताई गई है। बांग्लादेश में तख्तापलट के पहले हुई हिंसा के चलते बाहरी निवेशकों का भी विश्वास भी डगमगाया है। यह बांग्लादेश के लिए चिंता का सबब है। बांग्लादेश की इ समस्या में और भी बढ़ावा विएतनाम जैसे देश हैं, जो कपड़ों से लेकर बाकी सामानों में उसे कई बाजारों में पटखनी दे रहे हैं।

भारत से रिश्ते बिगाड़ कुछ नहीं हुआ हासिल

भारत से रिश्ते बिगाड़ने के चलते बांग्लादेश को आर्थिक मोर्चे पर नुकसान भी झेलना पड़ा है। भारत ने मई, 2025 में बांग्लादेश से आने वाले रेडिमेड कपड़ों, प्रोसेस्ड फ़ूड और फ्रूट ड्रिंक्स आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भारत ने बांग्लादेश से आने वाले प्लास्टिक और लकड़ी के सामान पर भी कई तरह के प्रतिबन्ध लगाए थे। भारत ने कहा था कि वह अब बांग्लादेश से आने वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स और कन्फेक्शनरी सामान को असम, मेघालय, त्रिपुरा-मिजोरम और पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं देगा।

भारत द्वारा लगाए इन प्रतिबन्धों के चलते बांग्लादेश को वार्षिक तौर 770 मिलियन डॉलर (₹6500 करोड़+) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था। यह बांग्लादेश के भारत को कुल निर्यातों का लगभग 42% बनता है। भारत व्यापार के मामले में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा पार्टनर है। हालाँकि, इसकी शुरुआत बांग्लादेश की तरफ से हुई थी। बांग्लादेश ने अप्रैल, 2025 में भारत मछली, कपड़े समेत कई उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी। उसने रास्ते के लिए भी भारत से 1.8 टका प्रति टन का शुल्क लेना चालू कर दिया था।

हिंसा, अराजकता और लोकतंत्र के गिरावट का रहा एक साल

बांग्लादेश जहाँ आर्थिक मोर्चे पर यूनुस सरकार के एक वर्ष के दौरान गोते लगा रहा है तो वहीं इसी समय में हिंसा भी जम कर हुई है। लोकतंत्र का भी गला यूनुस सरकार ने घोंटा है। बांग्लादेश में तख्तापलट के एक वर्ष के भीतर हिन्दुओं और बाक़ी अल्पसंख्यकों पर 2400 से अधिक हमले हुए हैं। इनमें कई हमले बहुचर्चित रहे हैं। हाल ही में एक हिन्दू महिला का BNP के एक नेता घर में घुस कर रेप किया था और इसका वीडियो भी वायरल कर दिया था।

इस्लामी कट्टरपंथियों को तो छोडिए, बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने खुद ढाका में रेलवे की जमीन पर बता कर एक पुराना हिन्दू मंदिर ढहा दिया। हिन्दुओं के लिए जिन्होंने आवाज उठाई, उनका भी इस एक वर्ष में बुरा हाल किया गया। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर जारी अत्याचार के चलते चटगाँव में बड़ा प्रदर्शन हुआ। इसका नेतृत्व संत चिन्मय दास ने किया। चिन्मय दास से चिढ़े इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगा दिया। उनको महीनों तक सुनवाई भी नहीं मिली। उनके वकील तक पर हमला हुआ।

जब आखिर में उनको जमानत भी मिली तो फिर इस्लामी कट्टरपंथी भड़के और उन्होंने जमानत पर रोक लगवा दी। इसके अलावा मोहम्मद यूनुस सरकार विपक्ष का दमन भी कर रही है। वह लोगों की स्मृतियों से तक उसे मिटा देना चाहती है। मोहम्मद यूनुस सरकार ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान के पैतृक आवास को टूटने दिया। दंगाइयों ने उस धानमंडी घर की ईंट-ईंट तक तोड़ दी, जिससे बांग्लादेश को आजादी मिली।

यह सब इसलिए होने दिया गया क्योंकि इसका कनेक्शन शेख हसीना से है। गुरु रबीन्द्र नाथ टैगोर के घर को तोड़ा गया। मोहम्मद यूनुस सरकार देखती रही। सत्यजित रे का घर भी गिरते-गिरते बचा। इस पर भी मोहम्मद यूनुस सरकार ने बेशर्म रवैया दिखाया। कहानी यहीं तक नहीं रुकती बल्कि शेख मुजीब से जुड़ा हर एक चिन्ह मिटाने का प्रयास लगातार किया गया। चाहे उनकी जयंती पर होने वाले समारोह को रोका जाना हो या फिर नोटों पर से उनका फोटो हटाना।

बांग्लादेश की सरकार इस विरासत मिटाने का हर प्रयास कर रही है। मोहम्मद यूनुस की सरकार के इन क़दमों के पीछे उसका इस्लामी कट्टरपंथ का एजेंडा है, जो मुजीब को नहीं देखना चाहता। यह सब करने के बाद के बाद मोहम्मद यूनुस बिना चुने ही बांग्लादेश को हमेशा के लिए अपने शासन तले रखना चाहते हैं। मोहम्मद यूनुस को जब सत्ता सौंपी गई थी, तब ही उसका कोई संवैधानिक आधार नहीं था। उन्हें अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में लाया गया था।

मोहम्मद यूनुस को सत्ता पर काबिज हुए 1 वर्ष हो गया है। लेकिन चुनाव का नाम लेते ही वह बिदक जाते हैं। हाल ही में बांग्लादेश में इसी को लेकर एक संकट तक पैदा हो गया था। आखिर में मोहम्मद यूनुस ने 2026 के मध्य तक चुनावों की बात किसी तरह कही। उनके इन सब क़दमों से लगता है कि वह स्वयं ही बांग्लादेश के बिना चुने तानाशाह बनना चाहते हैं।

कौशांबी में शादीशुदा हिंदू महिला से गैंगरेप कर बनाया अश्लील वीडियो, धर्मांतरण का डालने लगे दबाव: मोहम्मद कैफ गिरफ्तार, इरफान-शाह आलम और मौलाना इमरान की तलाश जारी

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के पश्चिम शरीरा थाना क्षेत्र में एक शादीशुदा हिंदू महिला के साथ गैंगरेप, अश्लील वीडियो वायरल करने और जबरन धर्मांतरण का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पुलिस ने मुख्य आरोपित मोहम्मद कैफ को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना गढ़ी बाजार की है, जहाँ पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि दो साल पहले उसकी मुलाकात कैफ से हुई थी। उसने प्रेमजाल में फंसाकर उसका भरोसा जीता। पाँच महीने पहले पीड़िता की शादी हो गई, लेकिन कैफ ने उसे धमकाना शुरू कर दिया। वह उससे मिलने और शादी तोड़ने की धमकी देता था।

पीड़िता ने बताया कि कैफ की बहन ने उसे अपने घर बुलाकर भाई को समझाने की बात कही। लेकिन जब वह वहाँ पहुँची, तो कैफ, इरफान और शाह आलम ने उस पर निकाह का दबाव बनाया। इंकार करने पर तीनों ने उसके साथ मारपीट की और बारी-बारी से दुष्कर्म किया। इस दौरान उन्होंने उसकी अश्लील वीडियो बनाई।

इसके बाद कैफ, इरफान और शाह आलम ने एक मौलाना इमरान को बुलाकर पीड़िता को इस्लाम अपनाने और कुरान की आयतें पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। उसे बुर्का पहनने का भी दबाव डाला गया। डर और धमकी के बीच पीड़िता किसी तरह घर पहुँची और अपने परिवार को आपबीती बताई।

इसके बाद कैफ ने पीड़िता को बदनाम करने के लिए उसकी अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। पीड़िता के पिता ने 26 जुलाई को पश्चिम शरीरा थाने में शिकायत दर्ज की। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शुक्रवार (1 अगस्त 2025) रात पुनवार नहर के पास से कैफ को गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने अपना जुर्म कबूल लिया। पुलिस ने आईपीसी, आईटी एक्ट और धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

कौशांबी डीएसपी जेपी पाण्डेय ने बताया कि जाँच जारी है और अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है। पीड़िता के बयान और बरामद बुर्के के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

छत्तीसगढ़ NIA कोर्ट ने दी केरल की ननों को मानव तस्करी-धर्मांतरण केस में सशर्त जमानत: गिरफ्तारी के बाद बचाव में उतरा पूरा वामपंथी-कॉन्ग्रेसी-मिशनरी इको-सिस्टम

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में विशेष NIA कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को केरल की दो कैथोलिक ननों, प्रीति मेरी और वंदना फ्रांसिस और एक जनजातीय युवक सुकमन मंडावी को सशर्त जमानत दे दी।

इन तीनों को 25 जुलाई को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर सरकार रेलवे पुलिस (GRP) ने गिरफ्तार किया था। उन पर मानव तस्करी और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप था, जो एक स्थानीय बजरंग दल कार्यकर्ता की शिकायत पर आधारित था।

शिकायत में दावा किया गया था कि तीनों नन तीन आदिवासी लड़कियों को नारायणपुर से आगरा ले जा रहे थे और उनका जबरन धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश कर रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, जमानत पर रिहा हुई आरोपित प्रीति मेरी, वंदना फ्रांसिस (दोनों असीसी सिस्टर्स ऑफ मैरी इमैक्युलेट – एएसएमआई) और सुकमन मंडावी को कोर्ट ने कई सख्त शर्तों के साथ राहत दी है।

उन्हें अपना पासपोर्ट जमा करना होगा, 50-50 हजार रुपये का जमानत बांड भरना होगा और दो-दो जमानतदार पेश करने होंगे। कोर्ट ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि तीनों बिना NIA कोर्ट की अनुमति के देश नहीं छोड़ सकते।

NIA कोर्ट के जज सिराजुद्दीन कुरैशी ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और FIR मुख्यतः संदेह के आधार पर दर्ज की गई थी। अदालत के अनुसार, आरोपितों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और तीनों कथित पीड़ित लड़कियों के माता-पिता ने अपने हलफनामों में स्पष्ट किया है कि उनकी बेटियों को ननों ने न तो बहलाया और न ही जबरन धर्म परिवर्तन कराया।

लड़कियों ने अपने बयानों में पुलिस को बताया कि वे वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रही हैं और वे अपनी मर्जी से आगरा जा रही थीं, जहाँ उन्हें काम के लिए ले जाया जा रहा था।

निचली अदालतों से पहले जमानत याचिका खारिज हो चुकी थी। दुर्ग की फास्ट ट्रैक सत्र अदालत ने इस आधार पर याचिका खारिज की थी कि मामला NIA कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके बाद आरोपित ने बिलासपुर स्थित विशेष अदालत का रुख किया।

इस मामले पर केरल में व्यापक विरोध देखने को मिला था। चर्च संगठन, एलडीएफ सरकार और विपक्षी कॉन्ग्रेस समेत कई दलों ने गिरफ्तारी की निंदा की थी। सीपीएम सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे ‘संविधान की जीत’ बताया और कहा कि एफआईआर को रद्द कराने के लिए लड़ाई जारी रहेगी।

वहीं सीपीएम नेता वृंदा करात ने जनजातीय समुदाय की आवाज को मान्यता मिलने पर खुशी जताई और बजरंग दल तथा हिंदू वाहिनी पर झूठी शिकायत दर्ज कराने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की माँग की।

मामले पर केरल और छत्तीसगढ़ भाजपा इकाइयों में भी टकराव देखने को मिला। केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने गिरफ्तारी को गलतफहमी बताया था और कहा था कि छत्तीसगढ़ सरकार जमानत का विरोध नहीं करेगी।

फिलहाल,आरोपितों की रिहाई के बाद मिशनरी और वामपंथी खेमे में खुशी की लहर है। छत्तीसगढ़ में समर्थक उन्हें रिसीव करने पहुँचे, जबकि कानूनी प्रक्रिया अब NIA अदालत की निगरानी में आगे बढ़ेगी।

बांग्लादेश में बंगबंधु के समर्थकों को लगातार निशाना बना रही यूनुस की कट्टरपंथी सरकार, अब ढाका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नीलिमा को नौकरी से हटाया: नरसंहार-आतंक के खिलाफ बोलने पर सजा देने का आरोप

बांग्लादेश की ढाका विश्वविद्यालय में एक वरिष्ठ प्रोफेसर नीलिमा अख्तर को फेसबुक पोस्ट पर मोहम्मद युनुस सरकार की आलोचना करने और बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु को पसंदीदा इंसान बताने पर यूनिवर्सिटी से बर्खास्त कर दिया गया है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस की तानाशाही के कई मामले अब तक सामने आ चुके हैं। इस मामले में भी उनका अड़ियल रवैया सामने आया है। नीलिमा अख्तर ने अपने पोस्ट्स में डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की आलोचना की थी। साथ ही गोपालगंज नरसंहार, 5 अगस्त के बाद हुई हिंसा, और जिया-उर-रहमान के शासनकाल में 1300 सैनिकों की हत्या जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए थे।

डॉ. नीलिमा अख्तर ने विश्वविद्यालय में जमात-शिबिर समर्थित समूहों द्वारा फैलाए जा रहे भीड़-आतंक के खिलाफ एक लिखित बयान जारी किया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इन बयानों के बाद उन्हें सोशल मीडिया पर विरोध का सामना भी करना पड़ा। छात्रों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन करते हुए उन्हें सत्ता समर्थक और छात्र आंदोलनों की विरोधी बताया। छात्रों ने विभाग की दीवारों पर विरोध संदेश लिखे और उनकी बर्खास्तगी की माँग की।

फोटो साभार- https://en.bddigest.com/

ढाका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नीलिमा अख्तर भी 20 वर्षों से कार्यरत थीं। अंग्रेजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर रहीं नीलिमा विश्वविद्यालय की शिक्षक राजनीति में सक्रिय थीं और 2022 में ढाका यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के चुनाव में ब्लू पार्टी की ओर से विजयी हुई थीं। ये पार्टी आमतौर पर आवामी लीग समर्थक मानी जाती है।

5 अगस्त के बाद जब भी प्रो. नीलिमा अख्तर ने बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की विचारधारा, मुक्ति संग्राम की भावना, और छात्रों की सुरक्षा के पक्ष में खुलकर आवाज उठाई थी। उन्होंने लगातार विश्वविद्यालय में जमात-शिबिर के प्रभाव और आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ बोलना जारी रखा, जिसे उनकी बर्खास्तगी का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

यह घटना सोशल मीडिया पर व्यापक समर्थन और आलोचना का विषय बन गई है। समर्थकों ने डॉ नीलिमा की पुनः नियुक्ति और उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की पारदर्शी जाँच की माँग की है।

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट की मानें तो प्रो नीलिमा को हाल की किसी पोस्ट के कारण नहीं बल्कि 17 जुलाई 2024 को की गई उनकी फेसबुक पोस्ट के कारण हटाया गया है। इस पोस्ट में उन्होंने एक आंदोलन को विरोधी ताकतों द्वारा पोषित बताया था। साथ ही इसमें बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की तस्वीर का उपयोग किया था।

रिपोर्ट के अनुसार, 1995 में भोर कागोज को दिए गए थे इंटरव्यू में उन्होंने शेख मुजीबुर रहमान को अपना पसंदीदा शख्सियत बताया था। इसके बाद अब उन्हें इस सोशल मीडिया पोस्ट के कारण बर्खास्त किया गया है।

इंडिगो फ्लाइट में मुस्लिम यात्री पर हमला, हमलावर भी मुस्लिम: वामपंथी-इस्लामी हैंडलों ने हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक नैरेटिव फैलाकर फेक न्यूज की वायरल, अब खुल चुकी है पोल

सोशल मीडिया पर शुक्रवार (1 अगस्त 2025) को एक इंडिगो फ्लाइट में हुए झगड़े को लेकर झूठी खबरें फैलाई गईं। दावा किया गया कि एक हिंदू व्यक्ति ने एक मुस्लिम यात्री पर हमला किया। यह अफवाह खासतौर पर एक्स पर कुछ वामपंथी और इस्लामी हैंडलों द्वारा फैलाई गई, जिन्होंने इसे मुस्लिम पीड़ित की तरह पेश किया।

इन दावों में मुस्लिम पहचान को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया और हमलावर को ‘हिंदू’, ‘संघी’ जैसे शब्दों से जोड़ा गया। लेकिन सच यह है कि झगड़े में शामिल दोनों व्यक्ति मुस्लिम थे। इसके बावजूद, एक खास नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए हमलावर की असल पहचान को नजरअंदाज कर दिया गया।

एक्स पर प्रमुख वामपंथियों और इस्लामवादियों द्वारा किए गए ट्वीट्स का स्क्रीनशॉट

यह मामला बताता है कि कैसे सोशल मीडिया पर गलत जानकारियों के जरिए सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की कोशिश की जाती है, जबकि हकीकत कुछ और होती है।

असल में क्या था मामला

कोलकाता से मुंबई जा रही इंडिगो की एक फ्लाइट में हुसैन अहमद मजूमदार नाम के एक यात्री के साथ मारपीट हुई। हुसैन, जो असम के कछार जिले का रहने वाला है, उसको उड़ान के दौरान घबराहट का दौरा पड़ा।

इसी वजह से फ्लाइट में देरी हुई, जिससे नाराज होकर एक अन्य यात्री हफीजुल रहमान ने उसे थप्पड़ मार दिया। इस घटना का एक वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें एक सहयात्री हमलावर को टोकते हुए कहता है, ‘तुमने उसे थप्पड़ क्यों मारा? तुम्हें किसी को मारने का कोई अधिकार नहीं है।’ इस दौरान हुसैन रोते हुए नजर आते हैं।

घटना के बाद आरोपित हफीजुल रहमान को कोलकाता में विमान से उतार दिया गया और CISF ने उसे हिरासत में ले लिया।

इंडिगो एयरलाइन ने शुक्रवार (1 अगस्त 2025) को इस मामले पर बयान जारी करते हुए कहा, ‘हमारी फ्लाइट में मारपीट की घटना घटी है, जिसे हम पूरी तरह से अस्वीकार्य करते हैं। हम यात्रियों और क्रू की सुरक्षा और सम्मान को सबसे ऊपर रखते हैं। हमारे स्टाफ ने तय नियमों के तहत कार्रवाई की और आरोपित को ‘अनियंत्रित यात्री’ मानते हुए उसे सुरक्षा एजेंसियों को सौंप दिया गया।’

एयरलाइन ने यह भी कहा कि घटना की जानकारी सभी संबंधित नियामक एजेंसियों को दे दी गई है और वे सभी उड़ानों में सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। फिलहाल, पीड़ित हुसैन अहमद मजूमदार घटना के बाद से लापता है, जिससे चिंता और बढ़ गई है।

मुस्लिम पीड़ित बनाम वास्तविकता की कहानी

जैसे ही घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, कुछ जान-पहचान वाले हैंडल्स ने तुरंत मान लिया कि हमला करने वाला व्यक्ति हिंदू है। उन्होंने इस एक घटना के आधार पर भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और देश के भविष्य को लेकर तरह-तरह की नकारात्मक बातें कहने लगे।

हालांकि, उनका ये झूठा और भड़काऊ नैरेटिव ज्यादा देर टिक नहीं सका। ‘द हिंदू’ की पत्रकार जागृति चंद्रा ने सबसे पहले सच्चाई सामने लाई और बताया कि इस झगड़े में शामिल दोनों व्यक्ति एक ही धर्म से हैं, यानी आरोपित और पीड़ित दोनों मुस्लिम हैं। इस खुलासे ने उन लोगों के एजेंडे की सच्चाई को सामने ला दिया, जो इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे थे।

उन्होंने अपनी जानकारी का स्रोत इंडिगो को बताया।

बाद में, अन्य पत्रकारों ने अपराधी का नाम हफीजुल रहमान बताया।

जब यह साफ हो गया कि हमला करने वाला व्यक्ति मुस्लिम है, तो वामपंथी और इस्लामवादी हैंडल्स ने इस मुद्दे पर बात करना अचानक बंद कर दिया।

उन्होंने पहले जिस तरह इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था, अब उसी पर चुप्पी साध ली और पीड़ित बनने की नई कहानियाँ गढ़ने के लिए किसी और मुद्दे की तरफ ध्यान मोड़ लिया। यानी जब उनकी बनाई गई झूठी कहानी टिक नहीं पाई, तो उन्होंने चुपचाप रास्ता बदल लिया।

डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद भारत नहीं खरीद रहा रूसी तेल, ऐसा नरेटिव गढ़ रहा था रॉयटर्स समेत वेस्टर्न मीडिया: लेकिन इस प्रोपेगेंडा की खुल गई पोल, जानिए – क्या है सच्चाई

भारत और अमेरिका में टैरिफ को लेकर जारी तनातनी के बीच रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से दावा किया था कि भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने एक हफ्ते से रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है। 31 जुलाई को प्रकाशित की गई इस रिपोर्ट में सीधे तौर पर अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का ज़िक्र किया गया था। साफ है कि रिपोर्ट का मकसद यह दिखाना था कि भारत, अमेरिका या ट्रंप की धमकियों के जवाब में झुक गया है।

हालाँकि, रॉयटर्स का यह प्रोपेगेंडा केवल कुछ ही घंटों तक टिक पाया। समाचार एजेंसी एएनआई ने अब सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि भारतीय तेल रिफाइनरियाँ अभी भी रूस से तेल खरीद रही हैं। एएनआई की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कंपनियों के आपूर्ति संबंधी फैसले कीमत, कच्चे तेल की श्रेणी, भंडार, लॉजिस्टिक्स और अन्य आर्थिक कारकों के आधार पर ही तय किए जाते हैं।

‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट में भी तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव ना होने का दावा किया है। इसका मतलब साफ है कि भारत को तेल खरीदना है या नहीं, यह फैसले बाहरी दबाव के बजाय भारत के हितों के आधार पर लिया जाता है।

रॉयटर्स का क्या था दावा?

रॉयटर्स ने दावा किया था कि इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम और मंगलौर रिफाइनरी पेट्रोकेमिकल लिमिटेड ने पिछले एक हफ्ते से रूसी तेल नहीं खरीदा है। रिपोर्ट में कहा गया कि रूस से नियमित तेल खरीदने वाली ये कंपनियाँ अब मध्य पूर्वी देशों जैसे अबू धाबी के मुरबान क्रूड और पश्चिम अफ्रीकी तेल की खरीद कर रही हैं। इस रिपोर्ट में ट्रंप की रूसी कच्चा तेल खरीदने पर 100% टैरिफ लगाने की धमकी का भी ज़िक्र किया था।

एएनआई की रिपोर्ट में क्या कहा गया है?

युद्ध की आशंकाओं और अमेरिकी टैरिफ के बाद मची खलबली के बीच एएनआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस चुनौतीपूर्ण समय में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का पूरी तरह से पालन करते हुए सस्ती ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अपने स्रोतों को रणनीतिक रूप से अपने हिसाब से ढाला है। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता भारत अपनी ऊर्जा पूर्ति के लिए 85% कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है।

एएनआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत ने रियायती रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदा होता तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें मार्च 2022 के 137 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के शिखर से कहीं ज्यादा बढ़ सकती थी जिससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ने का खतरा था। गौरतलब है कि रूसी तेल पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है और ना ही अमेरिका या यूरोपीय संघ द्वारा इसे अभी भी प्रतिबंधित किया गया है।

वहीं, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शनिवार को दो वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत की तेल खरीदने की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाल से दावा किया गया है कि सरकार ने तेल कंपनियों को रूस से आयात कम करने का कोई निर्देश नहीं दिया है।

ट्रंप ने दी थी भारत को धमकी

ट्रंप ने पिछले हफ्ते कहा था कि अगर भारत रूसी कच्चे तेल का आयात बंद नहीं करता है तो वह उस पर एक अतिरिक्त जुर्माना लगाएंगे। इसके कुछ दिनों बाद ट्रंप ने कहा कि उन्होंने सुना है कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर रहा है। ट्रंप का दावा था कि अगर ऐसा होता है तो यह अच्छा कदम होगा।

भारत के हितों के आधार पर फैसला: विदेश मंत्रालय

भारतीय विदेश मंत्रालय ने रूसी तेल खरीदने को लेकर अपने रूख को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के हिसाब से फैसला करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत अपनी ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए बाजार में जो भाव मिलता है और वैश्विक हालात को देखकर ही फैसला किया जाता है।”

जिस RSS कार्यकर्ता पर मालेगाँव ब्लास्ट का लगाया गया इल्जाम, वो 17 साल से नहीं लौटे अपने घर: सुहागन पत्नी कर रही ‘रामजी कलसांगरा’ का इंतजार, पूर्व अधिकारी का दावा- हिरासत में हो चुकी हत्या

मुंबई के स्पेशल एनआईए कोर्ट ने बीते दिनों मालेगाँव ब्लास्ट केस में पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी 7 आरोपितों को बरी कर दिया था। हालाँकि, इस केस से जुड़े कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं और इनमें ही एक सवाल इस केस के एक आरोपित रामजी कलसांगरा की गुमशुदगी का भी है।

17 वर्षों से सुहागन की तरह जी रहीं कलसांगरा की पत्नी

दरअसल, कलसांगरा पिछले करीब 17 वर्षों से लापता हैं। कलसांगरा की पत्नी लक्ष्मी कलसांगरा ने दैनिक भास्कर से बातचीत करते हुए कहा कि जाँच एजेंसियों को बताना चाहिए कि उनके पति जीवित हैं या मर चुके हैं। वह पिछले 17 वर्षों से सुहागन का जीवन जी रही हैं।

उन्होंने कहा, “हर तीसरे दिन एनआईए और एटीएस के अधिकारियों ने जाँच के नाम पर परेशान किया। उन्होंने ऐसे सूलूक किया जैसे हम अपराधी हों।”

लक्ष्मी बेशक सुहागन की तरह जी रही हैं लेकिन उनका कहना है कि ये सिर्फ जाँच एजेंसी को ही पता है कि कलसांगरा जीवित हैं या नहीं। वह बताती हैं कि पति के लापता होने के बाद उन्होंने खेती-बाड़ी की और मजदूरी तक करनी पड़ी तब जाकर अपने तीनों बेटों का पालन-पोषण कर सकीं। उन्हें आज भी अपने पति के लौटने का इंतजार है।

रामजी कलसांगरा के बेटे देवव्रत ने क्या कहा?

रामजी कलसांगरा के बेटे देवव्रत कलसांगरा का कहना है कि उन्हें अब भी न्याय का इंतजार है। उन्होंने इस मामले की जाँच करने वाले एटीएस अधिकारियों से सवाल किया है कि क्या उनकी माँ को खुद को विवाहित महिला मानना चाहिए या विधवा।

देवव्रत भावुक होते हुए बताते है कि 9 अक्टूबर 2008 को उन्होंने आखिरी बार पिताजी के साथ गाँव में दशहरा मनाया था और उसके बाद फिर अपने पिता को कभी नहीं देखा।

पिता के लापता होने के बाद की तकलीफों को लेकर देवव्रत ने कहा कि उनके लापता होने के बाद जाँच एजेंसी के अफसर घर आकर उनकी माँ को परेशान करते थे और समाज में हमारे परिवार को हीन नजरों से देखा जाता था।

वे बताते हैं कि 2011 में इस मामले की जाँच के दौरान अधिकारी उनके घर आए और उनके पिता के साथ के बचपन के फोटो और अन्य सामान ले गए। आज उनके पास पिता की कोई तस्वीर भी नहीं है।

देवव्रत ने अपने पिता के लापता होने की जाँच की माँग की है। उनका आरोप है, “उनके पिता को अवैध रूप से एटीएस ने हिरासत में लिया होगा और उस दौरान उनके साथ कुछ अप्रिय घटना घटी होगी।” देवव्रत और उनके पूरे परिवार को अभी भी अभी रामजी कलसांगरा के बारे में कोई ठोस खबर मिलने की उम्मीद है।

देवव्रत ने अपने चाचा को लेकर बताया कि मालेगाँव केस में उनके चाचा शिवनारायण कलसांगरा को भी एटीएस ने गिरफ्तार किया था। 2008 में उन्हें हिरासत में लेने के 15 दिन बाद उनकी गिरफ्तारी दिखाई गई। देवव्रत बताते हैं कि उनके चाचा को टॉर्चर किया गया। वो 2014 तक जेल में रहे फिर साल 2017 में एनआईए ने उन्हें बरी कर दिया था।

कौन हैं रामजी कलसांगरा?

रामचंद्र उर्फ रामजी कलसांगरा लापता होने से पहले इंदौर में रहते थे और वे इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टर थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रामजी 15 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए थे और उन्होंने 1992 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या जाकर कारसेवा में भी हिस्सा लिया था।

कलसांगरा पर आरोप था कि उन्होंने मालेगाँव में भीकू चौक पर शकील गुड्स ट्रांसपोर्ट नाम की दुकान के बाहर बम बँधी हुई बाइक रखी थी। उन पर समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट केस में शामिल होने का भी आरोप था।

कोर्ट ने बेशक सात लोगों को बरी कर दिया हो लेकिन कलसांगरा को अभी भी राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने वॉन्टेड आरोपित के तौर पर दिखाया है। यानी अगर इन्हें अभी भी गिरफ्तार किया जाता है तो इन्हें मुकदमे का सामना करना पड़ेगा

कलसांगरा की हत्या किए जाने का दावा

मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच कर रही महाराष्ट्र एटीएस की टीम में शामिल रहे और बाद में सस्पेंड कर दिए गए पुलिस अधिकारी महबूब मुजावर दिसंबर 2016 में सोलापुर की एक अदालत में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि रामजी कलसांगरा और उनके साथी संदीप डांगे की 2008 में कस्टडी में ही हत्या कर दी गई थी

उन्होंने अपने हलफनामे में दावा किया कि दोनों के शवों को मुंबई 26/11 के आतंकी हमलों के ‘अज्ञात पीड़ितों’ के रूप में पेश किया गया था। मुंबई आतंकी हमला डांगे और कलसांगरा को कथित हिरासत में लिए जाने के कुछ महीनों बाद हुआ था।

मुजावर ने दावा किया था कि कलसांगरा और डांगे को एटीएस ने भोपाल से पकड़ा था लेकिन 26 नवंबर 2008 को (मुंबई आतंकी हमले के दिन) दोनों को मुंबई में गोली मार दी गई थी। मुजावर का दावा था कि मारे जाने से पहले उन्हें कालाचौकी स्थित एटीएस ऑफिस में अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था।

मुजावर ने दावा किया कि उन्हें लापता आरोपितों की तलाश में कर्नाटक भेजा गया था लेकिन वे दोनों मारे जा चुके थे। उनका कहना था कि वह इन हत्याओं के खिलाफ थे और उन्हें चुप कराने के लिए उनके खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत एक फर्जी केस दर्ज किया गया था।

देवव्रत का कहना है कि मुजावर ने कोर्ट में एफिडेविट देने और उनकी हत्या की खबर को सुनने के बाद हमने जाँच एजेंसी और कोर्ट से स्पष्टीकरण माँगा था। देवव्रत ने कहा, “हमने उनसे गुजारिश की थी कि यदि मेरे पिता का शव उनके पास है तो वह हमें दे दें, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।”

इन हमलों के 17 वर्ष बाद जब सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है और कथित ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी भरभराकर गिर गई है तो ऐसे में कलसांगरा के परिवार की माँगों की भी जाँच किए जाने की जरूरत है। उनके परिवार को इंतजार है, उम्मीद है लेकिन सच कहीं फाइलों में दर्ज है या शायद उसे एक गुमनाम मौत बना दिया गया है।

जो दुनिया में नहीं, उन अरुण जेटली पर भी झूठे आरोप लगाने से नहीं चूके राहुल गाँधी: कहा – कृषि कानून के लिए मुझे धमकाया था, बेटे रोहन लगाई क्लास

राहुल गाँधी यूँ तो जब तब अपनी बातों से हँसी के पात्र बनते ही रहते हैं लेकिन शनिवार (2 अगस्त 2025) को उन्होंने इतना बेतुका बयान दे दिया कि उस पर विवाद खड़ा हो गया है।

शनिवार को दिल्ली में कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा आयोजित वार्षिक लीगल कॉन्क्लेव-2025 में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कहा कि जब वे कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ रहे थे, तब केंद्र सरकार ने उन्हें धमकाने के लिए अरुण जेटली को भेजा था।

राहुल गाँधी के अनुसार, जेटली ने उनसे कहा था, “अगर तुम सरकार का विरोध करते रहे, तो हमें तुम्हारे खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ेगी।” राहुल ने इसके जवाब में कहा, “मुझे नहीं लगता कि आपको पता है आप किससे बात कर रहे हैं।”

राहुल गाँधी के इस बयान पर तुरंत विवाद खड़ा हो गया क्योंकि अरुण जेटली का निधन 24 अगस्त 2019 को हुआ था, जबकि कृषि कानूनों को जून 2020 में अध्यादेश के रूप में लाया गया और सितंबर 2020 में संसद में पारित किया गया।

राहुल गाँधी इस दौरान चुनाव आयोग की निष्पक्षता और 2024 के लोकसभा चुनावों में कथित धांधली पर सवाल उठा रहे थे। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के पास 70 से अधिक सीटों पर गड़बड़ी के सबूत हैं, जिन्हें जल्द ही सार्वजनिक किया जाएगा।

रोहन जेटली का तीखा पलटवार

राहुल गाँधी के बयान पर अरुण जेटली के बेटे रोहन जेटली ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि राहुल गाँधी का दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि उनके पिता की विरासत का भी अपमान है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रोहन ने लिखा, “मेरे पिता का निधन 2019 में हुआ था, जबकि कृषि कानून 2020 में पेश किए गए थे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे पिता का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वे किसी विरोधी विचार रखने वाले को धमकी दें।”

रोहन ने आगे लिखा, “अरुण जेटली एक कट्टर लोकतांत्रिक थे, जो हमेशा सहमति बनाने और खुले तौर पर संवाद में विश्वास रखते थे। अगर कभी राजनीतिक मतभेद होता भी, तो वे सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकालने की कोशिश करते थे। यही उनका स्वभाव था और यही उनकी आज की विरासत है।”

रोहन जेटली ने लिखा कि राहुल गाँधी उन नेताओं के बारे में बोलते समय सावधानी बरतें जो अब हमारे बीच नहीं हैं। इससे पहले राहुल गाँधी ने पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के अंतिम दिनों को भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी, जो उतना ही असंवेदनशील था।

लोगों ने राहुल को लिया आड़े हाथ

रोहन जेटली के पोस्ट के बाद नेटिजन्स ने राहुल के खिलाफ जमकर गुस्सा निकाला है। राहुल के बयान के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर अरुण जेटली का नाम ट्रेंड करने लगा। कई यूजर्स ने कहा कि राहुल के खिलाफ शिकायत की जानी चाहिए।

फोटो साभार- x

कहीं कुछ यूजर्स ने कहा कि राहुल की झूठ बोलने की आदत हो गई है। ऐसे में उन पर मानहानि का मुकदमा किया जाना चाहिए।