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‘जुमे की नमाज, रमजान में एक्टिव रहता है… बच्चों से है इश्क’: अमेरिका में रेपिस्ट को बचाने के लिए उतरा इस्लामी संगठन, सोमालिया के इब्राहिम ने 12 वर्षीय बच्ची का गाड़ी में किया था रेप

अमेरिका में कई इस्लामी संगठन सार्वजनिक तौर पर अब रेपिस्ट और दूसरे अपराध करने वाले मुस्लिमों के बचाव में उतर आए हैं। ऐसा की कारनामा मिनेसोटा स्थित अल-इहसान इस्लामिक सेंटर ने किया है। उसने एक बलात्कारी के बचाव में जस्टिस को खत लिखा है।

जुलाई 2024 में एक सोमाली मुस्लिम अप्रवासी कलिनले इब्राहिम दिरी ने एक बच्ची का रेप किया। 12 साल की ये बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी। उस वक्त उसकी माँ घर पर नहीं थी। दिरी ने पहले बच्ची का अपहरण किया और फिर यौन शोषण का शिकार बनाया। कोर्ट ने इस मामले में उसे दोषी ठहराया था और 12 साल जेल की सजा सुनाई। इतने जघन्य अपराध के बावजूद इस्लामी संगठन बलात्कार की सजा कम करने और उसके ‘मानवीयता’ की बात करने लगे हैं।

दिरी का जन्म सोमालिया में गृहयुद्ध के दौरान हुआ था और 2006 में अमेरिका आने से पहले उन्होंने केन्या के एक शरणार्थी शिविर में अपना जीवन व्यतीत किया। हालाँकि दिरी की नागरिकता पर सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन दिरी ज्यादातर मिनेसोटा और नॉर्थ डकोटा में ही रहा है।

जुलाई 2024 में इस सोमाली मुस्लिम आप्रवासी पर एक 12 साल की बच्ची के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। शिकायत के अनुसार, पीड़िता मिनियापोलिस स्थित अपने घर के पास खेल रही थी, तभी दिरी छिप कर उसके पास पहुँचा और उससे बात करने लगा। उसने कथित तौर पर पूछा कि क्या बच्ची की माँ घर पर है? पीड़िता ने कहा कि नहीं वह घर पर नहीं है।

आरोपी वहाँ से चला गया और कुछ देर बाद वापस लौटा। उसने बच्ची के मुँह पर हाथ रखा और जबरन कार में बिठाया। बच्ची के सिर पर हमला किया ताकि वह ज्यादा न छटपटाए। कार को कुछ दूर ले जाकर उसके साथ जबरन रेप किया। बच्ची बहुत बुरे हाल में अपने घर पहुँची।

आरोपी दिरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसी साल मई में कोर्ट ने डिरी को नाबालिग के साथ रेप का दोषी पाया। डिरी के परिवार ने न्यायाधीश को पत्र लिखकर उसकी सजा तय करते समय उसके ‘चरित्र’ के दूसरे पहलुओं पर गौर करने और ‘सामुदायिक योगदान’ पर विचार करने का आग्रह किया।

परिवार के पत्र के अलावा अल-इहसान इस्लामिक सेंटर ने भी न्यायाधीश को खत लिखा है जिसमें दोषी दिरी को ‘हल्की सजा’ देने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। पत्र में रेपिस्ट को एक ‘समर्पित पारिवारिक व्यक्ति’ बताया गया।

दिरी के जघन्य अपराध को हल्का करने की कोशिश करते हुए इस्लामिक सेंटर ने कहा, “डिरी को एक नई संस्कृति में नए सिरे से शुरुआत करने की चुनौती का सामना करना पड़ा।” और बच्ची के साथ रेप करने से पहले वह एक ‘मिलनसार’ और ‘पारिवारिक व्यक्ति’ के रूप में जाना जाता था।

इसमें मुस्लिम बलात्कारी के अपने परिवार और बच्चों के प्रति ‘प्रेम’ को भी उजागर किया गया है, और कहा गया है कि दिरी अल-इहसान इस्लामिक सेंटर मस्जिद में एक सक्रिय स्वयंसेवक भी तरह रहा है, ‘ हर शुक्रवार की नमाज, रमजान और सामुदायिक कार्यक्रमों के दौरान वह एक्टिव रहता था।’

अल-इहसान इस्लामिक सेंटर के कार्यकारी निदेशक अहमद अंशुर के इस पत्र पर हस्ताक्षर हैं। इसमें दिरी के ‘गुणों’ का वर्णन है। इसमें लिखा गया है, “आप अक्सर दिरी को बुज़ुर्गों को घर पहुँचाने में मदद करते या बाहर सफाई में मदद करते पाएँगे। उनमें सेवा भाव है और हमारे समुदाय को एकजुट रखने वाले की प्रतिबद्धता है।”

पत्र में लिखा गया है, “एक ऐसा व्यक्ति जिसने हर काम परिवार और समुदाय के लिए किया हो, उसकी ऐसी हालत देख कर हम सकते में हैं। हम सम्मानपूर्वक अनुरोध करते हैं कि इस पत्र के जरिए कलीनल दिरी के व्यक्तित्व को समझा जाए। उनके योगदान भले ही सुर्खियाँ न बनें, लेकिन समुदाय के लिए काफी सकारात्मक रहे हैं।”

अल-इहसान सेंटर ने एक बलात्कारी को एक नायक और पीड़ित के रूप में पेश किया क्योंकि वह एक मुसलमान है। उसे उस वक्त उस बच्ची के बारे में नहीं सोचा, जिसे 12 साल की उम्र में डिरी की दरिंदगी का सामना करना पड़ा। इस्लामिक सेंटर ने घटना का जिक्र तक नहीं किया, निंदा करना तो दूर की बात है।

ब्रा लहराकर शुरू हुआ तख्तापलट, आज हिंदू युवतियों को नंगा करने पर पहुँचा: बांग्लादेश में महिलाओं के लिए ‘त्रासदी’ था बीता 1 साल, ‘सेकुलर’ युनूस सरकार का हासिल केवल ‘इस्लामी कट्टरपंथ’

बांग्लादेश में तख्तापलट को 1 साल पूरे हो गए हैं। आज से ठीक 12 महीने पहले बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अचानक अपने ही मुल्क को छोड़कर भागना पड़ा था क्योंकि वहाँ की कथित ‘छात्र युवा शक्ति’ ने प्रधानमंत्री आवास पर हमला बोल दिया था। इस अटैक के बाद जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं उन्हें कभी कोई नहीं भुला सकता और उसके बाद जो हुआ उसे पूरी दुनिया देख रही है।

एक साल पहले मीडिया में जिस ‘छात्र प्रदर्शन’ को क्रांतिकारी बताया जा रहा था उसका अंत पूर्व प्रधानमंत्री के अंडरगार्मेंट फैलाने से हुआ। याद करिए कैसे छात्रों के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ प्रधानमंत्री आवास में घुसी थी और तमाम सामान चुराने के साथ ब्रा-ब्लाउज को चुराकर ले भागे थे। उस दिन बांग्लादेश में हसीना सरकार की सत्ता का अंत था और हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार में बढ़ौतरी की शुरुआत।

हाल में बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में जानकारी दी गई थी 4 अगस्त से 30 जून के बीच 330 दिनों की अवधि में देश भर में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की कुल 2442 घटनाएँ हुईं। इनमें हत्या, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, धार्मिक स्थल पर हमले, ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तारियाँ, घर-व्यवसाय पर कब्जा जैसे मामले शामिल थे।

ऑपइंडिया, पहले बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार को लेकर अपनी विस्तृत रिपोर्ट कर चुका है। आज कुछ घटनाएँ याद दिलाकर हम आपको ये बताएँगे कि पिछले एक साल में कैसे हिंदू महिलाओं के साथ इस्लामी कट्टरपंथियों ने सुलूक किया।

  • बात 26 जून 2025 की है। बांग्लादेश के कुमिल्ला में एक हिंदू महिला अपने मायके रहने आई थी। जब बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी के नेता फजोर अली ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया। फजोर अली ने उसे घर में अकेला पाकर उसके साथ बलात्कार किया और उसकी रोती-चीखती नंगी वीडियो बनाई और उसे वायरल भी किया। वीडियो में महिला हाथ जोड़कर रोते हुए हुए उसे छोड़ने को कह रही थी, मगर फरोज के साथ खड़े एक शख्स को उस पर एक भी बार दया नहीं आई। अंत में पीड़िता मदद के लिए और तेज चिल्लाई तो आखिर में पड़ोसी मदद के लिए पहुँचे। पीड़िता को अस्पताल ले जाया जहाँ पुष्टि हुई कि उसके साथ दुष्कर्म किया गया है।
  • अगला मामला। शेख हसीना सरकार के जाने के चंद दिनों बाद का है। सतखीरा जिले में 30-35 लोगों की भीड़ एक हिंदू महिला के घर में घुसी। फिर उसके घर को लूटा और बाद में उसे गौशाला ले गए जहाँ उसे चुप रहने की धमकी देकर सबने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। दुष्कर्म के बाद महिला अचेत अवस्था में थी। उसे अस्पताल ले जाया गया और पूछा गया लेकिन महिला ने बताया कि उसके साथ जिन्होंने कुकर्म किया वो उनमें से किसी को नहीं पहचान सकती क्योंकि उसके मुँह पर मास्क था।
  • 52 साल की एक अन्य हिंदू महिला भी बांग्लादेशी कट्टरपंथियों की दरिंदगी का शिकार 24 दिसंबर 2024 को हुई थी। बसना के साथ गैंगरेप हुआ था। कट्टरपंथियों ने न केवल उसे शारीरिक प्रताड़नाएँ दी थी बल्कि उसे मानसिक रूप से भी परेशान किया था। महिला को अपने साथ हुई घटना पर इतना लज्जित महसूस हुआ कि उन्होंने खुद कीटनाशक पीकर हत्या कर ली।
  • इसी तरह एक हिंदू महिला ने अपने घर हुई लूटपाट की जानकारी देते हुए बताया कि इस्लामी कट्टरपंथियों ने घर में घुस सिर्फ सामान नहीं लूटा बल्कि वह तलवार-धारदार हथियार के दमपर घर की एक महिला को पकड़ लिया और उसे दूसरे कमरे में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म भी किया। गनीमत बस इतनी रही कि उन्होंने उसकी जान को बख्श दिया क्योंकि परिवार के मुताबिक इस्लामी कट्टरपंथी महिला का गला काटना चाहते थे।

हिंदू महिलाओं के साथ हुई ये घटनाएँ अंतिम खबरें नहीं है। इनकी लिस्ट लंबी है। अब भी ऐसे तमाम मामलों से मीडिया भरा पड़ा हुआ है। वहीं अनगिनत वीडियोज सोशल मीडिया पर मौजूद हैं जिनमें हिंदू महिलाएँ रो-रोकर अपनी व्यथा बता रही हैं, लेकिन सुनवाई के नाम पर कोई एक्शन तक नहीं लिया होता।

शेख हसीना की सरकार जाने के बाद हिंदू कई रात अपने घर, अपने मंदिर, अपनी महिलाओं की रक्षा में जागते रहे। उन्होंने बार-बार गुहार लगाई कि उनकी मदद की जाए, उन्हें बचाया जाए, सरकार देश में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल रहें, अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करें… लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

आज जब उस तख्तापलट को हुए 1 साल हो गया है। इस्लामी कट्टरपंथियों के दबदबे से मुल्क गर्त में रोज नए तरीके से ढकेला जा रहा है। न सांस्कृतिक विरासत बच पा रही है और न ही संस्कृति बचाने वाले। चुन-चुनकर हिंदू धर्मस्थलों को निशाना बनाया जाता है। समय-समय पर हिंदू विरोधी की हिंसा की बात सामने आती है… और जहाँ तक हिंदू महिलाओं के अधिकारों को संरक्षित करने की बात है तो इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वहाँ इस्लामियों की सत्ता आने के बाद से सभी महिलाओं की आवाज दबाने की बात हो रही है।

महिला आयोग करो खत्म, लड़कियों को खेलने मत दो: इस्लामी जमातों के तर्क

अप्रैल 2025 की खबर पढ़िए। बांग्लादेश में इस्लामवादी गठबंधनों ने एक माँग उठाई थी कि देश में जो सरकारी महिला आयोग चल रहा है उसे खत्म किया जाए। इस माँग को करते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों ने कहा था- समानता सुनिश्चित करना एक पश्चिमी विचारधारा है। पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता नहीं रखी जानी चाहिए।

इसके अलावा जनवरी 2025 में खबर आई थी कि इस्लामी संगठनों के दबाव में आकर महिलाओं का एक फुटबॉल मैच को रद्द करना पड़ा था क्योंकि ये मैच इस्लामी कट्टरपंथियों को नहीं पसंद था। उन्होंने मैच से कुछ दिन पहले ही सैंकड़ों की तादाद में इकट्ठा होकर आयोजन स्थल पर हमला कर दिया और हर जगह तोड़फोड़ कर दी थी। एक स्कूल के प्रिंसिपल ने तो यहाँ तक कहा था कि लड़कियों का फुटबॉल खेलना गैर-इस्लामी है। ये मजहबी जिम्मेदारी है ऐसी चीजों को रोका जाए तो इस्लामी मान्यता के खिलाफ हों।

प्रधानमंत्री मोदी से लड़कियों ने माँगी मदद

बता दें कि बांग्लादेश में महिलाएँ अपनी सुरक्षा को लेकर इतनी व्यथित हो चुकी थीं कि उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर सामने आए एक पत्र के अनुसार बांग्लादेशी हिंदू लड़कियों ने पीएम मोदी से गुहार लगाई थी कि उन्हें बचा लिया जाए। पत्र में लिखा था- “हमारे साथ बांग्लादेश में बहुत बुरी चीजें हो रही हैं। हम पर सुनियोजित तरीके से हमले और अत्याचार किए जा रहे हैं। मैं आपको इस स्थिति का वर्णन नहीं कर सकती।”

इस पत्र में लड़की ने लिखा था कि बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकी समूह ने हिंदुओं पर अकल्पनीय अत्याचार शुरू किए हैं। लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहा, घरों-मदिरों पर गोलीबारी हो रही है, हिंदुओं के व्यवसायों को लूटा जा रहा है और संपत्ति न देने पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है। इस पत्र की प्रमाणिकता क्या है ये तो नहीं पता लेकिन इसे शेयर करने वाले रिटार्यड फौजी हैं और उन्होंने दावा किया था कि इस पत्र को एक बांग्लादेशी लड़की ने ही लिखा है।

पत्र वो किस लड़की ने लिखा यहाँ ये जानना जरूरी नहीं है बल्कि ये जानना जरूरी है कि ये स्थिति आई कैसे। 4-5 अगस्त को बांग्लादेश में यूँही तख्तापलट नहीं हो गया था। इसी पृष्ठभूमि उसी समय से तैयार होने लगी थी जब शेख हसीना की पार्टी ने आम चुनाव में जीत हासिल की और लगातार चौथी बार अपनी सरकार बनाई।

छात्र प्रदर्शन था इस्लामी कट्टरपंथ की साजिश

5 जून से बांग्लादेश में एक प्रदर्शन शुरू हुआ जो सरकारी नौकरी से 30% कोटा हटाए जाने के विरोध में शुरू हुआ। 1जुलाई को बांगलादेश बंद की घोषणा करते हुए सड़के और रेलवे लाइन तक जाम कर दी गई। इस दौरान पूर्व सरकार ने स्थिति संभालने के प्रयास करते हुए इंटरनेट ब्लॉक किए, कर्फ्यू लगाए, लेकिन प्रदर्शन हल्का नहीं हुआ। 18 जुलाई के आसपास ये प्रदर्शन और व्यापक स्तर पर मीडिया में दिखाया जाने लगा। 4 अगस्त को खबर आई कि प्रदर्शनकारी और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हो गई है और 5 अगस्त को उनके पीएम आवास में घुसकर लूटपाट करने की खबर आई।

दिलचस्प बात ये है कि 5 अगस्त तक ये पूरा प्रदर्शन ‘छात्र प्रदर्शन’ बताकर मीडिया में फैलाया गया था, लेकिन बाद शेख हसीना के मुल्क छोड़ते ही नजर आने लगा कि इन सबमें इस्लामी कट्टरपंथियों का क्या हाथ था। शेख हसीना के आवास से निकालकर ब्रा और ब्लाउज लहराने वाली उपद्रवी मानसिकता हिंदुओं के घरों पर चुन-चुनकर अटैक करने लगी। उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं को ऐसे निशाना बनाया जैसे वो इसी अवसर की फिराक में थे। करीबन 3-4 दिन हमलों की अनगिनत खबरें सामने आईं। इसके बाद 8 अगस्त को घोषणा की गई कि नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनूस अंतरिम सरकार के प्रमुख बनें और अगले चुनाव तक देश संभाले। सत्ता हाथ में आते ही युनूस सरकार ने दिखावा किया कि वो अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों के खिलाफ एक्शन लेंगे, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। उलटा जिन लोगों पर हिंसा के केस थे उनपर से केस वापस लेने तक की खबरें आईं और ये पता चला कि सेकुलर चेहरा दिखाते हुए जिसे मुल्क संभालने को दिया गया उस पर तो असल पमें कट्टरपंथ का रंग चढ़ा हुआ है।

POK के गाँव से लोगों ने खदेड़ा LeT का कमांडर… ‘ऑपरेशन महादेव’ में मारे गए आतंकी के ‘जनाजा-ए-गायब’ में शामिल होने आया था, जानें क्या होता है ये

ऑपरेशन महादेव के तहत मारे गए आतंकी ताहिर का पीओके के रावलकोर्ट के खाई गाला गाँव में जनाजा निकला। लेकिन ये आम जनाजा नहीं बल्कि ‘जनाजा ए गायब’ था। इस दौरान आतंकियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

दरअसल ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर ए तैयबा के आतंकी शामिल होना चाहते थे। उसे देख कर रावलकोट के खाई गाला गाँव के लोगों का गुस्सा भड़क उठा। गाँव वालों ने लश्कर के कमांडर रिजवान हनीफ को खदेड़ दिया। दरअसल ताहिर के परिवार ने साफ मना कर दिया था कि ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर के आतंकियों को शामिल होने की जरूरत नहीं है।

इसके बावजूद लश्कर का स्थानीय कमांडर रिजवान हनीफ वहाँ पहुँच गया। उसके साथियों ने गाँव वालों को बंदूक दिखा कर डराना चाहा। इस पर गाँव वालों का गुस्सा भड़क उठा। आतंकियों और ग्रामीणों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। इसके बाद लोगों ने लश्कर के आतंकियों को गाँव से खदेड़ दिया।

आतंकवाद का विरोध करने लगी है पीओके की जनता

घटना से साफ पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान शामिल था, वहीं ये भी सामने आया कि पीओके की जनता अब आतंकियों के खिलाफ खुल कर अपना विरोध जता रही है। आतंकी ताहिर के ‘जनाजा ए गायब’ को आतंकियों की भर्ती का जरिया बनाना चाहते थे। भारत के खिलाफ जहर उगलना चाहते थे। लेकिन ग्रामीणों ने उनकी नहीं सुनी। लोग अब हर हाल में अपने बच्चों को आतंकी बनने से बचाना चाहते हैं। इसलिए ग्रामीण अब आतंकियों के खिलाफ सार्वजनिक बहिष्कार की योजना बना रहे हैं। ये पीओके में आई नई सोच और जागरुकता को दर्शाता है।

घटना को लेकर कुइयाँ और ख्याला क्षेत्र के ग्रामीण एक सार्वजनिक ‘जिगरा’ यानी पारंपरिक परिषद की बैठक करना चाहते हैं। बैठक में आतंकवाद का विरोध करेंगे। ‘जनाजा एक गायब’ के बाद एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे से पूछ रहा है, “ये कौन लोग हैं जो हमारे बच्चों का ब्रेनवॉश करते हैं और भारत जैसी सैन्य शक्ति के खिलाफ खड़ा करते हैं।”

क्या होता है ‘जनाजा ए गायब’

‘जनाजा ए गायब’ शवों की गैरमौजूदगी में किया जाना वाला सुपुर्दे खाक का एक तरीका है। इस्लामी परंपरा के मुताबिक जब किसी मुस्लिम की मौत ऐसी जगह हो जाए, जहाँ से शव न आ पाए और जनाजे की नमाज पढ़ने के लिए कोई मौजूद न हो, तो उसके परिजन शव की गैरमौजूदगी में नमाज अदा करते हैं और अंतिम दुआ करते हैं।

कौन था ताहिर हबीब

ताहिर पाकिस्तान का आतंकी था। लश्कर ए तैयबा में शामिल होने से पहले वह पाकिस्तानी फौज में था। वह पाकिस्तानी छात्र संगठन इस्लामी जमीयत तलाबा का सदस्य भी रहा है। उसने स्टूडेंट लिबरेशन फ्रंट से भी कनेक्शन थे। वह अफगानिस्तान के सदोजाई पठान समुदाय था था, जो 18वीं शताब्दी में अफगानिस्तान से आकर पुंछ के इलाके में बस गए थे। उसके समुदाय सरोजाई पठान ने पुंछ विद्रोह में अहम भूमिका निभाई थी। अफगान कनेक्शन की वजह से खुफिया रिकॉर्ड में उसे ‘अफगानी’ नाम दिया गया।

भारत ने मोस्ट वॉटेड आतंकी उसे घोषित किया था। पहलगाम हमले में उसने अहम भूमिका निभाई थी। इस हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया और पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के साथ-साथ आतंकियों को टारगेट करने के लिए ‘ऑपरेशन महादेव’ शुरू किया गया। इसके तहत पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों का एनकाउंटर कश्मीर की दुर्गम घाटी में किया गया।

भारत में आतंकियों के शवों का क्या किया जाता है?

अगर आतंकी भारत का है और उसकी पहचान हो जाती है तो उसके शव को परिजनों को सौंप दिया जाता है। लेकिन परिजन जब आतंकी के शव को लेने से मना कर दें तो उस आतंकी की रीति रिवाज के मुताबिक दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है। इसका खर्च स्थानीय प्रशासन वहन करता है।

अगर पाकिस्तान या दूसरे देश का आतंकवादी होता है, तो पहले शव को पाकिस्तान या संबंधित देश को सौंपने की कोशिश की जाती है। अगर संबंधित देश शव को ले जाने को तैयार नहीं होता है तो आतंकी के शव को गुप्त रूप से उसके रीति रिवाज के मुताबिक दफना दिया जाता है। आम तौर पर सुरक्षा कारणों से इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है।

अडानी ग्रुप ने BYD और बीजिंग वेलियन के साथ सहयोग की खबरों का किया खंडन, ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट को बताया आधारहीन: बैटरी निर्माण को लेकर चीनी कंपनियों संग पार्टनरशिप का किया था दावा

अडानी ग्रुप ने ब्लूमबर्ग की उस रिपोर्ट का खंडन किया है, जिसमें दावा किया गया था कि ग्रुप चीनी कंपनियों BYD और बीजिंग वेलियन न्यू एनर्जी टेक्नोलॉजी के साथ बैटरी निर्माण और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की योजना बना रहा है। अडानी ग्रुप की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में स्पष्ट किया कि ऐसी कोई बातचीत या सहयोग की योजना नहीं है।

कंपनी ने ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट को ‘आधारहीन, गलत और भ्रामक’ बताया है। ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अडानी ग्रुप, जो भारत में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है, चीनी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता BYD के साथ मिलकर भारत में बैटरी निर्माण शुरू करने की दिशा में काम कर रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, गौतम अडानी स्वयं BYD के अधिकारियों के साथ बातचीत कर रहे थे और यह चर्चा पिछले हफ्ते तक चली थी। इसका मकसद लिथियम-आयन बैटरी का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना था, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के लिए जरूरी है।

इसके अलावा ब्लूमबर्ग ने यह भी दावा किया कि अडानी ग्रुप बीजिंग वेलियन न्यू एनर्जी टेक्नोलॉजी और अन्य चीनी कंपनियों के साथ भी बातचीत कर रहा है, साथ ही यूरोपीय और दक्षिण कोरियाई बैटरी निर्माताओं से भी संपर्क में है।

हालाँकि, अडानी ग्रुप ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। कंपनी ने कहा कि वह न तो BYD के साथ बैटरी निर्माण के लिए कोई सहयोग कर रही है और न ही बीजिंग वेलियन के साथ किसी तरह की साझेदारी की बात चल रही है। ग्रुप ने यह भी दोहराया कि वह भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्रांति में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

अडानी ग्रुप पहले से ही सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में काम कर रहा है। कंपनी अपनी सौर मॉड्यूल उत्पादन क्षमता को 10 गीगावाट प्रति वर्ष तक बढ़ाने और पवन टरबाइन उत्पादन को 5 गीगावाट तक दोगुना करने की योजना बना रही है। साथ ही ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण की सुविधा विकसित करने पर भी काम चल रहा है।

भारत और चीन के बीच तनाव, जैसे सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा, इस तरह के सहयोग को जटिल बनाते हैं। ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि चीन ने अप्रैल से भारतीय ऑटोमोबाइल कंपनियों को रेयर अर्थ मैग्नेट का निर्यात रोक दिया है और भारत ने BYD के वरिष्ठ अधिकारियों को वीजा देने से इनकार कर दिया है, जिसके कारण बैठकें पड़ोसी देशों में हो रही थीं। फिर भी अडानी ग्रुप ने साफ किया कि वह किसी भी चीनी कंपनी के साथ साझेदारी की दिशा में काम नहीं कर रहा है।

इजरायली मंत्री ने अल-अक्सा मस्जिद परिसर में जाकर की प्रार्थना तो इस्लामी मुल्कों को लगी मिर्ची, पाकिस्तान बताने लगा शांति को खतरा: सऊदी अरब-जॉर्डन ने भी की निंदा

इजरायल के सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन-ग्वेर ने यरुशलम में अल-अक्सा मस्जिद परिसर का दौरा कर वहाँ प्रार्थना की है। पूर्वी यरुशलम के जिस परिसर में बेन-ग्वेर ने प्रार्थना की है उसे यहूदी ‘टेंपल माउंट’ कहते हैं।

इस स्थल को लेकर नियम है कि यहूदी वहाँ जा सकते हैं लेकिन उन्हें प्रार्थना करने की अनुमति नहीं है। बेन-ग्वेर के इसका एक वीडियो अपने X अकाउंट पर भी शेयर किया है जिसके बाद बवाल मच गया है और कई इस्लामी देशों ने उनके इस कदम की निंदा की है।

बेन-ग्वेर का यह दौरा ‘तिशा बाव’ के दिन हुआ है। यह दिन यहूदी धर्म में एक उपवास और शोक का दिन होता है। इसे यरुशलम में यहूदियों के पहले और दूसरे पवित्र मंदिरों के विनाश समेत यहूदी इतिहास की त्रासदियों की याद में मनाया जाता है।

परिसर की मौजूदा स्थिति

मान्यता है कि सोलोमन राजा ने 1000 ईसा पूर्व में यहूदियों के लिए इसी जगह पर दो मंदिर बनवाए थे। वहीं, मुसलमानों के लिए तीसरा सबसे पवित्र स्थान है और मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद यहीं से जन्नत की यात्रा पर गए थे। यहूदियों के मंदिर के स्थान पर अब केवल एक दीवार बची है जिसे ‘वेस्ट वॉल’ कहा जाता है।

ईसाइयों में मान्यता है कि इस ‘वेस्ट वॉल’ के पास ही यीशू का जन्म हुआ था और वे भी इसे पवित्र मानते हैं। 1967 के युद्ध में इजरायल ने इसे जॉर्डन से अपने कब्जे में लिया था और दोनों देशों के बीच इसे लेकर समझौता हुआ था।

मौजूदा व्यवस्था के तहत जॉर्डन को इस जगह का पारंपरिक संरक्षक बने रहने की अनुमति है। वहीं, इजरायल के पास सुरक्षा और यहां किसी के पहुंचने की अनुमति देने की जिम्मेदारी है। यहाँ अक्सर झड़पें होती रहती हैं।

इज़रायल के पीएम और इस्लामिक मुल्कों ने क्या कहा?

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बेन-ग्वेर की यात्रा को लेकर एक बयान जारी किया है। नेतन्याहू के बयान में कहा गया कि टेंपल माउंट पर यथास्थिति बनाए रखने की इज़राइल की नीति न तो बदली है और न ही बदलेगी।

हालाँकि, सऊदी अरब, पाकिस्तान और जॉर्डन समेत कई इस्लामिक मुल्कों ने इसकी निंदा की है। इस स्थल के संरक्षक जॉर्डन ने बेन-ग्वेर की इस यात्रा को ‘उकसावे वाली यात्रा’ बताया है। फलस्तीनी अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस यात्रा से ‘सभी हदें पार हो गई हैं’। सऊदी अरब ने भी इस कदम की निंदा करते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधियाँ क्षेत्र में संघर्ष को बढ़ावा देती हैं।

पाकिस्तान ने क्या कहा?

दुनिया में धार्मिक कट्टरता के लिए कुख्यात पाकिस्तान को भी इससे मिर्ची लग गई है। जो देश अपने यहाँ अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को नष्ट करता है वो भी इजरायल को शांति का पाठ पढ़ा रहा है। खुद सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर पाकिस्तान यहूदियों को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे लेकर X पर एक लंबा पोस्ट लिखा है। शहबाज ने बेन-ग्वेर की यात्रा की निंदा करते हुए लिखा, “यह अपवित्रता न केवल दुनिया भर के मुसलमानों का अपमान है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवता की चेतना पर सीधा हमला है।”

शहबाज ने आगे लिखा, “इस तरह के उकसावे शांति की संभावनाओं को खतरे में डालते हैं। इजरायल की बेशर्म हरकतें जानबूझकर फिलीस्तीन और पूरे इलाके में तनाव को भड़का रही हैं, जिससे मध्य पूर्व संघर्ष की ओर बढ़ रहा है।” पाकिस्तान ने इलाके में शांति की बात कही है।

सच्चे भारतीय होते तो नहीं करते ऐसी बात… सेना पर राहुल गाँधी ने दिया अपमानजनक बयान तो सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा: गलवान की लड़ाई के दौरान भी आर्मी का मनोबल गिरा रहे थे कॉन्ग्रेस नेता

भारतीय सेना पर आपतिजनक बयान देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी को लताड़ लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर राहुल गाँधी सच्चे भारतीय होते तो वह सेना पर ऐसा बयान नहीं देते। राहुल गाँधी से सुप्रीम कोर्ट ने उनके बयान का आधार भी पूछा है।

यह टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 अगस्त, 2025) को की हैं। सुप्रीम कोर्ट लोकसभा में अब नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। राहुल गाँधी ने इन बयानों पर दर्ज मामले रद्द करने की माँग की थी। इसको लेकर वह सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस याचिका की सुनवाई करते हुए कहा, “आपको कैसे पता चला कि चीन ने 2000 वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है? क्या आप वहाँ थे? क्या आपके पास कोई विश्वसनीय जानकारी है? आप बिना किसी सबूत के ये बयान क्यों दे रहे हैं… अगर आप सच्चे भारतीय होते, तो ये सब नहीं कहते।” सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी का पक्ष रख रहे वकील अभिषेक मनु सिंघवी से यह बातें कहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी से कहा कि उन्हें अगर यह सब बयान देने हैं तो संसद में जाकर यह सब कह सकते हैं। शीर्ष अदालत ने प्रश्न उठाया कि उन्हें यह सब बातें सोशल मीडिया पोस्ट में क्यों कहनी होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सैनिकों के नुकसान को लेकर भी राहुल गाँधी पर प्रश्न उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई लड़ाई होती है तो दोनों तरफ के सैनिक मारे जाते हैं या नुकसान होता है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि इसमें अजीब सा क्या है।

सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि राहुल गाँधी को राहत दे दी। राहुल गाँधी के खिलाफ दर्ज मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। उनकी केस खत्म करने की अर्जी सुप्रीम कोर्ट ने नहीं स्वीकार की। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

क्या था मामला?

राहुल गाँधी पर यह मामला सीमा सड़क संगठन के एक अधिकारी ने दर्ज करवाया था। उन्होंने कहा था कि 2022 में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने सेना का अपमान किया है। उनके बयान में भारतीय सैनिकों के चीनी सैनिकों से ‘पीटे जाने’ की बात कही गई थी।

राहुल गाँधी ने कहा था, “लोग भारत जोड़ो यात्रा, अशोक गहलोत और सचिन पायलट वगैरह के बारे में तो पूछेंगे ही। लेकिन चीन द्वारा 2000 वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर कब्ज़ा करने, 20 भारतीय सैनिकों को पीटने और अरुणाचल प्रदेश में हमारे सैनिकों की पिटाई के बारे में एक भी सवाल नहीं पूछेंगे। लेकिन भारतीय प्रेस उनसे इस बारे में एक भी सवाल नहीं पूछता। क्या यह सच नहीं है?”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस बयान पर दर्ज मामले को रद्द करने से मई, 2025 में मना कर दिया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं है कि कोई सेना का अपमान करेगा। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने राहुल गाँधी को समन भी किया था।

गलवान की लड़ाई के दौरान चीन के पक्ष में दिखे थे राहुल गाँधी

राहुल गाँधी ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ही नहीं बल्कि जून, 2020 में गलवान लड़ाई के दौरान भी सेना और सरकार का साथ नहीं दिया था। कहीं उन्होंने हजारों वर्ग किलोमीटर चीन के हाथ चले जाने की बात कही थी तो कहीं सैनिकों की सुविधाओं को लेकर बात कर रहे थे। वह कह रहे थे कि सरकार सो रही है और चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है। यह सारे बयान एस समय में दिए जा रहे थे जब चीन के खिलाफ पूरा देश चीन के साथ खड़ा था।

गलवान की लड़ाई के बाद जारी हुए चीन से तनाव के बीच राहुल गाँधी के दिल्ली में चीनी राजदूत से मिलने की खबर भी सामने आई थी। राहुल गाँधी इस पर कुछ स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए थे। इसके अलावा कॉन्ग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भी आपस में समझौता करने की रिपोर्ट्स आ चुकी हैं। भाजपा ने यह भी आरोप लगाया है कि राजीव गाँधी फाउंडेशन ₹1 करोड़ से अधिक का चन्दा चीन से ले चुका है। राजीव गाँधी फाउंडेशन का FCRA लाइसेंस भी कैंसिल हो गया था।

50 हजार की इनामी अम्मी के फर्जी साइन किए, कोर्ट में डाल दी करोड़ों की दौलत छुड़ाने की याचिका: मुख्तार अंसारी के बेटे उमर को UP पुलिस ने दबोचा, वकील भी गिरफ्तार

यूपी पुलिस ने पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी का बेटा उमर अंसारी को गिरफ्तार कर लिया है। उसने अपनी अम्मी अफ्शा अंसारी की फर्जी हस्ताक्षर कर कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। जब हस्ताक्षर का मिलान गया तो ये फर्जी पाया गया। इसके बाद उमर अंसारी को यूपी की मुहम्मदाबाद पुलिस ने रविवार (3 अगस्त 2025) को हजरतगंज पुलिस की मदद से दाउलशफा में विधायक निवास से गिरफ्तार किया। उसे गाजीपुर ले जाया गया है।

अम्मी की फर्जी हस्ताक्षर किए उमर अंसारी ने

दरअसल गाजीपुर में फर्जी हस्ताक्षर का मामला सामने आया था। उमर अंसारी ने अपनी अम्मी 50 हजार की इनामी और फरार चल रही अफ्शा अंसारी के हस्ताक्षर किए थे। उसने यूपी गैंगस्टर अधिनियम की धारा 14 (1) के तहत जब्त संपत्ति को छुड़वाने के लिए कोर्ट में याचिका दायर की थी। ये संपत्ति मृतक पिता मुख्तार अंसारी के जुड़ी थी। पुलिस की टीम ने मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शन की पार्टनरशिप डीड में अफ्शा अंसारी के हस्ताक्षर और याचिका में किए गए हस्ताक्षर में काफी अंतर पाया।

जाँच में ये भी सामने आयी कि याचिका में अफ्शा अंसारी का हस्ताक्षर नहीं है और ये फर्जी हस्ताक्षर उसके बेटे उमर अंसारी ने किया है। इसके बाद पुलिस ने जानबूझ कर फर्जी दस्तावेज बनाने और कोर्ट को गुमराह करने के आरोप में उमर अंसारी पर कई धाराओं में केस दर्ज किया।

गाजीपुर के एसपी डॉक्टर ईरज राजा के मुताबिक, ” मुख्तार अंसारी की गैंगस्टर एक्ट के तहत जो संपत्ति कुर्क की गई थी, उसे छुड़ाने के लिए फर्जीवाड़ा किया गया। उमर ने संपत्ति को छुड़ाने के लिए कोर्ट में अर्जी दायर थी, उसमें अपनी अम्मी अफशां अंसारी का फर्जी हस्ताक्षर कर कोर्ट को गुमराह किया “

वकील लियाकत अली पर एफआईआर दर्ज

इस मामले में उमर अंसारी के वकील लियाकत अली पर एफआईआर दर्ज की गई है। कोर्ट में वकील ने फर्जी हस्ताक्षर वाले दस्तावेज पेश किए। पुलिस ने इस मामले में उसे भी बराबर का दोषी माना है। पुलिस अन्य पहलुओं की जाँच कर अन्य दोषियों पर भी कड़ी कार्रवाई करेगी।

चीनी और इस्लामी कट्टरपंथियों ने फैलाई US के साथ ट्रेड बंद करने की खबर, ताकि लोगों में फैल जाए पैनिक: MEA ने खारिज की अफवाहें, भारत-अमेरिका के बीच FTA पर बातचीत जारी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ के ऐलान के बाद सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट की बाढ़ आ गई, जिसमें भारत-अमेरिका के बीच सबकुछ ‘सही’ नहीं होने की बात कही जा रही थी। यही नहीं, दावे ये भी किए जा रहे थे कि अब भारत अमेरिका के साथ कोई संबंध नहीं रखेगा और वो अमेरिका पर पलटवार की तैयारी कर रहा है। भारत अब अमेरिका की ‘शत्रुतापूर्ण आर्थिक नीतियों’ के जवाब में ‘दोगुना’ तक टैरिफ लगा देगा।

भारत-अमेरिका के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट चीन समर्थित या इस्लामी देशों से जुड़े दिखने वाले हैंडल्स से लगातार किए जा रहे थे। ऐसे ही एक हैंडल ‘मिडिल ईस्टर्स अफेयर्स’ की पोस्ट में दावा किया गया कि अगर अमेरिका अपनी ‘होस्टाइल’ नीतियों को नहीं बदलता है, तो भारत सरकार अमेरिका से साथ सभी व्यापारिक समझौतों को रद्द कर सकती है।

इसी तरह से ‘चाइना इन इंग्लिश’ नाम के हैंडल से बाकायदा एक लिस्ट ही जारी कर दी गई, जिसके इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट को लेकर भारत सरकार फैसले लेने वाली है। दावा किया गया कि भारत अमेरिका को देने वाली व्यापार छूटों को खत्म कर देगा।

हालाँकि विदेश मंत्रालय ने उन अफवाहों को सिरे से खारिज कर दिया है। मंत्रालय की फैक्ट चेक यूनिट ने साफ कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है। ये भी साफ कर दिया गया है कि भारत सरकार फिलहाल किसी भी जल्दबाजी में नहीं है। वो अमेरिका को दी गई व्यापारिक छूटों को वापस लेने या समीक्षा करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा रही।

बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जो 1 अगस्त से लागू हो चुका है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर भारत की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत के टैरिफ दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और रूस को अपनी अर्थव्यवस्थाओं के साथ ‘डूब जाना चाहिए।’ ट्रंप का यह बयान भारत द्वारा रूस से तेल और सैन्य उपकरण खरीदने के कारण भी आया, क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बीच अमेरिका इससे नाराज है।

इन तनावों के बावजूद भारत और अमेरिका व्यापारिक रिश्तों को बेहतर करने की दिशा में काम कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देश आपसी सहमति से लाभकारी व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि वर्चुअल मोड में चर्चा चल रही है और 24 अगस्त को अमेरिकी व्यापार वार्ता टीम नई दिल्ली आएगी। इस दौरे में छठे दौर की वार्ता होगी, जिसमें व्यापारिक मुद्दों को सुलझाने पर जोर रहेगा।

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ‘स्वदेशी’ अपनाने का आह्वान किया है, ताकि भारतीय उत्पादों को बढ़ावा मिले। वहीं, विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही गलत खबरें, जैसे कि भारत का ‘कोई सम्मान नहीं तो कोई छूट नहीं’ जैसा बयान, पूरी तरह बेबुनियाद हैं। सरकार का ध्यान व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने पर है, न कि उन्हें तोड़ने पर।

कर्नाटक धर्मस्थल में सामूहिक दफनाने की जाँच में सिर्फ पुरुष हड्डियाँ मिलीं, SIT की 10 जगहों की खुदाई बेनतीजा: सफाईकर्मी के दावों पर उठने लगे सवाल, क्या हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश?

कर्नाटक के एक धर्मस्थल से जुड़े सामूहिक दफनाने के मामले में SIT की जाँच फिलहाल सवालों के घेरे में है। सफाईकर्मी ने दावा किया था कि धर्मस्थल के आसपास 13 जगहों पर महिलाओं और लड़कियों के शव दफनाए गए हैं।

(29 जुलाई 2025) से शुरू हुई खुदाई में अब तक 10 जगहों की जाँच हो चुकी है, लेकिन ज्यादातर जगहों से कोई मानव अवशेष नहीं मिले। सिर्फ (31 जुलाई 2025) को नेत्रवती नदी के पास छठे स्थान से कुछ मानव हड्डियाँ मिलीं, जो प्रारंभिक जाँच में एक पुरुष की बताई गईं। वहाँ से करीब 15 हड्डियाँ मिलीं, जिनमें खोपड़ी नहीं थी।

इसके अलावा, जाँच के दौरान एक महिला का डेबिट कार्ड और एक पुरुष का पैन कार्ड भी मिला। पैन कार्ड नेलमंगला के रहने वाले सुरेश का निकला, जिसकी मार्च 2025 में पीलिया से मौत हो चुकी है।

पुलिस को शक है कि सुरेश ने मरने से पहले धर्मस्थल में पैन कार्ड खोया होगा। डेबिट कार्ड की जानकारी के लिए बैंक से संपर्क किया गया है। अब तक की जाँच में न तो कोई महिला का शव मिला है, न ही सफाईकर्मी के दावों को पुख्ता करने वाला कोई ठोस सबूत।

वहीं, सफाईकर्मी के खिलाफ भी फिलहाल किसी तरह की झूठी जानकारी देने का कोई सबूत नहीं मिला है। ऐसे में पूरा मामला अब और उलझता जा रहा है।

एक चश्मदीद गवाह एसआईटी के सामने पेश हुआ

जयंत टी नाम का एक व्यक्ति शनिवार (2 अगस्त 2025) को बेल्थांगडी में SIT के सामने पेश हुआ। उसने दावा किया कि उसे कथित सामूहिक दफनाने के मामले में अहम जानकारी है और वह इसकी गवाही दे सकता है।

जयंत ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उसने खुद अपनी आँखों से कई जगहों पर अवैध रूप से किए गए दफनाने के काम को देखा हैं, इसलिए उसे इस मामले की प्रत्यक्ष जानकारी है।

केस की सुनवाई कर रहे जज ने खुद को किया अलग

बेंगलुरु के 10वें कोर्ट के जज विजय कुमार राय बी ने धर्मस्थल सामूहिक दफनाने के मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने कोर्ट को आवेदन देकर यह केस किसी और अदालत में भेजने की अपील की है।

यह फैसला तब आया जब कुछ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि जज ने उसी संस्था के स्कूलों से पढ़ाई की है, जो धर्मस्थल मंदिर ट्रस्ट चलाता है। साथ ही, कहा जा रहा है कि उन्होंने राज्यसभा सांसद वीरेंद्र हेगड़े का प्रतिनिधित्व करने वाली एक कानूनी फर्म में जूनियर वकील के रूप में काम भी किया था।

इसी केस से जुड़ी एक याचिका में वीरेंद्र हेगड़े के भाई डी. हर्षेंद्र कुमार ने 8,000 से ज्यादा सोशल मीडिया पोस्ट, खबरें और वीडियो हटाने की माँग की थी। उनका कहना था कि इनमें उनके, उनके परिवार और मंदिर संस्थानों के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कही गई हैं।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस विजय कुमार राय बी ने पहले ही मीडिया कवरेज और सोशल मीडिया पर चल रही टिप्पणियों पर एकपक्षीय रोक (एकतरफा आदेश) लगा दी थी, जिससे जाँच पर हो रही रिपोर्टिंग पर भी रोक लग गई थी।

रहस्यमय सफाई कर्मचारी और खौफनाक आरोप

यह मामला तब सामने आया जब एक सफाईकर्मी ने चौंकाने वाला दावा किया कि उसे 1998 से 2014 के बीच धर्मस्थल में कई जगहों पर सैकड़ों शव दफनाने के लिए मजबूर किया गया था। यह सफाईकर्मी भगवान मंजूनाथ मंदिर में काम करता था और उसने 3 जून 2025 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

उसके आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, राज्य सरकार ने 19 जुलाई को इस मामले की जाँच के लिए SIT  का गठन किया। इसके बाद SIT उसे धर्मस्थल के स्नान घाट लेकर गई, जहाँ उसने 13 जगहों की पहचान की, जहाँ कथित रूप से शव दफनाए गए थे।

सफाईकर्मी ने अपनी शिकायत में बताया कि जिन शवों को वह दफनाता था, उनमें कई महिलाएँ और नाबालिग लड़कियाँ थीं, जिनका यौन शोषण किया गया था।

उसकी शिकायत के कुछ समय बाद, सुजाता नाम की 60 साल की एक महिला ने भी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। उसने बताया कि उसकी बेटी धर्मस्थल की तीर्थ यात्रा के दौरान लापता हो गई थी।

कश्मीर में पुराने हिंदू राजवंश के जीवंत प्रमाण, पवित्र झील के पास से मिलीं कई मूर्तियाँ-शिवलिंग: कभी करकोटा वंश का बजता था डंका, कल्हण की राजतरंगिनी में भी है जिक्र

जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग में एक बड़ी खोज हुई है। यहाँ सालिया क्षेत्र में ‘करकूट नाग’ नाम के पवित्र झरने के पास लोक निर्माण विभाग के मरम्मत कार्य के दौरान जमीन से प्राचीन हिंदू मूर्तियाँ और शिवलिंग मिले हैं। इनमें 11 शिवलिंग, एक देवमूर्ति और कुछ धार्मिक चिह्न शामिल हैं।

ये अवशेष जल स्रोत के किनारे खुदाई के समय निकले। मजदूर जब इस स्थान की मरम्मत कर रहे थे, तो उन्हें पानी के नीचे एक तरह का गुप्त पत्थर का कक्ष दिखाई दिया। जब इसे खोला गया, तो इन मूर्तियों का पता चला।

यह खोज उस समय हुई है जब घाटी में पारंपरिक तीर्थ स्थलों के पुनरुद्धार की माँग उठ रही है। इस स्थान की ऐतिहासिकता को देखते हुए जम्मू-कश्मीर के अभिलेखागार, पुरातत्व और संग्रहालय विभाग की टीम ने इस स्थल का निरीक्षण किया है।

उन्होंने पुष्टि की है कि इन मूर्तियों को अब श्रीनगर भेजा जाएगा, जहाँ उनकी उम्र और उत्पत्ति का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे। इसके लिए सामग्री परीक्षण (material analysis) और तिथि निर्धारण (dating tests) जैसे तकनीकी परीक्षण किए जाएंगे।

इसके बाद इन प्राचीन वस्तुओं को श्रीनगर स्थित एसपीएस संग्रहालय में भेजा जाएगा, जहाँ शोधार्थी और इतिहासकार इनका गहराई से अध्ययन कर सकेंगे। विभागीय अधिकारियों का मानना है कि ये मूर्तियाँ 7वीं से 9वीं सदी के बीच की हो सकती हैं, यानी अंदाजन करकोटा वंश के शासनकाल की।

इंडियान एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय लोगों, विशेषकर कश्मीरी पंडित समुदाय का मानना है कि इस स्थान का संबंध करकोटा वंश से है। उनका यह भी कहना है कि इस स्थल पर पहले कोई मंदिर रहा होगा और संभवतः उस मंदिर की मूर्तियों को बाद में सुरक्षित रखने के लिए जल स्रोत में छिपा दिया गया होगा।

उनका यह भी अनुरोध है कि इस स्थल को धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में फिर से स्थापित किया जाए। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से यह माँग की है कि यहाँ एक नया मंदिर बनाकर उन मूर्तियों को पुनः स्थापित किया जाए और इसे एक मान्यता प्राप्त तीर्थस्थल का रूप दिया जाए।

करकोटा वंश: कश्मीर का स्वर्ण युग

करकोटा वंश कश्मीर के इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। यह वंश 7वीं सदी के मध्य से 9वीं सदी के उत्तरार्ध तक कश्मीर पर शासन करता रहा। इस काल को अक्सर ‘कश्मीर का स्वर्ण युग’ कहा जाता है, जब राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक समृद्धि और धार्मिक सहिष्णुता अपने शिखर पर थी।

करकोटा वंश का संस्थापक दुर्लभवर्धन थे, जिसने 625 ईस्वी के आस-पास कश्मीर की सत्ता संभाली। प्रसिद्ध इतिहासकार कल्हण ने अपनी ऐतिहासिक कृति राजतरंगिणी में करकोटा वंश का विस्तृत वर्णन किया है।

कल्हण के अनुसार, दुर्लभवर्धन मूलतः किसी निम्न कुल से थे, लेकिन उनकी प्रतिभा और योग्यता देखकर उस समय के राजा बालादित्य ने उन्हें अपनी पुत्री अंगलेखा से विवाह करवा दिया और राजगद्दी सौंप दी।

दुर्लभवर्धन ने अपनी मूल पहचान छुपाकर खुद को नागों की संतति घोषित किया और खुद को कर्कोटक नामक पौराणिक नाग राजा का वंशज बताया। इसी से इस वंश का नाम ‘करकोटा’ पड़ा। नाग परंपरा कश्मीर में बहुत पुरानी रही है और नागों को वहाँ अत्यंत आदरपूर्वक पूजा जाता था।

नीलमत पुराण, जो कश्मीर की उत्पत्ति से संबंधित एक पुराण है, यह बताता है कि कश्मीर एक समय पर एक विशाल झील थी जिसे ऋषि कश्यप ने सुखाया और नागों को बसने के लिए दिया।

करकोटा वंश के सबसे प्रसिद्ध सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ थे, जिन्होंने 724 से 761 ईस्वी तक शासन किया। ललितादित्य को कश्मीर का ‘अलेक्ज़ेंडर’ भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान, पंजाब, मध्य एशिया और पूर्वी भारत तक अपना साम्राज्य फैलाया।

उनकी विजय यात्राओं का वर्णन काल्हण ने बहुत ही विस्तार से किया है। उन्होंने केवल सैनिक अभियानों में ही नहीं, बल्कि वास्तुकला और संस्कृति में भी महान योगदान दिया। उनकी राजधानी परिहासपुरा (Parihaspura) थी, जिसे उन्होंने खुद बसाया था और वह उस समय उत्तर भारत के सबसे समृद्ध और सुंदर नगरों में से एक माना जाता था।

ललितादित्य ने कश्मीर में कई भव्य मंदिरों और धार्मिक स्थलों का निर्माण कराया। उनका सबसे प्रसिद्ध निर्माण ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’ है, जो अनंतनाग के निकट स्थित है। यह मंदिर पत्थरों से बना हुआ है और भारतीय मंदिर वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है।

यह सूर्य को समर्पित था और इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। मंदिर के चारों ओर लगभग 84 छोटे मंदिर बने हुए थे और इसका पूरा परिसर पत्थर की दीवारों से घिरा था। ललितादित्य ने न केवल हिंदू धर्म के लिए, बल्कि बौद्ध धर्म के लिए भी कई मठ  बनवाए। उन्होंने मंदिरों में स्वर्ण और रत्नों से सुसज्जित देवमूर्तियाँ स्थापित करवाईं।

इस काल में कश्मीर में धार्मिक सहिष्णुता थी। हिंदू, बौद्ध और नाग परंपराओं के अनुयायी मिलजुल कर रहते थे। ललितादित्य की शासन प्रणाली भी एक सुचारु प्रशासनिक ढाँचे पर आधारित थी और उन्होंने अपने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में विभाजित करके शासन किया। चीन के प्रसिद्ध यात्री ह्वेन त्सांग भी इस काल में कश्मीर आए थे और उन्होंने कश्मीर को अत्यंत समृद्ध और सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत प्रदेश बताया था।

भविष्य की संभावनाएँ

सालिया क्षेत्र से मिली ये मूर्तियाँ केवल पत्थर की वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि एक पूरे सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक हैं। ये मूर्तियाँ हमें करकोटा कालीन स्थापत्य और धार्मिक विश्वासों की झलक देती हैं। जब वैज्ञानिक परीक्षण पूरे होंगे, तो इनसे जुड़ा कालखंड और स्पष्ट रूप से सामने आ सकेगा।

यह कश्मीर के इतिहास के उस दौर की पुष्टि करेगा, जिसे अब तक केवल ग्रंथों या मौखिक परंपराओं के माध्यम से जाना गया था। इस खोज का एक और बड़ा पहलू यह है कि यह स्थानीय लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव को फिर से सशक्त कर सकता है।

यह जगह कभी एक तीर्थ रही होगी, इसकी पुष्टि खुद वहाँ मिले अवशेष कर रहे हैं। ऐसे में, एक मंदिर का पुनर्निर्माण कर इन मूर्तियों को वहीं स्थापित किया जाना न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि धार्मिक और सामाजिक सौहार्द के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण कदम होगा।

यह भी उम्मीद की जा रही है कि यदि सरकार और पुरातत्व विभाग इस स्थल को संरक्षित करने की दिशा में कार्य करते हैं, तो यह स्थान आने वाले समय में एक प्रमुख पर्यटन स्थल और शोध केंद्र बन सकता है। इससे न केवल स्थानीय रोजगार में वृद्धि होगी, बल्कि कश्मीर की ऐतिहासिक विरासत का भी प्रचार-प्रसार होगा।