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2041 तक असम में हिंदुओं के बराबर होंगे मुस्लिम: डेमोग्राफी चेंज पर CM सरमा ने चेताया, बताया- लगातार बढ़ रहे मजहब बहुल जिले, इस्लाम मानने वालों में 31% ‘मियाँ’

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक बयान में कहा कि यदि मौजूदा स्थिति के अनुसार जनसंख्या में बढ़ोतरी होती रहेगी तो 2041 तक असम में मुस्लिम जनसंख्या हिंदुओं के बराबर हो जाएगी। उनका दावा है कि इससे मुस्लिम आबादी लगभग 50% तक हो जाएगी।

डिब्रूगढ़ में प्रेस से बात करते हुए सीएम सरमा ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि 2011 में असम की कुल जनसंख्या 3.12 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम जनसंख्या 1.07 करोड़ (लगभग 34.22%) और हिंदू जनसंख्या 1.92 करोड़ (लगभग 61.47%) थी।

3% ही असम के मूल निवासी

सीएम सरमा ने कहा कि असम में रहने वाले महज 3% मुस्लिम ही असमिया मूल के हैं, जबकि 31% मुस्लिम आबादी घुसपैठिए हैं जो मुख्यतः बांग्लादेश से आए हैं।

उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि अगर इसी तरह चलता रहा तो 2021, 2031 और 2041 तक असम की जनसंख्या में 50 फीसदी तबका मुस्लिम होगा और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक बन जाएगा।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 1951 से अब तक असम की जनसंख्या संरचना में काफी बड़े बदलाव आए हैं। मुस्लिम बहुल जिलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। 2001 में असम के 23 जिलों में से 6 मुस्लिम बहुल थे। इनमें धुबरी (74.29), गोलपारा (53.71), बारपेटा (59.37), नगांव (51), करीमगंज (52.3) और हैलाकांडी (57.63) थी।

2011 में जिलों की संख्या 27 हुई और इनमें 9 जिले मुस्लिम बहुल हो गए। इस समय के अनुसार मुस्लिम जिलों की आबादी में धुबरी (79.67), गोलपारा (57.52), बारपेटा (70.74), मोरिगांव (52.56), नगांव (55.36), करीमगंज (56.36), हैलाकांडी (60.31), बोंगाईगांव (50.22) और दारंग (64.34) शामिल हो गए। सीएम सरमा का कहना है कि वर्तमान में जिलों की संख्या कम से कम 11 तक पहुँच गई है।

असम की पहचान पर है हमला

सीएम सरमा ने जनसांख्यिकीय बदलाव पर कहा कि ये सिर्फ ‘भूमि जिहाद’ ही नहीं बल्कि असम को खत्म करने वाला जिहाद है। योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। इसके कारण असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान खतरे में पड़ गई है। अगर यही प्रवृत्ति जारी रही तो अगले 20 वर्षों में असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन सकते हैं।

इससे पहले भी सीएम हिमंता ने अतिक्रमण अभियान पर कहा था कि असम में लगभग 29 लाख बीघा यानी लगभग 10 लाख एकड़ भूमि पर अतिक्रमण है। इन पर अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिक रह रहे हैं। असम में बाहर से आए हुए मुस्लिमों को ‘मियाँ’ कहा जाता है।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि ये लोग अपने मूल जिलों में जमीन होने के बावजूद सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर अवैध रूप से बस जाते हैं और फिर वहाँ की मतदाता सूची में नाम दर्ज करवा लेते हैं। इसके बाद जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे ये एक बड़ा वोट बैंक बन जाते हैं। इसके कारण स्थानीय राजनीतिक पार्टियाँ उनके खिलाफ कार्रवाई करने से बचती हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया कॉन्ग्रेस के संरक्षण में वर्षों से चल रही है। जहाँ-जहाँ जनसांख्यिकीय बदलाव हुआ है, वहाँ कॉन्ग्रेस को अचानक अधिक वोट मिलने लगे हैं।

सरमा ने बताया कि उनकी सरकार ने मई 2021 से अब तक 1,19,548 बीघा (लगभग 160 वर्ग किलोमीटर) भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया है। ये जमीन ज्यादातर वन भूमि है। उन्होंने यह भी कहा कि अभी भी लाखों बीघा भूमि अतिक्रमण के अधीन है, और सरकार इसे भी मुक्त कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जनसंख्या नियंत्रण और भूमि अधिकारों से जुड़े कानूनों पर विचार कर रही है, ताकि असम की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना को बचाया जा सके।

‘जगदीप धनखड़ का आधिकारिक आवास सील, घर फौरन खाली करने का आदेश’: मीडिया के झूठ के सहारे PM मोदी-शाह को गाली दे रहा ‘लिबरल गैंग’, जानिए सच

भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर विपक्ष द्वारा अफवाहें फैलाने का काम जारी है। इसी क्रम में मीडिया भी पीछे नहीं है। हाल में इंडिया टीवी समेत कुछ चैनल्स पर दावा किया गया कि धनखड़ के इस्तीफे के बाद उनका आधिकारिक आवास सील कर दिया गया है और उन्हें कहा गया है कि उन्हें वो स्थान फौरन खाली करना होगा। अब इस खबर की सच्चाई क्या है, इसका फैक्टचेक PIB ने किया है।

पीआईबी ने अपने ट्वीट में बताया कि पूर्व उपराष्ट्रपति के आवास खाली करने को लेकर हो रहे दावे एकदम फर्जी हैं। जगदीप धनखड़ को अभी तक ऐसा करने के लिए बिलकुल नहीं कहा गया है। ट्वीट में ये भी कहा गया है कि- भ्रामक जानकारियों के चक्कर में न पड़ें। हमेशा ऐसी खबर को शेयर करने से पहले आधिकारिक स्रोतों की जाँच करें।

आवास खाली करने को लेकर फैलाया जा रहा झूठ

देख सकते हैं कि जिस खबर-पोस्ट का फैक्टचेक पीआईबी द्वारा किया गया है उसमें एक इंडिया टीवी का स्क्रीनशॉट है और दूसरा एक एक्स यूजर आयमान खोखर का ट्वीट है। दोनों में साफ लिखा है कि पूर्व वीपी को उनके इस्तीफे के बाद उनका आवास छोड़ने को कहा गया है।

फर्जी खबर और पोस्ट का स्क्रीनशॉट

सोशल मीडिया पोस्ट में तो साजिश दिखाने के लिए लिखा गया- हो ही नहीं सकता वीपी ने अपने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया हो।

इसी तरह कुछ अन्य लिबरल यूजर भी हैं जो इस फर्जी खबर को साझा करते हुए मोदी-शाह पर निशाना साध रहे हैं। लिबरल गैंग उन्हें सोशल मीडिया पर ‘जानवर’ तक कह रहा है। कहा जा रहा है- ‘इन लोगों ने जगदीप धनखड़ को क्या फेयरवेल दिया है।’

सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे पोस्ट
सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे पोस्ट

गौरतलब है कि पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य कारणों से अपने पद छोड़ने का ऐलान किया था। उनके इस्तीफे की खबर आने के बाद से वो लोग इस फैसले में राजनीति खोजने लगे थे जो कुछ समय पहले तक पूर्व वीपी के चलने तक का मजाक बनाते थे। उन्हें जगदीप धनखड़ के पद की चिंता होने लगी थी जिन्होंने 2022 में उनके उपराष्ट्रपति बनने का विरोध किया था, जो उनपर भाजपा प्रवक्ता होने का आरोप लगाया था व संसद के बाहर उनकी मिमिक्री करने उनका उपहास उड़ाते थे।

कोलकाता लॉ कॉलेज रेप केस में ममता सरकार को कोर्ट ने लताड़ा: पूछा- जब पहले हुईं 12 शिकायतें, तब क्या कर रहे थे?

कोलकाता की एक अदालत ने लॉ कॉलेज रेप मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को जम कर लताड़ा है। अलीपुर कोर्ट ने मंगलवार (22 जुलाई 2025) को कोलकाता लॉ कॉलेज में हुई रेप की घटना को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अलीपुर कोर्ट ने पूछा कि अगर मुख्य आरोपित मोनोजीत मिश्रा के खिलाफ 2023 से ही कम से कम 12 शिकायतें दर्ज थीं, जिनमें ज्यादातर छेड़छाड़ से जुड़ी थीं, तो फिर सरकार ने अब तक कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाया।

कोर्ट ने कहा कि अगर पहले कार्रवाई होती, तो शायद 25 जून को कॉलेज में छात्रा के साथ हुआ यह अपराध टल सकता था। कोर्ट ने मोनोजीत मिश्रा और तीन अन्य आरोपियों ज़ैब अहमद, प्रमित मुखर्जी और कॉलेज गार्ड पिनाकी बनर्जी की न्यायिक हिरासत 5 अगस्त तक बढ़ा दी। ये चारों आरोपित 8 जुलाई से हिरासत में हैं।

सुनवाई में मोनोजीत मिश्रा के वकील ने जमानत की माँग नहीं की, बल्कि दो याचिकाएँ दाखिल की। उन्होंने माँग की कि पूछताछ के समय वकीलों को भी मौजूद रहने दिया जाए और पीड़िता का मोबाइल फोन जब्त किया जाए।

वकील ने कोर्ट को बताया कि मोनोजीत से जेल में पूछताछ के दौरान उसे आरोप कबूल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है और उसे वकील से मिलने नहीं दिया जा रहा। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि मोनोजीत को जेल में अपने वकील से दो घंटे मिलने की अनुमति दी जाए।

रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने यह भी दावा किया कि जेल में उसके मुवक्किल को न तो सही इलाज मिल रहा है, न साफ पानी, न पढ़ने-लिखने का सामान और न मच्छरदानी, जबकि जेल को सुधार गृह कहा जाता है। सुरक्षा गार्ड पिनाकी बनर्जी के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल की इस मामले में कोई सीधी भूमिका नहीं थी।

इस मामले की शुरुआत 25 जून को हुई जब दक्षिण कोलकाता लॉ कॉलेज की एक 24 साल की छात्रा ने आरोप लगाया कि कॉलेज परिसर के गार्ड रूम में उसके साथ बलात्कार और मारपीट की गई। पीड़िता ने बताया कि जब उसे पैनिक अटैक आया तो आरोपितों ने उसे इनहेलर दिया, लेकिन इलाज के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उसकी हालत थोड़ी सुधर जाए ताकि वे दोबारा उसके साथ क्रूरता कर सकें।

डियर निब्बा-निब्बी! रोना-धोना छोड़ खुद को मेच्योर बनाओ, क्योंकि जीवन ‘सैयारा’ है…

सैयारा मैं सैयारा, सैयारा तू सैयारा
सितारों के जहाँ में मिलेंगे अब यारा

वैसे तो ऊपर की पंक्तियाँ सलमान खान और कटरीना कैफ की फिल्म ‘एक था टाइगर’ के एक गाने की हैं। यह फिल्म 2012 में रिलीज हुई थी। 13 साल बाद एक बार फिर अरबी भाषा का शब्द ‘सैयारा’ चर्चा में है। मोटे तौर पर सैयारा का अर्थ गतिमान या सफर होता है। पर जब यह शायरी का लिबास ओढ़ती है तो इसका उपयोग प्रेम/आकर्षण के लिए भी होता है। मोटे तौर पर यह आकर्षण दैहिक ही होता है।

अभी सैयारा (Saiyaara) नाम से एक फिल्म आई है। इसमें मुख्य भूमिका में अहान पांडे और अनीता पड्डा हैं। ‘यश राज फिल्म’ के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन मोहित सूरी ने किया है।

अब इस फिल्म से दिल्ली के साकेत में रहने वाले हाईकोर्ट के वकील प्रियांशु तिवारी की आपबीती पर चलते हैं। प्रियांशु बताते हैं कि वे जिस चार मंजिला इमारत में रहते हैं, एक दिन उसकी छत पर वह रात का भोजन करने के बाद खुले आसमान को देखने पहुँचे थे। यहाँ उन्हें उस इमारत में रहने वाली पड़ोस की एक लड़की मिली। उसने सैयारा उसी दिन देखी थी, जिस दिन यह फिल्म रिलीज हुई थी। कई घंटों बाद भी वह इस फिल्म से ‘प्रभाव’ से उबर नहीं पाई थी। वह अचानक से इस फिल्म की कहानी प्रियांशु को सुनाने लगती है।

यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि एक ही इमारत में रहने के बावजूद दोनों का इससे पहले कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कोई संवाद नहीं हुआ था। प्रियांशु बताते हैं कि कहानी सुनाते हुए लड़की बार-बार इमोशनल हो रही थी। उन्हें इस कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी उस लड़की ने हाथ पकड़कर करीब दो घंटे तक जबरदस्ती कहानी सुनाई। इस दौरान वह कई बार फूट-फूटकर रोई भी।

प्रियांशु बताते हैं कि पूरी कहानी सुनने के बाद भी उन्हें यह समझ नहीं आया कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जो कोई फूट-फूटकर रोने लगे? कोई युवा लड़की इसे जीवन से जोड़ ले?

इस ‘पागलपन’ के अकेले प्रियांशु ही पीड़ित नहीं हैं। या फिर उनकी इमारत में रहने वाली वह लड़की ही पागल नहीं है। सोशल मीडिया पर तो ऐसे वीडियोज की बौछार लगी है, जिसमें कई लड़के-लड़कियाँ थिएटर में ही इस फिल्म को देखते हुए चींखते-चिल्लाते रोते नजर आते हैं।

किसी वीडियो में रोता हुआ दिखने वाला कोई सिरफिरा आशिक है, जिसे उसे कथित प्रेमिका छोड़कर जा चुकी है। और वह किसी नई प्रेमिका की तलाश है।

इस पागलपन ने सैयारा के बॉक्स ऑफिस के प्रदर्शन को भी चर्चा में ला दिया है। फिल्म 6 दिन में ही करीब ₹150 करोड़ की कमाई कर चुकी है। साल 2025 की ब्लॉकबस्टर मूवी में शामिल हो चुकी है। वर्ल्डवाइड कलेक्शन में अक्षय कुमार की ‘केसरी-2’ और सनी देओल की ‘जाट’ को पीछे छोड़ दिया है।

मीडिया ‘सैयारा’ की कमाई और ‘यश राज फिल्म’ की प्रमोशन रणनीति के आगे बिछ गई है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी नई पीढ़ी के इस ‘पागलपन’ पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। यह सत्य है कि हर पीढ़ी ऐसी ही किसी बेतुकी ‘प्रेम कहानी’ के पीछे पागल होती है। मेरे से पहले की पीढ़ी ‘तेरे नाम’ के ‘राधे’ तो उससे भी पहले की पीढ़ी ‘डर’ के ‘राज’ को देखकर इसी तरह पागल हुई थी। पर हमें समझना होगा प्रेम और आकर्षण एक नहीं है।

मैं मानती हूँ हर लड़की/लड़का उस उम्र में आते हैं, जब वे इन दोनों को एक ही समझ बैठते हैं। अपनी दबी इच्छाओं (जो अक्सर दैहिक होते हैं) को प्रेम का नाम देकर विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होते हैं। मैं यह भी समझती हूँ उम्र के इस दौर में शरीर के हार्मोन भी बहुत तेजी से बदलते हैं। लेकिन इससे प्रेम और आकर्षण एक नहीं हो जाते।

भले बॉलीवुड की फिल्में या उसके गाने जैसे 16 बरस की बाली उम्र को सलाम, मैं 16 बरस की तू 17 बरस का, ऐसा पहली बार हुआ है 17-18 सालों में… यह बताते हों कि प्रेम करने की आयु यही होती है, लेकिन वास्तविक सत्य तो यही है कि लड़का हो या लड़की उसके लिए, यह उम्र अपने ज्ञान का कोष बढ़ाने, खुद को परिपक्व बनाने, अपने करियर की दिशा तय करने की होती है। इसी से यह तय होता है कि हमारी जिंदगी कितनी सैयारा (गतिमान) होगी। वैसे भी जिंदगी एक वास्तविकता है, किसी शायर की कल्पना नहीं।

जिस दौर में प्रेम को लिव-इन रिलेशन के तौर पर परिभाषित किया जाता हो, जिस दौर की Gen Z सिच्वुएशनशिप, ब्रेडक्रम्बिंग, बेंचिंग, घोस्टिंग, लव बॉम्बिंग, कफिंग सीजन, पॉकेटिंग, ड्राई डेटिंग, रिज जैसे टर्म से परिभाषित करती हो, जो अपने शरीर के भीतर आ रहे बदलावों को लेकर ऐसी चर्चाएँ करती हो जो छाती और योनि के ईर्द-गिर्द सिमटी हो, उसे प्रेम और आकर्षण का फर्क ऐसे समयकाल में बताना जब वह डोपामाइन, सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के प्रभाव में हो, कठिन है।

पर हमें फिर भी यह बात करनी होगी। बार-बार करनी होगी। क्योंकि जीवन का सैयारा (गतिमान) होना कठिन फैसलों पर ही निर्भर करता है।

मंदिर में इस्लाम का प्रचार, अल्लाह के बारे में बताना कोई अपराध नहीं… कर्नाटक हाई कोर्ट ने तीन मुस्लिमों के खिलाफ खत्म की FIR : हिन्दुओं ने कहा था- धर्म बदलने पर दे रहे थे दुबई में नौकरी का लालच

मुस्लिमों का किसी मंदिर के भीतर इस्लाम के प्रचार में पर्चे बाँटना, अल्लाह की अच्छाइयाँ बताना और अपने मजहब की बातें करना कोई अपराध नहीं है। यह बात कहते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने तीन मुस्लिमों के खिलाफ एक पूरा केस रद्द कर दिया है। यह मुस्लिम एक पुराने मंदिर के भीतर इस्लाम का प्रचार करने के मामले में गिरफ्तार हुए थे।

लाइवलॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस वेंकटेश नाइक ने यह कहते हुए मंदिर के भीतर पैम्फलेट बाँटने वाले मुस्लिमों को जमानत दी कि इस मामले में शिकायत उनके जरिए नहीं करवाई गई थी, जो धर्मांतरण का शिकार बने हों या फिर उससे सम्बन्धित हों।

जस्टिस नाइक ने कहा कि FIR को सच भी मान लिया जाए तो बात यह है कि मंदिर के भीतर मुस्लिमों ने किसी को दबाव में लेकर धर्मांतरित करने का प्रयास नहीं किया, ऐसे में उनके खिलाफ कोई मामला नहीं बनता और केस रद्द किया जाता है।

जस्टिस नाइक के फैसले का फायदा उन 3 मुस्लिमों को मिला, जिन पर मई, 2025 में कर्नाटक के जामखंडी शहर में स्थित रामतीर्थ मंदिर के भीतर इस्लाम के लिए पर्चे बाँटने, अल्लाह के बारे में दुनिया भर की बातें बताने के साथ सनातन को भला-बुरा बोलने को लेकर FIR करवाई गई थी।

उनके खिलाफ एक भक्त ने FIR करवाई थी। इसमें यह भी बताया गया था कि मौके पर मौजूद मुस्लिम सिर्फ इस्लाम का प्रचार ही नहीं कर रहे थे बल्कि वह इस्लाम में धर्मांतरित होने पर दुबई में नौकरी और गाड़ियों तक का लालच दे रहे थे।

इस मामले में उनके खिलाफ कर्नाटक के धर्मांतरण रोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था और उन्हें गिरफ्तार किया गया था। इसके खिलाफ इन मुस्लिमों ने कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया था और FIR रद्द करने की माँग की थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने उन्हें यह राहत दे दी है।

सीमा विवाद या अधिकारियों की लापरवाही, गंभीरा पुल पर हादसे के 15 दिन बाद भी क्यों लटका है ट्रक? सच्चाई मीडिया में चल रही खबरों से इतर

गुजरात के सौराष्ट्र और मध्य गुजरात को जोड़ने वाले गंभीरा पुल का एक हिस्सा 9 जुलाई 2025 को ढह गया था। इस हादसे ने देश भर में सुर्खियाँ बटोरीं थी। हादसे के चलते एकट्रक पुल पर ही फँसा रह गया था, वह हादसे के 2 सप्ताह से अधिक गुजर जाने के बाद भी वहीं लटका हुआ है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने ट्रक के फँसे रहने का कारण प्रशासन की शिथिलता को बताया है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ट्रक ड्राइवर और उसके मालिक का दावा है कि आणंद जिले और वडोदरा जिले के अधिकारी इस मामले में जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रहे हैं, जिससे उनकी परेशानी बढ़ गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि दोनों अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, जबकि ट्रक चालक और मालिक ट्रक को हटवाने के लिए कई जगह चक्कर काट रहे हैं। इस बीच, ट्रक चालक की चिंता बढ़ रही है क्योंकि उस पर EMI का भी दबाव है। इसके अलावा वह ट्रक के हटने तक बीमा का दावा भी नहीं कर पा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि हादसे के इतने दिनों बाद भी कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाने से ट्रक मालिक और चालक दोनों ही मानसिक और आर्थिक संकट में हैं।

ट्रक टूटे हुए गंभीरा पुल पर लटका हुआ है। (फोटो साभार X/theskindoctor13)

दिव्य भास्कर की रिपोर्ट में ट्रक मालिक रमाशंकर पाल ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा, “आणंद के सरकारी अधिकारी वडोदरा पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं और वडोदरा के अधिकारी आणंद पर। रिपोर्ट के अनुसार,अधिकारियों ने बताया कि ट्रक को हटाने के लिए सेना से हेलीकॉप्टर की मदद भी माँगी गई थी, लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला है और ट्रक वहीं फँसा हुआ है।”

उन्होंने आगे बताया, “ट्रक पर भारी कर्ज है और हर महीने मुझे ₹1 लाख की किश्त चुकानी पड़ती है। ट्रक चलेगा तभी मैं यह किश्त भर सकूँगा। प्रशासन ने मुझे ट्रक हटवाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन इतने दिनों बाद भी मुझे ट्रक वापस नहीं मिला।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रमाशंकर पाल की इस बात से साफ पता लगता है कि प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी से भागते अधिकारियों की वजह से आम आदमी को कितना भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

दिव्य भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, गंभीरा पुल पर हादसे के 10 दिन बाद भी ट्रक वहीं लटका हुआ है। इस रिपोर्ट का शीर्षक है, ‘पहले ट्रक लटका रहा, अब अधिकारी उसे ‘लटका’ रहे हैं।’ रिपोर्ट बताती है कि ड्राइवर ट्रक हटवाने के लिए इधर-उधर भटक रहा है और कह रहा है कि हर महीने उसे लाखों रुपए की किश्त चुकानी पड़ती है।

वहीं, गुजराती टीवी चैनल GSTV ने लिखा कि “सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं।” चैनल की रिपोर्ट में दावा किया गया कि ट्रक मालिक की स्थिति बेहद मुश्किल है और कोई अधिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं है।

GSTV के अनुसार, ट्रक मालिक पिछले दस दिनों से आणंद और वडोदरा के सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, लेकिन अब तक उसे कोई साफ जवाब नहीं मिला है। ट्रक मालिक ने चैनल को बताया, “हमें हर हाल में ट्रक की किश्तें चुकानी हैं। बैंक का कहना है कि भुगतान करना होगा, जबकि बीमा कंपनी कह रही है कि ट्रक सुरक्षित है, इसलिए कोई बीमा क्लेम नहीं मिलेगा।”

इन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि प्रशासनिक लापरवाही और प्रणाली की खामियों के कारण ट्रक मालिक आर्थिक संकट में फँसा हुआ है और अब तक उसे किसी भी तरफ से राहत नहीं मिली है।

ऑपइंडिया ने की जिला कलेक्टर से की बात

ऑपइंडिया ने इस मामले में आणंद जिला कलेक्टर प्रवीण चौधरी से बात की। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि आनंद और वडोदरा जिले के बीच कोई सीमाई विवाद नहीं है। उन्होंने बताया कि मामला प्रशासन के कारण लंबित नहीं हुआ बल्कि तकनीकी कारण समस्या को लम्बा खींच रहे हैं।

उन्होंने बताया कि पुल के टूटने के बाद क्रेन जैसी भारी मशीनरी को ट्रक निकालने के लिए ले जाना असंभव है। क्योंकि पुल पहले ही जर्जर हो चुका है। उन्होंने बताया कि कई दिन तक प्रयास किया गया। अब राहत बचाव ऑपरेशन पूरा होने के बाद ट्रक निकालने की योजना बनाई जा रही है।

कलेक्टर चौधरी ने बताया कि अब जब बचाव कार्य लगभग पूरा हो गया है तो PWD, एक निजी कंपनी और हाई‑स्पीड रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड के विशेषज्ञ मिलकर ट्रक हटाने की योजना बना रहे हैं। कलेक्टर के अनुसार, यह भी विचार किया जा रहा है कि ट्रक को पीछे से खींचा जाए या नीचे से सहारा देकर उठाया जाए।

उन्होंने बताया कि जो भी व्यवस्था की जाए लेकिन सबसे पहले यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इससे किसी की जान को कोई खतरा न हो। कलेक्टर ने यह भी बताया कि प्रशासन ने ट्रक मालिक की मदद के लिए बीमा कंपनी और बैंक के साथ बातचीत की है।

उन्होंने बताया कि बीमा क्लेम की प्रक्रिया के लिए जरूरी कागज दे दिए गए हैं तथा बैंक से भी कहा गया है कि वह 2-3 महीने की किश्त में रियायत बरतें। उनकी बातों से स्पष्ट होता है कि प्रशासन ट्रक मालिक की सहायता कर रहा है।

बचाव अभियान के चलते नहीं पहले हटा ट्रक

NDRF और जिला प्रशासन के अनुसार, दुर्घटना के बाद बहुत दिनो तक चले बचाव अभियान के दौरान टैंकर और ट्रक की स्थिति का पता न चल पाने के कारण पानी के नीचे सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया, इसके लिए मुंबई से सोनार मशीन मंगवाई गई।

NDRF ने बचाव कार्यों के दौरान जिला प्रशासन से अनुरोध किया कि फंसे हुए ट्रक को बांधकर सुरक्षित जगह पर रखा जाए, ताकि पुल के नीचे चल रही खोज और बचाव प्रक्रिया में कोई बाधा न आए। बाद में, NDRF की टीम और तकनीकी सलाह पर, प्रशासन ने ट्रक को क्रेन से पीछे की ओर बाँध दिया, जिससे पुल के नीचे काम सुरक्षित रूप से जारी रह सके।

जब सेना को ट्रक हटाने के लिए बुलाया गया, तो उन्होंने कहा कि ट्रक को धकेलने या खींचने के लिए लोगों की जरूरत होगी और यह तकनीकी रूप से लोगों के जीवन के लिए खतरा भरा होगा। वर्तमान में तेजी से ट्रक हटाने की रणनीति पर काम चल रहा है।

बीमा-EMI पर भी कलेक्टर ने बताया सच

आणंद के जिला कलेक्टर ने बताया कि ट्रक मालिक खुद उनके कार्यालय आया था और जहाँ उन्होंने और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट ने उसे पूरी स्थिति समझाई थी। उन्होंने बताया कि मालिक ट्रक को नष्ट करने के लिए तैयार हो गया है, लेकिन यह काम इस तरह से किया जाएगा कि किसी की जान को कोई खतरा न हो।

उनके अनुसार, इसके लिए एक सुरक्षित योजना पर काम चल रहा है। बीमा के मामले में कलेक्टर ने बताया कि उन्होंने बीमा कंपनी से मुलाकात की है। कंपनी ने कहा है कि यदि सरकार घटना का लिखित प्रमाण दे, तो वे बीमा क्लेम को मंजूरी दे देंगे। कलेक्टर के कार्यालय ने यह प्रमाण देने का आश्वासन दिया है और अब यह प्रक्रिया जल्द पूरी कर ली जाएगी।

EMI से जुड़ी स्थिति पर जिला कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि यह बैंक और ट्रक मालिक के बीच का मामला है, इसलिए प्रशासन इसमें सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता। फिर भी, उन्होंने बैंक को पत्र लिखकर मानवीय आधार पर दो-तीन महीनों के लिए किश्त स्थगित करने का अनुरोध किया है।

इसके साथ ही, राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति को भी एक ज्ञापन भेजा जाएगा, ताकि ट्रक मालिक को राहत मिल सके। कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि यह घटना आणंद-वडोदरा की सीमा पर नहीं बल्कि पूरी तरह वडोदरा जिले के क्षेत्र में हुई है।

मोहम्मद फरदीन, सैफुल्लाह, रिजवान, जीशान… ATS ने गुजरात-दिल्ली-नोएडा से दबोचे अलकायदा के 4 आतंकी, बड़े हमलों के लिए कर रहे थे भर्ती

गुजरात ATS ने अल कायदा इंडियन सब कॉन्टिनेन्ट (AQIS) के 4 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया है। यह आतंकवादी देश के अलग-अलग हिस्सों से गिरफ्तार किए गए हैं। यह चारों अल कायदा के लिए भर्ती चला रहे थे। इनकी पहचान मोहम्मद फरदीन रईस, सेफुल्लाह कुरैशी रफीक, मोहम्मद फैक रिजवान और जीशान अली के रूप में हुई है।

गुजरात ATS से मिली जानकारी के अनुसार, इनमें से दो आतंकी को गुजरात में अलग-अलग जगहों से पकड़ा गया है। वहीं, एक को दिल्ली और अन्य को नोएडा से गिरफ्तार किया गया है। ये सभी आतंकी सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालकर लोगों को अल कायदा से जोड़ने का काम कर रहे थे।

यह सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी और आतंकवादी विचारधारा से संबंधित फोटो-वीडियो डालते थे। जाँच एजेंसी को आतंकियों के सोशल मीडिया हैंडल और चैट भी मिले हैं। इसकी जाँच साइबर सेल कर रही है। गुजरात ATS को यह भी पता लगा है कि आतंकवादी मैसेज ऑटो-डिलीट करने वाला एप्लीकेशन भी इस्तेमाल कर रहे थे।

आतंकवादियों के मोबाइल फोन में सीमापार बैठे आतंकी हैंडलर्स से संपर्क में होने के भी सबूत मिले हैं। ATS के मुताबिक, पकड़े गए सभी आतंकवादियों की उम्र 20 से 25 वर्ष के बीच है। ये लोग भारत में बड़े पैमाने पर आतंकी हमले की साजिश रच रहे थे।

ATS DIG सुनील जोशी ने बताया कि फिलहाल मामले की गहराई से जाँच की जा रही है और बहुत जल्द प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे ऑपरेशन की जानकारी दी जाएगी। बता दें कि गुजरात से पकड़े गए चारों आतंकवादी के बाद अब जाँच एजेंसी इनके फंडिंग, नेटवर्क, ट्रेनिंग और विदेशी संपर्कों की जानकारी जुटाने में लग गई है। आने वाले दिनों में इससे जुड़ी और भी गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

सुरक्षा एजेंसियों ने गुजरात में अल कायदा मॉड्यूल का किया था पर्दाफाश

इससे पहले भी साल 2023 में सुरक्षा एजेंसियों ने गुजरात में आतंकी संगठन अल कायदा के नेटवर्क खड़े किए जाने का खुलासा किया था। पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने अहमदाबाद में सक्रिय इस आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया था।

इसमें 4 बांग्लादेशी मोहम्मद सोजिब मियाँ, मुन्ना खालिद अंसारी, अजरुल इस्लाम अंसारी और अब्दुल लतीफ गिरफ्तार हुए थे। ये सभी युवाओं को कट्टरपंथी बनाने में जुटे थे।

वहीं, अगस्त 2024 में झारखंड से अल कायदा मॉड्यूल के मुखिया डॉक्टर इश्तियाक को राँची से गिरफ्तार किया गया था। इश्तियाक आतंकी ट्रेनिंग दे रहा था।

UP में स्कूल मर्जर के नाम पर प्रिंसिपल ने करवाया छात्रों के रोने का ड्रामा, वायरल Video से अखिलेश यादव ने सेंकनी चाही राजनीतिक रोटियाँ: जाँच हुई तो निकली ‘स्क्रिप्टेड’, BSA ने किया प्रधानाध्यापक को सस्पेंड

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले से सोमवार (21 जुलाई 2025) को एक प्राथमिक स्कूल के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में प्राथमिक स्कूल के गेट पर ताला जड़ा हुआ था। गेट के बाहर स्कूली छात्राएँ दहाड़ मार कर रो रहीं थी और गेट खोलने की गुहार लगा रही थी। असल में यह मामला विद्यालयों के विलय से जोड़ा जा रहा था।

इस वीडियो के हवाले से सोशल मीडिया पर योगी सरकार को जमकर घेरा गया। कहा गया कि स्कूलों के विलय से बच्चों को कितनी परेशानी हो रही है, उनका लगाव कितना अधिक है स्कूलों से समेत कई अन्य तर्क पेस किए गए।

इसे लेकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी योगी सरकार को जमकर घेरा था। हालाँकि इस मामले की जाँच हुई तो पता चला कि स्कूल की प्रिंसिपल ने ही बच्चों को रोने का नाटक करने के लिए कहा था ताकि स्कूल का विलय न हो और उनकी नौकरी भी यहीं पर बनी रहे। हैरान करने वाली बात यह है कि यह स्कूल, विलय होने वाले स्कूलों की सूची में शामिल ही नहीं था। अब जिलाधिकारी ने प्रिंसिपल कुसुमलता पांडेय को निलंबित कर दिया है।

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था और स्कूलों के विलय पर निशाना साधते हुए उन बच्चों का स्कूल छिन जाने का दोषी योगी सरकार को बताया था।

वीडियो में रोते हुए बच्चों कह रहे हैं, ‘मैडम जी स्कूल खोल दो। गेट खोल दो, आंटी जी गेट खोल दो। हम लोग यहीं पर पढ़ेंगे, कहीं नहीं जाएंगे।’

महराजगंज में परतावल ब्लॉक के रुद्रपुर भलुही गाँव के इस प्राथमिक विद्यालय का वीडियो तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। इसके बाद जिलाधिकारी संतोष कुमार ने बेसिक शिक्षा अधिकारी रिद्धि पांडेय से विभागीय जाँच शुरू करवाई। इसमें पूरा मामला फर्जी निकला।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डीएम संतोष कुमार का कहना है कि स्कूल की प्रिंसिपल कुसुमलता ने बच्चों से रोने का ड्रामा कराया। साथ ही अभिवावकों को भी स्कूल के बाहर खड़ा करवाया। जाँच में ये बात भी सामने आई कि इस स्कूल का विलय नहीं होना है।

इस पूरे मामले पर प्रिंसिपल ने सोमवार को ही अपने दावे पेश किए थे। उनका कहना था कि इस स्कूल को गाँव से 1 किलोमीटर दूर करनौती प्राइमरी स्कूल में विलय हुआ है। प्रिंसिपल के अनुसार, शुक्रवार (18 जुलाई 2025) को वॉट्सऐप मैसेज पर खंड शिक्षा अधिकारी ने स्कूल के विलय की बात बताई थी।

इस पूरे मामले पर जिलाधिकारी का कहना है कि भुलुही का ये स्कूल विलय सूची में शामिल नहीं है। प्रिंसिपल ने गलत तरीके से स्कूल बंद कर बच्चों का वीडियो बनवाया है। मामले पर खंड शिक्षा अधिकारी को भी नोटिस जारी किया है।

स्कूलों के विलय का क्या है मामला

उत्तर प्रदेश में वर्तमान में 1.3 लाख से अधिक प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल हैं। इनमें कई लाख बच्चे पढ़ते हैं। वर्तमान में हर ग्राम सभा में एक प्राथमिक स्कूल है, इसको लेकर स्पष्ट तौर पर नियम भी बने हुए हैं।

कई जगह ग्राम सभाओं में स्कूल ऐसे हैं जहाँ 20-30 बच्चे भी नहीं पढ़ते। कई स्कूल ऐसे हैं जहाँ मात्र 30 बच्चों पर 5-6 शिक्षक हैं। कई स्कूल ऐसे हैं जहाँ बच्चों की संख्या 100 के पार है लेकिन वहाँ शिक्षकों की संख्या 3-4 है।

योगी सरकार ने इस समस्या को हल करने के लिए निर्णय लिया है कि जिन स्कूलों में 50 से कम बच्चे पढ़ते हैं, उन्हें पास के दूसरे विद्यालय में विलय कर दिया जाएगा। योगी सरकार ने स्पष्ट किया है कि बच्चों को स्कूल जाने में कोई समस्या ना हो, इसके लिए भी दिशानिर्देश दिए गए हैं।

सरकार ने यह भी ध्यान रखने को कहा है कि यह विलय पड़ोस के गाँव तक किया जाए। केवल उन्हीं स्कूलों का विलय किया जा रहा है, जिनमें बच्चों की संख्या बहुत कम है। यदि स्कूल आपस में विलय हो जाएँ तो बजट, इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई समस्याएँ हल हो सकती है।

बिहार में चल रहे SIR पर छाती पीट-पीटकर रो रहा विपक्ष, चुनाव आयोग को मिले 18 लाख+ डेड वोटर: 26 लाख पते पर नहीं मिले, 7 लाख से ज्यादा 2 जगहों पर मतदाता

बिहार में एसआईआर यानी वोटर वेरिफिकेशन के तहत करीब 52 लाख वोटरों का नाम कट जाएगा। चुनाव आयोग के मुताबिक 52.30 लाख मतदाता ऐसे हैं जो अपनी जगह पर नहीं मिले।

इनमें 18.66 लाख मतदाताओं के मृत होने की बात सामने आई है। जबकि 26.10 लाख मतदाता ऐसे हैं जो दूसरी जगह पर शिफ्ट हो गए हैं। एक से ज्यादा जगहों पर नाम वाले मतदाताओं की संख्या करीब 7.50 लाख है। चुनाव आयोग को 11.484 हजार ऐसे मतदाता मिले जिनका कोई अता-पता नहीं मिला यानी इनके बारे में कोई नहीं बता पाया।

21 लाख से ज्यादा वोटरों का फॉर्म नहीं मिल पाया

24 जून 2025 तक बिहार में कुल वोटरों की संख्या 7,89,69,844 है। इनमें 90.67% यानी 7,16,04102 वोटरों को गणना पत्र मिल चुके हैं। वहीं 7,13,65,460 यानी कुल वोटरों के 90.37% वोटरों का रिवीजन फॉर्म ऑनलाइन जमा हो चुके हैं।

अब 21,35,616 लोग बचे हैं यानी कुल वोटरों का मात्र 2.70% वोटर जिनका फॉर्म जमा नहीं हो पाया है। एसआईआर में अब तक 97.30 फीसदी वोटर आ चुके हैं।

1 अगस्त तक मतदाता सूची को करना है फाइनल

बिहार में वोटर वैरिफिकेशन का काम तेज से हो रहा है और पूरी कोशिश की जा रही है कि 1 अगस्त 2025 तक सभी योग्य मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएँ। अगले एक महीना यानी 1 सितंबर तक वोटर अपने नाम की पुष्टि, संशोधन, शिकायत या सुधार करा सकते हैं। इसके बाद 30 सितंबर तक फाइनल वोटर लिस्ट जारी की जाएगी। चुनाव आयोग का लक्ष्य है कोई भी मतदाता छूट ना पाए।

बिहार के सभी 12 मुख्य राजनीतिक दलों के करीब 1 लाख बीएलओ, 4 लाख स्वयंसेवक और 1.5 लाख बीएलए इस काम में लगाए गए हैं।

राजनीतिक दलों के बीएलए के साथ मिल कर बीएलओ कर रहे काम

सीईओ, बीएलओ, डीईओ, ईआरओ की बैठक में सभी पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल हुए जिसमें उन्हें पूरी जानकारी दी गई। इसमें बताया गया है कि 21.36 लाख वोटरों के फॉर्म अब तक नहीं मिल पाए हैं जबकि 52.30 लाख वोटरों के नाम कट सकते हैं।

विपक्ष ने किया वोटर वेरिफिकेशन का विरोध

बिहार में वोटर वेरिफिकेशन का काम जब से चुनाव आयोग ने शुरू किया, विपक्ष आग-बबूला है। इस मुद्दे पर महागठबंधन ने बिहार बंद करवाया और अब संसद में भी हंगामा हो रहा है। विपक्ष अब उन 52 लाख मतदाताओं पर क्या कहेगा जो अपने पते पर ही मौजूद नहीं हैं। यानी अगर इनका नाम वोटर लिस्ट में रहता तो मतदान प्रक्रिया का क्या होता?

Myntra के खिलाफ ED ने किया ₹1650 करोड़+ की गड़बड़ी का केस, FDI में हेरफेर पर दर्ज हुआ मामला: बताया- अपनी ही कम्पनी को बेचती थी 100% प्रोडक्ट्स, 25% की ही है परमिशन

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) 1999 की धारा 16(3) के तहत मिन्त्रा (Myntra) डिजाइंस प्राइवेट लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनियों और निदेशकों के खिलाफ 1654.35 करोड़ रुपए के उल्लंघन की शिकायत दर्ज की है।

ED का दावा है कि मिन्त्रा ने ‘मल्टी ब्रांड रिटेल व्यापार’ (MBRT) के कारोबार को ‘थोक व्यापार’ के रूप में दिखाकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का दुरुपयोग किया है। ED का कहना है कि यह FDI की नीतियों का उल्लंघन है। MBRT के संदर्भ में FDI या तो प्रतिबंधित है या फिर सख्त दिशा निर्देशों के साथ पालन की जानी चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ED की जाँच में पाया गया कि मिन्त्रा ने अपने ज्यादातर उत्पाद वेक्टर ई-कॉमर्स प्राइवेट लिमिटेड (Vector E-Commerce Pvt. Ltd.) को बेचे पर असल में ये मिन्त्रा की अपनी ही ग्रुप कंपनी है। वेक्टर ने अपने उत्पाद सीधे ग्राहकों को बेचे। ऐसे में ये रिटेल कोरबार का मामला बनता है, जो मौजूदा FDI नीति के तहत प्रतिबंधित है।

FDI नीति के अनुसार, किसी ग्रुप कंपनी को केवल 25% तक बिक्री की अनुमति है। लेकिन मिन्त्रा ने 100% बिक्री अपनी ही ग्रुप कंपनी को कर दी। ये साफ तौर पर नीति का उल्लंघन है।

ED की कार्रवाई

ED ने कहा कि मिन्त्रा ने जानबूझकर बिजनेस टू कस्टमर यानी B2C लेन-देन को बिजनेस टू बिजनेस यानी B2B के रूप में दिखाकर घपला किया। यह कागजी हेरफेर इसलिए की गई ताकि FDI नियमों को दरकिनार किया जा सके। अब यह मामला FEMA के तहत Adjudicating Authority (न्यायनिर्णयन प्रधिकारी) के सामने पेश किया जाएगा। इसके बाद आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।

इस मामले में मिन्त्रा पर जो भी कार्रवाई होगी, वह भारत में ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा FDI नियमों के पालन को लेकर एक बड़ा उदाहरण बन सकता है।