बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के छह गुंडों ने 27 जून, 2025 को एक नाबालिग हिन्दू जनजातीय लड़की के साथ रेप किया। यह घटना बांग्लादेश के चटगाँव डिवीजन के खगराछारी में हुई थी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता कक्षा आठ की छात्रा है। घटना वाले दिन वह रथ यात्रा मेले में गई थी और फिर एक रिश्तेदार के घर रुकी थी। आरोपित जबरन घर में घुस गए और पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार किया। आरोपितों की पहचान अरमान हुसैन, इमोन हुसैन, इनायत हुसैन, सद्दाम हुसैन, मोहम्मद सोहेल इस्लाम और मोहम्मद मुनीर इस्लाम के रूप में हुई है।
Chittagong hill, Khagrachhari
6 settler muslim men gang-raped a 13 year old girl of Tripura community. (Hindu)
आरोपितों ने रेप के दौरान उसका वीडियो भी बनाया और पीड़िता को चुप रहने के लिए धमकाया। चारो आरोपित BNP की छात्र शाखा, छात्र दल, युवा शाखा और जुबो दल के नेता हैं। डर और लोक-लाज के कारण नाबालिग हिंदू लड़की ने अपने साथ हुई घटना के बारे में परिवार वालों को नहीं बताया।
इसके चलते वह जल्द ही डिप्रेशन में आ गई। 12 जुलाई 2025 को उसने आत्महत्या का प्रयास किया। पीड़िता ने खुद को जान से मारने के लिए जहर पी लिया। परिजनों ने उसे खगराछारी सदर अस्पताल में भर्ती कराया। यहाँ अस्पताल में इलाज के बाद उसकी जान बचा ली गई।
Khagrachhari of #Bangladesh is in turmoil over the gang rape of an 8th grade student. The army is accused of forcing classmates not to form a human chain. This news has not been reported in any newspaper. What a shame that a noble laureate @Yunus_Centre is the @ChiefAdviserGoB… pic.twitter.com/ggxewgHCTP
मामले पर बात करते हुए अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर रिपोल बप्पी चकमा ने कहा, “छात्रा की हालत गंभीर है और वह मानसिक रूप से अवसादग्रस्त है। उसे आवश्यक उपचार दिया जा रहा है।” होश में आने पर पीड़िता ने अपने परिजनों को सच्चाई बताई।
16 जुलाई 2025 की रात को लड़की के पिता ने खगराछारी सदर थाने में BNP के छः नेताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। खगरछारी के एसपी आरोफिन ज्वेल ने बताया कि गुरुवार (17 जुलाई 2025) को पुलिस ने छापेमारी कर आरोपित अरमान हुसैन, इमोन हुसैन, इनायत हुसैन और सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया है।
BNP नेता फजोर अली ने भी किया था हिन्दू महिला से रेप
इससे पहले 26 जून 2025 को BNP के एक प्रमुख नेता फजोर अली ने एक हिंदू महिला के घर में जबरन घुसकर उसका रेप किया था। उसने अपनी साथियों संग मिलकर महिला का चाकू की नोंक पर रेप किया था। इतना ही नहीं उसने उसकी वीडियो भी बनाकर वायरल कर दी थी।
पीड़िता 21 साल की थी और उसके दो बच्चे भी हैं। उसका पति दुबई में रहकर नौकरी करता था । घटना के 15 दिन पहले ही वह मुरादनगर अपने पिता के घर रहने आई थी। तब से ही 38 वर्षीय फजोर अली उसके पीछे पड़ा था। बाद में उसने घर
उत्तर प्रदेश के आगरा में एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें दो सगी बहनों के अपहरण और धर्मांतरण की कहानी ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। आगरा पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाते हुए सात राज्यों में छापेमारी की और कई आरोपितों को गिरफ्तार किया।
इस रैकेट की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसके तार विदेशी फंडिंग से भी जुड़े होने का शक है। यह मामला फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ की तर्ज पर सामने आया है, जिसमें लालच, लग्जरी लाइफ का वादा और ब्रेनवॉश का कॉकटेल इस्तेमाल कर युवाओं को धर्मांतरण के लिए फँसाया जाता है। आइए ये पूरा मामला समझते हैं।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना शुरू होती है आगरा के सदर थाना क्षेत्र से, जहाँ पंजाबी समाज की दो सगी बहनें रहती थीं। ये बहनें 24 मार्च 2025 को अचानक अपने घर से गायब हो गईं। परिवार वालों ने पहले तो खुद तलाश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। 4 मई 2025 को सदर थाने में अपहरण की धारा में मुकदमा दर्ज हुआ। परिवार का आरोप था कि उनकी बेटियों को जम्मू-कश्मीर के ऊधमपुर की रहने वाली एक युवती सायमा उर्फ खुशबू ने बहला-फुसलाकर ले गई है।
पुलिस की जाँच में जो खुलासा हुआ, वो चौंकाने वाला था। ये कोई साधारण अपहरण का मामला नहीं था, बल्कि एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का हिस्सा था। पुलिस को पता चला कि इन बहनों का ब्रेनवॉश कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया है और अब वो खुद इस रैकेट का हिस्सा बन चुकी हैं।
कैसे शुरू हुई कहानी?
यह कहानी 2021 से शुरू होती है। उस वक्त बड़ी बहन, जो आगरा के दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में पढ़ती थी, सायमा उर्फ खुशबू नाम की एक युवती के संपर्क में आई। सायमा ने धीरे-धीरे उसका ब्रेनवॉश शुरू किया। उसे लग्जरी लाइफ और बड़े-बड़े वादों का लालच दिया गया। नतीजा ये हुआ कि 2021 में बड़ी बहन सायमा के साथ चली गई। परिवार वालों ने पुलिस को सूचना दी और रास्ते में लैंडस्लाइड होने की वजह से पुलिस और परिवार वाले उसे वापस घर ले आए।
लेकिन घर आने के बाद भी बड़ी बहन की हरकतें बदल चुकी थीं। वो पूजा-पाठ का विरोध करने लगी और इस्लाम की पैरवी करने लगी। परिवार वालों के लिए ये किसी सदमे से कम नहीं था। धीरे-धीरे उसने अपनी छोटी बहन को भी अपने प्रभाव में ले लिया। बड़ी बहन ने छोटी बहन का भी ब्रेनवॉश किया और दोनों 24 मार्च 2025 को घर से गायब हो गईं।
पुलिस ने कैसे पकड़ा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब परिवार ने पुलिस से गुहार लगाई, तो आगरा पुलिस ने फौरन हरकत में आते हुए सात टीमें बनाईं। इनमें साइबर सेल, सर्विलांस और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की टीमें शामिल थीं। डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश पर पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने इस मामले को गंभीरता से लिया।
पुलिस ने सर्विलांस और साइबर सेल की मदद से दोनों बहनों का सुराग तलाशा। उनकी लोकेशन पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में मिली। पुलिस ने तुरंत वहाँ छापेमारी की और दोनों बहनों को सुरक्षित बरामद कर लिया। इसके साथ ही बैरकपुर से दो लोगों, शेखर रॉय उर्फ हसन अली और रीत बनिक उर्फ मोहम्मद इब्राहिम को गिरफ्तार किया गया। हसन अली बारासात कोर्ट में कर्मचारी है।
पुलिस यहीं नहीं रुकी। उसने सात राज्यों – पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली-एनसीआर और बिहार में एक साथ छापेमारी की। उत्तराखंड के ऋषिकेश से रहमान नाम के एक शख्स को पकड़ा गया। बरेली और राजस्थान से भी एक-एक आरोपित को गिरफ्तार किया गया। सभी आरोपितों को ट्रांजिट रिमांड पर आगरा लाया जा रहा है।
धर्मांतरण गैंग का हाईटेक तरीका
पुलिस की जाँच में पता चला कि ये धर्मांतरण गैंग कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं है। ये एक हाईटेक नेटवर्क है, जो 2015 से सक्रिय है। ये गैंग पहले पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को टारगेट करता है। उन्हें लग्जरी लाइफ, पैसे और बड़े-बड़े वादों का लालच दिया जाता है। फिर सोशल मीडिया के जरिए हाईटेक तरीके से ब्रेनवॉश किया जाता है। जो लोग इनके जाल में फँस जाते हैं, उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है और फिर उन्हें गैंग का हिस्सा बना लिया जाता है।
ये गैंग इतना शातिर है कि धर्मांतरण के बाद लोग खुद इसके लिए काम करने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर इस्लाम के पक्ष में मुहिम चलाते हैं और नए लोगों को फंसाने का काम करते हैं। पुलिस को कुछ ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट्स मिले हैं, जिनकी गतिविधियाँ संदिग्ध हैं और धर्मांतरण से जुड़ी हुई हैं।
विदेशी फंडिंग का शक
पुलिस की शुरुआती जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि इस गैंग के तार विदेशों से जुड़े हो सकते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे बलरामपुर के छांगुर पीर उर्फ जलालुद्दीन के मामले में विदेशी फंडिंग की बात सामने आई थी। छांगुर पीर का मामला इन दिनों चर्चा में है, जहाँ ईडी, एटीएस और एसटीएफ ने छापेमारी की थी। हालाँकि, आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने साफ किया कि इस मामले का छांगुर पीर से कोई सीधा कनेक्शन नहीं है। फिर भी विदेशी फंडिंग की जाँच चल रही है और जल्द ही बड़ा खुलासा होने की उम्मीद है।
क्या कह रहा है पीड़ित परिवार?
पीड़ित परिवार का कहना है कि उनकी बेटियों को सायमा उर्फ खुशबू ने अपने जाल में फँसाया। सायमा ने पहले बड़ी बेटी को ब्रेनवॉश किया और फिर उसने अपनी छोटी बहन को भी उसी रास्ते पर ले गई। परिवार का आरोप है कि सायमा उनकी बेटियों को शादी के बहाने ले गई। पिता ने पुलिस को बताया कि उनकी बेटी सायमा के प्रभाव में आकर दूसरे मजहब की बात करने लगी थी। परिवार ने पुलिस से जल्द से जल्द कार्रवाई की गुहार लगाई थी।
‘द केरल स्टोरी’ जैसी है ये कहानी भी…
लोगों का कहना है कि ये मामला फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ से मिलता-जुलता है। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे युवतियों को प्रलोभन और ब्रेनवॉश के जरिए धर्मांतरण के लिए फँसाया जाता है। ठीक उसी तरह इस मामले में भी सायमा ने पहले बड़ी बहन को अपने जाल में फँसाया और फिर उसने छोटी बहन को भी उसी रास्ते पर ले गई।
आगरा पुलिस इस मामले में और गहराई से जाँच कर रही है। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने बताया कि बाकी आरोपितों की तलाश में छापेमारी जारी है। साइबर सेल सोशल मीडिया अकाउंट्स और आरोपियों के मूवमेंट की बारीकी से जाँच कर रही है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही इस रैकेट का और बड़ा खुलासा होगा।
ये मामला न सिर्फ आगरा बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। धर्मांतरण का ये हाईटेक रैकेट पढ़े-लिखे युवाओं को टारगेट कर रहा है। सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसे गैंग आसानी से लोगों को अपने जाल में फँसा लेते हैं। परिवार वालों को अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी और पुलिस को भी ऐसे मामलों में और तेजी से कार्रवाई करनी होगी। आगरा पुलिस की इस कार्रवाई से एक बात तो साफ है कि कानून का शिकंजा अब इन गैंगों पर कस रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये रैकेट पूरी तरह खत्म हो पाएगा?
एअर इंडिया हादसे को लेकर अमेरिकी विमानन जाँच एजेंसी नेशनल ट्रांसपोर्ट सेफ्टी बोर्ड (NTSB) ने बयान जारी किया है। NTSB ने एअर इंडिया हादसे का जिम्मेदार पायलट को बताने पर मीडिया संस्थानों को लताड़ा है। अमेरिकी जाँच एजेंसी NTSB ने भारतीय विमानन जाँच एजेंसी AAIB का पूरा सहयोग देने की बात कही है।
NTSB ने WSJ को लताड़ा
एअर इंडिया हादसे को लेकर NTSB प्रमुख जेनिफर होमेंडी ने शनिवार (19 जुलाई, 2025) को यह बयान जारी किया है। NTSB प्रमुख ने कहा,”एअर इंडिया 171 दुर्घटना पर हालिया मीडिया रिपोर्टें अपरिपक्व और कयास लगाने वाली हैं। भारत के विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो ने हाल ही में अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की है।”
NTSB प्रमुख ने आगे कहा,”इस तरह की जाँच में समय लगता है। हम AAIB की सार्वजनिक अपील का पूरा समर्थन करते हैं, जो गुरुवार को जारी की गई थी, और इसकी जाँच का सहयोग करते रहेंगे। इस मामले में जाँच सम्बन्धित सभी प्रश्न AAIB से पूछे जाने चाहिए।”
Statement from NTSB Chairwoman Jennifer Homendy: “Recent media reports on the Air India 171 crash are premature and speculative. India’s Aircraft Accident Investigation Bureau just released its preliminary report. Investigations of this magnitude take time. We fully support the…
NTSB के इस बयान हाल ही में वह हालिया मीडिया रिपोर्ट्स खारिज हो गईं हैं, जिनमें हादसे का जिम्मेदार सीधे तौर पर दुर्घटनाग्रस्त विमान AI-171 के कैप्टन सुमीत सभरवाल को ठहराया गया था। ऐसी रिपोर्ट्स वॉल स्ट्रीट जनरल ने प्रकाशित की थी।
WSJ की रिपोर्ट में AAIB की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट को तोड़ मरोड़ के पेश किया गया था। WSJ ने दावा किया था कि विमान के अहमदाबाद से उड़ने के बाद कॉकपिट में फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर ने कैप्टन सभरवाल से फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने को लेकर पूछा था।
अपनी खबर में WSJ ने यह दिखाने का प्रयास किया था कि जैसे कैप्टन सभरवाल ने ही यह फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद किया था और इसी के चलते हादसा हुआ। WSJ ने दावा किया था कि अब पूरी जाँच का केंद्र बिंदु पायलट सुमीत सभरवाल ही हैं।
WSJ के ही सुर में सुर मिलाते हुए रायटर्स, CNN समेत तमाम विदेशी मीडिया संस्थानों ने यही बातें लिखी थीं। पायलटों को दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने आने से पहले से आने लगी थीं। इसमें सबसे आगे WSJ रहा था।
पहले से तय कर ली थी कहानी
WSJ ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं।
यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई। यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने ही नहीं किया था। वॉल
स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था।
इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी। यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया।
AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई थी जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई।
इसी कहानी के अंतिम अध्याय में पायलटों को दोषी ठहराते हुए कैप्टन सुमीत सभरवाल को फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने का दोषी बता दिया गया। यह सब तब हुआ जब AAIB ने स्वयं कहा है कि इस हादसे की जाँच अभी पूरी नहीं हुई है और जो भी रिपोर्ट सामने आई है वह प्रारम्भिक है। अब NTSB ने भी WSJ समेत बाकी न्यूज संस्थानों की बात को झुठला दिया है।
पायलट यूनियन ने अब मीडिया से माँगा जवाब
NTSB के इस मामले में WSJ समेत बाकी रिपोर्ट्स को खारिज करने के बाद भारतीय पायलट फेडरेशन (FIP) ने भी जवाब माँगे हैं। FIP ने कैप्टन सुमीत सभरवाल को बिन जाँच पूरी हुए दोषी बताने पर WSJ और रायटर्स से जवाब माँगा है। उन्होंने इस सबंध में दोनों मीडिया संस्थानों को कानूनी नोटिस भेजी है। पायलट फेडरेशन ने कैप्टन सभरवाल को दोषी ठहराने वाली खबरों को वापस लिए जाने की बात नोटिस में कही है। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि कैप्टन सभरवाल की छवि ख़राब करने के लिए दोनों संस्थानों को माफी माँगनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश से संदिग्ध धर्मांतरण रैकेट के तार देहरादून तक जुड़े पाए गए हैं। यूपी ATS की जाँच के बाद देहरादून पुलिस ने रानीपोखरी की एक 21 वर्षीय युवती को धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभित करने के मामले में 5 आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इनमें अब्दुल रहमान, अबु तालिब, अयान, अमन, और श्वेता (गोवा निवासी) शामिल हैं।
यूपी ATS ने अब्दुल रहमान को शंकरपुर से हिरासत में लिया। पूछताछ में पता चला कि अब्दुल रहमान इस धर्मांतरण गैंग से जुड़ा है और उसने अपने साथियों के साथ मिलकर रानीपोखरी की एक युवती को भी निशाना बनाया था।
जानकारी के अनुसार, आरोपित इंस्टाग्राम के जरिए युवतियों से संपर्क करते थे। आरोपित हिंदू लड़कियों को इस्लाम अपनाने के लिए पैसों का लालच देते थे। इसके अलावा उन्हें कलमा-नमाज पढ़ने और बुर्का पहनने पर भी दबाव बनाया जाता था।
युवती ने बताया कि आरोपित उसे ‘रानी’ बनाने और पैसों की बरसात का लालच देते थे। आरोपित ने ऑनलाइन छोटे-छोटे अमाउंट (500 से 3000 रुपए तक) भी भेजे गए थे।
अब्दुल रहमान का छांगुर से कनेक्शन
पुलिस जाँच में सामने आया है कि अब्दुल रहमान का असली नाम ‘रूपेंद्र प्रताप सिंह’ है। उसने 2015 में एक मुस्लिम युवती से शादी करने के लिए धर्म और नाम बदला।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुल रहमान 2012 में धर्मांतरण का साजिशकर्ता जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर के संपर्क में आया था। छांगुर पीर ने उसे हिंदू युवतियों का धर्म परिवर्तन कराने के बदले मुनाफे का लालच दिया था।
अब्दुल रहमान ने धर्मांतरण के बाद देहरादून और लखनऊ में दो शादियाँ की हैं और उसके 8 बच्चे हैं। छांगुर पीर के संपर्क में रहने के बाद अब्दुल रहमान ने उत्तराखंड में इस गिरोह की कमान संभाली।
छांगुर पीर का फर्जी RSS कनेक्शन
छांगुर पीर अधिकारियों और नेताओं से मिलते समय खुद को RSS से जुड़ी संस्था का बड़ा पदाधिकारी बताता था। छांगुर पीर ने अपनी संस्था के लेटरहेड पर प्रधानमंत्री मोदी की फोटो भी लगा रखी थी।
छांगुर को भारत प्रतिकार्थ सेवा संघ नाम की संस्था का महासचिव बनाया गया था। इस संस्था को ‘ईद उल इस्लाम’ नाम का दूसरा आरोपित ईदुल इस्लाम चला रहा था। जाँचकर्ताओं का कहना है कि संस्था का नाम जानबूझकर ऐसा रखा गया था, ताकि लोग इसे RSS से जुड़ा हुआ मानें।
अपनी संस्था को असली दिखाने के लिए इस्लाम ने RSS के मुख्यालय नागपुर में एक फर्जी केंद्र भी खोल रखा था। छांगुर पीर और इस्लाम अधिकारियों से मिलते समय RSS के कई बड़े नेताओं का नाम लेते थे, ताकि उनकी बातों पर विश्वास किया जा सके।
देह व्यापार का भी एंगल
आगरा पुलिस ने बताया कि धर्मांतरण के बाद कुछ युवतियाँ इस्लाम के पक्ष में सोशल मीडिया पर मुहिम चलाती थीं। इस गिरोह के चंगुल से निकलने की कोशिश करने वाली युवतियों को देह व्यापार में धकेलने की बात भी सामने आई है।
हालाँकि, पुलिस ने बताया कि आरोपितों ने छांगुर से किसी भी तरह के कोई संपर्क की बात नहीं कबूली है। लेकिन अब्दुल रहमान के माध्यम से यह जुड़ाव सामने आया है।
जाँच के दौरान, पुलिस को पता चला कि आगरा की दो लापता बहनें कोलकाता में मिली और ‘द केरला स्टोरी’ फिल्म की तरह धर्मांतरण कराने वाले गैंग के जाल में फँस गई थीं।
पुलिस अभी भी इस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है और आरोपितों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी जाँच कर रही है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुँच गया है, लेकिन ऐन मौके पर एक अनचाही समस्या सामने आ गई है। ये है- मांसाहारी दूध, जो सौदे की राह में अड़चन बनकर उभरा है।
भारत ने अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात को यह कह कर खारिज कर दिया है कि उनमें ऐसी गायों का दूध होता है जिन्हें मांसाहारी या पशुओं के अवशेष युक्त आहार खिलाया जाता है। ये भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध है।
नॉन-वेज दूध क्या है?
मांसाहारी दूध से का मतलब उन गायों का दूध और डेयरी उत्पाद है, जिन्हें माँस, खून या चर्बी जैसे पशु-आधारित चारे खिलाए जाते हैं। 2004 में प्रकाशित हुई सिएटल पोस्ट-इंटेलिजेंसर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में गायों को ऐसा चारा दिया जा सकता है, जिसमें सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े, यहाँ तक कि बिल्ली और कुत्ते के अंग भी शामिल हो सकते हैं।
इसके अलावा, उन्हें सूअर और घोड़े का खून और मवेशियों के अंगों से बनी चर्बी भी खिलाई जा सकती है। हालाँकि गायें स्वभाव से शाकाहारी होती हैं, फिर भी अमेरिकी नियमों के अनुसार, उन्हें जानवरों से बनी चीजें खिलाने की अनुमति होती है। चाहे वे मांस के लिए पाली जा रही हों या दूध के लिए।
भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यहाँ गायों को पौधों पर आधारित आहार ही दिया जाता है और जानवरों या मांस से बनी कोई चीज नहीं खिलाई जाती। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से डेयरी उत्पादों के आयात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।
भारत का इनकार: धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ
वर्ल्ड एटलस की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 38% जनसंख्या शाकाहारी है। यहाँ दूध और घी को पवित्र माना जाता है। ये हिंदू और जैन धर्म में दैनिक पूजा और प्रसाद में इस्तेमाल किए जाते हैं।
इन धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाले दूध से बने उत्पाद शुद्ध (सात्विक) होने चाहिए। लेकिन अगर गाय को ऐसा चारा खिलाया गया हो जिसमें जानवरों के अंग, खून या मांस शामिल हों, तो उस गाय से प्राप्त दूध और उससे बने उत्पाद धार्मिक रूप से अशुद्ध और अस्वीकार्य माने जाते हैं।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक GTRI के अजय श्रीवास्तव ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “कल्पना कीजिए, आप उस गाय का मक्खन खा रहे हैं जिसे किसी दूसरी गाय का मांस और खून खिलाया गया हो। भारत शायद ऐसा दूध उत्पाद कभी स्वीकार नहीं करेगा।”
भारत का पशुपालन और डेयरी विभाग विदेशों से आने वाले दूध और खाद्य उत्पादों के लिए पशु चिकित्सा प्रमाणपत्र (Veterinary Certificate) अनिवार्य करता है। इस प्रमाणपत्र की एक जरूरी शर्त है कि- “ऐसे पशुओं को कभी भी मांस, हड्डी, खून, अंगों या सूअर से बने किसी भी पदार्थ वाला चारा नहीं खिलाया गया हो।” यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि भारत में केवल शाकाहारी आहार पर पली हुई गायों से प्राप्त दूध उत्पाद ही आयात किए जा सकें।
India Vs US Dairy Deadlock – India Says No 'Non-Veg' Milk
भारत का इनकार: सिर्फ संस्कृति नहीं, अर्थव्यवस्था भी है वजह
भारत का अमेरिका से डेयरी उत्पादों का विरोध केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से नहीं है, बल्कि इसका एक बड़ा कारण देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा करना भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।
2023-24 में भारत ने 239 मिलियन मीट्रिक टन दूध का उत्पादन किया, जिससे 7.5 से 9 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2.5% से 3% है। भारत का डेयरी सेक्टर 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है।
इनमें से ज्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास सिर्फ 2 या 3 गाय/भैंस होती हैं। उनके लिए यही आमदनी का मुख्य जरिया है। अगर भारत ने अमेरिका जैसे देशों से सस्ते, सब्सिडी वाले डेयरी उत्पादों को आने की इजाजत दे दी, तो भारतीय बाजार में सस्ती विदेशी चीजें भर जाएँगी।
2024 में अमेरिका ने 8.22 बिलियन डॉलर का डेयरी निर्यात किया और अगर उसका भारत में आयात हुआ तो इसका भारी असर भी होगा। भारतीय स्टेट बैंक के एक विश्लेषण के अनुसार, इससे घरेलू दूध की कीमतों में कम से कम 15% गिरावट आ सकती है। इससे किसानों को हर साल लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।
महाराष्ट्र के किसान महेश सकुंडे ने कहा, “सरकार को यह देखना होगा कि हम सस्ते विदेशी दूध से प्रभावित न हों। अगर ऐसा हुआ तो पूरे डेयरी उद्योग को और हम जैसे छोटे किसानों को बड़ा नुकसान होगा।”
बातचीत में रुकावट
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तय समय सीमा 1 अगस्त नजदीक आ रही है। अगर तब तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ (शुल्क) बढ़ा सकता है। डेयरी क्षेत्र को लेकर जारी विवाद भारत और अमेरिका के बीच 2030 तक व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने के बड़े लक्ष्य पर भी असर डाल सकता है।
हालाँकि बातचीत चल रही है, लेकिन भारतीय पक्ष अब भी अपने रुख पर अडिग है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने साफ कहा, “डेयरी के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। यह हमारे लिए एक स्पष्ट सीमा है।” इस बीच, अमेरिका ने यह मामला विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी उठाया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने कहा कि नवंबर 2024 से लागू होने वाला भारत का नया डेयरी सर्टिफिकेशन नियम उनकी समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं करता।
पश्चिम एशिया एक बार फिर संकट के मुहाने पर है। दक्षिणी सीरिया के सुवेदा में दो समुदायों ड्रूज (Druze) और बेडौइन के बीच स्थानीय संघर्ष के रूप में शुरू हुआ विवाद अब क्षेत्रीय तनाव का केंद्र बन गया है। इजरायली फाइटर प्लेन ने सीरियाई क्षेत्र में 160 से ज्यादा हवाई हमले किए हैं।
इस हमले का कारण सीरिया की नई सरकार द्वारा ड्रूज अल्पसंख्यकों के विरुद्ध की गई क्रूर कार्रवाई थी। इसके तहत कई ड्रूज नागरिकों की सामूहिक हत्या की गई। इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी हैं। ड्रूज समुदाय का इजरायल से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता है।
इन्हीं घटनाओं के बाद इजरायली वायुसेना ने सीरिया पर 160 से ज्यादा हवाई हमले किए। इजरायल ने यह कार्रवाई सिर्फ आत्म-रक्षा के लिए नहीं, बल्कि मानवीय सहायता के तहत भी की ताकि ड्रूज समुदाय को बचाया जा सके। हालाँकि यह हमला केवल ड्रूज की सुरक्षा तक सीमित नहीं था। इजरायल ने इस मौके का इस्तेमाल सीरियाई सेना को नुकसान पहुँचाने और इजरायल व सीरिया के बीच एक बफर जोन बनाए रखने के लिए भी किया।
गौर करने वाली बात यह है कि इजरायल ने राजनीतिक कारणों से सीरिया में एक पूर्व जिहादी को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन इस हमले के जरिए इजरायल ने साफ कर दिया कि वह सीरियाई सरकार द्वारा धार्मिक और जातीय हिंसा को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा।
कौन हैं ड्रूज और क्यों है इजरायल को उनकी परवाह ?
ड्रूज एक छोटा लेकिन एकजुट मजहबी समुदाय हैं। इनकी शुरुआत 10वीं सदी में इस्माइली शिया इस्लाम से हुई थी। हालाँकि समय के साथ यह समुदाय एक अलग मजहबी और जातीय पहचान बन गया है। ये लोग मुख्य रूप से सीरिया, लेबनान और इजरायल के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं।
वे इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) में सेवा करते हैं, समाज में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और देश के प्रति वफादार नागरिक माने जाते हैं। उनकी पहचान इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है। दक्षिणी सीरिया में, खासकर स्वैदा (Suwayda) नामक इलाके में ड्रूज लोग रहते हैं।
यह इलाका इजरायल के गोलान हाइट्स के पास है और लंबे समय से इजरायल और सीरियाई जिहादी समूहों के बीच एक बफर जोन का काम करता रहा है। यहाँ अस्थिरता इजरायल के लिए सिर्फ एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि एक रणनीतिक खतरा भी है। अगर इस इलाके से बेडुइन (Bedouin) जनजाति के लोगों के रुप एक और दुश्मन मोर्चा खुलता है तो यह इजरायल के लिए अस्वीकार्य है।
हाल ही में जब एक बेडुइन जनजाति ने स्वैदा में एक चेकपोस्ट बनाई और एक ड्रूज व्यक्ति पर हमला किया, तो जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई। इसके बाद अपहरण, हत्या और बदले की कार्रवाइयों का सिलसिला चल पड़ा। सीरियाई सरकार ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, लेकिन वो तटस्थ नहीं रही। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, सीरियाई सेना ने बेडुइन पक्ष का साथ दिया, जिससे हिंसा और बढ़ गई। कुछ ही दिनों में 300 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जिनमें 27 ड्रूज नागरिकों को बेरहमी से मारने की खबरें सामने आईं।
इजरायल ने कई बार दमिश्क (सीरियाई सरकार) को चेतावनी दी कि वे ड्रूज लोगों को निशाना बनाना बंद करें, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जब ड्रूज लोगों की हत्याओं के वीडियो सामने आने लगे और इजरायल के अंदर से ड्रूज स्वयंसेवक अपने लोगों की मदद के लिए सीमा पार करने लगे, तब IDF ने हस्तक्षेप किया।
पूर्व जिहादी के हाथ से निकल रही सीरिया की व्यवस्था
सीरिया के वर्तमान राष्ट्रपति और पूर्व जिहादी अल-शरा के पास अपने देश के लिए एक सुनहरा मौका था। वे लंबे समय से प्रतिबंधों का सामना कर रहे सीरियाई समाज को शांति, समृद्धि और निवेश के साथ एक नई दिशा दे सकते थे।
सऊदी अरब, तुर्की, और कुछ हद तक इजरायल और अमेरिका जैसे देश किसी न किसी कारण से उनके प्रति सकारात्मक रुख रखते हैं। उन्हें यह परिस्थिति समझनी चाहिए और अपने लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी, न कि समाज में हिंसा को बढ़ावा देना चाहिए था। लेकिन जो कुछ ड्रूज अल्पसंख्यकों पर हो रहा है, वह कुछ और ही कहानी बताता है।
इजरायल की कई चेतावनियों के बावजूद अल-शरा ने इन हमलों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उल्टा उनकी सेनाएँ इस हिंसा का समर्थन करती दिखीं। इसके बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई की।
अमेरिका ने किया हस्तक्षेप लेकिन यह इतना भी आसान नहीं
अमेरिका ने अब हस्तक्षेप करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन उसकी स्थिति थोड़ी जटिल है। सीरिया अमेरिका के खेमे में नहीं आता। फिर भी हाल के वर्षों में तुर्की और सऊदी अरब के कहने पर अमेरिका ने सीरिया के राष्ट्रपति अल-शरा से बातचीत की थी।
उस समय ट्रंप पश्चिम एशिया के दौरे पर थे। तुर्की की चिंता थी कि शरणार्थियों की आमद कम हो, जबकि सऊदी अरब चाहता था कि सीरिया को एक बड़े सुन्नी गठबंधन में शामिल किया जाए। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि अब सीरिया अमेरिका का मित्र बन गया है। दरअसल यहीं पर ‘ब्लॉक थ्योरी’ काम नहीं करती। आज की दुनिया में गठबंधन वैचारिक नहीं बल्कि लेन-देन के हिसाब से बनते हैं।
उदाहरण के तौर पर भारत अगर चीन से बातचीत कर रहा है, तो इसका ये मतलब नहीं कि वो चीन के साथ हो गया है। वैसे ही अमेरिका का सीरिया से संपर्क भी भरोसे पर नहीं बल्कि अस्थायी जरूरतों पर आधारित है।
‘ग्रेटर इजरायल’ की तरफ बढ़ रहा यहूदी राष्ट्र
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम इजरायल की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इसे कुछ लोग ‘ग्रेटर इजरायल’ की सोच कहते हैं। हालाँकि यह सिद्धांत अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।
हालाँकि मौजूदा हकीकत यह है कि इजरायल अपनी सीमाओं के आस-पास स्थिर और सुरक्षित बफर जोन बनाना चाहता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ उसकी अपनी अल्पसंख्यक आबादी, जैसे कि ड्रूज समुदाय रहता है। ड्रूज समुदाय की रक्षा कर के इजरायल न सिर्फ नैतिक बढ़त हासिल करता है, बल्कि सीरिया के एक रणनीतिक क्षेत्र में अपना प्रभाव भी बढ़ाता है।
इजरायल का मकसद कोई क्षेत्र छीनना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसके दुश्मन इन इलाकों पर प्रभावी न हों। फिलहाल अमेरिका के राजदूत टॉम बैरक ने जानकारी दी है कि इजरायल और सीरिया ने युद्ध विराम पर सहमति जताई है। लेकिन इजरायल ने साफ कहा है कि अगर ड्रूज समुदाय पर दोबारा हमला हुआ, चाहे वो हमला उसकी सीमाओं के बाहर ही क्यों न हो तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनमोल कुमार ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पांडे की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की है। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “महान स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। वे ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने वाले देश के अग्रणी योद्धा थे। उनके साहस और पराक्रम की कहानी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।”
महान स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। वे ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने वाले देश के अग्रणी योद्धा थे। उनके साहस और पराक्रम की कहानी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।
इस ट्वीट के जरिए पीएम ने न सिर्फ मंगल पांडे की बहादुरी को याद किया, बल्कि देशवासियों को उनके बलिदान से प्रेरणा लेने का आह्वान भी किया। मंगल पांडे के बलिदान ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहले बड़े विद्रोह की चिंगारी जलाई थी, जिसे आज हम भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं। आइए, इस खास रिपोर्ट में जानते हैं मंगल पांडे के जीवन, उनके विद्रोह की कहानी, कैसे अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा, क्यों 10 दिन पहले दी गई फाँसी और अंग्रेजों को क्या डर सता रहा था।
मंगल पांडे: एक साधारण सिपाही से क्रांतिवीर तक
मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गाँव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, उनका जन्म अयोध्या के पास सुरुरपुर गाँव में हुआ, लेकिन उनका परिवार बलिया से ही था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था और परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। फिर भी मंगल में बचपन से ही देशभक्ति और अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा था।
साल 1849 में सिर्फ 18 साल की उम्र में वे ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में सिपाही बन गए। उस समय ब्रिटिश सेना में भारतीय सिपाहियों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन उन्हें हमेशा कमतर आँका जाता था। कम वेतन, भेदभाव और अंग्रेजों की मनमानी से सिपाही नाराज थे। मंगल पांडे भी इस गुस्से का हिस्सा थे, जो बाद में उनके विद्रोह का कारण बना।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और मंगल पांडे की भूमिका
1857 का विद्रोह जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, कोई एक दिन की घटना नहीं थी। यह सालों से जमा हुए गुस्से का विस्फोट था। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं की रियासतें छीन लीं, किसानों पर भारी टैक्स लाद दिए और भारतीय सिपाहियों के साथ बुरा बर्ताव किया। लेकिन विद्रोह की असली चिंगारी थी नई एनफील्ड राइफल के कारतूस।
1850 के दशक में अंग्रेजों ने यह राइफल भारतीय सिपाहियों को दी, लेकिन इसके कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह फैल गई। इन कारतूसों को मुँह से काटकर राइफल में लोड करना पड़ता था, जो हिंदू और मुस्लिम सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ था। यह बात जंगल की आग की तरह फैली और सिपाहियों में बेचैनी बढ़ गई।
मंगल पांडे ने इस बेचैनी को आवाज दी। 29 मार्च 1857 को जब वे पश्चिम बंगाल के बैरकपुर छावनी में तैनात थे, उन्होंने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। मंगल ने कारतूस इस्तेमाल करने से मना कर दिया और अपने साथी सिपाहियों को भी अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने को कहा। उन्होंने जोरदार नारा लगाया, “मारो फिरंगी को!” और दो ब्रिटिश अफसरों लेफ्टिनेंट बौघ और सार्जेंट-मेजर ह्यूसन पर हमला कर दिया।
मंगल ने बौघ को घायल किया और ह्यूसन को मार डाला। यह घटना पूरे देश में क्रांति की शुरुआत बन गई। मंगल पांडे की इस हिम्मत ने सिपाहियों और आम लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भड़का दिया। इतिहासकार मानते हैं कि मंगल पांडे का यह कदम 1857 के संग्राम का पहला बड़ा कदम था, जिसने अंग्रेजों को डरा दिया।
अंग्रेजों ने कैसे पकड़ा मंगल पांडे को?
मंगल पांडे का विद्रोह देखकर बैरकपुर छावनी में हड़कंप मच गया। उनके हमले के बाद कुछ सिपाहियों ने उनका साथ दिया, लेकिन पूरी रेजिमेंट एकजुट नहीं हो सकी। मंगल ने खुद को गोली मारने की कोशिश की ताकि अंग्रेजों के हाथ न लगें। उन्होंने अपनी बंदूक की नाल छाती पर रखी और पैर से ट्रिगर दबाया, लेकिन गोली सिर्फ उन्हें घायल कर सकी। इसके बाद ब्रिटिश जनरल जॉन हर्सी ने स्थिति को संभाला।
हर्सी ने सिपाहियों को धमकी दी कि जो मंगल को नहीं रोकेगा, उसे गोली मार दी जाएगी। आखिरकार एक सिपाही ने मंगल पांडे को पकड़ लिया। मंगल को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल में मुकदमा चला। मंगल ने खुलकर कबूल किया कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। कोर्ट ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई और तारीख तय की 18 अप्रैल 1857।
10 दिन पहले फाँसी क्यों?
अंग्रेजों ने तय तारीख से 10 दिन पहले यानी 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर में चुपके से मंगल पांडे को फाँसी दे दी। इसका कारण था अंग्रेजों का डर। मंगल पांडे की बहादुरी की खबर तेजी से फैल रही थी। बैरकपुर के सिपाही ही नहीं, आसपास की छावनियों में भी विद्रोह की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। अंग्रेजों को डर था कि अगर मंगल को जिंदा रखा गया या फाँसी में देरी हुई, तो उनकी चिंगारी पूरे देश में आग लगा देगी। इसलिए उन्होंने जल्दबाजी में 8 अप्रैल को फाँसी दे दी ताकि विद्रोह को कुचला जा सके। लेकिन यह उनकी भूल थी। मंगल पांडे के बलिदान ने उल्टा विद्रोह को और भड़का दिया।
अंग्रेजों को क्या डर था?
अंग्रेजों का सबसे बड़ा डर था कि मंगल पांडे का विद्रोह एक बड़े स्वतंत्रता आंदोलन में बदल जाएगा। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज में लाखों भारतीय सिपाही थे और अगर वे एकजुट हो जाते, तो अंग्रेजों का राज खत्म हो सकता था। मंगल की कार्रवाई के बाद मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में विद्रोह की चिंगारी फैल गई। 20 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कसौली में सिपाहियों ने एक पुलिस चौकी जला दी। 10 मई 1857 को मेरठ में सिपाहियों ने ब्रिटिश अफसरों को मार डाला और दिल्ली की ओर कूच किया।
वहाँ उन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। लखनऊ में 30 मई को चिनहट और इस्माइलगंज में किसानों, मजदूरों और सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए। कानपुर में नाना साहब, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ में बेगम हजरत महल ने विद्रोह की कमान संभाली। अंग्रेजों को डर था कि अगर मंगल पांडे को जल्द खत्म न किया गया, तो यह विद्रोह पूरे भारत को आजादी की राह पर ले जाएगा।
मंगल पांडे की विरासत
मंगल पांडे के बलिदान ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को नई ताकत दी। भले ही अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया, लेकिन इसने उनकी कमजोरी उजागर कर दी। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म हुआ और ब्रिटिश क्राउन ने भारत पर सीधा शासन शुरू किया। मंगल पांडे की शहादत ने भारतीयों में आजादी की चाह जगाई, जो 1947 में पूरी हुई। उनकी याद में 1984 में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया। 2005 में उनके जीवन पर ‘मंगल पांडे: द राइजिंग’ नाम की फिल्म भी बनी थी, जिसमें आमिर खान ने उनकी भूमिका निभाई।
मंगल पांडे सिर्फ एक सिपाही नहीं, बल्कि भारत की आजादी की पहली चिंगारी थे। उनकी जयंती पर हम सब उन्हें सलाम करते हैं। जय हिंद!
भारत ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों और एयरबेस पर हमले किए। इसमें पाकिस्तान को काफी नुकसान हुआ लेकिन पाक अधिकारी यही कहते रहे कि ‘सबकुछ ठीक’ है। अब गूगल अर्थ ने पाकिस्तान के सरगोधा इलाके की कुछ सेटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं। इनमें किराना हिल्स पर हुए हमले के प्रभाव को दिखाया गया है।
ये सेटेलाइट तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। तस्वीरों में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि मई 2025 में किराना हिल्स पर हुए हमले का असर अब तक है। तस्वीरों में सरगोधा के मुशाफ एयरबेस के रनवे पर भी मरम्मत के बाद का नजारा देखा जा सकता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तस्वीर साझा करने वाले एक विश्लेषक और सेटेलाइट इमेज विशेषज्ञ डेमियन साइमन का कहना है कि भारत की ओर से किए गए हमले का असर साफ तौर पर किराना हिल्स में देखा जा सकता है। साथ ही सरगोधा एयरबेस पर भी स्ट्राइक के बाद रनवे की मरम्मत होने की तस्वीर भी देखी जा सकती है।
Imagery update from Google Earth of the Sargodha region, Pakistan, captured in June 2025, shows –
1 – the impact location of India's strike on Kirana Hills in May 2025 2 – repaired runways at Sargodha airbase post India's strikes in May 2025 pic.twitter.com/BLOXYB9fKP
एक यूजर की प्रतिक्रिया के जवाब में डेमियन ने कहा कि ये तस्वीरें किसी भी तरह से भूमिगत प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है। ये पहाड़ी का एक हिस्सा है जिसके आसपास कुछ महत्वपूर्ण स्थान नहीं हैं।
डेमियन ने साथ ही ये संभावना भी जताई कि हमले के आस पास कोई भी सुरंगें या परमाणु सुविधा जैसी चीजें नहीं हैं तो ऐसे में ये भारत की ओर से एक चेतावनी रही होगी। अगर भारत इस जगह तक पहुँच सकता है तो परमाणु सुविधा या सुरंगों तक पहुँचना कोई बड़ी बात नहीं है।
गौरतलब है कि पाकिस्तान ने किराना हिल्स पर हमले की बात को आधिकारिक तौर पर मना कर दिया था। पाकिस्तान की इंटर-सर्विस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने भारत की ओर से किए गए हमलों के के बाद हुए नुकसान की बात को ‘पूरी तरह से झूठा और निराधार’ बताया था।
पाक विदेश मंत्रालय ने भी नुकसान के दावों को ‘गैर-जिम्मेगदाराना और उकसाने वाली हरकत’ बताकर ये कहा था कि पाकिस्तानी फौज हर इंच की रक्षा करने में सक्षम है। अब ये तस्वीरें कुछ और कहानी ही बयाँ कर करही हैं।
क्यों जरूरी हैं किराना हिल्स?
पाकिस्तान के लिए किराना हिल्स और सरगोधा एयबेस काफी अहम जगहें हैं। किराना हिल्स में ही पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का जखीरा है। यहाँ पर मिसाइल बनने से लेकर परमाणु सुविधा की हर तैयारी की जाती है।
इसके अलावा सरगोधा में मुशाफ एयरबेस भी पाकिस्तान की फौज के लिए काफी अहमियत रखता है। भारत की सीमा से मात्र 150 किमी दूर इस अयरबेस पर पाकिस्तान के F-16, JF-17 और मिराज समेत कई महत्वपूर्ण विमान तैनात रहते हैं।
किराना हिल्स पाकिस्तान के पंजाब राज्य में एक श्रृंखला है। यह पाकिस्तान के सरगोधा जिले में स्थित है। यह पहाड़ी श्रृंखला लगभग 80 किलोमीटर लम्बी है। किराना हिल्स को लेकर ब्रिटिश सरकार के दौरान भी काफी रिसर्च हुई थी। किराना हिल्स को 1970 के बाद पाकिस्तान ने अपने काम में लेना चालू किया। पाकिस्तान यहाँ यूरेनियम की खोज को लेकर भी खुदाई की थी।
किराना हिल्स का सैटेलाईट व्यू (फोटो साभार:Jaidev Jamwal/X)
रिपोर्ट्स बताती है कि किराना हिल्स का इस्तेमाल 1978-79 के आसपास पाकिस्तान ने अपने परमाणु मिशन के लिए करना चालू किया था। किराना हिल्स में पाकिस्तान ने अपना परमाणु बम तैयार करने से पहले कई प्रयोग किए थे। यह भी कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियार बनाने के लिए कई चीजें छुपाई थी, जिन्हें अमेरिका के दबाव हटा दिया गया था।
किराना हिल्स को लेकर 2023 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि किराना हिल्स में हथियार रखने की जगह के साथ ही मिसाइल लांचर लान्चर खड़े करने के लिए गैरेज भी बनाए गए हैं।इन लॉन्चर के माध्यम से ही परमाणु हथियार रखने वाली मिसाइल को लॉन्च किया जाता है।
यह लॉन्चर ट्रक पर लगाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग जगह भी ले जाया जा सकता है। पाकिस्तान के परमाणु हथियार ले जानी वाली शाहीन और गौरी जैसी मिसाइलें हैं।
क्यों हुआ हमला?
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को पाकिस्तानी आतंकियों ने बैसारन घाटी में घूम रहे पर्यटकों से उनका धर्म पूछकर और हिंदू होने की पुष्टि कर मौत बरसाई थी। इस हमले में 20 से ज्यादा हिंदू पर्यटकों समेत 26 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे।
इसके जवाब में भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। इसमें पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकाने तबाह किए गए। जब पाकिस्तान ने जवाबी हमले शुरू किए तो उनको विफल करते हुए भारत ने पाकिस्तान के 11 एयरबेस उड़ा दिए।
हमलों के बाद कई विश्लेषकों ने दावा किया था कि भारत ने सिर्फ एयरबेस ही नहीं ध्वस्त किए बल्कि पाकिस्तान की एक परमाणु स्टोरेज फैसिलिटी ‘किराना हिल्स’ को भी उड़ाया। हालाँकि, एयरफोर्स के DG ऑपरेशंस ने इस बात से इनकार किया था कि किसी भी न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमला किया गया है।
भारत सरकार लक्षद्वीप समूह के एक द्वीप का रक्षा उद्देश्यों के लिए अधिग्रहण करने जा रहा है। इसके लिए भारत सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर दी है। यह द्वीप राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस का एक सांसद अब इस प्रोजेक्ट के विरोध में उतर आया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार जिस द्वीप का अधिग्रहण करने जा रही है उसका नाम बित्रा है। यह लक्षद्वीप द्वीप समूह के 10 बसे हुए आबादी वाले द्वीपों में से एक है। इसको लेकर लक्षद्वीप प्रशासन ने 11 जुलाई 2025 को एक नोटिफिकेशन जारी किया है।
राजस्व विभाग ने बताया है कि बित्रा द्वीप को रक्षा उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है। सरकार अब सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) करेगी, ताकि इस अधिग्रहण के प्रभावों का पता चल सके।
लक्षद्वीप के 10 बसे हुए द्वीपों में से एक बित्रा द्वीप को सरकार रक्षा उद्देश्यों के लिए अपने इस्तेमाल में लेगी। इस छोटे से द्वीप पर करीब 105 परिवार रहते हैं। नोटिफिकेशन के मुताबिक, बित्रा द्वीप की रणनीतिक अहमियत और राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण यह फैसला लिया गया है।
लक्षद्वीप के कॉन्ग्रेसी सांसद हामदुल्ला सईद ने सरकार के इस कदम का विरोध कर आरोप लगाया कि सरकार ने स्थानीय लोगों से कोई सलाह नहीं ली और यह इलाके में शांति भंग करने की कोशिश है। हामदुल्ला सईद इस फैसले के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कह रहा है।
बित्रा द्वीप महत्वपूर्ण क्यों?
बित्रा द्वीप लक्षद्वीप का सबसे छोटा बसा हुआ द्वीप है। बित्रा द्वीप का कुल एरिया केवल 0.105 वर्ग किलोमीटर है। यह 0.57 किलोमीटर लंबा और सबसे चौड़े हिस्से में 0.28 किलोमीटर चौड़ा है। यह द्वीप कोच्चि से 483 किलोमीटर (261 नॉटिकल मील) दूर है।
बिट्रा द्वीप 1835 तक समुद्री पक्षियों के लिए एक प्रजनन स्थल था। किलटन और चेटलाट के लोग यहाँ शिकार करने आते थे। आश्चर्य की बात यह है कि बित्रा द्वीप पहले एक विरान और बंजर था। 1945 के आसपास यहाँ एक महिला अपने बेटे के साथ आई थी, जिसके बाद धीरे-धीरे यहाँ की आबादी बढ़ने लगी।
मिनिकॉय द्वीप पर नया ‘दोहरे उद्देश्य वाला’ एयरपोर्ट
भारत सरकार ने 18 जुलाई 2024 को लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप पर नया एयरपोर्ट बनाने की मंजूरी दी थी। यह एयरपोर्ट सेना (वायुसेना, नौसेना, कोस्ट गार्ड) और आम नागरिकों दोनों के लिए इस्तेमाल होगा।
मिनिकॉय द्वीप की लोकेशन बहुत खास है, क्योंकि यह मालदीव से सिर्फ 50 मील दूर है। इससे भारतीय सेना को अरब सागर और हिंद महासागर पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी। अभी लक्षद्वीप में सिर्फ अगत्ती द्वीप पर ही एयरपोर्ट है।
नया एयरपोर्ट बनने से टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी और नौकरियाँ मिलेंगी।
अहमदाबाद में 12 जून, 2025 को हुए एअर इंडिया विमान हादसे में विदेशी मीडिया अपनी प्लेबुक पूरी कर चुका है। बोइंग को क्लीन चिट और भारतीय पायलट सुमीत सभरवाल को दोषी ठहराए जाने की कहानी को मूर्त रूप दिया जा चुका है। भले ही इस मामले में अभी अंतिम जाँच रिपोर्ट ना आई हो, लेकिन अमेरिकी मीडिया संस्थानों के लिए इस हादसे के दोषी कैप्टन सभरवाल हैं।
बोइंग को अमेरिकी विमानन नियामक FAA ने भी शुरुआती तौर पर क्लीन चिट दी है और उसके विमान 787 ड्रीमलाइनर पर किसी जाँच या निर्देश जारी करने से इनकार किया है। हादसे की भारत में जाँच कर रही एजेंसी AAIB की अंतिम रिपोर्ट में अभी लम्बा समय लगने के कयास हैं। इस बीच सवाल उठे हैं कि क्या बोइंग को क्लीन चिट देने का प्रयास जल्दबाजी में इसलिए तो नहीं किया गया है कि उसकी पहले से जारी मुश्किलों में इजाफा ना हो और वह ड्रीमलाइनर की कोई गड़बड़ी उसके लिए और मुश्किलें ना खड़ी करे।
इस तर्क के पीछे कई कारण हैं। बोइंग की आर्थिक फ्रंट पर समस्याएँ, उसका वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर पर निर्भरता और एयरबस के मुकाबले में उसका पिछड़ता रिकॉर्ड इसी तरफ इशारा करते हैं। यह ट्रेंड स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि यदि 787 ड्रीमलाइनर शक के दायरे में आता है तो यह बोइंग के ताबूत में आखिरी कील होगी।
787 ही है इस समय बोइंग की लाइफलाइन
787 ड्रीमलाइनर मॉडल इस समय बोइंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। बोइंग वर्तमान में 737 मैक्स, 787 और 777X की बिक्री करती है। जहाँ 737 मैक्स पहले से समस्याओं से जूझता रहा है, तो वहीं 777X की असल उड़ान में अभी समय है। इसके 2026 से बाजार में आने की संभावना है।
787 अकेला बोइंग का ऐसा मॉडल है जो समस्याओं से नहीं घिरा है और जिसकी बाजार में माँग भी काफी अधिक है। एअर इंडिया हादसे में 787 ही शिकार बना है और अगर इसमें कोई तकनीकी दिक्कत सामने आई तो बोइंग के लिए अकेला कमाऊ मॉडल जमीन पर खड़ा हो जाएगा।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि जहाँ एक 737 मैक्स से बोइंग को 10-15 मिलियन डॉलर (लगभग ₹85-₹120 करोड़) तक का फायदा होता है तो वहीं एक 787 ड्रीमलाइनर की बिक्री पर बोइंग 30 मिलियन डॉलर (₹250 करोड़-₹500 करोड़) तक का मुनाफा कमाती है।
बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर मॉडल (फोटो साभार: Boeing)
787 ड्रीमलाइनर में तकनीकी खराबी निकलने पर बोइंग को इसका उत्पादन रोकना पड़ सकता है या फिर इनकी ग्राउंडिंग तक की नौबत आ सकती है। इससे बोइंग का घाटा कई गुना बढ़ जाएगा और साथ ही उससे विमान खरीदने वाली एयरलाइंस का विश्वास भी घटेगा।
बोइंग के पास वर्तमान में लगभग 950 ड्रीमलाइनर डिलीवर करने के ऑर्डर हैं। एअर इंडिया हादसे में जो बोइंग 787 दुर्घटना ग्रस्त हुआ था, उसके फ्यूल कंट्रोल स्विच के मूवमेंट में समस्या बताई गई थी। इसका दोष पायलट सुमीत सभरवाल पर भले ही डाला गया हो, लेकिन अंतिम जाँच रिपोर्ट आना बाकी है।
यदि अंतिम जाँच रिपोर्ट में कहीं भी यह बात सामने आती है कि 787 ड्रीमलाइनर में तकनीकी खामियाँ हैं और उसके फ्यूल कंट्रोल स्विच या फिर अन्य किसी पुर्जे में खराबी है तो बोइंग को डिलीवरी रोकने के साथ उत्पादन तक रोकना पड़ सकता है जो बोइंग के लिए घातक सिद्ध होगा।
पहले से समस्याओं से घिरा है 787
ऐसा नहीं है कि बोइंग को 787 ड्रीमलाइनर को लेकर अब तक कोई समस्याएँ नहीं झेलनी पड़ रही हैं। इसके ऑर्डर की संख्या भले बड़ी हो लेकिन इसका उत्पादन बीते कुछ समय में धीमा रहा है क्योंकि कोविड की वजह से सप्लाई चेन में समस्याएँ आती रही हैं।
दूसरी तरफ से 787 को एयरबस का A350 कड़ी टक्कर दे रहा है। अभी तक बिक्री के मामले में भले ही 787 की संख्या A350 से अधिक रही हो लेकिन बीते 5 वर्षों में यह लगातार पिछड़ रहा है। 2020-25 के बीच जहाँ बोइंग ने लगभग 250 ड्रीमलाइनर बेचे हैं तो वहीं इस दौरान एयरबस 300 से अधिक A350 अपने ग्राहकों को देने में सफल रही है।
एअरबस A350 (फोटो साभार: Airbus)
ऐसे में बोइंग पर दबाव बढ़ ही रहा है। 787 की छवि बिगड़ना इसकी बिक्री को गर्त में पहुँचाने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह काम करेगा और बोइंग को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है और साथ ही उसके हाथ से भविष्य के ऑर्डर भी छूट सकते हैं।
पाँच बरस से घाटा झेल रही है बोइंग
बोइंग ने अपना लेटेस्ट विमान मॉडल 737 मैक्स 2017 में एयरलाइंस को देना चालू किया था। बोइंग ने यह विमान पुराने 737 के डिजाइन पर बनाया था और इसे एयरबस के A320 नियो श्रेणी विमानों से प्रतिस्पर्धा के लिए डिजाइन किया गया था। बोइंग का वादा था कि यह विमान पुराने के मुकाबले कम तेल खपत करेगा और इसमें उससे सुविधाएं भी अधिक होंगी।
बोइंग को इस विमान के हजारों ऑर्डर मिले थे। लेकिन 2018 और 2019 में दो नए नवेले बोइंग 737 मैक्स हादसे का शिकार हुए। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के साथ हुए। इन हादसों में लगभग 350 लोग मारे गए।
बोइंग ने पहले इन हादसों में पायलटों को दोषी बताने का प्रयास किया लेकिन जाँच में पता चला कि उसने इनमें एक नया MCAS नाम का सॉफ्टवेयर लगाया था, जिसके चलते यह हादसे हुए। इस सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी के चलते विमान नीचे की तरफ गोता लगाता रहा और हादसे का शिकार हुआ।
बोइंग ने पायलटों को भी इस विषय में नहीं बताया था, इसलिए उसकी चोरी और संगीन हो गई। इन हादसों के चलते बोइंग को 737 मैक्स का 2019 में उत्पादन रोकना पड़ा। इसके अलावा जितने बोइंग 737 मैक्स डिलीवर हो चुके थे, उन्हें भी उड़ाने पर रोक लग गई।
कंपनी को दोबारा इस विमान के लिए प्रमाणन लेने पड़े और मुकदमे झेलने पड़े और उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। इसके चलते उसके नए ऑर्डर भी रुके और पुराने ऑर्डर्स पर भी असर पड़ा। बोइंग 2019 में ही नुकसान में चली गई। 2019 के बाद से एक डॉलर का मुनाफा कमाने में असफल रही है।
737 मैक्स पर हुए बवाल के अलावा बोइंग को कोविड महामारी और फिर सप्लाई चेन में समस्या के चलते उत्पादन पर असर के कारण भी मोटा नुकसान हुआ है जिससे वह अभी तक उबर नहीं पाई है। उसका उत्पादन भी वापस पटरी पर नहीं आ रहा।
2019 से 2024 के बीच बोइंग लगभग 36 बिलियन डॉलर (₹3.09 लाख करोड़) का घाटा झेल चुकी है। उसे सबसे तगड़ा घाटा 2020 और 2024 में उठाना पड़ा है। इन दोनों वर्ष में उसने लगभग 12 बिलियन डॉलर (₹1 लाख करोड़) का घाटा उठाया है। यह सिलसिला 2025 में जारी है।
अगर 787 को लेकर कोई बुरी खबर आती है तो बोइंग को और भी नुकसान झेलना पड़ेगा और उसका बचा खुचा राजस्व का रास्ता बंद होगा। ऐसे में उस पर दबाव और बढ़ जाएगा।
कर्ज के पहाड़ में भी दबी है बोइंग
बोइंग सिर्फ घाटे का ही पर्याय नहीं बनी है बल्कि उस पर लगातार कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। बोइंग का यह कर्ज भी 2019 के बाद से लगातार बढ़ता गया है और बोइंग इसे चुकाने में भी असफल होती नजर आती है। बोइंग पर वर्तमान में 50 बिलियन डॉलर (₹4.25 लाख करोड़) से अधिक का कर्ज है।
बोइंग लगातार अपनी सप्लाई चेन सुधार और नए ऑर्डर्स के जरिए इस कर्ज को कम करने का प्रयास कर रही है लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है। यह 2019 के बाद एक दो बार कम हुआ है लेकिन 2023 के बाद यह दोबारा बढ़ गया था 50 बिलियन डॉलर के पार पहुँच गया।
एयरबस से पहले ही खा चुकी पटखनी
बोइंग की मुश्किलें कोई आज की नहीं हैं। वह बीते लगभग 15 वर्षों से प्रतिस्पर्धी एयरबस से दबाव झेल रही है। एयरबस एक के बाद एक उसका बाजार निगलती जा रही है। यूरोप से निकली एयरबस ने पहले A320 विमानों के जरिए बोइंग से नैरो बॉडी एयरक्राफ्ट्स का बाजार हथियाया।
इसके बाद एयरबस ने A380 और A330 के जरिए बोइंग से वाइड बॉडी यानी बड़े एयरक्राफ्ट्स का बाजार भी हथिया लिया। एयरबस बीते कुछ वर्षों से बोइंग के 787 ड्रीमलाइनर को पछाड़ने के प्रयास में है। इसके लिए उसने A350 विकसित किया है जो बोइंग के मुकाबले कहीं अधिक यात्री ले जा सकता है।
बोइंग के एयरबस के मुकाबले पिछड़ने का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2010 तक लगभग दोनों ही कंपनियां 700-800 विमान की डिलीवरी प्रति वर्ष कर रहीं थी लेकिन 2010 के बाद यह खेल पलट गया और एयरबस ने बोइंग को पीछे छोड़ दिया।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2010 के बाद से बोइंग जहां लगभग 9600 एयरक्राफ्ट बेच पाई है, तो वहीं एयरबस इसी दौरान 10,700 से अधिक एयरक्राफ्ट अलग अलग एयरलाइंस को बेच चुकी है। एयरबस ने सबसे बड़ी बढ़त उसी दौर में हासिल की है जब बोइंग के साथ 737 मैक्स वाली समस्याएं चल रही थीं।
बोइंग सिर्फ इसी मामले में नहीं पिछड़ी है। वह एयरबस से ऑर्डर्स के मामले में भी दबाव महसूस कर रही है। बोइंग को 2015 से 2024 के बीच लगभग 5000 विमानों के ऑर्डर मिले हैं जबकि इसी दौरान एयरबस को 8900 से अधिक एयरक्राफ्ट के ऑर्डर मिले हैं। ऐसे में वह बोइंग से लगभग दोगुना व्यापार कर रही है।
787 में गड़बड़ी से ठप हो जाएगी कंपनी
कर्ज, घाटा, 737 मैक्स प्रोग्राम के साथ समस्या और 777X प्रोग्राम में देरी के साथ ही यह स्पष्ट है कि बोइंग वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर पर ही निर्भर है। उसके राजस्व का बड़ा हिस्सा वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर से ही आता है। इसके अलावा वह एयरबस से लगातार मात खा रही है।
इन सब कारणों के चलते साफ़ हो जाता है कि एअर इंडिया हादसे में पायलट सुमीत सभरवाल को दोषी बताने का सिलसिला पहले दिन से क्यों चालू किया गया है। इसके लिए पटकथा हादसे के दिन से ही लिखी जा चुकी थी। 787 को साफ़ तौर बचाया जाए और बोइंग का धंधा चलता रहे, इसके लिए लगातार विदेशी मीडिया में पायलट पर खबरें चलती रहीं, इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।