Saturday, March 7, 2026
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अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होते ही ब्रिटेन ने चुपचाप 4000+ अफगानों को अपने यहाँ बसाया, खर्च किए ₹4600 करोड़: खबर दबाने को कोर्ट से ऑर्डर भी लिया

ब्रिटेन ने जिन लोगों को अफगानिस्तान से लाकर अपने यहाँ बसाया है, उनमें अफगान फ़ौज के पूर्व फौजी और उनके परिवार के साथ ही बाकी लोग शामिल हैं। अब तक यह मामला इसलिए नहीं मीडिया में आया था क्योंकि इस पर एक अदालत से रोक लगा दी गई थी। इस पर रिपोर्टिंग रोक दी गई थी।

ब्रिटेन की सरकार चुपचाप 4500 अफगान अपने यहाँ लाकर बसा चुकी है। यह रीलोकेशन प्रक्रिया 2022 के बाद से लगातार चलती आ रही है। इस पर ब्रिटेन हजारों करोड़ रूपए खर्च कर चुका है। यह पूरा खुलासा अब ब्रिटेन के हाई कोर्ट के एक फैसले से हुआ है। अब तक मीडिया को भी इस मामले को रिपोर्ट करने से रोका गया था। ब्रिटेन सरकार को यह फैसला एक डाटा लीक के चलते लेना पड़ा है। अब ब्रिटेन की सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।

क्या है मामला?

ब्रिटेन ने जिन लोगों को अफगानिस्तान से लाकर अपने यहाँ बसाया है, उनमें अफगान फ़ौज के पूर्व फौजी और उनके परिवार के साथ ही बाकी लोग शामिल हैं। अब तक यह मामला इसलिए नहीं मीडिया में आया था क्योंकि इस पर एक अदालत से रोक लगा दी गई थी। इस पर रिपोर्टिंग रोक दी गई थी।

जानकारी के अनुसार, फरवरी 2022 में यूके रक्षा मंत्रालय (MoD) के एक अधिकारी ने गलती से एक लिस्ट लीक कर दी थी, इसमें तालिबान के डर से यूके में शरण माँगने वाले करीब 19,000 अफ़गानों के नाम और व्यक्तिगत जानकारियाँ थीं।

यह लीक अगस्त 2023 में सामने आया था, जब यह जानकारियाँ फेसबुक पर वायरल हो गईं थी। इसके चलते हजारों अफगानों की जान सांसत में आ गई थी। इसके बाद, अप्रैल 2024 से ब्रिटेन सरकार ने चुपचाप अफगानों को ब्रिटेन लाना चालू कर दिया। इस प्रक्रिया पर अब तक 400 मिलियन पाउंड (₹46 अरब से अधिक) से खर्च हो चुका है।

यह भी आशंका जताई गई है कि इस पर ब्रिटिश नागरिकों के टैक्स का इतना ही पैसा अभी और खर्च होगा। सामने आया है कि अभी 600 पूर्व अफगान फौजी और उनके 1800 परिजन अफगानिस्तान में हैं और वापस निकाले जाने की राह देख रहे हैं।

इस मामले के खुलासे के बाद ब्रिटेन में पारदर्शिता और टैक्सपेयर के पैसे के उपयोग को लेकर प्रश्न उठे हैं। इस मामले की रिपोर्टिंग पर लगी रोक को हटाने के लिए हाल ही में इंडिपेंडेंट, द टाइम्स, टेलीग्राफ, फाइनेंशियल टाइम्स, प्रेस एसोसिएशन आदि ने कोर्ट में चुनौती दी थी।

डेटा लीक और अफगानों के गुप्त स्थानांतरण का खुलासा

करीब दो साल तक ब्रिटिश जनता को 2022 के डेटा लीक और उसके बाद हुए अफगानों के गुप्त स्थानांतरण के बारे में कुछ नहीं बताया गया, क्योंकि कंज़र्वेटिव सरकार ने 2023 में एक सुपर-इंजंक्शन (गोपनीयता बरतने वाला आदेश) कोर्ट से हासिल कर लिया था।

यह आदेश न केवल लीक की रिपोर्टिंग पर, बल्कि खुद आदेश के अस्तित्व की जानकारी पर भी रोक लगाता था। हाल ही में, जस्टिस चेम्बरलेन ने इस आदेश को हटा दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की गोपनीयता ने ‘लोकतांत्रिक जवाबदेही को पूरी तरह से बंद कर दिया’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर असर’ भी डाला।

यह इस मामले में चेम्बरलेन का यह चौथा फैसला था। इससे पहले 3 फैसले निजी रूप से दिए गए थे, जो अब प्रकाशित किए जा चुके हैं। अदालती दस्तावेजों से पता चला कि तत्कालीन रक्षा मंत्री बेन वालेस ने खुद इस गुप्त आदेश के लिए आवेदन किया था।

रक्षा मंत्रालय ने बाद में कहा कि तालिबान को शायद पहले से ही डेटा लीक की जानकारी थी, इसलिए रिपोर्टिंग से खतरा ज्यादा नहीं बढ़ता।

सरकार ने माफी माँगी, लेकिन रिलोकेशन पर चुप्पी साधी

ब्रिटिश संसद में रक्षा मंत्री जॉन हीली ने 2022 के अफगान डेटा लीक से प्रभावित लोगों से ‘माफी’ भी माँगी है। उन्होंने इसे एक ‘गंभीर विभागीय गलती’ बताया, जो एक स्प्रेडशीट को सरकारी सिस्टम के बाहर ईमेल करने से हुई थी।

मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इस मामले में कोई आपराधिक जाँच नहीं की है। कंजर्वेटिव नेता केमी बेडेनोच ने भी इस मामले में माफी माँगी और कहा कि ‘किसी ने बहुत बड़ी गलती की है।’ हालाँकि, सरकार ने यह नहीं बताया कि यह लीक करने के जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं।

इस लीक से प्रभावित अफगानों को सूचित किया गया है और उन्हें ऑनलाइन सतर्क रहने और अनजान संपर्कों से बचने की सलाह दी गई है। रक्षा मंत्रालय ने यह बताने से इनकार कर दिया कि इस लीक से किसी को सही में नुकसान हुआ है या नहीं।

अफगान डेटा लीक से ब्रिटेन पर उठ रहे सवाल

अफगानिस्तान में 20 साल की तैनाती के दौरान ब्रिटिश सेनाएँ अमेरिकी और नाटो सेनाओं के साथ मिलकर काम करती रहीं और उन्होंने स्थानीय अफगान सहयोगियों पर काफी भरोसा किया। 2022 का डेटा लीक न केवल इन सहयोगियों की जान को खतरे में डालता है, बल्कि इससे ब्रिटेन की अपने सहयोगियों की सुरक्षा और वादे निभाने की क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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