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अडानी पॉवर के ₹3700 करोड़ बांग्लादेश की यूनुस सरकार ने लौटाए, बाक़ी पैसा भी जल्द चुकाने को कहा: पहले मंत्री बोला था- ऐसे ही चला लेंगे काम

बांग्लादेश ने अडानी पावर को 437 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 3744 करोड़ रुपए का बकाया चुका दिया है। ये भुगतान 2017 के समझौते के तहत झारखंड के गोड्डा प्लांट से बिजली आपूर्ति के लिए किया गया है। द्विपक्षीय बिजली आपूर्ति समझौते के तहत किया गया ये सबसे बड़ा भुगतान है।

सूत्रों के मुताबिक भुगतान में बकाया बिल, वहन लागत और 2017 में बांग्लादेश और भारतीय समूह के बीच बिजली खरीद समझौते (पीपीए) से जुड़ी धनराशि भी शामिल हैं।

झारखंड में अडानी के 1,600 मेगावाट के गोड्डा बिजली संयंत्र से बिजली आपूर्ति में महीनों से अनियमितता रही है। भुगतान में देरी के कारण पिछले साल आपूर्ति कम हो गई थी। इस बीच रूस-यूक्रेन जंग और बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से बांग्लादेश की वित्तीय स्थिति बिगड़ गई।

जानकारों के मुताबिक बांग्लादेश ने पिछले कुछ महीनों में अपने भुगतान को नियमित कर दिया है। ये भुगतान हर महीने 90-100 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रहा है। बांग्लादेश ने वर्तमान भुगतान के अलावा दो महीने के बिलिंग के लिए लेटर्स ऑफ क्रेडिट (एलसी) लागू किया है और सभी बकाया राशि के लिए विस्तारित संप्रभु गारंटी दी है, जिससे अडानी पावर को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी।

बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री मुहम्मद फ़ौजुल कबीर खान ने पिछले साल रॉयटर्स से कहा था कि बांग्लादेश अडानी की बिजली आपूर्ति के बिना भी चल सकता है। इस दौरान उन्होने घरेलू उत्पादन क्षमता में वृद्धि का हवाला दिया था। साथ ही माना भी था कि सभी घरेलू इकाइयाँ काम नहीं कर रही हैं।

मंत्री के दावे के बावजूद बांग्लादेश को अडानी पावर के बिजली की जरूरत पड़ी। कंपनी को बड़ा भुगतान करने के बाद बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने कंपनी से शेड्यूल के अनुसार गोड्डा प्लांट की दोनों इकाइयों से पूरी बिजली आपूर्ति फिर से शुरू करने का अनुरोध किया है। यह प्लांट बांग्लादेश की बिजली की माँग का लगभग 10% पूरा करता है।

BPDB के डेटा से पता चलता है कि अडानी पावर की बिजली दूसरी कंपनियों से आपूर्ति की जाने वाली बिजली से थोड़ी सस्ती पड़ती है। आर्थिक विश्लेषकों का सुझाव है कि इन घटनाक्रमों से अडानी पावर की क्रेडिट रेटिंग में सुधार हो सकता है। कंपनी को उम्मीद है कि उसकी रेटिंग AA से AA+ तक अपग्रेड हो जाएगी। इससे कंपनी को कर्ज लेने में कम व्याज चुकाना पड़ेगा।

2017 का बिजली समझौता अक्सर राजनीतिक बहस का विषय रहा है। बांग्लादेश में तत्कालीन शेख हसीना सरकार के विरोधियों ने मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता और आयातित कोयला-आधारित बिजली पर निर्भरता का विरोध किया था। लेकिन अब इसके आगे चलते रहने के आसार हैं। समझौते के समर्थकों का कहना है कि गोड्डा संयंत्र ने बांग्लादेश को विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी मूल्य पर बिजली प्रदान की है, जिससे देश में बिजली की कमी को दूर करने में मदद मिली है।

हाल ही में हुआ वित्तीय समझौता बांग्लादेश के अपने ऊर्जा क्षेत्र को स्थिर करने और अपने समझौते को पूरा करने की वचनबद्धता को दर्शाता है। भुगतान वापस पटरी पर आने और आपूर्ति पूरी तरह से बहाल होने के साथ दोनों पक्ष भविष्य को लेकर भी आशावादी हैं।

मुस्लिम आरोपित का नाम ‘गोल’ और जगन्नाथ मंदिर पर ‘गोलमाल’: राजदीप सरदेसाई की ‘पक्षपाती’ पत्रकारिता… पहलगाम रेप मामले में ‘जुबैर अहमद’ का नाम लेने से किया किनारा

यह बात अब साफ हो चुकी है कि पत्रकार राजदीप सरदेसाई अपनी पत्रकारिता में दोहरा मापदंड अपनाते हैं। हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनसे उनकी पत्रकारिता की निष्पक्षता पानी की तरह दिखाई देती है।

मुस्लिम आरोपितों के नाम लेने में संकोच

हाल ही में, पहलगाम में एक 70 वर्षीय विधवा महिला के साथ हुए बलात्कार मामले में राजदीप सरदेसाई ने जानबूझकर आरोपित का नाम नहीं लिया। पीड़ित के साथ ‘जुबैर अहमद’ नाम के व्यक्ति ने रेप किया था।

राजदीप सरदेसाई ने इस घटना पर ट्वीट किया और कोर्ट के जमानत रद्द करने के फैसले का जिक्र भी किया, लेकिन आरोपित ‘जुबैर अहमद’ का नाम छोड़ दिया।

जब नेटिज़न्स ने उनसे सवाल किया, तो राजदीप सरदेसाई ने अपनी गलती मानने के बजाय, दूसरे मामलों का हवाला देना शुरू कर दिया। राजदीप सरदेसाई ने कहा कि कोलकाता के एक मामले में आरोपित का नाम ‘मोनोजित मिश्रा‘ था और तमिलनाडु के दहेज उत्पीड़न मामले में आरोपित पति कविन कुमार, ससुर ईश्वरामुर्थी और सास चित्रादेवी थे।

आरोपित का नाम जानबूझकर छुपाया गया था, यह बात साफ दिखती है। राजदीप सरदेसाई ने यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन यह बात संस्कृति और धर्म से जुड़े पहलुओं को नज़रअंदाज़ करती है।

जगन्नाथ मंदिर की ‘तुलना’ का विवाद

राजदीप सरदेसाई ने 27 जून 2025 को भी एक और विवाद खड़ा कर दिया था, जब उन्होंने ओडिशा के 900 साल पुराने पुरी जगन्नाथ धाम की तुलना पश्चिम बंगाल के दीघा में बने एक नए जगन्नाथ मंदिर से की। राजदीप सरदेसाई ने X (पहले ट्वीटर) पर लिखा, “जगन्नाथ यात्रा के अब 2 स्थान हैं- मूल ओडिशा के पुरी में, एक नया पश्चिम बंगाल के दीघा में।”

यह तुलना जानबूझकर की गई गलती है ताकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के लिए ‘एजेंडा सेट’ किया जा सके। ये तुलना इसलिए भी की गई होगी, क्योंकि राजदीप सरदेसाई की पत्नी सागरिका घोष TMC की राज्यसभा सांसद हैं।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर 12वीं सदी में बना एक ऐतिहासिक मंदिर है, जबकि दीघा का मंदिर अभी दो महीने पहले ही बनाया गया है। पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने भी स्पष्ट किया है कि दीघा मंदिर का भगवान जगन्नाथ की भक्ति से कोई लेना-देना नहीं है।

यह घटनाएँ राजदीप सरदेसाई की पत्रकारिता में एक पक्षपाती पैटर्न को दर्शाती हैं, जहाँ वे कुछ मामलों में जानकारी छिपाते हैं और दूसरों में जानबूझकर तुलना करके राजनीतिक एजेंडा साधने की कोशिश करते हैं।

साँस न आने पर पीड़िता को दिया इनहेलर ताकि फिर रेप कर सके, कोलकाता गैंगरेप के आरोपित TMC नेता मोनोजीत के शरीर पर मिले ताजा घाव, खरोच: मेडिकल रिपोर्ट में हुआ खुलासा, बंगाल के नेता मानस भुइयां के लिए ये ‘छोटी सी घटना’

कोलकाता लॉ कॉलेज में छात्रा से हुए गैंगरेप मामले में मुख्य आरोपित टीएमसी नेता मोनोजीत मिश्रा के खिलाफ अहम सुराग मिले हैं। मोनोजीत मिश्रा के शरीर पर ताजा खरोंच और नाखून के निशान पाए गए हैं। शुरुआती मेडिकल जाँच में इसका खुलासा हुआ है। माना जा रहा है कि गैंगरेप का पुरजोर विरोध कर रही छात्रा ने उसे खरोंचा था।

पुलिस के मुताबिक, ” मोनोजीत के शरीर पर ताजा खरोंच के निशान मिले हैं। ऐसा तब होता है जब कोई अपने ऊपर हुए हमले का विरोध करता है। ” इस बीच मोनोजीत मिश्रा के कॉल डिटेल को एसआईटी ने खंगाला है जिसमें पता चला है कि घटना के अगले दिन सुबह उसने कॉलेज की वाइस प्रिंसिपल डॉक्टर नयना चटर्जी से फोन पर बात की थी। पुलिस डॉक्टर चटर्जी से दो बार पूछताछ कर चुकी है।

पुलिस अधिकारी के मुताबिक, “ये जानना बेहद जरूरी है कि दोनों के बीच वारदात के अगले दिन किस संदर्भ में बातचीत हुई।”

इस बीच ये बात भी सामने आई है कि एक आरोपित जैब अहमद ने पीड़िता के लिए मेडिकल स्टोर से इनहेलर खरीदने गया था। मेडिकल स्टोर पर लगे सीसीटीवी फुटेज में ये खुलासा हुआ है।

दरअसल पीड़िता को जब गेट से खींच कर कॉलेज परिसर में ले जाया जा रहा था तो उसे पैनिक अटैक आया। उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी। उस वक्त उसे आरोपितों ने इनहेलर दिया।

मंगलवार 1 जुलाई 2025 को कोलकाता में कोर्ट की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि छात्रा को इनहेलर इसलिए नहीं दिया गया कि वह ठीक हो जाए बल्कि इसलिए दिया गया कि ठीक होने के बाद उसके साथ गैंगरेप किया जा सके।

इस बीच छात्रा के साथ गैंगरेप पर पश्चिम बंगाल के मंत्री और टीएमसी नेता मानस भुइयां का बयान सामने आया है। उन्होने गैंगरेप की वारदात को “छोटी घटना” बताया है।

इससे पहले टीएमसी नेता मदन मित्रा और कल्याण बनर्जी ने 25 जून को छात्रा के साथ हुए गैंगरेप को ‘छोटी घटना’ बताया था। बीजेपी ने बंगाल के मंत्री और टीएमसी नेताओं के बयान की कड़ी आलोचना की है साथ ही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली बंगाल सरकार को “बलात्कारियों का रक्षक” बताया है।

बीजेपी पश्चिम बंगाल के सह-प्रभारी अमित मालवीय ने मंगलवार (1 जून 2025) को राज्य के सिंचाई मंत्री मानस भुनिया के कथित बयान का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है., “जबकि पूरा देश 24 वर्षीय कानून की उम्मीदवार के साथ हुई अकल्पनीय क्रूरता से स्तब्ध है, टीएमसी नेता अपनी राजनीतिक बॉस ममता बनर्जी से प्रशंसा पाने के लिए बलात्कार को सामान्य बनाने में व्यस्त हैं।”

कोलकाता लॉ कॉलेज की 24 वर्षीय प्रथम ईयर की छात्रा के साथ 25 जून को लॉ कॉलेज परिसर में तीन लोगों ने गैंगरेप किया था। इनमें 31 वर्षीय पूर्व छात्र मोनोजीत मिश्रा, 19 वर्षीय जैब अहमद और 20 वर्षीय प्रमित मुखोपाध्याय शामिल है। इनके अलावा कॉलेज के एक सुरक्षा गार्ड को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया है।

ट्रंप के ‘मच लैस टैरिफ’ से खुलेगी व्यापार की नई राहें, समझौते पर टिकी है दोनों देशों की उम्मीदें: डेयरी-कृषि उत्पादों के बाजार में घुसने की कोशिश में अमेरिका, भारत को भी अमेरिकी बाजारों से आस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि भारत के साथ उनका एक व्यापार समझौता हो सकता है, जिसमें चीजें खरीदने-बेचने पर बहुत कम टैक्स लगेगा। इसे ‘मच लैस टैरिफ’ का नाम दिया गया है।

ट्रंप ने मंगलवार (1 जुलाई 2025) को बताया कि दोनों देशों के बीच बातचीत में कुछ रुकावटें आ रही हैं, फिर भी उन्हें उम्मीद है कि वे एक समझौता कर लेंगे। यह बात ट्रंप ने 9 जुलाई 2025 को अमेरिकी टैक्स (जिसे ‘लिबरेशन डे’ टैरिफ कहते हैं) की 90 दिन की रोक खत्म होने से ठीक पहले कही है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि उन्हें लगता है कि भारत के साथ एक व्यापार समझौता हो जाएगा। यह समझौता ‘अलग तरह’ का होगा, जिससे अमेरिका भारत के बाजार में ‘आसानी से चीजें बेच पाएगा।’

ट्रंप ने कहा, “अभी भारत अपने व्यापार में किसी को आसानी से अंदर नहीं आने देता।” उन्हें लगता है कि भारत इसमें बदलाव करेगा, और अगर ऐसा हुआ, तो सामानों पर बहुत कम टैक्स (टैरिफ) लगेगा।

कहाँ फँस रही है बात?

भारत और अमेरिका के अधिकारी एक व्यापार समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर 9 जुलाई 2025 तक यह समझौता नहीं होता, तो अमेरिका भारत से आने वाले सामानों पर 26% टैक्स लगाने की योजना बना रहा है। इसमें पहले से लगा 10% टैक्स भी शामिल है।

बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट यह है कि भारत अपने डेयरी उत्पादों (दूध, दही आदि) का बाजार विदेशी कंपनियों के लिए नहीं खोलना चाहता। अमेरिका चाहता है कि भारत डेयरी और खेती से जुड़े सामानों जैसे सेब, सूखे मेवे और जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर कम टैक्स लगाए।

भारत की माँग

वहीं, भारत चाहता है कि अमेरिका उसके कपड़े, गहने, चमड़े के सामान और खेती से जुड़े उत्पादों जैसे झींगा, तिलहन, अंगूर और केले के लिए अपना बाजार खोले।

व्यापार के जानकार कहते हैं कि शायद दोनों देश कुछ खास सामानों और सेवाओं पर ही समझौता करें। जैसे- भारत से आने वाले कपड़े, चमड़े और गहने जैसे सामानों पर क्योंकि इन्हें बनाने में बहुत से मजदूर लगते हैं। बाकी चीजों को शायद अभी समझौते से बाहर रखा जाए।

आगे क्या होगा?

अभी यह साफ नहीं है कि बातचीत कैसे आगे बढ़ेगी। दोनों देश अपने-अपने फायदे देखना चाहते हैं। भारत के लिए डेयरी और खेती का मामला बहुत संवेदनशील है, जबकि अमेरिका इन क्षेत्रों में पूरी तरह से पहुँच चाहता है।

हालाँकि, अभी भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर कोई असर नहीं पड़ा है, सिर्फ स्टील और एल्यूमीनियम जैसे कुछ सामानों पर पहले से ही ज्यादा टैक्स लगता है।

बिहार में घर-घर जाकर चुनाव आयोग कर रहा मतदाताओं का सत्यापन, तेजस्वी-ओवैसी-सागरिका से लेकर रवीश कुमार तक की फूल रही साँस: जानिए उस प्रक्रिया की ABCD, जिसे विपक्ष बता रहा NRC

बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले भारत का चुनाव आयोग (ECI) वोटर लिस्ट को ठीक करने का एक बड़ा काम कर रहा है। इसे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कहते हैं। इस काम में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) यानी वो लोग जो हर गाँव और मोहल्ले में वोटिंग का काम देखते हैं, घर-घर जाकर ये जाँच रहे हैं कि वोटर लिस्ट में कौन-कौन का नाम सही है। मतलब जिन लोगों को वोट डालने का हक है, उनका नाम लिस्ट में रहे और जिनका नहीं होना चाहिए, जैसे कि जिनकी मृत्यु हो गई है या जो कहीं और चले गए हैं, उनका नाम हट जाए।

चुनाव आयोग का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है ताकि वोटिंग में कोई गड़बड़ न हो। बिहार में अभी 7.89 करोड़ लोग वोटर हैं और इस जाँच से ये सुनिश्चित होगा कि सिर्फ़ सही लोग ही वोट डालें। इसके लिए 1.5 लाख से ज़्यादा बूथ लेवल एजेंट (BLA) लगाए गए हैं, जो सभी पार्टियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

हालाँकि विपक्षी पार्टियाँ जैसे राष्ट्रीय जनता दल (RJD), AIMIM, तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ और तेजस्वी यादव, असदुद्दीन ओवैसी, सागरिका घोष जैसे नेता इस काम को NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि ये सब बीजेपी और NDA की साजिश है, ताकि गरीब, दलित, पिछड़े और मुस्लिम लोगों को वोटर लिस्ट से हटाया जा सके। आइए इस पूरे मामले को समझते हैं कि ये काम क्या है, कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है और विपक्ष क्यों चिल्ला रहा है।

कैसे हो रहा है ये काम?

चुनाव आयोग ने 25 जून 2025 से ये जाँच शुरू की है, जो 26 जुलाई तक चलेगी। इसके बाद 30 सितंबर को नई और सही वोटर लिस्ट छपेगी। इस काम में बूथ लेवल अधिकारी (BLO) हर घर में जा रहे हैं। उनके पास एक फॉर्म होता है, जो आधा भरा होता है। वो उस फॉर्म को लोगों को देते हैं और उनसे कुछ जानकारी माँगते हैं, जैसे कि नाम, पता और कुछ कागजात। ये कागजात इसलिए चाहिए ताकि ये पक्का हो सके कि वो व्यक्ति वोट डालने का हकदार है।

अगर आपका नाम 2003 की वोटर लिस्ट में है (जब बिहार में आखिरी बार ऐसा बड़ा काम हुआ था), तो आपको बस अपनी जानकारी की पुष्टि करनी है। अगर आपके मम्मी-पापा का नाम उस लिस्ट में है, तो आपको कोई अतिरिक्त कागज देने की जरूरत नहीं। लेकिन अगर आपका या आपके मम्मी-पापा का नाम उस पुरानी लिस्ट में नहीं है, तो आपको कुछ कागज, जैसे जन्म प्रमाणपत्र या दूसरा कोई दस्तावेज़ देना पड़ सकता है।

फोटो साभार : X_ECI

BLO ये सारी जानकारी को एक मोबाइल ऐप (ECIनेट) में अपलोड करते हैं। साथ ही आपको एक रसीद भी देते हैं कि आपने फॉर्म भरा है। आयोग ने ये भी कहा है कि इस काम में बुजुर्गों, बीमार लोगों या दिव्यांग लोगों को परेशान नहीं करना है। बिहार में 2003 की वोटर लिस्ट में 4.96 करोड़ लोगों के नाम थे और आयोग का कहना है कि इन लोगों और इनके बच्चों को कोई खास कागज देने की जरूरत नहीं। यानी करीब 60% लोगों को आसानी होगी।

क्यों हो रहा है ये काम?

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट को समय-समय पर ठीक करना जरूरी है, क्योंकि बहुत कुछ बदल जाता है। जैसे-

शहरीकरण: बिहार में लोग अब गाँवों से शहरों की तरफ जा रहे हैं।
पलायन: बहुत से लोग नौकरी या दूसरी वजहों से बिहार से बाहर चले गए हैं।
नए वोटर: 18 साल के हो रहे युवाओं के नाम लिस्ट में जोड़ने हैं।
मृत्यु: कुछ लोग जिनकी मौत हो गई, लेकिन उनका नाम लिस्ट में अब भी है।
अवैध लोग: कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं, जो भारत के नागरिक नहीं हैं लेकिन लिस्ट में नाम डलवाए हैं।

आयोग का कहना है कि ये सब ठीक करने से वोटर लिस्ट साफ-सुथरी होगी। भारत के संविधान में अनुच्छेद 326 कहता है कि सिर्फ़ भारतीय नागरिक, जो 18 साल से बड़े हों और उस इलाके में रहते हों, वोटर बन सकते हैं। इसके लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 के नियमों का पालन हो रहा है। आयोग का मकसद है कि कोई भी सही वोटर छूटे नहीं और कोई गलत व्यक्ति लिस्ट में न रहे।

विपक्ष क्यों कर रहा है हंगामा?

विपक्षी पार्टियाँ और कुछ लोग इस काम को लेकर बहुत शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि ये जाँच सिर्फ़ एक बहाना है और इसके जरिए बीजेपी गरीब, दलित, पिछड़े और मुस्लिम लोगों को वोटर लिस्ट से हटाना चाहती है।

तेजस्वी यादव (RJD): बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और RJD नेता तेजस्वी यादव ने इसे “संदिग्ध और चिंताजनक” बताया। उनका कहना है कि बीजेपी और RSS इस जाँच के बहाने बिहार के गरीब लोगों का वोटिंग का हक छीनना चाहते हैं। उन्होंने ट्वीट किया कि आयोग ने अचानक सारी वोटर लिस्ट को रद्द करने का फैसला क्यों लिया? साथ ही, उन्होंने ये भी सवाल उठाया कि आधार कार्ड को इस जाँच में क्यों नहीं लिया जा रहा, जबकि वोटर लिस्ट को आधार से जोड़ने की बात हो रही थी।

असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM): AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘बिहार में चुपके से NRC लागू करना’ बताया। उनका कहना है कि इस जाँच से गरीब लोगों को लिस्ट से हटाया जाएगा, क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाणपत्र जैसे कागज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 2000 में सिर्फ़ 3.5% लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र था। ओवैसी ने आयोग को चिट्ठी लिखकर इस पर आपत्ति जताई है।

सागरिका घोष (TMC): तृणमूल कॉन्ग्रेस की सागरिका घोष ने कहा कि ये जाँच बहुत सख्त है, क्योंकि इसमें मम्मी-पापा के जन्म प्रमाणपत्र माँगे जा रहे हैं। उनका कहना है कि आम लोग, खासकर गरीब, इतने पुराने कागज कहाँ से लाएँगे? TMC का बिहार में कोई खास आधार नहीं है, फिर भी वो इस मुद्दे पर बोल रही है।

मनोज झा: RJD सांसद मनोज झा ने पूछा कि क्या एक महीने में 8 करोड़ लोगों की जाँच हो सकती है? उन्होंने कहा कि इससे गरीब और कमजोर लोग वोटिंग से वंचित हो सकते हैं।

पत्रकार रवीश कुमार ने उनके ट्वीट को शेयर करके इस बात को और बढ़ावा दिया।

रविश कुमार ने मनोज झा के ट्वीट को री-ट्वीट कर इसका समर्थन किया है, उसी ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X_Ravish_Journo)

रविश कुमार : रविश कुमार खुलेआम सरकार, संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी तत्वों के खिलाफ लोगों को भड़कर व्यूज बटोरने में आगे रहे हैं। इस मुद्दे पर चुप कैसे रहते? उन्होंने बाकायदा वीडियो बनाकर तेजस्वी यादव की बातों को आगे बढ़ाने और आम लोगों को भड़काने की कोशिश की है।

इस बीच, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि अगर आयोग विपक्ष की बात नहीं मानेगा, तो ‘इंडिया’ गठबंधन कोर्ट जाएगा। उनका इल्ज़ाम है कि ये जाँच गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश है।

NDA का जवाब क्या है?

सत्तारूढ़ NDA गठबंधन इस जाँच का समर्थन कर रहा है। उनके नेताओं का कहना है कि विपक्ष हार के डर से बहाने बना रहा है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि वोटर लिस्ट को ठीक करना कानून का हिस्सा है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में लिखा है कि समय-समय पर लिस्ट को अपडेट करना जरूरी है। इससे गड़बड़ियाँ, जैसे मृत लोगों के नाम या गलत लोग, हटाए जा सकते हैं।

वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि कुछ जगहों पर 20,000 तक फर्जी वोटर हैं। ये जाँच उनको हटाएगी, जिससे विपक्ष को नुकसान होगा। इसलिए वो शोर मचा रहे हैं। NDA का कहना है कि ये जाँच पारदर्शिता लाएगी और सही वोटरों को फायदा होगा।

पहले भी हुआ है ऐसा काम

ये कोई नया काम नहीं है। आज़ादी के बाद से कई बार वोटर लिस्ट को ठीक करने के लिए ऐसे अभियान चले हैं।

  • 1952-56: पहले आम चुनाव के बाद हर साल कुछ इलाकों की लिस्ट को गहन जाँच के साथ ठीक किया गया।
  • 1956: शहरों, मज़दूरों वाले इलाकों और जहाँ लोग ज़्यादा इधर-उधर जाते थे, वहाँ खास जाँच हुई।
  • 1962-66: लोकसभा चुनावों के बाद कुछ सालों में पूरे देश में गहन और छोटी जाँच हुई।
  • 1983-88: गाँवों और शहरों में गहन जाँच हुई।
  • 1995-2002: 1995 और 2002 में भी बड़े स्तर पर लिस्ट ठीक की गई।

बिहार में आखिरी बार 2002 में ऐसी जाँच हुई थी और 2003 में नई लिस्ट छपी थी। उस वक्त किसी ने इसे NRC से नहीं जोड़ा था। लेकिन अब, क्योंकि चुनाव नज़दीक हैं, विपक्ष इसे बड़ा मुद्दा बना रहा है।

वोटर लिस्ट की जाँच कई तरह से होती है-

  • गहन जाँच: पुरानी लिस्ट को बिना देखे, नए सिरे से जाँच होती है।
  • सारांश जाँच: सिर्फ़ अपडेट किया जाता है, घर-घर नहीं जाते।
  • विशेष जाँच: अगर कहीं गड़बड़ दिखे, तो खास जाँच होती है।
  • मिश्रित जाँच: पुरानी लिस्ट को देखकर और घर-घर जाकर जाँच होती है।

बिहार में अभी मिश्रित जाँच हो रही है, जिसमें 2003 की लिस्ट को आधार बनाया गया है।

विपक्ष का वही पुराना राग

विपक्ष का ये हंगामा कोई नई बात नहीं है। हर बड़े चुनाव से पहले वो कुछ न कुछ मुद्दा उठाते हैं। कभी EVM पर सवाल उठाते हैं, कभी वोटर लिस्ट पर और कभी चुनाव आयोग को बीजेपी का साथी बताते हैं। लेकिन जब विपक्षी पार्टी चुनाव जीत जाती है जैसे पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु में.. तो ये सारे सवाल गायब हो जाते हैं। हारने पर फिर वही इल्ज़ाम शुरू हो जाते हैं, जैसे महाराष्ट्र चुनाव में मिली हार के भूत का पीछा करते हुए अब भी कॉन्ग्रेस हल्ला मचा रही है, जबकि उसे चुनाव आयोग से लेकर हाई कोर्ट तक करारी हार मिल चुकी है।

प्राडा ने मॉडल्स को पहनाई कोल्हापुरी चप्पलें, ₹1 लाख में बेचा… भारत के गुस्से के बाद दिया श्रेय: स्टील से लेकर चावल तक, पश्चिमी देशों की भारतीय संस्कृति से जुड़ी चीजों को चुराने की पुरानी है आदत

हाल ही में इटली के एक लग्जरी ब्रांड प्राडा ने मिलान के रैंपवॉक के लिए अपने स्प्रिंग और समर सीजन के मेंस वियर कलेक्शन 2026 दिखाया। इसमें ब्रांड ने मॉडल्स को चमड़े की चप्पलें पहनाईं और इसे अपना बेहतरीन और ओरिजिनल कलेक्शन बताया। बस इसी के बाद दुनियाभर में प्राडा का तिरस्कार और बवाल शुरू हो गया।

बवाल होना भी लाजिमी है क्योंकि प्राडा जिन चप्पलों को अपनी ‘प्रेरणा’ बता रहा था वह असल में भारतीय कोल्हापुरी चप्पलें हैं जो भारत की एक पारंपरिक हस्तशिल्प की अनूठी पहचान के साथ आम लोगों के लिए गर्व का जरिया भी हैं।

प्राडा ने इन चप्पलों को ₹1,00,000 तक बेच डाला जबकि भारत में यही कोल्हापुरी चप्पलें ₹200 से ₹1000 में ही आसानी से बाजार में उपलब्ध हैं। प्राडा के इस कलेक्शन की चप्पलें सोशल मीडिया में जैसे ही वायरल हुई वैसे ही भारतीयों का आक्रोश सामने आया।

भारतीयों ने नाराजगी जताते हुए प्राडा से सवाल किया कि ब्रांड ने पीढ़ियों से चली आ रही इस कारीगरी की विरासत के लिए भारत या कोल्हापुर आदि का जिक्र क्यों नहीं किया।

कोल्हापुरी चप्पलों की है अपनी खासियत

भारतीय पारंपरिक हस्तशिल्प में महाराष्ट्र और कर्नाटक के कारीगरों द्वारा चमड़े पर की गई की सदियों की मेहनत और कौशल का दूसरा नाम कोल्हापुरी चप्पल कहा जा सकता है। आमतौर पर इसकी कीमत 500 से 1000 रुपए के बीच है। ये कोल्हापुरी चप्पलें जितनी महीन और बेहतरीन कारीगरी का संगम दिखाती हैं उतनी ही मजबूत और टिकाऊ भी होती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कोल्हापुरी चप्पलों का निर्माण 12वीं या 13वीं शताब्दी से चला आ रहा है। महाराष्ट्र के राजघरानों में रखे गए मोची समूह के कुशल कारीगर इसे हाथ से तैयार करते थे। इसकी एक खासियत ये भी है कि इसे बनाने में लोहे की कीलों का उपयोग नहीं किया जाता।

कोल्हापुरी चप्पलें किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। इसे 2019 में भारत सरकार ने GI टैग भी मिल चुका है। GI Tag उन उत्पादों को मिलता है जो किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े होते हैं और क्षेत्र के आधार पर ही उनकी विशिष्टता तय की जाती है।

आखिरकार झुका प्राडा

भारतीयों की गुस्सा देखने के बाद प्राडा को आखिरकार अपनी गलती माननी पड़ी। प्राडा के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी प्रमुख लोरेंजो बर्टेली ने महाराष्ट्र चेंबर ऑफ कॉमर्स को पत्र लिखकर अपनी गलती मानी और स्वीकार किया कि ये चप्पलें भारतीय परंपरा की सदियों पुरानी विरासत हैं।

बर्टेली ने स्थानीय भारतीय कारीगरों से ‘सार्थक बातचीत’ करने की बात भी कही। हालाँकि भारतीयों का गुस्सा अगर सामने नहीं आता तो शायद प्राडा अपने इस ‘अपने कलेक्शन’ से काफी मुनाफा कमा चुका होता।

भारतीय विरासतों की सदियों से हो रही नकल

यह कोई पहला मामला नहीं है जिसमें भारतीय पारंपरिक उत्पादों या विरासतों की नकल कर उसका फायदा उठाया गया हो। इससे पहले भी कई बड़े ब्रांडों ने न केवल फैशन में बल्कि खानपान और धातुओं में भी चोरियाँ कीं, उनसे मिली प्रसिद्धि का फायदा उठाया और असल देश और लोगों को तवज्जो देना भूल गए।

इटली के ही लग्जरी ब्रांड गूची ने 2021 में ‘ऑर्गेनिक लिनन काफ्तान’ के नाम पर भारतीय कुर्ता बेचा। इसकी कीमत लगभग ₹2.5 लाख थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर ब्रांड का जमकर मजाक बना। अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जारा ने अपने कपड़ों में कई बार भारतीय ब्लॉक प्रिंट्स और डिजाइनों का उपयोग किया है। इसके लिए उसने कभी भारतीय स्रोत को श्रेय नहीं दिया।

इसी तरह लुई वितोन ने बनारसी ब्रोकेट समेत भारतीय कढ़ाई का इस्तेमाल अपने कलेक्शन में किया। हालाँकि उसका कोई भी श्रेय जमीनी कारीगरों को नहीं दिया। इसी तरह भारतीय डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी ने 2021 में H&M के साथ मिलकर ‘वांडरलस्ट’ नाम का कलेक्शन पेश किया। इसमें राजस्थान के सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट का उपयोग किया लेकिन श्रेय नहीं दिया गया। सांगानेरी प्रिंट को भी GI Tag मिला हुआ है।

फैशन के अलावा भी हुईं हैं भारत के उत्पादों की चोरियाँ

मध्यकालीन यूरोप में तलवार की बेहतरीन धार और काफी मजबूत धातु के तौर पर दमिश्क स्टील प्रसिद्ध हुआ था। 12वीं सदी में यूरोप से ईसाइयत को बढ़ाने के लिए निकले योद्धाओं ने पश्चिम एशिया स्थित सीरिया की राजधानी दमिश्क में सबसे पहले ऐसी तलवारों को देखा जो रेशम के कोमल कपड़ों को भी हवा में काट देती थीं। उस जगह के नाम पर ही उन्होंने इस तलवार को दमिश्क स्टील नाम दिया।

हालाँकि असल में ये दमिश्क स्टील भारत की उत्पत्ति है। भारत से इसे पश्चिम एशिया में निर्यात किया जाता था। मूल रूप से वुट्ज स्टील (wootz steel) से बने दमिश्क स्टील को केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में तैयार किया जाता था। असल में वुट्ज स्टील का नाम तमिल के ‘उक्कू’ शब्द से आया है जिसका अर्थ इस्पात होता है।

ये स्टील 1-1.5% कार्बन से बना हाइपरयूटेक्टाइड स्टील होता था। इसके कारण ही ये दुनिया में सबसे सबसे अधिक मजबूत और धारदार होता था। भारत की इस धातु से बनी तलवारें आज भी यूरोपीय और एशियाई संग्राहलयों में हैं लेकिन इनसे भारत का नाम गायब हो गया है।

भारतीय उपमहाद्वीप की विरासत बासमती चावल भी हुए चोरी

भारतीय उपमहाद्वीप में पारंपरिक रूप से उगाए जाने वाले सुगंधित बासमती चावल भी चोरी होने से अछूते नहीं रह पाए। भारत और पाकिस्तान में होने वाली बासमती चावलों की खेती पर अमेरिकी कंपनी राइसटेक (RiceTec Inc.) ने 1997 में अमेरिकी पेटेंट करवाया। इसके बाद वहाँ उगने वाले बासमती चावलों को टैक्समती (Texmati) और जैसमती (Jasmati) कहकर बेचना शुरू कर दिया।

इसके बाद भारत ने बासमती को GI Tag देने की प्रक्रिया शुरू की। 18 साल की कानूनी लड़ाई के बाद बासमती को वैश्विक मान्यता और GI Tag मिल पाया।

नकल कर मुनाफा कमाने की पुरानी चाल

प्रेरणा के नाम पर बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड सदियों से चली आ रही पारंपरिक विधाओं के साथ कुशल कारीगरों की मेहनत का भी अपनी सुविधानुसार मजाक बनाते हैं। खुद का उत्पाद बताकर अच्छा खासा मुनाफा कमा लेते हैं, दुनियाभर में नाम कमा लेते हैं।

इसके बाद जब उनकी नकल पकड़ में आती है तो धीरे से माफी माँगकर बात को रफा-दफा कर देने का तरीका अपना लेते हैं। इन सब के बीच नुकसान सिर्फ और सिर्फ उन कुशल हाथों का होता है जिनकी पीढ़ियाँ इसी काम के बलबूते कमाती-खाती और अपनी पहचान स्थापित करती आई हैं।

जब कारीगर बार-बार अपने हुनर का मजाक बनते देखते हैं तो उनमें हताशा साफ तौर पर दिखती है। हतोत्साहित होने के साथ वे स्वयं को छला हुआ पाते हैं। तब वे इसे छोड़ने का मन बना लेते हैं ताकि उनकी अगली पीढ़ी इस निराशा से न जूझे।

ऐसे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार और कानून- नियम निर्माताओं की है कि वे हमारी विरासत को संजोने के लिए इतने कड़े नियामक तय कर दें कि कोई भी ब्रांड ‘असल कला’ की नकल करने से पहले उसके परिणामों से डर जाएं। तभी इस तरह के आधुनिक ब्रांड उन कुशल कारीगरों के पेट पर लात मारने या उनकी प्रतिभा का फायदा उठाने से पहले दो बार सोचेंगे।

62 करोड़ नए इन्टरनेट यूजर, 42 लाख KM का ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और 10000 करोड़ ट्रांजैक्शन… ये हैं डिजिटल इंडिया की 10 साल की उपलब्धियाँ: यह कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि जनआंदोलन

दस साल पहले, हमने बहुत दृढ़ विश्वास के साथ अज्ञात क्षेत्र में एक साहसिक यात्रा शुरू की।

जबकि दशकों तक भारतीयों की टेक्नोलॉजी का उपयोग करने की क्षमता पर संदेह किया जाता रहा, लेकिन हमने इस अप्रोच को बदल दिया और भारतीयों की टेक्नोलॉजी का उपयोग करने की क्षमता पर भरोसा किया।

जबकि दशकों तक यह सोचा जाता रहा कि टेक्नोलॉजी के उपयोग से संपन्न और वंचित के बीच की खाई और गहरी हो जाएगी। हमने इस मानसिकता को बदल दिया और संपन्न एवं वंचित के बीच की खाई को खत्म करने के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग किया।

जब इरादा सही हो, तो इनोवेशन, कम सशक्त लोगों को सशक्त बनाता है। जब अप्रोच, समावेशी होता है, तो टेक्नोलॉजी; हाशिए पर रहने वालों के जीवन में बदलाव लाती है।

इस विश्वास ने डिजिटल इंडिया की नींव रखी: पहुँच को लोकतांत्रिक बनाने, समावेशी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने और सभी के लिए अवसर प्रदान करने का मिशन।

2014 में इंटरनेट की पहुँच सीमित थी, डिजिटल साक्षरता कम थी और सरकारी सेवाओं तक ऑनलाइन पहुँच दुर्लभ थी। कई लोगों को संदेह था कि क्या भारत जैसा विशाल और विविधतापूर्ण देश वास्तव में डिजिटल हो सकता है।

आज, उस सवाल का जवाब न केवल डेटा और डैशबोर्ड में है, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों के जीवन में भी है। हम कैसे गवर्न करते हैं, कैसे सीखते हैं, लेन-देन करते हैं और कैसे निर्माण करते हैं, डिजिटल इंडिया हर जगह है।

डिजिटल खाई को पाटना

2014 में भारत में करीब 25 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन थे। आज यह संख्या बढ़कर 97 करोड़ से ज्यादा हो गई है। 42 लाख किलोमीटर से ज्यादा ऑप्टिकल फाइबर केबल, जो पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी से 11 गुना ज्यादा है, अब सबसे दूरदराज के गाँवों को भी जोड़ती है।

भारत में 5G की शुरुआत दुनिया में सबसे तेज गति से हुई है, जहाँ सिर्फ़ दो साल में 4.81 लाख बेस स्टेशन स्थापित किए गए हैं। हाई-स्पीड इंटरनेट अब शहरी केंद्रों और गलवान, सियाचिन और लद्दाख सहित अग्रिम सैन्य चौकियों तक पहुँच गया है।

इंडिया स्टैक, जो हमारी डिजिटल रीढ़ है, ने UPI जैसे प्लेटफॉर्म को सक्षम किया है, जो अब सालाना 100+ बिलियन लेनदेन को संभालता है। सभी वास्तविक समय के डिजिटल लेनदेन में से लगभग आधे भारत में होते हैं।

Direct Benefit Transfer (DBT) के माध्यम से ₹44 लाख करोड़ से अधिक सीधे नागरिकों को ट्रांसफर किए गए हैं, जिससे बिचौलियों को हटाया गया है और ₹3.48 लाख करोड़ की लीकेज की बचत हुई है।

SVAMITVA जैसी योजनाओं ने 2.4 करोड़ से अधिक संपत्ति कार्ड जारी किए हैं और 6.47 लाख गाँवों की मैपिंग की है, जिससे भूमि से संबंधित अनिश्चितता के वर्षों का अंत हुआ है।

सभी के लिए अवसर का लोकतंत्रीकरण

भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था MSMEs और छोटे उद्यमियों को पहले से कहीं ज्यादा सशक्त बना रही है।

ONDC (डिजिटल कॉमर्स के लिए ओपन नेटवर्क) एक क्रांतिकारी प्लेटफॉर्म है जो खरीदारों और विक्रेताओं के विशाल बाजार के साथ सहज कनेक्शन प्रदान करके अवसरों की एक नई खिड़की खोलता है।

GeM (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) आम आदमी को सरकार के सभी अंगों को सामान और सेवाएँ बेचने में सक्षम बनाता है। यह न केवल आम आदमी को एक विशाल बाजार के साथ सशक्त बनाता है बल्कि सरकार के लिए पैसे भी बचाता है।

कल्पना कीजिए: आप मुद्रा लोन के लिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं। अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क के जरिए आपकी क्रेडिट योग्यता का मूल्यांकन किया जाता है। आपको अपना लोन मिल जाता है और आप अपना उद्यम शुरू कर देते हैं। आप GeM पर रजिस्टर होते हैं, स्कूलों और अस्पतालों को सप्लाई करते हैं और फिर ONDC के जरिए आगे बढ़ते हैं।

ONDC ने हाल ही में 200 मिलियन ट्रांजेक्शन को पार कर लिया है, जिसमें से आखिरी 100 मिलियन ट्रांजेक्शन सिर्फ छह महीनों में हुए हैं। बनारसी बुनकरों से लेकर नागालैंड के बाँस कारीगरों तक, विक्रेता अब बिना किसी बिचौलिए या डिजिटल एकाधिकार के, पूरे देश में ग्राहकों तक पहुँच रहे हैं।

GeM ने 50 दिनों में ₹1 लाख करोड़ GMV को भी पार कर लिया है, जिसमें 1.8 लाख से अधिक महिलाओं के नेतृत्व वाले MSME सहित 22 लाख विक्रेताओं ने ₹46,000 करोड़ के ऑर्डर पूरे किए हैं।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत की ग्लोबल ऑफरिंग

आधार, कोविन, डिजीलॉकर और फास्टैग से लेकर पीएम-वाणी और वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन तक भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) का अब वैश्विक स्तर पर अध्ययन और अपनाया जा रहा है।

कोविन ने दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान को सक्षम बनाया, 220 करोड़ QR-verifiable प्रमाणपत्र जारी किए। 54 करोड़ यूजर्स के साथ डिजीलॉकर 775 करोड़ से अधिक दस्तावेजों को सुरक्षित और निर्बाध रूप से होस्ट करता है।

हमारे G20 प्रेसीडेंसी के माध्यम से, भारत ने ग्लोबल DPI रिपॉजिटरी और $25 मिलियन का सोशल इम्पैक्ट फंड लॉन्च किया, जिससे अफ्रीका और दक्षिण एशिया के देशों को समावेशी डिजिटल इकोसिस्टम अपनाने में मदद मिली।

स्टार्टअप पावर और आत्मनिर्भर भारत का संगम

भारत अब दुनिया के शीर्ष 3 स्टार्टअप इकोसिस्टम में शुमार है, जहाँ 1.8 लाख से ज्यादा स्टार्टअप हैं। लेकिन यह सिर्फ स्टार्टअप मूवमेंट से कहीं ज्यादा है, यह एक तकनीकी पुनर्जागरण है।

जब बात युवाओं में एआई स्किल पैठ और एआई talent concentration की आती है तो भारत बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है।

1.2 बिलियन डॉलर के India AI Mission के माध्यम से भारत ने 34,000 जीपीयू तक वैश्विक स्तर पर बेजोड़ कीमतों पर 1 डॉलर/जीपीयू प्रति घंटे से भी कम कीमत पर पहुँच को सक्षम किया है, जिससे भारत न केवल सबसे किफायती इंटरनेट अर्थव्यवस्था बन गया है, बल्कि सबसे किफायती कंप्यूट डेस्टिनेशन भी बन गया है।

भारत ने humanity-first AI का समर्थन किया है। एआई पर New Delhi Declaration जिम्मेदारी के साथ इनोवेशन को बढ़ावा देती है। हम पूरे देश में AI Centres of Excellence स्थापित कर रहे हैं।

आगे की राह

अगला दशक और भी अधिक परिवर्तनकारी होगा। हम डिजिटल गवर्नेंस से ग्लोबल डिजिटल नेतृत्व की ओर, India-first से India-for-the-world की ओर बढ़ रहे हैं।

डिजिटल इंडिया, केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं रह गया है, यह लोगों का आंदोलन बन गया है। यह एक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण और भारत को दुनिया के लिए एक विश्वसनीय इनोवेशन भागीदार बनाने के लिए अहम है।

सभी इनोवेटर्स, उद्यमियों और सपने देखने वालों के लिए: दुनिया, अगली डिजिटल सफलता के लिए भारत की ओर देख रही है।

आइए, हम वह बनाएँ, जो सशक्त करे।

आइए, हम वह हल करें, जो वास्तव में मायने रखता है।

आइए, हम ऐसी तकनीक से नेतृत्व करें जो जोड़ती है, सबको साथ लाती है और सबका उत्थान करती है।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने निजी ब्लॉग पर लिखा है। इसको पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

नई नहीं है दिल्ली में पुरानी पेट्रोल-डीजल गाड़ियों पर रोक, 2014 में NGT ने दिया आदेश: सुप्रीम कोर्ट तक लगा चुका मुहर, जानिए अब क्यों चल रही स्पेशल ड्राइव; इन गाड़ियों का क्या होगा

दिल्ली में 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों को ईंधन देना बंद कर दिया गया है। दिल्ली के 400+ पेट्रोल पम्प पर इन गाड़ियों की पहचान के लिए विशेष कैमरे तैनात किए गए हैं। यहाँ टीमें भी लगाई गई हैं जो इन गाड़ियों को पहचान कर सीज भी कर रहीं हैं। यह पूरी कवायद दिल्ली में वायु प्रदूषण को कम करने की पहल के चलते है। इस अभियान के तहत कई लाख गाड़ियाँ प्रभावित होने वाली हैं।

दिल्ली-NCR में कितने साल पुरानी गाड़ियाँ नहीं चलेंगी?

दिल्ली-NCR में 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियाँ नहीं चलेंगी। इनको सड़क पर चलने पर सीज किया जाएगा और जुर्माना भी लगाया जाएगा। इसके साथ ही इन्हें स्क्रैप करने के लिए भी भेज दिया जाएगा। यह नियम छोटी गाड़ियों, ट्रकों, बसों और यहाँ तक कि बाइक पर भी लागू होगा।

क्यों दिल्ली-NCR में लगा पुरानी गाड़ियों पर प्रतिबन्ध?

दिल्ली-NCR में पुरानी गाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगाने का यह निर्णय घटती वायु की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए लिया गया था। दिल्ली की हवा की गुणवत्ता बीते कुछ वर्षों में काफी खराब स्तर पर पहुँच चुकी है। 2014-15 तक इस गुणवता में ठण्ड के दिनों में भारी गिरावट आई थी।

हवा की गुणवत्ता में यह कमी प्रदूषण के चलते थी। रिपोर्ट्स बताती हैं कि गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ इस प्रदूषण में 50% से अधिक का हिस्सा रखता है। सबसे ज्यादा प्रदूषण वह वाहन करते हैं जो पुराने हो चुके होते हैं और उनका रखरखाव ढंग से नहीं होता।

इसके अलावा डीजल गाड़ियाँ अधिक प्रदूषण करती हैं क्योंकि उनमें पेट्रोल से अलग तकनीक उपयोग होती है। ऐसे में NGT इन गाड़ियों पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया था। इसके अलावा पहले ही रजिस्टर की जा चुकी गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन कैंसिल करने का निर्णय भी लिया गया था।

NGT ने कब लगाया पुरानी गाड़ियों पर बैन?

दिल्ली-NCR में 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों पर चल रहा यह अभियान कोई नया फैसला नहीं है। असल में यह 2014 और 2015 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकारण (NGT) द्वारा दिए गए एक फैसले के लागू किए जाने का असर ही है।

असल में नवम्बर, 2014 में NGT ने एक फैसले में कहा था कि दिल्ली-NCR के भीतर 10 वर्ष से पुरानी डीजल गाड़ियाँ और 15 वर्ष से पुरानी पेट्रोल गाड़ियाँ नहीं चलेंगी। NGT ने यह भी आगे आदेश दिया था कि इन गाड़ियों को दिल्ली और NCR के आसपास जिलों में पंजीकृत नहीं किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी गाड़ियों को लेकर क्या क्या था?

NGT के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई थी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने भी NGT के इस फैसले पर यह मुहर लगा दी थी कि दिल्ली-NCR के भीतर 10 वर्ष पुरानी डीजल और 15 वर्ष पुरानी पेट्रोल गाड़ियों को चलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। तब से दिल्ली में लगातार इन पुरानी गाड़ियों पर एक्शन चल रहा है।

NGT के इस आदेश के बाद वर्ष 2022 में दिल्ली सरकार ने निर्णय लिया था कि वह अब 10 साल पुरानी सभी डीजल गाड़ियों और 15 साल को डी रजिस्टर करने का निर्णय लिया था। दिल्ली सरकार ने कहा था कि अगर यह गाड़ियाँ सड़कों पर पाई जाएँगी तो इन्हें जब्त कर लिया जाएगा।

दिल्ली-NCR में अब पुरानी गाड़ियों पर क्या एक्शन हो रहा?

दिल्ली में अब 400 से अधिक पेट्रोल पम्पों पर ऐसी गाड़ियों को ईंधन नहीं दिया जाएगा। यह कार्रवाई 459 पेट्रोल पम्प पर की जा रही है। इनमें से 350 पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी की तैनाती की गई है। इसके अलावा 100 पेट्रोल पम्प पर पुलिस कर्मी तैनात हैं। इसके अलावा 59 पर दिल्ली परिवहन विभाग की टीमें तैनात की गई हैं।

इन पेट्रोल पम्प पर पुरानी गाड़ियों की पहचान के लिए विशेष कैमरे लगाए गए हैं। यह कैमरे गाड़ी का नम्बर देख कर उसका वाहन पोर्टल के डाटा से मिलान करेगा। इस डाटा के अनुसार, यदि कोई 15 वर्ष पुरानी पेट्रोल या 10 वर्ष पुरानी डीजल गाड़ी होगी तो यह पेट्रोल पम्प के कर्मचारी को अलर्ट कर देगा।

ऐसी गाड़ियों को इसके बाद ईंधन नहीं दिया जाएगा। इसके इन पर ₹10 हजार तक का जुर्माना और जब्ती की कार्रवाई भी हो सकती है। दिल्ली के पट्रोल पम्प पर यह एक्शन चालू भी हो गया है। कई पेट्रोल पम्प पर गाड़ियाँ और बाइक भी सीज की गई हैं।

पुरानी गाड़ियों का अब क्या होगा?

सवाल उठता है कि दिल्ली-NCR में रहने वाले जिन लोगों के पास पुरानी गाड़ियाँ हैं वह अब क्या करेंगे और उनकी गाड़ियों का क्या होगा। दरअसल, इन गाड़ियों के मालिकों के लिए दो विकल्प मौजूद हैं। या तो वह अपनी गाड़ी स्क्रैप कर दें यानी कबाड़ी को बेच दें या फिर उन्हें ऐसे राज्यों में बेचें जहाँ पर इन्हें चलने की अनुमति अभी दी गई है।

स्क्रैप में पुरानी गाड़ियों को लेकर क्या नीति?

दिल्ली सरकार ने 2024 में पुरानी गाड़ियों को स्क्रैप करने को लेकर एक नीति भी बनाई थी। इसके तहत पुरानी गाड़ियों को स्क्रैप करने पर उनके मालिकों को नई गाड़ी के पंजीकरण पर छूट का ऐलान किया गया था। इसके तहत उन्हें प्रमाण पत्र दिखाने पर 10%-20% तक की छूट देने का प्रावधान है।

दूसरे राज्यों में बेचने को लेकर क्या नियम?

दिल्ली-NCR में अब जिन गाड़ियों को चलने देने की अनुमति नहीं है, उन्हें दूसरे राज्यों में बेचा सकता है। हालाँकि, इस मामले में भी उस राज्य के नियमों का पालन करना होगा। दिल्ली- NCR की सड़कों से हटाई जाने वाली गाड़ियाँ दूसरे राज्यों के उन जिलों में बेचीं जा सकती है जहाँ इन्हें रजिस्टर करने की अनुमति है। उत्तर प्रदेश के NCR एवं कुछ जिलों को छोड़ कर यह किया जा सकता है। इसके अलावा बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इनकी बिक्री हो सकती है।

दिल्ली CM रेखा गुप्ता ने पुरानी गाड़ियों पर एक्शन को लेकर क्या कहा?

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इस मामले में बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली में कोर्ट और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड लगातार इस बात के लिए कह रहे हैं कि कि पुरानी गाड़ियों को सड़क से हटाया जाए।

उन्होंने कहा कि सरकार इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने पर प्रयास कर रही है। उन्होंने यह भी कहा है कि पेट्रोल पम्प पर कैमरा लगाने की योजना को लेकर भी काम चल रहा है।

काले हिजाब में खुद को नहीं छिपाएँगे, अपनी संस्कृति को देंगे बढ़ावा: 70% मुस्लिम आबादी वाले देश में चेहरा ढकने पर रोक, जानिए कौन-कौन से इस्लामी मुल्क लगा चुके हैं बैन

मुस्लिम बहुल कजाखस्तान में चेहरा ढकने पर सरकार ने रोक लगा दी है। इस्लामी मुल्कों में औरतें अक्सर हिजाब/बुर्का से चेहरा ढकने का चलन रहा है। वैसे इस तरह की पाबंदी लगाने वाला कजाखस्तान पहला मुल्क नहीं है।

कजाखस्तान की आबादी करीब 2 करोड़ है, इनमें से 70 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानने वाले हैं। चेहरा ढकने पर पाबंदी से जुड़े कानून पर राष्ट्रपति कासिम जोमार्ट टोकायेव ने 20 जून 2025 को हस्ताक्षर किए।

कानून के अनुसार, सार्वजनिक स्थान पर चेहरा ढकने पर पांबदी लगाई गई है। अब ऐसी किसी भी तरह के कपड़े नहीं पहने जाएँगे, जिससे चेहरे की पहचान नहीं की जा सके। हालाँकि, इसमें रियायत भी दी गई है। जहाँ मेडिकल कारणों और खराब मौसम में चेहरा ढकने पर रोक नहीं है। वहीं स्पोर्ट्स और सांस्कृतिक कार्यक्रम में पहने जाने वाले कपड़ों में चेहरा ढका जा सकता है।

कजाखस्तान ने चेहरा ढकने पर क्यों लगाई रोक ?

कजाखस्तान में अधिकतर मुस्लिम आबादी है, जो हिजाब पहनती है। खासकर महिलाएँ यहा चेहरा ढककर रहती हैं। लेकिन बावजूद इसके कजाखस्तान ने हिजाब और चेहरे ढकने वाले हर परिधान पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा इसीलिए क्योंकि कजाखस्तान अब अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में लगा है। देश अपनी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहता है।

राष्ट्रपति टोकायेव ने भी कहा कि चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाने से कजाखस्तान की असली सांस्कृतिक पहचान सामने आएगी। उन्होंने कहा, “चेहरा छुपाने वाले काले हिजाब पहनने के बजाय, देश के अपने परिधानों को महत्व दिया जाए। इससे देश अपनी खुद की संस्कृति को बढ़ावा देगा।”

स्कूल-कॉलेज में ‘हिजाब’ पर पहले ही बैन लगा चुका है कजाखस्तान

बता दें कि इससे पहले भी कजाखस्तान में हिजाब पर रोक लगाई जा चुकी है। लेकिन वह केवल स्कूल-कॉलेज में पढ़ रही छात्राओं के लिए प्रतिबंध लगाया गया था। साल 2023 में टोकायेव सरकार ने स्कूल-कॉलेज में हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाई थी। इस पाबंदी का खूब विरोध किया गया था। यहाँ तक की इसके बाद 150 छात्राओं ने स्कूल आना बंद कर दिया था।

कजाखस्तान की 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम

कजाखस्तान में चेहरे ढकने पर प्रतिबंध खासकर मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करेगा। मुस्लिम महिलाएँ हिजाब पहनती हैं, जिससे चेहरा ढका जाता है। ऐसे में प्रतिबंध का असर मुस्लिम आबादी पर अधिक पढ़ेगा। वैसे भी कजाखस्तान में कुल आबादी 2.03 करोड़ में से 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है। बाकी दूसरे नंबर पर लोग ईसाई धर्म को मानते हैं।

कभी सोवियत संघ का हिस्सा था कजाखस्तान

कजाखस्तान एक समय पर सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) का हिस्सा रह चुका है। 1991 में कजाखस्तान इस संघ से अलग हुआ। संघ में रूस, यूक्रेन, बेलारूस, उज्बेकिस्तान समेत 16 देश शामिल थे। इन देशों में भी कुछ देशों ने हिजाब पर बैन लगाया है। ये सभी देश अपनी राष्ट्रीय परंपरा को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं।

इन मुस्लिम देशों में भी हिजाब पर है प्रतिबंध

बता दें कि कजाखस्तान से पहले भी कई मुस्लिम देशों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया गया है। कई देशों में महिलाओं को आजादी से जीने के अधिकार के तौर पर, तो कहीं राष्ट्रीय पहचान का हवाला देते हुए हिजाब पर बैन लगाया है। इनमें अधिकतर सोवियत संघ से जुड़े देश शामिल हैं, जो अपनी संस्कृति को अपनाने में लगे हैं।

ताजिकिस्तान में 95 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है। इसके बावजूद ताजिकिस्तान में साल 2024 में हिजाब को प्रतिबंधित करने के लिए कानून पास किया गया। इस कानून के तहत हिजाब पर बिक्री, उसे पहनना या उसे बढ़ावा देना भी अपराध होगा। कानून में हिजाब को ‘विदेशी संस्कृति’ भी बताया गया है। देश में हिजाब पहनने या बेचने पर 750 डॉलर (₹62,000) से लेकर 3724 डॉलर (₹3.10 लाख) तक का जुर्माना लगाया गया है।

वहीं, कजाखस्तान के ही पड़ोसी मुल्क किर्गिस्तान में भी जनवरी 2025 में हिजाब या बुर्का पहनने पर पूरी तरह बैन लगा दिया है। देश ने निकाब को ‘समाज में एलियन’ का दर्जा दिया है। किर्गिस्तान में मुस्लिमों का कहना है कि इस नकाब से दुश्मनों को पहचान छिपाने में आसानी होती है।

इससे पहले सितंबर 2023 में इजिप्ट में स्कूल-कॉलेज में छात्राओं के निकाब पहनने पर रोक लगा दी थी। उज्बेकिस्तान में भी साल 2021 में स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं को हिजाब पहनने से प्रतिबंधित कर दिया था।

मुस्लिम बहुल देशों के अलावा स्विट्जरलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, बुल्गेरिया, इटली, फ्रांस, रूस जैसे देशों में भी हिजाब पहनने और चेहरा ढकने पर पाबंदी है।

गिरोह का दावा- हिंदूवादियों ने नजीब अहमद को गायब किया, कोर्ट ने कहा- हर एंगल से हुई जाँच पर ABVP के लड़कों की कोई भूमिका नहीं मिली: जानिए क्या है JNU से छात्र के गायब होने का मामला

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार (30 जून 2025) को JNU के स्टूडेंट रहे नजीब अहमद की गुमशुदगी के मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को मान लिया है। कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि मामले की पूरी जाँच हुई, कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि नजीब के साथ किसी ने मारपीट की, उसे अगवा किया या उसे जानबूझकर गायब किया गया।

कोर्ट ने साफ कहा कि सीबीआई ने हर पहलू से जाँच की, लेकिन नजीब का कोई सुराग नहीं मिला। फिर भी इस्लामिक कट्टरपंथी, वामपंथी छात्र संगठन और उनका राजनीतिक इकोसिस्टम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठा रहा है। सोशल मीडिया पर हंगामा मचा है और कोर्ट को गलत ठहराने की कोशिश की जा रही है।

कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि नजीब अहमद 15 अक्टूबर 2016 से गायब है और आज तक उसके बारे में कोई जानकारी सामने नहीं आई है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CBI ने 173(2) CrPC के तहत जो क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की है, उसमें यह बताया गया है कि सभी संभावित कोणों से गहन जाँच की गई, लेकिन नजीब की लोकेशन या उससे जुड़ी कोई भी निर्णायक जानकारी सामने नहीं आ सकी।

क्या हुआ था 2016 में?

नजीब अहमद जेएनयू का छात्र था और एमएससी बायोटेक्नोलॉजी का पहला साल पढ़ रहा था। 15 अक्टूबर 2016 को वह अपने माही-मांडवी हॉस्टल के रूम नंबर 106 से अचानक गायब हो गया।

घटनाक्रम के मुताबिक, नजीब अहमद 14 अक्टूबर 2016 की रात JNU के माही-मांडवी हॉस्टल के रूम नंबर 106 में थे, जब ABVP से जुड़े छात्रों ने -जो छात्र संघ चुनाव के लिए प्रचार कर रहे थे, उसके कमरे का दरवाजा खटखटाया। इनमें विक्रांत कुमार, सुनील प्रताप सिंह और अंकित कुमार रॉय शामिल थे।

जब नजीब ने दरवाजा खोला तो उन्होंने नजीब से मतदान की अपील की। इसी दौरान कथित रूप से नजीब ने विक्रांत को थप्पड़ मार दिया और उसकी कलाई में बंधे कलावे (हिंदू धार्मिक धागे) पर आपत्ति जताई। इसके बाद विक्रांत और नजीब के बीच झगड़ा हुआ और ABVP कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी शुरू कर दी।

सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी में नजीब को वॉर्डन ऑफिस ले जाया गया, जहाँ उसने मारपीट की बात स्वीकार की और माफी भी माँगी। उसे हॉस्टल से निकाले जाने का फैसला लिया गया, जिसे अगले दिन वापस ले लिया गया। हालाँकि अगली सुबह 15 अक्टूबर 2016 को नजीब लापता हो गया। आखिरी बार हॉस्टल वॉर्डन अरुण श्रीवास्तव (LW-4) ने उसे सुबह 11:30 बजे देखा, जब वह एक ऑटो में बैठता दिखा। CBI की रिपोर्ट के अनुसार नजीब बिना किसी समान के गया और यह ‘स्वेच्छा से गायब होने’ का मामला हो सकता है। उसके मोबाइल और लैपटॉप कमरे में ही मिले।

वामपंथी संगठनों ने बिना जाँच के आरोप लगा दिया कि एबीवीपी ने नजीब को गायब करवाया। जेएनयू, जामिया, एएमयू और देशभर के कैंपस में नारे लगे कि “हिंदूवादी संगठनों ने मुस्लिम छात्र को गायब किया।”

उस समय मीडिया खासकर अंग्रेजी चैनल्स ने इसे ‘हिंदुत्व की हिंसा का मामला बना दिया। लेकिन हकीकत यह थी कि झगड़े की शुरुआत नजीब ने की थी। नजीब ने तीन छात्रों पर हमला किया था, जिनमें दो दलित थे, फिर भी उसे यानी नजीब को ‘मासूम’ दिखाया गया।

ये वही गैंग है, जो 2016 में अचानक नजीब की गुमशुदगी के बाद सड़कों पर उतर आया था। जेएनयू से लेकर जामिया, एएमयू और देशभर के यूनिवर्सिटी कैंपस में नारे लगे कि ‘हिंदूवादी संगठनों ने एक मुस्लिम छात्र को गायब कर दिया’। जबकि अब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यह पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा था। सीबीआई की जाँच में न सिर्फ सबूतों की गहराई से जाँच हुई, बल्कि जिन 9 छात्रों पर आरोप लगाए गए थे, उनके खिलाफ एक भी ऐसा सबूत नहीं मिला जिससे कोई कानूनी कार्रवाई की जा सके।

सीबीआई की जाँच और कोर्ट का रुख

दिल्ली पुलिस ने पहले जाँच की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश से यह केस सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआई ने 2018 में जाँच बंद करने की बात कही क्योंकि नजीब का कोई ठोस सुराग नहीं मिला। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ज्योति महेश्वरी ने 30 जून 2025 को नजीब अहमद गुमशुदगी मामले में सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट और फातिमा नफीस की प्रोटेस्ट पिटीशन पर विस्तार से सुनवाई के बाद सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी दे दी।

कोर्ट ने विस्तार से कहा –

  • सीबीआई ने 560 गवाहों से पूछताछ की।
  • मोबाइल डेटा, सीसीटीवी फुटेज, बैंक रिकॉर्ड, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और इंटरपोल की मदद से जाँच हुई।
  • 9 छात्रों (जिन पर आरोप था) की गहन जाँच हुई, लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि उन्होंने नजीब को नुकसान पहुँचाया।
  • नजीब खुद हॉस्टल से गया था, कोई मारपीट, अगवा होने या जानलेवा हमले का सबूत नहीं मिला।
  • नजीब की मानसिक हालत ठीक नहीं थी, जिसकी बात डॉक्टरों और उसकी माँ फातिमा नफीस ने भी मानी। रिपोर्ट में डिप्रेशन का जिक्र है।
  • कोर्ट ने माना कि नजीब की गुमशुदगी रहस्यमई है, लेकिन एबीवीपी या किसी अन्य की इसमें कोई भूमिका साबित नहीं हुई।
कोर्ट के फैसले की कॉपी

कोर्ट ने अपने फैसले में साफ साफ कहा है कि ABVP के कार्यकर्ताओं का नजीब की गुमशुदगी से कोई लेना-देना नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर भविष्य में कोई नया सबूत मिलता है, तो जाँच फिर शुरू हो सकती है। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, “सच हमसे छिपा हो सकता है, लेकिन उसकी खोज अडिग और अडचनों से परे जारी रहनी चाहिए।”

दरअसल, 2018 में ही सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन उसका विरोध किया गया था। फातिमा नफीस की ओर से दाखिल प्रोटेस्ट पिटीशन में CBI की जाँच को ‘भ्रामक’, ‘आधे अधूरे तथ्यों पर आधारित’ और ‘पूर्वाग्रह से ग्रसित’ बताया गया था। उनका कहना था कि CBI ने जानबूझकर यह थ्योरी बनाई कि नजीब JNU से खुद चला गया था, जबकि इससे जुड़े कई अहम सबूतों और संभावित संदिग्धों की भूमिका की उचित जाँच नहीं की गई।

फातिमा नफीस शुरू से कहती रही हैं कि उनके बेटे को एबीवीपी ने गायब करवाया और यह राजनीतिक साजिश है। उन्होंने मीडिया और वामपंथी संगठनों के जरिए इस मुद्दे को हवा दी। लेकिन कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया और कहा कि सीबीआई ने हर पहलू से जाँच की है।

प्रोपेगेंडा गैंग का हंगामा जारी

कोर्ट के साफ फैसले के बावजूद अब इस्लामी कट्टरपंथी, वामपंथी गैंग और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम सोशल मीडिया पर हंगामा मचा रहा है। SDPI ( बैन किए गए आतंकी संगठन PFI के राजनीतिक मुखौटे) ने इस केस को जारी रखने की माँग करते हुए ऑफिसियल एक्स हैंडल से ट्वीट भी किया है।

एसडीपीआई का कहना है कि यह सच्चाई से मुँह मोड़ने और न्याय को बाधित करने वाला कदम है। उसके पोस्ट में लिखा है कि मुकदमा बंद नहीं होना चाहिए।

जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष नीतीश कुमार की तरफ से बाकायदा पोस्टर तक जारी किया गया है। इसके साथ ही एक्स पर लिखा है, “दिल्ली पुलिस और सीबीआई ने जिस तरीके से इस पूरे केस को डील किया है वो साफ़ दिखाता है कि अब तक नहीं पता है की नजीब कहाँ गया। जिन परिषद के लोगों ने उसके साथ मारपीट की उसे कभी गिरफ़्तार नहीं किया गया। हम लोग रिपोर्ट पढ़ रहे हैं, और अम्मी के साथ मिलकर जिस तरीक़े से वो इस लड़ाई को लड़ना चाहती ह, जेएनयू का स्टूडेंट्स और जेएनयूएसयू उनके साथ खड़ा रहेगा।”

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे पूर्व वामपंथी और बाद में कॉन्ग्रेसी नेता कन्हैया कुमार भी मामले को हवा देने में जुट गया। कन्हैया ने नजीब की माँ के हवाले से इमोशनल पोस्ट लिखकर आम लोगों की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की। वो ये लिखकर मामले पर राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहा है कि वो नजीब की माँ के साथ खड़ा है।

सुहैल आजाद नाम के व्यक्ति ने लिखा, “हम दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए, लेकिन अफसोस कि एक माँ को उसका बेटा नहीं लौटा सके।” ऐसी ही कोशिश गुरप्रीत वालिया जैसे एक्स हैंडल कर रहे हैं, जो खुलेआम विचारधारा के स्तर पर राष्ट्रवादियों के विरोध में हमेशा रहते हैं।

मोहम्मद शादाब खान नाम का व्यक्ति लिखता है, “आज जब अदालत कहती है कि CBI ने अपनी ‘पूरी कोशिश’ की, तो यह सवाल लाज़िमी है: क्या राज्य की कोशिशें भी नागरिक की धार्मिक और वैचारिक पहचान देखकर तय होती हैं? क्या एक ‘अस्वीकार्य विचारधारा’ रखने वाला छात्र इस देश में ‘लापता’ हो जाना डिजर्व करता है?” वहीं गोविंद प्रताप सिंह नाम के कथित वामपंथी पत्रकार ने लिखा, “सॉरी नजीब”

अंग्रेजी और वामपंथी मीडिया बनाना चाहते थे दूसरा ‘रोहित वेमुला’ केस

2016 में अंग्रेजी और वामपंथी मीडिया ने इस मामले को हिंदुत्व की हिंसा बता दिया था। नजीब को ‘मासूम मुस्लिम छात्र’ और एबीवीपी को खलनायक दिखाया गया। ये कोशिशें अब भी जारी हैं। लेकिन अब जब कोर्ट ने कहा कि कोई दोष नहीं है, तो वही मीडिया चुप है। ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, नजीब ने खुद तीन छात्रों पर हमला किया था, जिनमें दो दलित थे। फिर भी उसे पीड़ित और उन छात्रों को गलत दिखाया गया। यह मीडिया का दोहरा चेहरा है।

इनका मकसद सच जानना नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदा उठाना और हिंदू संगठनों को बदनाम करना है। वे नजीब के नाम पर एक नया ‘रोहित वेमुला‘ बनाना चाहते हैं।

राजनीतिक बयानबाजी में फँस गई फातिमा नफीस

नसीब अहमद की अम्मी फातिमा नफीस का दुख समझ में आता है। कोई माँ अपने बेटे को खोने का गम कैसे भूले? वह लगातार कहती रही हैं कि उन्हें उनका बेटा चाहिए और जाँच एजेंसियाँ नाकाम रहीं। उन्होंने कहा, “मैं आखिरी साँस तक लड़ूंगी।” लेकिन उनका गुस्सा एबीवीपी और हिंदू संगठनों पर गलत है। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई सबूत नहीं मिला। उन्हें अब कोर्ट के फैसले को मान लेना चाहिए और सच को स्वीकार करना चाहिए। उनके दुख का इस्तेमाल प्रोपेगेंडा के लिए नहीं होना चाहिए।

नजीब अहमद का केस अब कानूनी तौर पर बंद हो गया है। कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। सीबीआई ने 9 छात्रों को क्लीन चिट दे दी है। लेकिन वामपंथी-इस्लामिक कट्टरपंथी गैंग अब इस पर भी राजनीति कर रहा है। इनका मकसद नजीब को इंसाफ दिलाना नहीं, बल्कि हिंदू संगठनों को बदनाम करना और राजनीति चमकाना है। इस गैंग को न सच्चाई से मतलब है, न न्याय से। इन्हें बस एक नया ‘रोहित वेमुला’ चाहिए, ताकि वे अपने झूठे एजेंडे को आगे बढ़ा सकें।

कोर्ट ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया है। अब लोगों को सच समझना चाहिए और प्रोपेगेंडा से बचना चाहिए। अब जरूरत है कि लोग सच्चाई को समझें और सवाल पूछें – कि नजीब का इस्तेमाल क्यों किया गया? उसके नाम पर हिंदू संगठनों को क्यों बदनाम किया गया? और क्यों एक माँ के दुख को राजनीतिक औजार बना दिया गया?

बरहराल, अगर कोई नया सबूत मिलता है, तो जाँच फिर शुरू हो सकती है, लेकिन अभी के लिए यह मामला खत्म हो गया है। लेकिन वामपंथियों, कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ये एक नई शुरुआत है।