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अजीब नाली वाला घर, झील में अक्षर और सपना… ऐसे हुई थी 14वें दलाई लामा की खोज: अब पुनः अवतार का किया ऐलान, कहा- ‘आजाद देश’ में होगा जन्म; भड़का चीन बोला- हम करेंगे डिसाइड

तिब्बती बौद्ध समुदाय के सबसे बड़े धर्मगुरु दलाई लामा ने ऐलान किया है कि उनका पद उनके निर्वाण के बाद भी जारी रहेगा। उन्होंने कहा है कि उनके जाने के बाद भी दलाई लामा का पद जारी रहेगा और नए दलाई लामा की खोज उनका ट्रस्ट करेगा। उन्होंने यह भी साफ़ कर दिया है कि उनका पुनः अवतार किसी ‘आजाद देश’ में होगा। दलाई लामा ने यह घोषणा अपने 90वें जन्मदिन से पहले की हैं। दलाई लामा के बयान पर चीन बौखला भी गया है।

दलाई लामा ने क्या कहा?

दलाई लामा द्वारा बुधवार (2 जुलाई, 2025) को इस संबंध में अपना बयान जारी किया है। इस बयान में उन्होंने कहा, “24 सितंबर 2011 को तिब्बती आध्यात्मिक परंपराओं के प्रमुखों की एक बैठक में, मैंने तिब्बत में और उसके बाहर रहने वाले साथी तिब्बतियों, तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों के सामने एक बयान दिया था। इसमें मैंने पूछा था कि क्या दलाई लामा की पदवी जारी रहनी चाहिए। 1969 में ही मैंने स्पष्ट कर दिया था कि यह सम्बन्धित लोगों को तय करना होगा कि यह जारी रहे या नहीं।”

उन्होंने 2011 में बताया था, “जब मैं लगभग 90 वर्ष का हो जाऊँगा तो मैं तिब्बती बौद्ध परंपराओं के लामाओं, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म का पालन करने वाले अन्य लोगों से विचार करूँगा कि दलाई लामा की संस्था जारी रहे या नहीं।”

दलाई लामा ने इस बयान में कहा कि उन्होंने कोई सार्वजनिक चर्चा नहीं की है कि लेकिन उनसे अलग-अलग जगह के तिब्बतियों और तिब्बती धर्म गुरुओं और यहाँ तक चीन के लोगों ने यह संस्था बनाए रखने का आग्रह किया है। उन्होंने कह़ा, ” इन सभी अनुरोधों के अनुसार, मैं पुष्टि कर रहा हूँ कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी।”

सर्वोच्च तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु ने यह भी स्पष्ट किया कि अगला दलाई लामा कौन होगा, इसकी प्रक्रिया 2011 में ही तय कर ली गई थी। उन्होंने कहा कि नए दलाई लामा का चुनाव करने की जिम्मेदारी केवल गादेन फोडरंग ट्रस्ट के लोगों पर होगी। यह दलाई लामा का कार्यालय है।

दलाई लामा ने कहा कि इस प्रक्रिया में और कोई दखल नहीं दे सकता है। उन्होंने नए दलाई लामा के चुनाव को लेकर यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी ‘आजाद देश’ में पैदा होंगे। दलाई लामा ने यह ऐलान 6 जुलाई, 2025 को उनके 90वें जन्मदिन से पहले हुए हैं।

दलाई लामा के ऐलान पर चीन भड़का

तिब्बत से बौद्धों और दलाई लामा को बाहर करके 1950 के दशक में कब्जा करने वाला चीन इस ऐलान के बाद भड़क गया है। उसने इसको लेकर एक बयान जारी किया है। चीन ने कहा है कि वर्तमान दलाई लामा के उत्तराधिकारी की नियुक्ति को चीनी सरकार से अनुमति लेनी होगी।

चीन ने यह भी कहा है कि नए दलाई लामा की पहचान भी उसी के यहाँ की जाएगी। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, “दलाई लामा, पंचेन लामा और अन्य महान बौद्ध हस्तियों के पुनर्जन्म का चयन सोने के कलश से लॉटरी निकालकर किया जाना चाहिए और चीन की केन्द्रीय कमिटी द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।”

चीन ने एक और बयान जारी किया है जिसमें उसने एक एक्सपर्ट ली देचेंग के हवाले से कहा है कि कभी भी पवित्र बौद्ध पदवियों का पुनर्जन्म उनके जीवित रहते डिसाइड नहीं होता। उसने कहा है कि यह दलाई लामा के मामले में सीधे सोने के बॉक्स से लॉटरी निकाल कर जारी होता है।

दलाई लामा को चुनने और उनकी नियुक्ति का क्या इतिहास रहा है, इसका पूरा इतिहास बखान करते हुए चीन ने 14वें और वर्तमान दलाई लामा का विरोध किया है।

चीन को दलाई लामा से क्या समस्या?

वर्तमान दलाई लामा 1950 के बाद तिब्बत से भारत आ गए थे। उनके साथ हजारों तिब्बती भी भारत आ गए थे। दलाई लामा तिब्बत के प्रमुख माने जाते हैं। लेकिन चीन के कब्जे खिलाफ जब तिब्बती सेना नहीं लड़ पाई, तो उन्होंने भारत आने का फैसला लिया और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार बनाई।

भारत आते दलाई लामा (फोटो साभार:Dalailama.com)

वह तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानते और कम्युनिस्ट सरकार की तिब्बत की संस्कृति मिटाने के प्रयासों के खिलाफ खड़े रहे हैं। तिब्बत की बौद्ध जनता का बड़ा हिस्सा उनके वहाँ से आने के 6-7 दशकों के बाद भी उनके प्रति समर्पित हैं। चीन, तिब्बत को अपना हिस्सा बताता है और दलाई लामा उसका विरोध करते हैं।

दलाई लामा ने चीन की नास्तिक सरकार से समझौता करने से इनकार भी कर दिया था। ऐसे में वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार उनके प्रति जहर उगलते रहती है। दलाई लामा के प्रति चीन की सरकार अपमानजनक शब्द भी उपयोग करती है। तिब्बत के लोगों को अपने पाले में करने के लिए वह दलाई लामा के विरोध में खड़ी है।

चीन ने तिब्बत में अपना प्रभाव जमाने को एक फर्जी पंचेन लामा भी नियुक्त किया हुआ है। पंचेन लामा तिब्बती बौद्ध धर्म में दूसरी सबसे बड़ी पदवी है। वर्ष 1995 में 6 वर्ष के एक बच्चे को दलाई लामा ने 11वां पंचेन लामा घोषित किया था। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने उन्हें किडनैप कर लिया और अपना आदमी उनकी जगह नियुक्त कर दिया।

दलाई लामा की नियुक्ति के मामले में भी चीन यही करना चाहता था लेकिन उन्होंने अब पुनः अवतार की बात करके चीन की नींद उड़ा दी है। इसलिए वह अलग-अलग तरह से प्रोपेगेंडा कर रहा है और उन्हें झुठलाने का प्रयास कर रहा है।

कैसे खोजा जाता है नया दलाई लामा?

तिब्बती बौद्ध धर्म में अब तक 14 दलाई लामा हुए हैं। सारे दलाई लामा बोधिसत्व का अवतार माने जाते हैं। दलाई लामा को खोजने के लिए एक प्रक्रिया पहले से ही निर्धारित है। यह प्रक्रिया दलाई लामा की मृत्यु के बाद चालू होती है। मृत्यु के बाद दुख का एक काल होता है, जिसके बाद नए दलाई लामा को ढूंढा जाता है।

यह काम तिब्बती बौद्ध धर्म के बड़े धर्मगुरु या लामा करते हैं। उनका एक समूह इसके लिए संकेतों का सहारा लेते हैं। नए दलाई लामा की तलाश के लिए, निवर्तमान दलाई लामा के अंतिम संस्कार के दौरना उनके सिर की दिशा, उनकी मृत्यु के समय उनके देखने की दिशा समेत तमाम ऐसे संकेत इस्तेमाल किए जाते हैं।

13वें दलाई लामा (फोटो साभार: The treasury of lives)

इसके बाद उस दिशा में तलाश के लिए बौद्ध धर्मगुरु और बाकी विद्वान जाते हैं। सामान्यतः, इन दिशाओं में और संकेत मिलते हैं तथा इसके बाद कुछ बच्चों को इस प्रक्रिया में सेलेक्ट किया जाता है। हालाँकि, असल दलाई लामा पहचानने के लिए मृत हुए दलाई लामा से जुड़ी बातें पूछी जाती हैं और उसने जुड़ी चीजें दिखाई जाती हैं।

बौद्ध धर्मगुरु पूरी संतुष्टि के बाद ही यह ऐलान करते हैं कि नए दलाई लामा का आगमन हो चुका है। दलाई लामा के मिलने के बाद उनकी शिक्षा दीक्षा होती है और उनकी ताजपोशी भी होती है। वर्तमान दलाई लामा को वर्ष 1937 में तिब्बत में ऐसी ही एक प्रक्रिया में ढूँढा गया था।

कैसे ढूंढे गए थे वर्तमान दलाई लामा?

वर्तमान दलाई लामा का जन्म 1935 में हुआ था। उनकी आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, दलाई लामा के माता-पिता छोटे किसान थे जो ज़्यादातर जौ, अनाज और आलू उगाते थे। उनके पिता मध्यम बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते थे।

बच्चे के तौर पर दलाई लामा

दलाई लामा के अनुसार, “मुझे याद है कि एक बार मैंने उनकी मूंछें खींची थीं और मेरी इस हरकत के लिए मुझे बहुत मारा गया था… फिर भी वे एक दयालु व्यक्ति थे और उन्होंने कभी किसी से द्वेष नहीं रखा।” दलाई लामा 7 भाई-बहन थे।

दलाई लामा बताते हैं, “किसी को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मैं एक साधारण बच्चे के अलावा कुछ और हो सकता हूँ। यह अकल्पनीय था कि एक ही परिवार में एक से ज़्यादा तुल्कु (लामा) पैदा हो सकते हैं और निश्चित रूप से मेरे माता-पिता को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि मुझे दलाई लामा घोषित किया जाएगा।”

उनकी तलाश के लिए 1937 में एक पार्टी भेजी गई थी। इस दौरान तिब्बती सरकार द्वारा दलाई लामा के नए अवतार को खोजने के लिए भेजा गया एक खोज दल कुंबुम बौद्ध मठ में पहुँचा। यह लोग कई संकेतों के आधार पर यहाँ पहुँचे थे।

इनमें से एक उनके पूर्ववर्ती, 13वें दलाई लामा की मौत के बाद मिला था। 13वें दलाई लामा थुप्तेन ग्यात्सो की शव ममीकरण प्रक्रिया के दौरान, सिर दक्षिण की ओर से उत्तर-पूर्व की ओर मुड़ा हुआ पाया गया। इसके बाद एक वरिष्ठ को एक स्वप्न आया।

इस सपने में उन्होंने दक्षिणी तिब्बत में पवित्र झील, ल्हामोई ल्हात्सो के पानी में तिब्बती अक्षरों आह, का और मा को तैरते हुए देखा। उन्हें इसके बाद एक तीन मंजिला इमारत और एक रास्ता भी दिखा। एक और सपने में उन्हें अजीब सी नालियों वाला एक खर दिखा।

यह पार्टी सपने में दिखे पहले अक्षर ‘अह’ के चलते आमदो राज्य गई। इसके बाद दूसरे अक्षर ‘क’ के चलते कुम्बुम मठ गई। इसके बाद वह आसपास के गाँवों में गए जहाँ उन्हें वर्तमान दलाई लामा का घर दिखा जो अजीब तरह की नालियों वाला था।

दलाई लामा, बौद्ध मठ में ले जाए जाने के बाद

इस सर्च पार्टी में शामिल लोगों ने इसके बाद वर्तमान दलाई लामा, जो तब 2 वर्ष के थे, को ध्यान से देखा और उनकी हरकतें नोटिस की। कुछ दिन बाद यह सर्च पार्टी वापस आई और उन्होंने 13वें दलाई लामा की चीजें भावी दलाई लामा को दिखाई। उन्होंने तुरंत ही यह पहचान ली, और कहा कि वह उनके हैं।

इसके कुछ वर्षों के बाद उन्हें ल्हासा ले जाया गया और बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ दी गईं।

पायलट, TS सिंहदेव, सिंधिया… ‘CM इन वेटिंग’ वाली लाइन में DK शिवकुमार भी शामिल: कर्नाटक में खूब इंतजार के बाद भी नहीं मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी, बोले- मेरे पास और ऑप्शन भी क्या?

कर्नाटक की सियासत में एक बार फिर डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने साफ कर दिया है कि वह पूरे पाँच साल तक अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। इस बयान ने शिवकुमार और उनके समर्थकों के अरमानों पर पानी फेर दिया। शिवकुमार ने मजबूरी में सिद्धारमैया का साथ देने की बात कही, लेकिन उनके बयान में छिपी निराशा साफ झलक रही थी।

चिक्कबल्लापुर में मीडिया से बातचीत में कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने सीएम सिद्धारमैया के बारे में कहा, “मेरे पास और क्या चारा है? मुझे उनके साथ खड़ा होना है और उनका साथ देना है। मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं है। पार्टी हाईकमान जो कहेगा, जो फैसला करेगा, वो पूरा होगा… मैं अभी इस पर कुछ बोलना नहीं चाहता। लाखों कार्यकर्ता इस पार्टी के साथ हैं।”

डीके शिवकुमार ने कहा कि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं, मुझे उनके साथ खड़ा होना ही है। यह बयान उनकी उस हताशा को दिखाता है, जो बार-बार हाईकमान के फैसलों से उपज रही है। दरअसल, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की सत्ता को मजबूत करने में शिवकुमार की मेहनत को कोई नकार नहीं सकता, फिर भी उन्हें बार-बार इंतजार करने को कहा जा रहा है। क्या वह हमेशा ‘सीएम इन वेटिंग’ बने रहेंगे या कोई बड़ा सियासी कदम भी उठा सकते हैं?

सिद्धारमैया का दावा और शिवकुमार की मजबूरी

सिद्धारमैया ने पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा, “हाँ, मैं मुख्यमंत्री बना रहूँगा। आपको क्यों शक है?” उन्होंने बीजेपी और जेडी(एस) पर नेतृत्व परिवर्तन की अफवाहें फैलाने का आरोप लगाया। दूसरी तरफ डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया के बयान के बाद कहा, “मुख्यमंत्री के सामने मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। मैंने किसी से मेरे पक्ष में बोलने को नहीं कहा।”

डीके ने यह भी जोड़ा कि कॉन्ग्रेस हाईकमान का जो भी फैसला होगा, वह उसे मानेंगे। लेकिन उनके इस बयान में वह जोश और आत्मविश्वास नहीं दिखा, जो पहले उनके भाषणों में झलकता था। यह साफ है कि हाईकमान ने एक बार फिर सिद्धारमैया को प्राथमिकता दी है और शिवकुमार को इंतजार करने को कहा गया है।

साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की जीत के बाद शिवकुमार को उम्मीद थी कि उन्हें सीएम की कुर्सी मिलेगी। उनकी मेहनत और संगठन कौशल ने पार्टी को 135 सीटें दिलाई थीं। सूत्रों की मानें तो उस वक्त ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले की बात हुई थी, जिसमें सिद्धारमैया और शिवकुमार बारी-बारी से सीएम बनते। लेकिन अब सिद्धारमैया ने साफ कर दिया है कि वह पूरे कार्यकाल तक कुर्सी नहीं छोड़ेंगे और हाईकमान ने भी इस पर मुहर लगा दी है।

जातीय समीकरण पर भी हाई कमान का ध्यान

कर्नाटक की सियासत में जाति का एंगल हमेशा से अहम रहा है। डीके शिवकुमार ताकतवर वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जो कर्नाटक की राजनीति में बड़ा प्रभाव रखता है। उनके समर्थकों का मानना है कि पार्टी ने उनके साथ नाइंसाफी की है। हाल ही में वोक्कालिगा समुदाय के कुछ धर्मगुरुओं ने भी शिवकुमार के पक्ष में बयान दिए थे। दूसरी तरफ सिद्धारमैया पिछड़े वर्ग (कुर्मी) से हैं, और उनका सामाजिक आधार भी मजबूत है। कॉन्ग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया को समर्थन देकर यथास्थिति बनाए रखने का फैसला किया।

कॉन्ग्रेस विधायक इकबाल हुसैन ने दावा किया था कि 100 से ज्यादा विधायक शिवकुमार को सीएम बनाने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा था कि अगर कॉन्ग्रेस को 2028 में सत्ता में वापसी करनी है, तो शिवकुमार को मौका देना होगा। लेकिन हाईकमान ने हुसैन को नोटिस थमाकर चुप करा दिया। यह दिखाता है कि पार्टी में अनुशासन की आड़ में शिवकुमार के समर्थकों को दबाया जा रहा है। कर्नाटक विधानसभा में कॉन्ग्रेस के 138 विधायक हैं, जिसमें से करीब 100 शिवकुमार के साथ माने जाते हैं। फिर भी हाईकमान ने सिद्धारमैया को प्राथमिकता दी।

हाईकमान की रणनीति में बहाना बना बिहार विधानसभा चुनाव

कॉन्ग्रेस हाईकमान ने इस पूरे मामले में सधी हुई चाल चली। सूत्रों के मुताबिक, बिहार चुनाव को सिद्धारमैया को बनाए रखने का बहाना बनाया गया। हाईकमान को डर है कि सिद्धारमैया को हटाने से बिहार में पिछड़े वर्ग के बीच गलत संदेश जाएगा और बीजेपी इसे भुनाएगी। साथ ही शिवकुमार के खिलाफ चल रही सीबीआई जाँच को भी फैसले में शामिल किया गया। 2019 में मनी लॉन्ड्रिंग केस में उनकी जेल यात्रा को याद दिलाकर कहा गया कि अगर वह सीएम बने, तो बीजेपी जाँच एजेंसियों को और सक्रिय कर सकती है, जिससे कॉन्ग्रेस को नुकसान हो सकता है।

यही नहीं, मल्लिकार्जुन खरगे ने सिद्धारमैया के पक्ष में फैसला लेते हुए यह भी सुनिश्चित किया कि उनके बेटे प्रियांक खरगे का नाम भी सीएम की दौड़ में बना रहे। सूत्रों का कहना है कि सिद्धारमैया ने शिवकुमार के सामने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने की शर्त रखी थी, लेकिन शिवकुमार ने इसे ठुकरा दिया। इसके बाद गेंद हाईकमान के पाले में गई और खरगे ने यथास्थिति बनाए रखने का फैसला किया।

क्या बागी बनेंगे डीके शिवकुमार?

शिवकुमार की स्थिति एमपी में ज्योतिरादित्य सिंधिया, छत्तीसगढ़ में टीएस सिंहदेव और राजस्थान में सचिन पायलट जैसी है, जिन्हें भी कॉन्ग्रेस ने लंबे समय तक इंतजार कराया। सिंधिया ने आखिरकार बगावत कर बीजेपी का दामन थाम लिया, जबकि पायलट ने धैर्य रखा। हालाँकि शिवकुमार ने अब तक तो कॉन्ग्रेस के प्रति वफादारी दिखाई है, लेकिन उनके समर्थकों में बेचैनी बढ़ रही है। वोक्कालिगा समुदाय का गुस्सा और उनकी अपनी महत्वाकांक्षा देर-सबेर कोई बड़ा सियासी तूफान ला सकती है।

क्या शिवकुमार बगावत करेंगे? यह संभावना कम लगती है, क्योंकि वह कॉन्ग्रेस के लिए कर्नाटक में एक मजबूत चेहरा हैं। लेकिन अगर हाईकमान बार-बार उनकी अनदेखी करता रहा, तो उनके धैर्य की भी सीमा टूट सकती है। फिलहाल उन्होंने हाईकमान के फैसले को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि यह शांति ज्यादा दिन नहीं टिकेगी।

अभी आगे बहुत कुछ होना बाकी

कर्नाटक की सियासत में यह ड्रामा अभी थमा नहीं है। सिद्धारमैया की कुर्सी फिलहाल सुरक्षित है लेकिन शिवकुमार और उनके समर्थकों की बेचैनी बनी रहेगी। अगर कॉन्ग्रेस 2028 के चुनाव में कमजोर प्रदर्शन करती है, तो शिवकुमार के लिए मौका बन सकता है। लेकिन अगर हाईकमान ने फिर से उनकी अनदेखी की, तो कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की एकता पर सवाल उठ सकते हैं। भविष्य में क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल डीके शिवकुमार को एक बार फिर इंतजार की सजा मिली है।

लैंड फॉर जॉब स्कैम में CBI ने लालू यादव को बताया ‘किंगपिन’, तो RJD नेता ने बता दिया ‘भगवान’ : भोलेनाथ, श्रीराम और परशुराम से कर दी तुलना

लालू प्रसाद यादव एक बार फिर सुर्खियों में हैं। सीबीआई ने उन्हें लैंड-फॉर-जॉब्स घोटाले का ‘किंगपिन’ बताया, जिसमें उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप को भी ‘लाभार्थी’ कहा गया। दूसरी तरफ, RJD की नेत्री और MLC उर्मिला ठाकुर ने लालू की तुलना भगवान शिव, भगवान राम और भीष्म पितामह से की और उन्हें ‘कलियुग का भगवान’ बता दिया।

सीबीआई ने लालू यादव को बताया घोटाले का किंगपिन

ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव को लैंड-फॉर-जॉब्स घोटाले का मास्टरमाइंड बताया है। सीबीआई ने कोर्ट में मंगलवार (1 जुलाई 2025) को दलील दी कि लालू ने रेलवे में नौकरियाँ देने के बदले जमीन ली।

लालू की पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप, बेटी मीसा भारती को भी इस घोटाले का ‘लाभार्थी’ बताया गया। सीबीआई का कहना है कि लालू के निजी सचिव ने उनके इशारे पर नौकरियों के लिए चुने गए लोगों की लिस्ट दी थी। दो गवाहों ने भी दावा किया कि लालू ने उन पर दबाव डाला था।

सीबीआई ने 78 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें लालू और उनके परिवार के लोग शामिल हैं। अब कोर्ट में लालू और अन्य आरोपी अपनी सफाई पेश करेंगे। इसके बाद कोर्ट फैसला करेगा कि मुकदमा शुरू होगा या नहीं। सीबीआई ने पहले भी लालू के खिलाफ दो चार्जशीट दाखिल की थीं, लेकिन अब सभी रेलवे जोन को मिलाकर अंतिम चार्जशीट दाखिल की गई है।

RJD MLC ने लालू को बताया ‘कलयुग का भगवान’

मुजफ्फरपुर में RJD की MLC उर्मिला ठाकुर ने लालू यादव को ‘कलियुग का भगवान’ कहकर सबको चौंका दिया। न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, गायघाट में बाबा साहब अंबेडकर की मूर्ति अनावरण के कार्यक्रम में उन्होंने लालू की तुलना भगवान शिव, भगवान राम और भीष्म पितामह से की।

उर्मिला ने कहा कि जैसे राम का स्थान कोई नहीं ले सकता, वैसे ही लालू का स्थान भी कोई नहीं ले सकता। उन्होंने लालू को राजनीति का भीष्म पितामह और दुनिया का सबसे बड़ा समाजवादी नेता बताया।

उर्मिला ने यह भी कहा कि लालू ने ही उन्हें MLC बनाया, वरना उनके पिता तो 5 किलो अनाज पर दाढ़ी बनाते थे। उन्होंने तेजस्वी की भी तारीफ की और कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए कहा कि 1990 से पहले सत्ता में रहने वाले अब कभी नहीं आएंगे। इस बयान पर बिहार के सियासी दलों में हलचल मच गई है।

हार्ट अटैक पर बंद हो अब ये भसड़,कोविड वैक्सीन के कारण नहीं हो रहीं अचानक मौतें: ICMR-AIIMS की स्टडी ने बताया- लाइफस्टाइल जैसे कई फैक्टर जिम्मेदार

हाल ही में बॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री शेफाली जरीवाला की महज 42 वर्ष की आयु में हार्ट अटैक से ही मृत्यु की बात दुनिया भर में फैली। इसके अलावा पंजाब में क्रिकेट खेल रहे एक खिलाड़ी की भी पिच पर ही हार्ट अटैक से मौत की खबर भी सामने आई। इसके बाद कोरोना की वैक्सीन की वजह से हार्ट अटैक और अचानक मौतों के मामलों की चर्चा फिर से शुरू हो गई।

हालाँकि बुधवार (2 जुलाई 2025) को PIB पर एक रिपोर्ट जारी हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि ICMR और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) की ओर से की गई स्टडी में ये पता चला है कि भारत में COVID-19 टीके काफी सुरक्षित और प्रभावी रहे हैं। इनके दुष्प्रभावों की कोई भी बात बहुत कम देखने को मिली है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, अचानक हृदयगति रुकने से हुई मौतें आनुवंशिक परेशानियों, आधुनिक जीवनशैली, पहले से मौजूद बीमारियाँ और कोविड के बाद हुई जटिलताओं में से कई कारणों से हो सकती हैं।

ICMR और NCDC ने 18 से 45 वर्ष की उम्र के युवाओं में अचानक होने वाली मौतों के कारणों को समझने के लिए रिसर्च शुरू की है। इसके तहत उन्होंने पहले के और वर्तमान जाँचों को भी शामिल किया गया। इसके तहत 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 47 टर्शियरी अस्पतालों में अध्ययन किया।

इसके तहत ICMR के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (NII) ने ‘भारत में 18-45 वर्ष की आयु के वयस्कों में अचानक होने वाली मौतों से जुड़े कारक’ शीर्षक पर आधारित एक स्टडी की।

मई से अगस्त 2023 तक इस स्टडी में उन लोगों को शामिल किया गया जो सामने से स्वस्थ दिख रहे थे लेकिन अक्टूबर 2021 और मार्च 2023 के बीच अचानक उनकी मृत्यु हो गई। स्टडी में ये बात निकल कर सामने आई कि कोविड-19 वैक्सीन से युवाओं और वयस्कों में अचानक होने वाली मौतों का जोखिम नहीं बढ़ता है।

इसी तरह ICMR की वित्तीय सहायता के साथ AIIMS ने भी एक अध्ययन किया जा रहा है। इसका विषय ‘युवाओं में अचानक होने वाली मौतों के कारणों का पता लगाना’ रखा गया है। इस अध्ययन के शुरुआती विश्लेषण से पता चला कि युवाओं में अचानक होने वाली मौतों का असल कारण हार्ट अटैक या दिल का दौरा पड़ने से होता है।

इन मौतों के बारे में सबसे अहम बात ये है कि हार्ट अटैक के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। यानी वैक्सीन से जुड़े किसी तरह के बदलाव वाले पैटर्न नहीं देखने को मिला। हालाँकि मरने वालों में आनुवंशिक बदलाव जरूर देखे गए हैं। ये अध्ययन अब भी जारी है। इसमें अन्य पहलू भी सामने आ सकते हैं।

मौतों पर फैलाई गई भ्रामक बातें

2019 में शुरू हुई कोरोना महामारी में दुनिया भर में अपना कहर बरपाया। कई देश अब तक कोरोना के नए वेरिएंट और उसकी भयावहता से जूझ रहे हैं।

कोरोना के मामले शुरू होने के बाद इससे बचाव के लिए वैक्सीन तैयार की गई जिसके कारण लाखों लोगों की जान भी बची। इस बीच 2021 से कई युवाओं की अचानक मौत होने लगी। ज्यादातर मामलों में कहा गया कि मौत का कारण हार्ट अटैक है।

धीरे-धीरे इन मौतों के लिए कोरोना वैक्सीन को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। प्रोपेगेंडा फैलाने वाले पत्रकारों समेत ज्यादातर लोगों ने यह मान लिया कि कोरोना वैक्सीन लगाए जाने के बाद से ही इन मौतों में इजाफा में देखा गया है।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कहा कि एक बड़े पैमाने पर डॉक्टर्स और रिसर्चर्स की टीम बनाई जानी चाहिए और इस बात का सर्वेक्षण और रिसर्च किया जाना चाहिए कि कोरोना की वैक्सीन लगाए जाने के बाद लोगों के शरीर में क्या परिवर्तन आए हैं।

विशेषज्ञों ने कहा- बिना वैज्ञानिक आधार की बातें

प्रोपेगेंडा फैला रहे लोगों के लिए वैज्ञानिकों की ये स्टडी एक तमाचा है। इस स्टडी के अधार पर वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड-19 के लिए बचावरोधी वैक्सीन को अचानक होने वाली मौतों से जोड़ने वाले बयान झूठे और भ्रामक हैं। इनके बयानों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। उमके कारण आम लोगों का भरोसा वैक्सीन पर कम हो रहा है।

इसी बीच कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी astrazeneca ने 2024 में ब्रिटिश कोर्ट में यह कबूल किया कि उनकी वैक्सीन के साइड इफेक्ट हैं और इससे हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक भी हो सकता है। इसके बाद तो मानो कॉविड वैक्सीन के नाम पर लोगों को डराए जाने का खेल चरम पर आ गया।

कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल से एक न्यूज़ क्लिप साझा करते हुए मोदी सरकार पर जनता की जान के साथ सौदा किए जाने का आरोप लगा दिया गया। ट्वीट में लिखा गया कि मोदी ने 52 करोड़ का चंदा लेकर लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया है।

पोस्ट में लिखा गया कि चंद पैसों के लिए देश की जनता की जान को जोखिम में डालने वाले दरिंदों को कॉन्ग्रेस की सरकार बनते ही उनकी असली जगह पहुँचा जाएगा।

इस तरह की बातें लिखकर लोगों के मन में भी कोरोना वैक्सीन को लेकर लगातार जहर बोया गया और उन्हें विश्वास दिला दिया गया कि उन्हें लगी वैक्सीन में ही कुछ गड़बड़ी है।

कोरोना महामारी के दौरान इसी वैक्सीन ने लाखों लोगों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में निराधार बातों पर रिपोर्ट और दावे दिखा कर देश में वैक्सीन को लेकर लोगों में असंतोष बढ़ाने से भविष्य की स्वास्थ्य आधारित किसी भी तरह की विपदा के लिए समस्याएँ और अविश्वास जैसी परिस्थितियाँ हो सकती है।

ब्रेनवॉश ऐसा कि 3 महिलाओं का रेप करने वाले पादरी की ‘दुल्हन’ बनने के लिए माँ-बाप को दुत्कारा, सुबह 5 बजे उठकर 7 घंटे पढ़ती थी बाइबिल: कहानी एक ‘कल्ट ब्राइड’ की

लिज कैमरून एक ऐसी लेखिका जिनकी किताब ‘कल्ट ब्राइड हाउ आई वाज ब्रेनवाश्ड – एंड हाउ आई ब्रोक फ्री’ एक बार फिर सुर्खियों में है। चैनल 7 ने स्पॉटलाइट कार्यक्रम के अंतर्गत ‘द कल्ट नेक्स्ट डोर’ नाम से उनकी कहानी पर डॉक्यूमेंट्री बनाई है।

दरअसल उनकी कहानी एक सच्चाई है जो 18 साल की उम्र में लिज कैमरून के ईसाइयत का प्रचार करने वाले ग्रुप और पादरी के चंगुल में फँसने और उसके निकलने को मार्मिक तरीके से बयाँ करती है।

शॉपिंग के दौरान दक्षिण कोरियाई लोगों से मिलीं

2011 में जब लिज 18 साल की शर्मीली लड़की थीं और ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के शॉपिंग मॉल में घूम रही थी। उनकी मुलाकात ईसाइयत का प्रचार करने वाली महिला यूजून से हुई। यूजून दक्षिण कोरिया से एक ग्रुप के साथ आई थी। ईसाइयत का प्रचार करने वाली संस्था से ये ग्रुप जुड़ा था। ये संस्था 70 देशों में ईसाइयत का प्रचार- प्रसार करता था। यूजून ने बहुत प्यार से लिज से बातें की और सामान्य से सवाल किए, मसलन तुम्हें ऑस्ट्रेलिया पसंद है या नहीं। अपने धर्म में आस्था है या नहीं । यूजून ने मेल आईडी ली और बातचीत करने लगी।

एक दिन यूजून ने कैमरून को चाय पर बुलाया । इस दौरान उसकी दोस्त भी मौजूद थीं। दोनों ने मिलकर बहुत प्यार से कैमरून से बातें की और खाना भी खिलाया। कैमरून उन दोनों से इंप्रेस हो गईं। अब कैमरून का यूजून के घर आना-जाना बढ़ गया। वह बाइबिल सेशन में भी जाने लगी।

कैमरून के मुताबिक, “मैं काफी खुश रहने लगी। कुछ महीनों में ही मैं सुबह 5 बजे उठ कर प्रार्थना करना और 6 बजे से उनके घर पर घंटों बाइबिल पढ़ने लगी।”

कैमरून के व्यवहार में आए बदलाव को माँ ने नोटिस किया और उससे बातें भी की।

कैसे ब्रेन वॉश किया गया?

धीरे-धीरे ग्रुप का रंग कैमरून पर चढ़ने लगा। उसका ब्रेनवॉश यहाँ तक किया गया कि यौन शोषण के लिए सजा पाए पादरी जोशुआ को वो मसीहा मानने लगीं। पादरी उस वक्त तीन महिलाओं के यौन उत्पीड़न के आरोप में दक्षिण कोरिया की जेल में बंद था।

कैमरून को ये बताया गया कि पादरी जोशुआ को गलत तरीके से कैद किया गया है। कैमरून को पादरी जोशुआ या चर्च से जुड़े सवाल पूछने की इजाजत नहीं थी। उसे ‘समझाने’ के लिए कई लड़कियाँ आती थीं।

2011 की बात है जब चर्च में ब्राइड फैशन शो का आयोजन हुआ। इसमें कैमरून ने भी हिस्सा लिया। कुछ दिनों बाद जेल से पादरी जोशुआ का खत आया जिसमें कहा गया कि पादरी कैमरून के प्यार करते हैं।

चर्च और संस्था में ऐसा माहौल था कि पादरी के पास जाना बहुत ‘बड़ी बात’ मानी जाती थी। ऐसी लड़कियों को ‘खास ब्राइडेल’ कहा जाता था। कैमरून को भी खुद पर गर्व हुआ। वह अब पादरी की खास ब्राइडेल बनने का सपना देखने लगीं।

चर्च द्वारा आयोजित फैशन शो ( फोटो साभार- द सन)

नवंबर आते-आते कैमरून पूरी तरह चर्च के चंगुल में फँस चुकी थी। उसने अपने माता-पिता का घर छोड़ दिया और ईसाइयत का प्रचार करने वाले दक्षिण कोरियाई ग्रुप के साथ रहने लगी। अब चर्च ही कैमरून की जिंदगी बन गई। दोस्तों से उसने बात करना भी बंद कर दिया।

पिता से मिलने नहीं दिया गया

जनवरी 2012 में कैमरून की माँ उसे समझाने और चर्च पर हुए नए रिसर्च की जानकारी देने के लिए उससे मिलीं। कैमरून डर गई लेकिन फिर ग्रुप ने उनका ब्रेनवॉश कर दिया। इसके बाद जब पिता कैमरून से मिलने आए तो उसे छुपा कर भगा दिया गया।

पहली बार पादरी जोशुआ से मिलीं कैमरून

कुछ सप्ताह बाद कैमरून अपने ग्रुप के साथ दक्षिण कोरिया के जेल में बंद पादरी जोशुआ से मिलने पहुँची। इस दौरान वो काफी नर्वस थी।

कैमरून के मुताबिक, “अचानक पादरी जोशुआ पहुँचा। उन्होंने कहा कि वो सबसे मिलकर काफी खुश हैं। इस दौरान मुझसे ‘आई लव यू’ कहा। लेकिन मैं उनसे किसी तरह का प्यार महसूस नहीं कर पा रही थी।”

पादरी ने सेक्स करने को कहा

कैमरून वापस आई तो उसे पादरी का खत मिला। उसे पादरी ने सेक्स करने के लिए आमंत्रित किया था। कैमरून मान गई। वह कहती हैं कि पादरी के साथ सेक्स के बाद उन्हें बुरा नहीं लगा, क्योंकि मसीहा के साथ सबकुछ ‘पवित्र’ था। इसी तरह कई दिन बीत गए।

कैमरून कहती हैं कि वो खुद को फिट रखने के लिए व्यायाम करने लगीं। ज्यादा व्यायाम करने, कम खाने और ज्यादा काम करने की वजह से वह बीमार पड़ गईं। कैमरून का काफी वजन घट गया। जनवरी 2012 में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और वो इटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो गई।

माँ ने मुझे बचाया- कैमरून

कैमरून कहती हैं कि माँ ने चर्च के बजाय मुझे अस्पताल से छुट्टी दिलवा कर घर ले गईं और मनोचिकित्सक से संपर्क किया।

दो दिन तक मनोचिकित्सक ये बताते रहे कि कैसे पादरी की संस्था ने उसका ब्रेनवॉश किया? कैसे वो लोग रणनीति बना कर लोगों को बरगलाते हैं? कैमरून को सच का पता चलने पर समझ में आया कि पादरी जोशुआ यानी जंग म्युंग-सोक तीन महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न के लिए जेल में बंद था।

कैमरून के मामले के उजागर होने और आरोप साबित होने के बाद 2023 में जंग म्युंग-सोक को रेप और यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया और उसे 23 साल और जेल की सजा हुई।

कैमरून को एहसास हुआ कि उन्हें कितना धोखा दिया गया था

2013 में पादरी जोशुआ के चंगुल से छूट कर धीरे-धीरे कैमरून अपने जीवन में आगे बढ़ने लगीं। कार्यक्रमों में जाकर जागरूकता फैलाना, दूसरे पीड़ितों की मदद करना उनके जीवन का मकसद बन गया। लिज कैमरून फिलहाल कैनबरा में रहती हैं। वो वकील भी हैं साथ ही मनोविज्ञान की डिग्री की पढ़ाई कर रही हैं।

चैनल 7 ने स्पॉटलाइट कार्यक्रम के अंतर्गत ‘द कल्ट नेक्स्ट डोर’ नाम से उनकी कहानी पर डॉक्यूमेंट्री बनाई है। उसको फिल्माने के लिए 2023 में कैमरून दक्षिण कोरिया गई। लिज इन दिनों कट्टरपंथियों का खुलासा, लोगों का ब्रेनवॉश करने के तरीके को दुनिया को बता रही हैं।

कर्नाटक के वाल्मीकि फंड घोटाले की CBI करेगी पूरी इन्वेस्टीगेशन, हाई कोर्ट ने दिया आदेश: कहा- निष्पक्ष जाँच के लिए किया ट्रांसफर, कॉन्ग्रेस के मंत्री को देना पड़ा था इस्तीफ़ा

कर्नाटक में हुए वाल्मीकि फंड घोटाले की पूरी जाँच अब CBI करेगी। अभी तक यह जाँच कर्नाटक की ही SIT के पास थी। कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह आदेश भाजपा नेताओं की याचिका पर दिया है। CBI इस मामले में अब तक सीमित बिन्दुओं पर जाँच कर रही थी।

मंगलवार (1 जुलाई, 2025) को मामले पर कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस M नागप्रसन्ना की बेंच ने भाजपा नेताओं बसनगौड़ा पाटिल यतनाल और अरविंद लिंबावली की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित SIT की जाँच पर्याप्त नहीं है।

हाई कोर्ट ने कहा कि अब इस मामले को CBI को सौंपा जाए ताकि निष्पक्ष जाँच हो सके। साथ ही हाई कोर्ट ने SIT को आदेश दिया कि वह इस केस से जुड़े सभी दस्तावेज CBI को सौंप दे। हाई कोर्ट ने CBI से पूरे मामले पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी माँगी है।

इस घोटाले से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी कार्रवाई की है। जून, 2025 में ED ने कॉन्ग्रेस सांसद ई तुकाराम के ठिकानों पर छापे मारे थे। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के तीन विधायकों, नारा भारत रेड्डी, जीएन गणेश और पूर्व मंत्री बी नागेंद्र के आवासों पर भी छापे मारे गए थे। बी नागेन्द्र को इस मामले में इस्तीफ़ा भी देना पड़ा था।

क्या है वाल्मीकि फंड घोटाला?

कर्नाटक सरकार KMVSTDC प्रदेश की जनजातीय जनता के कल्याण के लिए चलाती है। इसके अंतर्गत जनजातीय जनसंख्या के लिए रोजगार समेत विशेष योजनाएँ लाई जाती हैं। कर्नाटक सरकार इसके लिए अलग से बजट देती है। इसी महर्षि वाल्मीकि फंड में घोटाले की बात सामने आई थी।

यह पूरा मामला एक आत्महत्या से चालू हुआ था। मई, 2024 में इसी निगम से जुड़े एक 48 वर्षीय कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी मौत के बाद एक सुसाइड नोट मिला था। इसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके उच्चाधिकारियों ने उस पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वह निगम के खातों से पैसा ट्रांसफर करे।

उसने आरोप लगाया था कि यह काम निगम का पैसा हड़पने के लिए किया गया था। उसका आरोप था कि यह काम एक मंत्री के मौखिक आदेशों के आधार पर किया गया था। उसने अपने विभाग के अलावा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारियों पर भी आरोप लगाए थे। इसके बाद पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया था।

आत्महत्या करने वाले कर्मचारी चंद्रशेखर ने सुसाइड नोट में बताया था कि उसे उच्चाधिकारियों ने इस बात के लिए निर्देशित किया था कि वह निगम के एक खाते से दूसरे खाते में पैसा ट्रांसफर करने के लिए पत्र लिखे। यह पैसा यूनियन बैंक के वसंत नगर ब्रांच से एमजी रोड ब्रांच में डाला जाना था।

इसी के तहत वाल्मीकि निगम के खातों से निकाला गया पैसा इसके बाद अन्य खातों में भेज दिया गया। इस पूरे खेल में ₹187 करोड़ का लेनदेन हुआ। इसमें से लगभग ₹88 करोड़ अवैध खातों में भेजा गया। जब यह मामला खुला तो चंद्रशेखर डर गया और उसने आत्महत्या कर ली।

यह पूरा मामला सामने आने के बाद कई बैंक कर्मचारियों समेत KMVSTDC के कई कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई। इसके बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था। इस मामले में ED ने जाँच किया। जहाँ इस मामले में 25 लोगों को आरोपित बनाया गया था।

ED ने इस मामले में दायर चार्जशीट में बताया था कि बेल्लारी लोकसभा में लगभग 7 लाख वोटरों को इस फंड में घोटाले के पैसे से रिश्वत दी गई। यह रिश्वत उन्हें कॉन्ग्रेस को वोट देने के लिए दी गई। यह पैसा बी नागेन्द्र ने महर्षि वाल्मीकि जनजातीय विकास निगम में घोटाला करके जुटाया था।

बेल्लारी में ₹14 करोड़ की रिश्वत

ED ने बताया था कि बेल्लारी में 7 लाख वोटरों को लगभग ₹200 की रिश्वत दी गई। ED ने कहा था कि घोटाले के पैसे से चुनाव प्रभावित करने की कोशिश की गई। ED ने यह खुलासा बी नागेन्द्र के पूर्व निजी सचिव विजय गौड़ा के फोन की जाँच के बाद किया था। उसमें बेल्लारी में पैसा खर्च होने के सबूत मिले थे।

ED ने आरोप लगाया था कि बी नागेन्द्र के पास इस घोटाले का अधिकांश पैसा आया। ED को विजय गौड़ा ने बताया था कि उसने घोटाले का यह पैसा नागेन्द्र के कहने पर कई लोगों में बाँटा जो कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए थे। यहाँ कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार ई तुकाराम के लिए घोटाले का पैसा उपयोग किया गया।

यह भी आरोप ED ने लगाया था कि बूथ पर काम करने वाले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को ₹10000 इस घोटाले के पैसे से दिए गए। नागेन्द्र के घोटाले का यह पैसा बंटवाने में कॉन्ग्रेस के विधायकों ने भी सक्रिय रोल निभाया, यह भी ED ने बताया था। जाँच एजेंसी बताया था कि घोटाले में से लगभग ₹15 करोड़ का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया गया।

ED के पास पैसे से लेनदेन की फोटो भी मौजूद हैं। चार्जशीट में यह भी कहा गया था कि बी नागेन्द्र ने इन आरोपों पर कोई साफ़ जवाब नहीं दिया है। बी नागेन्द्र ने बचने के लिए तीन आईफोन तोड़े हैं। ED ने यह भी आरोप लगाए हैं कि बी नागेन्द्र ने जब पैसों की गड़बड़ी की तो इसे वित्त विभाग ने भी नहीं चेक किया।

चुनाव बिहार का, पर तेजस्वी से लेकर पप्पू तक बजा रहे वक्फ-शरिया की डफली: विकास-संविधान से नहीं सरोकार, मुस्लिमों को उकसा कर ‘ध्रुवीकरण’ ही RJD-कॉन्ग्रेस-ओवैसी का एजेंडा

पटना के गाँधी मैदान में रविवार (29 जून 2025) को ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ नाम से एक बड़ी रैली हुई। इस रैली का आयोजन इमारत-ए-शरिया नाम के एक मजहबी संगठन ने किया था। इसका मकसद था वक्फ संशोधन बिल 2025 का विरोध करना। इस रैली में बिहार की विपक्षी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हुए जैसे तेजस्वी यादव, पप्पू यादव और AIMIM के अख्तरुल ईमान।

दरअसल, पटना के गाँधी मैदान में आयोजित ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली सिर्फ वक्फ बिल के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसके पीछे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की सियासत है। आइए, समझते हैं कि ये रैली थी क्या और क्यों, इसका असली मकसद क्या था और इसने बिहार की सियासत को कैसे गर्म कर दिया।

गाँधी मैदान की रैली में क्या – क्या कहा गया

रविवार को पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में हजारों लोग जमा हुए, खासकर मुस्लिम समुदाय के लोग। रैली में नेताओं ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोला। तेजस्वी यादव ने कहा, “ये देश किसी के बाप का नहीं है। ये हम सबका हिंदुस्तान है।” उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो न सिर्फ वक्फ की संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है, बल्कि मुस्लिमों, पिछड़ों और दलितों के वोट देने के अधिकार को भी छीनने की साजिश रच रही है। तेजस्वी ने ऐलान किया कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी, तो वो इस वक्फ संशोधन कानून को लागू नहीं होने देंगे।

गाँधी मैदान की रैली में मंच पर बैठे तेजस्वी और इस्लामी नेता (फोटो साभार : X_yadavtejashwi)

AIMIM के नेता अख्तरुल ईमान ने इस बिल को अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये कानून वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और जिलाधिकारियों को ज्यादा ताकत देता है।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान खान प्रतापगढ़ी ने शेरो-शायरी के साथ अपनी बात रखी और कहा, “ये बिल मुसलमानों को मंजूर नहीं है। ये हमारी बर्बादी का कारण बनेगा।” वहीं, निर्दलीय सांसद मगर कॉन्ग्रेस नेता पप्पू यादव ने मंच से खूब माहौल बनाने की कोशिश की।

वीआइपी पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने कहा कि जैसे मछली को पानी चाहिए, वैसे ही मुसलमानों को वक्फ बोर्ड चाहिए। उन्होंने बीजेपी पर मुस्लिमों की विरासत लूटने का इल्जाम लगाया।

सीपीआई माले के दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये बिल पूरे हिंदुस्तान पर हमला है और इसे रोकने के लिए नफरत फैलाने वालों को सत्ता से हटाना होगा। राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ फैसला उनके पक्ष में आएगा। कुल मिलाकर रैली में काफी भड़काऊ बयानबाजी हुई, जिसमें शरिया, वक्फ और मुस्लिम अधिकारों की बातें जोर-शोर से उठीं।

वक्फ बिल क्या है और विवाद क्यों?

वक्फ का मतलब है वो संपत्ति जो मुस्लिम समुदाय के मजहबी, सामाजिक या शैक्षिक कामों के लिए दी जाती है – जैसे मस्जिद, कब्रिस्तान या स्कूल। वक्फ बोर्ड इन संपत्तियों को संभालता है। केंद्र सरकार ने 2025 में वक्फ कानून में कुछ बदलाव किए, जिसे वक्फ संशोधन बिल कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने, महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने और वक्फ संपत्तियों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए हैं। इस बिल को बनाने से पहले संसदीय समिति, मुस्लिम संगठनों और कई लोगों से सलाह ली गई थी। सरकार कहती है कि कोई कानून थोपा नहीं गया।

लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये बिल वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। उनका इल्जाम है कि बीजेपी इस बिल के जरिए मुस्लिमों की संपत्ति पर कब्जा करना चाहती है और उनके वोट देने के हक को भी कमजोर कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस बिल की वैधता पर सुनवाई चल रही है और फैसला अभी तक नहीं आया है।

बिहार में इस्लामी सियासत का POWER GAME

बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटों पर मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। इन सीटों पर 20 से 40 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। बिहार में कुल 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो किसी भी पार्टी का खेल बना या बिगाड़ सकती है। यही वजह है कि विपक्षी पार्टियाँ जैसे आरजेडी, कॉन्ग्रेस और AIMIM इस रैली के जरिए मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने में जुट गईं।

विपक्ष बीजेपी पर सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की सियासत करने का इल्जाम लगाता है। लेकिन इस रैली को देखकर लगता है कि खुद विपक्ष ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहा है। वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर ये पार्टियाँ मुस्लिम समुदाय को भड़काने और अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं। तेजस्वी यादव ने रैली में कहा, “हम मुस्लिम समाज के साथ हैं और उनकी लड़ाई अंतिम साँस तक लड़ेंगे।” ये बयान साफ दिखाता है कि उनका मकसद मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

वक्फ के बहाने सक्रिय हुई AIMIM

बता दें कि पिछले यानी साल 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने बिहार में 5 सीटें जीती थीं, खासकर सीमांचल इलाके में। सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में 24 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 12 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। AIMIM की जीत ने विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन) का खेल बिगाड़ा था, क्योंकि उनके वोट बँट गए। इस बार भी AIMIM वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।

इमारत-ए-शरिया और मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी

इस रैली के पीछे इमारत-ए-शरिया और इसके प्रमुख मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी का बड़ा रोल रहा। मौलाना ने वक्फ संपत्तियों की रक्षा के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाया। उन्होंने 5 करोड़ ईमेल के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुँचाई। हालाँकि वो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से निकाले जा चुके हैं और उनकी इस रैली को भी AIMPLB ने समर्थन नहीं दिया। AIMPLB ने साफ कहा कि वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहता, इसके बावजूद इस मजहबी संगठन के मंच पर सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ न सिर्फ मौजूद रही, बल्कि अपने-अपने अंदाज में मुस्लिमों से समर्थन भी माँग लिया।

बिहार में असली मुद्दा क्या होना चाहिए?

बिहार के चुनाव में स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, उद्योग और विकास की बात होनी चाहिए। लेकिन इस रैली में सिर्फ वक्फ और मजहबी मुद्दों पर जोर रहा। विपक्षी पार्टियाँ मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। बीजेपी पर ध्रुवीकरण का इल्जाम लगाने वाले ये लोग खुद मजहबी आधार पर वोट माँग रहे हैं। ये रैली इसका सबूत है।

मुस्लिम समुदाय में भी कई सवाल हैं। जैसे, वक्फ बोर्ड की अरबों की संपत्ति का फायदा आम मुसलमान को क्यों नहीं मिलता? शिया और सुन्नी बोर्ड अलग-अलग क्यों हैं? गाँधी संग्रहालय के संयुक्त सचिव और मुस्लिम स्कॉलर आसिफ वासी कहते हैं, “वक्फ बिल का ज्यादा असर नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट 18 पार्टियों में बँटा हुआ है। 18 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, तो 78 फीसदी गैर-मुस्लिम वोट भी हैं।” उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति से आम मुसलमान को आज तक कोई खास फायदा नहीं हुआ।

वक्फ रैली पर बीजेपी और जेडीयू की प्रतिक्रिया रही तीखी

पटना की इस रैली पर बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा और लोकतांत्रिक परंपराओं को चुनौती देने वाला कदम बताया। सिन्हा ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल संसद की माँग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर पारित हुआ है। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाना और उनके गलत इस्तेमाल को रोकना है। उन्होंने साफ किया कि इस कानून में मजहबी स्वतंत्रता पर कोई आँच नहीं आती। गैर-मुस्लिम सदस्यों की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक होगी, न कि मजहबी।

सिन्हा ने राजद-कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि ये पार्टियाँ वोटबैंक की सियासत के लिए भ्रम और अराजकता फैलाना चाहती हैं। उन्होंने 2013 के वक्फ कानून का जिक्र किया, जब रातोंरात दिल्ली की 120 से ज्यादा वीवीआईपी संपत्तियाँ वक्फ को सौंप दी गई थीं। सिन्हा ने कहा कि अब ऐसी मिलीभगत की संस्कृति नहीं चलेगी।

बिहार बीजेपी ने इस रैली में तेजस्वी यादव के बयान पर सीधा निशाना साधा। बिहार बीजेपी ने लिखा, “तेजस्वी यादव की गाँधी मैदान रैली का असली एजेंडा अब सामने आ गया है। मंच से अब बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की नहीं, बल्कि शरीया और शरीयत की बातें हो रही हैं। क्या तेजस्वी और राहुल गाँधी बिहार को संविधान नहीं, शरीयत से चलाना चाहते हैं? देश को बाँटने वाली इस खतरनाक राजनीति का जवाब जनता 2025 में देगी। बिहार बाबा साहब के संविधान से चलेगा, शरीयत से नहीं।”

बिहार के मंत्री जमा खान ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में कुछ भी बोल रहे हैं, बिना ये सोचे कि उनकी बातें समाज में सौहार्द बिगाड़ सकती हैं। खान ने कहा कि विपक्ष खासकर राजद और कॉन्ग्रेस मुस्लिम समुदाय को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहार की जनता नीतीश कुमार पर भरोसा करती है। जमा खान ने रैली को सियासी मंच बताते हुए कहा कि ये सिर्फ भावनाओं को भड़काने की कोशिश थी, लेकिन 2025 में एनडीए फिर से सरकार बनाएगी, क्योंकि जनता सच्चाई जानती है।

लालू और नीतीश में मुस्लिम वोटर किसके साथ?

बिहार में वक्फ बिल का मुद्दा इसलिए भी गर्म है, क्योंकि यहाँ 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो चुनाव में बड़ा रोल अदा करती है। इस मुद्दे पर दो बड़े नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की साख दाँव पर है। लालू की पार्टी राजद हमेशा से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के सहारे सियासत करती रही है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपनी ‘सेकुलर’ छवि और सभी समाज के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए बिहार में मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग हमेशा उनके समर्थन में रहा है।

90 के दशक में लालू और नीतीश एक साथ थे और दोनों को सेकुलर माना जाता था। लेकिन 2005 में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और अपनी अलग पहचान बनाई। उस वक्त मुस्लिम वोटरों ने उनका साथ दिया। 2005 में जेडीयू के 4 मुस्लिम विधायक जीते, 2010 में 7, और 2015 में 5। लेकिन 2020 के चुनाव में नीतीश का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जो दिखाता है कि मुस्लिम वोटरों में उनकी लोकप्रियता घटी है। वक्फ बिल पर जेडीयू के समर्थन ने इस नाराजगी को और बढ़ाया है।

सीमांचल का सियासी समीकरण

सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया मुस्लिम बहुल हैं। यहाँ की 24 विधानसभा सीटों में से 12 पर मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। 2020 में एनडीए ने 11 सीटें जीतीं, महागठबंधन को 8 मिलीं और AIMIM ने 5 सीटें हासिल कीं। अब वक्फ संसोधन कानून के बहाने इस बार राजद और AIMIM इसी वोटबैंक पर नजर जमाए बैठे हुए हैं।

‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी। ये रैली दिखाती है कि राजद, कॉन्ग्रेस और AIMIM जैसी विपक्षी पार्टियां मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये पार्टियाँ वाकई मुस्लिम समुदाय की भलाई चाहती हैं या सिर्फ वोटबैंक की सियासत कर रही हैं? बिहार के 18 फीसदी मुस्लिम वोटर इस चुनाव में किसके साथ जाएँगे, ये वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि इस रैली ने बिहार के चुनाव को मजहबी रंग दे दिया है। रोजगार, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों की जगह वक्फ जैसे मुद्दों ने सियासत को गर्म कर दिया है और ये देखना बाकी है कि इसका असर चुनाव में कैसे दिखेगा।

अतीक अहमद का रिश्तेदार पप्पन पीर हिन्दू टीचर पर बना रहा धर्मांतरण का दबाव, 5 साल की बेटी को ‘अल्लाह-अल्लाह’ बोलना सिखाया: पूरे परिवार को पहले ही कबूल करवाया इस्लाम, UP के बदायूँ में दर्ज हुई FIR

उत्तर प्रदेश के बदायूं में एक हिंदू शिक्षिका ने आरोप लगाया है कि उन्हें और उनकी 5 साल की बेटी को इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यह आरोप पप्पन पीर पर लगा है। पुलिस ने पप्पन पीर के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

पूरा परिवार धर्मांतरण के चंगुल में

जानकारी के अनुसार, हिंदू शिक्षिका ने बताया, “पप्पन पीर ने मेरे पति, ससुर और सास का पहले ही धर्मांतरण करवा दिया है। अब वह मुझ पर भी इस्लाम कबूल करने का दवाब बना रहा है।” हिंदू शिक्षिका ने आगे बताया कि वे आए दिन धमकी देते रहते हैं, या तो इस्लाम कबूल करो वरना पति को तलाक दे दो।

हिंदू शिक्षिका ने बताया कि पप्पन पीर ने अतीक अहमद और अरशद के नाम से धमकी दी गई है। इसके अलावा जेल से भेजे गए पन्नों के स्क्रीनशॉट भी दिखाए गए।

अतीक अहमद का रिश्तेदार हूँ- पप्पन पीर

हिंदू शिक्षिका ने आगे बताया कि पप्पन पीर कई सालों से ससुराल आता-जाता रहता था। पप्पन पीर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ बरगलाता रहता है और कहता था कि इस्लाम में केवल एक ही भगवान है। पप्पन पीर ने यह भी कहा कि वे अतीक अहमद के साले सद्दाम का रिश्तेदार है।

हिंदू शिक्षिका ने बताया, “मेरे पति पप्पन पीर को बहुत मानते हैं और पिछले 1.5 साल से मिले नहीं है। जब मैं पति को ढूँढ़ते हुए पप्पन पीर के घर गई तो उन्हें वहाँ नमाज पढ़ते हुए देखा। पप्पन पीर ने मेरी बेटी को ‘अल्लाह-अल्लाह’ कहना भी सीखा दिया है।

पुलिस कार्रवाई और आरोप

हिंदू शिक्षिका के पति ने 8 अप्रैल 2024 को मौलवी के कहने पर तलाक के लिए अर्जी दी और उनकी सास ने भी 3 अप्रैल 2025 को घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया।

हिंदू शिक्षिका ने बताया कि पप्पन पीर के दबाव के कारण पुलिस ने शुरू में कोई कार्रवाई नहीं की। अब जाकर 30 जून 2025 को सर्किल ऑफिसर सिटी से मदद माँगी।

सरकार के आदेश के बाद 1 जुलाई 2025 की शाम को सिटी कोतवाली पुलिस ने पप्पन पीर के खिलाफ FIR दर्ज की और मामले की जाँच कर रही है।

मोदी सरकार में रेलवे के मैप पर आ रहे पूर्वोत्तर राज्य, 2014 के बाद 300% ज्यादा पैसा किया खर्च: अब ‘सेवेन सिस्टर्स’ की राजधानियाँ भी जुड़ेंगी, सिक्किम में पहली बार पहुँचेगी रेलगाड़ी

पिछले ग्यारह वर्षों में पूर्वोत्तर क्षेत्रों का विकास उल्लेखनीय रहा है। देश की मुख्य धारा से दूर अविकसित माने जाने वाले 7 सिस्टर्स में मोदी सरकार ने विकास की ऐसी बयार बहाई है कि हर राज्य रेलवे कनेक्टिविटी से जुड़ गया है। भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण इस क्षेत्र में विकास की आँधी आ गई है।

कुछ साल पहले मोदी सरकार ने बहु चरणीय कनेक्टिविटी परियोजना शुरू की थी। इसका मकसद 7 सिस्टर्स और वन ब्रदर्स की राजधानियों को एक-दूसरे से जोड़ना था। इसका रिजल्ट अब सामने आ रहा है। 2025 के अंत तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा और मणिपुर की राजधानी इंफाल के बीच रेलवे कनेक्टिविटी बन जाएगी। इसके अलावा मिजोरम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश का पासीघाट तक रेलवे नेटवर्क बिछ जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि 2029 तक पूर्वोत्तर के सारे राज्य एक-दूसरे से रेलवे के माध्यम से भी जुड़ जाएँगे।

केंद्र सरकार के ‘एक्ट ईस्ट’ के तहत बुनियादी ढाँचे पर आधारित विकास यहाँ किया जा रहा है। मिजोरम में बैराबी-सैरांग लाइन, नागालैंड में दीमापुर-जुब्ज़ा लाइन, सिक्किम में सेवोके-रंगपो परियोजना और असम में अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने वाला इंजीनियरिंग चमत्कार बोगीबील ब्रिज जैसी प्रमुख रेलवे परियोजनाओं ने भारत की सात बहनों और एक भाई के बीच का रिश्ता और मजबूत किया है।

मोदी सरकार का रणनीतिक प्रयास, विजन और नीति

2014 से ही भारत सरकार पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों के साथ जोड़ने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कनेक्टिविटी के माध्यम से विकास’ के तहत बुनियादी ढाँचे का विकास और रेलवे का विस्तार कर रही है। इस विजन को पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान और नॉर्थ ईस्ट स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम (NESIDS) जैसी नीतियों से और बढ़ावा मिला है। इस स्कीम का मकसद कनेक्टिविटी की कमी को पूरा करना है।

रेल मंत्रालय के अनुसार पूर्वोत्तर में रेल परियोजनाओं के लिए पूँजी वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2023-24 तक 370% से अधिक बढ़े हैं। इसका फायदा नई रेलवे लाइनों, गेज परिवर्तन, विद्युतीकरण और पटरियों के दोहरीकरण में हो रहा है।

धनसिरी-दीमापुर-जुब्जा रेलवे लाइन

कई दशकों तक नागालैंड रेलवे नेटवर्क से दूर रहा। हालाँकि दीमापुर रेलवे नेटवर्क में जुड़ा रहा है। अब दीमापुर-जुब्जा (कोहिमा) रेलवे लाइन पर कई सालों से काम चल रहा था। पिछले दशक में इस पर तेजी से काम हुआ। इस परियोजना पर 6,663 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। 82.5 किलोमीटर लंबी यह लाइन सिर्फ दीमापुर और राजधानी कोहिमा को ही नहीं जोड़ेगी बल्कि धनसिरी, शोखुवी, मोल्वोम, फेरिमा, पिफेमा जैसे कई शहरों कस्बों को जोड़ेगी। इसमें 37 सुरंगे, 24 पुल, 156 छोटे पुल, 5 रोड ओवर ब्रिज और 15 रोड अंडर ब्रिज बनाए जा रहे हैं।

जब यह लाइन चालू हो जाएगी, तो इससे यात्रा में समय कम लगेगा और कृषि उपज, पारंपरिक शिल्प और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। 2026 तक नागालैंड की राजधानी कोहिमा प्रमुख रेल हब बनने जा रहा है। यह परियोजना शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार तक पहुँच के माध्यम से राज्य के जनजातीय समुदायों को सशक्त बना रही है।

सिक्किम की पहली रेलवे परियोजना

सात बहनों में से एक सिक्किम आखिरकार राष्ट्रीय रेलवे नेटवर्क से जुड़ने के लिए तैयार है। 44.96 किलोमीटर लंबी इस परियोजना में कुल 5 स्टेशन हैं। सिक्किम में प्रवेश करने से पहले यह पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग जिलों के घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसमें 14 सुरंगें और 28 पुल बनाए गए हैं और इसे 2027 तक पूरा करने की योजना है।

यह रेलवे लाइन गंगटोक के पास के सीमावर्ती शहर रंगपो को भारतीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ेगी। इस परियोजना को गंगटोक तक पहुँचाने की भी बात की जा रही है। यह लाइन पर्यटन और बागवानी आधारित उद्योगों को काफी बढ़ावा देगा, साथ ही भारत-चीन सीमा तक भारतीय सेना को पहुँचने में आसानी होगी ।

बोगीबील पुल इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल

असम से अरुणाचल को जोड़ने के लिए बना बोगीबील ब्रिज इंजीनियरिंग की अनोखी मिसाल है। ये ब्रह्मपुत्र नदी पर बना भारत का सबसे लंबा रेलवे और सड़क पुल की मिलीजुली परियोजना है।

दिसंबर 2018 में बनकर तैयार हुआ यह 4.94 किलोमीटर लंबा ढाँचा असम के उत्तरी तट पर स्थित धेमाजी को दक्षिण में डिब्रूगढ़ से जोड़ता है। ये अप्रत्यक्ष रूप से अरुणाचल प्रदेश से जुड़ता है। इससे असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच यात्रा का समय काफी कम हो गया है।

पुल बनने से पहले डिब्रूगढ़ से ईटानगर जाने वाले लोगों को सड़क मार्ग से 24 घंटे का समय लगता था, लेकिन अब यह यात्रा सिर्फ 6 घंटे में पूरी हो जाती है। इस पुल का सामरिक सैन्य महत्व भी है क्योंकि ये चीन सीमा से लगे वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के नजदीक है।

अरुणाचल प्रदेश तक पहुँचा ट्रेन

अरुणाचल प्रदेश में 2013 तक कोई रेल संपर्क नहीं था। 2014 में उद्घाटन किए गए नाहरलागुन रेलवे स्टेशन ने राज्य में रेल आवागमन की शुरुआत हुई। ये स्टेशन ईटानगर से सिर्फ 15 किमी दूर है। नाहरलागुन से गुवाहाटी और दिल्ली तक इंटरसिटी सेवाओं ने न केवल यात्रा के समय को कम किया है, बल्कि पूर्वोत्तर को दिल्ली से जोड़ा भी है।

इसके अलावा सरकार ने 200 किलोमीटर लंबी भालुकपोंग -तवांग रेलवे लाइन को मंजूरी भी दे दी है।

मेघालय और मिजोरम का रेल कनेक्शन

मेघालय की राजधानी शिलांग और मिजोरम की राजधानी आइजोल पूर्वोत्तर के प्रशासनिक केंद्र हैं, लेकिन दशकों तक यहाँ रेलवे कनेक्टिविटी की कमी रही। तेतेलिया-बिरनीहाट लाइन से अब शिलांग को भारतीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की उम्मीद है।
पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत 51.38 किलोमीटर लंबी परियोजना बैराबी- सैरांग रेलवे लाइन आइजोल को सीधे भारत के नेटवर्क से जोड़ रहा है। इसमें 55 बड़े पुल, 87 छोटे पुल और 23 सुरंगें शामिल हैं। 2025 में ये परियोजना पूरी होने जा रही है।

त्रिपुरा और मणिपुर तक रेलवे नेटवर्क

2014 के बाद त्रिपुरा में रेलवे नेटवर्क का विकास हुआ। अगरतला-अखौरा रेल परियोजना भारत को बांग्लादेश से जोड़ती है। इसके 2025 में पूरा होने की संभावना है।

मणिपुर में जिरीबाम-इम्फाल रेलवे लाइन निर्माणाधीन है। 111 किलोमीटर से ज्यादा लंबी यह लाइन पहली बार इम्फाल को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ेगी। इससे मणिपुर की राजधानी में सामान और पर्यटक आसानी से पहुँच सकेंगे। ये परियोजना 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है। इस ट्रैक का 70% से ज़्यादा हिस्सा सुरंगों से होकर गुज़रेगी। म्यांमार से सटे होने की वजह से मणिपुर में इसका सामरिक महत्व भी है।

आर्थिक और रणनीतिक फायदा

इन परियोजनाओं का असर बहुआयामी है। पर्यटन, शिक्षा, बागवानी आदि के विकास में इनका काफी महत्व है। नागालैंड के संतरे, मेघालय के अनानास और मिजोरम के बाँस के हस्तशिल्प जैसे स्थानीय उत्पादों को विश्वस्तर पर ले जाने में इससे काफी मदद मिलेगी।

पिछले एक दशक से ज्यादा समय से पूर्वोत्तर भारत में रेलवे के बदलाव की असली कहानी सिर्फ पटरियाँ और सुरंग, पुल ही नहीं कह रहे, बल्कि इसका असर काफी गहरा है। ये परियोजनाएं उन लोगों पर सीधा असर डाल रही हैं जो पहले खुद को उपेक्षित समझते थे। नया रेल नेटवर्क पूर्वोत्तर की जीवन रेखा बन गई है। जैसे-जैसे भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, पूर्वोत्तर की भागीदारी भी बढ़ रही है और देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है।

11 लोग भगदड़ में दब कर मरे, तब कॉन्ग्रेस सरकार को नियमों की आई याद: हाई कोर्ट की लताड़ के बाद भीड़ प्रबन्धन पर कर्नाटक ने जारी की गाइडलाइंस

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरू (आरसीबी) ने 18 वर्षों में पहली बार इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की ट्रॉफी जीती। इसके बाद 4 जून 2025 को बेंगलुरू में इसका जश्न मनाने की तैयारी की गई। इसके लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम में लाखों की भीड़ इकट्ठा हो गई। इसके बाद वहाँ भगदड़ मची जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी और 56 लोग घायल हो गए थे।

अब कर्नाटक सरकार ने 1 जुलाई 2025 को किसी भी कार्यक्रम के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP ) तैयार किया है। साथ ही साथ बेंगलुरू भगदड़ पर जाँच भी चल रही है। इसके तहत केंद्रीय प्रशासनिक के न्यायाधिकरण (CAT ) ने चिन्नास्वामी स्टेडियम में भगदड़ के लिए आरसीबी को भी दोषी ठहराया है।

SOP में क्या होगा?

कर्नाटक सरकार ने भीड़ प्रबंधन के लिए एक विस्तृत SOP (Standard Operating Procedure) जारी किया है। इसका उद्देश्य भविष्य में भगदड़ जैसी घटनाओं को रोकना और सार्वजनिक समारोह में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। SOP के तहत पुलिस के आला-अफसरों को किसी भी आयोजन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए आयोजकों से संपर्क करना होगा।

SOP में कार्यक्रम की रूपरेखा के साथ आयोजन की तारीख और सही समय होना जरूरी है। इसके साथ ही कार्यक्रम में कितनी भीड़ आ सकती है। उसके अनुसार जगह पर्याप्त है कि नहीं। समारोह स्थल में प्रवेश और निकास के लिए समुचित रास्ते के साथ आपातकालीन निकासी के बारे में जानकारी जरूरी होगी। आयोजन कितनी देर तक आगे खिंच सकता है, आयोजन में किसी तरह के विरोधाभास की स्थिति होने के क्या आसार हो सकते हैं।

अगर कार्यक्रम में किसी भी तरह के विरोधाभास की स्थिति होने के आसार होते हैं तो उस दौरान के विरोध प्रदर्शनों की संभावना, आस-पास के क्षेत्र में स्थित महत्वपूर्ण जगहों पर खतरे के बारे में भी बताना होगा। इसके साथ ही और उस तरह के पिछले आयोजनों की स्थिति की समीक्षा भी की जाएगी।

इसके अलावा आयोजन स्थल में अग्निशमन (फायर एक्टिंग्विशर्स) की व्यवस्था के साथ स्वास्थ्य और अन्य जरूरी विभागों की अनुमति जरूरी होगी। इन सबके साथ कार्यक्रम के लिए डिजिटल टिकटिंग और सीटों के आरक्षण पर भी काम किया जाना इस SOP में शामिल होगा। इसके तहत प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग किया जाने की बात कही गई है।

कितना आसान होगा नए नियम लागू कर पाना

जनसंख्या और इस तरह के आयोजन के लिहाज से इस SOP को लागू करने में कर्नाटक सरकार को कई चुनौतियाँ झेलनी पड़ सकती हैं। व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो इन दिशा- निर्देशों को समझने में पुलिस समेत अन्य विभागों को ही काफी समय लग जाएगा।

इसके अलावा कर्नाटक में वर्तमान में लगभग 92,000 पुलिस कर्मी हैं। इसके एवज में 2011 के जनसंख्या सर्वे को ही मानें तो कर्नाटक की जनसंख्या 6.11 करोड़ है। ऐसे में किसी आयोजन में भारी भीड़ होने पर अगर कोई अनहोनी होती है तो उतने संसाधनों का जुटा पाना भी एक बड़ी चुनौती वाली बात है। विरोध प्रदर्शन जैसे मामलों में ये SOP गुब्बारे की हवा जैसे ही साबित होगी।

RCB के खिलाफ आया आदेश

CAT ने अपने आदेश में कहा कि सोशल मीडिया के जरिए RCB ने कई बार आयोजन का प्रमोशन किया। इससे लगभग 12 घंटे में ही काफी भीड़ एक साथ आ गई। इतने कम समय में पुलिस पूरी तरह से व्यवस्था कर पाने में असमर्थ थी।

आदेश में पुलिस की सीमाओं पर भी बात की गई और कहा गया कि वह ‘न तो भगवान’ हैं और ‘न ही जादूगर’, जिनके पास आखिरी समय में किसी की इच्छा पूरी करने के लिए ‘अलादीन का चिराग’ हो।

इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने पुख्ता सबूत न होने के कारण आईपीएस विकास कुमार विकास का निलंबन भी रद्द कर दिया। साथ ही दो अन्य अधिकारियों को भी बहाल करने के सिफारिश की।

भले ही CAT ने अपना आदेश सुना दिया हो या फिर SOP जारी कर दी गई हो, लेकिन जिन 11 लोगों की जानें गईं और जो लोग गंबीर रूप से घायल हुए, उन पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया अब भी अधूरी लगती है। इस पूरे मामले पर कई पक्षों ने कर्नाटक सरकार से जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक के साथ पूरी पारदर्शिता लाने की बात कही।

इसे लेकर याचिकाएँ भी डालीं गईं जिनमें ये आरोप लगे हैं कि कार्रवाई में राजनीतिक दबाव शामिल है, इसलिए न्याय मिलने में देरी हो रही है। फिर भी ढाक के वही तीन पात अब तक दिख रहे हैं यानी जाँच प्रक्रिया को अपने स्तर से ही कर्नाटक सरकार से ही चला रही है।

आयोजन में सरकार के उपमुख्यमंत्री बी बुलाए गए थे। इशके बावजूद इतनी बड़ी घटना हुई। इस मामले पर हाईकोर्ट ने भी सरकार से कई सवाल पूछे थे। इसके जवाब में कर्नाटक सरकार ने उस समय चुप्पी साध ली और जवाब देने के लिए समय की माँग कर डाली थी।