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‘मैं दक्षिण एशियाई नहीं, भारतीय हूँ’: ब्रिटेन में ‘ग्रूमिंग जिहाद’ कर रहे पाकिस्तानियों की पहचान पर ‘नकाब’ डाल रही पश्चिमी मीडिया, यह भारत की पहचान से खिलवाड़

आजकल भारतीय उपमहाद्वीप की जगह दक्षिण एशिया शब्द ज्यादा इस्तेमाल किया जाने लगा है। यह बदलाव कोई संयोग नहीं था, बल्कि 1940 से 1970 के बीच अमेरिकी विदेश विभाग के नीति-नियामक संस्थाओं ने इसे जानबूझकर बढ़ावा दिया। इसका मकसद ऐसा शब्द देना था जो भारत समेत आस पास के पूरे क्षेत्र को एक साथ दर्शाए।

असल में इसमें एक और छुपा हुआ उद्देश्य था- पूरे क्षेत्र की भारतीय विरासत और सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर कर उसे उसके सनातन (प्राचीन) इतिहास से अलग करना। धीरे-धीरे यह एजेंडा काम भी करता गया।

अब हालात ये हैं कि दिवाली जैसे खास भारतीय त्योहार को दक्षिण एशियाई त्योहार कहा जाने लगा है और ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ियों को दक्षिण एशियाई ओलंपियन कहा जाता है, न कि भारतीय।

भारतीय पहचान और हिंदू संस्कृति से समझौता करना एक कड़वा घूँट तो था ही, पर बात अगर गलत एजेंडे पर ही खत्म हो जाती तो शायद इतनी चिंता नहीं होती। लेकिन हालात इसके बिल्कुल उलट निकले। ऐसा लगा जैसे यह योजना पूरी नहीं हुई हो, क्योंकि बाद में दक्षिण एशिया शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया।

इसका उपयोग कुछ खास धर्म, देश और विचारधारा से जुड़े लोगों के बड़े अपराधों को छिपाने के लिए किया गया और इन अपराधों का दोष पूरे क्षेत्र, खासकर भारत पर गलत तरीके से डाला गया।

दक्षिण एशिया शब्द के इस दुरुपयोग को कई बार बढ़ावा मिला। कई भारतीयों ने इसके विरोध में आवाज तो उठाई मगर इस गलत प्रथा को रोकने के लिए कोई खास कदम नहीं उठाया गया। यह बात खासकर तब साफ तौर पर दिखी जब यूनाइटेड किंगडम में कई दशकों से नाबालिग ब्रिटिश लड़कियों के बलात्कार, उत्पीड़न और जघन्य अपराधों में शामिल पाकिस्तानी ग्रूमिंग गिरोहों का खुलासा हुआ। फिर भी, उनकी असली पहचान और पृष्ठभूमि को छुपाने के लिए उन्हें दक्षिण एशियाई कहकर एक बड़े समूह में डाल दिया गया।

इस तरह दक्षिण एशिया शब्द का इस्तेमाल न केवल क्षेत्र की असली पहचान को कमजोर करने के लिए हुआ, बल्कि अपराधों के दोष को भी गलत जगह पर ले जाने के लिए किया गया।

मैं अपनी पहचान का इस तरह का अनादर बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती, खास तौर पर तब जब यह उन लोगों की ओर से हो जो असली मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय, सब कुछ दक्षिण एशिया के नाम पर छिपाने की कोशिश करते हैं। ये लोग उन अपराधों को नजरअंदाज कर देते हैं जो उनके पसंदीदा समूहों द्वारा किए जाते हैं, लेकिन राजनीतिक शुद्धता की आड़ में उन्हें ढकने की कोशिश करते हैं।

उदाहरण के लिए, अगर कोई पाकिस्तानी कुछ अच्छा करता है, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो, तो उसका नाम, देश और धर्म खुलकर बताया जाता है, ताकि उसकी पहचान उससे जोड़ी जा सके। लेकिन अगर कोई भारतीय किसी छोटी गलती का भी दोषी पाया जाता है, तो उसके साथ ऐसा नहीं होता। उसकी राष्ट्रीयता और पहचान को दक्षिण एशिया कहकर नहीं छिपाया जाता, बल्कि उसे पूरी तरह उजागर किया जाता है।

इस तरह, भारतीयों को वो समान व्यवहार नहीं मिलता जो दूसरों को मिलता है। उनकी राजनीतिक शुद्धता उस समय अचानक गायब हो जाती है और भारतीयों की पहचान को ही निशाना बना लिया जाता है।

ठीक इसी तरह, जब कोई भारतीय या भारत कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करता है, तो उसका पूरा श्रेय भारत को नहीं दिया जाता। इसके बजाय, इसे दक्षिण एशिया की उपलब्धि बताकर पेश किया जाता है। जैसे इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे बाकी देशों ने भी अपना योगदान दिया हो।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को न सिर्फ अपनी उपलब्धियों का श्रेय दूसरों के साथ बाँटना पड़ता है, बल्कि कई बार उसे उन देशों के साथ दोष भी साझा करना पड़ता है, जिनका भारत से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता। कभी-कभी तो हालात इतने कठिन हो जाते हैं कि असल हकीकत भी मजाक जैसी लगने लगती है।

प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर भड़के ब्रिटिश-भारतीय

मेरी तरह, कई भारतीयों और ब्रिटिश भारतीयों ने भी प्रधानमंत्री कीर स्टारमर पर नाराजगी जताई है। 2008 से 2013 तक जब वे लोक अभियोजन निदेशक (DPP) थे, तब उनके लिए गए फैसलों में खुद का बचाव करते हुए उन्होंने एशियाई ग्रूमिंग गैंग जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, जिसकी वजह से विवाद और बढ़ गया।

यह मामला इतना बढ़ा कि एलन मस्क तक को कहना पड़ा कि ब्रिटिश सरकार इस मुद्दे पर हमेशा टालमटोल करती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि स्टारमर अपने कार्यकाल के दौरान ग्रूमिंग गैंग से जुड़ी गंभीर और संस्थागत समस्याओं को भी ठीक से निपटा नहीं सके।

सिख और ब्रिटिश भारतीय नेताओं ने भी इस शब्दावली पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि एशियाई शब्द का इस्तेमाल करके श्रीलंकाई, भारतीय और अन्य समुदायों को भी बदनाम किया जाता है, जबकि ये ज्यादातर मामले पाकिस्तानी मूल के लोगों से जुड़े होते हैं। उनकी वजह से पूरे एशियाई समुदाय पर बेवजह दाग लगता है।

यूके हिंदू परिषद के अध्यक्ष कृष्ण भान ने निराशा जताई कि प्रधानमंत्री ने इन गंभीर मामलों को छुपाने के लिए ‘एशियन’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि जब हिंदू और सिख लड़कियाँ भी इन ग्रूमिंग गिरोहों की शिकार बनी हैं, तो ऐसे अस्पष्ट शब्द का इस्तेमाल करना सभी एशियाई समुदायों का अपमान है।

फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल यूके के प्रवक्ता जय शाह ने भी इस दोहरे मापदंड पर सवाल किया कि हमें इस ग्रूमिंग गैंग्स की श्रेणी में क्यों रखा जाता है? उन्होंने कहा कि जब ग्रूमिंग गैंग्स की बात होती है, तो हमें एशियाई कह दिया जाता है। लेकिन जब कश्मीर जैसे मुद्दों की बात आती है, तो हमें खास तौर पर भारतीय बना दिया जाता है।

शाह ने कहा कि यह भेदभाव और पक्षपात बहुत अपमानजनक है। दोनों नेताओं ने साफ तौर पर कहा कि सभी एशियाई लोगों को एक ही रंग में रंगना गलत है, खासकर जब हकीकत में जिम्मेदार केवल कुछ खास समूह होते हैं।

समुदाय के नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि एशियाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि इससे समाज में पूर्वाग्रह भी बढ़ते हैं और अलग-अलग जातियों और समुदायों के बीच के भरोसे को भी खत्म करता है।

सिख फेडरेशन यूके ने राजनेताओं की आलोचना की कि वे राजनीतिक शुद्धता की आड़ में असली मुद्दों को नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं, लेकिन सरकार और मीडिया लगातार इनसे मुँह मोड़ते रहे हैं।

हालाँकि इन अपराधों में मुस्लिम पाकिस्तानी पुरुषों की भूमिका साफ तौर पर सामने आई है, फिर भी ब्रिटिश सरकार और मीडिया ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर उठाने से हमेशा परहेज किया है।

‘गैर-इस्लामी जानवर हैं’ इस बयान से मशहूर हुए पत्रकार मेहदी हसन एक बार फिर पाकिस्तानी अपराधियों का बचाव करते नजर आए और उनको हैवान बताने पर अपना प्रलाप जारी रखा।

हसन ने टेस्ला के सीईओ एलन मस्क पर यह भी आरोप लगाया कि वे H1B वीजा को लेकर हुए टकराव के बाद दक्षिणपंथियों को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि असल में मस्क ने अमेरिका में उच्च कौशल वाले भारतीय पेशेवरों का समर्थन किया था।

पाकिस्तानी अपराधियों को उनकी असली पहचान से बुलाना जहाँ एक तरह से अस्वीकार्य माना जाता है, वहीं उनके द्वारा किए गए जघन्य अपराधों के लिए पूरे दक्षिण एशिया या एशिया को जिम्मेदार ठहराना सेक्युलरिज्म और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आदर्श माना जाता है, यह साफ तौर पर दोहरापन है।

जो कोई भी इस एकतरफा सोच से हटकर कुछ कहता है, उसे तुरंत इस्लामोफोब या कट्टरपंथी कहकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि मुख्यधारा की मीडिया बार-बार सच्चाई को नजरअंदाज करती है। ये अपराधियों को बचाने की कोशिश करती है और पॉलिटिकल करेक्टनेस के नाम पर पूरे एशियाई महाद्वीप की छवि को नुकसान पहुँचाती है।

एशियाई ग्रूमिंग गैंग जैसे शब्दों का लगातार इस्तेमाल होता रहा है, जबकि कई रिपोर्टें और यूके के सिटी काउंसिल्स स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि ज्यादातर मामलों में अपराधी पाकिस्तानी मूल के थे। इसके बावजूद पूरे महाद्वीप को इस एक शब्द से बदनाम कर दिया जाता है, जो न सिर्फ गलत है, बल्कि गहराई से अनुचित भी।

सबसे दुखद बात यह है कि यूके सरकार और उसके अधिकारियों ने कई बार आरोपितों पर सख्त कार्रवाई से नजरअंदाज कर दिया ताकि वे नस्लवादी न लगें। ऐसे में न्याय, सच्चाई और पीड़ित लड़कियों की सुरक्षा जैसे सतही प्रथमिकताओं पर ही चिंता दिखी।

दक्षिण एशिया कह कर भारत की उपलब्धियों को कमतर दिखाना

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन  (ISRO) ने 2023 में चंद्रयान-3 मिशन का तीसरा चरण सफलतापूर्वक पूरा किया और चंद्रमा के अब तक अनछुए दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की। यह भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, जिस पर पूरे देश ने गर्व महसूस किया। हालाँकि इस खुशी के बीच भारतीयों को अपने जहरीले पड़ोसी मुल्क की सोच की एक और झलक देखने को मिली।

पाकिस्तानी खेल पत्रकार फरीद खान ने सोशल मीडिया पर लिखा, “चंद्रयान-3 के 23 अगस्त की शाम 5:47 बजे भारतीय समयानुसार चंद्रमा पर उतरने की उम्मीद है। दक्षिण एशिया और तीसरी दुनिया के देशों के लिए यह एक बड़ा पल है।”

इस टिप्पणी ने कई भारतीयों को नाराज कर दिया। उनका मानना था कि यह उपलब्धि पूरी तरह भारत की है और इसे दक्षिण एशिया के नाम पर पेश करना गलत है। सोशल मीडिया पर फरीद खान के बयान को लेकर मीम्स बने औरल उन्हें खूब ट्रोल किया गया।

गौरतलब बात ये है कि जब चंद्रयान-2 अपने तय लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाया था, तब पाकिस्तान के नेताओं और खासकर उस समय के मंत्री फवाद चौधरी ने इसरो, प्रधानमंत्री मोदी और भारत के अंतरिक्ष मिशन का खूब मजाक उड़ाया था।

ये वही लोग हैं जिनका खुद का अंतरिक्ष कार्यक्रम लगभग न के बराबर है, फिर भी वे भारत की असफलता पर खूब हँसे। लेकिन जब चंद्रयान-3 ने सफलता हासिल की, तो इन्हीं लोगों ने उसे दक्षिण एशिया की जीत बताने में एक पल भी नहीं गँवाया ताकि भारत की मेहनत का श्रेय खुद के नाम भी बाँटा जा सके। विलियम शेक्सपियर के हेमलेट से कहें तो, “बेशर्मी, तेरा नाम पाकिस्तान है।”

यह पूरा घटनाक्रम इस बात की साफ मिसाल है कि भारत की असफलताओं का मजाक उड़ाया जाता रहा है, लेकिन उसकी कामयाबियों में हिस्सेदार बनने की होड़ लग जाती है और सबसे आगे होता है यही पड़ोसी देश जो भारत को दुश्मन राष्ट्र कहता है और आतंकवाद के जरिए उसे हजार घावों से लहूलुहान करने की हर कोशिश में रहता है।

दुख की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई लोग इस दोगले नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं और ऐसी भ्रामक बातें फैलाते हैं, जो भारत की असली तस्वीर को छुपा देती है।

पाकिस्तानियों ने भारतीयों के खिलाफ फैले नस्लवाद को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ये बात अब सोशल मीडिया पर भी साफ दिखाई देने लगी है। वे भारतीयों को तरह-तरह की गालियाँ देते हैं, हिंदू धर्म पर निशाना साधते हैं और भारतीयों के खिलाफ झूठ और अपमानजनक बातें फैलाते हैं, जो अब उनके लिए एक आम आदत बन चुकी है।

ये लोग अक्सर भारत को गलत तरीके से दिखाते हैं। भारतीयों द्वारा किए गए किसी भी अपराध को पूरे देश से जोड़ देते हैं और सोशल मीडिया पर उन लोगों का साथ देते हैं जो भारतीयों के प्रति नफरत फैलाते हैं। खासकर वे उन पश्चिमी नस्लवादी विचारों के साथ दिखाई देते हैं जो भारतीय अमेरिकियों की कामयाबी और भारत के तेजी से बढ़ते विकास को पचा नहीं पाते।

फिर जब कोई उनके इस व्यवहार की सच्चाई सामने लाता है तो ये लोग उल्टे नाराज हो जाते हैं और खुद को पीड़ित बताने लगते हैं, जबकि असल में वे खुद दूसरों के खिलाफ जहर फैला रहे होते हैं।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया शब्द को अमेरिकी शिक्षाविदों ने इस क्षेत्र के लिए एक राजनीतिक तौर पर उदासीन रहने के तौर पर गढ़ा था। उद्देश्य ये था कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों के राजनेता, नीति निर्माता और शिक्षाविद् बिना किसी देश, खासकर गैर-भारतीय देशों, की संवेदनशीलता को ठेस पहुँचाए भारतीय उपमहाद्वीप पर चर्चा कर सकें ।

इस शब्द का इस्तेमाल इसलिए बढ़ गया कि इससे उन देशों को संतुष्ट रखा जा सके जो भारतीय उपमहाद्वीप शब्द से असहज महसूस करते हैं और इनमें सबसे ऊपर पाकिस्तान का नाम आता है। पाकिस्तान हमेशा इस बात से परेशान रहा है कि पूरा क्षेत्र भारत के नाम से जुड़ा हुआ है, इसलिए दक्षिण एशिया जैसे शब्दों को बढ़ावा देना उसके लिए फायदेमंद रहा है।

अब, पाकिस्तान से बाहर बसे प्रवासी समुदायों, खासकर अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में रहने वालों ने इस शब्द को और ज्यादा लोकप्रिय बना दिया। इसका नतीजा ये हुआ है कि आज वैश्विक स्तर पर दक्षिण एशिया एक आम शब्द बन गया है, जिससे भारत की ऐतिहासिक और भौगोलिक भूमिका को धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में धकेला जा रहा है।

जैसा कि अब साफ होता जा रहा है, पाकिस्तानियों में एक अजीब सी मानसिकता बन गई है, एक तरफ वे भारत से जुड़ी हर अच्छी खबर से खुद को जोड़ना चाहते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसी भारत से जलते और नफरत करते भी हैं।

भारत की कोई भी उपलब्धि हो, उसे दक्षिण एशिया की सफलता बताकर पेश किया जाता है, ताकि पाकिस्तान जैसे देशों को भी उसका श्रेय मिल सके। वहीं जब पाकिस्तानियों द्वारा कोई अपराध होता है, तो उसके लिए पूरे क्षेत्र या पूरे एशियाई महाद्वीप को दोषी ठहरा दिया जाता है।

पाकिस्तान की स्थिति बिल्कुल वैसी है जैसे कोई केक रखना भी चाहता है और खा भी लेना चाहता है, यानी वह भारत की कामयाबियों में हिस्सा भी चाहता है और भारत के खिलाफ नफरत फैलाना भी नहीं छोड़ता।

फिर भी एक भारतीय होने के नाते, यह जरूरी है कि हम पाकिस्तान और उसके समर्थक उदार पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा हमारी पहचान के लगातार हो रहे उल्लंघन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाएँ। अब और यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान की गलतियों और हरकतों के लिए पूरे दक्षिण एशिया या एशिया को दोषी ठहराया जाए।

चाहे उन्हें राजनीतिक शुद्धता, इस्लामोफोबिया के डर या नस्लवाद-विरोधी के नाम पर कितना भी समर्थन मिल जाए चाहे वो मीडिया से हो, अंतरराष्ट्रीय राजनीति से या अन्य देशों के संस्थानों से। यह बात साफ है कि यही समर्थन भारतीयों को शायद ही कभी उसी इज्जत या सहानुभूति के रूप में मिलता है।

सच तो यह है कि पाकिस्तान जैसे एक मतलबी मुल्क के साथ भारत को न सिर्फ महाद्वीप और क्षेत्र, बल्कि सीमाएँ भी साझा करनी पड़ती हैं। लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भारत को उसकी गलतियों का जिम्मेदार ठहराया जाए। भारत की पहचान, उसका सम्मान और उसकी उपलब्धियाँ खुद की हैं और हमें उन्हें किसी और के नाम पर नहीं बाँट सकते।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे।

डॉन बॉस्को स्कूल में KG के बच्चे का ‘तिलक’ ईसाई महिला टीचर ने जबरन पोछा, कहा-दोबारा लगाया तो मार पड़ेगी: ऑपइंडिया से बोले पीड़ित परिजन- जानबूझकर करते हैं हिंदू धर्म का अपमान

असम के सोनितपुर ज़िले के सिरजुली स्थित डोन बॉस्को स्कूल में एक ईसाई कैथोलिक स्कूल की टीचर ने एक हिंदू बच्चे के माथे से ज़बरदस्ती ‘तिलक’ हटा दिया। मंगलवार (24 जून 2025) को भी बच्चे के साथ ऐसा ही व्यवहार किया गया और उसे दोबारा तिलक लगाकर आने पर धमकाया गया। इस घटना की जानकारी बच्चे ने माता-पिता को दी।

मामला क्या है?

सोमवार (23 जून 2025) को किंडरगार्टन (KG) में पढ़ने वाले बच्चे के माथे से टीचर रिनी रोज़ ने ‘तिलक’ मिटा दिया था। जब बच्चे ने घर जाकर अपने माता-पिता को यह बताया, तो वे तुरंत स्कूल पहुँचे और प्रिंसिपल (फादर) से शिकायत की। प्रिंसिपल ने माता-पिता को भरोसा दिलाया गया कि ऐसा फिर नहीं होगा।

लेकिन, अगले ही दिन मंगलवार (24 जून 2025) को बच्चे के साथ फिर वही हुआ। उसके माथे से तिलक ज़बरदस्ती हटाया गया। टीचर रिनी रोज़ ने बच्चे को धमकी भी दी कि अगर उसने दुबारा तिलक लगाया तो उसे मारा जाएगा। इस धमकी से बच्चा बहुत परेशान हो गया है।

हिंदू धर्म का जानबूझकर अपमान

पीड़ित बच्चे के चाचा, अवध किशोर वर्मा ने ढेकियाजुली पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई है। चाचा वर्मा ने कहा है कि यह सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि संविधान में दिए गए धर्म के पालन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। चाचा ने इसे धार्मिक भेदभाव और हिंदू धर्म का जानबूझकर किया गया अपमान बताया है।

पुलिस शिकायत के बाद डोन बॉस्को स्कूल पहुँची, लेकिन प्रिंसिपल ने बताया कि आरोपित टीचर रिनी रोज़ घर जा चुकी हैं। स्कूल प्रशासन ने ‘ऑपइंडिया’ को बताया कि वे मामले की जानकारी लेने पुलिस स्टेशन जा रहे हैं।

अवध किशोर वर्मा ने यह भी बताया कि कुछ दिन पहले इसी कैथोलिक स्कूल के अधिकारियों ने एक हिंदू बंगाली छात्र की ‘तुलसी माला‘ भी ज़बरदस्ती हटा दी थी।

बंगाल के स्कूल ने तुलसी माला पहनने से रोका

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। बारासात के नबापल्ली जोगेंद्रनाथ बालिका विद्यामंदिर में हिंदू छात्राओं को स्कूल की प्रधानाचार्य ने तुलसी की माला पहनने से रोक दिया था। स्कूल की प्रधानाचार्य इंद्राणी दत्ता चक्रवर्ती को छात्रा को कहते हुए सुना था स्कूल में तुलसी की माला पहनकर नहीं आ सकतें।

स्कूल की प्रधानाचार्य के इस आदेश की ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। इस पर काफी हंगामा हुआ, जिसके बाद स्कूल की प्रधानाचार्य को अपना आदेश वापस लेना पड़ा और बकायदा बिना किसी शर्त माफी माँगनी पड़ी।

UCC की वकालत करने वाले जस्टिस शेखर यादव पर महाभियोग चाहते हैं सांसद, पर जिस जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में मिले नोटों के बंडल उन पर चुप्पी: क्या न्यायपालिका में ‘सुधार’ को लेकर गंभीर है विधायिका?

भारतीय राजनीति में इन दिनों दोहरे मापदंडों का ‘नंगा नाच’ चल रहा है और इस नाटक के मुख्य किरदार हैं विपक्षी सांसद, जो अपनी सुविधा के हिसाब से मुद्दों को उठाते और दबाते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव और जस्टिस यशवंत वर्मा के मामलों में विपक्ष का रवैया उनकी नीयत को साफ उजागर करता है।

एक तरफ जस्टिस यादव के खिलाफ महाभियोग की माँग को लेकर सांसदों की बेचैनी चरम पर है, भले ही उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस नोटिस को खारिज नहीं किया हो। दूसरी तरफ जस्टिस वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी की सिफारिश के बावजूद विपक्षी सांसदों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।

यह दोहरापन न केवल उनकी मंशा पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जनता की भलाई से उनका कोई लेना-देना नहीं है। वे केवल अपना एजेंडा चलाने और सरकार के खिलाफ हल्ला मचाने में मशगूल हैं।

जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग क्यों?

दरअसल, जस्टिस शेखर यादव का मामला पिछले साल दिसंबर में तब सुर्खियों में आया, जब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में कथित तौर पर सांप्रदायिक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने कहा था, “यह हिंदुस्तान है… और देश बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा।” इसके साथ ही उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन करते हुए मुस्लिम समुदाय की कुछ प्रथाओं पर टिप्पणी की थी।

पीछे ही पड़ गए विपक्षी सांसद

इस बयान पर विपक्षी सांसदों ने तुरंत महाभियोग का नोटिस तैयार कर लिया। 54 राज्यसभा सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉ्नग्रेस, आप, राजद और अन्य दलों के नेता शामिल थे। लेकिन इस नोटिस की प्रक्रिया में गड़बड़ियाँ सामने आईं। नौ सांसदों के हस्ताक्षर रिकॉर्ड से मेल नहीं खाए और एक सांसद के हस्ताक्षर दो बार पाए गए।

इसके बावजूद कपिल सिब्बल जैसे सांसद इस मुद्दे को बार-बार उठा रहे हैं, यह दावा करते हुए कि उप-राष्ट्रपति इस पर कार्रवाई नहीं कर रहे। सिब्बल ने तो यह तक कह दिया कि अगर नोटिस खारिज होता है, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। यह बेचैनी और जल्दबाजी क्या दर्शाती है? यह साफ है कि विपक्ष इस मामले को तूल देकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का लाभ उठाना चाहता है, ताकि जनता के बीच यह संदेश जाए कि वे ‘सेकुलरिज्म’ के रक्षक हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा पर साध ली चुप्पी

लेकिन जब बात जस्टिस यशवंत वर्मा की आती है, तो यही सांसद अचानक चुप्पी साध लेते हैं। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगी, और फायरफाइटर्स को वहाँ ‘जले हुए नोटों का पहाड़’ मिला। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की कमेटी ने 64 पेज की रिपोर्ट में साफ कहा कि ये नोट जस्टिस वर्मा के स्टोररूम में थे, जहाँ केवल उनके परिवार की पहुँच थी। कमेटी ने यह भी पाया कि जस्टिस वर्मा और उनके निजी सचिव ने फायर ऑफिसरों को इस मामले को दबाने के लिए कहा था।

कपिल सिब्बल ने बताया सबसे बेहतरीन जज

इतने गंभीर आरोपों के बावजूद जस्टिस वर्मा को न कोई ज्यूडिशियल काम सौंपा गया है, न उन्होंने इस्तीफा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की है और संसद में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। लेकिन विपक्ष, खासकर कपिल सिब्बल इस मामले में जस्टिस वर्मा का बचाव कर रहे हैं। कपिल सिब्बल ने जस्टिस यशवंत वर्मा को ‘देश के सबसे बेहतरीन जजों में से एक’ करार दिया और सरकार पर आरोप लगाया कि वह कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने की साजिश रच रही है।

यह दोहरापन क्यों? जब जस्टिस यादव के बयान का मामला आया, तो सिब्बल और उनके साथी सांसदों ने तुरंत महाभियोग की माँग की, लेकिन जस्टिस वर्मा के खिलाफ ठोस सबूत होने के बावजूद वे उनका बचाव कर रहे हैं। क्या यह उनकी अपनी सुविधा और एजेंडे का हिस्सा नहीं है?

न्यापालिका में सुधार नहीं, नरेटिव सेट करना है एजेंडा

विपक्ष का यह रवैया केवल सत्ता के खिलाफ हल्ला मचाने का हिस्सा है। जस्टिस यादव का मामला उनके लिए एक मौका है, जिसे वे सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वोट बैंक की राजनीति चमकाना चाहते हैं। लेकिन जस्टिस वर्मा के मामले में, जहाँ भ्रष्टाचार का आरोप साफ तौर पर सिद्ध हो चुका है, वे चुप हैं, क्योंकि यह उनके ‘सेकुलर’ नैरेटिव में फिट नहीं बैठता। यह दोहरापन न केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि उन्हें न्यायपालिका में सुधार या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ सरकार को घेरना और जनता को गुमराह करना है।

विपक्षी सांसदों की यह रणनीति नई नहीं है। वे हमेशा से चुनिंदा मुद्दों को उठाकर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करते रहे हैं। उदाहरण के लिए जब 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, तब भी विपक्ष ने इसे सरकार के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। उस समय भी कपिल सिब्बल इस अभियान में सबसे आगे थे। लेकिन जब बात भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दों की आती है, तो यही नेता पीछे हट जाते हैं। यह साफ है कि उनकी लड़ाई सिद्धांतों के लिए नहीं, बल्कि सियासी फायदे के लिए है।

विपक्ष का यह नाटक जनता के सामने भी अब खुल चुका है। सोशल मीडिया खासकर एक्स पर भी लोग इस दोहरे रवैये की आलोचना कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “जब जज सांप्रदायिक बयान देता है, तो विपक्ष को महाभियोग चाहिए, लेकिन जब जज के घर से नोटों का पहाड़ मिलता है, तो वही लोग उसे ‘बेस्ट जज’ बताते हैं। यह कैसी राजनीति है?” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “विपक्ष को भ्रष्टाचार से कोई दिक्कत नहीं, बस मुद्दा ऐसा चाहिए जो सरकार को घेर सके।” ये प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि जनता अब विपक्ष के इस नकली नैरेटिव को समझ चुकी है।

न्यायपालिका में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दे बेहद गंभीर हैं। लेकिन राजनीतिक दल इनका इस्तेमाल केवल अपनी सियासत चमकाने के लिए कर रहा है। जस्टिस यादव के मामले में उनकी बेचैनी और जस्टिस वर्मा के मामले में उनकी चुप्पी यह साफ करती है कि उनका मकसद जनता की भलाई नहीं, बल्कि सत्ता के खिलाफ नाटक करना है। जनता को अब इस नौटंकी को समझने और इन नेताओं के दोहरे चरित्र को बेनकाब करने की जरूरत है। अगर नेता गण वाकई में न्यायपालिका को मजबूत करना चाहता है, तो उसे दोनों मामलों में एक समान रुख अपनाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने के बजाय वे केवल अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं और यह जनता के साथ धोखा है।

ST परिवार के 40 लोगों की हुई ‘शुद्धि’ क्योंकि उनकी लड़की ने SC लड़के से कर ली शादी, लेकिन घृणा मनु से लेकर BJP-RSS तक फैलाई गई: जानिए वायरल Video का सच

ओडिशा में 40 सदस्यों वाली जनजातीय परिवार का ‘शुद्धिकरण’ किया गया। दरअसल परिवार की एक युवती ने दलित वर्ग (scheduled caste) के लड़के से शादी कर ली थी। अनुसूचित जनजाति (scheduled tribes )समाज की परंपरा के मुताबिक समाज का कोई व्यक्ति समाज से बाहर शादी नहीं कर सकता है।

शुद्धिकरण में शामिल 40 लोग युवती के परिवार के सदस्य या दूर के रिश्तेदार हैं। ये घटना 19 जून को राज्यगड़ा जिले के बैगानगोडा गाँव में हुई थी।

युवती ने अपने गाँव के एक अनुसूचित जाति के लड़के से शादी कर ली थी। इसके बाद गाँववालों ने पूरे परिवार को समाज से बाहर निकाल दिया। गाँव की पंचायत ने परिवार के 40 सदस्यों को सिर मुंडवाने का फरमान सुनाया। इस दौरान गाँव के देवता के सामने बकरे, सूअर और मुर्गियों की बलि दी गई। अनुष्ठान के बाद समाज को भोज खिलाया गया।

इस पूरे कार्यक्रम में जो खर्च आया वह परिवार को वहन करना पड़ा। सिर मुंडवाने की घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है।वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि परिवार के दर्जनों सदस्य सिर मुंडवाकर एक साथ खेत में बैठे हैं। इनलोगों ने अपने सिर झुका लिए हैं और कुछ लोग धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं।

वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन ने जाँच के आदेश दिये हैं। स्थानीय बीडीओ बिजय सोई ने मीडियो को कहा कि ब्लॉक स्तर पर एक टीम बनाई गई है जो गाँव पहुँची है और मामले की जाँच कर रही है।

हालाँकि महिला के परिवारवालों ने सरकारी अधिकारियों को कहा है कि समाज के नियम तोड़ने की वजह से उन लोगों ने अपनी मर्जी से ये पूरा अनुष्ठान किया है। उनसे समाज ने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की।

वायरल वीडियो में गलत दावा किया गया

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए कई लोगों ने गलत प्रचार किया। कुछ लोगों ने ‘शुद्धिकरण’ को जाति-व्यवस्था से जोड़ा और सवर्णों पर आरोप लगाए।

एक ‘ट्राइबल आर्मी’ नाम की एक्स हैंडल ने वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि यह मनुवादी वर्चस्व और भारतीय समाज में फैले जातिवाद की खौफनाक तस्वीर पेश करता है। इसमें लिखा गया है कि ये केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समानतावदी मूल्य व्यवस्था पर हमला है। इसमें महिला को दूसरी जाति में शादी करने पर पूरे परिवार को ‘सजा’ देती है।

इस हैंडल ने यह आरोप लगाया कि शुद्धिकरण अनुष्ठान सवर्णों ने करवाया। जबकि यह अनुष्ठान परिवार ने अपने जनजातीय समुदाय को खुश करने के लिए किया था। परिवार को किसी जाति विशेष ने मजबूर नहीं किया था।

हैंडल ने जानबूझकर इसे उच्च जातियों द्वारा ‘उत्पीड़न’ के रूप में पेश किया है और जातिवाद के नाम पर जमकर सर्वर्णों को कोसा है।

कुछ अन्य हैंडलों ने जनजातीय समुदाय के ऐसे रीति-रिवाजों के लिए बीजेपी और आरएसएस को दोषी ठहराया है। घटना को लेकर हैंडल ने कहने की कोशिश की है कि यह भाजपा या संघ ही था जिसने परिवार के सदस्यों को शुद्धिकरण अनुष्ठान करने के लिए मजबूर किया।

कुछ मीडिया पोर्टल जैसे ललनटॉप ने अपने हेडलाइन से लोगों को भ्रमित करने की कोशिश की।

दरअसल जातियों का मामला आने पर अक्सर मीडिया, सोशल मीडिया मनुवादी कहते हुए सर्वर्णों को खरी-खोटी सुनाना शुरू कर देते हैं। वे ये तक जानने की जहमत नहीं उठाते है कि घटना में कौन शामिल है? किनके बीच हुई है? क्या वजह है?

रं$, चु$, ब$… वजाहत खान की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, कामाख्या देवी और भगवान कृष्ण को दी थी गालियाँ: शर्मिष्ठा पर FIR कराने वाली ‘जेहादी’ की हिंदू घृणा की पूरी डिटेल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (23 जून 2025) को वजाहत खान की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। वजाहत के खिलाफ पश्चिम बंगाल सहित कई अन्य राज्यों में FIR दर्ज थी। उसे हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

यह अंतरिम आदेश जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 14 जुलाई 2025 तक वजाहत के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा, “नफरत भरे भाषण हमें कहीं नहीं ले जाते।” उन्होंने आगे कहा कि आग की वजह से लगे घाव भर सकते हैं, लेकिन शब्दों से लगे घाव कभी नहीं भरते। वजाहत खान के वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने दलील दी थी कि आरोपित ने जैसा बोया है, वैसा ही काट रहा है और सजा से उसने सबक भी सीखा है।

बता दें कि वजाहत खान की शिकायत पर ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ पोस्ट करने पर सोशल मीडिया इफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी के बाद बंगाल पुलिस ने वजाहत के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था।

जहाँ एक ओर शर्मिष्ठा को दो हफ्ते तक जेल में रखने के बाद भी उसकी बेल को नामंजूर कर दिया गया था। वहीं वजाहत ने उसकी गिरफ्तारी का जश्न मुस्लिम समुदाय के साथ मनाया था।

वजाहत के सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट दिखा थे। इसके बाद लोगों ने उसकी गिरफ्तारी की माँग की थी। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में वजाहत ने लिखा था “कामाख्या देवी मंदिर में ब्राह्मण को अन्य हिंदुओं से कटी हुई योनि की पूजा करवानी पड़ती है। इसमें अंतर करना बहुत मुश्किल है कि यह अंधभक्ति है या कोई मानसिक बीमारी।”

उसने ट्वीट किया था “एक हिंदू अपनी साली को अंग-अंग पर रंग लगाते हुए और अपने दोस्तों को भी उसके साथ ऐसा करने का निमंत्रण देते हुए…हिंदू.. यहीं है इनकी असलियत… बलात्कारी संस्कृति।”

एक अन्य पोस्ट में उसने लिखा था, “नहीं वो उसकी बात कर रहा है जिसकी 16108  रखैलों के साथ रंग रसिया मनाता था…या चुपके-चुपके लड़कियों को नहाते हुए देखता था..”

ऐसे ही उसने एक पोस्ट में लिखा था, “मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ है… पहले अपने धर्म के बारे में पढ़ो। मूत्र पीने वाले बदमाश”

हिंदूओं को गाली देते हुए वजाहत ने एक पोस्ट में लिखा था “तुझ जैसी रं* पेट की औलाद रसूल के बारे में मेरी बात करे ये जेब नहीं देता…तू इसकी बात कर, तेरा कृष्णा कैसा रंगीला था देख…सच्चाई देख वहम में मत जी…झं$% सा&% तूने जो भी कहा वो सब तो झूठ और बहुत है लेकिन ये तेरे ही किताब का है सच पढ़, सु*& के पि*%$”

इंस्टाग्राम पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा “अबे भो**, ब**… अपनी बहन से जाकर सीख तेरा धर्म ला**, तेरा धर्म जो तेरी बहन कोठे में बैठ कर सिखाती है… या फिर वही धर्म तेरे घर पे आकर सिखाती है, चु** कर ब**… अपनी बीवी को तुझ जैसा संघी काम चो* है दूसरे के लिए चो* देता है और अपनी बहन चो* है… ब*… सुन रं* पेट का जाना… मेरे अबाओ अजदाद कन्वर्ट हुए भी ते ना तो हमें उनपर फक्र है…के गंदा धर्म शैतानों का पूजा करने वाला, लिंग का पूजा करने वाला धर्म चो* कर… पाक साफ धर्म अपना और हक धर्म अपना…फखर है उनपे…जा तू लिंगम पूजा कर…लौ*

वजाहत खान कोलकाता में रशीदी फाउंडेशन चलाता है। सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने और दो धर्मों के बीच दुश्मनी पैदा करने के आरोप में वजाहत के खिलाफ काफी साक्ष्यों और दस्तावेजों के होने के बावजूद पश्चिम बंगाल पुलिस ने उसे शुरउआत में गिरफ्तार नहीं किया था।

बाद में सोशल मीडिया पर लोगों के उसके खिलाफ आक्रोश को देखने और अन्य राज्यों में वजाहत के खिलाफ दर्ज हुई FIR के बाद जब दबाव बढ़ने लगा तो 9 जून 2025 को पुलिस ने  उसे गिरफ्तार किया। इसके बाद उसे 23 जून तक के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया था।

हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ उसकी गंदी टिप्पणियों को देखने के बावजूद किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई न करके और पश्चिम बंगाल के बाहर के राज्यों में दर्ज FIR के तहत उसकी गिरफ्तारी पर रोक लगाने के सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से साफ समझा जा सकता है कि कोर्ट ने वजाहत के मामले में अनावश्यक नरमी दिखाई है।

हिंदू लड़कियों का रेप करने के लिए कमरे देता था अबरार, 65 दिन बाद हुआ गिरफ्तार: यहीं नशा देकर दरिंदगी करता था भोपाल का ‘मुस्लिम गैंग’, फिर Video बनाकर करता था ब्लैकमेल

राजधानी भोपाल के एक कॉलेज में हिंदू छात्राओं के साथ रेप, ब्लैकमेलिंग और धर्मांतरण (लव-जिहाद) के दबाव से जुड़े एक सनसनीखेज मामले में फरार चल रहा छठा आरोपित अबरार गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस ने 65 दिन बाद इटारसी के एक होटल से अबरार को दबोचा और कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया।

अबरार 65 दिन से पुलिस से बच रहा था। वह गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार अपनी जगह बदल रहा था। पुलिस ने उसे कोलकाता में तलाशा, तो वह बिहार में छिपा मिला। फिर वह भोपाल के पास आया, तो पुलिस ने तलाशी शुरू की, लेकिन वह फिर कोलकाता भाग गया।

कोलकाता से वह झारखंड के रास्ते मुंबई भागने की कोशिश में था। पुलिस को सूचना मिली कि वह जबलपुर से इटारसी होते हुए मुंबई जाने वाली ट्रेन में है। भोपाल पुलिस की तीन अलग-अलग टीमों ने इटारसी रेलवे स्टेशन पर घेराबंदी की। अबरार ट्रेन छोड़कर एक होटल में छिपा था, जहाँ से उसे आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया।

भोपाल मुस्लिम गैंग का है सरगना अबरार

अबरार, कोलकाता का रहने वाला है। अबरार मुस्लिम गैंग का एक्टिव मेंबर था। पुलिस के मुताबिक, अबरार सिर्फ हिंदू लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फँसाने में ही शामिल नहीं था, बल्कि उनके आपत्तिजनक वीडियो और सोशल मीडिया अकाउंट्स के ज़रिए ब्लैकमेलिंग में भी उसकी बड़ी भूमिका थी।

अबरार पर दो सगी बहनों के साथ रेप करवाने का आरोप है। अबरार ने मुख्य आरोपित फरहान और अली को कमरा दिलवाया था। अबरार, नबील नाम के एक और आरोपित का रूम पार्टनर था। ये दोनों एक किराए के कमरे में रहते थे। इसी कमरे में हिंदू लड़कियों को बुलाया जाता था। वहाँ उन्हें नशीला पदार्थ दिया जाता और उनके साथ गैंगरेप कर वीडियो बनाए जाते थे।

पुलिस को उम्मीद है कि अबरार की गिरफ्तारी से गिरोह के पूरे नेटवर्क और डिजिटल चैट्स से जुड़े कई अहम सबूत सामने आ सकते हैं।

भोपाल का ‘मुस्लिम गैंग’ क्या करता था काम?

अप्रैल 2025 महीने में भोपाल के कोकता थाना क्षेत्र में स्थित एक निजी कॉलेज की हिंदू छात्राओं के साथ हुए इस भयानक अपराध का खुलासा हुआ था। यह गिरोह खासकर कॉलेज की हिंदू छात्राओं को निशाना बनाता था।

मुस्लिम गैंग के आरोपित पहले हिंदू लड़कियों से दोस्ती करते और उन्हें अपने प्रेमजाल में फँसाते थे। फिर लड़कियों को नशीले पदार्थ पिलाकर उनके साथ गैंगरेप किया जाता था।

आरोपित रेप के आपत्तिजनक वीडियो बनाते थे और इन वीडियो के ज़रिए पीड़िताओं को ब्लैकमेल करते थे। वीडियो वायरल करने की धमकी देकर पीड़िताओं पर धर्म बदलने (धर्मांतरण) का दबाव बनाया जाता था। हिंदू छात्राओं को ज़बरदस्ती मांस खिलाया जाता और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता था।

हिंदू धर्म के खिलाफ गंदी बातें भी की जाती थीं। आरोपित बारी-बारी से छात्राओं का यौन शोषण करते थे।

शॉर्ट एनकाउंटर में पकड़ा था मुख्य आरोपित फरहान

इस गिरोह का मुख्य आरोपित फरहान खान है, जिसे पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस हिरासत में फरहान का एक शॉर्ट एनकाउंटर भी हुआ था, जिसमें उसके पैर में गोली लगी थी। फरहान के अलावा, उसके साथी अली, साहिल, साद और नबील भी पहले ही पकड़े जा चुके हैं। अबरार इस गिरोह का छठा आरोपित है।

पुलिस ने फरहान के फोन की जाँच की, तो उसमें 8 अन्य लड़कियों के वीडियो मिले। इनमें से ज़्यादातर उसी कॉलेज की छात्राएँ थीं। पुलिस ने इस मामले में पॉक्सो एक्ट, IT एक्ट और मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम जैसी कई गंभीर धाराएँ लगाई हैं।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने भी इस मामले को संगठित अपराध और धार्मिक दबाव का बताया है। पुलिस अब अबरार से पूछताछ कर रही है, ताकि गिरोह के पूरे नेटवर्क और अन्य डिजिटल सबूतों का पता लगाया जा सके।

संत तुकाराम-संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पुणे में यात्रा कर रहे थे हिंदू, मुस्लिम महिला ने फेंके माँस-हड्डियों के टुकड़े: कहा- किसी से डरती नहीं, जो करना है कर लो


पुणे के कैंप इलाके में हिन्दुओं में काफी गुस्सा है। दरअसल 21 जून को साल में एक बार निकलने वाली आषाढ़ी वारि तीर्थयात्रा निकली थी। इस दौरान 57 साल की नसीम शेख ने तीर्थयात्रियों पर हड्डियाँ और माँस के टुकड़े फेंक दिए।

नसीम शेख सोलापुर रोड पर मम्मा देवी चौक के पास गैबीपीर दरगाह के पास अपनी झोपड़ी के बाहर खड़ी थी। सालाना आषाढ़ी वारि इस रास्ते से होकर गुजरता है जो पंढरपुर तक जाता है। इसे पंढरपुर आषाढ़ी वारि भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस जुलूस का हिन्दुओं के लिए काफी महत्व है। सदियों पुरानी इस परंपरा में भक्त संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर जाते हैं। इसका समापन आषाढ़ी एकादशी के दिन भगवान विट्ठल मंदिर में होता है।

नसीम शेख के खिलाफ छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अक्कलवंत राठौड ने एफआईआर दर्ज कराई है। एफआईआर के मुताबिक, ” ये घटना दिनदहाड़े हुई जब जुलूस इलाके से गुजर रहा था। राठौड़ ने बताया कि माया धूमल नाम की भक्त जुलूस में शामिल थी जिसे नसीम शेख की फेंकी गई एक पोटली से चोट लगी। इसमें हड्डियाँ और माँस के टुकड़े थे। जब राठौड़ ने शेख से बात की तो वह गालियाँ देने लगी और कहा, ” जो चाहो करो, मैं डरने वाली नहीं हूँ। ” इस घटना से भक्तों में काफी गुस्सा है।

महाराष्ट्र सरकार ने आषाढ़ी वारि जुलूस के लिए कई नियम लागू किए हैं। इस दौरान जुलूस के गुजरने वाले क्षेत्र में माँस और शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके अलावा पंढरपुर में भी माँस-मदिरा की बिक्री बंद है।

वारि जुलूस में दूर-दूर से आकर लोग शामिल होते हैं। हर समुदाय में लोकप्रिय इस जुलूस पर सुरक्षा व्यवस्था का खास ख्याल रखा जाता है। लेकिन नसीम शेख के फेंके गए माँस और हड्डियों के टुकड़े ने लोगों को उकसाने का काम किया है।

पिछले कई सालों से इस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ हिन्दू मंदिरों के बाहर या धार्मिक कार्यक्रम में माँस, हड्डियाँ, गाय के सिर फेंके गए। असम के धुबरी जिले में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस साल बकरीद के दौरान दो बार हनुमान मंदिर के बाहर गाय के सिर फेंके गए। घटना के बाद राज्य सरकार ने देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े। बदरपुर और लखीपुर के शिव मंदिरों के पास भी माँस के टुकड़े मिले थे। इसके बाद कई मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया था।

यूपी के लखनऊ, प्रयागराज, अमेठी और सोनभद्र के मंदिरों के बाहर भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं। इसके बाद इलाके में तनाव फैल गया। इस साल मार्च में भी महाकुंभ मेले के बाद हिन्दू घरों के बाहर गाय के कटे सिर मिले, जो सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती है।

ये पूरा पैटर्न यूपी से असम तक फैल गया है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और झारखंड के पास हिन्दू समारोह में माँस फेंकने की खबरें आई हैं। कई बार सीसीटीवी फुटेज में पुलिस ने आरोपियों को ऐसा कर बाइक या पैदल भागते हुए देखा गया।

दरअसल कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन लगातार हिन्दू धार्मिक स्थलों, समारोहों को अपवित्र करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की साजिश कर रहे हैं। बार-बार ऐसी होने वाली घटनाओं के बावजूद सख्ती बरतने में राजनीतिक हिचकिचाहट ऐसे तत्वों को बढ़ावा देता है।

इजरायल में भी शुरू हुआ ‘ऑपरेशन सिंधु’, 161 लोग पहुँचे दिल्ली: भारतीयों को लगातार वापस ला रही सरकार, ईरान से अब तक 2003 लोग सकुशल पहुँचे देश

इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के बीच दोनों देशों में फँसे भारतीयों को वापस देश लाने के लिए सरकार ऑपरेशन सिंधु मिशन के तहत लोगों को रेस्क्यू कर रही है। इसके तहत अब तक 2003 लोग सकुशल भारत लाए जा चुके हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार (23 जून 2025) को ईरान के मशहद से 290 भारतीय नागरिकों के साथ एक श्रीलंका के नागरिक को भी सकुशल दिल्ली पहुँचाया गया है। ईरान के अलावा ऑपरेशन सिंधु के तहत अब इजरायल से भी भारतीयों को निकाला जा रहा है। इजरायल से 161 भारतीय नागरिकों का पहला जत्था 24 जून को दिल्ली पहुँच चुका है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि 23 जून 2025 की शाम को 290 भारतीय नागरिकों और एक श्रीलंकाई नागरिक को मशहद से निकाला गया है।

12 दिनों से संघर्ष जारी

इजरायल और ईरान के बीच 13 जून 2025 से ही संघर्ष चल रहा है। दोनों देश एक दूसरे पर मिसाइल और ड्रोन्स से हमला कर रहे हैं। इससे वहाँ कई लोगों के मरने और हताहत होने की खबरें सामने आईं। इसी बीच जम्मू-कश्मीर समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से ईरान गए लोगों के परिवारों ने उन्हें वापस लाने के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाई।

इसके बाद भारत सरकार ऑपरेशन सिंधु चलाकर अपने लोगों को वापस लाने का जतन शुरू किया। इसके तहत पहले जत्थे में ईरान से 110 लोगों को अर्मेनिया के रास्ते भारत लाया गया। इसके बाद से लगातार लोगों को वापस लाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गरिटा ने बताया कि भारत सरकार की ओर से ऑपरेशन सिंधु के हिस्से के तहत अगले दो से तीन दिनों में ईरान से तीन अतिरिक्त उड़ानें (एक्ट्रा एवैक्यूवैशन फ्लाइट्स) निर्धारित की गई है ताकि भारतीयों को वापस लाया जा सके।

लगातार बढ़ते हमलों से इजराइल में भी काफी लोग घायल हो रहे हैं और कई लोगों की मौत भी हो गई है। इसके बाद ऑपरेशन सिंधु के तहत इजरायल से भी लोगों को भारत लाया जा रहा है। सोमवार को इस ऑपरेशन के तहत 604 भारतीय नागरिकों को मिस्र (इजिप्ट) और जॉर्डन के रास्ते से होकर इजरायल से निकाला गया है।

ऑपरेशन सिंधु का यह सफर आसान नहीं रहा है। इजरायल से जॉर्डन और फिर अम्मान से रवाना हुई उड़ान को कुवैत से डायवर्ट कर दिया गया था। सोमवार की रात को ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों के कारण कुवैत का एयरस्पेस बंद कर दिया गया।

इजरायल और ईरान के संघर्ष के बीच तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिका ने रविवार (22 जून 2025) की तड़के ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ चलाकर ईरान के तीन प्रमुख परमाणु सुविधाओं पर हवाई हमले कर दिए।

इसके जवाब में ईरान ने कतर और इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कई मिसाइलें दागीं, जिनमें कतर का अल-उदेइद एयरबेस भी शामिल था। ये इस क्षेत्र में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। इशके बाद कतर ने एयरस्पेस कुछ घंटों के लिए बंद कर दिया था।

ट्रंप ने बड़बोलेपन में कर दिया ‘सीजफायर’ का दावा, ईरान ने कर दिया इंकार: इजरायल की ओर से हमला रुका तो शिया मुल्क ने दिया शांति का संकेत, संघर्ष पर अब लग सकता है विराम

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार (23 जून 2025) को बताया कि उनके दोस्तों, इजरायल और ईरान के बीच पूरी तरह से युद्ध रुकने पर सहमति बन गई है। ट्रंप ने कहा कि यह 24 घंटों के अंदर सीजफायर धीरे-धीरे लागू हो जाएगा।

शुरुआत में थोड़ी गड़बड़ हो गई, क्योंकि ईरान ने तुरंत कहा कि उन्हें युद्ध रोकने का ऐसा कोई प्रस्ताव मिला ही नहीं और मंगलवार (24 जून 2025) सुबह तेहरान में कई ज़ोरदार धमाकों के बाद, ईरान के विदेश मंत्री ने इशारा दिया है कि युद्धविराम समझौता लागू हो गया है।

ईरान ने कतर और इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कई मिसाइलें दागीं, जिसमें कतर में अल-उदीद एयर बेस भी शामिल था, जो इलाके में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य अड्डा है।

12 दिन बाद युद्ध विराम- ट्रंप

ट्रंप ने सोमवार (23 जून 2025) को अपनी सोशल मीडिया साइट ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि इजरायल और ईरान के बीच 12 दिन से चल रहा युद्ध अब रुक जाएगा। ट्रंप ने आगे कहा, “सभी को बधाई! इजरायल और ईरान के बीच यह मान लिया गया है कि पूरी तरह से युद्ध रुक जाएगा। यह 12 घंटों के लिए होगा, जिसके बाद युद्ध खत्म मान लिया जाएगा।”

ट्रंप के मुताबिक, ईरान युद्ध रोकना शुरू करेगा और 12 घंटे बाद इजरायल इसमें शामिल होगा, और अगले 12 घंटों के बाद, ’12 दिन के युद्ध का अंत पूरी दुनिया मनाएगी।’ ट्रंप ने दोनों देशों को इस लड़ाई को खत्म करने के लिए उनकी ‘मजबूती, हिम्मत और समझदारी’ के लिए शाबाशी दी।

ट्रंप ने यह भी कहा कि इजरायल और ईरान मेरे पास लगभग एक साथ आए और ‘शांति!’ बोले। ट्रंप ने ईरान का धन्यवाद किया कि उन्होंने हमें पहले से जानकारी दी, जिससे किसी की जान नहीं गई और कोई ज़ख्मी नहीं हुआ।

ट्रंप ने कहा कि शायद अब ईरान इलाके में शांति और दोस्ती की ओर बढ़ सकता है और उन्होंने इजरायल को भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा दिया।

ईरान का जवाब

ट्रंप के युद्धविराम के दावे के तुरंत बाद, ईरान ने कहा कि उन्हें अमेरिका से युद्ध रोकने का कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। ईरानी विदेश मंत्री ने ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर कहा, “अभी तक, युद्ध रोकने या सैन्य कार्रवाई खत्म करने पर कोई ‘सहमति’ नहीं बनी है।”

ईरानी विदेश मंत्री ने आगे कहा, “हालाँकि, अगर इजरायली सरकार तेहरान के समय के अनुसार सुबह 4 बजे तक ईरानी लोगों के खिलाफ अपनी गैरकानूनी हमला बंद कर देती है, तो हमारा उसके बाद अपनी कार्रवाई जारी रखने का कोई इरादा नहीं है। हमारी फौजी कार्रवाई खत्म करने का आखिरी फैसला बाद में लिया जाएगा।”

हालाँकि, मंगलवार (24 जून 2025) सुबह तेहरान में कई ज़ोरदार धमाकों के बाद, ईरान के विदेश मंत्री ने इशारा दिया कि युद्धविराम समझौता लागू हो गया है।

इजरायल का जवाब

इजरायल ने युद्धविराम के दावे पर चुप्पी साध रखी है और अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है।

इजरायली मीडिया के अनुसार, इजरायली अधिकारियों ने कहा है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू ट्रंप की युद्धविराम योजना के साथ हैं, लेकिन शर्त यह है कि ‘ईरान अपने मिसाइल हमलों को रोकने का वादा करे।’

’12 दिन का युद्ध’ कैसे शुरू हुआ

इजरायल-ईरान के बीच लड़ाई 13 जून 2025 को तब शुरू हुई जब इजरायल ने ईरानी फौजी और परमाणु ठिकानों पर ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन‘ नाम का एक बड़ा हवाई हमला किया।

जवाब में, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ नाम से ड्रोन और मिसाइलों से बड़ा हमला किया, जिसमें इजरायली लड़ाकू विमान के ईंधन बनाने वाले ठिकाने और बिजली सप्लाई के केंद्र निशाने पर थे।

तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिका ने रविवार (22 जून 2025) सुबह ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के तहत ईरान के तीन बड़े परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए।

युद्धविराम के दावों के बीच भी हमले जारी रहे

युद्धविराम के दावों के बीच भी हमले जारी रहे। इजरायल के रक्षा बलों (IDF) ने बताया कि ईरान से इजरायल की ओर मिसाइलें दागी गई हैं।

IDF ने ‘एक्स’ पर लिखा, “IDF ने पक्का किया है कि कुछ देर पहले ईरान से इजरायली इलाके की ओर मिसाइलें दागी गई हैं। बचाव करने वाली मशीनें खतरे को रोकने के लिए काम कर रही हैं।”

इसके अलावा, ट्रंप की युद्धविराम घोषणा के घंटों बाद मंगलवार (24 जून 2025) तड़के तेहरान में ज़ोरदार धमाकों से हमला हुआ।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार (23 जून 2025) को कहा कि अमेरिकी हमलों से उसके बुनियादी ढाँचे को तोड़ने के बाद ईरान अब परमाणु हथियार बनाने में सक्षम नहीं है। यह देखने वाली बात होगी कि यह युद्धविराम कितना टिक पाता है और क्या इजरायल और ईरान के बीच शांति कायम हो पाएगी।

कर्नाटक में जिस घोटाले पर सिद्धारमैया ने निकाली थी पदयात्रा, CM बनते ही भूल गए: कॉन्ग्रेसी मंत्री ने दिलाई अधूरे वादे की याद, कर डाली SIT बनाने की डिमांड

कर्नाटक में अवैध खनन का पुराना घाव फिर हरा हो गया है। वैसे, इस बार सवाल उठाने वाले कोई और नहीं, बल्कि सिद्धारमैया सरकार के अपने कानून मंत्री एच के पाटिल हैं। पाटिल ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सात पन्नों का तीखा पत्र लिखकर सरकार की नीयत और नाकामी पर सवाल खड़े किए हैं।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के कानून मंत्री एचके पाटिल ने कहा कि 2007 से 2011 के बीच अवैध खनन से राज्य को 1.5 लाख करोड़ का चूना लगा, लेकिन अब तक सिर्फ 7.6% मामलों की जाँच पूरी हुई। बाकी मामले सरकारी फाइलों में धूल खा रहे हैं। पाटिल ने चेताया कि जनता में सरकार की इस सुस्ती से गुस्सा है, और अगर जल्द कदम नहीं उठे, तो लोगों का भरोसा टूट जाएगा।

पाटिल ने साफ कहा कि सरकार दोषियों को सजा दिलाने और लूटी गई दौलत वसूलने में ईमानदारी नहीं दिखा रही। उन्होंने कई बड़े सुझाव दिए – जैसे दोषियों की संपत्ति जब्त करने के लिए विशेष आयुक्त की नियुक्ति, एक नया विशेष जाँच दल (SIT) बनाने और अवैध खनन के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत शुरू करने की माँग की।

उन्होंने यह भी कहा कि पुराने सबूतों को सुरक्षित रखा जाए, वरना वे गायब हो सकते हैं। पाटिल का यह पत्र ऐसे वक्त आया है, जब हाल ही में सीबीआई की अदालत ने पूर्व मंत्री गली जनार्दन रेड्डी को ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी (OMC) से जुड़े मामले में दोषी ठहराया।

दरअसल, कॉन्ग्रेस ने 15 साल पहले अवैध खनन के खिलाफ बेंगलुरु से बेल्लारी तक पदयात्रा की थी और सत्ता में आने का वादा किया था कि दोषियों को सजा दिलाएँगे। लेकिन अब सत्ता में होने के बावजूद कॉन्ग्रेस चुप्पी साधे बैठी है। पाटिल का यह पत्र उस वादे की याद दिलाता है, जिसे कॉन्ग्रेस भूलती नजर आ रही है।

बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने पाटिल का समर्थन करते हुए तंज कसा कि अब देखना है सिद्धारमैया अपने ही मंत्री के सवालों का क्या जवाब देते हैं। बोम्मई ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वालों का उनकी पार्टी में कोई सम्मान नहीं।

यह मामला सिर्फ खनन घोटाले तक सीमित नहीं है। यह सरकार की जवाबदेही और इच्छाशक्ति पर भी सवाल उठाता है। पाटिल ने लिखा कि 12,000 से ज्यादा अवैध खनन के मामले दर्ज हैं, लेकिन सिर्फ 0.2% में ही फैसला हुआ। हालाँकि यह विवाद 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल को भी गर्म कर सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या सिद्धारमैया इस बार कान में तेल डाले बैठे रहेंगे या अपनी ही सरकार के मंत्री की पुकार पर कुछ ठोस कदम उठाएँगे?