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जिस ‘गंगा जल बँटवारा संधि’ से बांग्लादेश को मिलता रहा 35000 क्यूसेक पानी, उसे देने पर अब भारत करेगा विचार: 30 साल पहले हुए समझौते की मियाद पूरी, बांग्लादेश खौफ में

भारत में विकास और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच बांग्लादेश के साथ ऐतिहासिक गंगा जल-बँटवारे की संधि की समीक्षा का वक्त आ गया है। दरअसल भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बँटवारा समझौता 2026 में अपनी अवधि पूरी कर रहा है। भारत ने संकेत दिया कि वह घरेलू जल आवश्यकताओं में वृद्धि के कारण गंगा संधि पर फिर से बातचीत करना चाहता है।

गौरतलब है कि भारत ने पाकिस्तान के साथ हुए सिंधु जल समझौता को निरस्त कर दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने ये भी दोहराया है कि ये ‘अतीत की बात’ हो गई है। ये समझौता भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद निरस्त किया था। नई दिल्ली ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था।

बांग्लादेश में भी राजनीतिक परिस्थितियाँ 30 साल पुरानी वाली नहीं है। गंगा समझौता के तहत बांग्लादेश को बगैर किसी रुकावट के पानी मिलता रहे इसके लिए समझौता करना जरूरी है।

ये संधि 30 साल के लिए था। भारतीय अधिकारी चाहते हैं कि यह केवल 10-15 साल तक का हो। संधि पर भारत के रुख ने बांग्लादेश को चिंतित कर दिया है।

अतीत के आईने में गंगा जल बंटवारा संधि

गंगा नदी भारत और बांग्लादेश के लोगों की जीवनदायिनी है। इसके पानी को साझा करना दोनों देशों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। दोनों देशों के बीच जल बँटवारे को लेकर विवाद 1950 के दशक से शुरू हुआ। उस वक्त भारत ने कोलकाता की ओर पानी मोड़ने के लिए पश्चिम बंगाल के फरक्का में बैराज बनाना शुरू किया।

1971 में अलग राष्ट्र बनने के बाद बांग्लादेश और भारत ने मिलकर इसके समाधान का प्रयास किया। 1972 में भारत और बांग्लादेश ने एक संयुक्त नदी आयोग (JRC) का गठन किया। 1977 में 5 साल के लिए जल-बँटवारे का समझौता हुआ। 1978 से 1982 के बीच लागू इस समझौते के तहत बांग्लादेश को हर हाल में जल उपलब्ध कराने की गारंटी दी गई। समझौता खत्म होने के बाद दोनों देशों ने करीब एक दशक तक जल संसाधनों के बँटवारे पर कोई औपचारिक समझौता नहीं किया। इस दौरान भारत ने गर्मी में गंगा के पानी को अपनी तरफ मोड़ा, जिससे बांग्लादेश के साथ संबंधों में तनाव पैदा हुआ। 1990 के दशक में दोनों पक्षों ने माना कि फरक्का बैराज विवाद को हल करने और गंगा जल बँटवारे के लिए दीर्घकालिक संधि की आवश्यकता है।

1996 में गंगा जल समझौते पर हुआ हस्ताक्षर

भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय तक बातचीत चली। आखिरकार, 12 दिसंबर 1996 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जल-बँटवारे के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को एक ऐसी सफलता के रूप में देखा गया जिसने नदी को लेकर दोनों देशों के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव को खत्म कर दिया।

बांग्लादेश ने इस संधि को अपने किसानों और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जरूरत के रूप में देखा। जबकि भारत ने इसे एक पड़ोसी देश के साथ सहयोग करने के तौर पर लिया। यह समझौता ऐसे समय में हुआ जब दोनों देशों के बीच रिश्ते मधुर हो रहे थे। ढाका में नवगठित हसीना सरकार भारत के साथ अच्छे संबंध बनाना चाहती थी, वहीं भारत की संयुक्त मोर्चा सरकार बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंध सुनिश्चित करना चाहती थी।

गंगा जल समझौते के तहत जल बंटवारा

गंगा जल बँटवारा संधि में जब गंगा में कम जल स्तर होता है तो जल बंटवारा कैसे किया जाए? इस पर सहमति बनी थी। फरक्का में गंगा नदी के प्रवाह के पुराने डेटा के मुताबिक माना गया कि 1 जनवरी से 31 मई के बीच जल स्तर कम रहता है। ये डेटा 1949 से 1988 तक के गंगा नदी में जल प्रवाह के डेटा के आधार पर बताया गया।

जब गंगा का प्रवाह कम होता है, तो भारत और बांग्लादेश पानी का बँटवारा बराबर-बराबर करें। लेकिन बाकी के वक्त भारत गंगा के जल का एक निश्चित हिस्सा लेगा।

  1. फरक्का में जब जल का बहाव 70,000 क्यूसेक या उससे कम होता है तो इसे कम माना जाता है। ऐसे वक्त में दोनों देशों को आधा-आधा पानी मिलता है।
  2. जब प्रवाह 70,000 और 75,000 क्यूसेक के बीच होता है, तो इसे मध्यम माना जाता है। इस वक्त बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक मिलता है जबकि भारत को बाकी पानी मिलता है।
  3. फरक्का में जब गंगा नदी का प्रवाह 75,000 क्यूसेक से अधिक होता है, तो भारत 40,000 क्यूसेक तक पानी ले सकता है और बाकि 35000 क्यूसेक पानी बांग्लादेश को मिलता है।
  4. यह संधि दोनों देशों को गर्मी के मौसम में जब जल प्रवाह नदी में कम होता है, उस वक्त बराबर पानी मिले ये तय करता है। इससे खेतों की सिंचाई में कोई बाधा न आए।
  5. हालाँकि अगर गंगा का जलस्तर असामान्य रूप से कम हो जाता है, तो न्यूनतम प्रवाह की कोई गारंटी नहीं है। दोनों देश आपस में बातचीत कर समस्या सुलझाएँ। संधि के अनुच्छेद II में ये बातें कही गई है।

कौन करता है प्रवाह की निगरानी?

गंगा नदी में जल प्रवाह की निगरानी के लिए भारत-बांग्लादेश संयुक्त नदी आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने एक संयुक्त समिति गठित की जिसमें दोनों पक्षों के तकनीकी अधिकारियों को शामिल किया गया। ये कमेटी गंगा जल स्तर की निगरानी, ​​डेटा का आदान-प्रदान और बाकी काम करती है।

संयुक्त समिति आम तौर पर साल में तीन बार मिलती है। अगर बीच में कोई समस्या आ गई हो, तो उसका हल निकालने के लिए आपात बैठक भी कर सकती है। इसमें तीसरे पक्ष की भागीदारी के लिए कोई प्रावधान नहीं है।

सहयोग और विवाद के तीन दशक

संधि पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद से लगभग 30 साल बीत चुके हैं। इस दौरान कई बार दोनों देशों के बीच विवाद हुए हालाँकि समझौते का सम्मान किया गया। जल स्तर पर निगरानी रखने वाली समिति में दोनों देशों के प्रतिनिधि नियमित रूप से मिलते हैं और डेटा का आदान-प्रदान करते हैं।

हालांकि कई बार बांग्लादेश ने समझौते को लेकर निराशा व्यक्त की है, खासकर उन वर्षों में जब नदी में पानी का प्रवाह काफी कम था।

कुछ अध्ययनों से पता चला है कि वास्तविक जल आपूर्ति वादे से कम की गईं। 1997 से 2016 के बीच, 300 दस-दिवसीय अवधियों में से 94 में, बांग्लादेश को अपने हार्डिंग ब्रिज बिंदु पर फरक्का में दर्ज की गई तुलना में कम पानी मिला। बांग्लादेश ने दावा किया कि उसे हमेशा जल की आपूर्ति कम होती है। बांग्लादेश ने यहाँ तक ​​आरोप लगाया कि भारत कभी-कभी गर्मी के महीने में पानी रोक लेता है और फिर बाद में ज्यादा पानी देकर इसकी भरपाई करता है। इससे बांग्लादेश में फसलों को नुकसान पहुँचता है।

बांग्लादेश में पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने भी पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले नुकसान की ओर इशारा किया है। उन्होंने दावा किया है कि संधि फरक्का में जल के बँटवारे पर केन्द्रित है और बांग्लादेश के दूसरे हिस्सों पर होने वाले प्रभाव की अनदेखी करता है। गंगा के निचले हिस्सों में नदी का खारापन लगातार बढ़ रहा है और इससे भूमि बंजर होती जा रही है।

जबकि भारत का मत है कि संधि के इतर उसने बांग्लादेश को ज्यादा पानी दिया है। पश्चिम बंगाल के राजनेताओं ने शिकायत की है कि उनके अपने किसान और शहर पानी की कमी का सामना कर रहे हैं, जबकि भारत संधि की वजह से बांग्लादेश को गंगा जल देता है।

कोलकाता बंदरगाह में जम रहा है गाद

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने संधि को ‘एकतरफा’ करार देते हुए इसकी समीक्षा पर जोर दिया है। उन्होने हर हाल में नई संधि किए जाने पर बंगाल को अधिक गंगा का जल देने की माँग की है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट यानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट तक 40,000 क्यूसेक पानी लगातार रहे इसके लिए फरक्का बैराज बनाया गया।

लेकिन 1996 की गंगा जल संधि ने फरक्का बैराज के संचालन के तरीके में बदलाव करने के लिए मजबूर किया। कोलकाता के इस व्यस्त बंदरगाह में गाद जमा हो रही है, जिससे जहाजों के आवागमन में दिक्कतें आ रही हैं। यहाँ तक कि फरक्का में स्थित एनटीपीसी के प्लांट को भी पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

भारत के दूसरे राज्यों की भी अलग-अलग शिकायतें हैं। फरक्का से ऊपर बिहार को दिक्कत है कि मॉनसून के दौरान कभी-कभी बैराज से बहुत ज्यादा पानी छोड़ दिया जाता है जिससे बाढ़ आ जाती है। इस वक्त फरक्का बैराज के गेट भी खोल दिए जाते हैं, जिससे बिहार के गंगा बेसिन में गाद और बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाता है।

बदलते माहौल में संधि की समीक्षा बेहद जरूरी है इसलिए 2026 में संधि की समाप्ति की तारीख आ रही है, तो उम्मीद की जा रही है कि भारत लंबे समझौते के लिए तैयार नहीं होगा बल्कि इसकी अवधि थोड़ी छोटी होगी। इसकी तैयारी भी शुरू हो गयी है। पिछले साल भारत सरकार ने गंगा से होने वाली घरेलू जल आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए पश्चिम बंगाल और बिहार के प्रतिनिधियों सहित एक समिति का गठन किया।

बांग्लादेश कहता रहा है कि जल हिस्से में अगर कमी की गई तो उसे भयावह स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। गर्मी के महीनों में कृषि, मत्स्य पालन और पेयजल आपूर्ति की गंभीर समस्या पैदा होगी। जून 2024 में शेख हसीना की दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया कि संधि को बढ़ाए जाने पर बातचीत शुरू होगी, हालाँकि अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

मार्च 2025 में दोनों देशों के विशेषज्ञों की कोलकाता में बैठक हुई। इसमें फरक्का में जल प्रवाह को संयुक्त रूप से मापने की बात कही गई। इस बीच पर्यावरण वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन की चेतावनी दी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा का प्रवाह अनियमित होता जा रहा है। कभी लंबे समय तक जल प्रवाह काफी कम रहता है तो कभी कम वक्त में ज्यादा बारिश से पानी का जलस्तर बढ़ जाता है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट द्वारा 2019 में किए गए एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि जलवायु परिवर्तन आने वाले दशकों में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के रास्ते में बदलाव ला सकता है। इससे लाखों लोग प्रभावित होंगे।

दोनों पक्षों ने माना है कि नई संधि में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रख कर बनाया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का सुझाव है कि नई संधि में बेहतर डेटा संकलन, संयुक्त बाढ़ प्रबंधन की नीतियाँ भी होनी चाहिए, जिससे जल बँटवारा सही तरीके से धरातल पर उतर सके।

बांग्लादेश में बदल गई है सत्ता

हमें ये भी याद रखना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश के बीच नई संधि पर राजनीतिक परिस्थितियों का भी असर पड़ेगा। अगस्त 2024 से बांग्लादेश में अंतरिम सरकार है। भारत ने संकेत दिया है कि वह ढाका में एक निर्वाचित सरकार के साथ बड़े समझौते करना पसंद करता है।

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार का चीन- पाकिस्तान के साथ नजदीकियाँ बढ़ गई हैं। इसलिए भारत ज्यादा सतर्क है। संधि की शर्तें आने वाले दशकों में भारत और बांग्लादेश के बीच राजनयिक संबंधों का भविष्य तय करेंगी। 2026 में संधि को समाप्त होने देना दोनों देशों के बीच अनिश्चितता और अविश्वास की शुरुआत कर सकता है।

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल समझौता संतुलित होना चाहिए। भारत के विकास की रफ्तार को देखते हुए अब 1996 के समझौते में तय की गई शर्तों को जारी रखना संभव नहीं है। किसी भी दो देशों के बीच जल बँटवारे के लिए हमेशा कूटनीति, वैज्ञानिक प्रबंधन और समझौते की भावना की आवश्यकता होती है। गंगा का जल 30 वर्षों से दोनों देशों के बीच शांतिपूर्वक बह रहा है। आने वाले दिनों में गंगा अविरल रहे ये भी जरूरी है, क्योंकि ये दोनों देशों की लाइफ लाइन है। ये समझौता इस ख्याल से भी मील का पत्थर साबित होगा।

6 साल पुराने मामले में IPS गौरव उपाध्याय पर असम के POCSO कोर्ट में आरोप तय, मोबाइल में Video दिखाने के बहाने यौन शोषण का है आरोप

असम कैडर के आईपीएस अधिकारी गौरव उपाध्याय के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। एक स्पेशल कोर्ट ने 6 साल पुराने यौन शोषण केस मामले में गौरव उपाध्याय के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय दंड संहिता (IPC) की अन्य धाराओं के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया है। इसका मतलब है कि अब उन पर कानूनी रूप से मुकदमा चलेगा।

यह मामला दिसंबर 2019 का है। उस समय गौरव उपाध्याय कार्बी आंगलोंग जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) थे। गौरव उपाध्याय पर आरोप है कि उन्होंने एक 14 साल की नाबालिग लड़की को जबरदस्ती किस किया और प्राइवेट पार्ट को छुआ था।

जानें पूरा मामला

कोर्ट पहुँचे यौन शोषण के इस मामले में बताया गया है कि पीड़िता के साथ दो बार यौन शोषण की घटना हुई थी। पहली दीफू में SP बंगले में और दूसरी उस होटल के कमरे में जहाँ पीड़िता अपनी माँ और भाई के साथ रुकी हुई थी।

आरोप पत्र में बताया गया है कि पीड़िता अपनी माँ और भाई के साथ IPS उपाध्याय के बेटे की जन्मदिन की पार्टी में गई थी। पार्टी के बाद उपाध्याय उन्हें अपना दफ्तर दिखाने ले गए। आरोप है कि जब लड़की की माँ वॉशरूम गई थीं, तो उपाध्याय ने लड़की के भाई के सामने ही लड़की को जबरन दो बार KISS किया था।

इसके बाद उपाध्याय ने तीनों (माँ, बेटे और लड़की) को एक होटल में छोड़ा, जहाँ उन्होंने उनके लिए एक सुइट बुक किया था। आरोप है कि होटल के कमरे में उपाध्याय ने अपने मोबाइल पर वीडियो दिखाने के बहाने लड़की के प्राइवेट पार्ट को छुआ और उसे चूमने की कोशिश की। लड़की किसी तरह बेडरूम में जाकर दरवाजा बंद कर पाई।

जब अगले दिन लड़की की माँ को इस बारे में पता चला तो उन्होंने 3 जनवरी 2020 को गुवाहाटी के महिला पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज करवाया। बाद में यह मामला अपराध जाँच विभाग (CID) को सौंप दिया गया। CID ने जाँच के बाद IPS अधिकारी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें पर्याप्त सबूत होने की बात कही गई।

कोर्ट ने कहा है कि आरोपित ने नाबालिग लड़की को जबरन चूमा और उसके प्राइवेट पार्ट को हाथ लगाया जो कि एक आपराधिक कृत्य है। कोर्ट ने साइकोलॉजिस्ट की रिपोर्ट का भी हवाला दिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि लड़की इस घटना के बाद सदमें और अवसाद में चली गई थी।

बता दें कि गौरव उपाध्याय 2012 बैच के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में असम राज्य परिवहन विभाग के अतिरिक्त सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अब इस मामले में उन पर मुकदमा चलेगा। अगली सुनवाई 10 जुलाई 2025 को होगी।

अमेरिका नहीं कर पाया ईरानी न्यूक्लियर प्लांट्स तबाह… CNN और NYT की खबर देख भड़के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप: कहा- ये केवल Fake News, US को कमजोर दिखाना है मकसद

हाल ही में एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट सामने आई, जिसमें दावा किया गया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर जिन ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले हुए थे उन्हें सिर्फ कुछ नुकसान हुआ है। इस रिपोर्ट पर ट्रंप और व्हाइट हाउस का दावा है कि ईरान का पूरा परमाणु ढाँचा नष्ट कर दिया गया है।

ट्रंप ने इन खबरों को ‘फेक न्यूज‘ बताते हुए CNN और The New York Times पर निशाना साधा है।

खुफिया रिपोर्ट का दावा – ठिकानों को पूरी तरह नहीं उड़ाया गया

अमेरिकी रक्षा खुफिया एजेंसी (DIA) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के फोर्डो और नतांज परमाणु ठिकाने पूरी तरह से तबाह नहीं हुए।

रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान के पास अभी भी प्रमुख उपकरण मौजूद हैं और वे कुछ महीनों में परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू कर सकता है।

ट्रंप का जवाब – ‘फेक न्यूज फैलाई जा रही है’

ट्रंप ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर लिखा, “ईरान के परमाणु बेस को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है। ‘टाइम्स’ और ‘सीएनएन’ झूठ बोल रहा है और उन्हें जनता की आलोचना का सामना करना पड़ेगा।”

ट्रंप ने इसे एक शानदार सैन्य सफलता करार दिया और कहा कि ईरान अब शांति के लिए मजबूर होगा। वहीं व्हाइट हाउस प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने खुफिया रिपोर्ट लीक करने वाले को ‘लो-लेवल लूजर’ कहा और आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य ट्रंप को कमजोर दिखाना है।

रिपोर्ट में सामने आई नई जानकारियाँ

  • ईरान ने हमलों से पहले 400 किलो यूरेनियम कहीं और भेज दिया था।
  • सैटेलाइट तस्वीरों में ‘फ़ोर्डो’ के बाहर 16 ट्रक देखे गए, जो कदाचित यूरेनियम को गुप्त जगहों पर ले गए।
  • ‘फ़ोर्डो’ ठिकाना पहाड़ों के नीचे बना है, जिसे बंकर बस्टर बम से भी पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल है।

हमले में इस्तेमाल हुआ भारी हथियारों का जखीरा

B-2 बॉम्बर्स ने फोर्डो और नतांज पर कुल 14 ‘GBU-57 बंकर बस्टर’ बम गिराए।

अमेरिकी नौसेना की पनडुब्बी से इस्फहान पर 30 टॉमहॉक मिसाइलें दागी गईं।

वहीं, जनरल डैन केन इस मिशन के मेन लीडर थे। जनरल ने कहा कि ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुँचाया गया है, लेकिन आखिरी हिसाब लगाना अभी बाकी है।

सीजफायर होने तक लगातार चलता रहा ‘ऑपरेशन सिंधु, युद्ध विराम की घोषणा के बाद जाकर भारत ने अभियान रोका: ईरान-इजरायल से लौटे अब तक 3170 लोग, 1 दिन में 1100 की वापसी

इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में सीजफायर के ऐलान के बाद तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर यह घोषणा की है कि ईरान से भारतीय लोगों को बाहर निकालने के लिए चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन सिंधु’ को धीरे-धीरे बंद कर दिया जाएगा। दूतावास में हेल्प डेस्क भी बंद कर दिया है।

बता दें कि ऑपरेशन सिंधु के जरिए इजरायल और ईरान में फँसे भारतीय नागरिकों को देश वापस लाने के लिए लगातार जतन किए जा रहे हैं। मंगलवार (24 जून 2025) को दोनों देशों के बीच युद्ध विराम के ऐलान के बाद दूतावास ने भी नए लोगों के निकासी के लिए जारी की गई हेल्प डेस्क को बंद कर दिया है।

सोशल मीडिया एक्स पर दूतावास ने लिखा है कि भारत सरकार इस पूरे मसले पर अपनी नजर बनाए हुए है। अगर भारतीय नागरिकों के लिए फिर से कोई खतरा नजर आता है तो नई रणनीति तय की जाएगी।

दूतावास ने ये भी लिखा कि ईरान में रह रहे भारतीय किसी भी तरह की सहायता के लिए दूतावास की ओर से जारी किए गए टेलीग्राम चैनल या हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

कतर ने बंद किया था एयरस्पेस

इजरायल और ईरान के संघर्ष के बीच अमेरिका ने भी ईरान के परमाणु सुविधाओं पर हमले किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की थी। इसके तहत सीरिया, इराक और कतर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान ने मिसाइलों से हमला किया था।

इसके कारण कतर ने अपना एयरस्पेस कुछ घंटों के लिए बंद कर दिया था। भारत सरकार लगातार इस पूरे मामले पर अपनी नजर बनाए हुई थी। इस बारे में विदेश मंत्रालय ने भी मंगलवार को ही अपना बयान जारी किया।

मंत्रालय ने कहा कि इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को लेकर हम गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं। कतर द्वारा एयरस्पेस दोबारा खोले जाने के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा कि इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष विराम की खबरें और कतर की ओर से निभाई गई भूमिका का हम स्वागत करते हैं।

भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी किया गया बयान (साभार X/@MEAIndia)

विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत इस दिशा में हर संभव सहयोग देने को तैयार है और हम उम्मीद करते हैं कि सभी पक्ष मिलकर शांति और स्थिरता की दिशा में काम करेंगे।

भारत की ओर से इजरायल और ईरान में फँसे भारतीयों को वापस लाने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू किया गया था। इसके तहत बुधवार (25 जून 2025) की रात 12:01 बजे ईरान के मशहद से 282 भारतीयों को फ्लाइट के जरिए दिल्ली लाया गया। मंगलवार को भारत में 1100 से भी अधिक नागरिकों को देश वापस लाया गया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान और इजरायल से निकल गए और भारतीय नागरिकों की कुल संख्या 3170 हो गई है। ईरान से 2858 लोग अब तक रेस्क्यू किया जा चुके हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिडल ईस्ट के 6 खाड़ी देशों में 90 लाख से भी अधिक भारतीय रहते हैं। इनमें यूएई में 35.5 लाख, सऊदी अरब में 26 लाख, कुवैत में 11 लाख, ओमान में 7.79 लाख, कतर में 7.45 लाख और बहरीन में 3.3 लाख लोग शामिल हैं।

पहले भी भारतीयों के लिए चले कई ऑपेशन

आपदा के साथ किसी भी अन्य स्थिति में भी भारत ने अब तक कई ऑपरेशन चला कर विदेशों में रह रहे भारतीयों को देश वापस लाने में सफलता हासिल की है। इसके तहत 2020 में कोविड में सहायता देने के लिए मालदीव के लिए ‘ऑपरेशन संजीवनी’ चलाया गया।

2021 में भारत के अफगानिस्तान में सिखों और हिंदुओं को रेस्क्यू करने के लिए ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ और तालिबान के कब्जे के बाद ‘ऑपरेशन अजायी’ चलाया गया। 2022 में रूस यूक्रेन के युद्ध के दौरान भारतीय छात्रों और नागरिकों को रेस्क्यू के लिए ‘ऑपरेशन गंगा’ के साथ 2023 में सूडान में हुए सिविल वॉर में भारतीय नागरिकों के रेस्क्यू के लिए ‘ऑपरेशन कावेरी’ चलाया गया।

इसी तरह 2023 में तुर्किए में आए भूकंप में सहायता देने के लिए ‘ऑपरेशन मित्र शक्ति’ और अप्रैल 2025 में म्यांमार में आए भूकंप के बाद मदद के लिए ‘ऑपरेशन ब्रह्मा’ समेत कई अन्य मिशन भी इस कड़ी में अपना कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं।

अपने मुँह मिया मिट्ठू बने ट्रंप हो गए ‘शांतिदूत’, पाकिस्तान ने नोबेल के लिए किया नामित: खुद को युद्ध रोकने वाला ‘मसीहा’ समझते हैं अमेरिकी राष्ट्रपति, सांसदों ने पढ़े शान में कसीदे

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे ‘युद्ध’ को रोकने में अपनी सबसे बड़ी भूमिका बताई है। इसके बाद ट्रंप को ‘शांति दूत’ बनने के लिए 2025 के नोबेल प्राइस के लिए नामिक किया गया है।

ट्रंप की इस ‘शांति स्थापना’ के बाद ना सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों से भी लोग ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करने की बात कर रहे हैं। हालाँकि, इस पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सोशल मीडिया पर यह चर्चा जोरों पर है।

नोबेल शांति पुरस्कार: ट्रंप फिर रेस में, शांतिदूत बनने की होड़

डोनाल्ड ट्रंप को इज़रायल और ईरान के बीच युद्धविराम में उनकी ‘ऐतिहासिक भूमिका’ के लिए 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। अमेरिकी सांसद बडी कार्टर और पाकिस्तान ने उनके कूटनीतिक प्रयासों की खुलकर सराहना की है।

बडी कार्टर ने नोबेल शांति पुरस्कार समिति को लिखे पत्र में कहा कि ट्रंप की अगुवाई ने 12 दिन तक चले इज़रायल-ईरान युद्ध को खत्म करने में मदद की। उन्होंने दावा किया कि ट्रंप की कोशिशों से एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष को टाला जा सका और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका गया।

कार्टर ने ट्रंप की कार्रवाई को ‘निर्णायक’ बताया, जिसने एक ऐसा समझौता करवाया जिसे कई लोग असंभव मानते थे। उनके अनुसार, ट्रंप की कोशिशें शांति, युद्ध रोकने और अंतरराष्ट्रीय एकता के उन आदर्शों को दर्शाती हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार सम्मानित करता है।

यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप को नोबेल के लिए नामित किया गया है। इससे पहले, अमेरिकी सांसद डैरेल इस्सा ने भी 2024 के लिए उनके वैश्विक प्रभाव और चुनावी जीत के लिए नामांकन किया था।

पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भी नोबेल समिति को पत्र लिखकर ट्रंप को पुरस्कार देने की सिफारिश की है। उन्होंने भारत-पाकिस्तान के हाल के तनाव में ट्रंप के ‘निर्णायक कूटनीतिक दखल’ की तारीफ की थी।

नोबेल की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, 2025 के शांति पुरस्कार के लिए कुल 305 लोग और संगठन नामांकित हैं।

युद्ध विराम का ‘ड्रामा’: ट्रंप का ऐलान और फिर ‘पलटवार’

यह सब तब हुआ जब क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई तेज़ हो गई थी। 13 जून 2025 को इज़राइल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इज़राइली सैन्य ठिकानों पर हमला किया। फिर अमेरिका भी इस लड़ाई में कूद गया और ईरान की तीन मुख्य परमाणु सुविधाओं – फोर्डो, नतान्ज़ और इस्फ़हान पर सटीक हमले किए।

ईरान ने भी अमेरिकी हमले के जवाब में कतर, सीरिया और ईराक के अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। इज़राइली वायु सेना (IAF) ने तेहरान के उत्तर में एक ईरानी रडार प्रतिष्ठान पर सीमित हमला किया।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने इज़राइल पर दो बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। फिर ट्रंप ने ‘सीजफायर का उल्लंघन’ करने पर कड़ी नाराज़गी जताई और कहा कि दोनों देश ‘इतनी देर और इतनी मुश्किल से लड़ रहे हैं कि उन्हें पता नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।”

नेतन्याहू और काट्ज़ का ‘ट्रंप प्रेम’: युद्धविराम का सम्मान, सहयोग का वादा

इसके तुरंत बाद, इज़राइली प्रधान मंत्री कार्यालय ने एक बयान में कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच बातचीत के बाद, इज़राइल ने ईरान पर आगे के हमलों पर रोक लगा दी है।

इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ ने एक्स पर एक पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ अपनी बातचीत के दौरान इज़राइल के साथ सहयोग की सराहना की।

काट्ज़ ने यह भी कहा कि अगर ईरान अपने समझौते का पालन करता है तो इज़राइल ‘युद्धविराम का सम्मान करेगा’। काट्ज़ ने एक्स पर कहा, “मैंने कुछ ही देर पहले अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ से बात की। मैंने ईरानी परमाणु खतरे के खिलाफ इज़राइल के साथ कार्रवाई करने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साहसिक फैसले के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। सचिव ने इज़राइल और IDF की ऐतिहासिक उपलब्धियों की सराहना की। मैंने जोर दिया कि इज़राइल युद्धविराम का सम्मान करेगा – जब तक दूसरा पक्ष करता है। हम घनिष्ठ अमेरिका-इज़राइल सुरक्षा सहयोग को गहरा करने पर सहमत हुए।”

गुजरात में बढ़ी BJP की लोकप्रियता, जनता का विश्वास भी बरकरार : गुजरात उपचुनाव के नतीजों में बिखरा दिखा विपक्ष, कॉन्ग्रेस हुई साफ

गुजरात की दो विधानसभा सीटों विसावदर और कादी पर हुए उपचुनाव के नतीजे सामने आ गए हैं। विसावदर सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के उम्मीदवार गोपाल इटालिया ने 17,554 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जबकि कादी सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राजेंद्र चावड़ा ने 39,452 वोटों की बड़ी बढ़त के साथ जीत हासिल की।

इन दोनों ही सीटों पर कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। हर सीट की स्थिति अलग थी, जिससे नतीजों में भी अंतर नजर आया। इन नतीजों से यह साफ होता है कि गुजरात में बीजेपी की पकड़ अब भी मजबूत है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने कॉन्ग्रेस के समर्थन के साथ खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने में कुछ हद तक सफलता हासिल की है।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस को लेकर यह धारणा भी बन रही है कि वह आप की ‘बी टीम’ बनती जा रही है, जिससे उसकी राजनीतिक साख को नुकसान हो रहा है। कुल मिलाकर यह उपचुनाव गुजरात की राजनीति में जारी बदलाव और सत्ता संतुलन की दिशा में एक संकेत माना जा सकता है।

विसावदर विधानसभा परिणाम

विसावदर विधानसभा सीट आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व विधायक भूपत भयानी के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। इस सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी, कॉन्ग्रेस और आप तीनों पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे।

हालाँकि चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया कि कॉन्ग्रेस की मौजूदगी इस बार बेहद कमजोर रही। कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार नितिन रणपारिया को सिर्फ 5,501 वोट मिले, जो यह दिखाता है कि पार्टी अपना पुराना गढ़ बचाने में पूरी तरह नाकाम रही। इस चुनाव में कॉन्ग्रेस की निष्क्रियता साफ नजर आई।

न तो प्रचार अभियान ज़ोरदार था और न ही स्थानीय स्तर पर कोई मजबूत नेतृत्व दिखाई दिया। जनता ने भी अब कॉन्ग्रेस के बजाय दूसरी पार्टियों को विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते यह उम्मीद की जाती है कि कॉन्ग्रेस का क्षेत्रीय स्तर पर पकड़ मजबूत होगी, लेकिन विसावदर के नतीजों ने इस धारणा को पूरी तरह उलट कर रख दिया।

विसावदर उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की हालत इतनी खराब रही कि उसका उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सका। कभी यह विधानसभा सीट कॉन्ग्रेस का मजबूत गढ़ मानी जाती थी, लेकिन अब पार्टी की पकड़ पूरी तरह ढीली पड़ गई है।

सिर्फ विसावदर ही नहीं, बल्कि पूरे गुजरात में कॉन्ग्रेस का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है। हालात इतने खराब हो गए हैं कि गुजरात कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शक्तिसिंह गोहिल ने चुनावी हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

आज के राजनीतिक माहौल में जब आम आदमी पार्टी जैसी नई पार्टी मजबूती से चुनाव लड़ रही है, तब कॉन्ग्रेस को अपनी रणनीति और नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठाने चाहिए। अगर पार्टी के पास साफ विज़न और योजना नहीं है, तो हार की जिम्मेदारी उसी पर आती है।

विसावदर में कॉन्ग्रेस का रवैया ऐसा दिखा जैसे वह आप को जानबूझकर मजबूत करने के लिए मैदान में लाई हो, मानो आप उसकी ‘बी टीम’ हो। आम आदमी पार्टी के प्रति कॉन्ग्रेस का यह उदासीन और कमजोर रवैया भी नतीजों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण बना।

विसावदर उपचुनाव में कॉन्ग्रेस ने न तो मजबूत प्रचार किया और न ही स्थानीय मुद्दों पर ध्यान दिया। यही वजह रही कि पार्टी पाटीदार वोटरों को जोड़ने में नाकाम रही, जो बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार गोपाल इटालिया के पक्ष में चले गए।

इससे साफ दिखता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी ने एक नई पार्टी के सामने हार मान ली है। कॉन्ग्रेस की कमजोरी का एक और बड़ा कारण उसके कार्यकर्ताओं की कमी थी। उम्मीदवार के साथ सिर्फ 5-7 लोग दिखाई दिए, बाकी कोई स्थानीय संगठन या समर्थन नजर नहीं आया।

इस तरह की लापरवाही किसी भी पार्टी के लिए राजनीतिक आत्महत्या के बराबर होती है और इससे यह सवाल खड़ा होता है कि गुजरात में कॉन्ग्रेस का भविष्य क्या होगा। दिलचस्प बात यह है कि कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे पर अक्सर बीजेपी की ‘बी टीम’ होने का आरोप लगाती रही हैं।

गोपाल इटालिया ने भी चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस को भाजपा की ‘बी टीम’ कहा था। लेकिन इन चुनाव नतीजों को देखते हुए यह तस्वीर बन रही है कि कॉन्ग्रेस ही अब आप की ‘बी टीम’ बनकर रह गई है।

आंतरिक कलह और उम्मीदवार विवाद के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा

विसावदर में भाजपा की हार अब गुजरात की राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बन गई है। हालाँकि यह सीट परंपरागत रूप से बीजेपी की मजबूत सीट नहीं रही है, लेकिन फिर भी यह पार्टी के लिए आगे बढ़ने का एक अच्छा मौका था।

2012 से विपक्ष इस सीट पर लगातार मजबूत रहा है और आम आदमी पार्टी की पिछली जीत ने उसके स्थानीय संगठन को और मज़बूत कर दिया। इस बार भी भाजपा की हार के पीछे कई वजहें रहीं, जिनमें सबसे अहम रही पार्टी के अंदर की खींचतान और गलत उम्मीदवार का चयन।

भाजपा ने किरीट पटेल को उम्मीदवार बनाया, जिनका चुनाव स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हुआ। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में नाराज़गी फैली, जो प्रचार अभियान में साफ नजर आई। दिलचस्प बात यह है कि किरीट पटेल पहले भी दो बार भाजपा को चुनाव में हरा चुके हैं।

साथ ही इस क्षेत्र में पाटीदार समुदाय के वोटर बड़ी संख्या में आम आदमी पार्टी के गोपाल इटालिया की ओर झुके। इसके अलावा, भाजपा नेता जवाहर चावड़ा का असर भी भाजपा की हार में अहम रहा। उन्हें दरकिनार करने की कोशिशें पार्टी को भारी पड़ीं, क्योंकि उनका क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव है।

हालाँकि हार के बावजूद भाजपा ने परिपक्वता दिखाई और ईवीएम या चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से बची। पार्टी नेता ऋषिकेश पटेल ने कहा कि वे हार की आंतरिक समीक्षा करेंगे और भविष्य में सुधार के लिए काम करेंगे। यही बात भाजपा को अन्य पार्टियों से अलग बनाती है, जो अक्सर हार के बाद सरकार या चुनाव प्रणाली पर आरोप लगाने लगती हैं।

वहीं, गोपाल इटालिया की जीत ने आम आदमी पार्टी में नई ऊर्जा भर दी है। लेकिन यह भी सच है कि उनकी जीत का एक बड़ा कारण भाजपा की आंतरिक समस्याएँ और कॉन्ग्रेस की कमजोरी रही। इसलिए ये नतीजे न सिर्फ एक सीट की जीत या हार हैं, बल्कि गुजरात की राजनीति में बदलाव के संकेत भी हैं।

गुजरात में भाजपा का दबदबा कायम, कादी में भाजपा की जीत

विधानसभा सीट पर भाजपा के राजेंद्र कुमार चावड़ा ने 39,452 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की, जिससे राज्य में पार्टी की मजबूत स्थिति और ज्यादा पक्की हो गई है। इस जीत से साफ हो गया कि गुजरात में भाजपा का प्रभाव अभी भी मजबूत है और उसका संगठनात्मक ढाँचा पूरी तरह सक्रिय है।

जनसंघ के जमाने से पार्टी से जुड़े हुए वरिष्ठ नेता चावड़ा के उम्मीदवार बनने से पार्टी को अपने पारंपरिक वोटरों का समर्थन मजबूत करने में मदद मिली। इस चुनाव में 57.51% की अच्छी वोटिंग दर रही, जो दिखाता है कि भाजपा का चुनाव अभियान लोगों को जोड़ने और मतदान के लिए प्रेरित करने में कामयाब रहा। कुल मिलाकर, कड़ी की यह जीत भाजपा के लिए एक बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला संकेत है।

कादी विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पार्टी की लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत अभी भी मजबूत बनी हुई है।

इस सीट पर भाजपा ने विकास, औद्योगिकीकरण और किसानों के मुद्दों को लेकर प्रचार किया, जो शहरी और ग्रामीण दोनों ही मतदाताओं को काफी पसंद आया। भाजपा नेता ऋषिकेश पटेल ने इस जीत को ‘लोगों की जीत’ कहा, जिससे यह साफ है कि पार्टी इसे जनता के समर्थन और अपनी नीतियों की पुष्टि के रूप में देख रही है।

वहीं, आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस इस सीट पर भाजपा को कोई बड़ी चुनौती नहीं दे पाए। आप के उम्मीदवार जगदीशभाई गणपतभाई चावड़ा को सिर्फ 3,090 वोट ही मिल सके, जो विपक्ष की कमजोर उपस्थिति को दिखाता है।

हालाँकि विसावदर में मिली हार भाजपा के लिए एक चेतावनी भी है। यह हार दिखाती है कि पार्टी को अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार करना होगा और स्थानीय स्तर पर मौजूद आंतरिक संघर्षों और नेताओं की नाराजगी को गंभीरता से लेना होगा।

भाजपा को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि हर क्षेत्र में उसका संगठन और नेतृत्व एकजुट और मजबूत रहे। कुल मिलाकर, जहाँ कादी की बड़ी जीत भाजपा को आत्मविश्वास देती है, वहीं विसावदर की हार उसे आत्ममंथन करने का मौका भी देती है, ताकि भविष्य में और मजबूत होकर सामने आ सके।

2022 के मुकाबले अब भाजपा बेहतर स्थिति में

अगर पूरे गुजरात की बात करें तो विसावदर उपचुनाव में मिली हार से भाजपा को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है। दरअसल, आज की तारीख में भाजपा 2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटों के साथ और भी मजबूत स्थिति में है।

जहाँ तक विसावदर की बात है, यह सीट पहले से ही भाजपा के पास नहीं थी, इसलिए यहाँ मिली हार को पार्टी के लिए झटका नहीं माना जा सकता। इस नजरिए से देखें तो भाजपा की स्थिति पहले से बेहतर है और एक सीट पर हार उसकी बड़ी सफलता की तस्वीर को धुँधला नहीं करती।

अब अगर 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को मौजूदा हालात से जोड़कर देखा जाए, तो साफ होता है कि भाजपा का जनाधार बना हुआ है और पार्टी राज्य में पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनी हुई है।

विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 2022 में बड़ी ऐतिहासिक जीत हासिल की। कुल 182 में से भाजपा ने 156 सीटें जीतकर एक नया रिकॉर्ड बनाया और सरकार बनाई। वहीं, कॉन्ग्रेस को सिर्फ 17 सीटें मिलीं और आम आदमी पार्टी को 5 सीटों पर जीत मिली। इसके अलावा समाजवादी पार्टी को 1 सीट और 3 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। इस चुनाव में भाजपा की शानदार सफलता ने साफ कर दिया कि गुजरात में उसका जनाधार बहुत मजबूत है।

अगर मौजूदा हालातों पर नजर डालें तो गुजरात विधानसभा में इस समय भाजपा के पास 162 सीटें हैं, जबकि कॉन्ग्रेस सिर्फ 12 सीटों पर सिमट गई है। आम आदमी पार्टी ने विसावदर में जीत दर्ज करके अपनी पिछली स्थिति को बरकरार रखा है।

अगर तुलना करें तो 2022 में भाजपा के पास 156 सीटें थीं, जो अब बढ़कर 162 हो गई हैं। यानी पार्टी ने पिछले तीन सालों में 6 और सीटें अपने नाम की हैं। यह दिखाता है कि राज्य में भाजपा की पकड़ और प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

विसावदर उपचुनाव में मिली हार भी भाजपा के लिए कोई बड़ा झटका नहीं है, क्योंकि यह सीट पहले से ही उसके पास नहीं थी। इस लिहाज से देखें तो भाजपा की स्थिति पहले से और मज़बूत हुई है और उसकी विधानसभा में संख्या में बढ़ोतरी ने यह साफ कर दिया है कि वह अब भी राज्य की सबसे ताकतवर पार्टी बनी हुई है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट गुजराती भाषा में राजगुरु भार्गव ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

कॉकरोच नहीं थे चंदा बाबू के बेटे, न CM की बेटी की शादी में शो रूम लूटने वाले कॉकरोच थे: मीडिया को दोषी बता जंगलराज को झुठला नहीं सकते तेजस्वी यादव

बिहार में इस साल विधानसभा चुनाव होने है। पक्ष-विपक्ष अपने-अपने हथियारों को धार देने में जुटा है। मीडिया में भी बिहार को लेकर राजनीतिक साक्षात्कारों का सीजन लौट आया है। इसी कड़ी में बिहार के विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सामाचार एजेंसी ANI से करीब 57 मिनट की लंबी बातचीत की है।

इस दौरान तेजस्वी यादव ने बीजेपी नीत एनडीए से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कई आरोप लगाए। बिहार के हालात को बदतर बताने की कोशिश की। यह भी दावा किया कि 2020 का चुनाव राजद को धांधली से हराया गया था और इस बार उनकी पार्टी का बिहार की सत्ता में आना तय है।

इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। चुनावी मौसम में हर पार्टी/नेता अपने विरोधियों को नकारा बताते हैं। जब तक अंतिम नतीजे नहीं आते हर पार्टी/नेता अपनी जीत के दावे करती है। चुनाव के बाद हार का ठीकरा फोड़ने के लिए बकरा खोजते हैं।

इस साक्षात्कार के दौरान तेजस्वी यादव ने मीडिया पर भी निशाना साधा, जो भारत की राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उदय के बाद से विपक्षी नेताओं के लिए सबसे जरूरी कार्यों में से एक बन चुका है। तेजस्वी यादव ने नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत से लेकर बिहार के जंगलराज तक का ठीकरा मीडिया पर फोड़ने की कोशिश की।

उन्होंने कहा कि मीडिया गुलाम हो चुकी है और उसके प्रोपेगेंडा से बीजेपी जीत रही है। जब उनसे पूछा गया कि बिहार से लेकर राष्ट्रीय मीडिया तक ने उनसे कब अनफेयर ट्रीटमेंट किया तो जवाब में तेजस्वी यादव ने कहा कि राजद की जब भी सरकार आती है तो कॉकरोच की मौत को भी बड़ा बनाकर दिखाया जाता है। आज अपराध हो रहे हैं, लेकिन कोई उसे जंगलराज नहीं बोलता है।

तेजस्वी यादव का यह भी कहना था कि कोई भी घटना होने पर अपराधी को राजद और उसके लोगों से जोड़ दिया जाता है। उसे लालू यादव और तेजस्वी यादव का करीबी बताकर मीडिया दिखाती है। उन्होंने कहा कि राजद की सरकारों को मीडिया ‘महाजंगलराज’ बातकर पेश करती है। कहा जाता है कि उस समय लोग बाहर नहीं निकलते थे। उन्हें उठा लिया जाता था।

आगे तेजस्वी यादव कहते हैं कि कानून-व्यवस्था की स्थिति की तुलना आँकड़ों के आधार पर ही हो सकती है। यदि राजद सरकारों से एनडीए सरकार के समय के अपराध के आँकड़ों की तुलना की जाए तो पता चलता है कि नीतीश कुमार के राज में अपराध सबसे बेलगाम है। लेकिन मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा।

आप नीचे लगे वीडियो में 12 मिनट से लेकर 17 मिनट 40 सेकेंड के बीच यह पूरी बातचीत सुन सकते हैं।

जंगलराज ​बिहार का भयावह अतीत है

जंगलराज- एक ऐसा शब्द है, जिसका बिहार की राजनीति में बार-बार लगातार इस्तेमाल होता है। 1990 से 2005 तक का वह शासनकाल जब तेजस्वी यादव के माता-पिता लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी बिहार की मुख्यमंत्री रहीं, उस कार्यकाल को ‘जंगलराज’ कहा जाता है।

उस दौर में बिहार ने जातीय नरसंहार का भयावह सिलसिला देखा। ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा सुना। अपहरण को ‘उद्योग’ बनते देखा। एक मुख्यमंत्री की बेटी की शादी में शो रूम लूटते और भय से कारोबारियों को बिहार छोड़कर भागते देखा। रोजी-रोजगार से लेकर शिक्षण-स्वास्थ्य संस्थानों को मरते देखा। हेमा मालिनी के गालों की तरह सड़क बनाने का वादा करने वालों के राज में गड्ढों वाली सड़क पर जनता को हिचकोले खाते देखा। लालटेन वाला अंधकार युग देखा है।

सीवान के चंदा बाबू नाम के एक पिता के दो बेटों को तेजाब से नहलाने और एक को गोली मरवा देने वाला राजद का नेता देखा। राजद के उस विधायक को भी देखा जो एक दलित बच्ची को उसके घर से उठाकर अपनी जीप में डालता है। उससे रेप करता है। उसी दौर में IAS अधिकारी बीबी विश्वास की पत्नी, माँ, भतीजी का लगातार दो साल तक यौन शोषण किया गया। जब मामला सामने आया तो आरोपित को बचाने में पूरी सरकार को लगते देखा।

एएनआई को दिए इंटरव्यू में तेजस्वी यादव जंगलराज को झुठलाने की कोशिश करते हुए उदाहरण देने की बात करते हैं। ऊपर मैंने चंद घटनाओं के बारे में बताया है। पर ऐसी घटनाओं की फेहरिस्त इतनी लंबी और भयावह है कि मेरी उँगलियाँ थक जाएँगी, की बोर्ड दबाव से उखड़ जाएँगे, पढ़ते-पढ़ते आपकी आँखें धँस जाएँगी, लेकिन जंगलराज की वे घटनाएँ खत्म नहीं होंगी जो दर्ज हैं और उनसे अधिक जो कहीं दर्ज ही नहीं हुईं।

तेजस्वी यादव को बताना चाहिए कि इनमें से कौन सी घटना कॉकरोच का मरना है। या फिर इनमें से कौन सी घटना को अंजाम देने वालों का राजद से लिंक नहीं रहा है, बल्कि वे कॉकरोच थे।

क्या आँकड़ों की बात करने से धुल जाएगा जंगलराज?

यह सत्य है कि नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में अपराध पर जिस तरह अंकुश लगाया था, जैसे अपराधियों का दमन किया था, बाद में वैसा नहीं दिखा। इसकी सबसे बड़ी वजह नीतीश कुमार का दो मौकों पर राजद के साथ मिलकर सरकार बनाना भी है।

यह भी सच है कि बिहार पुलिस के पास दर्ज अपराधों की संख्या को एकमात्र मानक मान लिया जाए तो लालू-राबड़ी के 15 साल के मुकाबले संख्या कहीं अधिक दिखती है। पर यह अधूरा सत्य है। मीडिया और खासकर सोशल मीडिया के विस्तार से अब किसी अपराध को दफन कर देना आसान नहीं रहा। लोग मामले दर्ज कराने थाने तक पहुँच रहे हैं। बिहार ही नहीं अन्य राज्यों में भी इस पैमाने पर आपको नंबर अधिक ही देखने को मिलेंगे।

पर जंगलराज केवल अपराध की संख्या से नहीं आता। आँकड़ों में चंदा बाबू के तीन बेटों का मारा जाना तो केवल तीन हत्या के रूप में दर्ज है। लेकिन, क्या यही आँकड़े यह भी बताते हैं कि उन्हें किस बेरहमी से मारा गया था? चंदा बाबू ने किस भय में जिंदगी गुजारी? इस घटना ने कितने माँ-बाप को डराया ? इसने कितने शहाबुद्दीन को कानून को रौंद देने की छूट दी?

डाटा भले यह बता दे कि कितनी हत्या हुई। कितने किडनैप किए गए। लेकिन, क्या उससे यह भी पता चलेगा कि उस दौर में हत्या और अपहरण एक ‘उद्योग’ बन चुका था? एक कारोबार था, पैसे कमाने का एक जरिया था? राजनेताओं, अधिकारियों और माफियाओं का ऐसा गठजोड़ इसके पहले कहीं देखा ही नहीं गया था? और सबसे बड़ी बात अपराध का साम्राज्य शहाबुद्दीन जैसे गुंडों और ‘सालों’ के भरोसे चलता था?

बाथे नरसंहार हो या अन्य जातीय नरसंहार, डाटा में वह केवल चंद लोगों की हत्या कही जाएगी। लेकिन इसने भूमिहारों का जनमानस किस वृहद रूप से प्रभावित किया, वह डाटा से सामने नहीं आएगा। ‘भूरा बाल साफ करो’ के नारे से सवर्णों में पैदा हुआ डर आँकड़े नहीं बताते। डाटा नहीं बताता कि बिहार में लोगों ने अपना सरनेम छिपाना शुरू कर दिया था।

मीडिया का गढ़ा नहीं है जंगलराज

ANI को दिए साक्षात्कार में तेजस्वी यादव यह बताने की कोशिश करते हैं कि ‘जंगलराज’ मीडिया का गढ़ा प्रपंच है। वह यह भी बताने की कोशिश करते हैं 2014 से पहले मीडिया दूध की धुली थी। वास्तविकता यह है कि 2014 से पहले भी मीडिया चारा घोटाले के सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव पर ‘मेहरबान’ थी, आज भी है।

मुख्यधारा की मीडिया हो या लिबरल वामपंथी गैंग उसने पहले लालू यादव की सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर छवि गढ़ने की कोशिश की। उसे राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की। बाद में इस लालू यादव की ‘मैनेजमेंट गुरु’ के तौर पर ब्रांडिंग की कोशिश की। यह मीडिया इतनी दरबारी रही है कि वह लालू यादव के कुर्ता फाड़ हुड़दंग को ही होली मानती थी।

यह बि​हारियों का जीवट था कि इन छवियों के सामने उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे जंगलराज की हर एक पीड़ा लेकर सामने आए। उन्होंने कानूनी लड़ाइयाँ लड़ी। सोशल मीडिया ने उन्हें दफन कर दी गई घटनाओं को फिर से सामने लाने का मंच दिया। फिर मीडिया गैंग भी ‘जंगलराज’ के सत्य को स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई।

तेजस्वी यादव को तो इस मीडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए, क्योंकि वह उनमें भी बिहार का भविष्य देखती है। वह उनके जंगलराज के दाग धोने की हरसंभव कोशिश करती है। अपराध के आँकड़े सामने रखकर यह जताने की कोशिश करती है कि जिसे जंगलराज कहा जाता है वो असल में ‘शांति के दिन’ थे।

पर तेजस्वी यादव का दुर्भाग्य यह है कि जंगलराज का सत्य बिहार के भीतर इतने गहरे तक धँसा है कि वह इन थोथले कु(तर्कों) के झाँसे में नहीं आता। लालू यादव के पूरे कुनबे के इसी दुर्भाग्य में बिहार का ‘सौभाग्य’ छिपा है।

बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन जारी, ढाका में इस्लामी कट्टरपंथियों ने घेरा दुर्गा माता का मंदिर : कहा – ‘खुद मंदिर हटा लें, वर्ना तोड़ देंगे’, दी कुछ घंटों की मोहलत

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी मंदिर सुरक्षित नहीं है। शहर के खिलखेत इलाके में मुस्लिम भीड़ ने सोमवार (23 जून 2025) की रात एक हिंदू मंदिर को घेर लिया और मंगलवार तक तोड़ने की धमकी दी।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘श्री श्री दुर्गा मंदिर’ इस इलाके का भव्य मंदिर है, जो इस्लामिक कट्टरपंथियों के निशाने पर है। यहाँ बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। सोमवार को भी काफी संख्या में भक्त मौजूद थे, जब इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हिंदू भक्तों को मंगलवार (24 जून) दोपहर 12 बजे तक मंदिर खुद से तोड़ने या सजा भुगतने की धमकी दी।

मंदिर में मौजूद हिन्दू भक्त सुमन सुधा के मुताबिक इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कहा, “अगर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय उनके हुक्म के आगे नहीं झुका तो वे हिंदू मंदिर को ध्वस्त कर देंगे।”

मंदिर के पास भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस पहुँची और मामले को शांत कराया। घटना पर इंस्पेक्टर मोहम्मद आशिकुर रहमान ने कहा, “हमें घटना के बारे में पता चला है। हमारे वरिष्ठ अधिकारी मामले को (मंगलवार तक) सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।”

उन्होंने माना, “कुछ मुस्लिम वहाँ गए और तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर दी।” बाद में रहमान ने हिंदू मंदिर को तोड़ने के अल्टीमेटम को मंदिर के पास हुई बहसबाजी का नतीजा बताया और मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “हम पूरे मामले की जाँच कर रहे हैं ताकि कोई अप्रिय स्थिति पैदा न हो।”

1400 साल पुराने चंडी माता मंदिर की जमीन पर अब्दुल ने किया कब्जा

बांग्लादेश के ही एक अन्य मामले में कूमिला में अब्दुल अली नाम के व्यक्ति ने हिंदू मंदिर की जमीन पर कब्जा कर लिया। ये मामला लालमाई इलाके में 1400 साल पुराने चंडी माता मंदिर से जुड़ा है, जहाँ अब्दुल अली ने मंदिर की जमीन पर टिन का घर बना लिया और उसे अपनी पैतृक संपत्ति घोषित कर दी।

बांग्ला ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार अली ने हिंदू मंदिर की जमीन पर एक अस्थायी घर बनाया और इसे अपनी ‘पैतृक संपत्ति’ घोषित कर दिया। जब शिव चंडी मंदिर की एक महिला भक्त ने अवैध अतिक्रमण का विरोध किया, तो अली और उसके आदमियों ने उस पर हमला कर दिया। पीड़िता की पहचान चंदना राहुत के रूप में हुई है।

शिव चंडी मंदिर समिति के अध्यक्ष दीपक साहा ने उनके दावों को खारिज करते हुए कहा, “प्रवेश द्वार के पश्चिम की ओर 600 एकड़ जमीन मंदिर के नाम पर दर्ज है। हाल ही में हमने श्रद्धालुओं के लिए इस जमीन पर एक विश्राम गृह बनाया था। लेकिन शनिवार को उसने (अब्दुल अली) हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया। अली ने जमीन पर घर बना लिया है।”

17 जून 2025 को हिंदुओं ने मंदिर की जमीन पर कब्जा करने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया ।

एक अन्य मामले में मुस्ताक नामक एक स्थानीय इस्लामिक कट्टरपंथी और उसके समर्थकों ने संन्यास मंदिर और राधा गोविंदो मंदिर दोनों पर कब्जा कर लिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं के घरों में जाकर धमकी दी कि यदि किसी ने मंदिर में पूजा-अर्चना करने की कोशिश की तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा।

हिन्दुओं ने एकजुटता दिखाई और धमकी का विरोध किया। इस दौरान 16 जून 2025 को मुस्ताक के समर्थकों ने हिन्दू मंदिर कमेटी के अध्यक्ष अतुल चंद्रा सरकार पर हमला कर दिया जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए।

सिर्फ पिता ही नहीं, सिंगल मदर के आधार पर भी बन सकेगा जाति प्रमाण पत्र: ‘न्याय’ के लिए सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने अकेली माँ के बच्चे को ओबीसी सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर गाइडलाइंस जारी कर सकता है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अहम बताते हुए 22 जुलाई को अगली सुनवाई करने की बात कही है। ये याचिका दिल्ली की एक सिंगल मदर ने दायर की है।

याचिका में सिंगल मदर ने बच्चे की माँ के पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर उसे ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने की माँग की है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केवी विश्वनाथन और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस पर सुनवाई करते हुए दिशानिर्देश की बात कही। कोर्ट ने इससे पहले विस्तृत सुनवाई करने पर जोर दिया है।

केन्द्र सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसडी संजय ने भी इस मुद्दे पर विचार करने का अनुरोध किया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा है कि वह याचिका की कॉपी सभी राज्यों के वकीलों को दे। जिस राज्य को अपनी बात रखनी होगी, वह अगली सुनवाई में रख सकता है।

जुलाई में सुनवाई के दौरान कोर्ट ये देखेगा कि सिर्फ पिता की जाति के आधार पर बच्चे को ओबीसी आरक्षण का फायदा मिलना चाहिए या नहीं। अगर किसी ओबीसी महिला ने दूसरी जाति के पुरुष से शादी की तो उनके होने वाले बच्चों को भी ओबीसी सर्टिफिकेट मिलना चाहिए या नहीं।

याचिकाकर्ता ने उस नियम को चुनौती दी है जिसमें पिता के ओबीसी होने पर ही बच्चे को ओबीसी सर्टिफिकेट दिया जाता है। कोर्ट अब इस मुद्दे पर गाइडलाइन्स जारी करने की बात कही है।

इस मामले में कोर्ट ने 2012 के उस फैसले का जिक्र किया जिसमें एक जनजातीय महिला और सवर्ण पुरुष की शादी हुई थी। ‘रमेशभाई दभाई नाइका बनाम गुजरात’ मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चे की परवरिश माँ ने किया, जो एससी/ एसटी से संबंधित है। सवर्ण पिता का बेटा होने के कारण उसे जीवन में कोई फायदा नहीं मिला, बल्कि माँ के समुदाय के कारण वह अभाव, अपमान और कई तरह की बाधाओं के बीच जिंदगी जी रहा है। बच्चे को भी माँ के समुदाय का सदस्य माना जा रहा है, न सिर्फ माँ के समुदाय द्वारा बल्कि दूसरे समुदाय के द्वारा भी, तो उसे माँ के समुदाय का फायदा मिलेगा।

कोर्ट ने कहा कि अगर माँ एससी/ एसटी है और पिता नहीं है तो क्या होगा? ऐसे मामलों की विस्तृत सुनवाई के दौरान चर्चा की जाएगी।

लोगों को खूब पता है किसे कहते हैं ‘इराज’, पर आपकी ‘चाराबुद्धि’ ही समझने को नहीं है तैयार: तेजस्वी यादव ने हिंदुओं को कोसते हुए बेटे के नाम पर फिर फैलाया झूठ, जानिए क्या है सत्य

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के घर में उनके बेटे के नाम पर जितनी चर्चा नहीं हुई होगी उससे अधिक चर्चा उस नाम को लेकर देश के अन्य हिस्सों में होने लगी है। कोई इसे संस्कृत का शब्द कह रहा है तो कोई ऊर्दू का। इतना ही नहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने तो ‘इराज’ नाम का मजाक उड़ाते हुए तेजस्वी को ईरान और इराक नाम रखने की भी सलाह दे दी थी।

अब एक इंटरव्यू में तेजस्वी ने जहाँ फिर एक बार इस नाम को भगवान ‘हनुमान’ का नाम बताया है, वहीं दूसरी तरफ संस्कृति के जाने-माने विद्वान, शोधकर्ता और संपादक नित्यानंद मिश्रा ने तेजस्वी के बेटे के नाम ‘इराज’ को ‘कामदेव’ का नाम बताया है।

न्यूज एजेंसी ANI के तेजस्वी यादव से लिए गए एक इंटरव्यू की वीडियो में 31 मिनट 9 सेकेंड से 33 मिनट 10 सेकेंड तक उनके बेटे के इराज नाम पर चले सवाल-जवाब वाली क्लिप में तेजस्वी यादव से पूछा गया कि बीजेपी आप पर हमेशा आरोप लगाती है कि आप मुस्लिमों के हितैषी हैं, आपने बेटी का नाम कात्यायानी रखा है जो कि माँ दुर्गा के नाम पर है। वहीं बेटे का नाम इराज रखा है, जो कि भगवान हनुमान के नाम पर है। तो आप इसके जरिए क्या मैसेज देना चाह रहे हैं?

इस पर जवाब देते हुए तेजस्वी ने कहा कि जब हमने अपने बेटे का नाम इराज रखा और लालूजी ने सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा की। इसके बाद कई भक्त लोग ऐसे थे जिन्होंने कमेंट में लिखा कि इराज क्यों नाम रख रहे हो, एजाज खान नाम रख लेते। ईरान और इराक रख लेते।

तेजस्वी ने कहा “लोगों को ये नहीं पता है कि ‘इराज’ संस्कृत का शब्द है और इसका मतलब है ‘पवनपुत्र’। जो कि हनुमान जी का नाम है। उन लोगों को कोई ज्ञान नहीं है सनातन का।” भाजपा पर तंज कसते हुए तेजस्वी ने कहा कि पार्टी के लोगों को ना ही संविधान का ज्ञान है ना ही धर्म का।

वहीं हिंदू धर्म और संस्कृत पर एक दर्जन से अधिक किताबें लिख चुके संपादक नित्यानंद मिश्रा ने यूट्यूब पर एक वीडियो जारी करते हुए बताया है कि इराज नाम तो बेशक संस्कृत का शब्द है, लेकिन इसका भगवान हनुमान से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि लालू यादव ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए इराज नाम रखने के पीछे कारण बताया था कि क्योंकि उनके पोते का जन्म मंगलवार को हुआ है और मंगलवार भगवान हनुमान का दिन माना जाता है, इसलिए उन्होंने हनुमान जी के ही एक नाम इराज पर अपने पोते का नाम रखा है।

नित्यानंद ने कहा कि उसके बाद से लगातार उनसे सवाल किया जा रहा था कि इराज नाम को लेकर काफी चर्चा है, वो बताएँ कि असल में यह शब्द हिंदी का ही है या संस्कृत का। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को ये भी शक है कि ये उर्दू का शब्द है। नित्यानंद ने इस पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि इंटरनेट भी इराज को भगवान हनुमान का नाम बता रहा है जबकि इराज संस्कृत का शब्द तो है, लेकिन यह हनुमान जी का नहीं बल्कि कामदेव का नाम है।

नित्यानंद ने बकायदा प्रमाण देते हुए बताया, “संस्कृत के दो प्रामाणिक कोश शब्दकल्पद्रुम और वाचस्पत्यम में इराज शब्द है। इन दोनों कोशों में हलायुध कोश का उद्धरण देते हुए बताया गया है कि इराज का अर्थ है कन्दर्प अर्थात कामदेव। इस प्रकार इराज एक संस्कृत नाम तो है पर कामदेव का, ना कि हनुमान का।”  

एक नहीं नित्यानंद ने अपनी वीडीयो में अनेक ऐसे साक्ष्य पेश किए जो इराज नाम का संबंध कामदेव से होने की पुष्ट करते हैं। अपनी वीडियो में उन्होंने ‘आप्टे संस्कृत हिंदी कोश’ और ‘मोनियर विलियम्स संस्कृत अंग्रेजी कोश’ का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें ईरज शब्द है और उसका मतलब है जिसका जन्म वायु से हुआ है, अर्थात भगवान हनुमान। उनका कहना है कि एक जैसे लगने वाले इन शब्दों में ईरज हनुमान का नाम है और इराज कामदेव का।

सोचने वाली बात है कि जिन्हें हिंदू धर्म और संस्कृति पर ज्ञान देने का शौक हो कम से कम उन्हें तो इससे संबंधित फैसले भली-भाँति जाँच कर के ही लेने चाहिए। असल में बात तो ये है कि लोगों की मानसिकता इतने तक ही सिमट कर रह गई है कि हम समाज में अपने किसी फैसले से समाज में एक उदाहरण पेश करें, भले ही बाद में उसकी आलोचना हो या वह पूर्ण असत्य और निराधार ही साबित क्यों ना हो जाए।